'संक्षितत शिवपुराणाह की विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
१-ध्यानस्थ शिव [ कविता | जी
२-शिवका स्तवन [ कविता | .( पाण्डेय पं०
श्रीरामनारायणदत्तजी शारह्री “राम? ) *** २
३-शिवपुराणमें शिवका खरू्प ' *** है
गेशिवपुराण-माहात्स्य
१-शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजी-
. का उन्हें शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिसा सुनाना *"* १७
+२-शिवपुराणके अ्रवणसे देवराजकोी शिवलोककी
प्राप्ति तथा चज्चुलाका पापसे भय एवं संसारसे
“” वैश्य । ह 275० ह८
/ ३-चब्चुढाकी प्रार्थनसे ब्राक्षणफता उसे पूरा
शिवपुराण सुनाना और समयानुसार शरीर
छोड़कर शिवलोकमें जा चज्चुलाका पार्वतीजीकी
सखी एवं सुखी होना लक *** २७०
४-चशब्चुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आशा पाकर
तुम्बुझका विन्ध्यपवेतपर शिवपुराणकी कथा
सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना
तथा उन दोनों दम्पतिका शिवघाममें सुखी
होना ७ ० न २२
५-शिवपुराणके अ्रवणकी विधि तथा श्रोतार्भोकि
पालन करने योग्य नियमोका वर्णन "** २५
भ्रीशिवमहापुराण ( विद्येश्वरखंद्िता )
२-प्रयागर्म सूतजीसे मुनिर्येका तुरंत पाप नाश
करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न ""* २७
२-शिवपुराणका परिचय. ** ““* २८
र-साध्य-साघन आदिका विचार तथा अ्रवण;
कीतेन और मनन--इन तीन साघरनोंकी श्रेष्ठता-
का प्रतिपादन द् 3990 <:
४-मेगवान् शिवके लिड्रः एवं साकार विग्रहकी
विषय । घृष्ठ-संख्या
पूजाके रहस्य तथा महत्वका वर्णन... * ३१
५-महेश्वरका ब्रक्मा ओर विष्णुकों अपने निष्कछ
ओर सकल खरूपका परिचय देते हुए लि७झ्न-
पूजनका महत्त्व बताना “' के
६-पॉनच कृर्त्योका प्रतिपादन; प्रणव एवं पदश्चाक्षर
मन्त्रकी महत्ता ब्रह्मा-विष्णुद्धारा भगवान् शिवकी
स्तुति तथा उनका अन्तर्धान हक केक.
७-शिवलिड्रकी स्थापना; उसके लक्षण ओर पूजन-
विधिका वर्णन तथा शिवपदकी प्राप्ति कराने
वाले सत्कर्मोका विवेचन "** है 5 लक
८-सोक्षदायक पृण्यक्षेत्रेका वणनः कालविशेषसमें
विभिन्न नदियोंके जंलर्म स्नानके उत्तम फलका
निदेश तथा तीथॉमें पापसे बचे रहनेकी
चेतावनी न * ३८
९-सदाचार, शोचाचाझ. स््नान।.. भस्मधारण;
संध्यावन्दन; प्रणव-जप+ गायत्री-जप, दान:
न्यायतः घनोपाजन तथा अमभिदेत्र आदिकी
विधि एवं महिमाका वर्णन * ३९
१०-अभियज देवयश्ञ ओर ब्रह्ममज्ष आदिका वर्णन:
भगवान् शिवके द्वारा सातों वार्रोका निर्माण
तथा . उनमें देवाराधनसे विभिन्न प्रकारके
फूलोकी प्राप्तितक॒ कथन *** ""* ४३
११-देश, काल) पात्र ओर दान आदिका विचार *** ४५
१२-य्ृथ्वी आदिसि निर्मित देव-प्रतिमाओके पूजनकी
विधि, उनके लिये नैवेधका विचार; पूजनके
विभिन्न उपचारोंका फल; विशेष मास; वार:
तिथि एवं नक्षत्रोके योगमें पूजनका विशेष फल
तथा लिड्के पेंानिक स्ल््पका विवेचन **" ५
१३-पडलिड्नखल्प प्रणवका मसाहात्म्य, उसके सूक्ष्म ..
रूप ( 3>कार ) ओर स्थूल रूप ( पश्चाक्षर गन्नर )
का विवेचन; उसके जपकी विधि एवं महिमा;
कार्यत्रहके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके॥ छोको-
तकका विवेचन करके काछातीत, पद्चावरण-
विशिष्ट शिवलोकके अनिर्बचनीय वैभवका निरूपण
तथा शिवभरक्ते के सत्कारकी महत्ता “*' ५१
१४-बन्धघन और सोक्षका विवेचन) शिवपूजाका
उपदेश; छिऊ्ग आदिमें शिवपूजनका विधान;
भस्मके खरूपका निरूपण और महत्त्वः शिव
एवं गुरु शब्दकी ब्युत्पत्ति तथा शिवके भस्म
घारणका रहत्य पर पद
१५-पार्थिवलिड्रके निर्माणकी रीति तथा वेद-मन्त्रो
द्वारा उसके पूजनकी विस्तृत एवं संक्षित विधिका
वर्णन *** ७५९
१६-पार्थिवपूजाकी महिसा,.. शिवनेवेधभक्षणके
विषयमें निर्णय तथा बिल्वका माहात्म्य.._ *** ६४
१७-शिवनाम-जप तथा भस्मधारणकी महिसा,
त्रिषुण्ड्के देवता और स्थान आदिका प्रतिपादन' *" ६६
१८-रुद्राक्षघारणकी महिमा तथा उसके विविध
मेदोंका वर्णन कह " ६९
रुद्रसंहिता प्रथम ( सृष्टि ) खण्ड
-अऋषियोके प्रशनके उत्तरमें नारद-ब्रह्म-संवादकी
अवतारणा करते हुए सूतजीका उन्हें नारदमोह
का प्रसड्र सुनाना; कामविजयके गवंसे युक्त हुए
मारदका शिव) ब्रह्मा तथा विष्णुके पास जाकर
अपने तपका प्रभाव बताना" ” "* ७२
२-मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिको कन्यापर
मोहित हुए नारदजीका भगवान् विष्णुसे उनका
रूप मौंगना; मगवानका अपने रूपके साथ उन्हें
वानरका-सा मुँह देना। कन्याका भगवानको
वरण करना और कुपित हुए! नारदका शिवगर्णो
को शाप देना बं ्
३-नारदजीका भगवान् विष्णुकी क्रोधपूर्वक
फ्टकारना और शाप देना फिर मायाके दूर
हो जानेपर पश्चात्तापपूवक भगवानके चरणोंमें
गिरना ओर शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान
विष्णुका उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य
जाननेके लिये ब्रह्मजीके पास जानेका आदेश
ओर शिवके भजनका उपदेश देना *** ७८
ह। फ्ः
हि रु श्स
वर पक
)
४-नारदजीका शिवतीय्मिें भ्रमण» शिवगर्णोको
शापोद्धारकी वात बताना तथा ब्रक्मठोकमें जाकर
ब्रह्मजीसे शिवतत््वके विपयर्म प्रश्न करना *'
५-महाप्रल्यकालमे केवल सदबझकी सत्ताका
प्रतिपादन, उस निगशुण-निराकार ब्रह्मसे ईश्वर-
मूर्ति ( सदाशिव ) का प्राकटय; संदाशिवद्वारा
सखरूपभूता शक्ति ( अम्बिका ) का प्रकटीकरण:
उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र ( काशी या आननद-
वन ) का प्रादुर्भोव) शिवके वामाड्से परम
पुरुष (विष्णु ) का आविर्भाव तथा उनके
सकाशसे प्राकृत तत्वोकी क्रमशः उत्पत्तिका
हो हा हे
६-भगवान् विष्णुकी नामिसे क्रमलका प्राडुभोंव:
शिवेच्छाबद ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना)
कमलनालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ
ब्रह्माका तप करना; श्रीदरिका उन्हें दशन देना,
विवादग्रस ब्रह्मा-विष्णुके वीचमें अग्नि-सतम्भका
प्रकट होना तथा उसके ओर-छोरका पता न
पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना
७-अह्मा और विष्णुकी भगवान् शिवके शब्दमय
शरीरका दशन ह
८-उमासहित भगवान् शिवका प्राकृट्य;। उनके
द्वारा अपने खरूपका विवेचन तथा ब्रह्म आदि
तीनो देवताओंकी एकताका प्रतिपादन
९-भीहरिको सृष्टिकी रक्षाका सार एवं भोग-
मोक्ष-दानका अधिकार दे भगवान् शिवका
अन्तर्धान होना द
१०-शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल
११-भगवान शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी
अनिवाये आवश्यकताका प्रतिपादन
२-शिव-पूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
१२-विभिन्न पुष्पों; अन्नों तथा जलादिकी घाराओँसे
शिवजीकी पूलाका माहात्म्य
१४-सृष्टिका वर्णन हे
१५-स्ायम्भुव मनु और शतरूपाकी, ऋषियोंकी
तथा दक्ष-कन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा
सती ओर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन
१६-यशदत्त-कुमारकों भगवान् शिवकी ऋपासे
कुबेरपदकी प्राप्ति तथा उनकी भगवान, शिवके
साथ मेत्री हल ही | अं १ हा, ३
१७-भगवान शिवका केस परवंतपर ग़मन तथा
सपछ्िखिण्डका उपसंहार ड़ ** १०६
द्रसंहिता छ्ठितीय ( सती ) खण्ड
श-नारदजीके प्रश्त ओर ब्रह्माजीके द्वारा उनका
उत्तर, सदाशिवसे ब्रिदेवोकी उत्पत्ति तथा
ब्रह्माजीसे देवता आदिकी खुष्टिके पश्चात् एक
नारी ओर एक पुरुषका प्राकस्य *"" १०८
२-कामदेवके नार्मोका निर्देश! उसका रतिके साथ
विवाह तथा कुमारी संध्याका चरित्र--वसिष्ठ
मुनिका चन्द्रभागपर्बंतपर उसको तपस्याकी
विधि बताना * १२०९
३-संध्याकी तपस्या; उसके द्वारा भगवान् शिवकी
स्तुति तथा उससे संतुष्ट हुए शिवका उसे
अमभीष्ट बर दे मैधातिथिके यशमें मेजना “*“' ११२
४-संध्याकी आत्माहुति, उसका अरुन्ध॒तीके रूपमें
. अवतीर्ण होकर मुनिवर वसिष्ठके साथ विवाह
करना; ब्रह्माजीका रुद्रके विवाहके लिये प्रयत्न
और चिन्ता तथा भगवान् विष्णुका उन्हें
('शिवाःकी आराधनाके लिये उपदेश देकर
चिन्तामुक्त करना हक १५१५
५-दक्षकी तपस्या और देवी शिवाका उन्हें
वरदान देना **' ११८
६-त्ह्माजीकी आज्ञासे दक्षद्वारा मंथुनी सृष्टिका
आरम्भ) अपने पुत्र हयइवों ओर शबल्ाश्वोको
निवृत्तिमागर्मं भेजनेके कारण दक्षका नारदकों
शाप देना *** " १२०
७-दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह; दक्ष ओर
वीरिणीके यहाँ देवी शिवाका अवतार दक्षद्वारा
उनको स्तुति तथा सतीके सदगुणों एवं
चेष्टाओंसे माता-पिताकी प्रसन्नता *** १२२
८-सतीकी तपस्यासे संतुष्ट देवताओंका कोल्शसमें
जाकर भगवान् शिवका स्तवन करना ** १२३
९-त्रह्माजीका रुद्रदेवसे सतीके साथ विवाह करने-
का अनुरोध, भीविष्णुद्वाए अनुमोदन और
भीरुद्रकी इसके लिये स्वीकृति “" श२५
१०-सतोको शिवसे वरकी प्रासि तथा भगवान्
शिवका ब्रह्माजीको दक्षके पास श्रेजकर सताका
वरण करना *** ! **" २१२७
) र
११-अह्ाजीसे दक्षकी अनुमति पाकर देवताओं और
मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना;
दक्षद्वार सबका सत्कार तथा सती और शिवका
विवाह
१ए-सती और शिवके द्वारा अभिकी परिक्रमा)
” १३०
श्रीहरिद्वारा शिवतत्त्वका वर्णन; शिवका ब्रह्माजीको
दिये हुए वरके अनुसार वेदीपर सदाके लिये
अवस्थान तथा शिव ओर सतीका विदा हो
केलासपर जाना
१३-सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें मगवान
शिवद्वारा शञान एवं नवधाभक्तिके खरूपका
विवेचन न् न न ।
१४-दण्डकारण्यमें शिवकोी ओऔरामके प्रति मस्तक
झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आश्ञासे
उनके द्वारा श्रीरामकी परीक्षा
१५-श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका
गोपेशके पदपर अमिषेक तथा उनके प्रति
प्रणामका प्रसद़ सुनाकर भीरामका सत्तीके मनका
संदेह दूर करना; सतीका शिवके द्वारा
मानसिक त्याग ह॒
१६-प्रयागमेँं समस्त महात्मा मुनियोद्वारा किये
गये यज्ञर्म दक्षका भगवान् शिवको तिरस्कार-
पूवंक शाप देना तथा नब्दीद्वारा ब्राह्मणकुलको
शाप-प्रदान+। भगवान् शिवका ननन््दीको
शान्त करना " हे
१७-दक्षके द्वारा महान यज्षका आयोजनः उसमें
ब्रह्मा) विष्णु, देवताओं और. ऋषियोका
आगमन) दक्षद्वारा सबका सत्कारः यशका
आरम्भ) दघीचढद्वारा भगवान् शिवको बुलानेका
अनुरोध और दक्षके विरोध करनेपर शिव-
भक्तोका वहाँसिे निकल जाना
१८-दक्ष-यज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ
चलनेके लिये अनुरोध; दक्षके शिवद्रोहको
जानकर भगवान् शिवकी आज्ासे देवी सतीका
पिताके यज्ञमण्डपकी ओर शिवगर्णोके साथ
प्रस्थान
१९-यज्ञशाल्यर्मं शिवका भाग न देखकर सतीके
रोषपूर्ण वचन) दक्षद्वारा शिवकी निन््दा सुन
दल्ष तथा देवताओरकोी घिक्कार-फटकारकर
' १३१
शैदेरे
>ौ* १३५
१३७
/ २४०
शहर
” २४४
सतीद्वारा अपने प्राण-त्यागका निश्चय
२०-सतीका योगामिसे अपने शरीरकों भस्म कर
देना; दशेकोका हाह्मकार, शिवपाष॑दोका प्राण-
त्याग तथा दक्षपर आक्रमण, ऋशभुओंद्वारा उनका
ु भगाया जाना तथा देवतारओंकी चिन्ता
२१-आकाशवाणीद्वारा दक्षको भत्सेना, उनके
विनाशकी सूचना तथा समस्त देवताओंको
यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्रेरणा
२२-गर्णोके मुखसे ओर नारदसे भी सतीके दरग्घ
होनेकी बात सुनकर दक्षपर कुपित हुए शिवका
अपनी जगसे वीरभद्र ओर महाकालीको प्रकट
करके उन्हें यश-विध्यंस करने ओर विरोधियोको
जल्ा डालनेकी आज्ञा देना
२३-प्रमथगर्णोंसहित वीरभद्र ओर महाकालीका
दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रद्यान। दक्ष तथा
देवताओंकी अपशकुन एवं उत्पातसूचक
लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना पे
२४-दक्षकी यश्की रक्षाके लिये भगवान विष्णुसे
प्राथना। भगवानका शिवद्रोह-जनित संकटको
ठालनेमें अपनी असमथता बताते हुए दक्षको
समझाना तथा सेनासहिंत वीरभद्रका आगमन
२५-देवताओंका पलायन; इन्द्र आदिके पूछनेपर
बूहस्पतिका रुद्रदेवकी अजेयता बताना;
वीरभद्रका देवताओंकों युद्धके लिये छलकारना;
श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत तथा विष्णु
आदिका अपने लोकमें जाना एवं दक्ष ओर यशका
विनाश करके वीरभद्रका केछासको लोठना “*'
२६-श्रीविष्णुकी पराजयमें. दघीच मुनिके
शापकोी कारण बताते हुए दधीच ओर क्षुवके
विवादका इतिहास); मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे
दधीचकी अवध्यता तथा भीहरिका क्षुवकों
दधीचकी पराजयके लिये यक्ञष करनेका
आश्वासन
२७-श्रीविष्;पु ओर देवताओंसे . अपराजित
दघीचका उनके लिये शाप ओर क्षुवपर
अनुमह हे
२८-देवतार्भोसहित वब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर
अपना दुश्ख निवेदन करना भ्रीविष्णुका
उन्हें शिवसे क्षमा मॉगनेकी अनुमति दे उनको
( ६ )
/ २१४५
” २९४७
. १४९
हि ५ (् ०0
१५२
१५३
१५५
१५७
. १६०
साथ ले केलासपर जाना तथा भगवान् शिवसे
मिलना शी * २१६१
२९-देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान्
शिवका देवता आदिके अड्ञोंके ठीक होने ओर
दक्षके जीवित होनेका वरदान देना, भ्रीहृरि
आदिके साथ यज्ञमण्डपर्में पधारकर शिवका
दक्षकों जीवित करना तथा दक्ष ओर विष्णु
आदिके द्वारा उनकी स्तुति *** १६२
३०-भगवान् शिवका दक्षकों अपनी भक्तवत्सलता,
शानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवताओंकी
एकता बताना; दक्षका अपने यशकों पूर्ण करना)
सब देवता आदिका अपने-अपने ख्ानको
जाना; सतीखण्डका उपसंहार ओर माहदात्म्य' *"" १६५
रुद्रसंहिता तृतीय ( पावती ) खण्ड
१-हिमालयके स्थावर-जंगम ट्विविध खरूप एवं
दिव्यत्वका वर्णन; मेनाके साथ उनका विवाद
तथा मेना आदिको पूवजन्ममें प्राप्त हुए
समनकादिके शाप एवं वरदानका कथन *** १६७
२-देवताओंका हिमाल्यके पास जाना और उनसे
सत्कृत हो उन्हें उमाराधनकी विधि बंता खय॑
भी एक सुन्दर स्थानर्मे जाकर उनकी स्छ॒ति
करना कक * १६८
३-उमा देवीका दिव्यरूपसे देवताओंकों दशन
देना, देववाओका उनसे अपना अमिप्राय
निवेदन करना और देवीका अवतार लेनेकी
बात सीकार करके देवताओको आश्वासन देना १६९
४-मेनाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवा देवीका उन्हें
अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना तथा मेनासे
मेनाकका जन्म हक ** १७१
५-देवी उम्राका हिमवानके हृदय तथा मेनाके
गर्भमें आना; गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा
स्तवन; उनका दिव्यरूपमें प्राहुभोवः माता
मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रुपमें
परिवर्तित होना हे ** १७३
६-पावतीका नामकरण ओर विद्याध्ययन, नारदका
हिमवानके यहाँ जाना; पावंतीका हाथ देखकर
भावी फछ बताना, चिन्तित हुए हिमवानकों
आश्वासन दे पावेतीका विवाह शिवजीके साथ
करनेकी कहना और उनके संदेशका निवारण
करना 35
७-मैना और हिमाल्यकी बातचीत) पावती तथा
हिंमबानके खप्न तथा भगवान शिवसे ५मन्नल?
ग्रहकी उत्पत्तिका प्रसड़ *** /' १७६
८-भवान् शिवका गदन्नावतरणतीर्थर्में तपत्याके
लिये आना+ हिमवानद्वारा उनका खागत,;
पूजन ओर स्तवन तथा भगवान् शिवकी
आशाके अनुसार उनका उस स्थानपर दूसरोंको
न जाने देनेकी व्यवस्था करना कह
९-हिमवावका पावंतीको शिवकी सेवार्से रखनेके
लिये उनसे आज्ञा सॉंगना ओर शिवका कारण
बताते हुए, इस प्रस्तावकी अखीकार कर देना १८०
१०-पावती और शिवका दाशनिक संवाद, शिवका
पाबंत्रीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा
पावतीद्वाय भगवानकी प्रतिदिन सेवा *"* १८१
११-तारकासुरसे सताये हुए! देवताओंका ब्रह्माजीको
अपनी कष्टकथा सुनाना; ब्रह्माजीका उन्हें
पावतीके साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग
करनेका आदेश देना; ब्रह्माजीके समझानेसे
तारकासुरका खर्गकों छोड़ना और देवताओंका
वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्नशील
होना
१२-इन्द्रह्मारा कामका स्मरण, उसके साथ उनकी
बातचीत तथा उनके कहनेसे कामका शिवको
मोहनेके लिये प्रस्थान ४ऊ ३ ३7%: ७
१३-रुद्रकी नेत्राग्सिसि कामका भस्स होना; रतिका
विलाप) देवताओंकी प्रारथनासे शिवका कामको
द्वापरमें प्रदम्नरूपसे नूतन शरीरकी प्रासिके
लिये वर देना ओर रतिका शम्बर-नगरमें
जाना
१४-अक्माजीका शिवकी क्रोधाभिकों वडवानलूकी
संश दे सपुद्र्मं स्थापित करके संसारके
भयकी दूर करना; शिवके विरहसे पारवतीका
शोक तथा नारजीके द्वारा उन्हें तपस्याके
लिये उपदेशपूवेक पदञ्ञाक्षर मन्नकी प्राप्ति
१५-श्री शिवकी आराधनाके लिये पावंतीजीकी
दुष्कर तपस्या
१६-सावंतीकी तपस्थाविधयक हृढ़ता। उनका
पहलेसे भी उग्र तप» उससे त्रिलोकीका संतप्त
१७८
१८ ३
१८४
२१८५
२१८७
१९०
होना तथा समस्त देवताओँके साथ ब्रझी
ओर विष्णुका भगवाच शिवके स्थानपर जाना
१७-देवताओंका भगवान् शिवसे पावतीके साथ
विवाह करनेका अनुरोध; भगवानका
विवाहके दोष बताकर अखीकार करना तथा
उनके पुनः प्राथना करनेपर स्त्रीकार कर लेना
१८-भगवान शिवकी आज्ञसे सद्नर्षियोका पावंतीके
आश्रमपर जा उनके शिवविषयक अनुरागकी
परीक्षा करमा ओर भंगवानकों सब प्ृत्तान्त
बताकर खरगकों जाना “**
१९-भगवान् शंकरका जटिल तपस्त्री ब्राह्मणके
रूपमें पावतीके आशभ्रमपर जाना; उनसे
सत्कृत हो उनकी तपस्याका कारण पूछना
तथा पावेतीजीका अपनी सखी विजयासे
सब कुछ कहलाना
२०-पावतीकी बात सुनकर जयधारी ब्राह्मणका
शिवकी निन््दा करते हुए पावत्तीको उनकी
ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना ***
२१-पार्वतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका प्रति-
पादन करना। रोषपुवबंक जटिल ब्राह्मणको
फटकारना। सखीद्वारा उन्हें फिर बोलनेसे
रोकना तथा भगवान् शिवका उन्हें प्रत्यक्ष
दर्शन दे अपने साथ चलनेके लिये कहना
२२-शिव ओर पार्वतीकी बातचीत, शिवका
पावेतीके अनुरोधको स्वीकार करना
२३-पावंतीका पिताके घरमें सत्कार। महादेवजीकी
नव्लीलाका चमत्कार; उनका मेना आदिसे
पार्वतीको मौगना और माता-पित्ताके इन्कार
करनेपर अन्तर्घान हो जाना की
२४-देवतारर्सके अनुरोधसे वेष्णव ब्राह्मणके वेषमें
शिवजीका हिमवानके घर जाना और शिवकी
निन््दा करके पावंतीका विवाह उनके साथ
ने करनेको कहना
२५-मेनाका कोपभवनर्म प्रवेश) भगवान् शिवका
हिमवानके पास सप्तषियोंकों भेजना तथा
हिमवानद्वारा उनका सत्कार। सप्तपिर्यो
तथा अरुन्चतीका ओर महंपि वसिष्ठका
मेना ओर हिंमवानकी समझाकर पाव॑त्तीका
विवाह मगवान् शिवक्के साथ करनेके लिये
१९१
१९३ े
१९५
१९९
२०१
२०३
२०४
२०६
कमा ही
२६-सप्तषियोंके समझाने तथा मेद्द आदिके कहनेसे
पत्नीसहित हिमवानका शिवके साथ अपनी
पुत्रीकेी विवाहका निश्चय करना तथा
सप्तषियोंका शिवके पास जा उन्हें सब बात
बताकर अपने धामको जाना
२७-हिमवानका भगवान् शिवके पास लम्मपत्रिका
' ेजना) विवाहके लिये आवश्यक सामान
जुटाना। मड्गलाचारका आरम्भ करना; उनका
निमन्त्रण पाकर पव॑तों ओर नदियोका दिव्य-
रूपमें आना; पुरीकी सजावट तथा विश्व-
कर्माद्वारा दिव्यमण्डप एवं देवतार्थोके निवासके
लिये दिव्यलोकीका निर्माण करवाना
२८-मगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओं
को निमनन््त्रण दिखाना; सबका आगमन तथा :
शिवका मड्गलछाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके
केलछाससे बाहर निकलना
२९-भगवान् शिवका बारात लेकर हिमाल्यपुरी
की ओर प्रस्थान
३०-हिंमवानद्वाारा शिबकी बारातकी अगबानी
तथा सबका अमिनन्दन एवं वन्दनः मेनाका
नारदजीको बुछझाकर उनसे बरातियोंका परिचय
पाना तथा शिव ओर उनके गणोंको देखकर
भयसे मूच्छित होना हे
३१-मेनाका विछाप; शिवके साथ कन्याका विवाह
. न करनेका हृठ) देवताओं तथा श्रीविष्णुका
उन्हें समझाना तथा उनका सुन्दर रूप घारण
करनेपर ही शिवको कन्या देनेका विचार
प्रकट करना
३२-भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य
रूपको प्रकट करना) मेनाकी प्रसन्नता और
क्षमा-प्राथना तथा पुरखासिनी ब्नरियोंका
शिवक्रे रूपका दर्शन करके जन्म ओर जीवनको
सफल मानना
३३-सेनाद्वारा द्वाररर भगवान् शिवका परिछनः
उनके रूपको देखकर संतोषका अनुभव;
अन्यान्य युवर्तियाद्वारा बरकी प्रशंसा; पार्वती-
का अम्बिकापूजनके लिये बाहर निकलना
तथा देवताओं और भगवान् शिवका उनके
( ८ )
२०७
२१०
९९९
२५१५
२१७
२१८
२२०
२२३
सुन्दर रूपको देखकर प्रसन्न होना. *''
२४-वरपक्षके आभूषणोसे विभूषित शिवाकी
नीराजना, कन्या-दानके समय वरके साथ
सब देवताओंका हिमाचलके घरके आँगनमें
विराजना तथा वरवधूके द्वारा एक-दूसरेका
पूजन
३५-शिव-पावतीके विवाहका आरम्भ, हिमाल्यके
द्वारा शिवके गोत्रके विषय प्रश्न होनेपर
नारदजीके द्वारा उत्तर, हिमाल्यका कन्या-
दान करके शिवकों दहेज देना तथा शिवा-
का अभिषेक हे
३६-शिवके विवाहका उपसंहार, उनके द्वारा
दक्षिणा-वितरण; वस्-वंधूका कोहबर और
वासभवनमें जाना; वहाँ खस्रियोका उनसे
लोकाचारका पारून कराना; रतिकी प्रार्थनासे
शिवद्वारा कामको जीवनदान एवं वर-
प्रदान, वस्वधूका एक-दूसरेकी मिप्ठान्न
भोजन कराना ओर शिवका जनवासेमें
लोय्ना
३७-रातको परम सुन्दर सजे हुए वासग्हमें शयन
करके प्रातःकाल भगवान् शिवका जनवासेमें
आगमन
३८--चतुर्थीकम, बारातका कई दिनोतक ठहरना;
सप्तषियोंके समझानेसे हिमालयका बारातकों
विदा करनेके लिये राजी होना; मेनाका
शिवकों अपनी कन्या सॉपना तथा बारातका
पुरीके बाहर जाकर ठहरना
३९-मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नीका
पावेतीकों पतिवतधमंका उपदेश देना
४०-शिव-पावंती तथा उनकी बारातकी बिदाई)
भगवान् शिवका समस्त देवताओंको विदा करके
केछासपर रहना ओर पाव॑तीखण्डके
श्रवणकी महिमा डे
रुद्रसंहिता: चतुर्थ ( कुमार ) खण्ड
१-देवताओंद्वारा स्कन्दका शिव-पार्वतीके पास
छाया जाना। उनका ह्मड्ु-प्यार। देवौके
मॉगनेपर शिवजीका उन्हें तारक-बंधके लिये
खामी कार्तिकको देना; कुमारक्की अध्यक्षता-
सें देवसेनाका प्रर्थान) सही-सागर-संगमपर
२२५
२२६
२२७
२२९
“श३१
२३२
२३१
२१७
तारकासुरका आना
. मुठभेड़ वीरमद्रका तारकके साथ घोर
संग्राम) पुनः श्रीहरि और तारकमें
भयानक युद्ध 3 "
२-ब्रह्माजीकी आशासे कुमारका युद्धके लिये
जाना; तारकके साथ उनका भीषण संग्राम
ओर उनके द्वारा तारकका वध) तत्यश्रात्
देवोंद्वारा कमारका अभिनन्दन आओर स्तवनः
कुमारका उन्हें वरदान देकर केछासपर जा
शिव-पावतीके पास निवास करना
३-शिवाका अपनी मेल्से गणेशको उत्पन्न करके
द्वारपाल-पदपर नियुक्त करना; गणेशद्दारा
शिवजीके रोके जानेपर उनका शिवगर्णके
साथ भयंकर संग्राम, शिवजीद्वारा ग़णेशका
शिरब्छेदन) कुपित हुई शिवाका शक्तियोंको
उत्पन्त करना ओर उनके द्वारा प्रल्य
मचाया जाना; देवताओं ओर कअ्षियाका
खसवनद्वारा पावतीकों प्रसन्ष करना) उनके छ्वारा
पुत्रकों जिलाये जानेकी वात कद्दी जानेपर
शिवजीके आशानुसार हाथीका सिर छाया
जाना ओर उसे गणेशके घड़से जोड़कर
उन्हें जीवित करना
४-पाव॑तीद्वार गणेशजाकों वरदान) देवोंद्वारा
उन्हें अग्रपूज्य माना जाना; शिवजीद्धारा
गणेशको स्वाध्यक्षपद्-प्रदान और गणेश-
चतुर्यात्रतका वर्णन, ततल्मश्वात् सभी देवताओं
का उनकी स्व॒ति करके हृषपूवक अपने-अपने
स्थानको लोट जाना **' हे
५-स्वामिकार्तिक और गगणेशकी बाललीला,
दोनोका परस्पर विवाहके विषयमें विवाद:
शिवजीद्वारा प्रथ्वी-परिक्रमाका आदेश;
कातिकेयका प्रस्थान, गणेशका माता-पिताकी
परिक्रमा करके उनसे प्रथ्वी-परिक्रमा स्वीकृत
कराना; विश्वल्पकी सिद्धि ओर बुद्धि नामक
दोनों कन्याओंके साथ गणेशका विवाह और
उनसे क्षेम तथा छाभ नामक पुत्नोंकी उत्पत्ति;
कुसारका प्ृथ्वीयरिक्रमा करके छोटना और
छुद्ध होकर क्रौख्व परवेद्पर चउब्प जाना;
कुमारखण्डक्षे अ्रवगक्ती महिमा हक
कक छः का
कमा
8 ]
धो]
और दोनों सैनाओँमें
रुदहसंहिताः पश्चम ( युद्ध ) खण्ड
१-तारक-पुत्र तारकाक्ष) विद्युन्माडी और कमलाक्ष-
की तपस्या; ब्रह्माद्दरा उन्हें वरम्रदान;
मयद्वाश उनके लिये तीन पुरोंका निर्माण और
उनकी सजावट-शोभाका वर्णन ५
२-तारक-पुत्रोंके प्रभावसे संतत्त हुए देवोकी
ब्रह्मके पास करुण पुकार; ब्रह्माका उन्हें
शिवके पास भेजना शिवक्री आज्ञासे देवोका
विष्णुकी शरणमें जाना और विष्णुका उन
देत्योंकी मोहित करके उन्हें आचार-प्रष्ट
करना ही
३-देवोंका शिवजीके पास जाकर उनका
स्तवन करना शिवजीके त्रिपुरवधके लिये
उद्यत न इनेपर ब्रह्मा ओर विष्णुका उन्हें
समझाना, विण्णुके बतलाये हुए शिवग्न्त्रका
देवोद्वारा तथा विष्णुद्वारा जप: शिवजीकी
प्रसल्षता ओर उनके ढिये विश्वकर्माद्वारा
सन्देवमय रथका निर्माण ४६
२३९
२४१
क कफ
४-सर्वदेवमय रथका वर्णन, शिवजीका उस
रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्र्मानः उनका
पशुपति नाम पड़नेका कारण, शिवजीद्वारा .
गणेशका पूजन ओर निपुर-दाह। मयदानवका
त्रिपुससे जीवित बच निकलना सा
५--देवोके स्तवनसे शिवजीका कोप शान््त होना
ओर शिवजीका उन्हूँ वर देना; मय दानवका
शिवजीके समीप आना ओर उनसे वर-याचना
करना; शिवजीसे वर पाकर मयका वितल-
लोकम जाना बी ५
६-दम्भकी तपस्या ओर बिण्णुद्धारा उसे पृत्न-
प्राप्तिका वरदान) शबझ्लनचूडका जन्मः तप
ओर उसे बरप्राप्ति, अनह्माजीकी आशासे उसका
पुष्करमें तुलसीके पास आना और उसके
साथ वार्तालाप; ब्रद्माजीका पुनः वहाँ प्रकट
होकर दोनोंको आश्यीर्वाद देना और शज्ज-
चुडका गान्वव विवाहकी व्रिधिसे तुरूसोका
पाणिग्रहण करना
७-इच्चचूडका असुरराज्यरर अभिषेक
उसके द्वारा देवोका अधिकार
देवाका ब्रह्माकी दरणमें जाना;
२४३२
२७४७
ओर
छीना जाना;
२४९ व्रद्माका उन्हें
|
२५३
र्५५
२५६
२५९
२६३
साथ लेकर विष्णुके पास जाना; विष्णुद्वारा
शहछुचूडके जन्मका रहस्योद्घाटन और फिर
चारमें प्रवत्त होना। उसके मनस्च्रियेद्वारा
शिव-परिवारका वर्णन, पार्वतीके सीन््दर्यपर
सबका शिवके पास जाना ओर शिवसभामें
उनकी झौँकी करना तथा अपना अभभिप्राय
१३-भाइयेंकि उपाल्म्मसे अन्चक्ृका तप करना
ओर वर पाकर तचिल्मेकीको जीतकर स्वेच्छा-
मोहित होकर अन्चकका वहाँ जाना ओर
नन््दीश्वरके साथ युद्ध/ अन्धकके प्रद्मारसे
परिवारसमेत द्वारकाकों ोट आना, बाणका
ताण्डव नृत्यद्वदारा शिवको प्रसन्न करना .
प्रकट करना २६७ ननन््दीववरकी मूर्ज्छा) पाव॑तीके आवाइनसे
८-देवताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख देवियोका प्रकट होकर युद्ध करना; शिवका
निवेदन करना+ झुद्रद्धार उन्हें आश्रासन आगमन ओर युद्ध। शिवद्वारा झुक्राचार्यका
ओऔर चित्ररथकों शझ्नचूडके पास मेजना, निगछा जाना शिवकी प्रेरणासे विष्णुका
खित्ररथके लौटनेपर रुद्रका गणों। पुत्री ओर कालीरूप घारण करके दानवोंके रक्तका पान
भद्रकालीसहित युद्धके लिये प्रस्थान) उघर करना; शिवका अन्वककों अपने निश्नूलमें
दह्लुचूडका सेनासहित पुष्पभद्राके तठपर पिरोना और युद्धकी समाप्ति "** २८०
पड़ाव डालना तथा दानवराजके द्त और १४-ननन््दीश्वरद्वारा शुक्राचायका अपहरण और
शिवकी बातचीत ““* २६९ शिवद्वारा उनका निगला जाना; सो वर्षके
९-देवताओं ओर दानवोंका युद्ध: शह्लचूडके बाद श॒क्रका शिवलिड्गके रास्ते बाहर
साथ वीरभद्गरका संग्राम/ पुनः उसके साथ निकलना, शिवद्वारा उनका #शुक्र! नाम
भद्रकालीका भयंकर युद्ध करना ओर रखा जाना; झुक्रद्वारा जपे गये मृत्युंजय मन्त्र
आकाशवाणी सुनकर निवृत्त होना; शिवजीका ओर शिवाष्टोत्तरातनामस्तोत्रका वर्णन; शिव-
शहुचूडके साथ युद्ध ओर आकाशवाणी हारा अन्धककों वर-प्रदान डक"
सुनकर युद्धसे निव्नच्त हो विष्णुकों प्रेरित १५-आुक्राचायंकी घोर तपस्या ओर इनका
करना; विष्णुद्धारा शहनचूडके - कवच ओर शिवजीको चित्तरक्ष अर्पप. करना तथा अष्ट-
तुलूसीके शीलका अपहरण; फिर रुद्रके हाथों मृस्येष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना;
त्रिशूलद्वारा शहनचूडका बंध, श्भकी उत्तत्ति- शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी
का कथन न 73० अराइर विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना २८८
१०-विष्णुद्धारा तुलसीके शील-हरणका वर्णन; १६-बाणासुरकी तपस्या ओर उसे शिवद्वारा
कुपित हुई ठुलसीद्वारा विष्णुकी शाप; वर-प्राप्ति) शिवका गर्णों और पृत्रोसहित उसके
दाम्भुद्दारा तुलूसी ओर शाल्प्राम-शिलाके नगरमें निवास करना, बाणपुत्री ऊषाका
माहात्म्यका वर्णन "** शृ७५ रातके समय खप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन)
११-उमाद्वारा शम्मुके नेत्र मद लिये जानेपर चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण)
अन्धकारमें शम्भुके पसीनेसे अन्धकासुरकी बाणका अनिरुद्धको नागपाशर्में बाँघनाः दुर्गाके
उत्पत्ति, हिरिण्याक्षकी पुत्रार्थ तपस्या और स्तवनसे अनिरुद्धका बन्धनमृक्त होना, नार-
शिवका उसे पृत्ररूपमें अन्धकको देना; द्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुर-
हिरपण्याक्षका त्रिकोकीकी जीतकर प्रथ्वीको पर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध:
रसातलमें ले जाना ओर वराहरूपघारी शिवकी आज्से श्रीकृष्णका उन्हें जम्मणास्से
विष्णुद्दारा उसका वध “'' “** २७६ मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना. २१९०
१२-हिरण्यकशिपुकी तपस्या ओर ब्रह्मासे वरदान १७-श्रीक्ृष्णद्वारा बाणकी भुजाओंका काथ जाना$
पाकर उसका अत्याचार: नइरसिहृद्यारा उसका सिर कायनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको
वध ओर प्रह्मादको राज्य २७८ शिवका रोकना ओर उन्हें समझाना) श्रीकृष्णका
शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानोंके साथ
महाकाल्त्वकी प्राप्ति **'
१८-गजासुरकी. तपस्या; वर-प्राप्ति और उसका
अत्याचार; शिवद्वारा उसका घघध, उसको
प्राथनासे.शिवका उसका चमे घारण करना
और “कृत्तिवासाः नामसे विख्यात होना
तथा कृत्तिवासेश्वर लिड़की स्थापना करना
१९-हन्दुभिनिर्दांद नामक देत्यका व्याप्नरूपसे
शिवभक्तपर आक्रमण करनेका विचार और
शिवद्वारा उसका वध **'
२०-विदछ और उत्पर नामक दुर्त्योंका पार्वतीपर
मोहित हेना ओर पारबतीका कन्दुक-प्रद्दर
द्वार उनका काम तमास करना कन्दुकेश्वरकी
स्थापना ओर उनकी महिमा
शतरुठ्संहिता
१-शिवजीके सद्योजात, वामदेव) तत्पुरुष, अधघोर
ओर ईशान नामक पाँच अवतारोंका वर्णन
२-शिवजीकी अष्टमूतियोंका तथा अधेनारीनर-
रूपका सविस्तर वर्णन' हक
३-वाराहकल्पमें होनेवाले शिवजीके प्रथम अवतारसे
लेकर नवम ऋषभअवतार तकका वर्णन ***
४-शिवजीद्वार दसवेंसे लेकर अटटदेसवे
योगेश्वरावतारोंका वर्णन **' श
५-नन्दीश्वरावतारका वर्णन **' ब
६-नन्दीश्वरके जन्म) वरप्राप्ति, अभिषेक और
विवाहका वर्णन के हक
७-कालभेरवका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या और
शिवजीका. प्रसन्न होकर उनकी पत्नी
शुनिष्मतीके गर्भसे उनके पुत्ररूपमें प्रकट होनेका
उन्हें वरदान देना
८-शिवजीका शुकिष्मतीके गर्भसे प्राकस्य; ब्रह्मा
द्वारा बालकका संस्कार करकेभ्णहपति!नाम रखा
जाना। नारदजीद्वार उसका भविष्य-कथन;
पिताकी आशासे शृहपतिका काशीमें जाकर
तप करना; इन्द्रका वर देनेके लिये प्रकट होना;
गृह्पतिका उन्हें हुकराना; शिवजीका प्रकट
होकर उन्हें वरदान देकर दिक्पालपद
प्रदान करना तथा अग्नीश्वर लिड्रः ओर अग्निका
माशत्म्य के / 588
९-आिबजीके महाकाल सादि दरू अवतारोंका
(
२९४
२९६
२९७
२९७
२०८
६६
)
तथा ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन
१०-शिवजीके दुर्वासावतार। तथा हनुमदवतार
का वणन हक
११-शिवजीके . पिप्पछाद-अवतारके प्रसद्रम
देवतार्भमोकी दघीचि युनिसे अस्थि-याचना;
द्धीचिका शरीस्त्याग, वजच्-निमोण तथा
उसके द्वारा प्त्रासुकका वधः खुवचोंका
देवताओंकी शाप; पिप्पछादका जन्म
और उनका विस्वृत घृत्तान्त ड़
१२-भगवान् शिवके द्विजेश्वरावतारकी कथा---
राजा भद्रायु तथा रानी कीतिमालिनीकी घामिक
इढताको परीक्षा को 8
१३-भगवान् शिवका यतिनाथ एवं हंस नामक
कक ही 5०३
१४-भगवान् शिवके कृष्णदशन नामक अवतारकी
कक श है
१५-भगवान् शिवके अवधूतेश्वरावतारकी कया
ओर उसकी महिमाका वर्णन के
१६-मगवान् शिवके भिक्षुवयावतारकी कथा;
राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा... ***
१७-शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा; उपमन्युकी
तपस्या ओर उन्हें उत्तम वरकी प्राप्ति. **'*
१८-शिवजीके किरातावतारके प्रसड्डमें शीकृष्ण-
द्वारा देतवनमें दुर्वासाके शापसे पाण्डवॉंकी
रक्षा, व्यासजीका अजुनकों शक्रविद्या और
पार्थिवपृजनकी विधि बताकर तपके लिये सम्मति
देना; अज्ञुनका इन्द्रकील पर्वतपर तप, इन्द्रका
आगमन ओर अजुनको वरदान अर्जुनका
शिवजीके उद्देश्य्से पुनः तपमें प्रच्नत्त
होना लक
१९-किरातावतारके प्रसड्में मूक नामक देत्वका
-. झूकर-रूप धारण करके अजुनके पास आना;
शिवजीका किरातवेषमें प्रकट होना और अर्जुन
तथा किरातवेषघारी शिवद्वारा उस देत्यका वध
२०-अजुन और शिवदृतका वार्तालाप, किरातवेष-
घारी शसिवजीके साथ अजुनका युद्ध;
पहचाननेपर भजुनद्वारा शिवस्तुति, शिवजीका
भजुनको वरदान देकर अन्तर्घान होना; अर्जुन-
का आश्रगपर लछोटकर भाश्येसे मिलना,
३२१३
३१५
१२१६
२१८
३२०
३२१
२२२
९१२४
१२६
२२७
३२२५
भीकृष्णका अज्ञुनसे मिलनेके लिये वहाँ पघारना
२११-शिवजीके द्वाइश ज्योतिलिज्गावतारोंका
सविस्तर वणन कर
काठिरुद्धसंद्विता
१-द्वादश च्योतिलिंड्रों तथा उनके उपलिड्रॉका
वर्णन एवं उनके दशेन-पूजनकी महिया
२-काशी आदिके विभिन्न लिड्डोका वर्णन तथा
अन्नीश्वरकी उत्त्तिके प्रसद्गभमें गड़ा और शिव
के अन्रिके तपोवनमें नित्य निवास करनेकी
कं हक
३-छषिकापर भगवान् शिवकी कृपा; एक
असुरसे उसके घर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें
धनन्दिकेश”ः मामसे निवास करना ओर वर्षमें
एक दिन गडद्जाका भी वहाँ आना
४-प्रथम ज्योतिलिंक़ सोमनाथके प्रादमोवकी
कथा और उसकी महिमा
५-मल्लिकार्जुन और महाकालनामक ज्योतिलिड्न-
के आविभोवकी कथा तथा उनकी महिमा **'*
६-मद्दाकालके माहात्म्यके प्रसड़में शिवभक्त राजा
चन्द्रसेन तथा गोप-बालक भ्रीकरकी कथा
७-विन्ध्यकी तपस्या भोकारमें परमेश्वर लिझ्षके
प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन **'
८-केदारेश्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिलिब्नोंके
आविभांवकी कथा तथा उनके माहात्म्यका
शत हे
९-विश्वेश्वर ज्योतिलिड़् ओर उनकी महिमाऊे
प्रसड़में पद्वक्रोशीकी महत्ताका प्रतिपादन **'
२० --वाराणसी तथा विर्वेश्वरका माहत्म्य
१ १-ब्यम्बक ज्योतिरलिंड्नके प्रसद्न्में महर्षि गोतम-
के द्वारा किये गये परोपकारकी कथा; उनका
तपके प्रभावसे अक्षय जल प्राप्त करके क्राषियों-
की अनाइष्टिके कष्टसे रक्षा करना; ऋषियोंका
छल्पूर्वक उन्हें गोहत्यामें फैंसलाकर आशअभ्रमसे
निकालना ओर शुद्धिका उपाय बताना
१२-पत्नीसहित गोतमकी आराधनासे संतुष्ट हो
भगवान् शिवका उन्हें दर्शन देना, गड़गको
वह्दं स्थापित करके सखय॑ं भी स्थिर होना;
देवताओंका वहाँ बृहस्पतिकके सिंहराशिपर आते
पर ज्ञगजीके विशेष माहात्म्यको स्वीकार करना,
२२८
२३५५
गन्जाका गोतमी ( या गोदावरी ) नामसे ओर
शिवका त्यम्बक ज्योतिलिड्गके नामसे विख्यात
होना तथा इन दोनोंकी महिमा
१२-वेद्यनायेश्वर ज्योतिलिज्नके प्राकव्यक्नी कथा
तथा! महिमा हक ं
१४-नागेश्वर नामक ज्योतिलिंज्गका प्रादुभाव और
उसकी महिमा क
१५-रामेश्वर नामक च्योतिलिंड्रके आविभ्भाव तथा
माहात्मयका वण॑न्
१६-घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका
जीवित होना; घुब्मेश्वर शिवका प्रादु्भाव तथा
उनकी महिसाका वर्णन
१७-शंकरजीकी आराधनासे मगवान् विष्णुको सुदर्शन
चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा देत्योंका संद्वार * * *
१८-भगवान् विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्ननाम-स्तोन्न
१९-भगबान् शिवकों संतुष्ट करनेवाले व्रतोंका वर्णन;
शिवरात्रि.ब्रतकी विधि एवं महिसाका कथन ''
२०-शिवरात्रि-्रतके उद्यापनकी विधि
२१-अनजानमें शिवरात्रि-त्रत करनेसे एक भीलपर
भगवान् शंकरकी अद्भुत कृपा ५३
२२-मुक्ति ओर भक्तिके स्वरूपका विवेचन
२३-शिव, विष्णु, रुद्र और ब्रह्माके स्वरूपका विवेचन
२४-शिवसम्बन्धी तत््वज्चानमा वर्णन तथा उसकी
महिमा; कोयिस्द्रसंहिताका माहात्म्य एवं उपसंहार
उमारूहिता
१-भगवान श्रीकृष्णके तपसे मंतुष्ट हुए शिव और
पावंतीका उन्हें अभीष्ठ वर देना तथा शिवकी महिमा
२-नरकमें गिरानेवाले पार्षोका संक्षिप्त परिचय **'
३-यापियों ओर पुण्यात्माओकी यमलोकयात्रा '*'
४-नरकोकी अद्दाईस कोटियों तथा प्रत्येकके पॉँच-
पाँच नायकके क्रमसे एक सो चालीस रौरवादि
नरकोकी नामावली ४
५-विभिन्न पारपोके कारण मिलनेवाली नरकयातनाका
वर्णन तथा कुक््कुरब॒लि, काकबलि एवं देवता
आदिके लिये दी हुई बलिकी आवश्यकता एवं
महत्ताका प्रतिपादन
६-यमलोकके मागरम सुविधा प्रदान करनेवाले
विविघ दार्नोका वर्णन ही
७-जलदान, जलाशय-निर्मोण, धक्षारोपण$ सत्य-
२३५७
३५९
२३६०
२६२
३६२
३२६५
२३६६
२३८३
३८६
२८६
२९१
२३९२
४०६
भाषण और तपकी महिमा
८-जैद और पुराण;कि स्वाध्याय तथा विविध प्रकार-
के दानकी महिमा, नरकोंका वर्णन तथा उनमें
गिरानेवाले पार्पोका दिरिशन) पापोंके लिये सर्वो
त्तम प्रायश्रित्त शिवस्मरण तथा शानके महत्वका
प्रतिपादन कक
९-मृत्युकाछ निकट आनेके कोन-कोनसे लक्षण हैं)
हसका वर्णन 2386;
१०-कालको जीतनेका उपाय, नवघा शब्दत्रह्म एवं
तुंकारके अनुमंघान ओर उससे प्राप्त होनेवाली
सिद्धियोका वर्णन श
११-काल या मृत्युकी जीतकर अमरत्व प्राप्त करनेको
चार योंगिक साधनाएँ---प्राणायाम) भ्रमध्यमें
अग्निका ध्यान; मुखसे वायुपान तथा मुड़ी हुई
जिह्ाद्वारा गलेक़ी घाँटीका स्परो
१२-भगवती उमाके कालिका-अवतारकी कथा---
समाधि ओर सुरथके समक्ष मेघाका देवीकी कृपा-
से मधुकेटभके वधका प्रसड्ध सुनाना *'
१३-सम्पूर्ण देवताओँके तेजसे देवीका महालक्ष्मीरूप-
में अवतार ओर उनके द्वारा महिषासुरका वध' * *
१४-देवी उमाके शरीरसे सरस्वतीका आविभाव; उन-
के रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्मका उनके पास
दूत भेजना, दुतके निराश लौोटनेपर श॒म्मका
क्रमशः घूम्रलोचन) चण्ड, मुण्ड तथा रक्तेबीज-
को भेजना और देवीके द्वारा उन सबका मारा जाना
१५-देवीके द्वारा सेना ओर सेनापतियोंसहित निशुम्भ
एवं झुम्भका संहार
१६-देवताओंका गये दूर करनेके लिये तेजःपुश्नरूपिणी
उमाका प्रादुर्भाव पक हु
१७-देदीके द्वारादुगमासुरका बंध तथा उनके दुर्गा;
शताक्षी) श्ञाकम्भरी ओर श्रामरी आदि नाम
पड़नेका कारण न्
१८-देवीके क्रियायोगका वणन--देवीकी मूर्ति एवं
मन्दिरके निर्माण, स्थापन ओर पूजनका महत्व)
परा अम्बाकी श्रेष्ठता, विभिन्न मार्सो ओर
तिथियोंगें देवीके श्रतः उत्सव ओर पूजन आदि-
के फल तथा इस संदिताके श्रवण एवं पाठकी
भरिभा ० कफ छ रू
( हैई
४०२
४०४
४०६
इ०्ट
४०९
४१९
४१४
४१५
४९७
४१९
है.
०५
हि |
हा
)
कैलाससंहिता
१-आऋषियोका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे
प्रश्न--प्रणवार्थ-निख्पणके लिये अनुरोध' **
२-प्रणवके वाच्यार्थरूप सदाशिवके स्वरूपका ध्यान:
वर्णाश्रम-घर्मके पालनका महत्त्व; शानमयी पूजा;
संत्यासके पूर्वाक्नभूत नानदीआदू एवं ब्रह्मयश
आदिका वर्णन थक * ०५
३१-संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि---गणपति-पूजन$
होम) तत्त्व-शुद्धि; साविन्नी-प्रवेश, सर्व॑संन्यास
ओर दण्ड-घारण आदिका प्रकार 33
४-प्रणवके अर्थोका विवेचन गा
५-शेवदर्शनके अनुसार शिवतत्त्व, जगत्-प्रपञ्ञ और
जीवतत्त्वके विषयर्मे विशद विवेचन तथा शिवसे
ज्ञीव ओर जगत्की अभिन्नताका प्रतिपादन
६-महावाक्योंके अर्थपर विचार तथा पंन्यासियोंके
योगपद्का प्रकार क ४
७-यतिके अन्त्येष्टिकमकी दराइपयन्त विधिका वर्णन
८-यतिके लिये एकादशाइ-कत्यका वर्णन
९-यतिके द्वादशाह-कृत्यका वर्णन, स्कन्न्द और
वामदेवका केलास परवतपर जाना तथा
घृतजीके द्वारा इस संहिताका उपसंद्धार ***
वायवीयरसंधिता ( पूर्वेरण्ड )
१-प्रयागर्में ऋषियोंद्वारा सम्मानित सूतजीके द्वारा
फथाका आरम्भ; विद्या-स्थार्नों एवं पुराणोंका
परिचय तथा वायुसंहिताका प्रारम्भ **'
२-ऋषियोंका ब्रह्मजीके पास जा उनकी स्तुति
करके उनसे परमपुरुषके विषयमें प्रश्न करना और
ब्रद्मजीका आनन्दमम हो #रुद्रः कहकर
उत्तर देना कक कह
३-अदह्याजीके द्वारा प्रमतत्वके रुूपमें भगवान
शिवकी ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी
कृपाकी ही सब साधनाका फल बताना तथा
उनकी आशासे सब घशुनियोंका नेमिषारण्यमें
आना 406
४-ने मिषारण्थमें दीघसन्रके अन्त मुनि्येकरि
'पास वायुदेवताका आगमन; उनका सत्तकार
तथा ऋषियोंक्रे पुछनेपर वायुक्ते द्वारा पश्च,
पाश एवं पश्चपतिका तात्विक विवेचन
"-मदेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन
६-अह्यालीकी मूच्छों: उनके मुखसे रूद्रदेबका
४२६
४२८
४२
है रे |
४३८
है है 4
४४५
४७
४४९
४०६
४५२
४५४
४०६
४५९
प्राकस्य, सप्राण हुए ब्रद्मजीके द्वारा आठ
नामेंसे महेश्वरकी स्ठुति तथा रद्रकी आशासे
ब्रह्माद्वारा खष्टि-रचना
७-भगवान् रुद्रके अ्ह्माजीके मुखसे प्रकट होनेका
रहस्य, रुद्रके महामहिम खरूपका वर्णन;
उनके द्वारा रुद्रगणोंकी सुष्टि तथा ब्रह्माजीके
रोकनेसे उनका खुश्सि विरत होना हे
८-हअद्याजीके द्वारा अर्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा
उस स्तोतन्नकी महिमा
९-महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकव्य ओर
देवीके भ्रमध्यभागसे शक्तिका प्रादुर्भाव *“*
१०-मगवान शिवका पार्चती तथा पार्षदोंके साथ
मन्दराचलपर जाकर रहना) शुम्म-निशुम्भके
वधके लिये ब्रह्माजीकी प्राथनाते शिवका
पावतीकोीं कालीः कहकर कुपित करना
भौर कालीका*गोरी? होनेके लिये तपस्याके
निमित्त जानेकी आशा मौगना कक
११-पावतीकी तपस्या। एक व्यात्रपर उनको
कृपा) ब्रक्षाजीका उनके पास आना; देवीके
साथ उनका वातॉलाप; देवीके द्वारा काली-
त्वचाका त्याग और उससे हृष्णवर्णा
कुमारीकन्याकरे रूपमें उत्तच्न हुईं कोशिकीके द्वारा
शुम्भ-निशुम्भभा वध
१२-गौरी देवीका व्याप्रको अपने साथ ले चाने-
के लिये व्रक्षाजीसि आशा मौगना) ब्रह्माजीका
उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना; देवीका
शरणागतकों त्यागनेसे इन्कार करना) ब्रह्माजी-
का देवीकी महत्ता बताकर अनुमति देना
और देवीका माता-पितासे मिलकर
मन्दराचलको जाना हर
१३-मन्द्राचरूपर गोरीदेवीका खागत; महादेवजी-
के द्वारा उनके ओर अपने उत्कृष्ट स्वरूप
एवं अविच्छेद्य सम्बन्धपर प्रकाश तथा
देवीके साथ आये हुए व्याप्रको उनका
गणाध्यक्ष बनाकर अन्न्तःपुरके द्वारपर सोमनन्दी
नामसे प्रतिष्ठित करना ०५०
१४-अपि ओर सोमके खरूपका विवेचन तथा
जगत्की अम्नीपोमात्मकताका प्रतिपादन **'*
१५-जगत् वाणी ओर अर्शरूप” है---इसका
आकर हंड
हा
डघ्र
४६४
४६५
४६७
४६८
४३०
४७२
४७३
ड७४
(४ )
प्रतिपादन
१६-षियोके प्रश्नका उत्तर देते हुए वायुदेव-
के द्वारा शिवके खतन््त्र एवं सवानुग्राहक
खरूपका प्रतिपादन ३6
१७-परम धघर्मका प्रतिपादन) शैवागसके अनुसार
पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन **
१८-याशुपत-ब्तकी विधि और महिमा तथा
भस्सधारणकों महत्ता *** न
१९-बरालक उपमन्युको दूधके लिये दुखी देख
माताका उसे शिवकी आराधनाके लिये प्रेरित
करना तथा उपमन्युक्री तीत्र तपस्या पा
२०-भगवान् शंकरका इन्द्र्प धारण करके
उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना, उर्न्ह
ध्षीरसागर आदि देकर वहुत-से वर देना और
अपना पुत्र मानकर पाव॑तीके हाथमें सॉपना:
कृताथ हुए, उपमन्युका अपनी माताके स्थानपर
लोटना ३४ 5 ०००
वायचीयसंदध्िता ( उत्तरसखष्ड )
१-ऋषियोके पूछनेपर वायुदेवका श्रीकृष्ण और
उपमन्युक्रे मिलनका प्रसक्गभ सुनाना। भीकृष्णको
उपमन्युसे ज्वानका ओर भगवान् शंकरसे पुत्रका
लाभ द्क च््क््से
२-उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णमो पाशुपत शझ्ञानका
उपदेश 9 कक >क०
३-भगवान शिवकी ब्रह्मा आदि पशञ्॒मूर्तियोँ,
इशानादि ब्रह्ममृ्तियों तथा प्रथ्वी एवं शर्बे आदि
अष्टमूतियोंका परिचय और उनकी सर्वव्यापकता-
का वर्णन की
४-शिव ओर शिवाकी विभूतियोंका वर्णन ***
५-परमेश्वर शिवक्रे यथार्थ सखरूपका विवेचन
तथा उनकी शरणमें जानेसे जीवके कल्याणका
कस की कर]
६-शिवके झुद्ध; बुद्ध) मुक्त सर्वमय, सर्वव्यापक
एवं सर्वातीत खरूपका तथा उनकी प्रणवृरूपता-
का प्रतिपादन की 99५
७-परमेश्वरकी शक्तिका ऋषिरययोद्वारा साक्षात्कार,
शिवके प्रसादसे प्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी सेवा-
भक्ति तथा पाँच प्रकारके शिव-घर्मका वर्णन
८-शिव-शान, दिवकी उपासनःे देबता्ोको
४७५
४७६
४७९
४८१
४८४
४८५
४८९
४९०
४९७
४९८
उनका दर्शन सूर्यदेवमें शिवकी पूजा करके
अध्यंदानकी विधि तथा व्यासावतारोंका वर्णन
-शिवके अवतार; योगाचार्यों तथा उनके शिकष्यों
की नामावली ** हा
१०-भगवान् शिवके प्रति अश्रद्धा-भक्तिकी
आवश्यकताका प्रतिपादन। शिवघर्मके चार
पादोंका वर्णन एवं ज्ञानयोगके साधनों तथा
शिवघमंके अधिकारियोंका निरूपण; शिवपूजनके
अनेक प्रकार एवं अनन्यचित्तसे भजनकी
महिमा ७ न
११-वर्णोश्रम-घर्म तथा नारी-घमेका वर्णन; शिवके
भजन) चिन्तन एवं ज्ञानकी महतताका
प्रतिपादन ०७० ७4%
१ए-यश्वाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका वर्णन हक
१३-यश्चाक्षर-मन्त्रकी महिमा; उसमें समस्त वाढ्सय-
की स्थिति, उसकी उपदेशपरम्परा, देवीरूपा
पञ्माक्षर-विद्याका ध्यान। उसके समस्त ओर
व्यस्त अक्षरोंके ऋषि, छन््द, देवता, बीज) शक्ति
तथा अड्डन्यास आदिका विचार हि
१४-शुरसे मन्त्र लेने तथा उनके जप करनेकी
विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा;
मन्त्रगणनाके लिये विभिन्न प्रकारकी मालाओ-
का महत्व तथा अंगुलियोंके उपयोगका वर्णन:
जपके लिये उपयोगी स्थान तथा दिशा; जपमें
वर्जनीय बातें; सदाचारका महत्त्व, आस्तिकता-
की प्रशंसा तथा पद्माक्षर सनन्त्रकी विशेषताका
वर्णन 5 26:४६
१५-त्रिविध दीक्षाका निरूपण। शक्तिपातकी
आवश्यकता तथा उसके लक्षणोका वर्णन) गुरु-
का महत्त्व, ज्ञानी गुस्से ही मोत्की प्राप्ति तथा
गुरुके द्वारा शिष्यकी परीक्षा कक
१६-समय-संस्कार या समयाचारकी दीक्षाकी विधि
१७-शडध्वशोधनकी विधि **' जे
१८-घडधघ्वशोधनकी विधि “*' बा
१९-ताधक-संस्कार और मन्त्र- माहात्म्यका वर्णन
२०-योग्य शिष्यके आचार्य-पदपर अभिषेकका
वर्णन तथा संस्कारके विविध प्रकारोका
निदेश्ञ ३ +०):५ ४३8
२१-अन्तमांग पूजा-विधिका
अभवा मानसिक
७ 6 4
५०२
५ ० हु
५०६
प् ०८
५१०
वर्णन
२२-शिवपूजनकी विधि
३-शिवपूजाकी विशेष विधि तथा शिव-भक्ति
की महिमा हा हिल | को हे
२४-पश्जाक्षर मन्त्रके जप तथा भगवान शिवके
भजन-पूजनकी महिमा; अम्रिकायके लिये
कुण्ड ओर वेदी आदिके संस्कार; शिवाम्रि-
की स्थापना और उसके संस्कारः होसः
पूर्णाहति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी
विधि तथा इवनान्तमें किये जानेवाले हृत्य-
का वर्णन के
२५-काम्य कमके प्रसड़से शक्तिसहित पद्चमुख
महादेवकी पूजाके विधानका वर्णन “*"
२६-आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त
विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन 3
२७-शिवके पाँच आवरणोंमें स्ित सभी
देवताओंकी स्तुति तथा उनसे अमीशष्पूर्ति
एवं मद्गलकी कामना
२८-ऐहिंक फल देनेवाले कर्मों और उनकी
विधिका वर्णन) शिव-पूजनकी विधि, शान्ति-
पुष्टि आदि विविध काम्य कर्मोर्मे विभिन्न
हवनीय पदार्थोके उपयोगका विधान "**
२९-पारलोकिक फल देनेवाले कर्म--शिवलिड्र-
महात्रतकी विधि ओर सहिमाका वर्णन ***
३०-योगके अनेक भेद; उसके आठ ओर छः
अड्रीका विवेचन--यम; नियम, आसन;
प्राणायाम; दशविघ प्रार्णोको जीतनेकी महिमा;
प्र्याहर/ घारणा) ध्यान और समाधिका
निरूपण मे हा
३१-थोगमार्गके विष्न, सिद्धिसृचक उपसग तथा
पृथ्वीसे लेकर बुद्धितत्वपयन्त ऐ्वर्यगुणोका
वर्णन, शिव-शिव्ाक्ते ध्यानकी महिमा
३२-ध्यान ओर उसकी महिमा; योगघर्म तथा
शिवयागीका मद्दत्व, शिवभक्त या शिवके
लिये प्राण देने अथवा शिवश्लेत्रमं मरणसे
तत्काल मोक्ष-लामका कथन हर
इ४१-दायुदेवका अन्त्घान। ऋपषियोका सरखतीमें
अवभथस्नान ्येर काशोमें दिव्य तेजका
दर्शन करके ब्द्लाजीके णास लाना; हद्माजी
ण्श्३
२४
५२६
५२८
५३१
ण्रेरे
५३६
५४८
५५१२
५५२
५५४
५५७
का उन्हें सिद्धि-प्राप्तिकी सूचना देकर मेरके
कुमारशिखरपर भेजना
३४-मेरगिरिके स्कन्द-सरोवरके तट्पर सुनिर्योका
सनत्कुमारजीसे मिलना; भगवान् नन््दीका
बहाँ आना ओर दृष्टिपातमात्रसे पराशछेदन
एवं शानयोगका उपदेश करके चला जाना;
शिवपुराणकी महिमा तथा ग्रन्थका उपसंदहयर
शिवपुराण समाप्त
४-रुद्र-देवता-तत्त्व ( सर्वदर्शनाचाय+ तत्त्वचिन्तक
खामी अनन्तश्री अनिदद्धाचाय वेंकटाचायंजी
महाराज ) "
५-प्रल्यंकरके प्रति [ कविता | ( श्रीरसिकविहारी
पंजुल! एम० ए० ) “*'
&--शिव-महिमा ( महामद्दी पाध्याय पं० भीगिरिधर-
जी शर्मों चतुर्वेदी, वाचस्पति ) का
७-लिड्र-रहस्य ( ख० श्रीरामदासजी गोड़) एम्०
ए० )
८-शिव-तत्व ( ख० श्रीमीमचन्द्र चह्मोपाध्याय
बी० ए.०) बी० एड ०) बी० एस-सी०; एम्०
आर० इ० इ०) एम्० आईं० ई० )
९-श्रीशिवचालीसा [ कविता |
१०-शिवपचाशक्षरस्तोत्रम्
१ १-श्रीशिव ( ख० पं० श्रीहनूमान् शर्मा ) *
१२-ओशिवनिर्माल्यादिनिणेय ( सम्मान्य पं० ख०
श्रीदाराणचन्द्रजी भद्गाचार्य, प्रधानाध्यापक
मारवाडी-संस्कृत-कालेज) काशी )
१ ३--भीशिवको अष्टमूतियाँ ( भ्रीपन्नाठालसिंहजी )
१४-मगवान शिव [| कविता | ( भीवक्लभदासजी
विज्ञानी ध्जेश” साहित्यरत्न ) हि
१५-शिव-तत्त्व ( श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका )
१६-परात्पर शिव ( खव०श्रीगौरीशंकरजी गोयनका )
१७-श्रीशिवा्क कविता | '
१८-श्रीशिव-तत्त्व ( स्व० पण्डितवर श्रीपज्ञाननजी
तकरत )
५६१
१९-हर दर भज [ कविता ]
२०-शिवलिक् ओर काशी ( स्व० पण्डित
श्रीमवानीशडइूरजी )
२१-शिव-महिमा-सूत्र [ पं० श्रीसूरजचन्दजी
सत्यप्रेमी ( डॉगीजी ) | 82०
२२-शिवताण्डव-स्तोत्र [कविता | ( अनु ०--प्रो०
गोपालजी धखर्णकिरण?, एमू० एू० ) **
२३-श्रीशिवाशिवसे वरयाचना [ कविता | ( पं०
श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी “मित्र” शात्तरी )
२४-आश्ुतोष भगवान् शिवजीके चरणोंमें एक
विनीत प्रार्थना ( श्रीरामनिवासजी शर्मा. )
२५-हिंदीवर्णानुकम जययुक्त. अशेत्तरशिव-
सहस्तनाम | कविता |
२६-शिवलिड्रपूजनमें स्तरियोका तथा शिवनिमोौस्यमें
सबका अधिकार है या नहीं ! ( श्रीवकृम
दासजी बिल्लानी अजेश” साहित्यरत्ष )
२७-नय्राज शंकर [ कविता | ( श्रीप्ृथ्वीसिंहजी
चोहान 'प्रेमी! ) - '
२८-महेश्वरस्थ्थम्बक एवं नापरः ( पं० भ्रीजानकी
नाथजी शर्मा )
२९-पवित्रतम झिवपुराणकों केसे पढ़ना; सुनना
ओर रखना चाहिये [ शिवभक्तेसि करबद्ध
प्राथना ] ( भक्त श्रीरामशरणदासजी )
३०-कालिदासोक्त कुमारसम्मवगत भगवान् शिवजीका
विलक्षण ख़रूप ( पं० भीरामनिवासजी शर्मा )
२१-अमोघशिवकवचम्
२२-श्रीशरभेश्वर ( शिव ) कवचम् ( प्रेषक-
सम्भान्य श्रीशिवचेतन्यजी ब्रह्मचारी, महेश्वर )
३३--अश्ग्रही
३४-रुद्राष््रकस्तोन्र
२५-कल्याण ( ५शिव! )
३६-द्षमा-प्रा थना
४४०१“ डी 30०---+३७++-७--:
६६२
६६३
६६७
६६८
६६९
६७०
६७१
६७७
६७९
३६८०
६८३२
चित्र-सूची
बहुरंगे
१-उमा-महेश्वर हल "* ' मुखपृष्ठ
२-भगवान् शिव ध्यानस्थ हक...
-श्रीशिव-पावती की "*" २७
४-श्रीनारायणके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रकट होना ७२
५-तपस्िनी . सतीके सामने शिवका प्राकस्य **" १०८
६-उमासहित भगवान् मृत्युज्ञय ' १५८
७-वर-वेषमें मगवान् शिवं * १६७
८-तपस्यामयी पावेती * १९६
९-पार्वती ओर सरप्त्षि " १९६
१०-शिवकी विकट बरात * ३६? ४२७
११-भगवती पावंती-विवाहइज्ञार ' २२५
१२-मगवन गणेशजी. * *** २५३
१३-गुफामें गोरीशंकर * २८१
४-श्रीशिव-पावंतीका श्रीकृष्णतोी वरदान " ३९६
१५-भगवान् स्कन्द हज * ४२७
१६-पार्वतीकी काढी त्वचाके आवरणसे कोशिकीका
प्राकय्य ४७१
१७-उपमन्यु ओर श्रीकृष्ण “** ५१३
रेखा चित्र दोरंगा
२-उमा-महेश्वर. ऊपरी मुखपृष्ठ
इकरंगे चित्र
२-नारदजीकी काम-विजय “*'" ७६
२-नारदजीके द्वार! सुन्दर रूपकी माँग. **' ७६
३-खयंवरमे वानर-मुख नारद "** ७७
४-नारूजीके द्वारा भगवान् विष्णुको शाप **' ७७
“-भगवान् रामको शिवजीके द्वारा नमस्कार **'*
६-राम-परीक्षाके लिये सतीका सीतारूप धारण १३२६
७-दक्षपर सतीका क्रोध | 7
८-सतीका योगामिसे शरीर-त्याग " १४८
९-शिवजीके द्वारा दक्षके वकरेका सिर ल्गाना १६४
१०-तपस्थामयी पावेतीके साथ घृद्ध ब्राह्मणक्रे
रूपसें शिवकी बातचीत *
* २००
११-द्वादश ज्योतिलिड्-१ * डेट
१२-द्वाइश ज्योतिलिड-२ **' “"* ३३९
गाव
१३६
क् रेखा-चित्र
१-लिड्रशस्थित भगवान् शिव
२-शोनकजीको सूतजीका शिवपुराणकी उत्कृष्ट
महिमा सुनाना
३-यमपुरीमें गये देवराज ब्राह्मणको विमानपर
बिठाकर शिववूर्तोंका केलास जानेके लिये
उद्यत होना तथा धर्मराजका अपने भवनसे बाहर
निकलकर उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना
कर , लक
४-वाष्कलनगर-निवासिनी चज्चुलाका गोक णक्षेत्रमें
शिवकथा बाँचनेवाले एक पोराणिक ब्राह्मणसे
अपना उद्धार करनेकी बात करना
५-चज्चुलाका शिवपुराण सुननेके परिणामस्वरूप
शिवद्वारा भेजे गये विमानपर आरूढ़ होकर
शिवलोकमें आगमन तथा पावतीका उसे अपनी
सखी स्वीकार करना **'*
६-पाव॑तीदेवीका चञ्चुलके साथ जाक़र उसके
पति पिशाचयोनिवाले बिन्दुगको शिवपुराणकी
कथा सुनानेका गन्धवराज तुम्बुरुको आदेश' * *
७--चज्चुलाके साथ विंध्यपर्वतपर जाकर
गन्धवेराज तुम्बुझका बिन्दुग पिशाचकों पाशों-
द्वारा बॉँचना तथा हाथमें वीणा लेकर गौरी-
पतिकी कथाका गान आरम्भ करना
८-सरस्वती नदीके तठपर तपस्यथारत व्यासदेवकों
सनत्कुमारका सत्यवस्तु--भगवान्. शिवक्के
चिन्तनका आदेश देना
९-महेश्वरका ब्रह्मा ओर विष्णुकी अपने निष्कल
ओर सकल खरूपका परिचय देना तथा
दोनोंके मध्यमें भीषण अग्निस्तम्भक्रे रूपमें
उनका आविभोव_ *** *«०
१०-हिमाल्य पवंतकी एक ग़ुफाम नारदजीकी:
तपस्था डे
११-नारदजीका अपनी काम-विजयका प्ृत्तान्त
विष्णुसे कहनेके लिये विप्णुलोकर्म आगमन *
१२-विष्णुद्वार मायानिर्मित नगरमें राजा
शीलनिधिका नारढको रत्नसिहासनपर विठाकर
उनका पूजन करना - तथा, अपनी कन्या
' मुखपृष्ठ
२७
१९
२०
२२
२४
शी:
३०
रे२
७२
४
१२-राजपुत्रोसे समलंकृत राजा
श्रीमतीको उन्हें प्रणाम करनेका आदेश
देना डक हि
शीलनिधिको
खयंवर-सभामें बेठे हुए कुरूप मुखवाले
नारदजीकी ओर देखकर ब्राह्मण-वेषमें आकर
बेठे हुए दो रुद्र-पाष॑दोंका हँसी उड़ाना **'
१४-नारूका दर्पषणमें अपना वानरके समान
मुख देखना और उपहास करनेवाले दोनों
रुद्रगणोंको शाप देना
१५-नारदजीका मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्ताप-
पूवेंक भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर
अपनी शुद्धिका उपाय पूछना
१६-नारदजीका ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीको
भक्तिपूंक नमस्कार करना और अनेक
प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे
शिवतत्त्वके विषयमें पूछना हे
१७-सदाशिवद्वारा खरूपभूता शक्ति ( अम्बिका- )
का प्रकटीकरण
१८-अविमुक्तक्षेत्र ( काशी )--आननन््दवनम
पाव॑ंतीके साथ विचरण करते हुए. भगवान्
शिवके द्वारा अपने वामभागके दसवें अज्गसे
विष्णुको प्रकट करना “*'
१९--शिवका ब्रह्माका हाथ पकड़कर विष्णुको उन्हें
सौंपकर संकटके समय सदा उनकी सहायता
करते रहनेके लिये कहना
२०-बह्माजीका ऋषियों और देवताओंके साथ
क्षीरसागरके तयपर विष्णुके पास आगमन ** "
२१-कैलासके शिखरपर निवास करनेवाले साम्ब
शिवका ध्यान करने योग्य पश्ममुख-रूप
२२-ब्रह्माह्दार घोर एवं उत्कृष्ट तप करनेपर
उनकी दोनों भोंहों ओर नासिकाके मध्यमागसे
शिवका अर्धनारीश्वरंूूपमें प्राकट्य
२३-बद्माद्वारा प्राथना करनेपर शिवका अपने
ही समान वहुते रुद्रगर्णॉकी सृष्टि
करना **«
२४-ब्रह्माका अपने शरीरको दो भार्गोमें विभक्त कर
दो रूपवाला हो जाना तथा एकसे मनु ओर
दूसरेसे शतरूपाकों उत्तन्न करना
(
७५
9७
७
७५९
८९
८२
८३
८९
९३
९५७
१०१
१०१
१०२
१८
)
२५-करामित्य-नगरमें निवास करनेवाले यह्ञदत्त
ब्राह्मणके दुराचारी पुत्र गुणनिधिका शिव-
मन्दिरम नेवेद्य चुरानेकी इच्छासे प्रवेश **'
२६-कलिद्गराज दमका ग्रामाध्यक्षोकों घुलाकर
अपने-अपने गंवोके शिवाल्योम- सदा दीप
लानेका आदिश देना हा
२७-घोर तपस्पारमें लीन कुबेरकी शंकर ओर
पावतीका प्रत्यक्ष दशन देकर वर देना
२८-त्ह्माजीसे समस्त शुभ शिव-चरित्र सुनानेके
लिये नारदकी प्रार्थना *" ]
२९-तअह्माके छृदयसे मनोहर रूपवाली सुन्द्री नारी
संध्याका उत्पन्न होना *'
३०-मरीचि आदि ऋषियोंद्वारा सनोभव कामदेवके
मदन; मन्मथ; दर्पषकः कंदप आदि अनेक
नाम रखना
३१-दक्षका अपने ही शरीरसे प्रकट हुईं 5रति?
नामकी कन्याको कंदपको संकल्पपूवक
सोपना
३२-ब्रह्माकी प्रेरणासे वसिष्ठका एक तेजखी
ब्रह्मचारीके रूपमें चन्द्रभाग परवतपर तपस्या
करनेवाली संध्याके पास जाकर उसके निजेन
पवतपर आनेका प्रयोजन पूछना तथा तपस्या
करनेकी विधि बताना
३३-तपस्पार्म लीन संध्याको शिवका उसीके
. आराध्यरूपमें प्रत्यक्ष दशन देना
३४-संध्याद्वारा मेघातिथि मुनिके यशक्री अम्मनि्मे
आत्माहुति तथा उसके पुरोडाशमय शरीरके
तत्काल दग्घ होनेपर यज्ञकी समाप्तिके समय
अग्निकी ज्वालामें महषि मेघातिथिका तथाये
हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें उसे
प्राप्त करना
२५-महाप्रजापति दक्षकी तपस्यासे प्रसन्न होकर
सिंहवाहिनी जगदम्बाका चतुभ्नुजरूपमें उन
दर्शन देना
अनुग्रह करनेके लिये आये हुए नारदको
उनका क्रोधपूर्वेक घिकारना
. 8१९
२६-नारदकी ही शिक्षासे अपने हयश्व॒ तथा शबदांग्न हा |
आदि पुत्रोके ऊध्वंगामी होनेपर दक्ष प्रजां-
पतिका कष्टका अनुमव करना तंथों देववश -
१०४
१०४
१०६
१०८
१०९
* . ११०
११०
१९
११३
११६
१२६
३७-अपनी पक्की वीरिणीसहित प्रजापति दक्षद्वारा..
जगदम्बाका ध्यान ओर प्रेमपूवक स्तवन
करनों
३८-सब देवताओंके साथ ब्रह्म ओर विष्णु
आदिका गिरिश्रेष्ठ केछासपर महादेवके पास -
- आगमन
३९-सतीका तपस्या करके मनोवाड्छित वर पानेपर
. घर लोटकर माता ( वीरिणी ) ओर, पिता
( प्रजापति दक्ष ) को प्रणाम करना तथा
अपनी सखीद्वारा उनको अपना तपस्यासम्ब॒न्धी
सब समाचार कहलवाना
४०-्रह्मा; विष्णु, नारद, देवताओं और मुनियों:
आदिके साथ शिवकी दक्षके घरके लिये
विवाहयात्रा
४१-विवाहकृत्य सकुशल समाप्त हो जानेपर दक्षकी
आशसे शिवका प्रसन्नतापूवक सतीको वृषभकी
पीठपर बिठाकर विष्णु आदि देवताओं
और मुनियों आदिके साथ हिमालय पर्वतकी
ओर प्रस्थान करना
४२-शिवका
तथा . उदारचेता शम्भुद्दारा उन्हें अपने
सामने बेठनेके लिये _ आसन देना
४३-दक्षद्वारा. यश्षमें रुद्रगणोंकी शाप दिया जाना
तथा शिवके प्रियभक्त नन््दीका -दक्षको
प्रत्युत्तर
४४-आ्रह्मफफुल और वेदोंको शाप देनेवाले
ननन्दीको शिवका समझाना
४५-मृप्रभपर सवार होकर वहुसंख्यक प्रसथ-
गण्णंके साथ सतीका अपने पिता दक्षके
यशकी ओर प्रस्थान
४६-दक्ष के यश्में उपस्थित सतीके शरीरका
-.. योगाम्रिसे जलकर उसी क्षण भस्म हो जाना;
शिवके पाषेदाका दक्षका प्राण लेनेके लिये
आक्रमण तथा भगुद्वारा यज्ञमें विष्न डालने-
वालेकि नाशके लिये यश्कुण्डसे क्रभु नामक
सहर्सों देवताओंकी प्रकट करना और
शिवके प्रमथ-गर्णोका भाग खड़ा होना **
अपने खरूपका ध्यान तोड़ना
जानकर जगदम्बा सतीका केलासपर आना .
(१९
330
१२५
१२९
१३०
श्श्
१३९
२४१
१४५
९४८
४८-दक्षका
)
४७-नारदके मुखसे दक्षयशर्में सतीके योगाम्िमें
भस्म होने ओर असंख्य प्रमथगर्णोके विनष्ट
हो जानेका समाचार सुनकर शिवद्वारा क्रोध- :- .
पूर्वक सिस्से एक जया उखाड़कर पव॑तपंर
. पटकना तथा जठाके दो भाग होनेपर पूव
भागसे वीरभद्र औरदूसरे भागसे महाकालीका
' उत्पन्न होना क
भगवान् विष्णुकी शरणमें जाकर
उनके चरणोंमें गिरना तथा यश्का विनाश न
होनेकी प्रार्थना करना
४९-शुक्राचायके आदेशसे.. द्घीचद्वारा
महामृत्युंजबका कठोर तपस्यापूवक जप तथा
शिवका उनके सामने प्रत्यक्ष प्रक" होकर
दर्शन देना; द्धीचद्वारा शिवकी स्तुति और
वरकी याचना के आह
५०-नत्रह्मा; विष्णु ओर देवताओंके साथ शिवका
कनखलमें स्थित दक्षकी यज्ञशालामें पधारना -
तथा वीरभद्रद्वारा विध्वंस किये गये यशस्थलको -
१६३
देखना
५१-देवताओंद्वार स्तुति की जानेपर परम अद्भुत
दिव्य रत्नमय रथपर विराजमान जगजननी
देवी उमाका उनके सामने प्रकट होना
५२-मनम संतानकी कामना लेकर तप करमने-
वाली हिमवानकी पत्नी मेनाके सामने प्रसत्नंता- ..
पूवंक जगदम्बाका प्रकट
/ आअनुग्रह करना ४७४
५३-गिरियज हिमालयकी प्रार्थनापर नारदजीद्वारा
होकर उनपर
उमाकी जन्मक़॒ण्डलीपर विचार करनेके लिये :
उनका हाथ देखा जाना
५४-अपनी कन्या उमाका विवाह किसी सुन्दर क्
वरके साथ कर देनेके लिये मेनाका अपने
पति हिमवानके पास जाकर विनय करना
तथा हिमवानका उन्हें समझाना
५५-शिवकागड्ावतरणतीर्थमें जाकर आत्म-
भूत परमात्माका चिन्तन करना तथा सेवकों-
सहित गिरिराज हिमवानका आकर उन्हें
स्तवनपूर्वक प्रणाम करना कप
५६-शिवका दर्शन करनेके लिये अपनी पुत्री
उमाके साथ नित्य आनेकी ट्मिवानका
२१५६१
१५३
२१५९
. ९७०
. १७६
२७९
उनसे आज्ञा माँगना ओर शिवद्वारा उन्हें
अकेले ही आनेकी आज्ञा देना
५७-इन्द्रद्दारः अपना स्मरण किये जानेपर
कामदेवका तत्काल ही उनके सामने आा
पहुँचना ही
५८-रुद्रकी नेत्रामिसि कामदेवका भस्म होना '*'
५९-शिवकी क्रोधामिकोी बड़वानलकी संक्षा
देकर--घोड़ेके रूपमें परिवरततित कर ब्रह्माका
उसको स्थापित करनेके लिये समुद्रतटपर जाना
तथा समुद्रका साक्षात् प्रकट होकर उनकी
स्तुति कर आनेका कारण पूछना
६०-शिवकी आराधनाके लिये पावेतीकी दुष्कर
तपस्या तथा उनके तपके प्रभावसे उस स्थलूपर
विचरण करनेवाले एक-दूसरेके विरोधी सिंह)
गो) चूहे बिल्ली आदिका पारस्परिक विरोध-
का त्याग कर देना तथा बवृक्षोंका सदा फलसे
ल्दा रहना हे
६१-भगवान शिवकी आशासे सप्त्षियोंका तपस्पामें
तत्पर पावतीके आश्रमपर जाकर उनके
शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना **'
६२-परीक्षाके बहाने जटिल तपस्वी ब्राह्मणके
वेषमें पधारे हुए. शंकरके सामने ही पावेतीका
अमिमें प्रवेश करना तथा उनकी तपस्याके
प्रभावले आंगका उसी क्षण चन्दन-पड़के
समान शीतल हो जाना और पावव॑तीका
आकाशर्मे ऊपरकी ओर उठने छगना
६३-बायें हाथमें सींग ओर दाहिने हाथमें डमरू
लेकर पीठपर- कथरी रखकर तथा लाल वक्त
पहनकर शिवजीका नटठके वेषमें मेनकाके पास
जाना तथा मेनकाके पास बैठी हुई स्त्रियोंकी
टोलीके समीप उनका सुन्दर नृत्य करना **'
६४-देवताओंके अनुरोधसे वेष्णव ब्राह्मणके वेषमें
शिवंजीका हिमवानके घर जाना ओर शिवकी
निनन््दा करके पावंतीका विवाह उनके साथ
न करनेको कहना
६५-वेष्णव ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए शिवजीकी
( शिवक्े ) अपने ही प्रति कही गयी
बहुत-सी उल्टी बातोंसे मेनकाका शानभ्रष्ट
हो जाना तथा मैले कपड़े पहनकर कोप-
१८४
१८६
१८८
१९१
१९७
१९९
२०५
२०७
भवनमें चले जाना ओर अरुन्धती देवीका :
उन्हें भीतर जाकर समझाना तथा सप्तर्षियोंके '
पधारनेकी सूचना देना
६६-वसिष्ठ आदि सप्तपियों तथा मेरे आदि
पर्वतेंकि समझानेपर मेनका और हिमवानका
प्रसन्नतापूवक शिवके साथ पार्वतीके
विवाहका निश्चय करना
६७-मेनाका विछाप करना तथा अपनी पुत्री
पार्वती ओर नारदकों दुर्बचन सुनाना और
घिक्कारना
६८-सप्तर्षियोंके समझानेपर भी मेनाका शिवके
साथ पावंतीका विवाह न करनेका ही हठ
करना तथा हिमवानका उन्हें समझाना और
शिवके पूजनीय खरूपका वर्णन करना “*'
६९-भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य
रूपको प्रकट करना) गड्ढा-यमुनाका उन्हें
सुन्दर चेवर डुलाना; आठों सिद्धिर्योका उनके
आगे नाचना तथा सिद्ध, उपदेवता, समस्त
मुनियोका वररूपमें शोमित शिवके साथ -
प्रसन्नतापूवक यात्रा करना
७०-कैलियहमें नूतन दम्पति शिव-पावंतीको
देखनेके लिये सोलह दिव्य नारियो---
सरखती आदिका प्रवेश तथा रत्नमय
सिंहासनपर नवदम्पतिके विराजमान होनेपर
भगवान् शिवके सामने रतिका हाथ जोड़
कर अपने पति ( कामदेव ) को जीवित
करनेकी प्रार्थना करना क् हक
७१-मेनाके मनोभावकी जानकर एक सती-साध्वी
ब्राह्मणपत्नीद्वारा गिरिजाको उत्तम पातिब्रत्यकी
शिक्षाका उपदेश
७२-अज्माजीकी सत्पेरणासे स्वामी-कार्तिकका
विमानसे उत्तरर हाथमें अपनी चमकीली
शक्तिको लेकर तारक असुरकी ओर पेंदल
दौड़ पढ़ना
७२३-तारक असुरका हनन करनेवाले कुमार स्कन्द
( कार्तिक .) का देवताओंके साथ विमानमें
बैठकर शिवजीके समीप केैंछास पहुँचना**
७४-सखियोंके समझानेपर पाव॑तीजीद्वार अपनी
ही आश्ार्में तत्पर. रहनेवाले. चेतन पुरुष
२०८
आओ
44
र२२
२२४
२३०
२३६
२४१
२४ ३
एं
( गणेश ) का अपने शरीरकी मैल्से निर्माण
करना तथा उन्हें अपना पुत्र कहकर
द्वारपालके पदपर नियुक्त करना
७५-द्वारपालके पदपर नियुक्त गणेशसे शिवजीका
लीलापूर्वक. अपने गर्णो और देवताओंका
युद्ध कराना तथा उनके पराजित न होनेपर
झूलपाणिका खर्य आकर घोर युद्धके पश्चात् '
त्रिशूलसे उनका ( गणेशका )' मस्तक कांट
देना तथा समाचार पाकर स्नानमें सखियों-
सहित तत्पर पावतीका घटनास्थरूपर
आकर बहुत-सी शक्तियोंकोी उत्पन्न कर
उन्हें प्रलय करनेकी आशा देना तथा
शिवगणोंका भयभीत होकर दूर भाग
खड़ा होना
७६-देवताओंद्वारा शिवके स्मरणपूर्वक वेद्मन्त्र-
द्वारा जलकी अभिमन्त्रित कर बालक
( गणेश ) के शरीरपर छिड़का जाना तथा
जल्के स्पशंसे बालकका शिवेच्छासे चेतना-
युक्त होकर जीवित हो जाना तंथा सोये
हुएकी तरह उठ बेठना हि
७७-त््मां; विष्णु और शंकर आदि देवताओँका
पावंतीजीको प्रसन्न करनेके लिये गणेशको
सर्वाष्यक्ष घोषित करना तथा शंकरका उन्हे
सम्पूणे ग्णोका अध्यक्ष बनाना
७८-प्ृथ्वी-परिक्रमा करनेमें अपने आपको असमर्थ
पाकर गणेशजीद्वाए अपने माता-पिताकों दो
आसनोपर बिठाकर उनकी सात बार प्रदक्षिणा-
कर अपने विवाहकी प्रार्था करना. **'
७९-प्रजापति विश्वर्पकी सुन्दर कन््याओं--सिद्धि
ओर बुद्धिके साथ विश्वकर्माद्दार गणेशजीका
विवाह-संस्कार सम्पन्न कराना ७
८०-तासके तीनों पुत्र--तारकाक्ष, विद्यन्माली और
कमलाक्षकी तपस्यासे अत्यन्त संतृष्ट हुए मद्य-
पशेखी प्रद्मजीका वर देनेके ल्यि उनके सामने
प्रकट होना और उन तीर्नोका अज्ञलि वॉधकर
पितामहके चरफणेंमिं प्रणगित करना
( २१ )
र्४४ड
२४५
२४६
२४८
२५०
४. रे
२५०३२
८१-देवराज इन्द्र विष्णु आदि सहित देवग्णोकी
त्रिपुपरासी दैत्योके नाशके लिये
भगवान शिवकी स्तुति तथा शिवका बृषमपर
सवार होकर प्रकट हो जाना ओर नन्दीश्वर-
की पीठसे उतरकर विष्णुका आलिड्डनकर नन्दी-
पर हाथ टेककर खड़े हो जाना '
८२-शिवजीद्वारा धनुष्की डोरी चढ़ाकर उसपर
पाशुपतास्न नामक बाणका संधान कर उसे
त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करना १७३
८३-बअह्माजीके आदेशसे शह्लुचूडका बदरिकाश्रमर्मे
जाकर तपस्यामें लीन तुलसीसे मधुर तथा
सकाम संलछाप करना
८४-शिवजीकी इच्छासे विष्णुका चृद्ध ब्राह्मणका वेष
धारण कर शह्भुचूडसे उग्र कवंचकी याचना .
करना तथा शह्डचूडद्वारा कबचका प्रदान किया
जाना 6 क ओके हु आम
८५-हिंरप्याक्षद्वारा पुत्रप्राप्तेके लिये घोर तपका .
अनुष्ठान तथा गौरीके साथ विराजमान शंकरका
प्रसन्नतापूवंक उसे पुत्ररूपमें अन्धकासुरको
प्रदान करना हट हा .
८६-युद्धमें श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज बाणासुरकी बहुत- _
सी भुजारअंका सुदर्शनचक्रसे काथ जाना तथा
उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत होनेपर उन्हें
शंकरजीका समझाना
८८-डग्र तपस्यामें रत नन्दीको ब्ृपभध्चज शिवका बर
देना तथा कमल्की बनी हुई अपनी शिरोमाला-
को उतारकर उसके गलेमें कृपापूर्वक डाल देना" * "
८९-विश्वानर मुनिका वाराणसीमें आकर वीरेश
लिट्लकी आराधना करना तथा अश्वर्पीय विभूति-
विभूषित बालकरूपमें शिवका उन्हें प्रत्यक्ष दान
देना तथा उनके पुत्ररूपरमें उनकी पत्नी
झविष्मतीके गर्भसे प्रकट होनेका आश्वासन प्रदान
के न ले
२५७
२६२
२७४
२७८
२९५
. ८७-शिवका प्रसन्नतापुंक पूर्णसचिदानन्दकी
कामदा-मूर्तिमं प्रविष्ट होकर अधेनारी-नरके
रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट होना तथा ब्रह्माजीका .
उन्हें दण्डवत् प्रणाम करना _ का
२०७
३२१०
९०-शिवजीका प्रकट होकर बालक ग्हपतिको
अभय-दान देना तथा अग्निपदका भागी
बनाना ! की
९१-रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमानका सूर्यकरे निकट
नित्य जाकर उनसे सारी विद्याएं सीखना “*'
९२-भगवान् शिवका यतिरूप धारणकर भील आहुक
और उसकी पत्नी आहुकाकी परीक्षा लेना
तथा पतिके हिंसक पशुओंद्वारा रातमें खा
लिये जानेपर प्रात;काल यतिसे चिता जलवाकर
भीलनीके उसमें प्रवेश करते ही शिवका अपने
साक्षात् रूपमें प्रकट होकर वर देना
९३-देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर शिवका
दशैन करनेके लिये इन्द्रका केलास पर्वतपर जाना
तथा बीचमें ही अवधूत वेष धारणकर
शिवद्वारा परीक्षा लिये जानेपर इन्द्रका
उनपर वज़्से प्रहार करनां) शिवके नेत्रसे रोषवश
अग्निका निकलना और बृहस्पतिकी प्रार्थनापर
शिवका उस तेजको क्षारसमुद्रमें फेंकना ओर
उसका बालक--सिन्घुपुत्र जलन्धरके रुपमें
परिणत हो जाना
९४-ब्राह्मणपत्नीके सामने भिक्षुरूपमें शिवका प्रकट द
होकर उसे विद््मदेशके सत्यरथ राजा) उनकी
पत्नी तथा उनके नवजात शिश्ञुके पू्वजन्मका
त्तत्तान्त सुनाकर बालकके पालन-पोषणका आदेश
देना तथा ब्राह्मणीको अपने उत्तम खरूपका
दर्शन कराना
९५-व्यासजीका अजुनको झुक्रविद्यांका उपदेश
देना तथा पाथिवलिडझ्कके पूजनका विधान
बतलछाकर उसे इन्द्रकील पवेतपर जाकर
जाहवीके तटपर बेठकर तप करनेकी
प्रेरणा देना क
९६-इन्द्रकील पर्वतपर गड्जाजीके समीप एक मनोरम
स्थानपर अजुनद्वारा तेजोराशि शंकरजीका
ध्यान करना तथा परीक्षा करनेके लिये
ब्रह्मचारी ब्राह्मणके वेषमें आये हुए; इन्द्रका
अपने सरूपमें प्रकट होना और उसे शंकरका
मन्त्र बताकर जप करनेकी आज्ञा देना ***
९७-मूक नामक दैत्यका शृक़ररूप धारण करके
अजुनके पास आना तथा किरातमैषमें
(२१२
३१३
३१६
३२१
२३२४
२३२६
२२८
३२९
)
शिवजीका अजुनकी रक्षाके लिये आगे जाना
ओर शिव तथा अजुनके बराणोंसे मरकर
शक्रका भूतलपर गिर पड़ना तथा देवताओँ-
द्वारा जय-जयकारपूर्वक पुप्यव्नृष्टि और स्व॒ति
किया जाना
९८-अजुनद्वारा बाण न छोठाये जानेगर किरात-
वेषधारी शिवका उससे भीपण संग्राम
छेड़ना न हक.
९९-शिवजीका अजुनपर प्रसन्न होकर उसे
पाशुपत नामक अख्तर प्रदान करना
१००-अन्निपत्नी अनसूयापर गड्नाजीकी कृपा तथा
उसके द्वारा गड्राजीको अपना वर्षभरका
किया पुण्य अपण किया जाना तथा गड्ढाजीका
उसके परिणामखरूप काशीमें स्थिररूपसे
निवास करनेका आश्वासन देना कप
१०१-बालविधवा ब्राह्मणपत्नीपर मूढ़ नामक
मायावी दुष्ट असुस्की कुदृष्टि और संयोग-
याचना तथा शिवद्वारा प्रकट होकर देत्यराजको
तत्काल भस्म कर दिया जाना ओर ब्राह्मणी-
द्वारा शिवकी स्त॒ति सा क
१०२-रोहिणीमें ही अधिक आसक्त होनेके कारण
चन्द्रमाको क्षयरोगसे ग्रस्त होनेका दक्षद्वारा
शाप तथा रोगके शमनाथे चन्द्रमाका शिव-
लिड्डकी स्थापना कर प्रभासक्षेत्रमं लगातार
खड़े होकर मृत्युंजय मन्त्रसे भगवान् वृषभ-
घ्वजका पूजन तथा शिवका प्रसन्न होकरं
चन्द्रमाको प्रत्यक्ष दशेन देना ओर चन्द्रमा-
द्वारा क्षयरोग-निवारणकी प्राथैना
१०२३-अवन्तिपर दूषण असुरकी चढ़ाईसे क्षुब्ध
ब्राह्मणॉंकी शिवपर भरोसा रखनेके लिये
कहनेपर शिवलिड्नके पूजनमें ध्यानस्थ वेद-
प्रियके चारों पुत्रों--देवप्रिय आदिको मार
डालनेका असुरका अपनी सेनाको आदेश
और शिवलिक्ञ्के स्थानके ही गडढेसे महाकाल
शिवका प्रकट होकर दैत्यको भस्म कर
* - ३४५
१०४-वानरराज हनुमानजीका प्रकट होकर गोपकुमार
श्रीकर, राजा चन्द्रसेन तथा अन्य राजाओंकों _
*.. ३४७
देना
कृपादष्टिसे देखना
३३१
३२३३
३२३५
३४०
३४२१
३४३
१०५-विंध्याचलकी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवजीका
योगियोंके लिये भी दुलंभ रुपमें प्रकट होना.
तथा देवता. ओर निर्मल अन्तःकरणवालि..
ऋषियोंका वहाँ आकर उनकी पूजा करके.
स्थिररूपसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना
१०६-नर-नारायणकी पाथिवलिड्ड-पूजासे . प्रसन्न
होकर शिवका प्रकट हो जाना तथा दोनोंका
उनसे हिमाल्यके केदारतीर्थमें . खयंज्योति-
लिंड्रके रूपमे सित होनेका अनुरोध
१०७-कामरूप देशके राजा सुदक्षिणके पाथिवलिड्र
पूजनम राक्षस भीसका विष्न डालना तथा
शिवका उस लिड्से भीमेश्वररूपरमें प्रकट
होऊर राश्चससे युद्ध करना ओर नारदजीकी
प्राथनापर समस्त राक्षसों ओर भीमको
हुंकारमात्रसे भस्म॑ कर डालना ब
१०८-रुद्रद्धारं भगवान् शित्रसे काशीपुरीको
- अपनी राजधानी बनाकर उमासहित -वहीं
विराजमान होनेके लिये प्रार्थना
१०९-पत्नीसहित महर्षि गोतमकी आराधनासे संतुष्ट
होकर भगवान् शिवका शिवा ओर प्रमथ-
गणोंके साथ प्रकट होना तथा गोंतमद्वारा
उनका स्तवन
११०-भगवान् शिवसे महर्षि गोतमकी गड्जा-याचना
तथा शिवदत्त गड्ञा-जलका च्लीरूप धारण
करके खड़ा होना। देवता आदिका आकर
गड़ाजीसे तथा' शित्रसे वहीं निवास करने-
की प्रार्थना करना और गड्ढा तथा शिवका
क्रमशः गोतमी ओर त्रयम्बक्रेश्वरके रूपमें
वहाँ निवास
१११-देवताओं, ऋषियोंके सानिध्यमें रावणकी
अपनी पत्नी मन्दोदरीसहित वेद्यनाथ शिव-
लिड्कको पूजा ०००
११२-राक्षसी दारुकाकी स्तुतिसे देवी पावतीका प्रसन्न
हो जाना तथा उसके द्वारा वंशक्की रक्षाका
वरदान मॉगनेपर उनका शिवसे अनुरोध करना
कि यही राक्षसोकि राज्यका शासन करे /**
११३-श्रीगमकी पूजासे प्रसन्न होकर शिवका
चामाड्भूता पावेतीसहित प्रकट होकर विजय-
सूचक वर देना तथा उनके ज्योतिलिड्रः
( रामेश्वर ) के रुूपमें स्थित होनेके लिये
भीरामकी प्राथेना 2
११४-घुश्माफे सामने क््योतिःस्वल्प महेश्वर शिवका
रई )
३४८
३४९
३५१
३५३
३५७
३५८
२६०
३६२१
प्रकट होना ओर घुश्माकी अपनी सोत सुदेहा-
को प्राणरक्षाकी उनसे प्राथना
११५-केलासपर जाकर भगवान् विष्णुकी विधिपू्षंक
शिव-आराधना तथा देवाधिदेव महेश्वरका उन्हें
.. अपना तेजोराशिमय सुदशेनचक्र प्रदान करना
११६-बिल्वके पेड़पर बैठे हुए गुरुद्ुढ्व भीलका
मृगीपर बाण-संधान करना तथा अनजानमें
उसके हाथके धक्केसे पेड़के नीचे शिवलिज्ञपर
थोड़े-ले जल और बिल्वपत्रका गिर पढ़ना _
११७-अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मुंग ओर, दोनों
मृगियोंका गुरुद्रह भीलके पास आ पहुँचनां
तथां शिवपूजाके प्रभावसे दुलंभ ज्ञानसे सम्पन्न
भीलका परोपकारमें छगे उन पशुओकी दा
देखकर अपने आपको घिक्कारना और उन
जानेकी आशा देना
११८-पुत्रकी प्राप्तिके लिये श्रीकष्णका तप करना
और उनके तपसे प्रसन्न होकर पाव॑तीः
कार्तिकेय तथा गणेशक्रे सहित शिवका प्रकट
होना और श्रीकृष्णका उनसे स्तुतिपूर्वक वरदान
मॉगना
११९-झुभ कमे करनेवाले प्राणीके यमपुरीमें
जानेपर यमराजद्वारा उसे स्वागतपूर्वक आसन
देकर पाद्य और अघ्य॑ दिया जाना
१२०-क्ूर कर्म करनेवालेका यमराजकों भयंकर रूपमें '
देखना
' १२१-शिवसे कालचक्रके सम्बन्धर्मं पार्वेतीका प्रश्न
पूछना
१२२-राजा सुरथके अपने आश्रमपर. आनेपर
मुनीश्वर मेघाका मीठे बचन। भोजन और
आसनद्वारा उनका आद्र-सत्कार करना ***
१२३-राजा सुरथका वेश्य समाधिको साथ लेकर
मेघा सुनिके पास आना तथा उनसे अपने
और वैश्यके मोहपाशको काटनेकी प्रार्थना ***
१२४-जगजननी महाविद्याका तैल्लेक्य-मोहिनी
शक्तिके रूपमें प्राकटय **' ही
१२५-देत्य श॒ुम्मासुरके दूत दानवश्िरोमणि स॒ग्रीव-
का हिमाल्यपर देवीके पास आकर शुम्मक्ा
संदेश-निवेदन किन
१२६-सच्िदानन्द्खरूपिणी . शथित्रप्रिया उमाका
वर; पाद, अड्शश और अमय धारणकर
प्रकट होना तथा देवताद्वारा मस्तक झुकाकर
भक्तिभावसे उनकी स्त॒ृति करना
३६४
२६६
३८७
३९०
२९५
३९८
३९९
४०७
४१२
४१२
४९२
४१६
( रे४ )
१२७-देवताओंकी व्याक्ुल प्राथेना सुनकर कृपामयी १३३-ब्रह्माजीकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महादेवजी-
देवीका चारों हाथोमें क्रशः घनुष्र/ बाण; का अपने शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको
कमल तथा अनेक प्रकारके फल-मूल लिये प्रकट करना और ब्रह्माह्मरा स्ेल्ोकमहेश्वर-
हुए प्रकट होना और प्रजाजरनोंकों कष्ट उठाते की स्ठ॒ति का ४६८
देखकर नो दिन और नो रात रोते रूना. ४२२ ३ ४-महादेवजी और पार्वतीजीकी परस्पर बात-
१२८-मेरुके दक्षिण शिखर--कुमारम्थ्क्षमं कुमार चीतके बीचमें ही देवीद्वारा आज्ञा दिये जानेपर
एक सस्रीका देवीद्वारा ही दांकरके लिये
दर्शन और पूजनकर महामुनि वाम
इन व २७. मंटखाल्य लबे गये. व्यामक़ो लाकर उनके
सामने खड़ा कर देना ४७४
१२९-सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर जाकर ब्रह्माजी- १३५-भगवान विष्णुके अनुरोधपर शिवका उमासहित
का ऋषियोंदह्वारा दशेन तथा मस्तकपर इन्द्रके रूपमें ऐरावतपर आसीन होकर उपमन्यु
अज्जलि बाँधकर स्तवन किया जाना. **" ४५३ मुनिके तपीवनमें जाना तथा मुनिका मस्तक
१३०-बह्माद्वारा छोड़े गये सूर्यठ॒ल्य तेजस्वी मनोमय झुकाकर उन्हें प्रणाम करना *** ४८६
चक्रका पीछा करते हुए. उसके शी होनेके १३६-देवी पावतीके साथ बृषभपर आरूढ़ हुए
स्थान ( नैमिषारण्य ) में सुनियोंका जाना *** ४५६ महादेवजीका दर्शन कर उपमन्युका भक्तिविनम्र
चित्तसे प्ृथ्वीपर दण्डकी माँति पड़ जाना **" ४८७
१३७-नै मिषारण्यनिवासी ऋषियोंका वायुदेवसे
श्रीकृणण ओर उपमन्युके मिलन तथा श्रीकृष्णके
१३१-नैमिषारण्यमें दीघेसन्रके अन्तमें मुनियोकि
पास वायुदेवताका आगमन तथा महायज्ञके
समाप्त होनेपर वे क्या करना चाहते हैं-- पाशुपतज्ञानकी प्राप्तिका प्रसक्ष पूछना और
इस सम्बन्धर्मे मुनियोसे उनका प्रइन 7” ४५७ वायुदेवका उसे सुनाना '*' *** ४८९
१३२-ब्ह्माजीके द्वारा शिके अद्धेनारीश्वरूपकी १३८-उपमन्युद्वार श्रीकृष्णकोी पाशुपतज्ञानका
स्तुति कक *** 5७६६ उपदेश बह हे *** ७९०
॥॒ +---०-प2 छत
छप गया / ग्रकाशित हो गया //
विक्रम-संवव् २०१६ ( सन् १६६२-६३ ) का गीता-पब्चाड्
क् सम्पादक---ज्यौतिषाचार्य ज्योतिषतीर्थ प॑० श्रीसीतारामजी झा; वाराणसी
आकार २२५३० आठपेजी, ग्लेज सफेद २६ पौंडका कागज, पृष्-संख्या ७२, आर्टपेपरका सुन्दर मुखपृष्ठ,
मुल्य -७० ( पचास नये पैसे ) डाकच्यय रजिस्ट्रीखर्चेसद्ित .७०, कुछ १.२०
इस बार व्योतिर्तिद् प॑० श्रीविद्याधरजी शुक्लद्गारा तेयार की हुई इष्टफलार्थ---काशीराश्युदयसिद्ध दे निक लम्नमसारिणीके
८ पृष्ठ और अधिक दिये गये हैं | अन्य सब उपयोगी बातें सदाकी तरह हैं ही ।
वि० र ८ के 5 2 लक ४० हर हा प्रतियाँ छापी गयी थीं; परंतु सब ग्राहकोकी पूर्ति न हो सकी | जगह-जगहसे
लोग माँगते ही रहे) पर उन्हें अन्ततः निराश ही, होना पड़ा | इस बार भी ४०३००० प्रतियाँ
जिन्हें लेना हो शीधता करनेकी कृपा करेगे | 9 न मम जम
विक्रेताओंके लिये १५००० प्रतियाँ एक साथ लेनेपर मुल्य ४५०.०० ( चार सौ पचास रुपये )है।
कमीशन) विशेष कमीशन तथा सवारी गाड़ीका फ्री रेलभाड़ा आदि नियमाजुंसार मिलता ही है।,. . _
मानस-पोयूपके खण्ड २ का चतुथ संस्करण ् ध्ज
( वालकाण्डके दोहा ४३ से दोहा १८८ की ६ चौपाईतक ) - ्ट्
पष्ठ-संख्या ८६८; सजिल्द मूल्य ९.५० ( नो रुपया पचास नये पेंसे )) डाकखर्च २.६० ( दो रुपया साठ नये पैसे )
व्यवस्थापक--गीताप्रेस, पो० गीताग्रेस ( गोरखपुर )
है: के. 2
*+%घ७१/
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पूर्णदः "र्णमिद् द पूर्णात् ॒पूर्णमुदच्यते | पूर्णल्य.. पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥)
2 5 मय
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प् ४ ली + आया केक
कल ओ
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उमासहार्य॑ परमेश्वर ग्रद्चं त्रिलोचन्न नीलंकण्ठ प्रशान्तम ।
ध्याखा सुनिर्मच्छति भूतयोनि समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥
2.2० गा... 3 वीक, मदीना... मनु.» मीना नानी पहनना... -3.. ४“ संपन्न.» ५. माही नरम पर इज. बैड कान. नह
संख्या १
बषे ३६ गोरखपुर, सोर माघ २०१८, जनवरी १९६२
पूणे संख्या ४२२
कि. आानिणान््मानीर
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! ध्यानस्थ शिव सचिदानन्द ।
| अचल सरल उन्नत खुद्व्य वपु,; कपिश केश चूड़ा नांगेश । |;
| ९
नीलकण्ठ, नासात्र दृष्टि स्थिर, मुक्ता-नाग-हार गरू-देश ॥
क्रोडस्थित कर-कमलर, समुज्ज्चल ज्योति; प्राण-तन-मन निस्पन्द | ;
व्याप्रचम-आसन शा शोभित शिव यांगेश शा सच्चिदानन्द ॥ |
पृ “++ै-+5४<६४2--+*-- (ः
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87. २२३3
शिवका स्तवन
जय है ओदढरदानी !
जेंसे तुम उदार परमेखर, तेसी सिवा भवानी ॥ जय० ॥
तुम घद-घटवासी अविनासी व्यापक अंतरजामी,
सुद्ध सचिदानन्द अनामय अमल अकाम अनामी |
अविदितिगति अनबद्य अगोचर अगुुन अनीह अमानी | जय॒०
अगम पग्रमानि तुमहि निगमागम 'नेति! 'नेति' कहि हारे,
सोई तुम भक्तन हित कारन रूप अनेकन पारे।
किए अनुग्रह भाजन प्रथश्चु ने सकल चराचर प्रानी ॥ जय०
प्रखि प्रीति परबत-तनया कों आधे अंग विठायो,
आधो पुरुष अरध नारी को अद्भुत रूप बनायो।
दंपति की यह एकरूपता तुम ते जग ने जानी || जय०
आक, धतूर, पात, श्रीफल पे तुम रीझ्त त्रिपुरारी,
चाउर चारि चढ़ाई पदारथ चारि लहत नर-नारी।
आसुतोष ! तुम बिन त्रिश्ुवन में को अति क्ृपानिधानी || जय०
जाके पदरज के ग्रसाद ते सुर सुरपति सुखभोगी,
सोह सखंख अरपि ओरन को फिरे, अर्किंचन जोगी |
परहित जाचत कर केपाल ले, डारत भीख भवानी | जय०
तुम बिन प्रेत पिसाचनहू कों को मानत निज प्यारे,
बेर बिहाइ मोर अहि मृषक निवसत सदन तिहारे।
बषृभ सिंघ संग संग रह पीअत एक घाट पे पानी || जय०
विष विषधर दोषाकर दूषन भूषन कोन बनाथे,
कोन आप हालाहल पीके ओरहि सुधा पियावे |
तुम विन काके कंठ कृपा को लखियत नील निसानी || जय०
कासी वीच मुक्ति-मक्तामनि कोन छुटावत डोलै
को पसुपति विनु बंधे पसुन को पास कृपा करि खोले।
स्वन सुनाइ कौन तारक मनु तारत अगनित प्रानी | जय०
जेहि मारत जग तेहि अहि गन कों प्यार करत तुम खामी
लीजे सरन महेस ! कृपा करें, चरन नमामि नमामी।
तुम बिन को अपनावत मो सम कुटिल अधम अभिमानी ।| जय०
॥ १ ॥|
॥ २ ||
॥ २ ||
|॥ ४ ||
| ५ ||
| ६ ॥|
॥ ७॥
॥ ८ ॥
॥ ९ ||
“शण्डेय रामनारायणदत्त शास्त्री ध्राम!
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शिवपुराणमें शिवका स्वरूप
एक ही परम तत्त्व
सत-चित्-आनन्दरूप परतम परात्यर ब्रह्म एक है;
वह सर्वदा स्वधा पृर्ण, सर्वंग, सर्बंगत, अनन्त, विश है;
वह सर्वातीत है, सबरूप है | सम्पृ्ण देश-कालातीत है,
सम्पू्ण देश-कोल्मय है | वह नित्य निराकार, नित्य
निगुण है; वहँ नित्य साकार; नित्य सगुण है। अवश्य
ही उसकी भक्ृति पाद्चभोतिक नहीं और उसके गुण
त्रिगुणननित नहीं हैं । वह ब्रह्म खरूपतः नित्य एकमात्र
होते हुए ही खरूपतः ही अनादिकालसे विविध-खरूप-
सम्पन्न, विविध-रक्तिसम्पन्न एवं विविध-शक्ति-प्रकाश-
प्रक्रिया-सम्पन है |. नित्य एक होते हुए ही उसकी
नित्य विभिन्न पृथक सत्ता है। उन्हीं परथक्त रूपोके नाम---
शिव, विष्णु, शक्ति; राम, कृष्ण, गणेश आदि हैं | वह
एक ही अनादिकालसे इन विविध रूपोमें अभिव्यक्त है।
ये सभी खरूप नित्य शाश्रत आनन्दमय ब्रह्मरूप ही हैं---
सर्व नित्या: शाइवताश्थ देहास्तस्य परात्मनः ।
हानोपादानरहिता नेंव प्रकतिजाः क्चित ॥
परमानन्द्संदोहा श्ानमाताश्च सबतः ।
सब सर्वेगुणे: पुणोः सर्वेदोषविवर्जिताः ॥
'परात्पर ब्रह्मके वे सभी रूप नित्य शाश्रत परमात्म-
खरूप हैं | उनके देह जन्म-मरणसे रहित और खरूप-
भूत हैं, कद्वापि प्रकृतिजनित नहीं हैं | वे परमानन्द-
संदोह हैं, सबंतोभावेन ज्ञानेकखरूप हैं, वे सभी समस्त
भगवहुणोंसे परिषृणे हैं एवं सभी दोषोंसे ( माया-प्रपश्नसे )
सबया रहित हैं ।!
शिवपुराणमें ये ही परात्पर ब्रह्म (शिव! नामसे
व्याख्यात हैं | इनके खरूपका शिवपुराणमें आदिसे
अन्ततक जो वर्णन मिलता है, वह सब-का-सब पूर्णरूपसे
परतम ब्ह्मका ही चरणन है। चेद-उपनिषद्में परात्यर ब्रह्मके
सम्बन्यम जो कुछ कड़ा गया है, वही शिव्रपुराणमें
भगवान् शिवके सम्बन्धमं कयित है । एक-एक अक्षर
मानो औपनिषदब्रह्मका वाचक है | कुछ उदाहरण
छीजिये | शिवपुराणकी वायवीयसंहिताके प्ूरखण्डमें
भगवान् वायुदेवने महेश्वर श्रीशिवका खरूप वर्णन करते
हुए कहा है---
पक एवं तदा रुद्रो न छ्वितीयोपस्ति कश्नन ।
संसज्य विध्वश्ुवर् गोप्तान्ते संचुकोचस यः ॥
विश्वतश्चक्लुरेवायमुताय॑ _.. विश्वतोम्लुखः ।
तथेंव विश्वतोबाहुर्विश्वतः. पादखंयुतः ॥
चावाभूमी च जनयन् देव एको महेश्वरः ।
स॒ एव सवदेवानां. प्रभवश्योद्धवस्तथा ॥
हिरण्यगर्स देवानां. प्रथम॑ जनयेद्यम ।
विश्वस्मादधिको रुद्रो महर्षिरिति हि श्रुति: ॥
चेदाहमेत॑ पुरुएं॑ महान्तमस्त घुवम |
आदित्यवण तमसः परस्तात् संस्थितं प्रभुम् ॥
अस्सान्नास्ति पर किचिदपरं परमात्मनः ।
नाणीयो5स्ति न च ज्यायस्तेन पूर्णमिदं जगत ॥
सवोननशिरोत्रीवः सर्वभूतगुदादायः ।
सर्वेब्यापी च भगवांस्तस्मात् सर्वेगतः शिव: ॥
सर्वेतः पाणिपादोषयं सबंतोषक्षिशिरोमुखः ।
सर्वेतःश्रुतिमाँछहोके सबमावृत्य. तिष्ठति ॥
सर्वन्द्रियगुणाभासः. सबन्द्रियविवर्जितः ।
सर्वेस्य प्रभुरीशानः स्वस्थ शरणं खुहव ॥
अचक्षुरपि यः पर्येदरकर्णाएपि शटुणोति यः।
सत्र वेत्ति न वेत्तास्य तमाडुः पुरुष परम ॥
अणोरणीयान् महतो. महीयानयमब्ययः ।
गहायां निहितश्धापि जनन््तोरस्य महेश्वरः ॥
तमक्रतुं ऋतुपाय महिमादिशयान्वितम ।
घातः पसादादीशानं वीतशोकः प्रपच्यति॥
वेदाहमेनमज़रं पुराणं सर्चं्ग विभुम् |
निरोध॑ जन्मनो यस्य चदन्ति तह्मवादिनः ॥$:
( शि० पु० वा० सं० पू० ख० ६। १४---२६.
62०
के एको हि बढो न दितीवाय तस्वु-
रे इमोॉलोकानीयत इद्यनीमि हमर
य. इमलिोकानीदत दानीभिः |
७ » नभो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने £
ध्य्ध्ष्ब्ययष्ममममााााााथा थक मत 5त रत 9मअं८ मापा ताप घार४ ५४ पहुमपम न नपण मकर कारकतावा पार अमल न जद कम अत लल मी ल लजज नल किब
सृष्टिके आरम्भमें एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते हैं,
दूसरा कोई नहीं होता । वे ही इस जगत्की सृश्टि करके
. प्रत्य#. जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले
संसज्य विश्वा भ्रुवनानि गोपाः ॥
(१।२)
विश्वतश्रक्षुरत विश्वतोमुखी विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
से बाहुम्यां धमति स॑ पतन्रैद्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥|
(३।॥३)
यो देवानां प्रभवश्वोद्धवश्च विश्वाधिपो रुद्रों महिः |
हिरण्यगर्भ जनयामास पूव स नो बुद्ध्या झुभया संयुनक्तु ॥
(३।४)
वेदाहमेत॑ पुरुष महान्तमादित्यवर्ण तमसः परस्तात् |
तमेव विदित्वाति मुृत्युमेति नान््यः पन््था विद्यतेड्यनाय ||
(२३।८)
यस्मात्परं॑ नापरमस्ति.. किंचिद्
यस्मान्नाणीयो न ज्यायोडस्ति कश्वित् ।
वृक्ष इच स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक-
स्तेनेद पूर्ण पुरुषेण सवम्॥
5. (३।९)
सर्वाननशिरोग्रीवः स्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यायी स भगवांस्तस्मात्सवंगतः शिवः॥
(३।११)
सर्वेतःपाणिपादं तत् सबंतो$क्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमछोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
(३। १६ )
सर्वेन्द्रियणुणामास सर्वेन्द्रियविवजितम् ।
सर्वस्य॒प्रभुमीशानं सर्वेस्थ शरणं बृहद्।॥
( ३। १७ )
अपाणिपादी जबनो गरहीता पश्यत्यचक्षुः स शणोत्यकर्ण: |
सवेत्ति वेद्य नच तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरःं पुरुष महान्तम ||
(१। १९)
अणोरणीवान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोडस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोकी धातु: प्रसादान्महिमानमीशम ||
(३। २० )
वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वोत्मानं स्वंगतं विभुत्वात्।
- जन्मनिरोध॑ प्रवदन्ति यस्य त्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम ||
(३| २१)
[ शैताश्वतरोपनिषद् ]
इसकी रक्षा करते हैं और अन््तमें सबका संहार का
डालते हैं | उनके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख्ष हैं,
सत्र ओर भुजाएँ हैं और सत्र ओर चरण हैं | खग और
पृश्चीकी उत्पन्र करनेवाले वे ही एक महेश्वर देव हैं | वे
ही पत्र देवताओंकों उत्पन्न तया पान करते हैं | वे ही
सब देवताओंम सबसे पहले ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं.।
वे ही सबसे अविक श्रेष्ठ रद्र॒देव महान ऋषि हैं । मै
इन महान् अमृतखरूप अधिनाशी पुरुष परमेश्वरको
जानता हूँ | इनकी अद्गकान्ति सूर्यक्े समान है । ये
प्रभु अज्ञानान्वकारसे परे विराजमान हैं | इन परमात्मासे
परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है | इनसे अत्यन्त सूक्ष्म और
इनसे अधिक महान् भी कुछ नहीं है ।-इनसे यह समस्त
जगत् परिणे है | ये भगवान् सत्र ओर मुंख, सिर और
कण्ठवाले हैँ | सब प्राणियोके हृदयरूप- गुफामें निवास
करते हैं, सव॑न्यापी हैं; अतण्व ये भगवान् शिव सर्वगत
हैं | इनके सब ओर हाथ, पेर, नेत्र, मस्तक, मुख और
कान हैं | ये लोकर्में सबको व्याप्त करके खत हैं । ये
सम्पूण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाले हैं, परंतु वास्तवमें
सब इन्द्रियोंसे रहित हैं| ये सबके खामी, शासक,
शरणदाता और सुहदू हैं | ये नेत्रके ब्रिना भी देखते हैं
और कानके बिना भी छुनते हैं | ये सबको जानते हैं,
किंतु इनको प्रणेरूपसे जाननेबाल कोई नहीं है | इन्हें
परम पुरुष कहते हैं | ये अणुसे भी अत्यन्त अणु और.
महानसे भी परम महान हैं | ये अविनाशी महेश्वर इस
जीवकी हृदय-गुफामें निवास करते हैं । जो मनुष्य सबकी
रचना करनेवाले परमेश्वरकी कृपासे इन यज्ञखख्प
संकल्परहित अत्यन्त महिमासे युक्त परमेश्वरकों देख लेता :
है, वह सब प्रकारके शोकसे रहित हो जाता है | ब्रहम-
वादी पुरुष जिनके जन्मका अभाव बतलाते हैं,
सबन्यापी, सर्वत्र विद्यमान, जरा-मृत्यु आदिसे रहिः
पराणपुरुष परमेश्वरको में जानता हैँ ।
वायुदेवता आगे फ़िर कहते हैं...
हो खुपर्णो व सथुजौ समान तक्षमास्थितो
एको$सि पिप्पल खादु परोषनश्षन् प्रपश्यति ॥
# शिवपुराणमे शिवका खरूप # ५
च््ब्ण्न्श्न्ब््््|्श्न्क्््च्क्््््ं़ः_»ँंँलकिेंओंिंंिंजि तन डक र?स सजी: ड इ इइक्अ इ/अइ.? ड:सक्क्इक्कइइअइइस्इडि चल, ्_ डॉ डड:: :: अन् अक्अअइअइअइअइ
छ्न्दांसि यज्ञाय क्रतवों यद्भूत भव्यमेव च्य॥!
मायी विश्व खजत्यस्सिन्निविष्टो मायया परः ।
मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ॥
५८ ६. है
परसखिकालादकछः स एवं परसमेश्वरः ।
सबंधित् त्रिशुणाधीशो ब्रह्म साक्षात् परात्परः ॥
त॑ विश्वरूपमभव॑ भवसीड्य प्रजांपतिम् |
देवदेव॑ जगत्पूज्य॑ खबित्तस्थमुपास्महे ॥
्् परिवतते
कालादिभिः परो यस्मात् प्रपश्चः परिवतंते ।
धर्मावह॑ पापचुदं भोगेश विश्वधामस चअ॥
तमीश्वराणां. परम महेश्वर
- व॑ देवतानां परम थे देवतम।
पति पतीनां परम परस्ता-
-.. ह्विद्ाम देव आुवनेश्वरेश्वरम् ॥
न॒तंस्य॑ विद्यते काय कारणं च न विद्यते ।
न तत्समोषधिकश्चापि क्तचित्लगति दृश्यते ॥
परास्य विविध शक्ति: श्रुतो खाभाविकी श्रुतता ।
ज्ञानं वर्ल क्रिया चेव याभ्यो विश्वमिदं कृतम् ॥
न तस्यास्ति पतिः कश्चिन्रेव लिझ्म न चेशिता ।
कारण कारणानां च सत्तेषामधिपाधिपः ॥
न चास्य जनिता कश्चित्न च जन्म कुतअ्रन ।
त्त जन्महेतवस्तद्वन्मलमायादिसंश्ञषकाः ॥
से एकः सवभूतेजु गृूढो व्याप्तश्थ विश्वततः |
सवभूतान्तरात्मा च धमोध्यक्षः स कंथ्यते ॥
लय
स्भूताधिवासश्व॒ साक्षी चेता च निगणः ।
एको धशी निष्क्रियाणां वहनां विचश्ञात्मनाम ॥
नित्यानामप्यसों नित्यइचेतनानां व चेतनः ।
एका बहुना व्यकामः कामानीशः प्रयच्छति ॥
खाख्ययोगाधिगम्यं यत् कारणं जगतां पतिम।
धात्वा देवं पशुः पाशें। सर्वेरेव विमुच्यदे ॥
'विश्वर॒द्विस्वबित् खात्मयोनिषः कालझहुणी।
'धभधातः . छेत्रशपतिर्शुणेश। . पाशमोचकः ॥
“म्ाण विद्धे पूरे देदांश्लोपादिशत् खयम्।
: ग देचस्तमह चुदृध्या खात्मचुद्धिमसादतः ॥
उमलुरस्मात् संसारात् प्रप्ये शरण शिवम ॥
शिवपुण्वा० सं० पृ७ सू०४ | ६-७) ९-१०, ६ | ५५-६७ )
यतो चानो निवर्तस्ते अप्राप्य मतखा सह।
आनन्द यस््य ये विद्वान न विभेति कुतस्थत॥
। ( हि० पु७ वा> सं० पृ० ख> ३। १)
4
ँ
यस्मिन्न भासते विद्युन्न खू्यों न च चर््रमाः ।
यस्य भासा विभातीदमित्येषां शाइवती श्रुति: ॥#
( शि० पु० वा० सं० पू० ख० ३। १४ )
$ दवा सुपर्णो सयुजा सखाया समान चक्ष॑ परिषस्व॒ जाते |
तयोरन्यः पिप्पल स्वादइवत्यनअन्नन्यो अभिचाकशीति || ४। ६॥
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो ब्रतानि भूतं भव्यं यत्च वेदा वदन्ति |
अस्मान्मायी खजते विश्वमेतत्तरस्सिश्रान्यो मायया संनिरद्ध/॥४) ९ ॥
मायां ठु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वस्म |
तस्यावयवसूतेस्तु व्याप्त स्वेमिदं जगत् ॥ ४।१० ॥
५८ >< ><
आदि; स संयोगनिमित्तहेतुः परम्लिकाछादकलोडपि दृष्टः ।
त॑ विश्वर्पं॑ भवभूतमीछ्य॑ देव॑ खचित्तस्थमुपास्य पूवम् ॥६॥५॥
स वृक्षकालाकृतिमिः परोडन्यो यस्मात््रपश्चः परिवततेज्यम् |
घमावहं पापनुद भगेशं शात्वात्मस्थमम्ृतं विश्वथास ॥६।६॥
तमीश्वराणा परम महेश्वरं तं देवतानां परम च देवतम् ।
पर्ति पतीनां परम परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् [[६।७॥
न तस्य काय करणं च विद्यते न तत्समश्राम्यधिकश्न हृर्यते |
परास्य शक्तिविंविधेव श्रुयते खाभाविकी शानवलक्रिया च ॥६।८॥
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके म चेशिता नेव च तस्य लिड्डम् |
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिजनिता न चाधिपः ||
एको देवः सर्वभूतेषु यूढः सर्वव्यापी स्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वयूताधिवास: साक्षी चेता केत्रलो नियुणश्र ॥३। ११॥
एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेक बीज॑ बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येडनपश्यन्ति धीरास्तेषां सुख शाश्वत नेतरेषाम॥॥६।१२॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्वेतनानामेको वहूनां यो विद्धाति कामान् ॥
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगर्म्य शात्वा देव॑ मुच्यते सवपारीं:॥६। १ ३॥
स विश्वक्ृद्धिश्वविदात्मयोनिशः कालकाल् गुणी सर्वविद् यः |
प्रधानक्षेत्रशपतिगुणेश:. संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥६।१६॥
यो ब्रह्माणं विद्धादि पूत्र यो वे वेदांश्व प्रहिणोति तस्में |
त॑ ह देवमात्मबुद्धिप्रकाझं मुमृक्षुव दरणमहं प्रप्ने |६।१८॥
( ब्वेताश्वतरोपनिषद् )
यतो वाचो निवतंन्ते अग्राप्प मनसा सह | आनन्द ब्रद्मणो
विद्वान न विभेति कृतश्रनेति ( तेत्तिरीयोपनिषद्: त्रह्मा० नवम
अनुवाक ?
नतत्र सूर्वो भाति न चन्द्रवारकक नेमा विद्युतो भान्ति ऊृताअयममि:,
तमेव भान्तमनुभाति सब तस्य भासा सवंमिदं विभाति ॥६। १४॥
( इदेताश्नतरोपनियद् )
६ ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने ४
_इरमादआन्र - ममता. ाकपम+मल+ "पान मना हक.
कन->- है. का किनामपॉ विन खनन. के. 8... >> कामननमबकमय--. “292 मपनकाक,
'एक साथ रहनेवाले दो पक्षी एक ही वृक्ष ( शरीर )-
का आश्रय लेकर रहते हैं | उनमेंसे एक तो उस्त वृक्षके
कमरूप फर्ेका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु
दूसरा उस बृक्षके फठका उपभोग न करता हुआ केब्रल
देखता रहता है |
..उन्द, यज्ञ, क्रतु तथा भूत, वर्तमान और सम्पूर्ण
विश्वकोी वह मायावी रचता है और मायासे ही उसमें
प्रविष्ट होकर रहता है | प्रकृतिको ही माया समझना
चाहिये और महेश्वर ही वह मायावी है |!
थे ही परमेश्वर तीनों कालोसे परे, निष्कछ, सर्वज्ञ,
त्रिगुणाधीश्वर एवं साक्षात् परात्पर ब्रह्म हैं | सम्पृण॑ विश्व
उन्हींका रूप है| वे सबकी उत्तत्तिके कारण होकर भी
स्वयं अजन्मा हैं, स्तुतिके योग्य हैं, प्रजाओंके पालक,
देवताओंके भी देवता और सम्पूर्ण जगतके लिये पूजनीय
है | अपने हृदयमें विराजमान उन परमेश्वरकी हम
उपासना करते हैं | जो काल. आदिसे परे हैं, जिनसे
यह समस्त प्रपन्च प्रकट होता है, जो धमके पालक,
पापके नाशक, भोगेंके खामी-तथा सम्पूर्ण विश्वके धाम हैं,
जो ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता
तथा पतियोंके भी परम पति हैं, उन भुवनेश्वरोंके भी
'इश्वर महादेवको हम सबसे परे जानते हैँ । उनके शरीर-
रूप कार्य और इन्द्रिय तथा मनरूपी करण नहीं हैं ।
उनके समान और उनसे अधिक भी इस जगतूमें कोई
नहीं दिखायी देता । ज्ञान, बढ और क्रियारूप उनकी
खाभाविक पराशक्ति वेदोंमें नाना प्रकारकी छुनी गयी है |
उन्हीं शक्तियोंसे इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है ।
उसका न कोई खामी है, न कोई निश्चित चिह्न है, न
उसपर किप्तीका शासन है | वह समस्त कारणोंका कारण
है. एवं उनका भी अधीख़र है | उसका न कोई जन्मदाता
है, न जन्म है, न जन्मके माया-मलादि हेतु ही हैं | वह
एक ही सम्पूण विश्वमें समस्त भूतोंमें गुह्मरूपसे व्याप्त
है । वही सव भूतोंका अन्तरात्मा और धर्माव्यक्ष कहल्यता
है| वह सब भूतोके अंदर बसा हुआ, सबका द्रष्ट
साक्षी, चेतत और निगण है। वह एक है, वश्ी
अनेकों विवशात्मा निष्करिय पुरुषोंकों वशमें रखनेवाल है
वह नित्योका नित्य, चेतनोंकरा चेतन है | वह एक ।
कामनारहित है और बहुर्तोकी कामना पूर्ण करनेवा
ईश्वर है | सांख्य और योग अर्थात् ज्ञानयोग और निष
कमयोगसे प्राप्त करने योग्य सबके कारणरूंप :
जगदीख़र परमदेवकोी जानकर जीव सम्पूर्ण प
( वन््चनों ) से मुक्त हो जाता है | वे सम्पूण विष
स्नश, सर्बज्ञ, खय॑ ही अपने प्राकव्यक्रे हेतु, ज्ञानसर
कालके भी स्रष्टा, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न, प्र
ओर जीवात्माके स्वामी, समस्त गुणोंके शासक :
संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं | जिन परमदेवने ए
पहले त्रह्माजीको उत्पन्न किया और स्वयं उन्हें वेद
ज्ञान दिया, अपने खरूपविषयक बुद्धिको प्र
( विकसित ) करनेवाले उन परमेख़र शिवको जान
मैं इस संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये उनकी २९
जाता हूँ । शा
“जिन्हें न पाकर मनसहित वाणी छोट आती
जिनके आनन्दमय खरूपका अनुभव करनेवाला पु
कमी भी किसीसे नहीं डरता !!
“जिसके पास न तो यह बिजछी प्रकाश करती
न सूर्य और चन्द्रमा ही अपनी प्रभा फेलाते हैं | उर्क
प्रकाशसे यह सम्पूर्ण जगव् प्रकाशित होता है । ऐ
सनातनी श्रुतिका कथन है ॥!
इस प्रकारके खरूप-व्याख्यानसे शिवपुराण भरा हैं
इससे सिद्ध है कि शिवपुराणके शिव पर तम परादर .
ब्रह्म हैं, जो विष्णुपुराणके महाविष्णु, श्रीमद्भाग'
महाविष्णु या श्रीकृष्ण हैं, रामायणके श्रीराम हैं, '
भागवतकी दुर्गा हैं । उस्तुतः एक ही ब्रह्म अनादिव।
ही विभिन्न नामें-रूपोंसे अभिव्यक्त है---एकं. सं
बहुधा वदन्ति | एक ही तत्त्वख़रूप परात्पर से”
*# शिवपुराणम शिवका खरूप॑ *# ७
महेखर, सर्वगत, सर्वातीत प्रभुको ऋणषियोंने विभिन्न
रूपों जाना, देखा और कहा है | शिव, विष्णु, शक्ति
तय और गगेश एक ही परमात्माके पाँच सगुणरूंप् हैं
पहागप्रल्थके समय वे एकमात्र ब्रह्म ही रह जाते है. । फिर
कके प्रारम्भमें उन्हीं एक ब्रह्मकी शक्तिके द्वार उनके
* किसी रूपंसे शक्तिका तथा ब्रह्मा-विष्णु-रुद--इन त्रिदेवों
! की प्राकत्य होता है | यह कमी 'शिवः रूपसे होता है
#भी विश, शक्ति या अन्य किसी रूपसे । वेसे तत्ततः
॥ वस्तुतः इनमें कोई भी भेद नहीं है ।
भगवान् शिव ओर विष्णुर्स तथा ब्रह्मा, विष्णु,
रुद्रमें अभिन्नता
.. भगवान् हरि-हर तो सबंधा एक हैं ही । छीलामात्रके
लेये कहीं भगवान् हर रूपसे उपास्य एवं हरिख्पसे उपासक
गैते हैं, तो कहीं हरिरूपससे उपास्य और हररूपसे उपासक
जैते हैं।। उपासनाका तत्त बतलानेके लिये ही वे परस्पर
/पास्य-उपासकक्की लीला करते हैं। वस्तुतः
हरिहरयोः प्रकृतिरेका प्रत्ययभेदेन रूपभेदोपयम ।
। एकस्पेव.._ नटस्थानेकविधा. भूमिकाभेदात् ॥
'.. "हरि और हरमें मूछतः भेद नहीं है । प्रत्ययमें ही
'हपका भेद होता है। नाटकमें अभिनेता विमिन्न रूप धारण
फरता है; पर वस्तुतः वह जो है, वही रहता है |
[हद्घमपुराण ( पूर्वखण्ड अध्याय ९ | १० ) में एक
गड्डी सुन्दर क्या है---
एक वार भगवान् नारायण अपने दिव्य वेकुण्ठलेकरमें
ग्रेये हुए खप्न देखते हैं कि करोड़ों चन्द्रमाओंकी
/कत्तिसे युक्त, त्रिशूल-डमरुचारी, खर्णाभूषणोंसे विभूषित,
रेन्द्रवन्दित, अगिमादि सिद्धियोंके द्वारा छुसेवित
४जलोचन भगवान् शिंत्र श्रेम तथा आनन्दातिरेकसे उन्मत्त
6 उनके सामने नृत्य कर रहे हैं । उन्हें इस प्रकार नृत्य-
# रायण देखकर भगवान् विष्णु ह्ेत्फुल्ल हो सहतता
(& ठकर शब्यापर बैठ गये और ध्यान करने लगे | उन्हें
५१ विंएलित देखकर भगवती लक्ष्मीजीने उनसे इस प्रकार
उठ-बैठनेका कारण पूछा, पर वे बोले नहीं | कुछ समय
पश्चात् बाह्यमावर्मं आकर उन्होंने कहा---“देवि ! मैंने
अभी खम्तमें अपू आनन्द और मनोहर शोभासे संयुक्त
श्रीमहेस्वरके दशन किये हैं । इससे ज्ञात होता है
श्रीशंकरने मुझे स्मरण किया है, अतः चलो, हमलोंग
केलास जाकर भगवान् महादेवके दशन करे ॥!
यों कहकर वे दोनों तुरंत केछासकी ओर चल दिये।
कुछ ही दूर गये होंगे कि उन्हें सामनेसे भगवती उमाके
साथ खय॑ शित्र आते दिखायी -दिये। मानो घर बेठे ही
निधि मिछ गयी | समीप पहुँचते ही दोनों परस्पर बड़ें'
ग्रेमसे मिले। प्रेम और ग्रेमानन्दका समुद्र उमड़ पड़ा।
दोनों ही पुलकित-कऋलेवर हो परस्पर लिपट गये। दोनोंकें
ही सुन्दर नेत्रोसे आनन्दाश्रुका प्रवाह बह चला | बात॑*
चीत होनेपर पता छगा कि भगवान् शिवकों भी रात्रिमें
खप्त हुआ, जिसमें उन्होंने विष्णुभगवानको इसी रूममें
देखा और फिर उनसे मिलने चल दिये | डे
अब दोनों ही परस्पर अपने यहाँ छिवा ले
जानेके लिये आग्रह करने छो | भगवान् शंकरसे.
नारायणने कहा--'वेकुण्ठ पधारिये! और भगवान् शम्भुने
उन्हें केछास प्रस्थान करनेके लिये कहा । दोनोंके ही.
आग्रह अलोकिक् प्रेमसे परिष्रण थे, इसलिये यह निर्णय.
करना कठिन हो गया कि कहाँ चछा जाय | इसी बीच
वीणा बजाते हरि-गुण गाते देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे।
नारदजीकी आये देखकर दोनोंने ही उनसे यहद्ट निर्णय.
कर देनेके डिये अनुरोध किया कि कहाँ जाना चाहियें।
नारदजी तो प्रेमी हैं ही, वे श्रीहरि-हरके इस अछोकिक
मिडत-प्रेमको देखकर मुग्ध हो गये और दोनोंका गुण-
गान करने छगे। अब निर्णय कौन करे । अन्तमें
इसका भार मगवती उम्राको सौंपा गया-वे जो ऋद्द दें,
वेंसा ही किया जाय | कुछ देर तो मगदती डमा चुप
रहीं । फिर दोनोंकों लक्ष्य करके बोडीं-- ;
़िबघ ७ लि लत ता ञ जल व वव्ल्ख्विश् ््र्यथ्थ्थिध्थ््पिप्प्च्च्च्च्च्च्म्म्प्म्ग्च्च्च्च्प्चचप्स्््स्स्स्स्ल्स्स्सल्
यादशी दर्शिता प्रीतियुवाभ्यां नाथ केशव ।
मन््ये तया प्रमाणेन न भिन्नचसती झुवाम॥
यादशी दर्शिता प्रीतियुवाभ्यां नाथ केशव ।
मनन््ये तया प्रमाणेन आत्मेकोषन्यतनुर्मिथः ॥
या प्रीतिदंशिता देव युवाभ्यां नाथ फेशव।
मन्ये तया प्रमाणेन भाय आदां पृथडः न वाम् ॥
यादशी दर्शिता प्रीतियुवाभ्यां नाथ केशव ।
मनन््ये तया प्रमाणेन द्वेप एकस्य स छयोः ॥
याह॒शी द्शिता प्रीतियुवाभ्यां चाथ केशव ।
मन््ये तया प्रमाणेन अपूजेकस्य च दयोः॥
_ है नाथ | है केशव | आपलछोगोंके इस प्रकारके
विलक्षण अनन्य और अचल ग्रेमको देखकर यही निश्चय
होता है कि आपके निवासस्थान प्रथक् नहीं हैं । जो
केलास है, वही वेकुष्ठ है भीर जो बेकुण्ठ है, वही
कैलास है । केवछ नाममें ही मेद है। मुग्ने तो यह
लगता है कि आपका आत्मा भी एक है, केवल शरीरसे
आप दो दिंखायी देते हैं | मुझे तो यह दीख रहा
है कि आपकी भायोएँ भी एक ही हैं, दो नहीं ।
जो मैं हूँ, वही ये श्रील्क्ष्मी हैं और जो श्रील्क्ष्मी हैं,
वही में हूँ । अतः आप लोमगमिंसे जो एकके प्रति द्वेष
करता है,.वह. दूसरेके प्रति ही करता है और जो
एककी पूजा करता है; वह खामाषिक ही दूंसरेकी
भी करता है एवं जो एकको भपृज्य मानता है, वह
दूसरेको भी अपृज्य ही मानता है ।!
भेरा तो यह निश्चय है कि आप दोनेंमें जो भेद
मानता है, उसका निश्चय ही घोर पतन होता है | मैं
देखती हूँ कि आपलोग मुझे इस प्रसड्में मध्यस्थ बनाकर
मानो मेरी प्रवश्चना कर रहे हैं, मुझे भुलावा दे रहे हैं
या विनोद कर रहे हैं | मेरी तो यह प्रार्थना है कि
आप दोनों ही अपने-अपने छोकको पधार | श्रीविष्णु
यह समझ हम शिवरूपसे वेकुष्ठ जा रहे हैं और
महेश्वर यह मानें कि हम विप्णुरूपसे केछासको प्रस्थान
कर रहे हें ।! भगवती उमाके इस निर्णयसे दोनों ही
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्ताने #
परम प्रसन होकर भगवतीकी प्रशंसा करते हुए परत
प्रणामाछिड्नन करके अपने-अपने लछोकको पवार गये |
श्रेकुणठ पहुँचनेके बाद भगवान् नशयणे
श्रीलक्ष्मीजीसे कहा--- द |
स॒पएवाहं महादेवः स एवाहं जनादेनः।
उभयोरनन््तरं नास्ति घटस्थजलयोरिव ॥
'वस्तुतः में ही जनादन विष्णु हूँ भर में हैं
महादेव हूँ | अछग-अछग दो घड़ोंमें रक्खे हुए जब्वी
भाँति मुझमें और उनमें कोई अन्तर नहीं है ।
गोखामी श्रीतुल्सीदासजीने भगवान् श्रीराम
भगवान् श्रीशिवका सम्बन्ध निरूपण करते हुए बहु
ठीक कहा है-..
सेचक स्वामि सखा सिय पीके। .
भगवान् महादेव कभी श्रीरामके साथ सेवककी ली
करते हैं, कमी खामीकी और कभी सखाकी | क
वे उन्हें पूजते हैं, कभी वे | तुछ्सीदासजीके भगवा
राम और सीता शिवपुराणके भगवान् शिव और शक्तिब
भाँति ही परात्पर पसह्न हैं | उन्हींसे--
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना
जासु भंस उपजहिं ग्रुन खानी। अगनित रूच्छि उमा ब्रह्मानी
भगवान् शिव और भगवान् विष्णुकी अमिन्नता'
प्रसन्न प्रायः सभी पुराणोंमें हैं और इनमें मे
माननेवालोंका नरकगामी होना बतलाया गया है। य
केवल दो उदाहरण दिये जाते हैं---
पक्षपुराणमें भगवान् परात्यर रामरूपसे भगवा
शिवके प्रति कहते हैं-- ्ि
ममास्ति हृदये शर्वों भवतों हृदये त्वहम्
आवयोरन्तरं नास्ति सूढाः पश्यन्ति दुर्धिय
ये भेदं विद्धत्यद्धा. आवय्योरेकरूपयो
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नरा: कट्पसहस्रकम
ये त्वक्भक्ताः सदाउःखंस्ते मद्भक्ता घर्मसंयुता
मझूक्ता अपि भूयस्या भत््या तब नतिकरा:
( इद्म० पाताल० २८ । २३-२९
# शिवपुराणमें शिवका खरूप $: के
“आप शिव मेरे हृदयमें रहते हैं और मैं आपके
हृदयमें हूँ | हम दोनोंमें वुछ भी अन्तर नहीं है |
मूह तथा दुबुद्धि छोग ही हममें भेद मानते हैं | हम
दोनों एकरूप हैं, हममें भेदभावना करनेवाले
मनुप्य हजार कल्पोंतक कुम्मीपाकादि नरकोंमें यन्त्रणा
भोगते हैं | जो धार्मिक पुरुष आपके मक्त हैं, वे सदा ही
मेरे भक्त हैं और जो मेरे भक्त हैं, वे महान भक्तिसे
आपको ही प्रणाम करते हैं |
शिवपुराणमें परात्पर परतम भगवान् शिवरूपसे
कहते हैं-..-
ममेव हृदये विष्णुविंष्णोश्व हृदये ह्ाहम ।
उभयोरन्तरं यो वैन जानाति मतों मम ॥
( ९ | ५५-५६ )
रुद्रध्येयो भवांस्वैच भवद्ध्येयो हरस्तथा।
थ्रुवयोरन्तर'ं नैच तब रुद्रस्य किचन ॥|
। ( १०|६ )
रुद्रभक्तो नरो यस्तु तथ निन््दां करिष्यति।
तस्य पुण्यं च निखिल द्रुतं भस्म भविष्यति ॥
| ( १० |८ )
नरके पतन तस्य त्वद्द्षेपात् पुरुषोत्तम ।
मदाशया भवेद्धिष्णो सत्यं सत्य न संशयः ॥
् मु ( १०|९ )
त्या यः समाश्चितों नूनं मामेव स समाश्रितः ।
“न्तर यश्य जानाति निरये पतति ध्रुचम॥
( १० | १४ )
( शिव० रु० सु० )
'मेरे हृदयमें विष्णु हैं और विष्णुके हृदयमें में हूँ ।
| इन दोनोंमें अन्तर नहीं समझता, वही मुझे विशेष
यहै। हे विष्णो | आप रूदके ध्येय हैं और रद
पके ध्येय हैं | आपमें और रुद्में तनिक भी अन्तर
हें है। जो मनुष्य रुदका भक्त होकर आपकी निन्दा
रेगा, उसका सारा पुण्य तुरंत भस्म हो जायगा |
रगेत्तम विष्णो | आपसे देव करनेके कारण भेरी
छसे उसको नरकमें गिरना पड़ेगा, यह वात सत्य हैं,
उत्प है । इसमें संशय नहीं है | जो आपकी शरणमें
शि पु० अ० २-...-
आ गया, वह निश्चय ही मेरी शरणमें आ गया | जो
मुझमें और आपमें मेद जानता है, वह अवश्य ही नरकमें
गिरिता है |!
ये ही परतम परात्पर ब्रह्म कल्पके आदिमें ( सदाशिव,
महाविष्णु, राम-कृष्ण-शक्ति आदि ) अपने किसी रूपसे
अपने ही अंश त्रिदेवोंको ( ब्रह्मा, विष्णु, रुदको ) प्रकट
करके अखिल विश्वकी सृष्टि, पाछन और संहारकी लीला
करते हैं | इस सिद्भान्तका प्राय: सभी शैव और वैष्णब-
पुराणोंमें प्रतिगदन किया गया है और सर्वत्र ही परतम
परात्पर बह्मसे प्रकट उन तीनों देवोंकी और उनसे पर-
तम परात्पर ब्रह्मकी अभिन्नता बतछायी गयी है |
शिवपुराणमें इनका ग्राकट्य परात्पर ब्रह्म मगवान् शिवसे
वृतछाया गया है | शिवक्रे दक्षिण भागसे ब्रह्माका,
वराम भागसे विष्णुका और हृदयसे रुदका प्राकव्य हुआ
है । इन्हीं शिवके आदेशसे फिर ब्रह्माका भगवान् विष्णु
के नाभिकमलसे और रुद्रका ब्रह्माके मस्तकसे प्रकट होना
नतछाया गया है | इन्हीं सदाशिवसे पराशक्तिका प्राकस्य
और फिर उनसे समस्त देवी शक्तियोंका उदय होना
वृतलाया है | देवीभागवत और ब्रह्मवैतरतपुराणमें परात्पर
ने भगवान् श्रीकृण्के दक्षिण भागसे भगवान् विष्णुका,
वामभागसे भगवान् महेख़रका और नामिक्रमहसे ब्रह्माका
प्रकट होना वतछाया है और उन्हींसे आदिशक्तिका
श्राकव्य बतछाया गया है | यह सब छीछावेचि-य है |
तत्व एक ही है। शिवपुराणमें परात्पर भगवान् शिव्रक
परात्पर निर्गुण स्वरूपको 'सदाशिक, सगुण स्वरूपको
भहेश्वरः, विश्वका सृजन करनेवाले स्वरूपको अ्रह्मा?,
पालन करनेवाले स्वरूपको “विष्णु! और संहार करनेवाले
स्वरूपको हद कहा गया है |
श्रीमद्भागवतमें दक्षसे स्वयं भगवान् विप्ण कहते
हिं----
अह ब्रह्मा च शार्बश्व ज़गतः कार्णं परम् ।
आत्मइवर डपद्झाि स्थयंटनविशेषण: ॥
गरिमा
१० ४४ नूमा रुद्राय शान्ताथ लहाण पर मात्मच *%
आत्ममायां समाविश्य सोषह गुणमर्या छ्विज ।
सूजन रक्षन हरन विश्व दध्ने संजां क्रियोचिताम ॥
तस्मिन. ब्रह्मण्यद्धितीये केवले परमात्मनि ।
ब्रह्मरद्रों च भूतानि भेदेनाशो5नुपद्यति ॥
यथा पुमान््न स्वाद्लेषु शिरःपाण्यादिपु ऋचित्।
पारक्यबुद्धि कुरुते एवं भूतेपु मत्परः॥
प्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति थे. मिदाम ।
सर्वेभूतात्मनां ब्रह्मनू] स शान्तिमघिगच्छति ॥
(४) ७। ५०--५४ )
'जगत्का परम कारण में ही ब्रह्मा और शिव हूँ । में
ही सबका आत्मा, ईखर, उपद्रष्ठ, खयम्प्रकाश और
'भेदरहित हूँ । विग्रवर | त्रिगुणमयी अपनी मायाके द्वारा
जब में सृजन, पाठन और संहारकी छीछा करता हूँ, तब-
तब में ही उस छीला-कार्यके अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र---
इन नामोंको धारण करता हूँ। ऐसे मु्न केवल अद्वितीय बिशुद्ध
परमात्मासे अज्ञानी छोग ही ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य समस्त
जीवोंको विभिन्न रूपसे देखते हैं। जिस प्रकार मनुष्य
अपने सिर और हाथ-पैर भादि भुजाओमे ये मुझसे मिन्न
हैं-ऐसी बुद्धि नहीं करता, वेसे ही मत्यरायण मेरा भक्त
किसी प्राणीको मुझसे मिन्न नहीं देखता | बह्मन् । हम
ब्रह्मा, विष्णु, रद्--तीनों स्वरूपतः एक ही है । हम
सर्वभूतरूप हैं । अतः जो हममें कुछ भी मेद नहीं
देखता, वही शान्ति प्राप्त करता है |!
पद्मपुराणमें ( पाताछ्खण्ड अ० २८ ) भगवान् शिव
प्रात्यर भगवानके रामरूपसे कहते है
एकर्त्य॑ पुरुषः साक्षात् प्रकृतेः पर इंयसे।
यः सखांशकलया विरुयं खज़त्यवति हन्ति च ॥
अरूपस्त्वमशेषस्य जगतः कारण परम ।
एक एवं त्रिधारूपं शह्दालि कुहकान्वितः ॥
सण्ठी विधातरूपस्त्व॑ पालने सप्रभामयः ।
प्रढये जगतः साक्षादह शवाख्यतां गतः ॥
“आप प्रइृतिसे पर साक्षात् अद्वितीय पुरुष कहे जाते
हैं, जो अपनी अंशकला ब्रह्मा, विष्णु और रूद्ररूप होकर
विश्वका सृजन, पालन और संहार करते हैं। आप रूप-
रहित होते हुए भी विद्वके परम कारण हैं | आप एक
विवासन+जजी-+फममकमम कर्म जनक.
ही छीलासे त्रित्रिध रूप ग्रहण करते है--विस्न
सश्कि समय व्रह्माख्पसे प्रकट होते हैं, पाठनके गण
अपने प्रभामय विप्युरूपसे व्यक्त होते हैं और जग़े।
प्रल्यके समय साक्षात् मुन्न शिवका खूप ले छेते हैं ॥
शिवपुराणमें ही भगवान् शंकरके द्वारा सीतान्वेष
तत्पर दरथ-पुत्रके रूपमें भगवान् श्रीरामकों प्रणा/
किये जानेकी कथा इस प्रकार आती है---
एक समयकी बात है, तीनों छोकोम विचरनेवरे
छीलाविशारद भगवान् रू सतीके साथ बेपर आए/
हो इस भूतछपर भ्रमण कर रहे थे। धूमते-बूमते।
दण्डकारण्परमं आये | वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित भगवा
श्रीरामकी देखा, जो रावणद्वारा छलपूवक हरी गयी अपः
प्यारी पत्नी सीताकी खोज कर रहे थे । वे हा सीते
ऐसा उच्चखरसे पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंच
रोते थे | उनके मनमें विरहका आवेश छा गया था
लक्ष्मणके साथ बनमें भ्रमण कर रहे थे और उनव
कान्ति फीकी पड़ गयी थी | उस समय उदास्चेता पृ
काम भगवान् शंकरने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणा
किया और जय-जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये
भक्तवत्सल शंकरने उस वनमें श्रीरामके सामने अपने
प्रकट नहीं किया | भगवान् शिवकी मोहमें डाउजेबाढी ऐप
छीला देख सतीको बड़ा विस्मय हुआ | वे उनकी माया
मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं |
सतीने कह[--देवदेव सर्वेश | पर्रह्म परमेश्वर
आप ही सबके द्वारा प्रणाम करने योग्य हैं; क्यों
वेदान्त-शास्रके द्वारा यक्नप्वेक्ष जानने योग्य निर्विका
परम प्रभु आप ही हैं | नाथ ! ये दोनों पुरुष कौन हैं !
इनकी आकृति विरहव्यथासे व्याकुल दिखायी देती है।
ये दोनों धनुर्घर वीर वनमें विचरते हुए छेशके भाग
और दीन हो रहे हैं | इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी आई"
कान्ति नील कमछके समान व्याप्त है। उसे देखक
किस कारणसे आप आनन्दमम्न हो उठे थे ? आपना
४४ शिवपुराणम शिवका खरूप $
१
चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन हो गया था ? खामिनू । संजय॒णका प्रयोग करके विष्णुरूपसे पालन करते हैं
; कब्याणकारी शिव | आप मेरे संशयकी दूर कीजिये ।
इसपर भगवान शिवने कहा--देवि ! ये दोनों
भाई वीरोंद्रारा सम्मानित हैं। इनके नाम हँ---श्रीराम
और छद्ष्मण | इनका प्राकत्य सूर्यबंशमें हुआ है। ये
दोनों राजा दशरथके बविद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे
'ंगके छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेषके अंश हैं । उनका
नाम छक्ष्मण है | इनके: बड़े भेयाका नाम श्रीराम है ।
इनके रूपमें उपद्ृवरहित भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूण
अंशसे प्रकट हुए हैं । ये साधुपुरुषोंकी रक्षा और हम-
तेगेके कल्याणके दिये इस एश्वीपर अक्तीर्ण ह हैं--
ज्येप्ठो रामाभिधों विष्णुः पूर्णाशों निरुपद्रवः।
अवतीणः क्षिती साधुरक्षणाय भवाय नः॥
( श्रीगोख्वामी तुल्सीदासजीने श्रीरामचरितमानसममे
इसीके आधारपर सती-त्यागकी सुन्दर कथा लिखी है। )
7“ महाँभारतकी गीतामें सगवान् श्रीकृष्णने खय॑ ही अपनेको
परात्पर ब्रह्म तथा सबका आदि प्रकटकती बतलाया है ।
किसी-किसी कव्ममें जीव भी ब्रह्माकी कोर्टिम पहुँच
जाते- हैं, ऐसा माना जाता है | परंतु त्रिदेवगत ये ब्रह्मा
भगवदूरूप हैं और इनके लिये भी वही बात कही गयी है
जो भगवान् शिव और भगवान् विष्णुके लिये कही गयी है ।
गया है-....
+ ७ हा 2 अंजीआर्ड ४३५५७
देवीपुराणमें ब्ह्माजीका स्तबन करते हुए कहा
जय देवाधिदेवाय त्रियुणाय खुमेधसे।
अव्यक्तव्यकरूपाय कारणाय महात्मने ॥
एतत्म्रिभावभावाय_ उत्पत्तिस्थितिकारक ।
रजोगुणगुणाविष्ट खुजसीदं॑ चराचरम् ॥
सत्त्वपाल महाभाग तमः संहरसेषखिलम ।
( अध्याय ८३ )
'दवाधिदव । बह्मदेव । आपकी जय हो । आप अचन्यक्त-
; च्य्प् फीस 7४4१९ त्रियुणमय, सद फारण, श्रेष्टवाड एच विश्वकी
सा्ट, पालन एवं संहार करनेयाले हम, विष्णु और रुद्र-
रूप तीनों भादेंसे भाजित हैं। आप रजोगुणसे आविष्ट
पर ध्याख्पसे इस चराचर जगदका सृजन करते हैं,
मां । ६ बम
७५६६०
और तमरूप होकर अशिछ विद्वका संहार करते हैं ॥!
विष्णुपुराणमें महर्षि पराशर परतम परात्यर भगवान्
विष्युकी स्तुति करते हुए कहते हैं---.
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्सने ।
सरदेकरूपरूपाय विष्णवे. सर्वेजिण्णवे ॥
नमो हिरण्यगभोय हरये शंकराय च।
वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिण ॥
एकानेकस्वरूपाय स्थूलसक्ष्मात्मने नमः
अव्यक्तव्यक्तभूताय विष्णवे मुक्तिहेतवे ॥
सर्गस्थितिविवाशानां जगतो5स्य जगन्मयः |
मूलभूतो नमस्तस्में विष्णवे परमात्मने ॥
आधारभूतं विश्वस्याप्यणीयांसमणीयसाम् ।
प्रणम्य सर्वेभूतस्थमच्युतं॑ पुरुषोत्तमस ॥
( १।२। १--५ )
विकाररहित नित्य, परमात्मा, सदा एकरूप,
स॒वब्यापी, सबंबिजयी, विष्णु, हिरिण्यगम ( ब्रह्मा ), हरि,
शंकर ( रुद्र ), वासुदेव, मायासे तारनेवाले, विश्वकी सृष्टि,
स्थिति और अन्त करनेवाले, एक तथा अनेकरूप, स्थूल
तथा सूक्ष्महूप, अव्यक्त-व्यक्त-स्वरूप और मुक्तिग्रदाता
भगवान् जिष्णुके प्रति मेरा बारंबार नमस्कार है | इस जगवका
सृजन, पालन और विनाश करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और
रुद्रके मूछ कारण जगन्मय परमात्मा विष्णुभगवानको
मेरा नमस्कार है। विज्नके आधार, सूक्ष्से भी अति
सूक्ष्म समस्त भूतोंके अंदर स्थित अच्युत पुरुषोत्तम
भगवानको मेरा प्रणाम है |?
शिवपुराणमें स्थान-स्थानपर इसी सिद्धान्तका विविध
प्रसडमें विविध भाँतिसे उल्लेख हे | कुछ उदाहरण
देखिये | एक स्थानपर शिवके चतुब्यूहका उल्लेख करते
हुए कहा गया है कि गुणत्रयसे अतीत परात्पर भगवान्
सदाशिव चारों व्यूहोंके रूपमें अमिन्यक्त हैं--.८
व्र्सा, ,
काल, रुद्र और विष्यु। वे खर्ब सबके
आधार और
शक्तिके भी मूलछ हैं | कहा गया हे...
देवों ग्रुणत्रयातीतश्वलुब्यूहो मदेद्चरः ।
सकलाः सकदाधएरशक्तरुत्पात्तकारणम ॥
पका... न्थ+ ह+पसरला्रआा ्मंत“केमम--उला+--होद कप: ८आए५."७२-जद२«रागाम,
सन््आपकानमा ४ पिाओ पिला पुन जिम
४७ ७ + % ०२० कै कक अवामयोकल-#क ढ०० आय पा ता सा आबरी पेनननी फनी फल नकान नल कआ। 32 अलवर 3 अनरीर 2.
सोष्यमात्मा त्रयस्थास्थ प्रकृतेः पुरुपस्य च ।
लीलाकृतजगत्सप्रिरीशस्वरत्वे व्यवस्थितः ॥
यः सबस्मात्परों नित्यो निष्कलः परमेश्वर: ।
स एवं चर तदाधारस्तदात्मा तदधिष्टितः ॥
तस्मान्महेश्वरच्चेव प्रक्तिः पुरुषस्तथा ।
सदाशिवो भवो विष्णुब्रह्मा सब शिवात्मकम॥
( शिव० वा० सं० पू० खं० १० | ९--१२ )
“चतु्यूहके रूपमें प्रकट देवाधिदेव महेल्वर तीनों
गुगोंसे अतीत हैं; वे सवंभय हैं, सबकी आधाररूपा
शक्तिकी भी उक्त्तिके कारण हैं | वे ही तीनों गुणोंको
( ब्रह्मा, विष्णु, र्दके ) विग्रहरूपमें धारण करनेवाले
उनके आत्मरूप हैं, प्रकृति और पुरुष भी उन्हींके शरीर
हैं और वे उन दोनोंके भी आत्मा हैं | ठीछासे ही---खेल-
ही-खेलमें वे अनन्त कब्रह्माण्डोंकी रचना कर देते
हैं । जगन्नियन्ता ईखररूपसे भी वे ही खित हैं।
जो सबसे परे, नित्य, निष्कल--अखण्ड अथवा कलना---
कल्पनामें न आनेयोग्य परमेश्वर हैं, वे ही सम्पूणे दृश्य-
प्रपक्चकके आधार, उसके आत्मा तथा अधिष्ठान भी हैं |
छुतरां भगवान् सदाशिवर ही महेख्वर हैं, वे ही प्रकृति
पुरुष भी हैं | ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी वे ही हैं।
बस्तुतः सब॒ कुछ भगवान् सदाशिव ही हैं ॥
प्रात्यर भगवान् शिव भगवान् विष्णु और अक्मासे कहते हैं---
प्रछयस्थितिसगीर्णां क्तीहं सगुणो5गुणः ।
परत्रह्म निर्विकारः सच्चिदानन्द्लक्षणः ॥ २७ ॥
त्रिधा भिन्नो छाहं विष्णो त्रह्मविष्णुहराख्यया ।
सर्गरक्षल्यगुणेनिष्कल'5हं सदा हरे ॥ २८ ॥
सुधर्णस्य ययैकस्य वस्तुत्वं नें गच्छति ।
अलुंकृतिकृते देव नाससेदो न चस्तुत+५॥ ३५॥
यथैकस्या सदों भेदों नानापाजे न वस्तुतः ।
कारणस्पेव काय व संनिधानं निद्शनम् ॥ २६ ॥
वस्तुव॒त् स्बेदश्यं च शिवरूपं मतं मम ।
अहँ भवानजदचेथ रुद्रों योष्यं भविष्यति॥ ३८ ॥
एकरूपा न भेदस्तु भेदे वे वन्धन भवेत्् ।
तथापि च मदीयं हि शिवरूप॑ सनातनम् ॥ ३९ ॥
मूलीभूतं सदोक्त च सत्यक्षानमनन्तकम् ।
प॒व॑ शात्वा सदा ध्येयं मनसा चेच तत्त्वतः॥ ४० ॥
' ( शिव० रुद्र० सृष्टि० अ० ९)
हार
नारा पान मोपधान्नमे पहन नायक+ नाक आर जाम... आम राकी. पानामन वीक,
४ नमो रुद्राय शास्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
सीन. सन अमर“ फकन "अरमान पाकर पाकर "पूहाओ.बएमा पार. ९ कुरान... "न जब तहिनयान,
'बिष्णो ! में ही सट्टि, पान और प्रव्यका कर्ता हूँ ।
में ही सगुण-निर्मृण हूँ तथा सचिदानन्दखरूप निर्विका
पर्ह्म परमात्मा हूँ | हे हरे ! सृष्टि, रक्षा और प्रव्यहा
गुणों अथबा कार्योंके भेदसे में ही वह्मा, विप्णु और हर (छ)
नाम घारण करके तीन खरूयोंमें विभक्त हुआ हैँ।
वस्तुत: मैं सदा निष्कल हूँ । हे देब ! जेंसे एक ही सुकरा
के अनेक अलंकार बनते हैं, उनमें नाम तथा आकृति
भेद है, वस्तुतः कोई भेद नहीं है। जेंसे मिद्रीके विभिः
प्रकारके पात्रोमें केबल नाम और आकारका ही मेद है
वास्तवमें कोई भेद नहीं है, सत्र मिट्टी ही है । कार्यके रुप
कारण ही रहता-है | यही दृष्ठान्त पर्यात है
अतः सबको वस्तुके समान शिवरूप ही मानना चाहिये
यह मेरा मत है | में, आप और जो रुद्र प्रकट होंगे---
सब एकरूप ही हैं | इनमें भेद नहीं है | भेद माननेप
अवश्य ही वनन््धन होगा। तथापि मेरा परात्यर शिवरूप ही
सनातन है। यही सदा सत्र रूपोंका मूलभूत कहा
गया है | यह सत्य ज्ञान एवं अनन्त ब्रह्म है |
विभित्र करमोंमे साक्षात् परतम परात्पर महेश्वर्
विभिन्न खरूपोंसे त्रिदेवोंका प्राकत्य होता है औए
विभिन्न प्रसड्रीपर परस्पर एक दूसरेका स्तवन किया जात
है | इससे न तो उनके मूल वास्तव रूपमें कोई भेद आत।
है और न कोई छोटा-बड़ा ही होता है | इप्त बातके
भी शिवपुराणमें स्पष्टरूपसे खीकार किया गया है--- :
|
अयस्ते कारगात्मानो जाता; साक्षान्महेश्वरत्।. |
चराचरस्य विश्वप्य सर्गस्थित्यन्तहेतवः ॥ १३॥
परमेश्वयसंयक्ताः परमेश्वरमाविता।।..
तच्छत्तयाधिष्ठिता नित्यं तत्कार्यकरणश्षमाः ॥ १४॥ |
पिचा नियमित पूर्व अयोष्पि न्रिषु क्मसु |.
बच कप * |
त्रह्मा सग हरेख्राणे रुद्रः स हरणे तथा। ॥ १५॥
लब्ध्वा- स्वात्मना तथ्य प्रसाद परमेष्ठिचः । |
$(्े
अह्मवार/यणों पूर्व रुद्रः कल्पान्तरेष्सजत् ॥ ७॥
कल्पान्तरे पुनत्रेह्म/ रुद्र॒विष्ण जगनन््मयः ।
विष्णुश्च भगवान स्द्र त्रह्मणमस्जत्पुनः ॥ १८॥
# शिवपुराणमं शिवका खरूप $ १३
.......................................................3..33५०-७- अमन कननननन+नननननननननननननननननननननननननननमर मनन 5 ध:म्य्य्े््ं़़्ंटशय्््य््य्य्य्स्प्प््श्-
नारायणं पुनत्रह्म। ब्रह्माणं च .पुनभंवः ।
. पव॑ कल्पेपु कव्पेपु बअ्ह्मावेण्णुमहेश्वराः॥ ९९ ॥
परस्परेण.. जायन्ते .परस्परहितेषिणः ।
तत्तत्कद्पान्तवृत्तान्तमधिकृत्य. मह(पिंमि; ॥ २० ॥
( शि० पु० वा० सं० पू० खं० अ० १३ )
अ्ह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों ही कारणात्मा हैं । वे
क्रमश; चराचर जगत्की उत्पत्ति, पाछत और संहारके
हेतु हैं और साक्षात् महेश्वर ( परात्पर परतम भगवान् )
से प्रकट हैं | उनमें परम ऐश्व्य विद्यमान है | वे पर-
मेश्ररसे भावित और उनकी शक्तिसे अधिष्ठित हो नित्य
उनके कार्य करनेमें समय होते हैं । पूर्षकाल्में_ पिता
महेश्वरने ही उन तीनोंकी तीन कार्यो नियुक्त किया
था | ब्रह्माकी सष्टिकायमें, विष्णुकी पालनकारयमें और
रुंद्रकी संहारकायमें नियुक्ति हुई थी | कह्यान्तरमें परमे-
खबर शिवके प्रसादसे रुद्रदेवने ब्रह्म और नारायणको
प्रकट किया था। इसी प्रकार दूसरे कल्पमें जगन्मय ब्रह्मा
ने रू तथा विष्णुको प्रकट किया, फिर कप्पान्तरमें
भगवान् विण्णुने रुद्र तया ब्रह्माकी प्रकट किया । इसी
प्रकार पुनः ब्रह्माने नारायणको और रुद्गदेवने ब्रह्माको
प्रकट किया | इस तरह विभिन्न कह्मोमें ब्रह्मा, विष्णु
ओर महेश्वर परस्पर उत्पन होते और एक दूसरेका हित द
चाहते हैं | उन-उन कब्पाके वृत्तान्तकों ( किस खूपसे
किपका प्राकग्य होता है, इस वर्णनको ) लेकर महर्षि
गिग उनके ( इसीके अनुसार उन-उन रूपोंके ) प्रभावका
“चणन करते हैं ॥!
श्सी हेतुसे कहीं किसीको बड़ा बतछाया गया है
वर्ही किंसीको | इसमें तनिक भी संदेह नहीं करना
चाहिये |
॥. एते परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम।
.. पएरस्परेण वद्धेन्ते परस्परमनब्ताः ॥
।.. फबिद् ब्रह्म कचिह्विप्णुः कचिद् रुद्रः प्रशस्यते ।
|... गनेत तेपामाधिक्यमेद्यय चातिरिच्यते ॥
।।.. अय परस्त्वयं नेति संरम्भाभिनिवेशिनः |
।.._गंत॒धाना भवन्त्येव पिशाचाश्य न संशय: |
। | ( ७ पु दा> स> (० सं> २० | ६-८ |
“ये तीनों ( ब्रह्मा, विष्णु, रुद्व ) एक दूसरेसे उत्पन
हुए हैं, एक दूसरेकों धारण करते हैं, एक दूसरेसे बढ़ते
रहते हैं और एक दूसरेके अनुकूल आचरण करते हैं।
कहीं ब्ह्माकी प्रशंसा की जाती है, तो कहीं विष्णुकी
और कहीं रुद्की । इससे उनके ऐश्वयमं कोई अधिकता
या न्यूनता नहीं आती । जो लोग क्रोधवश ऐसा कहते
हैं कि “अमुक श्रेष्ठ हैं, अमुक श्रेष्ठ नहीं हैं?--त्रे अगले
जन्ममें राक्षस या पिशाच होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं |!
शिव ओर शक्तिमें अभिन्नता
इस प्रकार तीनों महान् देवताओंकी अमिन्नता और
उनसे परात्यर परतम ब्रह्मकी ( सदाशिव, महाविष्णु,
श्रीराम, श्रीकृषष्णकी ) अमिन्नता सबसस्मत है । ये परा-
प्पर ब्रह्म नित्य ही खरूपभूता परा-शक्तिसे सम्पन्न हैं ।
कभी वह शक्ति शक्तिमानमें छिपी निष्रिय रहती है,
कमी प्रकट होकर क्रियाशीला बन जाती है । मगवानने
गीतामें प्रकृतिको 'महद्योनि! और अपनेको “बीजग्रद पिता!
कहा है | वास्तवमें शक्ति और शक्तिमानका नित्य अविना-
भाव-सम्बन्ध है | इसीसे शिवपुराणमें भी कहा गया है---
एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतो$ स्थिता ।
न शिवेन विना शक्तिने शत्तया बिना शिवः ॥
( शिव० वाय० सं० उत्तर० ४ )
“इस प्रकार शक्ति और शक्तिमानको सदा एक दूसरे-
की अपेक्षा रहती है | न तो शिव ( शक्तिमान् ) के बिना
शक्ति रू सकती है ओर न शक्तिके त्रिना शिव ही रह
सकते हैं | दशक्तिमानू न हों तो शक्ति कहॉ
रहे और शक्ति न हो तो शक्तिमानका अस्तित्व
हीन हो। इसीसे ४? कार ( शक्ति )हीन शिंवको
दब! कहा जाता है |
गक्तिमानक्ते खरूपकी अभिव्यक्ति उनकी शक्तिसे
ही होती है | अतरव शक्तिका खरूप भी बही है. जो शक्ति-
पाना हैं । शिवपुराणमें ही भगवती पराञ्मक्ति उमादेबी
इन्द्रादि देवोंसे खयं कड॒ती हैं--
पर बा पर जस्यांतिः पघणनयच हन्दरूपिणाी |
अहमेवास्मि सकल मदन्यों नास्ति कंश्चन |
१७
निराकारापि साकारा सबंतत््वखरूपिणी ।
अप्रतक््यंगुणा नित्या कार्यकारणरूपिणी ॥
कदाचिदयिताकारा कदाचित्पुरुषाकृतिः ।
कदाचिदुभयाकारा सर्वाकाराहमीझ्वरी ॥
पिरज्िः सश्टिकर्ताह जगद्धाताहसच्युतः ।
रुद्र संहारकर्ताह सर्वविदश्वविमो.हेनी ॥
कालिककामलाबाणीमुलाः सवो हि शक्तयः ।
मदंशादेव संजातास्तथेमा; सकलाः कलूाः ॥
मत्प्रभावाज्ित/ सब युप्मामिर्दितिनन्दनाः ।
तामविशाय मां यूयं श्रुथा सवंशमानिनः ॥
यथा दारुमयीं योषां नतयत्येन्द्रजालिकः ।
तथेव सर्वेभूतानि नतेयास्यहमीदवरी ॥
मद्धयाद् वाति पवनः सर्वे दृहदति हव्यभुक् ।
लोकपालाः प्रकवेन्ति सखकमीण्यनारतम् ॥
कदाचिद्देववर्गाणां कदाचिद्वेतिजन्मनाम ।
करोमि विजय॑ सम्यक् खत्तन््त्रा निजलीलया॥
अविनाशि पर धाम भायातीतं परात्परम ।
श्रुतयों चणयन्ते यत्तद्वूपं तु ममेव हि॥
सगुणं निर्गुणं चेति मब्रूंप॑ क्विंविधं मतम्।
मायाशबलितं चेक॑ द्वितीयं॑ तदवाश्रितम् ॥
एवं विज्ञाय मां देवाः स्व॑ं स्वं गव विहाय च।
भजत प्रणयोपेताः प्रकृति मां सनातनीम ॥
( शि० पु० उ० सं० ४८ | २७--३९ )
“मैं ही परह्म, परमज्योति, प्रणबरूपिणी तथा युगल-
रूपधारिणी हूँ | में ही सब कुछ हूँ | मुझसे मिन्न कुछ
भी पदार्थ नहीं है । में निशाकार होकर भी साकार हूँ ।
सर्वतत्तखरूपा हैं । मेरे गुण अतक्ये हैं। मैं नित्यलरूपा
तथा कार्यकारणरूपिणी हूँ । मैं ही कभी प्राणवल्लभा
नारीका आकार धारण करती हूँ और कभी ग्राणबह्ठभ
. पुरुषका | कभी एंक साथ खत्री और पुरुष दोनों रुपोंमें
( अधेनारीश्वररूपमें ) प्रकट होती हूँ | मैं सर्बरूपिणी
इश्वरी हूँ । में दी सश्किर्ता ब्रह्मा हूँ, में ही जगतृपालक अच्युत
विष्णु हूँ और में ही संहारकर्ता रुद्र हूँ | सम्पूर्ण विश्वको
मोहमें डालनेबाली महामाया भी मैं ही हूँ। काली, लक्ष्मी
और सरखती आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ तथा ये सभी
भी कहाएँ
_भी मेरे ही अंशसे प्रकट हुई हैं 3
| मेरे ही प्रभावसे
४: नमो रुद्भराय शान्ताय अह्मणे परमात्मने
विजयिनीकी न जानकर तुमछोग व्यर्थ ही अपनेको
सर्वश्वर मान रहे
कठपुतलीको नचाता है, वंसे ही में ईश्वरी ही समझ
प्राणियोंकी नचाती हूँ | मेरे भयसे हवा चलती है, मेरे
भयसे अग्निदेव सबको जछाते हैं तथा मेरा भय मानकर
ही लोकपाल्गण निरन्तर अपने-अपने कर्मोमें लगे रहते
हैं | में सबया खतन्त्र हूँ और अपनी लीछासे ही कभी
देवसमुदायकी विजयी बनाती हूँ, कमी देत्यसमृहको
मायासे अतीत जिस अविनाशी परात्यर धामका अश्रुतियाँ
वर्णन करती हैं, वह मेरा ही रूप है | सगुण और
निगुण--मेरे ये दो रूप माने गये हैं | इनमें प्रथम
मायायुक्त है, दूसरा मायारहित | देवताओ | ऐसा जान-
कर गबका त्याग करो और मुझ सनातनी प्रकृति ( परा-
प्रा शक्ति ) की प्रेमपृौवंक आराधना करो ।!
परमात्मा शिवकी ये पराशक्ति सर्वेश्वर सदाशिवः
अनुरूप ही समस्त भलोंकिक गुणोंसे सम्पन्न उनव॑
समधरमिणी हैं | इन शिव-शक्तिकी ही सारी छीछा है। य
अनन्त विश्व केबछ शक्ति-शक्तिमानका ही छील-विर्ंता
है। जितने पुरुष हैं, सब शिव हैं और उनकी जो सह
धर्मिणी जितना ब्लियाँ हैं, वे सब शक्तिरूपा हैं | इसी तत्तकं
दिखल्ते हुए शिवपुराणमें कहा गया है---“शक्ति औ
शक्तिमानूसे प्रकट होनेके कारण यह जगव् शाक्तः औ!
'शैव! कहा गया है। जैसे माता-पिताके बिना पुत्रका जन
नहीं होता, उसी प्रकार भव और मवानीके ब्रिना झम
चराचर जगतूकी उत्पत्ति नहीं होती | जी और पुर
प्रकट हुआ जगत् ख्री और पुरुषरूप ही है; यह बी;
और पुरुषकी विभूति है, अतः ख्री और पुरुषसे अधिक
है । इनमें शक्तिमान् पुरुषरूप शिव तो “परमात्मा! को/
गये हैं और ख्लीरूपिणी शिवा उनकी “पराशक्ति? | शि। -
सदाशिव कहे गये हैं. और शिवा मनोन््मनी | शिव
महेश्वर जानना चाहिये और शिवा माया कहलती हैं।'
परमेश्वर शिव पुरुष हैं और परमेश्वरी शिवा प्रह्ञत।
हो | जेसे इन्द्रजाठ करनेवाल सूत्रवा
+
तुम देवताओंने सम्पूण देत्योपर विजयग्राप्त की है | मुझ से
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४ शिवपुराणमें शिवका सरूप *
महेश्वर शिव रुद्र हैं और उनकी वल्लभा शिवादेवी
रद्राणी | विखतेश्वर देव विष्णु हैं. और उनकी प्रिया
लक्ष्मी | जब सृष्टिकर्ता शिव ब्रह्मा कहलते हैं, तब
उनकी प्रियाको वह्माणी कहते हैं | भगवान् शिव भास्कर
हैं. और भगवती शिवा प्रभा | कामनाहान शिव महेन्द्र हैं
और गिरिराजनन्दिनी उमा शची | महादेवजी अग्नि हैं
और उनकी अर्द्धद्निनी उमा खाह्य | भगवान् त्रिछोचन
यम हैं और गिरिराजतन्दिनी उम्र यमप्रियां । भगवान्
शंकर निर्नति हैं और पार्वती नैश्नीती । भगवान् रुद्र
वरुण हैं और पार्वती वारुणी | चन्द्ररोखर शिव वायु है
' श्र पार्वती बायुप्रिया शिवा | शिव यक्ष हैं और पावती
क्द्धि । चन्द्राधंशेखर शिव चन्द्रमा हैं. और रल्लभा
उम्रा रोहिणी | परमेश्वर शिव ईशान हैं और परमेश्वरी
शिवा आर्या | नागराज अनन्तकों वलयरूपमें धारण करने-
बाले भगवान् शंकर अनन्त हैं और उनकी वछुभा शिवा
अनन्ता । कालशत्रु शिव काछाग्नि रुद्र हैं और काली
काटान्तकप्रिया हैं | जिनका दूसरा नाम पुरुष है, ऐसे
खायम्भुव मनुके रूपमें साक्षात् शम्मु ही हैं. और शिव-
प्रिया उमा शतरूपा हैं । साक्षात् महादेंव दक्ष हैं. और
परमेश्वरी पावेती प्रसृति | भगवान् भव रुचि हैं और
भवानीको ही विद्वान पुरुष आकृति कहते हैं | -महादेव-
गी भंग हैं और पाती ख्याति | भगवान् रुद्र मरीचि हैं
और शिववल्षणा सम्भूति | भगवान् गड्गाघर भब्विरा हैं
तीर साक्षात् उमा स्मृति | चन्द्रमौलि पुल्स्य हैं. और
'वती प्रीति | त्रिपुरनाशक शित्र पुल्ह हैं और पाबंती
! री उनकी प्रिया हैं | यज्ञविष्दंसी शित्र क्रतु कहे गये हैं
#र उनकी प्रिया पावती संनति | मगवान् शिव अत्रि हैं
॥र साक्षात् उमर उनसया | कालहन्ता शिव कश्यप हैं
रे मवेश्वरी उम्रा देवमाता अदिति। कामनाशन शित्र
< सि४ठ हैं और साक्षात् देवी पार्वती अरुन्वती | भगवान्
3: छो संसारके सारे पुरुष हैं ओर महेश्वरी शिवा ही
(6 हि पियों । अत: सभी खरी-पुरुष उन्हींकी
नं प्यूतिय । ८ |
।। गान शत बिपयी
पप्ल्न,
द रे परमेश्वरी उमा दिपय !
सट्टा पुज रजत 5 ग्द्रा घता
है. वह उब उमाका खूप है और
रु
___ ७ ए0>_ _€___[_ नन्न्ीे्ि्ि्् क्ं अल फ५वअदइल्ल्टइइडफिफ७9फ कि:छीटइअ इिीछउस्िइइसिसिक्वइ इइिक्इिक्लइससण आम. अी ऋ
श्रोता साक्षात् भगवान् शंकर हैं । जिसके विषयमें प्रइत
या जिज्ञासा होती है, उस समस्त वस्तुसमुदायका: खुस
गंकरवछभा शिवा खर्य धारण करती हैं. तया प्रूछनेवाला
जो पुरुष है, वह बाल-चन्द्रशेखर विश्वात्म शिवरूप ही
है | भववक्कमा उमा ही द्रषटब्य वस्तुओंका रूप धारण
करती हैं और द्रष्ट पुरुषके रूपमें शशिखण्डमीलि भगवान्
विश्वनाथ ही सब कुछ देखते हैं । सम्पूणं रसकी राशि
महादेवी हैं और उस रसका आखादन करनेवाले मझ्जछमय
महादेव हैं | ग्रेमसमूह पाती हैं और प्रियतम विषभोजी
शिव हैं । देवी महेश्वरी सदा मन्तव्य बस्तुओंका खरूप
बस्तुओंके मनन््ता_ ( मनन करनेवाले )-हैं... न मनन करनेवाले भववल्ठभा
पाती बोद्धन्य ( जानने योग्य ) वस्तुओंका खरूप धारण
करती हैं और शिज्ञु-शशि-शेखर भगवान् महादेव ही उन
वस्तुओंके ज्ञाता हैं | सामध्यशाली मगवान् पिनाकी सम्पूर्ण
प्राणियोंके प्राण हैं और सबके ग्रार्णोकी स्थिति. जलरूपिणी
माता पार्वती हैं | त्रिपुरान्तक पशुपतिकी प्राणवल्लमा
पावतीदेवी जब क्षेत्रका -खरूप धारण करती हैं, तत्र
काल्के भी काछ भगवान् महाकाल क्षेत्रज्षरू्पमें स्थित
होते हैं | शूल्थारी महादेवजी दिन हैं. तो शूछपाणि प्रिया
पार्वती रात्रि | कल्याणकारी महादेवजी आकाश है. और
शंकरग्रिया_पावेती एगितरी | भगवान् महेश्वर समुद्र हैं तो
गिरिराजकन्या शिव्रा उसकी तटभूमि हैं | द्ृषरभव्वज महा-
देव वृक्ष हैं तो विश्वेश्वरत्रिया उमा उसपर फेलनेदाली
लता हैं | भगवान् त्रिपुरनाशक महादेव सम्पूर्ण पुलिज्न-
रूपको खर्य घारण करते हैं ओर महादेवी मनोरमा देवी
शिवा सारा खीलिड्न-रूप धारण करती हैं । शिव्रवरल्ठभा
शिवा समस्त शब्द-जाल्का रूप धारण करती हैं. और
वालेन्दुओखर शिव सम्पूर्ण अर्थका | जिस-जिस पदाथकी_
जो-जो शक्ति कही गयी है, वह-वह दाक्ति तो विश्लेश्वरी
देवी शिवा हैं और वह-बह सारा पदार्थ साथ्वात महेखर हैं ।
जो सबसे परे है, जो पत्ित्र है, जो पुण्यमव है तथा जो मइ्सप
है. उस-उस इस्त॒कों महाभाग महात्माओने उन्हीं दोनों
दिव-पाव तीके तेजसे विस्तासकों प्राप्त हुई बताया हैं |
जेंसे जछते हुए दीपकर्नी झिंल्ा समते
धरया
“०5 0०, ६
१६ ४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने £:
उन्म उमा - सकी. परमिका .तआमामम सुशनननम. पल्मी-पडाकि--फ तन पहन...
के >>वबजन-मफल 3 >मम-+-य व मनकपमनमी>-+मन>माम-न पथ न- ३... मो -मम»- पाल +५-नममपाकन--पानमर न -धरम-फअम-+१५३४००-"##-५७-+४५५ ८»./० ७-३० 2-९. ५७3 ५..+:७०५३००७ ५7० ० पान कमी >पन 3 अभि ममनय९७म+ञपमग आम-->-++“कना “3०% २5 #आरं५< रत
प्रकाशित करती है, उसी प्रकार शिव-पाबतीका ही यह
तेज व्याप्त होकर सम्पूर्ण जगत॒को प्रकाश दे रहा है।
ये दोनों शिवा और शिव स्वरूप हैं, सबका कल्याण
करनेवाले हैं; अतः सदा ही इन दोनोंका पूजन, नमन
एवं चिन्तन करना चाहिये ॥!
( शिवपुराण; वायवीयसं० उ० ख० अध्याय ४ )
कृष्णयजुर्वदीय 'रुद्रहद्योपनिषद्? में इसी पिद्धान्तको
इन शब्दोंमें व्यक्त किया गया है-
रुद्रो नर उम्रा नारी तस्में तस्ये नमो नमः।
रुद्रो ब्रह्मा उमा वाणी तस्में तसये नमो नमः ॥
रुद्रो विष्णुरुमा लक्ष्मीस्तस्में तस्ये नमो नमः ।
रुद्र:ः खूये उमा छाया तस्में तस्ये नमो नमः ॥
रुद्रः सोम उम्रा तारा तस्में तस्यें नमो नमः ।
रुद्रो दिया उमा राजत्रिस्तस्मे तसथे नमो नमः॥
रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्मे तस्ये नमो नमः ।
रुद्रो वह्षिस्मा खाहा तस्में तसये नमो नमः ॥
रुद्रो वेद उमा शार्त्र तस्में तसये नमो नमः ।
रुद्रो चक्ष उमा वल्ली तस्में तस्यें नमो नमः ॥
रुद्रः पुष्पछुमा गन्धस्तस्मे तस्ये नमो नमः ।
रुद्रोष्थ. अक्षरा सोमा तस्में तस्ये नमो नमः ॥
रुद्रो लिझ्मुमा पीठ तस्में तसथे नमो नमः ।
इसी उपनिषदूमें यह भी बतछाया गया है कि इन
उमा-महेश्वरसे लक्ष्मी-विष्णुकी सबंथा अभिन्नता है----'जो
भगवती उमा हैं, वही विष्णुमगवान् हैं; जो भक्तिपूर्वक
विष्णुभगवानकी अचचना करते हैं, वे वृषभष्वज शिवजी-
की ही पूजा करते हैं । जितने पुँछिज्ञ प्राणी हैं, सब
महेश्वर हैं; जिंतने खीलिड्ढ प्राणी हैं, सब भगवती उमा
हैं. । समस्त व्यक्त जगत् उमाका खरूप है और अव्यक्त
जगत महेश्वरका खरूप है । उमां और शंकरका योग
ही विष्णु कहलाता है.
“या उमा सा सखय॑ विष्णुः!
'ये्चेयन्ति हरि भक्त्या ते'चेयन्ति लपध्चजम ।!
पुलिह स्वेमीशानं स्रीलिहू भगवत्युमा ।?
“व्यक्त सर्वेसुमारूपमव्यक्त महेद्बरः |!
“उमाशंकरयोयॉगः स योगो विष्णुरुच्यते ।!
इसी तिद्धान्तका निरूपण समस्त शिवपुराणमें है।
शित्र, विष्णु, शक्ति; गणेश और सूरय--ये पाँच प्रगु
देवता एक ही भगवानके खरूप माने गये हैं | इन सत्र
एकता शिवपुराणमें प्रतियादित है | शित्र, विष्णु, शक्ति
की बात संक्षेपर्म ऊपर आ ही गयी है । गणेदका प्र
शिबपुराणमें विस्ताससे है और सयमगवानकों सर
भगवान् शित्रने अपना रूप बताकर उन्हें अर्ध्यदि देका
पूजन करनेकी आज्ञा दी है (शिवपुराण, वायबीयसंहित
उत्तरखण्ड अ० ८)। इस प्रकार एक ही परम परत
भगवत्तत्वका निरूपण तथा व्याख्यान शिवपुराणमें है।
यही शित्रपुराणके 'शिवःका खरूप है |
शिव सनातन त्रह्म तथा लिझ्न-पूजा भी सनातन
ये परात्यर परतम भगवान् शिव न तो आधुनिक देवह
हैं, न ये अवेदिक हैं और न अनायेंके ही देवता हैं |
लिझ्गपूजा ही दूषित, आधुनिक या अनायसेवित है | कि
अनादि परमात्मा पसख्नह्म हैं | ये वेदिक देवता हैं | वेदोंमें श्ि
तथा रुद्रपरक प्रसड्ढ भरे हैँ | रुद्राध्याय तो शिव भग
के नामोंसे ही प्रूण है । कर्दिन, पशुपति, सहस्
सद्योजात आदि नाम भी वहुत जगह आये हैं |+#
लिज्ञेपासनाका प्रमाण भी वेदोंमें मिलता है । ब्रा
तथा आरण्यक ग्रन्योंमें भी शिवका विशद वर्णन है
उपनिषदोंमें इवेताश्वतरोपनिषद् आदि कई उपर
तो केवछ शिवपरक ही हैं | केन, कैवल्य, नारायण, रुद्रहः
जाबाल, बृहजाबाल, दंक्षिणामूर्ति, नील्रुद्रोपनिषदू आ
में भी उमा-शिव-विषयक प्रसज्ज ही हैं। अतएव इस श्रा
निकाल देना चाहिये कि शिव अनारय या अवैदिक दे
हैं और उनकी उपासना आधुनिक है !
इतना अवश्य है कि द्ेषबुद्धिको छोड़कर ही आए
अपने साध्य इष्टखरूप तथा उसके न््य लगे
चाहिये । किसीको छोठा-बड़ा न मानकर सभी भ
रूपोंको अपने ही इष्टदेवके विभिन्न नाम-रूपोंवाले
उन्हींके खरूप मानकर अपने इष्ट-खरूपकी उपाए
संकन रहना चाहिये और अन्य किसी भी |
निन््दा नहीं करनी चाहिये | एक ही मगवानके अनेक
रूप तथा तदनुरूप उपासंनाके लिये विमिन्न नियम है
“7++-5>२++कक्ट्ॉटु.-६--
। *
श्रीगणेशाय नमः
श्रीशिवपुराण-माहात्य
भवाव्धिसग्न दीन॑ मां समुझर भवाणवात् | कर्मग्राहगहीताड़' दासो5ई तब
शंकर ॥
शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर खतजीका उन्हें शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना
श्रीशीनकजीने पूछा--महाशानी सूतजी | आप सम्पूण
सिद्धान्तोंके शाता हैं। प्रमो | मुझसे पुराणोंकी कथाओंके
सार्तत््वका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये | शान ओर वैराग्यसहित
:भक्तिसे प्राप्त होनेवाले विवेककी वृद्धि केंसे होती है ! तथा
साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम-क्रोध आदि मानसिक
विकारोंका निवारण करते हैं ! इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः
| आसुर खभावके हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध ( देवी
“सम्पत्तिसे युक्त ) बनानेके लिये सर्वश्रेंह उपाय क्या है ! आप
हैंइ्स समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन बताइये, जो
| किल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट एवं परम मज्गलकारी
ही तथा पवित्र करनेवाले उपायोंमें भी सर्वोत्तम पविन्रकारक
उपाय हो। तात | वह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे
गा द ही अन्तःकरणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा उससे निर्मल
हशचित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवकी प्राप्ति हो जाय ।
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श्रीसतजीने फहा--सुनिश्रेष्ठ शौनक | तुस धन्य हो;
क्योंकि तुम्हारे हृदय पुराण-कथा सुननेका विशेष प्रेम
एवं लालसा है | इसलिये में शुद्ध बुद्धिसि विचारकर तुमसे
परम उत्तम शासत्रका वर्णन करता हूँ। वत्स | वह सम्पूर्ण
शाह्त्रोंके सिद्धान्तसे सम्पन्न, सक्ति आदिको बढ़ानेवाला तथा
भगवान् शिवको संतुष्ट करनेवाल्म है। कानोंके लिये रसायनु--
अमृतस्वरूप तथा दिव्य है; तुम उसे श्रवण करो । मुने [ वह
परम उत्तम शाप्न है--शिवपुराण, जिसका पूर्वकाछमें भगवान्
शिवने ही प्रवचन किया था । यह कालरूपी स्पसे प्राप्त होनेवाले
महान् त्रासका विनाश करनेवाला उत्तम साधन है। गुरुदेव
व्यासने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर बड़े आदरसे संक्षेपमें
ही इस पुराणका प्रतिपादन किया है | इस पुराणके प्रणयनका
उद्दे श्य है--कलियुगर्म उत्पन्न होनेवाले मनुष्योके परम द्वितका
साधन ।
यह शिवपुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस भूतलपर
भगवान शिवका वाद्य स्वरूप समझना चाहिये और सब
प्रकारसे इसका सेवन करना चाहिये | इसका पठन ओर श्रवण
सर्वताधनरूप है। इससे शिवभक्ति पाकर श्रेष्ठमम स्थितिमें
पहुँचा हुआ मनुष्य शीत ही शिवपदको प्राप्त कर लेता है |
इसलिये सम्यूणं यक्ष करके मनुप्योंने इस पुराणकों पढनेकी
इच्छा की है--अथवा इसके अध्ययनको अभीष्ट साथन माना
है । इसी तरह इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी समूर्ण सनोबाम्छित
फछोंको देनेवाल्य है । भगवान् शिवके इस पुराणको सुननेसे
मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा इस जीवनमें बड़े-बड़े
उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करके अन्तमें शिवलोककों प्राप्त
कर लेता है ।
यह शिवपुराणनामक अन्थ चोवीस हजार अओेकंसि युक्त
है | इसकी सात संहिताएँ हैँ । मनुप्यको चाहिये कि बह
भक्ति; घाव ओर वेरास्थसे सम्पन्न हो बढ़े आदरसे इसका
श्रवण करे । सात ऊरंहिताअंसि युक्त यह दिव्य सिवपुराण
परदट्म परमात्माक्ते समान विराजमान £ सीर सबसे उत्ह्ृष्ट
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गति प्रदान छनेवाला टे !
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१८
जो निरन्तर अनुसंधानपूधेक इस शिवपुराणको बॉचता
है, अथवा नित्य प्रेमपूर्वक्त इसका पाठमान्र करता है। वह
पुण्यात्मा है--इसमें संशय नहीं है| जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष
अन्तकालमें भक्तिपूवेक इस पुराणकोी सुनता हैः उसपर
अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् महेश्वर उसे अपना पद ( धाम )
प्रदान करते हैं । जो प्रतिदिन आदरपूवक इस शिवपुराणका
पूजन करता है, वह इस संसारमें सम्यूणं मोगोंकी भोगकर
अन्तमें मगवान् शिवके पदको प्राप्त कर लेता है । जो प्रतिदिन
हि हि
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मन 5
[ सक्षिप्त-शित्रपुराणाः
सम परननरितानो जा... पार के फलनतीयानो;-परवोनारी> जममनगा+-. कुछ... धमकी. आह 8... परम. फरमान. फीड "नाकाम पाननी "कमा..." पेपार पे िाा# ०-० वमक
आल्ल्यरद्वित हो रेशमी बस्र आदिके वेष्टनसे इस शिवपुराणद्र
सत्कार करता है; वह सदा मुख्ती दाता है| यह शखित्रय॒ग
निर्मेल तथा भगब्रान शझिन्रकरा सर्बस्व हैं जो इहलोक ओऑ
परलोकम भी सुख चाहता हो; उसे आदरके साथ प्रवन्रूरर
इसका सेचन करना चाहिये । यह निर्मल एवं उत्तम शत
पुराण धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्षहूप चारों पुरुयाथो
देनेवाला है | अतः सदा प्रेमपूर्वक्र इसका श्रवण एवं विद
पाठ करना चाहिये | ( अध्याय १]
शिवपुराणके अ्रवणसे देवराजको शिवलोककी ग्राप्ति तथा चज्चुलाका पापसे भय एवं संसारसे बेंसाम्
श्रीशोनकजीने कहा--महामाग सूतजी ! आप धन्य
हैं, परमार्थ-तत्त्वके श्ञाता हैं; आपने कृपा करके हमलोगोंको
यह बड़ी अद्भुत एवं दिव्य कथा सुनायी है। भूतलपर
इस कथाके समान कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन दूसरा कोई
नहीं है; यह बात हमने आज आपकी कृपासे निश्चयपू्रक
समझ ली । सूतजी | कलियुगमें इंस कथाके द्वारा कोन-कोन-से
पापी शुद्ध होते हैं! उन्हें कृपापूर्वक बताइये और इस
जगतको कृताथे कीजिये ।
सूतजी वोले--मने ! जो मनुष्य पापी; हुराचारी; खल
तथा कामं-क्रोध आदियें निरन्तर ट्वे रहनेवाले हैं; वे भी इस
पुराणके श्रवण-पठनसे अवध्य ही झुद्ध हो जाते हैं। इसी
विष्रयमें जानकार मुनि इस प्राचीन इतिहातका उदाहरण दिया
करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पार्पोका पूर्णतया नाश हो जाता है।
पहलेकी वात है; कहीं किरातोंके नंगरमें एक ब्राह्मण
का अत्यन्त ९: वेचनेवाला
रहता था; जो ज्ञानमें अत्यन्त दुबल, दरिद्र, रस बेचनेव
तथा वैदिक धर्मसे विमुख था | वह सख्ाम-संध्या
आदि कर्मोंसे भ्रष्ट हो गया था ओर बैश्बबृत्तिमें तत्पर रहता
था । उसका नाम था देवराज | वह अपने ऊपर विश्वास
करनेवाले लोगोकी ठगा करता था । उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों,
बैश्यों, झट्ठों तथा दूसरोंको भी अनेक बहानोंसे मारकर उन-
उनका घन हड़प लिया था । परंतु उस पापीका थोड़ा-सा भी
घमके 408. ०» ० था् हें
घन कभी धमके काममें नहीं लगा था | वह वेश्यागामी तथा
सब प्रकारसे आचारश्रए्ट था |
एक दिन घूमता-बामता वह देवग्रोगसे प्रतिश्ानए
( झसी--प्रयाग ) में जा पहुँचा | वहाँ उसने एक शिद्राल
देखा, जहाँ बहुत-से साधु-महात्मा एकन्र हुए थे । देवरा
उस शिवालयमं ठहर गया; किंतु वहाँ उस ब्राह्मणको ज्यर ४
गया । उस ज्वर्से उसको बड़ी पीड़ा होने छूगी । वहाँ ए;
ब्राह्मणदेवता शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे । ज्वरमें पढ़
हुआ देवराज ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुईं उस
कथाको निरन्तर सुनता: रहा | एक मासके वाद वह चल
अत्यन्त पीड़ित होकर चल बसा | यमराजके दूत आये अं
उसे पाशेंसे वॉघकर बल्यूवंक यमपुरीमें ले गये | इतनेमें
शिवलोकसे भगवान शिवके पार्पदगग आ गये | उनके 7
अक्ञ कपूरके समान उज्ज्चछ थे, हाथ त्िश्यूल्से घ्फ
हो रहे थे; उनके सम्पूर्ण अज्ग भस्मसे उद्धासित ये४८४
रुद्राक्षकों मालाएँ उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रही है [
सब-के-सब क्रोधपूर्वक यमपुरीमं गये और यमराजक्रे दूहे
मार-पीटकरः वारंबार धमकाकर उन्होंने देवराजको 3
चंगुल्से छुड़ा लिया और अत्यन्त अद्भुत विमानपर «४
जब वे शिवदूत केलास जानेको उद्यत हुए; उस समय 4:
स॑ बड़ा भारी कोलाहछ मच गया | उस कोलाहलकों ४.
घमराज अपने भवनसे बाहर आये । साक्षात् दूसरे ढ,
समान प्रतीत होनेवाले उन चारों दूतोंकी देखकर
धर्मराजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और <।६ ;
देखकर सारा चृत्तान्त जान लिया । उन्होंने भयके + /
भगवान् शिवके उन महात्मा दूतोंसे कोई बात नई भर
जनक पर कापरनन रन ० 3 ०-22222 मम. यम 333 मल जमा अप अप
छ. शिवलोकक्री दि. रू हुं
श्रीशिवपुराण-साद्ात्स्य ). # शिवपुराणके श्रवणले देवराजकों शित् प्राप्ति * १९,
उलटे उन सबकी पूजा एवं प्राथेना की | तत्पश्चात् वे शिवदूत
केटासको चले गये ओर वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस ब्राह्मणको
दयासागर साम्ब शिवके हाथोंमें दे दिया ।
” झौनकजीने कहा--महाभाग सूतजी | आप सर्व
हैं। महामते | आपके कऋृपाप्रसादसे मैं' बारंबार ऋतार्थ
; हुआ | इस इतिहासको सुनकर मेरा मन अत्थन्त
( आनन्दर्मे निमग्न हो रहा है| अतः अब भगवान् शिवमें प्रेम
/ बंढ़ानेवाली शिवसम्बन्धिनी दूसरी कथाको भी कहिये ।
:!. भ्ीखतजी वोलछे--शोनक ! सुनो) में तुम्हारे सामने
2 गोपनीय फघावस्तुका भी वर्णन करूँगा; क्योंकि तुम शिवभक्तों-
५ में अगगण्य तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो | सम॒द्रके निकट्वर्ती
_>मदेशर्मे एक दाष्कछ नामक ग्राम है; जहाँ वेदिक घर्मसे
/ दिमुख महापाधी द्विज निवास करते हैँ। ये सब-केस्सव बड़े
: हुए हैं; उनका मन दूषित विपयमोगोंमें ही छगा रहता है। वे
£ ने देवताओंप घास करते हर भाग्यपर; ये सर्भ
. में पतआपर विश्वास बरते हैँ ने भाग्यपर। वे सभी कुटिल
के
|
फओी -+५9 यार पका अनकान्का
9८८ र्परि पड़जे रे किसान धातक अख्र
हे पतपाले एं। कियानी करते और भाति-भातिके घातक अरर-
्
|.
चा
| शक श्प्ते 7 कप हर न्पा घ्यरि स्गद्य हक हो देराग्य नम
४ शख् रखते हूँ। ये व्यमिदारी और खरल हैँ । कान वेराग्य
हु हि स्शफाफ्रत ्ड ध्छ चर 4 श्र हे.
४यरलदमश दान हा सनुष्पके लिये पर्स पवार ऐ--इस
७ हे. कोन
पलक मा ल््टालइलत अल गिरे 28» पक पल 5 री एल न्न्
८0077 ५ जज इ गए गन एच वे रर्मा पशुदचाददाल टू |
( जहॉँके द्विज ऐसे हों, वहँकि अन्य वर्णोके विषयमें क्या कहा
जाय । ) अन्य वर्णोके लोग भी उन्होंकी भाँति कुत्सित विचार
रखनेवाले, खघमविमुख एवं ख़ल हैं; वे सदा कुकर्ममें लगे
रहते और नित्य विषयभोगोंमें ही ड्रबे रहते हैं| वहाँकी सब
झ्रियाँ भी कुणिल खभावकी, स्वेच्छाचारिणी। पापासक्त:
कुत्सित विचारवाली ओर व्यभिचारिणी हैं | वे सद्दधवहार तथा
सदाचारसे स्वंथा झृत्य हैं। इस प्रकार वहाँ दुशेंका ही निवास है।
उस वाष्कछ नामक आममें किसी समय एक विन्दुंग
नामघारी ब्राह्मण रहता था; वह बड़ा अधम था । इुरात्मा
और महापापी था । यद्यपि उसकी स्त्री बड़ी सुन्दरी थी; तो भी
वह कुमा्गपर ही चलता था। उसकी पत्नीका माम चज्चुला
था; वह सदा उत्तम घमके पालनमें लगी रहती थी, तो भी
उसे छोड़कर वह दुष्ट ब्राह्मण वेश्यागामी हो गया था । इस
तरह कुकममें लगे हुएए उस बिन्दुगके बहुत वर्ष व्यतीत हो गये |
उसकी स्त्री चञ्चुढा कामसे पीड़ित होनेपर भी खघमनाशके
भयसे क्लेश सहकर भी दीघेकाल्तक धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुई |
परंतु दुराचारी पतिके आचरणसे प्रभावित हो आगे चलकर
वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गयी |
इस तरह दुराचारमें ट्बे हुए उन मुूढ चित्तवाले पति-
पक्तीका बहुत-सा तमय व्यर्थ बीत गया । तदनन्तर शूद्वजातीय
वेश्याका पति बना हुआ वह दृषित बुद्धिवाला दुष्ट ब्राह्मण
विन्दुग समयानुसार मत्युको प्रात हो नरकमें जा पढ़ा |
बहुत दिनोंतक नरकके दुःख भोगकर वह मूढ्बुद्धि पापी
विन्ध्यपवंतपर भयंकर पिशाच हुआ । इधर, उस दुराचारी
पति विन्दुगके मर जानेपर वह मूृढुद्ददया चब्चुला बहुत
समयतक पुत्रोंके साथ अपने घरमें ही रही |
एक दिन देवयोगसे किसी पुण्य पर्वके आनेपर वह स्त्री
भाई-बन्धुओंके साथ गोकणक्षेत्रमें गयी। तीर्थययान्रियोंके सहसे
उसने भी उस समय जाकर किसी तीर्थके जलमें स्नान
किया । फिर वह साधारणतया ( मेला देखनेकी दृष्टिसि )
बन्धुजनोंकि साथ यत्र-तत्न घूमने लगी | घृमती-धामती किसी
देवमन्दिरमें गयी और वहाँ उसने एक देव ब्राह्मके
मुखसे भगवान् शित्रकी परम पच्चित्र एवं मडलू्कारिणी उत्तम
पौरशागिक कथा सुनी | कथायाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि
“लो स्त्रियों परपुरर्षेक्ति साथ व्यमिचार करती हैं, थे मरनेफे
बाद जब यमलोकर्मे लाठी हैं; तब यमराजके दत उनकी
योनिमें तपे हुए. लोदेशा परिष शहते हैं । पींसदिक आद्यणके
२०
४ नगो रुद्भाय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने १
| संक्षिप्त-शिवपुराणाह
मुखसे यह वैराग्य बढ़ानेवाली कथा सुनकर चज्चुछा भयसे
व्याकुल हो वहाँ कॉपने छगी | जब कथा समाहत हुई और
सुननेवाले सब लोग वहँँसे बाहर चले गये, तब वह
भयभीत नारी एकान्तर्मे शिवपुराणकी कथा बॉचनेवाले
उन ब्राह्मणदेवतासे बोली |
श्र
श्द
रै
बैराग्यसे युक्त हुईं चब्चुछा ब्राह्मणदेवताके दोनों
सर ०० -+ ७४०७० ५७/2०५.५क--क५क३ ७4००५. ॥न्०७ ..2-७५०-.#१००५७०-५५ /र>+ सम नमन" पर नकल नमस्कार री करनी पल नी पक नमक- मछली यह नि -+ नर ककक री“ ककीत-3कटी- १७७ नली क-म५भ+- नली नयी 5 न १९५५-५५ मनन +रथ+ मानना जन्म ५ नम +अमम ५5 मारी फमकनी पकनीग पे नमी ५-48 प जी पकननि मीन मी नमन नन्मीयय परी + नमी सनी रन री परी सीन रन नी ान्चती कन्न्न्_.
जानती थी । इसलिये भेरे द्वारा बढ़ा दुराचार हुआ है।
खामिन् | मेरे ऊपर अनुपम कृपा करके आप मे
उद्धार कीजिये | आज आपके वेराग्य-रससे ओतपग्रोत
इस प्रवचनकों सुनकर मुझे बड़ा भय छग रहा है। मै
कॉप उठी हूँ और मुझे इस संसारसे वेराग्य हो गया है|
मुझ मूढ॒चित्तवाली पापिनीको घिक्कार है । में सबंध
निन््दाके योग्य हूँ | कुत्सित विप्रयोंमें फँसी हुई हूँ मो!
अपने धर्मसे बिमुख हो गयी हैं | हाय | न बने
किस-किस घोर कष्टदायक दुर्गतिमें मुझे पड़ना पढ़ेग
ओर वहाँ कौन बुद्धिमान् पुरुष कुमार्गमें मन ल्गानेवादे
मुझ पापिनीका साथ देगा | मृत्युकालमें उन भवंक
यमदूतोंको मैं केसे देखूँगी ! जब वे बल्पूर्वक मेरे गहेंग
फंदे डालकर मुझे बाँघेंगे, तब में केसे घीरज घारण कर
सकूँगी । नरकमें जब मेरे शरीरके हुकड़े-ठुकड़े किये जायगे
उस समय विशेष दुःख देनेवाली उस महायातनाको में वह
केसे सहूँगी ! हाय ! में मारी गयी | मैं जल गयी | मे
हृदय विदी् हो गया और मैं सब प्रकारसे नष्ट हो गयी
क्योंकि में हर तरहसे पापमें ही डूबी रही | है
ब्रह्मनू | आप ही मेरे गुरु, आप ही माता ओर आप
पिता हैं | आपकी शरणमें आयी हुई मुझ दीन अबला॥ग
आप ही उद्धार कीजिये; उद्धार कीजिये |
रूतजी कहते पह--शौनक ! इस प्रकार खेद
गिर पड़ी । तब उन बुद्धिमान ब्राह्मणने कृपापूर्वक उसे
ओर इस प्रकार कहा--- ( अध्याय २३३
चब्चुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण सुनाना ओर समयानुसार शरीर छोड़कर
शिवलोकमें जा चब्चुलाका पावेतीजीकी सखी एवं सुखी होना ह
ब्राह्मण बोले--नारी ! सोमाग्यकी बात है कि भगवान्
शंकरकी कृपासे शिवपुराणकरी इस बेराग्ययुक्त कथाकों सुनकर
ठ्॒हें समयपर चेत हो गया है | आ्राह्मणपत्नी | ठुम डरो मत ।
भगवान् शिवकी दशरणमें जाओ । शिवकी कृपासे सारा
पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। मैं तुमसे भगवान् शिवकी
कीतिकथासे युक्त उस परम वस्तुका वर्णन करूँगा, जिससे
तुम्हें सदा सुख देनेवाली उत्तम गति प्राप्त होगी ।
न उत्तम कथा सुननेसे ही तुम्हारी बुद्धि इस
पश्चात्तापसे युक्त एवं शुद्ध हो गयी है। साथ ही हुई
मनमें विषयोंके प्रति वेराग्य हो गया है। पश्चात्ताप ही
करनेवाले पापियोंके लिये सबसे बड़ा प्रायश्रित्त-
सत्पुरुषोंने सबके लिये पश्चात्तापको ही समस्त पापोंका
बताया है; पश्चात्तापसे ही पापोंकी शुद्धि होती है। जो प
करता है, वही वास्तवमें पापोंका प्रायश्रित्त करता है
बच
न्यू #
श्रीशिवपुराण-माहात्स्य ) # चज्चुलाकी प्रत्थनाले ब्राह्मणका डसे पूरा शिवपुराण खुनाता ह#ः
सत्पुरुषोंने समस्त पार्पोकी शुद्धिके लिये जेसे प्रायश्रित्तका
उपदेश किया है; वह सब पश्चात्तापले सम्पन्न हो जाता है |#
जो पुरुष विधिपूर्षक प्रायश्रित करके निर्भय हो जाता है;
पर अपने कुकर्मके छिये पश्चात्ताप नहीं करता) उसे प्रायः उत्तम
गति नहीं प्राप्त होती | परंतु जिसे अपने कुक्ृत्यपर
ह्वर्दिक पश्चाचाप होता है; वह अवश्य उत्तम गतिका भागी
होता है--इसमें संशय नहीं । इस शिवपुराणकी कथा सुननेसे
जैसी चित्तगुद्धि होती है; वेसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती ।
जसे दर्पण साफ करनेपर निर्मल हो जाता है। उसी प्रकार
इस शिवपुराणकी कथासे चित्त अत्यन्त झुद्ध हो जाता है---
इसमें संशय नहीं है | मनुप्योके शुद्धचित्तमें जगदम्बा पावरती-
सहित भगवान् शिव विराजमान रहते हैं | इससे वह
विश्वुद्धात्मा पुरुष श्रीसाम्ब सदाशिवके पदको प्रात होता है ।
इस उत्तम कथाका श्रवण समस्त मनुष्योके लिये कल्याणका
बीज है । अतः यथोचित ( शाघ्तोक्त ) मारगसे इसकी
आराधना अथवा सेवा करनी चाहिये । यह भव-बन्धनरूपी
' रोगका नाश करनेवाढी है। भगवान् शिवकी कथाको
घुनकर फिर अपने हृदयमें उसका मनन एवं निदिध्यासन
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करना चाहिये | इससे पूर्णतया चित्तशुद्धि हो जाती है ।
चेचशुद्धि होनेसे मद्ेश्वरकी भक्ति अपने दोनों पुत्रों ( शान
और वैराग्य ) के साथ निम्वय ही प्रकट होती है ।
तत्पश्शत् मशेश्वरफे अनुग्रहसे दिव्य मुक्ति प्राप्त द्ोती है
इसमें संशय नहीं है। जो मुक्तिसे वश्चित है; उसे पशु
पम्झना चाहिये। क्योंकि उसका चित्त सायाके बन्घनमें
आसक्त ऐ | वह निश्चय ही संसारबन्धनसे मुक्त नहीं
हो पाता ।
ग्रान््मणपत्ञी | इसलिये तुम विषयोंसे मनको हटा छो
ओर भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी इस परम पावन कथाको
भुनो--परमात्मा शंकरकी इस कथाकों सुननेसे तुम्दारे चित्तकी
छद्धि ऐमी ओर इससे तुम्हें मोक्षक्री प्राप्ति हो जायगी । जो
निर्मेठ चित्तसे भगवान शिवक्के चरणारविन्दोंका चिन्तन
3. 4 ५>>«>कलाक->>-जनिक अली नका- मर
के प६ छाप: पापडूसाी पापानां निष्कृति ध परा १
सं दवित॑ संद्धिः सर्वपापविशोषनस् ॥
इ्ाशाऐेगैद शुद्दिः पायाश्ति करोते सः।
र्पएरिहे. सर्िईि सर्णरविशेषनन् ॥
ट ई५ पराण २० ह "आती है ५ + फल -+१- - हट आकर
५ दिश्पराम-गाशध्म्थय झू० ३२ ऋठ ७-६ ॥
२१
करता है; उसकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है--यह
में तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ ।
सूतजी कहते है--शोनक | इतना कहकर वे श्रेष्ठ
शिवभक्त ब्राह्मण चुप हो गये | उनका छृदय करुणासे आदर
हो गया था । वे झुद्धचित्त महात्मा भगवान् शिवके- ध्यानमें
मम्म हो गये । तदनन्तर बिन्दुगकी पत्नी चश्लला मन-ही-
मन प्रसन्न हो उठी । ब्राह्मणका उक्त उपदेश सुनकर उसके
नेत्रोंमि आनन्दके आँसू छल्क आये थे । वह ब्राह्मणपत्नी
चञज्चुला हपभरे हृदयसे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके दोनों चरणोंमें
गिर पड़ी ओर हाथ जोड़कर बोली--५मैं कृतार्थ हो गयी |!
तत्पश्चात् उठकर वेराग्ययुक्त उत्तम बुद्धिवाली वह स्त्री; जो
अपने पापोके कारण आतड्डित थी; उन महान शिव-भक्त
ब्राह्मणसे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोली ।
चलाने कहा--ब्रह्मन! शिवमक्तोमें श्रेष्ठ ) स्वामिन!
आप घन्य हैं, परमार्थदर्शी हैं ओर सदा परोपकारमें लगे
रहते हैं | इसल्ये श्रेष्ठ साधु पृरुषोंमें प्रशंसाके योग्य हैं |
साधो | मैं नरकके समुद्रमें गिर रही हूँ | आप मेरा उद्धार
. कीजिये; उद्धार कीजिये । पोराणिक अथै-तत्वसे सम्पन्न
जिस सुन्दर शिवपुराणकी कथाकों सुनकर मेरे मनमें सम्पूर्ण
विषयेसि वेराग्य उत्पन्न हो गया; उसी इस शिवपुणणको
सुननेके लिये इस समय मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा हो रही है।
सूतजी कहते हँ--ऐसा. कहकर- हाथ जोड़ उनका
अनुग्रह पाकर चश्लुला उस शिवपुराणकी कथाकों सुननेकी
इच्छा मनमें लिये उन श्राह्मणदेवताकी सेवार्में तत्पर हो
वहाँ रहने लगी | तदनन्तर शिवभक्तोमें श्रेष ओर झद्ध बुद्धिवाले
उन ब्राह्मणदेवने उसी स्थानपर उस स््रीकीं शिवपुराणकी उत्तम
कथा सुनायी | इस प्रकार उस गोकर्ण नामक मह्दाक्षेत्रम उन्हों
श्रेष्ठ आह्षणसे उसने शिवपुराणकी वह परम उत्तम कथा.
सुनी, जो मक्ति, शान ओर वैेराग्यक्ो बद्नेवाली तथा मुक्ति
देनेवाली है | उस परम उत्तम कयाकों सुनकर बह आदाण-
पत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी | उसका चित्त शीत्र ही शद
टी गया । फिर भगवान शिवके अनुभ्हसे उसके हृदयमें
शिवके संगुगरूपका झ्िन्तन होने लगा | इसे प्रकार उसने
भगवान शिवर्में लगी रहनेदाली उचम
पड पादुर अकेला "पा सय 2 इ2
झुष्ठ पाकर शाइक
सक्तिदानन्दगय हा स्वत्पदा
के दानन्टसय सच
का कस बाज
रे चखतपदा यार दार उनदर्न आरस्म सूया ।
२०००: कलर
नी
कल... +
पंप अत जी की आजा कि लेस्यरे ही
श्रीशियपुराण-माहात्म्य | # चडज्चुलाके प्रयत्लसे पाः आज्ञा पांकर तुंस्चुरुँका खुखी होना $
सतजी कहते हैं--शोनक ! जिसे सद्गति प्राप्त हो
चुकी थी। वह चञ्चुला इस प्रकार महेश्वरपल्ली उमराकी स्तुति
करके सिर झुकाये चुप हो गयी । उसके नेन्रोम प्रेमके आँसू
उमड़ आये थे । तब करुणासे भरी हुई शंकरप्रिया भक्त-
वत्सव्य पावतीदेवीने चजञ्चुल्यकों सम्बोधित करके बड़े प्रेमसे
इस प्रकार कहा-- द
पाती वोलीं--सखी चड्चुले | सुन्दरि | में त॒म्हारी
की हुई इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ | बोलो, क्या बर मॉँगती
दो ! नुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है |
चञ्चुटा वोली--निप्पाप गिरिराजकुमारी | मेरे पति
विन्दुग इस समय कहों हैं; उनकी कैंसी गति हुई है--यह
में नहीं जानती | कल्याणमयी दीनवत्सलछे | में अपने उन
पतिदेवसे जिस प्रकार संयुक्त हो सकेँ, वैसा ही उपाय
कोजिये । महेश्वरि | महादेवि | मेरे पति एक झद्रजातीय
वेश्याके प्रति आसक्त थे और पापमें ही डबे रहते थे |
उनको मृत्यु मुझसे पहले ही हो गयी थी | न जाने वे क्लिस
गतिको प्राप्त हुए )
गिरिजा बोलीं--बेटी | तुम्हारा बिन्दुग नामवाल्ा
उति बड़ा पापी था | उसका अन्तःकरण बड़ा ही दृषित था।
वैज्याका उपभोग करनेवाला वह महामूढ़ मरनेके बाद नरकमें
पड़ा | अगणित वर्षोतक नरकमें नाना प्रकारके दुःख भोगकर
6 पापात्मा अपने शेप्र पापको भोगनेके लिये विन्ध्यपबतपर
पिशाच हुआ है ) इस समय वह पिद्याच-अवस्थामें हो है और
नाना प्रकारके क्लेश उठा रहा है| वह दुष्ट वहीं वायु पीकर
(ता और सदा सब प्रकारके कष्ट सहता है ।
सूतजी कहते हँ--औनक ! गोरीदेवीकी यह बात सुन-
९ उत्तम पतका पालन करनेवाली चज्चुला उस समय पतिके
हन इःसत्े दुसी हो गयी | क्रिर मनको ख्थिर करके उस
गोद्मगपकीने व्यधित हृदयसे सहेखरीकों प्रणाम करके
एनः पूष्ठा
ध्भ्चल ७ पु कमर कै
च्य5 | याले श्र भहादेवि गतसपर कृपा
५. जुल्म बोली-महेबरे ! महादेवि | मुसपर क
पु. जद य्य पर्स रा फरने वात 2 पतिका तर
३.४५ 2३२ दृः ते पन्स करनवाल सर उस दुए पातका अः
रजत पर पकच "५६-०५ थक पा “का 4
४४४६ पर दाजिय | देखवे ! कुछित चुद्धिवाले भेरे उस
88१6, पत्ता कप तिःे क्न्क ज्थपर करी उ्त्तय ग्् पथ
8 पति 4 दर ज्यद्स उत्तम गति संत है| सकती
(९ $ प्तप कब पता. 5२९ आएपद शा नंगत्यार ल््क
| 0 हा पर । आपको नगस्कार £ |
जु
पृ ० । तीने हो अकी प्थ्ट क्न्फ #*+ (५ या 3०-83 शव /णर ८
पिताने कहा--उम्हास पति यदि शिवएरायही पृष्परपी
॥० हिट,
न
उत्तम कथा सुने तो सारी दुगतिकों पार करके वह उत्तम
गतिका भागी हो सकता है ।
अमृतके समान सधुर अक्षरोंसे युक्त गोरीदेवीका यह
वचन आदसयपूर्वक सुनकर चज्चुलने हाथ जोड़ मस्तक
झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया ओर अपने पतिके समप्त
पापोंकी झुद्धि तथा उत्तम गतिकी प्राप्तिके लिये पा्ब॑तीदेबीसे
यह प्रार्थना की कि मेरे पतिको झिवपुराण सुनानेकी
व्यवस्था होनी चाहिये |! उस ब्राह्मणपत्नीके बारंबार प्रार्थना
करनेपर शिवप्रिया गौरीदेवीको बड़ी दवा आयी। उन
भक्तवत्सलछा महेश्वरी गिरिराजकरमारीने भगवान् शिवकी उत्तम
कीतिका गान करनेवाले गन्धत्ंराज तुम्बुरुको बुलाकर उनसे
प्रसन्नतापूवंक इस प्रकार कहा--तुम्बुरो | तुम्हारी भगवान
शिवमें प्रीति है। तुम मेरे मनकी वातोंको जानकर
मेरे अभीष्ट कार्योकों सिद्ध करनेवाले हो । इसलिये में तुमसे
एक बात कहती हँ। तुम्हारा कल्याण हो | तुस मेरी इस
सखीके साथ शीघ्र ही बिन्थ्यपवेतपर जाओ। वहाँ एक
महाघोर ओर भयंकर पिशाच रहता है | उसका ब्ृत्तान्त तुम
आरम्भसे ही सुनो । में तुमसे प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ बताती
हूँ । पूरवजन्ममें वह पिशाच बिन्दुय नामक ब्राह्मण था। मेरी
इस सखी चज्चुछाका पति था । परंतु वह दुष्ट वेश्यागामी हो
गया। ल्ान-संघ्या आदि नित्यकर्म छोड़कर अपविन्न रहने
लगा । क्रोषके कारण उसकी बुद्धिपर मूढ़ता छा गयी थी--
वह कतेव्याकतंव्यका विवेक नहीं कर पाता था | अमश्यमक्षग;
सजनोंसे दवेप ओर दूषित वस्तुओंका दान लेना--यही उसका
स्वाभाविक कर्म बन गया था | बंद अम्न-दस््र लेकर हिंसा
करता; बायें हाथसे खाता; दीनोंको सताता आर क्ृरता[र्वक
पराये घरोंमे आग लगा देता था। नाण्डलोंसे प्रेम करता
ओर प्रतिदिन वेश्याके सम्पर्कमें रहता था। बड़ा डुष्ठ था।
वह पापी अपनी पद्ीका परित्याग करके दुष्ठके सद्नर्म
ही आनन्द मानता था । वह मृत्युपर्यन्त दुराचारमें ही फँसा
रहा । फिर अन्तकाल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी | वह
शिया
हा 27 श्र छः ५ + च्ी. च्३ ष्क
पापियाक सोगसान घोर बमपुरसें गया ओर बलेंबहन-से
नेखाद उप भांग कर (3जन४+-७ 35७ त्र्ट् कर का+-सज शात्मा हा प्र गया -क- ग्र् जमा
रकाका उपभाग करके बह हुष्ठात्मा जीव इस समय विन्ख्य-
पसपर ब्म्पडान दि एच प्प्छ् ह्द्या >>. चह ऋ घः आर्ट ्.
_दद्पर पद्याच बना हुआ है | वहीं बहू दुष्ट पिशाच अरने
दाएदा व भोग का क्र
पका फ्ड खाग रहा हैं। नम उसके
- इस पल्यमंदा
4 आय 4 ्क
पुययका उस दिव्य कमाका प्रदद्न करे; पे प्
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आप अ ल्ल्नि
थागे पणप्द्धदा टन
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जा]
शत 5 6#9 4७ _ शा | स्य्श्ां जिला 4. श्र दिये प्रा की ४ आ उभर. * #लंह 53
तथा समस प्ापवा नाश करनेयाली दे। शियर्राणत्री कथाया
राय,
# नमो सद्भाय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने 5:
[ संश्षित्त-शिवपुराणाद
अवण सबसे उत्कृष्ट पुण्यकर्म है। उससे उसका हृदय शीघ्र
ही समस्त पापोंसे शुद्ध हो जायगा ओर वह प्रेतयोनिका परित्याग
कर देगा | उस दुर्गतिसे मुक्त होनेपर बिल््दुग नामक पिशाचको
मैरी आज्ञासे विमानपर बिठाकर तुम भगवान शिवके ससीप
के आओ !?
खूतजी कहते हँ--शोनक | महेश्वरी उसके इस
प्रकार आदेश देनेपर गन्वराज तुम्बुरु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न
हुए | उन्होंने अपने भाग्यकी सराहना की | तत्पश्चात् उस
पिशाचकी सती-साध्ची पत्नी. चज्चुछाके साथ विमानपर बैठकर
मारदके प्रिय मित्र तुम्बुर वेगपूक विन्ध्याचल पर्बतपर गये;
जहाँ वह पिशाच रहता था। वहाँ उन्होंने उस पिशाचको देखा ।
उसका शरीर विशाल था । ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। वह कभी
हँसता; कभी रोता और कभी उछलता था | उसकी आकृति
बड़ी विकराल थी। भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान
करनेवाले महावली तुम्बुसने उस अत्यन्त भयंकर पिशाचको
पाशोंद्वार बाँध लिया | तदनन्तर तुम्बुरुने शशिवपुराणकी कथा
बॉचनेका निश्चय करके महात्सवयुक्त स्थान और मण्डप
आदिकी सवना की। इतनेमें ही सम्र्ण लोकोमें बड़े बेगसे
यह प्रचार है गया कि देवी पाबंतीकी आशासे एक पिशाचक्रा
उद्धार करनेके उद्देश्यसे शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनानेके
लिये तुम्बुरु विन्ध्यपत्नंतपर गये हैं | फिर तो उस कथाक्नो
मुननेके लोभसे बहुत-से देवषि भी शी ही वहाँ जा पहुँचे ।
भादरपृ्॑क शिवपुराण सुननेके लिये भाये हुए लोगोंका उस
ग्
दर
! री
है 24
४ शशीमाआआएणा आशा का मा > ३ 2. या चीन बीली
पव॑तपर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समाज जुट गया |
फिर तुम्बुसने उसे पिशाचको पाशोंसि वधकर आसनपर
बिंठाया और हाथमें वीणा लेकर गौरीपतिकी कथाका गा |;
आरम्भ किया । पहली अर्थात् विद्येश्वरसंहितासे लेकर सात
वायुसंहितातक महात्म्यसहित शिवपुराणकी कथाका - उन्होंने।
स्पष्ट वर्णन किया । सातों संहिताओंसहित शिवपुराणका आदर। २
पूरक भ्वण करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये । उत् $
परम पुण्यमय शिवपुराणको सुनकर उस पिशाचने अपने सारे! श्ि
पापोकी धोकर उस वैश्ञाचिक शरीरको त्याग दिया। फिर हैं| |
शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया | अड्गकान्ति गौखर्पद। दल
हो गयी | शरीरपर स्वेत वस्त्र शोभा देने छगा | सब प्रकार; ऊँ
पुरुषोचित आभूषण उसके अज्ञोंको उद्धासित करने छो। प्
वह ज्िनेत्रधारी चन्द्रशेलररूप हो गया | इस प्रकार दिल है
देहघारी होकर श्रीमान् बिन्दुग अपनी प्राणवछभा चड्चुलहे। श;
साथ खयं भी पाबंतीवक्लम सगवान् शिवका गुणगान कण मन
गा । उसकी छ्लीको इस प्रकार दिव्यरूपसे सुशोमित देश के
वे सभी देवर्षि बड़े विस्मित हुए. | उनका चित्त परमानन्द ४]
परिपूर्ण हो गया । मगवान् महेश्वरका यह अदूमुत चरित्र दा शाम
कर वे सभी श्रोत्ा परम कृतार्थ हो प्रेमपूक श्रीशिव
यशोगान करते हुए, अपने-अपने धामको चले गये | दिल
ज्पधारी श्रीमान् विन्दुग भी सुन्दर विभानपर अपनी प्रियतमा|
पास बैठकर सुखपूर्वक आकाशमें स्थित हो वड़ी शोमा पाने |
श्रीशिवपुराण-माहात््य ] # शिवपुराणके श्रंवणंकी विधिं तथा श्रोताओके द्वारा पालनीय $:
तदनन्तर मदेश्वरके सुन्दर एवं मनोहर ग़ुणोंका गान
करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा ठुम्बुरुके साथ ञीघ्र ही
शिवधामम जा पहुँचा । वहाँ. भगवान महेश्वर तथा पावेती
ल््ह््ऊह्झऊ्स््स्स्सल्स््य््स्य्य्य्य््य्स्य््य्य््स्स्य्य्स्य्य्य्स्य्य्य्य्च्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्प्य्यय्य्य्य्य्य्यय्प्प्प्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्<
3
अपना पार्षद बना लिया । उसकी पक्की चज्चुला पावतीजीकी
सखी हो गयी । उस घनीभूत ज्योतिःसख्वरूप प्रमानन्द्सय
सनातनधाममें अविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पति परम
सुखी हो गये | ह ( अध्याय ५ )
>> 5४८ ल+--
देवीने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुगका बड़ा सत्कार किया ओर उसे
५ 20
शिवपुराणके श्रवणकी विधि
शोनकजी कहते है--महाप्राज्ञ व्यासशिप्य सूतजी /
आपको नमत्कार है | आप धन्य हैं, शिवभक्तोमें श्रेष्ठ हैं ।
आपके महान गुण वर्णन करने योग्य हूँ | अब आप कल्याण-
मय सिवपुराणके अवणकी विधि ब्रतलाइये, जिससे सभी
श्रोताओंकों सम्पूर्ण उत्तम फलकी प्राप्ति हो सके ।
सतजीने कह(--मुने शोनक ! अब मैं ठुम्हें सम्पूण
फलकी प्राप्तिके लिये शिवपुराणके श्रवणकी विधि बता रहा
हूँ | पहले किसी ज्योतिषीकों बुलाकर दान-मानसे संतुष्ट करके
अपने सहयोगी लोगोंके साथ बैठकर बिना किसी विप्न-बाधाके
कथाकी समाप्ति होनेके उद्देश्यसे झुद्ध मुहृतंका अनुतंधान
कराये और प्रयक्षपृर्वक देश-देशमें--सथान-स्थानपर यह संदेश
, भेजे कि मारे यहाँ शिवपुराणकी कथा होनेवाली है| अपने
' यब्याणकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको उसे सुननेक्रे लिये अवद्य
अं
पधारना चाहिये ।! कुछ लोग भगवान श्रीहरकी कथासे बहुत
: दूर पढ़ गये हूँ | कितने ही स्त्री, झूद्ध आदि भगवान् शंकरके
कथा-कीतनसे वश्चित रूते हैँ | उन सबको भी सूचना हो
गाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये । देश-देशमें जो भगवान
शवके भक्त हों तथा झिव-कथाके कीतन और अ्रवणके
लेये उत्सुक हों; उन सबको आदसपूर्वक बुल्वाना
वाहिये और आये हुए छोगोंका सब्र प्रकारसे आदर-सत्कार
सना चाहिये। शिवमन्दिरमें, तीर्थमें, बनप्रान्तमें अथवा घरमें
'शवपुराणकी कथा सुननेके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करना
5७ | फेलेफे खम्मोंसे सुशोभित एक ऊुँना कथामण्डप
प्यार कराये | उसे सब ओर फल-पुप्प आदिसे तथा सुन्दर
भंदोवेसे अलंइत्त करे और चारों ओर ध्यजञा-पताका लगाकर
सुखद हो सके । मुने ! नियमपूर्वक
/» है ॥| गगरेदा बे ं+त+ ुप ०० कई ल्िरि हि ग्थानोंद्ी ५
7 ग सुननगदे पोठाओफके लिये भी बशायोग्य सुन्दर स्थानों
भरता पल हो हि ् कह किक कड
मो] दिये | अन्य लोगोंफे छिये साधारण स्थान
४६5५३ ।>3| क+३* रच पड द
| जन आाएयि | किसे मब्यसे सिदल्शी हुई वी
, बा ७, $ न
> गरियद लि फप्रत:
शार। कान का ् फ़्णज
का $ उामभदुक समान घउनीए कह देनेवारी
भर ५ हर
| न 'अन््कयूती- ञ री चर न हा कर
। 9.4 छ, का ह+ कच्छ-/+ लकी जै+७' सा» ए्जारः नकीक शर्ते आपका 5
८ जि जिफत पान पार अते नुच्ठ जद्ध
तथा श्रोताओंके पालन करनेयोग्य नियरमोंका वर्णन
कभी नहीं करनी चाहिये | संसारमें जन्म तथा गुर्णकि कारण
बहुत-से गुरु होते हैं | परंतु उन सब पुराणीका जाता
विद्वान ही परम गुरु माना गया है। पुराणवेत्ता पवित्र, दक्ष)
शान्त) ईर्प्यापर विजय पानेवाला) साक््षु ओर दयाढ होना
चाहिये'। ऐसा प्रवच्चननकुशरू विद्वान् इस पुण्यम्री कथाको
कहे | सूर्यादयसे आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक उत्तस
बुद्धिवाले विद्वान पुरुषको शिवपुराणकी कथा सम्यक् रीतिसे
बॉँचनी चाहिये | मध्याहकालमें दो घड़ीतक कथा बंद रखनी
चाहिये; जिससे कथा-कीतनसे अबकाद पाकर लोग मरू-मृत्रका
त्याग कर सके | द
कथा-प्रारम्मके दिनसे एक दिन पहले व्रत अहण करनेके
लिये वक्ताको क्षोर करा लेना चाहिये। जिन दिनों कथा हो
रही हो; उन दिनों प्रयनपू्वक प्रातःकालका सारा नित्य-कर्म
संक्षेप ही कर लेना चाहिये | वक्ताके पास उसकी सहायताके
लिये एक दूसरा वैसा ही विद्वान स्थापित करना चाहिये | वह
भी सब प्रकारके संशयोंको निद्वत्त करनेमें समर्थ और लोगोंको
समझानेमं कुशल हो । कथामे आनेवाले विश्नोंकी निशृवत्तिके
लिये गणेशजीका पूजन करे | कथाके स्वामी भगवान शिवकी
तथा विशेषतंः शिवपुराणकी पुस्तककी भक्तिभावसे पूजा करे।
तत्पश्नात् उत्तम चुद्धिवाला श्रोता तन-मनसे झुद्ध एवं प्रसन्न-
चित्त हो आदर्पूवेक शिवपुराणकी कथा सुने । जो वक्ता और
श्रोता अनेक प्रकारके कर्मोमें भव्क रहे हों, काम आदि छ:
असर अमन पे-नतसन समन,
पर योलनन»»... 5 अनमा . आ+ -मननारन. आन .-+नआक/-पन4 कम -++-“-3 मत
विकारोंसे युक्त हों; ल्रीमें आसक्ति रखते हाँ और पाखण्डपूर्ण
बातें कहते हों। वे पुष्बके भागी नहीं होते । जो ल्ौकिक चिन्ता
तथा धन; रट्ट एवं पृत्र आदिकी चिन्ताको छोड़कर कथामें
प्राप्ति होती दे । जो श्रोता श्रद्धा ओर भक्तिसे युक्त होने ह+
क्रम ० चीप नहीं लगाते 8०. और ० मन “5 छ्यं
दूसरे कर्मोमें मन नहीं लगाते और मीन) पत्रित्र एवं उद्धेग-
धन्य होते कक 2000 पट भागी टोले ष्ड
ट्र तेह्यच ट्टी प्रण्यक भागा द्वात ६€ |
खसनजी बोहे सौनद दैक £३626 परोण मनने ५& अल दा
[तजी बोले--शौनक ! अब शिवपुराण मुननेका व्रः
लेेबाल कल फ्.ु एछम्य! ् हा सर निवभ कि >>: 25५ प्य लक वसा श्र,
प्लेबाले पुरुषाऊे छिये जो नियम हैं; उन्हें भक्तिपवक सुनो ।
नंगा नि पं श्र हे हनन पर िटज के >नलसन तक दा हि
जवर््वक बस लड़ कथाका दुननंस दिना दि
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“5 ]*< [| 5५
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उत्तम फडदी प्राप्ति होती है | जो
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श्पँ टाः ४३9.4 रन टनका
(० है। #* है हनन 47५ ४॥7, ६ हर है वा का ५ क
| गए कक कक
४5 80% ॥ 0. जन द्टा आफ *. नह कि. कि अर आ #<
कीग-अदणमने अधिकार नहीं है । अतः नने ' ऋधा सुननेडी
क्र कि... ७ कर.
शच्छाबाल सब लोगोकोीं पहुें बच्चले हीरा ग्रहण यगनी
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने
| सक्षिप्त-शिचपुराणाए
अमल का» फरभ+ पुन ३ पक नाक +"ाह॒ पक ममाआ ऊन पु पा". कमा नकनन पर न दाम “मना मम 3 पराम५नप न पा नम ३-4० ना दमन धन पा दमभा० >> कप. परम स्ुन "कामना" सनम पी" "पड #०+ कान बाइक -+ हा करी #न-- कम. मत इन रकम नर ० ४4०० पाना पान का “नम पहरी- पारी ए॥"नर +ाकमफक न कम भा इमाम +- ५४ ना थम “मा ५ शपक-% फर्क के कप -+मी पुनप ७७ रन पामन वाद कक ्न्कन पान तक ० मना
चाहिये । जो लोग नियमसे कथा सुने) उनको ब्रह्मनयेसे रहना॥
भूमिपर सोना) पत्तलमें खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त
होनेपर ही अन्न ग्रहण करना चाहिये | जिसमें शक्ति हो; वह
पुराणकी समास्ितक उपवास करके झुद्धतापूवंक भक्तिभावसे
उत्तम शिवपुराणकों सुने | इस कथाका न्नत लेनेबाले पुरुषको
प्रतिदिन एक ही बार हृविष्यान्न भोजन करना चाहिये । जिस
प्रकारसे कथा-अश्रवणका नियम सुखपू्वक संघ सके, वेसे ही
करना चाहिये | गरिष्ठ अज्) दाल जला अन्न) सेम) मसूर,
भावदूषित तथा बासी अन्नको खाकर कथा-ब्ती पुरुष कभी
कथाको न सुने । जिसने कथाका व्रत ले रक़्खा हो, वह पुरुष
प्याज, लहसुन; हींग, गाजर मादक वस्तु तथा आमिषर कही
जानेवाली वस्तुओंको त्याग दे | कथाका ब्रत लेनेवाला पुरुष
काम; क्रोध आदि छः विकारोको; ब्राह्मणोकी निन्दाकों तथा
पतित्रता ओर साधु-संतोकी निन््दाको भी त्याग दे । कथान्नती
पुरुष प्रतिदिन सत्य+ शौच) दया) मौन; सरलता; विनय तथा
हार्दिक उदारता--इन सद्मु्णेकी सदा अपनाये रहे । श्रोता
निष्काम हो या सकाम) बह नियमपूर्वक कथा सुने । सकाम
पुरुष अपनी अभीष्ट कामनाको प्राप्त करता है और निष्काम
पुरुष मोक्ष पा लेता है । दरिद्र, क्षयका रोगी; पापी, भाग्यहीन
तथा संतानरहित पुरुष मी इस उत्तम कथाको सुने | काक-
वन्ध्या आदि जो सात प्रकारकी दुश ज्रियाँ हैं, वे तथा जिसका
गर्भ गिर जाता हो; वह---इन सभीको शिवपुराणकी उत्तम कथा
सुननी चाहिये । मुने ! स्त्री हो या पुरुष--सबको यल्षपूव॑क
विधि- विधानसे शिवपुराणकी यह उत्तम कथा सुननी चाहिये |
महर्ष | इस तरह शिवपुराणकी कथाके पाठ एवं श्रवण-
सम्बन्धी यज्नोत्तवकी समात्ति होनेपर श्रोतार्योकों भक्ति एवं
प्रयत्मपूवंक भगवान् शिवकी पूजाकी माँति पुराण-पुस्तककी भी
पूजा करनी चाहिये | तदनन्तर विधिपूर्वक वक्ताका भी पूजन
करना आवद्यक है। पुस्तककी आच्छादित करनेके लिये नवीन
एवं सुन्दर बस्ता बनावे और उसे बाँधनेके लिये दृढ़ एवं दिव्य
डोरी लगावे | फिर उसका विधिवत् पूजन करे। मुनिश्रेष्ठ !
इस प्रकार महान् उत्सवके साथ पुस्तक और वक्ताकी
विधिवत् पूजा करके वक्ताकी सहायताके लिये ख्ापित हुए
. पण्डितका भी उसीके अनुसार घन आदिके द्वारा उससे कुछ
ही कम सत्कार करे | वहाँ आये हुए ब्राह्मणोकी अन्न-धन आदिका
दान करे | साथ ही गीत) वाद्य और नृत्य आदिके द्वारा
महान उत्सव रचाये | मुने ! यदि श्रोता विरक्त हो तो उसके
लिये ऋथासम प्तिके ठिनि विशेषजख्पसे उस गीताका पाठ करना
चाहिये, जिसे श्रीगमचन्द्रजीके प्रति भगवान् शिवने कहा था |
आओ का ०-2 2 अंश न
श््ते जन्मभाज:
वाणी शुणान् स्तीति कयां श्रणोति ओच्रद्नय॑
क्या सुनना चाहते हो ! श्रीमान् शिवपुराण समस्त पुरा
शान्तिके लिये शुद्ध दहृविष्यके द्वारा होम करना चाहिये | मुने |
रद्रसंदिताके प्रत्येक छोकद्वारा होम करना उचित है अप्वा
गायत्री-मन्त्रसे होम करना चादिये। क्योंकि वासवर्म के
पुराण गायत्रीमय ही है । अथवा शिवपश्चाक्षर मूल्मन्त्रते हम
करना डचित है | होम करनेकी शक्ति न हो तो विद्वार
पुरुष यथाश्षक्ति हवनीय हतिप्यका ब्राह्मणको दान करे |
न्यूनातिसिक्तितारूप दोपकी श्ान्तिके लिये भक्तिपूर्षक शिवसह्
नामका पाठ अथवा श्रवण करे | इससे सब कुछ सफर
होता हैं; इसमें संशय नहीं है। क्योंकि तीनों लोकम
उससे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है | कथाश्रवणसमर्
ब्रतकी पूर्णताकी सिद्धिके लिये ग्यारह ब्राह्मणोंकों मधुमिश्रित
खीर भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे | मुने ! यदि भरदि'
हो तो तीन तोले सोनेका एक सुन्दर सिंहासन बनवा
ओर उसपर उत्तम अक्षरोमें लिखी अथवा लिखाबी हू
शिवपुराणकी पोथी विधिपूर्वक स्थापित करे । तत्पश्रा॥
पुरुष उसकी आवाहइन आदि विविध उपचारोंसे पूजा करे|
दक्षिणा चढ़ाये। फिर जितेन्द्रिय आचायका . वद्ष/
आभूषण एवं गन््व आदिसे पूजन करके दक्षिणासहित क|
पुस्तक उन्हें समर्पित कर दे | उत्तम बुद्धिवाला श्रोता इसे
प्रकार भगवान् शिवके संतोषके लिये पुस्तकका दान को॥|
शौनक | इस पुराणके उस दानके प्रमावसे सगवान शिवा
अनुग्रह पाकर पुरुष भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है | इस हक '
विधि-विधानका पालन करनेपर श्रीसम्पन्न शिवपुराण सम
फलको देनेवाला तथा भोग और मोक्षका दाता होता है। (६
मुने | शिवपुराणका यह सारण माहात्म्य;, जो सभ॥ ६
अभीष्टकी देनेवाल्य है, मैंने तुम्हें कह सुनाया | अब ओ; हे
भालका तिलक माना गया है| यह भगवान शिवको अलग
प्रिय, स्मणीय तथा भवरोगका निवारण करनेवाला है|?
सदा भगवान् शिवका ध्यान करते हैं; जिनकी वाणी शी
गुणाकी स्तुति करती है और जिनके दोनों कान उनकी क॥ भें!
सुनते हैं; इस जीव-जगतूमें उन्हींका जन्म लेना सफल) पिएं
वे निश्चय ही संसारसागरसे पार हो जाते हैं ।# मिन्न-मित्र प्रणा| जडट
समस्त गुण जिनके सचिदानन्दमय खरूपका कमी स्पर्श व के
करते; जो अपनी भमहिमासे जगतके बाहर और मे
भाससान हैं तथा जो मनके बाहर और भीतर वाणी हे
मनोद्चत्तिरूपमें प्रकाशित होते हैं, उन अनन्त आनन्द १ |
परम शिवकी में शरण लेता हूँ । ( अध्याय $॥ है क
कू++-- शोर
खल जीवलोके ये वै सदा ध्यायन्ति विश्वनाथम । | पक
ते भवमुत्तरन्ति ॥ |
आपुराणपुरुषोत्तमाय नमः
श्रीगणेशाय नमः
श्रीशिवमहापुराण
विद्येबरसंहिता द ।
प्रयागमं खतजीसे मुनियोका तुरंत पापनाश करनेवाले साधनके विपयममे प्रश्न
आशन्तमह्नलमजातसमानभाव-
सार्य तसमीशमजरामसरमाव्सदेवस् ।
पतद्चाननं॑ प्रवलूपञ्चविनोदशीलं
सम्भावये सनसि इंकरमसम्बिकेशम् ॥
जो आदि और अन्तमें ( तथा मध्यमें भी ) नित्य
मइल्मय हैं, जिनकी समानता अथवा तुलना कहीं भी
: नहीं है, जो आत्माक्रे ख़रूपको प्रकाशित करनेवाले देवता
( परमात्मा ) हैं, जिनके पाँच मुख हैं; भोर जो खेल-ही
खेलमें--अनायास जगत्की स्चना; पालन ओर संहार तथा
उनग्रद एवं तिरोभावरूप पॉच प्रबल कर्म करते रहते हैं; उन
बिशे"्ट अजर-अमर ईश्वर अम्बिकापति भगवान् शंकरका
$ मन-ही-मन चिन्तन करता हूँ।
व्यासजी कहते हैँ--जो धर्मका महान् क्षेत्र है ओर
नह गड्ना-यमुवाका संगस हुआ है। उस परम पुण्यमय
पयागमे, जो ब्रद्यलोकका मार्ग है; सत्य्रतम तत्पर रहनेवाले
पद्ातेजली महामाग महात्मा मुनिर्योने एक विशाल
शानयशका आयोजन क्रिया | उस शानयज्ञका समाचार सुनकर
पोराणिकशिरोमणि व्यासशिप्य महामुनि सूतजी वहाँ सुनियोंका
दर्शन बरनेके लिये आये । सूतजीको आते देख चे
सब गति उस समय हपसे खिल उठे ओर अत्वन्त प्रसन्न
जित्तस उन्हेंने उनका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया |
पश्चात् उन प्रसन्न महात्माओने उनकी विधिव्रत् स्तुति
पर५फ दिनयतक हाथ जोड़कर उनसे इस प्रह्मर कदहा--
'सद्त विद्वान रामहपणजी | आपका भाग्य बड़ा भारी
,॥ एकल छापने य्यासतीईी मलतसे अपनी प्रसतताऊे डिये
५5 रग्ग५घ पृरागर्रेणा णाह् दी । इसलिये आप आधयम्वरूप
तप
२ 350९ (-550% उर्। हल लत रण्गंरर
श्र *९ 4५ क्त व म्पा >> ये कक कान 3 आकर जा आया कत्च्च्कू तीन नउण्मक, चबन्नेतानी-ऊ>नका-नी
ँ्मुट्ट गेह यहे शारभूत रगोग झागार है। तीनों लोफोर्मे
भूत; वर्तमान और भविष्य तथा और मी जो कोई वस्तु है)
बह आपसे अशात नहीं है। आप हमारे सौभाग्यसे इस
यज्ञका दर्शन करनेके लिये यहाँ पधार गये हैं ओर इसी
व्याजसे हमारा कुछ कल्याण करनेवाले हैं; क्योंकि आपका
आगमन निरथक नहीं हो सकता | हमने पहले भी आपसे
शुभाशुभ तत्त्वका पूरा-पूरा वर्णन सुना है; किंतु उससे वृतति
नहीं होती; हमें उसे सुननेकी वारंवार इच्छा होती है ।
उत्तम बुद्धिवाले सूतनी | इस समय हमें एक ही वात
सुननी है। यदि आपका अनुग्रह हो तो गोपनीय द्वोनेपर भी
आप उस विष्रयक्रा वर्णन करें। घोर कलियुग आनेपर मनुष्य
पुण्यकर्मसे दूर रहेंगे, दुराचारमें फँस जायेंगे ओर सब-के-सब
सत्यभाषणसे मुँह फेर लेंगे; दूसरोंकी निन््दामें तत्पर होंगे।
पराये घनकोी हड़प लेनेकी इच्छा करेंगे । उनका मन
परायी स्रियोमें आसक्त होगा तथा वे दूसरे प्राणियोंकी हिंसा
किया करेंगे । अपने शरीरको ही आत्मा समझेंगे | मूढ़
नास्तिक ओर पश्च॒नुद्धि रखनेवाले होंगे; माता-पितासे द्वेप
खखंगे। ब्राह्मम लोमरूपी ग्रहके आस बन जायेंगे । वेद
बेचकर जीविका चडायेंगे | धनका उपाजन करनेके लिये
ही विद्याका अभ्यास करेंगे ओर मदसे मोदित रहेंगे । अपनी
जातिके कमे छोड़ देगे। प्रायः दसरोकी ठगेंगे। तीनों
कालकी संध्योपासनासे दूर रहेंगे और ब्रह्मशानसे श्न्य देंगे |
समस्त क्षत्रिय भी खधर्मका त्याग करनेबाले होंगे। ऋसंगी,
णी ओर व्यमिचारी होंगे उनमें झोका अभाव होगा |
वे कुलित चोय-कर्मले जीविका चलायेंगे। शद्रोक्ा-सा बर्ताव
करेगे और
देश्य संस्कार-श्रए; खबरंतागी। ऋुमार्गी;
परायग तथा नाउलोहम आरती ऋत्सित
देनेबादे हूंगे। इसो तरह झद शाहरपोफ आचारमे तर होंगे
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छोड़कर उज्ज्वल वेश-भूषासे विभूषित हो व्यर्थ घूमेंगे।
वे खभावतः ही अपने घमेका त्याग करनेवाले होंगे |
उनके विचार धर्मके प्रतिकूल होंगे | वे कुटिल ओर द्विज-
निन्दक होंगे | यदि धनी हुए. तो कुकर्ममें लग जायेंगे ।
विद्वान हुए. तो वाद-विवाद करनेवाले होंगे | अपनेको
कुछीन मानकर चारों वर्णोके साथ वेवाहिक सम्बन्ध स्थापित
करंगे; समस्त वर्णोको अपने सम्पर्कसे भ्रष्ट करेगे | वे लोग
अपनी अधिकार-सीमासे बाहर जाकर द्विजोचित सत्कंमका
अनुष्ठान करनेवाले होंगे | कलियुगकी स्रियाँ प्रायः सदाचारसे
श्रष्ट ओर पतिका अपमान करनेवाली होंगी। सास-ससुरसे
ट्रोह करेंगी | किसीसे भय नहीं मानेंगी । मलिन भोजन
करेंगी | कुत्सित हाव-भावमें तत्पर होंगी । उनका शील-
*“ “““53--4*-->_६.-०+----
शिवपुराणका परिचय
सूतजी कहते है--साधु-महात्माओ ! आपने बहुत
अच्छी बात पूछी है | आपका यह प्रश्न तीनों छोकोंका हित
करनेवाला है। मैं गुरुदेव व्यासका स्मरण करके आपलोगोंके
स््नेहव इस विषयका वर्णन करूँगा । आप आदरपूर्वक
सुनें । सबसे उत्तम जो शिवपुराण है; वह वेदान्तका सार-
सर्वख है तथा वक्ता और श्रोताका समस्त पापराशियोंसे
उद्धार करनेवाल् है | इतना ही नहीं) वह परलोकरमम परमार्थ
वस्त॒को देनेवाला है; कलिकी कल्मघराशिका विनाश करनेवाला
है| उसमें भगवान् शिवके उत्तम यशका वर्णन है। ब्राह्मणों !
घर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष--इन चारों पुरुषार्थोको देनेवाला
वह पुराण सदा ही अपने प्रभावकी दृश्सि ब्ृद्धि या विस्तारको
प्राप्त हो रहा है। विप्रवरो | उस सर्वोत्तम शिवपुराणके
अध्ययनमात्रसे वे कलियुगके पापासक्त जीव श्रेष्ठतम गतिको
प्राप्त हो जायेंगे । कलियुगके महान् उत्पात तभीतक जगतमें
निर्भय होकर विचरेंगे, जबतक यहाँ शिवपुराणका उदय नहीं होगा।
इसे वेदके तुल्य माना गया है। इस वेदकल्प पुराणका सबसे
पहले भगवान् शिवने ही प्रणयन किया था। विद्येश्वरसंहिता,
रुद्रसंहिता, विनायकरसंद्विता, उमास्ृहिता, मातृसंहिता, एकादश-
रुद्रसंहिता। केल्यससंहिता, शतरुद्रसंहिता, कोटिरुद्रसंहिता,
सहस्लकोटिरुद्रसंहिता, वायवीयर्ंहिता तथा धर्मसंहिता--इस
प्रकार इस पुराणके बारह भेद या खण्ड हैं। ये बारह संहिताएँ
अत्यन्त पुण्यमयी मानी गयी हैं। ब्राह्मणो | अब मैं उनके
छोकोकी संख्या बता रहा हूँ। आपलोग बह सब आददर-
पू्॒रक सुनें | तिद्येश्वर्संहित मे दस हजार 'छोक ह | रुद्रसं हिता न्
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन #
[ संक्षिप्त शिवपुराणाहु
खमाव बहुत बुरा होगा ओर वे अपने पतिकी सेवासे सदा
ही विमुस्त रहेंगी | सूतजी ! इस तरह जिनकी बुद्धि नष्ट हे
गयी है। जिन्होंने अपने धर्मका त्याग कर दिया क ऐसे
लोगोंकोी इहलोक ओर परलोकर्म उत्तम गति केसे प्राप्त होगी--
इसी चिन्तासे हमारा मन सदा व्याकुल रहता है। पंरोपकारे
समान दूसरा कोई घर्म नहीं है । अतः जिस छोटेसे उपाके |
इन सबके पापोंका तत्काल नाग हो जाय; उसे इस समर |
कृपापूवक बताइये; क्योंकि आप समस्त सिद्धान्तेकि ज्ञाता हैं।
व्यासजी कहते हें--उन भवितात्मा मुनियोकी यह
बात सुनकर सूतजी मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मण
करके उनसे इस. प्रकार बोढे--- ( अध्याय १) |
|
।
विनायकरसंहिता; उमसंहिता और मातृसंहिता--इनमेंसे प्रत्येक
आठ-भाठ हजार छोक हैं। ब्राह्मणो | एकादशरुद्रसंहिताओं
तेरह हजार; केलाससंहितामें छः हजार; शतरुद्रसंहितामें तीन ।
हजार, कोटिरुद्रसंहितामं नो हजार; सहख्रकोटिरुद्रसंहितां
ग्यारह हजार: वायवीयसंहितामें चार हजार तथा घममसंहितामें
बारह हजार छोक हैं। इस प्रकार मुल शिवपुराणकी छोकसंख्या
एक. लाख- है । परंतु व्यासजीने उसे चोबीस हजार * पुर से चोब्रीस हजार 'होकोई
संक्षित कर दिया. है । पुराणोंकी क्रमसंख्याके विचारसे इत
शिवपुराणका स्थान चोथा है | इसमें सात संहिताएँ हैं]... |'
पूृ्िथंकालम भगवान् शिवने >छोकसंख्याक्री दृष्टिसे सो |
करोड़ छोकोंका एक ही पुराणग्रन्थ ग्रथित किया था | शक
आदिमें निर्मित छुआ, ५«< पुराण-साहित्य अत्यन्त विस्तृत
था । फिर द्वापर आदि युगोंमें दृपायन ( व्यास ) आदि। '
सहियोंने जब पुराणका अठारह भागोंमें विभाजन कर दिय!
उस संमय सम्पूर्ण पुराणोंका संक्षिप्त खरूप केबछ चार लाव॥ ॥़
छोकोंका रह गया | उस समय उन्होंने शिवपुराणका चौबीग
हजार >छोकोंम प्रतिपादन किया | यही इसके शछोकोंकी संख् पे
है | यह वेदतुल्य पुराण सात संहिताओंमें बैठा हुआ है।
इसकी पहली संहिताका नाम विद्येश्वस्संहिता है; दूसरी ख
संहिता समझनी चाहिये, तीसरीका नाम शतसुद्र॒॑हित ग
चौथीका कोटिरुद्रंहिता, पॉचवबींका उमासंहिता; छठी
कलाससंहिता और सातवींका नाम वायवीयसंहिता है। #॥ मे
प्रकार ये सात संहिताएँ मानी गयी हैं । इन सात संहितार्भो॥ मर
युक्त दिव्य शिवपुराण वेदके तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उरी,
8.
विश्ेश्वरसंहिता | # साध्य-साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीतेन ओर मननकी श्रेष्ठता £ ९,
ल्स्ल्ल्््ल्स्ल्स््ल्स्स्स्य्स्य्य्य्स्य्य्स्स्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्श्य्य्य्य्य्य्य्स्य्स्स्स्स्स्स्स्स्स्ः
रिए
गति प्रदान करनेवाल्ा है। यह निर्मेल शिवपुराण भगवान
झियके द्वारा ही प्रतिपादित है। इसे शेवश्षिरोमणि मगवान् व्यासने
संक्षेपले संकलित किया है। यह समस्त जीवसमुदायके लिये
उपकारक) विविध तापोंका नाश करनेवाला। तुलनारहित
एवं सत्पुरुषोंकों कल्याण प्रदान करनेवाला है | इसमें वेदान्त-
विज्ञाममय) प्रधान तथा निप्कपट ( निष्काम ) धमका
प्रतिपादन किया गया हैं | यह पुराण ईप्यरिहित अन्तःकरण-
वाले विद्वानोंके लिये जाननेकी वस्तु है। इसमे ओरे४्ठ सन्त्र-
समूहोंका संकलन है तथा धम; अथे ओर कराम-इस त्रिवर्गकी
ग्राप्तेकि साधनका मी वर्णन है | यह उत्तम शिवपुराण समस्त
पुराणोंमें श्रेष्ठ है| वेद-वेदान्तमें वेद्यरूपसे विछसित परम
वस्तु--परमात्माका इसमें गान किया गया है। जो बड़े आदरसे
इसे पढ़ता ओर सुनता है; वह भगवान् शिवका प्रिय होकर
परम गतिको प्राप्त कर लेता है | ( अध्याय २ )
साध्य-साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीतेन ओर मनन--इन तीन
साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
व्यासजी कहते हैं--सृतजीका यह वचन सुनकर वे
सब महर्षि बोले--'अब आप हमें वेदान्तसार-स्वेस्वरूप
अद्भुत शिवपुराणकी कथा सुनांइये |!
१
; सतजीने कहा--आप सब महपिंगण रोग-शोकसे
“द्वित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण करके पुराणप्रवर
शबपुराणकी ) जो वेदके सार-तक्तसे प्रकट हुआ है, कथा
निये | शिवपुराणमें भक्ति, शान और वैराग्य--इन तीनोंका
तिपूवंक गान किया गया है ओर वेदान्तवेद्य सद्ृस्तुका
पशेपकुपसे वर्णन हैं| इस वर्तमान कल्पमें जब सश्किम
पारम्भ हुआ था। उन दिनों छः कुलेंके महर्षि परस्पर बाद-
वेबाद करते हुए. कहने लगे--'अमुक्त वस्तु सबसे उत्कृष्ट
! और अमुक नहीं है |! उनके इस विवादने अत्यन्त मद्दान
नए धारण कर लिया । तब वे सब-के-सब अपनी श्र
पमाघानके लिये सश्किता अविनाशी ब्रह्मजीके पास गये
ओर एम जोड़कर विनयमरी वाणीमें बोले--म्प्रभो | आप
पूर्ण जगवकी धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके
भी कारण हैँ | एम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्त्वोसि
परे परात्यर पुराग पुरुष कौन है ९!
34.4.
प्रह्माजीने फहा--जहाँसे मनसद्दित वाणी उन्हें न पाकर
लेट आती है तथा मिनसे अ्रद्या) विष्णु) रद्र और इन्द्र आदिसे
पुरा यह सथूर् जगत् समस नूतों एवं इ॒क्द्रियोंके साथ पट्ले प्रकट
एश ९ मे ही ये देय; महादेव सर्वक्ष एवं सम्पूर्ण जगत
8 ९ ये ही सबसे उल्छाए एं। भतिसे ही इनका साक्षात्तथार
दे टत हू के डर थे के रः
(पा |8॥ दूसर किखे उपयसे कहीं इनहछा दर्शन नहीं होता
रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्तिभावसे
उनका दर्शन करना चाहते हैं। भगवान् शिवमें भक्ति होनेसे
मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । देवताके कृपाप्रसादसे
उनमें भक्ति होती है और भक्तिसे देवताका क्ृपाग्रसाद प्राप्त
होता है--ठीक उसी तरह, जैसे यहाँ अल्लुस्स बीज और
वीजसे अर पेंदा होता है | इसलिये ठुम सब तह्ार्पि भगवान
शंकरका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिये भूतलपर जाकर वहाँ
सहसों वर्षोतक चादू रहनेवाले एक विशाल यज्ञका आयोजन
करो | इन यज्ञपति भगवान शिवकी ही क्ृपासे वेदोक्त विद्याके
सारभूत साध्य-साधनका ज्ञान होता है ।
शिवपदकी प्राप्ति ही साथ्य है | उनकी सेवा ही साथन
है तथा उनके प्रसादसे जो नित्य नेमित्तिक आदि फर्लोकी
ओरसे निःध्यृष्ट होता है; वही साधक है। वेदोक्त कर्मका
अनुष्ठान करके उसके महान् फलको भगवान् दिवक्रे चरणंमिं
समर्पित कर देना ही परमेश्वरपदकी प्राप्ति हे | वही साल्गेक्य
आदिके ऋमसे प्राप्त होनेवाली मुक्ति है। उन-उन पुरुषोंकी
भक्तिके अनुसार उन सबको उत्कृष्ट फलकी प्रामि होती है ।
उस भक्तिके साधन अनेक प्रकारके हैं, तिनका साक्षात्
महेश्वरने ही प्रतिपादन किया है। उनमेंस सारबृत साधनवो)
203..--89,4...-3380/न की... बनमरनन्न्वेनन न्यवटीफाजी 2०
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३० ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने *
तात्पये यह कि महदेश्वरका श्रवण, कीतेन और मनन करना
चाहिये--यह श्रुतिका वाक्य हम सबके लिये प्रमाणभूत हे ।
इसी साधनसे सम्यूणे मनोरथोंक्री सिद्धिमें लगे हुए. आपलोग
परम साध्यको प्राप्त हों | छोग प्रत्यक्ष वस्तुकी आँखसे देखकर
उसमें प्रवृत्त होते हैं। परंतु जिस वस्तुका कहीं भी प्रत्यक्ष
दशन नहीं होता; उसे श्रवणेन्द्रियद्धार जान-सुनकर मनुप्य
उसकी प्राप्तिके लिये चेश् करता है। अतः पहला साधन
श्रवण ही है। उसके द्वारा गुरुके मुखसे तत्वको सुनकर
श्रेष्ठ बुद्धिवाला विद्वान् पुरुष अन्य साधन-कीतेन एवं मननकी
सिद्धि करे। क्रमशः सननपरयनत इस साधनकी अच्छी तरह
साधना कर लेनेपर उसके द्वारा सालोक्य आदिके क्रमसे धीरे-
धीरे भगवान् शिवका संयोग प्राप्त होता है | पहले सारे
अज्ञोंके रोग नष्ट हो जाते हैं। फिर सब प्रकारका छोकिक
आनन्द भी विलीन हो जाता है ।
भगंवान शंकरकी पूजा, उनके नामोंके जप तथा उनके
गुण, रूप। विलास ओर नामोंका युक्तिपरायण चित्तके
द्वारा जो निरन्तर परिशोघन या चिन्तन होता है; उसीको
मनन कहा गया है; वह महेश्वरक्ी कृपाइश्सि उपलब्ध होता
है। उसे समस्त श्रेष्ठ साधनोंमें प्रधान या प्रमुख कहा
गया है ।
खुतजी कहते हैं--पुनीश्वरो | इस साधनका माहात्म्य
बतानेके प्रसज्ञमें में आपलोगोंके लिये एक प्राचीन वृत्तान्तका
वर्णन॑ करूँगा; उसे ध्यान देकर आप सुनें | पहलेकी बात है;
पराशर मुनिक्के पुत्र मेरे गुरु व्यासदेवजी सरखती नदीके
सुन्दर तट्पर तपस्या कर रहे थे। एक दिन सूयतुल्य
तेजस्वी विमानसे यात्रा करते हुए भगवान् सनत्कुमार
अकस्मात् वहाँ जा पहुँचे । उन्होंने मेरे गुरुको वहाँ देखा।
वे ध्यानमें सप्न. थे । उससे जगनेपर उन्होंने - ब्रह्मपुत्र
सनत्कुमारजीको अपने सामने उपस्थित देखा ) देखकर
वे बड़े वेंगेले उठे ओर उनके चरणोममें प्रणाम करके मुनिने उन्हें
अध्य॑ दिया ओर देवताओंके बैठने योग्य आसन भी
अपित किया । तब प्रसन्न हुए भगवान् सनत्कुमार
विनीतभात्रसे खड़े हुए व्यासजीसे गम्भीर वाणीमें वोले--
हा: 24 ८--->>
[ संक्षिप्-शिवपुराणा]
अर ८-बाल-जुरंाकृर-जपन्घली" ननक.
आधा फनी गरम दरी- करी एलन उतरा. सा (.सस नयरमी।ाइी पड ही परी
8 २७:22 028
शाम के नल है! (रत, हा
|, + ् | लि
्। सर्द का
2 23३०९ 8/97( ८
धमुने |! तुम सत्य वस्तुका चिन्तन करो । वह सल्य
पदार्थ भगवान् शिव ही हैं, जो तुम्हारे साक्षात्कारके विषय
होंगे। भगवान् शंकरका श्रवण, कीतन। मनन--े तीन
महत्तर साधन कहे गये हैं | ये तीनों ही वेदसम्मत हैं|
ः पूर्बेकाल्में मैं दूसरे-दूसरे साधनोंके सम्भ्रममें पढ़कर घूमता
घामता मन्दराचछूपर जा पहुँचा ओर वहाँ. तपल
करने लगा | तदनन्तर महेश्वर शिवकी आशासे भगवार
नन्दिकेश्वर वहाँ आये | उनकी मुझपर बड़ी दया थी |7.
सबके साक्षी तथा शिवगणोंके स्वामी भगवान् नन्दिकेश[
मुझे स्नेहपूवक समुक्तिका उत्तम साधन बताते हुए बोले-
भगवान् शंकरका श्रवण: कीतेन और मनन--ये ही
साधन वेद्सम्मत हैं और मुक्तिके साक्षात् कारण हैं।
बात खय॑ भगवान् शिवने मुझसे कही है | अतः ब्रह्मत्
तुम श्रवणादि तीनों साधनोंका ही अनुष्ठान करो ।? व्यासजी॥)
बारंबार ऐसा कहकर अनुगामियोंसहित ब्रह्मपुत्र सनत्कुर्मा; ६
परम सुन्दर ब्रह्मधामको चले गये | इस प्रकार पूर्वकाल।
इस उत्तम बृत्तान्तका मैंने संक्षेपले वर्णन किया है।
ऋषि वोले--सूतजी ! श्रवणादि तीन साधनेंको आए रे
मुक्तिका उपाय बताया है। किंतु जो श्रवण आदि े
साधनोंमें असमर्थ हो; वह मनुष्य किस उपायका अवलग|
करके मुक्त हो सकता है ! किस साधनभूत कर्मके द्वारा *
यक्ञके ही मोक्ष मिल सकता है ! ( अध्याय ३!
विद्येश्वरसंदिता ]# भगवान शिवंके छिक्न एवं साकार विश्नद्वकी पूजाका रहस्य एवं महत्त्व $
३१९
_____.---_-->म __्_ट्तज्ख् वि चचखचचच च्च्च्च्स्च्स्स्स्स्स्स््स्््स्स्स्सि
भगवान् शिवके लिझ् एवं साकार बिग्रहकी पुजाके रहस्य तथा महत््वका वर्णन
सतजी कहते हैँ-.शोनक | जो श्रवण कीतन ओर
मनत--डन तीनों साधनोंके अनुष्ठानमें समर्थ न हो; वह
भगवान शंकरके लिज् एवं मूरतिकी स्थापना करके नित्य उसकी
पूजा करें तो संसार-सागरसे पार हो सकता है | वश्चना अथवा
छल न करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार धनराशि ले जाय
और उसे शिवलिद्ठ अथवा शिवमूर्तिकी सेवाके लिये
अपित कर दे | साथ ही निरन्तर उस लिछ्ढ एवं मूतिकी
पृजा भी करे | उसके लिये भक्तिभावसे मण्डप) गोपुर; तीर्थ)
मठ एबं क्षेत्रकी स्थापना करे तथा उत्सव रचाये | वस्त्र:
गन्व) पुष्प, धूप दीप तथा पूआ और श्ञाक आदि
८ व्यक्षनेंतति युक्त भाति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य अन्न नेवेद्यके रुपमें
£ समर्पित करें। छत्र। ध्वजा) व्यजन) चामर तथा अन्य
_. अग्लेसद्रित राजोपचारकी भाँति सव सामान भगवान् शिवके
लि एवं मृतिको चढ़ाये | प्रदक्षिणा: नमस्कार तथा
वथाद्क्ति जप करे | आवाहनसे लेकर विसर्जनतक सारा
कीय प्रतिदिन भक्तिभावसे सम्पन्न करे । इस प्रकार
शिवलिज्ग अथवा शिवमूर्तिमं मगवान् शंकरकी पूजा करनेवाछा
पुरुष श्रवणादि साधनोंका अनुष्ठान न करे तो भी भगवान
शिवकी प्रसन्नतासे सिद्धि प्रात्त कर छेता है | पहलेके बहुतसे
मद्दात्मा पुरुष लिट्ठ तथा शिवमूत्तिकी पूजा करनेमात्रसे
भन्वन्धनसे मुक्त हो चुके हैँ |
प़पियोने पूछा--मूर्तिमें ही स्वेत्र देवताओंकी पूजा
शोती ४ ( लिफ्नमें नहीं » परंतु भगवान् शिवकी पूजा सब
जगद मूर्ति और लिए्में भी क्यों की जाती है !
सतजीने फहा--शुनीश्वरो |! तुम्हारा यह प्रश्न तो
बढ़ा ही पव्रित्त और अत्यन्त अद्भुत है। इस विपयर्मे
मददेवजी दी वक्ता हो सकते हैँ | दूसरा कोई पुरुण कभी
और कहीं भी इसका प्रतिपादन नहीं कर सकता । इस प्रश्नक्े
समधासके लिये भगवान् शिवने जो कुछ कद्ा है और
उसे सीने गुरुबीके मुखसे जिस प्रकार सुना है; उसी तरह
कमेश। सपने फररेंगा। एकमाच भगवान् शिव ही ब्रह्मरूप
ऐनेडे; पारण भमिप्पल! ( निराझर ) कटे गये हैँ । रूपयान
पिया गरण उसे सम सी काटा गया है। इसलि्यि ये
क्र
को +, के, ७.
हृ अ
हज
् *हंई फ्् हम दमा बा के | दशिवपर; - तषप्सक्ल अंक -नरलमनक9--कपमान
हट हे हिपाए दोनों है। शिवके निष्दल--निराद्गर
कि हम - कमला आ-फणनां बह 4.
४5५ पारण हो उसी पाया आपारः 8
९ हि कक पक की शक |
पिलपयर है रत एइआ ह। अपीय् शिवहिद्र शिवके निशारार
#् कब्प,
झ्
ध््द्न्ब्च
हर 4.५१
खरूपका प्रतीक है| इसी तरह शिवक्रे सकछ या साकार
होनेके कारण उनकी पूजाका आधारभूत विग्रह साकार प्राप्त
होता है अर्थात् शिवका साकार विग्रह उनके साकार स्वख्पका
प्रतीक होता है । सकल ओर अकल ( समस्त अन्ज-आकार-
सहित साकार और अड्भप्आाकारसे स्वंधा रहित निराकार )
रूप होनेसे ही वे “ब्रह्म! शब्दसे कहे जानेवाले परमात्मा हैं ।
यही कारण है कि सब लोग छिज्जञ ( निराकार ) और मूर्ति
( साकार ) दोनोंमें ही सदा भगवान् शिवकी पूजा करते हैं ।
शिवसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, वे साक्षात् ब्रह्म नहीं
हैं। इसलिये कहीं भी उनके लिये निराकार लिड्ठः नहीं
उपलब्ध होता ।
पृर्वकालमें बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनिने
मन्दराचलपर नन्दिकेश्वरसे इसी प्रकारका प्रश्न किया था |
सनत्कुमार वोले---मगवन् ! शिवसे भिन्न जो देवता
हैं, उन सबकी पूजाके लिये सर्वत्र प्रामः बेर ( मूर्ति ) मात्र
ही अधिक संख्यामें देखा ओर सुना जाता है | केबछ मगवान्
शिबकी द्वी पूजामें लिड्रः ओर वेर दोनोंका उपयोग देखनेमें
आता है | अतः कल्याणमय नन्दिकेश्वर ) इस बिपयमें
जी तत््वकी बात हो; उसे मुझे इस प्रकार बताइये, जिससे
अच्छी तरह समझमें आ जाय |
नन्दिकेश्वरते कहा--निष्याप ब्रह्मकमार | आपके
जैसे लोगके $ ७ ७
इस प्रश्नका हम-ज ; द्वारा कोई उत्तर नहीं दिया जा
सकता; क्योंकि यह गोपनीय विषय है ओर लिज्न साक्षात्
_अहाका प्रतीक है । तथापि आप शिवभक्त हैं। इसलिये इस
विपवमें भगवान, शिवने जो कुछ बताया है; उसे ही आपके
समक्ष कद्दता हूँ । भगवान् शिव अद्धाखरूप और निष्कल
( निराकार ) हैं; इसलिये उन्हींकी प्रजामें निप्कल लिड्का
उपयोग होता है | सम्पूर्ण वेदोंका यही मत है ।
के कं २
सनत्कुमार यचाले--महाभमाग योगीन्द्र |! आपने
भगवान् शिव तथा दूसरे देवताअंक्ति पृजनमें लिफ़ ओर
वरक प्रचारदा जो रहस्य विभागपृर्वक बताया £:
बह बधाभ है | इसलिये लिझः ओर बेरकी आदि
डत्ाजििदात
घ>ब१ क' है। ञू 7३
स्र्सान्त श्र # उसीदो च४. र२7३
बताने है। उसको मे इस सम मसनना
है
चाहता हैं वल्ग्मक्त प्रोकत्यदा रहस्य मूचित करनेदाटा
थक बे
क्त कूल समय हु
अर दर सुनाइथय |
9२ ४ नमो रुद्राय शांन्ताय अ्रह्मणणे परमात्मने १: [ संक्षिप्त-शिवपुराणा;
इसके उत्तरमें नन्दिकेश्वरने भगवान् महादेवके निष्कल तथा दोनोंके बीचमें निप्फकल आदि-अन्तरहित भीषा
खरूप लिड़के आविर्भाबका प्रसज्ञ सुनाना आरम्म किया। अभिस्तम्भके रूपमें उनका आविर्भाव आदि प्रसद्गोंकी कया
उन्होंने ब्रह्मा तथा बिप्णुके विवाद, देवताओंकी व्याकुलता कही | तदनन्तर श्रीत्रहा ओर विष्णु दोनेकि द्वार उप
एवं चिन्ता; देवताओंका दिव्य कैलास-शिखरपर गमन) उनके. ज्योतिर्मय स्तम्भकी झँचाई और गहराईका थाह हेनेग्री
द्वारा चन्द्रशेखर महादेवका स्तवनः देवताओसे प्रेरित हुए चेश एबं केतकी-पुप्पके आप-बरदान आदिके प्रसव
महादेवजीका ब्रह्म ओर विप्णुके विवाद-खलमें आगमन भी सुनये | ( अध्याय ५ से ८ तक )
+-४*सेअधा<6-*8६०---
महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुकी अपने निष्कल और सकल खरूपका परिचय
देते हुए लिझ्गपूजनका महत्त्व बताना
नन्दिकेश्वर कहते हैं--तदनन्तर वे दोनों--त्झ्मा और. केयूर, किरीट, मणिमय कुण्डछ, वजोपवीत) उत्तरीय बस्तर) पुण
विष्णु भगवान् शंकरको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़. माला रेशमी वस्त्र; हार; मुद्रिका; पुप्प) ताम्वूल, कपूर; चेन्ल
उनके दायें-बायें भागमें चुपचाप खड़े हो गये। फिर; उन्होंने वहां. एवं अगुरुका अनुलेप, धूप; दीप; ब्वेतछत्र; व्यजन) 'लज)
ह चंवर तथा अन्यान्य दिव्य उपहारोंद्वारा, जिनका वेभव वाएँ
(१११ (! | और मनकी पहुँचसे परे था, जो केवल पञ्मुपति ( परमात्मा )
क् । । | | /' ९] के ही योग्य थे ओर जिन्हें पश्॒ ( बद्ध जीव ) कदापि नहीं प
७ । ; सकते थे; उन दोनोंने अपने खामी महेश्वरका पूजन किया।
| सबसे पहले वहाँ ब्रह्मा ओर बिष्णुने भगवान् शंकरकी पूजा की |
इससे प्रसन्न हो भक्तिवद्धेक भगवान् शिवने वहाँ नम्रभावते
खड़े हुए, उन दोनों देवताओंसे सुस्कराकर कहा---
महेश्वर बोले--पुत्रो | आजका दिन एक महार।
दिन है | इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है ८
इससे में तुमलोगोंपर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह कि;
परम पवित्र ओर महान-से-महान् होगा | आजकी यह ति
'शिवरात्रि?के नामसे विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी।
इसके समयमें जो मेरे लिज्ढ ( निष्कल--अज्ग-आकतिसे रहि
निराकार खरूपके प्रतीक ) वेर ( सकल--साकाररूपके प्रतीर
विग्रह ) की पूजा करेगा; वह पुरुष जगत्की ख॒श्टि और पा
आदि काय भी कर सकता है । जो शिवरात्रिको दिन-रात निगाह
एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्तिके अनुसार निश्चलमाक
संक्षात् प्रंकट पूजनीयमद्दादेवजीको श्रेष्ठ आसनपर स्थापित मेरी यथोचित पूजा करेगा; उसको मिलनेवाले फलका व
करके पत्रित्र पुरुष-बस्तुऑद्वारा उनका पूजन किया । दीर्घकाल- सुनो । एक वर्षतक निरन्तर मेरी पूजा करनेपर जो फछ मिल.
तक अविक्ृतभावसे सुस्थिर रहनेवाली वस्तुओंको “पुरुष वस्तुः है; बह सारा फल केवछ शिवरात्रिको मेरा पूजन कल. रे
कहते ५ और अल्पकालतक ही टिकनेवाली क्षणभह्ढर वस्तुएँ. मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता है। जैसे पूर्ण चन्द्रमाका «
'प्राकृत वस्तु? कहलाती हैँ | इस तरह वस्तुके ये दो भेद समुद्रकी बद्धिका अवसर है, उसी प्रकार यह गदिवरात्रि । | ।
जानने चाहिये | ( किन पुरुष-बस्तुओंसे उन्होंने भगवान् मेरे धर्मकी ब्रद्धिका समय है | इस तिथिमें मेरी स्थापना आई कु हा
श्िवका पूजन किया; यह बताया जाता है--) हार नूपुरः का मन्नल्मय उत्सव होना चाहिये | पहले में जब ५ ४
विद्येश्वरसंहिता ] # पाँच छत्योंका प्रतिपादन; प्रणव एवं पशञ्चाक्षर मन्त्रकी महत्ता %
स्तम्मरू्पसे प्रकट हुआ था) वह समय सा्गशीर्षमासमें आर्द्रा
नक्षत्रसे युक्त पृर्णणासी या प्रतिपदा हैं। जो पुरुष मार्गशीर्ष
मासमें आदर नक्षत्र होनेपर पावेतीसद्वित मेरा ददन करता है
अथवा मेरी मूर्ति या लिक्षकी ही झाँक़ी करता है? वह मेरे लिये
ऋतिकेयस भी अधिक प्रिय है| उस घ्यभ दिनको मेरे दशेन-
भात्रसे पूरा फेल प्रात्त होता है | यदि दर्शनके साथ-साथ मेरा
पूजन भी किया जाय तो इतना अधिक फल प्रा होता हैं
उसका याणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता |
वहाँपर में लिश्नरूपसे प्रकद होकर बहुत बड़ा हो गया था।
अतः उस लिड्ल्कके कारण यह भूतल “लिक्वस्थान! के नामसे प्रसिद्ध
- हुआ। जगतके लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें; इसके
लिये यद अनादि ओर अनन्त च्योतिःस्तम्मं अथवा ज्योतिर्मय
लिफ अलन्त छोटा हो जायगा । यह लिड्ग सब प्रकारके भोग
सुल्म करानेवाला तथा भोग और मोक्षका एकमात्र साथन है |
इसका दशशन) स्पर्श ओर ध्यान किया जाय तो यह प्राणियोंको
जन्म ओर मुृत्युक्े कष्टसे छुड़ानेवाल्य है। अमिके पहाड़
जगा जो यह शिवलिड्र यहाँ प्रकट हआ है। इसके कारण यह
खान अरुणाचल? नामसे प्रसिद्ध होगा। यहाँ अनेक प्रकारके
बड़े-बड़े तीथ॑ प्रकट होंगे । इस स्थानमें निवास करने या मरने
मे जीवॉका सोक्षतक दो जायगा |
मेरे दो रूप हैँ---“सकल? और “निप्कल? | दूसरे किसीके
एस रूप नहीं हैं। पहले में स्तम्भरूपसे प्रक्ँ/ हुआ। फिर
अपने साक्षात्रुपसे । धरद्मभाव”? मेरा ८निप्कल”ः रूप है और
“मण्यरभाव! सकल) रूप | ये दोनों मेरे ही सिद्धरूप हूं । में
0 पख्म परमात्मा हूँ । कलायुक्त और अकल मेरे ही स्वरूप
न्ध्ज्क्ष्ा जल
वन के ख् क कु 5
हद > कप ६ छं ५७
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अह्या जोर दिप्णने पूछा--प्रभो | सष्टि आदि पाँच
“ ४ झक्षण क्या हूं, यहू हम दोसेंकों बसाहये |
भगवान् शिव बोले-मेरे क्तत्याकी समसना शत्यन्त
एन ऐ पशये मे शतक उग्तें उनके विपयमे बता रहा
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हैं। ब्रह्मू्प होनेके कारण मैं ईश्वर भी हूँ । जीवोंपर अनुग्रह
आदि करना मेरा कार्य है । ब्रह्मा ओर केशव ! में सबसे
बृहत् ओर जगतकी ब्रृद्धि करनेवाल्ा होनेके कारण #्रक्षः
कहलाता हूँ | सर्वत्र समरूपसे स्थित ओर व्यापक दोनेसे में ही
सबका आत्मा हूँ। सगगंसे लेकर अनुभ्रहृतक ( आत्मा या इंश्वस्से
भिन्न ) जो जगत-सम्बन्धी पाँच झृत्य हैं; वे सदा मेरे ही हें;
मेरे अतिरिक्त दूसरे किसीक्रे नहों हैं; क्योंकि में ही सबका
ईश्वर हूँ | पहले मेरी ब्रह्मरूपताका बोध करानेके लिये “निष्कल?
लिक्ञ प्रकट हुआ था | फिर अज्ञात ईश्वरत्वका साक्षात्कार
करानेके निमित में साक्षात् जादीश्वर हो 'सकरछ” खूपमें
- तत्काल प्रकट हो गया | अतः मुझमें जो ईशत्व है; उसे
ही मेरा सकलरूप जानना चाहिये तथा जो यह
मेरा निष्कल सम्म है। वह मेरे ब्रह्नलरूपका बोध
करानेवाछा है । यह मेरा ही लिट्ः ( चिह्न ) है । ठुम
दोनों प्रतिदिन यहाँ रहकर इसका पूजन करो । यह मेरा दी
खरूप है ओर मेरे सामीप्यक्री प्राप्ति करनेत्राल् है। लिड्टः और
लिड्रीम नित्य अभेद होनेके कारण मेरें इस लिट्डका महान:
पुरुषको भी पूजन करना चाहिये । मेरे एक लिड्नकी स्थापना
करनेका यह फेरे बताया गया है कि उपासक्रकी मेरी समानता-
की प्राप्ति हो जाती है। यदि एकक्रे बाद दूसरे शिव्नलिश्नफी
भी स्थापना कर दी गयी; तब तो उपासककोी फलछरूपसे मेरे साथ
एकत्व ( सायुज्य मोन्न ) रूप फछ प्राप्त होता है। प्रधानत्या
शिवलिक्नकी ही स्थापना करनी चाहिये । मूतिकी स्थापना उम्रकी
अपेक्षा गोग कर्म है। शिव्रल्लिद्रके अभावमें सत्र ओरसे सवेर
( मूर्तियुक्त ) दोनेपर भी बह खान क्षेत्र नहीं कदछाता )
( अध्याय ९ )
अर 2 2:7-7--2+
पांच कृत्योंका अतिपादन, अ्रणव एवं पद्चाध्षर मन्त्रकी महत्ता, त्रप्मा-विष्णुद्रारा
भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तधान
खष्टिका सुखिरूपसे रहना दी उत्की म्वितिः है। उसका
विनाद ही “्संहारः है। प्रागेके उत्कतगफ्री /विरोमाव? कदते
हूँ । इन सबसे छुटकारा मिल जाना हो मेंस ्थनुग्रह! है |
इस प्रकार मेरे शैच कृत्य हैं | खह्ि आदि जा चार ऊत एऐ,
घे संसारदा विस्तार करनेंत्राड़ ैं। पॉचर्तों इत्य अवुभट
मोधरा देते है। बड़ सदा मुझमें दी अनड भायते स्पिर
गहता है। मेरे मझशन इस पवन झ्येहिी पथ भूर्तोमे
देखते हैं। खट्टि बूतहमें, सिते अहम, संहार अ्र्मे,
डे७छ
४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
[ सक्षिप्त-शिवपुराणाह
तिरोभाव वायुमें ओर अनुग्रह आकाशर्में ख्वित है। (एरथ्वीसे
सबकी सृष्टि होती है। जलसे सबकी चृद्धि एवं जीवन-रक्षा
होती है। भाग सबको जला देती है | वायु सबको एक स्थानसे
दुसरे स्थानको ले जाती है ओर आकाश सबको अनुगहीत
करता है। विद्वान् पुरुषोंको यह विषय इसी रूपमें जानना
पवाहिये । इन पाँच क्त्योंका भार वहव करनेके लिये. दी मेरे
पाँच मुख हैं।. चार दिद्याओंमें चार मुख हैं ओर इनके
बीचमें पॉँचवोँ मुख है | पुत्रों! तुम दोनोंने तपस्था करके
प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वरसे सृष्टि ओर स्थिति नामक दो कृत्य
प्राप्त किये हैं । ये दोनों तुम्हें बहुत प्रिय हैं | इसी प्रकार मेरी
विभूतिस्वरूप (रुद्र” ओर “महदेश्वए ने दो अन्य उत्तम कृत्य--
संहर ओर तिरोभाव मुझसे प्राप्त किये हैं। परंतु अनुग्रह
सामक कृत्य दूसरा कोई नहीं पा सकता | रुद्र ओर महेश्वर
अपने कमको भूले नहीं हैं | इसलिये मैंने उनके लिये अपनी
समानता प्रदान की है | वे रूप, वेष) कृत्य+ वाहन, आसन
ओर आयुध आदियें मेरे समान ही हैं । मैंने पूर्वकालमें अपने
खरूपभूत मन्त्रका उपदेश किया है; जो ओंकारके रूपमें
प्रसिद्ध है । वह महामझ्ुलकारी मन्त्र है। सबसे पहले मेरे
छुखसे ऑंकार ( 3“ ) प्रकट हुआ; जो मेरे स्वरूपका बोध
करानेवाला है । ओंकार वाचक है ओर मैं वाच्य हैँ। यह
सनन््त्र मेरा खरूप ही है | प्रतिदिन ओकारका निरन्तर स्मरण
करनेसे मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
मेरे उत्तरवर्ती मुखसे अकारका; पश्चिम मुखसे उकारका;
दक्षिण मुखसे मकारका? पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दुका तथा मध्यवर्ती
मुखसे नादका प्राकम्य हुआ । इस प्रकार पाँच अवयवोंसे युक्त
ओकारका विस्तार हुआ है | इन सभी अवयबोंसे एकीमूत
होकर वह प्रणव ८3४” नामक एक अक्षर हो गया | यह नाम-
रूपात्मक सारा जगत् तथा वेद उत्पन्न स्त्री-पुरुषवर्गरूप
दोनों कुछ इस प्रणव-मन्त्रसे व्याप्त हैं। यह मन्त्र शिव
और शक्ति दोनोंका बोधक है । इसीसे पद्चाक्षर मन्त्रकी उत्पत्ति
हुई है; जो मेरे सकल रूपका बोधक है | वह अकारादि क्रमसे
ओऔर मकारादि क्रमसे क्रमशः प्रकाशमें आया है ( ५ 3
नमः शिवाय” यह पशद्चाक्षर मन्त्र है )। इस पश्चाक्षर मन्त्रसे
मातृका वर्ण प्रकट हुए हैं, जो पाँच भेदवाले हैं# |
उसीसे शिरोमन्त्रसहित त्रिपदा गायत्रीका प्राकट्य हुआ
|७७४७७७७८ए"स्नशशशनशणशशशशशशशशशशशशशशशशशशलाााा95 >> अब न लक कक कक ई
€मए उ क्र लू--ये पाँच मूलभूत खर हैं तथा व्यक्षन भी
पाँच-पाच वर्णोसे युक्त पाँच वर्गवाले ६ ।
कि
हैं हर हर छः
क
डे
2307]
'जरीनीजन जगा
है। उस गायत्रीसे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और उन वेद
करोड़ों मन्त्र निकले हैं | उन-उन मनन््त्रोंसे भिन्न-भिन्न कार
सिद्धि होती है। परंठ इस प्रणब एज पद्चाक्षस्े समृप
मनोरथोंकी सिद्धि होती है । इस मन्त्रसमुदायसे भोग ओर
मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं | मेरे सकल स्ररूपसे सम्बन्ध ख़बने
वाले सभी मन्त्रराज साक्षात् भोग प्रदान करनेवाढे ऑ
थ्ुभकारक ( मोक्षप्रद ) हैं | ।
नन्दिकेश्वर कहते हँ--तदननत्तर जगदम्बा पाव॑तड
साथ बैठे हुए गुब्वर महादेवजीने उत्तराभिम्रुख बंढे हुए
ब्रह्म ओर विष्णुको पर्दा करनेवाले वल्लसे आच्छादित कं
उनके मस्तकपर अपना करकमल रखकर धीरे-धीरे उच्चाए
करके उन्हें उत्तम मन्त्रका उपदेश किया | मन्त्र-तन्त्र्म बता:
हुईं विधिके पालनपूर्व॒क्र तीन बार मन्त्रका उच्चारण कर
भगवान् शिवने उन दोनों शिप्योंकों मन्त्रकी दीक्षा दी । ह
उन शिप्योने गुरुदक्षिणाके रूपमें अपने-आपको ही सर्माः
कर दिया और दोनोंने हाथ जोड़कर उनके समीप खड़े ।
जन देवेश्वर जयद्गुरुका स्तवन किया ।
ब्रह्मा और विष्णु वोले--अभो ! आप निष्कलर्प है
आपको नमस्कार है ! आप निष्कल तेजसे प्रकाशित होते हैं
आपको नमस्कार है। आप सबके खामी हैं। आएं
नमस्कार है । आप सर्वात्माको नमस्कार है अथवा सकल्छाः
रा महदेश्वरकीं नमस्कार है। आप प्रणवक्के वाच्यार्थ
आपकी नमस्कार है। आप प्रणवलिट्वाले हैं।
नमस्कार है | सृष्टि, पालन) संहार, तिरोभाव ओर
करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके पॉच सुख हे
आप परमेश्वक्की नमस्कार है। पश्चत्रह्मखरूप पाँच
आपको नमस्कार है | आप सबके आत्मा हैं) ब्रह्म
आपके गुण ओर शक्तियाँ अनन्त हैं। आपको नमस्कार!
आपके सकल ओर निष्कल दो रूप हैं। आप सदृरु
शम्भु हैं, आपको नमस्कार है |
#नमी निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे .।
नम: सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने ॥ '
नमः: प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिब्विने ।
नमः सश्यादिकर्त्र च नमः पत्चसुखाय ते ॥
पतञ्चमद्मखरूपाय पशन्चकृत्याय ते नमः '
आत्मने बरह्मगे. तुम्यमनन्तगुणशक्तये ॥
सकलाकलरूपाय शम्भवे ग्रुवे नव |
( शि० पु० विधे० सं० १० । १८-४
ध् र हे
विग्रेश्वरसंहिता ] # शिवलिडज्ञक्री स्थापना; उसके लक्षण और पूजनकी विधिका चणन $
अंग ज््य्य्ियय्य्म्पे:::":-_---+-->->---<-++--_+++>-+>-->>+>+++>--->+--++-++>>--४--+-+--४४४“४++++४+४++४४+४४४श४श४४४+४+४४+४५४४-७+४++४-४४+ तक. फैमनदका2०--५.<क्धीीमाि ० नमीनगननागाए-"। ०
५. ३.
इन पद्मोंद्यारा अपने गुरु महेश्वरकी स्ठ॒ति करके ब्रह्मा
ओर बिश्णुने उनके चरणमिं प्रणाम किया |
प्रदोषव्यापिनी छेनी चाहिये; क्योंकि परवर्तिनी तिथिसे संयुक्त
चतुर्दशीकी ही प्रशंसा की जाती है | पूजा करनेवाल्ेके लिये
महेश्यर बोले--*भाद्द्र! नश्नत्रसे_युक्त चतुर्दशीको/ नक्षत्रसे युक्त चतुदशीको | मेरी मूर्ति तथा छिद्ज दोनों समान हैं; फिर भी मू्तिकी अपेक्षा
प्रथवका जप किया जाय॒ तो वह अक्षय फल देनेवाला होता है |
सूयकी संक्रान्तिसे युक्त महाआर्द्रा नक्षत्रमें एक बार किया हुआ
प्रणय-जप कोटिगुने जपका फल देता है । “मृगशिरा? नश्षत्रका
अन्तिम मांग तथा '्युनव॑स/का आदिम माग पूजा; होम और
तरपण आदिके लिये सदा आद्रकि समान ही होता है--यह
जानना चाहिये। मेरा या मेरे लिज्गका दर्शन प्रभातकालमें ही---
प्रातः ओर संगब (मध्याहके पूर्व ) कालमें करना चाहिये। मेरे
दर्शन-प्रजनक्रे लिये चतुदशी तिथि निशीथव्यापिनों अथवा
लिडका स्थान ऊँचा है | इसलिये मुम॒क्षु पुरुषोंको चाहिये
कि वे बेर ( मूर्ति )से भी श्रेष्ठ समझकर लिझ्गका ही पूजन करें ।
लिड्रका उँ“कार मन्त्रसे ओर वेरका पश्चाक्षर-मन्त्रसे पूजन
करना चाहिये। शिवरलिज्ञकी खय॑ ही स्थापना करके अथवा
दूसरोंसे भी स्थापना करवाकर उत्तम द्रव्यमय उपचारोंसे पूजा
करनी चाहिये.। इससे मेरा पद सुलभ हो जाता है ।
इस प्रकार उन दोनों शिष्योंकों उपदेश देकर भगवान्
शिव वहीं अन्तर्घान हो गये । ( अध्याय १० )
मा ०----->72 4 ५०----
मई लिड़की कर शा ही ९ शिवपदकी क
शिवलिड़्की स्थापना, उसके लक्षण ओर पूजनकी विधिका वर्णन तथा शिवपदकी
प्राप्ति करानेवाले सत्कर्मोका विवेचन
ऋषियोने पूछा--सूतजी ! शिवलि्ञकी स्थापना केसे
करनी चाहिये ! उसका लक्षण क्या है ? तथा उसकी पूजा केसे
करनी चाहिये, किस देश्वय-कालमें करनी चाहिये और क्रिस
द्रव्यके द्वारा उसका निर्माण होना चाहिये !
क् सतजीने फकहा--महर्षियों ! में तुमलोगोंके लिये इस
विषयक वर्णन करता हूँ । ध्यान देकर सुनो और समझो |
अनुकूल एवं घुमभ समयमें किसी पवित्र तीर्थम॑ नदी भादिके
तटपर अपनी रुचिक्रे अनुसार ऐसी जगह शिवलिद्गकी स्थापना
फरनी चाहिये, जहाँ नित्य पूजन हो सके। पार्थिव द्रब्बसे;
जल्मय द्॒व्यसे अथवा तेज पदार्थले अपनी रुचिके अनुसार
फल्पोत्त रक्षग्रेंसि युक्त शिवलिद्नका निर्माण करके उत्तकी पूजा
परनेस उपासककों उस पूजनका पूरा-यूणा फछ प्राप्त होता है ।
हे णे शुभ रक्षणोंसे युक्त शिवलिप्नकी यदि पृजा की जाय तो
दा हे तलाल पूजाका फूड देनेवाला होता है। यदि चलप्रतिश
. करनी हो तो इसके लिये छोटा-सा शिवलिट्र अथवा विम्रह श्रेष्ठ
7 भाना जाता है और यदि अचल्प्रतिष्ठ करनी हो तो स्थृल
, शिपणि अथवा बिग्रह अच्छा माना गया है। उत्तम
से गुदा शिवलिट्रकी पीडसट्ित स्थापना करनी चाहिये ।
शिल्ड्षिपरद्य पीठ मप्टलाक्गर ( शो » चोकोर, त्िकोग
। शेप साटफे पायेह्ी शोति ऊपर-नीचे मोटा और दीचमें
आ
न्ट £शप दि परे जि ५ शा हु दे या 8 सा
5 ता चाहथ। एसा लिप्वू-पीद महान फड़ देनेयाला
हुए हा हा कप कआ. वहणडण
हक ज्श है अल सिहर का ३. दया शक 4५ औ.
(७ म ९१ १९७४ सिश्ीते, प्ररर आदिने अथदा लोटटे आदिसे
८ ई जफ कर हि; लिभाण ६40 म्ज्् *-
भपिजडइपर लगाण परना चारयदे। शिस ट्त्पते शिवतिह्तदा
निर्माण हो, उसीसे उसका पीठ भी बनाना चाहिये। यही
स्थावर ( अचलप्रतिष्ठावांे ) शिवलिड्गकी विशेष बात है ।
चर ( चल्प्रतिष्ठावाले ) शिबलिड्र्में भी लिटड्ठ- और पीठका
एक ही उपादान होना चाहिये | किंतु बागलिड्के लिये यट॒
नियम नहीं है | लिड्रकी लंब्राई निर्माणकर्ता या स्थापना करने-
वाले यजमानके बारह अंगुलके बराबर होनी चाहिये। ऐसे '
ही शिवलिट्कको उत्तम कहा गया है | इससे कम लंबाई हो तो
फलमें कमी आ जाती है, अधिक हो तो कोई व्लेपकी बात
नहीं है । चर लिड्में भी वेंसा ही नियम है | उसकी लंबाई:
कम-से-कम कताके एक अंगुलके वसबर होनी चाहिये |
उससे छोटा होनेपर अल्प फड मिलता है | क्रिंतु उससे अधिक
होना दोपकी बात नहीं है । यजमानकों चाहिये कि बह पहले
शिव्प-शास्त्रके अनुसार एक विमान या देवालय बनवाये; जो
देवगणोंकी मूर्तियेसि अरृकृत हो । उसका गर्भगह बहुत ही
सुन्दर; सुदृद ओर दर्पणके समान खच्छ हो। उसे नी प्रकारदछे
रत्ंसि विभूरिद किया गया हो। उसमें पूर्व और पश्चिम
दिद्यार्मे दो मुख्य द्वार हों । जहाँ शिवलिड्रकी स्थापना करनी
हो; उस खानकते गर्तमें नीलम, लात चंदुर्य+ भ्वाम। मरकत; मोती:
मँगा। गोमेद और हीरा-इननी रकोंको तथा अन्य मदस्वपूर्ट
टव्येंकी वंदिक मन्त्रोक् साथ छाड़े। सं्ोशत झादि पैन
है. ३0४: कक शिद्लि बम कक छ
वेदिक सनन््मी ७ हाय शिवलिठ्रका पोच स्थान क्रमगाः प्रजद
नज #-३४०4९....रसील"> इन 2» बा छः प्रा; “हि ब्््ष्ट बज रच पु हि
र्न्प 7१" डक तक ०० दर कर
के जे साय जात ऊऋरफाान हप जाहाबम ले सना नें
4
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४5७ के उस ॥* “ हु. दर 4 का >कनयनयम दा कसा पक ब-लसुका-+कलका
का] कत, भुछती (० रा आन द्घु थी धू छ<, न रा 70९ क्रो
३६
करके अभिमें हविप्यकी अनेक आहुतियाँ दे ओर परिवारसह्दित
मेरी पूजा करंके- गुरुखरूप आचायको धनसे तथा भाई
बन्धुओंकोी - मनचाही वस्तुओंसे संत॒ष्ट करे | याचकॉकों जड़
( सुबर्ण) गृह एवं भू-सम्पत्ति ) तथा चेतन ( गो आदि )
वेभव प्रंदान करे |
स्थावर-जंगम सभी जीवोंकों यज्ञपूवक संतुष्ट करके एक
गद्ढेमें सुबर्ण तथा नो प्रकारके रक्ष भरकर सद्योजातादि बेदिक
भन्त्रोंकी उच्चारण करके परम कल्याणकारी महादेवजीका ध्यान
करे | तत्पश्रात् नादघोषसे युक्त महामन्त्र ओऑंकार ( 3४ ) का
उच्चारण करके उक्त गड्डेमें शिवलिड्गकी स्थापना करके उसे
पीठसे संयुक्त करे | इस प्रकार पीठयुक्त लिद्गकी स्थापना करके
उसे नित्य-लेप ( दीघेकालतक टिके रहनेवाले मसाले ) से जोड़कर
स्थिर करे | इसी प्रकार वहाँ परम सुन्दर वेर ( मूर्ति ) की
भी स्थापना करनी चाहिये । सारांश यह कि भूमि-संस्कार
आदिकी सारी. विधि जैसी लिड्र-प्रतिष्ठाके लिये कही गयी है,
वैसी ही बेर ( मूर्ति )-प्रतिष्षाके छिये भी समझनी चाहिये |
अन्तर इतना ही है कि लिझ्ञ्प्रतिष्ठके. लिये प्रणवमन्त्रके
उच्चारणका विधान है; परंतु वेरकी प्रतिष्ठा पश्चाक्षर मन्त्रसे करनी
चाहिये । जहाँ लिड्ल्गकी प्रतिष्ठा हुई है; वहाँ मी उत्सवके लिये
बाहर सवारी निकालने आदिके निमित्त. वेर ( मृत्रि ) को
रखना. आवश्यक है । वेरको बाहरसे भी लिया जा सकता है ।
उसे . गुरुजनोसे ग्रहण करे । बाह्य वेर वही लेने योग्य है; जो
साधु पुरुषोंद्वारा पूजित हो । इस प्रकार लिज्ञमें ओर वेरमें भी
की हुई महादेवजीकी पूजा शिवपद प्रदान करनेवाली होती है |
स्थावर और अंगमके भेदसे लिद्ग भी दो प्रकारका कहा गया
है | वृक्ष) छतो आदिको स्थावर लिज्ञ कहते हैं ओर कृमि-कीट
आदिको जंगम लिझ्ज । स्थावर लिड्डकी सींचने आदिके द्वारा
सेवा करनी चाहिये ओर जंगमलिड्गकी आहार एवं जल आदि
देकर तृत्त करना उचित है । उन स्थावर-जंगम जीबोंको सुख
उँ० वामंदेवाय नमो ज्येष्टाय नमः श्रेष्टाय नमो रुद्राय नमः
कालाय नमः कलूविकरणाय नमो वलविकरणाय नमों वलाय नमो
बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मथाय नमः ।
3० अधोरेभ्योडथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्वशर्वेभ्यो
नमस्ते इसतु रुंद्ररूपेस्य: ॥
उ० तत्पुरुषाय विद्यहे महादेवाय पीमहि तत्तो रुद्र: प्रचोदयात् ।
*» इंशानः सर्वविधानां ईश्वर: सर्वभृतानां अद्याधिपतिर्तहामणों5पिपति
ग्रंदा शिवों मे5स्तु सदाशिवोम् ॥
श्र,
क ६
सर <
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]ज
ध ज
पु
४६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने १
| संक्षिप्त-शिवपुराणोड्
मिस सिकसरि कमल मिट ककिलिक जल असम अ नह ल लक तंज मल ल ली जल सनक अल जम जज जल अमल जज आज जा नइमकजांममााानकलइााकाभभसमाफााम्नकालूआागुक दू महुएनयुतागुलबू छलका ्इकुसमभनपकनदमकननएतबानन तक 5ुकरमकरभभकभक़मम कुक मइउुकरम नगद रुक मुक् लू दुकाकल आ>क्रयुम क्रम मुदूतग कप कप पद का फरा
पहुँचानेम॑ अनुरक्त होना भगवान् शिवका पूजन हे) ऐप
विद्वान् पुरुष मानते हैं | ( यों चराचर जीवोंको ही मगवान्
शंकरके प्रतीक मानकर उनका पूजन करना चाहिये | )
इस तरह महालिक्ञकी स्थापना करके विविध उपचारोंद्राण
उसका पूजन करे | अपनी शक्तिके अनुसार नित्य पूजा की
चाहिये तथा देवालयके पास ध्वजारोपण आदि करना चाहिये।
शिवलिज्ज साक्षात् शिवका पद प्रदान करनेवाला है| अथवा चर
लिड्लमें पोडशोपचारोंद्वारा यथोचित रीतिसे क्रमशः पूजन करे |
यह पूजन भी शिवपद प्रदान करनेवाला है। आवाहनः आन)
अच्ये, पाद्म; पाद्माज्न आचमन, अभ्यन्नपूवक स्तानः वद्न
एवं यशोपवीत, गन्ध) पुष्प॥ धूप दीप) नेवेद्य) ताम्बूह
समर्पण, नीराजन) नमस्कार ओर विसर्जन--ये सोलह उपचाए
हैं | अथवा अध्यंसे लेकर नेवेद्रतक विधिवत् पूजन करे।
अभिषेक) नेवेद्य, नमस्कार ओर तर्पण--ये सब यथाशक्ति
नित्य करे । इस तरह किया हुआ शिवका पूजन शिवपदवी
प्राप्ति करानेवाला होता है। अथवा किसी मनुष्यके द्वारा स्थापित
शिवलिक्ष्में, ऋषियोंद्वारा स्थापित शिवलिझ्गञमं, देवताओंद्वाए
स्थापित शिवलिज्ञमें, अपने-आप प्रकट हुए. खयम्मूलिज्ञमें तथा
अपनेद्वारा नूतन स्थापित हुए. शिवलिक्ञमें भी उपचार-समपण-|
पूर्वक जेसे-लेसे पूजन करनेसे या पूजनकी सामग्री देनेसे भी
मनुष्य ऊपर जो कुछ कहा गया है; वह सारा फल प्राप्त क
लेता है | क्रमशः परिक्रमा ओर नमस्कार करनेसे मी शिवहर
शिवपदकी प्राप्ति करानेवाला होता है | यदि नियमप्र्वक्र. शिव
लिज्गका दर्शनमात्र कर लिया जाय तो वह भी कल्याणप्रद होता
है | मिद्दी, आटा) गायके गोबर, फूल) कनेर-पुष्प) फछ/
गुड़) मक्खन, भस्म अथवा अन्नसे भी अपनी रुचिके अनुसाए
शिवलिज्ग बनाकर- तदनुसार उसका पूजन करे अथवा प्रतिदि॥
दस हजार प्रणवमन्त्रक्म जप करे अथवा दोनों संध्याओं|
समय एक-एक सहस्त॒प्रणवका जप किया करे | यह क्रम मं
शिवपदकी प्राप्ति करानेवाला है, ऐसा जानना चाहिये । |
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चाहिये | नाद ओर बिन्दुसे युक्त ओंकारके उच्चारण हे
'समानप्रणयः कहते हैं।
विद्वान॒पुरुष यदि प्रतिहि
विद्येश्वरसंहिता ]
िशिमिलिलि न गिल कलश खीर लि न आल «7 5०६०-००००००्:-०-०००००-००००००६०००००३-२०-०--० 2 धिेआलआसस किधिजया शा ४४४ ४
का] 3 यान "ैजीमानन
आदरसपूर्चक .दस हजार पद्चाश्षर सत्ता जय क्रिया जावे
अथवा दोनों संध्याअओंके समय एक-एक सहखका ही जप
कया जाय तो उसे शिवपदकी प्राप्ति करानेबाला समझना
चाहिये | ब्राह्मगेंकि लिये आदिम प्रणवसे युक्त पद्चाक्षर मन्त्र
अच्छा बताया गया है| कलशसे किया हुआ लान।
मन्त्रकी दीक्षा, मातृकाओंका खा सतत पत्रित्र अन्तः- बात, संत्यसे प्रव्रित्र अन्तः-
करणात्य ब्राह्मम तथा शी गुरु--इन सबको उत्तम माता
गया है। हिज्ोंके लिये पममः शिवाय! के उच्चारणका
विधान है| द्िजेतरोके लिये अन्तमें नमःपदक्के प्रयोगकरी
विधि है अथात् वे शिवाय नमः इस मन्त्रका उच्चारण
करें | त्रियेंके लिये भी कहों-कहीं विधियूबेक नमोडन्त
उद्चारणका ही विधान है अर्थात् वे भी शिवाय नमः?
वा ही. जप करें। कोई-कोई ऋषि ब्राह्मणकी स्तियोंक्े लिये
सम/पूर्वक -शिवायक्रे जपक्की अनुमति देते हैं अर्थात् बे
ध्तमः शिवाय? का जय करें | पदश्चाक्षर मन््त्रका पाँच करोड़
जप करके मनुप्य भगवान् सदाशिबके समान हो जाता
ह। एक दो; तीन अथवा चार करोड़का जप करनेसे
क्रमशः ब्रह्म, विष्णु) रुद्र तथा महेश्वरका पद प्राप्त होता
९ै। अथवा मस्त्रमे जितने अक्षर हैं; उनका प्रथकू-प्रथक्
एक-एक लाख जप करे अथवा समस्त अक्षरोंका एक
साथ ही जितने अक्षर हों; उतने लाख जप करें।ह
तरटके; जपको शिवपदयी प्राप्ति करानेवाला समझना चाहिये |
दि एक हजार दिनोंमे प्रतिदिन एक सहस्य जपके ऋमसे
पश्मक्षर मन््त्रका दस लाख जय पूरा कर लिया जाय ओर
| प्रतिद्दिन ब्राहण-मोजन कराया जाय तो उस मन्नसे अभीष्
" घाय रग सिद्धि
ज्गती हूँ |
मासगकी चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रातःकाल एक
, (जार आठ बार यायत्रीका जप करे | एसा होनेपर गायन्नी
। “अर ए
न ल्ूए भरना $. यह प्रामरा। शिदरद ( शा जगत अर
हसशाः शिवका पद प्रदान करनेवाली होती दे ! वेदसन्तों
आए. पाएफ सूक्तोंडा भी नियमपूवंक जप करना चाहिये ।
[त पारायण भी शिवपदयी प्राप्ति करामेवाडा है; ऐसा जानना
एिसे। अम्यान्य सो वहतसे मन्च हैं, उनका भी जिनमे
एस जर पघर॥। शु्स प्रकार जो यधाशन्टि
“४+
(
४) झागोी राचिर अनुसार फकिली एप मसन्द्रया
ः लिदिस उसया जाग कास्ना चाहिए
सा दे हे ते ऋसमघदा प्रद्रन एन्द
प् छाहद । ऐन परस्मेर मगरन
3 कि कुर नी गो
ड्रच्ट्आकआओक
#+०( +५ | पक | + ४ कई । आआा।एर:
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बह, भेद्रघार निद्धि एड़ी है।
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५५ शिवलिइक्री स्थापना; उसके लक्षण ओर पूजनंकी विधिका वर्णन #
३७
जो मनुप्य भगवान् शिवके लिये, फुलवाड़ी या
बगीचे आदि लगाता है तथा शिवके सेबाकायके लिये मन्दिरमें
बांट
झाड़ने-बुहारे_आदिकी व्यतखा करता हैः वह इस .पुण्य-
नस्यायकाऊ मापन. भाान- 3 उमा
“क्ष्रकी करके शित्रपद प्राप्त कर लेता हैं। भगवान शिवके
अ्लत्र है, उनमे भरे श्ज्ध्ग्हा
जी काशी आर्दि क्षेत्र ह। उनमे भक्तियवक् निशक्ष निव्रास
करे | वह जड) चेतन सभीको भोग ओर मोशज्ष देनेबराला
होता है। अतः विद्वान पुरुषको भगव्रान् झित्रके क्षेत्र
आमरण नित्रास कप्ना चाहिये | पुण्यक्षेत्रँ खित्र बावड़ीः
कुओं आर पोखरे आदिकों शिवाड्ा समशझ्नना चाहिये ।
भगंत्रान् शिवक्रा ऐसा ही वचय है | वहाँ :स्ाव, दान और
जय करके मनुष्य भगप्रान् झित्रक्ी प्राप्त कर लेता है।
अतः मृत्युपयन्त शिवक्ते क्षेत्रका आश्रय लेकर रहना चाहिये |
जो शिबके क्षेत्रभ अपने किसी मृत सम्बन्धीका दाह) दर्याह:
मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकण अथवा वार्पिक श्राद्ध करता
हैं अथवा कभी भी शझिवके क्षेत्र्म अपने पितरोंकों पिण्ड
देता है; वह तत्काल सब पापोसे मुक्त हो जाता और अन््तमें
शिवपद पाता है | अयत्रा शित्रके क्षेत्र सात) पाँच; “तीन
या. एक ही रात निव्रास कर ले | ऐसा करनेते भी क्रमशः
शिवपदकी प्राप्ति होती है | .
लोक अपने-अपने वर्णके अनुरूप सदाचारका पालन
करनेसे भी मनुष्य शिवपदको प्राप्त कर लेता है। वर्णानु-
कूल आचरणसे तथा भक्तिभावसे वह अपने सत्कमंका अतिशय
फल पाता हैं; कामनावूवक किये हुए अपने कर्मके अभी£
फलको ज्ञीत्र ही पा लेता दे | निष्काममात्रसे क्रिया हुआ
साय कर्म साज्षात् झिव्रपदकी प्रासे ऋरानेत्राद्ा होता हैं ।
दिनके तीन विभाग होते है--प्रात:; मध्याद ओर सायाह |
इन तीनोंमे क्रमशः एक-एक प्रकारके कर्का सम्पादन किया
जाता है। प्रात-कालफों शाखत्रविद्िित निश्यक्मफ्े अनप्रानक्ा
ससय जानना चाहँये। मच्याट्ऋल सकाम कमके लिये
उपयोगी टैँ तथा खार्यकाल दान्विन्कर्मक्क उपय॒ुन्त £ ऐसा
जानना चाय | इसी थकार रािय भी समयहा बिभानत
किया गया है। शान चार प्रटरा/मंे
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हर युक्त होनेपर उसे “द्विज कहते हैं । जिसमें सल्पमात्रार्मे
ही आचारका पालन देखा जाता है; जिसने वेदाध्ययन भी
बहुत कम किया है तथा जो राजाका सेवक ( पुरोहित) मन्न्री
आदि ) है; उसे ५«क्षत्रिय-आ्राह्मण” कहते हैं? । जो ब्राह्मण
कृषि तथा वाणिज्य कर्म करनेवाला है और कुछ-कुछ
ज्रान््मणोचित आचारका भी पालन करता है, वह “वेश्य-आहण?
है तथा जो खयं ही खेत जोतता ( हल चलाता ) है; उसे
थ्षूद्ध-त्राह्मण” कहा गया है। जो दूसरोंके दोष देखनेवाला
आर पररोही है; उसे “चाण्डाल-ह्विज” कहते हैँ | इसी तरह
क्षत्रियोंमें भी जो प्रथ्वीका पालन करता है; वह “राजा? है ।
दूसरे छोग राजत्वहीन क्षत्रिय माने गये हैं । वैश्योंमें भी
जो घान्य आदि वस्तुआका क्रय-विक्रय करता है; वह “वैश्य?
कहलाता है । दूसरोंको 'वणिक्! कहते हैं। जो ब्राह्मणों,
कत्रियाँ तथा वेश्योंकी सेवामें लगा रहता है; वही वास्तवमें
्यूद्रः कहलाता है। जो झ्रूद्र हर जोतनेका काम करता
: है, उसे ध्यूघछ? समझना चाहिये | सेवा, शिल्प ओर कर्षणसे
सि्न वृत्तिका आश्रय लेनेवाले शूद्र “दस्युः कहंलाते हैं ।
इन सभी वर्णोके मनुष्योंको चाहिये कि वे ब्राह्म मुहूतेमें
उठकर पूर्वाभिमुख हो सबसे पहले देवताओंका; फिर
चर्मका3 अर्थका3 उसकी प्राप्तिके लिये उठाये जानेवाले
नलेशोॉका तथा आय ओर व्ययका भी चिन्तन करें |
रातके पिछले पहरको उष्रःकाल जानना चाहिये | उस
अन्तिम प्रहरका जो आधघा या मध्यभाग है; उसे संधि कहते हैं।
उस संघिकालमे उठकर टह्विजको मल्मूत्र आदिका त्याग
करना चाहिये । घरसे दूर जाकर वाहरसे अपने शरीरको ढके
र खकर दिनमें उत्तराभिमुख बेठकर मल-मृत्रका त्याग करे। यदि
उच्तराभिमुख बेठनेमें कोई रुकावट हो तो दूसरी दिशाकी ओर मुख
करके बैठे | जल) अग्निः ब्राह्मण आदि तथा देवताओंका सामना
बचाकर बैठे | मल त्याग करके उठनेपर फिर उस मलको
न देखे । तदनन्तर जलाशयसे बाहर निकाले हुए; जल्से ही
गुदाकी झुद्धि करे अथवा देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंके
ठीथोंमें उतरे बिना द्वी प्राप्त हुए जल्से शुद्धि करनी
न्वाहिये। गुदामें सात) पॉच या तीन बार मिट्टी लगाकर उसे
घोकर शुद्ध करे । लिड्गमें ककोड़ेके फलके वरावर मिट्टी लेकर
लगाये और उसे घो दे। परंतु गुदामें लगानेके लिये एक पसर
मिद्टीकी आवश्यकता होती है । लिड्र ओर गुदाकी शुद्धिके
- पश्चात् उठकर अन्यत्र जाय ओर हाथ-पे रोंकी झुद्धि करके आठ
बार कुल्ला करे। जिस किसी वृक्षके पत्तेसे अथवा उसके
स् ज्ञात म
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# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #:
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाड
02533 अल अप 42 8 अब कप लय 3०न2 जाल यम यायमथक-००< या क+5> पलक ४ जम बल
पतले काएसे जलके बाहर दतुअन करना चाहिये.। उम
समय तजेनी अंगुलिका उपग्रोग न करे । यह दन्त:शुद्धिक्र
विधान बताया गया है | तदनन्तर जल-समस्ी
देवताओंको नमस्कार करके मन्त्रगाठ करते हुए. जलाग्रयं
ने करे | यदि कण्ठतक् या कमरतक पानी खड़े होनेगी
शक्ति न हो तो घुव्नेतक जल्मं खड़ा हो अपने ऊपर यद्ध
छिड़ककर मन्त्रोचचाणपूर्वक स्नान-कार्य सम्पन्न करे |
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वहाँ तीर्थजलसे देवता आदिकि
सस््नानाड्र-तपंग भी करे |
इसके बाद धोतवस्र लेकर पाँच कच्छ करके उसे
धारण करे। साथ ही कोई उत्तरीय भी धारण कर लें; क्योंकि
संध्या-वन्दन आदि सभी कमोंमं उसकी आवश्यकंता होती
है। नदी आदि तीथ?मे स्नान करनेपर स्तान-सम्बन्धी उतारे
हुए वस्त्रकों वहाँ न धोये । स्नानके पश्चात् विद्वान पुरुष
भीगे हुए! उस बस््रको बावड़ीमें, कु्ँके पास अथवा घर
आदियमें ले जाय और वहाँ पत्थरपर,. लकड़ी आदिपर) जलमें
या स्थलमें अच्छी तरह धोकर उस वस्त्रको निचोड़े ।
द्विजो ! वस्नकी निचोड़नेसे जो जल गिरता है, वह एक
श्रेणीके पितरोंकी तृत्तिके लिये होता है | इसके बाद जावालि
उपनिबदर्म) बताये गये “अग्निरिति? मन्त्रसे भस्म लेकर
उसके द्वारा त्रिपुण्ड़ लगाये# ।
“7 & जावाहि-उपनिषद्मं भस-बारणकी विधि इस ढप्रकर
कही गयी हब
(3० अप्िरिति भस्म वायुरिति भस्त व्योगेति भस्म
भस्स स्थलमिति भस्म! इस मन्जसे भस्मकों अमिमन्त्रित करे।
'मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोघु माने
अद्वेघु रीरिप: | मा नो वीरात्रुद्र मामिनो वर्धीह॑विधन्तः |
सदमित्त्ता हवामहे” ॥
इस मन्त्रसे उठाकर जलसे मले, तत्पश्चात्
ज्यायुव॑ जमदग्ने: कश्यपस्थ ज्यायुपम् ।
यद्देवेष ज्यायुतं तन्नोष्स्तु न्यायुपम ॥!
श्त्यादि मन्त्रते मस्तक) ललाट, वकश्ष:स्थल और कंपोर।
त्रियुण्ड़ू करे | जी 4
ज्यायुब॑ जमदस्ने: करयपत्य ज्यायुपम् | ४
यददेवेपु ज्यायुष॑ तन्नोब्सु च्यायुपन ७ | |
तथा--- मै
ध्यम्बकक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । हर
उवोर्कमिव वन्धनान्मृत्योसक्षीय मासृतात् ॥! ड
“-श्नदोनों मन्त्रोंकी तीन-तीन वार पढ़ते हुए तीन रेखाएँ सींचे !
विधेश्वरसंहिता ]
व््ः<2<5क:्चबइ ्ॉकसअ2अ&इर्इ्2२३>इि इड्ड््ररश>>2खख्च्च्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्यय्य्य्य्च्य्य्य्य्ल््ख्य्चचचय्य्य्य्य्य्य्य्य्थ्य्चससस्स्स्स्स्सति
इस विधिका पाल्म न किया जाय; इसके पूर्व ही यदि जलमें
भस्म गिर जाय तो गिरानेब्राढा नरकमें जाता है । “आपो हि प्रा?
इत्यादि मन्त्रसे पाप-शान्तिके लिये सिरपर जल छिड़के तथा
ध्यत्य क्षयायः इस मन्त्रको पदकर पेरपर जल छिड़के | इसे
संधिप्रोश्षणम कहते हैं । “आपो हि पट? इत्यादि मन्त्र तीन
क्रचाएँ ६ और प्रत्येक ऋचार्म गायत्री छन््दके तीन-तीन
चरण हैं| इनमेंसे प्रथम ऋचाके तीन चरणोंका पाठ करते
हुए क्रमशः पैर; मस्तक और हृदबमं जछ छिड़के । दूसरी
क्रचाके तीन चरणाको पदकर क्रमशः मस्तक) हृदय ओर पैरमें
जल छिड़के तथा तीसरी ऋचाके तीन चरणोंका पाठ करते
हुए क्रमशः हृदय, पेर और मस्तकका जल्से प्रोश्षण करे ।
“से विद्वान पुरुष ध्मन्त्र्तना! सानते हैँ। किसी अपवित्र
स्तुसे क्रिंचित्ू स्पर्श हो जानिपर। अपना खांस्थ्य टीक न
इनेपर। राजा ओर राष्ट्र भर उपसित होनेपर तथा
॥_त्रकालम जलकी उपलब्धि न होनेक्री विवशता आ जानेपर
गन्व-सान! करना चाहिये। प्रातःकाल ध्सूयंश्र मा सन्युश्र?
त्यादि सूर्यानुबाकसे तथा सायंकाल 'अम्निश्र मा मन्युश्र!
ज्यादि अग्नि-समन्धी अनुवाकसी जलका आच्मन करके
पुन: जलसे अपने अड्जोंका प्रीक्षण करे। मध्याहकालम भी
'आप; पुनन्तु! इस मम्त्रसे आचमन करके पृवबत्त प्रोक्षण
प्रा माजंन करना चाहिये।
प्रातःकालकी संध्योपासनाम गायत्री मन्त्रका जब करके
तीन बार ऊपरकी ओर सूर्यदेवकों अध्य॑ देने चाहिये।
प्रात | मध्याहकालमे गायत्री मन््त्रके उच्चारणपूचक सू्को
एक ही अध्य देना चादिये | फिर सायंक्राल आनेपर पश्चिमकी
ओर मगुत्र करके वेट जाय और प्रष्वीपर ही सूर्यके लिये
वष्य ६ ( ऊपरकी ओर नहीं )। प्रातःकाल और मध्याद्रके
समय अज्ञहिमं अप्यजड लेकर अंगुल्ियोंकी ओरसे
सूतदेयक लिये अप्य दे | फिर अंगुलियोंके छिद्रसे दलते
एए सपकों देसे । तथा उसके छिये स्वतः प्रदक्षिणा करके
दीझ स्गासमन कर । सायंकाटर्स सूनोलसे दो घड़ी पहले
मे ६ रूपा निष्प्ट एती | क्योंकि बह साथ संध्याका
पेय नहीं हू। ढटीझऋ ससयइर संध्या बरी चाहिये; ऐसी
श्री आजा ऐ। यदि संप्यादसमा हिये दिना दिन दीत
हें हे प्रय्फ शमयोहे ह्िद्े झा प्रायधित्त ऋूता
४ दीते एए संप्यागाद
१4४
की न
9 ७ आधाषणाक चना उसका
ने। गमपरा ऋआधरा
४६ सदाचार, शोचाचार, समान) भस्मधारण: संध्यावन्दन आदिकी विधि 5६
।> 44
बीत जाय तो उसके प्रायश्वित्तरूपमें एक छाख .मायन्नीका
जप करना चाहिये | बदि एक मासतक नित्यकर्म छूट जाय
तो पुनः अपना उपनयन-संस्कार कराये |
अधथसिद्धिके लिये ईशा, गारी; कातिकेय) विष्णु) ब्रह्मा
चन्द्रमा ओर यमक्रा तथा ऐसे ही अन्य देवताओंका भी
झुद्ध जंलसे त्पण करे। फिर तर्पण कर्मको ब्रह्मापंण करके
शुद्ध आचमन करे ।तीर्थक्रे दक्षिण प्रशस्त मठमें। मन्त्रालयमें,
देवाल्यमें, घरम अथवा अन्य क्रिसी नियत खानमें आसनपर
खिरतापूरवक्र वेठकर विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धिकों स्थिर करे
ओर सम्ूर्ण देवताओंको नमस्कार करके पहले प्रगवका जप
करनेके पश्चात् गायत्री मन्त्रकी आवृत्ति करे। प्रणवक्के “अ?५
“3? ओर थम! इन तीनों अक्षरोंसे जीव ओर ब्ह्मकी
एकताका प्रतियादन होता है--इस बातको जानकर प्रणत्र
( 3» ) का जय करना चाहिये। जपकालमें यह भावना
करनी चाहिये कि “हम तीनों लोकॉकी सश्टि करनेवाले ब्रह्मा:
पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्रकी ---जो खय॑
प्रकाश चिन्मय ह--उपासना करते हैं | यह ब्रह्मसरूप ऑकार
मनन ५-9७. अपन अनाथ. अ+
हमारी कर्मेन्द्रय)ं ओर जश्ञानेद्धियोंकी बृत्तियोंको, मनकी
_वृत्तियों की तथा बुद्धि-बत्तियों को सदा भोग ओर मोक्ष प्रदान
करनेवाले धर्म एवं ज्ञानकी ओर प्रेरित करे ।? प्रणबके इस
अथंका बुद्धिके द्वारा चिन्तन करता हुआ जो इसका जब
करता हूँ; वह निश्चय ही ब्रह्मकी प्रात्त कर लेता हे । अथवा
अधानसंधानके बिना भी प्रणवका नित्य जप करना नयाहिये ।
इससे ध्वाह्मणत्वकी पूर्ति? द्वोती हैँ । ब्राह्मणलकी पूरततिके
लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणफोीं प्रतिदिन प्रातःफाल एक सहसत गायत्री
सनन्त्रका जम करना चाहिये | मध्याह्ककालम सो बार आर
सायंकालर्म अद्टाईस बार जपकी विधि अन्य वे
लोगोंकी अथ्ात् क्षत्रिय ओर बच्यकों तीनों संध्या्क्ति समय
यधथासाध्य गायची-जप करना चाहिये ।
टरीरके भीतर मृच्यवार; स्वाधधणन; मगिपर; अनादहत
आशा ओर सहआार-नये छः चक्र ह। इनर्म मृल्रधारस लेझर
सहस्तारतकः छर्ट स्थानों प्रमण:ः वियेश्व
2 ल्टर। 242* हल
स्वत हू । एन
स्वर्म ऋध्यवर्धि
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4६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
[ सप्चिप्त-शिवपुराणाड
3 नमनना “न पा." मम“ पटना “३७९००... * *पमाहाक०..गिापान--म पदक न्नपाल्म+* ५ नपोपाझा..+धााना+निकन कक कप आम. परकानम कन्सा,
पर्यन्त तत्वोंसे बना हुआ जो शरीर है। ऐसे सहस्तों शरीरोंका
एक-एक अजपा गायत्रीके जपसे एक-एकके क्रमसे अतिक्रमण
करके जीवको धीरे-धीरे परमात्मासे संयुक्त करे | यह जपका
'तत््व बताया गया है| सो अथवा अद्दाईस मन्त्रोंके जपसे उतने
ही शरीरोंका अतिक्रमण होता है | इस प्रकार जो मनन््त्रोंका जप
है, इसीको आदिक्रमसे वास्तविक जप जानना चाहिये | सहसत
बार किया हुआ जप ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला होता है;
ऐसा जानना चाहिये | सो बार किया हुआ जप इन्द्रपदकी
ः ग्राप्ति करनेवाला माना गया है। ब्राह्मणेतर पुरुष आत्मरक्षाक्े
लिये जो स्वल्पमात्रामें जप करता है; वह ब्राह्मणके कुलमें
जन्म लेता है । प्रतिदिन सूर्यापस्थान करके उपयुक्तरूपसे जप-
का अनुष्ठान करना चाहिये | बारह लाख गायत्रीका जप
करनेवाला पुरुष पूर्णूपसे “ब्राह्मण कहा गया है। जिस
त्राह्मणने एक लाख गायत्रीका भी जप न किया हो$ उसे
वैदिक कार्यमें न लगाये | सत्तर वर्षकी अवस्थातक नियम-
पालनपू्वक कार्य करे | इसके बाद ग्रह त्यागकर संन्यास ले
ले । परिब्राजक या संन्यासी पुरुष नित्य प्रातःकाल बारह हजार
प्रणयका जप करे | यदि एक दिन इस नियमका उल्ल्ठन
हो जाय तो दूसरे दिन उसके बदलेमें उतना मन्त्र ओर अधिक
जपना चाहिये और सदा इस प्रकार जपको चलछानेका प्रयत्ञ
करना चाहिये | यदि क्रमशः एक मास आदिका उल्लड्ृडन
हो गया तो डेढ़ छाख जप करके उसका प्रायश्रित्त करना
चाहिये | इससे अधिक समयतक नियमका उल्लड्डन हो जाय
तो पुनः नये सिरेसे शुरुसे नियम ग्रहण कंरे। ऐसा करनेसे
दोपोंकी शान्ति होती हैं, अन्यथा वह रौरव मरकमें जाता है |
जो सकाम भावनासे युक्त गहस्थ ब्राह्मण है; उसीक्रो धर्म तथा
अर्थके लिये यज्ञ करना चाहिये | मुमुक्षु ब्राह्मणको तो सदा
ज्ञानका ही.अम्यास करना चाहिये | धमसे अर्थकी प्राप्ति होती
है; अर्थ भोग सुलम होता है | फिर उस भोगसे वेराग्यकी
सम्भावना होती है । घर्ममूवक उपाजित धनसे जो भोग प्राप्त
मा मत,
होता है; उससे एक दिन अवश्य वराग्यका उदय होता
व्न््चिि्िनीणानज__्घ्ए्यय््ीा-तत..........................
_धर्मके विपरीत अधमसे उपाजित हुए. घनके छारा जो भोग
प्राप्त होता है; उससे भोगेकि प्रति आसक्ति उत्न्न होती
2० 86 2.00 880 ह
मनुप्य धमस घन पाता हैं; तपस्यासे उसे दिव्यरूपकी प्रामि
होती है । कामनाओंका त्याग करनेवाले पुरुपके अन्तःकरणकी
युद्धि होती है | उस झुद्धिसे ज्ञान उदय होता हैं, इसमें
संशय नहीं है ।
सत्ययुग आदिम तपको ही प्रशस्त कहा गया है; हि
कलियुग द्र॒व्यसाथ्य धर्म ( दान आदि ) अच्छा माना गब
है। सत्ययुगरम ध्यानसे, त्रेतामं तपस्थासे ओर द्वापरमें यर
करनेसे ज्ञानकी सिद्धि होती है। परंतु कल्युगर्म प्रतिम
( भगवहिय्ह ) की पूजासे ज्ञानलाभ होता दे । अब
हिंसा ( ढुःख ) रुप है और धर्म सुखरूप है | अधमसे मनुए
*ख पाता है ओर घमसे वह सुख एवं अम्युदयका भाएं
होता है । दुराचारसे दुःख प्राप्त होता है ओर सदाचाएं
सुख । अतः भोग ओर मोक्षकी सिद्धिके लिये धर्मका उपा
करना चाहिये | जिसके घरमें कम-से-क्रम चार मनुष्य है
ऐसे कुट्ठम्त्री ब्राह्मणकों जो सो वर्षके लिये जीविका ( जीवन
निवाहकी सामग्री ) देता है; उसके लिये वह दान ब्रह्मलोकः
प्राप्ति करानेवाल्ा होता है। एक सहसख्न चान्द्रायण ब्रतः
अनुष्ठान ब्रह्मलेकदायक माना गया हैं। जो ज्नत्रिय ए
सहख कुटम्बको जीविका ओर आवास देता है, उसका वह क
इन्द्रतोककी प्राप्ति करानेवाला होता है | दस हजार कुटुम्बों
दिया हुआ आश्रय-दान ब्रह्मलोक प्रदान करता है| दाः
पुरुष जिस देवताको सामने रखकर दान करता है अर्थात् व
दानके द्वारा जिस देवताको प्रसन्न करना चाहता है, उसी#
लोक उसे प्रात्त होता है--बह बात वेदवेत्ता पुरुष अर्छ
तरह जानते हैं | धन-हीन पुरुष सदा तपस्थाका उपाजंन करे
क्योंकि तपस्या ओर तीर्थसेवनसे अक्षय सुख पाकर मनुण
उसका उपभोग करता है |
अब में न्यायतः घनके उपाजनकी विधि बता रहा हूँ।
ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा सावधान रहकर विशुद्ध प्रतिग्र
( दान-ग्रहण ) तथा याजन ( यज्ञ कराने ) आदिसे घनदु
अजेन करे | वह इसके लिये कहीं दीनता न दिखाये और 7
अत्यन्त क्लेशदायक कर्म ही करे | क्षत्रिय बाहुबलसे घना
उपाज॑न करे आर वंध्य कृषि एवं गोरक्षासे | न्यायोपारनं
धघनका दान करनेसे दाताकों ज्ञानकी सिद्धि प्राप्त होती है।
शानसिद्धिद्वारा सब पुरुषोंको गुरुकपा--सोक्षसिद्धि सुलम हो
है । मोक्षसे स्वरूपकी सिद्धि ( ब्रह्मरूपसे स्थिति ) प्राप्त हे
हैं, जिससे मुक्त पुरुष परमानन्दका अनुभव करता है। रह
पुरुषको चाहिये कि वह धन-घान्यादि सब वस्ठुओंका दा
करे | वह तृषा-निन्वत्तिके लिये जल तथा क्षुधारूपी रोग
शान्तिके लिये सदा अन्नका दान करे | खेत) धान्यः कि.
अन्न तथा भशक्ष्य, मोज्य, लेह्य और चोष्य--ये चार प्रद्ाए ;'
सिद्ध अन्न दान करने चाहिये | जिसके अजन्नको खाकर मठ
विद्येश्वरसंदहिता |]. #% अश्नियज्ष, देवयज्ञ ओर ब्रह्मययक्ष आदिका वर्णन $ ४३
मा लललल गान नमकीन जब की अमन मिकमदाका इक भााा माह आकर चश्मा का इगका्यभायमकाभ कम पक आयात 5 077४ शएरण्॥॥््७७्ल्रए््७७७््ए्ल्॥७ए्र्ा॥षक्ाणाारणीभकरशराशशशश् रा
जबतक कथा-अ्रवण आदि सद्धर्मका पालन करता है, उतने
समयतक उसके किये हुए पुण्यफलका आधा भाग दाताको
मिल जाता है--इसमें संशय नहीं है | दान लेनेवाला पुरुष
| डानमें प्राप्त हुई वसस््तुका दान तथा तपस्या करके अपने प्रति-
. हजनित पापकी झुद्धि कर ले | अन्यथा उसे रोरव नस्कमें
रना पढ़ता है | अपने धनक्रे तीन भाग करे--एक भाग धर्मके
डेये, दूसरा भाग ब्रद्धिकरे लिये तथा तीसरा भाग अपने उप-
गेगक्रे लिये | नित्य, नमित्तिक ओर काम्य--ये तीनों प्रकारके
में धर्मार्थ खखे हुए घनसे करे | साधकरको चाहिये कि वह
दिके लिये रखे हुए धनसे ऐसा व्यापार करे; जिससे उस
नी ब्रद्धि हो तथा उपमोगके लिये रक्षित धनसे हितकारक:
रिमित एवं पवित्र भोग भोगे । खेतीसे पेदा किये हुए घनका
(स्वों अंदर दान कर दे | इससे पापकी शुद्धि होती है | शेप
नसे धर्म, ब्रृद्धि एवं उपभोग करे; अन्यथा बह रोर् नरकमें
इता है अथवा उसकी बुद्धि पापपूर्ण हो जाती है या खेती
) चापट हो जाती है । इद्धिके लिये किये गये व्यापारमे प्राम
[ए पनवा ठठा भाग दान कर देने योग्य दे | बुद्धिमान पुरुष
पश्य उसका दान कर दे ।
#/#४#+ "री गदूदा+मी न हुडण/म पाप न्इह# पिया का मदद" ह> मद पहाहा* "रद #०गपाड़नगगग."
विद्वानक्रों चाहिये कि वह दूसरोंके दोषोंका बखान न
प्राणियोंके हृदयमें रोप पेदा करनेवाली हो । ऐस्वयेकी सिद्धिके
लिये दोनों संध्याओंके समय अगनिदोत्रकम अवश्य करे | जो
दोनों समय अगिहोत्र करनेमें असमर्थ हो, वह एक ही समय
सूर्य ओर अग्निको विधिपूर्वक दी हुई आहुतिसे संतुष्ट करे ।
चावल, धान्य) घी, फल कंद तथा हृविप्य--इनके द्वारा
विधिपूर्वक स्थालीपाक बनाये तथा यथोचित रीतिसे सूर्य ओर
अग्निको अर्पित करें| यदि हृविप्यका अभाव हो तो अ्धान
होममात्र करे । सदा सुरक्षित रहनेवाली अभिको विद्वान पुरुष
अजखकी संशा देते हैँ | अथवा संध्याकालमें जपमात्र या सूये-
की वन्दनामात्र कर ले। आत्मशानकी इच्छावाले तथा धनाथथी
पुरुषेकोीं भी इस प्रकार विधिवत् उपासना करनी चाहिये |
जो सदा ब्रह्मयज्ञमं तत्पर होते हैँ; देवताओंकी पूजाम लगे
रहते है, नित्य अम्रिपूजा एवं गुरुपूजाम अनुरक्त दोते हैँ तथा
ब्राह्यणोंको ठम किया करने हैं; वे सब्र छोग स्वरगलोकके भागी
होते हूँ । ,. ( अध्याय १३ )
!
अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और त्रक्षयज्ञ आदका वर्गत, भगवान् शिवक छारा साता वाराका नि्मोण तथा
उनमे देवाराधनसे विभिन्न ग्रकारके फलोंकी प्राप्तिका कथन
न् दर.
| पंटपियोत्ति कहा--प्रमो ! अभियश, देवयज्) ब्रद्यायश)
/पज्त तगा ब्रछ्तृप्तिका हमारे समक्ष ऋरमदः वर्णन कीजिये |
ए कक शु ०
, , तेजी बोले-महर्पियों ! गहस्थ पुरुष अभिमे
पार आर प्रात:काल जो बावरू आदि द्व्यकी आहति
गे ७) उसीके अभियज्ञ कदते हें | जो बअद्मचर्य आश्रभमें
ुत ७ उन सहनारयाबदा लिये पसिधाका आधान हा
पिए्स है। ये समिया झा ही अभिम फर | ब्राह्मणों !
मगर आए गर्म निवास बरनेदाडे दिलोंगा जवबतक विवाह
है जाप आर ये थोरामनामिददी प्रतिण ने ऋर हें, तबतद
(पे; लिये अशभ्िमे सामधादा आहाते| मत आदिया पालन
8 दिद्च एन जे ट्त तल्य हूं (गा उन रिय
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८ गण्श है ) । ७) ' छिर सके
४ न 9. दर आप २११३ के] रन ! दृ
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+ * 09% रु चर १7२ | हर हर स् चक-+>मया-. #य।
भोजन कर छे | ब्राह्मणों | साथंकाल अगिके ट्यि दी हुई
आहुति सम्पत्ति प्रदान करनेबाली होती ४, ऐसा जानना
चाहिये ओर प्रातःकाल सूचदेवकी दी हुई आहुति आयुकी
व्रद्धि करनेवाली होती है; व बान अच्छी तरद समझ छेनी
चाहिये | दिनमें अभिदेव सूयमे ही प्रचिष्ठ हो जते है | अन;
प्रातःछाल सूयको दी हुई आहति भी अमिवनके ही अन्तगंत
# | इस प्रकार बह अशैयतशका बन किया गया
सम +-नक,
। | वन 25 किलर मय दिख हट हि उ्म है. हे
न्द्र आदि सम देः 3544 अ्च|यस ओआग़गभग है
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लाहुति वी जातो है, उसे देवदश समझना चाहिये । ख्थतीपाझ
ड्ज्का न न
आह कक प्र अनिल के सानरा ककांन्मक ब् अफक 9 के.
आदे पशाकों देवयज ही सामना चाटिग | हाय तय
कु ० आल ज्त कप सहात्रग हम 2 2
लतिटते ऊ कि लि कस कलर हत्रारन सर हयनवखामभ ।
नस
टक053 मी च्् रू हज कक ख्याकन छा न
इन भी देशखयशने ही अन्यगत शानमा साहिय ।वव हऋ्
ब््गा:क 3 ई 5 का ० _ २ अर
पद 5 30 ही अप | तब ट्र्शा ज्३ ह््य् ले, ८४7५ टेफ्शबपाएः
का ।
“प्री ह । *
न है ढ़
|
करे | ब्राह्मणो | दोषबश दूसरोंके सुने या देखे हुए. छिद्गको
भी प्रकट न करे | विद्वान पुरुष ऐसी बात न कहे, जो समस्त
3७
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने १:
[ संश्षिप्त-शिवपुराणाड
नित्यकर्मके अनन्तर सायंक्राउत्क ब्रह्मययज्ञ किया जा सकता
है । उसके बाद रातमें इसका विधान नहीं है |
अम्निक्रे बिना देवंयज्ञ केसे सम्पन्न होता है, इसे तुमलोग
श्रद्धांसे और आदरपूर्वक सुनो | सश्टिके आरम्भमें सर्वज्ञ) दयाल
ओर सर्वसमर्थ महादेवजीने समस्त लोकोंके उपकारके लिये
वारोंकी कल्पना की | वे भगवान् शिव संप्ताररूपी रोगको दूर
करनेके लिये वेच्य हैं | सबके श्ञाता तथा समस्त ओबधोंके भी
ओषध हैं | उन भगवानने पहले अपने बारकी कल्पना की; जो
आरोग्य प्रदान करनेवाला है। तत्पश्चात् अपनी मायाशक्तिका वार
बनाया; जो सम्पत्ति प्रदान करनेबाछा है | जन्मकालमें दुर्गति-
ग्रस्त बाढ़ककी रक्षाके लिये उन्होंने कुमारके वारकी कल्पना
की । तत्पश्रात् सर्वसमर्थ महादेवजीने आलस्य ओर पापकी
निवृत्ति तथा समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे लोकरक्षक
भगवान् विष्णुका वार बनाया । इसके बाद सबके स्वामी
भगवान् शिवने पुष्टि ओर रक्षाके लिये आयुःकर्ता त्रित्येक-
खश परमेष्ठी ब्ह्माका आयुष्कारक वार बनाया; जिससे सम्पूर्ण
जगतके आयुष्यकी सिद्धि हो सके । इसके बाद तीनों लछोकोंकी
बृद्धिके लिये पहले पुण्य-पापकी रचना हो जानेपर उनके करने-
वाले लोगोंको शुभाशुभ फल देनेके लिये भगवान् शिवने इन्द्र
और यमके वार्रोका निर्माण किया । ये दोनों वार क्रमशः भोग
देनेवाले तथा लोगोंके मत्युभयकों दूर करनेवाले हैं | इसके
बाद सूर्य आदि सात ग्रहोंको, जो अपने ह्वी खरूपभूत तथा
ग्राणियोंके लिये सुख-दुःखके सूचक हैं; भगवान् शिवने
उपयुक्त सात वारोंका स्वामी निश्चित किया । वे सब-के-सब ग्रह-
नक्षत्रोंके ज्योतिर्मय मंण्डल्में प्रतिष्ठित हैं ( शिवके वार या दिन-
के स्वामी सुर्य हैं | शक्तिसम्बन्धी वारके स्वामी सोम हैं | कुमार-
सम्बन्धी दिनके अधिपति मज्जल हैं । विष्णुवारके स्वामी बुध हैं ।
व्रह्माजीके वारके अधिपति बृहस्पति हैं | इन्द्रवारके खामी
सूर्य और यमवारके स्वामी शनेश्वर हैं| अपने-अपने वारमें
की हुई उन देवताओंकी पूजा उनके अपने-अपने फलको
देनेवाली होती है ।
सूर्य आरोग्यके ओर चन्द्रमा सम्पत्तिके दाता हैं ।
मद्नलल व्याधियोंका निवारण करते हैं, बुध पुष्टि देते हैं
चृहस्पति आयुको वृद्धि करते हैं। शुक्र भोग देते हैं और
शनेश्वर मत्युका निवारण करते हैं। ये सात वारोंके क्रमश:
फल बताये गये हैं, जो उन-डन देवताओंकी प्रीतिसे प्राप्त होते
हैं । अन्य देवताओंकी भी पूजाका फल देनेवाले भगवान् शिव
मा
ऊ
१६
का हे
अन्नम्क
ही हैं | देवताअकी प्रसन्नताके लिये पूजाकी पाँच प्रकाज़ी
ही पद्धति बनायी गयी दे । उन-उन देवताओंके मन्त्रोंका जा
यह पहला प्रकार है। उनके लिये होम करना दूसरा द्वत
करना तीसरा तथा तप करना चौथा प्रकार है। किय्ती वेदीपए
प्रतिमामं; अग्रिम अथवा ब्राह्मणके छरीरमें आराध्य देवताड़
भावना करके सोलह उपचारोंसे उनकी पूजा या आग्पन
करना पॉँच्ताँ प्रकार है |
इनमे पूजाक़े उत्तरोत्तर आधार श्रेष्ठ दँ | पूर्व यू
अमभावमें उत्तगेत्तर आधारका अवल्म्बन करना चाहिये | दोने
नेत्रों तथा मस्तकके रोगम ओर कुछ रोगकी शात्तिक
लिये भगवान् सूर्यक्री पूजा करके ब्राह्मणोंकी भोजन कराये।
तदनन्तर एक दिन) एक मास) एक वर्ष अथवा तीन वर्षत
लगातार ऐसा साधन करना चाहिये । इससे यदि प्रवः
प्रारूघका निर्माण हो जाय तो रोग एवं जरा आदि रोगग
नाश हो जाता है | इश्देवके नाममन्त्रोंका जप आदि साकः
वार आदिके अनुसार फल देते हैं | रविवारको कि हि
अन्य देवताओंके लिये तथा ब्राह्मगोंके लिये विशिष्ट.
अर्पित करे । यह साधन विशिष्ट फल देनेवाला होता है
इसके द्वारा विशेषरूपसे पापोंकी शान्ति होती है |
विद्वान् पुरुष सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये रूक्ष्मी आदिकी [7
करे तथा सपत्नीक ब्राह्मणोंकी घृतपक्क अन्नका भोजन कराये।
मद्जल्वारकी रोगोंकी शान्तिके ल्यि काली आदिकी पूजा
तथा उड़द, मूँग एवं अरहरकी दाह आदिसे युक्त अं,
ब्राक्मणोंकी भोजन कराये । बुधवारको विद्वान् पुरुष <१३-
अन्नसे भगवान् विष्णुका पूजन करे | ऐसा करनेसे सदा 3. .
मित्र ओर कलत्र आदिकी पुष्टि होती है। जो दीघ्घोयु हो".
इच्छा रखता हो, वह भुख्वारकों देवताओंकी पुश्टिके
वर्त्र, यज्ञोपवीत तथा घृतमिश्रित खीरसे यजन-यूजन को,
भोगोंकी प्राप्तिके लिये श॒ुक्रवारको एकाग्रचित्त होकर ९. .(४
पूजन करे और ब्राह्मणोंकी तृप्तिके लिये षड रस युक्त अन्न ६
इसी प्रकार स्ल्रियोंकी प्रसन्नताके लिये सुन्दर वस््रा भा
विधान करे | शनेश्वर अपमृत्युका निवारण करनेवाल ६
उस दिन बुद्धिमान् पुरुष रुद्र आदिकी पूजा करे |
होमसे, दानसे देवताओंको संतुद्ट करके ब्राह्मणोंकों तिलमि भू हे
अन्न भोजन कराये। जो इस तरह देवताओंकी पूजा करेगा. ..,
आरोग्य आदि फलका भागी होगा |
- देवताओंके नित्य-पूजन) विशेष पूजन; स्वान) दान *'
विद्येभ्वरसंहिता | .
# देश, काल, पात्र ओर दान आदिका विचार $
लिपि किकिलिल न टलिनदकिमिकि कमर लिमिट फिर कम पक ललित ियि दम नमी व तल ल. 3 ारमकया
>--.-.....--+>न्-्न््ल््लल्य्ल््॑य्य_्ं, ्व्य्स्य्स्््य्स्स््स््स्य्य्य्स्य्स्य्स्स्स्य्स्स्य्स्स्य्स्य्य्य्य्य्य्य््प््ञ--
दोम तथा ब्राक्षण-सर्पण आदिमें एवं रवि आदि वारोंमें विशेष
तिथि और नक्षत्रोका योग प्राप्त होनेपर विभिन्न देवताओंकि
पूजनमें सर्वक्ष जगदीश्वर भगवान् शिव ही उन-उन देवताओंकि
रूपमें पूजित हो सब छोगोंकों आरोग्य आदि फल प्रदान करते
ई | देदा, काल) पात्र) द्रव्य, श्रद्धा एवं ोकके अनुसार
उनके तारतम्य क्रमका ध्यान रखते हुए; महादेवजी आराधना
करनेवाले लोगोंको आरोग्य आदि फल देते है | शुभ ( मांगलिक
चर्म )के आरम्मर्मे ओर अगश्युभ ( अन्त्येष्टि आदि कर्म ) के
अन्तम तथा जन्म-नक्षत्रोंके आनेपर गृहस्थ पुरेष अपने घरम
आरेग्य आदिकी समृद्धिके लिये सूर्य आदि ग्रहोका पूजन
करे | इससे सिद्ध है कि देवताओंका यजन सम्पूर्ण अभीष्ठ
पस्तुओंको देनेबाल्ा है | ब्राह्मणोंका. देवयजन-कर्म वद्कि मन्त्रके
पाथ होना चाहिये | ( यहाँ ब्राह्मण-शब्द क्षत्रिय ओर वेश्यका
भी उपलक्षण है। ) झूद्ध आदि दूसरोंका देवयश तान्ब्रिक
विभिसे होना चाहिये | झुम फलकी इच्छा रखनेवाले मनुप्योंको
सातों ही दिन अपनी झक्तिके अनुसार सदा देवपूजन करना
चाहिये | निर्धन मनुप्य तपस्या ( ब्रत आदिके कष्ट-सहन )
द्वारा ओर धनी घनके द्वारा देवताओंकी आराधना करें | वह
वास्यवार श्रद्धापूर्वक इस तरहके धर्मका अनुष्ठान करता है ओर
बारंबार पुण्यल्ेकोमं नाना प्रकारके फल भोगकर पुनः इस
पृथ्ीपर जन्म ग्रहण करता है। घनवान् पुरुष सदा भोग-
सिद्धिके लिये मार्गमें इक्षादि लगाकर छोगेंके लिये छायाको
व्यव्था करे | जलाशय ( कँँआ। ब्रावली ओर पोखरे )
बनवाये | वेद-शात्तरोंकी प्रतिष्ठाके लिये पाठशाल्ाका निर्माण
करे तथा अन्यान्य प्रकारसे भी धर्मका संग्रह करता रहे।
धघनीको यह सब कार्य सदा ही करते रहना चाहिये ।
समयान॒सार पुण्यकर्मके परिपाकसे अन्तःकरण झुद्ध होनेपर
शानकी सिद्धि हो जाती है । द्विजो ! जो इस अध्यायको सुनता/
पढ़ता अथवा सुननेकी व्यवथ्था करता है; उसे देवयश्ञका फेक
प्राप्त होता है । ( अध्याय १४ )
नडपृल्च7 >प्साण: £2-ल अप +-+>न
देश, काल, पात्र ओर दान आदिका विचार
फ्रापियंने कहा--समस्त परदार्थेक्रे श्ाताओंमें श्रेष्ठ
सूतजी । अब आप क्रमश: देश-फकाल आदिका वर्णन करें ।
सूतजी बोले--महर्पियो | देवयश् आदि कमोमें अपना
शद यह समान फल देनेवाल्य होता है अर्थात् अपने धरमें
केये हुए, देववश आदि शास््रोक्त फलको सममात्रामें देनेवाले
शैते हैँ । मोशालाका स्थान घरकी अपेक्षा दसगुना फल देता
५ | जेदरायका तट उससे भी दसगुना महत्व रखता दूँ तथा
नह बेल) तुलसी एवं पीपलबृक्षका मूल निकट हो, वह खान
'हटाशयके तटसे भी दसगुना फल देनेवाल्य होता है ।
शैयाटयकों उससे भी दसगुने महत्वका स्थान जानना चाहिये ।
याटयसे भी दसगुना महत्व रखता है तीर्थथूमिका तट ।
ते दम्गुना सेष्र है नदीका किनारा । उससे दसगना
' स््ष् है तीपनदीदा तट और उससे भी दसगुना महत्व रखता
« अंग नामक नदियोंक्ा तीर्थ । गद्गा) योदावरी, कावेरी:
३ गगपर्यी, शिरएप 7 यू ओर नमंदा-हन सात नदियोक्नो
ह्गशी छण गए है। समुद्रझे तद्या खान इनसे भी दसगना
पे परप गण गया £ शोर परनरके शिसस्श प्रदेश समटसठ्से
( एन्गुया एण्म €। सबसे जपिफक भरच्यरा बट स्थान
रथ उडी सगे सगे झाय |
के
बताया जाता है--सत्ययुगर्म यज्ञ) दान आदि कम पूर्ण फल
देनेवाले होते हैं, ऐसा जानना चाहिये। ब्रेतायुगर्म उसका
तीन चौथाई फल मिलता है | द्वापरमं सदा आधे ही फलकी
प्राप्ति कही गयी है | कलियुग एक चोथाई ही फलकी प्राति
समझनी चाहिये ओर आधा कल्युग बीतनेपर उस चोथाई
फरलमेंसे भी एक चव॒र्थाश कम द्वो जाता है। शुद्ध अन्तः-
करणवाले पुरुषको शुद्ध एवं पवित्र दिन सम फल देनेवाला
होता है |
विद्वान ब्राह्मणों ! सूयय-संक्रान्तिके दिन किया हुआ
सनकम पूर्वोक्त शुद्ध दिनकी अपेक्षा दसगुमा फल देनेवाला
टीता हैं) यह जानना चाहिये। उससे भी दसगुना मदृत्व डस
कर्मका है; जो ब्रियव नामक योगमें किया जाता है| दक्षियायन
आरम्भ हनेके दिन अग्रात् ऋऋती संक्रान्तिम किये हुए
पस्वकसका सहत्य विदुयस भा दसगंना साना गया ४ | छझसस
बम अकल्न #ौ४ 4-२ क+ की बनी अ है फैल. >2फीमानओंओ ७-3... पओ-“कम्या मा “रन अअिलननम-ा-कागीन
दर ज्य 4 2 कह के फोन पटाध्यम-००-कै- ऋ टण ककानक ०6 कक. कक पुय पछ कट ४-ब००क
! « स्पीलपरर्+ सलदुसार बडे सबब जब लि यूथ दिपुय रेस्गरर
न
जज
रॉ
न के भर पु ब्क व्क
आर साई >् #ह करी हज ई+--+ हनण अ्च-चअ कु कनुक्राओ “१-० बम्ब ह प्र
परचरा र झा इन हआदथा रात दाना इशाबर हाल ॥ ।
जि गौ 00 | क्री की हि क्र
म्न्य हह चक्ज्क ह ॥4 # दान (कर कुल श्न्त््न्तूा ह--> जहा ० 9, अ्चकब्क कक जन क््न्त्क फफ हू. क्ड्रीनरि
क्र आप 53, पार) चल ०) ३ अर "मन ५ ० #7'५७
कक की जा चौँ हा
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+ भव ० ने हपप१ + 4 |
४८
अहणमें किये हुए! पुण्यका महत्त्व है | सूर्य ग्रहणका समय सबसे
उत्तम है। उसमें किये गये पुण्यकर्मका फछ चन्द्रअहणसे भी
अधिक ओर पूर्ण मात्रामें होता है, इस बातको विज्ञ पुरुष
जानते हैं । जगद्रूपी सूरयका राहुरूपी विषसे संयोग होता है;
इसलिये सूयग्रहणका समय रोग प्रदान करनेवाल्य है। अतः
उस विषकी शान्तिके छिये उस समय खस्लान। दान ओर
जप.करे । वह कार विष्रकी शझान्तिके लिये उपयोगी होनेके
कारण पुण्यप्रद माना गया है| जन्म-नक्षत्रके दिन तथा ब्रतकी
पूर्तिके दिनका समय सूयग्रहणके समान ही समझा जाता है ।
परत महापुरुषोंके सद्धका काल करोड़ों सूरयग्रहणके समान
पावन है, ऐसा शानी पुरुष जानते-मानते हैं ।
तपोनिष्ठ योगी ओर श्ाननिष्ठ यति--ये पूजाके पात्र हैं;
क्योंकि ये पापोंके नाशमें कारण होते हैं | जिसने चोबीस छाख
गायत्रीका जप कर लिया हो वह ब्राह्मण भी पूजाका उत्तम
पात्र है । वह सम्धूर्ण फर्ों ओर भोगोंको देनेमें समर्थ है । जो
पतनसे त्राण करता अर्थात् नरकमें गिरनेसे बचाता है, उसके लिये
इसी गुणके कारण शास्त्रमें “पात्र! शब्दका प्रयोग होता है।
वह दाताका पातकसे न्ञाण करनेके कारण “पात्र! # कहल्णता है।
गायत्री 'अपने गायक्रका पतनसे त्राण करती है; इसीलिये वह
“गायत्री” कहलाती है। जेसे इस लोकमें जो धनहीन है, वह
दूसरेको धन नहीं देता--जो यहाँ घनवान् है, वही दूसरेको
धन दे सकता है, उसी तरह जो खय॑ं शुद्ध ओर पवित्रात्मा
है, वही दूसरे मनुष्योंका त्राण या उद्धार कर सकता है। जो
गायत्रीका जब करके शुद्ध हो गया है। वही झुद्ध ब्राह्मण
कहलाता है । इसलिये दानः ज५ होम और पूजा सभी
कर्मोंके लिये वही शुद्ध पात्र है | ऐसा ब्राह्मण ही दान तथा
रक्षा करनेकी पात्रता रखता है |
त्री हो या पुरुष--जों भी भूखा हो, वही अन्नदानका
पात्र है। जिसको जिस वस्तुकी इच्छा हो) उसे वह वस्तु बिना
माँगे ही दे दी जाय तो दाताक्ों उस दानका पूरा-पूरा फल
प्रात्त होता है, ऐसी महर्षियोंकी मान्यता हैं। जो सवाल या
याचना करनेके बाद दिया गया हो; वह दान आधा ही फल
देनेवाला वत्ताया गया है | अपने सेवकको दिया हुआ दान
एक चोथाई फऊ देनेवाला होता है | विप्रवरो | जो जाति-
#पतनात्वायत इत्ति पात्र शात्के प्रयुज्यते ।
दातुश् पातकात्याणात्पात्रतित्यमिश्रीयते ||
( शि० पु० विधे० १५ । १५ )
] | रे
पक. १ कं. ५
हे हु
न
४£ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा[
मम ५ मा मय एरम ५ 9 ६ 4 काम कम 24७५२ रा इाम कामना नमक ४५५५3 पा पका पापा भव 9 का पा मा 944 वनाता माना पा ३४४१५ कमा धरा पायाइिमायााक पा गहन ३४अा धारा पा गा पाप माय याद पाक,
मात्रसे ब्राह्मण है ओर दीनतापूर्ण इत्तिसे जीवन बिताता है
उसे दिया हुआ घनका दान दाताकों इस भूतलूपर दस वर्षो
भोग प्रदान करनेवाला होता है । वहीं दान यदि वेद
त्राहणको दिया जाय तो वह खगलोकम देवताओंक्रि वे
दस वर्षोतक दिव्य भोग देनेवाला होता है | शिठ और उच्
वृत्तिसे# छाया हुआ ओर गुरुदक्षिणामें प्रात हुआ अन्नक्ष
जरुद्ध द्रव्य कहछाता है । उसका दान दाताकों पूर्ण फछ 'देने
बाला बताया गया है । क्षत्रियोंका शोयसे कमाया हुआ
वेश्योंका व्यापारसे आया हुआ ओऔर झूठ्ोंका सेवाइत्तिसे प्र
किया हुआ घन भी उत्तम द्रव्य कहलाता है । धम्मवीं इंच
रखनेवाली स्लियोंको जो धन पिता एवं पतिसे मिला हुआ है
उनके लिये वह उत्तम द्रव्य है ।
गो आदि बारह वस्तुओंका चेनत्र आदि बारह महीने
क्रमशः दान करना चाहिये | गो, भूमि, तिल) सुवण) ६
वस्त्र) धान््य) गुड़। चाँदी, नमक) कोंहड़ा और कन्यां--
ही वे बारह वस्त॒ुएँ हैं | इनमें गोदानसे कायिक) वाचिक मे
मानसिक पापोंका निवारण तथा कायिक आदि पुण्यकर्मो
पुष्टि होती है । ब्राह्मणो ! भूमिका दान इहलोक ओर परल
प्रतिष्ठा ( आश्रय ) की प्राप्ति करानेवाछा है। तिलका &
बलवर्धक एवं मुत्युका निवारक्कत होता है। सुवर्णका
जठरामिको बढानेवाला तथा वीयदायक है। घीका दान पुा्
होता है। वस्त्रका दान आयुकी चृद्धि करानेवाल्य है।
जानना चाहिये। धान्यका दान अन्न-धनकी समृद्धिमें का
होता है । गुड़का दान मधुर भोजनकी प्राप्ति करानेवाल हैं
है| चौदीके दानसे वीयंकी वृद्धि होती है। लवणका
प्रडस भोजनकी प्राप्ति कराता है । सब प्रकारका दान हा
समृद्धिकी सिद्धिके ल्यि होता है। विश पुरुष वृ
दानको पुश्टिदायक मानते हैं। कन्याका दान आजीवन
देनेवाला कहा गया है | ब्राह्मणो | वह छोक और परहो।
१
भी सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाला है | ं
फ्ह
कि
# कीशकार कहते हैं--..
“उज्छ: कणश
|
आदान॑ कणिशाधर्जनं॑ शिलम्ए | '
अर्थात् खेत कट जाने या बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखोहै।
अनज्नके एक-एक कणको चुनना और उससे जीविकां | ' क्
'उन्छशृत्ति है तथा खेतकी फसल कट जानेपर वहाँ पढ़ी
आदिकी वालें वीनना (शिल” कहा गया है, और उससे
चलाना “शिलधृत्ति है । च्
अम्याक हू वगा
- विद्यग्वरसंहिता |
विद्वान पुरुषकों चाहिये कि जिन वस्तुओंसे भ्वरण आदि
इब्टियोंकी तृप्ति होती है? उनका सदा दान करें | थ्रोत्र आदि
इन्द्रियेकि जो शब्द भादि दस विषय हैँ। उनका दान
किया जाय तो वे भोगोंकी ग्राप्ति कराते हैं तथा दिशा आदि
इच्द्रिपदेवताओंको संतुष्ट करते हैं । वेद ओर झाख्तरको
गुरुमुखसे ग्रहण करके ग़ुरुके उपदेशसे अथवा खय॑ ही बोध
प्राप्त करनेके पश्चात् जो चुद्धिका यह निश्चय होता है कि
'कर्मोक़ा फछ अवश्य मिल्ता है? इसीको उच्चक्रोटिकी
धआस्तिकता! कहते हैं। भाई-बन्चु अथवा राजाके भयसे
जो आसिकताजनुद्धि या श्रद्धा होती है; वह कनिष्ठ श्रेणीकी
आख़िकता है | जो सर्बथा दरिद्र है; इसलिये जिसके पास
सभी वस्तुओंका अभाव है; वह बागी अथवा कर्म ( शरीर )
द्वारा यजन करे | मन्त्र; स्तोत्र ओर जप आदिको वाणीद्वारा
5४ पृथ्चीं आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओके पूजनकी विधि 5:
४७
>-->->-.->>---ूूू चख् ्ख् खज् खक्तल्च_्_/वट्_य्च्् च चख ् _ल्ल्चच-खचतत्््य्ःयचशशशश्लश्य्य््य्य्स्य्म्च्स्स्य्य्स्स्स्ल््स्ः
किया गया यजन समझना चाहिये तथा तीथयात्रा ओर व्रत
आदिको विद्वान् पुरुष शारीरिक यजन मानते हैं। जिस
किसी भी उपायसे थोड़ा हो या बहुत) देवतापंण बुद्धिसे जो
कुछ भी दिया अथवा किया जाय; वह दान या सत्क्म भोगोंकी
प्राप्ति करानेमें समर्थ होता हैं| तपस्या ओर दान--ये दो कम
मनुप्यकी सदा करने चाहिये तथा ऐसे शहका दान करना
चाहिये, जो अपने वर्ण ( चमक-दमक या सफाई ) ओर गुण
( सुख-स॒विधा ) से सुशोमित हो | बुद्धिमान् पुरुष देवताओंकी
तृप्तिके लिये जो कुछ देते हैँ; वह अतिशय मात्रामें ओर सब
प्रकारके भोग प्रदान करनेवाल्य होता है | उस दानसे विद्यान
पुरुष इहल्गेक ओर परलोकमे उत्तम जन्म ओर सदा सुलभ
होनेवाला भोग पाता है । ईश्वरर्पण-चुद्धिसे यज्-दान आदि कर्म
करके मनुप्य मोक्षफलछका भागी होता है। ( अध्याय १५ )
ल-ा्स्ल>स्ॉेि >>
पृथ्वी आदिसे निर्मित देवग्रतिमाओंके पूजनकी विधि, उनके लिये नेवेध्का विचार, पूजनके
विभिन्न उपचारोंका फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रोंके योगमें पूजनका
विशेष फल तथा लिड्नके वज्ञानिक खरूपका विवेचन
पापियांने कहा--साधुशिरोमणे | अब आप पार्थिव
प्रतिगाकी पूजाका विधान बताइये, जिससे समस्त अभीष्ट
बस्तओंकी प्राप्ति होती है ।
सतजी बोले--महूपियो | तुमलोगोनि बहत उत्तम
बात एृछी है । पाभिव प्रतिमाका पूजन सदा सम्पूर्ण मनोरथों-
नेवाह्य है तथा दुःखका तत्काड निवारण करने
पाछा ६॥ भे उसका वर्णन करता हूँ, तुमलझोग उसको
ध्यान देवर सुनो । प्रध्वी आदियी बनी हुई देवप्रतिमाओंकी
४ इस भूतलपर अमीए्दायक मानी गयी ऐक निश्चय ही
श्सप पुरा ओर खियोंका भी अधिकार है। नदी
पौसरे अथवा कुएम प्रवेश करके पानीके भीतरसे मिश्ी
५ शागे। फिर गन्य-चूर्णके द्वारा उसका संशोधन करे
ज्यर शरद मण्टरमे स्यकर उसे महीने पीसे और साने ।
स्वरा याद हाथसे प्रतिमा बनाये कलीर इधस उसका मसम्दर
क् कार पर२॥ उस प्रतिमर्भ झआड्भ-प्रत्यद् अच्छी तरह
(॥ 239% 23 पर प्र्जर्पण् श्श्प जग्र शपय सा ग्ररर्
श्याज गे हे । गइमन्तर
मे परश्ाननरर अंरारत बरद
हा और ति ५ * १ उक कु मं एच कं हिंद ु
फल)
आदरपूर्वक उसका पएृजन करे । गणेश सूर्य, विष्णु) दुर्गा
ओर शिवकी प्रतिमाका, शिवका एवं शिवलिझ्ञका द्विजकी
सदा पूजन करना चाहिये । पोडशोपचारप्ृजनजनित
फल्की सिद्धिके लिये सोलह उपनारोंद्वार पूजन करना
चाहिये । पुष्पसे प्रोक्षण ओर मन्त्र-पाठपूवक्े अभिषेक
करे। अगहनीके चायल्से नवेद्र तेयार कर | सारा नेवेद्य
एक कुडबव ( लगभग पावभर ) होना घाहिये | घरमें पार्थिव -
पूृजनके लिये एक कुडब ओर बाहर किसी मनुष्यद्वारा
स्थापित गिवरलिश्कके प्रजनके डिये एक प्रस्थ ( सेरभर )
नवेय तयार करना आवश्यक है। ऐसा जानना चाहिये।
देवताओंद्वार स्थापित शिवल्िद्रेके छिये तीन सेर नेभेश्र
अपित करना उचित € ओर स्वयं प्रकट हुए खयात-
लिद्वके हिये पाँच सेर | ऐसा करनेपर पृ्ण फ्री प्राप्ति
समझनी चाहिये | इस प्रकार सह्त बार प्रा करने
तर
द्विन सत्य काका प्रादम झर आला ! |
*+-#--श००हका दरार >> >>्ब >> ्श्म््ली कम जहा नस
एसनेटटियरे 2 कर टरइण टाए, छा सटल दा
ि
(भ5 पद रूट स्वर एऐेप, टेडअ! कट! श।
श८
चोड़ा ' जो लोहे या लकड़ीका बना हुआ पात्र होता है;
उसे विद्वान् पुरुष “शिव” कहते हैं | उसका आठवाँ भाग
प्रस्थ कहलाता है; जो चार कुडवक्े बराबर माना गया है।
भनुष्यद्वारा स्थापित शिवलिड्जके लिये दस प्रश्न, ऋषियोंद्वारा
स्थापित शिवलिड्गके लिये सो प्रथ्ध ओर खयम्भू शिवलिद्नके
लिये एक सहस्र प्रस्थ नेवेय निवेदन किया जाय तथा
जल) तेल आदि एवं गन्ध द्रव्योंकी भी यथायोग्य मात्रा
खली जाय तो यह उन शिवलिज्ञोंकी महापूजा बतायी
जाती है ।
... देवताका अभिषेक करनेते अत्मशुद्धि होती है, गन्धसे
चुण्यकी , प्राप्ति होती है । नेवेद्य लगानेसे आयु बढ़ती और
तृप्ति, होती है | धूप निवेदन करनेसे घनकी प्राप्ति होती
। दीप दिखानेसे ज्ञानगका उदय होता है ओर ताम्बूल
समर्पण करनेसे भोगक्री उपलब्धि होती है। इसलिये खान
आदि छः उपचारोंको यज्ञपूवंक अर्पित करें। नमस्कार
और जप--ये दोनों सम्पूर्ण अमीश फलको देनेवाले हैं ।
इसलिये भोग ओर मोक्षकी इच्छा रखनेवाले छोगोंको
पजाके अन्तमें सदा ही जप ओर नमस्कार करने चाहिये ।
मनुष्यकी चाहिये कि वह सदा पहले मनसे पूजा करके
फिर उन-उन उपचार्रोसे करे। देवताओंकी पूजासे उन-उन
देवतांभके लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा उनके अवान्तर
लोकं॑में भी ययेष्ट भोगकी वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ।
अब मैं देवपूजासे प्राप्त होनेवाले विशेष लोकोंका
चर्णन-करता हूँ । छविजो ) तुमलछोग श्रद्धायूबंक सुनो । विप्नराज
गणेशकीः पूजासे भूलोकर्में उत्तम अभीष्ट वस्तुकी प्रासि
होती है। झुक्रवारको, आवण ओर भाद्रपद मार्सोके शुक्लपक्ष-
की चत॒र्थीकों और पोषमासमें शतभिषा नक्षत्रके आनेपर
विधिपूवक गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये | सो या सहख्न
दिनेमें. सो या सहस्त वार पूजा करे। देवता और अम्निमें
श्रद्धा रखते हुए किया जानेवाला उनका नित्य पूजन
मनष्योंकी- पुत्र एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है।
वह समस्त पार्पोका अमन तथा भिन्न-मिन्न दुष्कर्मोंका
विनाश करनेवाला है। विभिन्न वारोंमें की हुई शिव आदिकी
पूजाको' आत्मझुद्धि प्रदान करनेवाली समझना चाहिये |
वार या दिन तिथि; नक्षत्र ओर योगोंका आधार है ।
समस्त' कामनाओंको देनेवाल्ा है। उसमें ब्ृद्धि और क्षय
नहीं द्ोता । इसलिये उसे पूर्ण शह्मखरू्प मानना चाहिये |
के
ही.
४६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ३:
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाए्
सूर्यादयकालसे लेकर सूर्यादयक्राल आनेतक एक- बाजी
स्थिति मानी गयी है। जो ब्राह्मण आदि सभी वर्णाके कम
का आधार है | विहित तिथिके पूत्र भागमें की हुई देवएृत्र
मनुष्योकों पूर्ण भोग प्रदान करनेवाली होती है |
यदि मधच्याहके बाद तिथिका आरम्म द्वोता है वे
रात्रियुक्त तिथिका पूर्वभाग पितरोंके श्राद्धादि कमरे लि
उत्तम बताया जाता है । ऐसी तिथिका परमभाग ही दिनो
युक्त होता है; अतः वही देवकर्मके लिये प्रशस्त मात
गया है | यदि मध्याहकाल्तक तिथि रहे तो -उदयब्यापि
तिथिको ही देवकाय में ग्रहण करना चाहिये। इसी तह
ञुभ तिथि एबं नक्षत्र आदि ही देबकारयमें गद्य हे
हैं | वार आदिका मलीमाँति विचार करके पूजा ओर ज।
आदि करने चाहिये । वेदोंमें पूजा-शब्दके अर्थकी हैः
प्रकार योजना की गयी है--पूर्जायते अनेन इति पूजा।
पूजा-शब्दकी व्युत्यत्ति है। प्ू” का अर्थ है भोग
फलकी सिद्धि---बह जिस कमंसे सम्पन्न होती है, उस
नाम पूजा है। मनोवाड्छित वस्तु तथा शान--ये ही अर्म
वस्तुएँ हैं; सकाम भाववालेकी अमीषट भोग. भपेक़ि
होता है ओर निष्काम भाववालेको अर्थ--पारमार्थिक शञान
ये दोनों ही पूजा-शब्दके अथ्थ हैं; इनकी योजना करने
ही पूजा-शब्दकी सार्थकता है | इस प्रकार लोक ओर वेहे
पूजा-शब्दका अर्थ विख्यात है। नित्य ओर नेमित्तिक #
कालान्तरमें फल देते हैं; किंतु काम्य कर्मका यदि ;
भाँति अनुष्ठान हुआ हो तो वह तत्काल फलद होता है
प्रतिदिन एक पक्ष) एक मास ओर एक वर्षतक लगातार
करनेसे उन-उन कम्के फलकी प्राप्ति होती है ४ |
वेसे ही पापोका क्रमशः क्षय होता है |
गणपतिकी पूजा एक पक्षके पापोंका नाश करनेवाली और
पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।
चतुर्थीको की हुईं पूजा एक मासतक किये गये | |
देनेवाली होती है और जब सूर्य सिंह राशिपर खित हों) *
समय भाद्रपद मासकी चत॒र्थीकी की हुई गणेदजीकी .#
एक वर्षतक मनोवाजञ्छित भोग प्रदान करती है--ऐसा
चाहिये | श्रावणमासके रविवारको) हस्त नक्षत्रसे युक्त श
तिथिको तथा माघझुक्छठा सप्तमीको भगवान् सूर्यका
करना चाहिये | ज्येष्ट तथा भाद्रपद मार्सोके बुधवारंकी।
अत जज कम उप “यम कमी. पऑिगन-जनी अन्ना जनम “तय पतन का
विद्येश्वरसंहिता ]
नक्षत्रते युक्त द्वादशी तिथिकों तथा केत्रछ द्वादशीकों भी
क्रया गया भगवान् बिप्णुका पूजन अभीष्ट सम्पत्तिको देनेवाला
माना गया दे। श्रावणमासमें की जानेवाली श्रीहरिकी पूजा
अभी मनोरथ और आरोग्य प्रदान करनेवाली होती है।
अग्नों एवं उपकरणोंसहित पूर्वाक्त गो आदि बारह वस्तुओंका
दान करनेसे जिस फल़की प्राप्ति होती हे? उसीको दादक्ी
तिथि आराधनाद्वारा श्रीविष्णुकी तृप्ति करके मनुप्य प्राप्त कर
लेता है। जो द्वादशी तिथिकों भगवान् विप्णुके बारह नार्मो-
द्वारा बारह ब्राह्मणोंका पोडशोपचार पूजन करता है। वह
उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है | इसी प्रकार सम्पूर्ण देवता-
अकि विभिन्न बारद नार्मोद्दारा किया हुआ, वारद ब्राह्मणोंकरा
पृज्ञग उन-उन देवताओंको प्रसन्न करनेवात्य द्योता है |
काकदी संक्रान्तिसि युक्त श्रावणमासमें नवमी तिथिको
मुगशिरा नक्षत्रके योगमें अम्बिकाका पूजन करे । वे सम्यूणे
मनोवाश्छित भोगों ओर फर्डोको देनेवाली हैं | ऐश्वयंक्री इच्छा
रखसनेवाले पुरपफो उस दिन अवश्य उनकी पूजा करनी
चाएयि। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथि सम्पूर्ण
अभीए फर्श्की देनेवाली है । उसी मासके कृष्ण पश्चकी
खतुदशीकी यदि रविवार पड़ा हों तो उस दिनका महि्
विशेष बढ़ जाता है । उसके साथ ही यदि आद्रों ओर महाद्रां
( सूर्यसक्रान्तिसि युक्त आदर ) का योग हो तो उक्त अवसर्ोपर
पे हुई शिवपूजाका विशेष सदत्य माना गया दे | साथ
एशणा चदुदशीकों की हुई शिवजीकी पूजा सम्रृर्गण अपी!
फर्डोते देनेवाली है। वह मनुष्योंकी आयु बढ़ाती, सृत्यु-क्रए-
फो दूर एराती और समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति कराती दे ।
स्व मासभ चतुदशीकों यदि मरहाद्रोक्ता योग हो अमत्रा सार्गे:
धीरे मासमें फिसी भी तिथिकों यदि आर्द्र नक्षत्र दो तो उस
दसरपर विभिन्न मस्तुओंडी बनी हुई मृतिझ्ते रुपमें शिय्दी जे
णएए उपचासेते पृण छरता ऐै। उस पण्णत्याओे चरणवा
शन मरना चाहिये । भगवा शिवद्दी परणा मन॒ुप्योकी भेग
जार सात एनेपाली है; ऐसा झानना चाहिये । दातिक गाससमें
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# पृथ्वी आदिले निर्मित देवप्रतिमाओंके पूजवकी विधि *
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2... पक कान ननन-नननन नमन किन ५नन+व- बनना नकनन न + न नम5कनननकनन+क नमन नमन नमन नशशचखखिलल लू न
' टिया» मय ान-+ नकल नमैननम न,
वह कामनाओंको त्यागकर पीड़ारहित ( शान्त ) हो देवाराघन-
में तत्पर रहे ।
कार्तिक मासमें देवताओका यजन-यूजन समस्त भोगेंकरे
देनेव्राल्) व्याधियोंकों दर लेनेवाल तथा भूतों ओर परद्दोक्रा
विनाश करनेवाला है । कार्तिक मासके रविवारोंको भगवान्
सूर्यक्री पूजा करने ओर तेल तथा सूती वल्ल देनेते मनुष्योकि
कोढ़ आरि रोगोंका नाश होता है | हूँ काछी मिचे, वल्ल
और खीरा आदिका दान ओर ब्राह्मगेंक्री प्रतिअ करनेते
क्षषक्रे रोगका नाश होता है । दीए ओर सरसोके दानसे
मिरगीका रोग मिट जाता है | कृतिका नश्नत्रतते युक्त सोम-
वार्रोकी किया हुआ झित्रजीका पूजन मनुष्योंके मशन् दारिदिय-
को मिठानेवाल्ला ओर सम्पूणे सम्त्तियोंकों देनेवराला है | घरक्ी
आवश्यक सामग्रियोंके साथ णह ओर क्षेत्र आदिका दान
करनेसे भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। कृत्तिकायुक्त मश्नल-
वार्रोक़ी श्रीस्कन्दका पूजन करनेसे तथा दीपक एवं घण्टा
आदिका दान देनेसे मनुष्योंको शोत ही वाकसिद्धि प्राप्त दो
जाती है, उनके मुँहसे निकली हुई हर एक वात सत्य द्वोती
है | झृतिकायुक्त बुधवारोंकों क्रिया हुआ श्रीविष्णुडा यजन
तथा दही-मातका दान मनुर्ष्योक्री उत्तम संतानकी प्राप्ति कपनेत्राला
होता है। इत्तिकायुक्त गुख्वारोंको घने ब्रग्माजीफ़ा पूजन
तथा मथु; सोना ओर घीका दान करनेते मतुप्योकि भोग-
वैभवकी बद्धि होती है । कृत्तिकाथुक शुक्रव्रारोंकों गवान॑न
गणेशनीकी पूजा करनेसे तथा गर्। पुष्य एवं अन्नक्ता दान
देनेते मानवॉके भेग्य पदार्थोक्री श्रद्धि होती है | उप्त दिन
सोना; चौदी आदिका दान करनेप्े बन्याफ़ी भी उत्तम पुत्रकी
प्राप्ति दोती है। कृतिहायुक्त दनित्रारंकों दिक्वालोंकी वन््दना॥
दिग्गजों; सागों ओर सेवुवारृका पूजन) जिनेजरवारों छठ) पाये"
हारी विष्णु तथा ज्ञानदाता ब्रद्माझा आराधघन और भन्यन्तरि
एप दोनों अधयो झ॒मारोका एज करनेये रोग) दुद्ृत्यु एएं
अहलमृत्युडा निवरण दीता है तथा सात्झाडिक ब्याभिषोंती
शान्ति हो जाती हे | नमक लोड; नेड और उड़द आदिम
तिहद ( सोठ) पीयड और मोड मिय % के गर्त और
तेया पूत्र आद दवसदायाड़ा ओर सुतये सती
आई शादर वस्तु झका भो दान इंनेते सशयाणमफें प्राहि
हि च््ू
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को कक २+-नहात-- तक तर ॥” जे ३ ऋ- कफ ट ४४ ५ >आर्ड'
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शब्य्या अराग दो मखड बा मुउदये ऋरमे पताएा ५
नस्झ्मेड
हा
होती है । इनमेंसे नमक भादिका मान कम-से-कम एक प्रस्थ
( सेर ) होना चाहिये ओर सुचणे आदिका मान कम-से-कम
एक बल |
धनकी संक्रान्तिसे युक्त पौष मासमें उधःकालमें शिव
आदि समस्त देवताओंका पूजन क्रमशः समस्त सिद्धियोंकी
प्राप्ति करनेवाल्य होता है | इस पूजनमें अगदनीके चावलसे
तैयार किये गये हृविष्यका नेवेद्य उत्तम बताया जाता है ।
पोष मासमें नाना प्रकारके अन्नका नेवेद्य विशेष महत्व रखता
है । मार्गशीर्ष मासमें केवल अन्नका दान करनेवाले मनुष्योंको
ही सम्पूर्ण अभीष्ट फछोंदी प्राप्ति हे जाती है । सार्गशीषेसाससें
अजन्नका दान करनेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।
वह अभीष्ट-सिद्धि, आरोग्य/ घम वेदका सम्यक् शान) उत्तम
अनुष्ठानका फल; इहलेक ओर परलोकमें महान् भोग:
अन्तमें सनातन योग (मोक्ष ») तथा वेदान्तज्ञानकी सिद्धि
प्राप्त कर लेता है । जो भोगकी इच्छा रखनेवाठा है। वह
मनुष्य मार्गशीर्ष मास आनेपर कम-से-कम तीन दिन भी उषः-
काल्में अवश्य देवताओंका पूजन करे ओर पौषमासको पूजनसे
खाली न जानें दे | उषःकालसे लेकर संगवकाल्तक ही पौष
मासमें पूजनका विशेष महत्व बताया गया है। पौष मासमें
पूरे महीनेपर जितेन्द्रिय ओर निराह्यर रहकर ह्विज प्रातःकाल-
से मध्याह् काल्तक वेदमाता यायत्रीका जप करे । तत्पश्चात्
रातकी सोनेके समयतक पद्माक्षर आदि मन्त्रोंका जप करे |
ऐसा करनेवाल्य ब्राह्मण ज्ञान पाकर शरीर छूटनेके बाद मोक्ष
प्राप्त कर लेता है ! द्विजितर नर-नारियोंकों त्रिकाल स्नान और
पञ्चाक्षर मन्त्रके ही निरन्तर जपसे विश्ुद्ध शान प्राप्त हो जाता
है । इष्टमन्त्रोंका सदा जप करनेसे बड़े-से-बड़े पापोका भी नाश
हो जाता है ।
सारा चराचर जगत् विन्दु-नादखरूप है । बिन्दु शक्ति
है और नाद शिव | इस तरह यह जगत् शिव-शक्तिस्वरूप ही
है | नाद बिग्दुका और बिन्दु इस जगत्का आधार है; ये
बिन्दु और नाद ( शक्ति ओर शिव ) सम्पूर्ण जगतके आधार-
रूपसे स्थित हैं | बिन्दु और नादसे युक्त सब कुछ शिवखरूप
है; क्योंकि वही सबका आधार हैं । आधारमें ही आधेयका
समविद्य अथवा लय होता है। यही सकलीकरण है | इस
सकलीकरणवी स्थितिसे ही सष्टिकालमें जगतका प्रादुर्भाव होता
है, इसमें संशय नहीं है । शिवलिड्ड' बिन्दु-नादखरूप है | अतः
उसे जगत्का कारण बताया जाता है। बिन्दु देवी है और
नाद शिव) इन दोनोका संयुक्त रूप ही शिवलिड्ग कहलाता है |
).. ४
.. कल
%# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने
[ सक्षिप्त-शिवपुराणाः
अतः जन्मके संकटसे छुटकारा पानेके लिये शिवलिद्षकी पूद
करनी चाहिये । बिन्दुरूपा देवी उमा माता हैं ओर नादखह
भगवान शिव पिता । इन माता-पिताकरे पूजित होनेसे परमानन्द
की ही प्राप्ति होती है | अतः परमानन्दका छाम लेगेक्े हि
शिवलिद्गका विशेष रूपसे पूजन करें| देवी उमा जगत
माता हैं और भगवान् शिव जगतके पिता | जो. इनकी से॥
करता है; उस पुत्रपर इन दोनों माता-पिताकी ऋृषा निः्
अधिकाधिक बढ़ती रहती है# | वह पूजकपर कृपा करे
उसे अपना आन्तरिक ऐश प्रदान करते हैं | अतः मुनीश्रो
आन्तरिक आनन्दकी प्राप्तिके लिये; शिवलिज्कको माता-पिताद
स्वरूप सानकर उसकी पूजा करनी चाहिये । भगे (शिव
पुरुषरूप है ओर भर्गो ( शिव्रा अथवा शक्ति ) प्रकृति कहलत
है | अव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानरूप गर्भको पुरुष कहते
ओर सुव्यक्त आन्तरिकर अधिष्ठानभूत गर्भको प्रकृति | पुर
आदिगर्भ है, वह प्रकृतिरूप गर्भसे युक्त होनेके कारण गर्भवा
है; क्योंकि वही प्रकृतिका जनक है | प्रकृतिमें जो पुरुषव
संयोग होता है; यही पुरुषसे उसका प्रथम जन्म कहलाता है
अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्वादिके क्रसे जो जगतका व्यक्त होन
है, यही उस प्रकृतिका द्वितीय जन्म कहल्यता है | जीव पुरुष
से ही वारंबार जन्म ओर मृत्युको प्राप्त होता है। मायाद्वार
अन्यरूपसे प्रकट किया जाना ही उसका जन्म कहल्यता है;
जीवका शरीर जन्मकाल्से ही जीणे ( छः भावविकारॉसे युक्त )
होने छगता है; इसीलिये उसे “जीव” संज्ञा दी गयी हैं | जे
जन्म लेता ओर विविध पाशोद्वारा तनाव ( बन्धन ) में पड़ता
है, उसका नाम जीव है। जन्म ओर बन्धन जीव-शब्दका
अर्थ ही है। अतः जन्म-मृत्युरूपी बन्धनकी निद्वत्तिके लिये
जन्मके अधिष्ठानभूत मातृ-पितृखरूप शिवलिक्ञका पूजन
करना चाहिये ।
गायका दूध, गायका दही ओर गायका घी--इन तीन:
को पूजनके लिये शहद और शक्करकके साथ प्रथक्-पृथक् भी
रक््खे और इन सबको मिल्यकर सम्मिलितरूपसे पश्माम्रत मी ,
५. न '
तेयार कर ले | ( इनके द्वारा शिवलिड्रका अभिषेक एवं स्व
# माता देवी विन्दुरूपा नादरूप: शिव: पित्ता॥
पूजितान्यां पितृभ्यां तु परम,नन््द एवं हि.। ह
परमानन्दलाभमार्थ. शिवलिडशू प्रपूजयेच 0...
सा देवी जगतां माता स शिवों जगतः पिता । ।
पित्रोी: शुश्रूषके नित्य कृपाधिवयं हि वर्धते ॥ .. |
( शिवपु० वि० १६। ९१--$१/ |
विद्येश्वर संहिता ]
लि मल अमन अल जल 2393330::09::00:077% नवाज प मनन पका प पा ८ ८ 2>०7-2:-- 22227: ७७७७छ छा
कराये ) फिर गायके दूध ओर अन्नके मेल्से नेवेद्य तेयार
करके प्रणव मन्नके उच्चारणपर्वक उसे भगवान शझिवकों अपित
कर | सम्पर्ण प्रणको ध्वनििड्ठ कहते हैं। स्वयम्भूलिज्ञ तांद-
स्वरुप ह्ोनेके कारण नादलिंड्र' कहा गया है। यन्त्र या आधा
विल्दखरूप होनेके कारण विन्दुलिठ्ल्कके रूपमें विख्यात है।
उसमें अचछरूपसे प्रतिष्ठित जो शिवलिद्न है; वह मकार-खरूप
ऐै, इसलिये मकारलिक कहलाता दे | सवारी निकालने आदिके
४: पडलिड्खरूप प्रणवका माहात्स्य+ उसके सूक्ष्म रूपका विवेचन #
सन अमर 3 कं... +-+ अत हर
प्र
लिये जो चरलिड्ठ होता है; वह उकार-स्रूप होनेसे उकारलिब्न
कहा गया है तथा पूजाकी दीक्षा देनेवाले जो गुरु या आचार्य
हैं, उनका विग्रह अकारका प्रतीक होनेसे अकारलिज्ञा माना
गया है | इस प्रकार अकारः उकार, मकार) विन्दु) नांद
ओर ध्वनिके रूपमें लिक्कके छः भेद है| इन छ्ों लिज्लॉंकी
नित्य पूजा करनेसे साधक जीवन्मुक्त हो जाता है) इसमें संशय
नहीं है | ( अध्याय १६ )
कि,
पडलिद्नखरूप प्रणयका माहात्म्य, उसके सक्ष्म रूप (3०कार ) ओर स्थल रूप ( पश्चाक्षर मन्त्र ) का
विवेचन, उसके जपकी विधि एवं सहिमा, कार्यत्रझ्षके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके
लोकोंतकका विवेचन करके कालातीत, पश्चावरणविशिण्ठ शिवलोकके अनिर्बेचनीय
वभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता
फ्रापि बोले--प्रमो | महामने ! आप हमारे लिये
प्रमद पडलिश्नखरूप प्रणबका साहात्म्य तथा झिवमक्तके
पूजन प्रवार बताइये ।
पतजीने फह(-महपियों | आपत्गोेग तपस्याक्रे घनी
९ आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया है। किंतु
एसका ठीक-ठीक उत्तर महादेवजी ही जानते हैँ; दूसरा कोई
नए । तथापि भगवान् शिवकी कृपासे दही में इस विपयका
बणन परेंया । थे भगवान शिव एमारी ओर आपलोगोंकी
रक्षा भारी मार बारबार खयं ही ग्रहण करें | प्य)नाम है
प्रझृतिते उसन्न संसाररूपी महासागरका । प्रणव इससे पार करनेके
डिये दूसरी ( नव ) नाव है । इसलिये इस शेंकारकों प्रणवःकी
श पते हैं) छएयार अपने जप करनेबाडे साधकसि कहता टै--
प्र-पपले) स-महीं है बः--सुम लागकि लिये ।? अत; इस
भाद) लेपर भी छानी पृदप प्झोम!को प्रणव” मामसे जानते
€। एक्का दूसय भाव यों है--प्य--प्रकरेणं, म--नयेत
प:--पुण्यान मौक्षय एति वा पणयः | अधातू दटू तम सब
उशययोव बषइ्रड मोपतक परेचा देगा ।! एस अभिषायसे
+) एसे भेपिझृति पेय फाते हैं | अपना जप बरनेगाएे
गिफ सथा छापने ऋंधरी पडा फररेयाे
शक थ्भोंत्र याश छरवे
चुप ५
[२ ९५, ५ बंप एप्प ृ
उपासयाडे:
यह दिव्य शूतनम शान देना है;
ए् |[ 'भ्् 5१ स्सू रा सदा
साधक्रको नव अर्थात् नत्रीन ( शिवस्वरूप ) कर देता है।
इसलिये भी विद्वान् पुरुष उसे प्रणवक्के नामसे जानते हैं |
अथवा प्रकृष्कपसे सव--दिव्य परमात्मशान प्रकट करता
है। इसलिये वह प्रणत्र हैं।
प्रणवके दो भेद बताये गये हँ--स्थूल ओर सूक्ष्म ।
एक अक्षरूप जो “झोम! हैं; उसे सूक्ष्म प्रणः जानना
चाहिये ओर “नमः शिवाय! इस पॉच अक्षरवाले मन्त्रको
स्थूल प्रणय समझना चाहिये | जिसमें पॉँच अक्षर
व्यक्त नहीं हैं; वह सुध्म ऐ ओर जिसमें पॉचों अक्षर सुस्पष्ट-
रुपसे व्यक्त हूँ; वह स्थृत्ट ६ । जीवन्मुक्त पुझपके लिये सूध्ष्म
प्रणयके जपका विधान दे । वद्दी उसके लिये समरत साधनोंका
सार है । ( यथ्पि जीवन्मुक्तके लिये किसी साथनदी आयश्यकता
नहीं हैं; क्योंकि वह सिद्धरुप है; तथाति दसरोदी दृश्टिमं झबतवः
उसका दारीर रहता है; तबतक उसके द्वारा प्रणय-जय्की सदज
साधना खतः होती रहती है |) बट आअरनी देहदा विल्य हने-
तक सूध्म प्रणव मन््नका जप ओर उसके अर्थवृन परसान्म-
तत्वग़ अनुसंधान बारता रहता £। छब दशारीर मए्त हे ज्यता
दी है|
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'कन्- रा 8.त".आ ९ ५2०-म इमरान >> ३५०५... २... ;र. ५.2 >महामपनमति पक ारिम ूह-म धरम स्ामम ,अासमआम५मम ५अर ामनी पर ३५. मग दी कप न् (००५७-२० न ७ मरी पानी दुआ सम ३--अमे पहनी "०" ५५ +३० कमा ++पमी पक >इ ० पहन "००५५ धमकाने #भ० आम ०३३०-३9 समीप "३०2० इराक महा तह एक "९५०. पया सुकमा इरवरया ५ कम दाम पडा नम स्हन २ भ कम २ दा सह पान अमान हार ह ॒ पह॒३ल्०भाभारा#क
स्थित होता है। मकारपय॑न्त जो ओम् है; वह अ उ म्--
इन तीन तच्वोंसे युक्त है। इसीको “हस प्रणव? कद्दते हैं ।
: अ? शिव है; ८उ? शक्ति है ओर मकार इन दोनोंकी
एकता है | वह चितत्त्वरूप है; ऐसा समझकर हस्व प्रणबका
जप करना चाहिये। जो अपने समस्त पापोंका क्षय करना
चाहते हैं; उनके लिये इस हुख प्रणवक्ा जप अत्यन्त
आवश्यक है ।
पृथ्वी, जल; तेज, वायु ओर आकाश--ये पाँच भूत
तथा शब्द, स्पर्श आदि इनके पॉच विषय--ये सब मिलकर
दस वस्तुएँ मनुष्योंकी कामनाके विषय हैं| इनकी आशा
मनमें लेकर जो कर्मोंके अनुष्ठानमें संल्म होते हैं, वे दस
प्रकारके पुरुष प्रदत्त ( अथवा प्रश्नत्तिमार्गी ) कहलाते हैँ तथा जो
निष्काम भावसे शासत्रविहित कर्मोका अनुड़ान करते हैं; वे निद्वत्त
( अथवा निद्वत्तिमार्गी ) कहे गये हैं । प्रदत्त पुरुषोंकों हस्व
प्रणयका ही जप करना चाहिये ओर निवत्त पुरुषोंकों दीध
प्रणवका । व्याह्ृतियों तथा अन्य मन्त्रोके आदिमें इच्छानुसार
शब्द और कलासे युक्त प्रणबका (उच्चारण करना चाहिये |
वेदके आदिमें और दोनों संध्याोकी उपासनाके समय
भी औकारका उच्चारण करना चाहिये |
प्रणबका नो करोड़ जप करनेसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है |
फिर नो करोड़का जप करनेसे वह प्रृथ्वीतत्वपर विजय पा
' छेता है। तत्मश्चात् पुनः नो करोड़का जप करके वह जल-
तत्वको जीत छेता है | पुनः नो करोड़ जपसे अग्नितत्त्यपर
विजय पाता है | तदनन्तर फिर नो करोड़का जप करके वह
वायुतत्वपर विजयी होता है । फिर नो करोड़के जपसे
आकाशको अपने अधिकारमें कर लेता है | इसी प्रकार नी
नो करोड़का जप करके वह क्रमशः गन्ध, रस) रूप, स्पश
और शब्दपर विजय पाता है; इसके बाद फिर नो करोड़का
जप करके अहंकारको भी जीत लेता है | इस तरह
एक सौ आंठ करोड़ प्रणवका जप करके उत्कृष्ट बोधको
प्रात हुआ पुरुष झुद्ध योगका छाम करता है । शुद्ध
योगसे युक्त होनेपर वह जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें संशय
नहीं है। सदा प्रणयका जप ओर प्रणब्ररूपी शिवका ध्यान करते
करते समाधिमं स्थित हुआ महायोगी पुरुष साश्षात् शिव ही
है; इसमें संशय नहीं है | पहले अपने शरीरमें प्रणवक्ते क्रषि,
छन््द और देवता आदिका न्यास करके फिर जप आरम्भ
ब्नह पा, न
पक
है र क
बे
४ नमो रुद्राय शान्ताय ध्रह्मण परमात्मने ४
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
करना चाहिसे। अकारादि मातृका वर्णोसे युक्त प्रणव
अपने अड्ढमि न्यात करके मनुष्य ऋषि हो जाता
है । मन्न्त्रेके दशाविध संस्कार। मातृकान्यास तय
2, मन्त्रोंके दस संस्कार थे ए---जनन। दीपन, वोपन तहत,
अभिपेचन, विमठीकरण, जीवन, तर्पण, गोपन और आप्यावव |
एनवी विधि इस प्रकार दै---
भोजपत्रपर गोरोंचन। कुड्टूम) चन्द्नादिसे मात्माम्णि
त्रिकोण लिखे, फिर तीनों कोर्णेर्मे छः-छः: समान रेखाएँ सौंदे।
शेसा करनेपर ४९ त्रिकोण कोषप्ठ बनेंगे | उनमें ईशानकरेप्े
माठ्कावर्ण लिखकर देवताका आवाहन-पूजन करके मनद्र
एक-एक वर्ण उद्धार करके भल्ग पत्रपर लिखें । ऐसा करनेए
वजनन! नामका प्रथम संस्कार होगा ।
हंसमन्त्रका सम्पुट करनेसे एक हजार जपद्ारा मन्त्रका दूसए
दीपन! संस्कार होता है । यथा--हंसः: रामाय नमः सो5हन।!
हु -वीज-सम्पुटित मन्त्रका पाँच हजार जप करनेसे '्वोफ
नामक तीसरा संस्कार होता है । यथा--8 रामाय नमः छू ।
फट -सम्पुटित मन्त्रका एक हजार जप करनेसे व्ताइन:
नामक चतुर्थ संस्कार होता है। यथा--फट रामाय ननः फ़द।..
भूर्जपत्रपर मन्त्र लिखकर रों इंसः जो! इस मन्त्रसे जले
अभिमन्त्रि. करे और उस अभिमन्त्रि. जल्से भइवह्र
पत्रादिद्वारा मन्त्रका अभिषेक करे । ऐसा करनेपर “अभि
नामक पाँचवाँ संस्कार होता है ।
ओओं त्रों वपट? इल वर्णासे सम्पुदित मन्त्रका एक हजार दा
करनेसे ४विमलीकरण” नामक छठा संस्कार होता है। यभा
ओं त्रों वषड् रामाय नमः वषट त्रों ओं।
स्वथधा-वपट-सम्पुणित मूलमन्त्रका एक इजार जप करके
“जीवन! नामक सातवाँ संस्कार होता है । यधा--खपा के |
रामाय नमः वषद खधा ।
दुग्ध, जल एवं घतके द्वारा मूलमन्त्रसे सौ बार तर्पण करना
'त्प॑ण” संस्कार है । (
हीं-वीज-सम्पुटित एक हजार जप करनेसे 'योपन! नरम
नवम संस्कार होता है। यथा--हीं रामाय नमः हीं। |;
हों-बीज-सम्पुटित एक इजार जप करनेसे “्आप्पर्क ।
नामक दसवों संस्कार होता है । यथा--हों फ।
नमः ही १०००] हे
श्स प्रकार संस्कृत किया हुआ मन्त्र शीघ्र सिद्धिग्रद छोता है! ! के
सतना. डक.
क 3 +--क # %/७-७ “नल >> ज+मक-णा
च््छ
विद्येश्वरसंद्दिता |
.......--न्-_चशशखखश्य् यचच्ुय्य्य्य्य्य्य्स्य्य्स्य्स्य्य्प्य्प्प्प्प्प्प्प्य्््य्य्फ्ज---
पंटथथोघन आदिके साथ सम्पूर्ण न््यासफल उसे प्राप्त हो
दाता है | प्रद्त्ति तथा पद्नत्ति-निव्रत्तितिं मिश्रित भाववाले
पुुषोके टिये स्थल प्रणवका जय ही अमीए साधक होता है |
क्रिया, तप और जपके बोगसे शिवयोगी तीन
प्रकास्के होते हँ--जो क्रमशः क्रियायोगी) तथोयोगी ओर
छप्यागी बदलते हैँ । जो घन आदि वेभबंसि पूजला-
सामग्रीका संचय करके हाथ आदि अश्ञॉंसे नमस्कारादि
क्रिया करते हुए इश्टदेवक्की पृजार्म लगा रहता है
'व्रियायागी! कहलाता है। पूजाम संलम रहकर जो पारोमित
भोजन करता) बाह्य इब्तरिवॉकों जीतकर वश्चर्म किये रहता
और मनको भी वद्ममें करके परोह आदिसे दूर रहता है,
यह दाषायांगी! कहलाता है। इन सभी सहर्णोसे युक्त होकर
ले सदा शद्भावसे रहता तथा समस्त काम आदि दोर्पसि
एट्टित हो थान्तचित्तते निरन्तर जप क्रिया करता है; उद्ते
पटात्मा पृण्य “जअपयोगी” मानते हैँ। जो मनुप्य सोलद्ू
प्रधारप डपचारेसि शिवयोगी महात्माओंकी पूजा करता है, वह
श् ऐड खलोक्य आदिके ऋमसे उत्तरोत्तर उत्क्रए्ठ मुक्तिको
प्राप्त ऋर लेता है।
दिजो | अब भे जपयोगका वर्णन करता हूँ | तुम सब
छोग ध्यान देवर सुनों। तपस्या करनेवालिके लिये जपका
उपदेश किया गया है; क्योंकि बहू जय करते-करते अपने
आपको सपा शद्घ ( निष्याप ) कर छेता है| ब्राह्मणों !
परछ धगःः पद हो, उसके बाद चतुर्थी विभक्तिमें वशिव
भन है ते पदतचात्मक प्ममः शिवाय! मन्त्र होता है ।
ससे दिव-न्ाक्षरः यह स्थल प्रणयरुप है ।
एस पान जासे ही मरुष्प सम्रण सिद्धियोंकों प्रात्त दार
६ ७ ५ । पधाक्षमन्वया आदेगे ओर टगाकर ही सदा
"३ जात एुरना चाहिये । द्विज्न
किया
_्पही
प् पे २
| झुझाझ मुखसे पश्चाक्षर-
सपत्त उपदेश पार छ्म संसप्रमपा नियास क्रिया झा
क् हा बुर
; 0४३) ४४ उद्यम चूमितर सोने प्रयोप्ष
शापदा ) 7;
7रक रुष्यस्क्षद। आगुद शीत
सनक
को नत् हे बे 5७ ११
2० पडलिहस्वरूप प्रणयका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूपका विवेचन ४६
>. उमा +जम 3 ५ 2 मय लजि/ किगान-म के केक ५ कीजकज। 2 अमर सम जे है न
जे
विशिष्ट महत्व रखते हैं | यह समय सब समयेसे उत्तमोत्तम
साना गया है | साधकको चाहिये कि वह प्रतिदिन एक बार
परिमित भोजन करें) मोन रहे। इन्द्रियोंकी वशर्म रखे,
अपने स्वामी एवं माता-पिताकी नित्य सेवा करे | इस नियमसे
रहकर जय करनेवाला पुरुष एक सहलल जपते ही घुद्ध हो
जाता है; अन्यथा वह ऋणी होता है। भगवान् शिवक्का
निर्तर चिन्तन करते हुए पश्चाक्षर मन््त्रका पॉच लाख जप
करे। जयकालप इस प्रकार ध्यान करे । कल्याणदाता
भगवान् शित्र कठके आसनपर पिराजमान हैं |
उनका मस्तक श्रीगज़ाजी तथा चन्द्रमाकी कछसे सुझोमित
हैं। उनकी वायीं जाँघपर आदियक्ति भगवती उम्रा
बैठी ६ै। वहाँ खड़े हुए बड़े-बड़े गण भगयान् शिवक्ी शोभा
बद्ा रहे हैं। महादेवजी अपने चार हाथाम मगमुदा, यहा तथा
चर एवं अगयजी मद्राएं घारण किये हुए हू । इस प्रकार सदा
सत्रपर आनग्रह करनेवाले भगवान् सदाशेवका वारंबार
स्मरण करते हुए हृदय अथवा सूर्सममण्डलर्म पहले उनकी
मानसिक प्रजा करके फिर प्रवाभिमुख हो पूर्वाक्त पन्नाक्षरी
विद्याक्ता जाय करे । उन दिनो साधक सदा शुद्ध कमे ह्वी करे
( ओर दुष्कमसे बचा रहे )। जयकी समासिके दिन कृष्ण-
चठ॒द॒शीकोी प्रावश्याछ नित्रकसा करके शुद्ध एवं
सुन्दर सानमें शोच-संतोपादि नियमोंसे चुक्त हो शब्द
हृदयसे पश्चाक्षर मन्त्रका बारह सटख जाय करें। तसश्रात्
पंच सपत्वीक ब्राह्मगाका; जो श्रेष्ठ एवं शिवभक्त हों, वरण
करें| इनके अतिरेक्त एक श्रेंट आचायप्रचरका भी बरण
करे ओर उसे साम्ब सदाशियवा स्वरूप समसे। ईशान:
तत्पुरुप। अबोरः वामदेव तथा सयोज्ञात--एन पौर्चेकि प्रतीक-
खरप पॉच ही श्रेष्ठ ओर शिवभक्त ब्राह्मगेत्रा बरण करनेडे
पश्चात् पृजन-सामग्रीकीं एकन करके भगवान शिक्षका
पूजन आरम्भ कर । दि पप्रव क्र मिल । पृथा सम्पत्त खाँ;
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#जहन्न्यून ट्रफ अं 5 “हिन्द
ट्ोम आरभ्म करे
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जे ज्श् रू 4 है ॥ | छ कम व | घ्त पं ५ ञं ्ँ सख्त
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कक का, कक चेक का अनही #ौ कफ >ह+अ ५ आयोग: कम ३ और कद आफ अ०थ्यका पलक झकंर नाक ही
इईगै4 , » (०८ 8१; व ॥ » 7, हु ० 4 काट न ध्य्रघाा
पु शा नै
प्र डा >क पक नचय 'जाइण्गूडन ताक ६ कमा चछ.. -॥ सामम्पुक शक ज०क कच ष्र (मम ह क्ाकाा
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रे ब् क्र, कक ह। मम शा हि कि है 5 ही हब 57७ 4 री हु बा ु !
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शा आम
(५९2
४£ नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने १:
[ सक्षिप्त-शिवपुराणाडु
होमकर्म समाप्त होनेपर गुझको दक्षिणाके रूपमें एक गाय
और. बैल देने चाहिये । रशान आदिके प्रतीकरूप जिन
पॉच ब्राह्मणोंका वरण किया गया हो; उनको ईशान
आदिका खरूप ही समझे तथा आचायको साम्ब सदा-
शिवका स्वरूप माने | इसी भावनाके साथ उन सबके चरण
घोये और उनके घरणोदकसे अपने मस्तकको सींचे |
ऐसा करनेसे वह साधक अगणित तीर्थर्मं तत्काल
स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। उन ब्राह्मणोंको भक्ति-
पूवंक दरशाज़् अन्न देना चाहिये । गुरुपज्ञीको पराशक्ति
मानकर उनका भी पूजन करे । ईशानादि-क्रमसे उन
सभी ब्राह्मणोंका उत्तम अज्नसे पूजन करके अपने वेभव-
विस्तारके अनुसार रुद्राक्ष, वस्त्र; बड़ा ओर पूआ आदि
अपित करे । तदनन्तर दिक्पालादिको बलि देकर ब्राह्मणोंको
भरपूर भोजन कराये । इसके बाद देवेश्वर शिवसे प्रार्थना
करके अपना जप समाप्त करे | इस प्रकार पुरश्चरण करके
मनुष्य उस मन्त्रकों सिद्ध कर लेता है । फिर पाँच छाख
जप करनेसे समस्त पार्पोका नाश हो जाता है। तदनन्तर
पुनः पॉच लाख जप करनेपर अतलसे लेकर सत्यछोकतक
चौदहों भुवनोंपर क्रमशः अधिकार प्राप्त हो जाता है ।
यदि अनुष्ठान पूर्ण होनेके पहले बीचमें ही साघक्रकी म्त्यु
हो जाय तो वंह परछोकमें उत्तम मोग भोगनेके पश्चात् पुनः
पृथ्वीपर जन्म लेकर पश्चाक्षर मन्त्रके जपका अनुष्ठान करता
है। समस्त लोकोंका ऐश्वर्य पानेके पश्चात् वह मन्त्रको सिद्ध
करनेवाला पुरुष यदि. पुनः पाँच छाख जप करे तो उसे ब्रह्मा-
जीका सामीप्य प्राप्त होता है। पुनः पॉच छाख जप करनेसे
सारूप्य नामक ऐश़र्य प्रात होता है। सी लाख जप करनेसे
बह साक्षात् ब्रह्माके समान हो जाता है। इस तरह कारय-
ब्रह्म ( हिरिण्यगर्भ ) का सायुज्य प्राप्त करके वह उस ब्रह्माका
प्रछय होनेतक उस लोकमें यथेष्ट भोग मोगता है | फिर दूसरे
कल्पका आरम्म होनेपर वह ब्रह्माजीका पुत्र होता है | उस
समय फिर तपस्या करके दिव्य तेजसे प्रकाशित हो वह क्रमशः
मुक्त हो जाता है । पृथ्वी आदि ,कार्यखरूप भूतोंद्वारा पातालसे
लेकर सत्यलोकपय्यन्त ब्रह्माजीके चोदह छोक क्रमशः निर्मित
हुए, हैं । सत्यलोकसे ऊपर क्षमालोकतक जो चोदह भुवन हैं,
वे भगवान विष्णुके लोक हें । क्षमाल्लेकसे ऊपर झुचिल्लेकपर्यन्त
अद्वाईस भुवन स्थित हैँ । झुचिलोकके अन्तर्गत कैलासमें
प्राणियोंका संहार करनेवाले रुद्रदेव विराजमान हैं | शचिलोकसे
रे
आओ
ऊपर अहिंसालोकपर्यन्त छप्पन भुवनोंकी स्थिति है। अध्दिता
लोकका आश्रय लेकर जो शानकेटास नामक नगर शोमा
पाता है, उसमें कार्यभूत महेश्वर सबको अद्ब्य करके रहते
हैं| अहिंसालोकके अन्तमें काल्यक्रकी स्लिति है। यहाँतक
महेश्वरके विराटस्वरूपका वर्णन किया गया । वहींतक छोकोंक
तिरोधान अथवा लय होता है। उससे नीचे कर्मोक्रा भोग रे
ओर उससे ऊपर श्ञानका भोग । उसके नीचे कर्ममाया है भर
उसके ऊपर ज्ञानमाया |
( अब में कर्ममाया ओर ज्ञानमायाक्रा तालय बता खा
हूँ---) 'मा? का अर्थ है लक्ष्मी | उससे कर्ममोग यात--आा्ष
होता है | इसलिये वह माया अथवा कर्ममाया कहलाती हैं।
इसी तरह मा अर्थात् लक्ष्मीसे ज्ञानभोग यात अर्थात् प्राप्त होता
है | इसलिये उसे माया या श्ञानमाया कहा गया है | उपयुक्त
सीमासे नीचे नश्वर भोग हैं ओर ऊपर नित्य भोग | उससे नीचे
ही तिरोधान अथवा लय है; ऊपर नहीं । वहाँसे नीचे ही
कर्ममय पाशोंद्वारा बन्धन होता है। ऊपर बन्धनका सदर
अभाव है। उससे नीचे ही जीव सकाम कर्मोंका अनुसरंग
करते हुए. विभिन्न छोकों ओर योनियोंमें चक्कर काटते हैं |
उससे ऊपरके लोकोंमें निष्काम कर्मका ही भोग बताया गया है।
बिन्हुपूजामें तत्पर रहनेवाले उपासक वहाँसे नीचेके लोक़ोंमें है.
घूमते हैं । उसके ऊपर तो निष्कामभावसे शिवलिड्न्की
करनेवाले उपासक ही जाते हैं। जो एकमात्र शिवकी है
उपासनामें तत्पर हैं, वे उससे ऊपरके लोकोंमें जाते हैं | बहाँत
नीचे जीवकोटि है ओर ऊपर ईश्वरकोटि | नीचे संसारी जी
रहते हैं और ऊपर मुक्त पुरुष । नीचे कर्मलेक है और ऊफ |
शानछोक । ऊपर मद ओर अहंकारका नाश करनेवाली नम्रत ||
है, वहाँ जन्मजनित तिरोधान नहीं है | उसका निवारण किये
बिना वहाँ किसीका प्रवेश सम्भव नहीं है।इस प्रकार |
तिरोधानका निवारण करनेसे वहाँ ज्ञान-शब्दका अर्थ है|
प्रकाशित होता है। आधिमोतिक पूजा करनेवाले छोग उस्शे।
नीचेके लोकोंमें ही चक्कर काटते हैं | जो आध्यात्मिक उपात्ना
करनेवाले हैं, वे ही उससे ऊपरको जाते हैं |. |
जो सत्य-अहिंसा आदि घर्मोसे युक्त हो भगवान शिक्रे
पूजनमें तत्पर रहते हैं, वे कालचक्रकों पार कर जाते है।
कालचक्रेश्वरकी सीमातक जो विराट महेश्वरछोक बताया गा
हैं, उससे ऊपर ब्रषभके आकारमें पं्ंकी स्थिति है।
ब्रह्मचयका मूर्तिमान् रूप है। उसके सत्य, शौच) अह्िं
विद्येश्वरसंदिता | #
और दया--ये चार पाद हैं | वह सान्षात् शिवलोकके द्वारपर
खड़ा है | क्षमा उसके सींग हैं; दम कान दे) वह वेदध्वनि-
झयी गाब्दसे विभूषित दे | आस्तिक्रता उसके दोनों नेत्र हैं,
विश्वास ही उसकी श्रेष्ठ तुद्धि एवं मन है। क्रिया आदि घम-
रपी जो ब्पम हैं; वे कारण आदिम स्थित हँ--ऐसा जानना
चादिये । उस क्रियारुप ब्रप्भाकार धर्मपर कालछातीत शिव
आरुढ होते हैं | ब्रह्मा, विष्णु और महेद्यकी जो अपनी-अपनी
आयु है; उसीकी दिन कहते द। जहाँ धमंरूपी बृपभकी खिति
है; उससे ऊपर न दिन है न रात्रि। वहाँ जन्म-मरण आदि
भी नहीं हैं। वहाँ फिससे कारणस्वरूप ब्रह्मके कारण संत्यलोक-
पवन्त चोदद ठोक खित हैं, जो पाश्चभमोतिक गनन््व आदिसे परे
7४ । उनकी सनातन ख्िति है | सूक्ष्म गन्ध ही उनका स्वरूप है।
उनसे ऊपर पिर कारणरूप विष्णुके चोदह लोक स्थित है |
डगसे भी ऊपर फिर कारारुपी रुद्रके अछ्ईस लोकोंकी स्थिति
मानी गयी है | फिर उनसे भी ऊपर कारणेश शिवके छप्पन:
टोक विद्यमान है । तदनस्तर शिवसम्मत ब्रद्मयचय लोक है ओर
पहीँ पाँच आवरणंसि युक्त शानमय केलास हे) जहाँ पॉच
मण्टर्ला, पांच ब्रह्मकतद्मयओं और आदिशक्तिसे संयुक्त आदि-
लिप प्रतिशत है | उसे परमात्मा शिवका दिवारूय कहा गया
४ । यहाँ पणाशक्तिसे युक्त परमेश्वर शिव निवास करते हैँ । ये
खाए पालन) संहार) तिरोभाव और अनुग्रहं---इन पाँचों कृत्पॉमें
प्रवीण हैं। उनका श्रीतरिग्रह संचिदानन्द्खस्प है। वे सदा
ग्पागछ्ी भममें ही खित रहते ६ भोर सदा सबपर अनुग्रद
किया करते हैँ । थे खात्माराम £ूँ ओर समाधिरुपी आसनपर
पफासीग हो नित्य विराजमान होते है | कर्म एवं ध्यान आदिका
पतन करनस क््गदा। साधनपंथरमं आगे बदनेपर उनका
हाव बाय दासा है। निद्ननेमिसेक आदि फयमांद्वारा
5५ तिसाओ़ी सतम परनेसे भगवान शिव समाराधन-कर्मे
एयठा £ । किया आदि जो शिवसम्बन्धी कर्म हैं, उनके
एग शिषणन सिद शिगनच्या रम्ः
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पडलिद्वख रूप प्रणबका माहात्म्य, उसके खक्ष्म रूपका विवेचन हेँ:
जप
अपने भक्तके अज्ञानक्रीं मिय देते हैं। अज्ञानक्री निद्वत्ति हो
जानेपर शिवज्ञान खतः प्रकट हो जाता है | शिव्रज्ञानसे अपना
विश्वुद् खहूप आत्मायमत्त प्रात होता है ओर आत्मा -
रामलकी सम्बक सिद्धि हो जानेपर मनुष्य ऋृत्यक्रत्य हो
जाता है !
इस तरह यहाँ जो कुछ बताया गया है; वह पहले मुझे गुरु-
परम्परासे प्रात्त हुआ था। तत्पश्रात् मेने पुनः नन््दीश्वरके
मुखसे इस विपयको सुना था। नन्दिस्थानसे पर जो स्वंवेयय
शिव-वैभव है; उसका अनुभव केत्रल भगवान् शित्रकों ही है।
साक्षात् शिव्येकके उस वेभवका ज्ञान सबकी शिवकी कृपासे
ही हो सक्रता है; अन्यथा नहीं--ऐसा आस्तिक पुरुर्षोका
रा |
ऋषन ्द |
साधकको चाहिये कि वह पॉँच छाख जय करनेक्े पश्चात्
मगवान धित्रकी प्रसन्नताके लिये महाभिषेक एवं नवेद
निवेदन करके शिवभक्तोंका पूजन करे। भक्तकी पूजासे भगवान्
शिव बहुत प्रसन्न होते ई। शिव ओर उनके भक्तमें कोई
भेद नहीं है। वह साक्षात् शिवत्वरूप ही हे । शिवस्वरूप
मन्त्रको धारण करके वह शिव ही द्वो गया रहता दे। शिवभक्तका
दरीर शित्रूप ही है। अतः उसकी सेव्रार्मे तत्पर रहना
चाहिये। जो शित्रके भक्त हैं; वे लोक ओर वेदफ़ो सारी
क्रियाओंकों जानते ह। जो ऋमशः जितना-जितना गियमन्ब्का
जप कर लेता # उसके शरीरकों उतना-दी-उतना शिवरका
सामीष प्राप्त होता जाता है। इसमें संशय नहों है । शिव्रभक्त
ख्रीका रूप देवी पावतीका दी खरूप है । बह जितना सन्त
जपती है; उसे उतना दी देवीका खांनिष्य प्राम होता जाताहे ।
गधक स्वयं शिवत्वरूप ट्ोकर पराशक्तिक्त पतन के | दाक्ति।,
पर तथा छिद्रया चित बनाकर अगवा भिद्ठों आटिसे
एइनझी आद्वतिका नि्माय करके प्रायवनलिशगसकू निश्कृपट
भावस शनश्य एलन ऋरत।त वियजडिगका दाीब गसनदार॥
समझवर, दा थी गानएछ झ्फ
आपने की शिकार समझकर, धियलिद्रझ
नद्र परच्र सूट हुए हार दे
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शिवमक्तकी सेवा आदि करके उसे आनन्द प्रदान करता हैः
उस विद्वानपर भगवान् शिव बड़े प्रसन्न होते एँ। पॉच), दस
या सो सपत्नीक शिवभक्तोंको बुल्यवःर भोजन आदिके द्वारा
पत्नीसहित उनका सदैव समादर करे । घनमें, देहमें ओर
» नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
ब्च्च्म्न घी
दिफ त
मन्न्रम शिवभावना रखते हुए शिव ओर शत्तिक्रा
स्वरूप जानकर निष्कपट भावसे उनकी प्रजा करे। ऐस़ा
करनेवाला पुरुष इस भूतलपर फिर जन्म नहीं लेता |
( अध्याय १७ )
न्ननन-ननलशयत-ए.- ०-नब्बचू-+-
बन्धन और मोक्षका वियेचन, शिवएजाका उपदेश, लिड्ग आदिमें शिवपूजनका विधान, भक्तके खदपक्ा
[0
४॥]|
निरूपण ओर महत्व, शिव एवं शुरु शब्दकी व्युत्पत्ति तथा शिवके भखधारणका रहस्य
इुंप्लि दोले--सर्वशेंमें श्रेष्ठ सूतजी | बन्धन ओर मोक्षका
स्वरूप क्या है १ यह हमें बताइये ।
छतजीने कष्टा--महर्षियो! में बन्धन ओर मोक्षका
सख्रूप तथा मोक्षके उपायका वर्णन करूँगा | तुमलोग आदर-
पूर्वक सुनो । जो प्रकृति आदि आठ बन्धनोंसे बँधा हुआ है; वह
जीव वद्ध कहलाता है ओर जो उन आठों बन्धनोंसे छूटा
हुआ है, उसे मुक्त कहते हैं | प्रकृति आदिको वशमें कर
लेना मोक्ष कहलाता है । बन्धन आगन्तुक है और मोक्ष स्वतः-
सिद्ध है । वद्ध जीव जब बन्धनसे मुक्त हो जाता है तब उसे
मुक्तजीव कहते हैं | प्रकृति; बुद्धि ( महत्तत्त्त निगुणात्मक
अहंकार ओर पॉच तन्मत्राएँ--5नहें ज्ञानी पुरुष प्रक्ृत्या्रष्टक
मानते हैं । प्रकृति आदि आठ तत्त्वोंके समूहसे देहकी उत्पत्ति
हुई है | देहसे कर्म उत्पन्न होता है और फिर कर्मसे नूतन
देहवी उत्पत्ति होती है | इस प्रकार बारंवार जन्म ओर कर्म
होते रहते हैं। शरीरको स्थुल; सूक्ष और कारणके
मेदसे तीम प्रकारका जानना चाहिये । स्थूछ शरीर
( जाग्रत् अवस्थामें ) व्यापार करानेवाला, सूक्ष्म शरीर
( जाग्रत् और खप्न-अवस्थाओंमें ) इन्द्रिय-मोग प्रदान
करनेवाला. तथा कारण-शरीर ( सुषुप्तावस्थामें )
आत्मानन्ददी अनुभूति करनेवाला कहा गया है। जीवको
उसके प्रारब्ध-कर्मानुसार मुख-दुःख प्राप्त होते हैं | वह अपने
युष्यकर्मोके फलखरूप सुख ओर पापकर्मोके फल्खरूप
छुश्वका उपभोग करता है । अतः कर्मपाशसे बँघा
हुआ जीव अपने त्रिविध शरीरसे होनेवाले झुमा-
शुभ कर्मोद्दारा सदा चक्रकी मौँति वारंबार घुमाया जाता
है | इस चक्रवत् अ्रमणकी निद्वत्तिके लिये चक्रकर्ताका स्तवन
एवं आराघन करना चाहिये | प्रकृति आदि जो आठ पाश
चतलाये गये हें? उनका समुदाय ही महाचक्र है और जो
प्रकृतिसे परे है? वह परमात्मा शिव है। भगवान महेश्वर
दी प्रकृति आदि मद्दाचक्रके कर्ता हैं; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे
हैं। जेसे बकायन नामक इक्षका थाछा जलको पीता और
उगलता है, उसी प्रकार शिव प्रकृति आदिको अपने वश्नमें
करके उसपर शासन करते हैं । उन्होंने सबको वश्ममें कर ल्थि
है, इसीलिये वे शिव कहे गये हैं |शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण तथ
निःस्प॒ह हैं | सर्वश्ञता; तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता; निल
अल्प शक्तिसे संयुक्त होना ओर अपने भीतर अनन्त शक्तियोको
धारण करना--महेश्वरके इन छः प्रकारके मानसिक ऐश्वयोको
केवल वेद जानता है | अतः भगवान् शिवके अनुग्रहसे ही
प्रकृति आदि आठों तत्त्व वश्चमें होते हैं। मगवान् शिवका
कृपा-प्रसाद प्राप्त करनेके लिये उन्हींका पूजन करना चाहिये |
यदि कहें--शिव तो परिपूर्ण हैं, निःस्पृह् हैं; उनकी पूजा
केसे हो सकती है? तो इसका उत्तर यह है कि मगवान
शिवके उद्देश्यसे--उनकी प्रसन्नताके लिये किया हुआ सत्कर्म-
उनके कृपाप्रसादको प्राप्त करानेवात्म होता है ।
शिवकी प्रतिमार्में तथा शिवभक्तजनोंमें शिवकी भावना करके
उनकी प्रसन्नताके लिये पूजा करनी चाहिये | वह पूजन शरीर्ते; |
सनसे, वाणीसे ओर घनसे भी किया जा सकता है। उस
पूजासे महेश्वर शिव, जो प्रकृतिसे परे हैं, पूजकपर विशेष कप
करते हैं और उनका वह कृपा-प्रसाद सत्य होता है। शिवकी
कृपासे कम आदि सभी बन्धन अपने वरुमें हो जातेएं।
कर्मसे लेकर प्रकृतिपर्यन्त सब कुछ जब बशमें हो जाता है
तब वह जीव मुक्त कहलाता है और खात्मारामरूपसे विराजमान
होता है। परमेश्वर शिवकी कृपासे जब कर्मजनित शरीर अपने
वशमें हो जाता है, तव मगवान शिवके छोकमें मिंवासका
सोभाग्य प्राप्त होता है |इसीको सालोक्य-मुक्ति कहते है।
जब तन्मात्राएँ वशमें हो जाती हैं, तब जीव जगदम्वा- है
सहित शिवका सामीष्य प्राप्त कर लेता है। यह सामीण £
मुक्ति है; उसके आयुध आदि और क्रिया आदि स्व [मे
ऊँछ भगवान् शिवके समान हो जाते हैं। भगवानका
महाप्रसाद प्राप्त होनेपर बुद्धि भी वरमें हो जाती |
विद्येश्घरसंद्दिता ]
४: वनन््धन और भोक्षका विवेचत, शिवपूजाका उपदेश #
9
ल्स्ल्ल्ल्ल्ल््स्स्स््स्स्य्स्स्य्स्य््स्य्स्स्स्स्स्््स्य्य्य्य्स्य्स्स्य्य्य्य्य्य्स््य्स्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्स्स्स्-
है। वद्धि प्रकृतिका कार्य हैं | उसका बश्में होना साश्गिक्ति
बद्धा गया है | एन: संगवानका महान अनुग्रह प्राप्त होनेपर
प्रकृति बद्र्म हां जाबगी | उस समय भगवान शिवका सानसिक
ऐशवर्य बिना यलके ही मात्त दो जायगा | सर्वज्ञता ओर तृप्ति
आदि जी गशिवके ऐश्य हूँ; उन्हें पाकर सुक्त पुरुष अपने
: आत्मा ही ब्रिराजगान होता है। वेद और झाद्लोमें विश्वास
ख्नेवाल विद्वान पुरुष इसीको सायुज्य मुक्ति कहते हूँ। इस
प्रकार छिएः आदिम शिवकी पृजा करनेसे ऋ्रमदः मुक्ति स्वतः
प्रात हो जाती ४ । इसलिये शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेक्रे
'डिये तलग्बन्धी क्लिया आबिक्ि द्वारा उन्होंका पृजन करना
(ट्यि | झिबक्रिया। शिवतप, शिवमन्त्र-जय शिवज्ञान और
वध्यानक्रे लिये सदा उत्तरोत्तर अभ्यास बदाना चाहिये ।
तिद्िन प्रातःकाल्से रातकी सोने समबतक ओर जन्मकाल्से
कर मृत्युपयन्त सारा समय भगवान् शिवक्ते चिन्तन ही
ताना चाहिये । यद्योजातादि मन्त्रों तथा नाना प्रकारके
प्यास जो शिवकी पूजा करता है, वह शिवक्रो ही प्रात होगा ।
ध्रपि बोले-उत्तम श्तका पाछन करनेवाले सृतजी !
प्र आदिम शिवजीबी पृजाका क्या विधान है। यह दर्मे
ये ।
। खतजीने फह्ा-द्विजों | में छिक्ञोकि क्रमका वधावत्
न बर रहा हूँ | तुम सब लोग सुनो | वह प्रणव ही
सता अभी वस्तुओको देनेवातद्य प्रथम लिए है
अपरूुप समझो। सृश्म छिए्ः निष्कल होता है ओर स्थल
(ं सयर्ट । पधानर मन्नयोी ही स्थल लिए कटसे एं। उन दोनों
(िय दिक्षोद्रा पूजन तप कहता है । ये दोनों ही लिए
भाण दुंसबाड है ऐैय लिएः अर प्रह्नति-लिए्फ
व्ण्क न.
2 ५ (पर पा कक ६ | जुर;;
न्र्ाः छ ६
| उसे यूय्म .
भगयान् शिव ही विस्तारपृतरक -
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८ पते । दुसनत कोई नहीं जानता । परष्पीफे थि वारमनत
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दी बदने लगता है। सोने-चाँदी आदिके पत्रपरः थूमिपर
अथवा वेदीपर अपने हाथसे लिखित जो शुद्ध प्रणय-मन्न्ररूप
भगवान् शिवकी प्रति ओर आवाहन करें। ऐसा बिन्दुनाद-
मय छिटड्ढ ख्ावर और जंगम दोनों ही प्रकारका होता है। इसमें
शिवका दर्शन भावनामय ही है। ऐसा निस्संदेह कद्या जा
सकता है। जिसको जहाँ भगवान् शंकरके प्रकट होनेका
विश्वात हो; उसके लिये वहीं प्रकट होकर वे अभीए फल प्रदान
करते हूँ | अपने हाथसे लिखे हुए यन्त्रमं अथवा अदक्नन्रिम
स्थवावर आदिम भगवान शिवका आवाहन करके सोलह
उपचारोंसे उनकी पूजा करें। एसा करनेसे साधक्र खयं ही
ऐ्वयंको प्राप्त कर लेता है ओर इस साधनके अभ्याससे उसको
शान भी होता है। देवताओं ओर ऋषियोंने आत्मसिद्धिकरे
लिये अपने हाथसे वेदिक मन्त्रोके उचचारण[वेक्र शुद्धमण्डलमे
युद्ध भावनाद्वारा जिस उत्तम शिवलिड्ल्नकी सापना दी हैः
उसे पीदप लिझ कद्दते है | तथा बह्दी प्रतिट्ित लिड़ कहलाता
है। उस लिट्ककी पृजा करनेसे सदा पोदप ऐश्वय् क्री यात्ति होती है।
महान ब्राह्मण ओर महाधनी राजा क्रिसी कारीगरसे शिवलिक्ञका
निर्माण कराकर जो मन्त्रवृूवक उसकी स्थापना करते हूँ, उनके |
या खापित हुआ वह लिझ्ट भी प्रतिष्ठित लिन कहलाता है ।
क्ितु वह प्रांत लिड् है। इसलिये प्राइत ऐश्वर्य-भोगको ही
देनेवाद्य होता है| जो शक्तिशाली ओर नित्व होता £ै; उसे .
पोदष बदते £ूँ तथा जो हुबल ओर अनित्य ट्ता है; बह
प्राकृत कहलाता दै |
लिड्ठ) नाभि; जिदा। मासाम्रमाग ओर दिलाक्ष ऋमसे
फटि, हुद्य ओर मस्तक तीनों न्यानोर्म जो छिट्ठकी भावना
गयी है; उस आध्यात्मिक लिठ्कों ही चरालिए कहने ८।
पतकों पॉदिपाडद्र दताया गया हैं आर शूनलओं विद्वान पर
प्रारुतलिएः मानते | । इस आडेनो
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५८ % नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने [ संक्षिप्त-शिवपुराणा्
वैश्योंको महाघनपतिका पद प्रदान करनेवाला है तथा सुन्दर
शिलालिड्र शद्रोंकी महाग्ृद्धि देनेवाला है| स्फटिकमय लिछ्न
तथा बाणलिड्ज सब लछोगोंको उनकी समस्त कामनाएँ प्रदान करते
हैं। अपना न हो तो दूसरेका स्फटिक या बाणलि8क् भी पूजाके ल्यि
निषिद्ध नहीं है | स्त्रियों, विशेषतः सघवाओंके लिये पाथिव
लछिड्न्की पूजाका विधान है । प्रद्नत्तिमार्गमं स्थित विघवाओंके
लिये स्फटिकलिज्ञकी पूजा बतायी गयी है। परंतु विरक्त विधवा-
ओके लिये रसलिज्गकी पूजाकों ही श्रेष्ठ कहा गया है । उत्तम
ब्रतका पालन करनेवाले महर्षियों ! बचपनमें। जवानीमें और
बुढ़ापेमें भी शुद्ध स्फथिकिमय शिवलिज्ञका पूजन म्ररियोंको
समस्त भोग प्रदान करनेवाला है। ग्रहासक्त स्तरियोंके लिये
न्ब्क 5
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पीठपूजा भूतलपर सम्पूर्ण अभीश्की देनेवाली है ।
प्रवृत्तिमार्गमं चलनेवाला पुरुष सुपात्र गुरुके सहयोगसे
- ही समस्त पूजाकर्म सम्पन्न करे | इश्देवका अभिषेक करनेके पश्चात्
अगहनीके चावलसे बने हुए. खीर आदि पक्वाज्नोंद्वारा नेवेद्य
अर्पण करे । पूजाके अन्तमें शिवलिज्ञको सम्पुटमें पधराकर
घरके भीतर थक रख दे । जो निद्वत्तिमार्गी पुरुष हैं; उनके
लिये हाथपर ही शिवलिड्भ-पूजाका विधान है। उन्हें मिक्षादिसे
प्रात्त हुए अपने भोजनकों ही नेवेद्रूपमें निवेदित करना
चाहिये । निद्नत्त पुरुषोंके लिये सूक्ष्म लिझ्नः ही श्रेष्ठ बताया
जाता है। वे विभूतिके द्वारा पूजन करें और विभूतिको ही नेवेद्-
रूपसे निवेदित भी करें । पूजा करके उस लिड्गकों सदा अपने
मस्तकपर धारण करे ।
विभूति तीन प्रकारकी बतायी गयी है--छोकाग्निजनित;
वेदाग्निननित और शिवाग्निननित । छोकाग्निजनित या
व्यैकिक भस्सको द्रव्योंकी शुद्धिके लिये छाकर रक््खे ।
मिट्टी, लकड़ी ओर लेहेके पात्रोंकी, धान्योंकी, तिरू आदि
द्रव्योंकी) बस्र आदिकी तथा पयुषित वस्तुओंकी भस्मसे शुद्धि
होती है | कुत्ते आदिसे दूषित हुए पात्रोंकी भी भस्मसे ही
शुद्धि मानी गयी है | वस्तु-विशेषकी झुद्धिके लिये यथायोग्य
सजल अथवा निर्जल भस्मका उपयोग करना चाहिये | वेदाग्नि-
जनित जो भस्म है; उसको उन-उन वेदिक कमोंके अन्न्तमें
धारण करना चाहिये | मन्त्र और क्रियासे जनित जो होमकर्म
है, वह अग्निमें भस्मका रूप धारण करता है।। उस भस्मको
धारण करनेसें वह कर्म आत्मामें आरोपित हो जाता है।
अबोर-मूर्तिधारी शिवका जो अपना मन्त्र है, उसे पढ़कर वेल-
शी अली ले 23 मत जल असम सलीम टन सकल पक 2 क ली
१. अधोर-मन्त्रको पृष्ठ ३६ की टिप्पणीमें देखिये । ु
की लकड़ीकों जछाये | उस मन्त्रसे अभिमन्त्रित अमिगे
शिवाग्नि कद्दा गया है | उसके द्वार जले हुए काश दे
भस्म है; वह शिवाग्निजनित है| कपिठा गायके गोबर अपः
गायमात्रके गोबरकोी तथा शमी; पीपल; पलाद3 बड़; अर
तास ओर बेर--इनकी लकड़ियोंको शिवाग्निसे जलाये |
झुद्ध भस्म शिवाग्निजनित माना गया है । अथवा कुछ
अग्निमें शिवमन्त्रके उच्चारणपूर्वक काष्टको जलये | फि ढ
भस्मकोी कपड़ेसे अच्छी तरह छानकर नये घड़ेमें मर ए
दे । उसे समय-समयपर अपनी कान्ति या झोमाकी इक
लिये धारण करे | ऐसा करनेवाला पुरुष सम्मानित एवं पर
होता है | पूर्वकालमें भगवान् शिवने भस्म-शब्दका ऐवः
अर्थ प्रकट किया था । जेसे राजा अपने राज्यर्म सारभूत $
को ग्रहण करता है, जेसे मनुप्य सस्य आदिको जद
( शँधकर ) उसका सार ग्रहण करते हैं तथा जेसे जग
नाना प्रकारके भक्ष्यय भोज्य आदि पदार्थकों भारी म
ग्रहण करके जलछाता; जलकर सारतर वस्तु ग्रहण करता:
उस सारतर वस्तुसे खदेहका पोषण करता है। उसी ;
प्रपश्चक्ता परमेश्वर शिवने भी अपनेमें आधेयरूपसे विश्व
प्रपश्चको जलाकर भस्मरूपसे उसके सारतत्त्वको अहण
है। प्रपश्चको दग्ध करके शिवने उसके मस्मको अपने
लगाया है| राख, भभूत पोतनेके बहाने जगतके साख!
ग्रहण किया है | अपने शरीरमें अपने लिये रत्तस्वरूप मर
इस प्रकार स्थापित किया है--आकाशके सारतत्वसे ?
वायुके सारतत्त्वसे मुख, अग्नके सारतत्वसे हृदय |
सारतत्वसे कठिमाग और प्रथ्वीके सारतत्त्वले घुटनेको |
किया है | इसी तरह उनके सारे अड्ग विभिन्न वस्तुओंडे
रूप हैं | महेश्वरने अपने ललाठमें तिलकरूपसे जो शिं
घारण किया है, वह ब्रह्मा; विष्णु ओर रुद्रका सारतत्त
वें इन सब वस्तुओंको जगतके अभ्युदयका हेतु मानते है
भगवान शिचने ही प्रपश्चके सार-सर्वखकी अपने वहा है;
है | अतः इन्हें अपने वशमें करनेवाल। दूसरा कोई न!
जेसे समस्त मृर्गोंका हिंसक मृगहिंसक कहल्यता है ओर |
हिंसा करनेवाला दूसरा कोई म्ृग नहीं है; अतएव उे
कहा गया है |
24
बन
उपर €४७५७.. ७४ तार ५१३... 0७.
शकारका अर्थ है नित्यसुख एवं आनन्द) ४, पे
अब अर सम के ना है है पुरुष और वकारका अर्थ है अम्तखवल्या शर्प। हे
रे ९ /
सबका सम्मिलित रूप ही शिव कहलाता है। अतः व
विधेश्वरसंदिता ] # पार्थियल्ठिइके निर्मोणर्ती रीति तथा बेद-मन्त्रो्धारा उसके पूजनकी विधि # ७५९
निशिलिलििलिलिनिलिशिशशशिकिलि वन कक शी शलनिमिक कमीज, व अअ 3 8 3 अाअाा॒ भय भा आााभारकभककाधकबकककथकन ४» कक कम कम दमा कमन नाम कथ कक वन गान कभइक आन कया भान इराक कमा भव भकऋभकभभ कक कक कक कम # कक का कभ कक कक थक कक मम ककमामपक कम कम भक न पक यान भय ३ कया
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न अरतापैरजनीयन नमन. ना उनमे प्री य सनी फनी पिकातग ९७“
करी-् माई. आम सकौआ+-प नायक "जडीती
भगवान थिवको अपना आत्मा मानकर उनकी पूजा करनी हें । वे अपनी मायाक्रे दिये हुए हन्द्रका खयं ही परिमाजेत
चाहिये; अतः पहले अपने अड्डम भस्म मले | फिर ल्लाटम करते हैं | अतः शिवके दृएश कल्पित हुआ इन्द्र उन्दींको
उत्तम त्रिपुण्ड्र घाएण करे | पृजाकालमें सलल भस्मका उपयोग. समर्पित कर देना चाहिये | जो शिवकी पजामें तत्पर हो) वह
ट्राता ? और द्व्यशद्धिके लिये निजल भस्मका | गुणातीत जोन रहे, सत्य आदि गुणति संयुक्त हो तथा क्रिया। जप) तप
पर्स शित्र राजस आदि सबिकार गुर्णोका अवरोध करते ६-- ज्ञान और ध्यानमेंसे एक-एकका अनष्ठान करता रहे | ऐश्वर्थ)
यते ६ इसलिये वे सबके गुरुू्मका आश्रव लेकर खित (दिव्य शरीरबी प्राप्ति, श्ञानका उदय अज्ञानका निवारण और
४ | गुर विश्वासी शथिप्यक्ति तीनों गु्णाको पहले दर करके फिर भगवान् शिव्रके सामीप्यका लाभ-ये क्रमशः क्रिया आदिके
उम्द शिवततका बोध कराते हैं। इसीडिये गुरू कहदाते ६। इछ हैं | निप्काम कर्म करनेसे अज्ञानका निवारण हो जानेके
गुगकी पूजा परमात्मा शिवकी ही पूजा है । गुरुके उपयोगसे . क्षारण शिवभक्त पुरुष उसके वथोक्त फलको पाता है। शिव-
- बचा हुआ सास पदार्थ आत्मश्द्धि करनेवाल्य द्वोता दै। भक्त पुरुष देश) काल) शरीर और धनके अनुसार यथायोग्य
ब्व आशाके ब्रिना उपयोगमें छाया हुआ सब कुछ बेंसा कया आदिका अनुष्ठान करे। न्यायोपाजित उत्तम धनसे निर्वाह
0 9 जैसे चोर चोरी करके त्यवरी हुईं वस्तुका उपयोग करता . &रते हुए विद्वान पुरुष शिवके स्थानमें निवास करे | जीव-
/ । गुय्से भी विशेष शानवान, पुरुष मिल जाय तो उसे भी हिंसा आदिसे रहित ओर अल्यन्त क्लेशगशून्य जीवन बिताते
पपूपक गुरु बना लेता चाहिये | अज्ञानरू्पी बन्चनसे छूटना हुए पश्चाक्षसमन्त्रके जपसे अमिंमन्त्रित अन्न और जलकों सुख-
त जीवगात्रके लिये साध्य पुरझषाथ है । अतः जो विद्येप दा
|, बह च स्वरूप माना गया हू.) अथवा बहूतें दें कि दर्द पुरुपके लिये
धनय मुहं; जी वको को उस यनन््ध द्ूठ कंता कर्म
धनवान ४) वही जीवकी उस बन््धनसे छुड्टा सकता है। भिक्षासे य्राप्त हुआ अन्न ज्ञान देनेवात्य होता हे | शिवमक्तको
जन्म ओर मरणरूप हन्द्रको भगवान् शिवक्री मायाने टी. भिक्षान्न प्राप्त हो तो वह दिवभक्तिको बढ़ाता है | झिव-
सषित किया ९ । जो इन दोनेको शिवकी मायाकों ही अर्पित. योगी पुरुष मिल्षान्नकरो दाम्मुसच कहते हैँ । जिस किसी भी
हर ता ९) पद्द फिर शरीरके बनने नहीं पड़ता । जबतक उपायसे जहाँ-कह्दी भी भूतलपर शुद्ध अन्नका भोजन करते हुए
गरर रहता ए तबतक जो क्रियाक्ते दी अदीन ऐक वंह जीव बद्ध. सदा मोनभावसे रहे ओर अपने साधनका रहस्य किसीपर प्रकट
हुणाता ५ | रपूल) सूक्ष ओर कारण--तीनों शरीरोको बदा्म ने करे | भक्तीके समनझ्ष थिवके मसाद्मत्मकों दी प्रकाशित करें |
२ जैनेगर शीवका भें | ्टो जाता ि ? ऐसा धानी प्शयोका विवमन्न्र्र रएस्य को भगवान दिव टा जानते हूँ; दसरा नर्शा
कपन है। सायाचकके निर्माता भगव न शिव ही परम सारण ' ( अध्याय १८ )
९
२5 सध्त्ायत-5
एार्थिवलिड्के निर्माणकी रीति तथा वेद-मन््त्रोंद्दरा उसके पूजनकी विस्व॒त एवं
संक्षप विधिका वर्णन
सदनजर पाषय लिक़्शी श्रेष्ठटठटा तथा मटिमाका. दिये झेची सक्तिमावनाे खा उनमे प्रधियशिद्र्दी सेद्योस्द
२३ के पु, खतजी प्ए्त ह--मट| । आए मे चादफए दापस शारादाल पएश दर [ नौ यू रु $ 4५ ६१/]७१* 247.
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5 फानम्षक्त २: डा 5) ६+ $ "सा सागर एर* एइसम) शगाजयन झाबया हर कद दब रपलिस शा -
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॥
(८ १ नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने #
[ सह्षिप्त-शिवपुराणाइ
वैश्योंको महाघनपतिका पद प्रदान करनेवाला है तथा सुन्दर
शिलालिड़ शूद्रोंकी महाशुद्धि देनेवाला है ।सस््फटिकमय लिठ्ग
तथा बाणलिड्ज सब लोगोंको उनकी समस्त कामनाएँ प्रदान करते
हैं। अपना न हो तो दूसरेका स्फटिक या बाणलिक्न भी पूजाके लिये
निषिद्ध नहीं है | झ्लियों, विशेषतः सधवाओंके लिये पाथिव
लिड्गकी पूजाका विधान है । प्रद्वत्तिमार्गम स्थित विधवाओंके
लिये स्फटिकिलिड्गजकी पूजा बतायी गयी है । परंतु विरक्त विधवा-
ओंके लिये रसलिड्गकी पूजाकी ही श्रेष्ठ कह्य गया है | उत्तम
प्रतका पालन करनेवाले महर्षियो | बचपनमें। जवानीमें ओर
बुढ़ापेमें भी शुद्ध स्फटिकमय शिवलिज्गका पूजन म्ियोंको
समस्त भोग प्रदान करनेवाला है। गणश्हासक्त स्तरियोंके लिये
: पीठपूजा भूतलूपर सम्पूर्ण अमीश्को देनेवाली है ।
प्रवृत्तिमार्गमं चलनेवाछा पुरुष सुपात्र गुरुके सहयोगसे
“ही समस्त पूजाकर्म सम्पन्न करे। इश्देवका अभिषेक करनेके पश्चात्
अगहनीके चावलसे बने हुए; खीर आदि पक्वान्नोंद्वार नवेद्य
अर्पण करे । पूजाके अन्तमें शिवलिड्ठको सम्पुटमें पधराकर
घरके भीतर प्रथक रख दे । जो निवृत्तिमार्गी पुरुष है; उनके
लिये हाथपर ही शिवलिझ्ज-पूजाका विधान है। उन्हें भिश्वादिसे
प्रात्त हुए अपने भोजनको ही नेवेद्यरूपर्म निवेदित करना
चाहिये । निद्वत्त पुरुषोंके लिये सूक्ष्म छिद्ग ही श्रेष्ठ बताया
जाता है। वे विभूतिके द्वारा पूजन करें और विभूतिको ही ने वेच्-
रूपसे निवेद्त भी करें । पूजा करके उस छिड्ढडको सदा अपने
मस्तकपर धारण करें ।
विभूति तीन प्रकारकी बतायी गयी है--लोकाग्निजनित,
वेदाग्निननित ओर शिवाग्निजनित । लोकाग्निजनित या
लोकिक भस्मको द्रव्योंकी शुद्धिके लिये छाकर रक््खे ।
मिट्टी; लकड़ी ओर लोहेके पात्रोंकी, धान्योंकी, तिरू आदि
द्रव्योंकी; वस्र आदिकी तथा पयुषित वस्तुओंकी भस्मसे शुद्धि
होती है । कुत्ते आदिसे दूषित हुए, पात्रोंकी भी भस्ससे ही
शुद्धि मानी गयी है | वस्तु-विशेषकी झुद्धिके लिये यथायोग्य
सजल अथवा निर्जेल भस्मका उपयोग करना चाहिये | वेदाग्नि-
जनित जो भस्म है; उसको उन-उन बेंदिक कर्मोंके अन्तमें
धारण करना चाहिये । मन्त्र और क्रियासे जनित जो होमकर्म
है, वह अम्निमें भस्मका रूप धारण करता है. । उस मस्मको
धारण करनेसे वह कम आत्मामें आरोपित हो जाता है।
अत्रोर-मूर्तिधारी शिवका जो अपना मन्त्र है; उसे पढ़कर बेल-
१. अधघोर-मन्त्रको पष्ठ ३६ की टिप्पणीमें देखिये |
की लकड़ीकों जलाये | उस मन्त्रसे अमिमन्त्रित अमिरे
शिवाग्नि कहा गया है | उसके द्वारा जले हुए काप्तरा हे
भर्म है, बह शिवाग्निजनित है | कपिला गायके गोबर अप
गायमात्रके गोबरको तथा दामी; पीपल; पलाद; बड़। आह
तास ओर बेर--इनकी लकड़ियोंको शिवाग्निसि जलाये | क्.
शुद्ध भस्म शिवाग्निजनित माना गया है | अथवा वुझ,
अग्निमें शिवमन्त्रके उच्चारणपूर्वक काष्टको जछाये | फरि &
भस्मको कपड़ेसे अच्छी तरह छानकर नये घड़ेम भज़र है.
दे | उसे समय-समयपर अपनी कान्ति या झोमाओ बे:
लिये धारण करे | ऐसा करनेवाला पुरुष सम्मानित एज |
होता है | पूर्वकाछमं भगवान् झिवने भस्म-दब्दका ऐसा
अथ प्रकट किया था | जेसे राजा अपने राज्यमें सारभूत 5;
को ग्रहण करता है; जैसे मनुप्य सस्य आदिकों ॑%
( रॉधकर ) उसका सार अहण करते हैं तथा जेसे ज०
नाना प्रकारके भक्ष्य; भोज्य आदि पदार्थोंकी भारी -*
ग्रहण करके जलाता, जव्यकर सारतर वस्तु अहण करता: '
उस सारतर वस्तुसे ख्देहका पोषण करता है; उसी +'
प्रपश्चकर्ता परमेश्वर शिवने भी अपनेमें आधेयरूपसे “६.
प्रपश्नको जलाकर भस्मरूपसे उसके सारतत्वकों ग्रहण, .
है। प्रपश्चको दग्ध करके शिवने उसके भस्मकी अपने & :
लगाया है | राख, मभूत पोतनेके बहाने जगतके साझे ३
ग्रहण किया है । अपने शरीरमें अपने लिये रत्सखरूप भ८ ३
इस प्रकार स्थापित किया है--आकाशके सारतत्यसे ३
वायुके सासरतत्त्वसें मुख, अग्निके सारतत््वसे हृदवः) ६
सारतत्वसे कटिमांग और प्रथ्वीके सारतत्त्वसे घुटनेको
किया है | इसी तरह उनके सारे अक् विभिन्न वस्तुओं:
रूप हैं| महेश्वरने अपने ललाटमें तिरुकरूपसे जो ?
धारण किया है, वह ब्रह्मा; विष्णु और रुद्रका साखत ,
वे इन सब वस्तुओंको जगतके अभ्युदयका हेतु मानते ९. कु
भगवान शिवने ही प्रपश्चके सार-सबेखकी अपने वरर्म के
| अतः इन्हें अपने वशमें करनेवाला दूसरा कोई # है
जैसे समस्त मृर्गोका हिंसक मुगहिंसक कहलाता है औ औ,
हिंसा करनेवाल्य दूसरा कोई मृग नहीं है; अतएवं ओ पैड
कहा गया है | नह
शकारका अथे है नित्यसुख एवं आन) £ ॥
व और का पर सवा है पुरुष ओर वकारका अर्थ हैं लमृतस्वरूगा शर्/ के
सबका सम्मिलित रूप ही शिव कहलाता है | अतः ई क् |
|
विधेश्वरसंदिता ] # पार्थिव्रलिज्ञके निर्माणर्ती रीति तथा वेद-मन्त्रोद्दाय उसके पूजनकी विधि # ५९
रकम कपाुरमकतापामकह पततभक्रयलाशएचलमदाबावाभालााह कागज ताप मात 5 मकर कक नई जयूम राम क तय जा का की 3232 +22 8402 ३4000 45% 7७998 ##७७#४/##४#4८#४9-७2७७#७७७४4७-४४७७७४४७४7४8829४79७/७
भगवान् शिवकोी अपना आत्मा मानकर उनकी पूजा करनी
चाहिये; अतः पहले अपने अड्जोंमें भस्म मले | फिर ललाटमें
उत्तम त्रिपुण्ड्र धारण करे | पूजाकालमें सजल भस्मका उपयोग
होता है और द्रव्यशुद्धिके लिये निजेल भस्मका । गुणातीत
परम शिव राजस आदि सविकार गुणोंका अवरोध करते हैं--
दूर हयते हैं, इसलियि वे सबके गुरुरूपका आश्रय लेकर स्थित
हैं| गुरु विश्वासी शिष्योंके तीनों गु्णोकी पहले दूर करके फिर
उन्हें शिवतत््वका बोध कराते हैं, इसीलिये गुरु कहलते हैं।
ग़ुरुकी पूजा परमात्मा शिवकी ही पूजा हैं ! गुरुके उपयोगसे
बचा हुआ सारा पदाथे आत्मशुद्धि करनेवाला होता है।
गुरुकी आश्ञाके बिना उपयोगमें छाया हुआ सब कुछ वेसा
ही है, जेसे चोर चोरी करके छायी हुई वस्तुका उपयोग करता
है | गुस्से भी विशेष शानवान् पुरुष मिल जाय तो उसे भी
यत्ञपूवक गुरु बना लेता चाहिये | अज्ञानर्पी वन्धनसे छूटना
ही जीवमात्रके लिये साध्य पुरुषार्थ है | अतः जो विशेष
(निवान् है, वही जीवको उस वन्धनसे छुड़ा सकता है।
॥ जन्म ओर मरणरूप इन्द्ृकों भगवान् शिवकी मायाने ही
अर्पित किया है। जो इन दोनोंको शिवकी मायाको ही अर्पित .
क्र देता है; वह फिर शरीरके बन्त्रममें नहीं पड़ता ।जबतक
करीर रहता है; तबतक जो क्रियाके ही अधीन है; बह जीव् बद्ध
हर भवन मं शो जत #. छग के पण है। स्थूछ, सूक्ष्म और कारण--तीनों शरीरौको वशर्में
(कर लेनेपर जीवका मोक्ष हो जाता है। ऐसा जानी पुरुषोंका
#ग्थिन ए। मायाचक्रके निर्माता मावन् शिव ही परम कारण
२3००-3५ +- नमन पपनन-नननमन- जनमप “मनन नमन न व + न कर नमन न न ५ मनन नमन ५७५ +नन्म+ नाप ८+++न नमन +कनन ८ नमन ५» नमन न मनन 39५++++ नमक व ननमन नमन फनन न सम कककककक मम नकान ११७५ नमक. ब मम मक्का ख फ् भ़््---ज+>-->>----+
हैं। वे अपनी मायाके दिये हुएए इन्द्रका खयं ही परिमाजन
करते हैं | अतः शिवके द्वार कल्पित हुआ इन्द्व उन्हींको
समर्पित कर देना चाहिये । जो शिवकी पूजामें तत्पर हो; वह
मोन रहे, सत्य आदि गुणेसे संयुक्त हो तथा क्रिया) जप; तप)
ज्ञान ओर ध्यानमेंसे एक-एकका अनुष्ठान करता रहे । ऐ्वय्य
दिव्य शरीरकी प्राप्ति, शनका उदय) अज्ञानका निवारण और
भगवान् शिवके सामीप्यका छाम-ये क्रमशः क्रिया आदिके
फल हैं | निष्काम कर्म करनेसे अज्ञानका निवारण हो जानेके .
: कारण शिवभक्त पुरुष उसके यथोक्त फ़छको पाता है) शिव-
भक्त पुरुष देश, काछ, शरीर और धनके अनुसार यथायोग्य
क्रिया आदिका अनुष्ठान करे | न्यायोपार्जित उत्तम घनसे निर्वाद्द
« करते हुए विद्यान् पुरुष शिवके स्थानमें निवास करे | जीव-
हिंसा आदिसे रहित ओर अत्यन्त क्लेशशून्य जीवन बिताते
हुए पदश्चाश्षस्मन्त्रके जपसे अमिंमन्त्रित अन्न और जल्को सुख- ,
स्वरूप माना गया हैं.) अथवा कहतें हैं कि दरिद्र पुरुषके लिये
मिक्षासे प्रात्त हुआ अन्न ज्ञान देनेवाला होता है | शिवभक्तको
मिक्षान्न प्राव्त हो तो वह शिवभक्तिको बढ़ाता है । शिव-
योगी पुरुष सिक्षात्षको शुम्मुसत्ञ कहते हैं । जिस किसी भी
उपायसे जहाँ-कहीं भी भूतलपर शुद्ध अन्नका भोजन करते हुए
सदा मौनमावसे रहे और अपने साधनका रहस्य किसीपर प्रेकूट
न करे | भक्तोंके समक्ष शिवके माहात्म्यको ही प्रकाशित करे।
' शिवसन्त्रकें रहस्यको भगवान् शिव ही जानते हैं, दूसरा नहीं |
द ह ह ( अध्यांय १८ )
हैँ
पार्थिवलिज्षके निमोणकी रीति तथा वेद-मन्त्रोंद़्रा उसके पूजनकी विस्तृत एवं
संक्षिप्त विधिका वर्णन
« परदनस्तर पार्थित्र लिड़को श्रेष्टठता तथा मद्दिमाका
णन करके सूतजी कहते है--महर्षियो ! अब मैं वैदिक
सके प्रति श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले छोगेकि लिये वेदोक्त मार्गसे
| पाथिव धूजाकी पद्धतिका वर्णन करता हूं | यह पूजा भोग
पर मोक्ष दोनोंको देनेवाली है | आहिकसूत्रोंमे|ं बतायी हुई
पिफे अनुसार विधिपूर्वक स्नान और संध्योपासना करके पहले
"७ करे | तत्श्वात् देवताओं) ऋषियों, सनकादि मनुष्यों
॥र पित्तरोंका त्पंण करे । अपनी रुचिके अनसार सम्पूर्ण
त्यफर्मको पूर्ण करके शिवस्मरणपूवेक भस्म तथा रुद्राक्ष
के फरे | तसश्चात् सम्यृ्ण मनोबाज्छित फलकी सिद्धिके
लिये "ऊँची भक्तिभावनाके साथ उत्तम पार्थिवलिड्ल्नकी वेदोक्त
विधिसे भठीमाँति पूजा करे | नदी या तालाबके किनारे) पर्वेत-
पर; वनमें, शिवाल्यमें अथवा ओर किसी पत्रित्र स्थानमें पार्थिव-
पूजा करनेका विधान है | ब्राह्मणो ! झ॒द्ध स्थानसे निकाली हुई
मिद्टीको यल्पूर्वक छाकर बड़ी सावधानीके साथ शिवलिज्नका
निर्माण करें। ब्राह्मणके लिये खेत, क्षत्रियके लिये छाल;
चैश्यके लिये पीली और झृद्रके लिये काली मिट्टीसे शिवलिद्ठ
बनानेका विधान है अथवा जहाँ जो मिट्टी मिल जाय; उसीसे
शिवलिंड्र बनाये ।
शिवलिक्न बनानेक्े लिये प्रवत्नपृवेक मिद्चका संग्रह ऋरके
६०
#.. ५+-गनंग जया ४-आाइ
$# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5:
अन्य. ऋथ। या २ आयामिग्याहनमैसिकी...+.. ऑन पडा.
[ संश्षिप्त-शिवपुराणाइ
'सकि ज्या्रइ “अंक न]
"/ 32
उस शुभ मत्तिकाको अत्यन्त शुद्ध स्थानमें रकखे । फिर उसकी
शुद्धि करके जलसे सानकर पिण्डी बना ले ओर वेदोक्त मार्गसे
धीरे-धीरे सुन्दर पाथिवलिड्गकी सवना करे । तत्यश्वात् भोग
ओर मोक्षरूपी फलकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूनेंक उसका पूजन
करे | उस पार्थिवलिड्नके पूजनक्री जो विधि है; उसे में विधान-
पूवंक बता रहा हूँ: तुम सब लोग सुनो । “3“नमः शिवाय!
इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए. समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण
करे--उसपर जल छिड़के । इसके बाद “भूंरसि०? इत्यादि
मन्त्रसे क्षेत्रसिद्धि करे; फिर प्ञापोड्स्मीन०? इसभमन्त्रसे जलका
संस्कार करे | इसके बाद “ममस्ते रुद्र ०? इस मन्ञसे स्फायिका-
बन्ध ( स्फटिक शिलाका घेरा ) बनानेकी बात कही गयी है ।
(नमः शर्म्भवाय०? इस मन्त्रसे क्षेत्रशुद्धि ओर पश्चाम्रतका
प्रोक्षण करे | तत्पश्चात् शिवभक्त पुरुष “नमः पूर्वक “्नीले-
ग्रीवाय०? मन्त्रसे शिवलिक्गकी उत्तम प्रतिष्ठा करे । इसके बाद
बैदिक रीतिसे पूजन-कर्म करनेवाला उपासक भक्तिपूर्वक “एतत्ते
रुद्रावसं ०? इस मन्त्रसे र्मणीय आसन दे । ५मा नो मेहान्तम् ०?
१. पूरा मन्त्र इस प्रकार है--भूरसि भूमिरस्यदितिरसि
विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य घत्रीं,' एथिवीं यच्छ पृथिवीं द*ह एथिवीं
मा हिध्सी: । ( यजु० १३ ।॥ १८ )
२. आपो अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु शतेन नो तप्वः पुनन््तु ।
विश्व* हि रिप्र॑ प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूत एमि । दौशक्षा-
सप्सोस्तनूरसि तां त्वा शिवा*शम्मां परि दघे भद्ग वर्ण युष्यन् ।
( यज्गञु० ४ १२ )
३. नमस्ते रुद्र मन््यव उतो त इधवे नमः बाहुभ्यामुत ते नमः ।
(यजु० १६। १ )
४. नमः शम्मवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मय-
स्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥ ( यजु० १६ । ४१ )
७. नमो5रतु नीलगझीवाय सदस्नाश्षाय मीहुपे | अथो ये अस्य
सत्वानो5दं तेभ्योह्करं नम: | ( यजु० १६ | ८ )
. ६. एतत्ते रुद्राव्तं तेन परो मूजवतो5तीहि । अवततथन्वा
पिनाकावसः ऋत्तिवासा अहिश्सन्न: शिवोध्तीहि । ( यजु०
३।६१)
' ७. मा नो महान्तमुत मा नो अर्मकं मा न उश्नन्तमुत मा न
उक्षितम् । मा नो वधी: पितरं मोत मातरं मा न प्रियास्तन्वो रुद्र
रोरिप: ।( यज्ञु० १६। १५ )
इस मन्त्रसे आवाहन करे) ध्या ते रुद्र ”” इस मन्त्रसे मगवान्
शित्रको आसनपर समासीन करे | ध्यामिपुं० इस मन्त्र
शिवके अज्ञेमें न्यास करे | “अध्यवोचत् ० इस मन्तसे प्रेम
पूवेंक अधिवरासन करे। “असी य॑स्ताम्रो ०? इस मन्त्रसे शिवलिद्र
में इए्देवता शिवक्रा न्यास करे | “अस्सी योउ्वसर्पतिण इक
मन्त्रसे उपसपेण ( देवताके सगीप गमन ) करे । इसके बाद
“नमोस्तु नील्ग्रीवाय ०? इस मन्त्रसे इश्टदेवकी पाद्य समा
करे | “रुद्रंगायत्री०? से अब्य दे | ध्च्यर्म्सकं० मन्तो
आचमन कराये | “पयः प्रथिव्यां०? इस मन्त्रसे दुग्घलात
कराये | ८दधिक्राव्णोे०” इस मन्त्रसे दथिस्नान करावे। (इुत
_घृत पावा०? इस मन्त्रसे घृतस्नान कराये | “मु वाता। झा
१.याते रुद्र शिवा तनूरघोराउपापवाशिनी । या नव |
दनन््तमया गिरिशन्तामि चाकंशीहि | (यज्गञु० १६१। २)
२. याभिपुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र ;
कुरु मा हिष्सीः पुरुष जयत् । ( यज्ञु० १६।॥ ३ ) ।
३. अध्यवोचदधिवक्ता प्रथम दैव्यो मिषक् । अही<श्व सर्वाशन[:
यन्त्सर्वाश्व यातुधान्यो5धराची: परा सुव। ( यज्जु० १६। ५) |:
४. असौ यस्ताम्रो अरुण उत वश्नः सुमजलः । ये चैनश्डा
अभितो दिल्लु श्रिता: सहस्तशोष्वेषा*हेड ईमहे । ( यजु० १६.। ६)
७५. असौ योब्वसपंति नीलगीवो विलेहित: । उतैनं गेः
अद्श्नन्नदृश्रन्नुदद्दायं: स दृष्टे सृडयाति नः ।( यज्गु ० १६ । ४!
६. यह मन्त्र पहले दिया जा चुका है ।
७. तत्पुरुषाय वि्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदया।
८. च्यम्वर्क यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् | उदौरुकमिव बलद|
न्मृत्योमुक्षीय मामतात् । च्यम्वक॑ यजामदहे सुगर्न्वि पतिवेदक/ |
उरवीरुकमिव बन्धनादितो सुक्षीय मामुतः । ( यज्ञु० ३ | ६० ) |,
|
९. पय: प्रथिव्यां पप ओपधीपु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो% | थे
पयखतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् । ( यजु० १८ । ३६ ) | हि
१०. दघ्िक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्थ वाजिनः | £ ।
नो मुखा करत्मणआयू*षि तारिषत् | ( यजु० २३। ३२) | 'े)
११. छत घतपावानः पिवत वसां वसापावान:ः पिवताल/एा किक
हविरसि स्वाहा । दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उदिशे दि
साहा । ( यजु० ६। १९) मे
१२. मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्पवः .। मात भू
सन्त्वोषधी: ।( यज्ञु०ग १३। २७ )
१३. मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पायिवररजः । मधु घोर | रे
पिता । ( यज्ञु० १३१२८ ) हा . /
विद्येश्वरसंहिता ] # पार्थिवलिष्नके निमोणकी रीति तथा वेद्-मन्त्रो्हाय उसके पूजनकी विधि #._ द१
न? प्मंवुमान्नो? इन तीन ऋचाओंसे मधुस्नान ओर शेकरा-
स्नान कराये | इन दुग्ध आदि पाँच वस्तुओंको पशद्चाम्रत
कहते है ।
अथवा पाध-समर्पणके लिये कहे गये ८नमोडस्तु नील-
ग्रीवाय०? इत्यादि मन्त्रद्वारा पश्चामृतसे स्नान कराये। तदनन्तर
थमा नस््तोके ०? इस मन्त्रसे प्रेमपूर्वक मगवान् शिवको कटिवन्ध
£ करघनी ) अर्पित करे | “नमो धृष्णवे ०? इस मन्त्रका उच्चारण
करके आराध्य देवताको उंत्तरीय घारण कराये। प्यो ते देति;०?
इत्यादि चार ऋचाओंको पढ़कर वेदज्ञ भक्त प्रेमसे विधिपूर्यक
मगवान शिवके लिये वस्त्र ( एवं यज्ञोपवीत ) समर्पित करे |
दसके बाद “नमः श्वम्यः०? इत्यादि सन््त्रको पढ़कर शुद्ध बुद्धि-
वाला भक्त पुरुष मगवानको प्रेमपूवेक गन्ध ( सुगन्धित
१. मधुमान्नों वनस्पतिमेधुमाँ अस्तु सूथ्य; । माध्वीर्गावों भवन्तु
नं; । ( यजु० १३। २९ )
॥. २. बहुतसे विद्वान “मधु वाता? आदि तीन ऋचाओंका उपयोग
) फेवल मधुसतानमें ही करते हैं और झर्करा-ज्लान कराते समय
४ निम्नाद्वित मन्त्र बोलते हं--.-
अपाध्रसमुद्यस5 वूर्ये सन््त* समाहितम | अपाय* रसस्य यो
« रसस्त वो गृद्षम्युत्तममुपयामगृद्दीतोडसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृक्काम्येष ते
योनिरिन्द्राय ता जुष्टतमस् । ( यज्ु०भ ९। ३ )
३. मा नस्तोके तनये मा न जायुपि मा नो गोपु मा नो अश्वेषु
। रीरिपः । मा नो वीरान् रुद्र सामिनो वीहंविष्मन्तः सदमित् त्वा
हवामहे । ( यजु० १६ । १६ )
४« नमो धृष्णवे च प्रमृशाय च नमो निपज्निणे चेषुधिमते च
नमलोध्णेपवे चायुधिते च नमः खायुघाय च सुपन्वने च |
( यजु० १६। ३६ )।
या ते हेतिमींदुष्टम इस्ते वभूव ते धनु: । तयास्मान्विश्वतत-
स्थमयक्ष्सया परि भुज । (११ ) परि ते पन्चनो हेतिरसान्वृणक्त
'पेध्तः। जयो य इपुषिस्तवारे असन्नि घेटि तम् ( १२ ) । जवतत्य
'नुई५ सदस्ाक्ष शतेपुधे । निशीर्य्य शल्यानां मुखा शिवो न सुमना
व ( ३३ )। नमस्त जायुधायानातताय धृष्णवे । उभ्ास्यामुत ते
नमी दाहुम्यां तव पन््वने ( १४ )' (चजु ० १६ )।
्पः
[।
६« नमः खम्य: अपतिम्यश्व वो नमो नमो भवाय च् रुद्राय च
ह ईमः शयक् च् पशुपतये च नमो नीलझीवाय च शितिकण्ठाय च |
| पघलज्ञु० २ घ् )
चन्दन एव| रोली ) चढ़ाये। “नमस्तेक्षम्यों ?? इस मन्त्रसे
अक्षत अर्पित करे। “नमः पीर्याय०” इस मन्त्रसे फूल चढ़ाये ।
ध्ममः पर्णाय० इस मन्त्रसे बिल्वपत्र समर्पण करे। “नरम:
कपर्दिने च०? इत्यादि मन्त्रसे विधिपूवक धूप दे । “नमः
अशवे०? इस ऋचासे शासत्रोक्त विधिके अनुसार दीप निवेदन
करे | तत्पश्चात् ( हाथ घोकर नमो ज्येन््ठाय०? इस मन्त्रसे
उत्तम नेवेद्य अर्पित करे। फिर पूर्वोक्त ज्यम्बक-मन्त्रसे आचमन
कराये । “इमा सद्राय ०? इस ऋच्चासे फछ समपेण करे । फिर
“नमो अज्याय०? इस मन्त्रसे भगवान् शिवकों अपना सब कुछ
समर्पित कर दे | तदनन्तर मा नो महान्तम्०? तथा “मा नस्तेके?
इन पूर्वोक्त दो मन्त्रोंद्यारा केवछ अक्षतोंसे ग्यारह रुद्रोंका
७० नमस्तक्षम्यो रथकारेस्यश्र वो नमो नमः कुलालेस्य:
फर्मारेम्यश्च वो नमो नमो निषादेस्य: पुशिष्ठेभ्यश्ल वो नमो नमः
अनिभ्यों शृगयुम्यश्व वो नमः । ( यज्जु० १६ । २७ )
८ नत्नः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणाय च
नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः <ष्प्पाय च फेनपाय च ।
( यज्गजु० १६ | ४२ )
९. नमः पणोय च पणेशदाय-च नम उद्युरमाणाय चामिप्नते
च नम आखिदते च प्रखिदते च नम ह्पुक्ृद््यों पनुष्कृह्न्यश्थ वो
नमो नमो वः किरिकेम्यो देवाना£हृदयेम्यो नमो विंचिन्वत्केम्यो
नमो नम आनिद्वत्तेम्यः । ( यज्जु० १६ । ४६ )
१०. नमः कपर्दिने चव्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय चच
शतधन्वने च नमो ग्रिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीछुटमाय
चेपुमते च। ( यजु० १६ । २९ )
११. नम आइशवे चाजिरय च नमः श्ीश्याय च सजीम्याय च
नम ऊर्म्याय चा वखन्याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च ।
( यजु० १६। ३१ )
१२. नमो ज्येष्ठाय च कनिषठ्ठाय च नम्नः पूर्वजाय चापरजाय
नमी मध्यमाय चापगरमाय च नमो जघन्याय च डुध्न्याय च।
( यज्ञु० १६ । ३२ )
१३. इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रमरामदे मतीः ।
यथा शमसद् द्विपदे चतुप्पदे विश्व॑ युट्ट थ्रामें अस्पिन्ननातुरम् ।
( यज्गु० १६ | ४८ )
१४- ननो अज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्याय च गेझाय च.---
नमो द्वदय्याय च निवेप्प्याय च नम: कास्याय च गहरेछाय च
( यज्ञु० ६६) ४४ )
दर
पूजन करे । फिर ५हिरण्यंगर्भ:०? इत्यादि मन्त्रसे जो
तीन ऋचाओंके रूपमें पठित है; दक्षिणा चढ़ाये॥ |
“देवस्य त्वा०? इस मन्त्रसे विद्वान् पुरुष आराध्यदेवका
अभिषेक करे | दीपके लिये बताये हुए “नम आशवे ०? इत्यादि
मन्त्रसे भगवान् शिवकी नीराजना ( आरती ) करे | तसश्रात्
“इमा रुद्राय० इत्यादि तीन ऋचाओंसे भक्तिपूर्वक रुद्रदेवको
पुप्पाज्ललि अर्पित करे। थमा नो महान्तम ०? इस मन्त्रसे विश
उपासक पूजनीय देवताकी परिक्रमा करे | फिर उत्तम बुद्धिवाला
उपासक मा नस्तोके०? इस मन्जसे मगवानको साष्टाज्ञ प्रणाम
करे । “एबं ते०? इस मन्त्रसे शिवमुद्राका प्रदर्शन करे |
प्यतों यत:०? इस मन्त्रसे अभय नामक मुद्राका) “ज्यम्बक०?
मन्त्रसे शान नामक मुद्राका तथा नमः सेना० इत्यादि
मन्त्रसे महामुद्राका प्रदर्शन करे । “नमों गोभ्य;०? इस ऋचा-
दारा धेनुम॒ुद्रा दिखाये। इस तरह पॉंच मुद्राओंका प्रदर्शन करके
शिवसम्बन्धी मन्त्रोंका जप करे अथवा वेदरश पुरुष “शर्तें-
१: हिरिण्यगभे: समवतैताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीतव् ।
स् दाधार पृथिवीं घामुतेमां कस्मे देवाय हृविषा विधेम ।
% यह्द मन्त्र यजुवेंदके अन्तर्गत तीन स्थानोंमं पठित और तीन
मन्त्रोंके रूपमें परिगणित है | यथा--यज्जु० १३ ॥४; २३। १
तथा २५१ १० में ।
२. देवस्थ त्वा सवितुः प्रसवेडश्विनोबीहुस्यां पृष्णो हस्ता-
भ्याम | अख्िनोमैंपज्येन तेजसे जद्दावर्चसायामि पिन्नामि सरखत्ये
मैषज्येन वीर्यायाज्ञायायामि पिज्ञामीन्द्रस्येन्द्रियेण वलाय श्रिये यशसे $-
भिविमस्लामि। ( यज्ञु> २० ।३ )
३. एप ते रुद्र भाग: सह खत्नाम्विकया त॑ जुषस्व खाह्या ।
एप. ते रुद्र भांग आखुस्ते पशुः | ( यजु० ३ । ५७ )
४. यतती यतः समीहसे ततो नो अभय कुरु | श॑ नः कुरु
प्रजाभ्योधभय नः पशुम्य: ॥ ( यजु० ३६। २३ )
७. नमः सेनाम्यः सेनानिम्यश्च वो नमो नमो रथिभ्यो
भरथेम्यश्ष वो नमो नमः क्षठृभ्यः संग्रहीतृम्यश्व वो नमो नमो
महदस्यो अभकेस्यश्व वो नमः ॥ ( यजु० १६। २६ )
६. नमो गोम्य: श्रीमतीम्यः सौरभेयीमभ्य एवं सच ।
नमो मह्यसुताम्यश्वच पवित्राम्यो नमो नमः ॥
( गोमतीविद्या
७-यजुर्वेदका वह अंश, जिसमें रुद्रके सौ या उससे अधिक
. नाम आये हैं और उनके द्वारा रुद्रदेवकी स्तुति की गयी है ।( देखिये
यज़ु ० अध्याय १६ )
१४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाड
रुद्रिय! मन्त्रकी आवृत्ति करे। तत्यश्रात् वेदज्ञ पुरुष पद्माढू
पाठ करे | तदनन्तर “देवी गाठु०? इत्यादि मन्त्रते भगवान्
शंकरका विसजंन करे | इस प्रकार शिंवयूजाकी वैदिक विषिक
विस्तारसे प्रतिपादन किया गया |
महर्षियो | अब संक्षेपसे भी पाथिव्पूजनकी वेदिक विधि
वर्णन सुनो। “सद्यो जातं ० ?इस ऋचासे पार्थिव लिख बनानेके खि
मिद्दी लेआये। ८ वामदेवाय ०? इत्यादि मन्त्र पढ़कर उसमें उड
डाले | ( जब मिट्टी सनकर तैयार हो जाय, तब ) आर!
मन्त्रसे लिक्न निर्माण करे | फिर ८ तत्पुरुषाय! इस मत
विधिवत् उसमें भगवान् शिवका आवाहन करे । तदतत
(ईशान० ) मन््त्रसे भगवान शिवको वेदीपर स्थापित करे | एक
सिवा अन्य सब विधानोंको भी झुद्ध बुद्धिवाला उपाक
संक्षेपसे ही सम्पन्न करे | इसके बाद विद्वान् पुरुष पद्म
मन्त्रसे अथवा गुरुके दिये हुए अन्य किसी शिवसम्ध
सन्त्रसे सोलह उपचार्रेद्दारा विधिवत् पूजन करे अथवा--
भवाय भ्रवनाशाय सहादेवाय धघीमहि।
उद्याय. उम्रनाशाय शर्वाय शशिमोलिने ॥
(२० | ४१
॥
“इस मन्त्रद्मारा विद्वान उपासक भगवान् शंकरती एः
करे । वह श्रम छोड़कर उत्तम भावभक्तिसे शिवकी आय,
करे। क्योंकि भगवान शिव भक्तिसे ही सनोर्वा
फल देते हैं । गे
८. देवा गातुविदों गातुं वित्ता गातुमित | मनसस्पत '
देव यज्ञ खाहा वाते धा: ॥ ( यजु० ८ । २१५) ४
#।
९. सयोजातं प्रपयाति स॒द्योजाताय वे नमो नमः । न्
भवे भवेनातिमवे भवस्व मां भवोहूवाय नमः॥ '
॥।'
१०. ० वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः अेष्ठाय नमो रदवव
कालाय नमः कलूविकरणाय नमो बलविकरणांग
बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्व भूतदमंनांव ':
मनोन्मधाय नमः । |
|
११. ४० अधोरेभ्यो5थ धोरेभ्यो घोरघोरतरेस्य: सर्वेन्यः
नमस्ते5रतु रुद्ररूपेम्य: । |
और
१२. 3 तत्पुरुषाय विश्नहे महादेवाय धीमहि तन्नो रद
१३. ७० ईशान: सर्वविद्ानामीश्वरः सर्वेभूतानां शरद
म्रद्मा शिवों मेउस्तु सदा शिवोम ॥ क्
|
|
4
बैयेश्वरसंहिता ] # पार्थिवलिज्कके निमौणकी रीति तथा वेद-सन्श्रोद्धारा उसके पूजनकी विधि
९०/०५/०९०० एड/ेह-पेड रेफर परम र १३० ९५/०३०#मप,३० ५ /ऐ १०४० ०० पेज पर" ९ प-रयफमरग जहर न्री २ 'ुरि।की+ री सकी परी जप परी परम जम परी पानी पक यह करी पारी अर कर पर रत मम # नरम नमन खान सन समन सर रस ननमयररन्मनक्न्न नर फट-प पर एकर परम रमन रन: २२७० जरीयेजरएल्मनम रन न्र गम सनम पजरमभऋन्>म ९५२१ ९५३०१ ७ हमने दम ३४३०५ मर करनी जान जमीन मान
व्राक्मणो ! यहाँ जो वैदिक विधिसे पूजनका क्रम बताया
यां है; इसका पूर्णरूपसे आदर करता हुआ मैं पूजाकी एक
[सरी विधि भी वता रहा हूँ; जो उत्तम होनेके साथ ही सर्व-
।धारणके लिये उपयोगी है | मुनिवरों | पाथिवलिज्ञकी पूजा
गगवान् शिवक्रे नामोंसे बतायी गयी है | वह पूजा सम्पूण
गमीष्ठेंकी देनेवाली- है । में उसे बताता हूँ, सुनो ! हरः
हिश्वर, शम्स, झलपाणि; पिनाकृइृकू) शिव/ पशुपति ओर
हदेव--ये क्रमशः शिवक्रे आठ नाम कहे गये हैं | इनमेंसे
थम नामके द्वारा अर्थात् :डं“हराय नमः? का उच्चारण करके
(थिवलिज् बनानेके लिये मिट्टी छाये | दूसरे नाम अर्थात्
3पहेश्वराय नमःका उच्चारण करके लिक्न-निर्माण करे | फिर
3“शम्मवे नमः? बोलकर उस पार्थिव-लिड़की प्रतिष्ठा करे |
त्पश्चात् “3“झूलपाणये ममः? कहकर उस पार्थिवलिड्रमें
गगवान् शिवका आवाहन करे | ६3“पिनाकधृषे नमः” कहकर
'स शिवलिज्गभको नहलछाये | “३४“शिवाय नमः? बोलकर उसकी
जा करे । फिर *3“प्रशुपतये नमः? कहकर क्षमा-प्राथना करे
र अन्तमें ५3“महादेवाय नमः? कहकर आरराध्यदेवका
| सजन कर दे | प्रत्येक नामके आदिमें 5“कार ओर अन्तर्मे
ठर्थी विभक्तिके साथ धनमःःपद लगाकर बड़े आनन्द ओर
क्तिभावसे पूजनसम्बन्धी सारे कार्य करने चाहिये# |
/ पडक्षर मन्त्रसे अद्भन्यास ओर करन्यासकी विधि मलीभौँति
पन्न करके फिर नीचे लिखे अनुसार ध्यान करे। जो केलास
पेपर एक सुन्दर सिंहासनके मध्यमागम विराजमान है; जिनके
प्रभागम भगवती उम्रा उनसे सथ्कर बेठी हुई हैं, सनक-
न्दन आदि भक्तजन जिनकी पूजा कर रहे हैं तथा जो मक्तोंके
बख्पी दावानलको नष्ट कर देनेवाले अप्रमेयशक्तिशाली
/र हैं, उन विश्वविभूषण भगवान् शिवका चिन्तन करना _
<हये। भगवान् महेश्वरका प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करे-- *
ऐैकी अड्ककान्ति चाँदीके प्वंतकी भाँति गोर है| वे अपने
&फपर मनोहर चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं। रल्ोंके
मम 8 अर म 40
(हु
४ $ एरो महेश्रः शम्भुः शुल्पाणि: पिनाकधृक ।
का शिव: पशुपतिश्वेव महारेव इति कऋरमाद 0
7. मदाएरणसंधगप्रतिष्ठाहानमेव च्।
रुपने पूलने चेव क्षमस्वेति विसर्जनम् ॥
श. फारादियतुर्ध्यन्तैनंमोषन्तैनोमणि: क्रमात् ।
रूवी भत्या परमया मुदा ॥
यहैव्याप क्रिया:
( शि० पु० वि० २० | ४७-४९ )
# दे
आभूषण धारण करनेसे उनका श्रीअज्ग ओर भी उद्धासित हो
उठा है। उनके चार हाथोंमें क्रमशः परशु3 मृगसुद्रा, वर
एवं अमयमुद्रा ख॒ुशोमित हैं | वे सदा प्रसन्न रहते हैं। कमलके
आसनपर बेठे हैं ओर देवताछोग चारों ओर खड़े होकर उनकी
स्तुति कर रहे हैं | उन्होंने वर््रकी जगह व्याप्रचम धारण कर
रखा है | वे इस विश्वके आदि हैं, बीज ( कारण ) रूप हैं
तथा सबका समस्त भय हर लेनेवाले हैं | उनके पाँच मुख हैं
ओर प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन-तीन नेत्र हैं। #
इस प्रकार ध्यान तथा उत्तम पार्थिवलिज्गका पूजन करके _
गुरुके दिये हुए पद्चाक्षर्मन्त्रका विधिपूर्वक जप करे ।
विप्रवरो ! विद्वान पुरुषको चाहिये कि वह देवेश्वर शिवकों
प्रणाम करके नाना प्रकारकी स्त॒ुतियोंद्वार उनका स्तवन करे
तथा शतरुद्रिय ( यजु० १६ वें अध्यायके मन्त्रों ) को पाठ
# अद्वैन्यास और करन्यासका अयोग इस गम्रकार समझना
चाहिये । 5० ४“अज्जुष्माभ्यां नम; १ ४ ने तजनीभ्यां नमः .२ । 32
में मध्यमास्यथां नम; ३ । 3० शि अनामिकास्यां नमः ४ । “४ वां
कनिषप्ठिकाभ्यां नमः ५ । 3० य॑ करतलकरणंष्ठान्यां नमः ६ । श्ति
करनयास: | उें० ४०“हृदयाय नमः १ । 3० ने शिरसे खाह्य २ । 3
मं शिखाये वपट ३। ४०“ मि कवचाय हुम् ४ ।उ वां नेत्रत्रयाय वौपट
५ | ७० ये अस्ताय फट ६।इति हृदयादिषडद्धन्यास:। यहाँ करन्यास
और इदृदयादिपुडद्नन्यासके छः:-छः वाक्य दिये गये हैं। इनमें
करन्यासके प्रथम वाक्यको पढ़कर दोनों तर्जनी अंगरुलियोंसे अन्ञु्लोंका
स्पश करना चाहिये । शेष वान्योकों पढ़कर अद्भुष्ठोंसे तर्जनी आदि
अंग्रुलियोंका स्पर्श करना चाहिये । श्सी प्रकार अद्जन्यासमें मी
' दाहिने हाथसे हृदयादि अजन्ञोंका स्पर्श करनेकी विधि है । केवल
* घबचन्यासमें दाहिने हाथसे वायीं भुजा और बायें हाथसे दायीं भुजा-
का स्पर्श करना चाहिये । 'अस्थाय फट' इस अन्तिम वाक्यकों पढ़ते
हुए दाहिने हाथकों सिर्के ऊपरसे ले आकर वारयीं हथेलीपर ताली
वजानी चाहिये । ध्यानसम्बन्धी श्लेकक जिनके भाव ऊपर दिये
* गये ईं, इस प्रकार ह---
केलासपीआसनमध्यरसंरथं मक्ते:. सनन्दादिभिरच्यमानम ।
मक्तातिंदावानलहाप्रमेय॑ ध्यायेदुमालिप्वितविश्वभूषणम् ॥
ध्यायेन्नित्यं महेश रजतगिरिनिभ॑ चारुचन्द्रावत्रंसं
रक्ञाकत्पोज्ज्वलाई परशुश्ृगवराभीतिहस्त॑ प्रसम्नम् ।
पद्मासीन॑ समन्तात्स्तुतममरगणेर््याप्रहृत्ति बसान॑
विश्वा्य विश्ववीज॑ निखिलमयहर पश्टववत्न तिनेत्रम ॥
( दशि० पु० वि० २० | ५१-०२ )
६७ % नमो रुद्गाय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराण]
2० "महन््यगायायााारी-गार इतनी गए -कीी++- कक आमन-गा। कया पकन"' १2० प७०-मी मन्नत,
करे | तत्पश्चात् अज्लिमें अक्षत ओर फूल लेकर उत्तम भक्ति
भावसे निम्नाद्नित मन्त्रोंकी पढ़ते हुए प्रेम ओर प्रसन्नताके
साथ भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना करे---
(सबको सुख देनेवाले कृपानिधान भूतनाथ शिव | में
आपका हूँ । आपके गुणोमें ही मेरे प्राण बसते है अथवा
आपके गुण ही मेरे प्राण-मेरे जीवनसवंख ह। मेरा चित्त
सदा आपके ही चिन्तनमें छगा हुआ है । यह जानकर मुझपर
प्रसज् होइये | कृपा कीजिये । शंकर ! मेने अनजानमें अथवा
जान-बूझकर यदि कमी आपका जप ओर पूजन आदि किया
हो तो आपकी कृपासे वह सफल हो जाय । गोरीनाथ | में
आधुनिक युगका महान पापी हूँ, पतित हूँ और आप सदासे
ही परम महान् पतितपावन हैं । इस बातका विचार करके
आप जैसा चहिं; वसा करें | महादेव | सदाशिव ! वेदों,
पुराणों, नाना प्रकारके शास्त्रीय सिद्धान्तों और विभिन्न
महर्षियोंने भी अबतक आपको पूर्णझपसे नहीं जाना है | फिर
मैं कैसे जान सकता हूँ ? महेश्वर | मैं जेसा हूँ, वैसा ही, ..
रूपमें समूर्ण भावसे आपका हूँ । आपके आश्रित हूँ, ३५"
आपसे रक्षा पानेके योग्य हूँ । परमेश्वर | आप मुझपर प्र
इये [?॥६
मुने ! इस प्रकार प्रार्थना करके हाथमें लिये हुए &:
ओर पुष्पको भगवान् शिवके ऊपर चढ़ाकर . उन २४०१:
भक्तिमावसे विधिएृवक साष्टाज्ञ प्रणाम करे | तदनन्तर ४
बुद्धिवाला उपासक शास्नोक्त विधिसे इशष्टदेवकी पसिकिमा ग्रे!
फिर श्रद्धापूवक स्तुतियोंद्वारा देवेश्वर शित्रकी खुबिश्न
इसके बाद गढा बजाकर ( गलेसे अव्यक्त शब्दका रद
करके ) पवित्र एवं विनीत चित्तवाल्य साधक भगवानक्े 7
करे । फिर आदरपूर्वक विज्ञति करे और उसके बाद वि
मुनिवरों | इस प्रकार विधिपूर्वक पार्थिवप्ूजा बतायी ण|
वह भोग ओर मोक्ष देनेवाली तथा भगवान् शिव /
भक्तिभावको बढ़ानेवाली है |
( अध्याय १५४
ग
मा -- 224 ५---> जा ।
।
पार्थिवपूजाकी महिमा, शिवनेवेद्यमक्षणके विषयमें निणेय तथा विल्वका माहात्म्य
( तदनन्तर ऋषियोंके पूछनेपर किस कामनाकी पू्तिके
लिये कितने पाथिवलिड्रोंकी पूजा करनी चाहिये, इस विषय-
का वर्णन करके ) खूतजी बोले--महषियो | पार्थिवलिड्रोंकी
पूजा कोटि-कोटि यशोंका फल देनेवाली है | कलियुगमें लोगोंके
लिये शिवलिद्भ-पूजन जैसा श्रेष्ठ दिखायी देता है; वैसा दूसरा
कोई साधन नहीं है--यह समस्त शास्ओंका निश्चित सिद्धान्त
है | शिवलिज्ग भोग ओर मोक्ष देनेवाला है । लिड्ढः तीन
अकारके कद्दे गये हैं---उत्तम, मध्यम और अधम | जो चार
अंगुल ऊँचा और देखनेमें सुन्दर हो तथा वेदीसे युक्त हो,
भी अधिकार है | । ढिलोंके लिये वैदिक पद्धतिते ही
उस शिवलिजक्ञको शास्त्रज्ञ महर्षियोंने “उत्तम? कहा है । ते
आधा भ्मध्यम” और उससे आधा प्यघम? माना गा,
इस तरह तीन प्रकारके शिवलिड्ः कद्दे गये हैं,
श्रेष्ठ हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय वैद्य, शद्र अथवा विलोम पक 4
कोई भी क्यों न हो, वह अपने अधिकारके अनुसार ॥3
अथवा तान्त्रिक मन्त्रसे सदा आदरपूर्वक शिवलिश्ञत्री॥
करे | बआह्मणो | महर्षियो ! अधिक कहनेसे क्यार्त
शिवलिज्ञका पूजन करनेमें ज्लियोंका तथा अन्य ख बी।
रे
कै तावकरत्वहूणप्राणस्त्वच्ित्तो 5६ सदा मृड । कृपानिधे इति शात्वा भूतनाथ प्रसीद पे॥ 0
अशानाथदि वा शानाजपपूजादिक॑ मया । कृत॑ तदस्तु सफल कृपया तव शंकर॥क
का पापी महान पावनश्ष भवान्महान् । शइति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि तथा कुरु॥ - रि
वेद: पुराण: सिद्धान्तेऋषिसिविविधेरपि । न शातो5सि महादेव कुतो5६ं त्वां सदाशिव ॥ . । फ्
यया तथा लवदीयोइस्िि सवभावैमहेश्वर । रक्षणीयस्तवयाई. वै प्रसोद परमेश्वर ॥ के
(शि० पु० वि० २० । ५६ 3
| जाह्मण: क्षत्रियो वैद्य: शुद्दो वा अतिलोमज: । पूजयेत्. सतत लिड्न. तत्तन्मन्त्रेणमे सादरम् ॥ के
कि बहुक्तेन मुनयः शज्लीणामपि तथान्यत: । अधिकारोपस्ति सर्वेषा शिवलिक्ञार्चने द्विजा:॥ [| प्र
( शि० पु० वि० २६। की
विेश्वरसंहिता ] # पार्थिवपूजाकी महिमा, शिवनैबेद्रभक्षणके विषयम निणंय तथा विल्वका माहात्य्य के ५५
-........->न्नलच्््््य्च्य््य्:्लयव्य्य््ल् ््टश् अ्ल 6टटल/शच्!2स्सच्ययययच्य्
की पूजा करना श्रेष्ठ है परंतु अन्य लोगेंके लिये वैदिक मार्गसे
पूजा करनेकी सम्मति नहीं है | वेदरा द्विजोंकी वंदिक मांगते
ही पूजन करना चाहिये, अन्य मार्गसे नहीं--यह भगवान्
शिवका कथन है | दधीचि ओर गौतम आदिके शापसे जिनका
चित्त दग्ध हो गया है; उन द्विजोंकी वेदिक कर्ममें श्रद्धा नहीं
होती । जो मनुष्य वेदों तथा स्मृतियोंमं कहे हुए सत्कर्मकी
अवहेलना करके दूसरे कर्मको करने छगता है; उसका मनोरथ
कभी सफल नहीं होता । #
इस प्रकार विधियूवंक भगवान् शंकरका नेवेद्य|न्त पूजन
करके उनकी तिश्वुवनमयी आए मूर्तियोंका भी वहीं पूजन करे |
, पृथ्वी, जल, अग्नि) वायु; आकादझ) सूर्य) चद्धमा तथा
। तियाँ हें
, यजमान--ये भगवान् शंकरकी आठ मृतियाँ कही गयी हैं ।
" इन मूर्तियोंके साथ-साथ शव भव) रुद्र; उग्र; मी) ईश्वर:
महादेव तथा पञ्मपति---इन नामोंकी भी अचेना करे। तदनन्तर
[ वन्दन, अक्षत और बिल्वपत्र लेकर वहाँ ईशान आदिके
क्रमसे भगवान् शिवके परिवारक्रा उत्तम भक्तिभावसे पूजन
करे | इशान। नन््दी। चण्ड, महाकाल, भज्जी; बृष, स्कनन््द:
कपर्दाश्वर; सोम तथा झुक्र--ये दस शिवके परिवार हैं; जो
“मद ईशान आदि दसों दिशाओंमें पूजनीय हैं | तत्पश्चात्
गवान् शिवके समक्ष वीरभद्रका ओर पीछे कीर्तिमुखका
जन करके विधिपूर्वक ग्यारह रुद्रोंकी पूजा करे | इसके बाद
प्ाक्षर मन््त्रका जप करके शतरुद्रिय स्तोत्रका, नाना प्रकार-
गो स्तृतियोंका तथा शिवपश्चाज्ञका पाठ करे । तत्पश्चात् परि-
मा ओर नमस्कार करके शिवलिड्नका विसजेन करे | इस
कार मेने शिवपरूजनकी समूर्ण विधिका आदसपूर्वक वर्णन
कया । सात्रिमें देवकार्यकों सदा उत्तरामिमुख होकर ही करना
ताहिये | इसी प्रकार शिवपूजन भी पवित्र भावसे सदा उत्तरा-
भेमुख होकर ही करना उचित है | जहाँ शिवलिज्ञ स्थापित
[) उससे पूर्व दिशाका आश्रय लेकर नहीं बैठना या खड़ा
तना चाहिये; क्योंकि वह दिशा भगवान् शिवके आगे या
गमने पड़ती है ( इश्देवका सामना रोकना ठीक नहीं ) ।
धवलिप्नसे उत्तर दिशामें भी न बैठे! क्योंकि उधर भगवान
(करका वामाड्ः हैँ; जिसमें शक्तिखरूपा देवी उम्र विराज-
।न ६ | पूजककी शिवलिड्ल्से पश्चिम दिशामें भी नहीं बैठना
गश्यि। क्योंकि चह आराध्यदेवका प्रष्ठभाग है (पीछेकी ओरसे
जो करना उचित नहीं हू )। अतः अवशिष्ट दक्षिण दिखला
“ौ+प+53::::::::: फरउस्क््_चचचतत___+न.न,..........- - - -_-
| |
च.-] १
भदिकमनाइत्य. क्रम
सर ह
प्पतयरबयरणा कहर
स्मात॑मंथापि
सडक
बा ॥
स्मेत्त् ॥
६ पक न के गा के 5
|
;
ही ग्राह्म है | उसीका आश्रय लेना चाहिये । तात्ययं यह
कि शिवलिड्डसे दक्षिण दिशामें उत्तराभिमुख होकर बैठे और
पूजा करे | विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह भस्मका त्िपुण्ड
लगाकर, रुद्राक्षनं माला लेकर तथा बिल्वपत्रका संग्रह
करके ही भगवान् शंकरकी पूजा करे, इनके बिना नहीं ।
मुनिवरों | शिवपूजन आरम्भ करते समय यदि भस्म न मिले
तो मिद्दीसे मी छलाटमें त्रिपुण्ड्र अवश्य कर लेना चाहिये ।
ऋषि बोले--मुने | हमने पहलेसे यह बात सुन रक्खी
है कि भगवान् शिवका नेवेद्य नहीं ग्रहण करना चाहिये |
इस विषयमें शास्त्रका निर्णय क्या है? यह बताइये | साथ ही
बिल्वका माहात्म्य भी प्रकट कीजिये |
सूतजीने कहा--मुनियो ! आप शिवसम्बन्धी ब्रतका
पालन करनेवाले हैं | अतः आप सबको शतशः धन्यवाद है |
मैं प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ बताता हूँ; आप सावधान होकर
सुनें | जो भगवान् शिवका मक्त है; बाहर-भीतरसे पवित्र और
गुद्ध है; उत्तम ब्रतका पालन करनेवात्य तथा दृढ़ निश्चयसे
युक्त है; वह शिव-नेवेद्रका अवब्य भक्षण करे | भगवान्
शिवका नैवेद्य अग्राह्म है; इस भावनाकोी मनसे निकाछ दे ।
- शिवके नेवेद्यको देख लेनेमान्नसे भी सारे पाप दूर भाग जाते
हैं, उसको खा लेनेपर तो करोड़ों पुण्य अपने भीतर आ
जते हैं | आये हुए; शिव-नेवेद्रको सिर झकाकर प्रसन्नताके
साथ ग्रहण करे और प्रयत्न करके शिव-स्मरणपूर्वक उसका
भक्षण करे | आये हुए शिव-नैवेथ्को जो यह कहकर, कि मैं
इसे दूसरे समयमें ग्रहण करूँगा, लेनेम॑ विलम्ब कर देता है;
वह मनुष्य निश्चय ही पापसे बंध जाता है । जिसने शिवकी
दीक्षा ली हो; उस शिवभक्तके लिये यह शिव-नैवेद्य अवश्य
भनश्षणीय है---ऐसा कद जाता है। शिवकी दीक्षासे युक्त शिव-
भक्त पुरुषके लिये सभी शिवलिक्ञेंका नेवेद्य शुभ एवं ५्महा[-
प्रसाद? है; अतः वह उसका अबश्य भक्षण करे | परंतु जो
अन्य देवताओंकी दीक्षासे युक्त हैं ओर शिवमक्तिमं भी मनको
ल्गाये हुए हैं, उनके लिये शिवनैवेद्य-भक्षणके विपयमें क्या
निर्णय है---इसे आपलोग प्रेमपृर्वेक सुनें । व्राह्णा ! जहाँसे
गाल्ग्रामशिलाकी उसत्ति होती है; वहाँक्रे उत्पन्न लिड्गम, रस-
लिड्ड (५ पारदलिक् ) में; पापाण; रजत तथा सुवर्णसे निर्मित
लिक्टमं देवताओं तथा सिद्धद्धार प्रतिष्ठित लिड्रमें, केसर-
निर्मित लिप्नमें,; स्फश्किलिक्न्मं: सननिर्मित लिड्नमें तथा
समस्त ज्योतिलिद्रोंस विराजमान भगवान् शिवक्ते नेवेद्रका
भन्षण चान्द्रावगजतके समान पुण्यजनक है । बद्मदत्या करनें-
बाला पुरुष भी यदि पविन्न होकर शिवनिर्माल्यका भश्वण करके
उसे / सिरपर » धारण करे ते उसका सारा पाप झीघ्र ही नष्ट
श
हर
_ 3 ल्क+म»»»»मवनानमिमनन-ंमननानकनन नमकीन सन मनन कन् मनन न-े 3 बाय ध>न्धान्
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हो जाता है। पर जद्दों चण्डका अधिकार हैः व्दों जो शिवनिममाल्य
हो) उसे साधारण मनुप्योंको नहीं खाना चाहिये । जहाँ चण्ड-
का अधिकार नहीं है; वहाँके शिव-निर्माल्यका सभीको भक्ति-
पूर्चक भोजन करना चाहिये । वाणलिज्न ( नर्मदेश्वर ) छोह-
निर्मित ( खर्णादिधातमय ) लिज्ञ) सिद्धलिज्ञ ( जिन लिख्नोंकी
उपासनासे किसीने सिद्धि प्राप्त की है अथवा जो सिद्धोंद्गरा
सापित हैं वे लिड् » खयम्भूलिज्ञ--इन सब लिल्ञॉमं तथा
शिवदी प्रतिमाओं ( मूर्तियों ) में चण्डका अधिकार नहीं है |
जो मनुष्य शिवलिज्ञको विधिपूर्वंक स्नान कराकर उस स्नानके
जलका तीन वार आचमन करता है; उसके कायरिकः बाचिक
और मानसिक--तीनों प्रकारके पाप यहाँ शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ।
जो शिव-नेवेय) पत्र) पुष्पण फछ और जल अग्राह्म है; वह सब
भी शालग्रामशिलाके स्पर्शसे परवित्र--अहणके योग्य हो जाता
है | मुनीश्षयो ! शिवलिज्ञके ऊपर चढ़ा हुआ जो द्रव्य है, वह
अग्राह्म है | जो वस्तु लिक्नस्पशंसे रहित है अर्थात् जिस वस्तु-
को अछग रखकर शिवजीको निवेदित किया जाता है--लिझ्न-
के ऊपर चढ़ाया नहीं जाता; उसे अत्यन्त पवित्र जानना
चाहिये । मुनिवरों | इस प्रकार नैवेयके विषयर्में शास्त्रका
निर्णय बताया गया । |
अब तुमछोग सावधान हो आदसपूर्वक बिल्वका माहात््य
सुनो । यह बिल्व वक्ष महादेवका ही रूप है। देवताओने भी
इसकी स्त॒ुति की दै | फिर जिस किसी तरहसे इसकी महिंमा
कैसे जानी जा सकती है । तीनों लोकोंमें जितने पुण्य-तीर्थ
प्रसिद्ध हैं) वे सम्पूर्ण तीर्थ बिल्वके मूलमागर्मे निवास करते
हैं । जो पुण्यात्मा मनुष्य बिल्वके मूलमें लिज्नल्वरूप अविनाशी
महादेवजीका पूजन करता हैः वह निश्चय ही शिवपदको प्राप्त
पूजा करके लिड्न्को अपने. मस्तक
होता है । जो बिल्वकी जड़के पास जलसे अपने मस्तकको रण करें | उस लिट्ककी सदा अपने. मर्खःई
सींचता है) बह सम्पूर्ण तीर्थेमिं स्नानका फल पा लेता है और अजय हर
“““““<3चर#-छ0>.>
शिवनाम-जप तथा भरूधारणको महिमा, त्रिपृण्ड्के देवता ओर खान आदिका प्रतिपादन
ऋापि बोले--महामाग व्यासशिष्य सूतजी | आपको
नमस्कार है। अब आप उस परम उत्तम भस्म-माहात्म्यका
ही वर्णन कीजिये । भस्म-माहात्मम। दराद्राक्षमाहात्य
तथा उत्तम नाम-माहात्य--इन तीनोंका परम प्रसन्नतापूर्वक
प्रतिपादन कीजिये ओर हमारे हृदयको आनन्द दीजिये |
सूतजीने कहा--महर्पियों ! आपने बहुत उत्तम बात
द्द क् :४ नमो सद(य शास्ताय ब्रह्मग परमात्यते $£
[ संक्षित-शिव॑पुराणा
विधि न आजमा &0#७एए
नमक“ ०-० मम कक.“ मनन मन पानी आन."
2न्०... 2. मियननीपनानीे मीन सीन अनीन. जार >तयरम।+ -रिमिनयानीी अी--न जिम,
बरद्दी इस भूतलूपर पावन माना जाता है | इस विल्वकी जह॒के
परम उत्तम थाठिकी जछसे भरा हुआ देखकर महादेव
पूर्णतया संतुष्ट होते दें | जो मनुष्य गन्ब; पुष्प आदिसे बिल
मृल्भागका पूजन करता है वद शिवलोकको पाता है ओर इस
छोकमें भी उसबी सुख-संतति बढ़ती हे । जो बरिल्वकी जहते
समीप आदरपूर्वक दीपाबडी जलाकर रखता हैः वह तत्लशातते
सम्पन्न हो भगवान महेश्वरम मिल जाता दे । जो बरिल्वकी शाडा
थामकर हाथसे उसके नये-नये पल््लब उतारता और उनसे उ
विल्तरकी पूजा करता है; वह सब पार्पसि मुक्त हो जाता है।
जो बिल्यकी जड़के समीप मगवान् शिवमें अनुराग रखनेवे
एक भक्तको मी भक्तिपूर्वक भोजन कराता है। उसे कौथ्युत
पुण्य प्राप्त होता है । जो बिल्वकी जड़के पास शिवभक्ततरे
खीर और-घृतसे युक्त अन्न देता है? वह कमी « दरिद्रि कँ
होता । ब्राह्णणो ! इस प्रकार मैंने साज्नोपाज्ञ शिवहि
पूजनका वर्णन किया । यह प्रद्नत्तिमार्गी तथा निदनत्तिमा:
पूजकोंके भेदसे दो प्रकारका होता है । प्रश्नत्तिमार्गी लोग
लिये पीठ-पूजा इस भूतलपर सम्पूर्ण अमीशट वस्त॒ुओँको देंगे
वाली होती है । प्रदत्त पुरुष सुपात्र गुद आदिके दाग ह
: सारी पूजा सम्पन्न करे और अभिषेकके अन्तमें अगहलीः
चावल्से बना हुआ नेवेद्य निवेदन करे । पूजाके अन्त शि
लिड्डको शुद्ध सम्पुटमें विराजमान -करके घरके भीतर ऋ
अछग रख दे । निवृत्तिमा्गी उपासकोंके लिये हाथपरः
शिवपूजनका विधान है | उन्हें मिक्षा आदिसे प्राप्त हुए अप
भोजनको ही नेवेद्यरूपमें मिवेदित कर देना चाहिये | निई
पुरुषोंके लिये सूक्ष्म लिड्ढ ही श्रेष्ठ बताया जाता है । वे विभू्ि
पूजन करें और विसूतिको ही नैवेययरूपसे निवेदित भी करे
पूछी है। यह समस्त लोकोंके लिये हितकारक विषय ॒ द
जो छोग भगवान् शिवकी उपासना करते हैं) वे धन्य हैं) ९९ *;
हैं; उनका देहघारण सफल है तथा उनके समस्त कुल्की ।
हो गया | जिनके मुखमें भगवान् शिवका नाम है
मुखसे सदाशिव ओर शिव इत्यादि नामोंका उच्चारण
रहते. हैं, पाप उनका उसी तरह स्पर्श नहीं करते; मे
१० अधड >> ०४ रद ४ अर बा ७9 >िंआ॒े गा: कर्क कर
2.3... 8... समा -+3-७७-4..--मे "मही-3.-....>-मम पा... परम मी... पान +-.>++>ाम--पी...आमममुक्रीक०+-+३५+मि्पाहा-पीक गाए. मदन दीन मनाया पाया पाया. यक न
विद्येश्वरसंहिता ] . # शिवनाम-जप तथा भस्मधारणकी महिमा, तरिपुण्ड्रके देवता और स्थान # ६७
वृक्षके अज्वारको छूनेका साहस कोई भी प्राणी नहीं कर सकते |
“दे श्रीशिव | आपको नमस्कार हैं? ( श्रीशिवाय नमस्त॒भ्यम् )
ऐसी बात जब मेहसे निक्रठती है, तब वह मुख समस्त पापों-
का विनाश करनेवाला पावन तीथे बन जाता हैं । जो मनुष्य
प्रसन्नतापू्रक . उस मुखका दर्शन करता हैं; उसे निश्चय ही
तीर्थसेवनजनित फल प्राप्त होता है ।- ब्राह्मणो ! शिवका
नाम; विभूति ( भस्म ) तथा रुद्राक्ष---ये तीनों त्रिवेणीके समान
परम पुण्यमय माने गये हैं | जहाँ ये तीनों शुभतर वस्तुएँ
सवंदा रहती हैं, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य जिवेणी-स्लानका
फल पा लेता है | भगवान् शिवका नाम “गज्जाः है, विभूति
यमुना? मानी गयी है तथा रुद्राक्षको “सरस्वती? कहा गया है।
इन तीनोंकी संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापोंका नाश करनेवाली
है | श्रेष्ठ ब्रह्मणो | इन तीनोंकी महिसाको सदसह्विलक्षण भगवान्
महेश्वर्के बिना दूसरा कोन मलीमाँति जानता है । इस
व्रह्ाण्डमें जो कुछ है, वह सब तो केवल महेश्वर ही जानते हैं ।
विप्रगण | में अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार संक्षेपसे
भगवल्नामोंकी महिमाका कुछ वर्णन करता हूँ | तुम सब छोग
प्रेमपूवक सुनो । यह नाम-माहात्म्य समस्त पार्पोको हर लेनेवाला
सर्वोत्तम साधन है । “शिव” इस नामरूपी दावानछसे महान
पातकरूपी पबत अनायास ही भस्म हो जाता है--यह सत्य है,
सत्य है | इसमें संशय नहीं है । शोनक ! पापमूलक जो नाना
प्रकारके दुःख हैं, वे एकमात्र शिवनाम ( भगवज्ञाम ) से ही
:मष्ट होनेवाले हैं। दूसरे साधनोंसे सम्पूर्ण य्ञ करनेपर भी
(पूर्णतया नष्ट नहीं होते हैँ | जो मनुप्य इस भूतछपर सदा
£ भगवान् शिवके नामोंके जपमें ही छगा हुआ है, वह वेदोंका
शत हैः वह पुष्यात्मा है; वह घन्यवादका पात्र है तथा वह
/तद्वान माना गया है | मुने ! जिनका शिवनाम-जपमें विश्वास
है; उनके द्वार आचरित नाना प्रकारके धर्म तत्काल फल
(ैनेफे लिये उत्मुक हो जाते हैं । महर्पे ! भगवान् शिवके
अमसे जितने पाप नष्ट होते हैं, उतने पाप मनुप्य इस भूतरूपर
7२ नहीं सकते ।# जो शिवनासरूपी नोकापर आरूढ हो
(0 साररूपी समुद्रको पार करते हैं, उनके जन्म-सरणरूप संसारके
मत चैसारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं.। महामुने ! दे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हें-। महामुने !
रा भवन्ति विविधा धमोस्तेपां सथ: फलोन्मुखा: ।
हि नपा भसवदति विशासः दिवनामजपे . सुने ॥
हू ( पातकानि विनरवनति यावन्ति शिवनामतः ।
सच 75. सादे नरसने
। ही "माप नि पापानि क्रियल्ते न नरेंसने ॥
द ( शिं० पु० वि० २६३ | २६-२७ )
पु |
ल्च्््ड्डझझझझह/शसअे्हऊह8झचसय्लय्य्य्य्य्य्य्य्च्य्य्य्य्य्यय्य्य्य्य्थ्ख्य्य्य्म्च्य्य्य्स्स्स्य्प्य्स्य्य्स्स्स्म्म्म्स्य्म्म्म्स्य्य्य्स्य्य्स्स्स्स्स्स्स्स्ल्््््ः िर+- री पारनत+पनाभम पी री परमत-न रतन पानी सनी करिाईभान- जननी सनी. मी रन. स्रिताग करी समान सनम. जा--
वषकलयाह-क-4..+-सान.
संसारके मूछभूत पातकरूपी पादपोंका शिवनामरूपी कुठारसे
निश्रय ही नाग हो जाता हँ। जो पापरूपी दावानलसे पीड़ित
हैं; उन्हें शिव-नामरूपी अम्ृतका पान करना चाहिये । पार्षो-
के दावानलसे दग्घ होनेवाले छोगोंको उस शिव-नामामृतके
बिना शान्ति नहीं मिल सकती । जो शिवनामरूपी सुधाकी बष्टि-
जनित घारामें गोते लगा रहे हैं, वे संसाररूपी दावानलके बीचमें
खड़े होनेपर भी कंदापि शोकके भागी नहीं होते । जिन
महात्माओंके मनमें शिवनामके प्रति बड़ी मारी मक्ति है; ऐसे
लोगोंकी तहसा ओर सर्वथा मुक्ति होती है |# मुनीश्वर |
जिसने अनेक जन्मोंतक तपस्या की है; उसीकी शिवनामके प्रति
भक्ति होती है; जो समस्त पार्पोका नाश करनेवाली है ।
जिसके मनमें भगवान् शिवके नामके प्रति कभी खण्डित
न होनेवाली असाधारण भक्ति प्रकट हुईं है; उसीके लिये मोक्ष
सुलूम है--यह मेरा मत है। जो अनेक पाप करके भी भगवान्
शिवके नाम-जपमें आदरपूर्वक लग गया है; वह समस्त पापोंसे
मुक्त हो ही जाता है--इसमें तंशय नहीं है । जैसे वनमें दावा-
नलसे दग्ध हुए वक्ष भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार शिवनाम-
रूपी दावानलसे दग्ध होकर उस समयतकके सारे पाप भस्म
हो जाते हैं | शोनक ! जिसके अड्ग नित्य भस््र लगानेसे पवित्र
हो गये हैँ तथा जो शिवनाम-जपक्रा आदर करने लगा है; वह
घोर संसार-सागरको भी पार कर ही लेता है। सम्यूण वेदोका
अवलोकन करके पूर्ववर्ती महर्षियोंने यही निश्चित किया है कि
भगवान् शिवके नामका जप संप्तार-सागरकों पार करनेक्े लिये
सर्वोत्तम उपाय है| मुनिवरों | अधिंक कहनेसे क्या छाम,
में शिव-नामके सर्वपापापहारी माहात्मका एक ही :छोकमें
वर्णन करता हूँ | भगवान् झंकरके एक नाममें भी पाप हरण-
की जितनी शक्ति है; उतना पातक मनुप्य कभी कर ही नहीं
'जाआआआाााआआआआआाआआआआआएशए७एश््णशणणणणणनाणणाणाणाणणाााणाााााााानााााम9भबभआ भा ३-३ जुष ा चचफ्डिखथशथथ
# शिवनामतरी प्राप्प संसाराध्यि तरन्ति तले।
संसारमूलपापानि तानि नध्यन्त्यसंशयम ||
संस्ारमृूल्भृतानां प्रावकानों महामुन ।
शिवतामकुठारेण विनाश जायने श्रुबम ॥
दिवनामासृत पेय॑ पापदावानलादिन: ।
पापदावाधपितत्तानां छझाम्तिस्तेव बिना न हि॥
शिवेति नाभपीयूववर्याधाराप रिप्लुता: ।
संसारदवमध्यदपि न शोचन्ति कढाचन !
शिवनाजल्ि मसदद्धक्तिनता वेषां मदात्मनास ।
तद्विधानां तु सहसा मक्ति्ंवति सर्वदा ॥
( द्ि० पु० बि७ २ ४ 5०-52 !
६८
सकता ।# मुने | पू्वकालमं महापापी राजा इन्द्रद्युम्नने शिव-
नामके प्रभावसे ही उत्तम सह्वति प्राप्त की थी । इसी तरह कोई
ब्राह्मणी युवती भी जो बहुत पाप कर चुकी थीं) शिवनामके
प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त हुई । द्विनवरों | इस प्रकार
मैंने तुमसे भगवज्नामके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया है ।
अब तुम भमस्मका माहात्य सुनो; जो समस्त पावन वस्तुओंको
भी पावन करनेवाला है |
महर्षियो |! भस्म सम्पूण मन्नलोको देनेवाला
तथा उत्तम है; उसके दो भेद बताये गये हैं, उन
भेदोंका में वणन करता हूँ; सावधान होकर सुनो। एकको
भमहाभस्म?जानना चाहिये ओर दूसरेको“खल्पमस्म!। महामस्मके
भी अनेक भेद हैं । वह तीन प्रकारका कहा गया है---
श्रोत, स्माते ओर लोकिक | ख्ल्पभस्मके भी बहुत-से भेदोंका
वर्णन किया गया है। श्रोत ओर स्मार्त भस्म क्रो केवल द्विजोंके ही
उपयोगमें आनेके योग्य कहा गया है। तीसरा जो लोकिक भस्म है;
वह अन्य सब लोगोंके भी उपयोगमें आ तकता है। श्रेष्ठ महर्षियोंनि
यह बताया है कि द्विजोंको वेदिक मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भस्म
धारण करना चाहिये | दूसरे लोगोंके लिये बिना मन्त्रके ही केवल
घारण करनेका विधान है । जले हुए गोबरसे प्रकट
होनेवाला भस्म अण्नेय कहलाता है। महामुने | वह भी
निपुण्ड्रका द्रव्य है; ऐसा कहा गया है| अभिहोत्रसे उत्पन्न
हुए भस्मका भी मनीषी पुरुषोंको संग्रह करना चाहिये |
अन्य यज्ञसे प्रकट हुआ भस्म भी त्रिपुण्ड् धारणके काममें
आ सकता है | जाबालोपनिषंदूमें आये हुए. “अम्रि/ इत्यादि
सात मन्त्रोंद्ार जलमिश्रित भस्मसे धूलन ( विभिन्न अ्ेंमें
मर्दन या लेपन ) करना चाहिये | महर्षि जाबालिने सभी
वर्णो और आश्रमोंके लिये मन्त्रसे या बिना मन्त्रके भी
आदरस्पूर्वक भस्मसे त्रिपुण्ड् छगानेकी आवश्यकता
बतायी है | समस्त अज्ञोंमें सनक मस्मको मलना अथवा
विभिन्न अन्जोंमें तिरछा त्रिपुण्ड्र छऊगाना--इन कार्योंको मोक्षार्थी
पुरुष प्रमादसे भी न छोड़े, ऐसा श्रुतिका आदेश है|
भगवान् शात् आर विष्णुने भी तियक निषुण्ड़ धारण
किया है | अन्य देवियोंसहित भगवती उम्रा और
लक्ष्मीदेवीने भी वाणीद्वारा इसकी प्रशंसा की | ब्राह्मणों,
# पापानां हरणे अम्मोर्नाम्न भक्तिहं यावती |
शक्ताति पातऊ तावत् के नापि नरः क्च्नित् ॥
( द्वि० पु० वि० २ दे । ४२ )
४ नमा रुद्राय शान्ताय ब्लह्मण परमात्मन ::
| खंक्षिप्त-शिवपुराणार
क्षत्रियों, बेदयों। झदों। वर्णतंकरों तथा जातिश्नट् पुरुषोंने
भी उद्धलन एबं त्रिपण्डक्के रूपमे भस्म धारण क्रिया है।
इसके पश्चात् भस्म-बारण तथा त्िपुम्ड्रकी मरिम
एवं विधि बताकर सूतर्जने फिर कहा--प्रहर्णियों! इस
प्रकार मैंने संक्षेपत्ते त्रियुण्ड्का माहात्म्य बताया है। यह
समस्त प्राणियोंके लिये गोपनीय रहस्य है। अतः तुम मे
इसे गुम ही रखना चाहिये | मुनिवरों | ललछाट आदि सर्म
निर्दिट् खानोंम जो भश्मसे तीन तिरछी रेखाएँ बनाई
जाती हैं, उन्हींको बिद्वानोंने त्रिपुण्ड्र कहा है। भेहिंके मथ
भागसे लेकर जहाँतक भोहोंका अन्त है; उतना बड़ा त्रिपुए
ललाठमें धारण करना चाहिये। मध्यमा ओर अनामितर
अंगुलीसे दो रेखाएँ; करके बीचमें अद्जुछद्दारा प्रतिलोमभारे
की गयी रेखा त्रिपुण्ड्र कहलाती है। अथवा ब्रीचकी वी
अंगुलियोंसे भस्म लेकर यत्ञपूर्वक्ि: भक्तिमावते लक
त्रिपुण्ड़ धारण करे | त्रिपुण्ड्र अत्यन्त उत्तम तथा मे
ओर मोक्षको देनेवाला है। त्रिपुण्डकी तीनों रेखा ओंमेंसे प्रत्येक
नो-नो देवता हैं, जो सभी अज्ञेंमें खित हैं; मैं उक
परिचय देता हूँ | सावधान होकर सुनो | मुनिवरो | प्रणका
प्रथम अक्षर अकारः गाहंपत्य अग्मि; प्रथ्वी; धर्म) रजोगुग
ऋग्वेद, कियाशक्ति। प्रातःसवन तथा. महादेव-न
जिपुण्डकी प्रथम रेखाके नो देवता हैं, यह बात शि '
दीक्षापरायण पुरुषोंको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये | :
प्रणवका दूसरा अक्षर उकार; दक्षिगाम्रि; आकाश, सचगुतः |
यजुवंद, मध्यंदिनतवन, इच्छाशक्ति, अन्तरात्मा वर:
महेश्वर--ये दूसरी रेखाके नो देवता हैं | प्रणयका तीक
अक्षर मकार, आहबनीय अग्नि, परमात्मा। तमोगुण) थुले#
ज्ञानशक्ति; सामवेद, तृतीयसवन तथा शिव--ये तीर:
रेखाके नो देवता हैं | इस प्रकार स्थान-देवताओंको उक्त *
भक्तिमावसे नित्य नमस्कार करके स्नान आदिसे चुद्ध हु
पुरुष यदि त्रिपुण्ड्र धारण करें तो भोग ओर मोक्षक्रों भी #₹ '
कर लेता है । मुनीश्वर ! ये सम्पूर्ण अज्ञेंमें स्थान-देवता करी :
गये है। अब उनके सम्बन्धी खान बताता | '
भक्तिपूवंक सुनो । बत्तीव, सोलह, आठ अथवा पाँच खा.
त्रिपुण्ड्रका न्यास करे | मस्तक, लछलछ[ठ, दोनों कान; दोनों के! :
दोनों नासिका मुख, कण्ठ, दोनों हाथ) दोनों कोहनी! के 7
कलाई; हृदय, दोनों पाश्व॑भाग, नाभि; दोनों अग्डकोप) के
ऊरु, दोनों गुर्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडडी और दोनों १९7: के
ये बत्तीत उत्तम स्थान हैं, इनमें क्रमश: अग्नि; जले) ?। हर
प्र
आज -+न्३---३७७छ--३२३-८ "-++-
नल
विद्येश्वरसहिता ]
न «७» ७ ७.०. ५ नल अमान पा न वना»मणीन्क -पिलनकमि+मब ५ स्अअघवमनमल + हरी. >> - 5
कट के
£ रुद्राक्षथारणकी महिमा तथा उसके विषिव भेदोंका वर्णन 5
७... ७...-++-० >+क+७»->+>- २-3. अनजमन- नवीन,
य्ल्ल्ल्ल्स्स्स्य्स्स्य्य्स्ल्य्स्स्य्य्स्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्स्य्स्स्स्स्स्य्स्य्य्य्स्स्य्य्स्स्य्स्स्स्य्स्स्स्स्य्स्स्स्स्स्स्स्स्5
वायु; दस दिक्प्रदेश। दस दिकपाल तथा आठ वसुओंका
निवात है| धर, ध्रुव सोम) आप, अनिछ, अनकः प्रत्यूष
और प्रमास-ये आठ वसु कहे गये हैं। इन सबका
नाममात्र लेकर इनके स्थानोंमें विद्वान पुरुष तिपुण्ड्
धारण करे |
अथवा एकाग्रचितत हो सोलह स्थानमें ही त्रिपुण्ड धारण
करे । मस्तक) हललाट, कण्ठ: दोनों कंधों, दोनों भ्ुजाओं,
दोनों कोहनियों तथा दोनों कलाइयोमें, छृदयमें। नाभिमें;
दोनों पसलियोंमें तथा पृष्ठभागमे त्रिपुण्ड़ लगाकर वहाँ दोनों
अशिनी ऊुमारंका शिव; शक्ति, रुद्र/ इश तथा नारदका
ओर वामा आदि नो शक्तियोंका पूजन करे | ये सब मिलकर
सोलह देवता हैं | अश्विनीकुमार दो कहे गये हैं---तासत्य और
दस्त | अथवा मस्तक केश) दोनों कान; मुख) दोनों भ्ुजञा,
हृदय। नाभि; दोनों ऊरु) दोनों जानु। दोनों पेर ओर प्रृष्ठभांग---
इन सोलह स्थानेमिं सोलह त्रिपुण्ड्का न्यास करें | मस्तकमें
शिव; केशमें चन्द्रमा; दोनों कानोंमें रुद्र और ब्रह्मा। मुखमें
विन्तरान गणेश, दोनों भुजाओंमें विष्यु ओर लक्ष्मी;
हृदयमें दाम्मु, नाभिमें प्रजापति। दोनों ऊूरुओंमें नाग
ओर नागकन्याएँ» दोनों घुटनोंमें ऋषिकन्याएँ, दोनों
पैरेंमें समुद्र तथा विशाल प्रृष्ठभागमें सम्पूर्ण तीर्थ देवताहूपसे
विराजमान हैं | इस प्रकार सोलह खानोंका परिचय दिया
गया । अब आठ खान बताये जाते हैं | गुह्य खान; छलाठ,
परम उत्तम कर्णयुगल, दोनों कंचे, हृदय और नामि--ये
आठ स्थान हैं | इनमें ब्रह्मा तथा सप्तर्षि--ये आठ देवता
बताये गये हैं। मुनीखवरो | मस्मके खथानकी जाननेवाले
विद्वानोंने इस तरह आठ खानोंका परिचिय्र दिया है |
अथवा मस्तक; दोनों भुजाएँ: हृदय ओर नाभि--इन
पाँच स्थानोंकी भस्मवेत्ता पुरुषोंने भस्म घारणके योग्य बताया
है। यथासम्भव देश) काल आदिकी अपेक्षा रखते हुए, उद्लन
( भस्मको अभिमन्त्रित करना और जलमें मिलाना आदि काये)
करे | यदि उद्धलममें भी असमर्थ हो तो त्रिपुण्ड़ आदि
लगाये | निनेत्रधारी, तीनों शुणोंक आधार तथा तीनों
देवताओंके जनक भगवान् शिवका स्मरण करते हुए, “नमः
शिवाय? कहकर ललाटमें चिपुण्ड लगाये। “ईद्याभ्यां नमः?
ऐसा कहकर दोनों पादवेभागोंमें त्रिपुण्ड्र धारण करे।
धजीजाम्यां मम: यह बोलकर दोनों कलाइओंमें भस्म
लगावे । “पितृभ्यां नमःः कहकर नीचेके अजन्नमें; “उमेशाम्यां
कहकर ऊपरके अड्गमें तथा “भीमाय नमः कहकर
पीठमें और सिरके पिछले भागमें त्रिपुण्ड़ लगाना चाहिये ।
. ( अध्याय २३; २४ )
-+--€६8४६०-+
रुद्राक्धारणकी महिमा तथा उसके विविध भेदोंका वर्णन
सूतजी कहते ह--महाप्राज्ञ | महामते | शिवरूप
शोनक | अब में संक्षेपसे रुद्राक्षका माहात््य बता रहा हूँ
सुनो । रुद्राक्ष शिवको बहुत ही प्रिय है। इसे परम पावन
समझना चाहिये | रुद्राक्षेके दशनसे, स्पशसे तथा उसपर
जप करनेसे वह समस्त पार्पोका अपहरण करनेबाला माना
गया ह। मुने ! पूर्वकालमें परमात्मा शिवने समस्त छोकोका
उपकार करनेके लिये देवी पावरतीके सामने रुद्राक्षकी महिमाका
वर्णन किया था |
भगवान् शिव बोले--महेश्वरि शिवे ! में तुम्दारे
धेमवश भक्तोके: हिंतकी कामनासे रुद्राक्षकी महिमाका
वर्णन करता हूँ, सुनो। महेशानि ! पूर्वकालकी बात है; में
मनकी संयममें रखकर हजारों दिव्य वर्गेतक घोर तमस्यामें लगा
रए।। एक दिन सहसा मेरा मन क्षव्घ हो उठा | परमेश्वारि !
भे समृर्ण लेकोंका उपकार करनेचात्य खतन्त्र परमेश्वर हैँ |
अतें; उतर समय मेने लीलायश ही अपने दोना नेत्र खोले:
बोलते ही मेरे मनोदर ने्रपुरोसि कुछ जलकी चँँदे गिरों।
ऑयकी उन दूँदोंसे वहाँ रुद्राक्ष नामक च्ृक्ष पैदा हो गया।
भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये वे अश्रुविन्दु स्थावरभावको
प्रात्त हो गये । वे रुद्राक्ष मेने विष्णुभक्तकों तथा चारो वर्णोके
लोगोकी बाँद दिये । भृतछपर अपने प्रिय रुद्राक्षोंकों मैंने
गोड़ देशमें उत्पन्न किया । मथुरा, अयोष्या। लड्;
मलयाचल; सह्यगिरि; कोशी तथा अन्य देशोम भी उनके
अड्गर जगाये। वे उत्तम रुद्राल अमह्य पापसमुहेका भेदन
करनेवाले तथा श्रतिय्रोके भी प्रेरक €। मेरी आज्ञासे वे
ब्राह्मण, क्षत्रिय, चेश्य ओर झुद्र जातिके भेदसे इस भूतलूपर
प्रकट हुए | रुद्राक्षोक्री ही जातिके झ॒भाक्ष भी हैं। उन
त्राह्मणादि जातिबाले रुद्राक्षेक्रि वर्ण: ब्येन; रक्त; पीत तथा
कृष्ण जानने चाहिये। मनप्योक्ों चाहिये कि वे क्रमश: वर्णके
अनुसार अपनी जातिका ही रुद्राक्ष घारण करे । भोग
ओर मोक्ष क्री इच्छा रखनेवाले चारों वर्णाके लोगों ओर बिशीपतः
शित्रमक्तीकी शिव-पायतीकी प्रसन्नताके लिये सद्धाक्षके फॉटोकों
अवश्य थारण करना चाहिये | ऑबलिके फलके बगबर जे!
330--4-अनन्र-ग+--दफमिकक कक “०१ “अन््वे>म_..तहा.. २५. "का “जनओओं "नेक मनाआ॥--थिनाकन३.२७.
9० नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने १ [ संक्षिप्त-शिवपुराणाबू
रद्गाक्ष हो; वह श्रेष्ठ बताया गया है | जो बेरके फलके बराबर इसके वाद किस अक्ञम कितने रुद्राक्ष धारण
हो; उसे मध्यम श्रेणीकाी कहा गया हे ओर जो चनेके करने चाहिये, यह बताकर सूतज्ञी बोले--महपियो |
बराबर हो, उसकी गणना निम्नकोटिगें की गयी है। अब. र्रिर ईशान-मन्मसे; कानमें तत्युुप-न्त्रसे तथा गछे ओर
इसकी उत्तमताको परखनेकी यह दूसरी उत्तम प्रक्रिया बतायी.. दे अवोरमन्तसे रद्राक्ष घारण करना चाहिये। विद्या
जाती है। इसे बतानेका उद्देश्य है भक्तोकी हितकामना | हर आहट हि बेचरनआहरक न बा ह्तड
पति गेल "मन्त्रसे पंद्रह रद्राक्षेद्रारा गुथी हुई माल धारण करे।
पार्वती | तुम भी-मौंति के इस विषयको सुनो । अथवा अड्ञोंसहित प्रणवका पॉच वार जप करके रुद्राक्ती
महेश्वरि ! जो रुद्राक्ष बेरके फलके बराबर होता है। वह तीन; पाँच या सात मालाएँ घारण करे | अथवा मूल्य
. उतना छोटा होनेपर भी लोकरें उत्तम फल देनेवाला तथा ( “नमः शिवाय? ) से ही समस्त रुद्रा्षोक्ी घारण करे
सुख-सोभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है | जो रुद्राक्ष ऑवलेके . राद्राक्षधारी पुरुष अपने खान-पानमें मदर, मांस, लहसुन)
फलके बराबर होता है; वह समस्त अरिशेंका विनाश करनेवाला प्याज, सहिजन। लिसोड़ा आदिको त्याग दे ।
होता है तथा जो गुज्ञाफलके समान बहुत छोय होता है, वह गिरिराजनन्दिनी उमे ! ब्वेत रुद्राक्ष केवछ बआाह्मणोंकों है
सम्पूर्ण मनोरथों और फलोंकी सिद्धि करनेवाल है। रुद्राक्ष धारण करना चाहिये | गहरे छाल रंगका रुद्राक्ष क्षत्रिय
जैसे-जैसे छोटा होता हैं, वैसे-ही-वेसे अधिक फल देनेवाला लिये हितकर बताया गया है | वेध्योंके लिये प्रतिदिन बारंबा
होता है। एक-एक बड़े रुद्राक्षतं एक-एक छोटे रुद्राक्षको पीले रुद्राक्षको घारण करना आवश्यक है ओर शूद्रोंकों कादे
विद्वानोंने दसगुना अधिक फल देनेवाला बताया है | पार्पोका रंगका रुद्राक्ष धारण करना चाहिये--यह वेदोक्त माय है।
नाश करनेके लिये रुद्राक्ष-धारण आवश्यक बताया गया है । त्रक्नचारी; वानप्रस्थ, गहस्थ ओर संन्यासी---प्बको नियमपूछ
वह निश्चय ही सम्पूर्ण अमीष्ट मनोरथोंका साधक है। अतः. उढ्भाक्ष घारण करना उचित है | इसे धारण करनेका सोमाव
अवश्य ही उसे धारण करना चाहिये। परमेश्वरि ! छोकमें पुण्यसे प्राप्त होता है | उम्रे | पहले आँवलेके बराबर ओर '
मड़ल्मय रद्राक्ष जैसा फल देनेवाला देखा जाता है। वैसी फिर उससे भी छोटे रुद्राक्ष घारण करे | जो रोगी हों) जिन
फलदायिनी दूसरी कोई माला नहीं दिखायी देती। देवि ! दाने न हों) जिन्हें कीड़ेने खा लिया हो, जिनमें पिसोनेयोग
समान आकार-प्रकारवाठे, चिकने, मजबूत; स्थूल, कण्टक- छेद न हों) ऐसे रुद्राक्ष मझलाकाड्ली पुरुषोंकों नहों धाण |
युक्त ( उमरे हुए छोटे-छोटे दानोंवाले ) ओर सुन्दर रुद्राक्ष करने चाहिये। रुद्राक्ष मेरा मज्जलमय लिज्ञ-विग्रह है। का
अभिलषित पदार्थॉके दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देनेवाले. अन्वतोगतल्वा चनेके वराबर लघुतर होता है | सूक्ष्म रुद्राक्ष :
हैं। जिसे कीड़ोंने दूषित कर दिया हो; जो हूटा-फूटा हो, जिभमें ही सदा प्रदस्त माना गया है। सभी आश्रमों, समस्त वर्णों। |
मरें हुए दाने न हों) जो अणयुक्त हो तथा जो पूरा-पूरा गोल स्त्रियों ओर झूद्रोंकी भी भगवान् शिवक्री आशाके अनुसार |
न् हो) इन पाँच प्रकारके रुद्राक्षोंकी त्याग देना चाहिये । जित. रेदव रुद्राक्ष धारण करना चाहिये |# यतियोंके लिये प्रणवक्रे '
रुद्राक्ष अपने-आप ही डोरा पिसेनेके योग्य छिद्र हो गया. चरणपूर्वक रुद्राक्ष-घारणका विधान है । जिसके ललादों |.
हो, वही यहाँ उत्तम माना गया है। जिसमें मनुष्यके प्रयक्ञसे. तरिएृण्ड्र छगा हो ओर सभी अड्ग रुद्राश्वसे विभूषित हाँ तथा
छेद किया गया हो; वह मध्यम श्रेणीका होता है | रुद्राक्ष, मो मत्युज्यमन्त्रका जय कर रहा हो; उसका दर्शन करनेरे
धारण बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेबाल्ा है| इस जगपमें अक्षित् रुद्रके दशनका फल प्राप्त होता है | श्ै
ग्यारह सी रुद्राक्ष धारण करके मनुप्य जिस फडको पाता है, पारब॑ती ! रुद्माक्ष अनेक प्रकारके बताये गये हैं । मैं उसे पर
उसका वणन हे सेकड़ीं कप भी नहीं किया जा सकता | भेदोंका वर्णन करता हूँ । वे भेद भोग और सोक्षरूप फल देने .
मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिवका खरूप है| वह भोग ओए ,
लंबे सूतमें पिरोकर एक हार वना ले। वैसे-वैसे तीन हार जज
माणां वणोनां ख्रीशूद्राणां शिवाशया।
बनाकर भक्तिपरायग पुरुष उनका यशोपवीत तैयार करे और पाया: सदेव रुद्राक्षा % % ># »&-+॥. '
उसे यथास्थान धारण किये रहे | 'ा
- । (शि० घु० वि० २५ । ४४/ ;
बिक:
िर
विद्येश्वरसंद्दिता ]
४ रुद्राक्षणारणकी महिसा तथ। उसके विविध भेदोंका वर्णन +
9
मोक्षब्पी फल प्रदान करता है । जहाँ रुद्राक्षकी पूजा होती है)
वहाँसे लक्ष्मी दुर नहीं जातीं | उस ख्ानके सारे उपद्रव नष्ट हो
जते हूँ तथा वहाँ रहनेवाले लछोगोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूण
होती हैँ | दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहां गया है | वह
सम्पूर्ण कामनाओं और फरछोंको देनेवाला है । तीन सुखवाला
रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधनका फल देनेवाल्य हे, उसके प्रभावसे
सारी विद्याएं प्रतिष्ठित होती हैं। चार मुखवाल रुद्राक्ष साक्षात्
ब्रह्माका रूप है | वह दर्शन ओर स्पर्शसे शीत्र ही घर्म; अर्थ)
काम ओर मोक्ष--इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। पाँच
: मुखबात्म रुद्राक्ष साक्षात् काछमिरुद्र-रूप है| वह सब्र कुछ
करनेमें समर्थ है। सबको मुक्ति देनेवाछा तथा सम्पूर्ण
मनोवाड्छित फल प्रदान करनेवाला है | पग्ममुख रुद्राक्ष समस्त
पापोंकी दूर कर देता है । छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिक्रेयका
खरूप है | यदि दाहिनी बाँहमें उसे धारण किया जाय तो धारण
करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोसे मुक्त हो जाता है)
इसमें संशय नहीं है। महेश्वरि | सात मुखबाल्य रुद्राक्ष
अननज्खरूप ओर अनज्जा नामसे ही प्रसिद्ध है । देवेशि !
उसको धारण करनेसे दरिद्र भी ऐश्वयंशाली हो जाता है | आठ
मुखवाल्य रुद्राक्ष अश्मूर्ति भैरबरूप है | उसको धारण करनेसे
मनुष्य पूर्णायु होता है ओर मृत्युके पश्चात् झूलघारी शंकर
ही जाता है । नो मुखवाले रुद्राक्षको भैरव तथा कपिल्मुनिका
प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करनेवाली महेश्वरी
दुर्गा उसकी अधिष्ठान्री देवी मानी गयी हैं | जो मनुष्य भक्ति-
उरायण हो अपने बायें हाथमें नवमुख रुद्राक्षको धारण
करता है, वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है---
£इसमें संशय नहीं है। महेश्वरि | दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात्
“्रगवान् विष्णुका रूप है। देवेशि | उसको घारण करनेसे
“मनुप्यक्ी सम्यूणे कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। परसेश्वरि !
९ परह मुखवाला जो रुद्राक्ष है; वह रुद्ररूप है | उसको धारण
“रनेसे मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है । वारह मुखवाले दद्राक्-
।केशप्रदेशमें धारण करे। उसके घारण करनेसे मानो मस्तक-
| आदित्य विराजमान हो जाते हैं | तेरह मुखवाल्ा
रुद्राक्ष विज्वेदेवोंका खरूप है | उसको घारण करके मनुष्य
सम्यूण अभीशेंकों पाता तथा सोमाग्य और मड्गजल लाभ
करता है। चोदह मुखबाला जो रुद्राक्ष है, वह परम शिवरूप
है। उसे मक्तिपूर्वक्क मस्तकपर धारण करे | इससे समस्त
पापोंका नाश हो जाता है ।
: गिरिराजकुमारी | इस प्रकार मुखोंके भेदसे रुद्राक्षके
चौदह भेद बताये गये। अब तुम क्रमशः उन रुद्राक्षोंके
धारण करनेके मन्त्रोंको प्रसन्नतापूषंक सुनो | १. डे“ हीं
नम)। २. 3४ नमः । ३. की नमः) । ४. डें हों नमः ।
५. 3“ हीं नमः | ६. 3० हीं हुँ नमः. । ७. 2 हुं नमः ।
-८., 3“ हुं नमः । ९. 3“ हीं हुं नमः | १०. ँ“ हीं नमः |
११, 3० हीं हुं नमः।। १२. 3“ क्रो क्षों रों नम।। १३. डे“ हीं
नमः ॥ १४. 3 नमः | इस चोदह सन््त्रोंद्रारा क्रमशः एकसे
लेकर चोदह मुखवाले रुद्राक्षकों धारण करनेका विधान है।
साधकको चाहिये कि वह निद्रा ओर आल्य्यका त्याग करके श्रद्धा-
भक्तिसे सम्पन्न हो सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिके लिये उक्त मन्ह्रों-
द्वार उन-उन रुद्राक्षोंकी धारण करे | रुद्राक्षकी माला धारण
करनेवाले पुरुषको देखकर भूत) प्रेत, पिशाच डाकिनी;
शाकिनी तथा जो अन्य द्वोहकारी राक्षस आदि हैं, वे सब-के-
सब दूर भाग जाते हैं | जो कृत्रिम अमिचार आदि प्रयुक्त
होते हूँ; वे सब रुद्राक्षघारीको देखकर सशझ्ल हो दूर खिसक
"जाते हैं । पाव॑ती ! रुद्राक्षमाल्ाधारी पुरुषको देखकर में शिव,
भगवान् वि८्णु, देवी दुर्गा, गणेश) सूर्य तथा अन्य देवता भी
प्रसन्न हो जाते हैं | महेश्वरि | इस प्रकार रुद्राक्षकी महिमाको
जानकर धर्मक्री बद्धिके लिये भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त मन््ह्रोंद्ार
विधिवत् उसे धारण करना चाहिये |
सुनीश्वर | भगवान् शिवने देवी पाव॑तीके सामने जो कुछ
कहा था) वह सब तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने कह सुनाया !
मुनीश्वरों | मैंने तुम्हारे. समक्ष इस विद्येश्वर-संहिताका वर्णन
किया है । यह संहिता सम्पूर्ण सिद्धियोक्रो देनेवाली तथा
भगवान शिवकी आज्ञासे नित्य मोक्ष प्रदान करनेश्राली है ।
( अध्याय २५ )
॥ विद्येश्दरसंहिता सम्पूर्ण ॥
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रुद्रसंहिता ( प्रथम सश्टिण्ड )
ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें नारद-अक्य-संबादकी अवतारणा करते हुए सतजीका उन्हें नारमांह
का प्रसड़ सुनाना; कामविजयके गवेसे युक्त हुए नारूका शिव, ब्रह्मा
तथा विष्णुके पास जाकर अपने तपका ग्रभाव बताना
विश्वोद्धवस्थितिलया दिपु हेतुमेक
गौरीपति विदिततस्वमनन्तकीरतिस् ।
मायाश्रयं विगतमायसचिस्त्यरूपं
बोधस्वरूपममर्क हि शिव नमामि ॥
जो विश्वकी उत्पत्ति; स्थिति ओर लय आदिके एकमात्र
कारण हैं; गोरी गिरिराजकुसारी उमाके पति हैं तत््वज्ञ हैं;
जिनकी कीर्तिका कहीं अन्त नहीं है; जो मायाके आश्रय होकर
भी उससे अत्यन्त दूर हैं तथा जिनका खरूप अचिन्त्य है;
उन विमलू बोधखवरूप भगवान् शिवको में प्रणाम करता हूँ |
वन््दे शिव त॑ भ्रकृतेरनार्दि
प्रशान्तमेक॑ पुरुषोत्तम हि।
स्त्रमायया क्ृत्स्नमिदं हि रृट्झा
नभोवद्न्तबहिरास्थितो यः ॥
में खमावसे ही उन अनादि, शान्तखरूप, एकमात्र;
पुरुषोत्तम शिवकी वन्दना करता हूँ; जो अपनी मायासे इस -
सम्पूर्ण विश्वकी खध्टि करके आकाशकी भाँति इसके भीतर ओर
बाहर भी खित हैं |
बन्दे5न्तरस्थ निजगृढ्रूप॑
शिव खतस्स्रप्टुमिद॑ विचप्टे ।
जगन्ति निल््य॑ परितो अ्रसन्ति
यत्संनिधी चुस्बकलोहवत्तम ॥
: जैसे लोहा चुम्बकसे आइष्ट होकर उसके पास ही ल्ठका
रहता हैं; उसी प्रकार ये सारे जगत् सदा सब ओर जिसके
आसपास ही भ्रमण करते हैं, जिन्होंने अपनेसे ही इस प्रपश्चको
र्चनेंकी विधि बतायी थी, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे
विराजमान हैं तथा जिनका अपना खरूप अत्यन्त गढ़ है; उन
भगवान शिवकी में सादर वन्दना करता हैं |
ब्यासजी कहते हे--जग्तके पिता भगशन शिखर!
जगन्माता कल्याणमयी पावंती तथा उसके पुत्र गणेशजीको
पसस्कार करके हम इस पुराणका वर्णन करते हैं | एक समय
की बात है; नेमिपारण्यमं निवास करनेवाले शौनक आदि सर्म
मुनियोने उत्तम भक्तिभावक्ते साथ सूतजीसे पूछा
ऋषि चोले--महाभाग सूतजी ! विद्येश्वर-संहिताकी ब
साध्य-साधन-खण्ड नामवाली थ्ुभ एवं उत्तम कथा हैः“
हमलोगेने सुन लिया | उसका आदिभाग बहुत ही से
है तथा वह शिव-भक्तोंपर भगवान् शिवका वात्सल्य-स्नेह प्रक
करनेवाली है | विद्नू ) अब आप भगवान शिवके परम उक्त
खख्पका वर्णन कीजिये | साथ ही शिव ओर पावबेतीके एम
चरिज्रोंका पूर्णरूपसे श्रवण कराइये | हम पूछते हैं) रिएः
महेश्वर लोकमें संगुणरूप केसे धारण करते हैं ! हम सब दो
विचार करनेपर भी शिवके तत्वकों नहीं समझ पाते |.
सश्टिके पहले भगवान् शिव किस प्रकार अपने ख्रूपसे हि!
होते हैं ! फिर सष्टिके मध्यकाल्में वे भगवान् किस तरहओः
करते हुए सम्यक् व्यवहार-वर्ताव करते हैं ओर सश्किका
अन्त होनेपर वे महेश्वरदेव किस रुपमें स्वित रहते हैं ! होः ,
कल्याणकारी शंकर केसे प्रसन्न होते हैं ! ओर प्रसन्न हु.
महेश्वर अपने भक्तों तथा दूसरोंको कौन-सा उत्तम फछ प्रहः |
करते हैं ? यह सब हमसे कहिये | हमने सुना है कि भर्का'
शिव शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं | वे महान दयाछ हैं, इस
अपने भक्तोंका कष्ट नहों देख सकते । ब्रह्मा, विष्णु
महेश--ये तीन देवता शिवके ही अड्गसे उत्पन्न हुए!
उनके प्राकस्यकी कथा तथा उनके विशेष चरित्रोंका र्की
कीजिये । प्रभो | आप उम्ताके आविर्भाव. और विवाहवी' ....
कथा कहिये | विशेषतः उनके गाह॑स्थ्यधर्मका और |
लीलाओंका भी वर्णन कीजिये | निष्णाप सूतजी ! (
प्रब्नके उत्तरमें ) आपको ये सब तथा दूसरी बातें भी थी
कहनी चाहिये | | ।
घतजीने कहा--मुनीखरों | आपडोगोंने बड़ी अ «
बात पूछी है। भगवान् सदाशिवकी कथामें आपकोगी
आन्तरिक निष्ठा हुईं है, इसके लिये आप घन्यवादके पी
त्राह्मणी | संगवान् .शंकरका गुणानुवाद सात्विक राजी .
।
|
|
न्च्वाकक 7
रंट्रसंहिता ]
3 पफ्राषियोंके प्रनके उत्तरमे मारदं-प्रह्म-संबाद %
३
तामस तीनों ही प्रकृतिके मनुप्योक्ी सदा आनन्द प्रदान करने-
वाल्य है | पशुओंकी हिंसा करनेवाले निष्ठुर कसाईके सिवा
दूसरा कौन पुरुष उस गुणानुबादको सुननेसे ऊब सकता है |.
जिनके मनमें कोई तृष्णा नहीं है, ऐसे महात्मा पुरुष भगवान्
शिवके उन गुर्णोका गान करते हैं। क्योंकि वह गुणावली संसार-
रूपी रोगकी दवा है; मन तथा कार्नोंको प्रिय छगनेवाली ओर
समृण भनोरधोंकी देनेबाली है # | ब्राह्णो ! आपलोगेकि
प्रय्नके अनुसार मैं यथाबुद्धि प्रयक्षपूर्वक्क शिवललील्का वर्णन
' करता हूँ, आप आदरपूर्वक सुनें | जैसे आपलोग पूछ रहे हैं,
उठी प्रकार देवपि ऋारदजीने शिवरूपी भगवान् विष्णुसे ओरिति
- होकर अपने पितासे पूछा था । अपने पुत्र नारदका प्रश्न सुन-
( शिवभक्त ब्रह्माजीका चित्त प्रसन्न हो गया ओर वे उन
नेशिरोमणेको हष प्रदान करते हुए प्रेमपृवंक भगवान् शिवक्रे
पका गान करने लगे ॥
एक समयकी बात है; मुनिशिरोमणि विप्रवर नारदजीने;
| ब्ह्ाजीके पुत्र हैं, विनीतचित्त हो तपस्पामें मन लगाया |
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» गम्भागुणानुवादात् को विर्थ्येत पुमान् द्विजा: ।
दिना
ह छ कै
धपदत्त।
पशुघ्न त्रिविषजनानन्दकरात्
श्तिच्नि चर भवरोगं हा २. कम्ण
ः दत्प्मंश् बरगापपोषपि है।
गनासाश्ादिरामध . यतः सर्वार्ध: से बं॥
(दा० घु० रुद्र० सएुू० १। २३-२४ )
सदा ॥
शशि ए्० उ्6 २०-.....
दिखायी देती थी | उसके निकट देवनदी गद्जा निरन्तर वेग-
पूर्वक बहती थीं। वहाँ एक सहान् दिव्य आश्रम था; जो नाना
प्रकारकी शोभासे सुशोभित था | दिव्यदर्शी नारदजी तपस्या
करनेके लिये उसी आश्रममें गये | उस गुफाको देखकर मुनिवर
नारदजी बड़े प्रसन्न हुए ओर सुदी्घकाल्तक वहाँ तपस्था करते
रहे | उनका अन्तः/करण शुद्ध था। वे हृढ़तापूबक आसन
बाँधकर मोन हो प्राणायामपूर्वक समाधिमें स्थित हो गये ।
ब्राह्मणो | उन्होंने वह समाधि लगायी; जिसमें ब्रह्मका साक्षात्कार
करानेवाला “अहं ब्रह्मास्मि? ( मैं ब्रह्म हैँ )--यह विज्ञान प्रकट
होता है | मुनिवर नारदजी जब इस प्रकार तपस्या करने लगे,
उस समय यह समाचार पाकर ,देवराज इन्द्र कॉप उठे । वे
मानसिक संतापसे विहल हो गये | “ये नारद मुनि मेरा राज्य
लेना चाहते हैंः---मन-ही-सन ऐसा सोचकर इन्द्रने उनकी
तप्स्थामें विष्न डालनेके लिये प्रयत्ष करनेकी इच्छा की । उस
समय देवराजने अपने मनसे कामदेवका स्मरण किया | स्मरण
करते ही कामदेव आ। गये । महेन्द्रने उन्हें नारदजीकी तपस्यामें
विध्न डालनेका आदेश दिया | यह आज्ञा पाकर कामदेव
वसनन््तको साथ ले बड़े गर्वते उस स्थानपर गये ओर अपना
उपाय करने लगे | उन्होंने वहाँ शीम ही अपनी सारी कलाएँ
रच डालीं। वसनन््तने मी मदमतत होकर अपना प्रभाव अनेक
प्रकारसे प्रकट किया । मुनिवरों ! कामदेव ओर वसन्तके अथक
प्रयक्ष करनेपर भी नारद मुनिके चित्तमें विकार नहीं उत्पन्न
हुआ । महादेवजीके अनुगहसे उन दोनोंका गये चूणहो गया |
शोनक आदि महए्षियों ) ऐसा होनेमे जो कारण था, उसे
आदरपूबंक सुनो । महादेवजीकी कृपासे ही नारदमुनिपर काम-
देवका कोई प्रभाव नहीं पड़ा | पहले उसी आश्रममें कामशन्नु
भगवान् शिवने उत्तम तपस्पा की थी ओर वहीं उन्होंने
मुनियोंकी तपस्थाका नाश करनेवाले कामदेवक़ो शीघ्र ही भस्म
कर डाल्य था| उस समय रतिने कामदेवकों पुनः जीवित
करनेके लिये देवताओंसे प्राथना की । तब देवताओंने समस्त
ल्लेकींका कल्याण करनेवाले भगवान् द्वंकरसे याचना की |
उनके याचना करनेपर वे बोले--'देवताओ ) कुछ समय
च्यतीत होनेके बाद कामदेव जीवित तो हो जायेगे, परतु यहाँ
उनका कोई उपाय नहीं चल सकेगा | अमरगण ! यहाँ खड़े
होकर छोग चारों ओर जितनी दृरतककी भूमिकों नेत्नोसे देख
पाते हैँ, वहतिक कावदेव्े वागोंका प्रभाव नहीं चल सकेगा;
इसमें संशय नहीं है । भगवान शंकरकी इस उक्तिफे
हि
अनुमार उस समय बहा सारद जीके पति कझामदंदक्ा निती
ही ) 5
हि
७९०
#: नमो रुद्राय ध्ान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ::
[ संक्षिप्त-शिवपुराण|
प्रभाव मिथ्या सिद्ध हुआ वे शीघ्र ही स्वर्गंलोकर्मे इन्द्रके
पास लछोट गये | वहाँ कामदेवने अपना सारा ब्रृत्तान्त ओर
मुनिका प्रभाव कह सुनाया; तत्पश्वात् इन्द्रकी आशसे वे
बसन्तके साथ अपने स्थानकी छोट गये | उस समय देवराज
इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उन्हेंने नारदजीकी भूरिं-भूरि
प्रशंसा की | परंतु शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण वे
उस पूर्व॑इत्तान्तकी स्मरण न कर सके । वास्तवमें इस संसार-
के भीतर सभी प्राणियोंके लिये शम्भुकी मायाको जानना
अत्यन्त कठिन है | जिसने भगवान् शिवके चरणोंमें अपने
आपको समर्पित कर दिया है; उस भक्तको छोड़कर शेष सारा
जगत् उनकी मायासे मोहित हो जाता है# । नारदजी भी
भगवान् शंकरकी कृषाते वहाँ चिर्काह़ुतक तपस्थार्मे लगे
रहे | जब उन्होंने अपनी तपस्याको पूर्ण हुईं समझा; तब वे
मुनि उससे विरत हो गये | “कामदेवपर मेरी विजय हुईं?
ऐसा मानकर उन मसुनीश्वरके मनमें व्यथ ही गव हो गया |
भगवान् शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण उन्हें यथार्थ
बातका ज्ञान नहीं रहा। ( वे यह नहों समझ सके कि कामदेव-
के पराजित होनेमें भगवान् शंकरका प्रभाव ही कारण है। )
उस मायासे अत्यन्त मोहित हो मुनिशिरोमणि नारद अपना
काम-विजय-सम्बन्धी वृत्तान्त बतानेके लिये तुरंत ही केछास
पर्वतपर गये | उस समय वे विजयके मदसे उन्मत्त हो रहे
थे | वहाँ रुद्रदेवकी नमस्कार करके गवंसे भरे हुए. मुनिने अपने
आपको महात्मा मानकर तथा अपने ही प्रभावसे कामदेवपर
अपनी विजय हुई समझकर उनसे सारा बृत्तान्त कह सुनाया |
वह सब सुनकर भक्तवत्सल भगवान् शंकरने नारदजीसे,
जो अपनी ( शिवकी ) ही मायासे मोहित होनेके कारण काम-
बिजयके यथार्थ कारणको नहीं जानते थे और अपने विवेकको
भी खो बेठे थे; कहा---
रुद्र वोले--तात नारद ! तुम बड़े विद्वान हो, धन्य-
वादके पात्र हो | परंतु मेरी यह बात ध्यान देकर सुनो। अबसे
फिर कभी ऐसी बात कहीं भी न कहना । विशेषतः भगवान्
विष्णुके सामने इसकी चर्चा कदापि न करना | तुमने मुझसे
अपना जो बत्तान्त बताया है; उसे पूछनेपर भी दूसरोंके सामने.
न कहना । यह सिद्धि-सम्बन्धी चत्तान्त सवथा गुप्त रखने योग्य
है, इसे कभी किंसीपर प्रकट नहीं करना चाहिये | तुम मझे
शिक्षा देता हूँ ओर इसे न कददनेकी आज्ञा देता हूँ; कोर
तुम भगवान् विष्णुके भक्त हो ओर उनके भक्त होते हुए;
गरे अत्यन्त अनुगामी हो |
इस प्रकार बहुत कुछ कहकर संसारकी सृष्टि करेगे
भगवान् रुद्रने नारदजीकों शिक्षा दी--अपने दवत्तान्तको ए
रखनेके लिये उन्हें समझावा-बुझाया | परंठ वे तो गिर
मायासे मोहित थे । इसलिये उन्होंने उनकी दी हुई भिश्नत
अपने लिये हितकर नहीं माना | तदनन्तर मुनिश्चिरोमगिनद
ब्रह्मलोकमं गये | वहाँ त्रह्माजीको नमस्कार करके उन्हेंने कह
“पिताजी | मैंने अपने तपोब्रठ्से कामदेवक्रों जीत लिया है|
उनकी वह बात सुनकर ब्रह्माजीने भगवान शिवके चरणारविदों
चिन्तन किया ओर सारा कारण जानकर अपने पुक्
यह सब कहनेसे मना किया | परंतु नारदजी मार:
से मोहित थे | अतएब उनके चित्तमें मदका अड्भर जम के
था | उनकी बुद्धि मारी गयी थी । इसलिये नारदजी अर
सारा बृत्तान्त भगवान् विष्णुके सामने कहनेके लिये 4
शीघ्र ही विष्णुलोकर्मे गये | नारद मुनिको आते देख भहः
विष्णु बढ़े आदरसे उठे ओर शीघ्र ही आगे बढ़कर उ
मुनिको हृदयसे लगा लिया | मुनिके आगमनका क्या हैं॥| ४0)
इसका उन्हें पहलेसे ही पता था | नारदजीको अपने अर! जले,
पर बिठाकर भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन गा
श्रीहरिने उनसे पूछा-- ्ः
भगवान् विष्णु बोले--तात ! कहाँसे आते है |£
विशेष प्रिय हो, इसीलिये अधिक जोर देकर मैं तुम्हें यह
न ... # दुशशया शाम्भवी माया स्वेगा प्राणिनाविह। _शाम्भवी माया सर्वेधां प्राणिनामिह ।
भक्त विनापितात्मानं तया सम्मीक्षत जग़त् ॥ .
(शि० पु०र० सू० २। २५)
रुद्रसंहिता ] # मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित नारद्जीका विष्णुसे रूप मॉगना # ७५
ज्््स्स्स्स्स्स्स्ल्स्स्ल्ल्स्स्स्च्च्च्ल्ल्ल्ख्यस्ल्ख््ख्य्ल््य्य्य्य्य्य्श्ल्ख्ल्ख्य्स्ल्ल्ख्य्य्स्ख्य्स््य्य्य्य्स्य्य्य्प्म्क्ल्ल्स्फ
किसलिये तुम्हाता आगमन हुआ है १ मुनिश्रेष्ठ | तुम धन्य
हो | तुम्हारे झुभागमनसे में पवित्र हो गया ।
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर गवंसे भरे हुए नारद-
मुनिने मदसे मोहित होकर अपना सारा बृत्तान्त बड़े अभिमान-
के साथ कह सुनाया | नारद मुनिका वह अहंकारयुक्त वचन
सुनकर मन-ही-मन भगवान् विप्णुने उनकी कामविजयके
यथार्थ कारणको पूर्णरूपसे जान लिया |
तत्पश्चात् श्रीविष्णु बोले--मुनिश्रेष्ठ | तुम धन्य होः
तपस्याके तो मंडार ही हो | तुम्हारा हृदय भी वड़ा उदार
है । मुने | जिसके भीतर भक्ति, शान और वैराग्य नहीं होते,
उसीके मनमें समस्त दुःखोंको देनेवाले काम मोह आदि
बिकार शीघ्र उत्पन्न होते हैं | तुम तो नेष्ठिक ब्रह्मचारी हो और
सदा ज्ञान-बैराग्यसे युक्त रहते हो; फिर तुममें कामविकार केसे
आ सकता है | तुम तो जन्मसे द्वी निर्विकार तथा शुद्ध बुद्धि-
बाले हो |
श्रीहरिकी कही हुई ऐसी बहुत-सी बातें सुनकर मुनि-
शिरोमणि नारद जोर-जोरसे हँसने छगे और मन-ही-मन
भगवानको प्रणाम करके इस प्रकार बोले---
नारदजीने कहा--स्वामितन् ! जब मुझपर आपकी
कृपा है; तब बेचारा कामदेव अपना क्या प्रभाव दिखा
सकता है ।
ऐसा कहकर भगवानके चरणोंमें मस्तक झुकाकर इच्छा-
नुसार विचरनेवाले नारद मुनि वहँसे चले गये |
( अध्याय १-२ )
मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित हुए नारूजीका भगवान् विष्णुसे उनका रूप
4
मॉगना, भगवान्का अपने रूपके साथ उन्हें वानरका-सा छह देना, कन्याका भगवानूको
। बरण करना ओर कुपित हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना
( सूतजी कहते हैं--महर्षियो | जब नारदमुनि इच्छा-
_नुसार वहंसि चले गये, तब भगवान् शिवकी इच्छासे माया-
'विश्यारद श्रीहरिने तत्कार अपनी माया प्रकट की | उन्होंने
मुनिक्रे मार्गमें एक विशाल मगरकी रचना की; जिसका विस्तार
सी योजन था। वह अद्भुत नगर बड़ा ही मनोहर था।
डिक उसे अपने वेकुण्ठ छोकसे मी अधिक रमणीय
बनाया था । नाना प्रकारकी वस्तुएं उस नगरकी शोभा बढ़ाती
'यीं। वहाँ छ्लियों ओर पुरुषोंके लिये बहुत-से विहार-स्थल थे ।
“ बह श्रेष्ठ नगर चारयें वर्णंके लोगोंसे मरा था | वहाँ शीलनिधि
। नामक ऐश्वयशाली राजा राज्य करते थे | वे अपनी पुन्नीका
खबर करनेके लिये उच्चत थे। अतः उन्होंने महान् उत्सवका
"आयोजन किया था। उनकी कन्याका वरण करनेके लिये
(उस हो चारों दिशाओंसे बहुत-से राजकुमार पधारे थे; जो
, गनी प्रकारद वेशभूषा तथा सुन्दर झोभासे प्रकाशित हो
|! 'ऐ थे । उन राजकुमारोंसे वह नगर भरा-पूरा दिखायी देता
४
॥॒ | ऐसे सुन्दर राजनगरको देख नारदजी मोहित हो गये ।
(१ राजा शीलनिधिके द्वारपर गये। मुनिशिरोमणि नारदको
(आया देख महाराज शीलनिधिने श्रेष्ठ र्ममय पिंहासनपर
४. पटीवर उनका पूजन किया । तसश्रात् अपनी सुन्दरी कन्याको)
: “जिसका नाम श्रीमदी था; बुल्याया ओर उससे नारदजीके चरणोंमें
(से कसाया। उस कन्याको देखकर नारदम॒नि चकित हो
(पं और दोले--प्राज्नू ! यह देवकन्याके समान सुन्दरी
शएभाणा यन््या बोन है ? उनकी यहू बात सुनकर राजाने
तप झोइकर कशा-मुने ! यह मेरी पुत्री है। इसका नाम
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श्रीमती है । अब इसके विवाहका समय आ गया है । यह
अपने लिये सुन्दर वर चुननेके निमित्त खयंबरमें जानेवाली
है। इसमें सब प्रकारके शुभ लक्षण लक्षित होते हैं। महर्षे |
आप इसका भाग्य बताइये |?
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-...................-.नबननतनन नल मनन 9 ननमनननकानीननननन--ननननननन-ीनक-मान-+म नम अन++ननननन+++म_्न््गन्भव््नननखख ल् खरे ््िुिवखिखि् च््््््य्खि्ख्ख्ख्ग्म््म््फजज्सस
राजाके इस प्रकार पूछनेपर कामसे विहल हुए मुनिश्रेष्ठ
तारद उस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छा मनमें लिये राजाको
सम्बोधित करके इस प्रकार बोले--५भूपाल | आपकी यह पुत्री
समस्त शुभ छक्षणोंसे सम्पन्न है; परम सोमाग्यवती है | अपने
महान भाग्यके कारण यह धन्य है ओर साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति
समस्त गुणोंकी आगार है | इसका भावी पति निश्चय ही
भगवान शंकरके समान वेभवद्याली, सर्वेश्वरः किसीसे पराजित
न होनेवाला, बीरः कामबिजयी तथा सम्पूर्ण देवताओमें
श्रेष्ठ होगा ।!
ऐसा कहकर राजासे विदा ले इच्छानुसार विचरनेवाले
नारद मुनि वहाँसे चलछ दिये | वे कामके बशीभूत हो गये
थे | शिवकी मायाने उन्हें विशेष मोहमें डाल दिया था| वे
मुनि मन-ही-मन सोचने लगे कि “मैं इस राजकुमारीको केसे
प्राप्त कहूँ ! खयंवरमें आये हुए नरेशोमेंसे सबको छोड़कर
यह एकमात्र मेरा ही वरण करें! यह कैसे सम्भव हो
सकता है ! समस्त नारियोंको सौन्दर्य सर्वथा प्रिय होता है ।
सौन्दर्यको देखकर ही वह प्रसन्नतायूबक मेरे अधीन हो सकती
है, इसमें संशय नहीं है ।”
ऐसा विचारकर कामसे विहल हुएए मुनिवर नारद भगवान्
विष्णुका रूप ग्रहण करनेके लिये तत्काठ उनके लोकमें जा
पहुँचे । वहाँ भगवान् विष्णुको प्रणाम करके वे इस प्रकार
बोले---“भगवन | मैं एकान्तमें आपसे अपना सार दत्तान्त
कहूँगा ।! तब “बहुत अच्छा! कहकर लक्ष्मीपति श्रीहरि
नारदजीके साथ एकान््तमें जा बैठे ओर बोले--*मुने ! अब
आप अपनी बात कहिये ।”
तब नारदजीने कहा--भगवन् ! आपके भक्त जो
राजा शीलनिधि हैं; वे सदा घमम-पालनमें तत्पर रहते हैं।
उनकी एक विशाललोचना कन्या हैः जो बहुत ही सुन्दरी है |
उसका नाम श्रीमती है। वह विश्वमोहिनीके रूपमें विख्यात
है और तीनों लोकोंमें सवसे अधिक सुन्दरी है। प्रभो | आज
मैं शीप्र ही उस कन्यासे विवाह करना चाहता हूँ | राजा
झीलनिधिने अपनी पुत्रीकी इच्छासे खयंवर रचाया है ।
इसलिये चारों दिद्वाओंसे वहाँ महस्तरों राजकुमार पधारे हैं |
री
'७००/हन-गकपानमआाय की,
रः
नाथ | में आपका प्रिय सेबक हैं | अतः आप मुझे अप
स्वरूप दे दीजिये, जिससे राजकुमारी श्रीमती निश्चय ही मु
बरले।
सूतजी कहते हैँ--महर्पियों ! नारद मुनिकी ऐश
बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पढ़े ओर भगवान इंकडे
प्रभावका अनुभव करके उन दयाल प्रभुने उन्हें इस प्रक्त
उत्तर दिया---
भगवान विष्णु बोले--सुनें ! तुम अपने अ#|
स्थानकोी जाओ | में उसी तरह तुम्हारा हित-साधन का
जैसे श्रेष्ठ वैद्य अत्यन्त पीड़ित रोगीका करता दे। कम
तुम मुझे विशेष प्रिय हो ।
ऐसा कहकर भगवान् विप्णुने नारदसुनिकरों मुठ!
वानरका दे दिया और शेप अज्ञोंमें अपने-जेसा खख्प के[
वे वहाँसे अन्त्धान हो गये | भगवानकी पूर्वाक्त बात सु
और उनका मनोहर रूप प्राप्त हो गया समझकर नारद
बड़ा हृष हुआ | वे अपनेको कृतक्ृत्य मानने छंगे। भगवा
क्या प्रयज्ष किया है, इसको वे समझ न सके | तद्नर
मुनिश्रेष्ठ नारद ज्ीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँए
शीलनिधिने राजकुमारोंसे भरी हुईं खवयंवर-सभाका आबेशी
किया था । विप्रवरों ! राजपुत्रोंसे घिरी हुई वह दिव्य खफं॥
सभा दूसरी इन्द्रसभाके समान अत्यन्त शोभा पा रही #
नारदजी उस राजमभाम॑ जा बठे और वहाँ बेंठकर प्र ः
मनसे बार-बार यही सोचने लगे कि ५मैं भगवान् विष
ससान रूप घारण किये हुए हूँ | अतः वह राजकुमारी के |
मेरा ही वरण करेगी, दूसरेका नहीं ।? मुनिश्रेष्ठ नारदकी ६,
ज्ञात नहीं था कि मेरा मुँह कितना कुरूप है। उस रह]
बैठे हुए सब मनुष्योंने मुनिको उनके पूर्व॑रूपमें ही देह हे
राजकुमार आदि कोई भी उनके रूप-परिवर्तनके झूलर॥
जान सके । वहाँ नारदजीकी रक्षाके लिये भगवाव मा,
दो पार्षद आये थे, जो ब्राह्मणका रूप घारंण करके गूरी| हे
वहाँ बेठे थे | वे ही नारदजीके रूप-परिवर्तनके उत्तम गक पर
जानते थे | मुनिको कामावेशसें मूढ हुआ जान वें ॥
रुद्र॒संहिता ] # भगवानका अपने रूपके साथ उन्हे वानरका-सा मुँह देना, कन्याका भगवानको वरण करना $ ७७
नल िज?:ओीड:डटस स कक्स्क््क्सक्स्ल्ड्स्स्रश्ट्चल्ल्स्स्य््लवय््चय्््च्ःं्ं्चच्वच्ः|ः
का इन पा भी
ज होल पक साय पता डाक पक. को. फेनी पाता जान केक. पी अआश आफ कमी -यं का ऑन मी पन्ना "०-५. हल नपाती- आती
उस कन्याकी ही दृष्टि उनपर पड़ी । भगवानको देखते ही उस
परमसुन्दरी राजकुमारीका मुख असन्नतासे खिल उठा ।
उसने तत्काल ही उनके कण्ठमें वह माला पहना दी। राजाका
रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु उस राजकुमारीको साथ
लेकर तुरंत अच्श्य हो गये और अपने धाममें जा पहुँचे ।
इधर सब राजकुमार श्रीमतीकी ओरसे निराश हो गये | नारद
मुनि तो कामवेदनासे आतुर हो रहे थे | इसलिये वे अत्यन्त
'विहल हो उठे ।तब वे दोनों विप्रल्पधारी ज्ञानविशारद
रुद्रगण कामविहल नारदजीसे उसी क्षण बोले--
रुद्रगणोंने कहा-हे नारद ! हे सुने | तुम व्यथ ही
कामसे मोहित हो रहे हो ओर सोन्दर्यके बलसे राजकुमारीको
पाना चाहते हो । अपना बानरके समान श्रूणित मुँह तो
देख लो |
सूतजी कहते हँ--महर्षियो ! उन रुद्रग्णोका यह
बचन सुनकर नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ | वे शिवकी
सायासे मोहित थे । उन्होंने दर्षणमें अपना मुँह देखा ।
वानरके समान अपना मुह देख वे तुरंत ही क्रोप्से जल उठे
और मायासे मोहित होनेके कारण उन दोनों शिवगर्णोकों वहाँ
शाप देते हुए बोले--५अरे ! तुम दोनोंने मुझ ब्राह्मणका
(प्रंद उनके निकट गये अ.र आपसमें ब्रातचीत करते हुए
नकी हँसी उड़ाने लगे | परंतु सुनि तो कामसे विहल हो
है थे । अतः उन्होंने उनकी यथार्थ बात भी अनसुनी कर
)। वे मोहित हो श्रीमतीको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसके
गंगमनकी प्रतीक्षा करने लगे ।
इसी बीचमें वह सुन्दरी राजकन्या स्त्रियोसे घिरी हुई
पन््त;पुरसे वहाँ आयी | उसने अपने हाथमें सोनेकी एक
उन्दर माटठाय ले रखी थी। वह शुभलक्षणा राजकुमारी
वयंवरके मध्यमागर्मे छक्ष्मोके समान खड़ी हुईं अपूर्व शोभा
॥ रही थी । उत्तम घ्तका पलछत करनेवाली वह भूपकन्या
गेल्य हाथम लेकर अपने मनके अनुख्य बरका अन्वेषण
र्ती हुई सारो सभामें भ्रमण करने लगी । नारद
निका भगवान विष्णुके समान शरीर और वानर-जेसा मुँह
खिकर बह कुपित हो गयो ओर उनकी ओरसे दृष्टि हटाकर
नर मनसे दूसरी ओर चली गयी। खयंबर-समामें अपने
/वाब्टित वरकी न देखकर वह भयभीत हो गयी ।
ध उत्त सभाके भीतर चुपचाप खड़ी रह गयी ।
सिने फिसीके गलेमे जयमाला नहीं डाढी । इतनेमें ही
/जाऊ समान देशनूपा धारण किये भगवान् विष्णु चहाँ भा
कै ) 4६५ १२ शासर व्मेगोंने उनद ञ। हट एम नटों # ब.
४ दुसरे लगाने उनको बढह़ों नहीं देखा । देबल
ह;
निरम्म्भी लय
|
८
का. ३३. फरमान. सील. पीकानना। आम नाक
उपहास किया है | अतः तुम ब्राह्मणके बीयसे उत्पन्न राक्षस
ही जाओ | ब्राह्मणकी संतान होनेपर भी तुम्हांर आकार
राक्षसके समान ही होंगे [! इस प्रकार अपने लिये शाप सुनकर
वे दोनों शानिशिरोमणि शिवगण मुनिको मोहित जानकर कुछ
लिी----+5-न्सफिसे]े+
८-१ ४८-२९
१ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5:
का
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा[ _
न्फवीनत3नलमम-नफी-> गन खकान-ाकअाकन जम ल्भ। मार हमे बम
नहीं बोले | ब्राह्मणो | वे सदा सब घटनाओंमें मगवान् शिऋ्ट
ही इच्छा मानते थे। अतः उदासीन भावसे अपने खान
चले गये और भगवान् शिवकी स्त॒ति करने लगे |
( अथाय ३) ,
॥
नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूवंक फटकारना और शाप देना; फिर मायाके दूर हो जे
पश्चात्तापपूवेक भगवानके चरणोंमें गिरना ओर श॒ुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका
उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये त्रह्माजीके पास जानेका
ब्रे कै
आदेश ओर शिवके भजनका उपदेश देना
सूतजी कहते है--महष्रियो | मायामोहित नारद
मुनि उन दोनों शिवगर्णोकोी यथोचित शाप देकर भी
भगवान् शिवके इच्छावश मोहनिद्रासे जाग न सके | वे
भगवान् विष्णुके किये हुए कपटको याद करके मन दुस्सह
क्रोध लिये विष्णुलोकको गये ओर समिधा पाकर प्रज्वलित
हुए. अग्निदेवकी माँति क्रोाधसे जलते हुए; बोले---उनका ज्ञान
नष्ट हो गया था । इसलिये वे दुर्बेचनपूर्ण व्यड़ सुनाने लगे ।
नारदजीने कहा--हरें ! तुम बड़े दुष्ट हो, कपटी हो
और समस्त विश्वकों मोहमें डाले रहते हो । दसरोका उत्साह
'या उत्कर्ष तुमसे सहा नहीं जाता | तुम मायावी हो, तुम्हारा
अन्तःकरण मलिन है | पूर्वकालमें तुम्हीने मोहिनीरूप धारण
करके कपट किया; असुररोकों वारुणी मदिरा पिलायी, उन्हें
अमृत नहीं पीने दिया | छछ-कपटमें ही अनुराग रखनेवाले
हरे | यदि महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते तो तुम्हारी
सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती । विष्णुदेव | कपटपूरण
चाल तुम्हें अधिक प्रिय है | तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है,
तो भी भगवान शंकरने तुम्हें स्वतन्त्र बना दिया है । तुम्हारी
इस चाल-ढाछको समझकर अब वे ( भगवान् शिव )
भी पश्चात्ताप करते होंगे । अपनी वाणीरूप बेदकी प्रामाणिक्रता
स्थापित करनेवाले महादेवजीने ब्राह्मणफो सर्वोपरि बताया है |
हरे [>इस बातको जानकर आज मैं बल्पूर्यक तुम्हें ऐसी सीख
दूँगाः:जिससे तुम फिर कभी कहों भी ऐसा कर्म नहीं
कर सक़ोंगे। अबतक तुम्हें किसी शक्तिशाली या तेजस्वी पुरुषसे
पाला :.नंहां- पड़ा. था- इसील्यिे आजतक तुम-निडर बने हुए
हो ।. परंतु विष्णो |! अब तुम्हें अपनी करनीका पूरा
पूरा फल मिलेगा |
भगवान् विप्णुसे ऐसा कहकर मायामोहित नाझ ईः :
अपने ब्रह्मतेजका प्रदर्शन करते हुए क्रोघसे खिन्न हो उठे #
शाप देते हुए बोले--'बिप्णो ! तुमने स््रीके लिवेएं
व्याकुल किया है | तुम इसी तरह सबको मोहमें डालते रहो :
यह कपय्पूण कार्य करते हुए तुमने जिस स्वरूपसे मुझे |
किया था उसी स्वरूपसे तुम मनुष्य हो जाओ और # ,
वियोगका दुःख भोगों । तुमने जिन वानरोंके समान मेए!
बनाया था; वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों | तुम ; ६!
( सत्री-विरहका ) दुःख देनेवाले हो, अतः खयं भी तुम्हें
वियोगका दुःख प्राप्त हो। अज्ञानसे मोहित मनुष्योंक्रे «
तुम्हारी स्थिति हो |? हर
अशञानसे मोहित हुए नारदजीने मोहबश
जब इस तरह शाप दिया; तब उन्हंने शम्मुक्की * १
प्रशंसा करते हुए उस शापको स्वीकार कर लिया | »' १
महालोछा करनेवाले शम्भुने अपनी उस विश्वमोहिनी मा थे
जिसके कारण ज्ञानी नारद मुनि भी मोहित हो गये ये; :, भ
लिया । उस मायाके तिरोहित होते ही नारदजी $४ |
शुद्धबुद्धिसे युक्त हो गये | उन्हें पूर्वचत् ज्ञान प्राप्त हे.
और उनकी सारी व्याकुछता जाती रही | इससे उनके « ' रे
बड़ा विस्मय हुआ । वे अधिकाधिक पश्चात्ताप करे !:
बारंबार अपनी निन्दा करने छंगे | उस सम फे;
ज्ञानीकों भी मोहमें डालनेवाली भगवान् शम्मुकी गे 4
सराहना की । तदनन्तर यह जानकर कि सायाके कर्ण / हुं
में श्रममें पड़. गया था--यह सब कुछ . मेरा मार्बा+ | रथ
अ्रम ही था) वेष्णवशिरोमणि नारदजी भगवान हा
चरणोंमें गिर पड़े | भगवान श्रीहरिने उन्हें उठाकर
फेर
/
है
है
|
॥५
मद्रसंहिता |
दिया | उस समय अपनी दुबुद्धि नष्ट हो जानेके कारण
ग बोले--'नाथ | मायासे मोहित होनेके कारण मेरी
; बिगड़ गयी थी। इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत
चन कहे हैं, आपको शापतक दे डाला है । प्रभो | उस
को आप मिथ्या कर दीजिये | हाय | मैंने बहुत बड़ा
| किया है। अब मैं निश्चय ही नरकमें पड़ूँगा । हरे । मैं
पका दास हूँ । बताइये; मैं क्या उपाय--को न-सा प्रायश्रित्त
» जिससे मेरा पाप-समूह नष्ट हो जाय और मुझे नरकमें
गेरना पड़े !! ऐसा कहकर झुद्ध घुद्धिवाले मुनिशिरोमणि
दजी पुनः भक्तिभावसे भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर
4 उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था। तब
वेण्णुने उन्हें उठाकर मधुर बाणीमें कहा---
भगवान विष्णु बोढे--तात ! खेद न करो | तुम
: ४४ भक्त हो, इसमें संशय नहीं है । में तुम्हें एक बात
ता हूं; सुनो | उससे निश्चय ही तुम्हारा परम हित होगा,
५ नरक्म नहों जाना पड़ेगा । भगवान् शिव तुम्हारा
व्याथ दरेने । तुमने सदसे मोहित होकर जा भगवान
उबत सात नहों मानी धी--उसकी अवदेलना कर दी थी:
ने अपराधरा भगवान् शिचने तुम्हें ऐसा फछ दिया हैं;
"का दे ही कर््ग्लके दाता हैं । तुम अपने मनमें यद द्दद
£ नारदजीका भर्गवान विष्णुकों क्रोधपूवेक फ्रटकारना और शाप देना #
७९,
ग+-+--ककककनककनकनन कक _ वि चटाय्य््य्न्रल्क़्््््् गज... +ाा_६+3+++++++++++++++++++/+++++_ 5
निश्चय कर लो कि भगवान् शिवकी इच्छासे ही यह सब कुछ
हुआ है । सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गवंको दूर
करनेवाले हैं | वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं | उन्हींका
सच्चिदानन्दरूपसे बोध होता है। वे निर्गुण और निर्विकार
हैं | सत्त; रज ओर तम--इन तीनों गुणोंसे परे हैं । वे ही
अपनी मायाको लेकर ब्रह्मा, विष्णु ओर .महेश--इन तीन
रूपोंमें प्रकट होते हैं | निगेण ओर सगुण भी वे ही हैं । निर्गुण
अवस्थामें उन्हींका नाम शिव है | वे ही परमात्मा; महेश्वर
परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त ओर महादेव आदि नामोंसे कहे
जाते हैं। उन्हींकी सेवासे ब्रह्माजी जगत्के लश्ट हुए. हैं ओर
में तीनों लोकोंका पालन करता हूँ | वे खय॑ं ही रुद्ररूपसे सदा
सबका संहार करते हैं । वे शिवस्रूपसे सबके साक्षी हें;
मायासे भिन्न ओर निर्गुण हैं । खतन्त्र होनेके कारण वे
अपनी इच्छाके अनुसार चलते हैं | उनका विहार---आचार-
व्यवहार उत्तम है ओर वे भक्तोंपर दया करनेवाले हैं ।
नारदसुने ! मैं तुम्हें एक सुन्दर उपाय बताता हूँ, जो
सुखद, समस्त पापोंका नाशक ओर सदा भोग एवं मोक्ष
देनेवाला है | तुम उसे सुनो | अपने सारे संशयोंको त्यागकर
तुम भगवान् शंकरके सुयशका गान करो ओर सदा अनन्य-
भावसे शिवके शतनाम स्तोत्रका पाठ करो । मुने ! तुम
निरन्तर उन्हींकी उपासना ओर उन्होंका भजन करो उन्होंके
यशको सुनो ओर गाओ तथा प्रतिदिन उन्हींकी पूजा-अर्चा
करते रहो। नारद ! जो शरीर) मन ओर वाणीद्वारा भगवान्
शंकरकी उपासना करता है; उसे पण्डित या ज्ञानी जानना
चाहिये । वह जीवन्मुक्त कहलाता है। “शिव? इस नामरूपी
दावानलसे बड़े-बड़े पातकोंके असंख्य प्रेत अनायास भस्म
हो जाते हैँ--यह सत्य है, सत्य है | इसमें संशय नहीं है [६
जो भगवान् शिवके नामरूपी नोकाका आश्रय लेते हैं, वे
संसार-सागरसे पार हो जाते हैँ। संसारके मूलभूत उनके सारे
पाप निस्मंदेह नष्ट हो जाते हूँ | महामुने ! संसारके मूलभूत
जो पातकरूपी वृक्ष हैं, उनका शिवनामरूपी कुठारसे निश्चय
ही नाथ हो जाता है।
# शिवेतिनामदावाग्नेमहापातकपव ता: !
भग्मीनवन्त्यनायासात सत्यं सत्यं न संशय: ॥
( शि० पु० रू० सू० ४ | ४५० )
प्राप्य संसाराब्धि तरतनिति ते।
तेपां
पे शिवनानवर्री
सेंसारमल्पापानि नव्यन्त्यसंगायम ॥]
संसारमलभूनानों. परादझानां महामने ।
शिवनामदुठारेण विनाशों जावदे प्रुबद ॥
( शि० घु० रु० सू० ८४ ४२-५०
री ओ !
८० £ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रद्माण परमास्मले 5: [ संक्षिप्त-शिवेंपु।णा
के
जो लोग पापरूपी दावानलसे पीड़ित हैं) उन्हें
शिवनामरूपी अम्ृतका पान करना चाहिये । पापदावामभिसे
दग्ध होनेवाले प्राणियोंकी उस ( शिवनामामृत ) के बिना
शान्ति नहीं मिल सकती | सम्पूर्ण वेदोंका अबछोकन करके
पूव॑बर्ती विद्वानोंने यही निश्चय किया है कि भगवान् शिवकी
पूजा ही उत्कृष्ट साधन तथा जन्म-मरगरूपी संसारन्धनके
नाशका उपाय है | आजसे यत्षपू्षक सावधान रहकर विधि-
विधानके साथ भक्तिभावसे नित्य-निरन्तर जगदम्बा पावती-
सहित महेश्वर सदाशिवका भजन करो; नित्य शिवकी ही
कथा सुनो ओर कहो तथा अत्यन्त यज्ञ करके बारंबार
शिव-भक्तोंका पूजन किया करो | मुनिश्रेष्ठ | अपने हृदयमें
भगवान् शिवके उज्ब्वलर चरणारविन्दोंकी स्थापना करके
पहले शिवके तीर्थोमें बिचरो | मुने | इस प्रकार परमात्मा
शंकरके अनुपम माहात्म्यका दशन करते हुए अन्तमे
आनन्दवन ( काशी ) को जाओ; वह स्थान भगवान् शिवको
बहुत ही प्रिय है | वहाँ भक्तिपृर्वक विश्वनाथर्जीका दाग
पूजन करो । बविशेषतः उनकी स्तुति-बन्दना करके हुए
निर्विकल्प ( संशयरद्दित ) हो जाओगे) नारदजी | इसके वा
त॒म्हें मेरी आश्से भक्तिपृषक अपने मनोरथकी सिद्धिके स्लि
निश्चय ही ब्रह्मठाकम जाना चाहिये। वहाँ अपने फ्ि
ब्रह्मजीकी विशेषरूपसे स्त॒ुति-बन्दना करके हुँ
प्रसन्नतायूर्ण छृदयसे बारंबार शिव-महिमाक्े विपयम 7
करना चाहिये | ब्रह्मजी शिव-भक्तार्म श्रेष्ठ हैँ | व तुरई कई
प्रसन्नताके साथ भगवान् झंकरका माहात्म और शत्नाः
स्तोत्र सुनायगे | मुने ! आजसे तुम शिवाराधनम दक्क
रहनेवाले शिवभक्त हो जाओ ओर विशेषरूपसे मोक्षक्के मा: .
बनो | भगवान् दिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। इस प्रक्त
प्रसन्नचित्त हुए भगवान् विष्णु नारदमुनिको प्रेमपूत्रेक उप :
देकर श्रीशिवका स्मरण) बन्दन ओर स्तवन कर७के कर ,
अन्तर्धान हो गये । ( अध्याय! '
न्याय उ>७ ख्टाो >लच----- ा
नारद्जीका शिवतीर्थोमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा ऋह्मलोकमें
क् जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्तके विषयमें प्रश्न करना ... *+ ।;
खसूतजी कहते ह--महषियो ! भगवान् श्रीहरिके शाप दे दिया। शिवगणो ! मैंने जो कुछ कहा है; वह वेश,
अन्तर्घान हो जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारद शिवलिज्ञोंका भक्तिपूवंक होगा, तथापि मेरी बात सुनिये । में आपके लिये शापोद्धा0 |
दर्शन करते हुए प्रथ्वीपर विचरने लगे | ब्राह्मणों | भूमण्डल- बात बता रहा हैं | आपलोग आज मेरे अपराधको क्षमा
पर धूम-फिरकर उन्होंने मोग ओर मोक्ष देनेवाले बहुत-से दें । मुनिवर विश्रवाके वीर्यसे जन्म ग्रहण करके आप रु.
शिवलिज्ञोंका प्रेमपूवंक्र दर्शन किया । दिव्यदर्शी नारदजी दिशाओंमें प्रतिद्ध ( कुम्मकर्ण-राबण ) राक्षसराजका पद;
भूतलके तीर्थोमें विचर रहे हैं ओर इस समय उनका चित्त करेंगे और बलवान् बेमवसे युक्त तथा परम प्रतापी 'हों।/
शुद्ध है--यह जानकर वें दोनों शिवगण उनके पास गये | वे समस्त ब्रह्माण्डके राजा होकर शिवमंक्त एवं जितेन्द्रिय होंगेगे।
उनके दिये हुए शापसे उद्धारकी इच्छा रखकर वहाँ गये थे । झिबके ही दूसरे स्वरूप श्रीविष्णुके हाथों मृत्यु पाकर फिरआ ।
उन्होंने अददरसूर्वक मुनिके दोनों पैर पकड़ लिये और मस्तक |
भल्ली भौंति पदपर प्रतिष्ठित हो जायेंगे | |
झुकाकर भलीभाौति प्रणाम करके शीघ्र ही इस प्रकार कहा--
शिवगण बोले--अह्न् | हम दोनों शिवके गण हैं |
मुने [ हमने ही आपका अपराध क्रिया है । राजकुमारी
श्रीमतीके स्वयंवरमं आपका चित्त मायसे मोहित हो रहा था |
सूतजी कहते हँ--महर्षियो ! महात्मा नारदमुरि '
यह वात सुनकर वे दोनों शिवगण प्रसन्न हो सानद के
स्थानकी लौट गये । श्रीनारदजी भी अत्यन्त आनन्दित।,
अनन्यभावसे सगवान् शिवका ध्यान तथा शिवतीर्थोक्रा |
करते हुए बारंबार भूमण्डलमें विचरने लगे | अन्तमें वे ७!
ऊपर विराजमान शिव्रप्रिया काशीपुरीमें गये, जो <
एवं शिवकों सुख देनेवाली है । काशीपुरीका दशन #
नारदजी कृतार्थ हो गये। उन्होंने भगवान् काशीनाथका
किक न किया और परम प्रेम एवं परमानन्दसे युक्त हो उनी £ कि
वजन केह/--आप दोनों महादेवजीके गण हैं की। काशीका सानन्द सेवन करके वे मुनिश्रेष्ठ कतार ; हु
और सत्पुरुषोंके लिये परम सम्माननीय हैं। अत; मेरे मोह- अनुभव करने छगे और प्रेमसे विहल हो उसका नमक कक
रहित एवं सुखदायक यथार्थ वचनको सुनिये | पहले निश्चय तथा स्मरण करते हुए ब्ह्मछोककों गये । निसन््तर कि | 2
ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गवी थी, बिगड़ गयी थी ओर में सर्वथा स्मरण करनेसे उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी ९५५ |
लू मोहके वरशीमत हो गया था । इसीलिये आप दोनोंको मैंने पहुँचकर शिवतत्त्वका विशेषझूपसे शान प्राप्त करनेकी ई४ मन
उस समय परमेश्वस्की प्रेणासे आपने हम दोनोंको शाप दे
दिया । वहाँ कुसमय जानकर हमने चुप रह जाना ही अपनी
जीवन-र्ाका उपाय समझा | इसमें किसीका दोष नहीं है |
हमें अपने कमका ही फल प्राप्त हुआ है। प्रभो | अब आप
प्रसन्न होइये ओर हम दोनोंपर अनुग्रह कीजिये |
हि
रुद्रसंहिता ]
महाप्रल्यकारूमे केवल सद्त्रह्मयकी सत्ताक्रा प्रतिपादन, ब्रह्मसे ईश्वर-सूर्तिका प्राकत्य # ८९
नारदजीने ब्रह्माजीको भक्तिपृर्वक नमस्कार किया और नाना
प्रकारके स्तोन्रोंद्दारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके
विपयमें पूछा | उस समय नारदजीका हृदय भगवान् शंकरके
प्रति भक्तिमावनासे परिपूर्ण था |
8, 2
हा (| 8
नारदजी बोले--अह्मन् ! परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको
जाननेवाले पितामह ! जगत्मभी ! आपके कृपाप्रसादसे मेंने
भगवान् विष्णुके उत्तम माहात्म्यका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त किया
है। भक्तिमार्ग, शञनमार्ग3 अत्यन्त दुस्तर तपोमार्ग, दानमाग तथा
तीर्थमार्गका मी वर्णन सुना है। परंतु शिवतत्त्वका ज्ञान मुझे अमी-
तक नहीं हुआ है । में मगवान शंकरकी पूजा-विधिको भी नहीं
जानता । अतः प्रभो | आप क्रमशः
भगवान शिवके विविध चरित्रोंको तथा उनके खरूप-तत्त्व; प्राकस्य;
विवाह, गाहंस्थ्य धर्म--सब मुझे बताइये । निष्पाप पितामढ | ये
सब बातें तथा और भी जो आवश्यक बातें हों, उन सबका आपको
वर्णन करना चाहिये । प्रजानाथ ! शिव ओर शिवाके
आविरभाव एजय॑ं विवाहका प्रसद्धा विशेषरूपसे कहिये--तथा
कार्तिकेयके जन्मकी कथा भी मुझे सुनाइये । प्रभों | पहले
इन विषयोंको तथा
बहुत लोगेंसे मैंने ये बातें सुनी हैं; किंतु तृत्त नहीं हो सका
हूँ | इसीलिये आपकी शरणमें आया हूँ । आप मुझपर कृपा
कीजिये |
अपने पुत्र नारदकी यह बात सुनकर लोक-पितामह ब्रह्मा
वहाँ इस प्रकार बोले--- ( अध्याय ५ )
महाप्रलयकालमें केवल सद्व्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन,
उस निर्गुण-निराकार त्रह्मसे ईश्वर्मृर्ति ( सदाशिव )-
फा प्राकत्य, सदाशिवद्वारा खरूपभूता शक्ति ( अम्बिका ) का ग्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा
उत्तम क्षेत्र ( काशी या आनन्दवन ) का प्रादुर्भाव, शिवके थामाड्से परंम प्ररुष
ई ( विष्णु ) का आविभाव तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी
क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन
४ प्रह्माजीने कहा--त्रह्मन् ! देवशिरोमणे ! तुम सदा
2 सतत जंगत्क उपकारमें ही छगे रहते हो । तुमने लोगेंके
बने कामनासे यह बहुत उत्तम ब्रात पूछी है। जिसके
सननेसे सम लॉकोंके समस्त पार्षोका क्षय हो जाता है; उस
/नामय शिव-तत्तक्ा मैं तुमसे वर्णन करता हैं । शिवतत्त्यक्ा
# ४२ यहा ही उत्हट और अद्भुत है | जिस समय
०. एम चयचर जगत् नए हो गया था। सर्वत्र केबल अन्धकार-हो
दर,
पु | झं रे र् २ डर
जि
|
णि छः
अन्चकार था। न सूर्य दिखायी देते थे ने चन्द्रमा | अन्यान्य
ग्रह ओर नक्षत्राका भी पता नहीं था | ने दिन होता था; ने
रात) अन्नि: पश्दी, वाबु ओर हल्की भी सत्ता नहीं ४
भघान तत्त ( अब्बाह्त प्रकृति ) से रहित सूना आवाशन
कस
शेष था; दूसरे क्रिसी तेजकी ठस्सब्धि नहीं होती थी 77...
आटा >्मइनयका हि गे (न अम् किक लक 2 का हे (९
१० २. 8५8६ आर्थी शा दिकन। श- 2 »] | टाब्ट आर सर्वर बकव+ हज
तक +
सबक -> नी,
# महा ऐप ब्जटए पे ्छट। भा थे ज्क््य्ता जा
#ा रे है ह
क्र
बाफ च््
८२ % नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने #
रसका भी अभाव हो गया था। दिशाओंका भी भान नहीं होता
था | इस प्रकार सब ओर निरन्तर सूचीमेद्य घोर अन्धकार
फेछा हुआ था | उस समय ८तत्सढ्रह्म? इस श्रुतिमें जो पसत्?
सुना जाता है, एकमात्र वह्दी शेष था | जब प्यह! वह
'ऐसा?) “जो? इत्यादि रूपसे निर्दिष्ट होनेवाल भावाभावात्मक
जगत् नहीं था; उस समय एकमात्र वह पसत्? ही रोष था;
जिसे योगीजन अपने हृदयाकाशके भीतर निरन्तर देखते हैं |
वह सत्तत्व मनका विषय नहीं है | बाणीकी भी वहाँतक कभी
पहुँच नहीं होती । वह नाम तथा रूप-रंगसे भी शृत्त्य है |
वह न स्थूल है न कृश, न हस्व है न दीर्त्र तथा न लघु
है न गुरु | उसमें न कभी इंद्धि होती है न हास | श्रुति
भी उसके विषयमें चकितमावसे “है?” इतना ही कहती है;
आर्थात् उसकी सत्तामात्रका ही निरूपण कर पाती है, उसका
कोई विशेष विवरण देनेमें असमर्थ हो जाती है | वह सत्य;
शानखरूप, अनन्तः परमानन्दसयः परम ज्योतिःखरूप)
अप्रमेय+ आधाररहित, निर्विकार; निराकार; निर्शुण$ योगिगम्य,
सर्वव्यापी। सबका एकमात्र कारण निर्विकल्प। निरास्म्मः
मायाशृन्य; उपद्रवरहिंत, अद्वितीय अनादि; अनन्त: संकोच-
विकाससे शून्य तथा चिन्मय है ।
जिस परब्रह्मके विषयमें ज्ञान और अजञानसे पूर्ण उक्तियों-
द्वारा इस प्रकार ( ऊपर बताये अनुसार ) विकल्प किये जाते
हैं, उसने कुछ कालके बाद ( सष्टिका समय आनेपर ) द्वितीय-
की इच्छा. प्रकट की--उसके भीतर एकसे अनेक होनेका
संकल्प उदित हुआ । तब उस निराकार परमात्माने अपनी
लीलाशक्तिसे अपने लिये मूति ( आकार ) की कल्पना की |
वह मूर्ति सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणोंसे सम्पन्न, सर्वशानमयी; शुभस्वरूपा;
सर्वव्यापिनी) स्वेरूपा; स्वेद्शिनी, सर्वकारिणी, सबकी एकमात्र
वन्दनीया; सर्वाद्या, सब कुछ देनेवाली ओर सम्पूर्ण संस्क्षतियों-
का केन्द्र थी । उस थुद्धरूपिंणी ईश्वर-मू्तिकी कल्पना करके
वह अद्वितीय, अनादि, अनन्त; स्बप्रकाशक, चिन्मय; सर्वव्यापी
ओर अविनाश परब्रह्म अन्तहिंत हो गया | जो मूर्तिरहित
परम ब्रह्म है; उसीकी मूर्ति ( चिन्मय आकार ) भगवान्
..... संदाशिव हैं। अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान उन्हींकी ईश्वर
हा
है
रे ॥
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
कहते हैं | उस समय एकाकी रहकर स्वेच्छानुसार विहार
करनेवाले उन सदाशिवने अपने विग्रहसे खयं ही एक खब्प-
भूता शक्तिकी खष्टि की; जो उनके अपने श्रीअड्गसे कमी भल्ग
वा. आल
री]
4. 3 ओ+-नाधमक-थनी
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पर रँ जश्न
५॥। '#, 67 लक कप:
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७०७2 ॥॥ | ॥) |
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मऊ कजन 52० कक बजा
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मनन्०--न-क 7 पा “+ +>-5..२....... “पलक
>>
ल्म--.3 शस्स्क्ल््श्चट
+++ बन
होनेवाली नहीं थी | उस पराशक्तिको प्रधान; प्रकृति गुणः
माया, बुद्धितत्वकी जननी तथा विकाररहित बताया गया है
वह शक्ति अम्बिका कही गयी है | उसीको प्रकृति, सर्वे
त्रिदेवजननी, नित्या और मूलकारण भी कहते हैं | 6९०
द्वारा प्रकट की गयी उस शक्तिके आठ थुजाएँ: हैं| उत्त ६
लक्षणा देवीके मुखकी शोभा विचित्र है | वह अकेली ही ५
मुखमण्डलमें सदा एक सहख चन्द्रमाओंकी कासि ४.
करती है। नाना प्रकारके आभूषण उसके श्रीअज्ञोकी «
बढ़ाते हैं | वह देवी नाना प्रकारकी गतियोंसे सम्पन्न है *
अनेक प्रकारके अख््र-शस्त्र धारण करती है | उसके छुते
नेत्र खिले हुए कमलके समान जान पढ़ते हैं| वह ॥४
तेजसे जगमगाती है | बह सबकी योनि है औ |
उद्यमशील रहती है | एकाकिनी होनेपर भी वह माया ०
वशात् अनेक हो जाती है ।
की ्ष यश थ्् दशा जया बा » -.
भ्न्ज
«नर
रुद्रसंदिता ] * मद्ाप्रलयकालमें केवल संदूघ्नह्मकी सत्ताका प्रतिषादन, सदाशिवद्धारा शक्तिका आविभीच # ८३
न मा कम लक कप मम
हुआ०पदयहम*्पाय
आए ही
व्रे जो सदाशिव हूँ, उन्हें परम पुरुष, ईश्वर, शिव) शम्भु
ओर महेश्वर कहते हैं | वे अपने मस्तकपर आकाश-गज्जको
घारण करते हैं | उनके भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पते हैं।
उनके पॉँच भुख हैं ओर प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र हैं ।
उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है | वे दस भ्रुजाओंसे युक्त
और त्रिश्वूलधारी हैं| उनके श्रीअज्लोकी प्रमा कर्पूरके समान
श्वेत-गोर है । वे अपने सारे अज्ञोंमें भस्म रमाये रहते हैं।
उने कालरूपी ब्रह्मने एक ही समय शक्तिके साथ (शिवलोकः?
नामक क्षेत्रका निर्माण किया था ) उस उत्तम क्षेत्रको ही काशी
कहते हैं | वह परम निर्वाण या मोक्षका स्थान है; जो सबके
ऊपर विराजमान है । वे प्रिया-प्रियतमरूप शक्ति और शिव,
जो परमानन्दखरूप हैं, उस मनोरम क्षेत्रमें नित्य निवास
करते हैं | काशीपुरी परमानन्दरूपिणी है | मुने ! शिव और
शिवाने प्र्यकालमें भी कभी उस क्षेत्रकों अपने सांनिध्यसे
मुक्त नहीं किया है | इसीलिये विद्वान् पुरुष उसे “अविमुक्त
क्षेत्र” के नामसे भी जानते हैं । वह क्षेत्र आनन्दका हेतु है।
इसलिये पिनाकधारी शिवने पहले उसका नाम “्आानन्दबनः
रत था। उसके बाद वह ध्यविमृक्तःके नामसे प्रसिद्ध
हुआ ।
देवषं ! एक समय उस आनन्दवनमें रमण करते हुए
शिवा ओर शिवके मनमें यह इच्छा हुईं कि किसी दूसरे
उच्पकी भी सृष्टि करनी चाहिये, जिसपर यह सष्टिसंचालनका
भह्व् भार रखकर हम दोनों केवल काशीमें रहकर इच्छानुसतार
विचरें और निर्वाण धारण करें ) वही पुरुष हमारे अनुग्रहसे
7ंदा सबकी स्॒टि करे, पालन करे और वही अन्तमें सबका संहार
भी करे | यह चित्त एक समुद्रके समान है | इसमें चिन्ता-
पे उत्ताल तरहझ्लें उठ-उठकर इसे चश्चल बनाये रहती हैं |
इसमें सत्ततगुणरूपी रतन, तमोगुणरूपी ग्राह और रजोगुणरूपी
भूगे भरे हुए हैं| इस विशाल चित्त समुद्रको संकृचित करके
एम दोनों उस पृरुषके प्रसादसे आनन्द-कानन ( काशी ) में
सुखपृर्षक निवास करें | यह आनन्दवन वह स्थान है; जहाँ
एमारी मनोपृत्ति सब ओरसे सिमिट्कर इसीमें लगी हुई है
एप जिसके बाहरका जगत् चिन्तासे आतुर प्रतीत होता है |
ऐसा निय करके सक्तितहित सर्वब्यापी परमेश्वर शिवने अपने
पेमभागके दसदें अड्डपर अमृत्त मल दिया । फिर तो वहाँसे
“के इरप प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर
था। वह शान्त था | उसमें सत््वगुणकी अधिकता थी तथा
वह गम्भीरताका अथाह सागर था । मुने ! क्षणा नामक गुणसे
युक्त उस पुरुषके लिये टूंढ़नेपर भी कहीं कोई उपमा नहीं
मिलती थी | उसकी कान्ति इन्द्रनील मणिके समान श्याम थी |
उसके अज्ज-अज्जसे दिव्य शोमा छिटक रही थी और नेत्र
प्रफुछ कमलके समान शोभा पा रहे थे | श्रीअक्लेंपर सुवर्णकी-
सी कान्तिवाले दो सुन्दर रेशमी पीताम्बर शोभा दे रहे थे |
किसीसे भी पराजित न होनेवाल्ा वह वीर पुरुष अपने प्रच्वण्ड
भुजदण्डोंसे सुशोभित हो रहा था । तदनन्तर उस पुरुपने
परमेश्वर शिवकों प्रणाम करके कहां---८ खामिन् ! मेरे नाम
निश्चित कीजिये ओर काम बताइये |? उस पुरुषकी यह बात
घनकर महेश्वर भगवान् शंकर हँसते हुए मेवके समान गम्भीर
वाणीमें उससे बोले--
शिवने कहा--बत्स ! व्यापक होनेके कारण तुम्दारा
विष्णु-नाम विख्यात हुआ । इसके सिवा और भी बहत-से
नाम होंगे, जो भक्तोक़ी सुख देनेवाले होंगे । तुम सस्िर
उत्तम तप करो; क्योंकि वही समस्त कार्वोका साथन हे |
ऐसा कहकर भगवान् दिखने श्वासमार्म श्रीविष्णुको
वेदांका “"चून बालन सात प्रदान किया तेदनन्तर व्य्स्म न्य् दा
तदका झाने प्रदात किया | तदनन्तर अपनी सहिनासे दी
<७8
अमान. . पाना परम ९७० “भाइक+-“पानात पक 9
व्युत न होनेवाले श्रीहरि भगवान् शिवको प्रणाम करके बड़ी
भारी तपस्या करने छगे ओर शक्तिसहित परमेश्वर शिव भी
पार्षदग्णोके साथ बहाँसे अच्दय हो गये | भगवान विष्णुने
सुदीर्ध कालतक बड़ी कठोर तपस्या की | तपस्याके परिश्रमसे
युक्त भगवान् विष्णुके अज्जोसे नाना प्रकारकी जलूघाराएँ:
निकलने छगी । यह सब भगवान् शिवकी मायासे ही सम्भव
हुआ । महामुने | उस जलसे सारा सूना आकाश व्याप्त हो
गया । वह ब्रह्मूूप जल अपने स्पशमात्रसे सब पापोका नाश
करनेवाला सिद्ध हुआ । उस समय थके हुए परम पुरुष विष्णुने
सखय॑ उस जलमें शयन किया । वे दीघकालतक बड़ी प्रसन्नता-
के साथ उसमें रहे | नार अर्थात् जलमें शयन करनेके कारण
ही उनका “नारायण? यह श्रुतिसम्मत नाम प्रसिद्ध हुआ ।
उस समय उन परम पुरुष नारायणके सिवा दूसरी कोई प्राकृत
भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका ग्राहुभोव, शिवेच्छाबश बत्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमल-
नालके उद्धमका पता छगानेमें असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हें दशेन देना,
विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णुके बीचमें अग्नि-स्तम्भका प्रकट होना तथा उसके ओर-
छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना
ब्रह्माजी कहते हैँ--देवर्ष ! जब नारायणदेव जलूमें
शयन करने रूगे, उस समय उनकी नाभिसे भगवान् शंकरके
इच्छावश सहसा एक उत्तम कमल प्रकट हुआ? जो बहुत बड़ा
था | उसमें असंख्य नारूदण्ड थे । उसकी कान्ति कनेरके
फूलके समान पीले रंगकी थी तथा उसकी लंबाई ओर ऊँचाई
भी अनन्त योजन थी । वह कमल करोड़ो सुर्योके समान
प्रकाशित हो रहा था; सुन्दर होनेके साथ ही सम्पूर्ण तत्त्वोंसे
युक्त था और अत्यन्त अद्भुत) परम र्मणीय) दशनके योग्य
तथा सबसे उत्तम था। तत्पश्रात् कल्याणकारी परमेश्वर साम्ब
सदाशिवने पूर्ववत् प्रयत्न करके मुझे अपने दाहिने अज्ञसे उत्पन्न
किया | मुने ! उन महेश्वरने मुझे तुरंत ही अपनी मायासे मोहित
करके नारायणदेवके नाभिकमलमें ड/छ दिया और लीलापूर्वक
मुझे बहाँसे प्रकट किया । इस प्रकार उस कमल्से पुत्रके रुपमें
मुझ हिरिण्यगर्भका जन्म हुआ | मेरे चार मुख हुए और
शरीरकी कान्ति लाल हुई | मेरे मस्तक त्रिपुण्ड़की रेखासे
अज्लित थे | तात | भगवान् शिवक्री मायासे मोहित होनेके
कारण मेरी ज्ञानशक्ति इतनी दुबल हो रही थी कि मैंने उस
क्मलके सिवा दूसरे क्रिसीको अपने शरीरका जनक या
"टिया नहीं जाना। मैं कोन हूँ, कहँसे आया हूँ, मेरा
7!
न जे हि
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% नमो रुद्राय ध्यान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने £
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा३
क+नकादशणकमपजुाशारईनवा2* उषपाबे,.
वस्तु नहीं थी | उसके बाद ही उन मद्दत्मा नारायगदेवसे यथा-
समय सभी तत्व प्रकट हुए;। महामते ! विद्वन् | मैं उन
तत््योंकी उत्तत्तिका प्रकार बता रहा हूँ । सुनो, प्रकृतिसे मह-
तत्व प्रकट हुआ ओर महत्तत्त्वसे तीनों गुण | इन गणके मेद्रे
ही त्रिविघ अहंकारकी उत्पत्ति हुई। अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ
हुई ओर उन तन्मात्रारसे पाँच भूत प्रकट हुए, | उसी समय
जानेन्द्रियोँ ओर कमेन्द्रियोंका भी प्राहुर्भाव हुआ | मुनिश्रे4
इस प्रकार मैने त॒म्हें तत््योंकी संख्या बतायी है। इनमें
पुरुषको छोड़कर शेष सारे तत्त्व प्रकृतिसे प्रकट हुए है
इसलिये सब-के-सब जड़ हे । तत्त्तोंकी संख्या चोबीस है|
उस समय एकाकार हुए चोबीस तत्तोंको ग्रहण करके वे पत्
पुरुष नारायण भगवान शिवकी इच्छासे ब्रह्मरूप बह
से गये । ( अध्याय ६)
कार्य क्या हैः मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ ५
ओर किसने इस समय मेरा निर्माण किया है--इस प्रक
संशयमें पढ़े हुए मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ--मे
किसलिये मोहमें पड़ा हुआ हूँ १ जिसने मुझे उत्पन्न किये
है; उसका पता लगाना तो बहुत सरल है। इस कमलपुण
का जो पत्रयुक्त नाल है; उतका उद्गमस्थांन इस जहोें
भीतर नीचेकी ओर है। जिसने मुझे उत्पन्न किया के के *
पुरुष भी वहीं होगा--इसमें संशय नहीं है |? जे
ऐसा निश्चय करके मैंने अपनेको कमलसे नीचे उताए! #'
मुने | मैं उस कमलकी एक-एक नालमें गया और पैक मे
वर्षोतक वहाँ भ्रमण करता रहा) किंतु कहीं भी उस कमले
उद्गबमका उत्तम स्थान मुझे नहीं मिला | तब पुनः संशर्गों ४
पड़कर मैं उस कमलपुष्पपर जानेको उत्सुक हुआ-और नाले 5
मार्गसे उस कमलूपर चढ़ने लछगा। इस तरह बहुत आर "४
जानेपर भी मैं उस कमलके कोशको न पा सका | उस दशा कर
में ओर भी मोहित हो उठा। मुने | उस समय मगव हे
शिवकी इच्छासे परम मद्ललूमयी उत्तम आकाशवाणी १ ॥
हुईं, जो मेरे मोहका विध्वंस करनेवाली थी | उस वाणी हे
कहा---“तप? ( तपस्या करो ) | उस आकाशवाणीको बुर हे
रुद्रसंदिता |
% ब्रह्मा और विष्णुकों भगवान शिवके शब्द्मय शरीरका दशेन *
८
मैंने अपने जन्मदाता पिताका दर्शन करनेके लिये उस समय
पुनः प्रयलपूर्वक बारह वर्षोतक घोर तपस्या की ) तब मुझपर
: अनुग्रद्ठ करनेके लिये ही चार भुजाओं और सुन्दर नेत्रोंसे
| मुशोमित भगवान् विष्णु वहाँ सहसा प्रकट हो गये | उन
; परम पुरुपने अपने हाथोंमें शद्भू, चक्र गदा और पद्म
#घारण कर रक्खे थे | उनके सारे अड्गः सजल जलघरके समान
#श्यामकान्तिसे सुशोभित थे | उन परम प्रभुने सुन्दर पीताम्बर
पहन खखा था। उनके मस्तक आदि अज्जोमें मुकुट आदि
[महामूल्यवान् आभूषण शोभा पाते थे | उनका मुखारबिन्द
रैप्रसन्नतासे खिला हुआ था | मैं उनकी छविपर मोहित हो
शाह था। वे सुझे करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर दिखायी
शदिये | उनका वह अत्यन्त सुन्दर रूप देखकर मुझे बड़ा
पप्माश्चय हुआ | वे सॉबली और सुनहरी आभासे उद्धासित
। रहे थे | उस समय उन सदसत्त्वरूप) सर्वात्मा। चार भुजा
क्र फेरनेवाले; महाबाहु नारायणदेवको वहाँ उस रूपमें अपने
[थ देखकर मुझे बढ़ा हर्ष हुआ ।
।
तदनन्तर उन नारायणदेवके साथ मेरी बातचीत आरम्भ
४ | भगवान् शिवकी लीलासे वहाँ हम दोनोंमें कुछ विवाद
ड़ गया। इसी समय हमलोगोंके बीचमें एक महान
ग्नस्तम्भ ( ज्योति्मेय लिड्ल ) प्रकट हुआ मैंने और श्रीविष्णुने
क्रमशः ऊपर ओर नीचे जाफर उसके आदि-अन्तका पता छगानेके
लिये बढ़ा प्रयत्न किया; परंतु हमें कहीं भी उसका ओर-छोर नहीं
मिला | में थककर ऊपरसे नीचे लोट आया ओर भगवान्
विप्णु भी उसी तरह नीचेसे ऊपर आकर मुझसे मिले। हम
दोनों शिवकी मायासे मोहित थे। श्रीहरिने मेरे साथ आगे-
पीछे ओर अगल-बगल्से परमेश्वर शिवको प्रणाम किया |
फिर वे सोचने लगे--“यह क्या वस्तु है! इसके स्वरूपका
निदेश नहीं किया जा सकतः क्योंकि न तो इसका कोई
नाम है ओर न कर्म ही है। लिट्गरहित तत्त्व ही यहाँ
लिड्रमावको प्राप्त हो गया है | ध्यानमार्गमे भी इसके स्वरूप-
का कुछ पता नहीं चलता । इसके बाद मैं ओर श्रीहरि
दोनोंने अपने चित्तको खस्थ करके उस अग्निस्तम्भको प्रणाम
करना आरम्भ किया ।
हम दोनों बोले--महाप्रभो | हम आपके खरूपको
नहीं जानते । आप जो कोई भी क्यों न हों; आपको हमारा
नमस्कार है। मदेशान | आप शीकघ्र ही हमें अपने यथार्थ रूपका
दशन कराइये |
..मुनिश्रेष्ठ | इस प्रकार अहंकारसे आविष्ट हुए. &म दोनों
ही वहाँ नमस्कार करने लगे । ऐसा करते हुए हमारे सौ
वृष बीत गये | ( अध्याय ७ )
नाक डसकलककसक
जप
ब्रह्मा ओर विष्णुकोी भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन
. भह्माजी कहते हे---म्रुनिश्रेष्ठ नारद ] इस प्रकार हम
| देवता गर्बरहित हो निरन्तर प्रणाम करते रहे । हम दोनों-
मनर्म एक ही अमिलाषा थी कि इस ज्योतिर्लिइके रूपमें
ँट हुए परमेश्वर प्रत्यक्ष दश्न दें | भगवान् शंकर दीनोंकि
पलक, अहंकार्रियोंका गये चूर्ण करनेवाले तथा सबके
ननाश्नी प्रभु हैं । वे हम दोनोपर दयाछू हो गये । उस
ये वहाँउन मुर्रेठ्से प्योश्मू, ओश्मः ऐसा शब्द-
गोंद प्रकद; हुआ; जो स्पष्टडपसे सुनायी देता था । वह
६ डेत खरमें अभिव्यक्त हुआ था। जोरसे प्रकट होने-
है उस शब्दके विषयमें प्यह क्या है? ऐसा सोचते हुए
न देवताओंके आराध्य भगवान विष्णु मेरे साथ संतुष्ट-
उसे सड़े रह। दे संधा वैरभायसे रहित थे | उन्होंने
शक दक्षिण मारमें सनातन आदि व अक्वारका द््येन
6 उत्तर भागमें उकारका, मध्यभागमें सकारका और
में प्मारेसा! एस नादका साक्षात् दर्शन एवं अनुभव
किया | दक्षिण भागमें प्रकट हुए. आदिवर्ण अकारकों सूर्य-
मण्डलके समान तेजोमय देखकर जब उन्होंने उत्तर भागमें
दृष्टिपात किया; तब वहाँ उकार वर्ण अग्निक्के समान दीपिशाली
दिखायी दिया। मुनिश्रेष्ठ | इसी तरह उन्होंने मध्यमागमें
सकारको चन्द्रमण्डलक्के समान उज्ज्वल कान्तिसे प्रकाशमान
देखा । तदनन्तर जब उसके ऊपर दृष्टि डाली) तब झद्ध स्फटिक
सणिक्रे समान निर्मल प्रभासे युक्त; तरीयातीव, अमल) निष्कल:
निरुपद्रव, निह्न्द्र, अद्वितीय, झत्यमय, थाह्य और आम्यन्तर-
के मेदसे रहित, वाह्याम्बन्तर-मेदसे युक्त: जगतके भीतर
ओर बाहर खयं ही स्थित, आदि; मध्य और अन्तमे रहित;
आनन्दके आदि कारण तथा सबके परम आश्रय) सत्य:
आनन्द एवं अमृतखरूप परब्रह्मका साध्षात्कार किया |
उस समय श्रीहरि बह सोचने लगे कि प्यद अग्नि्तम्स
यहाँ कहाँसे प्रकद हुआ है ? हम दोनों फ्िरि इसद्ी परीक्षा
करे | में इस अनुपन अनहन्तम्भके नीचे जाओँगा |! ऐसा
८५
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमाताने ४
[ संक्षिप्त-शिवपुराण[
सनमा्या;न्आममान पनीर
के
7
हः
न डरा झा
है |
है.
जय
विचार करते हुए श्रीहरिने वेद और शब्द दोनेंकिे आवेशसे
युक्त विश्वात्मा शिवका चिन्तन किया । तब बहाँ एक ऋषि प्रकट
हुए, जो ऋषि-समूहके परम साररुप माने जाते हैं। उन्हीं ऋषिके
द्वारा परमेश्वर श्रीविष्णुने जाना कि इस झब्दब्रह्ममय शरीरवाले
परम लिड्ञके रूपमें साक्षात् परत्रह्मखरूप महादेवजी ही यहाँ
प्रकट हुए. हैं। ये चिन्तारहित ( अथवा अचिन्त्य ) रुद्र दे ।
जहाँ जाकर मनसहित वाणी उसे प्राप्त किये बिना ही सीट
आती है; उस परबह्ा परमात्मा शिवक्रा वाचक एकाक्षर
( प्रणव ) ही है; वे इसके वाच्याथथरूप हैं। वह परम कारण;
प्गत) सत्य, आनन्द एवं अमृतस्व॒रूप परात्पर परब्रह्म एकक्षर-
का वाच्य है | प्रणवके एक अक्षर अकारसे जगतके बीजभूत
अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्माका बोध होता है | उसके दूसरे एक
अक्षर उकारसे परम कारणरूप श्रीहरिका बोध होता है ओर
तीसरे एक अक्षर मकारसे भगवान् नीललछोहित शिवका शान
होता है । अकार सृश्कि्ता है; उकार मोहमें डालनेवाला है
और मकार नित्य अनुग्रह करनेवाला है। मकार-बोध्य सर्वे
व्यापी शिव बीजी ( बीजमात्रके खामी ) हैं और “अकार?
संज्ञक मुझ ब्रह्माको “बीज? कहते हैं। “उकार? नामधारी श्रीहृरि
योनि हैं | प्रधान और पुरुषके भी ईइवर जो महेश्वर हैं, वे
बीजी। बीज और योनि भी हैं । उन्हींकी “्नाद? कहा गया है ।
(उनके मीतर सबका समावेश है। ) बीजी अपनी इच्छासे ही
अपनेको बीज, अनेक रूपोमें विभक्त करके स्थित हैं | इन
बीजी भगवान महेश्वरके लिड्ढसे अकाररूप बीज प्रकट हुआ;
जो उकाररूप योनिमें स्थापित होकर सब ओर बढ़ने लगा ।
बह सुबर्णमय अण्डके रूपमें ह्वी बताने योग्य था | उसका और
कोई विशेष लक्षण नहीं लक्षित होता था। बह दिव्य अण्ड
अनेक वर्षोतक जलमें ही स्थित रहा | तदनन्तर एक हजार
वर्षके वाद उस अण्डके दो टुकड़े हो गये । जलमें खित हुआ
वह अण्ड अजन्मा ब्रह्माजीकी उत्त्तिका स्थान था और
ताक्षात् महेश्वरके आधघातसे ह्वी फूटकर दो भागोंमें बँट गया
था। उस अवस्थामें उसका ऊपर स्थित हुआ सुवर्णमय कपाल
बड़ी शोभा पाने लगा । वही चुलोकके रूपमें प्रकट हुआ ।
तथा जो उसका दूसरा नीचेवाछा कपाल था; वही यह पॉच
लक्षणेसि युक्त प्रथियरी है। उस अण्डसे चतुर्मंख ब्रह्मा उत्पन्न
हुए, जिनकी “कः संज्ञा है | वे समस्त लोकोंके ल्टा हैं । इस
प्रकार वे भगवान् महेश्वर ही “अ, “उ? और मम? इन त्रिविध
रूपर्में वर्णित हुए हैं | इसी अभिप्रायसे उन ज्योतिलिंड्र-
. ख़रूप सदाशिवने “ओरेम, ओशेम? ऐसा कहा--यह बात
मह0
; हा है!
रे
हि
पि
हु
यजुबंदके श्रेष्ठ मन्त्र कद्दते हैँ | यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्र य
कथन सुनकर ऋचाओं ओर साममन्त्रोंने भी हमसे आह
पृवेक कहा--५हे हरे | दे अहान् ! यह बात ऐसी ही है)
इस तरद देवेश्वर शिवकी जानकर श्रीदरिने शक्ति
मन्त्रद्वारा उत्तम एवं महान् अभ्युदयसे शोमित दोनेवाति &
महेश्वरदेवका स्तवन किया | इसी बीचम मेरे साथ हि
पालक भगवान् बिप्णुने एक ओर भी अद्भुत एवं समुद्र
देखा | मुने | वह रुप पाँच मुर्खो ओर दस भुजाओंसि बच
था | उसकी कान्ति कर्पूरके समान गोर थी। वह नानाफ़ा
की छठाभोंसे छविमान् ओर भॉति-भाँतिके आमूए
विभूषित था | उस परम उदार महापराक्रमी ओर महाएत्त
लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त उत्कृष्ट रूपका दर्शन करके में
श्रीहरि दोनों कृतार्थ हो गये |
तत्यश्रात् परमेश्वर भगवान् महेश प्रसन्न हो अपने क्
शब्दमय रूपको प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गये |# '
उनका मस्तक और आकार लछलाट है। इकार दाह्ििः
ईकार बायाँ नेत्र है | उकारकों उनका दाहिना और क
को बायाँ कान बताया जाता है। ऋकार उन ४
दायाँ कपोल है ओर ऋकार बायाँ | छ ओर लू--ये »
नासिकाके दोनों छिद्र हैं| एकार उन सर्वव्यापी प्रमुका
ओष्ठ है ओर ऐकार अघर | ओकार तथा औकार--ने,
क्रमशः उनकी ऊपर ओर नीचेकी दो दन्तपँक्तियाँ हैं।'अं५
“अः”? उन देवाधिदेव झूलधघारी शिवके दोनों ताल हैं | 4
पाँच अक्षर उनके दाहिने पॉच हाथ हैं और च आदि
अक्षर बॉयें पाँच हाथ; ८ आदि और त आदि पॉक
अक्षर उनके पैर हैं| पकार पेट है। फकारको दाहित
बताया जाता है और बकारको बायोँ पाई । मकारको 5
कहते हैं| मकार उन योगी महादेव शम्मुका हृदय है।
से लेकर “सः तक सात अक्षर सर्वव्यापी शिवकरे २४
शरीरकी सात धातुएँ हैँ | हकार उनकी नाभि हैओर #
मेढ़ू ( मृत्रेन्द्रिय ) कहा गया है | इस प्रकार निगुंग छं! के
स्वरूप परमात्माके शब्दमय रूपको भगवती उम्रक़े
देखकर मैं और श्रीहरि दोनों कृतार्थ हो गये | इस तू/ #
ब्रह्ममय-दरीरधारी महेश्वर शिवका दर्शन पाकर मेरी
श्रीहरिने उन्हें प्रणाम किया और पुनः ऊपरकी ओर
उस समय उन्हें पाँच कछाओंसे युक्त डँ“कारजनित ”
साक्षात्कार हुआ । तत्पश्चात् महादेवजीका “मं तत्व ै
ब्ज्प ८रहफज अध्ध
ञ्जन अलवड+
रे
ह
ऊऋषरए >पफता जा आप? हज उयः
जज अ- वन्य जय
'महावाक्य दृष्टिगोचर हुआ, जो परम उत्तम मलहूप
शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है | फिर सम्पूर्ण धरम ओर
द्रसंहिता | # उम्ासहित भगवान् शिचका प्राकख््य तथा उनके द्वारा अपने खरूपका विवेचन #
८39
जज >> "5. "््य् चचचखज्््््््य््््श्््श्््य््य्य्य्््य्य्य्प्प्प्य्य्य्य्प्प्प्प्प्फ्जजिणि
ख्जओली का |
# साधक तथा बुद्धिस्वरूप गायत्री नामक दूसरा महान् मन्त्र
गक्षित हुआ; जिसमें चौबीस अक्षर हैं तथा जो चारों पुरुषार्थ-
पी फल देनेवाला है | तस्पश्चात् मृत्युंजय मन्त्र; फिर पद्चाक्षर
उन्त्र तथा दक्षिणामूरतिसंशक्क चिन्तामणि मन्त्रका साक्षात्कार
रआ | इस प्रकार पाँच मन्त्रोकी उपलब्धि करके भगवान्
श्रीहरि उनका जप करने लगे |
तदनन्तर ऋक) यज्ुः ओर साम-ये जिनके रूप
ै जो ईशोंके मुकुटमणि इशान हैं; जो पुरातन पुरुष हैं,
८2 कि करन
त्रह्माजी कहते हैं--नारद ! भगवान् विष्णुके द्वारा
हुई अपनी स्ठ॒ुति सुनकर करुणानिधि महेद्वर बड़े प्रसन्न
और उमादेबीके साथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये । उस
ययेउनके पाँच मुख ओर प्रत्येक मुखर्म तीन-तीन नेत्र
भा पाते थे | भालदेशमें चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था।
रपर जय धारण किये गोरवर्ण+ विशालनेत्र शिवने अपने
पूर्ण अज्ञोंमं विभूति छगा रक््खी थी। उनके दस भुजाएँ
| | कण्ठमें नील चिह्द था। उनके श्रीअज्ग समस्त आशूषणोंसे
भूषित थे । उन सर्वोश्नसुन्दर शिवके मस्तक भस्ममय
पुण्ड्से अछ्लित थे । ऐसे विशेषणंसि युक्त परमेश्वर
ददेवजीको मगबती उमाके साथ उपसित देख मैंने ओर भगवान
ए्णुने पुनः प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की | तब पापहारी
'रुणाकर भगवान् महेश्वरने प्रसन्नचित्त होकर उन श्रीविण्णु
बको श्वासरूपसे बेदका उपदेश दिया । सुने | उसके बाद
एनने परमात्मा श्रीहरिको गुह्य ज्ञान प्रदान किया । फिर उन
रमत्माने कृपा करके मुझे भी वह ज्ञान दिया | बेदका शान
'पहै करके इतार्थ हुए भगवान् डिप्णुने मेरे साथ हाथ जोड़
वरकी नमस्कार करके पुनः उनसे पूजनक्री विधि बताने
था सदुपदेद देनेके लिये प्रार्थना की |
प्रद्मजी कहते हँ--मुने ! श्रीहरिकी यह वात सुनकर
प्पन्त सन्त हुए कृपानिधान भगवान् थिजनने प्रीतिप्रवदक
[( णात द्ट् श | |
८
; ् भीशिव बोले--सुरश्रेष्ठगण ! में तुम दोनोंकी भक्तिसे
; 72 | | । १५६ ४] ्स्ल छू | नम मल 2३ महादेवकी ओर
हैं कण, दर प्रा
मा | ४ रामय न ( मेरा स्वसूप जेसा दिखादी देता है दन्प
; २
है। हा न ६६ 68७०-६8 आन ही ज्त दरना ४० पजबफ (जप त्र्सय सु
ु "तप एनन-चन्तत दरना चाहये। तल
जिनका हृदय अबोर अर्थात् सोम्य है; जो हृदयको प्रिय छगने-
वाले सर्वगुह्य सदाशिव हैं, जिनके चरण वाम--परम सुन्दर हैं)
जो महान् देवता हैं. और महान् सर्पराजकी आभूषणके रूपमें
धारण करते हैं, जिनके सभी ओर पेर और सभी ओरे नेत्र
हैं, जो मुझ ब्रह्माके भी अधिपति, कल्याणकारी तथा सृष्टि, पालन
एवं तंहार करनेवाले हैं, उन वरदायक्र साम्ब शिवका मेरे
साथ भगवान् विष्णुने प्रिय वचनद्वारा संतुष्टचित्तसे
स्तवन किया | ( अध्याय ८ )
उमासहित भगवान् शिवका पग्राकृस्य, उनके द्वारा अपने खरूपका विवेचन तथा
ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंकी एकताका प्रतिपादन
दोनों महाबली हो ओर मेरी खरूपभूता प्रकृतिसे प्रकट हुए
हो । मुझ सर्वेश्वरके दाय-बायं अज्ञींसे तुम्हारा आविभाव हुआ
है। ये लोकपितामह ब्रह्मा मेरे दाहिने पाश्व॑से उत्पन्न हुए हैं
ओर ठुम विष्णु मुझ परसात्माके वाम पाइवसे प्रकट हुए
हो | मैं तुम दोनोंपर भलीभौँति प्रसन्न हूँ और तुम्हें मनोवाज्छित
वर देता हूँ । मेरी आज्ञासे तुम दोनोंकी मुझमें सुदृढ़ भक्ति
हो | ब्रह्मन् | तुम मेरी आज्ञाका पालन करते हुए,जगत्की
स॒ष्टि करो और वत्स बिप्णो | तुम इस चराचर जगतका
पालन करते रहो ।
हम दोनोंसे ऐसा कहकर भगतव्रान् शंकरने हमें पूजाकी
: उत्तम विधि प्रदान की; जिसके अनुसार पूजित होनेपर वे
पूजकरको अनेक प्रकारके फल देते हैं | शम्भुकी उपर्युक्त बात
सुनकर मेरे सहित श्रीहरिने महेश्वरक्रों हाथ जोड़ प्रणाम
करके कहा |
भगवान् विष्णु बोके--प्रभो |! यदि हमारे प्रति
आपके हृदयमें प्रीति उसन्न हुई है ओर यदि आप इसमें वर
देना आवश्यक समझते हैं तो हम यही वर माँगते हैं कि
आपमें हम दोनोंकी सदा अनन्य एवं अविचल भक्ति
बनी रहे ।
त्रह्माजी कहते हँ--मुने ! श्रीहरिक्री यह बात सुनकर
भगवान् हरने पुनः मस्तक झुकाकर प्रणाम करके हाथ जाड़े
खड़े हुए उन नारायणदेवसे स्वयं कहा ।
ध्रीमहेभ्वर बोले--में उष्टि, पालन ओर संहारका कर्ता
हूं; सुगुण ओर निंशण हैं तथा सद्चिदानन्दस्वरुप निविकार
परत्रद्य परमात्मा हें | दिप्प !
खाट: रक्षा और प्रत्यरष गा
कुक
+. यह वरना से. आन -नजानमन नम &+..)+% “न्माएमपााा
अथवा कार्योके भेदसे मैं ही ब्रह्मा) विष्णु ओर रुद्र नाम
धारण करके तीन खरूपोंमें विभक्त हुआ हूँ । हरे ! वास्तवमें
मैं सदा निष्कल हूँ । विष्णो | तुमने ओर ब्रहने मेरे
अवतारके निमित्त जो स्तुति की है; तुम्हारी उस प्रार्थनाको
में अवश्य सच्ची करूँगा; क्योंकि में भक्तवत्सल हूँ | ब्रह्मन् !
मेरा ऐसा ही परम उत्कृष्ट रूप तुम्हारे शरीरसे इस लोकमें प्रकट
होगा, जो नामसे “रुद्र? कहलायेगा | मेरे अंशसे प्रकट हुए
रुद्रकी सामथ्य सुझसे कम नहीं होगी । जो में हूँ, वही यह
रुद्र है । पूजाकी विधि-विधानकी दृष्टिसे भी मुझमें ओर
उसमें कोई अन्तर नहीं है। जेसे ज्योतिका जल आदिके
साथ सम्प्रक होनेपर भी उसमें स्पशेदोष नहीं लूगता; उसी
प्रकार मुझ निगगुण परमात्माको भी किसीके संयोगसे बन्धन
नहीं प्राप्त होता | यह मेरा शिवरूप है। जब रुद्र प्रकट
होंगे; तब वे भी शिवके ही तुल्य होंगे | महामुने | उनमें
और शिवमें परायेपनका भेद नहीं करना चाहिये । वास्तवमें
एक ही रूप सब जगतमें व्यवहारनिवाहके लिये दो रूपोमें
विभक्त हो गया है | अतः शिव ओर रुद्रमें कभी भेदजुद्धि
नहीं करनी चाहिये | वास्तवमें सारा दृश्य ही मेरे विचारसे
शिवरूप है ।
मैं, तुम) ब्रह्मा तथा जो ये रुद्र प्रकट होंगे; वे सब-के-
सब एकरूप हैं। इनमें भेद नहीं है | मेद माननेपर अवश्य
ही बन्धन होगा। तथापि मेरा शिवरूप ही सनातन है ।
यही सदा सब झरुपोंका मूलभूत कहा गया है।
यह सत्यः शान एवं अनन्त ब्रह्म है |# ऐसा जानकर सदा
मनसे मेरे यथार्थ ख्रूपका दर्शन करना चाहिये । ब्रह्मन् !
सुनो; में तुम्हें एक गोपनीय बात बता रहा हूँ । मैं खयं
ब्रह्माजीकी अ्रकुण्सि प्रकट होऊँगा । शु्णोर्मे भी मेरा प्राकण्य
कहा गया है । जेसा कि लोगोंने कहा है “हर तामस प्रकृतिके
हैं |? बास्तवमें उस रूपमें अहंकारका वर्णन हुआ है। उस
अहंकारकी केवल तामस ही नहीं, वैकारिक ( सात्विक ) भी
समझना चाहिये ( क्योंकि सात्तिक देवगण वेक[रिक अहंकारकी
ही सृष्टि हैं )। यह तामस ओर सात्विक आदि भेद केवल
नाममात्रका हैः वस्त॒ुतः नहीं है | वास्तवमें “हरः को तामस
नहीं कहा जा सकता | ब्रह्मन | इस कारणसे तुम्हें ऐसा
करना चाहिये । तुम तो इस खश्कि निर्माता बनो और
जज
# मूलीभूत सदोक्त च सत्यश्ञानमनन्तकम् |
( शि० पु०२० सू० ९ | ४० )
सा]
४ नमो रुदठ्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराण
श्रीहरि इसका पालन करें तथा भेरे अंशसे प्रकट हेमेए
जो रुद्र है, वे इसका प्रठ्य करनेवाले होंगे | ये जो %ऋ |
नामसे विख्यात परमेश्वरी प्रकृति देवी हूँ, इन्होंकी ४५,
वाग्देवी ब्रह्माजीका सेबन करेंगी | फिर इन प्रकृति स .
वहाँ जो दूसरी शक्ति प्रकट होगी; वे छक्ष्मीरूपते 0
विप्णुका आश्रय लेगी | तदनन्तर पुनः काली नाम :
तीसरी शक्ति प्रकट होंगी; वे निश्चय ही मेरे अंशभूत खत
प्रात होंगी | वे कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ ज्योतिरुफे 7३ '
होंगी | इस प्रकार मेंने देवीकी शुभस्रूपा पथ.
परिचय दिया | उनका कार्य क्रमशः सृष्टि पाछन ओर ७६४
सम्पादन ही है | सुरश्षेठ्ठ ! ये सब-की-सब मेरी प्रिया 4३/५
की अंशभूता हैं | हरे |! तुम लक्ष्मीका सहारा लेकर
करो । ब्रह्मन् ! तुम्हें प्रकृतिकी अंशभूता वाग्देवीकी ५७
आशाके अनुसार मनसे खश्किायका संचालन कराई '
ओर मैं अपनी प्रियाकी अंशभूता परात्पर कालीका *
ले रुद्ररूपसे प्रयसम्बन्धी उत्तम कार्य करूँगा | ,
लोग अवश्य ही सम्पूर्ण आश्रमों तथा उनसे भिन्न
विविध कार्योद्वारा चारों वर्णसे भरे हुए लोककी व...
रक्षा आदि करके सुख पाओगे | हरे | ठुम शत
सम्पन्न तथा सम्पूर्ण लोकोंके हिंतेषी हो | अतः आ “
आशा पाकर जगतूर्में सब लोगोंके लिये मुक्तिदाता« ह
मेरा दर्शन होनेपर जो फल प्राप्त होता है; वही तम्हाए
होनेपर भी होगा | मेरी यह बात सत्य है; सत्य है |:
संशयके लिये स्थान नहीं है । मेरे हृदयमें विष्णु #
विष्णुके हृदयमें मैं हूँ | जो इन दोनोंमें अन्तर नहीं ५० ;
वही मुझे विशेष प्रिय है |# श्रीहरि मेरे बाये अझसे
हुए. हैं । ब्रह्माका दाहिने अज्गसे प्राकत्य हुआ ९
महाप्र्यकारी विश्वात्मा रुद्र मेरे हृदयसे प्राहुभूंत ६,
विष्णो | में ही सृष्टि, पान और संहार करनेवाले र« १॥
त्रिविध गुण्णोद्वारा ब्रह्मा, विष्णु ओर रुद्वनामसे प्रहि
तीन रूपोर्में प्रथक-प्थक् प्रकट होता हूँ | साक्षात् शितर
जलता | वे प्रकृति ओर पुरुषसे भी परे हैं--अ#॥
नित्य; अनन्त) पूर्ण एवं निरक्षन परह्म परमाल। । |
तीनों छोकोंका पालन करनेवाले श्रीहरि भीतर तमोगुए *
# ममेव छदये विष्णुविष्णोश्व हृदये झहम् ॥
उमयोरन्तरं यो वे न जानाति मतो मम ।
(शि० पु० रु० सं० १।४४१
रुद्रसंहिता ] # श्रीहरिको खष्टिकी रक्षाका भार एवं भोग-मोक्षदानका अधिकार दे शिवका अन्तर्घधान % ८९
बाहर सत्तगुण धारण करते हैँ; त्रिलोकीका संहार करनेवाले इन तीन देवताओंमें गुण हैं; परंतु शिव गुणातीत माने गये
रुद्रदेव भीतर सत्ततगुण ओर बाहर तमोगुण धारण करते हैं. हैं। विष्णो | तुम मेरी आज्ञासे इन सृष्टिकर्ता पितामहका
तथा त्रिमुवनकी सष्टि करनेवाले ब्रह्माजी बाहर ओर भीतरसे प्रसन्नतापूर्वंक पालन करो; ऐसा करनेसे तीनों लोकोंमें पूजनीय
भी रजोगुणी ही हैं | इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र--- होओगे । | ( अध्याय ९ )
“*--+>-<<8)९४27--4-*-५
श्रीहरिको सशिकी रक्षाका भार एवं भोग-मोक्ष-दानका अधिकार
दे भगवान् शिवका अन्तधान होना
2 ८ ४3३5 न्नकड-ज्छऊििेि स्चंजिच-ा:5 757
परमेश्वर शिव बोले--उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले टिसपक नमी ८ “नन5 अमन मक रस
रे! विष्णो | अब तुम मेरी दूसरी आज्ञा सुनो | उसका पालन
रनेसे तुम सदा समस्त छोकोंमें माननीय और पूजनीय बने 7770 जा
ऐेगे । श्रह्माजीके द्वारा स्वे गये छोकमें जब कोई दुःख या कि / | 92
कट उत्पन्न हो; तब तुम उन सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेके >बड222 ५222८ 2१7५
वये सदा तत्यर रहना | तुम्हारे सम्पूर्ण दुस्सह कार्योमें में ८2 5 ८ ४८272:
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थ्प्न अर श बह ण मर
| ध [2
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म्हारी सहायता करूँगा। तुम्हारे जो दुर्जेय और अत्यन्त ।
त्कट शत्रु होंगे, उन सबको मैं मार गिराऊँगा | हरे ! तुम 726 है 26] न 208 हे नम
ना प्रकारके अवतार धारण करके लोकमें अपनी उत्तम “7 रथ | ५४ 2
र्तिवा विस्तार करो और सबके उद्धारके लिये तत्पर रहो । रे ' ८
मे रुद्रके ध्येय हो ओर रुद्र तुम्हारे ध्येय हैं| तुममें और (2
द्रमें कुछ भी अन्तर नहीं है | # जो मनुप्य रुद्रका भक्त
कर तुग्हारी निन्दा करेगा; उसका तारा पुण्य तत्काल भस्म
' जाय | पुरुषोत्तम विष्णो | तुमसे द्वेष करनेके कारण मेरी
शशासे उसको नरकमें गिरना पड़ेगा । यह बात सत्य है, सत्य
| इसमें संशय नहीं है | | तुम इस छोकमें मनुप्योके लिये
शेपतः भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले और भक्तोंके ध्येय
था पृज्य होकर प्राणियोंका निम्रह और अनुग्रह करो |
£ हक
# लय
+
ऐसा कहकर भगवान् शिवने मेरा हाथ पकड़ लिया और के ते मन
विण्णुको सौंपकर उनसे बंहा>२ पु: सैफेटक समय सदा इनका सहायता करते रहना | सबके अध्यक्ष होकर सभीकों
भोग ओर मोश्ष प्रदान करना तथा सर्वदा समस्त कामनाओंका
ए्र ल् य् कं विका न साथक + सच े बने के *:2॥॥
* र्प्रप्येया भवांइसेव सवदध्थेयो हरस्तथा । पाधक एच सर्वश्रेष्ठ बने रहना । जो तुम्हारी शरणमें आ गया;
बयारन्त्र छः मेरी दइरणम है. 2॥ जो ५ अं छस
पुक्योरनारं॑ नेव तब रुद््य किचन ॥। वह निश्चय ही मेरी शरणमें आ गया । जो मुझमें और तममें
(झ्ि० पु० २० स० खं० १० ।६) अन्तर समझता है, वह अवश्य नरकमें गिरता हैः: |?
चै प्र्घ रे 8० 5 बि हू हक भगवान सित्रका
। मऊ! चने ये सु तव निनन््यं करिप्यति। च्रह्माज़ी कहते --देबपे | 3 दिविकाों वह बचनन
ऊंय एन थे निश्मिल द्रते मर भविष्यति ॥ 35 जी ना, दिप्युने सबकी वद्यमें करने-
गरके दपस॑ पेस्स त्वग्तरशात्पूरपोत्तम < ६
मा उेशल्ुस्पोत्तम । * त्वा यः समाझ्ितों नू्न माभेव स समाध्रित:।
हक भराताणय सत्य सत्य ने संशय: ॥ मन यहा डानाति निरये पति छवमाशम
( शि० पु० २० ० स० १०॥१ ८-९ ) ( शि० एप रू० छल रण 7 ! १४ पु
हज
प्र च्त् पक
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१९%, ६ कि + 8 । थे र् टन ++--न्माभकबका-
९.०
जि बा भरा मर 0७७७७ एज
वाले विश्ववाथको प्रणाम करके मन्दस्वरमं कहा---
श्रीविष्णु वोले--करुणासिन्धो | जगन्नाथ शंकर ! मेरी
यह बात सुनिये | में आपकी आज्ञाके अधीन रहकर यह सब
कुछ करूँगा । खामिन् ! जो मेरा भक्त होकर आपकी निन््दा
करे, उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें | नाथ [| जो
आपका भक्त है; वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो ऐसा जानता
है, उसके लिये सोक्ष दुर्लम नहीं है। ३
श्रीहरिका यह कथन सुनकर दुःखहारी हरने उनकी बात-
का अनुमोदन किया और नाना प्रकारके धर्मोका उपदेश देकर
हम दोनोंके हितकी इच्छासे हमें अनेक प्रकारके वर दिये ।
४£ नमो रुद्राय शान्तात्र ब्रह्मणे परसात्मने 5:
सररम-- सा पडा नी) मदीना... #मिल पदालरम गह..#. फेक“ चीमआक.....क्०.. क् धरम गम सॉरी पा+ ०-६ "दुख पृशलानमत-2 आधा. पूझुलन।. समिनी+ सुकमा सूइमी न जी! छुल।. दरिरनायुमऑयि सम.
| संक्षिप्त-शिवपुराणा;
ज्जी. ीध. 9. बुरा. सीन. सीकानी+-मोकमानाुक+.वुडाक-ह५प.."५-सामओ..रित (अति. मम. साकि++- काना 0 २० अमन जरयाहीन.. अमन... शामिधिनाफनरीी.. बैन. आर. जड.. कमी... आकर. परी. न. आननी-. न
' इसके बाद भक्तवत्सल भगवान शम्भ क्पाप्वक हमारी के '
देखकर हम दोनोंके देखते-देखते सहसा वहीं अन्तघानह
गये | तभीसे इस छोकर्म लिड्कप्जाका विधान चाढू हआहै।
लिझ्में प्रतिष्ठित भगवान शिव भोग और मोज्न देनेवाले है।
शिवलिड्वकी जो वेदी या अर्घा है। वह महादेवीका खह्पर .
ओर लिझ् साक्षात् महेश्वरका | लयका अधिष्ठान होनेके का...
भगवान् शिवको लिड्डः कहा गया है; क्योंकि उन्हींगे नि
जगत्का लय होता है । महामुने ल्य है | महामने | जो शिवलिड्के के
कोई कार्य करता है; उसके पुण्यफलकों वर्णन करनेकी शी
मुझमें नहीं है । ( अध्याव १५
४ध्॑ाणणछ: >> 4 माय
शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल
ऋषि वोले--व्यासशिष्य महाभाग सूतजी | आपको
ममस्कार है | आज आपने मगवान् शिवकी. बड़ी अद्भुत एवं
परम पावन कथा सुनोयी है। दयानिधे | ब्रह्मा और नारदजीके
तंवादके अनुसार आप हमें शिवपूजनकी वह विधि बताइये, जिससे
यहाँ भगवान् शिव. संतुष्ट होते हैं । ब्राह्मण; क्षत्रिय, वैश्य ओर
शूद्ध--सभी शिवकी पूजा करते हैं | वह पूजन केसे करना
चाहिये ? आपने व्यासजीके मुखसे इस विषयको जिस प्रकार
सुना हो; वह बताइये ।
महर्षियांका वह कल्याणप्रद एवं श्रुतिसम्मत वचन सुनकर
सूतजीने उन मुनियोंके प्रश्नके अनुसार सब बातें प्रसन्नतापूर्वक
बतायीं ।
खूतजी बोले--मुनीखरों | आपने बहुत अच्छी बात
पूछी है । परंतु वह रहस्यकी बात है | मैंने इस विषयको जैसा
सुना है ओर जेंसी मेरी बुद्धि है; उसके अनुसार आज कुछ
कह रहा हूँ । जैसे आपलोग पूछ रहे हैं; उसी तरह पूर्वकालमें
व्यासजीने सनत्कृमारजीसे पूछा था | फिर उसे उपमन्युजीने
भी सुना था । व्यासजीने शिवपूजन आदि जो भी विषय सुना
था; उसे सुनकर उन्होंने लोकहितकी कामनासे मुझे पढ़ा दिया
था | इसी विपयको भगवान् श्रीकृष्णने महात्मा उपमन्युसे
सुना था 0० + 7 कली 7-7० इतनी: पूवकालमें ब्रह्माजीने नारदजीसे इस विषयमें जो
कुछ कहा था) वही इस समय मैं कहूँगा ।
# मम भक्तश्ल यः स्वामिस्तव निन््दा करिष्यति |
त्वद्गक्तो यो भवेत्खामिन्मम प्रियतरो हि सः।
ब्रह्माजीने कहा--नारद ! में संक्षेपसे लिड्नपूजनीर
बता रहा हूँ, सुनो | जेसा पहले कहा गया है; बेसा जो भ
शंकरका सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है; उसका उ
भक्तिभावसे पूजन करे, इससे समस्त मनोवाज्छित फर्लेंकीर'
होगी । दरिद्रता, रोग; दुःख तथा शन्नुजनित पीड़ा-वे5
प्रकारके पाप ( कष्ट ) तमीतक रहते हैं, जबतक मनुष्य मे
शिवका पूजन नहीं करता है | भगवान् शिवकी पूजा के!
सारे दुःख विलीन हो जाते और समस्त सुखोंकी प्राप्ति हो
है | तत्पश्रात् समय आनेपर डपासककी मुक्ति मी होती है
मानव शरीरका आश्रय लेकर मुख्यतया संबान-सुखकी का
करता है; उसे चाहिये कि वह सम्पूर्ण कार्यों और
साधक महादेवजीकी पूजा करे | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेरय *
शूद्र भी सम्यूणं कामनाओं तथा प्रयोजनोंकी सिद्धिके £
क्रमसे विधिके अनुसार भगवान् शंकरकी पूजा करे | #
काल ब्राह्म मुहूतम उठकर गुरु तथा शिवका सर हैं
तीर्थोका चिन्तन एवं भगवान् विष्णुका ध्यान करे | फिर
देवताओंका और मुनि आदिका भी स्मरण-चिन्तन करकेस'
पाठफूवंक शंकरजीका विधिपूर्वक नाम ले | उसके बाद ४*|
उठकर निवास-स्थानसे दक्षिण दिद्यामें जाकर मल्त्याग *(
मुने | एकान्तमें मल्लोत्स्ग करना चाहिये | उससे शरद
लिये जो विधि मैंने सुन रखी है; उसीको आज कह।[॥
मनको एकाग्र करके सुनो । क्
तस्य वे निरये वासं प्रयच्छ नियतं छुवम् ॥
एवं वे यो विजानाति तस्य मुक्तित॑ दुर्लभा ॥
( शि० पु० रु० स॒० खं० १० | ९ |
4
है।
द्वसंहिता ]
% शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल #
ब्राह्मण गुदाकी शुद्धिके लिये उसमें पाँच वार झुद्ध मिट्टी
का लेप करे और धोये । क्षत्रिय चार बार वैश्य तीन बार
और झूद्र दो वार विधिपूर्वक गुदाकी झुद्धिके लिये उसमें मिद्टी
हगाये | लिक्नमें भी एक वार प्रयक्षपूर्थक मिट्टी लगानी चाहिये ।
तत्पश्चात् बायें हाथमें दस बार और दोनों हार्थोमें सात बार
मिट्टी लगाकर थोये । तात ! प्रत्येक पेरमें तीन-तीन बार मिद्टी
ठगाये । फिर दोनों हाथोंमें मी मिद्दी लगाकर धोयें। स्त्रियोंको
श़द्रकी ही भाँति अच्छी तरह मिट्टी लगानी चाहिये | हाथ-पैर
धोकर पूर्ववत् झुद्ध मिद्दी ले और डसे छगाकर दाँत साफ
करे | फिर अपने वर्णके अनुसार मनुष्य दतुअन करे। ब्राह्मण-
को बारह अंगुलकी दतुअन करनी चाहिये । क्षत्रिय ग्यारह
अंगुल, बेश्य दस अंगुल ओर शुद्र नौ अंगुलकी दतुअन
करे । यह दतुअनका मान बताया गया । मनुस्मृतिके अनुसार
कालदोपका विचार करके ह्वी दतुअन करे या त्याग दे । तात |
पट्टी, प्रतिपदा। अमावास्या। नवमी) न्तका दिन सूयास्तका
समय, रविवार तथा भ्राद्ध-दिवस---े दन्तघावनके लिये वजित
हँ--इनमें दतुअन नहीं करनी चाहिये | दतुअनके पश्चात् तीर्थ
( जलाशय ) आदिम जाकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिये;
विशेष देश) काल आनेपर मन्त्रोच्वारणपूर्वक स्नान करना
' उचित है | रनानके पश्चात् पहले आचमन करके वह धुला
हुआ बस्तर धारण करे | फिर सुन्दर एकान्त स्थलूमें बेठकर
; सैध्याविधिका अनुष्ठान करे। यथायोग्य संध्याविधिका पालन
; पर्व: पूजाका कार्य आरम्भ करे ।
;.. मनको सुखिर करके पूजाणहमें प्रवेश करे । वहाँ पूजन-
* सामग्री लेकर सुन्दर आसनपर बेठे | पहले न्यास आदि
। करके क्रमशः महादेवजीकी पूजा करे. | शिवकी पूजासे पहले
: गणेशजीकी, द्वारपाल्लयेंकी और दिक््पालोंकी भी भलीभौति पूजा
£ करके पीछे देवताके लिये पीठस्थानकी कल्पना करे। अथवा
| अष्टरलकमल बनाकर पूजाद्रव्यके समीप बेंठे ओर उस कमलू-
£ पर है भगवान् शिवको समासीन करें | तत्यश्चात् तीन आचमसन
€ बरसे पुनः दोनों हाथ धोकर तीन प्राणायाम करके मध्यम
£ भाणायाम अपात् झृम्मकू करते समय चिनेत्रधारी भगवान्
४ शवका एस प्रकार ध्यान करे--उनके पाँच मुख हैं, दस
| भुजएँ ऐं, शुद्ध स्फटणिकके समान उज्ज्यल कान्ति हे सब
प्रदारड आव्ण उनके श्रीअफ्ोंको को विभषित करते हैँ तथा
“ पे स्शचनडी चादर ओदे हुए है । इस तरद ध्यान करके
. घर शाउगा बरे कि पह्े भी इनफ्रे समान | स्प् प्रात ट्ो
जाई । एटा जावना करदे मनुण्य सदाफे लिये अपने पापफो
ल्च्ं्च्ं्च्»्ंलज्िस्ल्च्स्स्स्स्स््लस््व्ल्््श््य्य्च्ख्य्य्ख्य्््य्य्य्स्स्य्ल्स्ल्स््य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्स्स्थ्स्टर अर
भस्म कर डाले | इस प्रकार भावनाद्वारा शिवका ही शरीर
धारण करके उन परमेश्वरकी पूजा करें। शरीरशुद्धि करके
मूलमन्त्रका क्रमदः न्यास करे अथवा सत्र प्रणयसे ही पडब्ज
न्यास करे । ५3८ अपद्येत्यादिः!० एपसे संकल्प-वाक्यका प्रयोग
करके फिर पूजा आरम्म करे। पाद्म) अर्ध्य ओर आचमनके
लिये पात्रोंको तैयार करके रखे | बुद्धिमान पुरुष विधिपूर्वक
भिन्न-भिन्न प्रकारके नो कलद स्थापित करें। उन्हें कुशाओंसे
ढककर रखे ओर कुशाओंसे ही जल लेकर उन सबका
प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् उन-उन सभी पात्रोर्मे शीतल जल डाले |
फिर बुद्धिमान् पुरुष देख-भाल्कर प्रणबमन्त्रके द्वारा उनमें
निम्नाद्धित द्रव्योंकी डाठे। खस ओर चन्दनको पाद्पात्रमें
रखे | चमेलीके फूछ, शीतछूचीनी, कपूर; बड़की जड़ तथा
तमाल--इन सबको यथोचितरूपसे कूट-पीसकर चूर्ण बना
ले ओर आचमनीयके पाचमें डाले | इछायची ओर चन्दमको
तो सभी पात्नोंम डालना चाहिये। देबाधिदेव महादेवनीके
पाश्चमागमें नन््दीश्वरका पूजन करे | गन्ध। धूप तथा मौँति-
भॉतिके दीपोद्वार शिवकी पूजा करे । फिर लिद्गश्द्धि करके
मनुष्य प्रसन्नतापूवक सन्त्रसमूहोंके आदियें प्रणव तथा अन्तमें
पमःः पद जोड़कर उनके द्वारा इश्देवके लिये यथोचित
आसनकी कल्पना करे। फिर प्रणवसे पद्मासवकी कल्पना
करके यह भावना करे कि इस कमलका पूव॑दल साक्षात्
अणिमा नामक ऐश्र्यरूप तथा अविनाशी है। दक्षिणद्ल
लघिमा है। पश्चिमदल महिसा दे। उत्तरदल प्राप्ति है।
अम्रिकोणकरा दल प्राकराम्य है। नक्नत्यकोणकी दल इशित्व
है। वायव्यक्रोणका दल वशित्व है | ईशानकोगका दल
सर्वशत्व है और उस कमलकी कर्णिकाको सोम कह जाता है।
सोमके नीचे सूय हैं, सूपके नीचे अम्रि हैं ओर अभिके भी
नीचे धर्म आदिके स्थान हैं | क्रमशः ऐसी कृत्यना करनेके
पश्चात् चारों दिश्याओर्मे अव्यक्त, महत्तत्व, अट्ंकार तथा
उनके विकारोंकी कल्पना करे | सोमके अन्तर्मे सत्य; रज्ञ और
तम--इन तीनों गुर्णोकी कल्यना करे। इसके बाद स्यद्रोज्ञत
प्रपद्यामि! इत्यादि मन्त्रसे परमेश्वर शिवक्रा आशटन ऋरझे
४3» वामदेवाय नम? इलादि बरामदेव-मन्त्रसे उन्हें आमनपर
विराजमान करें| फिर ४७०७ क्तपासपाद ग्प्म्याद वदिद्यद्रा स्त्याट्धि
गायत्रीद्वार इश्देवका सांनिष्य प्राम करके इन्द्र शथयरम्थोड्था
इत्यादि अपःस्सन्द्स वहाँ निउद्ध करे | क्रिर ईईद्यानः साई
विद्यानाम! इत्यादि मन्द्े ऋगनऋदिदओा व
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पथ आर ऋआचमनेाय आाउत इझरके अध्य दे! ४
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मम +4-ममम»»> अनम--मममा 3. अभमऔ3ा+ + . आयत-ा-..म.. 2-०. आन्मन्य. “जन पे+-ीन्ननन्क मा _ैक-क्क-२+ मनन,
गन्ध और चन्दनमिश्रित जलसे विधिपूर्वक रुद्रदेवकों स्नान
कराये । फिर पश्चगव्यनिर्माणकी विधिसे पॉँचों द्वव्योंको एक
पात्रम लेकर प्रणयसे ही अभिमन्त्रित करके उन मिश्रित गव्य-
पदार्थोद्यारा मगवानकी नहलाये | तलश्रात् प्रथक्-प्रथक् दूध,
दही; मधु; गन्नेके रस तथा घीसे नहछाकर समस्त अमीशेंके
दाता ओर हितकारी पूजनीय महादेवजीका प्रणवक्े उच्चारण-
पूर्वक पवित्र द्रव्योंद्राग अभिषेक करे | पवित्र जलपात्रोंमें
मन्न्रोच्चारणपूवंक जल डाले। डालनेसे पहले साधक इर्वेत
वस्रसे उस जलकी यथोचित रीतिसे छान ले। उस जलको
तबतक दूर न करे, जबतक इष्टदेवको चन्दन न चढ़ा ले।
तब सुन्दर अक्षतोंद्वारा प्रसन्नतापूवंक शंकरजीकी पूजा करे |
उनके ऊपर कुशः अपामागं) कपूरः चमेली, चम्पा गुलाव;
बेत कनेर, बेला; कमल ओर उत्पल आदि भॉति-मॉँतिके
आपू्व पुप्प एवं चन्दन आदि चढ़ाकर पूजा करे। परमेश्वर
शिवके ऊपर जलकी धारा गिरती रहे; इसकी भी व्यवस्था
करे | जलसे भरे भाँति-भाँतिके पात्रद्वारा महेश्वर्की नहलाये |
मन्त्रोचचारणपूवक पूजा करनी चाहिये । वह समस्त फरछोंको
देनेवाली होती है ।
तात | अब में तुम्हें समस्त मनोवाड्छित कामनाओंकी
सिद्धिके लिये उन पूजासम्बन्धी मन्त्रोंको भी संक्षेपले बता रहा हूँ;
सावधानीके साथ सुनो । पावमानमन्त्रसे; “वाडम्मे०? इत्यादि
मन्त्से, रद्रमन््त्र तथा नीलरुद्रमन्त्रसे; सुन्दर एवं शुभ पुरुष-
सृक्तसे; भ्रीसृक्तसे; सुन्दर अथवशीषके मन्त्रसे; 'आ नो भद्गा०?
इत्यादि शान्तिमन्त्रसे; शास्तिसम्बन्धी दुसरे मन्त्रोंसे, भारुण्डमन्त्र
और अरुणमन्त्रींसे, अर्थोभीष्टआम तथा देवव्रतसामसे, “अभि
: त्वा०? इत्यादि रथन्तरसामसे, पुरुषसूक्तसे, मृत्युंजयमन्त्रसे
तथा पश्चाक्षरमंन्त्रसे पूजा करे | एक सहल अथवा एक सो एक
जलधाराएँ: गिरानेकी व्यवस्था करे। यह सब वेदमागसे अथवा
नाममन्त्रोंसे करना चाहिये | तदनन्तर भगवान् शंकरके ऊपर
चन्दन और फ़ूछ आदि चढ़ाये। प्रणबसे ही मुखवास (ताम्बूल)
आदि अर्पित करे । इसके वाद जो स्फटिकमणिके समान
निर्मल, .निष्कल, अविनाशी, सर्वलोककारण, सर्वछोकमय
परमदेव हैं; जो ब्रह्मा3 रुद्र। इन्द्र ओर विष्णु आदि देवताओंकी
भी दृष्टिमें नहीं आते; वेदवेत्ता विद्वानोनि जिन्हें वेदान्तगें मन-
वाणीके अगोचर बताया है; जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित
तथा समस्त रोगियोंके लिये ओषघरूप हैं; जिनकी शिंवतत्त्के
नामसे ख्याति है तथा जो शिवलिझ्कके रूपमें प्रतिष्ठित हैं,
उन भगवान् शिवका शिवलिक्के मस्तकपर प्रणवमन्त्रसे ही
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र्डः घ
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4
/ नमो रुद्राय शान्ताये ब्रह्मण परमात्मने #
| संक्षिप्त-शिवपुराण;
पूजन करे | धूप) दीप) नेचेद्य) सुन्दर ताम्बूल एवं हुए
आरतीद्वारा यथोक्त विधिसे पूजा करके स्तोत्रों तथा अब
नाना प्रकारके मन्त्रेद्वारा उन्हें नमस्कार करे। फिर अब
देकर भगवानके चरणेमें फूल बिखर ओर साशड़ प्रात
करके देवेश्वर शिवकी आराधना करे। फिर हाथर्म फूल लेझ
खड़ा हो जाय और दोनों हाथ जोड़कर निम्नाड्लित मत्ते
सर्वेश्वर शंकरकी पुनः प्रार्थना करे---
अज्ञानाथदि. वा ज्ञानाजपपूजादिक मया।
कृत तदसत सफल कृपया तब दूांकर॥
“कल्याणकारी शिव | मैंने अनजानर्मे अथवा जान-बृद
जो जपयूजा आदि सत्कर्म किये हों) वे आपकी झइृ
सफल हों ।?
इस प्रकार पढ़कर भगवान् शिवक्रे ऊपर प्रसन्नता
फूल चढ़ाये। खस्तिवाचन करके नाना प्रकारकी आई
प्रार्थना करे । फिर शिवके ऊपर मार्जन करना चाहि
मार्जनके वाद नमस्कार करके आअपराधके लिये क्षमा
करते हुए पुनरागमनके लिये विसेजन करना चाहिये । ह?ः
बाद “अद्या? से आरम्म होनेवाले मन्त्रका उच्चारण
नमस्कार करे | फिर सम्पूर्ण भावसे विभोर हो इस क्र
प्रार्थना करे--
शिवे भक्तिः शिवे भक्ति? शिवे भक्ति्भवे मवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ॥
१. (3० खस्ति न इन्द्रो वृद्धअवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व
स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिषट्नेमि: खस्ति नो बृहस्पतिद॑पातु ॥' एव
स्वस्तिवाचनसम्बन्धी मन्त्र हें। २. «काले वर्षतु पर्जन्यः एके
शस्पशालिनी । देशोथयं क्षोभरहितों जाह्मणा: सन्तु निर्मया: ॥ फो*
सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि परक्लु
कश्चिद् दुःखभाग्मवेत् ॥? इत्यादि आश्ञीः-प्रार्थनाएँ हैँ । ३
आपो हि छामयोश्वुव:? ( यज्ञु० १६ ॥ ५०-०२ ) इत्यादि“
मार्जन-मन्त्र कहे गये हैं । इन्हें पढ़ते हुए इष्टदेवपर जल हि
भार्जए! कहलाता है । ४. अपराधसहस्राणि क्रियल्तेशर्ट
मया । तानि सर्वाणि में देव क्षमस्व परमेखवर ॥7 इत्यादि
ग्राथेनासम्बन्धी शोक हें । ७. प्यान्तु देवगणा: सर्व पूजाद्की
मामिकास् । अमीष्टफलदानाय पुनरागमनाय च ॥ इत्यादि किन
सम्बन्धी छोक हैं | ६. ४० अदा देवा उदिता सर्यख वि
पिष्ठता निरवद्यात् । तन्नो मित्रों बरुणो मामहन्तामदितिः 7६
पृथिवी उत थी; ॥? ( चजु० ३३ । ४२ )
रद्रसंदिता | # भंगवान् शिवकी श्रे्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवद्यकताका प्रतिपादूच # ९६३
_+७ऊ--०......+>े् जलन नल नी ली पयय नी नी नननी तननभी नी न न ननन्न्ी भी न न टी अच चअड डल्ड ऑऑिुिवलडच डी 5 > न डा ४४-५४ +++ 5
प्रत्येक जन्ममें मेरी शिवमें भक्ति हो, शिवमें भक्ति हो;
शिवमें भक्ति हो | शिवके सिवा दूसरा कोई मुझे शरण देने-
वाह्मय नहीं | महादेव ! आप ही मेरे लिये शरणदाता हैं ।?
इस प्रकार प्रार्थना करके सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता देवेश्वर
शिवका पराभक्तिके द्वारा पूजन करें | विशेषतः गलेकी
आवाजसे मगवानको संतुष्ट करे। फिर सपरिवार नमस्कार
करके अनुपम प्रसन्चताका अनुभव करते हुए समस्त लोकिक
कार्य मुखपूर्वक करता रहे ।
जो इस प्रकार शिवभक्तिपरायण हो प्रतिदिन पूजन
: करता है, उसे अवश्य ही पग-पंगपर सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त
....3........3भ७-2०-०५७०३७-५५७५७७७७७३७५५७७-४७५०५५३७० कला. 3७४७)५३७७३०७०३-५+५३५४७ ५४७०५ ५०७५४ + ४०७०३ ५५३पहथ॥ ७५५०५ +मह ५० भामह भा ७३३७ गम ७ पाया ॥ ४ नाइ8५४५३४६३ ४५०७४ ७५४०४७ ५ पदक ५ सावन इक ४३३८५ गन क् या; +५३७ ७ अर भकाक ५5५ &+ नाक ॒-++ पहन क नम रमक७4क-क99 ५ ++कमम श झ 9 आ्ा
मनन कसम क पहन“ पा. न्क “ट "जे.
होती है । वह उत्तम वक्ता होता है तथा उसे मनोवाड्छित
फलकी निश्चय ही प्राप्ति होती है | रोग दुःख, दूसरोंके निमित्तसे
होनेवाला उद्देग/ कुटिल्ता तथा विष आदिक्े रूपमें जो-जो
कष्ट उपस्थित होता है; उसे कल्याणकारी परम शझित्र अवश्य
नष्ट कर देते हैँ | उस उपासकका कल्याण होता है । भगवान्
शंकरकी पूजासे उसमें अवश्य सहुर्णोकी च्ृद्धि होती है--
ठीक उसी तरह, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं। मुनिश्रेषठ
नारद | इस प्रकार मैंने शिवकी पूजाका विधान बताया |
अब तुम क्या सुनना चाहते हो ! कौन-सा प्रश्न पूछनेवाले हो !
( अध्याय ११ )
भगवान् शिवकी श्रेष्ठठा तथा उनके पूजनकी अनिवायं आवश्यकताका ग्रतिपादन
नारदजी बोले--बरहान् | प्रजापते | आप पन्य हैं;
) वयोंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें छगी हुई है | विधे !
+ आप पुनः इसी विपयका सम्यक् प्रकारसे विस्तासपूर्वक वर्णन
कीजिये |
॥ . ब्रह्माजीने कहा---तात | एक समयकी वात है; में
"य ओरसे ऋषियों तथा देवताओंको बुलठ्मकर उन सबको
रिसागरके तटपर ले गया; जहाँ सबका हित-साधन
करनेवाले भगवान् विष्णु निवास करते हैं | वहाँ देवताओंके
पूछनेपर भगवान् विप्णुने सबके लिये शिवपूजनकी ही श्रेष्ठता
बतलाकर यह कहा कि “एक मुहूत या एक क्षण भी जो शिवका
पूजन नहीं किया जाता; वही हानि है; वही महान् छिद्र है;
वही अंधापन है और वही मूर्खता है। जो भगवान् शिचकी
भक्तिमें तत्पर हैं; जो मनसे उन्हींको प्रणाम ओर उन््हींका चिन्तन
करते हैँ; वें कभी दुःखके भागी नहों होते & | जो महान
सोभाग्यशाली पुरुष मनोहर भवन), सुन्दर आभूषण!से विभूषित
छ्नियाँ, जितनेसे मनको संतोष हो उतना धन) पुत्र-पीच्र आदि
संतति, आरोग्य) सुन्दर शरीर) अल्गेकिक प्रतिष्ठा, खर्गीय सुख;
अन्तमें मोक्षरूपी फल अथवा परमेश्वर शिवक्री भक्ति चाहते हूँ,
वे पू्वेजन्मेकि महान् पुण्यसे भगवान् सदाशिवकी पूजा-अर्चा्मे
प्रवृत्त होते हैं | जो पुरुष नित्य-भक्तिपरायण हो शिय्रलिद्गकी
पूजा करता है; उसको सफल छिद्धि प्राप्त द्वोती है तथा वह
पापोके चक्करमें नहीं पड़ता ।
भगवानके इस प्रकार उपदेश देनेपर देवताआने उन
श्रीहरिकों प्रणम किया ओर मनुर्प्योक्ती समस्त कामना र्थोकी
पूर्तिके लिये उनसे शिवलिड्ग देनेके लिये प्रार्थना की । मुनि-
श्रेष्ठ | उस ग्राथनाकी सुनकर जीवोके उद्घधारर्म तत्र रहमेयाले
भगवान् विष्णुने विश्वकर्माको ब॒ुत्यकर कहा--पविवकर्मत ! तुम
मेरी आजशसे सम्पूर्ण देवताओकोी सुन्दर शिवलिद्गता निर्मात
#ीो त्ौ हम कि
कि हक च् ठय ] उक्मांत हक जज कं यों शक्ल का डक घी
करदः दा | तन विश्वक ऊशरा आर शाहट्राका शरद
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भरहस्रथा दे चे हें ते दुधघाफज आमजन; ;
०७ ४४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमाव्यने 5: [ संक्षिप्त-शिवपुराण॥
अनुसार उन देवताओको उनके अधिकारके अनुसार शिवलिद्न
बनाकर दिये |
मुनिश्रेष्ठ नारद | किस देवताको कीन-सा शिवलिद्व प्राप्त
हुआ, इसका वर्णन आज में कर रहा हूँ? उसे सुनो | इन्द्र
पद्मयर॒ग मणिके बने हुए शिवलिड्गकी ओर कुबेर सुवर्णमय
लिज्नकी पूजा करते हैं | धमें पीतमणिमय ( पुखराजके बने
हुए ) लिज़्की तथा वरुण श्यामवर्णके शिवलिक्ञकी पूजा
करते हैं। भगवान् विष्णु इन्द्रनीलमय तथा ब्रह्मा हेममय
लिड्ल्की पूजा करते हैं । मुने | विश्वेदेवगण चॉदीके
शिवलिड्डकी, वसुगण पीतलके बने हुए! लिड्नकी तथा दोनों
अश्विनीकुमार पार्थिव लछिड्ऊकी पूजा करते हैं। लक्ष्मीदेवी
स्फटिकसय लिड्गकी, आदित्यगण ताम्रमथ लिड्डकी, राजा सोम
मोतीके बने हुए, लिज्ञकी तथा अग्निदेव वज्र ( हीरे ) के लिड्-
की उपासना करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण ओर उनकी पल्नियाँ मिट्टीके
बने हुए शिवलिड्रका, मयासुर चन्दननिर्मित लिज्ञका और
नागगण मूँगेके बने हुए शिवलिक्ञका आदरपूर्बक पूजन करते
हैं। देवी मक्खनके बने हुए. लिज्गकी। योगीजन भस्ममय
छिड्नकी, यक्षगण दधिनिर्मित लिक्नकी, छायादेवी आटेसे बनाये
हुए लिड्गककी ओर ब्रह्मपत्ञी रक्षमय शिवलिज्ञकी निश्चितरूपसे
पूजा करती हैं । बाणासुर पारद या पार्थिव छिक्नकी पूजा
करता है। दूसरे लोग भी ऐसा ही करते हैं। ऐसे-ऐसे शिवलिशक्ष
बनाकर विश्वकर्माने विभिन्न छोगोंको दिये तथा वे सब देवता और
ऋषि उन लिज्ञोंकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने इस
तरह देवताओंकोी उनके हितकी कामनासे शिवलिशझ्ज देकर उनसे
तथा मुझ ब्रह्मासे पिनाकपाणि महादेवके पूजनकी विधि भी
बतायी । पूजन-विधिसम्बन्धी उनके बचनोंकों सुनकर देव-
शिरोमणियोसहित में ब्रह्मा हृदयमें हे लिये अपने घाममें
आ गया । मुने | वहाँ आकर मैंने समस्त देवताओं और
ऋषियोंको शिवपूजाकी उत्तम विधि बतायी, जो सम्पूर्ण अभी
वस्तुओंको देनेबाली है ।
उस समय मुझ तब्रह्मानें कहा--देवताओंसहित
समस्त ऋषियों ! तुम प्रेमपरायण होकर सुनो; मैं प्रसन्नतापूर्वक
तुमसे शिवप्रूजनकी उस विधिका वर्णन करता हूँ; जो भोग
और मोक्ष देनेवाली है | देवताओं ओर मुनीश्वरो | समस्त
जन्ठुओम मनुष्य-जन्म प्राप्त करना प्रायः दुर्लभ है। उनमें भी
उत्तम कुलमें जन्म तो और भी दुलेभ है। उत्तम कुलमें भी
आचारवान् ब्राह्मणेकि यहाँ उत्पन्न होना उत्तम पुण्यसे ही सम्भव
है । यदि बेंसा जन्म सुलम हो जाय तो भगवान् शिवके संतोष-
के लिये उस उत्तम कमकरा अनुष्ठान करें, जो अपने वर्ण थो
आश्रमके लिये शास्रद्वारा प्रतिपादित है | जिस जातिके लि
जो कम बताया गया दे। उसका उछद्वन न करे। किक
सम्पत्ति हो, उसके अनुसार ही दान करे | कमेम्य से
यशंसि तपोयज्ञ बढ़कर दे । राहस्तों तपोयशोंसे जपयशका मत
अधिक है । ध्यानयशसे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है | था
शानका साभन द्ैे। क्योंकि योगी ध्यानके द्वारा अपने इक
समरस शिवका साक्षात्कार करता हैं |# ध्यानयज्ञ्म त
रहनेवाले उपासकके लिये भगवान, शित्र सदा ही संनित्ति |
जो विज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन पुरुषोंकी श॒द्धिके लिये £
प्रायश्रित्त आदिकी आवश्यकता नहीं दे |
मनुष्यको जबतक ज्ञानकी प्राप्ति न हो; तबतक वह |
दिलानेके लिये कमेसे ही भगवान् शिवकी आए
करे । जगतके लोगोंको एक ही परमात्मा 4
रुपोंमें अभिव्यक्त हो रह्म है | एकमात्र भगवान् सूर
स्थानमें रहकर भी जलाशय आदि विभिन्न वस्तुओोम भे
दीखते हैं | देवताओ । संसारमें जो-जो सत् या. असत्'
देखी या सुनी जाती है; वह सब परबरह्म शिवरूप ही है--
समझो | जबतक तत्वश्ञान न हो जाय; तबतक प्रतिमा
आवश्यक है। शानके अमावर्मे भी जो प्रतिमा-यूजाकी अब
करता है; उसका पतन निश्चित है | इसलिये ब्राह्मणो |
यथा बात सुनो । अपनी जातिके लिये जो कर्म बतावा'
है, उसका प्रयक्पृवक पालन करना चाहिये | जहाँ-जहाँ यष
भक्ति हो; उस-उस आराध्यदेवका पूजन आदि अवश्य $
चाहिये; क्योंकि पूजन ओर दान आदिके विना पातक
नहीं होते | जैसे मैंले कपड़ेमें रंग बहुत अच्छा:
चढ़ता है किंतु जब उसको घोकूर खच्छ कर लिया जाता
तब उसपर सब॒रंग अच्छी तरह चढ़ते हैं उसी #
देवताओंकी भलीमाँति पूजासे जब त्रिविध शरीर पूर्णतया हि
हो जाता है; तभी उसपर ज्ञानका रंग चढ़ता है ओर
विज्ञानका प्राकय्य होता है । जब विज्ञान हो जाता है '
3 के. जबकि मल मन 3 वीक वर जीफक नशा पदक न जद क कब आजम र मम श लक पलक जज कक न जक म कल
# ध्यानयश्ञात्परं नास्ति ध्यान शानस्य साधनम्।
यतः समरसं स्वेष्ट योगी ध्यानेन पर्यति॥
( शि० पु० रु० स॒० खं० ११ । ४
|यत्र यत्र. यथाभक्ति:ः क्षर्तव्य॑ पूजनादिकर्म |
विना पूजनदानादि पातक॑ न च दूर
(शिं० पु० रु० स॒० खंड ११ के
रुट्रसंहिता |
भेदभावकी निश्वत्ति हो जाती है। भेदकी सम्पूर्णतया निश्नत्ति हो
जानेपर हन्द्र-दुःख दूर हो जाते है ओर इन्द्र-दुःखसे रहित
पुरुष शिवरूप हो जाता है |
मनुष्य जबतक यगहस्थ-आश्रमर्म रहे, तबतक पॉँचों
देवताओंकी तथा उनमें श्रेष्ठ भगवान् शंकरकी प्रतिसाका उत्तम
प्रेमके साथ पूजन करे । अथवा जो सबके एकमात्र मृल ईं,
# शिच-पूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन $
९७
उन भगवान् शिवक्री ही पूजा सबसे बढ़कर है। क्योंकि मूलके
सींचे जानेपर शाखास्थानीय सम्पूर्ण देवता स्वतः ठप्त हो जाते
हैं। अतः जो सम्पूर्ण मनोद्राउ्छित फल्लोंकी पाना चाहता हैः
वह अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये समस्त प्राणियोंके हितमें
तत्यर रहकर लोककल्याणकारी मगवान शंकरका पूजन करे |
( अध्याय १२ )
का शिव-पूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
प्रह्मजी कहते है--अब्र मैं पूजाकी सर्वोत्तम विधि
बता रहा हूँ, जो समस्त अभीए तथा सु्खोकी सुलूम
करानेवाली है | देवताओं तथा ऋषियों | तुम ध्यान देकर
सुनो । उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्य मुहूत में शयनसे उठ-
कर जगदम्बा पावंतीसहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा
हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूवक उनसे प्रार्थना करें---
'देवेश्वर ! उठिये; उठिये ! मेरे हृदय-मन्दिरमें दायन करने-
'वाले देवता | उठिये। उम्राकान्त ! उठिये ओर ब्रह्माण्डमें
'सबका मल कीजिये। में घर्मको जानता हूँ, क्रिंठु मेरी
उसमें प्रवृत्ति नहीं होती | में अधर्मको जानता हूँ, परंतु मैं
(उससे दूर नहीं हो पाता । महादेव ! आप मेरे हृुदयमें
* खत होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वेसा ही मैं करता हूँ |
: इस प्रकार भक्तिपू्वक कहकर और गुरुदेवकी चरणपादुकाओं-
: का स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिण दिशामें मलमूत्रका त्याग
' करनेके लिये जाय | मल्त्यांग करनेके बाद मिट्टी और जलसे
' धोनेके द्वारा शरीरकी झुद्धि करके दोनों हाथों और पेरोंको
ं धो कर दतुअन करें; सूर्योदय होनेसे पहले ही दतुभन करके
मुटकोी सोलह बार जलकी अज्ललियोंसे धोये | देवताओं तथा
फषियों | पट्टी; प्रतिपदा, अमावास्या और नवमी तिथियों
तथा रविवारके दिन शिवभक्तकों यत्नपूर्वक दतुअनको त्याग
' देना चाहिये। अवकाशके अनुसार नदी आदिमें जाकर
अपदा घरमे ही भली-भोति स्नान करे | सनुष्यको देश और
पड विरुद्ध स्तान नहीं करना चाहिये ) रविवार, श्राद्ध)
' फैक्ान्ति, गहण, महादान) तीर्थ, उपवास-दिवस अथवा
आाीन्र प्राप्त होनेपर मनुष्य गरम जलसे स्नान न करे । शिव-
: ते भनृध्य तीर्थ आदियें प्रवाहके सम्मुख होकर स्नान करें |
; + गहनेद् पहले तेल रुगाना चाऐे, उसे विदित एवं निषिद्ध
क् बी विचार करते हो तेल्मम्यद्ग करना चाहिये। जो
5 ० लेयमएदेंद; तेल लगाता हो। उसके लिये किसी दिन
४ हैर्पट्र दूषित नहीं है अथवा जो तेल इच्च आदिसे
“० कह हक अन्न्नक के. न] कक
अंक मे, »
रा
९ झ $ हम क् हि
वासित हो; उसका लगाना किसी दिन भी दूपित : नहीं है ।
सरसोंका तेल अहणको छोड़कर दूसरे किसी दिन भी दूषित
नहीं होता | इस तरह देश; कारूका विचार करके ही विधि-
पूबक स्नान करे । स्नानके समय अपने मुखको उत्तर अथवा
पृवकी ओर रखना चाहिये ।
उच्छिए बस्तका उपयोग कभी न करे। झुद्ध वद्लसे
इष्टदेवके स्मरणपूर्यक स्नान करें | जिस वस्त्रकों दूसरेने घारण
किया हो अथवा जो दूसरोंके पहननेकी वस्तु हो तथा जिसे
खयं रातमें घारण किया गया हो, वह वस्त्र उच्छिष्ट कहलाता
है | उससे तभी स्नान किया जा सकता हैं जब उसे धो लिया
गया हो । स्नानके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरॉको
तृप्ति देनेवाल्ा स्मानाड् तपेण करना चाहिये। उसके बाद
घुला हुआ वस्त्र पहने ओर आचमन करे। द्विजोत्तमो !
तदनन्तर गीबर आदिसे लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध
स्थानमें जाकर वहाँ सुन्दर आसनकी व्यवस्था करे। बह
आसन विश्युद्ध काइ्का बना हुआ; पूरा फेला हुआ तथा
विचित्र होना चाहिये। ऐसा आसन स्खूणे अभीए तथा
फ्लेंकी देनेवाल्य है । उसके ऊपर बिछानेके लिये यथायोग्य
मृगचर्म आदि ग्रहण करें। शुद्ध-चुद्धिवाला पुरुष उस
आसनपर वबेंठवर भस्मसे तअ्रिपुण्ड़ रूगाये | त्रिषुण्ड्से जप-
तप तथा दान सफल होता है । भस्मक्के अभाव भिषुण्ड्का
साधन जल आदि बताया गया दे । इस तरद्द त्रिपुण्ड़ करके
मनुप्य रुद्राल धारण कर ओर अपने वित्यक्रमंका सम्पादन
करके फिर शिवक्री आयधना करे | तटश्वात् तीन यार
मन्त्रोच्चारणपृ्थंक आचमन करे | फिर वहाँ शिवक्की प्रजा-
के लिये अन्न और हल लाकर रकव | दूसरी कोई भी जो
वस्तु आवश्यक हो; उसे बथादाक्ति जुटाकर अयने पास सके
इस प्रकार पृजन-सामग्रीका संग्रह करके दर्टों भे्॑प्रयेक
भादते अप ह कट वी र्र कएटड० अंमएर- यो (एम ०4 का हनी <7 पी ल्टायय अं जकुच००-एा. एच कक हा
बस बंद पट हल: गन्वय ऋर आइतमस या एवॉोा आमया-
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पान १ रह जु. हुक । क्यू 4 55 जी हि है| की | हि क्््ज् $ जा का्ज काका बह हि ज्क् ॥॥ || कं द। | और न्कनय
अनुसार उन देवताओकी उनके अधिकारके अनुसार शिवलिद्ञ
बनाकर दिये ।
सुनिश्रेष्ठ नारद ! किस देवताकोी कीन-सा शिवलिद्ग प्राप्त
हुआ इसका वर्णन आज मैं कर रहा हूँ; उसे सुनो । इन्द्र
पद्मरग मणिके बने हुए शिवलिज्ञकी ओर कुबेर सुबर्णमय
लिड्ककी पूजा करते हैं | धरम पीतमणिमय ( पुखराजके बने
हुए ) लिड्रकी तथा वरुण इश्यामवर्णके शिवलिज्गकी पूजा
करते हैं | भगवान् विष्णु इन्द्रनील्मय तथा ब्रह्मा हेममय
लिद्रकी पूजा करते हैं | सुने ! विश्वेदेवगण चॉँदीके
शिवलिज्गकी। वसुगण पीतलूके बने हुए छिह्लकी तथा दोनों
अश्विनीकुमार पार्थिव लिज्नकी पूजा करते हैं। लक्ष्मीदेवी
स्फटिकमय लिड्गकी। आदित्यगण ताप्रमय लिड्डकी, राजा सोम
मोतीके बने हुए लिज्ञकी तथा अग्निदेव वज्र ( हीरे ) के लिज्-
की उपासना करते हैं। श्रेष्ठ ब्राहण ओर उनकी पल्नियाँ मिद्टीके
बने हुए शिवलिक्लका) मयासुर चन्दननिर्मित लिज्नका और
नांगगण मूँगेके बने हुए. शिवलिज्ञका आदरपूर्बक पूजन करते
हैं। देवी मक्खनके बने हुए. लिज्ककी। योगीजन भस्ममय
छिद्ढकी। यक्षगण द्िनिमित लिक्गलकी; छायादेवी आटेसे बनाये
हुए लिड्रकी और ब्ह्मपत्नी रक्षमय शिवलिज्ञकी निश्चितरूपसे
पूजा करती हैं | बाणासुर पारद या पार्थिव लिक्गकी पूजा
करता है। दूसरे लोग भी ऐसा ही करते हैं। ऐसे-ऐसे शिवलिझ्ञ
बनाकर विश्वकर्माने विभिन्न छोगोंको दिये तथा वे सब देवता ओर
ऋषि उन लिजझ्ञोंकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने इस
तरह देवताओंको उनके हितकी कामनासे शिवलिड़् देकर उनसे
तथा सुझ ब्रह्मासे पिनाकपाणि महादेवके पूजनकी विधि भी
बतोयी | पूजन-विधिसम्बन्धी उनके बचनोंकों सुनकर देव-
शिरोमणियोॉसहित मैं ब्रह्मा हृदयमें हर्ष लिये अपने धाममें
आ गया । मुने ! वहाँ आकर मैंने समस्त देवताओं ओर
ऋषियोकी शिवपूजाकी उत्तम विधि बतायी, जो सम्यू्ण अमीष्ट
वस्तुओंको देनेवाली है |
उस समय असुझ ब्रह्माने कहा--देवताओंसहित
समस्त ऋषियों ! ठुम प्रेमपरायण होकर सुने; मैं प्रसन्नतापूर्वक
तुमसे शिवपूजनकी उस विधिका वर्णन करता हूँ, जो भोग
ओर मोक्ष देनेवाली है | देवताओो ओर मुनीश्वरो | समस्त
जन्तुओंमें मनुष्य-जन्म प्राप्त करना प्रायः दुर्लभ है। उनमें भी
उत्तम कुलमें जन्म तो और भी दुर्लभ है। उत्तम कुलमें भी
आचाखानू ब्राह्मणोंके यहाँ उत्पन्न होना उत्तम पुण्यसे ही सम्भव
है । यदि बैसा जन्म सुलूम हो जाय तो भगवान् शिवके संतोष-
४ नमो रुद्राय शास्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ४
ममकामउम्कम्कामएमकमकमफकम्फंग्फग्कमकम्कप्कपकम्कम्फप्कामकम कम कप कम्का न कृपा कपकम कक मका ३ भककककयमकाकाकक ३३ मक्का कम कक कभभककाक कक कंकाल आा पता...
एंकर ऑनंणणं जंग 9७४ की“ काका कथा ला ८2४५ मा ७००७७७ ७ वध ांमणमाााा%थाकंाथ आवाज आल कं; कक 2३.5 किक कलाइस
विज्ञानका प्राकथ्य होता है | जब विज्ञान हो जाता है
मिलन लक मलिक लगन मर जे अक लल का के +परिि पल परत आ कह की कप पलक डक.
[ संक्षिप्त-शिवपुराण॥$
हप
2४ ७0/0७४/थ४४७७७७७४७७७७७७७७७४७७॥७/४७४॥एएए"रशश/श//॥//श/श/श/श///श/शशा#॥॥॥ामाआजरंजकआ आज» पे मका कान
के लिये उस उत्तम कर्मका अनुष्ठान करें) जो अपने वर्ण ओ!
आश्रमके लिये शाम्त्रेद्दारा प्रतिपादित है | जिस जातिक़े स्ि
जो कर्म बताया गया है; उसका उलड्डन न करे। स्की
सम्पत्ति हो; उसके अनुसार ही दान करें| कर्ममय सह
यशॉसि तपोयश बढ़कर है। सहस्नों तमोयशेंसि जपयशञका मह
अधिक है । ध्यानयश्से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है | घा
शानका साभन है। क्योंकि योगी ध्यानके द्वारा अपने झक्े
समरस शिवका साक्षात्कार करता है ।# ध्यानयशम तक
रहनेवाले उपासकके लिये भगवान् शित्र सदा ही संनिद् ६
जो विज्ञानसे सम्पन्न हैं) उन पुरुषोंकी झद्धिके लिये ड़
प्रायश्रित्त आदिकी आवश्यकता नहीं है |
मनुष्यकी जबतक शानकी प्राप्ति न हो; तबतक वह किए
दिलानेके लिये कर्मसे ही भगवान् शिवकरी आए
करे । जगतके लोगोंको एक ही परमात्मा भरे
रूपोमें अभिव्यक्त हो रहा है | एकमात्र भगवान् सूर्य
स्थानमें रहकर भी जलाशय आदि विभिन्न वस्तुर्भेमि थे
दीखते हैं | देवताओं । संसारमें जो-जो सत् या अस्त ऋ
देखी या सुनी जाती है, वह सब परब्रह्म शिवरूप ही है-
समझो । जबतक तत्त्वज्ञान न हो जाय; तबतंक प्रतिमाती
आवश्यक है। शानके अभावमें भी जो प्रतिमा-पूजाकी अरे"
करता है; उसका पतन निश्चित है | इसलिये ब्राह्मणे [||
यथार्थ बात सुनो | अपनी जातिके लिये जो कर्म बताया#|
है, उसका प्रय्पू्वक पालन करना चाहिये | जहॉ-जहाँ गए!
भक्ति हो; उस-उस आराध्यदेवका पूजन आदि अब ऋ
चाहिये। क्योंकि पूजन और दान आदिके विना पाती
नहीं होते ।' जैसे मेले कपड़ेमें रंग वहुत अच्छा #|
चढ़ता है किंतु जब उसको धोकूर खच्छ कर लिया जाती
तब उसपर सब॒रंग अच्छी तरह चढ़ते दे) उसी #
देवताओंकी मलीभाति पूजासे जब त्रिविध शरीर पूर्णतया हि
हो जाता है, तभी उसपर ज्ञानका रंग चढ़ता है ओए
# ध्यानयज्ञात्पं नास्ति ध्यान शानस्यथय साधन ।
यतः समरसं स्वेष्ट योगी ध्यानेन पर्थति॥ ;
( शि० पु० रु० स० खं० १२।४ “
यथामक्तिः. कर्त॑न्य॑. पूजनादिकर। ,
पूजनदानादि पातक॑ न च इक
(शि० पु० रु० स० खंढ ११९
यत्र यत्र
विना
रुट्रलंहिता |
क्विज जि चित चल चित" ४+/४/“/“४४““*“““““/““// 77
भेदमावकी निम्ृत्ति हो जाती है। भेदकी सम्यू्णतया निद्वत्ति हो
जानेपर इन्द्र-दुःख दर हो जाते ह और इन्द्र-डुःखसे रहित
पुरप शिवरूप हो जाता है |
मनृप्य जबतक ग्रहख-भआश्रमर्म रहे; तबतक पॉचों
देवताओंकी तथा उनमें श्रेष्ठ भगवान् शंकरकी प्रतिमाका उत्तम
प्रेमके साथ पूजन करे । अथवा जो सबके एकमात्र मूल हैं,
# शिव-पूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन #
हे
आ...................... सन ननननककनकनन-पनन+3-५५ नमन नीम कनम न मनन र ध७-ननननननन-मनक- कक नमन तनमन मन अभिशाप अफ््र्य्यरयावयम्न्््ञ+ राम ७आाााआओं
उन भगवान शिवकी ही प्रजा सबसे बढ़कर है; वयोकि मुलके
सींचे जानेपर झाखास्थानीय सम्पूर्ण देवता खतः वृत्त हो जाते
है | अतः जो सम्यृर्ण मनोब्राश्छित फलोंको पाना चाहता है?
बह अपने अभीष्ठकी सिद्धिके लिय्रे समस्त प्राणियोंके हितमें
तत्पर रूकर लोककल्याणकारी मगवान शंकरका पूजन करे |
( अध्याय १२ )
शिव-पूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
प्रह्माजी कहते हैं--अब में पूजाकी सर्वोत्तम विधि
; बता रहा हूँ; जो समस्त अभीष तथा सुखोंको सुलुम
करानेवाली है । देवताओं तथा ऋषियों | तुम ध्यान देकर
उुनो | उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्म सुद्दृत मं शयनसे उठ-
* कर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा
+थ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूवेक उनसे प्रार्थना करें--
देवेश्वर | उठिये; उठिये | मेरे हृदय-मन्दिरमें शयन करने-
ले देवता ) उठिये। उमाकान्त | उठिये और ब्रह्माण्डमें
बिका मल कीजिये। में धम्को जानता हूँ; किंतु मेरी
समें प्रवृत्ति नहीं होती | में अधरमको जानता हैँ; परंतु मैं
से दूर नहीं हो पाता । महादेव | आप मेरे हृदयमें
खत होकर मुझे जैसी प्ेरणा देते हैं, वेसा ही मैं करता हूँ (?
[प्रकार भक्तिपूवेक कहकर और गुरुदेवकी चरणपादुकाओं-
मे सारण करके गॉवसे बाहर दक्षिण दिशामें मलमूत्रका त्याग
ररनेके लिये जाय | मलत्याग करनेके बाद मिट्टी और जलूसे
पनेक द्वार शरीरकी शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरोंको
पोकर दतुअन करें; सूर्योदय होनेसे पहले ही दतुभन करके
भुएवते सोलह बार जलकी अज्जलियोंसे धोये | देवताओं तथा
क्रपियों | पष्ठी, प्रतिपदा, अमावास्या और नवमी तिथियों
तथा रविवारके दिन शिवभक्तकों यत्मपूर्वक दतुअनकों द्याग
ऐना चाहिये। अवकाशके अनुसार नदी आदिम जाकर
सदा घरम ही भढी-माँति स्नान करे। सनुप्यको देश और
पलक विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये | रविवार श्राद्ध
एकरान्ति, ग्रहण, महादान तीर्थ, उपबास-दिवस अथवा
आन प्रा ऐनेपर मनुष्य गरम जल्से स्नान न करे | शिव-
भेद भनुष तीर्थ आदियें प्रवाहके सम्मुख होकर स्वान करे |
जे गएने्रे पके तेल लगाना चाहे; उसे विटित एवं निषिद्ध
दियोगा पिच्वार बसे हो तंलाभ्यदड् करना चाह्यि।जो
'पिएन नियमपृदेक मेल लगाता ऐ) उसके लिये किसी दिन
ते नहीं है अथवा जो तेल इच्च आदिसे
0] हम न् है.
६ एतल्मण
बासित हो, उसका लगाना किसी दिन भी दूषित ' नहीं है ।
सरसोंका तेल अहणको छोड़कर दूसरे किसी दिन भी दूषित
नहीं होता | इस तरह देश; कालका विचार करके ही विधि-
पूवक् स्वान करे | स्नानके समय अपने सुखको उत्तर अथवा
पूवंकी ओर रखना चाहिये |
उच्छिए बस्लका उपयोग कभी न करे | शुद्ध वद्से
इष्टदेवके स्मरणपूर्वक स्नान करें | जिस वस्त्रकों दूसरेने धारण
किया हो अथवा जो दूसरॉके पहननेकी वस्तु हो तथा भिसे
खय॑ रातमें घारण क्रिया गया हो; वह वस्र उच्छिण कहलाता
है | उससे तभी स्नान किया जा सकता है, जत्र उसे घो लिया
गया हो । स्नानके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितर्रोको
तृप्ति देनेचाला स््नानाज़् तपण करना चाहिये | उसके बाद
घुला हुआ वच्च पहने ओर आचमन करे | हविजोत्तमो !
तदनन्तर गोबर आदिसे लीप-पोतकर खब्छ किये हुए श॒द्ध
स्थानम जाकर वहाँ सुन्दर आसनकी व्यवस्था करें। वह
आसन विश्वद्ध काइका बना हुआ; पूरा फैला हुआ तथा
विचित्र होना चाहिये। ऐसा आसन सघूर्ण अभी तथा
फलको देनेत्रात्य € । उसके ऊपर बिछानेक्रे .छिये यथायोग्य
मृगचम आदि ग्रहण करें। शुद्ध-बुद्धियाता पुरुष उस
आसनपर बेंठकर भस्मसे चिपुण्ड़ छूगाय । भिषण्ड्से जप-
तप तथा दाम सपझछ होता हैं। भत्सक्के असावमें त्रिपण्ट्रका
साधन जल आदि बताया गया ह | इस तहर्द त्रिपण्ड करके
मनुप्य रुट्राल घारण करे ओर अगउने नितल्चकमफा समग्पादन
करके फिर शझिवक्की आराधना करें । तत्यश्राव तीन बार
मन्त्रोद्चारणपूचक आचमन करे । सिर बढ़ा शिवकी पृज्ा-
कर य ८ 5
के लिये अन्न ओर हल लाझर रकथ | दुसरी छोड भी जो
बल आवश्यक हा) उसे बधाराक्ि जटाकर अपने पास रस |
इस मकार एजेनसामशदा संग्रह करके दीं थगपदक म्पिर
ढो
भादसे बट | कर जल, गन्प धर अपमानन युक्त एक अध्य
पानज्न तलूयार हइफना तहस शान र्ाम्ड | डख्स इपचारणा फ््लट
०
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने १
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा्
*3ेअ8.-3५ 4ापूदा-त. सानग्यामाकी, ७-६. >- का अपमान. परीननओन 3 अननयीओ... ८ पाकर गूके: “भा आनन #म्माहान-फ इनाम, कया. गा. धआक-यारनग-म-ए-मा मा.
होती है। फिर गुरुका स्मरण करके उनकी आशा लेकर
विधिवत् संकल्प करके अपनी कामनाको अलग न रखते
हुए पराभक्तिसे सपरिवार शिवका पूजन करे | एक मुद्रा
दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारोंद्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित विश्न-
हारी गणेशका पूजन करे | लक्ष ओर छाभसे युक्त गणेशजीका
पूजन करके उनके नामके आदियमें प्रणव तथा अन्तमें नमः
जोड़कर नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए नमस्कार
करें | ( यथा---32 गणपतये नमः अथवा 3“ लक्षल्वभयुताय
सिद्धि-बुद्धिसहिताय गणपतये नमः ) तदनन्तर उनसे क्षमा-
प्राथेना करके पुनः भाई कार्तिकेयसहित गणेशजीका पराभक्ति-
से पूजन करके उन्हें बारंबार नमस्कार करे | तत्पश्चात् सदा
द्वारपर खड़े रहनेवाले द्वारपाल महोदयका पूजन करके सती-
साध्वी गिरिशाजनन्दिनी उम्ाकी पूजा करे। चन्दन, कुछुम
तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों तथा नाना प्रकारके
नेवेद्योतें शिवाका पूजन करके नमस्कार करनेके पश्चात्
साधक शिवजीके समीप जाय | यथासम्भव अपने घरमें
मिट्टी, सोना; चांदी, धातु या अन्य पारे आदिकी शिव-प्रतिमा
बनाये ओर उसे नमस्कार करके भक्तिपरायण हो उसकी
पूजा करे | उसकी पूजा हो जानेपर सभी देवता पूजित हो
जाते हैं ।
मिद्दीका शिवलिज्ञ बताकर विधिपूवंक उसकी स्थापना
करे | अपने घरमें रहनेवाले लोगोंको स्थापनासम्बन्धी सभी
नियमोंका सर्वेथा पाठन करना चाहिये । भूतशुद्धि एवं
मात॒कान्यास करके प्राणप्रतिष्ठा करे | शिवाल्यमें दिक्पालों-
की भी स्थापना करके उनकी पूजा करे | घरमें सदा मूलमन्त्र-
का प्रयोग करके शिवकी पूजा करनी चाहिये । वहाँ द्वारपालों-
के पूजनका सर्वथा नियम नहीं है। भगवान् शिवके
समीप ही अपने लिये आसनकी व्यवस्था करे | उस समय
उत्तराभिमुख बैठकर फिर आचमन करे) उसके बाद दोनों
हाथ जोड़कर तब प्राणायाम करे। प्राणायामकालमें सनुष्यको
मूलमन्त्रकी दस आइवत्तियाँ करनी चाहिये | हाथोंसे पाँच मुद्राएँ
दिखाये | यह पूजाका -आवशच्यक अज्ज है। इन मुद्राओंका
प्रदशन करके ही मनुष्य पूजा-विधिका अनुसरण करे |
तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरुको नमस्कार करे और
पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बेठे अथवा उत्तानासन या
पर्यक्ासनका आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे ओर पुनः पूजनका
प्रयोग करे | फिर अव्यंपात्रसे उत्तम शिवलिड्का प्रक्षालन
करे | मनको भगवान् शिवसे अन्यत्र ने ले जाकर पूत्न
सामग्रीक। अपने पास रखकर निम्नाक्लित मन्त्रसमृहसे महत्लेः
जीका आवाहन करे |
आवाहन
केलासशिखरणस्थ च पार्व॑तीपतिमुत्तमम् ॥ ४१॥
यथोक्तरूपिणं शम्भुं निर्मुणं गुणरूपिणम् ।
पञ्नवकक््त्र दशओुज त्ििनेत्र वृषभध्वजम ॥ ४८
कर्परगौर॑ दिव्याह्ु चन्द्रमोलिः. कपर्दिनम ।
व्याप्रचमेत्तरीय च गजचमौम्बर॑ शुभम ॥ ४९
वासुक्यादिपरीताडुं.. पिनाकाद्ायुधान्वितम् |
सिद्धयोडष्टो च यस्थाग्रे नृत्यन्तीह निरन्तरम,॥ ५५
जयजयेति शब्देश्व सेवित॑ भक्तपुक्षकेः ।
तेजसा दुस्सहेनेव दुर्लक्ष्य देवसेवितम ॥ ५।
शरण्यं सर्वंसक्तानां प्रसन्नमुखपह्कजस ।
वेदेः शाख्रेयथागीतं॑ विष्णुब्ह्मनुत्त॑ सदा ॥ १
भक्तवत्सलमानन्द॑ शिवमावाहयाम्यहम् ।
( अध्याव (१
“जो केलासके शिखर॒पर निवास करते हैं, पा६व॑तीकें
पति हैं, समस्त देवतांसे उत्तम हैं; जिनके स्वरूपका शाह
यथावत् वर्णन क्रिया गया है; जो निर्गुण होते हुए +
गुणरूप हैं, जिनके पॉच मुख; दस भुजाएँ और प्रत्येक ए7
मण्डल्में तीन-तीन नेत्र हैं; जिनकी ध्वजापर बषभक्का #िं
अड्जित है; अज्ञकान्ति क्पूरके समान गौर है। जो दिया
धारी; चन्द्रमारूपी मुकुटसे सुशोभित तथा सिरपर जर्मई
धारण करनेवाले हैँ, जो हथीकी खाल पहनते ओर व्याक्
ओढ़ते हैं, जिनका ख्रूप शुभ है; जिनके अज्जामें वह
आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध ५
करते हैं; जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर दृत्म ई#
रहती हैं; भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी हैं
लगे रहते हैं, दुस्सह तेजके कारण जिनकी ओर देखता”
कठिन है; जो देवताओंसे सेवित तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी *'
देनेवाले हैं, जिनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ ।
वेदों ओर शार्त्रेने जिनकी महिसमाका यथावत् गान किया !
विष्णु ओर ब्रह्मा भी सदा जिनकी स्ठुति करते हैं तर्ष
परमामन्दस्व॒रूप हैं, उन भक्तवत्सल शम्मु शिवका में ॥१९ :
करता हूँ |?
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इस प्रकार साम्ब शिवका ध्यान करके उनके लिये आसन
। चतुथ्येन्त पदसे ही क्रमशः सब कुछ अर्पित करे ( यथा-
म्बाय सदाशियाय नमः आसने समपेंयामि--इत्यादि )।
ग़सनके पश्चात् भगवान् शंकरको पाथ ओर अध्ये॑ दे । फिर
रमाप्मा शम्मुको आचमन कराकर पश्चामृतसस्वन्धी द्व्व्यों-
शरण प्रसन्नतायूवक शंकरको स्नान कराये । वेदमन्नी अथवा
'मन्धक चवुध्यन्त मामपर्दाका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक
पथायोग्य समस्त द्रव्य भगवानकोी अर्पित करे । अभी९श
धरव्यको शंफरदे ऊपर चदाये । फिर भगवान् शिवको
गस्फश्नान कराये | स्नानके पश्चात् उनके श्रीअज्जोंमें
गन्पित चन्दन तथा अन्य द्रव्योंका यल्लपूवंक लेप करे । फिर
उमन्षित जजसे ही उनके ऊपर जल्घारा गिरकर अभिषेक
९] बेदमस्नो, पड़झ्ों अथवा शिवके ग्यारद नार्मोद्वारा
आपदा जरुबारा चदाकर बरसे शिवलिज्नको अच्छी तरह
८४7६३ । (एप जारगना
श्ः धर का २
जपचमनाप॑ जल दे ओर वस्त्र समपित वारे। माना
हिपार ६
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2४८ धन्यद्राण गगदान् शिवझो तिल, जो; गेहें। मँग और
आह ओ 6 उतर ता विक: ब्चाले परमात्मा सु जियो
दा मत 35 ॥। कर पाँच झुजचाले परमात्मा शिवयो
ऐप रु 2 १९ | एस कब ० ॥ पससार शा न मु न्दक लक
गज आह दल तप जे हक 5
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परामक्तिके साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी विशेष पूजा
करे | अन्य सब वस्तुओंका अमाव होनेपर *शिवको केवल
बिल्वपत्र ही अर्पित करे । विल्वपत्र समर्पित होनेसे ही शिवक्रो
पूजा सफल होती है | तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा सुवासित
उत्तम तेल ( इच्च आदि ) विविध वस्तुएँ बड़े हपके साथ
भगवान् शिवको अर्पित करे। फिर प्रसन्नतापूर्वक गुग्युल ओर
अगुर आदिकी धूप निवेदन करे । तदनन्तर शंकरजीको धीसे
बरा हुआ दीपक दे । इसके वाद निम्नाज्लित मनन््त्रसे भक्ति-
पूर्वक पुनः अर्थ दे ओर भावभक्तिसे बल्नद्धारा उनके मुखका
माजन करे |
अध्यमन्त्
रूप देहि यशों देहिं भोगं देहि च शंकर ।
भुक्तिसुक्तिफर्ल देहि भशृहीत्वाध्य नमोस्तु ते ॥
धप्रभो | शंकर | आपको नमस्कार है । आप इस अच्यको
स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, भोग दीजिये
तथा भोग ओर मोक्षरूपी फल प्रदान कीजिये |?
इसके बाद भगवान् शिवको भांति-भातिके उत्तम नेवेद्य
अर्पित करे | नेवेच्के पश्चात् प्रेमपूर्वक्ष आचमन कराये ।
तदनन्तर साज्नीपाज्न ताम्बूल बनाकर शिवको समर्पित करे ।
फिर पॉच बत्तीकी आरती बनाकर भगवानको दिखाये | उसकी
संख्या इस प्रकार हे--पे रोम चार बार; नाभिमण्डलके सामने
दो बार, मुखके समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण अद्ञोंमं सात बार
आरती दिखाये । तलश्वात् नाना प्रकारके स्तोन्नेद्वारा प्रेमपूर्वक
भगवान् इषभध्यजकी स्तुति करे | तदनन्तर धीरे-धीरे शिवकी
परिक्रमा करे | परिक्रमाके वाद भक्त पुरुष साशष्टाद्ग प्रणाम
करे और निम्नाष्टित मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पृष्पान्चलि दे---
पुप्पाश्लिमन्त
अज्ञानायद्दि था शज्वानाधशयत्पूजादिक
ऊृत॑ तदस्तु सफल छृपया
तावकस्त्वड्डतप्राणस्वच्षित्तों 5३
मया ।
तब शंकर ॥
सदा मठ ।
टूति विज्ञाय. गारीश भूतनाथ प्रसीद में ॥
भूमोी स्खलितपादानां समिरेदावल्स्थनम् |
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लॉ प्रा: #$| का यान. घ् शरण ञ्पे
त्वांय जॉतापराधान्र प“्ज्ा्ण शधर पका ||
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गरदंक कर च्ू कआषताओत पाए त्ः अयच मा 2० ता अध्आी शक प्र ६ का "कली 5 रे
६: का आय हो साइन हिस ह४ ए९ सह चर खुदा ऋ,:
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पैर लछड़खड़ा जाते हैं, उनके लिये भूमि ही सहारा है। उसी
प्रकार जिन्होंने आपके प्रति अपराध किये हैं; उनके लिये भी
आप ही शरणदाता हैं ।?
--ड त्यादि रूपसे बहुत-बहुत प्रार्थना करके उत्तम विधिसे
पुष्पान्नलि अर्पित करनेके पश्चात् पुनः भगवानको नमस्कार
करे । फिर निम्नाझ्लित मन््त्रसे विसजन करना चाहिये |
विसजन
स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभोी ।
पूजाकाले. पुननोथ त्वया55गन्तव्यमादरात् ॥
४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मत्ते ££
वालरदााापपााधवकरांदपमाप कर्म उकाउपदरअाइर+ अपना पाप ब+ पक भर॒>इात॒परालकुना पाप ट 4 ए2घममुयकरात जाए अरब का बह बा करापथा परस्पर कतडपवाथ० तहत भसबरघ कर: सदर करा भाप ना कर; थयपफ्कएलएउ उमा एक जय अउ मम अकबर सार आक ता एुरााााराअउालपापता॑ध पाएं हम बम का मकफन्य कप तत्पर; पद रकरयारप सतह.
तक
| संक्षिप्त-शिवपुराण;
'देवेश्वर प्रभो | अब आप परिवारसहित अपने खाक
पधारे | नाथ ! जब पूजाका समय हो; तब पुनः आप यहाँ सह
पदाप॑ण करें |?
इस प्रकार भक्तवत्सल शंकरकी वारंबार प्रार्थना कटे
उनका विसजेन करे और उस जलको अपने हुदयमें छात्र
तथा मस्तकपर चढ़ाये | ।
ऋषियों | इस तरह मेने शिवपूजनकी सारी विधि व
दी; जो भोग ओर मोक्ष देनेवाली है | अब ओर क्या छु
चढहते हो ! ( अघ्याव ११
“-++-“५-<2<-&---4-*+-*
विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य
बत्रह्माजी बोले--नारद | जो लक्ष्मीप्राप्तिैकी इच्छा
करता हो; वह कमल) बिल्वपतन्र, शतपत्र ओर शर्डपुष्पसे
भगवान् शिवकी पूजा करे । ब्रह्मन् | यदि एक छलाखकी
संख्यामें इन पुष्पोद्दार भगवान् शिवकी पूजा सम्पन्न हो जाय
तो सारे पापोंका नाश होता है ओर लक्ष्मीकी भी प्राप्ति
हो जाती है; इसमें संशय नहीं है । प्राचीन पुरुषोंने बीस
कमलोंका एक प्रस्थ बताया है । एक सहस््त बिल्वपन्रोंको
भी एक प्रस्थ कहा गया है। एक सहस््र शतपत्रसे आधे प्रस्थकी
परिभाषा की गयी है। सोलह पलोंका एक प्रस्थ होता है
और दस ट्छोंका एक पल । इसी सानसे पत्र) पुष्प आदिको
तौलना चाहिये । जब पूर्वोक्त संख्यावाले पुष्पोंसे शिवकी
पूजा हो जाती है; तब सकाम पुरुष अपने सम्पूण अभीष्ट-
को प्राप्त कर लेता है । यदि उपासकके मनमें कोई कामना
न हो तो वह पूर्वोक्त पूजनसे शिवस्वरूप हो जाता है ।
मृत्युक्षय मन््त्रका जब पाँच लाख जप पूरा हो जाता है;
तब॒ भगवान शिव प्रत्यक्ष दशन देते हैं। एक छाखके
जपसे शरीरकी शुद्धि होती है; दुसरे छाखके जपसे पूर्व॑जन्मकी
बावोंका स्मरण होता है; तीसरा छाख पूर्ण होनेपर सम्पूर्ण
काम्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं | चोये छाखका जप होनेपर स्वममें
मगवान शिवका दर्शन होता है और पाँचवें छाखका
जप चयों ही पूरा होता है; भगवान् शिव उपासकके सम्मुख
तत्काल प्रकग हो जाते हैं | इसी मन्त्रका दस लाख जप हो
जाय तो सम्यूण फलकी सिद्धि होती हैं। जो मोक्षकी अमिलाषा
रखता है; वह ( एक लाख ) दर्भोद्वारा शिवका पूजन करे ।
मुनिश्रेष्ठ || सत्र छाखकी ही संख्या समझनी चाहिये | आयुकी
इच्छावाला पुरुष एक छाख दूर्वाओंद्वारा पूजन के
जिसे पुत्रकी अभिलाषा हो; वह धव्रेके एक लाख पूरे
पूजा करें | छाल डंठलवाला धतूरा पूजनमें झुमदायक् एर
गया है । अगस्त्वके एक लाख फूलोंसे पूजा करे
पुरुषको महान् यशकी प्राप्ति होती है | यदि तुल्सीछ
शिवकी पूजा करे तो उपासककी भोग ओर सो दोनों हु
होते हैं। छाल ओर सफेद आक) अपामार्ग और हे
कमलके एक लाख फूल्ोंद्वारा पूजा करनेसे भी उसी 9
( मोग ओर मोक्ष ) की प्राप्ति होती है। जपा ( ऑड्हुल )
एक लछाख फूछोसे की हुईं पूजा शन्नुओंको मृत्यु देनेग5
होती है । करवीरके एक लाख फूछ यदि शिवपूतक
उपयोगमें छाये जाये तो वे यहाँ रोगोंका उच्चाठन ै
होते हैं । बन्घूक ( दुपहरिया ) के फूलोंद्वारा पूजन के
आशभूषणकी प्राप्ति होती है | चमेलीसे शिवकी पूजा कीं
मनुष्य वाहनोंकी उपलब्ध करता है, इसमें संशय नहीं ६
अल्सीके फूलोंसे महादेवजीका पूजन करनेवाल्य पुरुष भर्क
विष्णुको प्रिय होता है। शमीपन्नोंसे पूजा करके मनुष्य
प्रात्त कर लेता है। बेलाके फूल चढ़ानेपर भगवाद *
अत्यन्त झुमरक्षणा पक्षी प्रदान करते हैं | जूहोके फूलेंते
की जाय तो घरमें कमी अन्नकी कमी नहीं होती |
फूलोंसे पूजा करनेपर मनुष्योको बस्त्रकी प्राप्ति होती
सेदुआरि या शेफालिकाके फूछोंसे शिवका पूजन किया:
तो मन निर्मल होता है | एक छाख विल्वपत्र चढ्ी
मनुष्य अपनी सारी काम्य वस्तुएँ प्राप्त कर छेता है |
हार (हरसिंगार)के फूलोंसे पूजा करनेपर सुख सम्पत्तिकी इंडिर्
-+ वि७ पान 33 हा अत विभनन-ीभानीता-नपनमममम>त»भमभम ८ 3५4५>+-फैमम, .अनरमममभनऊऋभ..<मक,
रन बन 4 च७->शिए-++ अल जाक-णल
हि शो पं ञ् कक + जल दिककी घ्र आं * वर्ज की कक त्स्य २५ ९५९
रुद्॒लंहिता ]. # विभिन्न पुष्पों; अन्नों णं जलादिकी घाराओसे शिवजीकी पूजाका माहात्
अपना पहन पु न्ममगआि।* गान लरीमााा ०" परम क* पाक न् नमन नह. पातम+३०-3+.. वहन -अकन्न्मान,
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है | वर्तमान ऋतमें पैदा होनेवाले फूछ यदि शिवक्री सेवामें भक्तिभावसे विधिपूर्वक झित्रकी पूजा करके भक्तोंको
तमर्पिन किये जाये तो वे मोक्ष देनेत्राले द्वोते हैं; इसमें संशय पीछे जलूघारा समर्पित करनी चाहिये । पक जो
नहीं है । राईके फूछ शत्रुओंको मृत्यु प्रदान करनेवाले होते प्रछाप करने लगता है। उसकी झान्तिके लिये जलधारा
हैं। इन फूछलोक़ो एक-एक छाखकी संख्यामें .शिवके ऊपर शुमकारक बतायी गयी है | शतरुद्रिय मन्न्से, रुद्रीके ग्यारह
चदाया जाय तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते है पाठंसे, रुद्रमन्त्रेके जपसे; पुरुपसूक्तसे, 8: ऋचावाले
चम्पा और केबड़ेको छोड़कर शेष सभी फूछ मगवान् शिवको रुद्रयूक्तसे, महामृत्युज्ञयमन्त्रसे; गायत्रीमन्त्रसे अथवा शिवक्रे
चढ़ाये जा सकते हैं । शास्रोक्त नामोके आदियें प्रणः और अन्तमें प्तम;? पद
विप्रवर ! महादेवजीके ऊपर चावछ चढ़ानेसे मनुप्योकी जोड़कर बने हुए मन्त्रोंद्ठारा जलधारा आदि अर्पित करनी
लक्ष्मी बढ़ती है। ये चावल अखण्डित होने चाहिये ओर चाहिये | सुख ओर संतानकी इंडिके लिये जलधाराद्मरा
इन्हें उत्तम भक्तिभावसे शिवक्रे ऊपर चढ़ाना चाहिये । रुद्र- पूजन उत्तम बताया गया है | उत्तम भस्म धारण करके
प्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके ऊपर बहुत सुन्दर उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके झुभ एवं दिव्य द्रव्योंद्वारा
पस्र चढ़ाये ओर उसीपर चावछ रखकर समर्पित करे तो अबकी पुजा करनी चाहिये और शिवपर उनके सहखनाम
उत्तम है | भगवान शिवके ऊपर गन्ध) पुष्प आदिके साथ अन्प्रोंसे घीकी धारा चढ़ानी चाहिये | ऐसा करनेपर वंशका
£ एक श्रीफल चढ्ाकर धूप आदि निवेदन करे तो पूजाका पूरा- चिखार होता है; इसमें संशय नहीं है । इसी प्रकार यदि दस
5 पूरा फर प्राप्त होता है | वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंकी हजार मन्त्रोंद्रार शिवजीकी पूजा की जाय तो प्रमेह रोगकी
भोजन कराये । इससे मन्त्रपूंवेक साज्नोपाड़ छक्ष पूजा सम्पन्त शान्ति होती है और उपासकको मनोवाड्छित फलकी प्राप्ति
रैती है। जहाँ सो मन्त्र जपनेकी विधि हो) वहाँ एक सौ आठ. हे ज्ञाती है। यदि कोई नपुंसकताको प्राप्त हो तो बह घीसे
मन्त्र जपनेका विधान किया यया है । तिलोंद्वारो शिवजोको एक लाख. क्वजीकी भलीमौति पूजा करे तथा ब्राह्मणोंकी भोजन
आहुतियाँ दी जायेँ अथवा एक लाख तिलेसि शिवकी पूजा की कराये | साथ ही उसके लिये मुनीश्वरोंने प्राजापत्व ब्रतका भी
जाय तो वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। विधान किया है। यदि बुद्धि जड हो जाय तो उस अवख्थामें
जोद्दारा दी हुई शिवकी पूजा स्वर्गीय सुखकी वृद्धि करनेवाली पूजककी केवल शर्करामिश्रित दुग्धकी धारा चढ़ानी चाहिये |
है ऐसा ऋषियोंका कथन है । गेहूँके बने हुए पक्वानसे ऐसा करनेपर उसे वृहस्पतिके समान उत्तम बुद्धि प्राप्त हो
हुई शंकरजीकी पूजा निश्चय ह्दी बहुत उत्तम मानी गयी जाती हे | जबतक दस हजार मन्त्रॉोफा जप पूरा न ट्टो
| यदि उससे लाख बार पूजा हो तो उससे संतानकी चृद्धि जाय, तबतक पूर्वोक्त दुग्धधाराद्यारा भगवान् शिवका उत्कृष्ट
ऐती है । यदि मूंगसे पूजा की जाय तो भगवान् शिव सुख पूजन चाह रखना चाहिये | जब तन-मनमें अकारण ही
प्रदान करते हैं | प्रियंगु ( कैंगनी ) द्वारा सर्वाध्यक्ष परमात्मा उच्चाटन होने छगे--जी उचट जाय) कहीं भी प्रेम म
शिवया पूजन करनेमाचसे उपासकके घम; अर्थ और काम-भोगकी रहे; दुःख बढ़ जाय और अपने घरमें सदा कल्द रहने
धंद्धि ऐती है तथा वह पूजा समस्त सुलोंको देनेवाली होती है । दो, तब प्रवोक्तरुपसे दूधकी धारा चढ़ानेसे सारा दुःख नष्ट
अरएएरके पत्तोसे शड्भांर करके भगवान् शिवक्री पूजा करें। हो जाता है | सुवासित तेलसे पूजा करनेपर भोगोकी ब्रद्धि
' ६ इता साना प्रकारक सुर्ग्यो ओर सम्पूर्ण फ्ठोंकी देनेवाली होती है | यदि मधसे शिव की पूत्रा की जाब तो यजवध्माका
/ / | भनिषेए । अब फ़लोवी लक्ष मंख्याका .तोल बताया जा सेग दर हो जाता है | बदि शिव्रर इईलक्रे ससक्ी धारा
५ ऋऋे | [१ ॥*| न्र्र्र पाउट हक स्प्म सनक करनेवाले सार हे ह ् न्ड़ है हो हे # ही ् शो
| परजतारतक सनी । सूछा मानका प्रदर्शन करनेवाठे. दी जाव ते दद भी सम्यूध आनन्द्की प्रात्ति करानेचाली
शतक ४0७. शतक, कल
दी है । गड्गाइठकी घाय तो भोग और मोश्ष दोनों
$+९१ ४०५ चमेलीर फूड ए सो ये ए। एफ लाख एल्लका भान 5५ न
५ गा 4 “27₹ ०. 4+
५ दल ५० फापदा वही ४“ मी देनेवाली » । ये सब्र ऑन््शा घाया बतायी
गय। £। जहोड़े एड लाख फूट भी वही मान दे । हि के जलती
३ बट 'एएड़ एशशना सान नाठे पंच एश्य हू हे । उपांसतक्ो गंदा हूं: इस उनका जे सत्टज्बनन्द्रस चद्यना चाश्टिये 2 उसमे
जप 5 हि कक मन्त्रसा पद विधानत वि हझार जप झरना त्ब्राहि ह्ये पर
। ५३ ३0 मय पर ऐपर सोघफे ज्िपे भगयान शिदझी सी उक्त मन्त्र विधवानतः दस हार जप छ चाहदिय ऊआा।
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सृष्टिका वर्णन
तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर ब्रह्माजी वोले--
मुने ! हमें पूर्वोक्त आदेश देकर जब महादेवजी अन््तर्धान हो
गये, तब में उनकी आज्ञाका पालन करनेके छिये ध्यान-मग्न
हो कर्तव्यका विचार करने छगा । उस समय भगवान् शंकरको
नमस्कार करके श्रीहरिसे ज्ञान पाकर परमानन्दको प्राप्त हो
मैंने सृष्टि करनेका ही निश्चय किया ) तात | भगवान् विष्णु
भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे आवश्यक उपदेर दे
तत्काल अदृश्य हो गये । वे ब्रह्माण्डसे बाहर जाकर भगवान
शिवकी ऋपा ग्राप्त करके बैकुण्ठ-धाममें जा पहुँचे और सदा
वहीं रहने छगे | मेंने सष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और
विष्णुका ससरण करके पहलेके रचे हुए जलमें अपनी अज्ञलि
डालकर जल्को ऊपरकी ओर उछाछा | इससे वहाँ एक
अण्ड प्रकट हुआ; जो चोबीस तर्त्वॉका समूह कहा जाता है |
विप्रवर | वह विराट आकारवाछा अण्ड जडरूप ही था। उसमें
चेतनता न देखकर मुझे बड़ा संशय हुआ ओर मैं अत्यन्त
कठोर तप करने लगा । बारह वर्षोतक भगवान् विष्णुके
चिन्तनमें छगा रहा | तात | वह समय पूर्ण होनेपर भगवान्
श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बढ़े प्रेमसे मेरे अज्ञोंका स्पर्श
करते हुए! मुझसे प्रसन्नतापूवक बोले ।
अओीविष्णुने कहा--अहान् | तुम वर माँगो । मैं प्रसन्न
हूँ | मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान्
शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें समय हूँ ।
ब्रह्मा बोले--( अर्थात् मैंने कहा--) महामाग !
आपने जो मुझपर कृपा की है; वह सबंथा उचित ही है;
क्योंकि भगवान् शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सोंप दिया है |
विष्णो ! आपको नमस्कार है । आज मैं आपसे जो कुछ
माँगता हूँ; उसे दीजिये । प्रभो | यह विराटरूप चौबीस तर्त्त्वो-
से बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है; जडीभूत
दिखायी देता है ) हरे | इस समय भगवान् शिवकी क्ृपासे
आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरकी यृष्टि-शक्ति या
विभूतिसे प्राप्त हुए इस अण्डमें चेतनता लाइये |
मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आशामें तत्पर रहनेवाले महा-
विप्णुने अनन्तरूपका आश्रय ले उस अण्डमें प्रवेश किया। उस
समय उन्त परम पुरुषके सहस्तों मस्तक; सहस्रों नेत्र और सहत्वों
पैर ये । उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त
कर लिया । मेरे द्वारा भलीमाँति स्तुति की जानेपर जब
श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया; तब वह चौबीस तत्त्वोका
विकाररूप अण्ड सचेतन हो गया । पाताल्से लेकर सत्यलोक-
तककी अवधिवाले उस अण्डके रूपमें वहाँ साक्षात् श्रीहरि ही
विराजने छगे | उस विराद अण्डें व्यापक होनेसे ही वे
४४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5:
५ साया... अप. पहगीपाएन्म एम सहन हमर
॥॒ नवॉ कौमारसर्ग है ? जो प्रांत और वे करत भी है। इन से
| सन्षिप्त-शिवपुराण३
समन आ आता... दम्णयाहन:-मककीनान +क न््का पडा न ६ दा---९... ० कहा ७ कमा... जाके न्यन्गर, अर ककक-क
है अवसन 4 “ली की अभी जीन न. सन. उमर सनम ही. सनम अमरी हमर जरिया समीप न दुकान (मान नाउममग कमी धन ,पारागपदानमनाी, कान. मम >ही दकामन पकम बानी अरे जी, अपर" #म नानी सही कान, २०७०० ० ;म नमक,
प्रभु “वेराज पुरुष” कहलाये | पंद्चमुख महादेवने केवढ थे
रहनेके लिये सुरम्य कमत-्नगरका निर्माण क्रिया; जोम
लोकोंसे ऊपर -सुग्योभित होता है । देवपें | समृर्ण अद्याख्द
नाथ हो जानेपर भी वकुग्ठ ओर कैस--इन दो पारमोग्
यहाँ कमी नाद्य नहीं होता | मनिश्रेष्ठ | में सलदोक्ला
आश्रय लेकर रहता हैँ। तात | महादेवजीकी आजा #
मुझमें सृष्टि रचनेक्ी इच्छा उत्लन्न हुई है। वेट ! जब
सश्टिको इच्छासे चिन्तन करने लगा; उरा समय पहले मृत
अनजानमें ही पापपृणे तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हृअ
जिसे अविद्या-पश्चक ( अथवा पश्चपर्तरा अविदा ) कहते
तंदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर झम्मुकी आज्ञसे में पु
अनासक्त भावसे खश्टिका चिन्तन करने छगा। उस छः
मेरे द्वारा थावर-संज्ञक वृक्ष आदिकी सृष्टि हुई रि
मुख्य-सर्ग कहते हैं | ( यह पहला सर्ग है । ) उसे देवा
तथा वह अपने लिये पुरुषार्थका साधक नहीं है; यह जाम
सश्टिकी इच्छावाले मुझ ब्रह्मसे दूसरा सर्ग प्रकट हु
जो दुःखसे भरा हुआ है; उसका नाम है--तियंक्ोत
वह सर्ग भी पुरुषार्थंका साधक नहीं था | उसे मी पुरा
साधनकी शक्तिसे रहित जान जब में पुनः खुशिका चिद
करने छगा; तब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्विकसर्गका प्राहु्
हुआ, निसे “ऊर्ध्बंलोता? कहते हैं | यह देवसर्गके नाश
विख्यात हुआ । देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखद
है। उसे भी पुरुषार्थशाघनकी रुचि एवं अधिकारसे रे
मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिल्ल
आरम्म किया | तब भगवान् शंकरकी आशसे एक रणेग
सृष्टिका प्रादुभीव हुआ, जिसे अर्वकृस्ोता कह गया है|
इस सके प्राणी मनुष्य हैं; जो पुरुषार्थ-साधनके उ
अधिकारी हैं | तदनन्तर महादेवजीकी आजशासे भूत आहिं
सृष्टि हुईं | इस प्रकार मैंने पाँच तरहकी वैकृत सृष्टिका का
किया है | इनके सिवा तीन प्राकृत सर्य भी कहे खेर
जो मुझ ब्रह्माके सांनिष्यसे प्रकृतिसे ही प्रकट हुए हैं। झा
पहछा महत्तत्तवका सर है, दूसरा सूक्ष्म भूततों अर्थी
तन्मात्राओंका सर्ग है ओर तीसरा वैकारिकिसर्ग कहलाता!
इस तरह ये तीन पग्राकृत सर्ग हैं | प्राकृत और वैकृत को
प्रकारके सर्गोकी मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं। इनके मिं
अवान्तर भेदका में वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि उरी
उपयोग बहुत थोड़ा है |
१. पशु, पक्षी आदि तिरय॑क्त्रोता कहलाते हैं। वायुकी गे |
तिरछा चलनेके कारण ये तियंक् अथवा ८ तियकल्नोता' के गये ई् ह
तर
है|
रुद्र॒संहिता |
अन्य.“ ाओं--..क्दए -कोम्या मजाक अनयाम+न ऑ ा+-नकनााी आम _माषननॉमरइीमनाशादोकक कान... ऑ जातक आन्याम्यक
_>अ>नीजयायु७->+-पाकन-ट मेक “2 * कर
फम्णयारनिम्णफरकीया-गा+कमन्-पाकाइक. सा
मोहन अर,
अब दिजात्मक सर्गक्रा प्रतिपादन करता हूँ | इसीका
दूसरा नाम कोमारसर्ग है। जिसमें सनक-सननन््दन आदि
कुमारोंकी महत्वपूर्ण ख॒ष्टि हुई ह। सनक आदि मेरे चार
मानस पुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्माके ही समान हैं। वे महान
वेराग्यसे सम्पन्न तथा उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले हुए. |
उनका मन सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें ही लगा रहता है |
वे संसारसे ब्रिमुख एवं ज्ञानी हैं । उन्होंने मेरे आदेश
देनेपर भी सश्कि कार्यमें मन नहीं लगाया । मुनिश्रेष्ठ
नारद | सनकादि कुमारोके दिये हुए नकारात्मक उत्तरको
' सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया | उस समय
' मुझपर मोह छा गया। उस अवसरपर मेने मन-दी-मन
* भगवान, विष्णुका स्मरण किया | वे शीघ्र ही आ गये और
४, उन्दोंने समझाते हुए सुझसे कहा--“तुम भगवान् शिवकी
# प्रस्नताके लिये तपस्या करो |? मुनिश्रेष्ठ | श्रीहरिने जब मुझे
६, न |
है सी शिक्षा दी, तब मे महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा |
# पेश्टिके लिये तपस्पा करते हुए मेरी दोनों भें और
॥ नासिकाके मध्यमागसे, जो. उनका अपनाही अविमुक्त नामक
/' खान है। मद्देश्वरकी तीन मूर्तियोमेंसे अन्यतम पूर्णोश, सर्वेश्वर
5 एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट हुए, |
£ खश्टिका वर्णन ३
जा ए॥शाशीााणाशाई ० “५ कमन--जमन--जमतानी ना १० अधिनपममन न. अनननयवाननानवामनती “+नाफज।. अआणलनपानानननाा
करी. पदारिनमाना बनना. आन. हामन-" >-3हन्ाकि- न -कमन-.पाना-ुछ००ा हक. ""न्ममाा-+पकनकी, कीजम++-ीामननिनगन. >अमनना >> पान नानानगीगनकाजनी प नमी. मानी 3०++-ननणान
बनकर ----का पक >न>सहपपननम नस पीपनओा कि.
- अमान-_ पी, आ-परमानूमान+++पाजकनकीमी.... «न्याय... 3-3 -प जय ४५-4 ० मक#७>++मक, #.. आन... -"क--+-ज. आनयययओ.. न््मन्मााक-पृका
न
चआ-मनमपन्ममयायुकिकम-* 8-7 अमकमओे *चाममके आन जी-
.रमा+-न+-- न. 3.8. ल्वरमक पक “जम नननमःं पान परीनजीतोक- »+ 2 अे-कन ++ संस्पलन अमान अमन करी. क ॑>
जो जन्मसे रहित) तेजकी राश्यि; सर्वश्ञ तथा सर्बश हैं;
उन नीछ्लोहित-नामघारी साक्षात् उमावल्लभ शंकरको सामने
देख बड़ी भक्तिसे सस्तक झुक्रा उनकी स्तुति करके में बड़ा
प्रसन्न हुआ ओर उन देचदेवेश्वससे बोला--पप्रभो | आप
भॉति-भाँतिके जीवोंकी खष्टि कीजिये ।? मेरी यह बात
सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रुद्रने अपने ही समान बहुत-से
रुद्रगणोंकी खष्टि की | तब मेने अपने स्वामी महेश्वर महा-
रुट्से फिर कहा--'देव ! आप ऐसे जीबॉकी खष्टि कीमिये,
जो जन्म और मृत्युक्े मवसे युक्त हों ।? मनिश्रेष्ठ | गेरी
ऐसी बात सुनकर कंझणासागर महादेवडी देंसे पे ओर
तत्ताल इस प्रर्यर चौड |
रु
खाक +, चर
॥ कक 8 कक ड्य | सुत्युफ ध्यु
लि 32 ६ आप
७. महारियर्ज रन काटा द्िधान की
इियजान कषा-बदवबातव; ;
अपन युत्ता बजाकण्शोस अश्या किक क्त््फृजन्यकी | बटन म 24 की
दस यक्त आशभमितद आशा खाए
आमिर कक य््गाः नय ३ थ्ड कप पाल
धांखा अन्य बा 4 चमक
सह हुाा। १) ह४ै]४.
क्र ७ शल क्र ब- क् >फजफफ्ा+ कक के कक झित ब्क
० *3-आान्क-क है य्यः क /क-$-्ग्गवाक़' त् #०- 4 कि जयक >प७.कमीशी अ ॥॥ ज्टज श्र ८ 4 क््का कणनकत
<-, + ी नर हा ह<
«५ पजु.र३३ (२ | हट ४ + ०१.3 5५ /7२७ै५). >> ं ४,४३४: क््त 5,
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कप कक गुमाएा बी न ऋष्न्जु | 00२६ ्सआार्थी ऋशार कण्जकत-क ह+७-य हक जज ज जया का हम इरय
्ऊजर & ४-+ ड्माज 4 है १ के ओऔ, जे आ ला 70 अर दान जा
श रा 305: ५» । कह तो. 5 के बह, के | 8 *, ,
१०२ ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने [ संक्षिप्त-शिवपुराणह
व पवएमयइननइुअाञ वाहन पता का जाता 0भयाकमबूसा्ाक्ाभपाएा भरकर पी ॒ यामाशूकरबधउा काम कक एक रक: साहाचइकााबहमाएज उदार फका भी दफन > रकम 2 रा कन्या कीट न्त पा धम हरवमइफन्मान्5*क 0० *ीपुड मर पहागल सारा धयकधयरकाचयाइुतहवुए+उ९७ पाल भरत भव॒त अत > ककया पलक पत़नजक+>«ह
व्ग्क््क्मयम छाया चखिखफ्ड्श्शश्फ्ड््का डा मा मल मा भा रा ए७७#्शशशशशराशशशराशर/ शान ५
ले 999४४ ४७४७७ सच
उन सबको संसार-सागरसे पार करूँगा | प्रजापते ! दुःखमें ... मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीट्लेहि
ड्वे हुए सारे जीवकी खष्टि तो तुम्हीं करों। मेरी आशासे महादेव मेरे देखते-देखते अपने पार्षदोंके साथ वहाँसे तत्नः
इस कार्यमें प्रवत्त होनेके कारण तुम्हें माया नहीं बाँध सकेगी | ” तिरोहित हो गये | ( अध्याय १९ |
“2 क््ूव...-4--
खायम्शुव मनु ओर शतरूपाकी, ऋषियोंकी तथा दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा .-
सती ओर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन
ब्रह्माजी कहते है--नारद | तदनन्तर मैंने शब्द-
तन्मात्रा आदि सूक्ष्मभूतोंको खयं ही पश्चीकृत करके अर्थात्
उन पॉर्चोंका परस्पर सम्मिश्रण करके उनसे स्थूल आकाश;
वायु; अम्ि। जल ओर प्रृथ्वीकी स्टि की । पव॑तों, समुद्रों ओर
वृक्षों आदिको उत्पन्न किया | कलासे लेकर युगपयन्त जो
काल-विभाग हैं; उनकी रचना की। मुने | उत्पत्ति और विनाश-
वाले ओर भी बहुत-से पदार्थोका मैंने निर्माण किया | परंतु
इससे मुझे संतोष नहीं हुआ | तब साम्ब शिवका ध्यान करके
मैंने साधनपरायण पुरुषोंकी सृष्टि की । अपने दोनों नेत्रोसे
मरीचिको; दहृदयसे भगुको, सिरसे अक्ञिराको) व्यानवायुसे
मुनिश्रेष्ठ पुलहको, उदानवायुसे पुलस्त्यको, समानवायुसे
वसिष्ठको; अपानसे क्रतुको) दोनों कानोसे अन्निको) प्राणोसे
दक्षको) गोदसे तुमको) छायासे कर्दम मुनिको तथा संकल्पसे
समस्त साधनेंके साधन धममको उत्पन्न किया । मुनिश्रेष्ठ !
इस तरह इन उत्तम साधकोंकी स॒ष्टि करके महादेवजीकी
कृपासे मैंने अपने आपको कृतार्थ माना | तात | तत्पश्नात् उस पुरुषने उस स्त्रीके गर्भसे सर्वताधनसमर्थ उत्तम जे
उत्पन्न किया | उस जोड़ेमें जो पुरुष था; वहीं खाबम
मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ। खायम्भुव मनु उच्चकोटिक वाई
साधकोंकी प्रेरणासे साधनमें लग गये | इसके बाद मैंने हुए तथा जो स्त्री हुई; वह शतरूपा कहलायी | वह बे
अपने विभिन्न अन्नैंसे देवता; असुर आदिके रूपमें असंख्य एवं तपसखिनी हुई । तात | मनुने वैवाहिक विधिते अर
पुत्रॉकी उष्टि करके उन्हें मिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किये | उरी शतरूपाका पाणिग्रहण किया और उससे वे मैथुननर
मुने ! तदनन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकरकी प्रेरणासे अपने सष्टि उत्पन्न करने छगे। उन्होंने शतल्पासे_ की हु
शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके मैं दो रूपवाला हो गया। दो पुत्र और तीन कन्याएँ उसब्न
पट
हि न कन्याओंके नाम थे--आकूति) देवहूति ओर प्रतृति | *+
नारद | आधे शरीरसे में क्री हो गया और आधेसे उप । आकूतिका विवाह प्रजापति रुचिके साथ किया । मझली
संकल्पसे उत्पन्न हुए. घमम मेरी आज्ञासे मानवरूप घारण करके
।
रुद्रसंहिता ]
देवहति कर्दमकों व्याह दी और उत्तानपादकी सबसे छोटी
बटन प्रयृति प्रजापति दक्षको दे दी। उनकी संतान-
प्रम्पराओंसे समस्त चराचर जगत व्याप्त है |
रुचिसे आकृतिके गर्मसे यज्ञ और दक्षिणा नामक स्त्री
पुरुषवा जोड़ा उत्पन्न हुआ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए. ।
मुने ! कर्दमद्वारा देखूतिके गर्भसे बहुत-सी पुत्रियाँ उत्पन्न
हुईं | दक्षके प्रसूतिसे चोबीस कन्याएँ हुई । उनमेंसे श्रद्धा
आदि तेरह कन्याओंका विवाह दक्षने घर्मके साथ कर दिया |
मुनीध्चर | धर्मकी उन पत्ियेंकि नाम सुनो--अ्रद्धा। लक्ष्मी;
धृति, तु) पुष्ठिः मेधा) क्रिया; बुद्धि; लजा) वसु; शान्ति;
सिद्धि और कीर्ति--ये सब तेरह हैं। इनसे छोटी जो शेष
ग्यारह सुलोचना कन्याएँ थीं; उनके नाम इस प्रकार हैं--
ख्याति, सती; सम्भूति ) स्मृति; प्रीति, क्षमा; संनति, अनसूया,
ऊर्जा; खाद्य तथा खा । भरगु) शिव; मरीचि, अद्विरा
मुनि; पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ ऋठु, अज्ि; वसिष्ठ; अभि ओोर
'पितरने क्रमशः इन ख्याति आदि कन्याओंका पाणिग्रहण
किया | भूगु आदि मुनिश्रेष्ठ साधक हैं। इनकी संतारनसे
, पंणचर प्राणियोसहित सारी ज्िलोकी भरी हुई है।
। इस प्रकार अम्बिकापति महादेवजीकी आजश्ञासे अपने
क् पृवकर्मेके अनुसार बहुत-से प्राणी असंख्य श्रेष्ठ द्विजोंके रूपमें
-उसन्त हुए । कल्पभेदसे दक्षके साठ कन्याएँ. बतायी गयी
है । उनमेंसे दस कम्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया ।
>सत्ताईंस कन््याएँ. चन्द्रमाको ब्याह दीं और विधिपूर्वक तेरह
फन्याभोकरे हाथ दक्षने कब्यपके द्ाथर्में दे दिये। नारद !
उन्होंने चार वन््याएँ श्रेष्ठ रूपवाले ताब्य ( अरिएनेमि ) को
#पाए दो तथा भरगु$ अप्विरा ओर कृशाश्वको दो-दो कन्याएँ
“अपित झो। उन स्ियोसे उनके पतियोंद्वारा बहुसंख्यक
भणवर प्राणियोंदी उत्तत्ति हुईं | मनिश्वेष्ठ | दक्षने महात्मा
पश्यपकी जिम तेरद कनन््याओंका विधिएर्वंक दान दिया
पा. उनपी संदार्नोसे सारी त्रिलोदी व्याप्त है | खादर
»गर शंगम फोर भी उष्टि ऐसी नहों है; जो कश्यपदी
४ यंशदत्त-कुमारकों भगवान् शिवक्री कंपासे कुवेरपदकी प्राप्ति *
.........................................०००--०-०-.++०+नन नीलम नीयना-ी-ीन- न जननी पीनीनीयनिननयी- पिन न पननन मनन पा +पान$कन-न- कर्क ५५०० व ९-3 ५+नन नम &»कन कक ५नन++ नम नन+कनम 3» न ननकमनकन-+ नी ननन-+3+_++-न करन मम रथ ख्धशथश ्टरुल्राकाख-ख्-+5>
१०३
कफ नमक तन.“ अनाा। 5... अमान पान
तंतानोंसे शून्य हो | देवता; ऋषि) देत्य; इक्ष) पक्षी, पर्वत
तथा तृण-लता आदि सभी कथश्यपपत्िियोंसे पेदा हुए है।
इस प्रकार दक्ष-कन्याओंकी संतानोंसे सारा चराचर जगत्
व्याप्त है । पातालसे लेकर सत्यलोकपयन्त समस्त ब्रह्माण्ड
निश्चय ही उनकी संतानोंसे सदा! भरा रहता है; कभी खाली
नहीं होता |
इस तरह भगवान् शंकरकी आशज्ञासे ब्रह्माजीने भलीभति
सष्टि की । पूर्वकालमें सर्वब्यापी शम्मुने जिन्हें तपस्याके लिये
प्रकट किया था तथा रुद्रदेवने त्रिशूलके अग्रभमागपर रखकर
जिनकी सदा रक्षा की है? वे ही सतीदेवी छोकहितका कार्य
सम्पादित करनेके लिये दक्षसे प्रकट हुई थीं । उन्होंने भक्तोंके
उद्धारके लिये अनेक लीलाएँ. की | इस प्रकार देवी शिवा ही
सती होकर भगवान् शंकरसे व्याही गयीं । किंतु पिताके यज्ञमे
पतिका अपमान देख उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया और
फिर उसे ग्रहण नहों क्रिया | वे अपने परमपदको प्रात हो
गयीं । फिर देवताओंकी प्रार्थनासे वे ही शिवा पार्वतीरूपमें
प्रकट हुईं ओर बड़ी मारी तपस्या करके पुनः भगवान् शिवको
उन्होंने प्रात्त कर लिया | मुनीख्वर | इस जगत उनके अनेक
नाम प्रसिद्ध हुए । उनके कालिका; चण्डिकरा) भद्गा) चामुण्डा
विजया, जया; जयन्ती, भद्रकाली, दुर्गा, भगवती, कामाख्या,
कामदा; अम्बा, मूडानी ओर स्वंमइला आदि अनेक नाम
हैं, जो भोग ओर मोक्ष देनेवाले हैं | ये सभी नाम उनके गुण
ओर कर्मोके अनुसार हूँ ।
मुनिश्रेषे नारद | इस प्रकार मैंने सश्क्रिमका तमसे
वणन किया है । ब्रह्माण्डका यह सारा भाग भगवान् शिवकी
आज्ञासे मेरेद्वारा रचा गया ६ । भगवान शिवकों परवरहा
परमात्मा कहा गया है। में) विष्णु तथा झद्र---थय तीन देवता
गुणभेदसे उन्हींके रूप बतलावे गये £। वे मनोरम टिव-
लोफमे शिवाक्ते साथ स्वच्छन्द विश्वर करते हैं। भगवान सित्र
स्वतन्त्र परमात्मा है | निगुण आर सुमुण भी वे ही हैं ।
( अच्याय १६ )
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# पशात्तनभारको भरयानू शिवका कपास कुकपटठका प्राप्त तथा उनका भगवान शिवक्त साथ मंत्री
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१०७
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शंकरके चरित्रका वर्णन करता हूँ | वे केसे केलास परवेतपर
गये और कुबेरकी उनके साथ किस प्रकार मेत्री हुईं। यह
सब सुनाता हूँ | काम्पिल््थ नगरमें यशदत नामसे प्रसिद्ध
एक ब्राह्मण रहते थे, जो बढ़े सदाचारी ये । उनके एक
पुत्न हुआ; जिसका नाम गुशनिधि था । वह बड़ा दी
दुराचारी ओर जुआरी हो गया था । पिताने अपने उस
पुत्रको त्याग दिया | वह घरसे निकछ गया ओर कई
दिनोंतक भूखा भग्कता रहा | एक दिन वह नेवेद्य चुराने-
की इच्छासे एक शिवमन्दिरमें गया । वहाँ उसने अपने
वच्खधको जलाकर उजाला किया । यह मानो उसके द्वारा
भगवान् शिवके लिये दीपदान किया गया । तत्पश्चात् वह चोरीगे
पकड़ा गया और उसे प्राणदण्ड मिला | अपने कुकर्मोंके
कारण वह यमदूतोंद्वार बॉधा गया। इतनेमें ही मगवान्
शंकरके पार्षद वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने उसे उनके
बन्धनसे छुड़ा दिया | शिवगणोंके सज़से उसका हृदय झुद्ध
हो गया था| अतः वह उन्हींके साथ तत्काल शिवलोकमें
चल्म गया । वहाँ सारे दिव्य भोगोंका उपभोग तथा उसम्रा-
महेश्वरका सेवन करके कालान्तरमें वह कलिद्गराज अरिंदम-
का पुत्र हुआ | वहाँ उसका नाम था दम | बह निरन्तर
४: नमो रुद्भाय शात्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
३-३३ ४७७ ५-४० आन ओ)-९००००, >ऑम., ००+..य+.९->मनग॥, जय मान. आम सपा -++पान+पक-आ-सोआओकआ-धी जमाकीनने. के ऑन ० ९७... ऑ-जननक भा #जाओम अगाक | कान
| संक्षिप्त-शिवपुराणाह
+ क़ अैतनम--मपीजऑमम,. 4-८. -९०3०-॥४७-सा+ मा. अमन
किन नल 2... आममामना
सी. २मरी न न करा ३०ममी न पता.
न्अलान----भलण्मपनकेश-ा..
भगवान् शिवकी सेवार्म लगा रहता था | बालक होनेपर
वह दूसरे बालकीके साथ शिवकां भजन किया करता था|
वह क्रमशः युवावस्थाकों प्राप्त हुआ ओर पिताके परलेक
गमनके पश्चात् राजर्सिहासनेपर बेठा ।
राजा दम बड़ी प्रसन्नताके साथ सब ओर शिवधर्म का प्रचार
करने लगे | भूपाल दमका दमन करना दूसरेंकि लिये सवंया कर
था। ब्रह्मन्ू | समस्त शिवालय दीपदान करनेके अतिरिक्त र
दुसरे किसी धर्मको नहीं जानते थे | उन्होंने अपने गज
रहनेवाले समस्त आमाध्यक्षोंकी बुलाकर यह आज्ञा दे दी!
“शिवमन्दिरमें/दीपदान करना सबके लिये अनिवार्य होगे!
जिस-जिस ग्रामाध्यक्षके गाँवके पास जितने शिवालय है
वहाँ-वहाँ बिना कोई विचार किये सदा दीप गर्क
चाहिये ।! आजीवन इसी धर्मका पालन करनेके -कारण ए*
दसने बहुत बड़ी धर्मसम्पत्तिका संचय कर लिया । हि!
काल-घर्मके अधीन हो गये । दीपदानकी वासनासे युक्त हैं ।
के कारण उन्होंने शिवाल्योंमें बहुत-से दीप जह्वाये |.
उसके फलस्वरूप जन्मान्तरमें वे रत्मय- दीपोंकी ४
आश्रय हो अलकापुरीके स्वामी हुए. | इस प्रकार २४४ :
शिवके लिये किया हुआ थोड़ा-सा भी पूजन या 4० ,
न्पन्ध जॉब
* ५) ७
>> ४५४४६:
रद्रसंहिता ]
हिलाउरक कम्दण्फपकमहण्कह्हीन्कन्यकाकनकाप्कपकपक/्तन्काषक-कम्फ ापकापदनतपन्कतकण्क-कपनएन का उमपा रामकमरम्या- कक कक पक नस नकारा कम्कनयान्तकमता्कपपप्कपकनकनसम सन परत कर पकफ कफ सा न्स कप सम कर कक
# यशदच-कुमारको भगवान शिवकी कृपाले कुबेरपदकी प्राप्ति *
२०५
समयानुमार महान् फल देता है, ऐसा जानकर उत्तम सुखकी
इच्छा रखनेवाले लोगोंकों शिवका मजन अवश्य करना
चाहिये ) वह दीक्षितका पुत्र) जो सदा सब प्रकारके
अधर्मोमें ही रचा-पचा रहता था; देवयोगसे शिवालयमें घन
चुरानेके लिये गया और उसने खार्थवश अपने कपड़ेको
दीपककी बत्ती बनाकर उसके प्रकाशसे शिवलिज्ञके ऊपर-
का अधेर दूर कर दिया; इस सत्कर्मके फलखरूप वह कलिड्डदेश-
का राजा हुआ ओर घर्ममं उसका अनुराग हो गया । फिर दीप-
' की वासनाका उदय होनेसे शिवाल्योंम दीप जलवाकर उसने
यह दिक्यालका पद पा लिया | मुनीश्वर ! देखो तो सही$
कहाँ उसका वह कम ओर कहाँ यह दिक्पालकी पदवी:
जिसका यह मानवर्मा प्राणी, इस समय यहाँ उपभोग कर
रह्य है। तात | यह तो उसके ऊपर शिवके संतुष्ट होनेकी
बात बतायी गयी । अब एकचित्त होकर यह सुनो कि किस
कार सदाके लिये उसकी भगवान् शिवक्रे साथ मित्रता हो
एयी । में इस प्रसड्का तुमसे वर्णन करता हूँ ।
नारद | पहलेके पाञ्मकल्पकी वात है, मुझ ब्रह्माके
मानस पुत्र पुलस््से विश्रवाका जन्म हुआ और विश्ववाके
पु्न वेश्षवण ( कुबेर ) हुए । उन्होंने पूर्वकालमें अत्यन्त
उग्र तप्स्याक्रे द्वारा त्रिनेत्रणारी महादेवकी आराधना करके
विध्वकर्माकी बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया।
जेब बहू कल्प व्यतीत हो गया और मेबबाहनकल्य
'ऑस्म्म हुआ उस समय वह यश्षदतततका पुत्र; जो प्रकादग्मका
; ने परनेबाला था, कुबेरके रूपमें अत्यन्त दुस्पह तपस्या
फरने छगा | दीपदानमाचसे मिलनेवाली शिवभक्तिक्े
पनावकीं जानवर बह शिवको चित्पकाशिका काशिकापुरीमें
' गया और अपने चित्तरुपी र्ममय प्रदीपेंसे ग्यारह रुद्रोंदो
, को प्योषित परके अनन्यभक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो वह
' उ्गयतापृत्रक शिवक्के ध्यानर्मभ सस््न हो सनिश्चलभावसे वेंठ
गे) हो शिपद्ती एकताका सहान पाच्र है: तपरूपी अग्निसे
ही हुआ ६ काम-इ/धादि महानिध्यरूपी पतड़ोझि आदधातसे
ने ४६४ सोथनिरघरुपी चायुरान्य व्यास निश्वल्भावसे
शत
8 -त ७७% कू च्य.. >> मो ०८
कक अं 9९७५.+% ऊँचाई के फुल दार०८] ्ज्स धान जिमल |.
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तदनन्तर विद्यालक्षी पावतीदेवीके साथ भगवान् विश्वनाथ
कुबेरके पास आये । उन्होंने प्रसन्नचित्ते अलकापतिकी
ओर देखा । वे शिवलिक्ष्में सनकी एकाग्र करके ढूँठे काठकी
भाँति स्थिरभावसे बैठे थे । भगवान् शिवने उनसे कहा---
धअलकापते ! में वर देनेके लिये उद्यत हूँ । ठुम अपना
मनोरथ बताओ ।?
यह वाणी सुनकर तपस्याके घनी कुवेरने ज्यों ही आँखें
खोलकर देखा) त्यों ही उमावल्लम भगवान् श्रीकण्ठ सामने
खड़े दिखायी दिये । वे उदयकालके सहसतों सूर्यसि भी
अधिक तेजस्वी थे ओर उनफे मस्तकपर चन्द्रमा अपनी चांदनी
बिखेर रहे थे | भगवान शंकरके तेजसे उनकी आँखें चांधिया
गयीं । उनका तेज प्रतिहत हो गया ओर बे नेत्र बंद करके
मनोरथसे भी परे विराजमान देवदेवेश्चर शिवसे बोले
ध्ताथ ! मेरे नेनत्रोंकी वह दृष्टिशक्ति दीजिये;। जिससे
आपके चरणारविन्दोंका दमन हो सके | खामिन् | आपका
प्रत्यक्ष दर्शन हो; यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर है ) ईडा !
दूसरे किसी वरसे मेरा क्या प्रयोजन है । चन्द्रशेखर | आप-
को नमस्कार है ।?
कुवेरकी यह बात सुनकर देवाविदेव उमापतिने अपनी
हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें देखनेकी द्यक्ति प्रदान
की । दृश्शिक्ति मिल जानेपर यज्ञदत्तके उस पृत्रने आँखें
फाड-फाड़कर पहले उमाकी ओर ही देखना आरम्भ किया |
वह मन-ही-मन सोचने लग “भगवान शंकरके समीप यह
सर्वाज्नसुन्दरी कोन है ? इसने कोना ऐसा तप #िया हैं; जो
मेरी भी तपस्थासे बढ गया है । यह रूप, यह प्रेम: यद सोभाग्य
ओर यह असीम झोमा--समभी अद्भत दे ।? बद
बार-बार यही कहने लगा | जब याग्यार यही
बह हुए दृष्टिसि उनकड्ी ओभोर देखने तव दामाके
अवलोकनसे उसकी बादी आंख प्रद्ठ गठी | सदनन्तर देदी
पातीने महादिव्जीस कट्ा-- प्रो
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शंकरके चरित्रका वर्णन करता हूँ । वे केसे केलास पर्वतपर
गये और कुबेरकी उनके साथ किस प्रकार मेत्री हुई; यह
सब सुनाता हूँ । काम्पिल््थ नगरमें यशदत्त नामसे प्रसिद्ध
एक ब्राह्मण रहते थे; जो बढ़े सदाचारी थे । उनके एक
पुत्र हुआ; जिसका नाम गुगनिधि था । वह बड़ा ही
दुराचारी ओर जुआरी हो गया था । पिताने अपने उस
पुत्रको त्याग दिया । वह घरसे निकक गया और कई
दिनोंतक भूखा मग्कता रहा । एक दिन वह नेवेद्य चुराने-
की इच्छासे एक शिवमन्दिरमें गया । वहाँ उसने अपने
वश्ञकी जलाकर उजाला किया । यह मानो उसके द्वारा
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भगवान् शिवके लिये दीपदान किया गया । तत्पश्चात् वह चोरीगे
पकड़ा गया और उसे प्राणदण्ड मिछा | अपने कुकर्मोंके
कारण वह अमदूतोंद्वाए बॉँधा गया । इतनेमें ही भगवान्
शंकरके पार्षद वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने उसे उनके
बन्धनसे छुड़ा दिया | शिवगणोंके सज्ञ्से उसका हृदय झुद्ध
हो गया था | अतः वह् उन्हींके साथ तत्काल शिबलोकमें
चला गया । वहाँ सारे दिव्य मोगोंका उपभोग तथा उसा-
मह्देश्वरका सेवन करके कालान्तरमें वह कलिड्गराज अरिंदम-
का पुत्र हुआ | वहाँ उसका नाम था दम | वह निरन्तर
४: नमो रुद्राय शास्ताय ब्रह्मणे परमसात्मने ४
के “० >म-नम>न्ाकी +००+० रोकने वोट. आम्याननननो-अपु-पह- ऑमियार: पनकऑ+नकना ७ ५७आ)-+मक न कब दाओ-.. ५: पॉप“ -लकत- यवोन्गाबक..ध सा. आिन-बा बम. थी. आक अना॥-ल.
| संक्षिप्त-शिवपुराणा|
| ७. ७- - फीओ. ४-७... फंप्पाअकजमआ 3 नया 3 -७ ४.00. 9... +>+प+ममयाह+-गव्िक-६8)?;पाआ रहा पा... सर. +3५....-म+#म---राम्याबूहुडपारि गम ५ "बना +2००क --इिभा्फहक कर.
अन््कागा
ही जी सी भी आम न सी आज मी आल 2000 ७0७0७७७७७॥७७एश#0० ७० न्याय,
भगवान शिवकी सेवार्मे लगा रहता था | बालक होनेपर मे
वह दूसरे बालकोंके साथ शिवका भजन किया करता था
वह क्रमशः युवावस्थाको प्राप्त हुआ ओर पिताके परहेः
गमनके पश्चात् राजसिंहासनैपर बेंठा ।
राजा दम बड़ी प्रसन्नताके साथ सब ओर शिवधर्मका प्रचा
करने लगे | भूपाल दमका दमन करना दूसरोंके लिये सर्वथा कह
था| ब्रह्मन् | समस्त शिवालय दीपदान करनेके अतिरिक्त
दूसरे किसी धर्मको नहीं जानते थे | उन्होंने अपने गए.
रहनेवाले समस्त ग्रामाध्यक्षोंकी बुलाकर वह आज्ञा दे दी
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“शिवमन्दिरसें/दीपदान करना सबके लिये अमिवार्य है'
जिस-जिस ग्रामाध्यक्षेके गॉँवके पास जितने शिवालय
वहाँ-चहाँ बिना कोई विचार किये सदा दीप मई
चाहिये ।! आजीवन इसी धर्मका पालन करनेके -कारण 7
दमने बहुत बड़ी धर्मसम्पत्तिका संचय कर लिया | हि |
काल-धर्मके अधीन हो गये | दीपदानकी वासनासे युक्त
के कारण उन्होंने शिवाल्योंगें बहुत-से दीप जल्वाये *
उसके फल्खरूप जन्मान्तरमें वे रत्वमय- दीपोंकी #
आश्रय हो अल्कापुरीके खवामी हुए. । इस प्रवार माँ
शिवके लिये किया हुआ थोड़ा-सा सी पूजन या भार
रुद्रसंहिता ]
समयानुसार महान् फल देता है; ऐसा जानकर उत्तम सुखकी
इच्छा रखनेवाले लछोगोंको शिवका भजन अवश्य करना
चाहिये । वह दीक्षितका पुत्र; जो सदा सब प्रकारके
अपर्मो्मे ही रचा-पचा रहता था; देवयोगसे शिवाल्यमें घन
चुरानेके लिये गया ओर उसने खार्थवश अपने कपड़ेको
दीपककी बत्ती बनाकर उसके प्रकाशसे शिवलिज्ञके ऊपर-
* का अधिरा दूर कर दिया; इस सत्कर्मके फलस्वरूप वह कलिड्रदेश-
; का राजा हुआ ओर घर्ममें उसका अनुराग हो गया | फिर दीप-
। की वासनाका उदय होनेसे शिवाल्योंमें दीप जल्वाकर उसने
यह दिक््पालका पद पा लिया | मुनीश्वर |! देखों तो सही:
कहाँ उसका वह कर और कहाँ यह दिक्पालकी पदवी)
जिसका यह मानवधधर्मा प्राणी, इस समय यहाँ उपभोग कर
रहा है। तात ! यंह तो उसके ऊपर शिवके संतुष्ट होनेकी
. बात बतायी गयी ) अब एकचित्त होकर यह सुनो कि किस
ग़र सदाके लिये उसकी भगवान शिवके साथ मित्रता हो
री । मैं इस प्रसड़्का तुमसे वर्णन करता हूँ ।
नारद | पहलेके पाञ्मकल्पकी बात है; मुझ ब्रह्माके
नस पुत्र पुरुस्त्यसे विश्रवाका जन्म हुआ और विश्ववाके
त्र वेश्रवण ( कुबेर ) हुए । उन्होंने पूर्वकालमें अत्यन्त
ग्र तप्य्याके द्वारा त्रिनेत्रधारी महादेवकी आराधना करके
शवकरमोकी बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया ।
ब वहः कल्प व्यतीत हो गया और मेघवाहनकल्प
परम्म हुआ, उस समय वह यशदत्तका पुत्र। जो प्रकाशका
एन करनेवाला था, कुबेरके रूपमें अत्यन्त दुस्सह तपस्था
करने लगा । दीपदानमात्रसे मिलनेवाली शिवभक्तिके
प्रभावको जानकर बह शिवकी चित्मकाशिका काशिकापुरीमें
गया और अपने चित्तरूपी रत्ममय प्रदीपेसि ग्यारह रुद्रोंको
उद्दोघित करके अनन्यभक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो बह
तन््मयतापूवक शिवके ध्यानमें मस्त हो निश्चलभावसे बैंठ
गया | जो शिवकी एकताका महान पात्र है, तपरूपी अग्निसे
बढ़ा हुआ है, काम-क्रोधादि महाविष्सरूपी पतब्नोंके आघातसे
श्त्य है; प्र णनिरोधरूपी वायुश्न्य स्थानमें निश्चलमावसे
भरकाशित है; निर्मेल दृष्टिक कारण स्वरूपसे भी निर्मल है तथा
. परी पुष्पेसे जिसकी पूजा की गयी है, ऐसे शिवलिमकी
पनि्ठ | एरके वह तबतक तपस्थवामें छगा रहा; जबतक
: 75 गरोरम केबछ अखि और चर्मसात्र ही अवशिष्ट नहीं
(«६ 'पयि। इस प्रकार उसने दस हज़ार वर्षोतक तपस्या की |
शि ए७ 336 १९२...
कै यशद्त्त-कुमारको भगवान शिवकी कृपासे कुवेरपद्की प्राप्ति #
२०७
तदनन्तर विशालाक्षी पार्वतीदेवीके साथ भगवान् विश्वनाथ
कुबेरके पास आये । उन्होंने प्रसन्नचित्तो अलकापतिकी
ओर देखा । वे शिवलिज्ञमें मनको एकाग्र करके हूँठे काठकी
भाँति स्थिरभावसे बैठे थे | भगवान् शिवने उनसे कहां---
“अलकापते [ में वर देनेके लिये उद्यत हूँ । तुम अपना
मनोरथ बताओ ।?
यह वाणी सुनकर तपस्याके धनी कुबेरने ज्यों ही आंखें
खोलकर देखा; त्यों ही उमसावक्म भगवान् श्रीकण्ठ सामने
खड़े दिखायी दिये | वे उदयकालके सहखोों सूर्योसे भी
अधिक तेजस्वी थे और उनके मस्तकपर चन्द्रमा अपनी चाँदनी
बिखेर रहे थे | भगवान् शंकरके तेजसे उनकी आँखें चोंधिया
गयीं । उनका तेज प्रतिहत हो गया ओर वे नेत्र बंद करके
मनोरथसे भी परे विराजमान देवदेवेब्बर शिवसे बोले---
धनाथ ! मेरे नेच्रोंकी वह दृष्टिशक्ति दीजिये, जिससे
आपके चरणारविन्दोंका दशेन हो सके । स्वामिनं_| आपका
प्रत्यक्ष दर्शन हो; यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर है | ईश !
दूसरे किसी वरसे मेरा कया प्रयोजन है । चन्द्रशेखरं | आप-
को नमस्कार है |? |
कुबेरकी यह बात सुनकर देवाधिदेव: उमापतिने अपनी
हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें देखनेकी शक्ति ..प्रदान
की | दृश्शिक्ति मिल जानेपर यशदत्तके उस पुत्रमे आँखें
फाड़-फाड़कर पहले उमाकी ओर ही देखना आरम्म किया |
वह मन-ही-मन सोचने लगा। “भगवान शंकरके समीप यह
सर्वाज्नसुन्दरी कोन है ? इसने कौन-सा ऐसा तप किया है; जो
मेरी भी तपस्यासे बढ़ गया है | यह रूप; यह प्रेस) यह सौभाग्य
और यह असीम शोमा--सभी अद्भुत हैं ।? वह ब्राह्मगक्रमार:
बार-बार यही कहने लगा | जतब्र . वारंबार यही कहता हुआ
वह क्रूर दृष्ठिसे उनकी ओर देखने लगा; तब वामाके
अवलोकनसे उसकी यायीं आँख फूट गयी | तदनन्तर देवी
पावतीने महादेवजीसे कहा--५प्रभो | यह दुए तपस्वी वारबार
मेरी ओर देखकर क्या बक रहा है ? आय मेरी तपस्याके
तेजको प्रकट कीजिये [? देवीकी यह बात सुनकर भगवान्
शिवने हँसते हुए उनसे कहा--८उमे ! यह तुम्हारा पुत्र हे |
यह तुम्हें क्रूर इृश्िति नहों देखता, अपित नुम्द्ारी तपःसम्पत्तिक्ा
वर्णन कर रहा हे |? देवीसे ऐसा कट्कर भगवान् शिक्ष पुनः
उस ब्राह्मपकुमार्से बोलि--पभ्यत्त ! में तुम्हारी तमस्यासे
# नमो रुद्राय शान्ताय प्रक्षण परमात्मने # . [ संक्षिप्त-शिवपुराणा
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संतुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूँ । तुम निधियोंके स्वामी और
गुह्यकोके राजा हो जाओ | सुब्रत | यक्षों, किन्नरों और
घनके दाता बनो | मेरे साथ तुम्हारी सदा मेत्री बनी रे!
ओर मैं नित्य तुम्हारे निकट निवास करूँगा । मित्र |
तुम्हारी प्रीति बढ़ानेके लिये में अलकाके पास ही छूँग। '
आओजो; इन उमादेवीके चरणोंमें साष्टाड्रः प्रणाम करो; कोर
ये तुम्हारी माता हैँ | महाभक्त यज्ञदत्त-क्रमार | तुम अलन
प्रसन्नचित्तते इनके चरणोंमें गिर जाओ ।?
त्रह्माजी कहते हें--नारद | इस प्रकार वर के
भगवान शिवने पावेती देवीसे फिर कहा--“देवेश्वरी | छल
कृपा करो | तपखिनि | यह तुम्हारा पुत्र है|” भगवान् शंकर
यह कथन सुनकर जगदम्बा पाब॑तीने प्रसन्नचित्त हो कहर
कुमारसे कहा--“वत्स ! भगवान शिवमें तुम्हारी सदा मि
भक्ति बनी रहे | तुम्हारी वार्यीं आँख तो फूट ही गा
इसलिये एक ही पिड्नलनेत्रसे युक्त रहो | महादेवजीने
वर दिये हैं, वे सब उसी रूपमें तुम्हें सुलभ हों | बेय
मेरे रूपके प्रति ईर्ष्या करनेके कारण ठुम कुबेर के
प्रसिद्ध होओगे |? इस प्रकार कुबेरको वर देकर भक
महेश्वर पावती देवीके साथ अपने विश्वेश्वर-धाममें चले फ्े
इस तरह कुबेरने भगवान् शांंकरकी मेत्री प्राप्त की ४
अलकापुरीके पास जो केछास पर्वत है; वह भगवान् गंकए
राजाओंके भी राजा होकर पुण्यजनोंके पाठक और सबके लिये निवास हो गया। ( अध्याय १७-४६
शा बा ००772 20०7"
भगवान शिवका केलास पवेतपर गमन तथा सष्टिखण्डका उपसंहार
त्रह्माजी कहते हैँ--नारद | मुने ! कुबेरके तपोबलसे
भगवान् शिवका जिस प्रकार पर्व॑तश्रेष्ठ केछासपर शुभागमन
हुआ? वह प्रसद्ग सुनो। कुबेरको वर देनेवाले विश्वेश्वर शिव
जब उन्हें निधिपति होनेका वर देकर अपने उत्तम स्थानको
चले गये; तब उन्होंने मन-ही-सन इस प्रकार विचार किया---
“ब्रह्मजीके छलाटसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो
प्रढयका कार्य सभालते हैं; वे रुद्र मेरे पूर्ण खरूप हैं।
अतः उन्हींके रूपमें में गुह्मकोंके निवासस्थान केल्यस पर्वतको
जाऊँगा । उन््हींके रूपमे में कृबेरका मित्र बनकर उसी पर्व॑तपर
विलासपूर्वक रहूँगा ओर बड़ा भारी तप करूँगा |?
/औ
जी
शिवकी इस इच्छाका चिन्तन करके उन रुके
केछास जानेके लिये उत्सुक हो अपनी उत्तम गति देनेवाले
नादस्वरूप डसरूको बजाया | डमरूकी वह ध्वनि) जी 3४
बढ़ानेवाली थी; तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गयी |
विचित्र एवं गम्भीर शब्द आह्वानकी गतिसे युक्त था भा
सुननेवारलोंकी अपने पास आनेके लिये प्रेरणा दे रहाई'
उस ध्वनिको सुनकर मैं तथा श्रीविष्णु आदि 2 के
ऋ्रषि, मूर्तिमान् आगम) निगम ओर सिद्ध वहाँ आ फू
देवता ओर असुर आदि सब छोग बड़े उत्साहमे भर
आये । भगवान् शिवक्े समस्त पार्षद तथा सर्वलेकी'
न कंस
अन्न्क जा.
रद्रसंदिता | ह#ः
महामाग गणपाल जहाँ कहीं भी थे; वहोँसे आ गये।
इतना कहकर ब्रह्माजी वहाँ आये हुए
गणपालेंका नामोल्लेखपूर्वक विस्तृत परिचय दिया; फिर
इस प्रकार कहना आरम्म किया | वे वोले--वहाँ असंख्य
महाबली गणपाल पधारे | वे सब-के-सब सहसों मुजाओंसे
युक्त थे ओर मस्तकपर जटाका ही सुकुथ धारण किये हुए थे ।
सभी चन्भचूड़8 नीलकण्ठ ओर जिल्येचन ये | हार, कुण्डल
केयूर तथा मुकुट आदिसे अलंकृत थे । वे मेरे, श्रीविष्णुके
तथा इन्द्रके समान तेजखी जान पड़ते थे | अणिमा आदि
आठों सिद्धियांसे घिरे थे तथा करोड़ों सुयकि समान उद्धासित
हो रहे थे । उस समय -भगवान् शिवने विश्वकर्मोको उस
पर्व॑ंतपर निवासस्थान बनानेकी आशा दी। अनेक भक्तींके
साथ अपने ओर दूसरोंके रहनेके लिये यथायोग्य आवास
तैयार करनेका आदेश दिया ।
है मुने | तब विश्वकर्माने भगवान् शिवकी आशौके अनुसार
उस पवतपर जाकर शीघ्र ही नाना प्रकारके गहोंकी रचना
की । फिर श्रीहरिकी प्रार्थनासे कुबेरपर अनुग्रह करके
भगवान् शिव सानन्द केलास पर्ब॑तपर गये । उत्तम मुहूर्तमें
अपने ख्थानमें प्रवेश करके भक्तवत्सल परमेश्वर शिवने
सबको प्रेमदान दे सनाथ किया; इसके बाद आनन्दसे मरे हुए
श्रीविष्णु आदि समस्त देवताओं); मुनियों ओर सिद्धोंने शिवका
प्रसक्षतापूषेक अभिषेक किया । हाथोंमें नाना प्रकारकी मेंटे
लेकर सबने क्रमशः उनका पूजन किया ओर बड़े उत्सबके
'साथ उनकी आरती उतारी । मुने )! उस समय आकाशसे
“फूलोंकी चर्षा हुईं; जो मड्गलसूचक थी | सब ओर
भगवान शिवका कैलास पर्वेदपर गमन तथा रूशिखण्डका उपसंद्दार #
3 3-७-औ0-:3अ-कनओट. ि ७4नतओ.-म.- अमन नान नमन | 3 िशमनन- 3३3>-3>-ओ-3.4-3.-.-4 *-७७-)+ पाक ---क.
जय-जयकार ओर नमस्कारके शब्द गूँजने लगे। महान
उत्साह फेछा हुआ था? जो सबके सुखको बढ़ा रहा था |
उस समय सिंहासनपर बेठकर श्रीविष्णु आदि समी देवताओं-
द्वारा की हुईं यथोचित सेवाकों बारंबार अ्रहण करते हुए
भगवान् शिव बड़ी शोभा पा रहे थे । देवत। आदि सब लोगोंने
साथेक एवं प्रिय बचनोंद्रार छोककल्याणकारी भगवान्
शंकरका प्थक्-प्थक् स्तवन किया | सर्वेश्वर प्रभुने प्रसन्नचित्तसे
वह स्तवन सुनकर उन सबको प्रसन्नतापूर्वक मनोवाज्छित
वर एवं अभीष्ट वस्तुएं प्रदान कीं । मुने | तदनन्तर श्रीविष्णुके
साथ में तथा अन्य सब देवता ओर 'मुनि मनोवाड्छित
वस्तु पांकरं आनन्दित हो भगवान् शिवकी आज्ञासे
अपने-अपने घामकों चले गये । कुबेर भी शिवकी आशासे
प्रसन्नतापूवेक अपने स्थानकी गये | फिर वे भगवान् शम्भु,
जो सर्वधा खतन्त्र हैं; योगपरायण एवं . ध्यानतत्पर हो
पर्व॑तप्रवर केछासपर रहने छगे | कुछ काल बिना पत्नीके
ही बिताकर परमेश्वर शिवने दक्षकन्या सतीको पत्नीरूपमें
प्रात किया | देवर | फिर वे महेश्वर दक्षकुसमारी सतीके
साथ विहार करने लगे ओर लोकाचारपरायण हो सुखका
' अनुभव करने लगे | मुनीश्वर ! इस प्रकार मेंने तुमसे यह
रुद्रके अवतारका वर्णन किया हैं; साथ ही उनके केंछासपर
आगमन ओर कुबेरके साथ मेत्रीका भी प्रसकृः सुनाया है ।
केलासके अन्तर्गत होनेवाली उनकी ज्ञानवर््धिनी छीलाका भी
वर्ण किया, जो इहलोक - ओर परलोकम सदा सम्पूर्ण
मनोवाड्छित फलोंको देनेवाली हैं । जो एकाग्रचितत हो
इस कथाको सुनता या पढ़ता हैँ; वह इस छोकमें भोग पाकर
परलेकमें मोक्ष लाभ करता हैं । ( आध्याथ २० )
-+--्यक लि। बहा
॥ रुद्रसंदहिताका खुपष्ठटिखण्ड सम्पूर्ण ॥
-..६6--०५2७--
रुद्रसंहिता ( द्वितीय सतीखण्ड )
नारदजीके प्रश्न ओर ब्रह्माजीके द्वारा उनका उत्तर, सदाशिवसे त्रिदेवोंक्री उत्पत्ति तथा त्रह्माजीये
देवता आदिकी सृश्टिके पश्चात् एक नारी ओर एक पुरुपका प्राकृत्य
नारदजी बोले--महाभाग ! महाप्रमो ) विधातः ]
आपके मुखारविन्दसे मद्जलकारिणी शम्भुकथा सुनते-सुनते
मेरा जी नहीं भर रहा हैं | अतः भगवान् शिवका सारा झुभ
चरित्र मुझसे कहिये । सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मदेव !
मैं सत्तीकी कीतिसे युक्त शिवका दिव्यचरित्र सुनना चाहता हूँ ।
शोभाशालिनी सती किस प्रकार दक्षपत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुईं
महादेवजीने विवाहका विचार केसे किया १ पूर्वकाल्में दक्षके
प्रति रोष होनेके कारण सतीने अपने शरीरका त्याग कैसे किया !
चेतनाकाशको प्राप्त होकर वे फिर हिसालयकी कन्या केसे हुईं !
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पार्बतीने क्रिस प्रकार उम्र तपस्पा की और कैसे उनका विवाह
हुआ ; कामदेवका नाश करनेवाले भगवान शंकरके आधे
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शरीरम वे किस प्रकार खान पा सकीं ? महामते | इन
बाताकी आप विस्ताखूरवंकर कहिये | आपके समान दूसरा
संशयका निवारण करनेवाठा न है न होगा |
ब्रह्माजीने कहा--मुने ! देवी सती ओर भग
शिवका शुभ यश परमपावनः दिव्य तथा गोपनीयसे भी अः
गोपनीय है | तुम वह सब मुझसे सुनो । पूर्वकालमें भा
शिव निगुण, निर्विकल्प, निराकार। शक्तिरहित, चिन्मव।
सत् ओर असतसे विलक्षण खरूपमें प्रतिष्ठित थे | फ़ि
ही प्रथु सगुण ओर शक्तिमान् होकर विशिष्ट रूप घारण
स्थित हुए । उनके साथ भगवती उम्र विराजमान
विप्रवर | वे भगवान् शिव दिव्य आकृतिसे सुशोमित हो
थे | उनके मनमें कोई विकार नहीं था | वे अपने एण
स्वख्पमें प्रतिष्ठित थे। मुनिश्रेष्ठ | उनके बाय अज्गञसे भाग
विष्णु) दायें अड्से में ब्रह्मा ओर मध्य अड्ज अथात् हद
रुद्रदेव प्रकट हुए । मैं ब्रह्मा सश्कितां हुआ; मगवाव वि
जगत्का पालन करने लगे ओर खबयं रुद्रने संहारका
संभाला । इस प्रकार मगवान् सदाशिव खयं ही तीन
धारण करके स्थित हुए. | उन्हींकी आराघना करके !
लोकपितामह ब्रह्माने देवता; असुर ओर मनुष्य आदि सम
जीवोंकी सृष्टि की। दक्ष आदि प्रजापतियों और देवशिरोा
योकी सृष्टि करके में बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपनेको 7
अधिक ऊँचा मानने छगा । मुने ! जब मरीचि! ऑ
पुलह; पुलस्त्य, अन्विरा, ऋतु) वसिष्ठ; नारद; दक्ष ओर मं
इन महान् प्रभावशाली मानसपुत्नोंकी मेने उतन्न कि
तब मेरे हृदयसे अत्यन्त मनोहर रूपवाली एक सुंदरी
उत्पन्न हुईं। जिसका नाम “संध्या” था | वह दिलमें की
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तपखितनी सतीये
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रुद्रसंहिता है
जाती, परंतु साय॑काहमें उसका रूप-सोन्दर्य खिल उठता था।
वह मूतिमती सायं-संध्या ही थी और निरन्तर किसी मन्त्रका
जप करती रहती थी | सुन्दर मोंहोंबाली बह नारी सौन्दर्यकी
चर्म सीमाको पहुँची हुईं थी ओर सुनियोंके भी मनको मोहे
लेती थी।
इसी तरह मेरे मनसे एक मनोहर पुरुष भी प्रकट
हुआ; जो अत्यन्त अद्भुत था | उसके शरीरका मध्यमाग
. अटिप्रदेश ) पतला था । दौँतोंकी पंक्तियाँ बड़ी सुन्दर थीं।
% कामदेवके नामोका-निर्देश, उसका रतिके साथ विवाह #
कम -.न-9-नन-म-म-ममनीपिीयनी+तीी----ीाीीस -ननीनीीतीी-नीननीनत-ी-मननीनीयनीमीनीनीनीी नी नी न न सकती + तन नल नस तन न पननन. 3 न. ककनानकन-+ मनन मकननऊ मनन न+-म जनपद "पकनन-नीननमनन--+ सकमनाम मनन -+“मनकन++++ नमन -कननन-+म मकान नमइगन एन" पनकाकन-नमकनामनन+ नमन" नी न न सना तन फ कनिनन ॑न नमन पान + -+ +ननि ननन-थी+ न फिनीनननम।+3-_+ आना प पक "पूरक पान न" पल- कप "83५०० जन नारा नाम पान पानमनान-+- नमन नमन मनन-न-+-रम-++.- मम वन
१०९,
उसके अक्लोंसे मतवाले हाथीकी-सी गन्ध प्रकट होती थी ।
नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाते थे। अज्लोंमें केसर
लगा था; जिसकी सुगन्ध नासिकाको तृ्॑त कर रही थी। उस
पुरुषको देखकर दक्ष आदि मेरे सभी पुत्र अत्यन्त उत्सुक
हो उठे | उनके मनमें विस्मय भर गया था | जगत्की
स॒ष्टि करनेवाले मुझ जगदीश्वर ब्रह्माकी ओर देखकर उस
पुरुषने विनयसे गर्दन झुका दी ओर मुझे प्रणाम करके कहा |
वह पुरुष वोला--अह्मन् | मैं कौन-सा कार्य करूँगा!
मेरे योग्य जो काम हो) उसमें मुझे लगाइये; क्योंकि विधाता |
आज आप ही सबसे अधिक माननीय ओर योग्य पुरुष हैं।
यह छोक आपसे ही शोमित हो रहा है ।
ब्रह्माजीने कहा--भद्रपुरुष | तुम अपने इसी स्वरूपसे
तथा फूलके बने हुए पॉँच बाणोंसे स्त्रियों ओर पुरुषोंको मोहित
करते हुए. सश्कि सनातन कार्यको चछाओ | इस चराचर
त्रि॒ुवनमें ये देवता आदि कोई भी जीव तुम्हारा तिरस्कार करनेमें
समर्थ नहीं होंगे | तुम छिपे रूपसे प्राणियोंके हृदयमें प्रवेश
करके सदा खयं॑ उनके सुखका हेतु बनकर सष्टिका सनातन
कार्य चालू ऱलो | समस्त प्राणियोंका जो मन है; वह तुम्हारे
पुष्पमय बाणका सदा अनायास ही अद्भुत लक्ष्य बन जायगा
और तुम निरन्तर उन्हें मदमत्त किये रहोगे। यह मेंने तुम्हारा
कर्म बताया है; जो सश्किा प्रवर्तक होगा ओर तुम्हारे ठीक-
ठीक नाम क्या होंगे; इस बातको मेरे ये पुत्र बतायेंगे ।
सुरश्रेष्ठ | ऐसा कहकर अपने पुत्रोंके मुखक्ी ओर
दृष्टिपात करके मैं क्षणमरक्रे लिये अपने कमलमय आसनपर
चुपचाप बेठ गया । ( अध्याय १-२ )
-+5चस्ल्च्च्टओओंंं>-
फामदेवके नामोंका निर्देश, उसका रतिके साथ विवाह तथा कुमारी संध्याका चरित्र--
वसिष्ठ मुनिका चन्द्रभाग परवेतपर उसको तपस्याकी विधि बताना
प्रद्माजी कहते हैं--समे
प्ाजी कहते ह--मुने ! तदनन्तर मेरे अभिप्रायको
निनेवडे मरोचि आदि मेरे पृत्न॒ सभी मुनिययोने उस
एरश उच्चप नाम रस्ख दक्ष तियॉने
“7४ 3 चर नाम रक्त । दक्ष आदि प्रजाप तियोने उसका
मुह देखते ही परोक्षक्ते भी सारे चूत्तान्त जानकर उसे रहनेके
लिये खान ओर पत्नी प्रदान की । मेरे पुत्र मरीचि आदि
द्विजोंने उस पुठपके नाम निश्चित करके उससे यह युक्ति
युक्त बात कही |
११७ # थी रद्गाय शान्ताय अ्हमगे परमात्मोी | संक्षित-शिवपुराण;
फ्क् '#-वा कक, अुम्पार-#-पाक वराकममीक०-+. ५० सविकन, खाक. नमक. अन्मा-. आकि-क 4.9 54०००... जमाायह पका», -७०००००००कण-. अत-०-सक-+. अमान-ममहीका. जा नमन, नी. उ.. २७७००+-----भाहीग्णफ' रा, दाम अर -नइऐनपीयरनआआ-. "पा. अर.
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फ्राषि बोले---तुम जन्म लेते ही हमारे मनको भी मथने
लगे हो । इसलिये छोकमें 'मन्मथ? नामसे विख्यात होओगे ।
मनोभव ! तीनों लोकोंमें तुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले
हो) तुम्हारे समान सुन्दर दूसरा कोई नहीं है; अतः कामरूप
होनेके कारण तुम “काम? नामसे भी विख्यात होओ। लोगोंको
मदमत्त बना देनेके कारण तुम्हारा एक नाम मदन? होगा |
तुम बड़े दर्पसे उत्पन्न हुए हो, इसलिये ८दर्पकः कहलाओगे
ओर सदर्प होनेके कारण ही जगतमें “कंदर्पः नामसे भी तुम्हारी
ख्याति होगी | समस्त देवताओंका सम्मिलित बलू-पराक्रम भी
तुम्हारे समाननहीं होगा । अतः सभी स्थानोंपर तुम्हारा अधिकार
होगा और ठुम सर्वव्यापी होओगे | जो आदि प्रजापति हैं, वे
ही ये पुरुषोंमें श्रेष्ठ दक्ष तुम्हारी इच्छाके अनुरूप पत्नी स्वयं
देंगे । वह ठम्हारी कामिनी ( तुममें अनुराग रखनेवाली )
होगी ।
भ्ह्माजीने कहा--सने | तदनन्तर मैं वहाँसे अहद्य हो
गया । इसके बाद दक्ष मेरी बातका स्मरण करके कंदर्षसे
बरेले--“कामदेव ! मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई मेरी यह कन्या
उन्दर रूप आर उत्तम गुर्णोसे सुशोमित है | इसे तुम अपनी
हे पत्नी बनानेके लिये अहण करो | यह गुणोंकी दृष्टिसे सर्वथा
न
५26८ गा.
अर का की. कती- नी कुछ 3 उन्न, कह: । ७) सकी जय 8 ० के सनम. > कीडिकमानमकाना + के. अर. पीना जा सम अब हा. आनामाा # क्स+ नर) रयाा। >मम >मक न ्मान-सामी- आग
तुम्हारे योग्य दे । महातेजस्वी मनोभव ! यह सदा तुम्हे सा
रहनेवाली और तुम्हारी रचिके अनुसार चलनेवाढ्य शेर
धमंतः यह सदा तुम्हारे अधीन रहेगी |
ऐशा कहकर दक्षने अपने शरीरके पसीनेसे प्रकट हुई
कन्याका नाम (रति? रखकर उसे अपने आगे वबेठावा ओः
कंदपेको संकल्पपृर्वक सॉप दिया। नारद | दक्षकी वह पुत्री
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ण्य रू] शा
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॥। आल
हम
पड़ी रमणीय और सुनियोंके मनको भी मोह लेनेवाली
उसके साथ विवाह करके कामदेवको भी बड़ी प्रसन्नता हू!
अपनी रति नामक सुन्दरी स्त्रीको देखकर उसके |
आदिसे अनुरक्षित हो कामदेव मोहित हो गया | वात | #
पमय बड़ा भारी उत्सव होने छगा; जो सबके झुखको का
वाला था । प्रजापति दक्ष इस बातको सोचकर बढ़े प्रतन'
कि मेरी पुत्री इस विवाहसे सुखी है। कामदेवको भी
छुख मिला । उसके सारे दुःख दूर हो गये। दक्षकया/॥
भी कामदेवको पाकर बहुत प्रसन्न हुई। जैसे « “० “
भनोहारिणी विद्युन्मालाके साथ मेघ शोभा पाता है? उी हे
रतिक्रे साथ प्रिय बचन बोलनेव[ला कामदेव वड़ी शोभा रा
जा इस प्रकार रतिके प्रति भारी मोहसे युक्त ९४४ ,
कामदेवने उसे उसी तरह अपने हृदयके सिंहासनपर ४०
रुद्गसंध्िता ]
# कामदेवके नामोंका निर्देश, उसका रतिके साथ विवाह #
_............------+> तल कसस्कस्स्सस्स्च्स्ल््स्स्स्चचससलतनललस्स्सिससिभतत
जैसे योगी पुरुष योगविद्याकों हृदयमें धारण करता है । इसी
प्रकार पूर्ण चन्द्रमुखी रति भी उस श्रेष्ठ पतिको पाकर उसी
तरह सुग्योभित हुईं जेसे श्रीहरिको पाकर पूणचन्द्रानना लक्ष्मी
शोभा पाती हैं ।
सूतजी कहते हँ--अज्याजीका यह कथन सुनकर
मुनिश्रेष्ठ नारद मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए. ओर मगवान्
शंकरका स्मरण करके हर्षपूवेक बोलि--५महाभाग | विष्णुशिष्य !
महामते | विधातः ! आपने चन्द्रमोलि शिवकी यह अद्भुत
; लीला कही है | अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि विवाहके
श्वात् जब कामदेव प्रसन््नतापूवेक अपने स्थानकी चला गया;
क्ष भी अपने घरको पघारे तथा आप ओर आपके मानस-
त्ञ भी अपने-अपने धामकी चले गये; तब पितरोंकों उत्पन्न
रनेवाली ब्रह्मकुमारी संध्या कहाँ गयी ? उसने क्या किया
गैर किस पुरुषके साथ उसका विवाह हुआ १ संध्याका यह
व चरित्र विशेषरूपसे बताइये ।
च्रह्माजीने कहा--मुने ! संध्याका वह सारा शुभ चरित्र
नो, जिसे सुनकर समस्त कामिनियाँ सदाके लिये सती-साध्यी
) सकती हैं | वह संध्या; जो पहले मेरी मानस-पुत्री थी, तपस्या
?रके शरीरको त्यागकर मुनिश्रेष्ठ मेघातिथिकी बुड्धिमती पुत्री
तीकर अरुन्धतीके नामसे विख्यात हुई | उत्तम त्रतका पालन
के उस देवीने ब्रह्मा) विप्णु और महेब्वरके कहनेसे श्रेष्ठ
तेधारी महात्मा वसिष्ठको अपना पति चुना | वह सोम्य स्वरूप
गली देवी सबकी बन्दनीया और पूजनीया श्रेष्ठ पतित्रताके
ः्पमें विख्यात हुई ।
नारदजीने पूछा--भगवन् | संध्याने केसे किसलिये
भेरि कहाँ तप किया ? किस प्रकार शरीर त्यागकर वह
मैधातिथिकी पुत्री हुई ? ब्रह्मा, विष्णु और शिव--इन तीनों
देवताओंके बताये हुए श्रेष्ठ त्रतधारी महात्मा वसिष्ठकोी उसने
विस तरह अपना पति बनाया ? पितामह |! यह सब में
बिस्तारके साथ मुनना चाहता हूँ । अरुन््धतीके इस कौतूहल्पूर्
चरिजिस्ध आप यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये |
भञ्माजीने कहा--मुने ! संध्याक्े मनमें एक बार सकाम
(त आ सया था, इसलिये उस साध्वीने यह निश्चय किया कि
रँ
।
“वैदिकमार्गके अनुसार मैं अग्निमें अपने इस शरीरकी आहुति दे
दूँगी । आजसे इस भूतछूपर कोई भी देहधारी उत्पन्न होते ही
काममावसे युक्त न हों; इसके लिये में कठोर तपस्या करके
मर्यादा स्थापित करूँगी ( तरुणावस्थासे पूर्व किसीपर भी काम-
का प्रभाव नहीं पड़ेगा) ऐसी सीमा निर्धारित करूँगी )। इसके
बाद इस जीवनको त्याग दूँगी |?
मन-ही-मन ऐसा विचार करके संध्या चन्द्रभाग नामक
उस श्रेष्ठ प्वेतपर चली गयी; जहाँसे चद्धमागा नदीका प्रादु-
भाव हुआ है | मनमें तपस्याका दृढ़ निश्चय ले संध्याको श्रेष्ठ
पर्वतपर गयी हुई जान मैंने अपने समीप बैठे हुए वेद-वेदाज्ों-
के पारंगत विद्वान) सर्वज्ञ) जितात्मा ,एवं ज्ञानयोगी पुत्र
वसिष्ठते कहा--'ब्रेटा वसिष्ठ | सनस्विनी संध्या तपस्याकी
अभिलाषासे चन्द्रमाग नामक पर्वतपर गयी है । तुम जाओ
ओर उसे विधिपूर्वक दीक्षा दो | तात | वह तपस्याक्े भावकों
नहीं जानती है | इसलिये जिस तरह तुम्हारे यथोचित उपदेशसे
उसे अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सके, बसा प्रयत्न करो ।?
नारद | मैंने दयापूर्वक जब वसिष्ठको इस प्रकार आज्ञा
दी; तब वे पजो आज्ञा? कहकर एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रुपमें
संध्याके पास गये । चन्द्रभाग पर्वंतपर एक देवसरोवर है;
जो जलाशयोचित गुर्णोंसे परिपूर्ण हो मानसरोवरके समान शोभा
पाता है। वसिष्ठने उस मरोबरको देखा और उसके तटपर
ब्रैठी हुई संध्यापर भी दृष्टिपात किया | कमलेंसे प्रकाशित
होनेवाला वह सरोवर तटपर बेंठी हुई संध्यासे उपलक्षित हो
उसी तरह सुश्योभित हो रहा था, जैसे प्रदोषकालमें उदित हुए
चन्द्रमा ओर नक्षत्रेसि युक्त आकाण शोभा पाता है । सुन्दर
भाववाली तंध्याको वहाँ ब्रैठी देख मुनिने कोतृहल्प्र्वक्क उस
वृहल्खोहित नामबाले सरोवरक्रों अच्छी तरह देखा |
प्राकारसूत पवतके शिखरसे दक्षिण समुद्रकी ओर जाती हुई
चन्द्रभागा नदीका भी उन्होंने दशन किया | जैसे गद्य हिमा-
लयसे निकलकर समुद्रकी ओर जाती है; उसी प्रकार चन्द्रभाग-
के पश्चिम शिखरका भेदन करके बह नदी समुद्रकी ओर जा
रही थी | उस चन्द्रमाग प्रतपर वृहल्ओोट्टित सरोबरके किनारे
बैठी हुई संध्याकों देखकर बस्श्चिजीने आदरपएचक एटा |
१६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने
[ संक्षिप्त-शिवपुराणए
अति व-िफकनीरिआलन उजन जन 3 असन। 3. सिननानन न. >अंणक,
आओ. "रमन "जनम री आज जी ऑकिाओज कक तन.
पड़े तो आप मुझे तपस्याक्री विधि बताइये | में यही कर
चाहती हूँ | दूसरी कोई भी गोपनीय बात नहीं है | में ला
के भावक्री--डसके करनेके नियमको बिना जाने ही तपोक़ों
आ गयी हूँ । इसलिये चिन्तासे सूखी जा रही हूँ. और ग्रे
हृदय कॉपता दे ।
संध्याकी वात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने। गे -
स्वयं सारे कार्योके शाता थे, उससे दूसरी कोई वात का
पूछी । वह मन-ही-मन तपस्याका निश्चय कर चुकी थी हो!
रँ है है । हु ही ै न +०॥४ के
!॥ |] 5
[., 5-५0 ॥'
९ ' है ॥। | ं
नम
जिन व अत. आा
आसन 0 ही डर $
| ६
है
। | हे
2
वसिष्ठज़ी बोले--भद्रे ! तुम इस निजन पर्वेतपर किस-
लिये आयी हो १ किसकी पुत्री हो ओर तुसने यहाँ क्या करने-
का विचार किया है ? में यह सब सुनना चाहता हूँ । यदि
छिपाने योग्य बात न हो तो बताओ ।
महात्मा वसिष्ठकी यह बात सुनकर संघ्यानें उन महात्मा-
की ओर देखा । वे अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान
प्रकाशित हो रहे थे | उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था;
मानो ब्रह्मचय देह घारण करके आ गया हो । वे मस्तकपर
जटा धारण किये बड़ी शोमा पा रहे थे | संध्याने: उन तपोघन-
को आदरपूर्वक प्रणाम करके कहा |
संध्या वोली--अह्मन् ! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ । मेरा
॥|
: नाम संध्या है ओर मैं तपस्या करनेके लिये इस निर्जन पर्वतपर
आयी हूँ । यदि मुझे उपदेश देना आपको उचित जान
"7०४०-84 8---9---
उसके लिये अत्यन्त उद्यमशील थी | उस समय पर
मनसे भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण करके
प्रकार कहा | ु
वसिष्ठजी बोले--झ्भानने ! जो सबसे महान् :
उत्कृष्ट तेज हैं, जो उत्तम और महान तप हैं तथा जो र
परमाराध्य परमात्मा हैं, उन भगवान् शम्भुकों तुम हृ
धारण करो । जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम ओर में
आदिकारण हैँ, उन त्रिछोकीके आदिसष्ठा, अद्वितीव पु
त्तम शिवका भजन करो | आगे बताये जानेवाले मन्त्र दे
शम्भुकी आराधना करो | उससे तुम्हें सब कुछ मिल जा
इसमें संशय नहीं है | “3४ नमः झंकराय 3“? इस मः
निरन्तर जप करते हुए मौन तपस्या आरम्भ करो ओर ६
नियम बताता हूँ उन्हें सुनो | तुम्हें मोन रहकर ही र्
करना होगा; मौनालम्बनपूर्वक ही महादेवजीकी पूजा करनी है
प्रथम दो बार छठे समयमें तुम केवछ जलका पूर्ण अं
कर सकती हो । जब तीसरी बार छठा समय आये; तबते
उपवास किया करो | इस तरह तपस्याकी समाप्तितक
कालमें जलाहार एवं उपवासकी क्रिया होती रहेगी । दें
इस प्रकार की जानेवाली मोन तपस्या ब्रह्मचयका फल देने
तथा सम्यूर्ण अभीश मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली होती है।
सत्य है; सत्य है, इसमें संशय नहीं है | अपने चित्तमें !
शुभ उद्देश्य लेकर इच्छानुसार शंकरजीका चिन्तन करे!
प्रसन्न होनेपर तुम्हें अवश्य ही अभीष्ट फल प्रदान करेंगे।
इस तरह संध्याकी तपस्या करनेकी विधिका
दे मुनिवर वसिष्ठ यथोचितरूपसे उससे बिदा ले वहीं अर्तों
हो गये । ( अध्याय ३८
संध्याकोी तपस्या, उसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति क् तथा उससे संतुष्ट हुए
शिवका उसे अभीष्ट वर दे सेघातिथिके यज्ञमें भेजना
त्रह्माजी कहते हँ--मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ नारद |
तपस्पाके नियमका उपदेश दे जब वसिष्ठजी अपने घर चले गये,
तब तपके उस विधानकी समझकर संध्या मन-ही-मन बहुत प्रसन्न
हुई। फिर तो वह सान॑न््द यनसे तपस्विनीके योग्य वेष बनाकर
बृहल्लोहित सरोबरके तट्पर ही तपस्या करने लगी । वि
तपस्याके लिये जिस मन्त्रको साघन बताया था, उसीते ५.
भक्तिभावके साथ वह भगवान् शंकरको आराधना करे #*
उसने भगवान् शिबम अपने चित्तको छंगा दिया ओ९ ५
रुद्टसंहिता |
मनसे वह बड़ी भारी तपस्या करने छूगी । उस तपस्थामें लगे
हुए. उसके चार युग व्यतोत हो गये । तब मगवान् शिव
उसकी तपस्थासे संतुष्ट हो बड़े प्रसन्न हुए तथा बाहर-भीतर
ओर आकाशमें अपने स्वरूपका दर्शन कराकर जिस रूपका वह
चिन्तन करती थी; उसी रूपसे उसकी आँखोंके सामने प्रकट
हो गये | उसने मनसे जिनका चिन्तन किया था; उन्हीं प्रभु
शंकरकों अपने सामने खड़ा देख वह अत्यन्त आनन्दर्मे निमम
हो गयी । भगवानका 'मुखारविन्द बड़ा प्रसन्न दिखायी देता
था | उनके स्वरूपसे शान्ति बरसरही थी | वह सहसा भय-
भीत हो सोचने लगी कि “में भगवान् हरसे कया कहूँ १ किस
तरह इनकी स्तुति करू !? इसी चिन्तार्में पड़कर उसने अपने
दोनों नेत्र बंद कर लिये | नेत्र बंद कर लेनेपर भगवान्
शिवने उसके हृंदयमें प्रवेश करके उसे दिव्य शान दिया;
दिव्य वाणी ओर दिव्य दृष्टि प्रदान की | जब उसे दिव्य ज्ञान
दिव्य दृष्टि और दिव्य वाणी प्राप्त हो गयी, तब वह कठिनाईसे
शत होनेवाले जगदीश्वर शिवको प्रत्यक्ष देखकर उनकी स्तुति
फरने ल्गी।
छ ( ५ ८ 4 ३
27
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हल ० डक. टन का
सध्य पाली--हो निराकार और परम हानगम्य हु,
' एे स्थपूल ६ जे सूध्म ओर न उच्च ही हैं तथा जिनके
पल पु अं ६५--
# संध्याकी तपस्या; उसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति #
१९३
खरूपका योगीजन अपने हृदयके भीतर चिन्तन करते हैं;
उन्हीं लोकलश आप मगवान् शिवको नमस्कार है | जिन्हें
शर्व कहते हैं, जो शान्तस्वरूप) निर्मछ+ निर्विकार ओर ज्ञान-
गम्य हैं, जो अपने ही प्रकाशमें स्थित हो प्रकाशित होते हैं;
जिनमें विकारका अत्यन्त अमाव है; जो आकाशमार्गकी भाँति
निर्गुण; निराकार बताये गये हैं तथा जिनका रूप अज्ञानान्धकार-
मार्गसे स्वथा परे है, उन नित्यप्रसन्ल आप मगवान् शिवको
में प्रणाम करती हूँ | जिनका रूप एक ( अद्वितीय » झुद्ध;
बिना मायाके प्रकाशमानः सच्िदानन्दमय, सहज निविकार,
नित्यानन्द्मय, सत्य; ऐसे युक्त) प्रसन्न तथा लक्ष्मीको देने-
वाला है, उन आप भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके
स्वरूपकी ज्ञानख्पसे ही उद्धावना की जा सकती है, जो इस
जगतसे सर्वथा भिन्न हे एवं सतच्यप्रधान। ध्यानके योग्य;
आत्मखरूप, सारभूत, सबकी पार लगानेवाला तथा पवित्र
वस्तुओमें भी परम पवित्र है, उन आप महेश्वरकों मेरा नमस्कार
है । आपका जो खरूप शुद्ध, मनोहर, रल्ममय आूषणोंसे
विभूषित तथा खच्छ कर्पूरके समान गौरवर्ण है; जिसने अपने
हाथोंमें वर: अभय; शूछ ओर मुण्ड धारण कर रक््खा है; उस
दिव्य; चिन्मय; समुण, साकार विग्नहसे सुशोमित आप योगयुक्त
भगवान् शिवको नमस्कार है.। आकाश) पृथ्वी, दिशाएँ; जल,
तेज तथा काल--ये जिनके रूप हैं; उन आप परमैश्वरको
नमस्कार है। #
हि : संध्योवाच--- ः
निराकारं श्ञानगम्य॑ पर यन्नेव स्थू् नापि सृक्ष्म॑ न चोच्चम ।
अन्तश्चिन्त्य॑ योगिमिस्तस्त॒ रूपं तस्मे त॒ुभ्यं लोककत्रें नमो5स्तु ॥
शव शान्त निर्मल निविकारं शानगम्यं खप्रकाशे5विकारम ।
खाध्वप्रख्य॑ ध्वान्तमार्गोत्परस्ताद रुप॑ य॒स्य त्वां नमामि अ्सन्नम ॥
एक शुद्ध दीप्यमानं विनाजां चिदानन्द सहज चाविकारि।
नित्यानन्द सत्यभूतिप्रतन््न॑ यस्य श्रीद॑ रूपमस्म नमस्ते ॥
विधाकारोड्भाव घ्वेयनात्मखरूपम् ।
सारं पारं पावनानां पवित्र तस्मे रूपं यस्य चैंव॑ नमस्ते ॥ .
गय॑ प्रभिन्न सच्चच्छन्द
यत्वाकारं शुरूरूप॑ मनो्ष रलाकल्प॑ खच्छकपूरगीरम् ।
इष्टानीती शल्मुण्डे दवानं हस्तेंनेगों योगयुक्ताय तुन्यम ॥
ज्योतिरेव
सलित्द
श लो बट
गगन भृदिशरश्थेद चर]
पुनः: फाल्य रूुपाशि यस्य हुम्य॑ नमंध्स्तु से॥
( शि० घु० रु० सं० स० खं० ६! १२-२७ )
8: रे
११४
प्रधान ( प्रकृति ) ओर पुरुष जिनके शरीरूपसे प्रकट
हुए हैं अर्थात् वे दोनों जिनके शरीर हैं, इसीलिये जिनका
यथार्थ रूप अव्यक्त ( बुद्धिआदिसे परे ) है, उन भगवान् दंकर-
को बारंबार नमस्कार है। जो ब्रह्मा होकर जगतकी ख्टि
करते हैं; जो विष्णु होकर संसारका पालन करते हैं तथा जो
रुद्र होकर अन्तमें इस खश्टिका संहार करेंगे; उन्हीं आप
भगवान् सदाशिबको बारंबार नमस्कार है | जो कारणके भी
कारण हैं; दिव्य अमृतरूप ज्ञान तथा अणिमा आदि ऐश्वर्य प्रदान
करनेवाले हैं; समस्त लोकान्तरोका वेभव देनेबाले हैं; स्वयं
प्रकाशरूप हैं तथा प्रकतिसे भी परे हैं, उन परमेश्वर शिवको
नमस्कार है; नमस्कार है | यह जगत जिनसे भिन्न नहीं कहा
जाता; जिनके चरणोंसे एथ्बी तथा अन्यान्य अज्ञेसि सम्पूर्ण
दिशाएँ, सूर्य; चन्द्रमा, कामदेव एवं अन्य देवता प्रकट हुए.
हैं ओर जिनकी नाभिसे अन्तरिक्षका आविर्भाव हुआ है, उन्हीं
आप भगवान् शम्म्रुको मेरा नमस्कार है। प्रमो | आप ही
सबसे उत्कृष्ट परमात्मा हैं; आप ही नाना प्रकारकी विद्याएँ
हैं, आप ही हर (संहारकर्ता) हैं, आप ही सद्॒ह्म तथा परब्रह्म हैं, आप
सदा विचारमें तत्पर रहते हैं ।जिनका न आदि है; न मध्य है ओर
न अन्त ही है; जिनसे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है तथा जो मन
और वाणीके विषय नहीं हैं, उन महादेवजीकी स्तुति मैं केसे
कर सकूँगी १ # द
ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्यथाके धनी भुनि भी जिनके
रूपोंका वर्णन नहीं कर सकते, उन्हीं परमेश्वरका वर्णन अथवा
स्तवन मैं केसे कर सकती हूँ १ प्रभो | आप निगुंण हैं, मैं मूढ़
+# प्रधानपुरुषी.. यस्य कायत्वेन विनिग॑तौ ।
तस्मादव्यक्तरूपाय. शंकराय. नमो नमः ॥
यो बह्या कुरुते सृष्टि यो विष्णु: कुरुते स्थितिम् ।
संहरिष्यति यो रुद्वस्तस्मे तुम्य॑ नमो नमः ॥
नमो नमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय ।
समस्तलोकान्तरमूतिदाय प्रकाशरूपाय परात्पराय ॥
यस्थापरं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिर्दिश: सूर्य इन्दुर्मनोज: । .
- बहिमुखा नाभितश्ान्तरि्षं तस्मे तुम्य॑ं शम्भवे मे नमो5स्तु ॥
_त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः ।
सदुब़्द्दा च पर॑ बहा विचारणपरायण: ॥
यस्य नादिन मध्य च नान्तमस्ति ,जगद्यतः |
कथ्य॑ स्तोष्यामि त॑ देवमवाइमनसगोचरम् ॥
(शि० पु० रृ० सृं9 स्० ख्ं० ६। १८--४३ )
%* नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5
[ संक्षिप्त शिवपुराण[
स्री आपके गुणोंकी केसे जान सकती हूँ? आपका खत
' ऐसा है; जिसे इन्द्रसद्दित सम्पूर्ण देवता ओर असुर भी हू
जानते हैं | महेशवर ! आपको नमस्कार है | तगोमय | आफ
नमस्कार है। देवेश्वर द्ाम्भी ! मुझपर प्रसन्न होइवे | आफ
बारंबार मेरा नमस्कार है |£
ब्रह्मजी कहते ह--नारद | संध्याक्ा यह सुगित
वचन सुनकर उसके द्वारा भलीभाँति प्रशंसित हुए मततहः
परमेश्वर शंकर बहुत प्रसन्न हुए. | उसका दरीर वल्कहःर
मगचर्मसे ढका हुआ था | मस्तकपर पवित्र जजूटः
पा रहा था| उस समय पालेके मारे हुए. कमलके समानउ
कुम्हलाये हुए मुँहको देखकर भगवान् हर दसयासे द्रवित
उससे इस प्रकार बोले |
महेश्वरने कहा--भद्े ! में तुम्हारी इस उत्तमतफः
बहुत प्रसन्न हूँ । शुद्ध बुद्धिवाली देवि | तुम्हारे इस सा
भी मुझे बड़ा संतोष प्रात हुआ है | अतः इसपए
अपनी इच्छाके अनुसार कोई वर माँगो | जिस बसे
प्रयोजन हो तथा जो तुम्हारे मनमें हो, उसे में यहाँअवश्न
करूँगा । तुम्हारा कल्याण हो । में तम्हारे अतनीय
बहुत प्रसन्न हूँ ।
प्रसन्नचित्त महेश्वरका यह वचन सुनकर अल
हषसे भरी हुई संध्या उन्हे वारंबार प्रणाम क
बोली-महेश्वर ! यदि आप मुझे प्रसन्नतापूवेक
देना चाहते हैं, यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ? यदि
शुद्ध हो गयी हूँ तथा देव ! यदि इस समय आए
तपस्मासे प्रसन्न हैं तो मेरा माँगा हुआ यह पहला वर थे
करे । देवेश्वर | इस आकाशमें प्रथ्वी आदि किसी मी र्साः
जो प्राणी हैं, वे सब-के-सब जन्म लेते ही काममावसे व
हो जायें । नाथ ! मेरी संकाम दृष्टि कहीं न पढ़े । मेरे जे
हों) वे भी मेरे अत्यन्त सुद्दद् हों । पतिके अतिरिक्त जे
पुरुष मुझे सकामभावसे देखे, उसके पुरुषत्वका ने
_जाय- वह तत्काछ नपुंस हो जाय || हो जाय |
# यस्य जअह्यादयो देवा सुनयश्च तपोपनाः |
न॒विषृण्वन्ति रूपाणि बर्णनीयः कथ॑ से में॥
स्त्रिया मया ते कि शेया नि्मृणस्थ ग॒ुणाःप्रभो।
नेव जानन्ति यद्रूप॑ं सेन्द्रा अपि सुराप्वएः॥ -
नमस्तुभ्यं॑ महेशान. नमस्तुम्यं तपोमव |
प्रसीद शम्मों देवेश भूयों भूयोंनमोइखते।
(, शजि० पु० रु0 सं० स० खं० ६ | रहना
रुद्रसंहिता ] .. # संध्याकी आत्माहुति,; उसका अरुन्धतीके रूपमे चसिष्ठके साथ विवाह #
्लल्ल्ज्््?य््लट्य्ःय्स्चच्चच्च्च्स्स्स्स्च्स्थस्स्य्थच्च्स्स्च्स्च्च्च्स्स्स््स्च्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सि
निष्पाप संध्याका यह वचन खुनकर प्रसन्न हुए
भक्तव॒त्सल भगवान शंकरने कहा--देवि संध्ये | सुनो |
भद्दे ! तुमने जो-जो बर माँगा है;, वह सब तुम्हारी तपस्यास
: संतुष्ट होकर मैंने दे दिया | प्राणियोंके जीवनमें मुख्यतः चार
अवश्ाएँ: होती है--पहली शेशवावस्थाः दूसरी कोमारावस्थी)
सरी योवनावथा ओर चोथी बुद्धावस्था | तीसरी अवस्था
प्र होनेपर देहधारी जीव कामभावसे युक्त होंगे | कहीं-कहीं
सरी अवस्थाके अन्तिम भागमें ही प्राणी सकाम हो जाये |
खारी तपस्थाके प्रभावसे मैंने जगतर्मे सकाममावके उदयकी
ह मर्यादा स्थापित कर दी है; जिससे देहघारी जीव जन्म
ते ही कामासक्त न हो जायें | ठुम भी इस लोकमें बसे दिव्य
तीमावको प्राप्त करो; जेसा तीनों लोकोंमें दुसरी किसी र््लीके
5ये सम्भव नहीं होगा । पाणिग्रहण करनेवाले पतिके सिवा
गत कोई भी पुरुष सकाम होकर तुम्हारी ओर देखेगा। वह
त्काल नपुंसक होकर दुर्बलताको प्राप्त हो जायगा । तुम्ददरे
ति महान् तपख्वी तथा दिव्यूरूपसे सम्पन्न एक महाभाग
हर्पि होंगे, जो तुम्हारे साथ सात कल्पोंतक जीवित रहेंगे | तुमने
अझसे जो-जो बर माँगे थे; वे सब मैंने पूर्ण कर दिये। अब
में तुमसे दूसरी बात कहूँगा जो, पूर्वजन्मसे सम्बन्ध रखती
है । तुमने पहलेसे ही यह प्रतिशा कर रक्खी है कि में अमिनिमें
अपने शरीरकी त्याग दूँगी। उस प्रतिशकोी सफल करनेके
लिये में तुर्म्ह एक उपाय बताता हूँ । उसे निस्संदेह करो ।
मुनिवर मेधातिथिका एक यज्ञ चल रहा है; जो बारह वर्षोतक
'चादू रहनेवाछा है । उसमें अग्नि पूर्णतया प्रज्वलित है | ठ॒ुम
बिना विलम्ब किये उसी अम्निमें अपने शरीरका उत्स्े कर
दो। इसी पर्वतकी उपत्यकामें चन्द्रभागा नदीके तथ्पर
'तापसाभ्षममं मुनिवर मेघातिथि महायज्ञषका अनुष्ठान करते हैं ।
व्म खच्छन्दतापूवक वहाँ जाओ । मुनि तुम्हें वहाँ देख नहीं
सकेंगे | मेरी कृपासे तुम सुनिकी अग्निसे प्रकट हुई पुत्री
होओगी | तुम्हारे मनमें जिस किसी खामीको प्राप्त करनेकी
इच्छा हो, उसे हृदयमें धारणकर, उसीका चिन्तन करते हुए
तुम अपने शरीरकी उस यश्ञकी अग्निमं होम दो । संष्ये |
जब तुम इस पर्वतपर चार युगोतकरकके लिये कठोर तपस्या
कर रही थी, उन्हीं दिनों उस चतुर्थगीका सत्ययुग बीत जानेपर
न्ञेताके प्रथम भागमें प्रजापति दक्षके बहुत-सी कन्याएँ हुईं ।
उन्होंने अपनी उन सुशीला कन्याओंका यथायोग्य वरोंके साथ
विवाह कर दिया । उनमेंसे सत्ताईस कन्याओंका विवाह उन्होंने
चन्द्रमके साथ किया । चन्द्रमा अन्य सब पत्नियोंकी छोड़कर
केवल रोहिणीसे प्रेम करने लगे | इसके कारंण क्रोचसे भरे हुए,
दक्षने जब चन्द्रमाकी शाप दे दिया; तब समस्त देवता तुम्हारे
पास आये | परंतु संष्ये | तुम्हारा मन तो मुझमें छगा हुआ
था; अतः तुमने ब्रह्माजीके साथ आये हुए उन देवताओंपर
दृष्टिपात ही नहीं किया। तब ब्रह्माजीनी आकाशकी ओर
देखकर ओर चन्द्रमा पुनः अपने खरूपको प्राप्त करें; यह उद्देश्य
मनमें रखकर उन्हें शापसे छुड़ानेके लिये एक नदीकी सृष्टि
की) जो चन्द्र या चन्द्रभागा नदीके नामसे विख्यात हुई ।
चन््रभागाके प्रादुर्भावकालमें ही महर्षि मेघातिथि यहाँ
उपस्थित हुए थे । तपस्याके द्वारा उनकी समानता करनेवाला
न तो कोई हुआ है, न है ओर न होगा ही। उन महर्पिने
महान् विधि-विधानके साथ दीघेकालतक चलनेवाले ज्योतिष्टोम-
नामक यज्ञका आरम्भ किया है। उसमें अग्निदेव पूर्णरूपसे
प्रज्यलित हो रहे हैं | उसी आगमें तुम अपने थरीरको डाल
दो ओर परम पवित्र हो जाओ | ऐसा करनेसे इस समय
तम्हारी वह प्रतिज्ञा पूर्ण हो जायगी ।
इस प्रकार संध्याकोी उसके हितका उपदेश देकर देवेश्वर
भगवान् शिव वहीं अन्तर्घान हो गये । ( अध्याय ६ )
संध्याकी आत्माहुति, उसका अरुन्धतीके रूपमें अवतीर्ण होकर मुनिवर वसिष्ठके साथ विवाह करना,
श्रह्माजीका रुद्रके विवाहके लिये प्रयन्न आर चिन्ता तथा भगवान विष्णुका उन्हें
शिवा! की आराधनाके लिये उपदेश देकर चिन्तामुक्त करना
॒ पह्माजी कहते हैँ--नारद ! जब वर देकर भगवान्
के अन्तर्धान हो गये, तब संध्या भी उसी स्थानपर गयी;
जे मुनि मेघातिथि यश कर रहे थे। भगवान शंकरकी कृपासे
उसे क्िधीने वर्दो नहीं देखा | उसने उस तेजखी ब्रह्मचारीका
पे फिया। जिसने उसके लिये तपस्याकी विधिका उपदेश
० ४) झएजुने | पूवकालमें महृषि वतिष्ठने मस्त परमेह्ठीकी मृनियेनि उते नहों देखा । मक्षाडीकी वर एूपी बढ़े हक
आज्ञसे एक तेजस्वी ब्रह्मचारीका वेष घारण करके उसे तपत्या
करनेके लिये उपयोगी निवर्मोका उपदेश दिया था । संब्या
अपनेको तपस्याका उपदेश देनेवाले उन्हीं त्रह्मचारी ब्राह्मण
वसिष्ठको पतिरुपसे मनमें रखकर उस मद्रायशमें प्रस्वल्ति
अमिके समीप गयी। उस समय भगवान् दांकरकी झृपासे
जज
बी ।
ल्शर् , रु
के 7
१ ५ नमी रुद्गायं शान्ताय त्रह्मण परमात्मने ? [ संक्षिप्त-शिवपुराणा
- जब
हा
साथ उस अम्रिमें प्रविष्ट हो गयी । उसका पुरोडाशमय शरीर
तत्काल दुग्ध हो गया । उस पुरोडाशकी अलक्षित गन्ध सब
ओर फैल गयी । अभिने भगवान् शंकरकी आज्ञसे उसके
सुवर्ण-जैसे शरीरकी जलाकर झुद्ध करके पुनः सूग्रमण्डलमें पहुँचा
दिया । तब सूर्यने पितरों और देवताओंकी तृप्तिके लिये उसे
दो भागोंमें विभक्त करके अपने रथरम स्थापित कर दिया ।
मुनीश्वर | उसके शरीरका ऊपरी भाग प्रातःसंध्या
हुआ जो दिन और रातके बीचमें पड़नेबाली आदिसंध्या है
तथा उसके शरीरका शेष भाग सायंसंध्या हुआ, जो दिन और
रातके मध्यमें होनेवाली अन्तिम संध्या है। सायंसंध्या सदा
ही पितरोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाली होती है। सुयोदयसे
पहले जब अरुणोदय हो--प्रात्रीके क्षितिजमें लाली छा जाय;
तब प्रातःसंध्या प्रकट होती है; जो देवताओंको प्रसन्न करने-
वाली है। जब छाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाते हैं,
उसी समय सदा सायंसंध्याका उदय होता है; जो पितरोंको
आनन्द प्रदान करनेवाली है। परम दयाहु भगवान् शिवने
उसके मनसहित प्राणोंको दिव्य झरीरसे युक्त देहधारी बना
दिया । जब मुनिके यश्ञकी समाप्तिका अवसर आया; तब वह
अशिकी ज्वालामें महषि मेघातिथिको तपाये हुए! सुवर्णकी-सी
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कान्तिवाली पुत्नीके रुपमें प्राप्त हुई। सुनिने बड़े आमोदके सा।
उस समय उस पुतन्नीकों ग्रहण किया । मुने | उन्होंने यनके ट्ि
उसे नहृत्यकर अपनी गोदमें बिठा लिया । शिप्येसे बिरे हुए
महामुनि मेधातिथिको वहाँ बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। उन्हे
उसका नाम “अरुन्वती? रक््खा | बह किसी भी कारण पर
का अवरोब नहीं करती थी; अतः उसी गुणके कारण उसे
स्वयं यह नभिभ्ुवनविख्यात नाम प्राप्त क्रिया । देवप॑ | बे
समाप्त करके कृतक्ृत्य हो वे मुनि पुत्रीकी प्राप्ति होनेसे कह
प्रसन्न थे ओर अपने शिप्वोक्रे साथ आश्रममें रहकर
उसीका लालन-पोलन करते ये। देवी अरुन्धती चन्द्रभागाः
के तय्पर तापसारण्यक्रे भीतर मुनिवर मेघातिथिके उस आः
में धीरे-घीरे बड़ी होने लछगी। जब बह विवाहके योग्य हो।
तब मैंने, विष्णु तथा महेश्वरने मिलकर मुझ ब्रह्माके पुत्र व
के साथ उसका विवाह करा दिया । ब्रह्मा) विष्णु तथा
के हाथोंसे निकले हुए जलसे शिग्रा आदि सात परम १
नदियाँ उत्पन्न हुई |
मुने ! मेघातिथिकी पुत्री महासाथ्वी अखन्यती
पतित्रताओंम श्रेष्ठ थी, वह महर्षि वसिष्ठको पतिरुप्र्म १
उनके साथ बड़ी शोमा पाने छगी | उससे शक्ति आदिः
एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए. । मुनिश्रेष्ठ | वह प्रियतम '
वसिष्ठको पाकर विशेष शोमा पाने लगी । मुनिशिरोमणे !'
प्रकार मेंने तुम्हारे समक्ष संध्याके पविन्न चरित्रका वणन
है, जो समस्त कामनाओंके फर्लोको देनेवाला परम पा
ओर दिव्य है । जो स््री या शुभ ब्रतका आचरण करनेग'
पुरुष इस प्रसज्ञको सुनता हैं, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्रातः
लेता है | इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं!
प्रजापति ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीग॥#
प्रसन्न हो गया ओर वे इस प्रकार बोले |
नारदजीने कहा--त्रह्मत् | आपने अंरुन्धतीकी 7
पूव॑जन्ममें उसकी स्वरूपभूता संध्याकी बड़ी उत्तम |]
कथा सुनायी है, जो शिवभक्तिक्ी वृद्धि करनेवाली
धर्मश ! अब आप भगवान् शिवके उस परम की
चरित्रका वर्णन कीजिये, जो दूसरोंके पापोंका विनाश करने]
उत्तम एवं मड्जडलदायक है । जब कामदेव रतिसे विवाई
हृषपूपंक चला गया; दक्ष आदि अन्य मुनि भी जब ०'
अपने स्थानको पधारे और जब संध्या तपस्या करेंरें
चली गयी, उसके याद वहाँ क्या हुआ !
रुद्रसंहिता |
खिल ्खि्यि्य्श्य्य्यिथ्यथ्य्य्य्य्य्य्प्ज्स्स्स्ल्लि्िििा:ःःःड:::ः:ः:ः:::ः::।:।७ अं: ड:ड डखअअजचड८चजचचघचअक्अचयअबच_अक्अहअहअॉइडइंइडि-ओ:
प्रह्मजीने कहा--विप्रवर नारद | तुम धन्य हो;
भगवान् शिवक्रे सेवक हो; अतः शिवकी लीलासे युक्त जो
उनका शुभ चरित्र है; उसे भक्तिपूवक सुनो | वात ! पूवकालमें
में एक बार जब मोहमें पड़ गया ओर भगवान शंकरने मेरा
उपहास किया। तब मुझे बड़ा क्षोम हुआ था । बस्ठुतः
दिवकी मायाने मुझे मोह लिया था; इसलिये में मगवान् शिव-
के प्रति ईर्प्या करने लगा | किस प्रकार, सो बताता हूँ; सुनो ।
में उस खानपर गया; जहाँ दक्षराज सुनि उपस्थित थे। वहीं रतिके
साथ कामदेव भी था | नारद | उस समय मैंने बड़ी प्रसन्नताके
ताथ दक्ष तथा दूसरे पुत्रोंको सम्बोधित करके वार्ताल्ञप आरम्भ
किया। उसवार्तातपके समय मैं शिवकी मायासे पूर्णतया मोहित था;
अतः मैंने कहा--“पुन्रो ! तुम्हें ऐसा प्रयक्ष करना चाहिये;
जिससे महा[देवजी किसी कमनीय कान्तिवाली स्त्रीका पाणिग्रहण
करें |? इसके बाद मैंने भगवान् शिवकों मोहित करनेका भार
रतितहित कामदेवकी सौंपा । कामदेवने मेरी आज्ञा मानकर
फहा--प्रभो | सुन्दरी सत्री ही मेरा असर है; अतः शिवजीको
मोहित करनेके लिये किसी नारीकी सृश्टि कीजिये |? यह सुनकर
मे चिन्तामें पड़ गया और लंबी साँस खोंचने छगा । मेरे उस
निःश्वससे राशि-राशि पुष्पोति विभूषित वसन्तका प्रादु्भाव हुआ।
_बसन्त ओर मल्यानिछ-ये दोनों मदनके सहायक हुए. । इनके
साथ जाकर कामदेवने वामदेवकोी मोहनेकी बारंबार चेश की;
परंतु उसे सफलता न मिली । जब वह निराद्य होकर लौट
आया; तब उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ | उस समय
मेरे मुखसे जो निःश्वासवायु चली, उससे मारगणोंकी उत्पत्ति हुई
उन्हें मदनकी सहायताके लिये आदेश देकर मैंने पुनः उन सबको
'शिवजीके पास भेजा, परंतु महान प्रयकज्ञ करनेपर भी वे
भगवान् शिवकी मोहमें न डाछ सके | कास सपरिवार लौट
; भाया ओर मुझे प्रणाम करके अपने स्थानकी चत्य गया |
के उसके चले जानेपर मैं सन-ही-मन सोचने लगा क्रि
£ कोर तथा सनकी बदमें रखनेवाले योगपरायण भगवान
। पार किसी क्लीको अपनी सहधर्मिणी बनाना कैसे खीकार
/ *गे। यही सोचते-सोचते मैंने भक्तिभावसे उन भगवान्
. भोहरिक्ा स्मरण किया; जो साक्षात् शिवस्वरूप तथा भेरे
/ पके जन्मदाता हैं | मैंने दीन वचनोंसे युक्त शुभ सोज्नों-
«४... उनपेत स्तुति दी | उस स्तुतिको सुनकर भगवान् शी ही
; मेरे ने प्रकट हो गये । उनके चार मुजाएँ शोभा पाती
५ । नेत्र मऊुस्ल दामलके समान सुन्दर थे | उन्होंने ह्ार्थोर्म
“हैं! इक, गया और पद्म ले रखे थे | उनके श्याम शरीर-
्ज
& खंध्याकी आत्माहुति, उसका. अरुन्धतीके रूपमें वसिष्ठके साथ विवाह ४
“जननी पम-पा+पाकननी++3+++कर पाक "पाक मा
२७
पर पीताम्बरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे भगवान श्रीहृरि
भक्तप्रिय हैं---अपने भक्त उन्हें बहुत प्यारे हैं | सबके उत्तम
रारणदाता उन श्रीहरिको उस रूपमें देखकर भेरे नेत्रोंसे
प्रेमाश्रुओंकी घारा बह चली ओर मैं गद्॒द कण्ठते बारबार
उनकी स्तुति करने लगा । मेरे उस स्तोत्रको सुनकर अपने
भक्तोके दु:ख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न हुए
और दारणमें आये हुए मुझ ब्रह्मसे बोले--महाप्राश
विधातः ! छोकसश बह्मन् | तुम धन्य हो। बताओ,
तुमने किसलिये आज मेरा स्मरण किया है और किस
निमित्तसे यहं स्तुति की जा रही है ? तुमपर कौन-सा महान
दुःख आ पड़ा है? उसे मेरे सामने इस समय कहो। मैं
वह सारा दुःख मिट दूँगा । इस विषयमें कोई संदेह या
अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये |?
तब ब्रह्माजीने सारा प्रसकड़ सुनाकर कहा--“केशव ! यदि
भगवान् शिव किसी तरह पत्नीको ग्रहण कर लें तो में सुखी
हो जाऊंगा, मेरे अन्तःकरणका सारा दुःख दूर हो जायगा )
इसीके लिये में आपकी शरणमें आया हूँ ।?
मेरी यह बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और
मुझ लोकलश ब्रह्माका ह॑ बढ़ाते हुए मुझसे शीज्र ही यों
बोले---“विधातः | तुम मेरा वचन सुनो । यह तुम्हारे भ्रमका
निवारण करनेवाल्य है। मेरा वचन ही वेद-श्ाखत्र आदिका
वास्तविक सिद्धान्त है । शिव ही सबके कर्ता-मर्ता ( पालक )
ओर हर्ता ( संहारक ) हैं | वे ही परात्पर हैं | पर्रह्म) परेश;
निगुग; नित्य) अनिर्देश्य; निर्विकार, अद्वितीय,अच्युत, अनन्त,
सबका अन्त करनेवाले, खामी और सर्वव्यापी परमात्मा एवं
परमेश्वर हूँ | यंष्टि पाछन और संहारके कर्ता, तीनों गुणोंको
आश्रय देनेवाले, व्यापक; ब्रह्मा) विष्णु और महेश नामसे
प्रसिद्ध, रजोगुण, सत्ततगुण तथा तमोगुणसे परे, मायासे ही भेद-
युक्त प्रतीत होनेवाले, निरीह, मायारहित, मायाके स्वामी या
प्रेरक, चतुर, समुण, खतन्त्र, आत्मानन्द्खरूप निर्विकल्प,
आत्माराम) निद्वन्द्र, भक्तपरवश, सुन्दर विग्रहसे सुशोभित,
योगी, नित्य ब्ोगपरायण, योगमार्गदर्शक, गर्बहारी, लोफेश्वर
ओर सदा दीनवत्सल हैं | ठुम उन्हींकी शरणमें जाओ |
सर्वात्तमना शम्भुका भजन करो | इससे संतुष्ट होकर वे तुम्हारा
कल्याण करेंगे | अक्षन् | यदि तुम्हारे सनमें यह विचार हो कि
शंकर पत्नीका पाणिप्रहण करें तो शिवाको प्रसन्न करमनेके
उद्देश्यते शिवका स्मरण करते हुए उत्तम तपत्या करो । अपने
उस मनोरधको छुदयमें रखते हुए देवी शिवाका ध्यान फरो |
११८ ४ नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुराणाए्
च्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्ख्स्स््य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्य्य्य्य्य्य्य्य्ल्स्य्य्य्य्य्य्य्स््ल्््ंचस्चि. 5555
वे देवेश्वरी यदि प्रसन्न हो जायें तो सारा कार्य सिद्ध कर
देंगी । यदि शिवा सगुणरूपसे अवतार ग्रहण करके लोकमें
किसीकी पुन्नी हो मानव-शरीर भ्रहण करें तो वे निश्चय ही
महादेवजीकी पत्नी हो सकती हैँ | ब्रह्मनू! ठुम दक्षको
आशा दो; वे भगवान् शिवके लिये पत्नीका उत्पादन करनेके
निमित्त ख़तः भक्तिमावसे प्रयतपूर्वक तपस्या करें | तात |
शिवा ओर शिव दोनोंकी मक्तके अधीन जानना चाहिये । वे
निगुण परबरह्मस्तरूूप होते हुए भी स्वेच्छासे सगुण हो
जाते हैं।
“विधे | भगवान् शिवकी इच्छासे प्रकट हुए हम दोनोंने
जब उनसे प्राथंना की थी; तब पूवकालमें भगवान् शंकरने
जो बात कही थी, उसे याद करो । ब्रह्मन् |! अपनी शक्तिसे
सुन्दर लीला-विहार करनेवाले निगुण शिवने स्वेच्छासे सगुण
होकर मुझको ओर तुमको प्रकट करनेके पश्चात् तुम्हें तो
सष्टि-कार्य करनेका आदेश दिया और उमासहित उन
अविनाशी सष्टिकर्ता प्रभुने मुझे उस सश्कि पाछनका काये
सॉपा । फिर नाना-लीला-विशारद उन दयाछ खामीने हँसकर
आकाशकी ओर देखते हुए बड़े प्रेमसे कहा--“विष्णो ! मेरा
उत्कृष्ट रूप इन विधाताके अड्गसे इस लोकमें प्रकट होगा
जिसका नाम रुद्र होगा | रुद्रका रूप ऐसा ही होगा; जसा
अपपानीपाा तर: | ड+॥७६३७००७६-९५०-न एप काम ता: ३न्लापुरन्ू पाप: २०५५ क ्हुऋ०--कड़ 3०4 तप >प मसी परणक उ०४-मतक 2४८72 सक > .४०:#63.-+-स८(>व ५2: कक डक
29.25 पुन पारन हर पतन
&म७००७०#०० २३७०० ##*प पड
मेरा है। वह मेरा पूर्णझूप होगा) तुम दोनोंको सदा उसी
पूजा करनी चाहिये | वह तुम दोनके सम्पूर्ण मनोरोंई
सिद्धि करनेवाला होगा । वही जगतका प्रलय करनेवाद
होगा | वह समस्त गुणोंका द्रष्ट) निर्विशिष एवं उत्तम योगा
पालक होगा | यद्यपि तीनों देवता मेरे ही रूप हैं; तर्था)
विशेषतः रुद्र मेरा पृर्ण्ूप होगा | पुत्रों | देवी उमाक़े मं
तीन रूप होंगे । एक रूपका नाम छक्ष्मी होगा; जो इन
श्रीहरिकी पत्नी होंगी | दूसरा रूप ब्रह्मपली सरखती हैं।
तीसरा रूप सतीके नामसे प्रसिद्ध होगा । सती उमाका पूर्ण
होंगी । वे ही भावों रुद्रकी पत्नी होंगी |?
“ऐसा कहकर भगवान् महेश्वर हमपर कूंपा करे
पश्चात् वहाँसे अन्तर्घान हो गये ओर हम दोनों सुलपृ्
अपने-अपने कारय में लग गये | त्रह्मन् ! समय पाकर में ४
तुम दोनों सपत्नीक हो गये ओर साक्षात् भगवान् शंकर रुद्ना
अबतीण् हुए | वे इस समय केछास पर्वतपर निवास क
हैं। प्रजेशबर ! अब शिवा भी सती नामसे अवतीर्ण होनेत
हैं। अतः तुम्हें उनके उत्पादनके लिये ही यत्न करना चाहिये|
ऐसा कहकर मुझपर बड़ी भारी दया करके भंग
विष्णु अन्तधोन हो गये ओर मुझे उनकी बातें सुनकर 4
आनन्द प्राप्त हुआ | (५ अच्याय ७--१९
*+--+-<#केल््खल नी -+०-३०-०-
दक्षकी तपस्थों ओर देवी शिवाका उन्हें वरदान देना
नारदजीने पूछा--धूज्य पिताजी ! दृढ़तापू्वक उत्तम
त्रतका पालन करनेवाले दक्षने तपस्या करके देवीसे कौन-सा
वर प्राप्त किया तथा वे देवी किस प्रकार दक्षकी कन्या
हुई !
ब्रह्माजीने कहा--नारद् | तुम धन्य हो |! इन सभी
मुनियोंके साथ भक्तिपूवक इस प्रसड्गको सुनो। मेरी आजा
पाकर उत्तम बुद्धिवाले महाप्रजापति दक्षने क्षीरसागरके उत्तर
तटपर स्थित हो देवी जगदम्बिकाको पुत्रीके रूपमें प्राप्त करने-
की इच्छा तथा उनके प्रत्यक्ष दशेनकी कामना लिये उन्हें
हृदय-मन्दिरमें विशजमान करके तपस्या प्रारम्भ की। दछ्षने
मनको संयममें रखकर दृढ़तापूवंक कठोर त्रतका पालन करते
हुए. शौच-संतोषादि नियमोसे युक्त हो तीन हजार दिव्य वर्षों-
तक तंप किया । वे कभी जल पीकर रहते, कभी हवा पीते
ओर कभी सर्वथा उपवास करते थे । भोजनके नामपर क
सूखे पत्ते चबा लेते थे |
मुनिश्रेष्ठ नारद ! तदनन्तर यम-नियमादिसे युक्त ।
जगदम्बाकी पूजामें लगे हुए. दक्षको देवी शिवाने प्रत्यक्ष दा
दिया । जगन्मयी जगदम्बाका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रजा
दक्षने अपने आपको कृतकृत्य माना । वे कालिका देवी हि
आरूढ थीं | उनकी अद्गकान्ति श्याम थी | मुख व़ीं ६
मनोहर था । वे चार भुजारमेसे युक्त थीं ओर हाथोंमें १६
अभय; नील कमल ओर खड़ धारण किये हुए थीं |
मूर्ति बढ़ी मनोहारिणी थी | नेत्र कुछ-कुछ लाल ये । हु
हुए केश बढ़े सुन्दर दिखायी देते थे | उत्तम प्रभासे प्रका्ि/
होनेवाली उन जगदम्बाको भलीमौति प्रणाम करके *
विचित्र वचनावलियोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे |
४ दक्षकी तपस्या ओर देवी शिवाका उन्हें वरदान देना 5
११९,
| न टू नि ; (ऑ।
(27)
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दक्षने कह--जगदम्ब | महामाये ! जगदीशे !
महेश्वर | आपको नमस्कार है। आपने कृपा करके मुझे
अपने खूपका दर्शन कराया है। मगवति | आये ! मुझपर
प्रसन्न होइये | शिवरूपिणि ! प्रसन्न होइये । भक्तवरदायिनि !
पसन्न होइये । जगन्माये ! आपको मेरा नमस्कार है |#
प्ह्माजी कहते हँ--मुने ! संयत चित्तवाले दक्षके
इस प्रकार स्तुति करनेपर महेश्वरी शिवाने खयं ही उनके
अभिप्रायक्ो जान लिया तो भी दक्षसे इस प्रकार कह्य--प्दक्ष !
ऐुख्द्ारी इस उत्तम भक्तिसे मैं बहत संतुष्ट हूं | तुम अपना
&४+ वर माँगो । तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय
नए ६ [१
“गदम्वाकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्ष बहुत प्रसन्न
इए और उन शिवाको वारंबार प्रणाम करते हए बोले |
हि के पते कहा--जगदम्ब ! महामाये | यदि आप मुझे
देनेक लिये उद्यत हैँ तो सेरी बात सुनिये और प्रसन्नता-
33 ञभ नानक न भ था ३७०-े पा सवा +०6५ ७५3८-७३ (नमक न क»एण०७+रव५ ०७३४५
१ न पप्रीक ऊ *ईई। द्तत्या व
धर भगदत्याये प्रसीद शिवरूपिणि ।
0 पक वर दि पारा > प्
(5 5 फ्दरद नगनसाय समोष्स हे॥
४ 3९ प्ृ० ९७ सं० स० सं6 ४ | ६४)
पूर्वक मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये | मेरे खामी जो भगवान् शिव
हैं, वे रुद्र-नाम धारण करके बह्माजीके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए
हैं। वे परमात्मा शिवके पूर्णावतार हैं | परंतु आपका कोई
अवतार नहीं हुआ | फिर उनकी पत्नी कोन होगी ! अतः
शिवे ! आप भूतलपर अबतीर्ण होकर उन महेश्वरको अपने
रूप-लावण्यसे मोहित कीजिये | देवि | आपके सिवा दुसरी
कोई ली रुद्रदेवकी कभी मोहित नहीं कर सकती | इसलिये
आप मेरी पुत्री होकर इस समय महादेवजीकी पत्नी होइये।
इस प्रकार सुन्दर छीला करके आप हसर्मोहिनी ( भगवान्
शिवकी मोहित करनेवाली ) वनिये | देवि | यही मेरे लिये
वर है | यह केवल मेरे ही खार्थकी बात हो; ऐसा नहीं सोचना
चाहिये । इसमें मेरे ही साथ सम्यूण जगत्का भी हित है।
ब्रह्मा, विष्णु ओर शिवमेंसे व्रह्माजीकी ग्रेरणासे मैं यहाँ आया हूँ |
प्रजापति दक्षका यह वचन सुनकर जगदम्बिका शिवा
हँस पड़ीं और मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण करके
यों बोलीं ।
देवीने कहा--तात | प्रजापते | दक्ष ! मेरी उत्तम
वात सुनो । में सत्य कहती हूँ; ठम्हारी भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न
हो तुम्हें सम्यूण मनोवाज्छित वस्तु देनेके लिये उद्यत हूँ।
दक्ष | यद्यपि में महेश्वरी हूँ; तथापि तुम्हारी भक्तिके अधीन
हो तुम्हारी पत्नीके गर्भसे तुम्हारी पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण
होऊंगी--इसमें संशय नहीं है | अनघ | में अत्यन्त दुस्सह
तपस्या करके ऐसा प्रयत्न करूँगी जिससे महादेवजीका बर
पाकर उनकी पत्नी हो जाऊँ। इसके सिवा ओर किसी उपायसे
काये सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे भगवान सदाशिव
सर्वथा निर्विकार हैं; ब्रह्मा ओर विष्णुके भी सेव्य हैं. तथा
नित्य परिपूर्णरूप ही हैं | में सदा उनकी दासी ओर प्रिया हूँ ।
प्रत्येक जन्ममे वे नानास्पथारी शम्भु ही मेरे स्वामी होते
हैँ । भगवान् सदाशिव अपने दिये हुए वरके प्रभावसे ब्रह्माजी-
की भ्रकुटिसे रुद्रसू्पर्मे अवती् हुए दूँ | में भी उनके बरसे
उनकी आजशाके अनुसार यहाँ अवतार लूँगी। तात | अब तुम
अपने घरको जाओं । इस कायमें जो मेरी दूती अथवा
सहायिका होगी, उसे मैंने जान लिया हैं । अब सीजम ही मैं
तुग्हारी पुत्री होकर महादेवजीकी पत्नी बनेंगी |
दक्षसे यह उत्तम बचने ऋटकर मन-ही-सन शिवकी आजा
प्राप्त करके देवी शिवाने शिवक् ऋग्यारदिन्दाका चिन्तन करते
हुए पिरि कद्दा--प्रलसते |! एरंट मेंस एक प्रण ४) उसे
१२० ४£ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5: | संक्षिप्त-शिवपुराणाड़
विन््मनी का. या "फनी खनन ओम. पंकानत' माना शनी आकर
तुम्हें सदा मनमें रखना चाहिये | में उस प्रणको सुना देती
हूँ | तुम उसे सत्य समझो; मिथ्या न मानो । यदि कभी मेरे
प्रति तुम्हारा आदर घट जायगा; तब उसी समय में अपने शरीर-
को त्याग दूँगी, अपने स्वरूपमें छीन हो जाऊंगी अथबा दूसरा
शरीर धारण कर रूँगी। मेरा यह कथन सत्य है | प्रजापते |
प्रत्येक सगे या कल्पके लिये तुम्हें यह वर दे दिया गया---
में तुम्हारी पत्नी होकर भगवान शिवकी पत्नी होऊेंगी।
मुख्य प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर महेश्वरी शिवा उन
देखते-देखते वहीं अन्तथान हो गर्यी । दुगाजीके अनधात
होनेपर दक्ष भी अपने आश्रमक्रों छोट गये ओर यह सोच
प्रसन्न रहने छगे कि देवी शिवा मेरी पुत्री होनेवाली हूं |
( अव्याय ११-०१)
है. बन ५० पर आन मा ७ हे कै-नकम००-०----पनमन
ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरस्भ, अपने पृत्र ह्श्रों ओर शवलाश्रोंको
निवृत्तिमागेमें भेजनेके कारण दक्षका नारदकों शाप देना
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! प्रजापति दक्ष अपने
आश्रमपर जाकर मेरी आज्ञा पा ह्पभरे सनसे नाना प्रकारकी
मानसिक स॒ष्टि करने लगे । उस प्रजासष्टिको बढ़ती हुई न
देख प्रजापति दक्षने अपने पिता मुझ त्रह्मसे कहा |
वृक्ष बोले--त्रह्मन् ! तात | प्रजानाथ ! प्रजा बढ़
नहीं रही है। प्रमो ! मैंने जितने जीवोंकी सृष्टि की थी
वे सब उतने ही रह गये हैं | प्रजानाथ | में क्या करूँ!
जिस उपायसे ये जीव अपने-आप बढ़ने लगें, वह सुझे
बताइये । तदनुसार में प्रजाकी स॒ष्टि करूँगा, इसमें संशय
नहीं है ।
ब्रह्माजीने ( मैंने ) कहा--तात ! प्रजापते दक्ष | मेरी
उत्तम बात सुनो और उसके अनुसार काय करो। सुरश्रेष्ठ
भगवान् .शिव तुम्हारा कल्याण करेगे | प्रजेश | प्रजापति
पश्चजन, ( वीरण ) की जो परम सुन्दरी पुत्री असिक््नी
है, उसे तुम पत्नीरूपसे अहण करो | स्रीके साथ मेंथुन-
घर्मका आश्रय ले तुम पुनः इस प्रजासगकी बढ़ाओ। असिक्नी
जेंसी कामिनीके गमसे तुम बहुत-सी संतानें उत्पन्न कर
सकोगे । ब
तदनन्तर मेथुन-धर्मसे प्रजाकी उत्पत्ति करनेके उद्देश्यसे
प्रजापति दक्षने मेरी आज्ञाके अनुसार बीरण प्रजापतिकी
पुत्नीके साथ विवाह किया | अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे
प्रजापति दक्षने दस हजार पुत्र उत्पन्न किये; जो हर्य॑श्व
कहलाये । मुने | वे सब-के-सब पुत्र समान घर्मका
आचरण करनेवाले हुए। पिताकी भक्तिमें तत्पर रहकर
सदा बदिक मागपर ही चलते थे | एक समय पिताने उन्हें
प्रजाकी स॒ध्टि करनेका आदेश दिया | तात | तब वे सभी
दाक्षायण-नामधारी पुत्र सुश्कि उद्देश्यसे तपस्या करके ल्रि
पश्चिम दिद्याकी ओर गये | वहाँ नाराबण-सर नामक परम पक
तीर्थ है; जहाँ दिव्य सिन््दु नद और समुद्रका संगम हुआ
है | उस तीर्थ-जलका ही मिकण्से स्पर्श करते उनका बतः
करण शुद्ध एवं श्ानसे सम्पन्न हो गया | उनकी थार्नीः
मलराशि घुल गयी ओर वे परमहंस-घम्ममें स्थित हो गये |दलरे
वे सभी पुत्र पिताके आदेशमें बंधे हुए थे | अतः मे
सुस्थिर करके प्रजाकी इंद्धिके लिये वहाँ तप करने लगे
सभी सत्पुरुषोंमे श्रेष्ठ थे |
नारद ! जब तुम्हें पता लगा कि हय॑श्वगण सृश्करि।
तपस्या कर रहे हैँ, तब भगवान् छक्ष्मीपतिके हा
अभिप्रायकी जानकर ठुम खय॑ उनके पास गये ओर आं|
पूबेक यों बोले--“दक्षपुत्र॒हयेश्वगण | तुमलोग ए८
अन्त देखे बिना खष्टि-स्वना करनेके लिये केसे 5
हो गये !?
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद | हयश्व आह्स्पे
रहनेवाले थे ओर जन्मकाल्से ही बड़े बुद्धिमान ये |
सब-के-सब तम्हारा उपयुक्त कंधन सुनकर स्वयं उसपर विः
करने छगे । उन्होंने यह विचार किया कि “जों
शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक आदिशको नहीं समझते)
केवल रज आदि गुणोंपर विश्वास करनेवाला पुरुष भ
निर्माणका कार्य कैसे आम्रम कर सकता है !? ऐश मि'
करके वे उत्तम बुद्धि ओर एकचित्तवाले दक्षक्ुुमार नारी.
प्रणाम श्लोर उनकी परिक्रमां करके ऐसे पथपर चढे #*
रुद्रसंहिता ]
जहाँ जाकर कोई वापस नहीं छोटता । नारद | तुम भगवान्
शंकरके मन हो ओर मुने ! तुम समस्त लोकेमें अकेले विचरा
करते हो । तुम्हारे मनमें कोई विकार नहों है। क्योंकि तुम
सदा महेश्वरकी मनोद्ृत्तिके अनुसार ही काये करते हो। जब
चहुत समय बीत गया तब मेरे पुत्र प्रजापति दक्षकों यह
पता लगा कि मेरे, सभी पुत्र नारदसे शिक्षा पाकर नष्ट हो
गये ( मेरे हाथसे निकल गये )। इससे उन्हें बढ़ा दुःख हुआ। वे
बार-बार कहने लगे--उत्तम संतानोंका पिता होना शोकका
दी स्थान है ( क्योंकि श्रेष्ठ पुत्रोंके बिछुड़ जानेसे पिताको बड़ा
कए होता है )। शिवकी मायासे मोहित होनेसे दक्षकों पुत्न-
वियोगके कारण बहुत शोक होने छगा । तब मेंने आकर
अपने बेटे दक्षको बढ़े प्रेमसे समझाया ओर सान्ल्ना दी।
देवका विधान प्रवलू होता है---इत्यादि बातें बताकर उनके
मनको शान्त क्रिया। मेरे सानन््तना देनेपर दक्षने पुनः पश्चजन-
कन्या असिक््नीके गर्भसे शबलाश्व नामके एक सहस्त पुत्र
उत्पन्न किये | पिताका आदिश पाकर वे पुत्र भी प्रजासशिके
लिये हृदतापूरवंक प्रतिशञापालनका नियम ले उसी स्थानपर गये;
. जंदँ उनके सिद्धिको प्राप्त हुए बड़े भाई गये थे । नारायण-
सरोवरके जलका स्पर्श होनेमात्रसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये;
. अन्त+करणमें झुद्धता आ गयी ओर वे उत्तम ब्रतके पालक
. आाबदाश्व ब्रह्म ( प्रण० ) का जप करते हुए वहाँ बड़ी भारी
: सपस्या करने लगे। उन्हें प्रजासश्कि लिये उद्यत जान ठुम
” युनाः पहलेकी ही भाँति ईश्वरीय गतिका स्मरण करते हुए
* उनके पास गये और वही बात कहने लगे; जो उनके माइयोंसे
.. पहले कह चुके थे | मुने ! तुम्हारा दर्शन अमोघ है; इसलिये
तुमने उनको भी भाइयोंका ही मार्ग दिखाया | अतएव वे
भारयेके ही पथपर ऊर्घ्बंगतिक्ो प्राप्त हुए । उसी समय प्रजा-
पति दक्षकों बहुत-से उत्पात दिखायी दिये | इससे मेरे पुत्र
दक्षकी बड़ा विस्मय हुआ और वे मन-ही-मन हुखी हुए ।
फिर उन्होंने पूर्व॑वत् ठुम्हारी ही करतूतसे अपने पुत्रोंका नाश
डे सुना, इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । वे पृत्रद्योकर्स
मूच्छिन ऐ अत्यन्त कष्टदा अनुभव करने लगे । फिर दक्षमे
एमार यहा क्रोष किया और कहा--प्यह नारद बड़ा ट्ष्र
५ इस्दशा उसी समय नुम दक्षपर भअनुग्रद करनेके लिये बहाँ
जे पहुंचे । हुई देखते ही शोकादेशसे युक्त हुए. दक्षके
शिड पृ० आऔं० १६६--१७४---
& ब्रह्माजीकी आश्ञासे दक्षद्वारा मेथुनी सध्ठिका आरस्म #
ओठ रोपसे फड़कने छगे | तुम्हें सामने पाकर वे घिकारने
और निन्दा करने लगे ।
दक्षन्े कहा--ओ नीच ! तुमने यह क्या किया !
तुमने झठ-मूठ साधुओंका बाना पहन रक्खा है। इसीके
द्वारा ठगकर हमारे भोले-माले बालकोंकी जो तुमने भिक्षुओंका
मार्ग दिखाया है; यह अच्छा नहीं क्रिया । ठुम निर्दय
ओर इझाठ हो | इसीलिये ठुमने हमारे इन बालकोंके, जो
अभी ऋषिं-ऋ्रण, देव-ऋण और पिते-ऋणसे मुक्त नहीं हो
पाये थे, लोक ओर परलोक दोनोंके श्रेयका नाश कर डाला |
जो पुरुष इन तीनों ऋणोंकों उतारे ब्रिना ही मोक्षकी इच्छा
मनमें लिये माता-पिताकी त्यागकर घरसे निक्रठ जाता है---
संन््यासी हो जाता हैं; वह अधोगतिको प्राप्त द्वोता है।
तुम निर्दय ओर बड़े निलेज हो । वर्धोकी द॒द्धिमें भेद पैदा
१-३. अद्यययंपालनपूर्देक वेद झाग्दोंके स्वाध्यायले ऋषि-
करण) यश जोर पृदा आदिसे देव ऋण जीर पृजणा आदिसे देव-फऋण तथा पुशत्रके उत्पादनसे
;..
दितृ-ऋमका निवारय छेता निवारण एन ५-.।
१२९
६२२
बे. करआ+- मम. उन,
हाई
करनेवालें हो और अपने सुयशकी स्वयं ही नष्ट कर रहे हो ।
मूहुमते | तुम भगवान् विष्णुके पार्षदोंमें व्यर्थ ही घूमते-
फिरते हो । अघमाघम [| ठुमने बारंबार मेरा अमद्गल किया
है| अतः आजसे तीनों लोकोंमें विचरते हुए तुम्हारा पैर
चड्हीं स्थिर नहीं रहेगा। अथवा कहीं भी त॒म्हें ठहरनेके
लिये सुस्थिर ठोर-ठिकाना नहीं मिलेगा ।
नारद | यद्यपि ठुम साधु पुरुषोंद्दार सम्मानित हो;
४: नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने 5 | संक्षिप्त-शिवपुराणा
तथापि उस समय दक्षने शोकबश तु््ह बसा शाप दे दिया।
वे इश्वरकी इच्छाकों नहीं समझ सके | शिवकी मायाने उनूँ
अत्यन्त मोहित कर दिया था । मुने | तुमने उस शापक्ने
चुपचाप ग्रहण कर लिया ओर अपने चित्त विकार कं
आने दिया। यही त्रक्ममाव है । ईश्वरकोटिके महात्मा पुणे
स्वयं शापकी मिटा देनेम॑ समर्थ होनेपर भी उसे सह छेते ह।
( अध्याय १३ )
>> 7०-८२ 2-८ <2«प.+--
दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्ष और वीरिणीके यहाँ देवी शिवाका अवतार,
दक्द्वारा उनकी स्तुति तथा सतीके सद्ठुणों एत्रं चेष्टाओंसे
माता-पिताकी प्रसन्नता
बरह्माजी कहते है--देवर्ष | इसी समय दुक्षके इस
वर्तावकी जानकर मैं भी वहाँ आ पहुँचा ओर पूर्वेवत् उन्हें
इन््त करनेके लिये सानन््त्ना देने लगा | तुम्हारी प्रसन्नताको
बढ्मसे हुए मैंने दक्षके साथ तुम्हारा सुन्दर स्नेहपूर्ण सम्बन्ध
स्थापित कराया | ठुम मेरे पुत्र हो) मुनियोंमें. श्रेष्ठ
ओर सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय हो | अतः बढ़े प्रेमसे तुम्हें
आश्वासन देकर मैं फिर अपने स्थानपर आ गया | तदनन्तर
प्रजापति दक्षने मेरी अनुनयके अनुसार-अपनी पत्नीके गर्भसे
साठ सुन्दरी कन्याओोंकी जन्म दिया ओर आल्स्यरहित हो
घर्म आदिके साथ उन सबका विवाह कर दिया । भुनीश्वर !
मैं उसी प्रसड़की बढ़े प्रेमसे कह रहा हूँ; तुम सुनो । सुने !
दक्षने अपनी दस कन्याएँ विधिपूर्वंक धमको ब्याह दीं;
पेरह वन्याएँ कश्यप मुनिकी दे दीं ओर सत्ताईस कनन््यार्थोका
विवाह चन्द्रमाके साथ वर दिया | भूत (या बहुपुत्र )
अड्लिय तथा छृशाश्वकी उन्होंने दो-दो कन्याएँ दीं ओर
शेष चार कन्याओंका विवाह ताध्ष्य ( या अरिष्टनेमि ) के
- साथ वर दिया | इन सबकी संतान-परम्पराओंसे तीनों लोक
भरे पड़े । अतः विस्तार-मयसे डनका वर्णन नहीं किया
जाता | कुछ लोग शिवा या सतीकी दक्षकी ज्येष्ठ पुत्री
चताते हैं । दूसरे लोग उन्हें मझली पुत्री कहते हैँ तथा कुछ अन्य
लोग सबसे छोटी पुत्री मानते हैं | कल्प-भेदसे ये तीनों
मत ठीक हैं । पुत्र और पुत्रियोंकी उत्पत्तिके पश्चात् पत्नी-
सहित प्रजापति दक्षने बड़े प्रेमसे मन-ही-मन जगदम्बिकाका
ध्यान किया | साथ ही गद्गदवाणीसे प्रेमपूवंक उनकी स्तुति
॑ी की | वारंवार अञ्ञल्लि बाँध, नमस्कार करके वे विनीत-
आदी
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भावसे देवीको मस्तक झुकाते थे | इससे देवी शिवा संत॒ः
ओर उन्होंने अपने प्रणक्ी पूर्तिके लिये मन-ही-मन यह वि
किया कि अब्र मैं वीरिणीके गर्भसे अवतार हूँ । ऐसा विचार
वे जगदम्बा दक्षके हृदयमें निवास करने लगीं। मुनि
उस समय दक्षकी बड़ी शोमा होने छमी | फिर उत्तम
देखकर दक्षने अपनी पत्नीमें प्रसन्नतापूर्वक गर्भाधान कि
रुद्रसंहिता ] # सतीकी तपस्यासे संतुष्ट देवताओंका कैछासमे जाकर भगवान् शिवका स्तवन करना $ ९९३
ड््््च््ड्ड्स्ड्््ड्ड्स्ल्ज्ििल्ल्ल्ड्ड््स्चिििचचच चच चचखच्िचचचच््अआ्ख्चखखच्चख्च्च्च्चच््च्च्चच्स्स्च्च्स्च्स्य्स्स्थ्प्पस्स्स्प्प्िि
तब दयाल शिवा दक्ष-पत्मीके चित्तमें निवास करने छगीं। समय दक्षसें इस प्रकार बोलीं, जिसमें माता वीरिणी
उनमें गर्भधारणके सभी चिह्न प्रकट हो गये | तात | उस ने सुन सके |
क वीरिणी चित्तमें >> लीं पुन्नीरूपमें बिक
अवखामें वीरिणीकी शोमा बढ़ गयी और उसके चित्तमें देवी व लॉ--प्रजापते | तुमने पहले पुन्नीरूपम मुझे
अधिक हर छा गया | मगवती शिवाके निवासके प्रभावसे प्रौत्त करनेके लिये मेरी आराधना की थी) तुम्हारा वह
बीरिगी महामझलरूपिणी हो गयी । दक्षने अपने कुछ- “नोरिथ आज पिद्ध हो गया | अब तुम उस तपस्याके फलकी
। बे कि . . ग्रहण करो।
: सम्प्रदाय, वेदश्ञान ओर हादिक उत्साहके अनुसार प्रेसन्नता- के देवीने अपनी मायासे
व गा समय कहकर दे« ह
/ पृथक पुंसवन आदि संस्कारसम्बन्धी श्रेष्ठ क्रियाएं सम्पन्न का ला ४ भजन हुई
लक बल लय शिशुरूप धारण कर लिया ओर शेशवमाव प्रकट करती हुई
र्की | के कम कि अनुष्ठान समय महान् उत्सव हुआ। चै वहाँ रोने छगीं । उस वालिकाका रोदन सुनकर सभी ख््रियाँ
प्रजापतिने ब्राह्मगोंकी उनकी इच्छाके अनुसार धन दिया | ओर दासियाँ बढ़े वेगसे प्रतन्नतापूयक्र वहाँ आ पहुँचीं।
उस अवसरपर वीरिणीके गर्भमें देवीका निवास हुआ (बे पुत्नीका मम कल मम जय मा कक
जानकर श्रीविप्णु आदि सब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई । के ल्गे | हे | का है वॉक बे थ हल हब
“7 सबने वहाँ आकर जगदम्बाका स्तवन किया ओर समस्त सम क के हर मल व सो ही कि
कक्री उपकार करनेवाली देवी शिवाक्रों बारंबार प्रणाम प के के और: कट ह की कल
या । वे सब देवता प्रसन्नचित्त हो दक्ष प्रजापति तथा «२ है दी की मा: कल
रंगीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके अपने-अपने स्थानको 2 कक किया । ब्राहमणोंकी दान दिया और
४ गये । नारद | जब नौ महीने बीत गये, तब छौकिक भी धन बॉटा। सब ओर यथोचित गान ओर दृत्य
3 8 । हे ह ०८ भातिके बहुत बाजे
तक निवाह कराकर दसवें महीनेके पू्णे होनेपर चन्द्रमा होने ह पागल वि कल कक जब वी
दि ग्रहों तथा ताराओंकी अनुकूलतासे युक्त सुखद मुहूतमें सा कम आर हे
शिवा शीश ही अपनी माताके सामने प्रकट हुईं । उनके प्रशंसित होनेवाली अपनी उस पुन्नीका नाम प्रसन्नतायूवंक
तार छेते ही प्रजापति दक्ष बड़ें प्रसन्ष हुए. और उन्हें. खखा | तदनन्तर संसारमें लोगोंकी ओरसे उसके
गम तेजसे देदीप्यमान देख उनके मनमें यह विश्वास हो और भी नाम प्रचलित किये गये, जो सब-केसब महान
॥ कि साक्षात् वे झिवादेवी ही मेरी पुत्रीके रूपमें प्रकट
६ हैं। उस समय आकाइझसे फूर्लोंकी वर्षा होने लगी और
प् जल बरससाने लगे। मुनीश्वर | सतीके जन्म लेते ही
पृण दिशाओंम तत्काल शान्ति छा गयी | देवता आकाशझमें
हे हो मान्नलिक बाजे बजाने छंगे | अग्निशालाओंकी
0 हुई अग्नियोँ सहसा प्रज्यलित हो उठों और सब कुछ
मे भड्नटमय हो गया | वीरिणीके गर्मसे साक्षात् जगदम्बा-
मइझलदायक तथा[ विशेषतः समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले
हैं । वीरिणी ओर महात्मा दक्ष अपनी पुत्रीका पाछन करने
लगे तथा वह झक्लपक्षकी चन्रकलाके समान दिनों-दिन
बढ़ने लगी । द्विजश्रेष्ठ | वाल्यावस्थार्मं भी समस्त उत्तमोत्तम
गुण उसमें उसी तरह प्रवेश करने लगे, जसे झक्लपक्षके बाल
चन्द्रमामं भी समस्त मनोहारिणी कल्ाएँ प्रविष्ट हो जाती हैँ ।
दक्षकन्या सती सखियोंके बीच चेठी-बेटी जब अपने भावमें निमम्म
पट हुई देस रहने दोनों हाथ मोडकर नमत्मर किया... ते सार मगर विवडी मं चिकित करे
र बड़े भक्ति-भावसे उनकी बड़ी स्तति दी । लगती थी । म बलमयी रुती जब वाल्योचित सुन्दर गीत गाती;
तंव खाणु; हर एवं उद्र नाम लेकर स्मरदन्रु शिवका स्मरण
इंडिसान, दक्षके स्तुति करनेपर जगन्माता शिवा डसः किया करती थी । ( अध्याय १४ )
री कक
सतीकी तपस्थासे संतुष्ट देवताओंका कैलासमें जाकर भगवान् शिवका स्ववन करना
नस.
ध्ात्र पफरते हद मैने 2 बिक" क्न रु 4०.
ही मा एस 8>नारद | एक दिन मैंने तग्दारे करके तुम्हारा भी सत्कार किया। यह देख ल्लोक-लीलाक
724६4 »&( पर १5५ -टिः
४ १ छ ट। श क्र | ० व. तीन न कर गने 4 धो. का ऊ
"से रा पा खड़ी हुई सतीको देखा । वह तीनों. अनुसरण करनेवाली सतीने भक्ति ओर प्रसक्षताके साथ सुझके
हक र् रु द्तदा + हनन श्र 2०. पके न हक का हे का
“हज सुन्दत थी। उसके पिताने मुझे नमत्का और तुमको भी प्रणाम किया। नारद | धृदनन्तर सतीरी
१२४
ओर देखते हुए हम ओर तुम दक्षके दिये हुए शुभ आसनपर
ब्रेठ गये। तत्पश्नात् मेने उस विनयशीछा बालिकासे कहा---
'सती ! जो केवल तुम्हें ही चाहते हैं ओर तुम्हारे मनमें भी
एकमात्र जिनकी ही कामना है उन्हीं सर्वक्ष जगदीश्वर
महादेवजीकी तुम पतिरूपमें प्राप्त करो । शुभे ! जो तुम्हारे
सिवा दूसरी किसी स््रीको पत्नीरूपमें न तो ग्रहण कर सके हैं,
न करते हैं ओर न भविष्यमें ही ग्रहण करेंगे; वे ही भगवान्
शिव तुम्हारे पति हों । वे तुम्हारे ही योग्य है, दूसरेके नहीं ।?
नारद ! सतीसे ऐसा कहकर में दक्षके घरमे देरतक
ठहरा रहा | फिर उनसे बरिदा ले मैं ओर तुम दोनों अपने-
अपने स्थानको चले आये । मेरी बातको सुनकर दक्षको बड़ी
प्रसन्नता हुई | उनकी सारी मानसिक चिन्ता दूर हो गयी और
उन्होंने अपनी पुत्रीकों परमेश्वरी समझकर गोदम उठा लिया।
इस प्रकार कुमारोचित सुन्दर छीला-विहारोंसे सुशोमित होती
हुईं भक्तवत्सला सती, जो स्वेच्छासे मानवरूप धारण करके
प्रकट हुईं थीं, कोमारावस्था पार कर गयीं । बाल्यावस्था
बिताकर क्िंचित् युवावस्थाको प्राप्त हुईं सती अत्यन्त तेज
एवं शोंभासे सम्पन्न हो सम्पूर्ण अज्ञोंसे मनोहर दिखायी देने
लगीं | लोकेश दक्षने देखा कि सतीके शरीरमें युवावस्थाके
लक्षण प्रकट होने लगे हैं | तब उनके मनमें यह चिन्ता हुई
कि मैं महादेवजीके साथ इनका विवाह केसे करूँ। सती
खय॑ भी महादेवंजीको पानेकी प्रतिदिन अभिलाषा रखती थीं |
अत; पिताके मनोभावकोी समझकर वे माताके निकट गयीं | विशारू
बुद्धिबाली सतीरूपिणी परसेश्वरी शिवाने अपनी माता
वीरिणीसे भगवान शंकरकी प्रसन्नताके निमित्त तपस्या करनेके
लिये आज्ञा माँगी | माताकी आशा मिल गयी | अतः दृढता-
पूर्वक त्रतका पालन करनेवाली सतीने महेश्वरको पतिरूपमें
प्राप्त करनेके लिये अपने घरपर ही उनकी आराधना
आएम्म की ।
आश्विन मासमें नन््दा ( प्रतिपदा; पष्ठी और एकादशी )
तिथियोंमें उन्होंने भक्तिपूनंक गुड़, भात ओर नमक चढाकर
भगवान् शिवका पूजन किया ओर उन्हें नमस्कार करके
उसी नियमके साथ उस भासको व्यतीत किया | कार्तिक
मासकी चतुदंशीको सजाकर रखे हुए माल्यूओं ओर खीरसे
परमेश्वर शिवकी आराधना करके वे निरन्तर उनका चिन्तन
रने लगीं। मागशीर्ष सासके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको
तिल) जो और चावलसे हरकी पूजा करके ज्योतिर्मय दीप
दिखाकर अथवा आरती करके सती दिन बिताती थीं । पौबष
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
| संक्षिप्त-शिवपुराण[
सारा राम कलकमाकम काम कम कमा कमा कम कम नकममाक मापा भ भरना दक भा कम ककभकककम् कक क्रमम कम 4 भभक्र मक्का ककया पक्का कम कम भक्रमकम कम कम कम मक्का कया का. «मद
मासके गुक्तपक्षकी ससमीकी रातमर जागरण करके प्रात
खिचड़ीका नंवेद लगा वे शिवकी पूजा करती थीं। भ्
पृर्णिमाकी रातमें जागरण करके सवेरे नदोमे नहाती और
वस्नसे ही तटपर बेठकर भगवान् झंकरकी पूजा कई
थीं | फाल्गुग. मासके कृप्णपश्षकी चतुर्दशी हि;
को रातमें जागरण करके उस सात्रिके चारों एफ
शिवजीकी विशेष पूजा करतीं ओर नरेंद्वारं गत
भी कराती थीं | चेन्र मासक्रे श्रक्लपक्षकी चुर#े
वे दिन-रात शिवक्रा स्मरण करती हुई समय वितातों
ढाकके फूल तथा दवनांसे भगवान् शिवकी पूजा करती
वैद्ञाख झुक्ला तृतीयाको सती तिलका आहार करके रहा
नये जोके भातसे रुद्रदेवकी पूजा करके उस महीनेक्रो
थीं । स्येएकी पृर्णिमाको रातमें सुन्दर बस्रों तथा भय
फूलछांसे शंकरजीकी पूजा करके वे निराह।र रहकर ही क
व्यतीत करती थीं। आपाढके अक्लपक्षकी प्वतुदंशीगरे
बस्तर और मय्कय्याके फूलोंसे वे रुद्रदेवका पुजन कर
श्रावण मासके शुक्लपक्षकी अश्मी एवं चतुदआीक्रोवे
पीता, वस्त्रों तथा कुशके पविन्रोंसे शिवकी पूजा क्रिया
थीं । भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको नाताप्र
फूलों और फल्ेसे शिवका पूजन करके सती चतुर्दशी
केवल जलका आहार किया करती । माँति-मातिके फट) पूछ
उस समय उत्पन्न होनेवाले अन्नोंद्वारा वे शिवकी पूजा
ओर महीनेभर अत्यन्त नियमित आहार करके केवह
लगी रहती थीं। सभी महीनोंम॑ सारे दिन सती £
आराघनामें ही संल्म रहती थीं। अपनी इच्छासे मा
घरण करनेबाली वे देवी इृढ़्तापूवक- उत्तम बतबा '
करती थीं | इस प्रकार ननन््दान्रतको पू्णरूपसे समा॥ '
भगवान् शिवमें अनन्यभाव रखनेवाली सती णजा्रव
बड़े प्रेमसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं तथा उतत४
ही निश्चलभावसे स्थित हो गयीं ।
मुने | इसी समय सब देवता ओर ऋषि भगवान्
और मुझको आगे करके ततीकी तपस्या देखनेके हि
बहाँ आकर देवताओने देखा, सती मूर्तिमती दूसरी
समान जान पड़ती हैं | वे भगवान, शिवके ध्यातमें ग”
उस समय सिद्धावस्थाको पहुँच गयी थीं। समर 58
बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ दोनों हाथ जोड़कर सर्वोर्कि
किया) मुनियोने मी मस्तक झकाये तथा श्रीहरि आर्थि |
प्रीति उमड़ आयी | श्रीविष्णु आदि सब देवता
रुद्बसंहिता ]
आश्र्यचक्ित हो सती देवीकी तपस्याकी भूरि-थूरि प्रशंसा करने
हगे | फिर देवीको प्रणाम करके वे देवता ओर मुनि तुरंत ही
गेरिश्रेष्ठट केल्यसको गये, जो भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय
पीजी जिम लक जल आह 8 आलनुूुन समय लताारअउ नमक आरमपाामउकर_प भा कजल+ मत क्ष उप आना दाल अपार एदा शक पापा म कल इ दमा कककाइ> नम भुक यम घकल का पका चन्आ५ हा दा ० चल दा चुन कर दमदार "दम दाम कक पकपन्ान्् कन्या नामदल्बक कम काम बह क्ाएा> मामा
अत. पक कक उस... 3० फैजमा जान चाक वाह. कजक पित्त पशाक्. सुक). भारी. गवाही: पड हर पयक रकम. ऑक ेयी. "थी चाही चकना कान),
. +>++5+५--७---७-७७--.०७७-_ ०-० क०-नीयन-ककी- अलकता+ ४०-००
है। साविन्नीके साथ में ओर लक्ष्मीके साथ भगवान् वासुदेव
भी प्रसन्नतायूवंक सहादेवजीके निकट गये | वहाँ जाकर मगवान्
शिवको देखते ही बड़े वेगसे प्रणाम करके सब देवताओंनिे
दोनों हाथ जोड़ बिनीत भावसे नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्ारा उनकी
स्तुति करके अन्तर्मे कहा--
प्रभो ! आपकी सत्त, रज ओर तम नामक जो तीन
शक्तियाँ हैं, उनके राग आदि वेग असह्य हैं। वेदत्यी अथवा
ठोकत्रयी आपका सर्प है | आप दरणागतोंके पालक हैं तथा
आपकी शक्ति बहुत बड़ी है---उसकी कहीं कोई सीमा नहीं है;
आपको नमस्कार है। दुर्गापते । जिनकी इख्ियाँ दुु हैं---
बशमें नहीं हो पार्ती, उनके लिये आपकी प्राप्ति कोई
मार्ग सुलम नहीं है । आप सदा भक्तोंके उद्धारयें तत्पर रहते
हैं, आपका तेज छिपा हुआ है; आपको नमस्वागर है | आपकी
मायाशक्तिझूपा जो अहंबुद्धि है, उससे आत्माका खरूप ढक
गया है; अतएव यह मूढबुद्धि जीव अपने स्वरूपको नहों जान
पाता । आपकी महिमाका पार पाना अस्यन्त कठिन ( ही नहीं,
स्व था असम्भव ) है। हम आप महाप्रभुकी मस्तक झुक्राते हैं ।
ब्रह्माजी कहते हँ--नतारद ! इस प्रकार महादेवजीकी
स्तुति करके श्रीविष्णु आदि सब देवता उत्तम भक्तिसे मस्तक
झुकाये प्रभु शिवजीके आगे चुपचाप खड़े हो गये ।
( अध्याय १५ )
त्रह्माजीका रुद्रदेवसे सतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, श्रीविष्णुद्धारा अनुमोदन
ओर श्रीरुद्रक्ी इसके लिये खीकति
प्रह्ाजी फहते है--श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा
पं हुए उस स्तुतिको सुनकर सबकी उत्पत्तिके हेतुभृत
भगवान शंकर बड़े प्रसक्ष हुए ओर जोर-जोरसे हँसने छगे।
पु बजा आर विष्णुको अरती-अपनी पत्नीके साथ आया
0 दक्ष महादेवजीने हमलोगोंसे यथ्ोचित वार्ताल्प किया
आर एमारे आयसनका कारण पृदा |
गद्ट बोले--हे हरे ! हे विये ! तथा हे देवताओं
''बर भहषप्रों ! आज निर्भय होकर यहाँ अपने आनेका टीक-
भा > प्य बताओ। छुमलोग किस लिये यहाँ आये हो
॥
नजर
हक
। । हर रे एप काय आ पड़ा है ? बहू सब में सुनना चाहता
( या । अंदर द्वारा की गयी सुतिसे मेरा मन बहतद
टी ४
('
मुने ! महादेवजीके इस प्रकार पूछनेपर मगवान् विष्णु
की आज्ञासे मेने वातालाप आरम्म किया |
सुझ् च्रह्माने कहा--देवदेव | महादेव | करूणा-
सागर | प्रभो | हम दोनों इन देवताओं ओर ऋषियोंके साथ
जिस उद्दशयसे यहाँ आये ६ उसे सुनिये । ब्रपभच्चञ् !
विशेषतः आपके ही डिय्रे हमारा यहाँ झागमन हश्ा हैं;
क्प्रोंक्कि हम तीनों सद्यार्थी ह--साप्टचिचक्ले संचालनप
प्रयोजनकी सिद्धिके लिये एक-दूसरेके सहावह्ू हैं। सहाथ्ोके।
सदा परस्पर बथायोग्व सहयाग करना चाहिये | अन्यथा
पट उगवय्ू बिक नह टॉ सदता ) सहेब्दरर ! काछ एस अमर
उत्तन्न होंगे; को मेरे हाथसे मारे जानेंगे | झुछ भगवान
दिप्णुके ओर कुछ आउके हाथों हुए होंगे | महापनी |! कुछ
ररर
ही मारे जा सकेंगे | प्रभो | कभी कोई विरले ही असुर ऐसे
होंगे, जो मायाके हाथोंद्वार वधक्रो प्राप्त होंगे। आप भगवान्
शंकरकी कृपासे ही देवताओंकों सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा ।
घोर असुरोंका विनाश करके आप जगतूको सदा स्वास्थ्य एवं
अमय प्रदान करेंगे | अथवा यह भी सम्भव हैं कि आपके
हाथसे कोई मी असुर न मरे जायें; क्योंकि आप सदा योग-
युक्त रहते हुए राग-द्वेषसे रहित हैं तथा एकमात्र दया
करनेमें ही लगे रहते हैं । ईश ! यदि वे असुर भी
आराधित हों--आपकी दयासे अनुण्हीत होते रहें तो सूट
ओर पालनका कार्य केसे चल सकता हैं | अतः चृषध्वज !
आपको प्रतिदिन खष्टि आदिके उपयुक्त कार्य करनेके लिये
उद्यत रहना चाहिये | यदि सृष्टि, पालन ओर संहाररूप कर्म न
करने हों तब तो हमने मायासे जो भिन्न-भिन्न शरीर धारण
किये हैं; उनकी कोई उपयोगिता अथवा ओचित्य ही नहीं
है । वास्तवमें हम तीनों एक ही हैं, कायके भेदसे भिन्न-भिन्न
देह धारण करके स्थित हैं| यदि का्यभेद न सिद्ध हो; तब
तो हसारे रुपभेदका कोई प्रयोजन ही नहीं है | देव | एक ही
परमात्मा महेश्वर तीन स्वरूपोंमं अभिव्यक्त हुए. हैं | इस
रूपमेदमं उनकी अपनी साया ही कारण है । वास्तवमें प्रभु
खतन्त्र हैं। वे लीलाके उद्देश्यसे ही ये सष्टि आदि कार्य करते
हैं | भगवान् श्रीहरि उनके बाँये अज्ञसे प्रकट हुए हैं, में
ब्रह्म उनके दायें अड्से प्रकट हुआ हूँ और आप रुद्रदेव
उन सदाशिवके छृदयसे आविभूत हुए हैं; अंतः आंप ही
शिवके पूर्ण रूप हैं। प्रभो ! इस प्रकार अभिन्नहूप होते
हुए भी हम तीन झरूपोंमें प्रकट हैं | सनातनदेव ! हम तीनों
उन्हीं भगवान् सदाशिव ओर शिवाके पुत्र हैं; इस यथार्थ
तत्वका आप हृदयसे अनुभव कीजिये । प्रभो ! मैं और
श्रीविष्णु आपके आदेशसे प्रसन्नतापूवंक लोककी सृष्टि और
फालनके कार्य कर रहे हैं तथा कार्य-कारणवश सपत्नीक भी
हो गये हैं; अतः आप भी विश्वहितके लिये तथा देवताओंको
सुख पहुँचानेके लिये एक परम सुन्दरी रमगीको अपनी पत्नी
बनानेके लिये ग्रहण करे । महेश्वर |! एक बात ओर है,
हसे सुनिये; मुझे पहलेके बृत्तान्तका स्मरण हो आया है।
पूर्वकालमें आपने ही शिवरूपसे जो बात हमारे सामने कही
थी) वही इस समय सुना रहा हूँ | आपने कहा था; ध्व्रह्मन् |
मेरा ऐसा ही उत्तम रूप तुम्हारे अद्भविशेष--ललाटसे प्रकट
होगा; जिशवी लोकमें रुद्र-नामसे प्रमिद्धि होगी। तुम ब्रह्मा
१ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
अतः अं, ० कीं अकतन जया, पुधामो महक. - सके +मयाान्मयायदााानी-मलिनो न पूझााा+-स डा. "मीमा+--बइुानी ०. राम" गद़नां
असुर ऐसे होंगे, जो आपके वीयसे उत्पन्न हुए. पुत्रके हाथसे
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
सश्टिकर्ता हो गये; श्रीहरिं जगत॒का पालन करनेवाले हुए को
में सगरुण रुद्ररूप होकर संहार करनेत्राला होऊँगा। एक़ ध्ली.
के साथ विवाह करके छोकके उत्तम कायकी सिद्धि करूगा।
अपनी कही हुईं इस बातको याद करके आप अपनी ही फ्
प्रतिशञाकों पूर्ण कीजिये | स्थामिन्ू ! आपका यह आदेश रे
कि में सष्टि करूँ; श्रीहरि पालन करें ओर आप खबं ऊंहए
के हेतु चनकर प्रकट हों; सो आप साझ्षात् शिव ही रंक्लः
करत्तक्रे रूपमें प्रकट हुए. है | आपके बिना हम दोनों अर
अपना काये करनेमें समर्थ नहीं हैं; अतः आप एक ऐंहं
कामिनीको स्वीकार करें, जो लोकहितके कार्य ततर रहे
अम्मो ! जैसे लक्ष्मी मगवान् विष्णुकी ओर सावित्री में
सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी उैक
सहचरी प्राणत्रस्लमाको ग्रहण करें |
मेरी यह बात सुनकर लोकेश्चर महादेवजीके मुठ
मुसकराहट दौड़ गयी । वे श्रीहरिके सामने मुझसे
प्रकार बोले ।
ईश्वरने कहा--त्रह्मन् ! हरे | तुम दोनों मुझे स्व
अत्यन्त प्रिय हो | तुम दोनोंको देखकर मुझे बड़ा आन
मिलता है | तुमलोग समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ तथा त्रिोक्ी
खामी हो | लोकहितके कायमें मन लगाये रहनेवलि हु
दोनोंका वच्नन मेरी इृष्टिमें अत्यन्त गोखपूर्ण है। हि
सुरश्रेष्टण ! मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं होण
क्योंकि में तपस्यामें संलम रहकर सदा संसारसे विरक्त है
रहता हूँ और योगीके रूपमें मेरी प्रसिद्धि है। जो निरृति
सुन्दर मार्गपर स्थित है, अपने आत्मामें ही रमण करा:
आनन्द मानता है, निरज्ञन ( मायासे निर्लित ) है। गिरती
शरीर अवधूत ( दिगम्बर ) है, जो शञानी, आत्मदर्शी %
कामनासे झूत्य है; जिसके मनमें कोई विकार नहीं के +
भोगोंसे दूर रहता है तथा जो सदा अपवित्र और अमझ्ं
धारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है--यहे £
समय मुझे बताओ तो सही [# मुझे तो सदा केवल यो
लगे रहनेपर ही आनन्द आता है | ज्ञानहीन पुरुष ही गो
>> नेक वन बन > मे पपनर लक
रयो निवृत्तिसुमार्गस्थ,. खात्मारामो निरञ्ञनः ।
अवधूततनुशानी स्वद्र्थ कामवर्जितः ॥
अविकारी छहमोगी च सदा शुचिरमन्नठः ।
तस्य दज्योजनं लोके कामिन्या कि वंदाधुना।
( शि० पु० रु० सं० स० खं० १५ ।३१-३३/
५४ सतीको शिवसे वरकी प्राप्ति #
भा ७-पा ५४५०-७४ ४०१५५५+३५५७०॥ ५ ०४७५४॥०॥० कद था 8 ३७३७०५५३३ ०३५०2 भा भव +29७2३५+४४ ३०५४५ १३४७४४४३/#ा ७३ पा शा आए पाया ता पा राम पर्याय माकपा या न जमाया वइ॒धाा ४ ाए 9.०० भा ५ काम कमान ध०१ भा धभाउ नाक हम 2५."
रुद्रसंहिता ] श्२७
छोड़कर भोगको अधिक महत्त्व देता है | संसारम विवाह करना
पराये बन्धनमें बंधना है | इसे वहुत बड़ा वन्धन समझना
चाहिये | इसलिये में सत्य-सत्य कहता हूँ; विवाहके लिये मेरे
मनमें थोढ़ी-सी भी अभिरुचि नहीं है । आत्मा ही अपना उत्तम
अर्थ या खार्ध है। उसका मलीमॉति चिन्तन करनेके कारण
मेरी छोकिक ख्ार्थम प्रव्नत्ति नहीं होती | तथापि जगतके हितके
लिये तुमने जो कुछ कहा है; उसे करूँगा । तुम्हारे वचनको
गरिए्ठ सानकर अथवा अपनी कही हुईं बातकों पूर्ण करनेके
टिये में अवश्य विवाह करूँगा; क्योंकि में सदा भक्तोंके बशमें
रहता हूँ । परंतु में जेसी नारीकों प्रिय पत्नीके रूपसे अहण
करूँगा ओर जैसी शर्तके साथ करूँगा, उसे सुनो । हरे ! ब्रह्मन !
में जो कुछ कहना हूँ, वह सर्वथा उचित ही है। जो नारी मेरे
तेजकी विभागपूवक ग्रहण कर सके, जो योगिनी तथा
इच्छानुसार रूप घारण .करनेवाली हो, उसीको तुम पत्नी बनानेके
लिये मुझे बताओ । जब में योगमें तत्यर रहूँ, तब उसे भी
गिनी बनकर रहना होगा । ओर जव्र में कामासक्त होऊ; तब
उसे भी ऋमिनीके रूपमे ही मेरे पास रहना होगा । वेदवेत्ता
विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं, उन ज्योतिःस्वरूप सनातन
शित्रका मैं सदा चिन्तन करता हूँ और करता रहूँगा। त्रह्मन्!
उन सदाशिवके चिन्तन जब में न छगा होऊ। तभी उस
भामिनीके साथ में समागम कर सकता हूँ । जो मेरे शिवचिन्तनमें
त्रिन्न डालनेवाली होगी, वह जीवित नहीं रह सकती, उसे
अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा | तुम) विष्णु ओर मैं तीनों
है ब्रणखरूप शिवक्रे अंशभूत हैं। अतः मद्गमागगण !
टमारे लिये उनका निर्तर चिन्तन करना ही उचित है ।
वमलासन |! उनके चिन्तनक्ते लिये में बिना विवाहके भी रह
देगा । ( वितु उनका चिन्तन छोड़वर विवाह नहीं करूँगा । )
आअनः तुम मुझसे ऐसी पत्नी प्रदान करो; जो सदा मेरे कर्मके
आअनुकृड चल सज्े । ब्रह्म ! उसमें भी मेरी एक ओर शर्त
४! उसे तुम सुनो; यदि उस खत्रीका मुझपर और मेरे वचनपर
केस लेगा तो में उसे त्याग देंगा |
उनकी यह बात सुनकर मैंने ओर श्रीहरिने मन््द मुसकानके
साथ मन-द्ी-मन प्रसन्नताका अनुभव किया; फिर मैं विनम्र
होकर बोला--नाथ | महेश्वर | प्रभो | आपने जसी नारीकी
खोज आरम्म की है; वेसी ही सत्रीके विषयमें में आपको
प्रसन्नतापूवंक कह रहा हूँ । साक्षात् सदाशिवकी धर्मपत्ञी जो
उमा हैं, वे ही जगतका कार्य सिद्ध करनेके लिये भिन्न-भिन्न
रूपमें प्रकट हुई हैं | प्रभो! सरस्वती ओर लक्ष्मी--ये दो रूप
घारण करके वे पहले ही यहाँ आ चुकी हैं | इनमें लक्ष्मी तो
श्रीविष्णुकी प्राणवकलभा हो गयीं ओर सरस्वती मेरी | गब
हमारे लिये ये तीसरा रूप घारण करके प्रकट हुई हैं। प्रमी !
लोकहितका काय करनेकी इच्छाबाली देवी शिवा दक्षपुन्रीके
रूपमें अवती्ण हुई हैं | उनका नाम सती है । सती ही ऐसी
भायां हो सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी दह्ो।
देवेश | महातेजसिनी सती आपके लिये, आपको पतिरूपमें
प्राप्त करनेके लिये हड़तापूर्व कर कठार बतका पाछते करती हुई
तपस्या कर रही हैं। महेश्वर | आप उन्हें वर देनेके लिये
जाइये; कृपा कीजिये ओर बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें उनकी
तपस्याके अनुरूप वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये ।
शंकर ! भगवान् विप्णुकी, मेरी तथा इन सम्पूर्ण देवताओंकी
यही इच्छा है। आप अपनी झुभ दृष्टिसे हमारी इस इच्छाकों
पूर्ण कीजिये, जिससे हम आदरपू्वेक इस उत्सवको देख सकें ।
ऐसा होनेसे तीनों लोकोंमें सुख देनेवाला परम मड़छ होगा
और सबकी सारी चिन्ता मिंट जायगी, इसमें संशय नहीं है |?
तदनन्तर मेरी बात समाप्त होनेपर छीलाविग्नरह घारण
करनेवालि भक्तवत्सल् महेश्वरसे मघुसूदन अच्युतने इसीका
समर्थन किया |
तत्र भक्तचत्तल भगवान् शझिवने हंसकर कहा) ध्यहुत
अच्छा; ऐसा ही होगा [! उनके ऐसा कददनेपर हम दोनों उनसे
आज्ञा ले अपनी पत्नी तथा देवताओं ओर मुनियोफे साथ
अत्यन्त प्रसन्न हो अपने अभीए सानकों चले आये |
( अव्याय १६ )
न-ललक््कल्य्म्स्श्ल्श्ध्य्ल्स्टिजज--+
पतोकी शिवसे चरकी प्राप्ति तथा भगवान् शिवका त्रह्लाजीको दक्षके पास भेजकर सतीका वरण करना
भामाज फहत एपूँ-मने । उघर सतीने आशविन मासके
; इज जउमी उपदास करके भक्तिभावसे सर्वेश्धर
२) पृज्ग विदा | एस प्रयार सनन््दाबत पृष दीनपर नवसा
हू चनक के र | जप ।
जे पयानमम् हुई नतीकी भगवान् शियने प्रत्यक्ष दर्शन
दिया । उनका श्रीविग्नट सर्वाप्नमुन्दर एवं गीरर्णक्ना था ।
उनके पाँच मुख ये ओर प्रत्येक मुस्पमें तीम-तीन नेत्र थे !
टिदशनस चन्द्रमा साझा द रहा सा। उनहा चिन प्रसश्र
था ओर कण्ठमें नील चिए दृष्ियोद्रर होता था | उनके ऋर
$
र््दाः
जज
१२८ ४ नमो रुद्राय शान्ताय श्रह्मण परमात्मने [ संक्षिप्त-शिवपुराणाए
जि 9झ७5 ७ डफडइ खखखअअअअआअबडडअडॉअॉअअइॉॉइअधइचअचध््धउइ्पञअ- नस फअखख खखअ्क् अइअइचइिनत चलन ननन-ननननननय-यिनयननननननन मनन न -+न++५++न++43++नलजनम-+म++«++ज«भ+भ3.....
भुजाएँ थीं। उन्होंने हाथोंमँ त्रिशूछ, ब्रह्ममपाछ। वर तथा
अमय धारण कर रखे थे। भस्ममय अड्गरागसे उनका सारा
शरीर उद्धासित हो रहा था। गड़ाजी उनके मस्तककी शोभा
बढ़ा रही थीं | उनके सभी अज्ग बड़े मनोहर थे | वे महान
लावण्यके धाम जान पड़ते ये । उनके सुख करोड़ों चद्रमार्भोकरे
समान प्रकाशमान एवं आह्ादजनक थे । उनकी अज्ञकान्ति
करोड़ों कामदेवोंकी तिरस्क्ृत कर रही थी तथा उनकी आकृति
ज्लियोंके ल्यि सर्वथा ही प्रिय थी | सतीने ऐसे सोन्दर्य-माधुयसे
युक्त प्रभु महादेवजीको प्रत्यक्ष देखकर उनके चरणोंकी बन्दना
की । उस समय उनका मुख लूजासे झुका हुआ था। तपस्पाके
पुज्ञका फल प्रदान करनेवाले महादेवजी उन्हींके लिये कठोर
ब्रत धारण करनेवाली सतीको पत्नी बनानेके लिये प्राप्त करनेकी
इच्छा रखते हुए भी उनसे इस प्रकार बोले ।
महादेवजीने कहा--उत्तम त्रतका पालन करनेवाली
दक्षनन्दिनि ! में तुम्हारे इस ब्तसे बहुत प्रसन्न हूँ | इसलिये
कोई वर माँगो। तुम्हारे मनकी जो असोष्ट होगा; वही वर
मैं तुम्हें दूंगा ।
. ब्रह्माज़ी कहते है--सुने ! जगदीश्वर महादेवजी यघपि
सतीके मनोभावकी जानते थे; तो भी उनकी बात सुननेके
लिये बोले---“कीई वर माँगो? । परंठु सती लजाके अधीन हो
गयी थीं; इसलिये उनके हृदयमें जो बात थी, उसे वे स्पष्ट
शब्दोंमिं कह न सकीं। उनका जो अभीष्ट मनोरथ था;
वह लजासे आच्छादित हो गया। प्राणवल्लम शिवका प्रिय वचन
सुनकर सती अत्यन्त प्रेममें मप्न हो गयीं। इस बातको जानकर
भक्तवत्सछ भगवान् शंकर बढ़े प्रसन्न हुए ओर शीघ्रतापूर्वक
बारंबार कहने लगे--'वर माँगो, वर माँगो?। सत्पुरुषोंके
आशभ्रयभूत अन्तर्यामी शम्मु सतीकी मक्तिके वशीभूत हो गये थे |
तब सतीने अपनी छज्ञाकी रोककर महादेवजीसे कहा --प्वर
देनेवाले प्रभो ! मुझे मेरी इच्छाके अनुसार ऐसा वर दीजिये;
जो टल न सके ।? भक्तवत्सल भगवान् अथांकरने देखा सती
अपनी बात पूरी नहीं कह पा रही है, तब वे खयं ही उनसे
बोले--८देवि ! तुम मेरी भायां हो जाओ |? अपने अभीष्ट
कूलकी प्रकट करनेवाले उनके इस वचनकी सुनकर आनन्दमम्त
हुई सती चुपचाप खड़ी रह गयीं। क्योंकि वे मनोवाज्छित वर
पा चुकी थीं। फिर दक्षकन्या प्रसन्न हो दोनों हाथ जोड़
मस्तक झुका मक्तवत्सल शिवसे बारंबार कहने लगीं |
सती चोलीं--देवाधिदेव महादेव ! प्रभो ! जगत्पते !
आप मेरे पिताकी कहकर वैवाहिक विधिसे मेरा पाणिग्रहण करें |
त्रह्माजी कहते हँ--नारद ! सतीकी यह बात सुन
भक्तवत्सल महेश्वरने प्रेमसें उनकी ओर देखकर कहा--प्रिये!
ऐसा ही होगा |? तब दक्षकन्या सती भी भगवान मिक्रो
प्रणाम करके भक्तियूवेक विदा मॉग--जानेकी आता प्रात कडे
भोह ओर आननन््दसे युक्त हो माताक्े पास छोंट गयीं। इधर
भगवान् शिव भी हिमाल्यपर अबने आश्रम प्रवेश कहे
दक्षकन्या सतीके वियोगसे कुछ कष्टका अनुभव करे हुए
उन्हींका चिन्तन करने लगे। देवप ! फ़िर मनकी एकाग्र ढ
लेकिक गतिका आश्रय ले मगवान शांकरने मन-ही-मन
स्मरण किया । तरिश्यूलधारी महेश्वरक्े स्मरण करनेपर 5
सिद्धिसे प्रेरित हो में तुरंत ही उनके सामने जा खड़ा हुः
तात | हिमालयके शिखरपर जहाँ सतीके वियोगका अनु
करनेवाले महादेवजी विद्यमान थे; वहीं म॑ सरखतीके '
उपस्ित हो गया। देवर्ष ! सरस्वतीसहित मुझे आया:
सतीके प्रेमपाशमें वधे हुए; शिव उत्सुक्रतापूवक बोले |
शस्सुने कहा--अक्षन् ! में जबसे विवाहके के
खार्थबुद्धि कर बेठा हूँ; तबसे अब मुझे इस खार्थम
खत्व-सा प्रतीत होता है। दक्षकन्या सतीने वड़ी भक्ति +
आराधना की है | उसके नन््दाब्रतके प्रभावसे मैंने :
अभीष्ट वर देनेकी घोषणा की । बत्रह्मनू | तब उ
मुझसे यह वर सॉँगा कि आप मेरे पति हो जाइये। ४
सुनकर स्वेथा संतुष्ट हो मैंने भी कह दिया कि मम ऐे
पत्नी हो जाओ।? तबदाक्षायणी सती मुझसे वोलीं---'नगतते
आप मेरे पिताकी सूचित करके वैवाहिक विधिसे सक्ले ऋ
करें |? ब्रह्मन् ! उसकी भक्तिसे संतोष होनेके कारण मे
उसका वह अनुरोध भी स्वीकार कर लिया | विधातः ! तब पे
अपनी माताके घर चली गयी और मैं यहाँ चला आया । इस
अब त॒म मेरी आश्से दक्षके घर जाओ और ऐसा यत्र करो! कि
प्रजापति दक्ष शीघ्र ही मुझे अपनी कन्याका दान कर दे।
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैं झतइत मे
प्रसन्न हो गया तथा उन भक्तवत्सल विश्वनायतते £
प्रकार बोला ।
सुझ च्रह्माने कहा--भगवन् | शम्मो | आपने ४
कुछ कहा है, उसपर मलीमाँति विचार करके
पहले ही उसे सुनिश्चित कर दिया है। दृषमघज [हैं
मुख्यतः देवताओंका और मेरा भी खार्थ है। दक्ष ली
जन «ा वब >+-७-त क्->मममम-क्ी -........->3-क०, अर पा जलन 3 अमन
रुदसंहिता | % भगवान, शिवका ब्रह्माजीको दक्षके पास भेजकर सतीका वरण करना #.... (१५९
आपकी अपनी पुत्री प्रदान करेंगे; किंतु आपकी आज्ञासे में
भी उनके सामने आपका संदेश कह दूँगा।
सर्वश्वर महाप्रभु महादेवजीसे ऐसा कहकर में अत्यन्त
वेगशाली रथके द्वारा दक्षके घर जा पहुँचा ।
नारदजीने पूछा--वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग | विधातः |
बताइये--जब सती घरपर छोटकर आयी, तब दक्षने उनके
लिये क्या किया !
त्रह्मा जीने कहा---तपस्या करके मनोवाड्छित वर पाकर
* सती जब घरको लोट गयीं) तब वहाँ उन्होंने पिता-माताको
४ प्रणाम किया। सतीने अपनी सखीके द्वारा माता-पिताको
॒
यासम्बन्धी सब समाचार कहल्वाया | सखीने यह भी सूचित
जिया कि सतीको मददेशस्से बरदी प्राप्ति हुई है, वे सतीकी
हि * बहत संन7 नुष्ठ क्वए * सखीके सुह्स सात्त जत्तान्त
हि _ | मादापिदाकों बड़ा आनन्द प्राम हुआ और उन्होंने
हुई है . । फिश । उदारचेता दक्ष और महामनखिनी
| शाजजरी उनकी इच्छाफे अनुसार द्ब्य दिया तथा
न-++--+०-९३ जि ही] हे
८-9 जीनत नाक जग मन जज टीनीन--ीा+०-नन कितनी जनता ननी नी न-मी कि नी न नमी न री नमी नी नी" कस * >> विन आस तकततव >किस >> सीन + न े-ीीक नकेल -ननीन न रीीनीपन जननीीय+ नमन न नमन नम नमन पिन 9 नियत जनीीय घन नी किन ननतीय न नमन पक नर तन ननीय+ तन न नमन न ननीन+>ी+तन्ीतीती
बनी नता33५--सितिनननतीनीवणननी + १० नननन न जननी जननी खनन वनन-तीययी न नानननन न 5मन मनन नमन तन «नी नी कन»ीरी 4 नी "मनन य नमन «मन नमी नमी री न तीन वन नमक नी ५७9० तय ५ नस नबी +-_-सत न+-+ मीन मम न न नननीयक हरी या पमना सन राननम नानी य ५० नरी करी 3५५ +न्ीष 3५५ नमी ५५ ०नीमप पर मनन ५ नमन नमन प पकनन ती+ करी पक यु मनी पक मना“ तन रमन निय १ कहती तनमन कम मन कम न न -+
अन्यान्य अंधों ओर दीनोंकी भी घन बाँटा । प्रसन्नता बढ़ानेवाली
अपनी पृत्रीको हुदयसे लगाकर माता वीरिणीने उसका मस्तक
सघा और आनन्दमम् होकर उसकी वारंबार प्रशंसा की ।
तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर घमेज्ञोमें श्रेष्ठ दक्ष इस
चिन्तामें पड़े कि “में अपनी इस पुत्नीका विवाह भगवान् शंकरके
साथ किस तरह करूँ ? महादेवजी प्रसन्न होकर आये थे;
पर वे तो चले गये | अब मेरा पुतन्रीके लिये वे फिर केसे यहाँ
आयेंगे ? यदि किसीको शीघ्र ही भगवान् शिवक्रे निक्रठ भेजा
जाय तो यह भी उचित नहीं जान पड़ताः क्योंक्रि यदि वे
इस तरह अनुरोध करनेपर भी मेरी पुत्नीको ग्रहण न् करें
तो मेरी याचना निष्फल हो जायगी ।?
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए प्रजापति दक्षके सामने
में सरस्वतीके साथ सहसा उपस्थित हुआ । मुझ पिताकों
आया देख दक्ष प्रणाम करके विनीतभावसे खड़े हो गये ।
उन्होंने मुझ खयम्भूकी यथायोग्य आसन दिया | तंदनन्तर
दक्षने जब मेरे आनेका कारण पूछ तब मेने सब बातें
बताकर उनसे कह्ा--“प्रजापते | भगवान् शंकरने तुम्हारी
घुत्रीको प्राप्त करनेके लिये निश्चय ही मुझे तुम्हारे पास भेजा
है; इत विपयमें जो श्रेष्ठ कृत्य हो; उसका निश्चय करो | जेसे
सतीने नाना प्रकारके भावोंसे तथा सात्विक ब्रतके द्वारा
भगवान् शिवकी आराधना को है; उसी तरह वे भी सतीकी
आगरधधना करते हूँ | इसलिये दक्ष | भगवान शिवक्ते लिये ही
संकल्पित एवं प्रकट हुई अपनी इस पुत्रीको तुम अविलम्ब
उनकी सेवार्म सॉप दो, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे 4
मे नारदके साथ जाकर उन्हें त॒म्हारे घर ले आऊँगा । फिर
तुम उन्हींके लिये उत्तन्न हुईं अपनी यह पुत्री उनके हाथम
दे दो ।*
त्रह्माजी कहते है--नारद ! मेरी यह बात सुनकर भेरे
पत्र दक्षतो बड़ा दृ्प हुआ | वे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोलि---
“पिताजी | ऐसा ही होगा ।? मुने | तब में अत्यन्त हर्षित
हो बहाँसे उस खानको छोटा) जहाँ लोककल्याणर्में तत्यर
रहनेवाले भगवान झित्र बड़ी उत्सुकतासे मेरी प्र्तीला कर रहे
थे | नारद ! मेरे लोट आनेपर री और पुत्नीमद्रित प्रडापति
हर री फ् का दि साल प7 सनी से
दत्त भा एणकाम हा गंद | वे इतने सहुष्ठ हुएक। सानों अम
हु किक 5 रू पट्प्य न्न् ह ३
पीकर आवा गये हा । ६ झादाय १७ |
०-45 ०+--००* पाक.
२३७ ४६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5 [ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
>-------------->>>>््््य्य्् _्पपस्पसपस्स्प्स्य्स्प्स्य्प्स्स्स्पस्स्कस्स्स्सस्प्प्स्स्ससस्स्टफपट-___- .............................000........ै.......---->--"--->>->द-<------क्----......ै-83......0...
ब्रह्मजीसे दक्षकी अनुमति पाकर देवताओं ओर मुनिरयोसहित भगवान् शिवका दक्षके घर
जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार तथा सती ओर शिवका विवाह
ब्रह्माजी कहते है--नारद ! तदनन्तर में हिमालयके
केलास-शिख्तरपर रहनेवाले परमेश्वर महादेव शिवक्रों लानेके लिये
प्रसन्नतापूवंक उनके पास गया ओर उनसे इस प्रकार
बोला--८बृषध्यज | सतीके लिये मेरे पुत्र दक्षते जो बात कही है,
उसे सुनिये और जिस कारयको वे अपने लिये असाध्य मानते
थे, उसे सिद्ध हुआ ही समझिये | दक्षने कहा है कि “मैं अपनी
पुत्री भगवान् शित्रके ही हाथम दूँगा; क्योंकि
उन्हींके लिये यह उत्पन्न हुईं है। शिवके
साथ सतीका विवाह हो यह कार्य तो मुझे
स्वतः ही अमभीष्ट है; फिर आपके भी कहनेसे
इसका महत्व ओर अधिक बढ़ गया। मेरी
पुत्नीनी खवयं इसी उद्देश्यसे भगवान् शिवकी
आराधना की है और इस समय शिवजी (>प
भी मुझसे इसीके विषयमें अन्वेषण ( पूछताछ ).. १३
कर रहे हैं; इसलिये मुझे अपनी कन्या
222 की ८2: #«. ८ १2 ५
फ्री
है
5
| विधातः ! वे भगवान् शंकर
लग्म ओर शुभ मुहूर्त यहाँ पारें
समय में उन्हें शिक्षाके तोरपर अपनी यह पुत्री दे
दूँगा ? बृषभव्यज | सुझसे दक्षने ऐसी बात कही
है | अतः आप शुभ मुहूर्तमें उनके घर चलिये
ओर सतीको ले आइये |?
मुने | मेरी यह वात सुनकर भक्तवत्सल रुद्र लोकिक
गतिका आश्रय ले हँतते हुए मुझसे बोले--संसारकी स॒ष्टि
करनेवाले ब्रह्माजी ! में तुम्हारे ओर नारदके साथ ही दक्षके
घर चल्ूगा | अतः नारदका स्मरण करो। अपने मरीचि
आदि मानस पुत्रोंकों भी बुला लो | विधे | मैं उन सबके
साथ दक्षके निवासस्थानपर चर्लूँगा । मेरे पार्षद भी मेरे
साथ रहेंगे ।?
नारद | लोकाचारके निर्वाहमें लगे हुए. भगवान्
शिवके इस प्रकार आश्ञा देनेपर मैंने तुम्हारा और मरीचि आदि
पुत्रांका भी स्मरण किया । मेरे याद करते ही तुम्हारे साथ मेरे
समी मानप्त पुत्र मनमें आदरकी भावना लिये शीघ्र ही वहाँ
आ पहुंचे | उस समय तुम सब लोग हर्षतते उत्फुब्छ हो रहे
202
पा
#/: 2०
/ ड़
/2822% 622
४/7,/2 ५222:
६ | 4५ /०५,/ 2 १० है.
ढडूटड पा हल थी
० ## 4
थे | फिर रुद्रके स्मरण करनेपर शिवभक्तोंके सम्राट मामा
विष्णु भी अपने सेनिकों तथा कमलादेवीके साथ गरइए
आरूद हो ठहुरंत बहाँ आ गये । तदनन्तर चेनगारे
शक्लपक्षकी तयोदशी तिथिमें, रविवारको पर्वाफाल्णुनी नक्षत्र
मुझ ब्रह्मा ओर विष्णु आदि समस्त देवताओंके र"
महेश्वरने विवाहक्रे लिये यात्र। की | मागमें उन देवा
और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए भगवान् शंकर
शोभा पा रहे थे | वहाँ जाते हुए देवताओं, मुनि्वो
आनन्दमग्म मनवाले प्रमथगणोंका रास्तेमें बड़ा उत्सव हो,
था | भगवान् शिवकी इच्छासे वृषभ; व्याप्र। सप जं#*
चन्द्रकका आदि सब-के-सब उनके लिये यथायोग्य भर
बन गये | तदनन्तर वेगसे चलनेवाले वलवान् वही
नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ हुए, महादेवजी श्रीविष्णु आदि देवता
साथ लिये क्षणभरमें प्रसन्नतापूर्वक दक्षक्के घर जा पहुँचे।
वहाँ विनीतचित्तवाले प्रजापति दक्ष समख मै
जनेंके साथ मगवान् शिवकी अगवानीके लिये उनके हे
आये | उस समय उनके समस्त अज्ञोमें हर्जनित रोम
आया था | स्वयं दक्षने अपने द्वारपर आये हुए.
देवताओंका सत्कार किया | वे सब छोग सुरे8 हि
बिठाकर उनके पाश्व॑भागमें खयं मी मुनियोंक्रे से नि
ब्रेठ गये | इसके बाद दक्षने सुनिर्योसहित समस्त दे
परिक्रा की ओर -उन सबके साथ भगवाव ्ि
घरके भीतर ले आये | उस समय दकषके
रुद्रसंदिता ] £# सती और शिवके द्वारा अश्िकी परिक्रमा: श्रीहरिद्वारा शित्रतत्वका वर्णन $£
बढ़ी प्रतन्नता थी। उन्होंने सर्वर शिवकों उत्तम
आधयन देकर खयं ही विधिपूत्रक उनका पूजन किया
तत्पश्चात् भ्रीविप्णुका, मेरा; ब्राह्मणोंका, देवताओंका
ओर समस्त शिवगर्णोक्रा भी यथोचित विधिसे उत्तम
भक्तिभावके साथ पूजन किया | इस तरह पूजनीय पुरुषों
तया अन्य लोगोंसहित उन सबका यथोचित आदर-सत्कार
करके दक्षने मेरे मानस पुत्र मरीचि आदि सुनियोके साथ
आवश्यक सल्यह की | इसके बाद मेरे पुत्र दक्षने मुझ पितासे
मेरे चरणोंमें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वकक कहा--प्प्रभो |
आप द्वी वेबाहिक कार्य कराये ॥?
तब में भी हर्षभरे हृदयसे बहत अच्छा? कहकर उठा ओर
वह सार काय कराने लगा । तदनन्तर पग्रहोंके बल्से युक्त
शै३२
७ है. 3+-न्ममी-जारमरान-ना न न अननमरम»» नमी जा. न न
शुभ ल्य ओर मुहूर्तमें दक्षने हेपूर्वक अपनी पुत्री सतीका
हाथ भगवान शंकरके हाथमें दे दिया | उस समय हषेसे
भरे हुए. भगवान् बृषभध्वजने भी वैवाहिक विधिसे सुन्दरी
दक्षकन्याका पाणिग्रहण किया | फिर मैंने; श्रीहरिने, तुम
तथा अन्य मुनियोंने, देवताओं ओर प्रमथगणोंने मगवान्
शिवको प्रणांस किया ओर सबने नाना प्रकारकी स्व॒तियोंद्वारा
उन्हें संतुटर किया | उस समय नाच-गानके साथ महान
उत्सव मनाया गया | समस्त देवताओं ओर मुनियोंकों बड़ा
आनन्द प्राप्त हुआ । भगवान् शिवके लिये कन्यादान करके
मेरे युत्र दक्ष छृतार्थ हो गये | शिव्रा ओर शिव प्रसन्न हुए
तथा सारा तंसार सक्नलका निकेतन बन गया |
( अध्याय १८ )
० बा ७:०-2220<:: 4»
सती ओर शिवके द्वारा अग्निकी परिक्रमा, *
श्रीहरिद्वारा शिवतत्वका वर्णन, शिवका ब्रह्माजीको
दिये हुए बरके अनुसार वेदीपर शदाके लिये अवान तथा शिव और
सतीका विदा
ज़ह्माजी कहते हँ--नारद ! कन्यादान करके दक्षने
भगवान् शंकरको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेजमे दीं | यह सब
फरके वे बड़े प्रसन्न हुए | फिर उन्होंने ब्राह्मणोंको मी नाना
प्रकारके पन बोटे | तत्पश्रात् लश्मीसहित भगवान् विष्णु
अम्भुफे पास आ हाथ जोड़कर खड़े हुए और यों बोले---
'देवदेव गह्यदेव ] दयासागर | प्रभो ! तात | आप सम्यूणे
जगत्के पिता हैं ओर सत्री देवी सप्की माता हैं. । आप दोनों
भरपुरुषादे कस्याप तथा दुष्टाक दमन लिये सदा लीटाउबक
सवतार भहण करते हं---यहू सनातन शतिका कथन है ।
आप चिकने नील अज्जनक्रे समान झोभावादी सतीके साथ
' जि प्रकार शोभा पा रहे हैं; में उससे उलदे लब्भीके
। मान शोगा पा रह हूँ--अर्थात् सती नील्वर्णा तथा आप
» िण ६, उपसे उछठे में नील्वणे तथा छ््मी
/ गेणणों है ।
. गारद ! में देवी उतीके पास झाकर इज़यजोक्त विधिसे
(६ र्शरपूबक लाया अगिज्रार्य दराने छगा। मुझ आचार्य
# जया शाजभादी आशतसे दिव्ा ओर शिवने बड़े हर्षछे साथ
ह पूरक अप्रज़्ी परिक्मा की | उस समय चच्ों
चरा
धुत उस मसगाया कं! जे याजे ध्योर सत्य न साध शक
“शिपे उनसे संगाया गया | गछे। बाते ओर जृत्यक्ते स
हा न गज
£ ईलएए ए० उत्तर सदन वष्टा सुखद जान पडा |
हो केठासपर जाना
तदनन्तर भगवान् विष्णु बोले--सदाशिव । में
आपकी आज्ञासे यहाँ शिवतत्तका वर्णन करता हूँ । समस्त देवता
तथा दूसरे-दूसरे मुनि अबने सनकी एकाग्र करके इस विपयको
सुनें । भगवन् ]) आप प्रधान ओर अप्रधान ( प्रकृति और
उससे अतीत ) हैं | आपके अनेक भाग हैं। फिर भी आप
भागरद्टित हैं | ज्योतिमंय खरूपबाले आप परमेश्वरक्े ही हम
तीनों देवता अंग हैँ | आप कोन; में कीन और ब्रह्मा कोन
हूं ? आप परमात्माके ही ये तीन अंश हूं, जो सुष्टि, पालन
ओर संहार करनेके कारण एक दूसरेसे भिन्न प्रतीत दते हू ।
आप अपने खब्पका चिन्तन कीजिये | आपने खबं ही लीटा-
पू्नक शरीर घारण किया दे | भाप निगुण ब्रद्मषपसे एक है |
आप ही सशुण ब्रह्म ह आर हम ब्रह्मा) विष्णु तथा गदध--तीन।
आपके अंग दँ। जैसे एक ही दारीरके भिन्न-भिन्न अवयतर
मस्तक; ग्रीवा आदि नाम घारण करते £ तथापि उस शरीरस
वे भिन्न नहीं हैं; उसी प्रकार हम तीनों अंश आप परमेश्वर
ही भर द। जो ज्योतिमव: आकराशके समान संबब्धापी एवं
निर्लय, स्वयं ही अपना धाम) पुराय: कोट्स; अनन्त
नित्य तथा दीए आदि विधेरणासे रहित निदियार ्रत्म ४५ दी
ली. ड़ ++
जवां बहन क अजपशा च्छ्ज़ु का च्यत व्ा्आक ड ५.७ $&७र्ड कह ( कहर. व्यतमान सा नमी |
आप दांव हू । बाते का दि सुधा मू
का ् बन्- कक कक हैँ जब ऋण.
2 कर पक थे है कल्प को च्क जा कं ज्क ++ कटा अक कानर कल कि
शत 80 ०250 हा यम 5
यही
१३२ ४६ नमों रुद्राय शान्ताय
यह बात सुनकर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर
उस विवाह-यज्ञके स्वामी ( यजमान ) परमेश्वर शिव प्रसन्न हो
लोकिकी गतिका आश्रय ले हाथ जोड़कर खड़े हुए मुझ
ब्रह्मासे प्रेमपूवक बोले |
शिवने कहा--अह्षज् ! आपने सारा वेबाहिक काये
अच्छी तरह सम्पन्न करा दिया। अब में प्रसन्न हूँ | आप
मेरे आचाय हैं। बताइये; आपको क्या दक्षिणा दूँ! सुरज्येठ !
आप उस दक्षिणाको मॉगिये। महाभाग !
यदि वह अत्यन्त दुल्म हो तो भी
उसे शीघ्र कहिये | मुझे आपके लिये कुछ
भी अदेय नहीं हे |
मुने | भगवान् शंकरका यह वचन
सुनकर में हाथ जोड़ विनीत चित्तसे उन्हें
बारंबार प्रणाम करके बोला--“देवेश !
यदि आप प्रसन्न हों ओर महेश्वर | यदि
में वर पानेके योग्य होऊँ तो प्रसन्नतापूवंक
जो बात कहता हूँ; उसे भाप पूण्
कीजिये । महादेव ! आप इसी
रूपमें इसी वेदीपर सदा विराजमान
£ 722 4
रहें, जिससे आपके दर्शनसे मनुष्योंके पाप घुल जाये ।
अन्द्रशेलखर! आपका सांनिध्य होनेसे में इस वेदीके
समीप आश्रम बनाकर तपस्था करूँ---यह् मेरी अभिलाषा है।
चेत्रके शक्लपक्षकी त्रयोदशीको पू्ाफाब्णुनी नक्षत्रमें रविवारके
दिन इस भूतरूपर जो मनुष्य भक्तिभावसे आपका दशन करे;
उसके सारे पाप तत्कारू नष्ट हो जायें, विपुल पुण्यकी दृद्धि
हो और समस्त रोगोंका स्वथा नाश हो जाय | जो नारी
दुर्भगा। वन्ध्याः कानी अथवा रूपद्दीना हो; वह मी आपके
दरशेनमात्रसे ही अवश्य निर्दोष हो जाय ।?
मेरी यह बात उनकी आत्माको सुख देनेवाली थी | इसे
सुनकर भगवान् शिवने प्रसन्नचित्तते कहा--५विधातः ! ऐसा
ही होगा । में तुम्हारे कहनेसे सम्पूण जगतके हितके लिये
अपनी पत्नी सतीके साथ इस वेदीपर सुस्थिरमावसे
स्थित रहूँगा ।?
ऐसा कहकर पत्नीसहित भगवान् शिव अपनी अंशरूपिणी
मूतिको प्रकट करके वेदीके मध्यभागमें विराजमान हो गये |
तत्पश्चात् खजनोंपर स्नेह रखनेवाले परमेश्वर शंकर दक्षसे
बिदा ले अपनी पत्नी सतीके साथ केछास जानेको उद्यत हुए।
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त्रह्मणे परमात्मने 5: [ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
नि न कल आल अल ला आल ना अल रा रा ४४७४७४७७४७७एशश/शश//श//श/ाशशरााशाथााा॥ााणणााा॥आ७%्७७७७७्णणभ॥्नाआाााााा राणा ७आ॥७०७॥७७७७७०७७७ा्ररााा आर लक इक. मजा लीड जी
उस समय उत्तम बुद्धिवाले दक्षने विनयसे मस्तक झुका
हाथ जोड़ भगवान् द्ृप्रमश्वजक्री प्रेमपूत्रेंक खुति की | फि
श्रीविष्णु आदि समस्त देवताओं) मुनियों ओर शिवगरणंने
नमस्कासपृर्वक नाना प्रकारकी स्तुति करके बढ़े आनन्द
जय-जयकार किया। तदनन्तर दल्षकी आज्से भगव्रान् शिवने
प्रसन्नतापूर्वक सतीको ब्रपमक्री पीठयर ब्िठाया और ख़यं भी
उसपर आछरुद हो वे प्रभु हिमालय पबतकी ओर चढे।
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भगवान् शंकरके समीप दृष्रभपर बैठी हुई सुन्दर दाँत ओ
मनोहर हातवाली सती अपने नीलश्याम वर्णके कारण चन्ह्माः
नीली रेखाके समान शोभा पा रही थीं। उस समय उन न
दम्पतिकी शोभा देख श्रीविष्णु आदि समस्त देवता, मररीषि
आदि महर्षि तथा दूसरे लोग ठगे-से रह गये | हिल-डुल म
न सके तथा दक्ष भी मोहित हो गये | तत्यश्रात् कोई बागे
बजाने छगे ओर दूसरे लोग मधुर खरसे गीत गाने ढगे।
कितने ही लोग प्रसन्नतापूषक शिवके कल्याणमय उच्जत
यशका गान करते हुए उनके पीछे-पीछे चले | मगर
शंकरने बीच रास्तेसे दक्षकों प्रसन्नतापूर्बवक लोग दिया ओऔ
खयं प्रेमाकुल हो प्रमथगर्णोके साथ अपने घामको जा पहुँचे।
यद्यपि भगवान् शिवने विष्णु आदि देवताओंको भी बिद्य *
दिया था; तो भी वे बड़ी प्रसन्नता और मक्तिके साथ उऑ
उनके साथ हो लिये | उन सब देवताओं, प्रमथगर्णों व
अपनी पत्नी सतीके साथ हर्षभरे शम्प्रु हिमालय पर्वत
सुशोभित अपने केलासधाम्में जा पहुँचे । वहाँ जाके 8
देवताओं, मुनियों तथा दूसरे लोगोंका बहुत आदर-पर्माने
करके उन्हें प्रसन्नतापू्वक बिदा किया | शम्मुकी आई ब्य
/
|
[ रुद्रसंहिता ] # सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरम भगवान् शिवद्वार/ शान-भक्तिका निरूषण $:
>+अ नया“ पाक. “०-५ ैककाकगीी न पाक.
रु च-+. का. के. ७.० नर फकात- अंपााम मय टप्णकनां अमान... ०.५... ऑधन्ाओ-.3.०- ० पलकाथ.. पथरी न... अदामिनमामा-मआं कमा "धान. "पाक “नमक. 3डन्ममार-+ सवारी 39. सक#+- पक कनान-+- यमन जया
ब्रिष्णु आदि सब देवता तथा मुनि नमस्कार ओर स्व॒ति करके
मुखपर प्रसन्नताकी छाप लिये अपने-अपने घामको चले गये |
सदाशिवका चिन्तन करनेवाले भगवान् शिव भी अत्यन्त
आनन्दित हो हिमाल्यके शिखर॒पर रहकर अपनी पत्नी दक्षकन्या
सतीके साथ विहार करने लगे ।
सूती कहते हँ--मुनियों ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव
मन्वन्तरमें भगवान् शंकर ओर सतीका जिस प्रकार विवाह
हुआ; वह सास प्रसद्ग मैने ठुमसे कह दिया। जो वियाहकालमें,
रैरेरे
जि अल लक आज जा आज अल अजब आलम लल_लललनचलभ लत चललुलनललुलुनलुभलत नल चनलु नल लत नुतलुलुल हुनर ्रमरनिदाकाननसिनददन किनारा कक इनक मद कनदकभ ककभ कक भ पकवान भ नह गकम्मनकरमभकम दर म कम करन कम कम ककभादकभ 9 कनभाा थम गम भगगभक
यज्ञ्मं अथवा किसी भी छुम कायके आरम्ममें भगवान्
शंकरकी पूजा करके शान्तचित्तसें इस कथाको सुनता है)
उसका सारा कर्म तथा बेवाहिक आयोजन बिना किसी विष्न-
बाघाके पूर्ण होता है ओर दूसरे घुम कर्म मी सदा निर्विश्न
पूर्ण होते हँ। इस झुभ उपाख्यानको प्रेमपूर्वंक सुनकर
विवाहित होनेवाली कन्या भी सुख) सोभाग्य, सुशीलता ओर
सदाचार आदि सदगुणंसे सम्पन्न साथ्वी स्त्री तथा पुत्रवती
होती है । ( अध्याय १९-२० )
सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें भगवान् शिवद्वारा ज्ञान एवं नवधाभक्तिके खरूपका विवेचन
केलास तथा हिमालय परबंतपर श्रीशिव और
सतीके विविध विह।रोंका विस्तारपूर्वक चणन करनेके
पश्चात् ब्रह्मर्जने कह(/--मुने | एक दिनकी बात है; देवी
सती एकान्तमं भगवान् शंकरसे मिलीं ओर उन्हें भक्तिपूर्वक
ग्णाम करके दोनों हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं | प्रभु शंकरको
पूर्ण प्रसन्न जान नमस्कार करके विनीत भावसे खड़ी हुई
दक्षकुमारी सती भक्तिभावसे अज्ञलि बाँधे बोलीं ।
सतीने कह(--देवदेव महादेव | करुणासागर | प्रभो |
दीनोद्धारपरायण ) महायोगिन् ! मझपर कृपा कीजिये | आप
परम पुरुष हैं | सबके स्वामी हैं । रजोगुण, सत्वगुण ओर
तमोगुणसे परे हैँ । निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं। सबके साक्षी;
निर्विकार और महाप्रभु हैं | हर ! में धन्य हूँ, जो आपकी
कामिनी ओर आपके साथ सुन्दर विहार करनेबाली आपकी
प्रिया हुई | खामिन् ! आप अपनी भक्तवत्सल्तासे ही प्रेरित
दोकर मेरे पति हुए हैं | नाथ ! मैंने बहुत वर्षोतक्त आपके
साभ विद्वर किया है | महेद्ान | इससे में बहुत संतुष्ट हुई
एूँ ओर अब मेरा मन उघरसे हट गया है। देवेशवर हर ! अब
तो में उस परम तत्वका शान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो
निरतिशय सुख प्रदान करनेवाल्य है तथा जिसके द्वारा जीव
फैतार-दुःखसे अनायास ही उद्धार पा सकता है । नाथ ! जिस
फ्मगा अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परम पदको प्राप्त कर
जे ओर संपारवन्धनमें न बेचे, उसे आप बताइये, मुझपर
>ण योजणिय |
प्रणाजी कहते हँ--मुने ! इस प्रकार आदिशक्ति
धो
बिक
शा छरी सदीत फेलफ
ग्के दर रू कै ड़ | | 'ञ ५ है] (४, हा
च5'
लक कक स्वेयाम जे धक अजल नाक टपर दर 2०६ क् च्
हा *जल्टत शंतर धारण दरनेबाले तथा पागक
द्वारा भोगसे विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवने अत्यन्त प्रसन्न
होकर सतीसे इस प्रकार कहा ।
शिव वोले--देवि ! दक्षनन्दिनि ! महेश्वरि | सुनो; में
उसी परमतत्त्वका वर्णन करता हूँ; जिससे वासनावद्ध जीव
तत्काल मुक्त हो सकता है। परमेश्वरि |! तुम विज्ञानकों परमतत्तव
जानो । विज्ञान वह है, जिसके उदय होनेपर में ब्रह्म हूँ?
ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है। अह्मके सिवा दूसरी किसी
वस्तुका स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुषकी बुद्धि
सर्वथा झुद्ध हो जाती है । प्रिये ) वह विज्ञन दुलंभ है | इस
त्रिलोकीमें उसका शाता कोई बिरत्य ही होता है | वह जो और
जैसा भी है, सदा मेरा खरूप ही है। साक्षात्परात्पर ब्रह्म है।
उस विज्ञानकी माता है मेरी भक्ति, जो भोग ओर मोक्षरूप
फल प्रदान करनेवाली है | वह मेरी कृपासे सुलम द्वोती है |
भक्ति नो प्रकारकी बतायी गयी है । सती ! भक्ति और ज्ञानमें
कोई भेद नहीं है | भक्त ओर शानी दोनोंको द्वी सदा सुख
प्राप्त होता है। जो भक्तिका विरोधी है। उसे ज्ञानकी प्राप्ति
नहीं ही होती । देवबि | में सदा भक्तके अबीन रखता हूँ
ओर भक्तिके प्रभावसे जातिद्ीन नीच मनुष्योके घरोम भी चला
जाता हूँ; इसमें संशय नहीं है [#& सती ! बह भक्ति दो
प्रकारकी है--सगुणा और निर्यणा । जो वंधी ( दास्नविधिते
प्रेरित ) ओर स्वाभाविकी ( दृदयके सहम अनुरागसे प्रेरित )
भक्ति होती है; बह श्रेष्ठ है तथा इससे मिन्न जा कामनामृस्फ
् श्चद्ध हक भरा ०8 ऋरीण्क रु सिद घ्यु हाफ
# सतत शान ने नां दि गादाल: खबदा सुगम
न
शा ब्क ० अीड क्री कील. आओ
शत से अकदप् कक #न्ऋशच्रारन:
च्प ॥। 2 ्् हे (
ब्क प्र ् 9 आई हा हा हर ा7> पड ६आआनय ७.# | हट कक मात
"++ 4०-“मूहिनननन-्कक्नमकृफ- न्य्- ह्जाप्य भा
११६११.. ड्ने ९१५ ट दे 34 ६,१८७ जज खयपू
दा अ्ण्न्फफ्ी अर न कन्या हु ह- ७०० | अललक हक 2 कल
नाथ, अं हआआं म्य्ााक 4 का ध्णााा ऑ। आजफासमकी
नोदाना उलाथइशंनानाा याद दशा हम ग्रशय: ॥
( शि० यु रे पहे० रसूल गा८प २३
नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5 [ संक्षिप्त-शिवपुराणड
जिलाल#धर एलन माााचकतब गाज वक्ता भला कक ॒करमन ए नकल का रूम तरभक पकवान पता कइ रत केक बकन् कल... नम
भक्ति होती है, वह निम्नकोटिकी मानी गयी है । पूर्वोक्त सुगुणा
ओर निगुंणा--ये दोनों प्रकारकी मक्तियाँ मेष्ठिकी ओर अनेष्टिकी-
के भेदसे दो भेदवाली हो जाती हैँ । नष्ठटिकी भक्ति छः प्रकार-
की जाननी चाहिये ओर अनेष्ठिकी एक ही प्रकारकी कही गयी
है। विद्वान् पुरुष विहिता ओर अविहिता आदि भेदसे उसे
अनेक प्रकारकी मानते हैं | इन हिंविध भक्तियोंके बहुत-से
भेद-प्रभेद होनेके कारण इनके तत््वका अन्यत्र वर्णन किया
गया है। प्रिये | मुनियोने सगुणा और निर्गुणा दोनों भक्तियों-
उसे “वन्दन! कहते हैँ | ईश्वर मज्ञल था अम्ल जो कुछ मे
करता है, वह सब मेरे मद्जलके लिये ही है | ऐसा दृद विश्व
रखना पसख्यः भक्तिका लक्षण है |॥ देह आदि जो कुछ भी
अपनी कही जानेवाली वस्तु है; वह सब भगव्रानकी प्रसन्नता
लिये उन्हींको समपित करके अपने निवाहके लिये भी बृह
बचाकर न रखना अथवा निवराहकी चिन्तासे भी रहित हो
जाना “आत्मसमर्पण? कहत्यता है । ये मेरी भक्तिके नो अप
हैं, जो भोग ओर मोश्ष प्रदान करनेबाले हैँ | इनसे शक
के नो अड्ग बताये हैं | दक्षनन्दिनि | में उन नवों अज्ञोंका
वर्णन करता हूँ; तुम प्रेमसे सुनो । देवि ! श्रवण, कीतेन;
स्मरण) सेवन; दास्य$ अर्चन। सदा मेरा वन्दन। सख्य ओर
आत्मसमपंण--ये विद्वानंनि भक्तिके नो अड्ढ माने हैं #|'
शिव ! भक्तिके उपाड़् भी बहुत-से बताये गये हैं ।
देवि | अब तुम मन लगाकर मेरी भक्तिके पूर्वोक्त नवों
अज्जोके प्थक-प्रथक लक्षण सुनी; वे लक्षण मोग तथा मोक्ष
प्रदान करनेवाले हैं | जो स्थिर आसनसे वेठकर तन-मन आदि
से मेरी कथा-कीतंन आदिका नित्य सम्मान करता हुआ
प्रसन्नतापूर्वक अपने अ्रवणपुटोंसे उसके अमृतोपम रसका पान
करता है; उसके इस साधनकी “श्रवण” कहते हैं | जो हृदया-
काशके द्वारा मेरे दिव्य जन्म-कर्मोका चिन्तन करता हुआ
प्रेमसे वाणीद्व/एं उनका उच्चखरसे उच्चारण करता है। उसके
इसे भजन-साधनको “कीर्तन” कहते हैं | देवि | मुझ नित्य
महेश्वरकी सदा और सर्वन्न व्यापक जानकर जो संसतारमें निरन्तर
निर्भय रहता है; उसीको “स्मरण” कहा गया है । अरुणोदयसे
लेकर हर॒ समय सेव्यकी अनुकूलताका ध्यान रखते हुए
हृदय और इन्द्रियोंसे जो निरन्तर सेवा की जाती है, वही
(सेवन! नामक सक्ति है। अपनेंको प्रभुका किंकर समझकर
हृदयाम्तके भोगसे स्वामीका सदा प्रिय सम्प[दन करना ५दास्य!
कहा गया है | अपने घन-बैमवके अनुसार शास्त्रीय विधिसे
मुझ परमात्माकी सदा पाद्य आदि सोलह उपचारोंका जो
समपण करना है, उसे अ्चन? कहते हैं | मनसे ध्यान और
वाणीसे वन्दनात्मक मन्त्रोंके उच्चारणपू्वक आठों अज्ञोंसे भूतल-
का स्पर्श करते हुए जो इश्टददेवकी नमस्कार किया जाता है;
# अ्रवणं कीतन॑ चेव स्मरणं सेवन तथा।
दास्यं तथार्चन॑ देवि बन्दनं॑ मम सर्वदा ॥
सख्यमात्मापंणं. चेति नवाद्वानि .विदुर्बुधा: |
( जशि० पु० रु० सं० स० खें० २३ । र्श्ड् ).
प्राकत्य होता हैं तथा ये सब्र साधन मुझे अत्यन्त प्रिय
मेरी भक्तिके बहुत-से उपान्न भी कहे गये हैँ, जैसे £
आदिका सेवन आ।दि | इनको विचारसे समझ लेना चाहि
प्रिये | इस प्रकार मेरी साइ्रोपाह्न भक्ति सबसे उ
है। यह शान-वैराग्यकी जननी है और मुक्ति इसकी दाती
यह सदा सब साधनेंसे ऊपर विराजमान है | इसके।
सभ्पूण करके फलकी प्राप्ति होती है। यह भक्ति मुझे
तुग्हारे समान ही प्रिय है। जिसके चित्तमें नित्+निस्तर
भक्ति निवास करती है; वह साधक मुझे अत्यन्त प्याग
देवेश्वरि ! तीनों छोकों ओर चारों युगोमें भक्तिके समान दूं
कोई सुखदायक मार्ग नहीं है | कलियुगमें तो यह वि
सुखद एवं सुविधाजनक है || देवि ! कल्युगम प्राया'
और वेराग्यके कोई ग्राहक नहीं हैं | इसलिये वे दोनों ;
उत्साहशून्य ओर जजेर हो गये हैं | परंतु भक्ति कलिश
तथा अन्य सब युगोंमें भी प्रत्यक्ष फल देनेवाली है । मम
प्रभावसे में सदा उसके बच्यमें -रहता हूँ, इसमें संशय
है | संसारमें जो भक्तिमान् पुरुष है; उसकी में सदा सह
करता हूँ, उसके सारे विध्नोंकों दूर हँटाता हूँ-। उसः मच
जो शजन्न होता है, वह मेरे. लिये दंण्डनीय है--डेसमें संशय
है।] देवि ! मैं अपने भंक्तोंका रक्षक हूँ । भक्तती रं
# मलामज्रू यद् यत् करोतीतीखरों हि. में)
सव॑ तन्मइलायेति विश्वास; सख्यलक्षणम् ॥
(शि० पु०७ रु० सं० स० खं० २१३१॥२
त्रेलोक्ये भक्तिसदृश: पन्था नास्ति खझुखावहा।
चतुयुंगेप. देवेशि कली तु सुविशेषतः ॥
(् शि० पु० रु० सं० स्० खे० २३। ३८
यो भक्तिमान्पुमोंछहीके सदाह. तत्सहायकप ।
विष्नहर्ता रिपुस्तस्य . दण्डयो नात्र च संशयः ॥
( शि० पु० रु० सं० स॒० खं० २११४!) ,
रुद्रसंदहिता | ४
दण्डकारण्यमे शिवको. श्रीरामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह $ २३०
कन-सक-रीफिना>-> न
लिये ही मेने कुृषित हो अपने नेन्रजनित अमित अग्निसे कालको भी
दघ कर डाल था। प्रिये | भक्तक्े लिये में पूचंकालम सूयपर
भी अल्न्त क्ुद्ध हो उठा था ओर शूल़ लेकर मैंने उन्हें मार
भगाया था । देवि ) भक्तके लिये मैंने सेन्यप्हित रावणकों
भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई पक्षपात नहीं
किया । सती ! देवेश्वरि ! बहुत कहनेसे क्या छाम, में सदा
द्वी भक्तके अधीन रहता हूँ ओर भक्ति करनेवाले पुरुषके
अत्यन्त वशमें हो जाता हूँ |
त्रह्मजी कहते है--नारद | इस प्रकार भक्तका महत्त्
मुनकर दक्षकन्या सतीकोी बड़ा हप॑ हुआ । उन्होंने अत्यन्त
प्रसन्नतापूवेंक भगवान् शिवकों मन-ही-सन प्रणास किया |
मने ! सती देवीने पुनः भक्तिकराण्डविपयक शास्त्रके विपयमें
भक्तिपृवक पूछ । उन्होंने जिज्ञासा की कि जो छोकमें सुखदायक
तथा जीवोंके उद्धारके साधनोंका प्रतिपादक है; वह शास्त्र कौन-सा
है । उन्होंने यन्त्र-मन्त्र, शासत्र, उसके माहात्म्य तथा अन्य
जीवोद्धारक घ्मंमय साधनोंके विपयमें विशेषरूपसे जाननेकी
इच्छा प्रकट की | सतीक्रे इस प्रइमको सुनकर शंकरजीके मनमें
बड़ी प्रसन्नता हुईं | उन्होंने जीवोके उद्धारके लिये सब शास्त्रों-
का प्रेमपूवक वर्णन किया । सहेश्वरने पाँचों अज्ञोंसहित तस्त्र-
शास्त्र, यन्त्रशाख्र तथा भिन्न-भिन्न देवेश्वरोंकी महिसाका वर्णन
किया । मुनीश्चवर ! इतिहास-कथासहित उन देवताओंके भरक्तो-
की महिमाका) वर्णाश्रस धर्मोकरा तथा राजघर्मोका भी निरूपण
किया ) पुत्र और स््रीके धर्मकी महिमाका, कभी नष्ट न होनै-
वाले वर्णाभ्रमधर्मका ओर जीबोंकी सुख देनेचाले वेद्रकशास्त्
तथा ज्योतिष॒शासत्रका भी वर्णन किया । महेश्वरने कृपा करके
उत्तम सामुद्रिक शास्त्रकां तथा ओर भी बहुत-से शास्त्रोंका
तत्वतः वर्णन किया | इस प्रकार लोकोपकार करनेके लिये
सदुणसम्पन्न शरीर धारण करनेवाले, त्रिछोकसुखदायक
और सर्वज्ञ सती-शिव हिसाल्यक्रे केलासशिखरपर तथा
अन्यान्य स्थानोंमं नाना प्रकारकी लीलाएँ करते थे | वे दोनों
दम्पति साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं ।
( अध्याय २९-२३ )
“४ “४४४ पुन.
दण्डक्रण्यर्म शिवकों श्रीसमके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकों
आज्ञासे उनके द्वारा श्रीरामकी परीक्षा
नारदजी वोले--ब्रह्मन् | विधे ! प्रजानाथ ! महाप्राश !
निधे ) आपने भगवान् शंकर तथा देवी सतीके मड्नलकारी
पका श्रवण कराया है | अब्र इस समय पुनः प्रेमपूर्वक
# उत्तम यशका वर्णन कीजिये | उन शिव-दम्पतिने वहाँ
र फोन-सा ऋरित्र किया था ?
व्रह्माजीने कहा--मुने ! तुम सझसे सती और शिवके
जका प्रेमसे अ्वण करो । वे दोनों दम्पति वहाँ लोकिकी
को आध्षय ले नित्प-निर्तर क्रीडा किया करते थे।
स्तर महादेवी सतीको अपने पति शंकरका वियोग प्राप्त
॥0 ऐला कुछ भरे बुद्धिवाले विद्वानोंका कथन है । परंतु
वासबम उन दोनोंका परस्पर वियोग केसे
पक है ? क्योकि वे दोनों वाणी ओर अर्थके समान एक
जसश मिलेजुले हैँ, शक्ति ओर दक्तिमान हैं तथा
फष्य ६। फिर भी उनमे लीला-विपयक रुचि होनेफे
पा, गे! हर लोफिफ रफातका अतुनरण ऋरक व
रते हैं; ने सब रूग्भद हैं । द्षवज्पा सीने
5 0 जे
र् 3,
पद हे सर प८5 4+ झ्रग दि च्द ला प््प्द दे २4 4 *]
पिता दक्षके यशमें गयीं ओर वहाँ समगवान् धंकरका अनादर
देख उन्होंने अपने शरीरकों त्याग दिया | वे ही सती पुन:
हिमालयके घर पावतीके नामसे प्रकट हुई और बड़ी भारी
तपस्या करके उन्हेंने विवाहके द्वारा पुनं भगवान शिवकों
प्राप्त कर लिया |
सूतजी कहते हँ--महर्थियो ! ब्रद्मानीकी यह बात
सुनकर नारदजीने विधातासे थित्रा और शिवक्ते महान, यश्यक्के
विवयर्म इस प्रकार प्रछा ।
तारदजी बोले--महाभाग विण्णुशिप्य! विधातः |! आप
मुझे शिवा और शिवके भाव तथा आचारसे सम्बन्ध रसनेवाले
उनके चरित्रको विस्तारएक सनाइये । तात ! भगवान झंकरने
आने प्राणसि भी प्यारी धमयतल्ी सतीका क्रिसलिये त्याग
किया ? यह , घटना तो सूठे बड़ी विलित्र झान परती हे ।
अतः इसे आप अवध्य कहें | अब! आापे पंच्र दक्षक बशम
भगवान शिवक्क अनादर बेसे हुआ ? और यहाँ पिता के यक्षई
जावर सतीने अपने शर्सरदा क्यांग डिस पदार किया ? उसके
बाद वहाँ क्या हुआ ? मसंगदान महा
सब बातें मुझसे कटिय | इन्हें छुननेशे लिये मेरे
यददी श्रद्धा है
खरस करा छा 4
प्रसार
॥ है कि ४
4
ब
2
४
कर
१३६ ४४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुराण:
उ. आनी. कण... कमी, पिता पाता... फनी अिएन-ा-पकानना-य उतनी "पिदानभत- ९७० का नपेशानम+प३५#म या एल“ पेडनन-+२३७५४०+० एध+भन न कमा कमान मय न. "करना ० धन यम पुकार चाकनी। सयामन_- सायमानता >न्ी
बह्माजीने कह(-मेरे पुन्रोंमें श्रेष्ठ ! महाप्राश ! तात
नारद | तुम महियोंके साथ बड़े प्रेमसे भगवान् चन्द्रमोलिका
यह चरित्र सुनो। श्रीविष्णु आदि देवताअंसि सेवित परत्रह्म
महेश्वरको नमस्कार करके में उनके महान् अद्भुत चरित्रका
वन आरम्म करता हूँ । मुने | यह सब भगवान शिवकी
लीला ही है । वे प्रभु अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले, स्वतन्त्र
ओर निर्विकार हैं| देवी सती भी बसी ही हैं। अन्यथा वेसा
कर्म करनेमें कोन समर्थ हो सकता है। परमेश्वर शिव द्वी
परब्ह्म परमात्मा हैं |
एक समयकी बात है; तीनों लोकोंमें विचरनेवाले लीला
विशारद भगवान् रुद्र सतीके साथ बलूपर आरूढ़ हो इस
भूतलूपर भ्रमण कर रहे थे। घुमते-धूमते वे दण्डकारण्यमें
आये । वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामकी देख जो
रावणद्वारा छल्पूवंक हरी गयी अपनी प्यारी पत्नी सीताकी खोज
कर रहे थे | वे “हा सीते !? ऐसा उच्चस्व॒स्से पुझारते, जहाँ-
तहाँ देखते ओर बारंबार रोते थे | उनके मनमें विरहका
आवेश छा गया था। सूयवंशमें उत्पन्न) वीर भूपाल) दशरथ-
ननन््दन) भरताग्रज श्रीराम आनन्दरहित हो लक्ष्मणके साथ
वनमें भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी
थी । उस समय उदारचेता पूर्णकाम भगवान् शंकरने बड़ी
प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया और जय-जयकार करके
के दुसरी ओर चल दिये। भक्तवत्सल शंकरने उस वनमें
: श्रीरामके सामने अपनेको प्रकट नहीं किया | भगवान् शिवकी
मोहमें डालनेवाली ऐसी लीलां देख सतीको बड़ा विस्मय
हुआ । वे उनकी मायासे मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं ।
सतीने कहा--देवदेव सर्वेश ! परत्रह्म परमेश्वर !
अक्षा) विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सदा सेवा करते हैं।
आप ही सबके द्वारा प्रणाम करने योग्य हैं। सबको आपका ही
सवंदा सेवन ओर ध्यान करना चाहिये। वेदान्त-शास्त्रके
द्वारा यत्नपूवंक जाननेयोग्य निर्विकार परमप्रभु आप ही हैं| नाथ !
ये दोनों पुरुष कोन हैं ; इनकी आकृति विरहव्यथासे व्याकुल
दिखायी देती है | ये दोनों धनुर्धर वीर वनमें विचरते हुए
क्लेशके भागी ओर दीन हो रहे हैं। इनमें जो ज्येष्ठ है; उसकी
' अइ्गकान्ति नील कमरूके समान व्याम है | उसे देखकर किस
कारणसे आप आनन्दविभोर् हो उठे थे.! आपका -चित्त क्यों
अत्यन्त प्रसन्न हो गया था १ आप इंस समय भक्तक्े समान
विनम्र क्यों हो गये थे ? स्वामिन ! कल्याणकारी शिव | आप
मेरे संशयको सुने | प्रभो ! सेव्य स्वामी अपने सेवकको प्रणए
करे, यह उचित नहीं जान पड़ता |
ब्रह्माजी कहते हैँ--नारद ! कल्याणमयी परमेझ्ा
आदिशक्ति सती देवीने शिवक्री मायाके वद्गीभूत होकऋ
भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रश्न किया; तब सतीकी वह व
सुनकर लीलाविशारद परमेश्वर शंकर हसकर उनसे झ |
प्रकार बोले |
परमेंश्वरने कह(--देवि ! सुनो, में प्रसनता
यथार्थ बात कहता हूँ | इसमें छल नहीं है। वरदानके प्रभ
ही मैंने इन्हें आदरूूर्वक प्रणाम किया है। प्रियें ! ये
भाई वीरोंद्वारा सम्मानित हैं | इनके नाम हैं--श्रीणम
लक्ष्मण | इनका प्राकस्य सूर्यवंद्में हुआ है। ये दोनों:
दर्रथके विद्वान पुत्र हैं| इनमें जो गोरे रंगके छोटे वर
दे साक्षात् शेषके अंश हैं| उनका नाम लक्ष्मण है।ः
बड़े भेयाका नाम श्रीराम है | इनके रूपमें भगवान् विष
अपने सम्पूर्ण अंदसे प्रकट हुए हैं | उपद्रव इनसे ढृ
रहते हैं। ये साधुपुरुषोंकी र्षा ओर हमलोगोंके कल
लिये इस प्रथ्वीपर अवती्ण हुए हैं |.
ऐसा कहकर सृश्टिकर्ता भगवान् शम्मु चुप हो १
भगवान् शिवकी ऐसी बात सुनकर भी सतीके मनकों३
विश्वास नहीं हुआ । क्यों न हो; भगवान् शिवकी मधर'
प्रबल है, वह सम्पूर्ण त्रिछोकीको मोहमें डाल देनेवा्
सतीके मनमें मेरी वातपर विश्वास नहीं है, यह जानकर
विशारद प्रभु सनातन शम्भु यों बोले | .
शिवने कह-देवि ! मेरी बात स॒नो। यदि
मनमें मेरे कथनपर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर रे
ही बुद्धिसि श्रीरामकी परीक्षा कर छो । प्यारी सती! ः
प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय; वह करों |
जाकर परीक्षा करो | तबतक में इस ब्रगदके नीचे लड़|
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद | भगवान् शिवकी आई
ईदवरी सती वहाँ गयीं ओर मन-ही-सन यह सोचने ला
कीं बनचारी रामकी कैसे परीक्षा करूँ “अच्छाः मैं पे
रूप धारण करके रामके पास चढूँ। यदि राम साक्षर ५
हैं, तब तो.सब कुछ जान लेंगे; अन्यथां वे मुझे नहीं हि
ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीरामके समीप उनती
लेनेके लिये गयीं | वास्तवमें वे मोहमें पड़ गयी में | |
सीताके रूपमें सामने आयी देख शिव-शिवका जप
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खुकुलनन्दन श्रीरम सब कुछ जान गये ओर हँसते हुए
उन्हें नमस्कार करके बोले |
श्रीरामने पूछा--सतीजी | आपको नमस्कार है | आप
प्रेमपूर्वक बतायें; भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं ? आप पतिके
बिना अकेली ही इस बनमें क्योंकर आयी ! देवि ! आपने
अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप घारण किया है !
मुझ्नपर कृपा करके इसका कारण बताइये ।
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात खुनकर सती उस समय
आश्रयंचकित हो गयीं। वे शिवजीकी कही हुई बातका
स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं ।
श्रीरामकी साक्षात् विष्णु जान अपने रूपको प्रकट करके मन-
ही-मन भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर प्रसन्न
चित्त हुईं सती उनसे इस तरह बोलीं-(रघुनन्दन | स्वतन्त्र
परमेश्वर भगवान् शिव मेरे तथा अपने पार्षदोंके साथ प्रथ्वीपर
भ्रमण करते हुए, इस वनमें आ गये थे । यहाँ उन्होंने सीताकी
जोजमें छगे हुए, लक््मणसहित तुमको देखा | उस समय सीता-
फे लिये तुम्हारे मनमें बढ़ा क्लेश था और तुम विरदृशोकसे
पीड़ित दिखायी देते थे | उस अवस्थामें तुम्हें प्रणाम करके
वे चले गये ओर उस वय्वृक्षके नीचे अमी खड़े ही
हैं। भगवान शिव बढ़े आनन्दके साथ तुम्हारे वेष्णव
# श्रीशिवके द्वारा गोलोकधामम श्रीविष्णुका गोपेशके पदूपर अभिषेक *
(३७
रूपकी उत्कृष्ट महिमाका गान कर रहे ये । यद्यपि उन्होंने
तुम्हें चतुभूज विष्णुके रूपमें नहीं देखा, तो भी तुम्हारा दशन
करते ही वे आनन्दविभोर हो गये। इस निमेल
रूपकी ओर देखते हुए. उन्हें बड़ा आनन्द प्रात हुआ |
इस विषयर्म मेरे पूछनेपर भगवान् शम्मुने जो
बात कही, उसे सुनकर मेरे मनमें भ्रम उत्पन्न हो गया ।
अतः राघवेन्द्र | मेने उनकी आज्ञा लेकर तुम्हारी परीक्षा की
है। श्रीराम | अब मुझे श्ञात हो गया कि तुम साश्षात् विष्णु
हो | तुम्हारी सारी प्रभुता मैंने अपनी आँखों देख छी | अब
मेरा संशय दूर हो गया तो भी महामते | तुम मेरी बात
सुनो | मेरे सामने यह सच-सच बताओ कि तुम भगवान
शिवके भी वन्दनीय केसे हो गये १ मेरे मनमें यही एक संदेह
है। इसे निकाल दो ओर शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान
करो |?
सतीका यह वचन सुनकर श्रीरामके नेत्र प्रफुछ कमलके
समान खिल उठे | उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान्
शिवका स्मरण किया । इससे उनके दूुदयमें प्रेमकी बाढ़ आ
गयी | मुने | आशा न होनेक्े कारण वे सतीके साथ भगवान्
शिवके निकट नहीं गये तथा मन-ही-मन उनकी महिसाका वर्णन
करके श्रीरघुनाथजीने सतीसे कहना प्रारम्म किया । ( अध्याय २४ )
श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक तथा उनके ग्रति प्रणामका प्रसड्
सुनाकर श्रीरामका सतीके मनका संदेह दूर करना, सतीका शिवके द्वारा मानसिक त्याग
भीराम वोले--देवि ! प्राचीनकालमें एक समय परम
छष्ठा भगवान् शम्भुने अपने परात्पर धाममें विश्वकर्माको बुलाकर
उनके; द्वार अपनी गोशालमें एक रमणीय भवन बनवाया:
जो बहुत ऐी विस्तृत था| उसमें एक श्रेष्ठ सिहासनका भी
निर्माण घराया | उस सिंदासनपर भगवान् शंकरने विश्वकर्मा
गरा एव छत्र बनवाया। जो बहुत ही दिव्य+ सदाके लिये
अद्भुत ओर परम उत्तम था | तत्पशात् उन्होंने सब ओरसे
रन्ट्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धवों, मागादिकों तथा सग्पूण
उपदेयोओी भी शीघ्र बह्ों बुल्याया | समस्त चेदों और आम
१४.१ पृपोसहित इद्ाजीको, सनिरयोकों तथा अप्साओो्स: ट्त
उस इडियोसे, जो माना प्रदारकी वलओसे सम्पन्न थीं)
अपन किये | इनके सिवा देवताओं, कपियों, सिद्धो
70 नदी शाचएसोग्टर बन््याओंदो भी दलदाया
[) ९६५९९ करा र्रः श्े दांणा
'ग:३ बस्तुए थी। मैने ' दीणा, मद दाः आादि नामा
टिक
[१ प« न््के मम १८ गत
प्रकारके वाद्योकी वजवाकर सुन्दर गीतोंद्वारा मदन उत्सव
स्वाया । सम्यूण ओपषधियोंके साथ राज्याभिपेकके योग्य द्रव्य
एकत्र किये गये। प्रत्यक्ष तीथेंकि जलेोंसि भरे हुए पॉन्च
कलश भी मंगवाये गये | इनके सिवा ओर भी बहत-सी दिव्य
सामग्रियोंको भगवान् शंकरने अपने पापदोंद्वाण मेंगशाया और
वर्हाँ उच्चस्वस्से बेदमन्त्रोोका घोष करवाया ।
देवि ! भगवान् विष्णुक्की पृर्ण भक्तिसे महेश्र देव सदा
प्रसक्ष रहते थे | इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हदयसे शीटरियो
वेकृण्ठस बुल्याया और शुभ मुहतमे ओऑीहरिय! उस शेड
सिहारनपर दिठावार महादियज्ञीम खय्यं ही प्रमप्र्दक, हमे मद
प्रशारके आवधत्तगाल दिदृरित किया ( उसके: मम्गसप
532॥| रे #नन््केसलअ> जा कफ ट्रफोलकुत वन >नन््यकूक. पु & 30027
इकूट कोधा गया छोर उससे मद्रह-कोनुदः वागये गये | झट
य हों हानक दाद महाफुन साय प्रद्मापटमाटरपर्स सील्पफद
ऊ न्कक्क कं क
+्क ढ* ड़ ड ब्गुघ | घर प्र 26६
१३८
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने *
| संक्षिप्त-शिवपुंराणा]
हिशमसवायमन्साभकादा॒राकाा॒इरपभाउप'प एतसपइुमआउप एमाकाम का मइतरपम रचा न ध्यञ कर कार वतन एामुला [एकता उन कलकस्फ दा लात का साउा॒क पार इं४मततरु तप इाप परमार तपा भस्म पक पर जाल ३ फइ 5 महरदता अआउता पातपालाम बइाफाइभ %इतकलका फरार जक का सनक फल कमल 8. 33. - कान क्या मे 2 जन-झनीजओ .. #िरब- माना के स्का, कि के
ज-ख ७ त अली जा पास... 2 अमन समीनईं >नमो-जपनान समान धन. सम कान पान, अमन आन, /#म- आम न न्परानयतनमन) अन,
अनार अपन ाक-, रन 40 >बआ «मम पकमपकननड
किया; जो दुसरोंके पास नहीं था | तदनन्तर खतन््त्र ईश्वर
भक्तवत्सल शम्मुने श्रीह॒रिका स्तवन किया और अपनी परा-
घीनता ( भक्तपवशता ) को स्वेत्र प्रसिद्ध करते हुए वे
लोककतो ब्रह्मासे इस प्रकार वोले ।
महेश्वरने कहा--लोकेश |! आजसे मेरी आशाके
अनुसार ये विष्णु हरि खयं मेरे वन्दनीय हो गये | इस बातको
सभी सुन रहे हैं। तात | तुम सम्पूर्ण देवता आदिके साथ इन
श्रीहरिको प्रणाम करो और ये वेद मेरी आशासे मेरी ह्वी तरह
इन श्रीहरिका वर्णन करें ।
श्रीरामचन्द्रजी कहते है--देवि | भगवान् विष्णुकी
शिवभक्ति देखकर प्रसन्नचित्त हुए वरदायक भक्तवत्सल रुद्र-
देवने उपयुक्त बात कहकर खबं ही श्रीगरुडघ्वजको प्रणाम
किया । तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों ओर सिद्ध
आदिने भी उस समय शभ्रीहरिकी वन्दना की | इसके बाद
अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वरने देवताओंके समक्ष
श्रीहरिको बढ़े-बड़े वर प्रदान किये |
महेश बोले--हरे ! तुम मेरी आशासे सम्पूर्ण लोकोंके
कर्ता; पाठक और संहारक होओ । घमं) अर्थ ओर कामके
दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करनेवाले दुष्टोंकों दण्ड देने-
वाले होओ; महान बल-पराक्रमसे सम्पन्न; जगत्यूज्य जगदीश्वर
वने रहो । समराक्भणमें तुम कहीं मी जीते नहीं जा सकोगे ।
मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे । तुस मुझसे मेरी
दी हुई तीन प्रकारकी शक्तियाँ ग्रहण करो | एक तो इच्छा
आदिकी सिद्धि, दूसरी नाना प्रकारकी छीलाओंको प्रकट करने-
की शक्ति और तीसरी तीनों लोकोंमें नित्य खतन््त्रता । हरे !
जो तुमसे छेष करनेवाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयक्पूर्वक
दण्डनीय होंगे । विष्णो ! में तुम्हारे भक्तोंको उत्तम मोक्ष प्रदान.
करूँगा | तुम इस मायाको भी ग्रहण करो, जिसका निवारण
करना देवता आदिके लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित
होनेपर यह विश्व जडरूप हो जायगा | हरे | तुम मेरी बायीं
भुजा हो ओर विधाता दाहिनी भुजा हैं | तुम इन विधाताके
भी उत्पादक और पालक द्वोओगे | मेरा ह्ृदयरूप जो रुद्र है,
वही मैं हँ---इसमें संशय नहीं है । वह रुद्र तुम्हारा ओर ब्रह्मा
आदि देवताओंका भी निश्चय ही पूज्य है | तुम यहाँ रहकर
विशेषरूपसे सम्यूणं जगत्का पालन करो । नाना प्रकारकी
लीलाए करनेवाले विभिन्न अवतारोंद्वारा सदा सबकी रक्षा करते
रहो । मेरे चिन्मय घामरमें तुम्हारा जो यह परम वेभवशाली
भोर अत्यन्त उज्ज्बल स्थान दे; बह गोलोक नामसे विज्या]
होगा । हरे | भूतलपरं जो तुम्हारे अवतार होंगे; वे सबके झड़
ओर मेरे भक्त होंगे | में उनका अवश्य दर्शन करूँगा।वे
मेरे वरसे सदा प्रसन्न रहेंगे |
श्रीरामचन्द्रजी कहते है--देवि ! इस प्रकार श्री
फी अपना अखण्ड ऐ.्वर्य सॉपकर उमावल्ूम भगवान् ह
खय॑ केलास पर्व॑तपर रहते हुए; अपने पार्पदोंके साथ खछद
क्रीडा करते हैं | तमीसे भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेप घा
करके आये ओर गोप-गोपी तथा गोभके अधिपति होकर व
प्रसन्ञताके साथ रहने लगे | वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो स्
जगतकी रक्षा करने लगे | वे शिवकी आजझ्ासे नाना प्रन्ना
अवतार ग्रहण करके जगत्का पालन करते हैँ | इस समर
ही श्रीहरिं भगवान् शंकरकी आशासे चार भाइयोंक्े हा
अवतीण्ण हुए हैं | उन चार भाइयोंमें सबसे बड़ा में फ[
दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं ओर चोये भाई झा
देवि | में पिताकी आशासे सीता ओर लक्ष्मणक्रे साय क
आया था। यहाँ किसी निशाचरने मेरी पत्नी सीताको हरत्नि
है ओर मैं विरही होकर भाईके साथ इस वनमें अपनी प्रिया
अन्वेषण करता हूँ | जब आपका दरशंन प्राप्त हो गवा) तव ले
मेरा कुशल-मद्गल ही होगा | मा सती | आपकी #पे ऐः
होनेमें कोई संदेह नहीं है | देवि | निश्चय ही आपकी भेए
मुझे सीताकी प्राप्तिविषयक वर प्राप्त होगा | आपके - भक्ुट
उस दुःख देनेवाले पापी राक्षसकों मारकर में सीताको कई
प्रास करूँगा । आज मेरा महान् सौमाग्य है जो आप देर
मुझपर कृपा की | जिसपर आप दोनों दयाड हो जाय)
पुरुष घन्य ओरे श्रेष्ठ है |
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती दे
प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आशाते 5
वनर्म विचरने लगे | पविन्न ह्ृदयवाले श्रीरामकी यह
सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्तिपरायण रघुनाथजीकी ८:
करती हुईं बहुत प्रसन्न हुईं | पर अपने कर्मको याद करके
भनर्म बड़ा शोक हुआ । उनकी अड्गकान्ति फीकी पढ़े में
वे उदास होकर शिवजीके पास लोटीं । मार्गमें जाती हुई
पतो बारंबार चिन्ता करने लगीं कि मैंने भगवान् शिव
नहीं मानी ओर श्रीरामके प्रति कुत्सित.बुद्धि कर ही।*
शंकरजीके पास जाकर उन्हें क्या. उत्तर दूँगी। शहरी
वारबार विचार करके उन्हें उस समय बड़ा पश्चात्ताप है -
हद्गसंदिता ] # श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममसे श्रीविष्शुका गोपेशक पद॒पर अभिषेक # १३९
लिन सिम अमित जज जल 27:02:
नम कामना न नल नाम सह
गिवके समीप ज्ञाकर सतीने उन्हें मन-ही-सन प्रणाम किया |
मह्ददेवजीने प्वान तोड़ा | यह जानकर अंगदम्पा राती बढ
उनके मुखपर विषराद छा रहा था । वे शोकसे व्याकुल और
निस्तेज हो गयी थीं। सतीकी दुखी देख भगवान् हरने उनका
कुशलू-समाचार पूछा और प्रेमपूवेंक कहय---/ठुमने किस प्रकार
परीक्षा ली ? उनकी यह बात सुनकर सती मस्तक झ्ुकाये
उनके पास खड़ी हो गयीं । उनका सन शोक ओर विषादमें
ड्वा हुआ था। भगवान् महेश्वरने ध्यान लगाकर सतीका सारा
चरित्र जान लिया और उन्हें मनसे त्याग दिया। वेदघर्मका
प्रतिपालन करनेवाले परमेश्वर शिवने अपनी पहलेकी की हुई
प्रतिशाकी नष्ट नहीं होने दिया | सतीका मनसे त्याग करके वे
अपने निवासभूत केलास पर्वतपर चले गये । मार्गमें महेश्वर
ओर सतीको सुनाते हुए आकाशवाणी बोली--“परमेश्वर | तुम
धन्य हो और तुम्हारी यह प्रतिशा भी धन्य है । तीनों छोकोंमें
तुम्दरे-जेसा महायोगी और महाप्रभु दूसरा कोई नहीं है ।
वह आकाशवाणी सुनकर देवी सतीकी कान्ति फीकी पढ़े
गयी । उन्होंने भगवान् शिवसे पूछा--“नाथ | मेरे परमेश्वर !
आपने कौन-सी प्रतिशा की है ! बताइये ।? सतीके इस प्रकार
पूछनेपर भी उनका ह्वित चाइनेवाले प्रभुने पहले अपने विवाह-
के विषयर्मे मगवान् विष्णुके सामने जो प्रतिश की थी; उसे
नहीं बताया | मुने | उस समय सतीने अपने प्राणवल्लभ पति
भगवान् शिवका ध्यान करके उस समस्त कारणको जान लिया;
जिससे उनके प्रियतमने उन्हें त्याग दिया था। “शम्मुने मेरा
त्याग कर दिया? इस यातकी जानकर दक्षकन्या सती शीघ्र ही
अत्यन्त शोकमें डूब गयीं ओर बारंबार सिसकने लगीं । सती-
के मनोभावकी जानकर शिवने उनके लिये जो प्रतिशा की थी,
उसे गुप्त ही रक्वा ओर वे दूसरी-दूसरी बहुत-सी कथाएँ. कहने
छगे। नाना प्रकारकी कथाएँ कहते हुए वे सतीके साथ केल्यस-
पर जा पहुँचे ओर श्रेष्ठ आसनपर स्थित हो चित्त्नत्तियोंके
निरोधपू्वंक समाधि लगा अपने स्वरूपका ध्यान करने लगे ।
सती सनमें अत्यन्त विषाद ले अपने उस धाममें रहने लगीं |
मेने । शिवा ओर शिवक्के उस चरित्रकों कोई नहीं जानता था।
भएनुने ! स्वेच्छासे शरीर धारण करके लोकलीलाका अनुसरण
परनेयले डन दोनों प्रमुझोका इस प्रयार वहाँ रहते हुए दीर्च
एल स्तीत हो गया । तत्यधात् उत्तम लीला मरसनेवाले
आर्यी और उन्हेंने व्यथित हृदयसे शिवके चरणोंमें प्रणाम किया ।
उदास्वेता शम्भुने उन्हें अपने सामने चैठनेके लिये आसन
है।
दिया और बड़े प्रेमसे यहुत-सी मनोरम कथाएँ कहीं । उन्हेंनि
वैसी ही लीला करके सतीके शोकको तत्काल दूर कर दिया |
वे पृववत् सुखी हो गयीं । फिर भी शिवने अपनी अतिशाको
नहीं छोड़ा | तात ! परमेश्वर शिवक्रे विपयर्मे यह कोई आश्रर्य-
की बात नहीं समझनी चाहिये । मने ! मुनिलोंग शिवा और
जिवकी ऐसी ही कया कहते है। कुछ मनुष्य उन दोनों-
में वियोग मानते हैं| परंतु उनमें वियोग केसे सम्मव है |
शिवा और शिवके चरित्रकों बास्तवरिकपसे कौन जानता है ।
ये दोनों सदा अपनी इ्छछासे सेठछते और मॉति-भोतिदी
छीछाएँ करते हैं। सती और शिव डाणी आर अपदी भौनि एक
दुसरेसे नित्य संयुक्त हैं । उन दोनर्सि दियोंग झा अखम्भद
ए्द्रशाम किक, ब् 4 स्ल्ण 4:52 क्र क्र च्ज
“कु “+ 8 3-७» ।*+ ष्ट! रुसाा ०» *“,5)+*५, बी ध, बहस ्झं टर मद रे
१४० # नमो रुद्ठाय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने £ [ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
7 9७क-ा..07+4.8०%-#4.:4मा ० कमा मा हगी+- एमी पहन सहानम सहन. न. सप०ााा ९... सिबरमिना् यानि आय कली
प्रयाग समस्त महात्मा सुनियोंद्वारा किये गये यज्ञमें दक्षका भगवान् शिवक्ों तिरस्कारपुवेक शाप देना
तथा नन््दीद्वारा ब्राह्मणकुलको शाप-प्रदान, भगवान् शिवका नन््दीको शान्त करना
ब्रह्माजी कहते ह--नारद ] पूर्वकालमें समस्त मद्दात्मा
मुनि प्रयागमें एकत्र हुए थे । वहाँ सम्मिलित हुए उन सब
महात्माओंका विधि-विधानसे एक बहुत बड़ा यश हुआ । उस
यज्ञमं सनकादि सिद्धगण; देवधि, प्रजापति; देवता तथा ब्रह्म-
का साक्षात्कार करनेवाले शानी भी पधारे थे | में भी मूर्तिमान्
महातेजस्वी निगमों ओर आगमोसे युक्त हो सपरिवार वहाँ गया
था । अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ वहाँ उनका विचित्र
समाज जुटा था। नाना शाझ्लोंके सम्बन्धर्मं शानचर्चा एवं
वादविवाद हो रहे ये | मुने | उसी अवसरपर सती तथा
पार्षदोंके साथ त्रिलोकहितकारी, खष्टिकतों एवं सबके सखामी
भगवान् रुद्र भी वहाँ आ पहुँचे | भगवान शिवको आया देख
सम्पूर्ण देवताओं, सिद्धों तथा मुनियोने ओर मैंने भी भक्ति-
भावसे उन्हें प्रणाम किया ओर उनकी स्तुति की | फिर शिव-
की आशा पाकर सब छोग प्रसन्नतापूवक यथास्थान बैठ गये ।
भगवानका दर्शन पाकर सब छोग संतुष्ट थे ओर अपने
सौभाग्यकी सराहना करते थे। इसी बीचमें प्रजापतियोंके भी पति
प्रभु दक्ष) जो बढ़े तेजखी ये; अकस्मात् घूमते हुए प्रसत्नता-
पूर्वक वहाँ आये । वे मुझे प्रणाम करके मेरी आशा ले वहा
बैठे | दक्ष उन दिनों समस्त ब्रह्माण्डके अधिपति बनाये गये
थे, अतएव सबके द्वारा सम्माननीय थे । परंतु अपने इस
गौरवपूर्ण पदको लेकर उनके मनमें बड़ा अहंकार था; क्योंकि
वे तत््वज्ञानसे शून्य थे | उस समय समस्त देवधियोंने मतमस्तक
हो स्तुति और प्रणामके द्वारा दोनों हाथ जोड़कर उत्तम तेजखी
दक्षका आदर-सत्कार किया । परंतु जो नानाप्रकारके लीला-
विहार करनेवाले; सबके स्वामी ओर उत्कृष्ट लीलाकारी खतन्त्र
परमेश्वर हैं; उन महेश्वरने उस समय दक्षकों मस्तक नहीं
झुकाया । वे अपने आसनपर बैठे ही रह गये ( खड़े होकर
दक्षका खागत नहीं किया )। महादेवजीको वहाँ मस्तक झुकाते
न देख मेरे पुत्र प्रजापति दक्ष मन-ही-मन अप्रसन्न हो गये |
उन्हें रुद्रपर सहसा क्रोध हो आया) वे ज्ञानश्ून्य तथा महान
अहंकारी होनेके कारण महाप्रभ्ुु॒ रुद्रको क्रूर दृष्टिसे देखकर
सबको सुनाते हुए उच्चखरसे कहने लगे ।
दक्षले फहा--ये सब देवता, असुर, श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा
ऋषि मुझे विशेषरूपसे मस्तक झुकाते हैं | परंतु वह जो प्रेतें
और पिशाचोंसे घिरा हुआ महामनखी वनकर बैठा है, वह
दुष्ट मनृष्यके समान क्यों मुझे प्रणाम नहीं करता ! आशा
निवास करनेवाला यह निलेज जो मुझे इस समय प्रणाम नहें
करता; इसका क्या कारण है १ इसके वेदोक्त कर्म लुप्त हो गे
हैं । यह भूतों ओर पिशाचोंसे सेवित हो मतवाछा बना फिख
है और शास्त्रीय विधिकी अवद्देलना करके नीतिमागंको रद
कलझ्लित किया करता है । इसके साथ रहनेवाले या इसम्
अनुसरण करनेवाले लोग पाखण्डी, दुष्ट पापाचारी तय
ब्राक्मणको देखकर उद्दण्डतापूवंक उसकी निन््दा करनेवाले है
हैं | यह खयं ही ज्रीमें आसक्त रहनेवाला तथा रतिकममे है
दक्ष है । अतः मैं इसे शाप देनेकी उच्यत हुआ हूँ | यह छ
चारों वर्णोसे पृरथक् और कुरूप है | इसे यशसे बहिष्कृत
दिया जाय । यह व्मशानमें निवास करनेवाला तथा उच्च
कुल और जन्मसे हीन है। इसलिये देवताओंके साथ क्
यशमें भाग न पाये ।
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद ! दक्षकी कही हुई यह वा.
सुनकर भगु आदि बहुत-से महृष्रि रुद्रदेवको दुष्ट माता
देवताओंके साथ उनकी निन््दा करने लगे |
दक्षकी बात सुनकर नन्दीको बड़ा रोष हुआ । उने क्
नेत्र चश्चल हो उठे ओर वे दक्षकों शाप देनेके विचारसे ठुंत ,
इस प्रकार बोले | |
नन्दीश्वरने कहा--अरे रे महामूढ़ ! दुश्खुद्धि श्४ '
दक्ष | बूने मेरे खामी महेश्वस्को यज्ञसे बहिष्कृत क्यों कर
दिया १ जिनके स्मरणमात्रसे यश सफल और तीर्थ पंवित्र है
जाते हैं, उन्हीं महादेवजीको तूने शाप कैसे दे दिया! '
दुललुद्धि दक्ष ! तूने ब्राह्मणणातिकी चपलतासे प्रेरित है.
इन रुद्रदेबको व्यर्थ ही शाप दे डाला है। महाप्रयु र
सवंथा निर्दोष हैं, तथापि तूने व्यय ही इनका उपहास कि '*
है | ब्राह्मणाधम | जिन्होंने इस जगतकी सृष्टि की जो इस
पालन करते हैं ओर अन्तर जिनके द्वारा इसका रह
होगा, उन्हीं इन महेश्वर-रूपको तूने शाप कैसे दे दिवा'
नन््दीके इस प्रकार फटकारनेपर प्रजापति दक्ष रोषसेआ *
बबूल्ा हो गये और उन्हें शाप देते हुए बेले--अरे खो!
तुम सब लछोग वेदसे बहिष्कृत हो जाओ। वेदिंक मा हे
झद्रसंदिता ] # भ्रयागमें मुनियोंद्वारा किये गये यज्षमे दक्षका शिवजीको तिरस्कारपू्वक शाप देना के रै४९
नम मिभ किक जि लक की अर. आला लुनल ला इइाााा बा ता आइना ा॥३ बा आाााा॥ राणा ााणाणाआ्ाेाणाणाणाााामाणााा आभार बह कल लआचकुल कल क कुल लल॒लल_नुुकजुछु कल. लक पका अकाल ललइलल अलावा हा ३7३ छा
भ्रष्ट तथा महर्षियोद्वारा परित्यक्त हैं| पाखण्डवादम्म लग जाओ
और शिष्टाचारत दूर रहो | सिरपर जग ओर दरीरमें भस्म
एवं इहृड्डियोंके आभूषण घारण करके मद्रपानमें आसक्त
ख्ट्ो |?
जब दक्षने शिवके पाषदोकी इस प्रकार शाप दे दिया;
तब उस झ्ापको सुनकर शिवके प्रियभक्त नन््दी अत्यन्त
गेपके वशीभूत हो गये । शिलादपुत्र नन््दी भगवान् शिवके
प्रिय पारद और तेजखी हैँ | वे गवंसे भरे हुएए महादुष्ट
दक्षकों तत्काल इस प्रकार उत्तर देने लगे ।
हि ; गत ; ह थ
्् 5च, फ् * कक, > पहला बढ
४ 5 5०70८ हर्ट /
किक... + #
ेर केश है; कर का ध ्क & 5५ २ “।
४००२० + हम मी । पा.
घोले
नन््दीःबर घोले--अरे शठ ! दुबबुद्धि दक्ष ! तुसे शिव-
पेगपा ज्ल्लिलि कि ग रे
जाती दिज्डझेल शान नहीं है। अतः मेने ग्रीवशे
आज] हे
ह भ् 7* 8३6 ५ के तन या हे कि के
६३०) ४, रे 44 शाप दिय | ] ह: 5 ह ह घार। द््ध् !
यू गा न 7 ह। कि 8 ४१३३ अं ५ /&5
7: चतद गृएता भरी है. उस शग आईँने भी
हयरण अश्मिनर्मे आउर महूप्रमु॒ सहेहरका
एशन डिया है। सतत: बने हे: ) खमर-
४ ६। उत्तः यहाँ हें भगवान गदते शेमस्स
छा च्ज्च्क 2 कब) दिलमार कई बल 5
5 >ह: * [ 2 ६ ( ९६५१३) १५.९ उतने
प्रशंसक वेदवादमें फँसकर वेदके तत्त्वशानसे झृत्य हो जाये ।
वे ब्राह्मण सदा भोगोंमें तन््मवय रहकर स्वरगको ही सबसे
बड़ा पुरुषार्थ मानते हुए “स्वर्गले बढ़कर दूसरी कोई वस्तु
नहीं है! ऐसा कहते रहें तथा क्रोच, लोभ ओर मदसे युक्त
हो निलंज भिक्षुक बने रहें | कितने ही ब्राह्मण वेदमागेको
सामने रखकर शझूुद्रोंका यज्ञ करानेबाले ओर दरिद्र होंगे ।
सदा दान लेनेमें ही छगे रहेंगे, दूषित दान ग्रहण करनेके
कारण वे सब-के-सब नरकगामी होंगे | दक्ष | उनमेंसे कुछ
ब्राह्मण तो ब्रह्मराक्षस भी होंगे | जो परमेश्वर शिवको सामान्य
देवता समझकर उनसे द्रोह करता है, वह दुष्ट बुद्धिवाल
प्रजापति दक्ष तत््वशानसे विमुख हो जाय | यह विपषय-
सुखकी इच्छासे कामनारूपी कपटसे युक्त धर्मत्राले गहस्था-
श्रममें आसक्त रहकर कर्मकाण्डका तथा कर्मफलकी प्रशंसा
करनेवाले सनातन वेदवादका ही विस्तार करता रहे । इसका
आनन्ददायी मुख नष्ट हो जाय | यह आत्मश्ञानकोी भूलकर
पशुके समान हो जाय तथा यह दक्ष कमेश्रष्ट हो शीम ही
बकरेके मुखसे युक्त हो जाय |
इस प्रकार कुपित हुए नन्दीने जब ब्राह्मणोंको ओर
दक्षने महादेवजीकों शाप दिया; तब वहाँ महान हाह्कार
मच गया । नारद ! में वेदांका प्रतिपादक होनेके कारण
शिवतत््वको जानता हूँ | इसलिये दक्षका वह शाप सुनकर
मेने बारंबार उसकी तथा भूगु आदि ब्राह्म्णोकी भी
निन्दा की । सदाशिव महादेवजी भी नन््दीकी वह बात सुनकर
हँसते हुए-से मधुर वाणीमें बोडे--ब्रे नन््द्रीकों समझाने
ल्गे।
सदाशिवने कहा--नन्दिन् ! मेरी बात सुनो । तुम वो
परम ज्ञानी हो। तम्हें क्रोष नहीं करना चाहिये। तुमने
श्रमसे बह समझकर कि मुझे झाप दिया गया। व्यथ
ही ब्राग्णकुलकों शाप दे डात्य । बास्तवर्म मुझे क्िसीका
शाप छू ही नहां सकताः अतः नुर्ग्दे उत्तेजित नहों होना
७ +७- १7२०७ द्र््ट्ा गन्ना: पक रुग््ाय न तय खु्कासय #भाए- बामलली0 अंग 3 खा गप धत्पर पटक
चाहिये ) बंद सन्चान्तरमय ओर खूनासय है। उसके प्रत्येड
कं > 5 गडटत्ल + "5, ) प्याज हल ५“ »7। भामीजआ 30४ ह ॥ #र्ग पारसा अं 2 ।
सुकसम समस्त इट्थारदाक आत्मा। परमात्मा ) प्रताएः
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गे सर ३५० २९० 87 +मात्मल ४:
| सं क्षिप्त-शिवपुराण]
लाएं छान 3& 3०
किक िििििजमनमममच्च्च्म्णग्णग्ग्ग्गग्ण्ण्ड्डस्ड्ड्ड््डिडिडस्स्ज्जन
यहाँ नहीं बुलाया है | अतः दधीचजी | आपको फिर कमी
ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । मेरी प्रार्थना हे कि आप सब
लोग मिलकर मेरे इस महान यशकी सफल बनाये |?
दक्षकी यह बात सुनकर दधीचने समस्त देवताओं ओर
मुनियोंके सुनते हुए यह सारगभित बात कही ।
द्धीच बोले--दक्ष | उन भगवान् शिवके बिना यह
सहान् यश्ञ अयश हो गया--अब यह यश कहलानेयोग्य ही नहीं
रह गया । विशेषतः इस यज्ञमें तुम्हारा विनाश हो जायगा |
ऐसा कहकर दधीच दक्षकी यशशालासे अकेले ही निकल पढ़े
ओरवहुरंत अपने आश्रमको चल दिये। तदनन्तर जो मुख्य-मुख्य
शिवभक्त तथा शिवके मतका अनुसरण करनेवाले थे; वे भी
दक्षको वेसा द्वी शाप देकर तुरंत वहाँसे निकले ओर अपने
आश्रमोंको चले गये | मुनिवर दघीच तथा दूसरे ऋषियोंके
उस यज्ञमण्डपसे निकल जानेपर दुष्टबुद्धि शिवद्रोही दक्षने उन
मुनियोंका उपहात करते हुए कहा ।
दक्ष बोढे--जिन्हें शिक्न ही प्रिय है, थे नाई
ब्राद्मण दधीच चले गये । उन्हींके समान जो दूसरे थे; ३४
मेरी यशशालासे निकल गये | यह बड़ी शुभ बात हुई | फे
तदा यही अभीष्ठ है । देवेश | देवताओ और मुनियो !
कहता हूँ---जिनके चित्तकी विचारदाक्ति नष्ट हो गयी, ६
मन्दबुद्धि ६ ओर मिध्यावादमें लगे हुए हैं, ऐसे वेद
ढुराचारी लोगोंको यशकर्ममें त्याग ही देना चाहिये | 5:
आदि आप सब देवता और ब्राह्मण बेदवादी हैं | आह
इस यश्को शीघ्र ही सफल बनायें |
त्रह्माजी कहते हें--दक्षकी यह बात सुनकर
मायासे मोहित हुए समस्त देवर्षि उस यज्ञमें देवा)
पूजन ओर हवन करने छगे । मुनीश्वर नारद | इसपर
यशको जो शाप सिला, उसका वर्णन किया गया | भव ३
विध्वंसकी घटनाको बताया जाता है; आदसपूर्वक मुनो |
( अध्ाव ४
मी 7. ९-4. + नल
. -दक्ष-यज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ चलनेके लिये अनुरोध, दक्षके शिवद्रोहक
जानकर भगवान् शिवकी आज्ञासे देवी सतीका पिताके यज्ञमण्डपकी
ओर शिवगणोंके साथ प्रस्थान
त्रह्माजी कहते हँ--नारद | जब देवर्षिगण बड़े उत्साह
ओर ह॒र्षके साथ दक्षके यशमें जा रहे थे; उसी समय दक्ष-
कन्या देवी सती गन्धमादन पर्बंतपर चेंदोवेसे युक्त धाराणहमें
सखियोंसे घिरी हुई मॉति-भाँतिकी उत्तम क्रीडाएँ कर रही
थीं । प्रसन्नतापूर्वंक क्रीडार्म छगी हुई देवी सतीने उस समय
रोहिणीके साथ दक्षयश्षमें जाते हुए चन्द्रमाकी देखा | देखकर
वे अपनी हितकारिणी प्राणप्यारी श्रेष्ठ सखी बिजयासे बोलीं--
धमेरी संखियोंमें श्रेष्ठ प्राणप्रिये विजये | जल्दी जाकर पूछ तो
आ ये चन्द्रदेव रोहिणीके साथ कहाँ जा रहे हैं ??
सतीके इस प्रकार आजा देनेपर विजया तुरंत उनके
पास गयी और उसने यथोचित शिष्टाचारके साथ पूछा--
“चन्द्रदेव | आप कहाँ जा रहे हैं !? विजयाका यह प्रश्न
सुनकर चन्द्रदेवने अपनी यात्राका उद्देश्य आदरपूर्वक बताया |
दक्षके यहाँ होनेवाले यशोत्सव आदिका सारा ब्वत्तान्त कहा |
तरह सत्र सुनकर विजया बड़ी उतावलीके साथ देवीके पास
आयी ओर चन्द्रमाने जो कुछ कहा था, वह सब उसे
उनाया । उसे सुनकर कालिका सती देवीको बड़ा
हुआ । अपने यहाँ सूचना न मिलनेका क्या कारण है?
बहुत सोचने-विचारनेपर भी उनकी समझमें नहीं आया |
उन्होंने पार्षदोंसे घिरे अपने स्वामी भगवान् शिवके पात का
भगवान् शंकरसे पूछा ।
सती बोलीं--प्रभो | मैंने सुना है कि मेरे फ़िर
यहाँ कोई बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है। उसमें बहुत #
उत्सव होगा । उसमें सब देव्षि एकत्र हो रहे हैं। देवदेकेश,
पिताजीके उस महान् यश्में चलनेकी रुचि आपको को”
हो रही है ! इस विषयमें जो बात हो) वह सब बाई
महादेव | सुहृदोंका यह धर्म है कि वे सुहृदोके हाय
जुले | यह मिलन उनके महान् प्रेमको बढ़ानेवाल हीत ['
अतः प्रभो ! मेरे खामी | आप मेरी प्रार्थना मानकर ]
प्रयत्ष करके मेरे साथ पिताजीकी यज्ञशाल्यमें आज ही चर ्
सट्रसंदिता |
>> सनी जानने जहा 43० हरी भें पलक * कलर सलरी ट्री जम पानी कनक, क हए अधि फिल्म जी व्मनीकिननमम न्नममारमी अली पी फनी 3 िररीीपनन०ममनीकानननपननीयन समन जनम नमी.
सतीकी यह बात सुतकर भगवान् महेश्वरदेव, जिनका हृदय
दक्षके वाग्वाणेंसि घायल हो चुका था) सघुर वाणीमें बोले---
पदेव्रि] तुम्हारे पिता दक्ष भेरे विशेष द्रोही हो गये हैँ | जो
प्रमुख देवता ओर ऋषि अमिमानी; मूह ओर शानशृत्य हैं;
वें ही सब तुम्दारे पिताके यज्ञर्म गये हैं | जो छोग बिना
बुलाये दूसरेके घर जाते हैं; वे वहाँ अनादर पाते हैं, जो
मृत्युसे भी बढ़कर कष्टदायक है | अतः प्रिये | तुमकी और
मुझ्की तो विशेषरूपसे दक्षके यज्ञर्म नहीं जाना चाहिये
( क्योंकि वहाँ दमें बुलाया नहीं गया हैं) । यह मैंने सच्ची
बात कही है |
महात्मा महेश्वरके पुस। कहनेपर सती रोष-
पृवक दोलौं--शम्भो | आप सबके ईश्वर हैं | जिनके जानेसे
: यज्ञ सफल होता है, उन्हीं आपको गेरे दुष्ट पिताने इस समय
: आमन्त्रित नहीं किया है | प्रभो | उस दुरात्माका अभिप्राय
गन] है; वह सब मैं जानना चाहती हूँ। साथ ही वहाँ आये
हुए सग्यूण दुरात्मा देवषियोंक्े मनोसावका भी में पता
लगाना चाहती हूँ | अतः प्रभो | में आज द्वी पिताके यश्में
जाती हूँ | नाथ ! महेश्वर | आप मुझे वहाँ जानेकी
! आशा दे दे | |
देवी सतीके ऐसा कहनेपर सर्वक्ष) स्वद्रण्ठ) खष्टिकर्ता
एवं वल्याणखरूप साक्षात् भगवान् झुद्र उनसे इस
“गर बोले |
शिवने कहा--उत्तम अतका पालन करनेवाली देवि !
£ एस प्रदार तुम्दारी मचि वहाँ अवश्य जानेके लिये हो
॥ ६ ते मेरी आशासे तम शीघ्र अपने पिताके यश्में जाओ।
' नन््दी प्पभ सुसझित है, तुम एक महारानीके अनुरूप
गपचार साथ छे सादर इसपर सवार दो बहुसंख्यक प्रमथगर्णोदि
५ यात्रा बरो | प्रिये | इस विभूषित छृपभपर आरूद दोओ |
खद्के इस प्रदार आदेश देनेपर
हेटल सती देवी सब साधनोंसे
३ ओर ऋरी | परमात्मा सिमने
मुन्दर आमृषणोसे
युक्त हो पिताफ्रे
उन्हें सुन्दर वरर,
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! “मु # कक
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# यशशालाम शिवका भाग न देखकर सतीका रोषपूण बचन कद्दना हें
न कनकनकननननकानरमननननम करन नमक नमन कफ नकारना आधी जी तन नी नी नी न्नी नी नी नी जी जी लव ड् क्् ौघ 5 उरननानननननननननान नमन पान नमन नमन नमी कननननन-- नमन मनन नमन ननन-+न नि धधा ाए
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आभूषण तथा परम उज्ज्वल छपम्म; चामर आदि मद्दाराजोचित
उपचार दिये | भगवान शिवकी आशसे साठ हजार रुद्रगण
बड़ी प्रसलता और मद्दान् उत्साहक्े खाथ कीवृहल्यूत्रक सतीक्ते
साथ गये | उस समय वहाँ यज्षके लिये यात्रा करे समय सख
ओर मद्यान उत्सव होने लगा | महादिवजीके गणने शिव्रिया
सतीके लिये बड़ा भारी उत्सव रचाया | वे सभी गण
कीवृट्ल्यूर्ण कार्य करने तथा सती और झिवके यशकों गाने
लगे । शिवके प्रिय और सहान वीर प्रमथगण प्रसक्रतापूर्सक
उछलते-कूदते चल रहे में । जगदम्थाके यात्राल्नन्टमें सब
प्रकारसे बड़ी भारी झोमा हो रही थी । उस समय हो सस्वद
जब-जयकार आदिया दद्ध प्रदण हुआ; उससे तीनों लोड
£ आश्याय र८ )
की न हे जा चअन्अ
, मामा 5 जम
2-20 से -आीक-ाअक
पशशाला्म शिवका भाग न देखकर सतीके रोपपृर्ण बचने, दक्षद्ारा झिवक्ी निन्दा सुन दस
तथा देवताओंकों धिकार-फटकारकर सतीडारा अपने प्राण-स्यागका निश्चय
पुर ् कं छः
प्ट्याज ९ ् जौ ३, डा छा
१ हर 8 रे स्गार जज > कोच ८ स्पा हु] 25 है शागएरर व्कमलपानात कुल ता की अलग, बा. नाक उन अकबर -+#णक “० अमन, प्रा कुक >>--की के बे
जाऊं पास ऐ--नारद | दउज्पा सती उस सादर गादान ४0 खरने दिये गतय सना प्रशारत्। पता पर ए एप
ह। वे हि
9०] प्र छ् शैँ
बे 9» ३7 है आुऔ 6५ है -++ न हल जो लच्ज्चाा च्् 5४० के की 9; छू.
भ् रे ध] शत हे कु ह हर दिलके ३० हट १5. ह तक है मी जरा!" .] कि श्क्न ७७, शक आाक 4 "री 4 | क् हा ओऔ कफ + ४ फृत >तचणकू कूृछ कल>आ व का निधि ज्चक-+>मनफा- >०-जाह़-- «न हू
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द्वारपर जाकर खड़ी हुईं और अपने वाहन नन्दीसे उतरबर
अकेली ही शीमतापूर्वक यशशालाके भीतर चली गयीं | सतीको
आयी देख उनकी यशखिनी माता असिक्नी ( बीरिणी ) ने
ओर बहिनोंने उनका यथोचित आदर-सत्कार किया | परंतु
दक्षने उन्हें देखकर भी कुछ आदर नहीं किया तथा उन््हींके भवसे
शिवकी मायासे मोहित हुए दुसरे छोग भी उनके प्रति आदर-
का भाव न दिखा सके । मुने | सब लोगेंके द्वारा तिरस्कार
प्रात्त होनेसे सती देवीकी बड़ा विस्मय हुआ; ते भी उन्होंने
अपने माता-पिताके चरणोंमें मस्तक झुकाया | उस यश्षमें सतीने
विष्णु आदि देवताओंके भाग देखे | परंतु शम्भुका भाग उर्न्ह कहीं
नहीं दिखायी दिया । तब सतीने दुस्सद क्रोध पकट किया |
वे अपमानित होनेपर भी रोषसे भरकर सब छोगोंकी ओर पूर
दृष्टिसे देखती ओर दक्षकी जकाती हुई-सी बोलीं ।
सतीने कहा--प्रजापते ! आपने परम मज्जञलकारी
भगवान् शिवको इस यज्ञमें क्यों नहीं बुलाया १ जिनके द्वारा यह
सम्पूर्ण चराचर जगत् पवित्र होता है, जो स्वयं ही यश) यशवेत्ताओंमें
श्रेष्ठ यज्षके अज्ज) यशकी दक्षिणा ओर यशेकतों यज़मान हैं;
उन भगवान् शिवके बिना यज्ञकी सिद्धि केसे हो सकती है !
अहो | जिनके स्मरण करनेमात्रसे सब कुछ पविन्न हो जाता
है, उन्हींके बिना किया हुआ यह सारा यज्ञ अपविच्न हो
जायगा । द्रव्य, मन्त्र आदि, हृव्य और कव्य--ये सब जिनके
सखरूप हैं; उन्हीं भगवान् शिवके बिना इस यज्ञका आरम्भ
कैसे किया गया ? क्या आपने भगवान शिवको सामान्य देवता
समझकर उनका अनादर किया है ? आज आपकी बुद्धि भ्रष्ट
ही गयी है | इसलिये आप पिता होकर भी मुझे अधमस जेँच
रहे हैं | ओरे | ये विष्णु ओर ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनि
अपने प्रभु भगवान् शिवके आये बिना इस यज्ञर्मे कैसे
चले आये !
ऐसा कहनेके बाद शिवस्थरूपा परमेश्वरी सतीने भगवान्
विष्णु; ब्रह्मा; इन्द्र आदि सब देवताओंको तथा समस्त ऋषियोंको
बड़े कड़े शब्दोर्मे फटकारा |
. घ्रह्माजी कहते हँ--नारद ! इस प्रकार ऋघसे भरी
हुई जगदम्वा सतीने वहाँ व्यथित हृदयसे अनेक प्रकारकी
बातें कहों । श्रीविष्णु आदि समस्त देवता ओर मुनि जो वहाँ
उपस्थित थे) सतीकी बात सुनकर छुप रह गये । अपनी पुत्रीके
देसे वचन सुनकर कुप्रित हुए दक्षने सवीक्षी ओर कऋर हृण्सि
देखा ओर इस प्रकार वहा ।
%# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5 | संक्षिप्त-शिवपुराणा]
'लपालाहमय ९-4 जहा -२८८४६हर गा पका: स+ वहएवजरशचा ८-२७ उपरडारनक फिर?" झ॒ जापान री पपरनाल 0 कू- ८८ यम: ३: वपहापपन ३; पक 2 पवार: पया' यार १ रतलाम पवाइ,6 पर परम नए ०९१०६६३/७::२५अम-रधन्__ल १२०52 हक (९ (एफ दर सत2-वरतमीचकाम: पर २५: ८अनादफ ससचहााप:र तट पाइ७१९(७-
दक्ष बोले--भद्रे ! तुम्हारे बहुत कहनेसे क्या छाप|
इस समय यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है | तुम जाओग
ठददरो, यह तुम्हारी इच्छापर निर्भर है। तुम यहाँ आती ह
क्यों ! रामस्त विद्वान जानते हैं कि तुम्हारे पति शिव अमह
रुप हैं । वे कुछीन भी नहीं हैं । वेढ्से वहिष्क्त हैं और रे
प्रेतां तथा पिशाचके स्वामी हैं | वे बहुत ही कुवेप घा
किये रहते हैं | इसीलिये रुद्रक्रों इस यज्ञक्ने लिये नहीं बुलग
गया है | बेटी | में रुद्रको अच्छी तरद जानता हैँ। का
जाम-बृझकर ही मेने देवपियंकी सभामें उनको आम
नहीं क्रिया है ) रुद्रको झाखके अर्थका ज्ञान नहीं है] वे उह
ओर दुश॒त्मा है | मुझ मृद पापीने ब्रह्मजीके कहनेसे उनके
ठ॒म्हारा विवाह कर दिया था | अतः झुचिस्मिते | तुम
छोड़कर स्वस्थ ( शान्त ) हो जाओं | इस यज्ञ तु
ही गयी तो स्वयं अपना भाग ( या दहेज ) ग्रहण करो |
दक्षके ऐसा कहनेपर उनकी त्रिभुवतपूजिता पुत्री स्तनिधि
मिन््द। करनेवाले अपने पिताकी ओर जब दृष्टिपात विब्रा
उनका रोष और भी बढ़ गया | वे मन-हो-मन सोचने हा
“अब में शंकरजीके पास केसे जाऊंगी ? यदि शंकरजीके दो
इच्छासे वहाँ गयी ओर उन्होंने -यहाँका समाचार पूछा हे
उन्हें क्या उत्तर दूँगी !? तदनन्तर तीनों लोकोंकी जननी!
रोषावेशसे युक्त हो लंबी सास खींचती हुई अमने दुष्ृ
पिता दक्षसे बोलीं । ु
सतीने कहा--जो महादेवजीकी निन््दा करता है व
जो उनकी होती हुई निन्दाको सुनता है; वे दोनों ले
नरकमें पड़े रहते हैं, जबतक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमात 8
अतः तात ! मैं अपने इस दारीरकों त्याग ढूँगी)
आगमें प्रवेश कर जाऊंगी | अपने स्वामीका अनादर ही
अब मुझे अपने इस जीवनकी रक्षासे क्या प्रयोजन |
कोई समर्थ हो तो वह स्वयं विशेष यत्न करके शम्मुवी
करनेवाले पुरुषकी जीमको बलपूर्वक् काठ डाले | र्म
शिव-निन्दा-अवणके पापसे शुद्ध हो सकता है, इसमें
नहीं है । यदि कुछ कर सकनेमें असमर्थ हो तो पे बुर
पुरुषको चाहिये कि वह दोनों कान बंद करके वहपि
जाय | इससे वह शुद्ध रहता है--दोषका भागी वह हैं
ऐसा श्रेष्ठ विद्वान कहते हैं। ० श्रेष्ठ विद्वान कहते हैं । ही
# यो निनन््दति महादेव निन्धमानं शणोति वा ।
तावुभौ नरवा यातो यावच्चन्द्रदिवाकरों ।
] |
(शि० पु० रु० स॒० त्ञ० ख्० २१६
हक ञ् शरीर हल उसे दर्यकां का हाद्ाकार ट क १:७9
द्रसंदिता ] # सतीका योगाप्मिसे पने शरीरकों भस्म कर देना; दर्शकांका हाह
..........>.-->->-"-चव्य्यययच।टअ्स्य्स्स्स््य्य्त्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्प््य्य्य्य्स्स्म्््स्ज दीप अल कटी कमल वानयाबव्ाध्यवरपकावयक्षयासुमजयफरमदा्या+बरमअमहााभाफायननाक पा पकन्यअम बम करप लावा -पता॒० कया कया कमरााबा कलम
इस प्रकार धर्मनीति बतानेपर सतीको अपने आनेके कारण उसमे शम-दम आदि )--दो ओर त्रताये रस है ।
डा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने व्यथित चित्तसे मगवान् शंकरके. मनीषी पुरुषोंको उनका विचार करना चाहिये । वेदमें विवेचन-
पचनका स्मरण करिया। फिर सती अत्यन्त कुपित हो दंक्षसे। पूर्वक उसके रागी और विरागी--दो प्रकारके अलग-अलग
उन विष्णु आदि समस्त देवताअंसि तथा मुनियोसे भी निडर अधिकारी बताये गये हैं ! परस्पर विरोधी होनेके कारण उक्त
शीकर बोलीं । कल दोनों प्रकारके कर्मोका एक साथ एक दी कर्तके द्वारा आचरण
सतीने कद्दा--तात | तुम भगवान शक शिन्दक नहीं किया जा सकता | भगवान् शंकर तो परब्रह्म परमात्मा हैं;
टी | इसके लिये तुम्हें पश्चात्ताप होगा | यहाँ बी ठ्भ्स उनमें इन दोनों ही प्रकारके कर्मोका प्रवेश नहीं हे । उन्हें
भोगकर अन्तर्म तुम्हे बातना भोगनी पड़ेगी हा सर मक कोई कर्म प्राप्त नहीं होता, उन्हें किसी भी प्रकारके कर्म करनेकी
लिये न बोई प्रिय है न अप्रिय, उन निः रे कम आवश्यकता नहीं हे। पिताजी! हमारा ऐड्वरय अव्यक्त हे।
प्रतिकूल तुम्द्ारे सिवा दूसरा कौन चछ सकता है | जो दुए छोग उसका कोई लक्षण व्यक्त नहीं है, सदा आत्मज्ञानी मद्यपुरुष
है ये सदा ईर्ध्यापूनंक यदि महापुरुपोंकी निन््दा करें वो उनके ही उसका सेवन करते है । ठग्हारे पास वह. ऐव्वर्य नहदं दे ।
जप व आज बात नव मत हक यरुशालाओोंर्मे रहकर वहाँके अन्नसे तृप्त होनेवाले कमंठ छोगोंको
जग जन अत मी कि 5 वो पा शोता है; उससे वह ऐश्वर्य बहुत दूर है । जो
मएपुदपोंकी निन्दा शोभा नहीं देती | जिनका “दिव? यह महापुरुषोंकी निन्दा करनेवाल्ा ओर दुष्ट है; उसके जन्मको
दो अक्षरोंका नाग कमी बातचीतके प्रसजसे मुष्योंकी वाणी- है। विद्वान पुरुषको चाहिये कि उसके सम्बन्धको
प्रा एक बार भी उन्चारित हो जाय तो वह सम्पूण पापराशिको विशेषरूपसे प्रयत्त करके त्याग दे | जिस समय भगवान
थीम दी नष्ट कर देता ऐ) उन्हीं पवित्र कीतिवाले निर्मल शिवसे शिव तुम्हारे साथ मेरा सम्बन्ध दिखलाते हुए मुझे दाक्षायणी
एम शेप करते हो! आश्रर्य है | वास्तवर्में तुम अशिव कहकर पुकारेंगे, डउस समय मेरा सन सहसा अत्यन्त दुखी
(अमप्रल ) रुप ऐ। गद्दापुरुपोफे मनरूपी मधुकर ब्रह्मानन्दमय हो जायगा । इसलिये तुम्हारे अम्नसे उलनन्न हुए. सदा गबके
रसका पान करनेकी इचछासे जिनके सर्वोर्थदायक चरणकमल्लों तुल्य घ्रणित इस शरीरको इस समय में निश्चय ही त्याग देंगी और
पा निरतर सेवन किया करते हैँ, उन्दीसे तुम मू्ेतावश द्रोह मद कर बी ऐ जाऊँगी | दे देववाओ और सनियों !
गे हो ! जिन्ई तुम नामसे शिव ओर कामसे अशिव बताते तुम सब लोग मेरी बात सुनो । तुग्दारे द्वदयमें दुष्टता आ गयी
! उन्हें क्या त्ुग्शरे सिवा दूसरे विद्वान नहीं जानते £ तुमछोगका यह कर्म सवया अनुचित है | तुम सब्र लोग
ग आदि देवतह सनक आदि मुनि तथा अन्य शानी क्या भूद दो क्योंकि शिवकी निन््द्रा ओर वालइ तुम्हें प्रिय है ।
के स्वस्पनी गद्दी समझते ! उदार-बुद्धि भगवान् शिव अतः भगवान, इस्ते नुरईे इस ककर्मका सिश्वय ही प्रगाग्रा
से पलाये, कपाठ घारण किये इ्मशानमें यूतेंके साथ अति ी गा
तन््मतापुब व रहते तथा भस्गम एस नसरसण्डाव ने माला धारण न े
से ६--इस बानवों जामबार भी जो सुनि और देवता उनके त्रह्माज्ञी कटते हू--नारद | उस यन्नम दक्ष सथा
रोते गिरे हुए निर्माल्यकी बढ़े आदरके साथ अपने गस्तक- देवताओंसे ऐसा कहकर सती देवी छुप ही गयों आर मन-दी-
२ चदादे हैं, इसदा क्या कारण है! यही कि वे भगवान्. मन आमने प्राण-वल्दम शग्बुका स्मस्य करने स्थायी ।
"5 ऐे नाशत् परमेश्वर हूं | प्रद्धत्ति ( मध-मागादि ) और | ऋष्या
डक
किक ब्ुः व ४+२००--० नलफनीय- तल लक
सतीका योगामरिसे अपने शरीरको भस कर देना, दर्शकोंका हाहझार, शिवपापदोंका प्राणन्याम
तेथा दक्षपर आक्रमण, ऋभुओंद्रार उनका भयाया जाना तथा देवताओंकी चिन्ता
,.. गली आहसे ए- - गए ! शोन
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पु कर +-गढी प+ण्कककी वन ननक-जकास) कक व ५आ#० १ ++७- फूल्स न कक की ली ऑ के >यजका की छा
की 46 कियंपपइ शाह न ४३ जप हे कब श्श के का परम पब म यम न स्
दारदाी आपय 45६ रश्व्एग]ु रब 8७, 0७, ३५७ व) ४१.३. न्
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०. ३ जे रे, 8१; धन १६६*+ * ३ है| हक 52 | 5१ पट ४ जा ,
बीयर का सी सन्मान॥ु धो पिनममान मर मान आम
२१७८
अपानकी एकरूप करके नाभिचक्रमें स्थित किया। फिर उदान
वायुकी बलपूर्वक नाभिचक्रसे ऊपर उठाकर बुद्धिके
साथ हृदयमें स्थापित किया। तत्यश्वात् शंकरकी प्राणवल्लभा
अनिन्दिता सती उस द्वुदयस्थित वायुको कण्ठमार्गसे
भ्रकुटियोंके बीचमें के गयीं । इस प्रकार दक्पर क़पित हो
सहसा अपने शरीरको त्यागनेकी इच्छासे सतीने अपने
सम्पूर्ण अड्जोंमे योगमार्गके अनुसार वायु और अभिकी
घारणा की । तदनन्तर अपने पतिके चरणारविन्दोंका विन्तन
करती हुईं सतीने अन्य सब वस्तुओंका ध्यान भ्रुल्ा दिया |
उनका चित्त योगमार्गर्म स्थित हो गया था | इसलिये वहाँ
उन्हें पतिके चरणोंके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं दिखायी
दिया | मुनिभ्रेष्ठ | सतीका निष्पाप शरीर तत्काल गिए और
उनकी हृच्छाके अनुसार योगाभिसे जलकर उसी ऋण भस्म
हो गया | उस समय वहाँ आये हुए देवता आदिने जब यह
घयना देखी; तब वे बड़े जोरसे द्वाद्यकार करने छंगे | उनका
वह महान भद्भुत) विचित्र एवं भयंकर हाए्गकार आकाशर्मे
और प्ृष्वीतलपर सव ओर फैल गया | लोग कह रहे थे--
“हाय | महान् देवता भगवान् शंकरकी परस प्रेयणी सती
देवीने किस दुष्टके दुन्यवद्धाससे कुपित हो अपने प्राण
स्याग दिये । अहो | ऋ्रक्माजीके पुत्र इस दक्षकी वढ़ी भारी
दुष्ता तो देखो | सारा चराचर जगत् जिसकी छंतान हैः
उसीकी पुत्री मनखिनी सती देवी, जो सदा हीं मान पानेके
योग्य थीं, उसके द्वारा ऐसी निराहत हुईं कि प्राणोंसे ही हाथ
घो बेठीं । भगवान् वृषभधष्वजकी प्रिया सती रुदा सभी
सत्पुरुषोंके ह्वारा निरन्तर सम्मान पानेकी अधिकारिणी थीं ।
वास्तवर्मे उसका द्ृदय बड़ा ही असहिष्णु है | वह प्रजापति
दक्ष ब्राह्मणद्रीही है | इसलिये सारे संसारमें उसे महान
अपयश प्राप्त होगा । उसकी अपनी ही पुत्री उसीके अपराधसे
जब प्राणत्याग करनेको उद्यत हो गयी; तब भी उस महा-
नरकभोगी शंकरद्रोद्दीने उसे रोकातक नहीं |
जिस समय सब लोग ऐसा कह रहे थे; उसी समय
शिवजीके पार्षद सतीका यह अद्भुत प्राणत्याग देख तुरंत ही
क्रोधपूवक अख्र-शस्त्र ले दक्षको मारनेके लिये उठ खड़े
हुए । यशमण्डपके द्वारपर खड़े हुए वे भगवान् शंकरके
समस्त साठ हजार पार्षद, जो वढ़े भारी बलवान ये; अत्यन्त
रोपसे भर गये ओर «हमें घिक्कार है; घिक्कार है?, ऐसा कहते
हुए भगवान् शंकरके गणोंके वे सभी वीर यूथपति बारंबार
डच खरसे हाह्मकार करने लगे | देवर्षे | कितने ही पार्षद
फपकानक 4 उाशतञुअककम कई पकलतयकमकाउफरकधकर विश फाा पशु चपराउकउता सनक पुत् कमर पकल्कतय की जुारका लुक चक्र पाइप कम वक्त पान हज समान रीना सकी * तीज जज»ीी जप पटरी कमी इक". ९५५ परत" यकीस क्ीी-र जमा कमी जला जब. अनीता अनी-यर 7. करी जी जममा+.. री बकानीी जमा .न्अरा। जानी पीसी" परी "रानी पुकार पी कमी (नीम की परी
%: नमों रुद्राय शान्ताय पग्रह्मणे परमात्मने # | सक्षिप्त-शिवपुराणा]
3 पाकर... 40०“ पड दा; ७०० एमयाएा ० मय “पम यादुफ-++पाका-“सारि यु“ ए्गाइ मम यह ल् यह गाए... मा मयाओर/नपहीपपममपाआनम मा?" गपगगानी गइइवूइाा गा गा पाह+#+" प्रभाग हक" चागयइल् पा भा माह मयहुापयाह गण हा भू.
तो वहाँ शोकसे ऐसे व्याक्ुछ हो गये कि वे अत्यन्त तौरे
प्राणनाशक शख्ज़द्वार अपने द्वी मस्तक ओर मुख बा
अद्ञींपर आधात करने लगे | इस प्रकार बीस हजार पाए
उस समय दक्षकन्या सतीके साथ ही नष्ट हो गये | वह एड
अद्भुत-सी यात हुई | नष्ट होनेसे बचे हुए मद्दत्मा मंडे
वे प्रमथगण प्रोषयुक्त दअको मारनेके लिये हथियार स्ि
उठ खड़े हुए । मरने | उन आक्रमणकारी पाष॑दोंक के
देखकर भगवान भरुने यज्ञर्म विप्त डालनेवार्लोका नाश
करनेके लिये नियत “अपहता असुराः र्षारमि वेशि!
इस यजुम॑न्त्रसे दक्षिणामिमें आहुति दी । भगुके भक्त
देते ही यशकुण्डसे ऋभु नामक सहसतों महान देवता, बोझ
प्रबल वीर थे, वहाँ प्रकट हो गये । मुनीद्वर | उन के
हाथमें जलती हुई
अत्यन्त विकट युद्ध हुआ; जो सुननेवांलोंके भी रोग ।
कर देनेवाला था ॥ उन ब्रह्मतेजसे सम्पन्न महावीर 248
सब ओरसे ऐसी मार पड़ी; जिससे प्रमथर्गण वि हे ।
प्रयासके ही भाग खड़े हुए.। इस प्रकार उने ४ क्
उन शिवगणोंकी तुरंत मार भगाया ) यह अड्ु्ी
शगवान् शिवकी महाशक्तिमती इच्छासे ही हुई | ६ |
हु
न * |
के 348 ७७ +/ 4 श
३००७५ ५. नि हि के तु
हैः
[ प्रष्ठ १४६
रु
ग्द्संदिता |
' अली यही पी. धाम सा" दमा समा दमा (मानो सुदामा इुककनी वही करी
देखकर ऋषि, इन्द्रादि देवता, मसुद्वण; विश्वेदेव। अश्विनी-
झमार ओर व्येकपाल चुप ही रहे | कोई सब्र ओरसे आ-आकर
वर्हा भगवान विष्णुसे प्रार्थना करते थे कि किसी तरह बिद्न
टल जाय | वे उद्विम हो वारंबार विघ्न-निवारणके लिये
आपसमें सलाद करने लगे | प्रमथगर्णंकि नाश होने ओर
४ आकाशवाणीद्वार दक्षकी भत्संता तथा उनके विनाशकी खूचना $#
नि ला माा आााााआ भा इ ाामाइ आरा भा आभााााआााााााााााआाााााभणााणा यारा आइअ इक >लललललललततः_इ सकजाक 3 कला लीन जजलललजज जमकरलललललज का छा सजा पक की. जमकर लमीक जज सअ. उज_नवील लक कमी. आल सका कल लु अब
जाओ
भगाये जानेसे जो भाव्री परिणाम होनेवाल्ल था, उसका
भलीमाँति विचार करके उत्तम जुद्धिवाले श्रीविष्णु आदि
देवता अत्यन्त उद्विम हो उठे थे। मुने | इस प्रकार दुरात्मा
डॉकर-द्रोही ब्रह्मवन्धु दक्षके यशर्मे उस समय बड़ा भारी विध्न
उपस्थित हो गया | ( अध्याय ३० )
हार आआ::: 0-७ ८-७
आकाशवाणीद्वारा दक्षक्की भत्सेना, उनके विनाशकी झचना तथा समस्त देवताओंको
यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्ररणा
त्रह्माजी कहते हँ--पुनीश्वर ! इसी बीचमें वहाँ दक्ष
तथा देवता आदिके सुनते हुए आकाशवाणीने यह यथार्थ
बात कह्दी--“रे-रे दुराचारी दक्ष | ओ दम्धाचारपरायण
मद्ापूढ्व | यह तूने केसा अनर्थकारी कर्म कर डाला १ ओ
मूर्स | शिवभक्तराज दधीचके कथनको भी वूने प्रामाणिक
नहीं मान; जो पेरे लिये सब प्रकार्से आनन्ददायक और
गद़लकारी था। वे ब्राक्षण देवदा तुझे दुस्सह शाप देकर तेरी
यश्यालारे निकल गये, तो भी तुप्त मूढ़ने अपने मनमें कुछ
भी नहों समझा । उसके बाद तेरे घरमें मड्ठडलमयी सती
देवी खत; पारी, जो तेरी अपनी द्वी पुत्री थीं; किंतु तूने
उन भी परम आदर नहीं किया | ऐसा क्यों हुआ ? शान-
हब दक्ष | तूने सती और महादेवजीकी पुजा नहीं कीः यह
बण किया १ रो ऋद्याजीका बेटा हूँ? ऐसा समझकर तू
व्यर्थ ही पमंडमें भय रदता ऐ और इसीलिये तुझपर मोद छा
गया ९। वे सती देवी ही सत्पुरुषोंकी आराष्या देवी है
अपना सदा आराधना वरनेके योग्य ६, वे समस्त पुर्ण्योका
फल देनेवाली, तीनों लोकोंफी माता, कल्याणखरूपा और
नगताव शंकरके आधे अग्नमें निवास करनेवाली हैं ! वे
नही देवी ही पूजित होनेपर सदा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान
ब_नेयाटी एूँ | ये ही महे्वस्ती शक्ति हैं और
जप ने भी सब प्रकासके मल देदो £ैं | मे सदी
दण रा एमेपर सदा संसारका भव दूर
अमन गनोयास्टित फड देती ४ तथा थे हो समस्य
हे या मर्नेयारी देवी हैं । मे नमी ही सदा
सनी, है दे बिक आम हे हद विद हा <
६ पद पर भारत प्रदान परती ए । भे ही
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मातारूपसे सुशोमित होनेवाली तथा ब्रह्मा; इन्द्र, चन्द्र, अग्नि
एवं सूयेदेव आदिकी जननी मानी गयी हैँ । वे सती ही
तप) धर्म ओर दान आदिका फल देनेवाली हैं। वे ही शम्मु-
शक्ति महादेवी हैँ तथा दुष्ठोंका इनन करनेवाली परात्पर शक्ति
हैं | ऐसी महिंसावाली सती देवी जिनकी सदा प्रिय घमंपत्नी
हैं, उन भगवान् महददेवकों तूने यश्ष्में भाग नहीं दिया |
अरे | तू केसा मूढ और कुविचारी है |
“भगवान् शिव ही सबके स्वामी तथा परात्पर परमेश्वर
हैं | वे समस्त देवताओंके सम्पक सेव्य हैं और सबका कल्याण
करनेवाले हैं | इन्हींके द्शनकी इच्छासे सिद्ध पुरुष तपस्या
करते ६ और इन्दींके साक्षात्कारकी अमिलापा मनरमें लेकर
योगीलोग योग-साभनामें प्रदडत होते हैँ। अनन्त घन-घान्य और
यज्ञ-याग आदिका सबसे मदान् फल यही बताया गया है कि
भगवान् शंकरका दर्शन मुल्भ हो | शिव ही जगत्का घारण-
पोषण करनेवाले हैं | वे ही समस्त विद्याओंके पति एवं सय
कुछ करनेमें समर्थ हैं । आदिवियाके श्रेष्ठ खामी और
समस्त मडलोंक्े मी मप्नल वे ही है । हुए दक्ष | सने
उनकी दाक्तिका आज सत्फार नहीं किया है । एसीलडिये इस
यशका विनाश हो जायगा । पूजनीय ब्वक्तियोंकी पा मे
करनेसे अमइ होता ही है सूने एग्स पृष्य शिवम्बया
तलीका पूजन नहीं किया ४ | रोपनाग आपने साहस सस्तवोगे
आए. हु बा जी, फ् ही]
हर * ब2 “4 ापू जन: अजय. अमणााकमुकममकुकि: #ऋ्क व्की अप जमकर) + का. +>>मीहि +
प्रतिदिन पहमााायय रा लिन चर/दी रप बरग ऋण हु,
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बन जा च्कु अ्य जात $ ४ हु शन्मि ब #.# की न्ड झ्यो नी (..: छा >>्इंल्कक
हु कह । पा न हे न्प् राम ० 7 . हि कप वि. अशकाओं हल
तक | 5१९] 4+$९4._ (७ | 4 7,, ७॥(१7१)4 5 ह # | | ५१५ ४१, अआ.पु#
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गृढ़ दक्ष | तूने उन माता-पिताका सत्कार नहीं किया। फिर
तेरा कल्याण केसे होगा |
८तुझपर दुभोग्यका आक्रमण द्वो गया ओर विपत्तियाँ
टूट पड़ीं; क्योंकि तूने उन भवानी सती ओर भगवान् शंकर-
की भक्तिभावसे आराधना नहीं की । “कल्याणकारी शम्भुका
पूजन न करके भी में कल्याणका भागी हो सकता हूँ? यह तेरा
कैसा गये है ! वह दुर्बार गधे आज नष्ट हो जायगा । इन
देवताओंमेंसे कौन ऐसा है, जो सर्वेद्बर शिवसे विम्ुख होकर
तेरी सहायता करेगा ? मुझे तो ऐसा कोई देवता नहीं दिखायी
देता । यदि देवता इस समय तेरी सहायता करेंगे तो जलती
आगसे खेलनेवाले पतज्लोंके समान नष्ट हो जायेंगे । आज
तेरा मुँह जल जाय; तेरे यश्ञका नाश हो जाय ओर घितने
४ नमो रुद्र|य शास्ताय बत्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुरण
तेरे सद्दायक हैं; वे भी आज शीत द्वी जल भरें | इस दुर्ग
दक्षकी जो सदह्दायता करनेवाले हैं, उन समस्त देवतओरे
लिये आज शपथ हे | वे तेरे अमद्नलके लिये ही है|
सद्दायतासे विरत हो जाये | समस्त देवता आज हस क्र-
मण्डपसे निकलकर अपने-अपने स्थानको चले जायें। अब
सत्र लोगोंका सब प्रकारसे नाथ हो आायगा। अब छ
मुनि और नाग आदि भी इस यश्षसे निकल जायें; अन॥
आज सब लोगोंका सर्वथा नाश हो जायगा। श्रीहे'
ओर विधातः | आपलोग भी इस यज्ञमण्डपसे जीव्र नि
जाइये |??
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! सम्यूण यजशाद
बैठे हुए लोगंसि ऐसा कहकर सबका कल्याण करनेवाले «
आकाशवाणी मोन द्वो गयी । ( अध्याय १!
शा ७ ८ आल १८५-- ५४ €-:- « <-य आर श् स्जन्ड
गणोंके मुखसे और नारदसे भी सतीके दुग्ध द्वोनेकी बात सुनकर दक्षपर कपित हुए शितता
अपनी जटासे वीरभद्र ओर महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ-विध्यंस करने
ओर पिरोधियोंको जल डालनेकी आज्ञा देना
ब्रह्माजी कदते है--मारद ) वह आकाशवाणी सुनकर
सब देवता आादि भयभीत तथा विस्मित हो गये। उनके
मुखसे कोई बात नहीं निकली । वे इस तरह खड़े या बेठे रह
गये; मानो उनपर विशेष मोह छा गया हो । भगुके मन्त्रबलसे
भाग जानेके कारण जो वीर शिवगण नष्ट होनेसे यच गये थे; वे
मगवान शिवकी शरणमें गये | उन सबने अमिततेजसी भगवान्
रुद्रको भलीमाँति सादर प्रणाम करके वहाँ यशमें जो कुछ हुआ
था; वह सारी घटना उनसे कह सुनायी ।
गण बोले--महेश्वर ! दक्ष बड़ा दुरात्मा ओर घमंडी
है। उसने वहाँ जानेपर सतीदेवीका अपमान किया ओर
देवंताओंने भी उनका आदर नहीं किया | अत्यन्त ग्व॑से भरे
हुए उस दुष्ट दक्षने आपके लिये यज्ञमं भाग नहीं दिया।
दूसरे देवताओंके लिये दिया और आपके विषयमें उच्बखवस्से
तुर्बेचन कहे । प्रभो | यह्षमें आपका भाग न देखकर सतीदेवी
कुपित हो उठीं और पिताकी बारंबार निन्दा करके उन्होंने
तत्काछ अपने शरीरकी योगाम्निद्वारा जलाकर भस्म कर दिया |
- यह देख दस हजारसे अधिक पाष॑द लजाबश शख्ह्रोंद्गरा अपने
दी अज्ञोंकी काट-काय्कर वहाँ मर गये | शेष हमलोग दक्षपर
कुपित हो उठे और सबको भय पहुँलाते हुए वेगपूर्वक डस
यशका विध्व॑ंस करनेको उद्यत हो गये; परंतु विरोधी भू
अपने प्रमावसे हमें तिर॒स्कृत कर दिया । हम उनके गला
का सामना न कर सके | प्रमो | विश्वम्मर | वे ही क्षः
आज आपकी शरणमें आये हैं | दयालो | वहाँ प्राप्त हुए +
से आप हमें बचाहये, निर्भय कीजिये | महाप्रभो | उत्त १
दक्ष आदि सभी दुष्टोने घर्मडमें आकर आपका विशेष
अपमान किया है | कल्याणकारी शिव | इस प्रकार हैं
अपना; सतीदेवीका ओर मूढ़ बुद्धिवाले दक्ष आदिका भी!
इत्तान्त कह सुनाया । अब आपकी जेसी इच्छा
बेसा करे |
त्ह्मजी कहते हेँं--नारद | अपने पाषदोंकी यह
सुनकर भगवान् शिवने - वहाँकी सारी घटना जाननेे *
शीघ्र ही तुम्हारा स्रण किया | देवर | तुम दिव्य
सम्पन्न हो | अतः भगवानके स्मरण करनेपर तुम ठुरंत
आ पहुँचे ओर शंकरजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके हि
गये | स्वामी शिवने तुम्हारी प्रशंसा करके तुमसे दक्ष
गयी हुई सतीका समाचार तथा दूसरी घटनाओंकी हैं.
तात | झम्म्ुके पूछनेपर शिवमें मन लगाये रखनेवाटे कु
शीघ्र ही वह सारा चृत्तान्त कह सुनाया) जो दक्षयशषों
मद्धसेहिता | 5£ दृद्
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हुआ था | मुने । तग्हारे मुखसे निकली हुईं बात सुनकर उस
समय मद्ान रोद्र पराक्रमसे सम्पन्न सर्वेश्वर रुद्रने तुरंत ही
बढ़ा भारी क्रोध प्रकट किया । टोकसंद्ारकारी रुद्रने अपने
निस््मे एक जय डखाड़ी और उसे रोपपूर्वक उस पर्वतके ऊपर
दे मारा | मने | भगवान शंकरके पठकनेसे उस जटाके दो
हट है! गये ओर महाप्रत्यके समान भयंकर शब्द प्रकट
हुआ | देव | उस जठके पृ््रेसागसे महाभयंक्रर महावली
वीरमद्र प्रकट हुए; जो समस्त शिवगण्णक्रे अगरुआ हैं| वे
थूमण्डलका सब ओरसे व्यात करके उससे भी दस अंगुल
अभिक ट्राकर खड़े हुए. । वे देखनेमें प्रल्याग्निकि समान जान
पहने थे | उनका दारीर बहुत ऊँचा था | वे एक हजार
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प्रतीत होते थे | वीरमद्र बातचीत करनेमें बड़े कुशरू थे ।
उन्हेंने दोनों हाथ जोड़कर परमेश्वर शिवको प्रणाम करके कहा ।
वीरभद्र बोछे--महारुद्र ! सोम) सूर्य और अग्नियो
तीन नेत्रोकि रुपमें घारण करनेवाले प्रभो | जञीज आशा
दीजिये। मुझे इस समय कोन-सा कार्थ करना होगा !
ईशान ! क्या मुझे आधे ही क्षणमें सारे समुद्रोकी सुखा देना
है ? या इतने ही समयमें सम्पूर्ण पर्वतोकी पीस डालना है ?
हर | में एक ही छणमें ब्रह्मग्डको भस्म कर डाई या समस्त
देवताओं ओर मुनीखरोंकों जलाकर राख कर दूँ! शंकर !
ईशान ! क्या में समस्त छोकोंको उल्ट-पलट दूँ या सम्पृ्
प्राणियवा विनाश कर डादू | महेश्वर | आपकी कृपासे कहीं
कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे में न कर स्व) । पराक्रमके
द्वारा मेरी समानता करनेबाला वीर न पहले कभी हुआ है और
न भागे होगा | शंकर | आप किसी तिनकेकी भेज दें तो बह
भी बिना किसी यत्नके क्षणमरमें बड़े-से-बड़ा कार्य सिद्ध कर
सकता है इसम॑ संदाय नहीं हैं । छाम्मी | यद्यपि आपनी
लीलामातजसे सारा काये सिद्ध हो जाता ६; तथापि जो मुझे भेन्ना
जा रहा है; यह सुझपर आपका अनुग्रद ही है। शमग्भी ) मुझमें
भी जो ऐसी शक्ति दे। वह आपकी कृपासे ही प्राप्त हुई 2 ।
शंकर | आपकी कृपाके बिना क्िसीमें भी कोई शक्ति नहों हो
सकती । वास्तवर्मे आपदी आशाके बिना कोई तिनक्े आदिकों
भी दिलामेगें समर्थ नहीं है, यह निस्संदेदह कहा जा सकता £ |
महादेव | में आपके चरण बारबार प्रगाम करता £ |
हर | आप अपने अभीए कायकी सिद्धिके लिये आज गये
थी भेजिये । शम्गी | मेरे दाहिने झ्गः बारंबार फूडक २४
हूैं। इसे सूचित होता है कि मेरी विलय अमग्य प्रोगी। आता;
'प्रभो | मश भेजिय | शंदर ! आज मरे कोर अमृत एयं
विशेष टूप हा उत्ताशद। अनशव है रहा है जोर नेरा शिन
आपने चरणत गहने लगा हुआ हैं | झाहा प्रकेपगगारर मे
लिए आह पाती विल्नार ॥ गो 8: 7 5 के
| निसनीे ऊापन सहुटण जि; ४« पसीड! सपा दिए 7
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हो गया है । अतः इन दिनों वह विशेषरूपसे मेरा विरोध करने
लगा है | दक्ष इस समय एक यज्ञ करनेके लिये उद्यत है |
तुम याग-परिवारसहित उस यशको भस्म करके फिर शीघ्र मेरे
स्थानपर लोट आओ | यदि देवता) गन्धबे, यक्ष अथवा अन्य
कोई तुम्हारा सामना करनेके लिये उच्यत हों तो उर्न्हें भी आज
ही शीक्ष और सहसा भस्म कर डालना । दघीचकी दिलायी हुई
मेरी शपथका उलछड्ठडन करके जो देवता आदि वहाँ ठहरे हुए.
हैं, उन्हें तुम निश्चय ही प्रयत्नपूषेक जलाकर भस्म कर देना |
जो मेरी शपथका उल्लद्नन करके गवेयुक्त हो वहाँ ठहरे
हुए हैं, वे सब-के-सब मेरे द्रोही हैं | अतः उन्हें अग्निमयी
मायासे जल्य डालो | दक्षकी यशशालामें जो अपनी पत्नियों
१ नमो रुद्राय शान्ताय ज्नह्मण परमात्मने #
० -अयुध---पीममु--- समान गा कम ० -मपूकुके-...ड--+ मा पाक कुन.
(वानी न- और कपल न मद के “मानी +मआन न न ..क्40-99 440": आत. ८७४७-८७ ७७-४८ ७-७४ ८543 अर तक सन मम वकल अं ााााांधााााआ८््णण
9५ २0. 2 4०7 ७७७एए॒र॒ंमा
[ संश्िप्त-शिवपुराण|
ओर सारभृत उपकरणोंके साथ बेठे हों उन सबको उच्च
भस्म कर देनेके पश्चात् फिर शीघ्र लौट आना । हुर्ो के
जानेपर विश्वेदेव आदि देवगण भी यदि सामने भा हुए
सादर स्त॒ति करें; तो भी तुम उन्हें ज्ञीम आगकी लाहः
जलाकर ही छोड़ना | बीर | वहाँ दक्ष आदि सब सेफ़े
पत्नी ओर बन्धु-बान्धत्रॉसहित जछाकर ( कल्यर्म एफ
हुए ) जलको लीलापूवक्र पी जाना |
त्रह्माजी कहते है--नारद ! जो वेदिक मरे
पालक) कालके भी शत्रु तथा सबके ईश्वर हैं, वे भगवाः
रोपसे लाल आँखें किये महावीर वीरभद्गसे ऐसा,
चुप हो गये | ( अयाब
प्रमथ्गणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रय्यान, दक्ष तथा
देवताओं को & हिल (0 * बिक
देवताओंकी अपशकुन एवं उत्पातस्नचक लक्षणोंका दशंन एवं भय होना
ब्रह्माजी कहते है--नारद ! महेश्वर्के इस वचनको
आदणरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत संतुष्ट हुए । उन्होंने महेश्वर-
को प्रणाम किया । तत्पश्वात् उन देवाधिदेव झूलीकी उपयुक्त
आशाको शिरोधाय करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके यश-
मण्डपकी ओर चले | भगवान् शिवने केवल शोभाके लिये
उनके साथ करोड़ों महावीर गर्णोंकी भेज दिया; जो प्रलूयाग्निकरे
समान तेजस्वी थे | वे कोतृहलकारी प्रबल वीर प्रमथगण वीर-
भद्रके आगे और पीछे भी चल रहें थे | कालके भी काल
भगवान् रुद्रके वीरभद्गरसहित जो छाखों पाषदगण थे; उन
सबका स्वरूप रुद्रके ही समान था | उन गणोंके साथ
महात्मा वीरमद्र मगवान् शिवके समान ही वेश-भूषा घारण
किये रथपर बैठकर यात्रा कर रहे थे | उनके एक सहस्त
भुजाएँं, थीं। शरीरमें नागराज लिपटे हुए थे | वीरमद्र
बड़े प्रबल ओर भयंकर दिखायी देते थे | उनका रथ बहुत ही
विशाल था। उसमें दस हजार सिंह जोते जाते थे; जो
प्रयत्नपूवक उस रथको खींचते थे | उसी प्रकार बहुत-से
प्रवछ सिंह; शार्दूछ$ मगर; मत्स्य और सहसों हाथी उस
रथके पाश्वेभागकी रक्षा करते थे | काली, कात्यायनी,
ईशानी, चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली। भद्रा। त्वरिता
तथा वेष्णवी--इन नवदुर्गोभोके साथ तथा समस्त
भूतगर्णेके साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये
चलीं। डाकिनी) शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्मकः कृष्माण्ड;
पपंट, चटक; ब्रह्मराक्षण; भेरव तथा क्षेत्रापाल आदि--ये
सभी बीर भगबान् शिबकी आशाका पालन एवं दक्षके यज्ञका
विनाश करनेके लिये तुरंत चल दिये | इनके खा
गणेके साथ योगिनियोंका मण्डल भी सहसा कुपित है
यजश्ञका विनाश करनेके लिये वहाँसे प्रस्थित हुआ | झञ'
कोटि-कोटि गण एवं विभिन्न प्रकारके गणाघीश वीरमाडे
चले | उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी।
प्रकारके शब्द करनेवाले शद्भू बज उठे | भिन्न-मिन्न 7
सींगें बजने रूगीं। महामुने ! सेनासहिंत वीरमद्रकी 4
समय वहाँ वहुत-से सुखद खप्म होने लगे |
इस प्रकार जब प्रमथगणोंसहित वीरभद्वने प्रखाव।
तब उधर दक्ष तथा देवताओंको बहुत-से अशुभ रक्षग दि
देने छगे। देवर्ष ) यशविध्वंसक्की सूचना देनेवाठे £
उत्पात प्रकट होने लगे | दक्षकी बायीं आँख; बायीं गज
बायीं जाँघ फड़कने लगी | तात .] वाम अज्जोंका वह
सर्वंथा अशुमसूचक था ओर नाना प्रकारके कष्ट कि
सूचना दे रहा था। उस समय दक्षकी यशशालर्ग '
डोलने छगी । दक्षको दोपहरके समय दिनमें ही *
तारे दीखने लगे | दिशाएँ मलिन हो गयीं | सका
चितकबरा दीखने लूगा | उसपर हजारों घेरे पढ़ गये!
वह भयंकर जान पड़ता था | बिजली और अमित
दीसिमान् तारे हृट-हृूटकर गिरने छगे तथा और मी हैं
भयानक अपशकुन होने लगे ।
इसी बीचमें वहाँ आकाशवाणी प्रकट हुई है| है
देवताओं और विशेषतः दक्षकों अपनी बात सुनाने “'
जज,
स्ट्रसंदिता | रे
.0०३_+-.. बाक
+ा- कलम -रमक कम. तक... भरा आग ध
आज. बड़ी अग ना आी अत हा & खो. जानी. ल्नी 2७०... मा. आन 4. कक की. ही. मीन ड.. #॥औ “| इक काम ४ री जा
आकादशाबाणी वाली-ओों दक्ष ! आज नेरें जन्मको
प्रकार दे! तू महामूद्त ओर पापात्मा है। भगवान हरकी
ओरे आज तुझे महान दुःख प्राप्त होगा जो किसी तरह
बच नहीं सकता । अब यहाँ तेरा हाह्मकार भी नहीं सुनायी
देगा जे मृद देवता आदि तेरे यज्ञ स्थित हैं; उनको मी
महान दःख होगा--इसम संशय नहीं है |
प्रह्माजी कहते है--म्ुने ! आकादावाणीवी यह बात
फमान»-पाकन+ सनम» आओ ०33. पाआन-- बी +- १-५: >प्त
छ्यि (्ः की
दक्षकी यज्ञकी रपक्षाकें छिय भगवान विप्णुसे प्रतथना २ ४७३
डबल
समन... 3५ ममा2०- परम >पा#नन-५+पामया/पा-++नवीअमपपा#-.. "73००-५५ .पहमनपक, जा के |» 3 पीजी पाया. फिनन-ीपानानका व्म्जबाढत. कक. की
जम तर. अर >> ज->->+-3+ जज नी मल शकन त ड ऑ डठडअइ5:5क्ल्अअइबअइअअअइि 5“: ू-<>-े॑य:ः < कक जी जय छा जन री हक माफ आका सके हि 2 जीना के अमीक, आगन अरेन जी अनीये अतीक आन -ज + जनक ७:33 परी ..-मी, आज. आौयत 3-79 &+ आ3-# ॥.# के आकलन हरी आधा. धो अंग. री... था. > ७ आगए- अगर ऑक98 पध+ 2०० अमिए,. शक. #0७ .#] मय क./आ
नो के
मुनकर ओर पृर्वोक्त अद्युभसूचक लछक्षेणोंको देखकर दक्ष
तथा दूसरे देवता आदिकों भी अत्यन्त भय प्राम हुआ ।
उस समय दक्ष मन-ही-मन अत्यन्त व्याकुल हो कॉपने लगे
ओर अपने प्रभु लक्मीपति भगवान् विप्णुकी द्ारणमें गये ।
वे भयसे अधीर हो बेसुध हो रहे थे। उन्होंने स्वजनवत्सलछ
देवाधिदेव भगवान विष्णुको प्रणम किया ओर उनकी लुति
करके कहा | ( अध्याव २३-३४ )
दक्षकी यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्राथना, भगवावका शिवद्रोहजनित संकटको ठालमेमें
अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित बीरभद्रका आगमन
दक्ष दालि--देवदेव ! हरे ! विष्णो ! दीनबन्धों !
इपनिधे | आपको मेरी ओर मेरे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये ।
प्रमो | आप ही यज्ञके रक्षक हैं; यज्ञ ही आपका कमे है
और आप यज्ञसखरूप हैं। आपकी ऐसी कृपा दरस्नी चाहिये,
तससे यशका बिनाझ ने हो |
प्रद्माज्ी फटते हँ---प्रनीख्वर ! इस तरह अनेक प्रकार-
| सादर प्रार्थना करके दक्ष भगवान श्रीहरिफे चरणंभे गिर
है । उनका चित्त भयसे ब्याकुल हो रहा था | तब जिनदे
६.८... .... .
हट
सन हु
श्य्य
भर
» कब न
मनम॑ घव्राहट आ गयी थीं; उन प्रजापति दक्षकों उठाकर
ओर उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर भगवान् जिप्णुने
देवाधिदेव शिवका स्मरण किया। अपने प्रभ्॒ एवं महान,
ऐश्वयंसे युक्त परमेश्वर शिवका स्मरण करके शिवतत्त्वके जाता
श्रीहरि दक्षकी समझाते हुए बोले |
ध्रीहरिने कहा--दक्ष | भें तुमसे तत्त्ववी बात बता
रहा हूँ | ठुम मेरी बात ध्यान देकर झुनो | मेरा यह वचन
तुम्हारे लिये सर्वधा द्ितकर तथा महामन्च्रके समान सखदायक
होगा । दक्ष ! तुम्हं तत्यका ज्ञान नहीं हे । इसलिये तमने
सबके अधिपति परमात्मा शंकरी अबदेलना की है| ईध्वर-
की अवदेलनासे सारा काय सबंधा निप्पल हा जाता है |
केबल इतना ही नहीं; पम-प्गपर विपत्ति भी आती है ।
जहाँ अपूज्य पुरुषोकी पूजा होती दे आर पृजनीय पुरुपक्री
पूज्ञा नहीं की जाती, यहाँ दरिद्रता; मृस्यु तथा भय
4. के गे हु हा % + २
तान सके अवच्य प्राम हगठ | इसडिय सम्यत प्रयत्न
तुम्दें भगवान् शषभ्वजका सम्मान इरना चादिय | मोददरदा
कप का दी हज दि विन्का, रे
अपमान फरनसे हो तग्टाग ठापर सहासन भय उपरिपित हुझआा।
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वचन सुमकर दक्ष चिन्तामें ड्रब गये | उनके चेहरेंका रंग
उड़ गया ओर वे चुपचाप प्रृथ्यीपर खड़े रह गये | इसी समय
भगवान् रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र अपनी सेनाके
साथ यश्स्थल्में जा पहुँचे | वे सब-के-सब बड़े शूरत्रीर: निर्भेय
तथा रुद्रके समान ही पराक्रमी थे । भगवान् शंकरकी आश्ञसे
आये हुए उन गणोंकी गणना असम्भव थी।वे वीर-
शिरोमणि रुद्रसनिक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे | उनके
उस महानादसे तीनों छोक गूँज उठे | आकाश धूलसे ढक
गया ओर दिशाएँ. अन्धकारसे आचृत हो गयीं । सातों दीपसि
युक्त पृथ्वी अत्यन्त भक्से व्याकुल हो पर्चत, चन ओर
काननोंसहित कॉपने लगी तथा सम्पूण समुद्रोमें ज्वार आ
गया । इस प्रकार समस्त लोकोंका विनाश करनेमें समर्थ उस
विशाल सेनाकी देखकर समस्त देवता आदि चकित हो गये |
सेनाके उद्योगकी देख दक्षके मुहसे खून निकल आया । वे
अपनी छ्लीकों साथ ले भगवान् विण्णुके चरणोंमें दण्डकी
भाँति गिर पड़े और इस प्रकार बोले |
दछ्ष्ने कह(--विष्णो | मह्मप्रमो | आपके बलसे ही
मेंने इस महान् यज्ञका आरम्म किया है | सत्कर्मकी सिद्धिके
लिये आप ही प्रमाण माने गये हैं। विष्णो | आप कमंकि
साक्षी तथा यज्ोंके प्रतिपालक हैं| महाप्रमो ! आप वेदोक्त
धर्म तथा ब्रह्माजीके रक्षक हैं | अतः प्रभो | आपको मेरे इस
यशकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि आप सबके प्रभु हैं ।
त्रह्माजी कहते हँ--दक्षकी अत्यन्त दीनतापूर्ण बात
- सुनकर भगवान विष्णु उस समय शिवतत्त्वसे विमुख हुए
दक्षको समझानेके लिये इस प्रकार बोले |
श्रीविष्णुने कह[--दक्ष ! इसमें संदेह नहीं कि मुझे
तुम्हारे यश्की रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि धम-परिपालनविषयक
जो मेरी सत्य प्रतिशा है, वह सर्वत्र विख्यात है | परंतु दक्ष !
में जो कुछ कहता हूँ, उसे तुम सुनो | इस समय अपनी
क्रूरतापूण चुद्धिको त्याग दो | देवताओंके क्षेत्र नेमिषारण्पमें
४: नमो सद्राय शान्ताय. ब्रह्मण परमात्मन 5:
॥ संक्षिप्त-शिवपुराणा३
वओ-+-
४,छ८४४७४७४७७४४७४४४४४४४7 रा ७४#४#श्र् मामा था ८८ पथ पालक लडकी
जो अद्भुत घटना ब्रदित हुई थी; उसका तुम्हें सर मं
हो रह्म है । क्या तुम अपनी कुय्ुद्धिके कारण उसे भूल गे !
यहाँ कोन भगवान रुद्रके कोपसे तुम्हारी रक्षा करनेमें सम
है | दक्ष ! तम्हारी रक्षा क्रिमकों अभिमत नहीं है? पर बे
7म्दारी रक्षा करनेको उद्यत-डोता दे। वह अपनी दुर्ब॑द्धित
ही परिचय देता है | दुर्मते ! क्या कर्म है ओर क्या अका
इसे तुम नहीं समझ पा रहे हो | केबछ कमे ही कमी बुद्
करनेमें समर्थ नहीं हो सक्रता । जिसके सहयोगसे कम :
करनेकी सामथ्य आती है; उसीको तुम स्वकर्म समझने
भगवान् शिवके बिना दूसरा कोई कर्में कल्याण करे
शक्ति देनेवाला नहीं है| जो झ्ान्त हो ईश्वरमं मन ला
उनकी भक्तियूवंक कार्य करता है; उसीकों मगवान।
तत्काल उस कर्मका फल देते हैं। जो मनुप्य केवल शा
सहारा ले अनीश्वस्बादी हो जाते या ईश्वरकों नहीं माः
हैं; वे शतकोयि कल्पोंतक नरकमे ही पड़े रहते हैं [|
वे कर्मपाशमें बंधे हुए जीव प्रत्येक जन्ममें नरकंकी या
भोगते हैं; क्योंकि वे केबछ सकाम कर्मके ही स्वरूपका था!
लेनेवाले होते हैँ |
ये शतन्रुमर्दन वीरभद्र, जो यज्ञशालाके आँगनमें आ 7
हैं, भगवान् रुद्रकी क्रोधाग्रिसे प्रकट हुए हैं | इस हा
समस्त रुद्रगणोंके नायक ये ही हैं । ये हमलोगेंके विन?
लिये आये हैं, इसमें संशय नहीं है। कोई मी कार्य की
हो; वस्तुतः इनके लिये कुछ भी अशक्य है हो नहीं।
महान् सामथ्यश्ाली वीरभद्र सब देवताओंको अवश्य जल!
शान्त होंगे--इसमें संशय नहीं जान पड़ता | में मर
महादेवजीकी शपथका उल्लड्डन करके जो यहाँ ठहग
उसके कारण तुम्हारे साथ मुझे भी इस कष्टका सामना *ं
ही पड़ेगा |
भगवान् विष्णु इस प्रकार कह ही रहे थे कि वीर:
साथ शिवगणोंकी सेनाका समुद्र . उमड़ आया | समस्त कैट
आदिने उसे देखा | ( अथाव २
-++-+-(>5७६.4.0.::7-39---..
# केवल शानपाश्ित्य
हनन 533०३++5त+ल >> रन नननननन-+मन«- «मं ंनन- नमन» नमन +««न- कप +न++ «न +-+> जन 9>+++«++-++०+ ८-६६... पतन
निरीश्वरपरा नरा: । निस््ये ते च गच्छन्ति कल्पकोटिशतानि च ॥
>
( शि० पु० रु० सं० स० खं० र१! ११
सदसंहिता ] # देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका रुद्वदेवकी अजेयता बताना $£ २७८५
“न नन्नीनीन नमन व न ननननननीनन कमर नमननननध्खभननख श् चर श चि खखिचश्चचखिखखा खा खा खचखचच ि ि व िाू़ाआश्खचय्य्य्य््य्यय्चिच्िथियिय्थ्थ्थिथ्िथय्यय्थ्यथ्च्थ्स्म्म्स्लफम
समरमगहनीी+न कान काया
देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका रुद्रदेवकी अजेयता बताना, बीरभद्रका
देवताओंको यद्धके लिये ललकारना, श्रीविण्णु ओर वीरभद्रक्की बातचीत तथा विष्णु
आदिका अपने लोक जाना एवं दक्ष आर यज्ञका विनाश करके
वीरभद्रका केलासकों लोटना
त्रह्माजी कहते हँ--नारद ! उस समय देवताओंके
साथ दिवगर्णोका घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें सारे देवता
पराजित हुए ओर भागने लगे) वे एक दूसरेका साथ छोड़कर
स्वंगंलोकर्म चल गये | उस समय केवल महात्रली इन्द्र आदि
लोकपाल ही उस दारुण संग्राममं धैर्य घारण करके उत्सुकता-
पृथक खड़े रहे | तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता मिलकर
उस समयक्षणम बृहरपतिजीको विनीतभावसे नमस्कार करके
पूछने लगे |
छोकपांलछ बोछे--गरुदेव बहस्पते ! तात ! महाप्राश !
दयानिभे | शीप्र बताइये, हम जानना चाद्दते हैँ कि हमारी
विज्ञम फसे होगी !
उनकी यह बात सुनकर बृहस्पतिने प्रयल्पूवक्त भगवान्
धग्भुका स्मरण किया ओर ज्ञानदुर्बल महेन्द्रसे कहा |
नृएस्पति बोले--इन्द्र ! भगवान् विप्णुने पहले जो
पृष्ठ यहा था। बह सब इस समय घटित हो गया । में उसीको
'प९ सर रहा हूँ | सावधान होकर सुनो | समल क्मोका
£ पनवाढा जी मोई ईश्वर हैं; वह कताका ही आश्रय लेता
४“ >यर्ट परनेबलिकों ही उस कर्मझा फल देता है | जो कर्म
कगातयोी नहीं: उसको फल देनेम वह भी समर्थ नहीं है ( अतः
ण३०स्वी जानवर उसवा आशय खेर सलग करता है; उसीको
॥ मककी पे मिलगा ४. इखरट्रोहीयों नहीं )। । न सनम ने
कधयो; ने समस्त आभिचारिक कम मे लोकिकझ पुरयः ने
न घ४ मे पथ ओर उत्तर मीमांस तथा न नाना चेदासे
पूछ जन्यान्य शास्द हे रैखायों जाननेगे सम थे रे ऐ--ऐसा
/धज्यम ! । अनन्यशरण भक्तागी छोड़वर
जग 0/: मद आते नारे और कदाशाय वेरण
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हितके लिये उसे ध्यान देकर सुनो | इन्द्र | ठुम लोकपालेकि
साथ आज नादान बनकर दल्ष-्यज्ञम॑ आ गये | बताओ ते;
यहाँ क्या पराक्रम करोगे ? भगवान् झुद्र जिनके सहायक हैं,
ऐसे ये परम क्रोधी रुद्रगण इस यज्ञम विन्न डालनेके लिये आये
हैं और अपना काम पूरा करेंगे--इसमें संशय नहीं है। मैं
सत्य-सत्य कहता हूँ कि इस यज्ञक्रे विप्चका निवारण करनेक्रे
लिये वस्तुतः तुममेंसे क्रिसीके पास भी सर्चधा कोई उपाय
नहीं है |
वृहस्पतिकी यह बात सुनकर वे इन्द्रसट्तित समस्त लोकपाल
बड़ी चिन्तामं पड़ गये | तब महावीर रुद्रगणोेसे घिरे हुए
वीरमदने मन-ही-मन भगवान् झांकरका स्मरण करके इन्द्र
आदि लोकपार्लकी डॉट ओर इसके पश्चत॒ रुद्रगणोंके नायक
वीरभद्ने रोपसे भरकर तुरंत ही सम्यूर्ण देवताओंकी तीखे
बा्णेसे घायल कर दिया | उन बाणोक्री चोट खाकर इन्द्र
आदि समस्त सुरेखवर भागते हुए दसों दिद्याओम चले गये ।
जब्र लोकपाल चले गये ओर देवता भाग खड़े हुए, तब बीर
भद्र अपने गणकि साथ यज्षदशालाके समीप गये | उस समय
बहा विद्यमान समस्त मद अत्यन्त भायभीन ही परमेश्चर
श्रीटरिसे रक्षाकी ग्राथना करनेके लिये सहसा ननमस्नक हो
शीप्र बोलि--देवदेव ! रमानाथ | स्दवेश्वर ' महाप्रगों ! आप
दक्षफे बशकी रक्षा बोजिय। आप ही गड £. इसमे संघय
नहों है । वक्ष आपका हम: नकप और आग है। आर यश
रक्षक है। अतः दन्षयगर्ीी सता कीडिये। आपके खिा दरार
योर इसका नहीं ए |
आफ्ाजा कहते पे-मारण ! शापिशया मंह् बयय
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जो कुछ कहता हैँ; उसे सुनो--में भगवान शंकरका सेवक हूँ।
तुम मुझे रुद्रदेबसे ब्िमुख न कहो | दक्ष अज्ञानी हे | कर्म-
काण्डमें ही इसकी निष्ठा है| इसने मृदताबश पहले मुझसे
बारंबार अपने यज्ञमें चलनेके लिये प्राथंना की थी। म॑ भक्तके
अधीन ठहर इसलिये चला आया | भगवान् मद्देश्वर भी
भक्तके अधीन रहते हैँ | तात | दक्ष मेरा भक्त है | इसीलिये
मुझे यहाँ आना पड़ा है। रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हुए बीर !
तुम रुद्र-तेजःस्वरूप हो; उत्तम प्रतापके आश्रय हो) मेरी
प्रतिशा सुनो । में तुम्हें आगे बढ़नेसे रोकता हूँ ओर तुम मुझे
रोकी | परिणाम वही होगा; जो होनेवाल्य होगा । में पराक्रम
करूँगा ।
पह्माजी कहते हँ--नारद ! भगवान् विष्णुके ऐसा
कहनेपर महावाहु वीरभद्र हँसकर बोल्य--५आप मेरे प्रभुके
प्रिय भक्त हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है |? इतना
कहकर राणनायक वीरमद्र हँस पड़ा और बिनयसे नतमस्तक
हो बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीविप्णुदेवसे कहने लगा ।
वीरभद्रने कहा--महाप्रमो ! मैंने आपके भावकी
परीक्षाके लिये कड़ी बातें कही थीं | इस समय यथाथे बात
कहता हूँ, सावधान होकर सुनो | हरे ! जेसे शिव हैं, वैसे
आप हैं । जैसे आप हैं, वेसे शिव हैं। ऐसा वेद कहते हैं ओर
वेदोंका यह कथन शिवकी आजशाके अनुसार ही है | # रमा-
नाथ ! भगवान शिवकी आज्ञासे हम सब लोग उनके सेवक ही
हैं; तथापि मेंने जो बात कही है, वह इस वादविवादके
अवसरके अनुरूप ही है। आप मेरी हर बातकी आपके प्रति
आदरके भावसे ही कही गयी समझिये ।
. ब्ह्माजी कहते हे--बीरभद्रका यह वचन सुनकर
भगवान् श्रीहरि हँस पढ़े ओर उसके लिये हितकर वचन बोले |
श्रीविष्णुने कहा--महावीर ! तुम मेरे साथ निःश्डः
होकर युद्ध करो | तुम्हारे अखस्नोंसे शरीरके भर जानेपर ही में
अपने आश्रमकी जाऊंगा | कर
बह्माजी कहते हैं--ऐसा कहकर मगवान् विष्णु चुप
हो गये ओर युद्धके लिये कमर कसकर डट गये | महाबली
वीरभद्र भी अपने गर्णोके साथ युद्धके लिये तेयार हो गये |
& यर्थां शिवस्तथा लव द्वि यथा त्व॑ं च तथा शिव: |
एति- वेद वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे ॥
( जिं० पु० ४० स॑6 सु 6 ३६ । दह )
४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ::
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
8 परमयारा कम पा-0८ रा नासा:
२०4... 42०० + खा०-सथा. अइ-+ अपीलनी- अमन ऋा3 अमान >न् जी सक. सा- सती वन. 2--+ रा अकत-ंनयाता मरी सडन- न पर रामाान+- आन >ाकर खनन ४४ै++७++/४“/+-++ न ७-+क७७०७७७००७००५७+क ०० कण७०-तहे(े|
नारद ! तदनन्तर भगवान व्रिष्णु ओर वीरभद्र शेर
युद्ध हुआ । अस्त बीरभद्रते भगवान विष्णुके ऋत्ने
सम्मित कर दिया तथा दाइ्नबनुपक्के तीन टुके ऋ
डाले | तब मेरे द्वारा एवं सरत्वतीद्वारा बोवित हुए श्रीविणु
ने उस महान गणनायक्र बीरभद्रको असह्य तेजसे सम
जानकर वहेंसि अन्तर्थान होनेका व्रिचार किया। दूं
देवता भी यह जान गये कि सतीक्रे प्रति जो अन्याव हुआ
है। उसीका यह सब भावी परिणाम है | दृसरंक्रि श्ति
इस संक्टका सामना करना अत्यन्त कठिन है। के
जानकर वे सब देवता अपने सेवर्कक्रि साथ खत
सर्वेश्षर शिवका स्मरण करके अपने-अपने लोककों कहे
गये । में भी पुत्रके हुःखसे पीड़ित हो सत्यत्येकम चल आग
और अत्यन्त दुःखसे आवर हो सोचने लगा कि अब पर
क्या करना चाहिये। मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जग
मुनिर्योसहित समस्त यज्ञके आधार रहनेवाले देवता शिवगरगोद्मा
पराजित हो भाग गये । उस उपद्रवक्रों देखकर ओर
उस महासखका विध्यंस निकट जानकर वह वद्न मे
अत्यन्त मयभीत हो मृगका रूप घारण करके वहोँते भाग।
मगके रूपर्म आकाशकी ओर भागते देख वीर
उसे पक्रढ़ लिया ओर उसका मस्तक काट डाला ।४ि
उन्होंने मुनियों तथा देवताभके अज्ग भ्ठ कर दिये ओ
बहुतोंकी मार डाला | प्रताषी मणिभद्रने भ्गुक्तो उठाई
पटक दिया ओर उनकी छातीको पैरसे दबाकर वत्ाः
उनकी दाद़ी-मूँछ नोच ली। चण्डने बढ़े वेगसे पृ
दाँत उखाड़ लिये; क्योंकि पूवकालमें जिस समय महादिवर
को दक्षके द्वारा गालियाँ दी जा रही थीं। उस समय
दाँत दिखा-दिखाकर हँसे थे । नन्दीने भगकों रोपू्त
पृथ्वीपर दे मारा और उनकी दोनों आँखें निकाल ही
क्योंकि जब दक्ष शिवजीको शाप दे रहे थे; उस समबवे
आँखोंके संकेतते अपना अनुमोदन सूचित कर रहें *|
वहाँ रुद्र-गणनायकॉने सघ।, खाह। ओर दक्षिगा देवियों
बढ़ी विडम्बना (दुर्दशा ) की । वहाँ जो मस्व-तत्त्र ते
दूसरे छोग थे; उनका भी बहुत तिरस्कार किया | बहईः
दक्ष भपके मारे अन्तवेदीके भीतर छिप गये ये | वी
उनका पता लगाकर उन्हें बल्पूर्वक पकढ़ लोबे।*ि
उनके दोनों गाछ प क़ड़कर उन्होंने उनके सस्तकपर तलवार
से आघात किया.। परंतु योगके प्रभावते दक्षकरी त्ि
अमेश्य हो गया था। इसलिये कट महीं सका । जप परी
|
० शी कि कट सन र्य मैच 7य प्लुयके कथन हर हर
| मद्वसंदिता |: श्रीविष्णुकी हारम दर्बीचके शापको हेतु चताते हुए दथीच ओर श्षुत् इतिहासका कथन 55 १०७
व ५..०......>>०+ मनन ननन-ननननझ- नमन न नील दधननननननन न न्न् >ल्६;्््ं ि््ि्््ख्ः्ु ्ख्े़िय्स्य़खँूख््ंाख्ख्ख्च्थ्िथ्य्थ्िय्च्िच्थ्थिथिथिथ्भ्ग्य्प्प्प्म्स्ल्लल्््ज्
मार नि ०५
फरन- नानी गरमीमा3 मनी,
बज +० के 2 3 ह अत का हीयीगी जन फम्भीनमटीय-जन, अम-शिममा
द्वी जात हुआ कि सखू्ण अन्नद्यत्नेसि इनके मन्तकका
दिन नहीं हों सकता; तब उन्दंनि दे की छातीयर पर
हर दबाया ओर दोनों दाथासे गठन मसराइकर तोड़
ऐडारी | किए शझिवद्रोद्दी दुष्ट दक्ष उस सिरकी गणनायक
वश मटठने अग्निकृण्डम डाल दिया | तदनन्तर जैसे सूर्य
4
ड्िंष भन््यकार-रशशिक्रा नाश करके उदयवाचलपर आरूद
होते हें; उसी प्रकार बीर वीरभद्र दक्ष ओर उनके बन्का
विध्यंस करके कृतकाय हो तरत ही वहसि उत्तम केलास
परब॑तक्को चले गये। बीरमद्रकों काम पूरा करके आया देख
परमेश्वर शिव मन-ही-सन बहुत संतुष्ट हुए ओर उन्होंने
उन्हें बीर प्रमथगणोंका अध्यक्ष बना दिया |
( अच्याय ३६-३७ )
रन बे ०ा ०००. न-नम
श्रीशिग्णकी पराजयर्म दीच मनिके शापको कारण बताते हुए द्धीच आर क्षवक विवादका
इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुठानसे द्धीचकी अग्रध्यता तथा श्रीहरिका शक्षुवकों
दधीचकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन
सूतजी फहते हँ--महू्पियो ! अमितबुद्धिमान ब्रह्माजी-
। कही हैई बह कथा सुनकर द्विजक्षेण्ट मारद विस्मयम
? गा4। उन्हंनि प्रमब्रतायबंक प्रश्न किया ।
. नारदजीने पृछा--पिताजी | भगवान् विष्णु शिवजीको
'दिकर अन्य देवताओंके साथ दक्षके यश्में क्यों चठे
॥ जिसके कारण वहाँ उनका तिरस्कार हुआ? क्या
प्रस्ययारी पराक्रमबाले भगवान शंकरको नहीं जानते
पिर उस्ीने अशानी पुरुपषफी भाँति रुद्रगर्णोके साथ
गया किया ? साझणानेधे ! मेरे सनमभे यह बहुत बड़ा
7 है । भाव कृपा करने मेरे इस संशयकों नष्ट कर
आए पशों । दंगय उत्पीह पढ़ी बरनेवाओ टिवेः
उद) फकाष्रिये ।
33.
| 4
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हा -अनुंल््गक के क काभका---० माफ है | हक ६ ०
ऊतवले।न पा+--भारद ! प्र4पालम
हट +व> के + ब्यक के *
रा 4५5. ०११ 4६
राजा छुवका
» छीहरिकों दपीब मुनिने छाव दे दिया
३: हल रसय थे इस मानो रूट बेटों ओर दे
९ ज्यादा सब ले दक्षओे यहमें से गये। दर्ध
/ हार हटा पट सुनों। प्राद्दीन माटमे छुद नामस
कक ॥ कक ही भ्प पं + का रा पा, क>्क जद ्ट
7४ एय शहादत 5) 6558 |! गये हर | थे मसह[प्रभावशाल
कह हट कक
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छ कह | ४ ५ कर आम
। ४० है हा सा क ध् +
कि ही हक) कै
ट का >++>०> ७ ३ *+श
् धर .
श्षुव वोले-णजा इन्द्र आदि आठ लेकपालके खलूपको
धारण करता है | वह समस्त बर्णों ओर आश्रमोंका पालक
एवं प्रथु है। इसलिये राजा ही सबसे श्रेष्ठ है। राजाकी
श्रेठताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी कद्दती है कि राजा
सर्वदेवमय है । मुने | इस श्रुतिके कथनानुसार जो सबसे बड़ा
देवता है) वह मैं ही हूँ | इस विवेचनसे ब्राह्मणकी अपेक्षा
राजा ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है| च्यवननन्दन ! आब इस
विययमे विचार करें ओर मेरा अनादर न करें; क्येंकि
में सवंधा आपके लिये पृजनीय हैँ
राजा छुबका यह मत श्तियों ओर समृतियोक्े विरुद्ध
था | हसे सुनकर शगुकूलभूवण मुनिर्भठ द्धीचका बड़ा
बोध हुआ। मुने ! अपने गोरका विचार करके कछृपित
है पं 220. मई व्यय 203 सदाउर ब्मामयुल अ्कत- बह के दडाम
टुत महातेजतली दधीचने धर; सस्कारर दकाय सुक्काः
प्रहार किया। उनके मककेकी मार स्थाफर अद्माश्टके
अधियति कृच्तित डुद्धियाड़े छुब व् अच्नन्य झोपित ॥) गरज
आहत हा नयुत्दणा !
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घमख््र्ब्र्फ़ एजाहशएओ ४5मई अआशूडज दि जाट * 27:
१०८ ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुरंण|
( आराधन ) करते हैं। ब्यम्बकका अर्थ दे--तीनों छोकोंके
पिता प्रभावशाली शिव । वे भगवान् सूर्य, सोम ओर
अग्रि--तीनों मण्डलोंके पिता हैं | सत््वः रज ओर
तम--तीनों गुणोंके महेश्वर हैं । आत्मतत््व, विद्यातत्त
ओर शिवतत्त्व--इन तीन तत्वोंके। आहवनीयः गाहंपत्य
ओर दक्षिणाम्रि--इन तीनों अग्नियोंके; सर्वत्र उपलब्ध होनेवालि
पृथ्वी, जल एवं तेज--इन तीन मूत॑ भूतोंके ( अथवा
सात््विक आदि भेदसे त्रिविध भूतोंके ), त्रिदिव ( खग्गे ) के
त्रिभुजके, त्रिधाभूत सबके तथा ब्रह्मा) विष्णु ओर शिव--तीनों
देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी ही हैं। ( यहाँतक मन्त्रक्रे प्रथम
चरणकी व्याख्या हुई | ) मन््त्रका द्वितीय चरण है---“खुगन्धि
पुश्चिर्धनम--जैसे फूछोंमें उत्तम गन्ध होती है। उसी प्रकार
वे भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त ऋत्यॉमे;
इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देबोंमें ओर गणोंमें उनके प्रकाशक सारभूत
आत्माके रूपमें व्याप्त हैं; अतएवं सुगन्धयुक्त एवं सम्यृर्
देवताओंके ईश्वर हैं | ( यहातक ५सुगन्धिम्! पदकी व्याख्या
हुईं । अब “पुश्विर्धनम? की व्याख्या करते हैं--) उत्तम
ब्रतका पालन करनेवाले द्विजश्रेष्ठ ! महामुने नारद ! उन
अन्तर्यामी पुरुष शिवसे प्रकृतिका पोषण होता है--महत्तत्त्वसे
लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण विकल्पोंकी पुष्टि होती है तथा मुझ
ब्रह्माका) विष्णुका। मुनियोक्रा ओर इन्द्रियोंसहित. देवताओंका
भी पोषण होता है; इसलिये वे ही “पुश्विधन! हैं | ( अब
मन्त्रके तीसरे ओर चोथे चरणकी व्याख्या करते हैं। ) उन दोनों
चरणोंका खरूप यों है--उवीरुकमिव बन्धनान्मृत्योमुश्षीय
माम्रतात--अर्थात् धप्रमो | जेसे खरबूजा पक जानेपर
छताबन्धनसे छूट जाता है उसी तरह मैं म्ृत्युरूप बन्धनसे मुक्त हो
जाऊँ; अम्ृतपद (मोक्ष ) से पृथक न होऊ |? वे रुद्रदेव अम्ृत-
स्वरूप हैं; जो पुण्यकर्मसें; तपस्यासे, खाध्यायसे, योगसे अथवा
ध्यानसे उनकी आराधना करता है; उसे नूतन जीवन प्राप्त
होता है | इस सत्यके प्रभावसे भगवान् शिव खय॑ ही अपमे
भक्तको मृत्युके सूक्ष्म बन्धनसे मुक्त कर देते हैं; क्योंकि वे
भगवान, ही बन्चन और मोक्ष देनेवाले हैं---ठीक उसी तरह;
जैसे उर्वार्क अथोत् ककड़ीका पोधा अपने फलको खये ही
लताके बन्धनमें बॉधे रखता है ओर पक जानेपर खय॑ ही उसे
बंन्धनसें मुक्त कर देताहै [| ्रथ<&्
- यह मतसंजीवनी मन्त्र है; जो मेरे मतसे सर्वोत्तम है।
तुम प्रेमपू्वंक नियमसे भगवान् शिवका स्मरण करते हुए इस
मच्चका - जप: करो | जप: ओर दर हवनके पश्चात्. इसीसे
शनइसइफपलालरतकास उप नल एप श्र पकप सतना एच 2२ दाहामादाणात्रदाकपाइमाउ परत < कप नम
जीन नमी जनीनननननननननन नमन न नमन +न रन जननी ५ नमन तन नननिननननननझमनननी न मनन लननन-न 4 ५3क्4+443 “नली नमी नमन न मीन बन नमी न नी न नन न जीन नमी नी नी नी नई +क्घक्+४++६+/६४/४/६ईघघ८६६४६ ६६६६६ ४४६/४//७६-++//++-::555 उऩ्न्न्..-++-+
अभिमन्त्रित किये हुए जलको दिन ओर रातमें पीओेद
शिवविग्रद्के समीप बेठकर उन्हींका ध्यान करते खो। हे
कहीं भी मृत्युकां भय नहीं रहता। न्यास आदि खड़।
करके विधिवत् भगवान् शिवकी पूजा करो | यह खझोे
द्ञान्तभावसे ब्रेंठकर भक्तवत्सल शंकरका ध्यान कला गहि “
में भगवान शित्रका ध्यान बता रहा हूँ, जिसके अनुमाक्त :
चिन्तन करके मन्त्र-जप करना चाहिये । इस तझ हिह
जप करनेसे बुद्धिमान पुरुष भगवान शिवतके प्रमाग्रे
मन्त्रको सिद्ध कर लेता है |
सत्युजयका ध्यान
हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुदछ्त्य तोय शिरः
सिद्चन्तं करयोयुगेन दधतं स्वाह्े सकुम्भो झो।
अक्षत्रउम॒गहस्तमम्वुजगत मूर्धस्थचन्द्रसव-
प्पीयूपाद्॑तनुं भजे सगिरिज व्यक्ष॑ थरूत्युतयर।
जो अपने दो करकमलछोंम रकक््खे हुए दो कह
जल निकालकर उनसे ऊपरवाले दो हाथोंद्ात हैं.
मस्तकको सींचते हैं। अन्य दो द्वाथोंमें दो छो
उन्हें अपनी गोदमें रखे हुए हैं तथा शेष दे ७ '
र्द्राक्ष एवं मगमुद्रा धारण करते हैं, कमलके भर्क -
बैठे हैं, सिरपर स्थित चन्द्रमासे निर्तर झरते हुए की
जिनका सारा शरीर भोंगा हुआ है तथा जो तीन ने '
करनेवाले हैं; उन भगवान् मृत्युंजयका) जिकेा .
गिरिराजनन्दिनी उमा भी विराजमान हैं, मैं मजन (हि
करता हूँ ।
ब्रह्मजी कहते हँ---तात | मुनिश्रेष्ठ द्धीवग
प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान् शंकरका लए
हुए अपने स्थानको लोट गये | उनकी वह वह .
महामुनि दधीच बड़े प्रेमसे शिवजीका सारण को
तपस्पाके लिये वनमें गये | वहाँ जाकर उन्होंने ॥
महामृत्युंजय मन्त्रका जप ओर प्रेमपूर्वक भगवा *
चिन्तन करते हुए तपस्या प्रारम्भ की। दीपकार्दक'
मन्त्रका जप और तंपस्योद्वारा भंगवान् शैंकरती मे
करके दंधीचने महामृत्युंजय शिवको संतुष्ट कियां। मर
उस जपंसे प्रसन्नचित्त हुए. मक्तवत्सल भगवान् शत '
प्रेमवश उनके सांमने प्रकट हो गये । आपने प्र
सक्षात् दर्शन करके मुनीश्चर दघीचक्ों बड़ी प्व्ा।
उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ शो मद
कि सद्रलंदिता | ४ सखुत्युजयमन्त्रके अनुणानसे दर्घीचकी अन्ध्यता ३: ; ७७०,
(एंटंकरका स्ववन किया | तात ! मुने ! तदनन्तर मुनिर्के प्रमस
हप्रतन्न हुए शित्ने अ्यवनकुमार दधीचसे कह्ा--तुम वर
दु्गी ।! मात्रान शिव्रा यह बचने सुनकर भक्तशिरोमणि
गह्ीच दोनों हाथ जोड़ नतमस्तक हो मक्तवत्नल शंकरसे
हक दय र शक लि
ण ध्थ के हे बार 2
हक २३ ७ कक के 25
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एर्ीयने पाहा--देवदेव महादेव | मृश्त तीन वर
3) मरी हट्टी बच्च हो जाय | कोई नी मेरा वध न कर
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हस्त सवप्त अद्ेन रे--कभी सुसमें दौनता ने आये।
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मुनीख्चर दवीयकी अवच्यता: अदीनता तथा बन्नसे भी बढ-चढ़-
कर प्रमाव देखकर ब्रह्मकुमार क्षुबक्के मनमें बड़ा आश्रय
हुआ | उन्होंने शीम दही वनमे जाकर इन्द्रके छोटे भाई
मुकुन्दकी आराधना आरम्म वी । वे शरणागतपालक नरेद्य
मृत्यु अयसेबक्र दर्धीचसे पराजित हो गये थे। क्षुबकी पृजासे
गरुडध्वज भगवान् मथुसूदन बहुत संतुष्ट हुए । उन्हंनि
राजाको द्व्यदृष्टि प्रदान की । उस दिव्यहश्सि ही जनादन
देवका दर्शन करके उन गरुडध्यजको छषुबने प्रणाम किया ओर
प्रिय बचनोंद्वारा उनकी स्तुति की | इस प्रकार देवेश्वर आदिसे
प्रयंसित उन अजेय ईश्वर श्रीनारायणदेवका पूजन ओर स्तवन
करके राजाने भक्तिमावसे उनक्की ओर देखा तथा उन जनाद॑नके
चरणोंम मस्तक रखकर प्रणाम करनेके पश्चात् उन्हें अपना
अभिप्राय सुचित किया |
राजा बोले--मगवन् ! दधीच नामसे प्रसिद्ध एक
ब्राह्मण हैँ; जो धमक्रे ज्ञाता हैं । उनके हृद्यमें विनयका भाव
है। वे पहले मेरे मित्र बे। इन दिनो रोग-शोकसे रहित
मृत्युञय महादेवजीकी आराधना करके वे उन्हीं कल्याणकारी
शिवके प्रभावसे समस्त अख-शर्त्नद्वारा सदाके लिये आअवध्य
हो गये हैं | एक दिन उन महातपस्नी दधीचने भरी समभार्म
आकर अपने बाये पेरसे मेरे मस्तकपर बढ़े वेगसे अव्देलनापूर्य क
प्रहार किया ओर बड़े गवसे कहा--५मैं किसीसे नहीं डरता ॥!
हरे ! वे मृत्युंजयसे उत्तम बर पाकर अनुपम गयसे भर गये हूँ ।
प्रच्माजी कहते हँ--नार् ! महात्मा दर्धीचदी
अवधताका समाचार जानकर श्रीट्रिने महादिवर्जीके अतुल्ति
*ँ
प्रभावका स्मरण क्रिया | फिर वे ब्रद्मपृत्र राणा छुवसे बडे
रे 222 >> पर फ् राल बी हा 4 न
'राजन्ट्र | शराद्मगाजा वहाँ साड़ा-सा भा शगय सात $ | इूढत !
2628 परत प्र£ ्न्डू तर न कक न के | 4 सास नया नल जज कक शख्स जे 3.
बावत: रद्र सक्ताद लेख नो साय सासदका का हल #£ ह।
न ; & डी । कोल जी 2 कक कक पक: पक हर द्रा * _
नहीं | याद मे तग्शश भआरस इछ करे मा क्ाट्य दधाचडा
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हि 6 कटा ्टँ “है| नह तर 9. है का लय रह रे कल 5० जल कक है > की ट़रः है| |
ले ऐसा आर पद सुसनहज्ञातस सार डिद अं गाए
श्र हैः
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जच्यानन्री 4 -+-हू 4 रन (प् #ह2॥ | कक हुं « 8 शक व्याजुकंबोर पाए «ही # गा बह कल आय या मी म |
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००] दत आापगा | सर | करिधयड, गागदसत खास सगफ
कक दब > ७ पीली किक नि हे कल 5, के का
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ज्न्प्क रः कक दा शक ज्च्क की >्कश्रानक डा ही ०३ अब कब भय ज फतचसा “कामना २३४६
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गा तह 5४४90 ७2४9७ ल सकल
श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचका उनके लिये शाप ओर श्षुवपर अनुफ्र
व्रह्माजी कहते ह--नारद | भक्तवत्सल भगवान विष्णु
राजा क्षुवक्रा हित-साधन करनेके लिये ब्राह्मणका रूप धारण-
कर दधीचके आश्रमपर गये | वहाँ डन जगदगुरु श्रीदरिने
शिवभक्तशिरोमणि ब्रह्मर्षि दधीचको प्रणम करके क्षुवके
कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हो उनसे यह वात कही ।
श्रीविष्णु चोे---भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर
रहनेवाले अविनाशी ब्रह्मर्षि दधीच | में तुमसे एक वर
माँगता हूँ | उसे तुम मुझे दे दो ।
क्षुकके का्यकी सिद्धि चाहनेवाले देवाधिदेव श्रीहरिके इस
प्रकार याचना करनेपर शेवशिरोमणि दधीचने शीघ्र ही भगवान्
विष्णुसे इस प्रकार कहा ।
दूधीच बोले--ब्रह्मन् ! आप क्या चाहते हैँ) यह मुझे
ज्ञात हो गया। आप क्षुवका काम बनानेके लिये साक्षात्
भगवान श्रीहरि ही ब्राह्मणका रूप घारण करके यहाँ आये हैं |
इसमें संदेह नहीं कि आप पूरे मायावी हैं| किंतु देवेद !
जनारदन |! मुझे भगवान् रुद्रकी कृपासे भूत। भविष्य ओर
वर्तमान-तीनों कार्छोंका ज्ञान सदा ही बना: रहता हैं | सुब्रत !
में आपको जानता हूँ | आप पापहारी श्रीहरि एवं विष्णु हैं ।
यह ब्राह्मणका वेश छोड़िये । दुश्बुद्धिवलि राजा छुवने
आपकी आराधना की है | ( इसीलिये आप पघारे हैं। ) मगवन् !
हरे | आपकी भक्तवत्सलताकों भी में जानता हूँ ।
यह छल छोड़िये । अपने रूपको ग्रहण कीजिये और भगवान
शंकरके स्मरणमें मन लगाइये | में भगवान् शंकरकी आराधनामें
लगा रहता हूँ | ऐसी दशामें भी यदि मुझसे क्रिसीको भय हो
तो आप उसे यत्नपू्वंक सत्यकी शपथक्ेे साथ कहिये | मेरा
मन् शिवके स्मरणमें ही लगा रहता है। में कभी झूठ नहीं
बोलता । इस संसारमें किसी देवता या देत्यसे भी मुझे
भय नहीं होता ।
श,्रीविष्णु बोले--उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले दघीच !
तुम्हारा भय सत्र नष्ट ही है; क्योंकि तुम शिवकी आराधनामें
तत्पर रहते हो | इसीलिये सर्वज्ञ हो | परंतु मेरे कहनेसे तुम
एक वार अपने प्रतिद्वन्द्री राजा छुवसे जाकर कह दो कि
'राजेन्द्र | में तुमसे डरता हूँ |!
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी शैवशिरोमणि
महामुनि दधीच निर्भय ही रहे ओर हँसकर ब्रोले |
दधीचने कहा--में देवाब्रिदेव पिनाकपाणि भा
दाम्भुके प्रसादसे कहाँ; कभी, क्रिसीस ओर किंविमाव४
नहीं डरता--सठा ही निर्भय रहता हैं |
इसपर श्रीहरिने मुनिक्रों दवानेकी चेश की । देवता:
भी उनका राथ दिया। किंठ सबके सभी अन्न कृश्लि[
गये । तदनन्तर भगवान श्रीविष्णुने अगणित गणोंक्ी एश३!
परंतु महर्पषिने उनकी भी भम्म कर दिया। तब माएहे
अपनी अनन्त विष्णुमूर्ति प्रकट की । यह सब देखकर चक
कुमारने वहाँ जगदीश्वर भगवान विप्णुसे कहा |
थीच बाले--महाबाहो ! मायाक्रों त्याग दीज्षि|
विचार करनेसे यह प्रतिभासमात्र प्रतीत होती है। माफ
मने सहरस्ता टुविशेय बल्तुओऑकी जान लिया है| भाप
अपने सहित सम्पूर्ण जगत्की देखिये । निराल्य होक
ब्रह्म एवं रुद्रका भी दर्शन कीजिये। में आप हि
दृष्टि देता हैँ।
ऐसा कहकर मगवान् शिवके तेजसे पूण शर्राखाेघक
कुमार दर्घीच मुनिने अपनी देहमे समस्त ब्रह्माण्ल्य्
कराया | तब भगवान् विष्णुने उनपर पुनः कोप का वह
इतनेमें ही मेरे साथ राजा क्षुव वहाँ आ पहुँचे। मैंने निस्के गे
हुए. भगवान् पद्मनाभको तथा देवताओंको क्रोध करेगे ऐ!
मेरी बात सुनकर इन छोगेंने ब्राह्मण दघीचकों पार
किया | श्रीहरि उनके पास गये और उन्होंने “ पट
किया । तदनन्तर छ्षुव अत्यन्त दीन हो उन मुनीखर सर
निक्रट गये ओर उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना करने ढगे।
क्षुव बोले--मुनिश्रेष्ठ ! शिवभक्तशिरोमणे !
प्रसन्न होइये । परमेश्वर ! आप दुर्जनोंकी दृष्टिते दूर
हैं| मुझपर कृपा कीजिये |
ध्रह्माजी कहते हैँ--नारद ! राजा छ्षुवकी #
सुनकर तपस्याकी निधि ब्राह्मण दघीचने उनपर अवुर हि
तत्पश्चा त् श्रीविष्णु आदिको देखकर वे मुनि क्रोध रा
हो गये ओर मन-ही-मन शिवका स्मरण करके विष
देवताओंको शाप देने लगे ।
दधीच॑ने कह(--देवराज इन्द्रसहित देवताओं *
. मुनीब्वरों ! तुमलोग रुद्रकी क्रोधाग्निसे श्रीविष्णु (4 ०
गगोंसहित पराजित ओर ध्वस्त हो जाओ ।. दे
: देवताओंको इस तरह शाप दे छुबकी ओर
उरसंहिता ]. # देवताओसहित ब्रह्मका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना # १८
3... नमन ननननन की पननननननननननिनानानीन वन ननननननक न कम पक न नमन नी न नमन ल् णननधभ्नखखखखलण ज धखघध धअइिधधणश जाए ाएाा:
यताओं और यत्रा्के पृजनीय द्विजश्रेष्ठ दधीचते कहा--
गहसद्द ! ब्राह्मण दही बी और प्रमावश्ाली होते € | ऐसा
कटकर ब्राह्मण दखीच अपने आश्रमर्में प्रविष्ठ
) गये । फिर दीचको नमस्कार मात्र करके क्षुव अपने घर
5 गये | तथश्राव मगवान, विष्णु देवताओंक्रे साथ जैसे
शव थे। उसी तरह अपने बेकुण्ठटोककी छोट गये । इस
बार बह स्थान खानेस्चर मामक तीथके रूपमे प्रसिद्ध हो
या । खानेध्वसकी यात्रा करके सनुप्य शिवक्ा साथुज्य प्रात
पट्कयमे
# ५2
शीत जदानं नबी. धज.. आम" बिक भारी पखामन+-ाहा' उमा कार आता. रदाताफकामः पक पाता. गली. पाक चरम कीट.. अब की अं पता आस न न न मा आं|ं आर शशि. हि.
कर लेता | तात ! मैंने व॒म्हें संक्षपले छुत्र ओर दीचके
विवादकी कथा सुनावी और भगवान् इझंकरकों छोड़कर
केवल ब्रह्मा ओर विष्णुको ही जो शाप प्राप्त हुआ; उसका भी
वर्णन क्रिया । जो क्षुव ओर दघीचक्ते विवादसम्बन्धी इस
प्रसक़का नित्य पाठ करता है; वह अपमृत्युकी जीतकर
देहत्वागके पश्चात् ब्रह्मलोकर्म जाता है। जो इसका पाठ करके
रणभूमिम॑ प्रवेश करता है। उसे कभी मृत्युक्का भव नहीं दोता
तथा यह निश्चय ही विजयी होता है । ( अध्याय ३९ )
न्+-+-चसिुस्कस++
दवताओंसहित ब्रह्माझा विष्णुलोकर्मे
क्षमा मॉगनेकी अनुमति दे
नारदजीने ऋद्टा--विधातः ! महायप्राज्ष | आप शिव-
व््यूदा। साम्षात्कार करनेवाले हैं । आपने यह बड़ी अद्भुत
वं स्मगीय शिव्रलीला सुमायी है । तात ! बीर वीरभद्र जब
पर गगया विनाश करके कैछास परवेतपर चले गये तब
॥ एशा ? या एर्स बताइये ।
प्रश्माली बोले--माझ ! रुद्वदेवत्ें सेनिकने जिनके
परम पर डिये थे; वे समस्त पराजित देवता और मुनि उस
गय भर लोपम आये । वहीं मुझ खयग्गूकी नमस्कार करके
बने मारबार मेस सस््तथने किया । फिर अपने विशेष वलेदा-
। पृण्ग से सुनाया | उसे मुनकर में पृच्रशोकसे पीड़ित हो
/0 भोग ख्त्यल खग्र हो व्यथिव चित्तसे बड़ी निन्ता
बन 7गा। फिर मैंने मक्तिगावसे भगवान् विष्णुका स्मरण
१। एसने मधे समयोजित शान प्राप्त हुआ । तदनन्तर
भर भमियोऊे साथ में विष्णुल्लोक्में गया और वहाँ
गगू पिषयुरों ममरयार एज नाना प्रकारहे स्तोष॑द्वारा
(शी परके उससे अपना दशम मिवेदन झिया ! मैंने
57 दिस गए भी यश ए्ण हर गरमांन फीरित
हि खाते इेजता तशा मेने सुस्दी हो जायें, बेसा उपाय
तर |
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30. 58 । + 7३५३ आप 8
४५ दापइद ! रमनाथ ! देशणखंदायक दिप्णों ! हम
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उनको साथ ले क्रैंठासपर जाना तथा भगवान शिवसे मिलना
ख निवेदन करना, श्रीनिष्णुका उन्हें शिवसे
अपराध करनेवाले मनुप्यक्ति लिये बह अपराध मड्ठलकारी नहीं
हो सकता । विधातः ! समस्त देवता परमेश्वर शिवक्ते अपराधी
हैं; क्योंकि इन्होंने भगवान् शम्भुकी यज्ञका भाग नहीं दिया ।
अब तुम सब लोग श॒द्ध हृदवसे शीघ ही प्रसन्न ऐोनेवाले उन
भगवान् शिवक्े पेर पकड़कर उन्हें प्रसक्ष करो । उनसे क्षमा
मांगों । जिन भगवानके कृषित होनेपर यहू साथ जगत नष्ट
हो जाता है तथा जिनके शासनसे लोकपार्लेसद्वित यशवका जीवम
शीघ्र दी समाप्त हो जाता ए ने भगवान महादेव इस समय
अपनी प्रायवल्लभा सनीसे विद्ृड् गये # तथा अत्यन्त दरात्या
दक्षने अपने दुबचनरूपी बाणोसे उनके छदमकों पहलेगे ही
घायल कर दिया दे। अतः तुमलोग थीं। ही जाकर उनने आपने
अपराधिके लिये छमा मेंगों | विध ! उर्नों शान स्नेया
फेखल यही सबसे बड़ा उपाय है | में समझता ईें ऐसा करनेगे
भगवान दांवरकी सेतोप होगा | यद मेने सती यान सही # )
ब्रह्मनन ! में नी तुम सब लोगेफि साथ शिवके निदास स्थानपर
दरगा ओर उनसे समा मर्मिंगा ।
देवता आदि सहित मत अलादी एन प्रएार साटेश टेएर
सीएरिने देखगगौटे साथ सेशान परदेतार हामेगा दिचार
दिया । नदनमत्तर देवला- मुनि और प्रशारि शादि स्मिफे
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६७ ५६ नमो रूद्राय शान्ताय तर्मण परमान्मन 5 | संब्लिप्त-शिवपुर॥
0 22:020202:2:2.222220932000.2.2.2-2<555555::::::::::::::5::::::::::::::- अल
श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दर्धीचका उनके लिये शाप ओर क्षुबपर अनुफ्र
चरह्मजी कहते हैं--नार्द | भक्तवत्सल भगवान् विष्णु
राजा क्षुवका हित-साधन करनेके लिये ब्राह्मणका रूप धारण-
कर दधीचके आश्रमपर गये | वहाँ उन जगदगुर श्रीहरिने
शिवभक्तशिरोमणि ब्रह्मणि दधीचकों प्रणाम करके छ्षुवके
कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हो उनसे यह बात कही |
श्रीविष्ण बोछे--भगवान् शिवकी आराधना तत्पर
रहनेवाले अविनाशी ब्रक्मर्षि दघीच ! में तुमसे एक बर
माँगता हूँ । उसे तुम मुझे दे दो ।
क्षुवकके का्यंकी सिद्धि चाहनेवाले देवाधिदेव श्रीहरिके इस
प्रकार याचना करनेपर शेवशिरोमणि दधीचने शीघ्र ही भगवान्
विप्णुसे इस प्रकार कहा |
दूधीच बोले--त्रह्मनन् | आप क्या चाहते हैं, यह मुझे
शांत हो गया। आप क्षुब॒का काम बनानेके लिये साश्षात्
भगवान् भ्रीहरि ही ब्राह्मणका रूप धारण करके यहाँ आये हैं|
इसमें संदेह नहीं कि आप पूरे मायावी हैं। किंठ देवेद्य |
जनार्दन [. मुझे मगवान् रुद्रकी कृपासे भूत, भविष्य और
वर्तमान-तीनों कालोंका शान सदा ही बना रहता है | सुन्नत !
में आपको जानता हूँ । आप पापहारी श्रीहरि एवं विष्णु हैं ।
यह ब्राह्षणका वेश छोड़िये । दुष्बुद्धिवालि राजा क्षुवने
आपकी आराधना की है। ( इसीलिये आप पधारे हैं। ) भगवन् |
हरे ! आपकी भक्तवत्सल्ताको भी में जानता हूँ ।
यह छल छोड़िये । अपने रूपको ग्रहण कीजिये और भगवान
शंकरके स्मरणमें मन लगाइये। में मगवान् शंकरकी आराधनामें
लगा रहता हूँ ) ऐसी दश्ामें भी यदि मुझसे किसीको मय हो
ते आप उसे यत्नपूर्वक सत्यकी शपथके साथ कहिये । मेरा
मन शिवके स्मरणमें ही लगा रहता है। मैं कभी झठ नहीं
बोलता । इस संसारमें किसी देवता या देत्यसे भी मुझे
भय नहीं होता ।
.. श्रीविष्णु बोकछे--उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले दधीच |
तुम्हारा भय सर्वत्र नष्ट ही है; क्योंकि तुम शिवकी आराधनामें
तत्पर रहते हो । इसीलिये सर्वज्ञ हो | परंतु मेरे कहनेसे तुम
एक बार अपने ग्रतिद्वन्दी राजा क्षुससे जाकर कह दो कि
'रजेन्द्र | में तुमसे डरता हूँ |!
भगवान् विष्णुका यह बचन सुनकर भी होवशिरोमणि
मध्य मुनि दधीच निर्भव ही रहे ओर हँसकर बोले |
दर्लीचने कह(--में देवाधिदेव पिनाक्पागि मझ
धम्मुके प्रसादसे कहाँ; कभी, किसीसे ओर किंविमाई
नहीं डरता--नदा ही निर्मय रता हूँ ।
इसपर श्रीदरिने मुनिक्रों दबनेकी चेश की। केश '
भी उनका साथ दिया | किंतु सबके सभी अम्र कृल्लिर ,
गये | तदनन्तर भगवान श्रीत्रिष्णेने अगणित गणकी दे?
परंतु महर्पषिने उनकी भी भस्म कर दिया। तब माह
अपनी अनन्त विष्णुमूर्ति प्रक८ की | यह सब देखकर च
कुमारने वहाँ जगदीब्वर भगवान बिप्णुसे कहा ।
दर्धीच बाले--महावाद्यो ! मायाको बाग बैंः
विचार करनेसे यह प्रतिभासमात्र प्रतीत होती है। मः
मेने सहस्तों दर्विजिय वस्तुओंकी जान दिया है। भाग
अपने सहित सम्यूर्ण जगत्को देखिये | निरालल हक ६
ब्रह्म एवं रुद्रका भी दहन कीजिये। में आन्रे।
दृष्टि देता हूँ ।
ऐसा कहकर भगवान् शिवके तेजसे पूर्ण शरीखादे४
कुमार दधीच मुनिने अपनी देंहम समस्त व्रह्माग्ला:
कराया । तव भगवान् विप्णुने उनपर पुनः कोप का 5
इतनेमें दी मेरे साथ राजा क्षुव वहाँ आ पहुँचे। मेंने तिसे!
हुए भगवान् पद्मननामकों तथा देवताओंको क्रोध करते:
मेरी बात सुनकर इन लोगोंने ब्राह्मण दधीचको पा
किया । श्रीहरि, उनके पास गये ओर उन्होंने मुत्ति॥
किया । तदनन्तर क्षुव अत्यन्त दीन हो उन मुनीखर दे
निक्रट गये ओर उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना करने ठग
“280 बोले--मुनिश्रेष्ठ | शिवमक्तशिरोमणे | #
प्रसन्न होइये | परमेश्वर | आप दर्जनोंकी दृश्सि दूर ही
हैं | मुझपर कृपा कीजिये ।
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद ! राजा छुक्की #'
सुनकर तपत्याकी निधि ब्राह्मण दधीचने उनपर अनुगं डः
तत्पश्रा त् श्रीविष्णु आदिको देखकर वे मुनि क्रोपते *
हो गये ओर मन-ही-मन शिवका स्मरण करके वि:
देवताओंको जाप देने लगे ।
दधीचंने कह(--देवराज इन्द्रसहित देवताओं *
मुनीझ्चरों | तुमलोग रुद्रकी क्रोधाम्निसे श्रीविष्णु तव *
गर्गोंसहित पराजित ओर ध्वस्त हो जाओ |
- देवताओंको इस तरह शाप दे क्षुवकी आः दे
मन मसल सन यकीन नी नी जी जी फनी नी री सी नी सीन न न आनन्रॉु््न्+++४"/++5+*४/+/४/““*“* “5४5”
देवताओं और राजाओंके पूजनीय ह्विजश्रेष्ठ दधीचने कहा--
'ाजेद्ध ! ब्राह्मण ही बडी और प्रभावशाली होते है ।! ऐसा
स्पष्हपसे कहकर ब्राह्मण दघीच अपने आश्रममें प्रविष्ट
हो गये । फिर दधीचकी नमस्कार मात्र करके छुव अपने घर
चले गये | तत्पश्चात् भगवान् विष्णु देवताओंके साथ जेसे
आये थे; उसी तरह अपने बैकुण्ठछोकको लौट गये | इस
प्रकार वह स्थान स्थानेश्वर नामक तीथके रूपमें प्रसिद्ध हो
गया ) खानेश्वर्की यात्रा करके सनुष्य शिवका सायुज्य प्राप्त
5 ननलनमेलमनमनन नल पे नन >> मनन मन ८: मम नस + «3 मब«»+ 93० कम >कत++ «9 भ»«ंभ++ ० नल न « «मनन «०99 नल आन + 9 3+ 3 क3 3 5939-99 मत ज
कर लेता है । तात ! मैंने तुम्हें उंक्षेपसे क्षुव और दधीचके
विवादकी कथा सुनायी ओर भगवान् शंकरको छोड़कर
केवल ब्रह्मा और विष्णुको ही जो शाप प्राप्त हुआ। उसका भी
वर्णन किया | जो क्षुव ओर दधीचके विवादसम्बन्धी इस
प्रसक्षका नित्य पाठ करता है; वह अपमृत्युको जीतकर
देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकरमें जाता है | जो इसका पाठ करके
रणभूमिमें प्रवेश करता है। उसे कभी मृत्युका भय नहीं होता
तथा वह निश्चय ही विजयी होता है । ( अध्याय ३९ )
---+-->>+ कई
देवताओंसहित ब्क्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, श्रीविष्णुका उन्हें शिवसे
क्षमा मॉँगनेकी अनुमति दे उनको साथ ले केलासपर जाना तथा भगवान् शिवसे मिलना
नारदजीने कहा--विधातः ! महाप्राश्ञ | आप शिव-
चका साक्षात्कार करानेवाले हैं | आपने यह बड़ी अद्भुत
व॑ रमणीय शिवलीला सुनायी है । तात ! बीर वीरभद्र जब
श्के यज्ञका बिनाद करके केछास पर्वेतपर चले गये; तब
गा हुआ ! यह हमे बताइये ।
ब्रह्मजी बोले--नारद ! रुद्रदेवके सेनिकॉने जिनके
क्ष्मड़् कर दिये थे; वे समस्त पराजित देवता ओर मुनि उस
य मेरे छोकम आये | वहाँ मुझ स्वयम्भूकी नमस्कार करके
ने वारंबार मेरा स्तवन किया । फिर अपने विशेष क्लेश-
पृणश्यसे सुनाया । उसे सुनकर में पुत्रशोकसे पीड़ित हो
गञ और अत्यन्त व्यग्र हो व्यथित चित्तसे बड़ी चिन्ता
ने लगा । फिर मैंने मक्तिभावसे भगवान् विष्णुका स्मरण
या । इससे मुझे समयोचित ज्ञान प्राप्त हुआ । तदनन्तर
/ताओं और मुनियोके साथ मैं विष्णुलोकमें गया और वहाँ
भपान् विष्णुकी नमस्कार एवं नाना प्रकारके स्तोन्रेंद्वारा
की स्तुति करके उनसे अपना दुःख मिवेदन किया ॥ मैंने
“देव ! जिस तरह मी यज्ञ पूर्ण हो, यजमान जीवित
और समस्त देवता तथा मुनि सुखी हो जायें, वैसा उपाय
जेये | देवदेव | र्मानाथ | देवसुखदायक विष्णो ) हम
ता और मुनि निश्चय ही आपकी शरणमें आये हैं |!
डश जअहाकी यह बात सुनकर भगवान् रक्ष्मीपति विष्णु,
/ 7 मन सदा शिवमं लगा रहता है और जिनके हृदयमें
। दीनता गर
॥ दीनता नहीं आती; शिवक्ा स्मरण करके इस प्रकार बोले |
हि मत कहा--देवताओ ! परम समर्थ तेडुस्थी
पते कोई अपराध वन जाय तो भी उसके बदलेमें
शि पृ० अं० २१---
अपराध करनेवाले मनुष्योंके लिये वह अपराध मड्रलकारी नहीं
हो सकता । विधात: ! समस्त देवता परमेश्वर शिवके अपराधी
हैं; क्योंकि इन्होंने भगवान् शम्भुको यज्षका भांग नहीं दिया ।
अब तुम सब लोग शुद्ध हृदयसे शीघ्र ही प्रसन्न होनेवाले उन
भगवान् शिवके पेर पक्रड़कर उन्हें प्रसन्न करो । उनसे क्षमा
माँगो । जिन भगवानके कृपित होनेपर यह सारा जगत् नष्ट
हो जाता है तथा जिनके शासनसे लोकपालेंसहित यज्ञका जीवन
शीघ्र ही समाप्त हो जाता है; वे भगवान महादेव इस सम्रय
अपनी प्राणवल्लमा सतीसे बिछुड़ गये हैं तथा अत्यन्त दुरात्मा
दक्षने अपने दुबंचनरूपी बाणोंसे उनके हृदयको पहलेसे ही
घायल कर दिया है; अतः तुमलोग शीघ्र ही जाकर उनसे अपने
अपराधंके लिये क्षमा माँगो | विधे! उन्हें शान््त करनेका
केवल यही सबसे बड़ा उपाय है | में समझता हूँ ऐसा करनेसे
: भगवान् शंकरको संतोष होगा | यह मैंने सच्ची बात कही है।
ब्रह्मन | में भी तुम सब लोगोंके साथ शिवक्के निवास स्थानपर
चर्ढूँगा और उनसे क्षमा माँगूँगा ।
देवता आदि सहित मुझ ब्रह्माको इस प्रकार आदेश देकर
श्रीहरिने देवगणोंके साथ केलास परवंतपर जानेका विचार
किया । तदनन्तर देवता; मुनि ओर प्रजापति आदि जिनके
सख्रूप ही हैं; वे श्रीहरि उन सबको साथ ले अपने वेकुण्ठघाम-
से भगवान शिवके शुभ निवास गिरिश्रेष्ठ केलासको गये |
केलास भगवान् शिवको सदा ही अत्यन्त प्रिय है ) मन॒ष्योंसे
भिन्न किन अप्सराएँ ओर योगसिद्ध महात्मा पुरुष
उसका भलीमाति सेवन करते,हैँ तथा वह परत्रत बहुत ही
ऊँचा है | उसके निकट रुद्रदेवके मित्र कुबेर्की अरका सामक
महादिव्व एवं रमणीय पुरी है; जिसे सब देवताओंने देखा।
दर
उस पुरीके पास दी सोगन्बिक वन भी देवताओंकी दृष्िमें
आया; जो सब प्रकारके ब्क्षोंसे हरा-भरा एवं दिव्य था।
उसके भीतर सर्वत्र सुगन्ध फेलानेबाले सोगन्धिक नामक कमल
खिले हुए, थे। उसके बाहरी भागमें नन्दा ओर अलकनन्दा--
ये दो अत्यन्त पावन दिव्य सरिताएँ बहती हैं, जो दशनमात्रसे
प्राणियोंके पाप हर लेती हूँ । यक्षराज कुबेर्की अलकापुरी ओर
सोगन्धिक वनकों पीछे छोड़कर आगे बढ़ते हुए देवताओंने
थोड़ी ह्वी दूरपर शंकरजीके व्वृक्षको देखा | उसने चारों ओर
अपनी आविचछ छाया फैला रक््खी थी। वह दक्ष सी योजन
ऊँचा था ओर उसक्री शाखाएं पचहत्तर योजनतक फेली हुई
थीं। उसपर कोई घोंसला नहीं था ओर ग्रीष्मका ताप तो
उससे सदा दूर द्वी रदता था । बड़े पुण्यात्मा पुरुषोंको ही
उसका दर्शन हो सकता है । वह परम रमणीय ओर अत्यन्त
पावन है | वह दिव्य वृक्ष भगवान् शम्म्रुका योगस्थल है।
योगियेंके द्वारा सेव्यऔर परम उत्तम है। मुमुक्षुओंके आश्रयभूत
उस महायोगमय वटवृक्षके नीचे विष्णु आदि सब देवताओंने
भगवान् शंकरकी विराजमान देखा । मेरे पुत्र महासिद्ध
सनकादि) जो सदा शिव-भक्तिमें तत्पर रहनेवाले ओर शान्त
हैं; बड़ी प्रसक्नताके साथ उनकी सेवामें बैठे थे । भगवान्
शिवका श्रीविग्नह परम शान्त दिखायी देता था | उनके सखा
कुबेर) जो गुद्यकों और राक्षसोक्े खामी हैं; अपने सेवकगणों
तथा कुट्म्बीजनोंके साथ सदा विशेषरूपसे उनकी सेबा किया
“77:++कछ0<६&:-
देवताओं्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान् शिवका देवता आदिके अड्ोंके ठीक होने गे।
दक्षफे जीवित होनेका वरदान देना, श्रीहरि आदिके साथ यज्ञमण्डपमें पधारकर शिवका *
४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने £
| संक्षिप्त-शिवपुराण;
0... जन न जन मनन पलनन-पर- काम कम न++ के जनक रा + भयानक भी ३क+>न २८० न कक
अतीत परम ह्मटौ-- मीन पा आर अनार. दर परम सुन मी... (जल .आनरम की पीर की "रीयल "कक ++ "नह कक . मम तक दाह], 'व्आरीमए.न्#2०. न सही 27०- अधए आह. नीली जी नस रमन
करते हैं| वे परमेश्वर शिव उस समय तपस्वीजरनोंकी पत्र फि
लगनेवाला सुन्दर रुप धारण किये बैठे थे | भस्म बर्ति
उनके अड्डींकी बड़ी शोभा हो रही थी | भगवान शिव बड़े
वत्सछ खभावक्ेे कारण सारे संसारक्ते सुद्दृद
थ्रे। वे बायाँ चरण अपनी दायीं जॉघपर ओर वाया हु
बाये घुटनेपर रक्खें। कलाईम॑ रुद्राक्षकी माला डाले सुन्दर क
मुद्रोसे विराजमान थे |
इस रूपम॑ भगवान् दिवका दर्शन करके उस सम्रय शिए
आदि सब देवताओंने दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर हर!
उनके चरणोमें प्रणाम किया । मेरे साथ भगवान गिणुगर
आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता भगवान रुद्र उठक
हो गये ओर उन्होंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम भी ज्लि।
फिर विष्णु आदि सब देवताओंने जब भगवान् गिर
प्रणाम कर लिया, तब उन्होंने मुझे नमस्कार किया--ठौ के
तरह, जेसे लोकोंकी उत्तम गति प्रदान करनेवाले भगवाव हि
प्रजापति कश्यपको प्रणाम करते हैं | तत्यश्वात् देवताओं) हि
गणाघीशों ओर महषियोंसे नमस्कृत तथा खयं भी ( श्री
को एवं मुझकी ) नमस्कार करनेवाले भगवान शिके भह
आदणपूबक वार्ताछाप आरम्भ किया | ( अध्याय ४०)
दक्ष्ों जीवित करना तथा दक्ष ओर विष्णु आदिके द्वारा उनकी स्तुति
द्ेवताओंने भगवान शिवजीकी अत्यन्त विनयके
साथ स्तुति करते हुए अन्तमे कहा--आप पर (उत्कृष्ट
परमेश्वर; परात्पर -तथा परात्परतर हैं। आप सर्ब॑व्यापी विश्वमूर्ति
मदेश्वर्को नमस्कार है। आप विष्णुकलत्न, विष्णुक्षेत्र, भानु;
सैरब) शरणागतवत्सर; ज्यम्बक तथा विहरणशील हैं। आप
मृत्युंजय हैं | शोक भी आपका ही रूप है , आप त्रिगुण एवं
गुणात्मा हैं | चन्द्रमा, सूय ओर अग्नि आपके नेत्र हैं। आप
सबके कारण तथा धर्ममर्यादाखरूप हैं | आपको नमस्कार है |
आपने अपने ही तेजसे सम्पूण जगत्को व्याप्त कर रक््खा है ।
आप निविक्रारः प्रकाशपूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, पखनह्म
हैं। महेश्वर | ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और चन्ध आदि
देवता तथा मुनि आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। चूँकि आर
शरीरको आठ भागोंमें विभक्त करके समस्त संसार
करते हैं, इसलिये अश्मूर्ति कहलाते हैं | आप ही सब
कारण करुणामय ईश्वर हैं | आपके भयसे यह वायु च*
आपके भयसे अम्ि जलानेका काम करती है। आप
सूर्य तपताहै और आपके ही मयसे मृत्यु सब ओर
फिरती है। दयासिन्धो | महेशान ! परमेश्वर ! प्रसन्न
१. तजेनीको अँगुठेसे जोड़कर और अन्य अँगुलियोंको आपसमें मिलाकर फैला देनेसे जो बन्ध सिद्ध छोता है। ताक
६ | इसीका नाम (श्ञानमुद्रा' भी है ।
देंदू हैं | गाए| “
उस दिन वे एक कुशासनपर बेंठे थे ओर सब संतेंके पुल -
हुए तुम्हारे प्रश्न करनेपर तुम्हें उत्तम शानका उपदेश दे ऐ
रुद्रसंहिता |. .
# देवताआद्वारा भगवान शिवकी- स्तुति # १द३े
#
हम नष्ट ओर अचेत हो रहे हैं| अतः सदा ही हमारी रक्षा
गैजिये, रक्षा कीजिये | नाथ ! करुणानिधे ) शम्मो | आपने
वतक नाना प्रकारकी आपत्तियोंसे जिस तरह हमें सदा सुरक्षित
खा है, उसी तरह आज भी आप हमारी रक्षा कीजिये |
थ | ढुर्गेंश | आप शीघ्र कृपा करके इस अपूर्ण यज्ञका
(र प्रजापति दक्षका भी उद्धार कीजिये | भगको अपनी
खिं मिल जायें, यजमान दश्ल जीवित हो जायें, पूषाके दाँत
मे जाये ओर भूगुकी दाढ़ी-मूँछ पहले-जैसी हो जाय |
कर ! आयुधों ओर पत्थरोंकी-वर्षासे जिनके अड् भड़ः हो गये
/ उन देवता आदिपर आप स्वथा अनुग्रह करें, जिससे
नं पूर्णतः आरोग्य छाम हो | नाथ ! यश्ञकर्म पूर्ण होनेपर
| कुछ शेष रहे, वह सब आपका पूरा-पूरा भाग हो ( उसमें
र कोई हस्तक्षेप न करे )। रुद्रदेव ! आपके भागसे ही
ह पूर्ण हो, अन्यथा नहीं |
ऐसा कहकर मुझ ब्रह्माके साथ सभी देवता अपराध क्षमा
णनेके लिये उद्यत हो हाथ जोड़ भूमिपर दण्डके समान
ह गये | का
व्रह्माजी कहते हँ--नारद | मुझ ब्रह्मा, लोकपाल,
जापति तथा मुनिर्योसहित श्रीपति विप्णुके अनुनय-बिनय
एनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये | देवताओंको आश्वासन
हउकर उनपर परम अनुग्रह करते हुए. करुणानिधान
मेश्वर शिवने कहा | '
श्रीमहादेवजी बोले--सुरश्रेष्ठ अह्मा और विष्णुदेव !
'प दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कहता
: तात | आप दोनोंकी सभी बातोंको मैंने सदा माना है |
श्के यशञका वह विध्वंस मैंने नहीं किया है | दक्ष खयं ही
परोसे द्वेप करते हैं। दूसरोंके प्रति जैसा बर्ताव किया जायगा,
९ अपने लिये ही फलित होगा | अतः ऐसा करे कभी नहीं
“ना चाहिय्रे, जो दूसरोको कष्ट देनेवाला हो# । दक्षका
के चले गया है; इसलिये इनके सिरके स्थानमें बकरेका
के जोड़ दिया जाय; भग देवता मित्रकी आँखसे अपने
रेशागक़ो देखें । तात | पूषा नामक देवता, जिनके दाँत हट
५» येजमानके दाँतोंसे भलीभाति पिसे गये यज्ञान्नका भशक्षण
| का 'च्ची वात बतायरी है। मेरा विरोध करनेवाले
हक जनम चकरेकी दाढ़ी लगा दी जाय | शेप
भी देवता३ भ हि कल ७»
/। देवताओंके, जिन्होंने पाप 3 पैसे यशषमागके रूपमें यज्ञकी यज्ञभागके रूपमें यज्ञकी
/ ल् घर ह्ेष्टि मी.
के ः देष्टि. परेपां यदात्मनस्तद्धविष्यति ॥
प्र फटने कमे न कार्य तत्वकदाचच ।
( शशि 3० रु० सं० स० रछ० ४२-.-.५६०८. ) -- हे
अवशिष्ट वस्तुएँ दी हैं, सारे अड्ढ पहलेकी भाँति ठीक हो
जाय | अध्वयु आदि याशिकमेंसे, जिनकी भुजाएँ टूट गयी
हैं, वे अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे ओर जिनके हाथ नष्ट
हो गये हैं, वे पूपाके हाथोंसे अपने काम चलायें | यह मैंने
आपलोगोंके प्रेमबश कहा है |
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! ऐसा कहकर वेदका
अनुसरण करनेवाले सुस्सम्राट चराचरपति दयारु परमेश्वर
महादेवजी चुप हो गये | भगवान् शंकरका वह भाषण सुनकर
श्रीविष्णु और ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो उन्हें तत्काल
साधुवाद देने लगे | तदनन्तर मगवान् शम्धुकोी आमन्त्रित
करके मुझ ब्रह्मा ओर देवर्षियोंके साथ श्रीविष्णु अत्यन्त हर्ष-
पूर्वक पुनः दक्षकी यशशालाकी ओर चले | इस प्रकार उनकी
प्राथनासे भगवान् झम्मु विष्णु आदि देवताओेंके साथ
कनखलमें स्थित प्रजापति दक्षकी यज्ञशाल्ममें पधारे | उस समय
रुद्रदेवने वहाँ यशञका ओर विशेषतः देवताओं तथा ऋषियोंका
जो वीरभद्के द्वारा विध्वंस किया गया था, उसे देखा। स्वाहा)
सखंघा। पृथरा; -तुष्टि, धृति,; सरस्वती; अन्य समस्त ऋषि,
पिंतर; अम्नि तथा अन्यान्य बहुत-से यक्ष; गन्धव॑ और, राक्षस
वहाँ पड़े थे | उनमेंसे थे;
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कुछ लोगोंके बाल नोच लिये गये थे ओर कितने ह्वी उस
समराज्गणमें अपने प्राणोंसे हाथ घो बेठे थे | उस यज्ञकी वेसी
दुखवस्था देखकर भगवान् शंकरने अपने गणनायक
महापराक्रमी वीरभद्रकों बुलाकर हँसते हुए. कद्दा-“महद्दबाहु
वीरभद्र ! यह तुमने कैसा काम किया ? तात ! ठुमने थोड़ी
ही देरमें देवता तथा ऋषि आदिको बड़ा भारी दण्ड दे दिया।
वृत्स | जिसने ऐसा द्वोहपूर्ण कार्य किया, इस विलक्षण यजश्ञका
आयोजन किया और जिसे ऐसा फल मिला; उस दक्षकों तुम
शीघ्र यहाँ ले आओ |!
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उत्तावलीके
साथ दक्षका घड़ छाकर उनके सामने डाल दिया । दक्षक्े उस
शवको. सिरसे रहित देख लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरने
आगे खड़े हुए वीरमद्रसे हँसकर पूछा--“दक्षका सिर कहाँ
है ? तब प्रभावशाली वीरभद्रने कहा--“प्रभो शंकर ! मैंने
तो उसी समय दक्षके सिरको आगमें होम दिया था ।? वीरमभद्रकी
वह बात सुनकर भगवान् शंकरने देवताओंको प्रसन्नतापूबक
वेंसी हीं आज्ञा दी, जो पहले दे रक्खी थी । भगवान् भवने उस
समय जो कुछ कहा) उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि
सब देवताओंने भ्गु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया |
तदनन्तर शम्भुके आदेशसे ग्रजापतिके घड़के साथ यज्ञपञ्ञु
बकरेका सिर जोड़ दिया गया | उस सिरके जोड़े जाते ही शम्भुकी
शुभ दृष्टि पड़नेसे प्रजापतिके शरीरमें प्राण आ गये और वे
तत्काल सो कर जगे हुए पुरुषकी भाँति उठकर खड़े हो गये ।
उठते ही उन्होंने अपने सामने करुणानिधि भगवान् शंकरको
देखा | देखते ही दक्षके हछृदयमें प्रेम उमड़ आया | उस
प्रेमने उनके अन्तःकरणको निर्मेल एवं प्रसन्न कर दिया ।
पहले महादेवजीसे द्वेष करनेके कारण उनका अन्तःकरण
मलिनि हो गया था | परंतु उस समय शिवके दर्नसे वे
तत्काल शरद् ऋतु॒के चन्द्रयाकी भाँति निमेल हो गये | उनके
मनमें भगवान शिवकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ |
परंठु वे अनुरागाधिक्यके कारण तथा अपनी मरी हुई पुत्नीका
स्मरण करके व्याकुल हो जानेके कारण तत्कारू उनका
स्तवन न कर सके । थोड़ी देर वाद मन स्थिर होनेपर दक्षने
लजित हो लोकशंकर शिवशंकरको प्रणाम किया और उनकी
स््त॒ति आरम्म की | उन्होंने भगवान् शंकरकी महिमा गाते
हुए वारंबार उन्हें प्रणाम किया | फिर अन्तमें कहा---
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा:
'पपरमेश्चर | आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले था्न-
तत्वका श्ञान प्रात्ष करनेके लिये अपने मुखसे विद्या;
ओर अत धारण करनेवाले आह्मर्णोकी उत्तन््त किया था । है
ग्वाला छाठी टेकर गोओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार मय:
का पालन करनेवाले आप परमेश्वर दण्ड धारण डरियेः
साधु ब्राह्मगोकी सभी विपत्तियरोंसे रक्षा करते दे । मैने दब
रूपी बाणेसि आप परमेश्चरको बींव डाला था। फिर भी
मुझपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ आ गये | भत्र मेरी
तरह अत्यन्त देन्यपूर्ण आश्यावाले इन देवताओपर मीह़
कीजिये | भक्तवत्सल ! दीनबन्धो ! द्म्मो | मुझमें आए
प्रसन्न करनेके लिये कोई गुण नहीं है। आप पड़विष ऐसा
सम्पन्न परात्यर परमात्मा हैँ | अतः अपने ही बहुए
उदारतापृर्ण बर्तावसे मुझपर संतुष्ट हाँ |?
त्रह्माजी कहते है--नारद ! इस प्रकार लोककलाईं
महाप्रभु महेश्वर शंकरकी स्तुति करके विनीतचित्त प्रा
दक्ष चुप हो गये | तदनन्तर श्रीविष्णुने हाथ जोड़ माह
वृषभध्वजको प्रणाम करके प्रसन््नतापूर्ण हृदय और वाभाह
वाणीद्वारा उनकी स्तुति प्रारम्भ की ।
तद्नन्तर मेने कहा--देवदेव ! महादेव | क्या!
प्रभो | आप खतन्त्र परमात्मा हैं; अद्वितीय एवं अर्ि:
परमेश्वर हैं | देव | ईश्वर ! आपने मेरे पुत्रपर अनु हि
अपने अपमानकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर दहहे को
उद्धार कीजिये | देवेश्वर ! आप प्रसन्न होइये और ह
शार्पोकी दूर कर दीजिये। आप सज्ञान हैं। अतओं
मुझे कर्तव्यकी ओर प्रेरित करनेवाले हैं और आप ही भर्चि
रोकनेवाले हैं | | ।
महामुने | इस प्रकार परम सद्देश्वरकी र॒ति कहे | ।
दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर खड़ा हो गया | क#|
विचार रखनेवाले इन्द्र आदि देवता और लोकपाल बकरी
स्तुति करने छंगे | उस- समय भगवान् शिवका मुराए
प्रसन्ततासे खिल उठा था | इसके बाद प्रसन््न॑चित्त है5 है ।
देवताओं, दूसरे-दूसरे सिद्धों, ऋषियों और प्रजापति
शंकरजीका सहर्ष स्तवन किया | इसके अतिरिति ३) ।
नागों , सदस्यों तथा ब्राह्मणोंने प्रथक-पथक् प्रणाम"
भक्तिभावसे उनकी स्तुति की । ( अध्याय ४९-४५ हे
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रद्डसंहिता |] # भगवान, शिवका दक्षकों अपनी भक्तवंत्सलछता तथा ज्ञानी भक्तको श्रेंटता वतलाना #
अनालिक-ी कटी फल ली भिननिनन
3 2 फल चहल किवननमगपहनतीम्माहान “अपर वोेलनमम्मारनी ७? फकना “सपआनन "न # न गाहक-* नए पान हनन. समन 9०० 4 कान-+-ान- मय आन मम चिकनी
भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठठा तथा तीनों देवताओंकी एकता
५ चर ३; कर श्र चर जे.
बताना, दक्षका अपने यज्ञकों पृण करना, सब देवता आदिका अपने-अपने खानको जाना,
सतीखण्डका उपसंहार ओर माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैँ--नारद | इस प्रकार श्रीविष्णुके,
मेरे; देववाओं और ऋषियोके तथा अन्य लोगोेंके स्तुति करनेपर
महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए. । फिर उन शम्भुने समस्त ऋषियों,
देवता आदिको कृपाइृष्टिसे देखकर तथा मुझ ब्रह्मा ओर
विष्णुका समाधान करके दक्षसे इस प्रकार कहा |
महादेवजी वोलछे--प्रजापति दक्ष ! मैं जो कुछ कहता
हूँ, सुनो । में तुमपर प्रसन्न हूँ । यद्यपि में सबका ईश्वर ओर
खतन््त्र हूँ; तो भी सदा ही अपने मक्तोके अधीन रहता हूँ ।
चार प्रकारके पुण्यात्मा पुरुष मेरा भजन करते हैं। दक्ष
प्रजापते | उन चारों भक्तोंमें पूर्व-पूवंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ
हूँ | उनमें पहला आते; दूसरा जिशासु) तीसरा अर्थार्थी और
चौथा शानी है । पहलेके तीन तो सामान्य श्रेणीके भक्त हैं ।
किंतु चोथेका अपना विशेष महत्व है। उन सब मक्तोँमें
चोथा ज्ञानी ही मुझे अधिक प्रिय है| वह मेरा रूप माना -
गया है | उससे बढ़कर दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है, यह मैं सत्य-
सत्य कहता हूँ |# में आत्मश हूँ। वेद-वेदान्तके पारगामी
विद्वान शानके द्वारा मुझे जान सकते हैँ | जिनकी बुद्धि मन्द
है, वे ही शानके विना-मुझे पानेका प्रयत्न करते हैं । कर्मके
अधीन हुए मूढ़ मानव मुझे वेद, यज्ञ) दान और तपस्था-
द्वारा भी कभी नहीं पा सकते |
अतः दक्ष | आजसे तुम बुद्धिके द्वारा मुझ परमेश्वस्को
जानकर शानका आश्रय ले समाहित-चित्त होकर कर्म करो।
प्रजापते | तुम उत्तम बुद्धिके द्वारा मेरी दूसरी बात भी
सुनो | में अपने संगुण सख्रूपके विषयमें भी इस गोपनीय
रस्यको धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे सामने प्रकट करता हैँ।
न
४ चतुविधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनः सदा ।
उत्तरोत्तरतः भरेप्ठास्तेषां दक्ष प्रंजापते ॥
भार्तों जिशासुरर्थाथीं शानी चैव चतुर्थकः ।
पूर्व प्यरच सामान्यारचतुर्थों हि विशिष्यते ॥
पत्र शानी प्रियत्तरों मम रूप च स स्मृतः ।
तलात्प्रियतरों नान््यः सत्यं स॒त्यं वदाम्यदम् ॥
( शि० पु० रु० सं० स० खं० ४३ । ४-+-६ )
जगत्का परम कारणरूप मैं ही ब्रह्मा ओर विष्णु हूँ । में
सबका आत्मा ईश्वर ओर साक्षी हूँ | खयम्प्रकाश तथा
निर्विशेष हूँ | मुने | अपनी त्रिगुणात्मिका म्ायाकों स्वीकार
करके में ही जगतकी स॒ष्टि, पाछन और संहार करता हुआ
उन क्रियाओंके अनुरूप ब्रह्मा; विष्णु ओर रुद्र नाम धारण
करता हूँ | उस अद्वितीय ( भेदरहित ) केवल ( विशुद्ध )
मुझ परब्ह्म परमात्मामें ही अज्ञानी पुरुष ब्रह्म; ईश्वर तथा
अन्य समरंत जीवोंको भिन्नब्पसे देखता है। जैसे मनुष्य
अपने. सिर और हाथ आदि अड्डोंगें ये मुझसे भिन्न हैं?
ऐसी परकीय बुद्धि कभी नहीं करता; उसी तरह मेरा
भक्त प्राणिमात्रमें मुझसे मिन्नता नहों देखता । दक्ष !
में, ब्रह्म ओर विष्णु तीनों ख्रू्पतः एक ही हैं तंथा हम
ही सम्पूर्ण जीवरूप हैं--ऐसा[ समझकर जो हम तीनों
देवताओंमें भेद नहीं देखता, वही शान्ति प्राप्त करता
है। जो नराघम हम तीनों देवताओंमें भेदबुद्धि रखता है
3 ७ -ननसमीयओन अनटीगान»-+ न कब ये कक. उन 333. रीयननबानकोननकझमाकम«म««मक०» की पन-+-काम५..3+ #-अमााय, उन.
वह निश्चय ही जबतक चन्द्रमा और तारे रहते है, तबतक
नरकमें निवासकरता है । # दक्ष | यदि कोई विष्णुभक्त
होकर मेरी निन््दा करेगा ओर मेरा मक्त होकर विष्णुकी
कण +निनीनी नी विन वार अन्य इ्-ल ्त्न न्डडडडि::: अअसिख अस्ऊक् ओ»>ओ। आओ
: निन््दा करेगा तो तुम्हें दिये हुए पूर्वोक्त सारे शाप उन्हीं
दोनोंको प्राप्त होंगे ओर निश्चय ही उन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति
नहीं हो सकती म |
च्रह्माजी कहते हें--मुने | भगदन महेश्वरके इस
*% सर्वभृतात्मनामेकभावानां यो न पद्यति |
त्रिसुराणां भिद्रां दक्ष स शान्तिमघिगच्छति ॥
यः करोति व्रिदेवपु. मेदबुद्धि नराधमः ।
नरके स॒ वसेनन्नूनं वबावदाचनद्धतारकन् ॥
( शि० पु० रु० सं० स० सं० ४३ | १६-१७)
हि मां निन्देत्तया शा भवेददि।
दापा भवेशुस्ते तक्तप्राप्तिमवेश्दि ॥
(शि० पु० रु० सं० स० खें० ४३१२६ )
ते हरिसक्ता
तयोः
का #सरमरकारएगहुननाततइपुअम इक यहा बूकपररपाक्रयजआा कप दाध्यपाा १ (का काक्ाकंध मकर कवााभह> चर पु भइतमृुखवएल् पृएउक तक पक पद कानहण्याततक मम यु#पक्रमलामूनग पाए यकासुपज इकबाल वह पइुलान का त#याा हा उकाइन#पएप काम ए दब कपतर भरत 4 कम तकफ्राएपचलरकलतउका परम कन कद पक पक जक 5 काका. ९७०8) पानी चरम अर. कित+ पारी "दम. पर ९. ऐक्५ल्#ानी सार भा घ“.र ५2 न्दरए मरी जारी नि... "२० पेपानरी ९. 3५ पियानीी) जानी चिकनी
सुखदायक वचनको सुनकर सब देवता, मुनि आदिको उस
अवसरपर बड़ा हषे हुआ । कुद्म्बसहित दक्ष बड़ी प्रसन्नताके
साथ शिवभक्तिमें तत्पर हो गया । वे देवता आदि भी शिवको
ही सर्वेश्वर जानकर भगवान् शिवके भजनमें लछूग गये ।
जिसने जिस प्रकार परमात्मा शम्भुकी स्तुति की थी; उसे
उसी प्रकार संतुष्टचेत्त हुए शम्भुने वर दिया। मुने |
तदनन्तर भगवान् शिवकी आशा पाकर प्रसन्नचित्त हुए
शिवभक्त दक्षने शिवके ही अनुग्रहसे अपना यज्ञ पूरा
किया । उन्होंने देवताओंकी तो यशभाग दिये ही, शिवको
भी पृर्णभाग दिया । साथ ही ब्राह्मणोंकी दान दिया | इस
तरह उन्हें शम्भुका अनुग्रह प्राप्त हुआ । इस प्रकार महादेवजीके
उस महान् कर्मका विधिपूर्वक वर्णन किया गया । प्रजापतिने
ऋत्विजोंके सहयोगसे उस यशकमेकी विधिवत् समाप्त
किया । मुनीश्वर | .इस प्रकार परब्रह्मखरूप शंकरके
प्रसादसे वह दक्षका यज्ञ पूरा हुआ। तदनन्तर सब
देवता और ऋषि संतुष्ट हो भगवान् शिवके यशका वर्णन
करते हुएं अपने-अपने स्थानकों चले गये | दूसरे छोग
भी उस समय वहाँसे सुखपूषक बिदा हो गये।
मैं और श्रीविष्णु भी अत्यन्त प्रसन्ष हो भगवान् शिवके
सर्वेमड्रलदायक सुयशका निरन्तर गान करते हुए. अपने-
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाए
स्भ्च्य्च्य्च्च््च्च्स्स््स्ल्च
अपने स्थानकोी सानन्द चले आये | सत्पुरुषेकि आश्रयमृत
महादेवजी भी दक्षसे सम्मानित हों प्रीति और प्रसत्रतार
साथ गर्णोॉसद्दित अपने निवासस्थान केछास पर्वतकी चहे
गये । अपने पवतपर आकर अआम्भुने अपनी प्रिया सवीक्न
स्मरण क्रिया ओर प्रधान-प्रधान गणेसि उनकी कथा की।
इस प्रकार दक्षकन्या सती यज्ञ अपने शरीरको दया.
कर फिर हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे उत्न्न हुई
यह बात प्रसिद्ध है। फिर वहाँ तपस्या करके गोरी शिव
भगवान् शिवका पतिरुपमें वरण किया । वे उन्हे
बामाड़में स्थान पाकर अद्भुत लीछाएं. करने लगीं। नाए !
इस तरह मेने तुमसे सतीके परम अद्भुत दिव्य चरिक्ा
वर्णन किया है; जो भोग ओर मोक्षको देनेवाल व
सम्यूण कामनाओंको पूर्ण करनेबाल्य है। यह उपाणयात
पापको दूर करनेवाला; पवित्र एवं परम पावन है| सगे
यश तथा आयुको देनेवाल्ा तथा पुत्र-पोत्र रूप कह प्रदा
करनेवाला है। तात | जो भक्तिमान् पुरुष भक्तिमाओे
लोगोंकी यह कथा सुनाता है; वह इस लोकमें समा
कर्मोका फल पाकर परलोकमें परमगतिको प्राप्त करं खेत है|
( अध्याय ४१]
++-<ईव्ण्लन्कफिहएलकत्त १२०
॥ रुद्रसंहिताका सतीखण्ड सम्पूर्ण ॥
हा]
5
... रुद्रसंहिता, तृतीय ९ पाव॑ती ) खण्ड
.. हिमालयकें खावर-जंगम द्विविध खरूप एवं दिव्यत्वका वर्णन, मेनाके साथ उनका विवाह तथा
मेना आदिको पूर्व॑जन्ममें ग्राप्त हुए सनकादिके शाप एवं बरदानका कथन
नारदजीने पूछा--अह्न् | पिताके यश्षमें अपने शरीर-
: का परित्याग करके दक्षकन्या जगदम्बा सती देवी किस प्रकार
: गिरिराज हिमाल्यकी पुत्री हुईं ! किस तरह अत्यन्त उग्र
* तपस्था करके उन्होंने पुनः शिवको ही पतिरूपमें प्राप्त किया !
: यह मेरा प्रश्न है; आप इसपर मलीभाँति और विशेषरूपसे
॥ प्रकाश डालिये |
! व्रह्माजीने कहा--मुने ! नारद | तुम पहले पाबतीकी
। माताके जन्म; विवाह और अन्य मक्तिवर्दक पावन चरित्र सुनो |
: मुनिश्रेष्ठ | उत्तर दिशामें पर्वतोंका राजा हिमवान् नामक सहान्
पंत है. जो महातेजसी और समृद्धिशाली है | उसके दो रूप
प्रसिद्ध हैं---एक स्थावर और दूसरा जंगम। मैं संक्षेपसे उसके
/ सक्षम (स्थावर) खरूपका वर्णन करता हूँ । वह रमणीय पर्वत नाना
९ प्रकारके रक्ञोंका आकर ( खान ) है और पूर्व तथा पश्चिम
! संमुद्रके भीतर प्रवेश करके इस तरह खड़ा है; मानो भूमण्डल-
'! की नापनेके लिये कोई मांनदण्ड हो | वह नाना प्रकारके
' इश्षेसे व्याप्त है और अनेक शिंखरोंके कारण विचिच्र शोभासे
' पमन्न दिखायी देता है | सिंह, व्याप्र आदि पद्म सदा सुख-
: पूबेंक उसका सेवन करते हैं | हिमका तो वह भंडार ही है;
: इसलिये अत्यन्त उग्र जान पड़ता है | भौति-भौतिके आश्र्य-
' उनके इृश्योंसे उसकी विचित्र शोभा होती है। देवता; ऋषि,
5 तिद्ध और सुनि उस पर्वतका आश्रय लेकर रहते हैं | भगवान्
५ शिवकों वह बहुत ही प्रिय है, तपस्णा करनेका स्थान है |
| खरूपसे ही वह अत्यन्त पवित्र और महात्माओंकी भी पावन
' फेरनेवाला है | तपस्थामें वह अत्यन्त शीघ्र सिद्धि प्रदान करता
हि है। अनेक प्रकारके धातुओंकी खान और शुभ है। वही दिव्य
. शरीर धारण करके सर्वाइसुन्दर स्मणीय देवताके रूपमें भी
खित है। भगवान् विष्णुका अबिकृत अंश है, इसीलिये बह
' शैरसज जे साधुसंतोंकी अधिक प्रिय है | |
उऊक समय गरिरिवर हिमबानने अपनी कुल-परम्पराकी
स्थिति और धर्मकी वृद्धिके लिये देवताओं तथा पितरोंका हित
परनेकी अभिवयपासे अपना विवाह करनेकी इच्छा की।
पनीर | उस अवसरपर सम्पू्ण देवता अपने स्वार्थका विचार
हक दिव्य पिततरोंक़े पात आकर उनसे प्रसन्नतापूव॑ंक बोले |
थक
(६७-८८:५
अर्टनय नि
देवताओने कहा--पितरो ! आप सब छोग प्रसन्नचित्त
होकर हमारी बात सुनें और यदि देवताओंका कार्य सिद्ध करना
आपको भी अमीष्ट हो तो शीत बैसा ही करें | आपकी ज्येष्
पुत्री जो मेना नामसे प्रसिद्ध है; वह मज्जलरूपिणी है। उसका
विवाह आपलोग अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हिमवान् पर्वतसे कर
द् । ऐसा करनेपर आप सब लोगोंको स्वेथा महान् छाम होगा
ओर देवताओंके दुःखोंका निवारण भी पग-पगपर होता रहेगा |
देवताओंकी यह बात सुनकर पितरोंने परस्पर विचार करके
स्वीकृति दे दी ओर अपनी पुत्री मेनाको विधिपूर्वक हिमालयके
हाथमे दे दिया | उस परम मड्गडल्मय विवाहमें बड़ा उत्सव
मनाया गया | मुनीश्वर नारद | मेनाके साथ हिमालयके शुभ
विवाहका यह सुखद प्रसज्ञः मैंने तुमसे प्रसन्नतापूवंक कहा है।
अब ओर क्या सुनना चाहते हो !
नारदजीने पूछा--विधे | विद्वन् ! अब आदरपूर्वक
मेरे सामने मेनाकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये | उसे किस प्रकार
शाप प्राप्त हुआ था; यह कहिये ओर मेरे संदेहका निवारण
कीजिये ।
बह्माजी बोले--मुने ! मैंने अपने दक्ष नामक जिस
पुत्रकी पहले चर्चो की है; उनके साठ कन्याएँ हुईं थीं; जो
सश्टिकी उत्पत्तिमें कारण बनीं । नारद ! दक्षने कश्यप आदि
श्रेष्ठ मुनियोंके साथ उनका विवाह किया था, यह सब जृत्तान्त
तो तुम्हें विदित ही है। अब प्रस्तुत विषयको सुनो । उन
कन्याओंमें एक खधा नामकी कन्या थी, जिसका विवाह
उन्होंने पितरोंके साथ किया | खधाकी तीन पुत्रियाँ थीं, जो
सोभाग्यञ्यालिनी तथा धर्मकी मूर्ति थीं | उनमेंसे ज्ये्ठ पुन्नीका
नाम ध्मेना? था । मेंझली “्वन्याःके नामसे प्रसिद्ध थी और
सबसे छोटी कन्याका नाम “कलावती? था। ये सारी कन्याएँ
पितरोंकी मानसी पुत्रियाँ थीं--उनके मनसे प्रकट हुई थीं ।
इनका जन्म किसी माताके गर्भसे नहीं हुआ था, अतएव ये
अयोनिजा थीं। केबल लोकव्यवहारसे खधाकी पुत्री मानी जाती
थीं | इनके सुन्दर नामोंका कीर्तन करके मनुप्य सम्पूण
अभीश्को प्राप्त कर लेता है । ये रुदा सम्पूर्ण जगती
वन्दनीया छोकमाताएँ हैँ और उत्तम अम्युदयतते मुशोमित
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रुद्रसंहिता, तृतीय ( पावंती ) खण्ड
हिमालयकें खावर-ज॑ंगम द्विविध खरूप एवं दिव्यत्वका वर्णन, मेनाके साथ उनका विवाह तथा
मेना आदिको पूर्वजन्ममें प्राप्त हुए सनकादिके शाप एवं वरदानका कथन
नारदजीने पूछा--ब्रह्मन् | पिताके यश्षमें अपने शरीरः
का परित्याग करके दक्षकन्या जगदम्बा सती देवी किस प्रकार
गिरिराज हिमालयकी पुत्री हुईं ! किस तरह अत्यन्त उम्र
तपस्या करके उन्होंने पुनः शिवको ही पतिरूपमें प्राप्त किया !
यह मेरा प्रइन है; आप इसपर भलीमाति ओर विशेषरूपसे
प्रकाश डालिये |
प्रह्माज़ीने कहा--सुने ! नारद ! तुम पहले पाबेतीकी
माताके जन्म; विवाह ओर अन्य भक्तिवर्द्कक पावन चरित्र सुनो ।
मुनिश्रेष्ठ | उत्तर दिशामें पर्वतोंका राजा हिमवान् नामक महान्
पव॑त है, जो महातेजस्वी ओर समृद्धिशाली है | उसके दो रूप
प्रसिद्ध हैं---एक स्थावर ओर दूसरा जंगम | मैं संक्षेपसे उसके
सूक्ष्म (सथावर) खरूपका वर्णन करता हूँ। वह स्मणीय पव॑त नाना
प्रकारके रक्नोंका आकर (खान ) है और पूर्व तथा पश्चिम
समुद्रके भीतर प्रवेश करके इस तरह खड़ा है मानो भूमण्डल-
को नापनेके लिये कोई मांनदण्ड हो | वह नाना प्रकारके
तृक्षोंस्े व्याप्त है ओर अनेक शिखरोंके कारण विचित्र शोमासे
समन्न दिखायी देता है | सिंह, व्याप्त आदि पश्चु सदा सुख-
पृवंक उसका सेवन करते हैं | हिमका तो वह भंडार ही है;
इसलिये अत्यन्त उग्र जान पड़ता है | मौँति-भातिके आश्वर्य-
जनक दृश्योंसे उसकी विचित्र शोभा होती है । देवता, ऋषि)
सिद्ध ओर मुनि उस पर्वतका आश्रय लेकर रहते हैं | मगवान्
'शिवकी वह बहुत ही प्रिय है, तपस्या करनेका स्थान है ।
' खरूपसे ही वह अत्यन्त पविन्न और महात्माओंको भी पावन
: करनेवाल्य है । तपस्थामें वह अत्यन्त शीघ्र सिद्धि प्रदान करता
है। अनेक प्रकारके घातुओंकी खान और शुभ है। वही दिव्य
! शरीर धारण करके सर्वाद्जसुन्दर रमणीय देवताके रूपमें भी
/ खित है। भगवान् विष्णुका अविक्ृत अंश है, इसीलिये वह
'शैल्राज साधु-संतोंकी अधिक प्रिय है | ।
एक समय गिरिवर हिमवानने अपनी कुल-परम्पराकी
'खिति और धर्मकी बृद्धिके लिये देवताओं तथा पितरोंका ह्ति
परनेकी अभिलापासे अपना विवाह करनेकी इच्छा की।
उनीक्षर | उस अवसरपर सम्पूर्ण देवता अपने स्वार्थका विचार
3२5 दिव्य पितरोंके पास आकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले ।
देवताआंने कदा--पितरो ! आप सब छोग प्रसन्नचित्त
होकर हमारी बात सुनें और यदि देवताओंका कार्य सिद्ध करना
भापको भी अमीष्ट हो तो शीत्र बेसा ही करें | आपकी ज्येष्ठ
पुत्री जो मेना नामसे प्रसिद्ध है; वह मज्जलरूपिणी है | उसका
विवाह आपलोग अत्यन्त प्रसन्नतापूवेक हिमवान् पर्वतसे कर
दे | ऐसा करनेपर आप सब ल्ोगोंको स्ेथा महान् लाभ होगा
ओर देवताओंके दुःखोंका निवारण भी पग-पगपर होता रहेगा।
देवताओंकी यह बात सुनकर पितरोंने परस्पर विचार करके
स्वीकृति दे दी और अपनी पुत्री मेनाको विधिपूर्वक हिमालयके
हाथमें दे दिया | उस परम मद्भनलमय विवाहमें बड़ा उत्सव
मनाया गया । मुनीश्वर नारद | मेनाके साथ हिमालयके शुभ
विवाहका यह सुखद प्रसद्ग मैंने तुमसे प्रसन्नतापूषंक कहा है |
अब ओर क्या सुनना चाहते हो !
नारदजीने पूछा--विधे | विद्वनू ! अब आदरापूर्वक
मेरे सामने मेनाकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये | उसे किस प्रकार
शाप प्राप्त हुआ था; यह कहिये ओर मेरे संदेहका निवारण
कीजिये |
ब्रह्माजी वोले--मुने | मैंने अपने दक्ष नामक जिस
पुत्रकी पहले चर्चा की है; उनके साठ कन्याएँ: हुईं थीं; जो
सष्टिकी उत्पत्तिमें कारण बनीं | नारद | दक्षने कश्यप आदि
श्रेष्ठ मुनियोंके साथ उनका विवाह किया था; यह सब ज्ृत्तान्त
तो तुम्हें विदित ही है। अब प्रस्तुत विषयकों सुनो | उन
कन्याओंमें एक खधा नामकी कन्या थी, जिसका विवाह
उन्होंने पितरोंके साथ किया | खधाकी तीन पृतन्रियाँ थीं, जो
सीमाग्यद्ञालिनी तथा धर्मकी मूर्ति थीं। उनमेंसे ज्येष्ठ पुत्नीका
नाम ध्मेना? था । मेंझली ५्धन्या?के नामसे प्रसिद्ध थी और
सबसे छोटी कनन््याका नाम “कलावती” था । ये सारी कन्याएँ:
पितरोंकी मानसी पुत्रियाँ थीं--डनके मनसे प्रकट हुई थीं |
इनका जन्म किसी माताके गर्भसे नहीं हुआ था; अतएव ये
अयोनिजा थीं। केबल लोकव्यवहारसे स्वधाकी प॒त्री मानी जाती
थीं | इनके सुन्दर नामेंका कीर्तन करके मनुप्य सम्पूर्ण
अमीश्को प्राप्त कर लेता दे | ये सदा सम्पूर्ण जगतकी
वनन््दनीया लोकमाताएँ हैं ओर उत्तम अम्युदवसे मुग्योमित
हदसंदिता | _# जसा देवीका दिव्यरूपसे देवताओंको द्शन देना # १६९,
न ननननननीनाननननपननाननननन नमन नमननननननल लिख खश्वखखिखिचच थच्शखाखख्ु्ू्््िल्््ख्खि्य़्ंियथ़़टय्य्थ्खच्च्थथियथ्थच्चच्च्थप्प्ा
हुआ । मेरी सारी भूमि धन्य हुईं । मेरा कुल घन्य हुआ ।
मेरी त्री तथा मेरा सब कुछ धन्य हो गया; इसमें संशय नहीं
है; क्योंकि आप सब महान् देवता एक साथ मिलकर एक ही
समय यहाँ पघारे हैं । मुझे अपना सेवक समझ्षकर प्रसन्नता-
पूर्वक उचित कार्यके लिये आज्ञा दें |
.... हिमगिरिका यह वचन सुनकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न
' हुए. ओर अपने कार्यकी सिद्धि मानते हुए बोले ।
देवताओने कद्दा--मसहामाश हिसाचछ _]) हमारा
तकारक वचन सुनो | हम सब लोग जिस कामके लिये यहाँ
ये हैं, उसे प्रसन्नतापूषक बता रहे हैं । गिरिराज | पहले
। जगदम्बा उम्रा दक्षकन्या सतीके रूपमें प्रकट हुईं थीं
पर रुद्रपली होकर सुदी्षकालतक इस भूतलपर क्रीडा करती
ऐै) वे ही अम्बिका सती अपने पितासे अनादर पाकर अपनी
तिशाका स्मरण करके यज्ञर्में शरीर त्याग अपने परम घामको
पार गयीं । हिमगिरे | वह कथा छोकमें विख्यात है ओर
हैं मी विदित है। यदि वे सती पुनः ठुम्हारे घरमें प्रकट
। जायें तो देवताओंका महान लाभ हो सकता है।
ब्रह्माजी कहते हैँ--श्रीविष्णु आदि देवताओंकी यह
ते सुनकर गिरिराज हिमालय मन-द्वी-मन प्रसन्न हो आदरसे
के गये और बोले--“प्रभो | ऐसा हो तो बड़े सौभाग्यकी बात
[? तदनन्तर वे देवता उन्हें बड़े आदरसे उमाको प्रसन्न करनेकी
थि बताकर सखय॑ सदाशिव-पत्नी उमाकी शरणमें गये । एक
न्दर स्थानमें स्थित हो समस्त देवताओंने जगदम्बाका स्मरण
या और बारंबार प्रणाम करके वे वहाँ श्रद्धापू्वंक उनकी
तुति करने लगे | ।
देवता चोले--शिवलोकमें निवास करनेवाली देवि [
मे | जगदम्बे | सदाशिवप्रिये | दुर्गे | सहेश्वरि | हम
ग्पकोी नमस्कार करते हैं | आप पावन शान्तस्वरूप श्रीशक्ति
» परमपावन पुष्टि हूँ । अव्यक्त प्रकृति ओर महत्तत्त--ये
पके हे रूप हैं | हम भक्तिपूर्वक आपको नमस्कार करते हैं |
आप कल्याणमयी शिवा हैं। आपके हाथ भी कल्याणकारी हैं ।
आप शुद्ध) स्थूछ, सूक्ष्म ओर सबका परम आश्रय हैं।
अन्तर्विद्या ओर सुविद्यासे अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली आप
देवीको हम प्रणाम करते हैं । आप श्रद्धा हैं। आप धृति हैं ।
आप श्री हैं और आप ही सबमें व्यात रनेवाली देवी हैं |
आप ही सूर्यकी किरणें हैं और आप ही अपने प्रपश्चको
प्रकाशित करनेवाली हैं । ब्रह्माण्डल्प शरीरमें और जगतके
जीवोंमें रहकर जो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्की
पुष्टि करती हैं, उन आदिदेवीको हम नमस्कार करते हैं |
आप ही वेदमाता गायत्री हैं; आप ही साविन्नी ओर सरखती
हैं । आंप ही सम्पूर्ण जगत्के लिये वार्ता नामक चृत्ति हैं और
आप ही घर्मस्वरूपा वेदतयी हैं | आप ही सम्पूर्ण भूतोंमें निद्रा
बनकर रहती हैं। उनकी क्षुधा ओर तृप्ति भी आप ही हैं।
आप ही तृष्णा। कान्ति; छवि) तुष्टि ओर सदा सम्पूर्ण
आनन्दको देनेवाली हैं | आप ही परुण्यकर्ताओंके यहाँ लक्ष्मी
बनकर रहती हैं और आप ही पापियोंके घर सदा च्येष्ठा
( लक्ष्मीकी बड़ी बहन दरिद्रता ) के रूपमें वास करती हैं ।
आप ही सम्पूर्ण जगत्की शान्ति हैँ | आप ही घारण करनेवाली
धात्री एवं प्राणोंका पोषण करनेवाली शक्ति हैं | आप ही पॉँचों
भूतोंके सारतत््वको प्रकट करनेवाली तत्त्वखरूपा हैं | आप ही
नीतिशोकी नीति तथा व्यवसायरूपिणी हैं | आप दह्वी सामवेदकी
गीति हैं | आप ही ग्रन्थि हैं। आप ही यजुमेन्त्रोंकी आहुति
हैं। ऋग्वेदकी मात्रा तथा अथववेदकी परम गति भी आप दी
हैं। जो प्राणियोंक्रे नाक। कान; नेत्र; मुख) भुजा3 वक्ष/स्थल
ओर हृुदयमें घूतिरूपसे स्थित हो सदा ही उनके लिये सुखका
विस्तार करती हैं; जो निद्राके रूपमें संसारके लोगोंको अत्यन्त
सुभग प्रतीत होती हैं; वे देवी उसा जगतकी ख्िति एवं
पालनके लिये हम सबपर प्रसन्न हों |
इस प्रकार जगजननी सती-साध्वी महेश्वरी उमाकी स्तुति
करके अपने हृदयमें विश्वुद्ध प्रेम लिये वे सब देवता उनके
दर्शनकी इच्छासे वहाँ खड़े हो गये | ( अध्याय ३ )
224 ८--->
; उमा देवीका दिव्यरूपसे देवताओंको दर्शन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिप्राय निवेदन
|. फरना ओर देवीका अबतार लेनेकी बात खीकार करके देवताओंको आश्वासन देना
. दाजी कहते हँ--नारद ! देवताओंके इस प्रकार
// ० नर दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली जगजननी देवी
रा! 7 पक सामने पक्ष प्रच्यट द&:
; ॥ उनके खमने प्रद् हुईं। दे परम अद्भुत दिव्य रलमय
4... शि« पृ० आँ० २२---
रथपर बेंठी हुई थीं। उस श्रेष्ठ रथमें बुँबुरू छंगे हुए थे और
मुलायम बिस्तर बिछे थे | उनके ओविग्रहका एक-एक अद्ग
करोड़ो सूचोतते मी अधिक प्रकाद्ममान और रमणीय था | ऐसे
मिलन 3 इलआशुकाइभयकभाइकम इंजन मीककमकम्कामय कम कब कपाकाक्रकमइभहीमनक मान ॥ न वामा कहर कवका काका करवा कभारक भा भक्रप् थकान आर करम कम कम पकवान हा इमाम कम॥ ० कमका कप भ कम पयगक्रगगाफयफ कम क मकर कक इमाम कभ कम कम कम कक कक कम लए“ पाया जम
अनगनन- जलननीय रमन नन न ५ रतन"
रहती हैं। सब-की-सब परम योगिनी शाननित्रि तथा तीनों
लोकोंमें सर्बत्च जा सकनेवाली हैँ | मुनीश्षर | एक समय वे
तीनों बहिने भगवान विण्णुके निबासस्थान श्वेतद्वीपर्म उनका
दर्शन करनेके लिये गग्मीं। मगवान् बिष्णुक्ो प्रणाम ओर
भक्तिपूर्वक्क उनकी स्वुति करके वे उन्हींकी आज्ञसे वहाँ ठहर
गयीं । उस समय बहाँ संतोंका बड़ा भारी समाज एकत्र
हुआ था ।
मुने | उसी अबसरपर मेरे पुत्र सनकादि सिद्धगण भी
बहाँ गये और श्रीहरिकी स्त॒ुति-बन्दना करके उन्हींकी आज्ञासे
वहाँ ठहर गये । सनकादि मुनि देवताओंके आदिपुरुष और
सम्पूर्ण छोकमें वन्दित हैं| वे जब वहाँ आकर खड़े हुए,
उस समय इ्वेतद्वीपके सब छोग उन्हें देख प्रणाम करते हुए
उठकर खड़े हो गये । परंतु ये तीनों बहिने उन्हें देखकर भी
वहाँ नहीं उठों | इससे सनत्कुमारने उनको ( मर्यादा-रक्षा्थ )
उन्हें स्वर्गसे दूर होकर नर-त्री वननेका शाप दे दिया | फिर
उसके प्राथना करनेपर वे प्रसन्न हो गये ओर बोले ।
सनत्कुमारने कहा--पितरोंकी तीनों कन्याओ ! तुम
प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनो | यह तुम्हारे शोकका नाश
करनेवाली और सदा ही तुर्म्हं सुख देनेवाली है । तुममेंसे जो
ज्येष्ठ है; वह भगवान विप्णुके अंशभूत हिमालय गिरिकी पत्नी
हो | उससे जो कन्या होगी। वह “पावती”के नामसे विख्यात
होगी । पितरोंकी दूसरी प्रिय कन्या; योगिनी धन्या राजा जनक-
की पक्षी होगी | उसकी कनन््याके रूपमें महालक्ष्मी अवतीण
होगी; जिनका नाम “सीता? होगा । इसी प्रकार पितरोंकी छोटी
॥£ नमो रुद्भाय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराण;
#७७७७॥७७एरनाणणनाणणमणाणााशाणभााऋम ताक इक शो अल कु
पुत्री कलावती द्वापरफे अन्तिम भागम बृपभानु बेश्यी फ़
देगी ओर उमकी प्रिय्र पुत्री प्राधा? के नामसे विख्यात होगे।
योगिनी मेनका (मेना) पावतीजीके बरदानसे अपने पतिके साथ कई
दारीस्से केठास नामक परमपदको प्राप्त हो जायगी | बन
तथा उनके पति; जनककुलमं उत्पन्न हुए जीवम्पुक्त मदगरे|
राजा सीरध्बज) लश्ष्मीम्वरुपा सीताके प्रभावसे बेकृष्ट धाम
जायगे | ब्रपभान॒ुके साथ वबाहिक मड्लकृत्य समतन्र होने
कारण जीवन्मुक्त योगिनी कलाबती भी अपनी इब
राधाके साथ गोलोक धाममे जायगी--इसमें संशय नहीं हे।
विपत्तिम पड़े त्िना कहाँ क्रिंनक्ी महिमा प्रकट होती है | उत्त |
कर्म करनेवाले पुण्यात्मा पुरुषोंका संकट जब टल जाता है के
उन्हें दुर्लभ सुखकी प्राप्ति होती है। अब तुमलोग प्रमक्
पूत्रंक मेरी दूसरी बात भी सुनो, जो सदा मुख देनेवा्ी |
मेनाकी पुत्री जगदम्बा पावंती देवी अत्यन्त दुस््सह ताक
भगवान शिबकी प्रिय पत्नी बनेगी | धन्याकी पुत्री गे
भगवान श्रीरामजीकी पत्नी होंगी ओर लोकाचारका आशय
श्रीरामके साथ विहार करेंगी | साक्षात् गोलोकघाम्म वि!
करनेवाली राधा ही कलावतीकी पुत्री होंगी। वे गुप्त लेएे
बंधकर श्रीकृष्णकी प्रियतमा बनेंगी ।
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! इस प्रकार शापक्रे बारे
दुलभ वरदान देकर सबके द्वारा प्रशंसित भगवान् सबक
मुनि भाइयोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये। तात ! गिर्फ!
मानसी पुत्री वे तीनों बहिनें इस प्रकार झ्यापमुक्त हो हु
पाकर तुरंत अपने घरको चली गयीं।.. ( अध्याव १-९)
-->*डझ8:0९०.-......0.
देवताओंकां हिमालयके पास जाना और उनसे सत्कृत हो उन्हें उमाराधनकी विधि वता
खयय भी एक सुन्दर सख्थानमें जाकर उनकी स्तुति करना
नारदजी वोले--महामते | आपने मेनाके पूर्वजन्मकी
यह धुभ एवं अद्भुत कथा कही है। उनके विवाहका प्रसद्भ
भी मैंने सुन लिया । अब आगेके उत्तम चरित्रका वर्णन
कीजिये |
ब्रह्माजीने कहा--नारद ! जब मेनाके साथ विवाह
करके हिमवान् अपने घरकी गये; तब तीनों लोकोंमें बड़ा भारी
उत्सव मनाया गया । हिमालय भी अलबम्त प्रसन्न हो मेनाके
साथ अपने सुखदायक सदनमें निवास करने छगे। मुने |
उस समय श्रीविष्णु आदि समस्त देवता और महात्मा मुनि
«पास गये | उन सब देवताओंको आया देख महान
हिमगिरिने प्रशंसापूर्वक उन्हें प्रणाम किया ओर अपने भाव
सराहना करते हुए भक्तिमावसे उन सबका आदत
किया । हाथ जोड़ मस्तक झुक्राकर वे बड़े प्रेमसे स्व॒ति के
को उद्यत हुए | शैल्राजके शरीरमें महान् रोमाश्र हो अं!
उनके नेन्रोंसे प्रेकेक आँसू बहने छगे । मुने ! हिमगीरी
प्रसन्न मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और
खड़े हो श्रीविष्णु आदि देवताओंसे कहा |
हिमाचल बोले--आज मेरा जन्म सफल हो गा! गे
बड़ी भारी तपस्या सफल हुईं । आज मेरा ज्ञान तफह हुई
ओर आज मेरी सारी क्रियाएँ सफल हो गयीं। भर्ज ५
रुद्रसंदिता ]
_# उस्मा देवीका दिव्यरूपले देवताओंको दशन देना *
१९९,
नील लशन आज ाआाु व च व ्ख्च्य्य्थ्थ्य्थिय्य्थ्च्थ्य्चिचिथथाखख्ख्थथच्च्थ्चथ्प्क्ल्ि
हुआ । मेरी सारी भूमि धन्य हुई | मेरा कुछ धन्य हुआ ।
मेरी स्ली तथा मेरा सब कुछ धन्य हो गया; इसमें संशय नहीं
है; क्योंकि आप सब महान् देवता एक साथ मिलकर एक ही
समय यहाँ पघारे हैं । मुझे अपना सेवक समझकर प्रसन्नता-
पूर्वक उचित कार्यके लिये आज्ञा दें ।
“'. हिसगिरिका यह वचन सुनकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न
* जए, और अपने कार्यकी सिद्धि मानते हुए बोले ।
देवताअतरे कहा-महाप्राश हिमाचछ | हमारा
हेतकारक वचन सुनो । हम सब लोग जिस कामके लिये यहाँ
आये हैं, उसे प्रसन्नतापू्वक बता रहे हैं | गिरिराज | पहले
जो जगदम्बा उमा दक्षकन्या सतीके रूपमें प्रकट हुईं थीं
भोर रद्रपत्ली होकर सुदीर्घकालतक इस भूतलपर क्रीडा करती
हीं, वे ही अम्बिका सती अपने पितासे अनादर पाकर अपनी
प्रतिशाका स्मरण करके यज्ञम्में शरीर त्याग अपने परम धामको
धार गयीं | हिमगिरे | वह कथा छोकमें विख्यात है ओर
ग्हें भी विदित है । यदि वे सती पुनः तुम्हारे घरमें प्रकट
हे जायें तो देवताओंका महान लाम हो सकता है|
, . श्रह्माजी कहते हैँ--शीविष्णु आदि देवताओंकी यह
घात सुनकर गिरिराज हिंमाल्य मन-दही-मन प्रसन्न हो आदरसे
हक गये और बोले--धप्रमो ! ऐसा हो तो बड़े सोमाग्यकी बात
१ । तदनन्तर वे देवता उन्हें बड़े आदरसे उमाको प्रसन्न करनेकी
'वैधि बताकर खयं सदाश्िव-पत्नी उमाकी शरणमें गये | एक
'पुन्द्र स्थान स्थित हो समस्त देवताओंने जगदम्बाका स्मरण
कया ओर बारंबार प्रणाम करके वे वहाँ श्रद्धापूवंक उनकी
“तुति करने लगे । ४
देवता वोले--शिवलोकमें निवास करनेवाली देवि !
(मे | जगदम्त्रे | सदाशिवप्रिये | दुर्गे ! महेशखरि | हम
गपको नमस्कार करते हैं | आप पावन शान्तस्वरूप श्रीशक्ति
रस्मपावन पुष्टि हैँ। अव्यक्त प्रति ओर महत्तत्त--ये
के हो रूप हैं | हम भक्तिपूर्वक आपको नमस्कार करते हैं ।
आप कल्याणमयी शिवा हैं। आपके हाथ भी कल्याणकारी हैं ।
आप शुद्ध, स्थूछ, सूक्ष्म और सबका परम आश्रय हैं।
अन्तर्विद्या ओर सुविद्यासे अत्यन्त प्रसन्न रनेवाली आप
देवीको हम प्रणाम करते हैं | आप श्रद्धा हैं। आप छृति हूँ ।
आप श्री हैं ओर आप ही सबमें व्याप्त रनेवाली देवी हैं ।
आप ही सूयंकी किरणें हैं ओर आप ही अपने प्रपश्चको
प्रकाशित करनेवाली हैं | ब्ह्माण्डहप शरीरमें और जगतके
जीवोमें रहकर जो बह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूण जगत्की
पुष्टि करती हैं, उन आदिदेवीकों हम नमस्कार करते हैं ।
आप ही वेदमाता गायत्री हैं; आप द्वी सावित्री ओर सरखती
हैं | आप ही सम्पूर्ण जगत्के लिये वार्ता नामक इत्ति हैं और
आप ही घम्स्वरूपा वेदतयी हैं | आप ही सम्ूणे भूतोंमें निद्रा
बनकर रहती हैं। उनकी क्षुधा ओर तृप्ति भी आप ही हैं।
आप ही तृष्णा। कान्ति; छवि तुष्टि और सदा सम्पूर्ण
आनन्दको देनेवाली हैं | आप ही पुण्यकर्तोओंके यहाँ लक्ष्मी
बनकर रहती हैं और आप ही पापियेंके घर सद्दा न्येष्ठा
( लक्ष्मीकी बड़ी बहिन दरखिता ) के रूपमें वास करती हैं ।
आप ही सम्पूर्ण जगत्की शान्ति हैं | आप ही घारण करनेवाली
धात्री एवं प्राणोका पोषण करनेवाली शक्ति हैं । आप ही पाँचो
भूतोंके सारतत्त्वकोी प्रकट करनेवाली तत्वखरूपा हैं | आप ही
नीतिशेकी नीति तथा व्यवसायरूपिणी हैं | आप ही सामवेदकी
गीति हैं | आप ही ग्रन्थि हैं | आप ही यज़ुर्मन्त्रोंकी आहुति
हैं। ऋग्वेदकी मात्रा तथा अथववेदकी परम गति भी आप दी
हैं। जो प्राणियोंके नाक) कान) नेत्र) मुख) भुजा; वक्षःस्थलू
ओर द्ृदयमें ध्ृतिरूपसे स्थित हो सदा ही उनके लिये सुखका
विस्तार करती हैं; जो निद्राके रूपमें संसारके लोगोको अत्यन्त
सुभग प्रतीत होती हैं, वे देवी उमा जगतकी खिति एवं
पालनके लिये हम सबपर प्रसन्न हों |
इस प्रकार जगजननी सती-साध्यी महेश्वरी उमाकी स्तुति
करके अपने ह्ृदयमें विश्व॒ुद्ध प्रेम लिये वे सब देवता उनके
दर्शनकी इच्छासे वहाँ खड़े हो गये । ( अध्याव ३ )
न्न्ल्च्स्य्श्ण्स्स्ट्ि+
उग्मा देवीका
दिव्यरूपसे देवताओंको दशेन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिग्नाय निवेदन
करना ओर देवीका अवतार लेनेकी वात खीकार करके देवताओंको आश्वासन देना
प्रह्मजी कहते हँ--नारद ! देवताओंके इस प्रकार
फरनेपर दुर्गम पीड़ाका नाझ्ष करनेवाली जगजननी देवी
* उमऊे ना ऊब्य मीट हुए | वे परम अछ् दिव्य रलगव
शि० पु० झं० २२--
रथपर बेठी हुईं थीं। उस श्रेष्ठ रथमें ुघुरू छगे हुए थे और
मुलायम वित्तर बिछे थे | उनके श्रीविग्रहका एक-एक अड
करोड़ों सूयोसे भी अधिक प्रकाशमान ओर स्मणीय था । ऐसे
॥£ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने
3-३७. सपा... -रम+ अम्मा. सु७.आक-#१-ा-नड3-+पहमय--ग४०३३ "हीना. रिकमपक ने कक “कला -पककरटननम-मर-रय-परन...सवामा2--सी780.. 3० परसधक0. परकम+--+पज.. 0. परयारेतपनाथमाक-- परपक-न-+ज0परपकमरफ$५--<लसा. फपिना+ववकण..
| संक्षिप्त-शिवपुराण;
अवयबौसे वे अत्यन्त उद्धासित द्वो रही थीं। सब ओर फेली सुनें | पहले आप दछ्षकी पुन्नीर्पसे अवतीर्ण हो छोस़ो
हुई अपनी तेजोराशिके मध्यमागमें वे विराजमान थीं | उनका. रुद्रदेवकी वल्लभा हुई थीं | उस समय आपने तद्याजीके ता
न पा दूसरे देवताओंके महान् दुःखका निवारण क्रिया था|
तदनन्तर पितासे अनादर पाकर अपनी की हुई प्रति
अनुसार आपने दारीरकों त्याग दिया और खथाममें पढ्
आयी । इससे भगवान् हरकी भी बड़ा दुःख हुआ।
महेश्वरि | आपके चले आनेसे देवताओंका कार्य पृ #ू
रे अर
है | हे
रूप बहुत ही सुन्दर था और उनकी छबिकी कहीं तुलना नहीं
थी | सदाशिवके साथ विलास करनेवाली उन महामायाको
किसीके साथ समानता नहीं थी । शिवलोकमें निवास करने
वाली वे देवी त्रिविध चिन्मय गुणोसे युक्त थीं। प्राकृत गुणोका
अभाव होनेसे उन्हें निर्गणा कद्य जाता है। वे नित्यर्पा हैं |
वे दुष्टपर प्रचण्ड कोप करनेके कारण चण्डी कहलाती हैं,
परंतु स्वरूपसे शिवा ( कल्याणमयी ) हैं । सबकी सम्पूर्ण
पीडाओंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्की माता हैं ।
वे ही प्रलयकालमें महानिद्रा होकर सबको अपने अडूमें सुला
लेती हैं तथा वे समस्त खजनों ( भरक्तों ) का संसार-सागरसे
उद्धार कर देती हैं | शिवा देवीकी तेजोराशिके प्रभावसे देवता
उन्हें अच्छी तरह देख न सके। तब उनके दर्शनकी अभिलाषा-
से देवताओंने फिर उनका स्तवन किया । तदनन्तर दर्शनकी
इच्छा रखनेवाले विष्णु आदि सब देवता उन जगदम्बाकी
कृपा पाकर वहाँ उनका सुस्पष्ट दर्शन कर सके ।
इसके वाद देवता वोले--अम्बिके ! महादेवि |
हम सदा आपके दास हं | आप प्रसन्नतापूर्वक हमारा निवेदन
हुआ । अतः हम देवता ओर मुनि व्याकुछ होकर «
शरणमें आये हैं | महदेशानि ! शिवे | आप देवता
मनोरथ पूर्ण करें? जिससे सनत्कुमारका वचन सपछ
देवि | आप भूतछपर अवतीण हो पुनः रुद्रदेवकी
होइये ओर यथायोग्य ऐसी लीला कीजिये; जिससे देव!
को सुख प्रास हो । देवि ! इससे वेलास पदतपर €
करनेवाले रुद्रदेव भी सुखी होंगे । आप ऐसी इपा
जिससे सब सुखी हों ओर सब्रका सारा दुःख नष्ट हो ज
त्रह्माजी कहते हँ--नारद ! ऐसा कहकर
आदि सब देवता प्रेममें मग्न हो गये ओर +
विनम्र होकर चुपचाप खड़े रहे । देवताओंकी यह
सुनकर शिवादेवीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई | उसके |
विचार करके अपने प्रश्न शिवका स्मरण करती हुई
व॒त्सछा दयामयी उमादेवी उस समय विष्णु आदि देव
की सम्बोधित करके हँसकर बोलीं ।
उमाने कहा--हे हरे ! हे विधे ! ओर हे के!
तथा मुनियो | ठुम सब लोग अपने मनसे शूट ति
दो और मेरी बात सुनो | मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। हमे
नहीं है | सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओं ओर वि
सुखी रहो | में अवतार ले मेनाकी पुत्री होकर उन
दूँगी और रुद्रदेवकी पत्नी हो जाऊँगी । यह मेरा
गुप्त मत है । भगवान् शिवकी लीला अद्भुत है | वह
को भी मोहमें डालनेवाली है । देवताओ | उस वर
पिताके द्वारा अपने खामीका अनादर देख
दक्षजनित शरीरकी त्याग दिया है; तमीसे वे में
काल्गग्नि रुद्रदेव तत्काल दिगम्बर हो गये ।
चिन्तामें हृवे रहते हैं | उनके मनमें यह वि,
करता है कि घर्मकी जाननेवाली सती मेरा रेप
पिताके यश्ञमें गयी और वहाँ मेरा अनादर देख महा
होनेके कारण उसने अपना शरीर त्याग दिया | है «
वे घर-बार छोड़ अलौकिक वेष घारण करके योगी ॥
मेरी खरूपभूता सतीके वियोगकी वे महेश्वर तह
; रुद्नसंहिता ] # मेनाको भत्यक्ष दृशन देकर शिवा देवीका उन्हें चरदादले संतुष्ट करना हः १७१
| सके | देवताओं | मगवान् रुद्रकी भी यह अत्यन्त इच्छा. ब्ह्माजी कहते हैं--नारद ! ऐसा कहकर जगदम्बा
ह है कि भूतलपर मेना ओर हिमाचलके घरमें मेरा अवतार शिवा उस समय समस्त देवताओंके देखते-देखते ही अदृश्य
£ हो; क्योंकि वे पुनः मेरा पाणिग्रहण करनेकी अधिक अभिलछाषा हो गयीं ओर तुरंत अपने लछोकमें चली गयीं | तदनन्तर ह्षसे
|| रखते है| अतः मैं रुद्रदेवके संतोषके लिये अवतार रूँगी भरे हुए विष्णु आदि समस्त देवता और मुनि उस दिशा-
हू ओर लोकिक गतिका आश्रय लेकर हिमालय-पत्नी मेनाकी को प्रणाम करके अपने-अपने धाममें चले गये |
४ पुत्री होंगी । ( अध्याय ४ )
डा 5जच>पट2००६ लॉ
मेनाको प्रत्यक्ष दशन देकर शिवा देवीका उन्हें अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना
तथा मेनासे मेनाकका जन्म
नारदजीने पूछा--पिताजी | जब देवी दुर्गा अन्तर्घान हट *श न्
हो गयीं और देवगण अपने-अपने घामको चले गये, उसके हर ।
बाद क्या हुआ ! -
प्रह्माजीने कहा--मेरे पृत्रोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारद !
जब विष्णु आदि देवसमुदाय हिमाछ्य और मेनाको देवीकी
भआाराधनाका उपदेश दे चले गये, तब गिरिराज हिमाचल
और मेना दोनों दम्पतिने बड़ी मारी तपस्या आरम्म की।
वे दिन-रत शम्परु ओर शिवाका चिन्तन करते हुए भक्ति-
युक्त चित्तते नित्य उनकी सम्यक् रीतिसे आराधना करने
लगे । हिमवानकी पत्नी मेना बड़ी प्रसन्नतासे शिवसहित
शिवा देवीकी पूजा करने लगीं । वे उन्हींके संतोषके लिये
पदा ब्राक्षणोंकी दान देती रहती थीं | मनमें संतानकी
| फीमना ले भेना चेत्रमासके आरम्भसे लेकर सत्ताईस वर्षों-
/ पक प्रतिदिन तत्परतापूर्वक शिवा देवीकी पूजा और आराघना-
[में लगी रहीं | वे अष्टमीको उपवास करके नवमीकों लड़;
/ बडि-सामग्री, पीठी; खीर और गन्ध-पुष्प आदि देवीको भेंट
्<
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“५” > हि (डक रे
०-2 ऋकइ “87 ५0 कि
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गड़ाके पप्िप्रस्यमें का किक 22 ;
; री थीं। गद्नके किनारे ओ उम्राकी मिद्लीकी हक किल्लत के सिविल ट्रक पट 532 १:
; मृति बनाकर हुँ महक 2222 %**%
; र नाना प्रकारकी वस्तुएँ समर्पित करके उसकी पूजा कक
| $सती थीं। मेना देवी कभी निराह्यर रहतों) कभी अतके नियमों - 9 ० हर
: हे पोलिन करतीं, कभी जल पीकर रहती और कभी हवा पीकर... /....
॥ ही रट जाती वर कं थीं | विशुद्ध तेजसे दमकती हुई दीप्तिमती देवीने कहा--गिरिराज हिमाल्यकी रानी महासाध्ची
| ० । शिवामें चित्त लगाये सत्ताईस वर्ष व्यतीत म्ेना | मैं तुम्दारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्दारे मनमें
| पाइस वर्धे पूरे होनेपर जगन्मयो शंकरकामिनी जो अमिलाषा हो) उसे कहो । मेना | ठुमने तपस्या, अत
& शगदम्वा के
हलक शे के कल हुईं । मेनाकी उत्तम भक्तिसे और समाघिके द्वारा जिस-जिस बस्तुके लिये प्रार्यना की है,
उनके सामने प्रकट हु उनपर अनुमह करनेके छिये (हू सब मैं तुम्हें दूँगी। तब मेनाने प्रत्यक्ष प्रकट हुई काल्का
£' तथा “ ईई। तेजोमण्डलके बीचमें विराजमान देवीकी देखकर प्रणाम किया ओर इस प्रकार कहा |
ं भेनासे पर अवयवोंसे संयुक्त उमादेवी प्रत्यक्ष दर्शन दे | रा
न सि एसती हुई बोलीं | मेता वाली--देवि | इस समय मुझे आपके रुपका
प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है ) अतः में आपकी स्व॒ति करना
चाहती हूँ | कालिके | इसके लिये आप प्रसन्न हों।
ब्रह्माजी कहते है--मारद ! मेनाके ऐसा कहनेपर
सर्वमोहिनी कालिकादेवीने मनमें अत्यन्त प्रसन्ञ हो अपनी
दोनों बाहोंसे खींचकर मेनाकी दृदयसे छूगा लिया । इससे
उन्हें तत्काल महाशानकी प्राप्ति हो गयी | फिर तो मेना देवी
प्रिय. वचनोंद्वारा भक्तिभावसे अपने सामने खड़ी हुई
कालिकाकी स्तुति करने लगीं।
मेना बोलीं--जो महामाया जगत्को घारण करनेवाली
चण्डिका3 लोकधारिणी तथा सम्पूर्ण मनोवाज्छित पदार्थोंको
देनेवाली हैँ, उन महादेवीको मैं प्रणाम करती हूँ । जो नित्य
आनन्द प्रदान करनेवाली माया) योगनिद्रा; जगज्जननी तथा
सुन्दर कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, उन नित्यसिद्धा उमा
देवीको में नमस्कार करती हूँ | जो सबकी मातामही) नित्य
आनन््दमयी+ भक्तोंके शोकका नाश करनेवाली तथा कृब्प-
पर्यन्त नारियों एवं प्राणियोंकी बुद्धिरूपिणी हैँ; उन देवीको
मैं प्रणाम करती हूँ । आप यतियोंके अजश्ञानमय बन्धनके नाश-
की देतुभूता ब्रह्मविद्या हैं | फिर मुझ-जेसी नारियाँ आपके
प्रभावका क्या वर्णन कर सकती हैं | अथवंवेदकी जो हिंसा
( मारण आदिका प्रयोग ) है; वह आप ही हैं | देवि | आप
मेरे अमीष्ट फलको .सदा प्रदान कीजिये । भावद्दीन
( आकाररहित ) तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओंसे आप ही
पञ्नभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं| आप ही उनकी
शाश्वत शक्ति हैं। आपका खरूप नित्य है। आप समय-समय-
पर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें प्रकट होती हैँ | आप दी
जगत्की योनि और आधघारशक्ति हैं । आप ही प्रांत
तत्त्वोंसे परे नित्या प्रकृति कही गयी हैं | जिसके द्वारा ब्रह्मके
खरूपको वशमें किया जाता ( जाना जाता ) है; वह नित्या
विद्या आप ही हैं। मात; | आज मुझपर प्रसन्न होइये ।
आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उम्र दाहिका शक्ति हैं। आप
ही सूरय-किरणोंमें स्थित प्रकाशिका शक्ति हैं । चन्द्रमामें जो
आह्वादिका शक्ति है वह भी आप ही हैं | ऐसी आप चण्डी
देवीका मैं स्तवन और बन्दन करती हूँ । आप स्रियोंको बहुत
प्रिय हैं । ऊध्वेरेता ब्रह्मचारियोंकी ध्येयभूता नित्या ब्रह्मशक्ति
भी आप ही हैं | सम्पूर्ण जगत्की वाब्छा तथा श्रीहरिकी माया
भी आप ही हैं| जो देवी इच्छानुसार रूप घारण करके सृष्टि,
.... पालन ओर संहारमयी हो उन कार्योका सम्पादन करती हैं
तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरकी भी हेतुभूता है.) “
आप ही हूँ | देवि | आज आप मुझपर प्रसन्न हैं| आड़े द
पुनः मेरा नमस्कार है |
तच्रह्माजी कद्दते ह--नारद | मेनाके इस प्रकार हु
करनेपर दुर्गा कालिकाने पुनः उन मेना देवीसे कह्-क्
अपना मनोवाश्छित वर माँग लो | हिमाचटप्रिये [क्र .
मुझे प्राणंके समान प्यारी हो | तुम्दारी जो इच्छा हे।
माँगो | उसे में निश्चय ही दे दूँगी। तुम्हारे लिये पे:
भी अदेय नहीं है |?
महेश्वरी उमाका यह अमृतके समान मधुर 4
सुनकर हिमगिरिकामिनी मेना बहुत संतुष्ट हुईं और
प्रकार बोलीं--४शिवे | आपकी जय हो; जब हो। 7
शानवाली महेश्वरि | जगदम्बिके ! यदि में वर पाने"
हूँ तो फिर आपसे श्रेष्ठ वर माँगती हूँ ) जगदम्े | पहे
मुझे सो पुत्र हों । उन सबकी बड़ी आयु हो ।वे बल्यए
से युक्त तथा ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न हों । उन पुत्रेंक़े फ
मेरे एक पुत्री हो) जो स्वरूप और गु्णेसि सुझ्योमित होने!
हो; वह दोनों कुलोंको आनन्द देनेवाली तथा दीनें ढेः
पूजित हो । जगदम्बिके | शिवे | आप दी देवता्भोत्न
सिद्ध करनेके लिये मेरी पुत्री तथा रुद्रदेवकी पत्नी होश
तदनुसार लीला कीजिये |?
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद | मेनकाकी बात
प्रसन्नद्ृनदया देवी उमाने उनके मनोरयको पूर्ण करे ।
मुस्कराकर कहा |
देवी बोलीं--पहले तुम्हें सौ बलवान पुत्र प्राएँ
उनमें भी एक सबसे अधिक बल्वान् और प्रधान होग।
सबसे पहले उत्पन्न होगा | तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट दो मं
तुम्हारे यह्लोँ पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी भोर
क् देवताओंसे सेवित हो उनका कार्य सिद्ध करूँगी |
ऐसा कहकर जगद्भात्री परमेश्वरी कालिक े
मेनकाके देखते-देखते वहीं अदृश्य हो गयीं | वात ! गे
से अमीष्ट वर पाकर मेनकाको भी अपार हर्ष हुआ।#
तपस्याजनित सारा क्लेश नष्ट हों गया । मुने | फिए ४
क्रमसे मेनाके गर्भ रहा और वह प्रतिदिन बहने न्
समयानुसार उसने एक उत्तम पुत्रको उत्तत्र किया! !
नाम मेनाक था । उसने समुद्रके साथ उत्तम मत्री व
वह अद्भुत पर्वत नागबधुओंके उपमोगका खेल बी डे
रुद्रसंहिता | # देवी उस्राका हिममवानके
. है | उसके समख अक्ज श्रेष्ठ हैं | हिमालयके सो पुत्रोमिं वह
सबसे श्रेष्ठ और महान वल-पराक्रमसे सम्पन्न है। अपने-
हृदय तथा मेनाके गर्भम आना #
0... तनमन मन म+ मनन मनन नमन न नमन धन न नननन नव नन नमन नमक“ »++५ न न मम ना १९+व७कम ३ ५५33५५3५+++न+ नमन +क ५५७५५ ५ न ननक कक न कक न कक न 9 रन ०-५ कक स ०५ चमकक चश्वज्यालअ़यटप्य
२७३
से या अपने बाद प्रकट हुएए समस्त पर्व॑तोमिं एकमात्र मैनाक
ही पर्वतराजके पदपर प्रतिष्ठित है । ( अध्याय ५ )
देवी उमाका हिमवानके हृदय तथा सेनाके गर्भसें आना, गर्भस्या देवीका देवताओंद्वारा स्तवन, उनका
दिव्यरुपमें प्रादुभोव, माता मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना
व्रह्माजी कहते ह--नारद |! तदनन्तर मेना. और
हेमाल्य आदरपू्वक देव-कार्यकी सिद्धिके लिये कन्याग्राप्तिके
रैतु वहाँ जगजननी भगवती उमाका चिन्तन करने छगे।
जो प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अमीष्ट वस्तुओंकी देनेवाली है, वे
प्रदेश्वरी उमा अपने पूर्ण अंशसे गिरिराज हिंमवानके चित्तमें
प्रविष्ट हुईं | इससे उनके शरीरमें अपूबे एवं सुन्दर प्रभा
उतर आयी। वे आनन्दमग्न हो अत्यन्त प्रकाशित होने
लगे | उस अद्भुत तेजोशाशिसे सम्पन्न महासना हिमालय
अग्निके समान अधृष्य हो गये थे | तत्मश्चात् सुन्दर कल्याण-
कारी समयमें गिरिराज हिंमाठयने अपनी प्रिया मेनाके
उदरमें शिवाके उस परिपूणे अंशका आधान किया | इस
तरह गिरिराजकी पत्नी मेनाने हिमवानके हृदयमें विराजमान
करुणानिधान देवीकी कृपासे सुखदायक गभे घारण किया ।
उम्पूण जगतूकी निवासभूता देवीके गर्भ आनेसे गिरिप्रिया
भेना सदा तेजोमण्डलके बीचमें स्थित होकर अधिक शोभा
पाने छगीं। अपनी प्रिया शुभाड़ी मेनाकी देखकर गिरिराज
ट्िमवान् बढ़ी प्रसत्ताका अनुभव करने छगे । गर्भमें
जगदम्बाके आ जानेसे वे महान तेजसे सम्पन्न हो गयी थीं ।
पुने | उस अवसरमें विष्णु आदि देवता ओर सुनियोंने वहाँ
आकर गर्भ निवास करनेवाली शिवादेवीकी स्तुति की और
तदनन्तर महदेश्वरीकी नाना प्रकारसे स्तुति करके प्रसन्नचित्त हुए
वे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये । जब नवाँ
महीना वीत गया और दसवाँ भी पूरा हो चला; त्तव जगदम्बा
फालिकाने समय पूर्ण होनेपर गर्भस्थ शिश्षुकी जो गति होती
है, उसीको धारण किया अर्थात् जन्म ले लिया | उस अवसर-
पर भाद्याशक्ति सती-साध्वी शिवा पहले मेनाके सामने अपने
ऐ रुपसे प्रकट हुईं | वसनन््त घऋतुमें चेत्र मासकी नवमी
तिधिकी मगशिरा नक्षत्रमें आधी रातके समय चन्द्रमण्डलसे
आवाशगड़ाकी भाँति मेनकाके उदरसे देवी शिवाक्ता अपने
0 खरूपमें प्रादुभोव॑ हुआ | उस समय सम्पूर्ण संसारमें
भत्ता छा गयी | अनुकूल हवा चलने लगी, जो सुन्दर,
सुर्णन्पत एवं गम्भीर थी। उस समय जल्दी दर्पाके साथ
फूलोंकी वृष्टि हुईं | विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये |
सबने सुखी होकर प्रसन्नताके साथ जगदम्बाके दर्शन किये
और शिवलोकर्मे निवास करनेवाली दिव्यरूपा महामाया
शिवकामिनी मड्गल्मयी कालिका माताका स्तवन किया |
नारद | जब देवतालछोग स्तुत्ति करके चले गये, त्तब
मेनका उस समय प्रकट हुई नीछ कमछ-दलके समान कान्ति-
वाली श्यामवर्णा देवीको देखकर अतिशय आनन्दका अनुभव
करने लगीं | देवीके उस दिव्य रूपका दर्शन करके गिरिप्रिया
मेनाको ज्ञान प्राप्त हो गया । वे उन्हें परमेश्वरी समझकर
अत्यन्त इर्षते उछसित हो उठीं और संतोषपूर्वक बोलीं | .
मेनाने कहा--जगदम्बे | महेश्वरि | आपने बड़ी
कृपा की; जो मेरे सामने प्रकट हुईं | अम्बिके | आपकी
बड़ी शोमा हो रही है। शिवे | आप सम्पूण शक्तियोंमें
आधद्ाशक्ति तथा वीनों लोकोंकी जननी हैं | देवि |! आप
भगवान् शिवको सदा ही प्रिय हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंसे
प्रशंसित पराशक्ति हैं | मद्देश्वरे | आप कृपा करें और इसी
रूपसे मेरे ध्यानमें स्थित हो जायें। साथ ही मेरी पुत्रीके
अनुरूप प्रत्यक्ष दशनीय रूप घारण करें |
चरह्माजी कहते हँ--नारद | पर्व॑त-पत्नी मेनाकी यह
बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं शिवादेवीने उन गिरिप्रियाको
इस प्रकार उत्तर दिया |
देवी वोलीं--मेना ! तुमने पहले तत्परतापूर्वक मेरी
वड़ी सेवा की थी | उस समय तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हो में
वर देनेके लिये तुम्हारे निकट आयी | “वर माँगो? मेरी इस
- घाणीकी सुनकर तुमने जो वर माँगा, वह इस प्रकार है--
'महादेवि ! आप मेरी पुत्री हो जायें ओर देवताओंका हित
साधन करें !? तब मैंने प्तथास्तुः कहकर तुम्हें सादर यह
वर दे दिया और में अपने घामकझी चली गयी । गिरिक्रामिनि !
उस वरके अनुसार समय पाकर आज मैं तुम्दारी पुत्री हुईं
हूँ | आज मैंने जो दिव्यल्पका दद्न कराया है; इसका उद्देश्य
इतना ही है कि ठुर्म्ह मेरे सलूपका स्मरण हो जाव; अन्यथा
मनुप्यरूपमें प्रकद द्वोनेपर मेरे द्रिपयमें तुम अनजान दी
१७४
बनी रहतीं । अब तुम दोनों दम्पति पुत्रीमावसे अथवा
दिव्य-भावसे मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मुझमें स्नेह
रक्खो । इससे तुम्हे मेरी उत्तम गति प्राप्त होगी | मैं प्रथ्वीपर
अद्भुत लीला करके देवताओंका कार्य सिद्ध करूँगी। भगवान्. रुपमें परिवर्तित हो गर्यी |
४ नमो रुद्राय शाम्ताय प्रह्मणे परमात्मने #
लि ला
[ संक्षिप्त-शिवपुणाणह
का
दम्भुकी पत्नी होऊँगी ओर सजनोंका संकट्से उद्धार कहँी।
ऐसा कहकर जगन्माता शिवा चुप हो गयीं और 34
क्षण माताके देखते-देखते प्रसन्नतापूषंक नवजात पे
( अथाव ६]
है “++++-+<2)4+8४--4+-+-
पाबेतीका नामकरण ओर विद्याध्ययन, नारदका हिमवानके यहाँ जाना, पावतीका हाथ देखकर
भावी फल घताना, चिन्तित हुए हिमबानकों आश्वासन दे पार्वतीका विवाह शिवजीके
साथ करनेको कहना ओर उनके संदेहका निवारण करना
न्रह्माजी कहते है--नारद ! मेनाके सामने महा-
तेजसिनी कन्या होकर लोकिक गतिका आश्रय ले वह रोने
लगी | उसका मनोहर रुदन सुनकर घरकी सब ख्नियाँ हषसे
खिल उठीं और बड़े वेगसे प्रसन्नतापूवक वहाँ आ पहुँचीं ।
नील कमल-दलके समान श्याम कान्तिवाली उस परम तेज-
खिनी ओर मनोरम कन्याकी देखकर गिरिराज हिमालय अति-
शय आसनन्दमें निमग्न हो गये । तदनन्तर सुन्दर मुहूतंमें
मुनियोंके साथ हिमवानने अपनी पुत्रीके काली आदि सुख-
दायक नाम रक््खे । देवी शिवा गिरिराजके भवनमें दिनोंदिन
बढ़ने लगीं--ठीक उसी तरह) जैसे वर्षाके समयमें गड्नाजीकी
जलराशि और शरद्-ऋतुके शुक्लपक्षमें चाँदनी बढ़ती है।
सुशीलता आदि गुणोंसे संयुक्त तथा बन्धुजनोंकी प्यारी उस
कन्याको कुटुम्बके छोग अपने कुलके अनुरूप पावेती नामसे
पुकारने लगे | माताने कालिकाकी “उ मा? ( अरी ! तपस्या
मत कर ) कहकर तप करनेसे रोका था | भुने | इसलिये वह
सुन्दर मुखवाली गिरिराजनन्दिनी आगे चलकर लोकमें उमाके
नामसे विख्यात हो गयी | नारद | तदनन्तर जब विद्याके
उपदेशका समय आया; तब शिवा देवी अपने चित्तको एकाग्र
करके बड़ी प्रसत्नताके साथ श्रेष्ठ गुरुसे विद्या पढ़ने लगीं | पूव॑-
जन्मकी सारी विद्याएं, उ्हें उसी तरह प्राप्त हो गयीं, जैसे शरत्-
कालमें हंसोंकी पॉत अपने-आप खर्गज्ञाके त्पर पहुँच जाती
है और रात्रिमें अपना प्रकाश खतः महौषधियोंको प्राप्त हो जाता
है। मुने | इस प्रकार मेंने शिवाकी किसी एक लीलाका ही
वर्णन किया है । अब अन्य लीलाका वर्णन करूँगा; सुनो |
एक समयकी वात है तुम भगवान् शिवकी प्रेरणासे
प्रसन्नतापूवंक हिमाचलके घर गये | मुने ! तुम शिवतक्तके
शाता और उनकी लीलाके जानकारोंमें श्रेष्ठ हो | नारद ! गिरि-
राज हिमालयने तुम्हें घरपर आया देख प्रणाम करके तुम्हारी
पूजा की ओर अपनी पुत्नीको बुलाकर उससे तुम्हारे चरणोंमें
प्रणाम करवाया । मुनीश्वर | फिर खय॑ भी तुम्हें नमस्कार करके
हिमाचलने अपने सोभाग्यकी सराहना की ओर अल मत्त
झुका हाथ जोड़कर तुमसे कहा ।
हिमालय वोले--हे मुने नारद | हे ब्रह्मपुत्रोंम »े
शानवान् प्रभो | आप सर्वज्ञ हैं ओर कपापूर्वक दूर
उपकारमें लगे रहते हैं | मेरी पुत्रीकी जन्मकुण्डदीमें जो पु
दोष हो; उसे बताइये | मेरी बेटी क्रिसकी सोमाग्यवतती कि
पत्नी होगी !
त्रह्माजी कहते है--म्॒निश्रेष्ठ ! तुम बातचीत दुए
ओर कीौत॒की तो हो ही, गिरिराज हिमालयके ऐसा कहे!
तुमने कालिकाका हाथ
रुद्रसहिता ]
' विशेषरूपसे दृष्टिपात करके हिमाल्यसे इस प्रकार कहना
' आरम्म किया । |
नारद वोले--शैलराज ओर मेना | आपकी यह पुत्री
; चन्द्रमाकी आदि कलाके समान बढ़ी है | समस्त शुभ लक्षण
इसके अज्ञोंकी शोमा बढ़ाते हैं | यह अपने पतिके लिये
अत्यन्त सुखदायिनी होगी और माता-पिताकी भी कीर्ति
बढ़ायेगी | संसारकी समस्त नारियोंमें यह परम साध्वी ओर
। खजनोंको सदा महान् आनन्द देनेवाली होगी । गिरिराज |
तुम्हारी पुत्रीके हाथमें सब उत्तम लक्षण ही विद्यमान हैं।
घल एक रेखा विलक्षण है; उसका यथार्थ फल सुनो । इसे
सा पति प्राप्त होगा, जो योगी; नंग-घड़ंग रहनेवाला; निरगंण
गैर निष्काम होगा | उसके न माँ होगी न बाप । उसे मान-
म्मानका भी कोई ख्याल नहीं रहेगा ओर वह सदा अम्ल
प् धारण करेगा ।
ब्रह्मजी कहते हँ--नारद | तुम्हारी इस बातको सुन
गैर सत्य मानकर मेना तथा हिमाचल दोनों पति-पत्नी बहुत
खित हुए, परंतु जगदम्बा शिवा तुम्हारे ऐसे बचनको
[नकर और लक्षणोंद्यारा उस भावी पतिको शिव मानकर मन-
मन हषेसे खिल उठीं | प्नारदजीकी बात कभी श्वृ् नहीं
! सकती? यह सोचकर शिवा भगवान् शिवके युगलचरणोंमें
पूर्ण हृदयसे अत्यन्त स्नेह करने लगीं | नारद | उस समय
न-ही-मन दुखी हो हिमवानने तुमसे कहा--'मुने | उस
खाका फल सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ है । मैं अपनी
वत्नीको उससे बचानेके लिये क्या उपाय करूँ ??
मुने | तुम महान कोतुक करनेवाले ओर वार्तालाप-
विशारद हो । हिमवानकी बात सुनकर अपने मड़लकारी
बचरनोद्वार उनका हु बढ़ाते हुए. तुमने इस प्रकार कहा ।
नारद बोढे--गिरिराज | तुम स्नेहपूवक सुनो, मेरी
पांत सच्ची है। वह झूठ नहों होगी | हाथकी रेखा ब्रह्माजीकी
लिपि है। निश्चय ही वह मिथ्या नहीं हो सकती | अतः शील-
भवर | इस कन्याको बसा ही पति मिलेगा; इसमें संशय नहीं ।
परंतु इस रेखाके कुफलसे बचनेके लिये एक उपाय भी है;
उसे प्रेमपूर्षक सुनो । उसे करनेसे तुम्हें सुख मिलेगा । मैंने
जैसे वरका निरूपण किया है, बैसे ही भगवान् शंकर हं | वे
परवेसमथ ₹ आर लीलाके लिये अनेक रूप घारण करते रहते
६। उनमे समस्त कुलक्षण सदुणोंके समान हो जायेंगे | समर्थ
इप्पम कोर दोष भी हो तो वह उसे दुःख नहीं देता।
अपमथ+क छिये है| वह दुःखदायक होता है | इस विपयमें
सूप) अग्नि और गड्जाका दृष्ठान्त सामने रखना चाहिये ।
« पार्वतीका नामकरण और विद्याध्यथन; नारदका हिमवानके यहाँ आना
१७५७५
.......0ह0.... ..0................................3.....3+.ल्+>+-न नमन 3 ननन+ नमक 3५५५3. ५433 ७५333 क 4४७3० क मन कककका कम कनकननन्ाकम्ल्ााी ््ोैीथ्््श? खखहशु्वाचवचअअ_.आं््््््च्च्च्न्लच्खिशिशििेण-
इसलिये तुम विवेकपूर्वक अपनी कन्या शिवाको भगवान् शिवकरे
हाथमें सोंप दो | भगवान् शिव सबके ईश्वर, सेव्य, निर्विकार:
सामथ्यंशाली ओर अविनाशी हैं । वे जल्दी ही प्रसन्न हो जाते
हैं | अतः शिवाको ग्रहण कर लेंगे; इसमें संशय नहीं है।
विशेषतः वे तपस्यासे वशमें हो जाते हैं | यदिं शिवा तप करे
तो सब काम ठीक हो जायगा | सर्वेश्वर शिव सब प्रकारसे
” समर्थ हैं। वे इन्द्रके वज़का भी विनाश कर सकते हैं । ब्रह्मा-
जी उनके अधीन हैं तथा वे सबको सुख देनेवाले हैं । पाबंती
भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी होगी । वह सदा रुद्रदेवके
अनुकूल रहेगी; क्योंकि यह महासाध्वी ओर उत्तम बतका पालन
करनेवाली है तथा माता-पिताके सुखको बढ़ानेवाली है । यह
तपस्या करके भगवान् शिवके सनकी अपने वश्षमें कर लेगी
ओर वे भगवान् भी इसके सिवा किसी दूसरी स्लीसे विवाह
नहीं करेंगे । इन दोनोंका प्रेम एक दूसरेके अनुरूप है। वैसा
उच्चकोठिका प्रेम न तो किसीका हुआ है; न इस समय है
और न आगे होगा । गिरिश्रेष्ठ | इन्हें देवताओंके कार्य करने
हैं| उनके जो-जो काम नष्टप्राय हो गये हैं, उन सबका
इनके द्वारा पुन उजीवन या उद्धार होगा | अद्विराज |
आपकी कन्याको पाकर ही भगवान् हर अर्द्धनारीश्वर होंगे।
इन दोनोंका पुनः हषपूवेंक मिलन होगा । आपकी यह्द पुत्री
अपनी तपस्याके प्रभावसे सर्वेश्वर महेश्वरको संतुष्ट करके उनके
शरीरके आधे भागकी अपने अधिकारमें कर लेगी, उनका
अर्घाड़् बन जायगी | गिरिश्रेष्ठ | तुम्हें अपनी यह कन्या
भगवान् इंकरके सिवा दूसरे किसीको नहीं देनी चाहिये । यह
देवताओंका गुप्त रहस्य ६३ इसे कभी प्रकाशित नहीं
करना चाहिये |
हिमालयने कदहा--ज्ञानी मुने नारद | मैं आपकी एक
बात बता रहा हूँ, उसे प्रेमपूर्वक सुनिये और आननन््दका
अनुभव कीजिये । सुना जाता है; महादेवजी सब प्रकारकी
आसक्तियोंका त्याग करके अपने मनको संयमर्म रखते हुए
नित्य तपस्या करते हैं | देवताओंकी भी दृश्टिमं नहीं आते ।
देवषें | ध्यानमागमें स्वित हुए वे भगवान् द्ाम्भु पर्ममें
लगाये हुए अपने मनकी केसे हृथयेंगे ! ध्यान छोड़कर
विवाह करनेको केसे उद्यत होंगे ! इस विपयमें मुझे महान
संदेह है । दीपकक्ी ल्ोंछे समान प्रवाशमान; अविनाशी
प्रकृतिस परे; निविकार: निर्गुण; सजग; निर्विशिष ओर निरीद
जो परत्रह्म है; वह्दी उनका अपना सदाक्षिव नामक खरूप हैं |
अतः वे उसीका सबत्र साक्षात्कार इससे हैं; क्लिसी बाह्य+-
अनात्मवलुपर दृष्टि नहीं डाड्ते। गुने ! वहाँ आये दुए
१७६ / नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने १: [ संक्षिप्त-शिवपुराणी]
न] नककामकम्दमगकम्पईफगकंधकमाकमकममाकमकमेकमकममाकपइगगकमभाकममाकग्पकमयुडप कमनयगकुअग कम यमपक-यकम्मकम कम यहग्गकप्पकममाग कम मुपवा कदम कमा कम कपधकरम वन # थक पक पभमरवभ व क्षय कक मनन कक कमाकफ काका कक 5३ >..... मई
किनरोंके मुखसे उनके विषयमें नित्य ऐसी ही बात सुनी जाती
| कया वह बात मिथ्या ही है । विशेषतः यह
बात भी सुननेमें _ आती है कि भगवान् इरने
पूवेकालमें सतीके समक्ष एक प्रतिश की थी ।
उन्होंने कहा था-“दक्षकुमारी प्यारी सती | में तुम्हारे सिवा
दूसरी किसी स््रीका अपनी पत्नी बनानेके लिये न वरण करूँगा
न.अहण । यह में तुमसे सत्य कहता हूँ |! इस प्रकार सतीके
साथ उन्होंने पहले ही प्रतिशा कर ली है। अब सतीके मर
जानेपर वे दूसरी किसी सत्रीको केसे ग्रहण करेंगे
यह खुनकर तुम ( नारद ) ने कहा--महामते !
गिरिराज | इस विषयमें तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये ।
. तुम्हारी यह पुत्री काली द्वी पूतरेकालमें दक्षक्या सती हुई थी।
उस समय इसीका सदा सर्वमड्नलदायी सती नाम था। वे सती
दक्षकन्या होकर रुद्रकी प्यारी पत्नी हुई थीं। उन्होंने पिताके
यज्ञ्मं अनादर पाकर तथा भगवान् शंकरका भी अपमान हुआ
देख क्रोधपूवंक अपने शरीरको त्याग दिया था था।वैही प्रविष्ट होर ही
जारी करी ३..आन फनी जानी यामी पा. क्या वन... परी. बात... हसीन अपनी. आन सन. अं. जननी. आओ वीर. ७#॥.. अमन. फल, अपार की खान्ती बनी
व के उम ऋमम जम.
इसमें संशय नहीं है |
नारद | ये सब्र बातें तुमने हिमवानक्ो विज्लाणुक
बतायीं | पारब॑तीका वह पू्वरूप ओर चरित्र प्रीतिको बढ़नेय
है | कालीके उस सम्पूर्ण पूर्व श्रत्तान्तकों तम्हारे मुखसे पु
हिमवबान् अपनी पत्नी और पुत्रके साथ तत्काल संदेहरहितहोे छे|
इसी तरह तुम्दारे मुखसे अपनी उस पूर्वकरथाक्रों सुनकर भरे
लजाके मारे मस्तक झुका लिया और उसके मुखर
मुस्क्रानकी प्रभा फेल गयी । गिरिराज हिमालय पावतीड़े।
चरित्रकों सुनकर उसके माथेपर हाथ फेरने लगे ओर मत
सूँघकर उसे अपने आसनके पास ही बिठा लिया |
नारद | इसके पश्चात् तुम उसी क्षण प्रसनता:
स्वर्गलोककी चले गये ओर गिरिराज हिमवाव् भी मत
मनोहर आनन्दसे युक्त हो अपने सबंसम्पत्तिशादी मे
प्रविष्ट हो गये | ( अध्याय ७-८ )
मेना ओर हिमालयकी बातचीत, पावेती तथा हिमवानके खप्न तथा भगवान्
शिवसे 'मद्गल' ग्रहकी उत्पत्तिका ग्रसद्भ
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद | जब तुम खर्गलोकको
चले गये; तबसे कुछ काल ओर व्यतीत हो जानेपर एक दिन
मेनाने हिमवानके निकट जाकर उन्हें प्रणाम क्रिया | फिर खड़ी
हो वे गिरिकामिनी मेना अपने पतिसे विनयपू्बंक बोलों |
मेनाने कहा--प्राणनाथ ) उस दिन नारद मुनिने जो
बात कह्दी थी; उसको स्री-स्वभावक्रे कारण मैंने अच्छी तरह
नहीं समझा; मेरी तो यह प्रार्थना है कि आप कन्याका विवाह
किसी सुन्दर वरके साथ कर दीजिये | वह विवाह सर्वथा अपूर्व
सुख देनेवाल्य होगा। गिरिजाका वर शुभलक्षणोंसे सम्पन्न
ओर कुलीन होना चाहिये । मेरी बेटी मुझे प्रणोंसे भी अधिक
प्रिय है । वह उत्तम वर पाकर जिस प्रकार भी प्रसन्न और
सुखी हो सके, वेसा कीजिये | आपको मेरा नमस्कार है ।
ऐसा कहकर मेना अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं | उस
समय उनके मुखपर आँसुर्ओकी धारा बह रही थी प्राश-
शिरोमणि हिसवानने उन्हें उठाया और यथावत् समझाना
आरम्म किया |
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ट्विमालय बोले--देवि मे पेनके | मैं यथार्य मो का
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बात बताता हूँ । सुनो । भ्रम छोड़ो | मुनिकी बात कमी झटी
नहीं हो सकती | यदि बेटीपर तुम्हें स्नेह है तो उसे सादर
शिक्षा दो कि वह भक्तिपूर्वक सुस्यिर चित्तसे भगवान् शंकरके
लिये तप करे | मेनके | यदि भगवान् शिव प्रसन्न होकर
कालीका पाणिग्रहण कर छेते हैं तो सब झुभ ही होगा ।
नारजीका बताया हुआ अमल या अश्जयभ नष्ट हो जायगा।
शिवके समीप सारे अमड्गल सदा मक़ुलरूप हो जाते हैं ।
इसलिये तुम पुत्रीकों शिवकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेकी
शीघ्र शिक्षा दो।
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद | हिमवानकी यह बात
सुनकर मेनाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे तपस्यामें रुचि उत्पन्न
करनेके लिये पुत्नीको उपदेश देनेके निमित्त उसके पास गयीं।
परंतु वेटीके सुक्रमार अद्भपर दृष्टिपात करके मेनाके मनमें
बढ़ी व्यथा हुईं | उनके दोनों नेत्रोमें तुरंत आँसू भर आये।
फिर तो गिरिप्रिया मेनामें अपनी पुत्रीको उपदेश देनेकी
शक्ति नहीं रह गयी | अपनी माताकी उस चेंथ्टाको पावंतीजी
शीघ्र ही ताड़ गयीं । तब वे सवंश परमेश्वरी कालिका देवी
माताकों वारंबार आश्वासन दे तुरंत बोलीं ।
पावतीने कहा--मा ! तुम बढ़ी समझदार हो | मेरी
यह बात सुनो ) आज पिछली राभिके समय आाझमुहूतेमें मैंने
एक खप्म देखा है, उसे बताती. हूँ | माताजी ! खप्ममें एक
'दयाडु एवं तपस्री बरह्मणने मुझे शिवकी प्रसन््नतके लिये
उत्तम तपस्या करनेका प्रसन््नतापूर्वक उपदेश दिया है ।
'. नारद | यह सुनकर मेनकाने शीघ्र अपने पतिको बुलाया
ओर पुत्रीके देखे हुए खप्नको पूर्णतः कह सुनाया । मेनकाके
मुखसे पुत्नीके खप्नको सुनकर गिरिराज हिमालय बड़े प्रसन्न
डए ओर अपनी प्रिय पत्नीको समझाते हुए बोले ।
् गिरिराजने कहा--प्रिये | पिछली रातमें मैंने भी एक
खनन देखा है। में आदरपूर्वक उसे बताता हूँ । तुम प्रेमपूर्वक
| उसे सुनो । एक बढ़े उत्तम तपखी थे । नारदजीने वरके जैसे
उश्षम बताये थे, उन्हों लक्षणेसि युक्त शरीरको उन्होंने धारण
/2> पर रखा था । वे बड़ी प्रसन्नताक्े साथ मेरे नगरके निकट
तपत्या करनेफे लिये आये। उन्हें देखकर मुझे बड़ा दर्ष
एुआ ओर में अपनी पुत्रीको साथ लेकर उनके पास गया |
कक नुप्ते शत हुआ कि नारदजीके बताये हुए वर
शि० पु० 3० २३---
% भेना और हिमाऊलयकी बातचीत, पावेती तथा हिमवानके खप्त #
2७ सजनस>ननगरनगनगननननननननननशभनभान लक फल रशभ शा शधिनलचिललटा्स्स््स््््च्स्स्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्स्स्स्स्स्च्च्स्स्स्ट
भा पक भी नी मी सी अप जी कक उरी फनी परत लाना पिथानन पक पहल चिपक. भकत.
माला “सका “सनी परतान फेपआन कान
रा
१७७
भगवान शम्मु ये ही हैं | तब मैंने उन तपस्वीकी सेवकि लिये
अपनी पुतन्नीको उपदेश देकर उनसे भी प्रार्थना की कि वे
इसकी सेवा खीकार करें | परंतु उस समय उन्होंने मेरी बात
नहीं मानी) इतनेमें ही वहाँ सांख्य ओर वेदान्तके अनुसार
बहुत बड़ा विवाद छिड़ गया | तदनन्तर उनकी आशससे मेरी
बेटी वहीं रह गयी ओर अपने ह्ृदयमें उन्हींकी कामना रखकर
भक्तिपूर्वक उनकी सेवा करने छगी | सुसुखि [ यही मेरा देखा
हुआ खष्न है; जिसे मैंने त॒म्हें बता दिया | अतः प्रिये मेने !
कुछ काछतक इस खप्नके फलकी परीक्षा या प्रतीक्षा करनी
चाहिये, इस समय यही उचित जान पड़ता है । तुम निश्चित
समझो, यही मेरा विचार है |
ब्रह्माजी कहते है--मुनीखर मारद | ऐसा कहकर
गिरिराज हिंमवान् ओर मेनका शुद्ध हृदयसे उस स्प्मके फल-
की परीक्षा एवं प्रतीक्षा करने लगे |
देव | शिवभक्तशिरोमणे | भगवान् शंकरका यश परम
पावन) मड़लकारी, भक्तिवर्धक ओर उत्तम है। तुम इसे
आदरपूवक सुनो । दक्ष-यशसे अपने निवासस्थान कैलछास
परवेतपर आकर भगवान् शम्प्रु प्रियाविरसे कातर हो गये
और प्राणोंसे भी अधिक प्यारी सती देवीका हृदयसे चिन्तन
करने लगे | अपने पाषेदोंको बुलाकर सतीके लिये शोक करते
हुए उनके प्रेमवर्द्क गुर्णोका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक वर्णन करने
लगे | यह सब उन्होंने सांसारिक गतिको दिखानेकले लिये
किया। फिर, गहस्थ आश्रमकी सुन्दर स्थिति तथा नीति-रीतिका
परित्याग करके वे दिगम्बर हो गये ओर सब लोकोंमें उन्मत्तकी
भाँति भ्रमण करने लगे। लीलाकुशर्क होनेके कारण विरही-
की अवस्थाका प्रदर्शन करने लगे | सतीके विरहसे दुःखित हो
कहीं भी उनका दर्शन ने पाकर भक्तकल्याणकारी भगवान्
शंकर पुनः कैल्ासगिरिपर छोट आये ओर मनको यत्लपूर्थक
एकाग्र करके उन्होंने समाधि छगा छी; जो समस्त दुःखोका
नाश करनेवाली है । समाधिमें वे अविनाशी स्वरूपका दर्शन
करने लगे | इस तरह तीनों गु्णोसि रहित हो वे मगवान् शिव
चिरकाल्तक सुस्चिर भावसे समाधि ल्याये चठे रहे।
वे प्रभु खयं द्वी मायाके अधिपति निर्विकार परत्रह्म है | तदनन्तर
जब असंख्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब उन्होंने समाधि छोड़ी |
उसके बाद तुरंत ही जो चरित्र हुआ; उसे में तुम्हें बताता हूँ ।
भगवान् शिवक्े ललाठसे उस समय श्रमजनित पसीनेकी एक
बूँद प्रथ्वीपर गिरी ओर तत्काल एक शिश्ञ॒के रूपमे परिणत हो
गयी । सुने | उस बालकके चार भुजाएं थीं; शरीरकी कान्ति
लाल थी और आकार मनोहर था | दिव्य चुतिसे दीप्तिमान
वह शोभाशाली बालक अत्यन्त दुस्सह तेजसे सम्पन्न था; तथापि
उस समय लोकाचारपरायण परमेश्वर शिवके आगे वह साधारण
शिशुकी भाँति रोने छगा | यह देख पृथ्वी भगवान् शंकरसे
भय मान उत्तम बुद्धिसे विचार करनेके पश्चात् सुन्दरी स्रीका
रूप घारण करके वहीं प्रकट हो गयी | उन्होंने उस सुन्दर
बालकको तुरंत उठाकर अपनी गोदर्म रख लिया ओर अपने
ऊपर प्रकट होनेवाले दूधको ही स्तन्यके रूपमें उसे पिलाने
लगीं । उन्होंने स्नेहसे उसका मुंह चूमा और अपना ही बालक
मान हँस-हँसकर उसे खेलाने लगीं | परमेश्वर .शिवका हित-
साधन करनेवाली प्रथ्वी देवी सच्चे भावसे स्वयं उसकी माता
बन गयीं |
संसारकी स॒ष्टि करनेवाले; परम कोतुकी एवं विद्यान्
अन्तर्यामी शम्भु वह चरित्र देखकर हँस पड़े ओर प्ृथ्वीको
पहचानकर उनसे बोले--“घरणि | तुम धन्य हो | मेरे इस
१ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #:
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[ संक्षिप्त-शिवपुराण
पुत्नका प्रेमपूवरेंक पालन करो | यह श्रेष्ठ शिद्रु मुझ्न महतेर
दम्भुके श्रमजल ( पसीने ) से तुम्हारे ही ऊपर उतर ह्
है| बसुधे | यह प्रियकारी बालक यद्यपि मेरे श्रमजत्पे प्र
हुआ हे) तथापि तुम्हारे नामसे तुम्हारे ही पुत्रके रुपमें इक
ख्याति होगी | यह सदा न्रिव्रिध तापोसि रहित होगा। थक
गुणवान् ओर भूमि देनेवाला होगा । यह मुझे भी सतत प्ष
करेगा | तुम इसे अपनी रुचिक्रे अनुसार ग्रहण करो |!
त्रह्माजी कहते हं--नारद | ऐसा कहकर भगवा:
चुप हो गये | उनके हृदयसे बिरहका प्रभाव कुछ का
गया | उनमें विरह क्या था; वे छोकाचारका पालन कर
थे | वास्तवमें सत्पुरुषेक्ि प्रिय श्रीरुद्रदेव निर्विकार पत्ाः
ही हैं। शिबक्री उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधाय करके पुर्वा
पृथ्वीदेवी शीघ्र ही अपने स्थानको चली गयीं | उन्हें आर
सुख मिला । वह बालक “मोम? नामसे प्रसिद्ध हो यवाहेते
तुरंत काशी चला गया ओर वहाँ उसने दीघ॑कालतक मात
शंकरकी सेवा की । विश्वनाथजीकी कृपासे ग्रहकी पदवी पं
वे भूमिकुमार शीघ्र ही श्रेष्ठ एवं दिव्य छोकमें चढ़े गो।'
शुक्रलोकसे परे है | ( अध्याय ९-३
बार आक:८2००- 'आ आ
भगवान् शिवका गड्जावतरण तीथेमें तपयाके लिये आना, हिमवानूद्वारा उनका खागत, पूजा
ओर स्तवन तथा भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उनका उस खानपर -
दूसरोंको न जाने देनेकी व्यवय्था करना
ब्रह्माजी कहते है--नारद | हिमवानकी पुत्री छोक-
पूजित शक्तिस्वख्पा पावती, हिमालयके घरमें रहकर बढ़ने
लगीं । जब उनकी अवस्था आठ वर्षकी हो गयी; तब सतीके
विरसे कातर हुए शम्भुको उनके जन्मका समाचार मिला |
नारद | उस अद्भुत बालिका पावतीको हृदयमें रखकर वे मन-
ही-मन बड़े आनन्दका अनुभव करने छगे। इसी बीचमें
लोौकिक गतिका आश्रय ले शम्मुने अपने मनको एकाग्र करनेके
लिये तंप॑ करनेका विचार किया | नन््दी आदि कुछ छ शान्त
पाषदोंकों साथ ले वे हिमाठयके उत्तम शिखरपर गड्गावतार
नामक तीथेमें चले आये, जहाँ पूर्वकालमें ब्रह्मघामसे च्युत
, होकर समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये चली हुई परम
पावनी गज्जा पहले-पहल भूतलूपर अवतीर्ण हुईं थीं। जितेन्द्रिय
१. गड्जोत्तरी ।
हरने वहीं रहकर तपस्पा आरम्भ की | वें आल्याक्षि|
चेतन; शानखरूप, नित्य; ज्योतिर्मय/ निरामयः गगी
चिदानन्दखरूप) देतहीन तथा आश्रयरहित आपने भाग
परमात्माका एकामग्रभावसे चिन्तन करने लगे | भगवा हैं
ध्यानपरायण होनेपर नन्दी-भज्गी आदि कुछ अब पाप
भी ध्यानमें तत्पर हो गये | उस समय कुछ ही
परमात्मा शम्भुकी सेवा करते थे । वे सब-के-सब मो
ओर एक शब्द भी नहीं बोलते थे | कुछ द्वारपाल हे गो
इसी समय गिरिराज हिंसवान् उस ओषधिबहुल वित्त
भगवान् शंकरका झुमागमन सुनकर उनके प्रति आदखी भ ८"
वहाँ आये | आकर सेवकोंसहित गिरिराजने मगवार सूती
किया; उनकी पूजा वी और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ गई #
सुन्दर स्तवन किया | फिर हिमालयने कंहा-ः प्रभे
उन
रुद्रसंहिता |
उदय हुआ है; जो आप यहाँ पधारे हैं। आपने मुस्े
तनाथ कर दिया | क्यों न हो) महात्माओंने यह ठीक ही वर्णन
कया है कि आप दीनवत्सलछ हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया ।
प्राज मेरा जीवन सफल हुआ ओर आज मेरा सब कुछ सफल
त गया; क्योंकि आपने यहाँ पदार्पण करनेका कष्ट उठाया
/ | महेखवर ! आप मुझे अपना दास समझकर शझान्तभावसे
#से सेवाके लिये आशा दीजिये | में बड़ी प्रसन्नतासे अनन्य-
/चत्त होकर आपकी सेवा करूँगा |?
£ ब्रह्माज़ी कहते है--नारद ! गिरिराजका यह वचन
कनिकर महेश्वरने किंचित् आँखें खोलीं और सेवकोंसहित
(शमवानको देखा । सेवकॉसहित गरिरिराजकी उपस्थित देख
&मनयोगम स्वित हुए जगदीख्र बृषभष्यजने मुसकसाते
“प्से कटा । ह
महेद्वर वोले--शैलरशाज ! मैं तुम्होर शिखरपर
जान्तम त्पञा करनेके लिये आया हूँ । ठुम ऐला प्रवन्ध
'रो, जिससे कोई भी मेरे निकट न आ सके | ठुम महात्मा
: प्यारे घाम हो तथा सुनियों, देवताओं, राक्षसों और
जप भरात्माओंकोी भी सदा आश्रय देनेवाले हो | द्विज
४ भगवान शिवका गद्ञावतरण तीर्थ तपस्याके लिये आना #
२७९,
आदिका तुम्हारे ऊपर सदा ही निवास रहता है । तुम गज्ञसे
अभिषिक्त होकर सदाके लिये पवित्र हो गये हो। दूसरोंका उपकार
करनेवाले तथा सम्पूणे पर्वतोंके सामथ्येशाली राजा हो)
गिरिराज | में यहाँ गद्भावतरण-स्थलमें तुम्हारे आश्रित रूकर
आत्मसंयमपूर्बक बड़ी प्रसन्नताके साथ तपस्या करूँगा । शैल्राज !
गिरिश्रेष्ट | जिस साधनसे यहाँ मेरी तपस्या बिना किसी विश्न-
बाघाके चालू रह सके, उसे इस समय प्रयक्ञपूर्वंक करो | पर्वेत-
प्रवर | मेरी यही सबसे बड़ी सेवा है। ठुम अपने घर जाओ
और मैंने जो कुछ कहा है; उसका उत्तम प्रीतिसे यक्ञपूर्वक
प्रबन्ध करो | |
च्रह्मजी कहते है--नारद ! ऐसा कहकर सष्टिकर्ता
जगदीश्वर मगवान् शम्मु चुप हो गये । उस समय गिरिराजने
शम्मुसे प्रेमपूवक यह बात कही--“जगन्नाथ ! परमेश्वर |! आज
मैंने अपने प्रदेशमें स्ित हुए आपका स्वागतपूवंक पूजन
किया है; यही मेरे लिये महान् सोमाग्यकी बात है | अब आपसे
ओर क्या प्रार्थना करूँ | महेश्वर | कितने ही देवता बड़े-बड़े
यक्षका आश्रय ले महान् तप करके भी आपको नहीं पाते ।
वे ही आप यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये | मुझसे बढ़कर श्रेष्ठ
सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आप
मेरे प्रृष्ठआागपर तपस्याके लिये उपस्थित हुए. हैं। परमेश्वर !
आज में अपनेको देवराज इन्द्रसे भी अधिक भाग्यवान् मानता
हूँ; क्योंकि सेवकॉंसहित आपने यहाँ आकर मुझे अनुग्रहका
भागी बना दिया । देवेश | आप खतन्त्र हैं। यहाँ विना किसी
विप्न-बाधाके उत्तम तपस्या कीजिये | प्रभो ! में आपका दास
हूँ | अतः सदा आपकी आज्ञाके अनुसार सेवा करूँगा |?
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद ! ऐसा कहकर गिरिराज
हिमालय तुरंत अपने घरको लोट आये | उन्होंने अपनी प्रिया
मेनाकों बड़े आदरसे वह सारा बृत्तान्त कह सुनाया। तलश्रात्
शेल्राजने साथ जानेबाले परिजनों तथा समस्त सेवकरगर्णोको
बुल्कर उन्हें ठीक-ठीक समझाया |
हिमालय वोछे--आजसे कोई भी गड्गावतरण नामक
स्थानमें) जो मेरे पृष्ठभागमें ही है, मेरी आशा मानकर न जाय |
यह में सच्ची वात कद्दता हैं | यदि कोई वहाँ जायगा तो उस
महादुष्टको में विशेष दण्ड दूँगा। मुने | इस प्रकार अपने
समस्त गर्णोकों शीपर ही नियन्नित करके टद्मिवानने विश्न-
निवारणके लिये जो सुन्दर प्रयले क्रिया: बह तुम्हें बताता
हूँ; रनों । ( अध्याव ११ )
जा 2 200 कण
१८०
3 आओ ७ » + पाक सेकओं जसााात भतार भारी पपीता सुडामीश पहनीषतीपाओि' अरे, /म नानी सही करी पी. पाहिती।पस्ामत- दि पुर पानी पादाना'. सुलह "पहना या “पके... भलम-मीे पहनती. आह की सह". पिकाना+-पानीा+ पान 2०#-.. धमाल पाली आ.. की. आाम्थीर अं वकममातयन्मी कममास आ ढक. +
हिमवानका पावेतीको शिवकी सेवार्म रखनेके लिये उनसे आज्ञा भाँगना और शिवका
£ नमो रुद्राय शासम्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराण[
अत. के म्म््प-5ः::अ क् अइअइसससजअसअसअसइच संत नजन-ज-न ७ »तनकम७७क३७०७७७जकाराछ 9-+ -+ ७०-क+-कानी पाना बाकि जा पक हे आकलन जम. पइमम नमन आक ४ /3> ल्ै१० यही... पा-सकोनक. ऑइ--गुथा.. झा: जमाना. जीरा. जुबानी चन्ना पार. आओ नमन जी. ची। कम बम तक.
कारण बताते हुए इस ग्रस्तावकी अखीकार कर देना
ब्रह्माजी कहते है--नारद | तदनन्तर शेलराज हिमालय
उत्तम फल-फूल लेकर अपनी पुत्रीके साथ हर्षपूर्वक भगवान
हरके समीप गये । वहाँ जाकर उन्होंने ध्यानपरायण त्रिलोकीनाथ
शिवको प्रणाम किया ओर अपनी अद्भुत कन्या कालीको
हृदयसे उनकी सेवामें अपित कर दिया । फल-फूल आदि सारी
सामग्री उनके सामने रखकर पुत्नीकों आगे करके शैलराजने
शम्भुसे कहा--“भगवन् | मेरी पुत्नी आप भगवान् चन्द्रशेखरकी
सेवा करनेके लिये उत्सुक है। अतः आपके आराधनकी इच्छासे
मैं इसको साथ लाया हूँ | यह अपनी दो सखियोंके साथ सदा
आप शंकरकी ही सेवाम रहे | नाथ | यदि आपका मुझपर
आनुग्रह है तो इस कन्याको सेवाके लिये आशा दीजिये |?
तब भगवान् शंकरने उस परम मनोहर कामरूपिणी
कन्याको देखकर आँखें मूँद लीं ओर अपने त्रिगुणातीत; अविनाशी
परमतत्त्वमय उत्तम रूपका ध्यान आरम्म किया । उस समय
सर्वधर एवं स्वेब्यापी जठाजूटधघारी वेदान्तवेथ चन्द्रकला-
विभूषण शम्भु उत्तम आसनपर बेठकर नेत्र बंद किये तप
( ध्यान ) में ही लग गये। यह देख हिमाचलने मस्तक
झुकाकर पुनः उनके चरणोंमें प्रणाम किया । यद्यपि उनके
हृदयमें दीनता नहीं थी; तो भी वे उस समय इस संशयमें पड़
गये कि न जाने भगवान मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे या नहीं |
वक्ताओंमें श्रेष्ठ गिरिराज हिमवानने जगतके एकमात्र बन्धु
भगवान शिवसे इस प्रकार कहा |
हिमालय बोले--देवदेव ! महादेव | करुणाकर !
शंकर ! विभो ! में आपकी शरणमें आया हूँ। आँखें
खोलकर मेरी ओर देखिये । शिव [| शर्ब | मद्देशान | जगतको
आनन्द प्रदान करनेवाले प्रमो | महादेव | आप सम्पूर्ण
आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं | में आपको प्रणाम करता
हूँ । खामिन | प्रभो | में अपनी इस पुत्रीके साथ प्रतिदिन आपका
दर्शन करनेके लिये आऊंगा । इसके लिये आदेश दीजिये |
उनकी यह बात सुनकर देवदेव महेश्वरने आँखें खोलकर
ध्यान छोड़ दिया और कुछ सोच-विचारकर कहा ।
महेइबर वोले--गिरिराज ! तुम अपनी इस कुमारी
कन्याको घरमें रखकर ही नित्य मेरे दर्शनको आ सकते हो;
अन्यथा मेरा दर्शन नहीं हो सकता |
महेश्वरकी ऐसी बात सुनकर शिवाके पिता हिंमवान्
मस्तक झकाकर उन भगवान् शिवसे बोले--“प्रमो | यह तो
वताइये, किस कारणसे मैं इस कन्याके साथ आपके दर्शैनके ल्यि
नहीं आ सकता । क्या यह आपकी सेवाके योग्य नहीं है ! फिर
इसे नहीं लानेका क्या कारण है; यह मेरी समझमें नहीं आता!
यह सुनकर भगवान व्ृप्रभध्यज आम्भु हँसने छो
विशेषतः दुष्ट योगियोंकों लोकाचारका दर्शन कराते हुए
हिमालयसे बोले---'शैंठराज | यह कुमारी सुन्दर किये
सुशोभित; तन्चद्ी; चन्द्रमुखी और शुभ हछक्षणेतति उमर
इसलिये इसे मेरे समीप तुम्हें नहीं छाना चाहिये | इसके
में तुम्हें बारंबार रोकता हूँ | वेदके पारंगत विद्वानेने नाई
मायारूपिणी कहा है | विशेषतः युवती जञ््री तो ताप्ीम
तपमें विष्न डालनेवाली ही होती है | गिरिश्रेष्ठ ! में का
योगी ओर सदा मायासे निर्लिप्त रहनेवाला हूँ । मुझे मु
स््रीसे क्या प्रयोजन हैं? तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय हिल
इसलिये फिर तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये; क्योंड़ि !
वेदोक्त धर्ममं प्रवीण; ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और विद्वान ऐ
अचलराज ! ज्लीके सड़से मनमें शीघ्र ही विषयवासना आ
हो जाती है। उससे वेंराग्य नष्ट होता है और वैराय न है
पुरुष उत्तम तपस्यासे भ्रष्ट हो जाता है। इसह्यि रे
तपस्वीको ज्लियोंका सद्गः नहीं करना चाहिये; क्योंकि
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% पाती और शिवका दाशनिक खंबाद #
१८९२
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महाविषय-बातनाकी जड़ एवं शात-वेराग्यका विनाश करनेवाली
होती है २
ब्रह्माजी कहते हैं--मारद | इस तरहकी बहुत-सी बातें
कहकर महायोगिशिरोमणि सगवान् महेश्वर चुप हो गये ।
देवष॑ | शम्भुका यह निरामय; निःस्पृह् ओर निष्ठुर वचन
सुनकर कालीके पिता हिमवान् चकित, कुछ-कुछ व्याकुर
और चुप हो गये । तपख्ी शिवकी कहीं हुईं बात सुनकर और
गिरिराज हिमबानकी चकित हुआ जानकर भवानी पाती उस
समय भैगवान शिवको प्रणाम करके विशद् वचन बोलीं |
( अध्याय १२ )
पावती ओर शिवका दाशनिक संवाद, शिवका पावेतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा
पावती तिदिन
देना तथा पावतीद्वारा भगवानूकी प्रतिदिन सेवा
भवानीने कह(--योगिन् | आपने तपस्ी होकर गिरि-
से यह क्या बात कह डाली | प्रभो | आप ज्ञानविशारद हें,
! भी अपनी बातका उत्तर मुझसे सुनिये । शम्मो | आप
पशशक्तिसे सथन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते हैं । उस
_क्तिके कारण ही आप महात्माको तपस्पथा करनेका विचार
एआ है | सभी कर्मोको करनेकी जो वह शक्ति है; उसे ही
कृति जानना चाहिये । प्रकृतिसे ही सबकी स॒ष्टि पाछन ओर
हार होते हैं| मगवन् | आप कोन हैं ? ओर सूक्ष्म प्रकृति
था है ! इसका विचार कीजिये । प्रकृतिके बिना लिड्ढखूपी
पहेश्वर केसे हो सकते हैं ! आप सदा प्राणियोंके लिये जो
अचेनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैँ, वह प्रकृतिके ही कारण
हैं | इस बातको हृदयसे विचारकर ही आपको जो कहना हो;
वह सब कहिये | क्
प्रह्माजी कहते हँ---नारद ! पार्बतीजीके इस वन्चनको
सुनकर महती छीछा करनेमें लगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर
हँसते हुए बोले |
महेश्वरने कहा--मैं उत्कृष्ट तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका
नाश करता हूँ ओर तत््वतः प्रकृतिरहित शम्भुके रूपमें
खित होता हूँ । अतः सत्पुरुषोंकी कभी या कहीं प्रकृतिका
संग्रह नहीं करना चाहिये । छोकाचारसे दूर एवं निर्विकार
रएएना चाहिये ।
नारद | जब झम्भुने छोकिक व्यवहारके अनुसार यह
बात बे; तब काली मन-ही-सन हँसकर मधुर वाणीमें चोली |
.फालीने कहा--कल्याणकारी प्रभो ! योगिन् ! आपने
3 दति कही है) क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है ! फ़िर आप
$ भसद्त्वदस
सतसपस्िना
तत्सद्वाद् विपयोत्पत्तिराशु
शल ने
डर विनरयति थे 4
वे। विनदवति थे वराम्ध
काया रझोपु संगतिः । मद्दाविषयमूलं सता
उससे परे क्यों नहीं हो गये १ ( क्यों प्रकृतिका सहारा लेकर
बोलने लगे १ ) इन सब बातोंकी विचार करके तास्विक दृशिसे
जो यथार्थ बात हो, उसीको कहना चाहिये | यह सब कुछ
सदा प्रकृतिसे बंधा हुआ है | इसलिये आपको न तो बोलना
चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और
करना--सब व्यवहार प्राकृत ही है। आप अपनी बुद्धिसे इसको
समझिये । आप जो कुछ सुनते; खाते, देखते ओर करते हैं,
वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। शठे वाद-विवाद करना व्यर्थ
है। प्रभो | शम्मी ) यदि आप प्रकृतिसे परे हैँ तो इस समय
इस ह्िमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये करते हैं १ हर !
प्रकृतिने आपको निगल लिया है | अतः आप अपने खरूपको
नहीं जानते । ईशा ) आप यदि अपने खरूपको जानते हैं तो किस
लिये तप करते हैं ! योगिव् | मुझे आपके साथ बाद-विवाद
करनेकी क्या आवश्यकता है ? प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर
विद्वान् पुरुष अनुमान प्रमाणकी नहीं मानते । जो कुछ
प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है; वह सब ज्ञानी पुरुषोंको
बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना चाहिये | योगीश्वर | बहुत
कहनेसे क्या लाभ ! मेरी उत्तम बात सुनिये । में प्रकृति हूँ ।
आप पुरुष हैं | यह सत्य है; सत्य है | इसमें संशव नहीं है ।
मेरे अनुग्रहसे ही आप सग्ुण एवं साकार माने गये हूँ । मेरे
बिना तो आप निरीह हैं | कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप
जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके अधीन हो सदा नाना प्रकारके
कर्म करते रहते हैं | फिर निर्विकर केसे हैं ? ओर मुझसे
लिप्त केसे नहीं ? शंकर | यदि आप प्रकृतिसे परे हैं ओर
यदि आपका यह कथन रुत्य दे तो आपको मेरे समीय रदनेपर
भी डरना नहीं चाटियि |
ता भदयति संचपः ॥
रातव्य नाटिनी +
हानवराग्यनारिनी ॥
( शि० एपु० रु० 6 परा० ऊँ >+ १६-२५ )
१८० ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवप्राणा
सनम. मन. भारा मय + मम ++मपककम्कापनन 9४४५ +५७५७७७५३५५७ नह घप५०३४७ भा म४०७ ५७५०
्र ७ ८ + कम फेजअट अर सनम फमामम्मश-#ाह पा साय आक) “सडामा मजा ““ ता अन्न इुआान साहा कातआ सका. साम+-सोडनभ० पुकार पूडामिनन पाक” दही पाना य पक. य०»री साथी. आमत+ पहनी हि" पानी पीतवगायान फंपी.. आम परीममम पा. ककनी. नम. डी. सनम कट कक था. आग. कक. गए आध ७ + ५७ कमी ६ बा. बा #०+-चक
> ५ सकी. सनी. अर पाक. अमन उन रा अ- आम उद खि. साइन सर. मीन काने वन के
हिमवानका पावेतीको शिवकी सेवार्म रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना ओर शिवका
कारण बताते हुए इस प्रस्तावकोी अखीकार कर देना
त्रह्माजी कहते है--नारद | तदनन्तर शलराज हिमालय
उत्तम फल-फूल लेकर अपनी पुत्रीके साथ हप॑पूवंक भगवान्
हरके समीप गये | वहाँ जाकर उन्होंने ध्यानपरायण त्रिलोकीनाथ
शिवको प्रणाम किया ओर अपनी अद्भुत कन्या कालीको
हृदयसे उनकी सेवार्में अपित कर दिया । फल-फूल आदि सारी
सामग्री उनके सामने रखकर पुत्रीको आगे करके शेट्राजने
शम्भुसे कहा--“भगवन् | मेरी पुत्री आप भगवान् चन्द्रशेखरकी
सेवा करनेके लिये उत्सुक है। अतः आपके आराधनकी इच्छासे
में इसको साथ लाया हूँ । यह अपनी दो सखियोक्रे साथ सदा
आप शंकरकी ही सेवा रहे | नाथ | यदि आपका मुझपर
अनुग्रह है तो इस कन्याको सेवाके लिये आशा दीजिये ।
तब भगवान् शंकरने उस परम मनोहर कामरूपिणी
कन्याको देखकर आँखें मूँद लीं ओर अपने त्रिगुणातीत; अविनाशी
परमतत्वमय उत्तम रूपका ध्यान आरम्म किया | उस समय
सर्वेश्वर एवं स्वेग्यापी जटाजूटघारी वेदान्तवेथ चन्द्रकला-
विभूषण शम्प्रु उत्तम आसनपर बैठकर नेत्र बंद किये तप
( ध्यान ) में ही लग गये। यह देख हिमाचलने मस्तक
झुकाकर पुनः उनके चरणोंमें प्रणाम किया | यत्रपि उनके
हृदयमें दीनता नहीं थी, तो भी वे उस समय इस संशयमें पड़
गये कि न जाने भगवान् मेरी प्रार्थना खीकार करेंगे या नहीं |
वक्तार्अमें श्रेष्ठ गेरिगन हिसवानने जगतके एकमात्र बन्धु
भगवान शिवसे इस प्रकार कहा |
हिमालय बोले--देवदेव ! महादेव ! करुणाकर !
शंकर ! विभो | में आपकी शरणमें आया हूँ । आँखें
खोलकर मेरी ओर देखिये । शिव | शर्ब | महेशान | जगतको
आनन्द प्रदान करनेवाले प्रभो ! महादेव | आप सम्पूर्ण
आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं। मैं आपको प्रणाम करता
हूँ । खामिन | प्रभो | मैं अपनी इस पुत्रीके साथ प्रतिदिन आपका
दर्शन करनेके लिये आऊंगा | इसके लिये आदेश दीजिये |
उनकी यह बात सुनकर देवदेव महेश्वरने आँखें खोलकर
ध्यान छोड़ दिया और कुछ सोच-विचारकर कहा |
महेश्वर बोले--गिरिराज | तुम अपनी इस कुमारी
कन्याको घरमें रखकर ही नित्य मेरे दर्शनकी आ सकते हो,
अन्यथा मेरा दशन नहीं हो सकता ।
महेश्वरकी ऐसी बात सुनकर शिवाके पिता हिंमवान्
मस्तक झुकाकर उन भगवान् शिवसे बोले--(प्रमो | यह तो
बताइये; किस कारणसे मैं इस कन्याके साथ आपके दर्शनके ल्यि
नहीं आ सकता | क्या यह आपकी सेवाके योग्य नहीं है ? फिर
इसे नहीं लानेक्रा क्या कारण है, यह मेरी समझमें नहीं थात।
यह सुनकर भगवान द्ृप्रभध्यज झम्प्ु हँसे छो हे
विशेपतः दुष्ट योगियोंकों छोकाचारका दर्बन कराते हुए!
हिमालयसे बोले--“शैलराज |! यह कुमारी सुन्दर श्र
सुशोभित, तन्वड़ी, चन्द्रमुखी ओर शुभ लक्षणेति उम्र!
इसलिये इसे मेरे समीप तुम्हें नहीं छाना चाहिये | इसके
में त॒म्हें बारंबार रोकता हूँ । बेदके पारंगत विद्वाननि गा
मायारूपिणी कहा है | विशेषपतः युवती स्त्री तो ताली
तपमें विध्न डालनेवाली ही होती है | गिरिश्रेष्ट | में क्र
योगी ओर सदा मायासे निर्लिप्त रहनेवाला हूँ । मुझे इ
स्रीसे क्या प्रयोजन है? तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय झिः
इसलिये फिर तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहियेः कोड
वेदोक्त धर्ममें प्रवीण; ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और विद्वान्।
अचलराज ! च्लरीके सड़से मनमें शीघ्र ही विषयवादता ४
हो जाती है। उससे वेराग्य नष्ट होता है और वैराब न है
पुरुष उत्तम तपस्यासे भ्रष्ट हो जाता है। इसब्यि
तपस्त्रीकी स््रियोंका सड्रः नहीं करना चाहिये! क्यों
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व्रह्मजी कहते हैं--नारद ! इस तरहकी बहुत-सी बातें
इकर महायोगिशिरोमणि भगवान् महेश्वर चुप हो गये |
पर्ष | शम्भुका यह निरामय) निःस्पृह् ओर निष्ठुर वचन
सुनकर कालीके पिता हिंमवान् चकित, कुछ-कुछ व्याकुछ
और चुप हो गये | तपस्व्री शिवकी कही हुई बात सुनकर और
गिरिराज हिमवानको चकित हुआ जानकर भवानी पार्वती उस
समय भैगवान् शिवको प्रणाम करके विशद् वचन बोलीं ।
( अध्याय १२ )
पार्वती ओर शिवका दाशनिक संवाद, शिवका पावेतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा
देना तथा पावतीद्वारा भगवानकी प्रतिदिन सेवा
भवचानीने कह(--योगिन् ! आपने तपस्वी होकर मिरि-
जसे यह क्या बात कह डाली | प्रभो | आप शानविशारद् हैं;
| भी अपनी बातका उत्तर मुझसे सुनिये । शम्मो | आप
पःशक्तिसे सम्पन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते हैं । उस
क्तिके कारण ही आप महात्माको तपस्या करनेका विचार
आ है | सभी कर्मोको करनेकी जो वह शक्ति है; उसे ही
कृति जानना चाहिये । प्रकृतिसे ही सबकी सष्टि पालन और
हार होते हैँ । मगवन् ! आप. कौन हैं १ ओर सूक्ष्म प्रकृति
या है ! इसका विचार कीजिये । प्रकृतिके बिना लिझ्डरूपी
हेश्वर केसे हो सकते हैं ! आप सदा प्राणियोंके लिये जो
प्रचेनीय, वन्दनीय ओर चिन्तनीय हैं; वह प्रकृतिके ही कारण
£ | इस बातको हृदयसे विचारकर ही आपको जो कहना हो;
न्ह सब कहिये |
च्रह्माजी कहते है--नारद ! पार्वतीजीके इस बचनको
ुनकर महती लीला करनेमें छगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर
(सते हुए बोले ।
महेश्वरले कहा--मैं उत्कृष्ट तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका
नाश करता हूँ ओर तत्त्वतः प्रकृतिरहित शम्भुके रूपमें
खित होता हूँ । अतः सत्पुरुषोंकी कभी या कहीं प्रकृतिका
संग्रह नहीं करना चाहिये । लोकाचारसे दूर एवं निर्विकार
रएना चाहिये |
नारद | जब झाम्मुने लोकिक व्यवहारके अनुसार यह
बात कहो) तब काली मन-ही-मन हँसकर मधुर वाणीमें बोली |
कालीने कहा--कल्याणकारी प्रभो | योगिन् ! आपने
जौ ते
जी बात कही है; क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है ? फिर आप
0 तह यो
तत्सग्द् विषयोक्तत्तिराशु
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श्ल नक्ष
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भतृस्तपस्िन्ा
थे । विनश्यति च दैराग्य॑ ततों
कार्यो स्तोषु संगतिः | महाविपयमूलं त्ता
उससे परे क्यों नहीं हो गये १ ( क्यों प्रकृतिका सहारा लेकर
बोलने लगे १ ) इन सब बातोंको विचार करके तात्विक दृष्टिसे
जो यथार्थ बात हो; उसीको कहना चाहिये | यह सब कुछ
सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है | इसलिये आपको न तो बोलना
चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और
करना---सब व्यवद्दार प्राकृत ही है | आप अपनी बुद्धिसे इसको
समझिये । आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते ओर करते हैं,
वह सब प्रकृतिका ही काय है | शठे वाद-विवाद करना व्यथ
है। प्रभो ! शम्भी ! यदि आप प्रकृतिसे परे. हैँ तो इस समय
इस हिसवान् पर्व॑तपर आप तपस्या किसलिये करते हैं १ हर |
प्रकृतिने आपको निगल लिया है | अतः आप अपने खरूपको
नहीं जानते | ईश ! आप यदि अपने खरूपको जानते हैं तो किस
लिये तप करते है १ योगिन् | मुझे आपके साथ वाद-विवाद
करनेकी क्या आवश्यकता है ! प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर
विद्वान पुरुष अनुमान प्रमाणकी नहीं मानते ॥ जो कुछ
प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है; वह सब ज्ञानी पुरुषोंको
बुड्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना चाहिये | योगीश्वर | बहुत
कहनेसे क्या छाभ १ मेरी उत्तम बात सुनिये | में प्रकृति हूँ ।
आप पुरुष हैं । यह सत्य है; सत्य है | इसमें संशय नहीं है ।
मेरे अनुग्रहसे ही आप सग्ुण एवं साकार माने गये हैं । मेरे
विना तो आप निरीह हैं | कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप
जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके अधीन हो सदा नाना प्रकारके
कर्म करते रहते हूँ ! फिर निर्विकार कैसे हैं ? और मुझसे
ल्सि केसे नहीं १ शंकर | यदि आप प्रकृतिसे परे हैं ओर
यदि आपका यह कथन सत्य है तो आपको मेरे समीप रहनेपर
भी डरना नहीं चाहिये ।
अश्यति सत्तप:॥
शानवेराग्यनाशिनी ॥
( शि० पु० रु० सं० पा० खं० १२ ]३१-३२ )
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१८२ / नमो रुद्राय शान्ताय बह्मणे परमात्मने % | संक्षिप्त-शिवपुराणा
जा ाााआश्णणााए अरशलन्मम+-गायाा,. 2-२५. “रमोम्नमया जग... सपेकणक, “सा ३नपयकात. धगो-ममान नमन... धराकमा'.मिनोपआ०#ि+-मेककनन
त्रह्मजी कहते है--परावतीका यह सांख्यशास्रके
अनुसार कहा हुआ वचन सुनकर भगवान् शिव वेदान्तमतमें
स्थित हो उनसे यों बोले । ।
श्रीशिवने कहा--सुन्दर भाषण करनेवाली गिरिजे [
यदि ठुम सांख्य मतको धारण करके ऐसी बार्त कहती हो तो
प्रतिदिन मेरी सेवा करो; परंतु वह सेवा शा्लनिपिद्ध नहीं
होनी चाहिये ।
गिरिजासे ऐसा कहकर भरक्तोपर अनुग्रह ओर उनका
मनोरज्जनन करनेवाले भगवान शिव हिसवानसे बोले |
शिवने कहा--गिरिरणाज | मैं यहीं तुम्हारे अत्यन्त
रमणीय श्रेष्ठ शिखरकी भूमिपर उत्तम तपस्या तथा अपने
आमन्दमय परमार्थस्वरूपका विचार करता हुआ विचररूँगा |
पर्व॑तराज ! आप सुझे यहाँ तपस्या करनेकी अनुमति दें |
आपकी अनुशाके बिना कोई तप नहीं किया जा सकता।
देवाधिदेव झलघारी भगवान् शिवका यह कथन सुनकर
हिमवानने उन्हें प्रणाम करके कहा--“महादेव | देवता, असुर
और मनुष्योसहितः सम्पूर्ण जगत् तो आपका ही है। मैं तुच्छ
होकर आपसे क्या कहूँ ९?
ब्रह्मजी कहते हें---नारद ! गिरिराज हिमवानके ऐसा
कहनेपर छोककल्याणकारी भगवान् शंकर हँस पड़े ओर
आदरपूर्वक उनसे बोले-“अब तुम जाओ | शंकरकी आज्ञा
पाकर हिंमवान् अपने घर लोट गये । वे गिरिजाके साथ
प्रतिदिन उनके दर्शनके लिये आते ये । काली अपने पिताके
बिना भी दोनों सखियोंके साथ नित्य शंकरजीके पास जातीं
और भत्तिपूर्वक उनकी सेवामें लगी रहती । नन्दीश्वर आदि
कोई भी गण उन्हें रोकता नहीं था। तात | महेश्वरके
आदेशसे ह्वी ऐसा होता था। प्रत्येक गण पवित्नतापूर्षक रहकर
उनकी आशज्ञाका पालन करता था । जो विचार करनेसे परस्पर
अभिन्न सिद्ध होते हैं, उन्हीं शिवा ओर शिवने सांख्य और
वेदान्त-मतमें स्थित हो जो कल्याणदायक संवाद किया, वह
सर्वदा सुख देनेवाला है । वह संवाद मैंने यहाँ कह सुनाया |
इन्द्रियातीत भगवान् शंकरने गिरिराजके कहनेसे उनका गौरव
मानंकर उनकी पुत्रीको अपने पास रहकर सेवा करनेके लिये
स्वीकार कर लिया |
काली अपनी दो सखियोके साथ चन्धशेखर
अदेशममक्धानकक-फ+-सामनन्नकडन..
जाया. बुक. मिलाइुअ-' “माह मेगा आया... आधा पाय आन -3 2... 2 ा.ाकमा-ारपाए अमन पहन. ऑटगाव- ७ पुहमामाथया ७ मीमयानाइआाी पी. पहना... रयकलापे+ साहा... समा या, पका सलितमुकी लक पका था थार च आफ सस्यत अप काली पपरा 2 कहता 67 ग वा; पद इस न किस उनन्ततकरन अमान उततका सरहद तक. पक फल ी-मपअिना 2. ड"ाध्याफकलीनपाडेक #शगी- जय >-क
नैपा++म०७+ कार नयु-
महादेवजीकी सेवाके लिये प्रतिदिन आती-जाती रहती थीं |;
भगवान् थंकरके चरण थोकर उस चरणामृतका पान कल
थीं। आगसे तपाकर शुद्ध किये हुए, बस्रसे ( अथवा ग्र
जल्से धोये हुए बस्नक्के द्वारा ) उनके शरीरका माजन ऋए।
उसे मलती-पोछती थीं। फिर सोलह उपचारोसे विधिक
हरकी पूज। करके बारवार उनके चरणोंमं प्रणाम करनेडे पश्च
प्रतिदिन पिताके धर छोट जाती रहों । मुनिश्रेष्ठ | इस प्र
ध्यानपरायण शंकरकी सेवार्म लगी हुई शिवाका महान् 8
व्यतीत हो गया; तो भी वे अपनी इच्द्रियोको संग्रमर्म रह
पूवंबत् उनकी सेवा करती रहीं । मह्यदेवजीने जब एिः
अपनी सेवामें नित्य तत्यर देखा; तब वे दयासे द्रवित हो
और इस प्रकार विचार करने लगे--यह काली जब दा
ब्रत करेगी ओर इसमें गर्बका बीज नहीं रह जावगा व
इसका पाणिग्रहण करूँगा |?
ऐसा विचार करके महालीला करनेवाले महायोगी
भगवान् भूतनाथ तत्काल ध्यानमें स्थित हो गये। 7?
परमात्मा शिव जब ध्यानमें रण गये; तब उनके हृद्यमेंद
कोई चिन्ता नहीं रह गयी । काली प्रतिदिन महात्नाशि
रूपका निरन्तर चिन्तन करती हुईं उत्तम भक्तिभावप्ते उ
सेवामें लगी रही | ध्यानपरायण भगवान् हर थुद्ध
वहाँ रहती हुई कालीको नित्य देखते थे | एि
पूर्व चिन्ताको भुलाकर उन्हें देखते हुए भी नहीं देखी:
इसी बीचमें इन्द्र आदि देवताओं तथा मुनियोंने बर्नाः
आज्ञसे कामदेवको वहाँ आदरपूर्वक मेजा | वे कामत्रीग्
कालीका रुद्रके साथ संयोग कराना चाहते -थे। उमके
करनेमें कारण यह था कि सहापराक्रमी तारकासुरसे वे
पीड़ित थे ( ओर शंकरजीसे किसी महान् बलवान ३
उत्पत्ति चाहते थे )। कामदेवने वहाँ पहुँचकर अने
उपायोंका प्रयोग किया । परंतु महादेवजीके मनमें तने
क्षोम नहीं हुआ | उल्टे उन्होंने कामदेवकी जलाकर मेर्श
दिया | मुने ! तब सती पारव॑तीने भी गवरहित 5 हा
आशसे बहुत बड़ी तपस्या करके शिवको पति
किया । फिर वे पाती ओर परमेश्वर परस्पर अल *
ओर प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे | उन दोनोंने परोपकार्री
रहकर देवताओंका महान कार्य सिद्ध किया।. (ऑथां
+7+<ई#5०८७१-९८०००७०-४६२०--
जी
रुद्रसंहिता ] # तारकाखुरसे सताये हुए देवताओंका ब्रह्माजीको अपनी कश्कथा खुनाना
१८३
तारकासुरसे सताये. हुए देवताओंका ब्रक्नाजीको अपनी कष्टकथा सुनाना, अह्माजीका उन्हें पाबेतीके
साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग करनेका आदेश देना, ब्रह्माजीके समझ।नेसे तारकासुरका
खर्गको छोडना और देवताओंका वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्रशील होना
' सूतजी कहते हे--तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर
पावतीके विवाहक्रे विस्तृत प्रसड़की उपस्थित करते हुए त्ह्मा-
जीने तारकासुरकी उत्पत्ति, उसके उग्र तप सनोवाडओ्छित वर-
प्राप्ति तथा देवता ओर असुर--सबको जीतकर खब॑ इन्द्रपदपर
प्रतिष्ठित हो जानेकी कथा छुनायी ।
तत्पश्चात् ब्रह्मजीने कहा--धारकासुर तीनों लेकॉको
अपने वशमें करके जब खय॑ इन्द्र हो गया; तब उसके समान
दूसरा कोई शासक नहीं रह गया। वह जितेन्द्रिय असुर
जिभुवनका एकमात्र खामी होकर अद्भुत ढंगसे राज्यका
संचालन करने लगा । उसने समस्त देवताओंको मिकालूकर
उनकी जगह देत्योंको स्थापित कर दिया और विद्याधर आदि
दिवयोनियोंको स्वयं अपने कर्ममें लगाया । मु॒ने ! तदनन्तर
(तारकासुरके सताये हुए, इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता अत्यन्त
व्याकुल ओर अनाथ होकर मेरी शरणमें आये। उन सबने
मृञ्ष प्रजापतिको प्रणाम करके बड़ी भक्तिसे मेरे सवन किया
ओर अपने दारुण दुःखकी बातें बताकर कह्य--ध्यमो | आप
ही हमारी गति हैं। आप ही हमें कतंव्यका उपदेश देनेवाले
हैं ओर आप ही हमारे घाता एवं उद्धारक हैं | हम सब देवता
''तारकासुर नामक अमिमें जलकर अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं ।
जैसे संनिषात रोगमें प्रबल औषधें भी निर्बेल हो जाती हैं;
सी प्रकार उस असुरने हमारे सभी क्रूर उपायोकी वलहीन वना
है| है | भगवान् विप्णुके सुदर्शनचक्रपर ही हमारी विजय-
0 आशा अवलम्बित रहती है | परंतु वह भी उसके कण्ठपर
एण्ठित हो गया । उसके गलेमें पड़कर वह ऐसा प्रतीत होने
हा था; मानो उस असुरको फूलकी माला पहनायी गयी हो ।
# मुने ! देवताओका यह कथन सुमकर मैंने उन सबसे
& मयोचित बात कद्दी--“देवताओ ! मेरे ही वरदानसे द्त्य
।& जि।छुर श्तना बढ़ गया हैं । अतः मेरे हार्थो ही उसका वध
#6*गी उचित नहीं | जो जिससे पलकर बढ़ा हो, उसका उसीके
(एप दघ होगा योग्य दार्य नहीं है । विपके ब्रक्षकों भी यदि
पर शाचकर बड़ा दिया गया हो तो उसे खय॑ काटना
(दचित माना शया ६ । तुमलोगेका सारा कार्य करनेके योग्य
भअगरार २0
। म् ज््ति व चुम्दरे फहनेपर भी छूय॑ उस
असुरका सामना नहीं कर सकते । तारक देत्य खय॑ अपने
पापसे नष्ट होगा | मैं जेंसा उपदेश करता हूँ; तुम वेंसा कार्य
करो । मेरे बरके प्रभावसे न में तारकासुरकका वध कर सकता
हूँ, न भगवान् विष्णु कर सकते हैं ओर न भगवान शंकर ही
उसका वध कर सकते हैं | दूसरा कोई वीर पुरुष अथवा सारे
देवता मिलकर भी उसे नहीं मार सकते; यह में सत्य कहता
हूँ | देवताओं | यदि शिवजीके वीयसे कोई पुत्र उत्पन्न हो
तो वही तारक देत्यका वध कर सकता है; दूसरा नहीं ।
सुरश्रेष्णण ! इसके लिये जो उपाय में बताता हूँ; उसे करो |
महादेवजीकी कृपासे वह उपाय अवश्य सिद्ध होगा। पूववकालमें
जिस दक्षकन्या सतीने दक्षके यज्ञमें अपने शरीरको त्याग दिया
था) वही इस समय हिसालयपत्ती मेनकाके गर्भसे उत्पन्न हुई
है । यह बात तुम्हें भी विदित ही है। महादेवजी उस कन्याका
पाणिग्रहण अवश्य करेंगे; तथापि देवताओं ] तुम स्त्रय॑ं भी
इसके लिये प्रयक्ञ करो । तुम अपने यत्नसे ऐसा उद्योग करो;
जिससे मेनकाकुसारी पावतीमें समगवान् शंकर अपने वीयका
आधान कर सके | भगवान् शंकर ऊध्वरेता हैं ( उनका वी
ऊपरकी ओर उठा हुआ है ) । उनके वीर्यकों प्रस्वलित
करनेमें केबल पार्वती ही समथ हैं | दूसरी कोई अबला अपनी
शक्तिसे ऐसा नहीं कर सकती । गिरिराजकी पुत्री वे पार्वती
इस समय युवावस्थामें प्रवेश कर चुकी हैं और हिमालयपर
तपस्यामें लगे हुए. महादेवजीकी प्रतिदिन सेवा करती हैं |
अपने पिता हिमवानके कहनेते काली शिवा अपनी दो सखियोंके
साथ ध्यानपरायण परमेश्वर शिवकी साग्रह सेवा करती हैं| तीनों
लोकीमें सबसे अधिक सुन्दरी पाती शिवके सामने रहकर प्रति-
दिन उनकी पूजा करती हैं; तथापि वे ध्यानमम् मददेश्वर मनसे
भी ध्यानहीन खितिम नहीं आते । अर्थात् ध्यान भड़ करके
पार्वतीकी ओर देखनेका विचार भी मनमें नहीं लाते | देवताओ |!
चन्द्रशेखर शिव जिस प्रकार कालीकी अपनी भार्या बनानेदी
इच्छा करें; वेंसी चेश् तुमलोग झीत्र दी प्रयत्नयूवंक करो।
में उस देत्यक्रे स्खानपर जाकर तारकामुरकों बुरे हठसे इटनेकी
चेष्टा करूँगा | अतः अब तमलोग अपने स्थानको जानो ।!
नारद ! देवताओंसे ऐसा
मिला ओर बड़े प्रेमसे दुल्यकर मेने उतसे श्स प्रकार कहा--..
कहकर में दीम ही वारकानरसे
१८७ % नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुराण]
अली मीन लीन जीन जमीन जमीन नली “रन फनी धनी न सन तन पतन “माने “जनम कनंपजक५->नमल्नन-+ जनम >री पाना जन जज कप ल्न् फनी जन्म मरी न फनी जलन न्न्ीपिनी नी की की सी? नी बी ी चऑी जल जल चक्स् ल् न्क् चैट ््ििलिलिं _/_ :_ लि सा आक््च्चचचचन्ीनचीस् च चच्तिनी जी जीन जी सी जप ससस यमन,
(तारक | यह ख्वर्ग हमारे तेजका सारतत्व है। परंत
तुम यहाँके राज्यका पालन कर रहे हो | जिसके लिये
तुमने उत्तम तपस्या की थी; उससे अधिक चाहने लगे हो |
मैंने तुम्हें इससे छोटा ही वर दिया था । खगगका राज्य कदापि
नहीं दिया था | इसलिये तुम खगेको छोड़कर प्रृथ्वीपर राज्य
करो | असुरश्रेष्ठ | देवताओंके योग्य जितने भी कार्य हैं) वे
सब तुम्हें वहीं सुलभ होंगे । इसमें अन्यथा विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है ।
ऐसा कहकर उस असुरको समझानेके बाद मैं शिवा ओर
शिवका स्मरण करके वहँसे अदृश्य हो गया । तारकासुर भी
खग्गको छोड़कर प्रृथ्यीपर आ गया और शोणितपुर ए
बह राज्य करने लगा | फिर सब देवता भी मेरी वात पु
मुझे प्रणाम करके इन्द्रके साथ प्रसन्नतापूक बड़ी सावधानीड़े छ
इन्द्रढोकम गये | वहाँ जाकर परस्पर मिलकर आपस रत
करके वे सब देवता इन्द्रसे प्रेमपूर्वंक बोले--4भगवन् | कि
शिवा जैसे भी काममूलक रुचि हो; वसा ब्रह्माजीक्ष कप
हुआ सारा प्रयक्ष आपको करना चाहिये |”
इस प्रकार देवराज इन्द्रसे सम्पूर्ण बृत्तान्त निवेदन ऋ
देवता प्रसन्नतापूवंक सब ओर अपने-अपने खानपर चहे।
( अध्याय १४-+
इन्द्रह्दारा कामका सरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहनेसे
कामका शिवको मोहनेके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद् ! देवताओंके चले जानेपर
दुरात्मा तारक देत्यसे पीड़ित हुए इन्द्रने कामदेवका स्मरण
किया । कामदेव तत्काल वहाँ आ पहुँचा । तब इन्द्रने मित्रता-
का धर्म बतछाते हुए कामसे कहा--«मित्र ! कालवशात्
मुझपर अखाध्य दुःख आ पड़ा है | उसे तुम्हारे बिना कोई
भी दूर नहीं कर सकता । दाताकी परीक्षा दुभिक्षमें) झूरवीर-
की परीक्षा रणभूमिमें, मित्रकी परीक्षा आपत्तिकालमें तंथा
स्त्रियोंके कुलकी परीक्षा पतिके असमर्थ हो जानेपर होती है ।
तात ! संकट पड़नेपर विनयकी परीक्षा होती है और परोक्षमें
सत्य एवं उत्तम स्नेहकी;। अन्यथा नहीं । यह मैंने सच्ची बात
कही है# | मित्रवर | इस समय मुझपर जो विपत्ति आयी
है, उसका निवारण दूसरे किसीसे नहीं हो सकता | अतः आज
तुम्हारी परीक्षा हो जायगी । यह कार्य केवल मेरा ही है और
मुझे ही सुख देनेवाला है; ऐसी बात नहीं | अपितु यह
समस्त देवता आदिका कार्य है, इसमें संशय नहीं दे |?
इन्द्रकी यह बात सुनकर कामदेव मुस्कराया और प्रेमपूर्ण
गम्भीर वाणीमें बोला ।
. # दातुः परीक्षा दुसिक्षे रणे शुरसस जायते।
आपत्काले तु मित्रस्याशक्तों ज्लीणां कुलुस्थ हि॥
विनते: संकटे प्राप्तेावितथस्य॒ परोक्षतः ।
सुस्नेहत्य॒तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम 0
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० १७। १२-१३ )
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कामने कहा--देवराज ! आप ऐसी बात का
हैं ! मैं आपको उत्तर नहीं दे रहा हूँ ( आवक कं;
मात्र कर रहा हूँ )। छोकमें कौन उपकारी मित्र है
बनावदी--यह खय देखनेकी वस्तु है। उहलेती कर
संकटके समय बहुत बातें करता है; वह कीम मे
का -
जी भू
रुद्रसंहिता |
तथापि महाराज | प्रभो ! में कुछ कहता हूँ, उसे सुनिये ।
मित्र | जो आपके इच्रपदको छीननेके लिये दार्ण तपस्था कर
ः रहा है, आपके उस शत्रुकों में सर्वथा तपस्थासे भ्रष्ट कर दूँगा ।
: जो काम जिससे पूरा हो सके, बुद्धिमान् पुरुष उसे उसी काममें
! छागाये। मेरे योग्य जो कार्य हो; वह सब आप मेरे जिम्मे
5१ फ़्ार
“्>ीध
च्ब+
ः बीजिये |
त्रह्मजी कहते है--क्रामदेवका यह कथन सुनकर
इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए | वे कामिनियोंकों सुख देनेवाले कामको
प्रणाम करके उससे इस प्रकार बोले ।
इच्दने कहा--तात ) मनोभव ! मैंने अपने मनमें
जिस कायको पूर्ण करनेका उद्देश्य रकखा है, उसे सिद्ध करनेमें
केरल तुम्हीं समर्थ हो। दूसरे किसीसे उस कार्यका होना सम्भव
नहीं है | मित्रवर ! मनोभव काम ! जिसके लिये आज
पुग्दारे सहयोगक्री अपेक्षा हुई है; उसे टीक-ठीक बता रहा
हैं; सुनो । तारक नामसे प्रसिद्ध जो महान दैत्य है, वह
ह्माजीका अद्भुत वर पाकर अजेय हो गया है और सभीक्रो
!:ख दे रहा है | वह सारे संसारक्ो पीड़ा दे रहा है। उसके
श़रा वारबार धर्मक्रा नाश हुआ है। उससे सब देवता और
रत ऋषि दुखी हुए हैं। सखयूर्ण देवताओंने पहले उसके
गैथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया था; परंतु उसके
ऊपर सबके अख्र-शरस्त्र निप्फल हो गये | जलके स्वामी वरुण-
श याश टूट गया | श्रीहरिका सुदर्शनचक्र भी वहाँ सफछ
गे
पेह्
हीं हुआ। श्रीविष्णुने उसके कण्ठपर चक्र चलाया, र्कितु
४ रुद्रकी ने्राश्मिसे कामका भस्म होना, रतिका विछाप #£
२८५
वह वहाँ कुण्ठित हो गया | ब्रह्माजीने महाय्रोगीश्वर भगवान्
आम्मुक्े ब्रीयसे उत्नन्न हुए बालकके हाथसे इस दुरात्मा दत्य-
की मृत्यु बतायी है | यह कार्य तुम्हें अच्छी तरह ओर प्रय्न-
पूर्वक करना है। मित्रवर | उसके हो जानेसे हम देवताओंको
बड़ा सुख मिलेगा । भगवान् शम्मु गिरिराज हिमालयपर
उत्तम तपस्थामें लगे हैं। वे हमारे भी प्रभु हैं; कामनाके
वच्ममें नहीं हैं; खतन्त्र परमेश्वर है | मेंने सुना है कि गिरिराज-
- नच्दिनी पाग्रती पिताक्री आज्ञा पाकर अपनी दो सखियोक्े
साथ उनके समीप रहकर उनकी सेवामे रहती हैं | उनका यह
प्रयक्ष महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये ही है | परंतु
भगवान् शिव अपने सनको संयम-नियमससे वशमें रखते हैं |
मार | जिस तरह भी उनकी पार्यतीमं अत्यन्त रुचि हो जाय)
तुम्हें वैसा ही प्रयल करना चाहिये। यही काय करके तुम
कतार हो जाओगे और हमारा सारा दुःख नष्ट हो जायगा |
इतना ही नहीं, व्लेकमे तुम्हारा स्थायी प्रताप फेल जायगा ।
ब्रह्माजी कहते हें--नारद ! इन्द्रके ऐसा कहनेपर
कामदेवका मुखारबिन्द प्रसन्नतासें खिल उठा | उसने देवराज-
से प्रेमपूवक कहा--८मैं इस कार्यको करूँगा। इसमें संशय
नहीं है |? ऐसा कहकर शिवक्री मायासे मोहित हुए; कामने
उस कार्यके लिये खीकृति दे दी ओर शीम ही उसका भार छे
लिया । वह अपनी पत्नी रति ओर बमसनन््तको साथ ले बड़ी
प्रसन्नताके साथ उस स्थानपर गया) जहाँ साक्षात् योगीश्वर
. शित्र उत्तम तपस्पा कर रहे थे | ( अध्याय १७ )
हि नेत्राभिसे जज 52 #लस्स-
रुद्रका नेत्राम्रेसे कामका सस होना, रतिका विलाप, देवताओंकी ग्रार्थनासे शिवका कामको द्वापरसें
| रकी ८५, लिये दे ल्र के
प्रद्युस्तरूपसे नूतन शरीरकी ग्राप्िके लिये वर देना ओर रतिका शम्बर-नगरमें जाना
हिट प्रक्माजी कहते हँ--मुने | काम अपने साथी बसन्त
आदियो लेकर वहाँ पहुँचा | उसने भगवान् शिवपर अपने
शय चढाये | तब शंकरजीक्रे सनमें पारवतीके प्रति आकर्षण
नि लगा और उनका थैय छूटने लगा | अपने बैयका हास
पा देस महायोगी महेश्वर अत्यन्त त्रिस्मित हो मन-ही-मन
एस प्रवार चिन्तम बरने लगे ।
.. शिव बोले--मैं ते उत्तम तपस्या कर रद्य था उसमें
। + फसे आ गे ? किस कुकर्मीने यहाँ मेरे चित्तमं विकार पेदा
5 ट
४ हटा:
८४ पिचार करके सत्पुरपोके अधवदाता सहायोगी
6
शिए् "श्ायन्त या णे स््ूण व्गाः जद अप
आज न १ [, (् कक कर ं दि न है, हक थ् प्र 29 देग्वने
पट्टा बे
लगे | इसी समय वामभागमं बाण खींचे खड़े हुए कामपर
उनकी दृष्टि पड़ी | बह मृदचित्त मदन अपनी शक्तिके घमंडमें
आकर पुनः अपना बाण छोड़ना दही चाहता था | नारद |! इस
अबस्थामें कामपर दृष्टि पड़ते ही परमात्मा गिरीशकों तत्काल
रोप चंद आया | मुने ) उघर आक़राण्र्म बागसहित घन॒ुप
लिये खड़े हुए कामने भगवान् दांकरपर अपना आअमोघ अख्त
छोड़ दिया; जिसद्ा निवारण रूख्ना बहुन ाठिन था | परंतु
परमात्मा शिवपर बह अमोब अल भी माय ( व्यर्थ ) हो गया:
कुपित हुए परमेशरके णस झातें ही झन्त हो यथा | मगदान
जि
शिव्पर आप हु हट व्यू | शक 7 पर मई है है. लक
दिवपर आपने झअनझा ब्यथ हा जानपर मन्मश ( काम ) क।
न्जा क्र जा ही कक
झा | धगदानल मसंस्यकज्षूणओार पधचमान देम्तद्ूर ८?
है ७7 | बग जब < 5 +«5 दे ऋगमन ५» 3८.९ ००
अियलत+-ा ८ १० पामामी--ान 7 जद. >की--मामाा मानीन
बाप उठा और इन्द्र आदि समस देखताओंबा स्मरण कंस्ने
लगा । मुनिश्रेष्ठ | अपना प्रयास निष्फ हो जनिपर काम
भयसे व्वाकुल हो उठा था। मुनीश्वर | कामदेवके स्मरण करने-
पर वे इन्द्र आदि सब देवता वहाँ आ पहुँचे ओर झम्गुको
प्रणाम करके उनकी स्वुति करने लगे |
देवता स्तुति कर ही रहे थे कि कुपित हुए भगवान् दृरके
ललायके मध्यभागम स्थित तृतीय नेत्रसे बड़ी भारों आग
तत्काल प्रकट होकर निकली । उसकी ज्वालाएं ऊपरकी ओर
उठ रही थीं | वह आग घू-घू करके जलने छगी | उसकी
प्रभा प्रल्यामिके समान जान पड़ती थी । वह आग तुरंत ही
आकाशमें उछली ओर प्रध्बीपर गिर पड़ी | फिर अपने चारों
. ओर चक्कर काठ्ती हुई धराशायिनी हो गयी । साधो !
“भगवन् | क्षमा कीजिये; क्षमा कीजिये? यह बात जबतक
4 55 | ३ ।
(5.
देवताओंके मुखसे निकले, तबतक ही उस आगने कामदेवकों
जल्यकर भस्म कर दिया । उस वीर कामदेवके मारे जानेपर
देवताओंको बड़ा दुःख हुआ | वे व्याकुल हो हाय ! यह
क्या हुआ ?? ऐसा कह-कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करते हुए.
रोने-बिल्खने लगे । |
उस समय विक्षतचित्त हुईं पारवतीका सारा शरीर सफेद
पड़ गया---कागो तो खून नहीं | वे सखियोंको साथ ले अपने
भवनकी चली गयीं | कामदेवके जल जानेपर रति वहाँ एक
क्षणतक अचेत पड़ी रही | पतिकी मृत्युके दुःखसे वह इस
तरह पड़ी थी; मानो मर गयी हो । थोड़ी देरमें जब होश हुआ;
तब अत्यन्त व्याकुल हो रति उस समय तरह-तरहकी बातें कह-
कर बिलाप-करने लगी |
$ नमो रुद्राय शास्ताय त्रह्मण परमात्मने 5:
काम हजननुफम छा पानाक सन हन कक मानकर न कर किए दइ का कारक उकाएरका रावत लिरदपर रा 4 चमक ए 5 भ्ाउभकन्-म जमकर कक धान कमयुक्बरूमहरतरदभुफआ का 5 कपास 6:70 4#हएक्रलााइभपुुरपवउ सरदार शयत नए यथा ८ धचराााननऋक् काजल धर फनझानतदाऋमपबहन इतर तन + घन तभ्रल॒ जप भ ऊपर ला >>
[ संश्षिप्त-शिवपुरणह
स्य्म्प््ख््य्य्ख््ख्ल्स््््य््ललय्य््य््य्य्च्च्य््स््य्स्य्य्य्््िि
रति बाली-द्वाय ! में क्या करूँ? कहाँ लईठ।
देवताओंन यह क्या किया ? मेरे उद्बण्ड खा्मीकों दुख
नट्ठर करा दिया। हाय ! हाथ । साथ ! समर ! छाप
प्राणपिय | हा मुद्दे सुख देनेबाले प्रियतम | हा प्राज़ाय!
यह यहां क्या हो गया ?
च्रह्माजी कहते ह--नारद | इस प्रकार राती) विख्हई
20070 0 00 0000 70)
: थ 9.2: 2] ५ / 2.
ओर अनेक प्रकारती बातें कहती हुई रति दाथ-पेर पके
ओर अपने गिरके बाल्की नोचने लगी | उस ह
उसका विलाप सुनकर वहाँ रहनेवाले समस्त बनवार्मी:
तथा ब्रक्ष आदि ख्थावर प्राणी भी बहत दुखी हो गये | :
बीचम॑ इन्द्र आदि सम्रण॑ देवता महादिवजीका सा द
हुए रतिको आश्वासन दे इस प्रकार बोल |
देवताओंने कहा--ठुम कामके शरीर थोड़
भस्म लेकर उसे यत्मपूर्वक खो और
छोड़ो | हम सबके स्वामी महादेवजी कहे
पुनः जीवित कर देंगे ओर तुम फिर +
प्रियतमको प्राप्त कर छोगी । कोई किसी
तो सुख देनेवाल्य है ओर न कोई हुःख
देनेबाल। है | सब लोग अपनी-अपनी ऋर्
फल भोगते हं । ठुम देवताओंको दोः रे
व्यथ ही शोक करती हो।
इस प्रकार रतिकोी आश्वासन दे
देवता भगवान् शिवक्रे पास ओे *
उन्हें भक्तिभावसे प्रसन्न करके या वोले |
देवताओंने कह[--भगवन् ! शरणागतवतल में
आप कृपा करके हमारे इस चझुभ बचनकी सुनिये |
आप कामदेवकी करतूतपर भलीमाौति प्रसब्नतापूर्ते वि
कीजिये । महेश्वर | कामने जो यह कार्य -किया के!
उसका कोई स्वार्थ नहीं था । दुष्ट तारकासुरसे पीड़ित
हम सब देवताओंने मिलकर उससे यह काम कराये ३
नाथ ! शंकर |! इसे आप अन्यथा न समझे | सब $
वाले देव ! गिरीश | सती-साध्वी रति अकेली अति ढुंशी हा
विलाप कर रही है। आप उसे सान्त्वना प्रदात करें | |
यदि इस क्रोधके द्वार आपने कामदेवकों मार ही!
हम यही समझेगे कि आप देवताओँसहित समस्त
अभी संहार कर डालना चाहते हैं । रतिकां ढ/-
ह५ . पफ अनर
न्ल्््््स्ल््ल्स्य्स्््स्स्य्य्स्स््स्य्स्य्स््स्य्स्स्स्स्स्स्य्स््स्स्स्स्स्म्स्स्स्स्स्ल्स्च्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ः
रहे हैं; इसलिये आपको रतिका शोक घनको लेकर उसके साथ पुनः नगर जायगा । मेरा यह
देवता नष्टप्राय
दूर कर देना चाहिये |
ब्रह्माजी कहते हँ--नास ! समूर्ण देवताओंका यह
वचन सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न हो उनसे इस
प्रकार बोछे |
शिवने कहा--देवताओ ओर ऋषियो ! तुम सत्र
. आदसपूरबक मेरी बात सुनो । मेरे क्रोससे जो कुछ हो गया
+ध्रए
. हैं, वह तो अन्यथा नहीं हो सकता;
तथापि रतिका शक्ति-
; शाढ्यी पति कामदेव तभीतक अनझ्ढ ( शरीररहित ) रहेगा,
५ जबतक रुक्मिणीपति श्रीकृ्णणा धरतीपर अबतार नहीं हो
. जाता | जब श्रीक्षप्ण द्वारकामें रहकर पुत्रोकी उत्पन्न करेंगे;
तब वे रक्मिणीके गर्मसे कामकी भी जन्म देंगे । उस कामका
दी माम उस समय प्प्रयुम्न” होगा--इसमें संशय नहीं है ।
उस पुत्रके जन्म लेते ही शम्बरासुर उसे हर लेगा । हरणके
पश्चात् दानवशिरोमणि श्ाम्बर उस शिक्ष॒ुकी समुद्रमें डाल
देगा | फिर वह मूद् उसे मर हुआ समझकर अपने नगरको
लोट जायगा । रते | उस समयतक तुम्हें शम्बरासुरके नगरमें
मुखपूवंक निवास करना चाहिये । वहीं तुम्हें अपने पति
प्रयुम्नकी प्राप्ति होगी । वहाँ तुमसे मिलकर कास युद्धमे
शम्बरासुरका वध करेगा और सुखी होगा । देवताओ !
प्रचुम्न-नामघारी कास अपनी कामिनी रतिको तथा झम्बरासुरके
ब्रह्माजीका शिवकी ऋ्रोधाशिको वडवानलेकी संज्ञा दे समुद्र स्थापित करनों $#
१८७
थन सबंधा सत्य होगा ।
त्रप्चाजी कहते ह--नारद ! भगवान् शिवको यह
बात सुनकर देवताओँके चित्तमें कुछ उल्लास हुआ ओर वे
उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ विनीतभावसे बोले |
देवताओने कहा--देवदेव ! महादेव ! करुणा-
सागर | प्रभो | आप कामदेवको श्वीघत्र जीवन-दान दे तथा
रतिके प्रार्णोकी रक्षा करे ।
देवताओंकी यह बात सुनकर सबके स्वामी करुण[सागर
परमेश्वर शिव पुनः प्रसन्न होकर बोले--“देवताओ ! में बहुत
प्रसन्न हूँ । में कामको सबके हृदयमें जीवित कर दूँगा |
वह सदा मेरा गण होकर विहार करेगा | अब अपने खानको
जाओ | मैं तुम्हारे दुःखका सवेथा नाश करूँगा |!
ऐसा कहकर रुद्रदेव उस समय स्त॒ति करनेवाले
देवताओंके देखते-देखते अन्तर्घान हो गये । देवताओंका
विस्मय दूर हो गया ओर वे सब-के-सब प्रसन्न हो गये |
मुने | तदनन्तर रुद्रकी वातपर भरोसा करके ख्थिर रहनेवालि
देवता रतिको उनका कथन सुनाकर आश्वासन दे अपने-अपने
सखानको चले गये | मुनीश्वर | कामपत्नी रति शिवक्ते बताये
हुए. शम्बरनगरकी चली गयी तथा रुद्रदेवने जो समय
बताया था; उसकी प्रतीक्षा करने लगी |
( अव्याय १८-१९ )
बद्माजीका शिवकी क्रोधाग्तिकों वड़वानलकी संज्ञा दे समुद्रमे खापित करके संसारके भयकों
दर करना, शिवके बिरहसे पावंतीका शोक तथा नारदजीके द्वारा उन्हें तपथाके
| लिये उपदेशपूर्वक पश्चाक्षर मन्त्रकी प्राप्ति
». प्रह्माजी कहते ह--नारद ! जब्र भगवान् रुद्रके तीसरे
भेत्से प्रकट हु॑ई अग्निमे कामदेवकी शीघ्र जलकर भस्म कर
दिया; तब चद्द बिना क्विसी प्रयोजनके ही प्रज्वलित हो सब
आर फैलने लगी । इससे चराचर प्राणियोसहित तीनों लोवमें
गहन हह्याघार मच गया । तात ! सम्पूर्ण देवता ओर
' कप नुरंत भरी दारणमें आये । उन सबने अल्न्त व्याकृुल
्िर मलक उंज दोनों हाथ जोड़ मुस्ते प्रणाम किया ओर
: भैं| सुति करके वह दुःख निवेदन किया । बहू सुनकर में
$ गया शिपप्रा सारण करके उसके ऐनुका भडीमौति विचार-
छाप सोरदी रपारे डिये विनीतभावसे दहोँ पहुँचा |
प्यणागालाओझंसे अत्यन्त उसे हो जगवकों हुला
ह्
देनेक्रे लिये उयत थी | परंतु भगवान शिवकी ऋपासे प्राप्त
हुए उत्तम तेजके द्वारा मेने उसे तत्काल स्तम्मित कर दिया ।
मुने ! त्रिछोकीकों दग्ध करनेकी इच्छा रखनेवाली उस क्रोषमयव
अग्निको मेंने एक ऐसे घोड़ेक्रे रुपमें परिणत कर दिया;
जिसके मुखसे सोम्ब ज्यात्य प्रकद हो री थी । भगवान
शिवकी इच्छासे उस शाइब-द्वरीर ( घोड़े ) दाली अम्निक्ते
लेकर में लोकहितके लिये समुद्रतव्पर गया। मने ! रस आया
देख समुद्र एक दिव्य पुरुषक्रा ऋझप धारण करके हाथ छोड़े
हुए मेरे पास आया । मुझ सम्पूर्ण लोकोंके पिनामदकी भी-
अति वि खित्रतू सवातिशन्दरतणा ऋश्फक लिल्शसे मंतर प्रमगना-
बेदः कहा |
१८८ ५५ नमो रुद्ठाय शास्ताय शरह्मण परमात्मने ३ [ संक्षिप्त-शिवपुराण:
पल कमर पक प पड पड प पपिजप कप पक मम मय 77: पड पी फ्सटफपपत पक उककलक्क्
पधारे हैं ! मुझे अपना सेवक समझकर इस
पूर्वक कहिये ।
सागर वोला--एर्बेभर प्रह्मन ! आप यहाँ किसलिये
बांतकों प्रीति-
व
कब ग 5 मम कट नह कं
५२ कै 6 ३ ञ हु के -६ $ हर न + छू *
बह । 30% ० ०० न]
बने बा कर «आओ
क .>म«-ममक्मननन पाक तक के १. ०.» व्यन -« __ 8 >2:7>प्स्सत्त्टस्सट: हे बज
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उश्य-आ यउ म८ कई “8.६. 39 उलम] ख्ट >श्थ्य़ा
'... 2 कक. कन््_-_- हु कक अपमान १२ ७ “यार हे ५ ७७७४००८-- का न पट श्र नजर कै
2८22 ०५५०८. ्ट्यिषद ब। जंमपाकक०- हक +-++> ७» >> “07८7० (2.० - कैन्ारग 2.
न न् के 7 2. 00 ्य
बटन-
चऊ
सागरकी बात सुनकर . भगवान् शंकरका स्मरण करके
लोवहितका ध्यान रखते हुए: मैंने उससे प्रस्॒तापूवंक कहा--
धतात सम॒द्र | तुम बढ़ें बुद्धिमान और सम्पूर्ण लोकेकि हितकारी
हो । मैं शिवकी इच्छासे प्रेरित हो हार्दिक प्रीतिपूवंक तुमसे
कह रहा हैँ. । यह भगवान् महेश्वरका क्रोध है, जो महान
शक्तिशाली अश्वके रुपमें यहाँ उपस्थित है । यह कामदेवको
दग्ध करके तुरंत ही समयूर्ण जगत्कों भस्म करनेके लिये उद्यत
हो गया था । यह देख पीड़ित हुए. देवताओंकी प्रार्थनासे में
शंकरेच्छावश वहाँ गया और इस अग्निको स्तम्मित किया ।
फिर इसने घोड़ेका रूप धारण किया और इसे लेकर में यहाँ
आया । जल्घार ! मैं जगत्पर दया करके तुम्हें यह आदेश
दे रहा हूँ---इस महेश्वस्के क्रोधकों) जो वाड़बका रूप धारण
करके मुखसे ज्वाला प्रकट करता हुआ खड़ा है, तुम प्रलुय-
काल्पर्यन्त धारण किये रहो | सरितते ! जब में यहाँ आकर
बास करूँगा; तब तुम भगवान् शंकरके इस अद्भुत क्रोधको
छोड़ देना । ठागद्ारा जछ ही प्रतिदिन इसका भोजन तो।।
तुम यलपूर्बक इसे ऊपर ही धारण किये रँना। किसे के
तम्दारी अनन्त जलगशिक्रे भीतर न चछा जाय |!
ब्रह्माजी कहते हं--नारद ! मेरे ऐसा कहनेपर पढ़े
रद्रदी क्रोधाग्सिहप बड़वानलकी धारण करा संक्
कर लिया; जो दूमरेके लिये असम्भत्र था। तक्षद
बह बड़बाग्नि समुद्रमे प्रविष्ट हुई ओर ज्यालमालओंते फ्री
हो सागरक्ी जलराशिका दहन करने छगी । मुने ! झ
संतुट्चित्त होकर में अपने लोककों चला आया ओर
दिव्यस्पधारी समुद्र मुझे प्रणाम करके अद्ब्य हे फ्र
महाम॒ने ! रुद्रकी उस क्रोधाग्निके भयसे छृट्कर समूणे का
खख्ताका अनुभव करने लगा और देवता तथा १
सुखी हो गये ।
नारदजी बोले--दवानिधे | मदनदहनके पश्चात्
राजनन्दिनी पार्वती देवीने क्या क्रिया ! वे आनीदे
सखियोंके साथ कहाँ गयीं ? यह सब मुझे बताइवे ।
ब्रह्माजीने कहा--भगवान झंकरके नेत्रसे उतन्न !
आगने जब कामदेवकों दग्य किया) तब वहाँ महात #!
शब्द प्रकट हुआ। जिससे सारा आकाश गूँजे ४
उस महान शब्दके साथ ही कामदेवकों दग्ध हुआ
भयभीत और व्याकुछ हुई पार्ती दोनों सखियेकि ताप
घर चली गयीं | उस शब्दसे परिवारसहित हिमवाव मे
विस्मयमें पड़ गये और वह्“ँ गयी हुई अपनी पुत्रीका ९
करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ । इतनेमें ही पाव॑ती दूरी *
हुई दिखायी दीं । वे शम्भुके विरसे रो रही थी । १
पुनत्नीको अत्यन्त विहल हुई देख शेलराज हिमवानईी
शोक हुआ और वे शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचे व
हाथसे उसकी दोनों आँखें पॉछकर बेलि-- शिव : ढ्गे
गेभो मत ।? ऐसा कहकर अचलेश्वर हिमवानते अल |
हुई पार्वतीको शीघ्र ही गोदमें उठा लिया और उसे में
देते हुए वे अपने घर ले आये ।
कामदेवका दाह करके महादेवजी अर रे
थे । अतः उनके विरहसे पार्वती अलन्त व्याकुट
थीं। उन्हें कहीं भी सुख या शान्ति नहीं मिलती
पिताके घरः जाकर जब वे अपनी मातसे ५
समय पार्वती शिवाने अपना नया जन्म ही
वे अपने रूपकी निन््दा करने लगीं और बोल,
मैं मारी गयी ।? सखियोंके समझानेपर भी
न् ताग्डजीसे उन्हे धर ..प पं
:द्रसंहिता ] # शिवके विरहसे पार्वतीका शोक तथा नारदजीसे उन्हें तपका उपदेश ओर पश्चाक्षरमन््त्रकी प्राप्ति * १८९
क्रमारी ऋछ समझ न्हं| पाती थीं । वे सोते जागते $ खाते
भोते, नहाते-धोते, चलते-फिस्ते और सलियेक्रि बीचमें खड़े
'होते समय भी कभी किंचिन्मात्र मी सुखका अनुभव नहीं
करती थीं। मेरे ख्वरूपको तथा जन्म-कर्मको भी धिक्कार हैं?
ऐसा कहती हुई वे सदा महादेवजीकी प्रत्येक चेष्ठका चिन्तन
(करती थीं | इस प्रकार पावेती भगवान् शिवके विरसे मन-
छी-मन अत्यन्त क्लेशका अनुमव करती ओर किंचिन्मात्र भी
मुख नहीं पाती थीं। वे सदा (शिव, शिव?! का जप किया
+ररती थीं । शरीरसे पिताके घरमें रहकर भी वे चित्तसे पिनाक-
४गणि भगवान शंकरके पास पहुँची रहती थीं । तात | शिवा
[डीकमन हो वारंबार मूर्च्छित हो जाती थीं । शैलराज हिसवान,
27नकी पत्नी मैनका तथा उनके मेनाक् आदि सभी पुत्र; जो
डड़े उदारचेता थे, उन्हें सदा सान्त्वना देते रहते ये | तथापि
भगवान् शंकरको भूल न सकी |
बुद्धिमान् देवव॑ | तदनन्तर एक दिन इन्द्रकी प्रेरणासे
नुसार घूमते हुए तुम हिमालय पर्व॑तपर आये | उस
य भहात्मा हिमबानने तुम्हारा स्वागत-सत्कार किया और
पढ-मज्नल पूछा | फिर तुम उनके दिये हुए. उत्तम आसन-
वैं० । तदनन्तर शोलराजने अपनी कन्याकरे चरित्रका
र्मसे ही वर्णन किया । किस तरह उसने महादेवजीकी
॥ आरम्भ की और किस तरह उनके द्वारा कामदेवका दहन
॥नयह सत्र कुछ बताया । मुने | यह सब सुनकर तुमने
रिराजसे कहा--शेलेश्वर ) भगवान् शिवका भजन करो |
उनसे ब्रिदा लेकर तुम उठे और मन-ही-मन शिवका
एण करके शेलराजको छोड़ शीम्र ही एकान्तमे कालीके
प् आय गये । मुने | तुम लोकीपकारी, शानी तथा झिबके
ये भक्त हो; समस्त ज्ञानवानोंके शिरोमणि हो, अतः काली
गैस आ उसे सम्बोधित करके उसीके हिलमे स्थित हो
से सादर यहू सत्य बचन बोले |
नारदज।ने ( तुमने ) कह(--कालिके | ठम मेरो बात
गां। भें दयावश सच्ची बान दाह रहा हैं | भरा वच्चन तम्दयर
पे लवथा दतिकर; निदाप तथा उत्तम काम्य बसतुओंबो देने
हि। हया | तुमने बह सहादेवजीकी सेवा अवध्य की थी
९ ता ताझाक गवंयुक्त होकर की थी | दीनोंपर
६ परनवाड शियने बग्हरें इसी गयकों बट क्रिया
३२ द्िसन््द्र आर महायोगी हैं | उन्होंने
है.
हे हि आफ | छः ! स्का च्क्ः ्लपादा न ल3- 5
भर, ऋप्यादर दी हुम्द सदुधल होड़ दिया ट,
उसमें यही कारण है कि वे भगवान् भक्तवत्सल हैं | अतः तुम
उत्तम तपस्यामें संलग्न हो चिरकाल्तक महेश्वरक्की आराधना
करो । तपस्यासे तुम्हारा संस्कार हो जानेपर रुद्रदेव तुम्हें अपनी
सहधर्मिणी बनायेंगें ओर तुम भी कभी उन कल्याणकारी
शम्भुका परित्याग नहीं करोगी । देवि ! तुम हृठपूतंक शिवको
अपनानेका यत्न करो । शिवक्रे सिवा दूसरे किसीको अपना
पति स्वीकार न करना |
त्रह्माजी कहते हं--मुने ! त॒म्हारी यह बात झुनक
गिरियजकुसारी काली कुछ उल्लमित हो व॒मसे हाथ जोड़
प्रसन्नतापूथक बोलीं |
शिवाने कहा--प्रभो ! आप सर्वज्ञ तथा जगत्का
उपकार करनेवाले हैं | मुने ! मुझे रुद्रदेवकी आराधनाके लिये
कोई मन्त्र दीजिये ।
ब्रह्माजी कहते हँ--मारद ! पार्यतीका यह बच्चन
सुनकर ठुसने पश्चाक्षर शिवमन्त्र ( नमः शिवाय ) का उन्हें
विधिपृवक उपदेश किया | साथ ही उस मन्त्रराजमें श्रद्धा
उत्न्न करनेक्रे लिये तुमने उसका सबसे अधिक
प्रभाव बताया |
नारद ( तुम ) बोले--देव्रि ! इस मन्त्रका परम अद्भुत
प्रभाव सुनो | इसके श्रवणमात्रसे मगवान दांकर प्रसन्न हो
जाते हैं | यह सन्त्र सत्र मन्त्रोंका राजा ओर भनोवाण्छित
फलको देनेबाल्य है | भगवान् शंकरको बहुत ही प्रिय है. तथा
साधकरको भोग ओर मोक्ष दोनों देनेमें समर्थ है। सोभाग्य-
शालिनि | इस मन्त्रका विधिपू्वंक जप करनेसे तुम्हारे द्वारा
आंराधित हुए भगवान् शिव अवच्य ओर श्षीम तुम्हारी
आँखोंके सामने प्रकट हो जायेंगे । थिवे [ शजीच-संतोपादि
नियमाम तत्यर रहकर भगवान् शथिवके सत्पका चिन्तन करती
तुम पश्चाश्षरमन्त्रका जग करो । इससे आराध्यदेव शिव
शीघ्र ही संठठ हांगे | साथी | इस तरह तपस्पा करो |
तपस्यासे मद्देश्वर बद्यमं है सकते हैं । तपस्थासे ही सबको
मनोबाब्छित फल्की प्राति हाती हे; अन्यथा नहीं ।
प्रह्माजा कहत हू--नारद | तुम भगवान शथिवक्त प्रिय
भक्त आर इच्छानुनार विचरनेवाले हो | तमने क्ालीम
इउक्युक्त वात कुकर दवताझाक टुतम नरार हों स्वरगंटॉकिता
प्र्यान छिया । तुम्हारों बात सुनकर उस समय पाती बहुल
प्रसन्न हुई । उन्हें प्रस्म उत्तम परद्धालस्मन्च्र प्रा
कि मनु “दान्पक- इक. रत 4 है:8 6 । अक सका श
टै। चंदा खा | ( ऋषाय २०-२१ ।
_-+-+++<ऊानसमड्ि - फीफिी तीन
१९०
०-७. सनक -+ड- २७० .*:०88७७--8५-अ#*५४०७७+म्पूकमन--+ कम... इमाम... -4+- आए बम्माओम्यीक.ड>म+.
४ नमों रद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5:
.[ संक्षिप्त-शिवुणा]
प2४)५७०न४ कक...
श्रीशिवकी आराधनाके लिये पार्वतीजीकी दृष्कर तपस्या
प्रह्माजी कहते है--देवप ] तुम्हारे चले जानेपर
प्रफूछचित्त हुईं पाबेतीने महादेवजीको तपस्यासे ही साध्य माना
ओर तपस्पाके लिये ही मनमें निश्चय क्रिया | तब उन्होंने
अपनी सखी जया और विजयाके द्वारा पिता हिमाचल और
माता मेनासे आज्ञा माँगी। पिताने तो स्वीकार कर लिया;
परंतु माता मेनाने स्नेहबश अनेक प्रकारसे समझाया ओर घरसे
दूर बनमें जाकर तप करनेसे पुत्नीको रोका । मेनाने तपस्यकि
लिये वनमें जानेसे रोकते हुए. ५उ? थमा! ( बाहर ने जाओ )
ऐसा कहा; इसलिये उस समय दिबाका नाम उम्रा हो गया ।
मुने | शेलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने रोकनेसे शिवाकों दुखी
हुईं जान अपना विचार बदल दिया और पार्बतीकों तपस्याके
लिये जानेकी आज्ञा दे दी। मुनिश्रेष्ठ | माताकी वह आज्ञा
पाकर उत्तम त्रतका पालन करनेवाली पार्वतीने भगवान् शंकर-
का स्मरण करके अपने मनमें बड़े सुखका अनुभव किया |
माता-पिताको प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करके शिवके स्मरणपूर्यक
दोनों सखियोंके साथ वे तपस्या करनेके लिये चली गयीं |
अनेक प्रकारके प्रिय बस्तरोंका परित्याग करके पावतीने
कंटि-प्रदेशमें सुन्दर मूँजकी मेखला बाँध ज्ीघ्र ही वल्क॒ल घारण
कर लिये | हरका परिहार करके उत्तम मुृगचर्मको हृदयसे
लगाया | तत्पश्चात् वे तपस्थाके लिये गद्भावतरण ( गजद्ढीत्तरी )
तीथेंकी ओर चलीं ।
जहाँ ध्यान लगाते हुए भगवान् शंकरने कामदेवको
दग्घ किया था; हिमालयका वह शिखर गद्नावतरणके नामसे
प्रसिद्ध है। वहीं परम उत्तम श्वद्धितीर्थमें पार्यतीने तपस्या
प्रारम्भ की | गोरीके तप करनेसे ही उसका “गौरी-शिखरः
नाम हो -गया । मुने | शिवाने अपने तपकी परीक्षाके लिये
वहाँ बहुत-से सुन्दर एवं पवित्र बुक्ष लगाये; जो फल देनेवाले
थे । सुन्दरी पावेतीने पहले भूमि-शुद्धि करके वहाँ एक
वेदीका निर्माण किया | तदनन्तर ऐसी तपस्या आरम्भ वी,
जो भुनिरयोके लिये भी दुष्कर थी | वे मनसहित सम्पूर्ण
इन्द्रियोंकी शीघ्र ही काबूमें करके उस वेदीपर उच्चकोटिकी
तपस्या करने लगीं । ग्रीष्म ऋतुमें अपने चारों ओर दिन-रात
आग जलाये रखकर वे बीचमें वैठतीं और निरन्तर पद्माक्षर
जे क्र
मन्त्रका जप करती रहती थीं। वर्षो ऋत॒र्म वेदीपर हुद्ध
आसनसे बैठकर अथवा किसी पत्थरकी चश्मनपर ही अत
लगाकर वे निरन्तर वर्षाकी जलबारासे भीगती रही ई।
शीतकालमं निराहार रहकर भगवान् शंकरके मजनमे त्याए
वे सदा घीतल जलके भीतर खड़ी रहती तथा रातभर ब़्
चद्मानोंपर ब्रेठा करती थरीं। इस प्रकार तप करी हैं
पश्चाक्षर मन्त्रके जप संलान हो शिवा सझूर्ण मनोत्रक्ि
फलकि दाता शिवक्रा ध्यान करती थों। प्रतिदिन कक
मिलनेपर वे सखियोके साथ अपने छगावे हुए झेे
प्रसन्नतापूतंक सींचतीं ओर वहाँ पथारे हुए अतेफि
आतिथ्य-सत्कार भी करती थीं |
झुद्ध चित्तवाली पायतीने प्रचण्ड आँधी, कड़ाकेशी छ
अनेक प्रकारकी वर्षो तथा दुस्सह घूपका भी सेवन ह्लि।
उनके ऊपर वहाँ नाना प्रकारके हुःख आये, परंतु ठईः
उन सबको कुछ नहीं गिना | मुने | वे केवल किक
लगाकर वहाँ सुस्थिरमावसे खड़ी या बैठी रहती थीं।ऊ
पहला वर्ष फछाहारमें बीता और दूसरा वर्ष उद्ेने कः
पत्ते चबाकर बताया | इस तरह तपथ्या करती हुई
पावतीने क्रमशः असंख्य वर्ष व्यतीत कर दिये |
हिमवानकी पुत्री शिवा देवी पत्ते खाना भी छोड़कर शी
निराहार रहने लगीं; तो भी तपश्चर्यामें उनका अवुरग #
ही गया | हिमाचलपुन्नी शिवाने भोजनके लिये पर्की
परित्याग कर दिया | इसलिये देवताओंने उनका ताम और
रख दिया । इसके बाद पार्वती भगवान् शिवके सा
एक पेरसे खड़ी हो पश्चाक्षर मन्त्रका जप करतो हैं
भारी तपस्या करने छगीं। उनके अज्ञ चीर और बल
थे | वे मस्तकपर जटाओंका समूह घारण किये रहती का
प्रकार शिवके चिन्तनमें छगी हुई पार्वतीने अपनी हि
द्वारा मुनियोंकी जीत लिया | उस तपोवन्मे गहं
चिन्तनपूर्वक तपस्या करती हुई कालीके तीन ही.
बीत गये । |
|
(् ) हर
वर्षो |
तदनन्तर जहाँ महादेवजीने साठ हंजार 4 खा
किया था; उस स्थानपर क्षणमर ठहरकर शिवा
तिल री कर | कस > ५
सुट्ठसंहिता] #पार्वतीकी तपस्थाविषयक दढता, उनका पहलेसे भी उम्र तप, उससे त्िछोकीका संतप्त होना १९१
प्रकार चिन्ता करने लगीं--क्या महादेवजी इस समय यह
, नहीं जानते कि में उनके लिये नियर्मोके पालनमें तत्पर हो
। तपस्या कर रही 8 ? फिर क्या कारण हे क्रि सुदीब ऋल्से
तपस्थामें ठगी हुई मुझ सेविकाके पास वे नहीं आये त्येकमें;
बेद्म और मुनियोद्वार सदा गिरीशकी महिमाका गान
? क्रिया जाता है। सब यही कहते हैं कि भगवान् शंकर
(£ सबज्ञ; सर्वात्मा: सर्वदर्शी, समस्त ऐश्वर्यॉंकि दाता; दिव्य दाक्ति
सम्पन्न; सबके मनोभावोकों समझ लेनेवाले; भक्तीकी उनकी
:; अभीए वरत देनेवाले ओर सदा समस्त ब्लेशोका निवारण
£ करनेवाले हैं । यदि में समस्त कामनाओंका परित्याग करके
>भावान् ब्रप्रभव्थजमं अनुसक्त हुई हूँ तो वे कल्याणकारी
भगवान शिव यहाँ मुझपर प्रसन्न हों | यदि मेने मारदतन्त्रोक्त
' शिवपश्चाक्षर मन्त्रका सदा उत्तम भक्तिमावसे विधिपूर्वक जप
फैबा हो तो भगवान झंकर सुझपर प्रसन्न हों। यदि
वश्बर शिवकी भक्तिसे युक्त एवं निर्विकार होऊ तो भगवान्
कर मुझपर अत्यन्त प्रसन्न हो |?
इस तरद् नित्य चिन्तन करती हुईं जठा-वल्कलधारिणी
विकार पाबती मेह नीचे किये सुदीर्घधकालतक तपस्यामें लगी
हीं। उन्होंने ऐसी तपस्था की, जो मुनियोके लिये भी दुष्कर
॥ | वहाँ उस तपस्थाका स्मरण बरके पुरुषोंकी बड़ा विस्मय
!आ। महर्ष | पा्तीकी तपस्थाका जो दूसरा प्रभाव पड़ा
॥, उसे भी इस समय सुनो | जगदम्बरा पारवतीका वह महान
प परम आइचयजनक था। जो खभावतः एक दूसरेके
बैरोधी थे, ऐसे प्राणी भी उस आश्रमके पास जाकर उनकी
'पस्थाके प्रभावसे विशेधरहित हो जाते थे | थिंह और गो
दि सदा रागादि दोपेसि संयुक्त रहनेवाले पश्च भी पार्वती
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के तपकी महिमासे वहाँ परस्पर बाधा नहीं पहुँचाते ये ।
मुनिश्रेष्ठ] इनके अतिरिक्त जो खमावतः एक दूसरेके बरी
हैँ, वे चूहे-बिल्ली आदि दूसरें-दूसरे जीव भी उस आश्रमपर
कभी रोप आदि विकारोंसे युक्त नहीं होते थे | वहकि सभी
वृक्षोमें सदा फ़छ लगे रहते थे। भाँति-भाँतिके ठूण ओर
विचित्र पुष्प उस बनकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँका सारा बन-
प्रान्त केछासके समान हो गया | पार्यतीके तपकी सिद्धिका
साकार रूप बन गया | ( अव्याय २२ )
“9.
भष्ाजा पहुते एूँ--मुनीश्चर | शिवदी प्राप्षिक्रे लिये
8, “शर तपस्या बरती हुई पार्वतीके बहुत वर्ष बीत गये, तो
थे गन संबर प्र नहीं हुए । तव हिमाचल) मेना
वयकण-
हे | 7 [झ' हु 7
६४ पराचए: थ्यदिने ज्वद्र पादंताको सदतदादा आर
[रंडी पापियों अनरोध
७. अगका 4 शमाक..&
>““ऋन्ते दृष्दर वतावदर उनतस बह
हसन प्रष्सखा रोएय ह ए्य्को लोट चलो |
न् पा पावताकी 8 [8 पहलेसे कक है * छछ
+ परवेतोकाी तपस्थाविषयक इठता, उनका पहलेसे भी उग्र तप, उससे त्रिलोकीका संतप्त होना तथा
समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा ओर विप्णुका भगवान शिवकेे खानपर जाना
तब उन सबकी वात झनकर पार्वतीने कहा--
पिताडी ! माताजी | तथा मेरे झूभी बान्चव ! मेने पहल हो
वात कही थीं; उसे कया आयपउलोगोॉने मला दिया हें? अराद
न समय र। सता ज्ञा परादशणण मं
झ्न्टदिनि टन रूपल यबासमददपा। ८ उम्यू हर, ये
घदाय मिककी 5 जा शी # छः
सहदिवज्ञा £. “4५८; घिरन्दछा ५ हा न्क्क *] दस! लसा्म्ट्ागग न्प्ट्
'इमममाि०--साम्कनुड,
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जरा “पन्ट! प्र ष् 2: हर ||
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४४ कक.
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१९२ १: नमों रुद्राय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने 5: | रुक्षिप्त-शिवपुणणा|
शाह उप्र अंप्यकर कफ बार तप पा भायाकरक रा लाउन्_एत्कक फायर फमभर व पक आरशापवएपान कप चल पाए पता वाद; भपद फमबुकपेएकर कद कक धइुतपक्रपपकत्काएकए पा+ ८ कम पयफता कायम द 5 2ुा काया मन्क्ासा चलन तु कक: करत लरू- पा ३.
'क.+ अनाथ सुपर." 3०७७.७-ह- पनननर-“पा-9. सता “काका पापा. अकमीमम> आम ्ज्ब्ज्ब््य्ज््ध्य्व्ध्ब्ध्ब््ध्ण्न्ण्ण्ष्प्षषष्कष्क्् पका कक ्िौैौएथ्क थक ४४४ आस > ८3८. मत
भक्तबत्सल भगवान् शंकरकी अवश्य संतुए करूँगी | आप
सब लोग प्रसन्नतापूर्वक्र अपने-अपने घरको जाये; महदेवजी
तुष्ठ होंगे ही; इसमें अन्यथा विचारकी आवश्यक्रता नहीं
है। जिन्होंने कामदेवकोी जलाया है; जिन्होंने इस पर्बतके
वनकी भी जलाकर भस्म कर दिया है; उन भगवान् आंकरको
में केबल तपस्थासे यहीं बुलाऊुंगी | महाभागगण | आप
यह जान ले कि महान तपोबलसे ही भगवान सदाशिबकी
सेवा सुलभ हो सकती है | यह में आपलोगेंसे सत्य, सत्य
कहती हूँ ।
सुमधुर भाषण करनेवाली परबंतराजकरुमारी शिवा माता
मेनका; भाई मेनाक) पिता हिमालय ओर मन्दराचलू आदिसे
उपयुक्त बात कहकर शीघ्र ही चुप हो गयीं । शिवाके ऐसा
कहनेपर वे चतुर-चालाक परत। गिरिराज सुमेर आदि
गिरिजाकी बारंबार प्रशंसा करते हुए अत्यन्त विस्मित हो
जैसे आये थे; वेसे ही छोट गये | उन सबके चले जानेपर
सखियासे घिरी हुई पार्बती मनमें यथार्थ निश्चय करके पहलेसे
भी अधिक उग्र तपस्या करने लगीं ) मुनिश्रेष्ठ ! देवताओं,
असुरों; मनुष्यों ओर चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिछोक्ी
उस महती तपस्यासे संतत हो उठी | उस समय समस्त
देवता, असर, यक्ष, किनर, चारण; सिद्ध) साध्य, मुनि)
विद्याघर, बड़े-बड़े नाग प्रजापति; गुह्मक तथा अन्य लोग
महान-से-महान् कष्टमें पड़ गये | परंतु इसका कोई कारण
उनकी समझमें नहीं आया | तब इन्द्र आदि सब देवता
मिलकर गुरु बृहस्पतिसे सलाह ले बड़ी विह्लताके साथ
सुमेरु प्वेतपर मुझ विधाताकी शरणमें आये | उस समय
उनके सारे अड्ढ संतप्त हो रहे थे। वहाँ आ मुझे प्रणामकर
उन सभी व्याकुछ और कान्तिहीन देवतार्भने मेरी स्तुति
करके एक साथ ही मुझसे पूछा--पप्रभो ! जगतके संतप्त
होनेका क्या कारण है १?
उनका यह प्रश्न सुनकर मन-ही-सन शिवका स्मरण करके
विचारपूर्वक मेने सब कुछ जान लिया | इस समय विश्वर्म
जो दाह उत्पन्न हो गया है; वह गिरिजाकी तपस्थाका फल है---
यह जानकर में उन सबके साथ शीघध ही क्षीरसागरको गया।
वह जानेका उद्देश्य भगवान् विप्णुसे सब कुछ बताना था |
वहाँ पहुँचकर देखा भगवान् श्रीहरि सुखद आसमनपर
विराजमान हैं । देवताओंके साथ मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम-
पूजंक उनकी स्त॒ति की और कहा--“महाविष्णो ! तपस्यामें
लगी हुई पावतीके परम उग्र तपसे संतत्त हो हमसे
आपनी दरणम आये हैं। आब हमें बचाइये, बचराले|
हम सब देवताओंकी यह बात सुनकर शेपभरस्यापर बह
भगव्रान टश््मीयति हमरों बोले |
श्रीविष्िणुन कहा--देवताओ ! मैंने आज पर
तपस्याका सारा कारण जान लिया है। अतः ते
साथ अब परमेश्वर शिव्रके समीप चलता हूँ | हम ज़छ्े
मिलकर यह प्रार्थना करगे कि वे गिरिजाकों बाहर
यहाँ ले आधे | अमरो | इस समय समस्त संसारके कला
टिये भगवानसे शिवाक्रे पराणिग्रहणक्के लिये अनुरोध #
है | देवाधिदेव पिंनाकधारी भगवान् दित्र शिवाओ्री वर
लिये जैसे भी वहीं उनके आभश्रमपर जाये; इस सम
वसा ही प्रयक्ष करगे | अतः परम मज़लमय महाप्रतु
जहाँ उम्र तपस्मामें छगे हुए हैं, वहीं हम सब छोग चई।
भगवान् विष्णुकी यह बात सुनकर समस्त देवता
हटी) क्रोधी और जलनेके लिये उद्यत रहनेवाते प्रत॑
रुद्रसे अत्यन्त भयभीत हो बोले |
देवताओंने कहा--भगवन |! जो महा
कालामिके समान दीसिमान् और भयानक नेत्रेसे यु
उन रोधपभरें महाप्रभु॒ रुद्रके पास हमलोग नहीं जा हे
क्योंकि जैसे पहले उन्होंने कुपित हो दुर्जय कामों मै*
दिया था; उसी प्रकार वे हमें भी दग्ध कर डहिगे-्ई
संशय नहीं है ।
मुने ! इन्द्रादि देवताओंकी बात सुनकर लक्ष्मीपति मै
उन सबको सान््त्वना देते हुए कहा |
श्रीहरि वोले--है देवताओ ! तुम सब छोग
आदरके साथ मेरी बात सुनो । मगवान् शिव देवा
स्वामी तथा उनके भयका नाश करनेवाले हैं । वे वर
दग्ध करेंगे | तुम सब लोग बड़े चतुर हो | मेक 3
शम्मुकी कल्याणकारी मानकर हमारे साथ सबके उप“
उन महादेवजीकी शरणमें चलना चाहिये । मर्गाः 5
पुराणपुरुष, सर्वेश्वर; बरणीय, परात्यरः तपखी और
खरूप हैं; अतः हमें उनकी शरणमें अवश्य चलना चाि
प्रभावशाली विष्णुके ऐसा कहनेपर सब दें थे
साथ पिनक्रपाणि शिवका दर्शनः करनेके लिये गये
पाबंतीका आश्रम पहले पड़ता .था । अतः हें ब
नन्दिनीकी तपस्या देखनेके लिये विष्णु आदि ९
रुद्रसंहिता ]
ााौाौा-त मा... ीपन-ननतनयूनननरीयोकननन- अनवनननपक+५ तनमन +-मननननननिनानतिनी न निनाननन नल नानननन मनन िनान नमन तन नी नमन नमन नि तन नी नी न नमी न न न +म नमन गन नमन >ीनननन नी पीली “कमी न न नमन नी नव रन न्नी भी न नत चसचचडड 5 इ चयययय तययययघतयतयत
कौतृहत्यूवंक उनके आश्रमपर गये । पावेतीके श्रेष्ठ तपको
देखकर सब देवता उनके उत्तम तेजसे व्याप्त हो गये | उन्होंने
तपस्पामें लगी हुई उन तेजोमयी जगदम्बाको नमस्कार किया
और साक्षात् सिद्धिखर्पा शिवा देवीके तपकी भूरि-भूरि
प्रशंसा करते हुए. वे सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ
भगवान् ब्ृप्भध्वज विराजमान थे | मुने ! वहाँ पहुँचकर सब
देवताअनि पहले तुम्हें उनके पास भेजा ओर खयं वे मदन-
. दहनक्ारी भगवान् हरसे दूर ही खड़े रहे | वे वहींसे यह
४ देवताओंका भगवान् शिवले पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध #
१९ ट्रे
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बाम/ पा पारमयाु>--प पाक पइनयान गाए मकर बदन नइड
हो । अतः तुमने भगवान् शिवके स्थानपर जाकर उन्हें समेथा
प्रसन्न देखा | फिर वहाँसे छोटकर तुम श्रीविष्णु आदि सब
देवताओंको भगवान् शिवके स्थानपर ले गये । वहाँ पहुँचकर
विष्णु आदि सब देवताओँने देखा भक्तवत्सल मगवान् शिव
सुखपूर्वक प्रसन्न मुद्रामें बैठे हैं | अपने गणोसे घिरे हुए
शम्भु तपस्वीका रूप धारण किये योगपद्ठपर आसीन थे | उन
परमेश्वररूपी शंकरका दर्शन करके मेरे सहित श्रीविष्णु तथा
अन्य देवताओं; सिद्धों ओर मुनीश्धरौने उन्हें प्रणाम करके
. देखते रहे कि. भगवान् शिव कुपित हैं या प्रसन्न | नारद ! वेदों और उपनिषदोंके सूक्तोद्वारा उनका स्तवन किया |
. तुम तो सदा निर्भव रहनेवाले ओर विशेषतः शिवके भक्त
( अध्याय २३ )
देवताओंका भगवान् शिवसे पावतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवानका विवाहके दोष बताकर
अखीकार करना तथा उनके पुनः प्राथना करनेपर खीकार कर लेना
ब्रह्माजी कहते हैं--नारद ! देवताओंने वहाँ पहुँचकर
भगवान् रुद्रको प्रणाम करके उनकी स्तुति की । तब
नन्दिकेश्वरने भगवान् शिवसे उनकी दीनबन्धुता एवं भक्त-
वत्सल्ताकी प्रशंसा करते हुए कहा--८प्रभो |! देवता और
मुनि संकटमें पड़कर आपकी शरणमें आये हैं | सर्वेश्वर |
आप उनका उद्धार करे |?
दयाहु नन्दीके इस प्रकार सूचित करनेपर भगवान्
शम्भु धीरे-धीरे अखिे खोलकर ध्यानसे उपरत हुए ।
समाधिसे विरत हो परम ज्ञानी परमात्मा एवं ईश्वर शम्भुने
समस्त देवतार्ओेसि इस प्रकार कहा ।
शम्भु बोले--भीविण्णु और ब्रह्मा आदि देवेश्वरो |
तुम सब लोग मेरे समीप केसे आये ? तुम अपने आनेका
जो भी कारण हो, वह श्ीप्र बताओ |
भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सब देवता प्रसन्न
ऐ कारण बतानेके लिये भगवान् विष्णुके मुँहकी ओर देखने
'छगे | तथ शिवके महान भक्त और देवताओँके हितकारी
भीविष्णु मेरे बताये हुए देवताओंके महत्तर कार्यको चूचित
रुरने लगे । उन्होंने कद्ा--प्शम्भो | तारकासुरने देवताओंको
, ते अद्भुत एवं मह्दान् कष्ट प्रदान किया है । यहीं बतानेके
! लिये सब देवता यहाँ आये हूँ | भगवन् ! आपके औरस पृत्नसे
/ ५ एरक देत्य मारा जा सफेगा। और किसी प्रकारसे नहीं ।
/ रे पृ कथन सबंधा सत्य है| महादेव | इस प्रकार विचार
/ लक आप झूपा करें। आपको नमस्कार है । स्वामिन् !
/ णिमुरक्ष पवार उपस्थित किये गये इस कण्से झाप
ज
कं
न
5 ए० छ७ ६५७...
देवताओंका उद्धार कीजिये | देव | शम्मो ! आप दाहिने हाथसे
गिरिजाका पाणिग्रहण करें | गिरिराज हिमवानके द्वारा दी
हुई महानुभावा पार्वतीकों पाणिग्रहणक्रे द्वारा ही अनुण्हीत
कीजिये |?
श्रीविष्णुका यह वचन सुनकर योगपरायण भगवान् शिवने
उन सबको उत्तम गतिका दछ्यन कराते हुए. इस प्रकार
कहा--“देवताओ | ज्यों ही मैंने सर्वोड्न्रसुन्दरी गिरिजा
देवीको स्वीकार किया; त्यों ही समस्त सुरेधर तथा ऋषि-मुनि
सकाम हो जायेंगे। फिर तो वे परमार्थपथपर चलनेमे
समर्थ न हो सकेंगे | दुर्गा अपने पाणिग्रहणमात्रसे ही कामदेवकों
जीवित कर देंगी । विष्णो ! मेने कामदेवको जल्यकर
देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है | आजसे सब
लोग मेरे साथ सुनिश्चितरूपसे निष्काम होकर रहें | देवताओं !
जैसे में हूँ, उसी तरह तुम सब लोग प्रथकृप्रथक रहकर
कोई विशेष प्रयत्ष किये बिना ही अत्यन्त दुष्कर एवं उत्तम
तपस्या कर सकोगे | अब उस मसदनके ने होनेसे तुम
सब्र देवता समाधिक्रे द्वारा परमानन्दका अनुभव करते हुए
निविकार हो जाभो; क्योंकि काम नरककी ही प्राधि
करानेवाला दे | कामसे क्रोध होता है; क्लोेघले मोह होता
ओर मोहसे तपस्या नष्ट होती है | अतः तम सभी श्रेष्ठ
देवताओंकी काम ओर क्रोघका परित्वाग ऋर देना चाहिये;
मेरे इस कंथनकोी कभी अन्यथा नहीं मानना चाहियेरू |
* कामों दि नरकादवब स्यद ओऋोपषोइमिल्यते :
।्. की है. ह ब्क्ः
कह्रधाजबलि सम्मदा माहाश अंदाओदे लप:
१९४ ३: नमो रुद्राय शाम्ताय ब्रह्मण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुराणा
ब्रह्माजी कहते है--नारद | पृषभक्रे खिहसे युक्त
ध्वजा धारण करनेवाले भगवान् महादेवने इस प्रकारकी
बातें सुनाकर ब्रह्मा; विष्णु, देवताओं तथा मुनिरयोको निष्काम
धमंका उपदेश दिया | तदनन्तर भगवान् शम्भु पुनः ध्यान
लगाकर चुप हो गये ओर पहलेकी ही भाँति पार्षदसि घिरे हुए
सुस्थिरमावसे बंठ गये | वे अपने मनमें ही खय॑
आत्मखरूप, निरक्षन। निरामास, निविकार। निरामय॥
परात्पर; नित्य ममतारहित, निरवग्रह, शब्दातीत, निग्गुण;
शानगम्य एवं प्रकृतिसे पर परमात्माका चिन्तन .करने लगे।
इस प्रकार परम खरूपका चिन्तन करते हुए वे ध्यानमें
खित हो गये | बहुत-से प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान्
शिव ध्यान करते-करते ही परमानन्दर्में निमग्न हो गये |
श्रीहरि एवं इन्द्र आदि देवताओंने जब परमेश्वर शिवको
ध्यानमग्न देखा, तब उन्होंने ननन््दीकी सम्मति ली] नन््दीने
पुन; दीनभावसे स्तुति करनेके लिये कहा | उनकी इस
सत्सम्मतिके अनुसार देवता स्तुति करने लगे | वे बोले---
“देवदेव | महादेव ! करुणासागर प्रभो | हम आपकी शरणमें
आये हैं। आप महान् क्लेशसे हमारा उद्धार कीजिये |?
ब्रह्माजी कहते हैँ--नारद | इस प्रकार बहुत
दीनतापूर्ण उक्तिसे देवताओने भगवान् शंकरकी स्तुति की |
इसके बाद वे सब देवता प्रेमसे व्याकुलचित्त हो उच्च
स्वस्से फूट-फूटकर रोने लगे। मेरे साथ भगवान् श्रीहरि
उत्तम भक्तिमावसे युक्त हो मन-द्दीमन भगवान् शम्धुका
स्मरण करते . हुए अंत्यन्त दीनतापूर्ण वाणीद्वारा उनसे अपना
अभिप्राय निवेदन करने लगे ।
देवताअंके, मेरे तथा श्रीहरिके इस प्रकार बहुत स्व॒ति
करनेपर भगवान् महेश्वर अपनी भमक्तव॒त्सलताके कारण ध्यानसे
विरत हो गये। उनका मन अत्यन्त प्रसन्न था। वे भक्तवत्सल
शंकर श्रीहरि आदिको करुणाइृष्टिसे देखकर उनका हथे बढ़ाते
हुए बोले--विष्णो ! ब्रह्मन् ! तथा इन्द्र आदि देवताओ |
तुम सब लोग एक साथ यहाँ क्रिस अभिप्रायसे आये हो ! मेरे
सामने सच-सच बताओ [?
श्रीहरिने कहा--महेश्वर | आप सर्वज्ञ हैं, सबके
अन्तयांमी ईश्वर हैं । क्या आप हमारे मनकी बात नहीं
कामक्रोधी परित्याज्याौ भवद्धि: सुरसत्तमै: ।
संवेरेव च मन्तव्य॑ मद्दाक्यं नान्यथा कचित् ॥
( शि० पु० र० सं० पा० खं० २४ | २७-२८ )
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कमी अर पममी जी नम, चशी या यरी उन पर सकजन तक,
हर,
जानते ? अबब्य जानते हूँ, तथापि आपकी आशा में
भी कहता हूँ।सुखदायक्र शंकर | हम सब देवतामेंड़
तारकासुरसे अनेक प्रकारका दुःख ग्राप्त हुआ है। इस्लेड
देवताओंने आपको प्रसन्न किया है| आपके टिवे ही रे
गिरिराज दिमालयसे शिवाक्री उत्मत्ति करायी है | मिले
गर्भसे आपके द्वारा जो पुत्र उत्पन्न होगा; उसीसे तारपुर
मृत्यु द्वोगी, दूसरे किसी उपायसे नहीं । त्रह्माजीने उतरे
वह्दी बर दिया है। इस कारण दूसरेसे उसकी झंलु
हो पा रही है । अतएव वह निडर होकर सारे संसाख्े
दे रहा है | इधर नारदजीकी आशासे पाती कठोर ह
कर रही हैँ | उनके तेजसे समस्त चंयाचर प्राणियों
त्रिलोक़ी आच्छादित हो गयी दे। इसलिये परमेश्वर | आपशि
वर देनेके लिये जाइये | खामिन् | देवताओद '
मिटाइये और हमें सुख दीजिये | झंकर ! मेरे तया देवत
हृदयमें आपके विवाहका उत्सव देखनेके लिये वढ़ा
उत्साह है। अतः आप यथोचित रीतिसे विवाह कम
परात्पर परमेश्वर | आपने रतिको जो बर दिया यह:
पूर्तिका अवसर आ गया है। अतः अपनी प्रतिशकी
सफल कीजिये । #ु है
च्रह्माजी कहते हे-नारद ! ऐसा हईई
प्रणाम करके श्रीविष्णु आदि देवताओं और मं
नाना प्रकारके स्तोच्रोंद्वारा पुनः उनकी स्तुति ही |
सब-के-सब उनके सामने खड़े हो गये । कि
रहनेवाले भगवान् शंकर भी; जो वेदम्यदिकि ख्
देवताओंकी बात सुन हँसकर ब्रोलें--हे हे | हे |
और हे देवताओ | तुम सब लोग आदसखूबंक की
यथोचित) विशेषतः विवेकपूर्ण वात कह रहा हू!
करना मनुष्योके लिये उचित कार्य नहीं. हैं दे
विवाह दृढ़्तापूर्वक बाँध रखनेवाली एक बहुत
है । जगतमें बहुत-से कुसज्ञ हैं; परंद लीका रन
सबसे बढ़कर है। मनुष्य सारे बन्धनोंसे छुटकारा *
है, परंतु स्रीसड्ररूपी वन्चनसे वह हर न
पाता । छोंहे और काठकी बनी हुई वेड़ियोर्मि ४
बैघा हुआ पुरुष भी एक दिन उस कैंदसे छुट्तीए
है, परंतु ज्री-पुत्न आदिके बन्धनमें वधा हुआ
कभी छूट नहीं पाता । महा बखतमे
विषय सदा बढ़ते रहते हैं | जिसका मन विषयेंके '
हो गया है। उसके लिये मोक्ष खममें भी $०
चना
रुद्रसंहिता | # भगवान, शिवकी आश्ासे सप्तर्षियोंका पावेतीके शिव-विषयक अनुरागकी परीक्षा करना # १९५
.......................-.. ४० न3 ५» 3०७3७ ५3333५»»+५५3+ 33५५3; ++क3५४33+ 3 ..४७७)०4५५+५»3,3५3५4343. 4.७०» 4०७9० नाप ५५७५3 ८०५५५. + पन कन >पनमम9७५+५५++ मन अर ा४७ +न मम ५ 3 मकर ननकक प नननन
विद्वान् पुरुष यदि सुल्ल चाहता है तो वह विषयोंकी विधि-
पूर्वक त्याग दे | विपयोको विषके समान बताया गया हैः
जिनके द्वारा मनुष्य मारा जाता है | विषयीके साथ वातो
करनेमात्रसे मनुष्य क्षणमरमें पतित हो जाता है ।
आचार्यनि विषयक्रों मिश्री मिलायी हुई वारुणी.( मदिरा )
कहा है# । यद्यपि में इस बातको जानता हूँ और यद्रपि
विपयोंके इन सारे दोषोंका मुझे विशेष शान है; तथापि
में तुम्हारी प्राथनाकों सफल करूँगा; क्योंकि में भक्तोंके
अधीन रहता हूँ. और भक्तवत्सलतावश उचित-अनुचित
सारे काय करता हूँ | इसीलिये तीनों लोकोंमें “अयथोचित-
कर्ता? के रूपमें मेरी प्रसिद्धि है| भक्तोंके लिये मैंने अनेक
वार बहुतसे प्रयत्न करके कट्ट सहन किये हैं, गहपति होकर
विश्वानर मुनिका दुःख दूर किया है| हरे ! विधे | अब
अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता । मेरी जो प्रतिज्ञा है; उसे
तुम सव लोग अच्छी तरह जानते हो। में यह सत्य
कहता हूँ कि जब-जब भक्तोंपर कहीं विपत्ति आती है, तब-
तब में तत्काल उनके सारे कष्ट हर लेता हूँ ।
तारकासुरसे ठुम सब छोगोंको जो दुःख प्राप्त हुआ है; उसे
मैं जानता हूँ और उसका हरण करूँगा, यह भी सत्य-
सत्य बता रहा हूँ। यद्यपि मेरे मनमें विवाह करनेकी
कोई रुचि नहीं है तथापि में पुत्रोत्पादनके लिये
गिरिजाके साथ विवाह करूँगा | तुम सब देवता अब निर्म॑य
होकर अपने-अपने घर जाओ । मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध
करूँगा । इस विष्रयमें अब कोई विचार नहीं करना चाहिये |?
ब्रह्माजी कहते हें--तारद | ऐसा कहकर भगवान्
शंकर मौन हो समाधिमें स्थित हो गये ओर विष्णु आदि
सभी देवता अपने-अपने धामकों चले गये |
( अध्याय २४ )
*+--+- ७०० 2ध््य- ४5
भगवान शिवकी आज्ञासे सप्तषियोंका पावतीके आश्रमपर जा उनके शिवविषयक अनुरागकी
परीक्षा करना ओर भगवानको सब बृचान्त बताकर खगेको जाना
च्रह्माज्ी कहते हं--देवताओंके अपने आश्रममें चले
जनेपर पावतीके तपकी परीक्षाके लिये भगवान् शंकर
समाधिस्थ हो गये | वे खय॑ अपने आपमें, अपने ही
परात्पर, खस्थ, मायारहित तथा उपद्रवशृत्य खरूपका
चिन्तन करने लगे | उस ध्येय वखुके रूपमें साक्षात्
भगवान् म्ेश्वर ही विराजमान हैं | उनकी गतिका किसीको
शान नहीं होता। वे भगवान् पृषभच्यज ही सबके
सश-रमेश्वर हूँ ।
तात | उन दिनों पावतीदेवी बड़ी भारी तपस्या कर
री भीं। उस तपस्यासे रुद्रदेव भी बड़े विस्मयमें पड़ गये |
भक्ताधीन होनेके कारण ही वे समाधितते ब्रिचलित हो गये,
ओर किसी कारणसे नहीं । तदनन्तर खश्किर्ता हरने वसिष्ठ
आदि रुप्तषियांका रण किया । उनके स्मरण करते ही
वे सातों ऋषि शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे | उनके मुखपर
प्रसन्नता छा रही थी तथा वे सब-के-सब अपने सौभाग्यकी
अधिक सराहना करते थे | उन्हें आया देख भगवान् शिवके
नेत्र प्रसन्नतासे प्रफुछ कमलके समान खिल उठे और वे
हँसते हुए बोले--#तात सप्तपियो ) तुम सब छोग मेरे
हितकारी तथा सम्यूण वस्तुओंके ज्ञानमें निपुण हो | अतः
शीघ्र मेरी बात सुनो । गिरिराजकुमारी देवेश्वरी पार्वती
इस समय सुस्थिर-चित्त वो गोरी-शिखर नामक पर्वतपर
तपस्या कर रही हैँ । मुझे पतिरूपम प्राप्त करना ही उनकी
तपस्याका उद्देश्य है | दिलों | इस समय केबल सखियाँ
उनकी सेवामे हैं | मेरे सिवा दूसरी समस्त कामनाओंका
परित्याग करके वे एक उत्तम निश्चयपर पहुँच चुकी हैं |
मुनिवरों | तुम सब लोग मेरी आशा वहाँ जाओ ओर
॥७७७७८७४८७४७८एे"एरनशश"शशशणरशशशणणनणश/शथणााणाभााय“ «मल श मम
# ऊुसह्ा बहवो छोफे सोसइस्तव चाधिकः । उद्रेत्सकलेदन्धन स्सेसहातू प्रमुच्यदे ॥
क + न रथ य. ब् स्व्यादिपागनसम्धदों
धोटदास्मयं:. पाशटु्द बद्धोषपि खुच्चते | स्वयादिपाशदुसन्दशं झुच्यते न क्द्ाचइन ;
बईन्ते... दिपया: शश्न्मरासन्धनकारिण: । विषयात्रान्तसनस: खबर्ने मोप्षोर दुर्लन: !,
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न #% है के. खा चाय आओ उरेन 2 अमिता युनरी पहनना बाहर. पिता. पिन आर कान.
4 एन जननी। पहनी पी पिन चालान पानी “पका फनी
प्रेमपूर्ण हृदयसे उनकी छृढ़ताकी परीक्षा करो। वहाँ तुम्हे
सर्वेथा छल्युक्त बातें कहनी चाहिये। उत्तम ब्रतधारी
महर्षियो | मेरी आज्ञासे ऐसा करना है। इसलिये तुम्हें
संशय नहीं करना चाहिये |! '
भगवान् शंकरकी यह आज्ञा .पाकर वे सातों ऋषि
तुरंत ही उस स्थानपर जा पहुँचे; जहाँ दीप्तिमती जगन्माता
पार्वती विराजमान थीं । सप्तियोंने वहाँ शिवाक्ी तपस्थाकी
मृतिमती दूसरी सिद्धिके समान देखा | उनका तेज
महान था। वे अपने उत्तम तेजसे प्रकाशित हो रही थीं |
उन उत्तम ब्रतघारी सप्तियोने उन्हें मन-ही-सन प्रणाम
किया और उनके द्वारा विशेषतः पूजित हो वे मस्तक
झुकाये इस प्रकार बोले |
ऋषियोंने कहा--देवि | गिरिराजनन्दिनि | हमारी
यह बात सुनो | हम जानना चाहते हैं कि तुम किस लिये
तपस्या करती हो १ तथा इसके द्वारा किस देवताको और
किस फलको पाना चाहती.,हो !
उन ह्विजेंके इस प्रकार पूछनेपर गिरिराजकुमारी
देवी शिवाने उनके सामने अत्यन्त गोपनीय होनेपर भी
सच्ची बात बतायी ।
पार्वती बोलीं--छनीश्वरो | आपलोग प्रसन्नतापूर्ण
हृदयसे मेरी बात सुनें | मैंने अपनी बुद्धिसे जिसका चिन्तन
किया है; अपना वह विचार मैं आपके सामने रखती हूँ |
आपलोग मेरी असम्भव बार्ते सुनकर मेरा उपहास करेंगे,
इसलिये उन्हें कहनेमें संकोच ही होता है; तथापि कहती हूँ |
क्या करूँ १ मेरा यह मन अत्यन्त हृढ़तापूर्वक एक उत्कृष्ट
कर्मके अनुष्ठानमें छगा है ओर ऐसा करनेके लिये विवश
हो गया । यह पानीके ऊपर बहुत बड़ी और ऊूँची दीवार
खड़ी करना चाहता है । देवर्षिका उपदेश पाकर मैं पमगवान्
रुद्र मेरे पति हों? इस मनोरथको मनमें लिये अत्यन्त कठोर
तप कर रही हूँ। मेरा मनरूपी पक्षी बिना पाँखके ही हठपूर्वक
आकाशरमें उड़ रहा है। मेरे खामी करुणानिधान भगवान्
शंकर ही उसके इस आशाकी पूर्ति कर सकते हैं।
पावेतीका यह वचन सुनकर वे मुनि हँस पड़े ओर गिरिजाका
सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक छल्युक्त मिथ्या वचन बोले |
पऋषियोने कह--गिरिराजनन्दिनि ! देवर्िं नारद व्यर्थ
ही अपनेको पण्डित मानते हैं । उनके मनमें क्रूरता मरी रहती
_ है। आप समझदार होकर भी क्या उनके चरित्रक्ो नहीं
अर
0 | ।
४ नमो रुद्गाय शान्ताय बत्रह्मणे परमात्मने
[ संश्षिप्त-शिवपुराणा
न कमल
जानती |. नारद छल-कपटकी बातें करते हैं और दूर
चित्तको मोहमें डालकर मथ डालते हैं | उनकी बार्ते यु
सवथा द्वानि ही होती है । त्रह्मपुत्र दक्षके पुत्रोंकों नादने हे
छल्पूर्ण उपदेश दिया; उसका फल यह हुआ कि वे सन्-देख
अपने पिताके घर छोटकर न आ सके | यही हाल उठे
दक्षके दूसरे पुत्रोका भी क्रिया | वे भी उनके चक्कर भा
भिखारी बन गये | विद्याधर चित्रक्रेतुको इन्होंने ऐसा उपरेश
दिया कि उसका घर ही उजड़ गया | प्रहादको अपना वे
बनाकर इन्होने हिरण्यकशिपुसे बढ़े-बढ़े दुःख दिल्खाये। वे
सादा दूसरोंकी बुद्धिमें भेद पेदा किया करते हैं। नाख्यत
कार्नोकोी पसंद आनेवाली अपनी विद्या जिस-जिसको सुना है
हैं, वही अपना घर छोड़कर तत्काल भीख माँगने लगता है।
उनका सन मलिन है | केवल झारीर ही सदा उज्ज्वल दिख
देता है | हम उन्हें विशेष रूपसे जानते हैं। क्योंकि उर
साथ रहते हैं | उनका उपदेश पाकर बड़े-बड़े विद्वानों
सम्मानित होनेवाली तुम भी व्यर्थ ही भुलवेमें आ गयी +
मूर्ख बनकर दुष्कर तपस्या करने लगीं।
बाले | तुम जिनके लिये यह भारी तपल्या कर
हो; वे रुद्र सदा उदासीन, निर्विकार तथा कामके झतरु हैं
संशय नहीं है। वे अमा ्लिक वस्तुओंसे युक्त शरीर घारण क
हैं, लजञाको तिलाज्जलि दे चुके हैं, उनका न कहीं घर हैनगा
वे क्रिस कुलमें उत्तन्न हुए. हैं, इसका भी किसीको पता में
है। कुत्सित वेष धारण किये भूतों तथा प्रेत आदिके थे
रहते हैं ओर नंग-धड़ंग हो झूल घारण किये घूमते है। ६
नारदने अपनी मायासे तुम्हारे सारे विशानको नष्ट कर लि
युक्तिसे तुम्हें मोह लिया और तुमसे तप करवाया । देवेर्थ
गिरिराजनन्दिनि | तुम्हीं विचार करो कि ऐसे वरकी पाक
तुम्हें क्या सुख मिलेगा | पहले रुद्रने बुद्धिसे खूब सोच-विचार्स
साध्वी सतीसे विवाह किया। परंतु वे ऐसे मूढ़ हैं कि कुछ दि
भी उनके साथ निबाह न सके | उस वेचारीको वैसे ही एो'
देकर उन्होंने त्याग दिया और खय॑ खतन्त्र हो अपने विन
ओर शोकरहित स्रूपका ध्यान करते हुए उमीमें पुल
रम गये । देवि | जो सदा अकेले रहनेवाले; शान्तः सर
ओर अद्वितीय हैं, उनके साथ किसी स्त्रीका निर्वाह कैसे होगे
आज भी कुछ नहीं बिगड़ा है | तुम हमारी आश मार्क
घर लौट चलो और इस दुर्बुद्धिको त्याग दो | मह्भागे | हि
तुम्हारा भला होगा । तुम्हारे योग्य वर हैं भगवान, विध्यु) हर
समस्त सद्गुणोंसे युक्त हैं । वे वैकुण्ठमें रहते हैं; लक्ष्मीके ला
7 अनशभमक: जुट 25 १४ प्र
० ५ 2 रा, । +++ ४ ४८. रर न्, हक ह - ;
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सट्रसंदिता ] # सप्तर्पियाँका पार्वतीकी परीक्षाके वाद भगवानको सब दृत्तान्त वताकर खर्गको जाना
१९७
हैं ओर नाना प्रकारकी क्रीडाएँ करनेमें कुशल हैं| उनके साथ
हम तुम्हारा विवाह करा देंगे ओर वह विवाद्द तुम्हारे लिये
तमस्त सुखोंको देनेवाला होगा । पावती | तुम्दारा जो रुद्रके
पाथ विवाह करनेका हठ है; ऐसे हठकी छोड़ दो ;और सुखी
हे जाओ |
च्रह्मजी कहते ह--नारद | उनकी ऐसी बात सुनकर
तगदम्बिका पार्यती दस पड़ी ओर पुनः उन शानविशारद
उनियासि बोलीं ।
४2५ /72/£ ८८४5 हर
पावेतीने कहा--पुनीखरों | आपने अपनी समझसे ठीक
पद्ा ऐ । परंतु द्विनो ! मेरा दृठ भी छूटनेवाला नहीं है ।
॥ शरीर पवतसे उत्पन्न होनेके कारण मुझमें स्वाभाविक
शेणा वियमान है । अपनी बुद्धिसि ऐसा विचारकर आपन-
ग मुते तण्य्यासे रोइनेफा कष्ट न करें । देवपिका उपदेदा-
रए भर हिये परम दितकारझ है । इसलिये में उसे कभी नहीं
एगी। पेदवेता भी महू सानते हूँ कि गुझजनीका पचन
वर हाता ए। गुरओंका वचन सत्य होता है! ऐसा
४3. एए एच्चार ९) उन एएटलाड और परल/फर्म परम
दर: पाप (दी झकझोर दस दान नदी होता | प्ामू्भादा
वचन सत्य होता है? यह विचार जिनके हृृदयमें नहीं है। उन्हें
इहलोक ओर परलोकम भी दुःख ही प्राप्त होता है, सुख कमी
नहीं मिलता ।अतः द्विजो | गुरदओंके वचनका कभी किसी तरह
भी त्याग नहीं करना चाहिये | मेरा घर बसे या उजड़ जाय;
मुझे तो यह हठ ही सदा सुख देनेवाला है | मुनिवरो | आपने
जो बातें कही हैं, मैं उनका आपके कह्टे हुए. तालयंसे मित्र
अर्थ समझती हूँ और उनका यहाँ संक्षेपसे विवेचन प्रस्तुत
करती हूँ | आपने यह ठीक कहा कि भगवान् विष्णु सद्वुणोंके
घाम तथा लीलाविहारी हैं | साथ ही आपने सदाशिवको निर्गुण
कहा है | इसमें जो कारण है, वह बताया जाता है। भगवान
शिव साक्षात् परत्रह्म हैं, अतएव निर्विकार हैं। वे केवल
भक्तकि लिये शरीर घारण करते हैं, फिर भी लछोकिकी प्रभुताको
दिखाना नहीं चाहते । अतः परमइंसोकी जो प्रिय गति है;
उसीकी वे धारण करते हैं; क्योंकि वे भगवान शम्भु
परमानन्दमय हैं; इसीलिये अवधूतरूपसे रहते हैं | मायाल््ि
जीवोंकी ही भूषण आदिकी रुचि होती है; ब्रह्मफी नहीं। वे
प्रभु गुणातीत) अजन्मा; मायारहितः अलक्ष्यगति ओर विरा८
हैँ । द्विजो | भगवान् अम्मु किसी विशेष धर्म या जाति
आदिके कारण किसीपर अनुग्रह नहीं करते । म॑ गुरुकी
ऋपासे ही शिवको यथार्थरूपसे जानती हूँ | ब्रक्मर्पियो | यदि
शिव मेरे साथ विवाह नहीं करेंगे तो में सदा कुमारी ही रह
जाऊँगी, परंतु दूसरेके साथ विवाह नहीं करूँगी। यह में सत्प-
सत्य कहती हूँ । यदि सूय पश्चिम दिद्यार्में उगने लगें; मेंरु-
पर्ब॑त अपने खानसे विचल्ति हो जाय, अग्नि झीतलताको
अपना ले तथा कमल पवंतशिखरकी शिलाफे ऊपर खिलने लगे;
तो भी मेरा हृठ छूट नहीं सकता। यहू में सच्ची बात
कहती हूँ ।
ब्रह्माजी कहते है--नारद | ऐसा कह उन मुनिर्वोको
प्रणाम करके गिरिराजकुमारी पावती निर्विकार चित्तसे शिवका
स्मरण करती हुई चुप हां गयीं। इस प्रकार गिरिझाकझे उस
उत्तम निश्चवक्री जानकर वे समप्र्षि भी उनदी जब-जगयकार
करने ल्गे आर उन्होने पावती क्रो ज्कत्तम आयाीया टू दिया |
मने | गिरिजादेवीकी परीक्षा झस्नेवाले थे मानों ह्ापि उन!
प्रथाम करके प्रसन्नचित्त है धीम ही संगशन शिवक्ते स्थानों
री! 74 बाज | वहा प्ल्न २ ] ] शायया! ्ँ डाइट | । च्क कील है १ # कब 6334 है
सिदे प्रराच्ज्क बच अत 5] हक सी ॑ञ्यप्णूकि ख्क सा क टनकम; रा शक
इचान्त निवेदन परके- उननी झाशा ले थे पुनः सदर स्वर्ग दाक
रु है.
अ-म्यन्नान ० गाय जे ४
चल गय | ( छाय २० )
. ४४ नमो रुठ्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ४:
| संक्षिप्त-शिवुणा]
हो उनकी तपस्थाका कारण पूछना तथा पाव॑तीजीका अपनी सखी
विजयासे सब कुछ कहलाना
त्रह्माजी कहते है--नारद ! उन सप्तपियोके अपने
लोकमें चले जानेपर सुन्दर लीला करनेवाले साक्षात् भगवान
शंकरने देबीके तपकी परीक्षा लेनेका बिचार किया | थे मन-
ही-मन पार्वतीसे बहुत संतुष्ट थे । परीक्षाक्रे ही बहाने पाबतीजीको
- देखनेके लिये जगाघारी तपस्वीका रूप घारण करके भगवान झम्मु
“उनके बनमें गये | अपने तेजसे प्रकाशमान अलन्त बूढ़े त्राह्मणका
रूप धारण करके प्रसन्नचित्त हो वे दण्ड और छत्र लिये बहाँ-
से प्रस्थित हुए | आश्रममें पहुँचकर उन्होंने देखा देवी शिवा
/सखियोंसे घिरी हुई वेदीपर बेठी हैं ओर चन्द्रमाकी विश्युद्ध
कला-सी प्रतीत द्वोती हैं । त्रह्मचारीका खरूप धारण किये
भक्तवत्सल शम्सु पाती देवीको देखकर प्रीतिपूबेक उनके
पास गये | उन अद्भुत तेजस्वी ब्राह्मणदेवताको आया देख
उस समय देवी शिवाने समस्त पूजन-सामग्रियोद्दारा उनकी
पूजा की । जब उनका भलीमौॉति सत्कार हो गया; सामग्रियों-
द्वारा उनकी पूजा सम्पन्न कर ली गयी; तब पावतीने बड़ी
प्रसन्नता और प्रेमके साथ उन ब्राह्मणदेवसे आदरपूर्वक कुशल-
समाचार पूछा ।
पार्वती बोलॉं--अज्मचारीका खरूप धारण करके आये
हुए आप कोन हैं और कहाँसे पघारे हैं ! वेदवेत्ताओंमें
श्रेष्ठ विप्रवर | आप अपने तेजसे इस वनको प्रकाशित कर रहे
हैं। मैंने जो कुछ पूछा है, उसे बतलाइये ।
ब्राह्मणने कहा--मैं इच्छानुसार विचरनेवाला वृद्ध
ब्राह्मण हूँ । पविन्नवुद्धि, तपख्ी; दूसरोंको सुख देनेवाला
और परोपकारी हूँ--इसमें संशय नहीं है | तुम कौन हो !
किसकी पुत्री हो और इस निर्जन वनमें किसलिये ऐसी तपस्या
कर रही हो; जो पंजेके बलपर खड़े हो तप करनेवाले मुनियों
के लिये भी दुलभ है। तुम न बालिका हो न बृद्धा ही हो,
सुन्दरी तरुणी जान पड़ती हो | फिर किस लिये पतिके बिना
इस वनमें आकर कठोर तपस्या करती हो ! भद्दे | क्या तुम
किसी तपस्वीकी सहचारिणी तपस्विनी हो ! देवि | क्या वह
तपस्वी तम्हारा पालन-नोपण नहीं करता। जो हुई होड़
अन्यत्र चला गया है ? बोले) तुम किसके कुलमें वसा
हो ? तम्दारे पिता कीन हैं ओर तुम्हारा नामक
तुम महासोभाग्यरूपा जान पड़ती हो । तुम्हात कः
अनुराग व्यर्थ है। क्या तुम वेदमाता गायत्री हे छा
अथवा क्या सुन्दर रूपवाली सरखती हो! इन तो
कीन हो--यह में अनुमानसे निश्चय नहीं कर पाता |
पार्वती बोलीं--विप्रवर | न तो में वेदमात ०
हैँ; न लक्ष्मी हैँ ओर न सरखती ही हूँ। इस ९
हिमाचलकी पुत्री हूँ और मेरा नाम पार्वती है।
इससे पहलेके जन्ममें में प्रजापति दक्षकी पुत्री थी। 5४
मेरा माम सती था | एक दिन पिताने मेरे पतिकी तिः
थी; जिससे कुपित हो मेने योगके द्वारा शरीरको थाग
था | इस जन्ममें भी भगवान् शिव मुझे मिह मे
परंतु भाग्यवश् कामको मस्म करके वे मुझे भी छोड़
गये | ब्रह्मन. | शंकरजीके चले जानेपर मैं विरतापे
हो उठी और तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके गिरी
यहाँ गद्भाजीके तटपर चली आयी । यहाँ दीपकाल्कः
तपस्था करके भी मैं अपने प्राणवक्लमको न पा सकी |
अप्निमें प्रवेश कर जाना चाहती थी । इतनेमें है आप
देख मैं क्षणमरके लिये ठहर गयी। अब आए मई
अमिमें प्रवेश करूँगी; क्योंकि भगवान शिवने मु
नहीं किया । किंतु जहाँ-जहाँ मैं जन्म दूँगी? वही
ही पतिरूपमें वरण करूंगी ।
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! ऐसा कहकर 7
ब्राह्मण देवताके सामने ही अभ्रिमें समा गर्यी)
देव सामनेसे उन्हें बारंबार ऐसा करनेसे रोक रहे
प्रवेश करती हुई पर्वतराजकुमारी पार्वतीकी हे
वह आग उसी क्षण चन्दन-पह्ुंके समान शीतल है
क्षणभर उस आगके भीतर रहकर जब पावती आकाश
नीफनीरफीर) अफसर #न्क,
भगवान् शंकरका जटिल तपखी ब्राह्मणके रूपमें पावतीके आश्रमपर जाना, उनसे सत्ृत
ड्रसंहिता ]. # पार्वतीकी वात खुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निनन््दा करना # १९९,
4२; हे
५
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च बढ
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। क्या चमक
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! ओर उठने लगीं) तब ब्राह्मणस्पधोरी शिवने सहता हँसते
ए उनसे पुनः पूछा--“अहो भद्दे | तुम्हारा तप क्या है,
( कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया । इधर अग्मिसे तुम्हारा
रीर नहीं जला, यह तो तपस्याकी सफलताका सूचक हैं;
ए अबतक तु्म्हं अपना मनोरथ प्राप्त नहीं हुआ, इससे
सब विफलता प्रकट होती है | अतः देवि | सबकी आनन्द
गेवाले मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मणके सामने तुम अपने अमीए मनोरथरो
अ-सच बताओ |! द
पूछनेपर उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली अम्बिकाने अपनी
सखीको उत्तर देनेके लिये प्रेरित किया। पावतीसे प्रेरित हो उनकी
विजयानामक प्राणप्यारी सखीने; जो उत्तम ब्रतकों जाननेबाली
थी; जयाधारी तपस्वीसे कहा ।
सखी वोली--साथधो ! तुमसे पार्वतीके उत्तम चरित्रका
और इनकी तपस्थाके समस्त कारणोंक्रा वर्णन करती हूँ।
आप सुनना चाहते हों तो सुनिये। मेरी सखी गिरिराज
हिमाचलकी पुत्री हैं। ये पार्वती और काली नामसे
विख्यात हैं तथा माता मेनकाकी कन्या हैं। अबतक किसीने
इनके साथ विवाह नहीं किया है । ये भगवान् शिवके सिया
दूसरे किसीको चाहती भी नहीं । उन्हींके लिये तीन हजार ,
वर्षोसि तपस्या कर रही हैं | मगवान् शिवकी प्रासिके लिये ही
मेरी इन सखीने ऐसा तप प्रारम्भ किया है | विप्रवर ! इसमें
जो कारण है; उसे बताती हूँ; सुनिये | ये पव॑तराजकुमारी
ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओंकी भी छोड़कर केवल
पिनाकपाणि भगवान् शंकरको ही पतिरूपमें प्राप्त करना चाहती
हैं ओर नारदजीके आदेशसे यह कठोर तफ्स्या कर रही हैं ।
हिजश्रेष्ठ | आपने जो कुछ पूछा था; उसके अनुसार मैने
प्रसन्नतापू्वक्ष अपनी सखीका मनोरथ बता दिया | अब आप
ओर क्या सुनना चाहते हैं !
त्रह्माजी कहते हैँ--नारद | विजयाका यह यथार्थ
वचन सुनकर जटाघारी तपस्वी रुद्र हँसते हुए बोले--“सखोने
यह जो कुछ कहा है; उसमें मुझे परिहासका अनुमान होता है ।
यदि यह सब ठीक हो तो पायेती देवी अपने मुहसे कहें ।?
जटिल ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर पार्वती देवी अपने
पह्माजी कहते हँ--मारद |! ब्राह्मणक्के इस प्रकार मुँँहसे ही यों कहने लगीं | ( अध्याय २६ )
| +.“7४-+६2४5ए-७४- ट्रैन्समल्प2..+-
है पावेतीकी 6 चर
। गे वात सुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निन््दा करते हुए पावंतरीको उनकी
पथ
रन
घ्ती ्् गोली मी! न
| पा वी शराल्ू--जटाधारी विप्रवर ! मेरा सारा बृत्तान्त
"_। मेरे सुखीने जो कुछ कहा है; वद ज्यो-का-तों सत्य
£ 3) अस्त्य कुछ भी नहीं है। में मन, वाणी और क्रिया-
रर। ई१८०७६ ई न्ट >> उप ख्त्य नष्टों मैंने साठ 400] 5.
४7 पे बहदा एए असत्य नहों। स॑ने साज्षात् पतिभावसे
| 0 लिकय के] * तक नहर ग्रह ल्थ किया दे सा धो
कप ताल ए वरण किय है। यद्यत्रि जानती है; वह
[%३ "पं लकी घट ५३ मर प्र सपने कम का ले |
3 उप अ ससे कंसे प्राप्त हो समती है; तथापि मनी
भाप्टाए दिएत ऐ। है सी
| दिएश है। मैं उपस्या कर रही हूँ ।
कि ल् डर
हु
०
जम.
2!
ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना
च्राद्मणसे शशि. अली त०- मी घात दाहकर कीट पाय॑ देवी प््सम
हणसे ऐसी बात कहकर पावेती देवी उस समय खलप
बै| जनदी बह खाते सनकर दआद्रण पे अध्मार
टो रहीं | तब उनकी वह यात सुनकर ब्राह्मणने कद्ा |
हा >> कर ू ब हा
प्राण वबाले--इहस समयतक मरे मनभ यट जाननेद!
हि पट करन के डा किस हु दलभ पउनशप कर नाटर्न ना बल व
इल इच्छा थी कि ये देवी किस दुलभ यखकों चादती £ ?
द्िसक स्ल्श् जे एटा सहात हा # दौ- पक 2. ढग फ्
जेसके लिये ऐसा महान तय डर रही हैं। दिल देध ! मुम्दार
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मुखारदिन्दस रव पाठ सुनवर उसे आरा बस्दरों जान
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पाक: “*फण्-+म्सक*"ऐै-नएुन्ेड। ट्रिग्वा+-पाकन पे सकक 4. .7म३+ ० प्ीका्रमरि"-ीप्फ_्दामगदना 9. ज्ाकैन्क
चियाह#मग्पाएनाहानन
बसा करो । यदि तुम मुझसे न कहती तो मित्रता निष्फल होती ।
अब जैसा तुम्हारा कार्य है; वैसा ही उसका परिणाम होगा ।
जब तुम्हें इसीमें सुख है; तब मुझे कुछ नहीं कहना है ।
वहाँ ऐसी बात कहकर ब्राह्मणने ज्यों ही जानेका विचार
किया, त्यों ही पावती देवीने प्रणाम करके उनसे इस
प्रकार कहा।
पावेती बोलीं--विप्रवर | आप क्यों जायेगे ? ठहसियि
ओर मेरे हिंतकी बात बताइये |
पावतीके ऐसा कहनेपर दण्डधारी ब्राह्मणदेवता रुक गये
ओर इस प्रकार बोले--५देवि | यदि मेरी बात सुननेका मन
है और मुझे भक्तिमावसे ठहरा रही हो तो में वह सब तत्त्व
बता रहा हूँ; जिससे तुम्हें हिताहितका शान हो जायगा |
महादेवजीके प्रति मेरे मनमें गोरव-बुद्धि है। अतः में उनको
सब प्रकारसे जानता हूँ; तो भी यथार्थ बात कहता हूँ, तुम
सावधान होकर सुनो | बृषभके चिहसे अद्धित ध्वजा धारण
करनेवाले महादेवजी सारे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैँ, सिरपर
जय धारण करते हैं, घोतीकी जगह बाघका चाम पहनते और
चादरकी जगह हाथीकी खाल ओदठते हैं | हाथमें भीख
मौगनेके लिये एक खोपड़ी लिये रहते हैं। झुंड-के-झुंड
सॉप उनके सारे अड्जभोंमें लिपटे देखे जाते हैं | वे विष खाकर
ही पुष्ट होते हैं, अभक्ष्यमक्षी हैं; उनके नेत्र बड़े भद्दे हैं
और देखनेमें डरावने लगते हैं। उनका जन्म कब कहाँ
और किससे हुआ; यह आजतक प्रकट नहीं हुआ | घर-
गहस्थीके भोगसे वे सदा दूर ही रहते हैं; नंग-धड़ंग धूमते हैं और
भूत-प्रेतोंकी सदा साथ रखते हैं | उनके एक-दो नहीं, दस
भुजाएँ हैं| देवि | में समझ नहीं पाता कि किस कारणसे
तुम उन्हें अपना पति बनाना चाहती हो । तुम्हारा शान कहाँ
चला गया। इस बातको आज सोच-विचारकर मुझे बताओ |
दक्षने अपने यश्षमें अपनी ही पुत्री सतीकों केवल यही
सोचकर नहीं बुलाया कि वह कपाल्थारी भिक्षुककी भार्या
है। इतना ही नहीं, उन्होंने यशमें भाग देनेके लिये
सत्र देवताओंको बुलाया, किंतु शम्मुकोी छोड़ दिया।
सती उसी अपमानके कारण अत्यन्त क्रोघसे व्याकुल हो उठी।
उसने अपने प्यारे प्राणोंकी तो छोड़ा ही, शंकरजीको भी
त्याग दिया । |
पतुम तो स््ियोर्मे रत्न हो, तुम्हारे पिता समस्त पव॑तोंके
राजा हैं । फिर तुम क्यों इस उम्र तपस्थाके द्वारा वैसे पतिको
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने
[ संक्षिप्त-रिवण]
्क्क््य्व्ण्शर््ञ़्ु्ंय्यय्य्य्य्य्य्ख्स्स्च्य्य्स्न्ल्स्स्स्स्नस्स्स्ख्खय्य्य्ल्खस्च्--___्_्55 #रभाइ/ंगररमंध हक
पानेकी अभिलापा करती दो ? सोनेकी मुद्रा ( अर्फ | के
बदलेम॑ उतना ही बड़ा काच लेना चाहती हो! कक
चन्दन छोड़कर अपने अश्ञमिं कीचड़ ठपेटना चाहत है! :
सू्के तेजका परित्याग करके जुगुनूकी चमक पता चए '
हो ? मद्दीन वस्न तद्यागकर अपने दरीरो चमढ़ेते कक
इच्छा करती हो! घरमे रहना छोड़कर बने पूत्ी छः
चाहती हो ? तथा देवेश्वरि | यदि तुम इन्ध आदि थेगक
त्यागकर शिवक्रे प्रति अनुरक्त हो तो अवश्य ही रजेंडि क्र
भंडारकों त्यागकर लोहा पानेकी इच्छा करती हे। के
इस बातकी अच्छा नहीं कद्दा गया है | शिवक्रे साय हुश
सम्ब्नन्व मुझे इस समय परस्परवरिरद्ध दिखायी देता है|
तुम, जिसके नेत्र प्रफुछ कमलदलके समान शोम फे|
और कहाँ वे रुद्र, जो तीन भद्दी आँखें घारण करे ६१
तो चन्द्रमुखी हो और शिव पश्चमुख कहे गये है।
सिरपर दिव्य बेणी सर्पिणी-सी शोभा पा रही कै परंदुक्ि
मम्तकपर जो जगाजूट बताया जाता है; वह प्रतिद्ध है
तुग्दारे अड्गमें चन्दनका अड्गराग होगा ओर शिल्े फ'
चिताका भस्म ! कहाँ तुम्दारी सुन्दर मृदुल तड़ी औ ४
शंकरजीके उपयोगमें आनेत्राली हाथीक्ी खाल £ कहां ।
अज्ञोमें दिव्य आभूषण और कहाँ शंकरके सर्वाहमे लि [
सर्प ! कहाँ तुम्हारी सेवाके लिये उद्यत रहनेवाले त्मूण
और कहाँ भूतोंकी दी हुई बलिकों पसंद करने नि
कहाँ तो मृदड्गकी मधुर ध्वनि और कहाँ डमस्ती हि
कहाँ भेरियोंके समूहकी गड़गड़ाहट और कहां अं है
नाद ? कहाँ ढक्काका शब्द और कहाँ अशम गला
तुम्हारा यह उत्तम रूप शिवके योग्य केंदराप की
यदि उनके पास घन- होता तो वे दिंगमवर ( नी !
रहते ? सवारीके नामपर उनके पास एक बूंढ़ा ११६,
दूसरी कोई भी सामग्री उनके पास नहीं है। क्या ः
हँढ़े जानेवाले वरोंमें जो नारियोंकोी सुख देनेवालें श
गये हैं, उनमेंसे एक भी गुण भद्दी आँखबाले थ'
है। तुम्हारे परम प्रिय कामकी मी उन हर देवताने हे ।
_दिया और तुम्हारे प्रति उनका अनाइ और तुम्हारे प्रति उनका अनादर वो तभी कह ०
१. अकूतेंकी संशाओंमें चन्द्रमाकों . एक संख्यावा गे
गया है । एक मुखवालें पुरुष और खियोँ ही सुर्दः
एकसे अंधिंक मुखवालें नहीं ।. श्स प्रकार एकडुड 7 हर;
भी तुलना की गयी है। ्वन्दधमुखी” पदका ई
तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान मनोहर है और वे
समान भयंकर हैं ।' . « 6 ४ '
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हद्ठसंहिता | #पावतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका पतिपदर्न करना तथा जटिल ब्राह्मणको फटकारना <६ २० १
गया) जब वे तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चले गये। उनकी
काई जाति नहों देखी जाती | उनमें विद्या तथा शानका भी
पता नहीं चल्ता | पिशाच ही उनके सहायक हैं और विष
तो उनके कण्ठमें ही दिखायी देता है | वे सदा अकेले रहनेवाले
ओर विपेशरूपसे बिरक्त हैं | इसलिये तुम्हें हरके साथ अपने मनको
नहीं जोड़ना चाहिये | कहाँ तुम्हारे कण्ठमं सुन्दर हार और
कहाँ उनके गलेमे नरप॒ण्डोंकी माल्या ! देवि | त॒म्हारे ओर
(रे रूप आदि सब एक दूसरेके विरुद्ध हैं | अतः मुझे
तो यह सम्बन्ध नहीं दचता | फिर तुम्हारी जैसी इच्छा
हो, वेसा करो) संसारम जो कुछ भी असदस्सु है; वह
सब तुम खय॑ चाहने लगी हो | अतः में कहता हूँ कि तुम उस
असतूकी ओरसे अपने मनकों हटा छो | अन्यथा जो चाहे);
वह करो; मुझे कुछ नहों कहना है ।?
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! यह बात सुनक्वर पार्वती
शिवक्री निन््द्रा करनेवाले उस ब्राह्मणपर मन-ही-मन कपित
हो उठों ओर उससे इस प्रकार वोढीं | ( अध्याब २७ )
लू किस्स कह
पावतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन करना, रोपपूर्वक जटिल ब्राक्षणको फटकारना,
सखीद्वररा उन्हें फिर बोलनेसे रोकना तथा भगवान् शित्रका उन्हें प्रत्यक्ष
दशन दे अपने साथ चलनेके लिये कह्टना
पावती वोर्ली--ब्राबाजी | अबतक तो मैंने यह समझा
था कि कोई दूसरे ज्ञानी महात्मा आ गये हैं | परंतु अब सब
शत हो गया--आपकी कलई खुल गयी । आपसे क्या कहूँ---
विशेषतः उस दशामें) जब्र आप अबध्य ब्राह्मण हैं १ ब्राह्मण
देवता |! आपने जो कुछ कहा है, वह सब सुझे ज्ञात
४ | परतु वह सब शठा ही है, सत्य कुछ नहीं है | आपने
फद्ा था कि में शिवकों जानता हूँ | यदि आपकी यह बात
टीक ऐती तो आप ऐसी युक्ति एवं बुद्धिके विरुद्ध बात नहीं
बोलते | यह ठीक है कि कभी-कभी महेश्वर अपनी लील्यशक्तिसे
प्रेरित ही तथाकथित अद्भुत वेष धारण कर लिया करते हैं ।
परतु चास्तव्म थे साक्षात् परत्रह्म परमात्मा हैँ। उन्होंने
'प्छासे ही शरीर धारण किया है । आप ब्रह्मचारीका खरूप
पारणर मुझे ठगनेके लिये उयत हो यहाँ आये हैं और
अनुचित एवं असंगत युक्तियोंका सहारा ले छल-कपण्से युक्त
पति बाल रए हू भें भगवान् शंकरके स्वरूपकों भलीभाँति
जानती है। इसलिये यभायोग्य विचार करके उनके तच्यका
१ केस्ती हूं। बास्तवमं शिव निर्शुण ब्रह्म हैं; कारणवश
ये गये हैं | जो निशण ऐ, समस्त गग लिनक्रे
प.। 3१ उन जाते केस है! सकती है ? ये भगशन सदादशाव
मगर पियाओंडे आदर पे । किए उन पर्ण थे परमास्माकी किसी
"७ गा पाम ! एडडाह् पालपप इस अगदाय्
4७-कृ-चह०- कल
जाई
उच्हयानरुूपस सम्यण दद प्रदान
| [7 जे री. हज क
का हा । ४ आरा ७ ऑ 7९७ अमान ग्प
$ ३६ ६०, ४७४७ ४५ बज] (4, ग्प ||
0:7१ +% ४७+४+७८०२०- ०-५ क क-७++० ३ ६ थ -्क-क ट्टे य
5-5 ३5 ८ कृक+ आ न्श्स्श्छ पान हक 4 जा #*ना५ कक, सु कण
$ ०१३७४. ९३० ९७५४४ लत २६ र.(० |; 0
न (५
जैकी 5». नक्षकाकक खा च् बे
ऊझअ) 5१३ अल 0 १४०० 0“% 3 4 शी, श्यवा पक शक कक 2 कनलकलओ
शा 0 ६ हक जब कब व ब +द य 5 3 6॥ हज ॥ ० 0 अप]
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है + आओ - ख क - अ प0ह च शमी शयात, इकमाआसरा बॉ ए डॉ #साम 0, आक्ीआन
2302 8 ४ न ० अनार उत्यन्न आर ररि ५ घउनदी।
१८५
हू
दक्तिका दूसरा क्या कारण हो सकता है! जो छोग सदा
प्रेमपूरवक शक्तिके स्वामी भगवान् शंकरका भजन करते हैं,
उन्हें भगवान् शम्मु प्रभुशक्ति; उत्साहशक्ति ओर मन्त्रग्नक्ति-
ये तीनों अक्षय शक्तियाँ प्रदान करते हैं । भगवान, शित्रके
भजनसे ही जीव मृत्युको जीत लेता ओर निर्भय हो जाता है |
इसलिये तीनों छोकमें उनका ५मृत्युंजय? नाम प्रसिद्ध है । उन्हींके
अनुग्रहसे विष्णु विष्णुत्वको, ब्रह्मा ब्रह्मत्कों और देवता
देवलको प्राप्त हुए हैं | शिवजीका पक्ष लेकर बहुत
बोलनेसे क्या छाम ? वे भगवान् स्वयं ही महाप्रसु ई |
कल्यागरुपी शझिव्रकी सेवासे यहाँ कीन-सा मनोरथ सिद्ध
नहीं हो सकता ! उन महादेवजीके पास क्रिस बातकी
कमी है, जो वे भगवान् सदाशिव स्वयं मरे पानेकी हच्छा
करें ? यदि शंकरकी सेवा न करे तो मनुप्य सात जम्मोतिक
दरिद्र होता है और उन्हींकी सेवासे सेवकों छोकमें कभी मष्
न दनेवाती रूष्मी प्राप्त होती ह। जिनके सममने आठ
सिद्धियाँ नित्य आकर सिर नीचा किये इस इस्छासे दृत्य
करती हूं कि ये भगवान् हमपर संतुष्ट दो जाये; उनके खिये
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चिताका भस्म लगाते हैं | परंतु यदि उनका लगाया हुआ
भस्म अपवित्र होता तो उनके दशरीरसे झड़कर गिरे हुए उस
भस्मक्रो देवतालोग सदा अपने सिरपर केसे धारण करते !
( अतः शित्रके अज्ञोंके स्वशंसे अपविन्न वस्तु भी पवित्र हो
जाती है । ) जो महादेव सगुण होकर तीनों छोकंकि कर्ता-भर्ता
और दूर्ता होते हैं तथा निर्गृणह्पमें शिव कहलाते हैं, वे बुद्धिके
द्वारा पूर्ण्झ्पसे केसे जाने जा सकते हैं १ परख्रह्म परमात्मा
शिवका जो निर्गुण रूप है; उसे आप-जसे बहिर्मख लोग केंसे
जान सकते हैं ! जो दुराचारी ओर पापी हैं, वे देवताओंसे
बहिष्कृत हो जाते हैं | ऐसे लोग निर्गंण शिवक्ते तत््वकरो नहीं
जानते । जो पुरुष तत्वको न जाननेके कारण यहाँ शिवकी
निन््दा करता है; उसके जन्ममरका सारा संचित पुण्य भस्म हो
जाता है| आपने जो यहाँ अमित तेजस्वी महादेवजीकी निन््द।
की हैं और मैंने जो आपकी पूजा की है, उससे मुझे पापकी
भागिनी होना पड़ा है। शिवद्रोहीको देखकर वस्त्रसहित स्नान
करना चाहिये; शिवद्रोहीका दशन हो जानेपर प्रायश्रित्त
करना चहिये ।
इतना कहकर पावतीजी उस ब्राह्मणपर अधिक
रुष्ट होकर बोलीं--ेरे रे दुष्ट ! तूने कहा था कि में शंकर-
को जानता हूँ; परंतु निश्चय ही तूने उनसनातन शिवको नहीं
जाना है | भगवान् रुद्रको तू जसा कहता है, वे वेसे ही क्यों
न हों, उनके-जेसे भी बहुसंख्यक रूप क्यों न हों, सत्पुरुषों-
के प्रियतम नित्य-निविकार वे मगवान् शिव ही मेरे अभीश्टतम
देव हैं | ब्रह्म ओर विष्णु भी कभी उन महात्मा हरके समान
नहीं हो सकते; फिर दूसरे देवताओंकी तो बात ही क्या है ?
क्योंकि वे सदेव कालके अधीन हैं | इस प्रकार अपनी शुद्ध
बुद्धिसे तत््वतः विचारकर में शिवक्रे लिये बनमें आकर बड़ी
भारी तपस्या कर रही हूँ | वे भक्तवत्सछ सर्वेश्वर शिव ही
हम सबके परमेश्वर हैं । दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले उन
महादेवको ही प्राप्त करनेकी मेरी इच्छा है |
ब्रह्माजी कहते हैं---नारद | ऐसा कहकर गिरिराज-
नन्दिनी गिरिजा चुप हो गयीं ओर निर्विकार चित्तसे भगवान्
शिवका ध्यान करने लगीं | देवीकी बात सुनकर वह ब्रह्मचारी
ब्राह्मण ज्यों ही कुछ फिर कहनेके लिये उद्यत हुआ, त्यों ही
शिवमें आसक्तचित्त होनेके कारण उनकी निन््दा सुननेसे
विमुख हुईं पावंती अपनी सखी विजयासे शीघ्र बोलीं |
.... पावेताने कहा--सखी | इस अधम ब्राह्मणकरो यतपूर्वक
रे / हे
हर ॒ ;.
$ मे न
२ ४६ नमो रुद्राय शान्ताय ध्रह्मणण परमांत्मने 5:
| संक्षिप्त-शिबपुणण;
रोकी, यह फिर कुछ कहना चाद्वता दे। वह केवल शिकार
ही करेगा | जो शिव्रकी निन््दा करता है। केबल उसकी ए
नहीं लगता, जो उस निन््दाक्रों गुनता है। बह भी वहाँ पा
भागी द्वाता है ।# भगवान् शिवक्े उपासकोंकी चाहि हि
शिवकी निन््दा करनेबालेका सबंथा बच करे | यदि वह ब्रह्म
हो तो उसे अबद्य ही त्याग दे ओर स्व्रय॑ उस निन््दा़े खत
से शीत्र दूर चले जायें | यह दुष्ट ब्राह्मण क्रि! शिवरत्री विद
करेगा । ब्राह्मण होनेके कारण यह बच्य तो है नहीं; अतः दा
देने योग्य दे ) किसी तरह भी इसका मुँह नहीं देखना चाक्ि।
इस खानकों छोड़कर हमलोग आज ही किसी दूसरे खाकर
जीत्र चछी चलें, जिसते फिर इस अज्ञानीके सायदत
करनेका अव्रसर न मिले |
च्रह्माजी कहते हैँ--नतारद ! ऐसा कहकर उमने सह
अन्यत्र जानेके लिये पैर उठाया; त्यों ही भगवान् शिवने आने
साक्षात् खहयसे प्रकट हो प्रिया पार्यतीका हाथ पकड़ लिग।
शिवा जसे स्वरूपका ध्यान करती थीं; वेसा ही सुद ल
धारण करके दिवबने उन्हें दर्शन दिया। पावतीने दशक
अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया |
तव भगवान, शिव उनले वोले--प्रिये [ गु्े छोई
कहाँ जाओगी १ अब मैं फिर कमी तुम्हारा त्याग नहीं कह!
मैं प्रसन्न हूँ । बर माँगो । मुझे तुम्हारे लिये कुछ मी अब #
है। देवि ! आजसे में तपस्याके मोल खरीदा हुआ व॒ग्हाण ३
हूँ । ठम्होरे सौन्दर्यने भी मुझे मोह लिया है। भव दुश्े
बिना मुझे एक क्षण भी युगके समान जान पड़ता है|
छोड़ो । तुम तो मेरी सनातन पत्नी हो | गिरिरजनतिति
महेश्वरि | मैंने जो कुछ कहा है; उसपर श्रेष्ठ बुद्धिते विचा
करो । सुस्थिर चित्तताली पार्वती ! मैंने माना प्रकासे ह8'
बारंवार परीक्षा लीहै। लोकलीछाका अनुसरण पा के
मुझ स्वजनके अपराधको क्षमा कर दो । शिवे [ तीन लोक
तुम्हारी-जेसी अनुरागिणी मुझे दूसरी कोई नहीं दिखायी
में सवेथा तुम्हारे अधीन हूँ । तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो | *
मेरे पास आओ । ठुम मेरी पत्नी हो और में त॒म्हार व रे
तुम्दोरे साथ मैं शीघ्र ही अपने निवासखान उतनी
केलासको _कलासको चढदूँगे।....._._._> | कि
# न केवल भवेत् पापं निन्दाकतुः शिवल हि!
यो वै श्णोति तज्निन्दां पापभाक स भवेदिदं ! ।
.. (शि० पु० रु० सं० पा० ख० २८। ९
रुद्रसंहिता ]
ब्रह्माजी कहते हैं--देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा
कहनेपर पात्रतीदेवी आनन्दमंग्न हो उरठीं। उनका तपस्था-
जनित पहलेका सारा कष्ट मिंट गया। मुनिश्रेष्ठ | सती-साध्यी
४४ शिव ओर पार्वतीकी बातचीत, शिवका पावेतीके अनुरोधकों खीकार करना £६. २०३
पावतीकी सारी थकावट दूर हो गयी; क्योंकि परिश्रमका फल
प्राप्त हो जानेपर प्राणीका पहलेवाला सारा श्रम नष्ट हो जाता है।
( अध्याय २८ )
शिव ओर पावतीकी बातचीत, शिवका पावेतीके अनुरोधकों खीकार करना
त्रह्माजी कहते हँ--नारद ! परमात्मा हरको यह
बात सुनकर ओर उनके आनन्ददायी रूपका दर्शन पाकर
पायतीकों बड़ा हर्ष हुआ | उनका सुख प्रसन्नतासे खिल
उठा । वे बहुत सुखका अनुभव करने लगीं | फिर उन
महासाल्वी शिवाने अपने पास ही खड़े हुए भगवान
शिवसे कहा ।
पाती बोलीं-देवेश्वर | आप मेरे खामी हैं ।
प्रभो | पृब्कालमें आपने जिसके लिये हर्पपूर्क्र दक्षके यज्ञका
विनाश किया था, उसे क्यों भुछठा दिया था १ वे ही आप
हैँ और यही मैं हूँ । देवदेवेश्वर | इस समय में तारकासुरसे
दुःख पानेवाले देवताओंके कार्यक्री सिद्धिके लिये रानी मेनाकरे
गर्भसे उतन्न हुई हूँ । देवेश | यदि आप प्रसन्न हैं और यदि
मुझपर कपा करते हैं तो मेरे पति हो जाइये । ईशान !
' प्रभो ! मेरी वह बात .मान छीजिये। आपकी आजा लेकर
' ४ पिताक्ले घर जाती हूँ। अब आप अपने विवाहरूप पर॒य उत्तम
विशद्ध यगाकी सर्वत्र विख्यात कीजिये । नाथ ! प्रभो!
आप तो लीचा करनेगें कुशल हैं | अतः मेरे पिता टहिमवान:
: के पास चढिये ओर याचक बनकर उनसे मेरी याचना
फोजिये | लोकम मेरे पिताके यश्की फेलाते हुए आपको
ऐश ही करना चाहिये | इस तरह आप मेरे सम्पूर्ण
/ गश्ज्ाधमको सफल बनाइये | जब आप प्रसत्नतापूर्वक ऋषियों
से भरे पिताक्ो सत्र बातोंदी जानकारी करायेंगे, तब मेरे
* पिता इपने भाई-बन्युओंचे साथ आपकी आशाका पालन
: परमे- एसमें संदेह नहीं है । जब में पहले प्रजापति दक्षकी
£ भन्द थी शोर भेरे पिताने आये हाथम मेरा हाथ दिया॥
श्री
न] दि की त ल रा दकाय ः हे
४ ऐसे सगाय छापे शास्रात्ता विषिसे वियाहका काय पूरा नहों
» ६... न >+
; सा) मर ता उक्तने श्धकी पूजा नहीं बी । भ)ः उस
् ९ 6० ++० हा हक के नर कन््कण्क, म्ज्जि ए 22,
५ जे क ऋए अतापंबरध ब्रा भारा हाब रए गाा।
हि जी कफ है है कक ृ ना य््पे >+ - 3 चार लेट्रला: जद पा नद् रे
का ।70 ६ ७ | सरादद्र! आरा बार इताओझाश फायदा
है मल दर कम छ.
रा हिंद. लिए बार शारदा दिधिते विबाह्णर्यका सम्गदन
है
९ पक कि «४२५४५ ते का के ३ । ष कम क-+यक " कच्प कं
का ई ह्एओ जे सेसे हैं. डहरा पॉलना आपपो)
जा अल १० न नेक ब् .
७, हज शक शक हद पार, पर किंडी आड: धाजलाओ
तरह शात हो जाना चाहिये कि मेरी पुत्रीने झमकारक
तपस्पा की है।
पावतीकी ऐसी बात सुनकर भगवान् सदाशिव बड़े
प्रसन्न हुए ओर उनसे हँसते हुए-से प्रेमपूवेंक बोले ।
शिवने कहा--देवि ! महेश्वरि | मेरी यह उत्तम बात
सुनो, यह उचित मझलकारक ओर निर्दाप है। इसे सुनकर
वेसा ही करो | वरानने | ब्रह्मा आदि जितने भी प्राणो हैं,
वे सब अनित्य हैं | भामिनि |! यह राव जो कुछ दिखायी
देता है; इसे मश्बर समझो | में निुण परमात्मा ही गुर्थोसे
युक्त हो एकसे अनेक हो गया हूँ।जो अपने प्रकाश्से
प्रकाशित होता है, वही परमात्मा में दूसरेके प्रकाशसे प्रकाशित
होनेवाला हो गया । देवि ! में खतन्त्र हूँ; परंतु तुमने मुझे परतन्त्र
बना दिया। समस्त कर्मोको करनेवाडी प्रकृति एवं महामाया
तुम्हों हो | यह सम्पूणं जगत् मायामव ही रचा गया दे ।
मुझ सर्वात्मा परसात्माने अपनी उत्तम चुद्धिक द्वारा इसे
धारणमात्र कर खखा है । सत्रन्न परमात्ममाव रखभवाले
सर्वात्मा पृण्यवाननि इसे अपने भीतर सीचा है तथा यह
तीनों गु्णासे आवेश्ति है| देवि | वस््वणिनि ! दीन सुख्य ग्रह
हूँ १ कोनसे ऋतु-समूह हूँ ? अबबा कोन दूसर-दूसरे
उपग्रह हूं ? इस समय तुमने शिवद्य लिये कया कद्टा
किस कतंव्यका विधान किया है ? गुण आर कायके भेदसे
एम दोनोंने इस जगत भक्तवत्मनलताओे कारण मनोंयी सस्य
देनेक्के ऐतु अदरतार महण किया
( ब्रिगुगात्मिका ) सृक््म प्रक्ष हर ते है सदा 2270
सगुगा ओर निशुगा भी हो | छुमयने ! में यर्दो समर
सूतोझा आत्मक निदिशर एवं निरीट है । शायी हमे
घुरुख ढक कान काका आन चीढ.. ऑन +
५, है [ व कम +/
5.४ स्व कै
; बैँ ब्क
भंभे गारगर चारण वियां है | शाइत है | सग्गार 375ा
४5 के बा 4
हिसाल्यक पास नहीं जा मफ्ता सथा निधरश हागर हिली
ही क्री #> 5५
दरद् सुशाय उससे पाता का शहे।, दाग शा (पररशाए
सह कस दी,
न्य;न | सराए ग्यु 9 अत शह 'ब कया तओ! पाजए डक काट
_्भ रच मर के, का हम बच
*य भरने महज दर ९ व | बे रात िशाइउइशरर गएरएार
चल हु न रो कद
खपताओ धाम हा फारा पक ५०० | न
२०४
हमारे लिये क्या कहती दो १ भद्दे ! तुम्हारी आजशासे मुझे
सब कुछ करना है | अतः जेसी तुम्हारी इच्छा दो;
वैसा करो |
महादेवजीके ऐसा कहनेपर भी सती-साध्वी कमललोचना
महा देवी शिवाने उन भगवान् शंकरको बारबार भक्तिभावसे
प्रणाम करके कहा ।
त्रती यों आप जप और
पाती बोलीं--नाथ ! आप जात्मा £ ओर मैं
- प्रकृति | इस विषयम विचार करनेकी कोई बात नहीं है | हम
दोनों खतन्त्र ओर निगुंण होते हुए भी भक्तोंके अधीन होनेकरे
कारण सगुण हो जाते हैं। शम्मो! प्रभो | आपको प्रयत्नपृषक मेरी
प्राथनाके अनुसार कार्य करना चाहिये | शंकर | आप
मेरे लिये याचना करें ओर हिमवानकी दाता बननेका
सोभाग्य प्रदान करें | महेश्वर ! में सदा आपकी भक्ता हूँ;
अतः मुझपर कृपा कीजिये | नाथ ! सदा जन्म-जन्ममें में
ही आपकी पत्नी होती रही हूँ । आप परब्रह्म परमात्मा हैं;
निशुण हैं; प्रकृतिसे परे हैं, निर्विकार, निरीह एवं खतनत्र
परमेश्वर हैं; तथापि भक्तोंके उद्धारमें संलग्न होकर यहाँ
सगुण भी हो जाते हैं, खात्माराम होकर भी छीलाविहारी
बन जाते हैं; क्योंकि आप नाना प्रकारकी छीलाएँ करनेमें
४: नमो रुद्राय शास्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ४:
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा!
््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्ख्य्य्य्ख्ख्य्य्य्य्य््स्म्ण्य्य््य्स्स्स्स्स्ल्््ख्य््यसमसभभभस्सखमभमस्प्स्स्स््च्ज्ज्ििि
कुशल £ | महादेव | महेश्वर | मैं सब प्रकाले अक्े
जानती हूँ | सबंध ! अब्र बहुत कहनेसे क्या लाम ! पु
दया कोजिये | नाथ! महान अद्भुत लीला करके लोकें अरे
मुबशका विस्तार कीजिये, जिसे गा-गाकर लोग पार
ही भवसागरसे पार हो जायें ।
त्रह्माजी कहते है--नारू | ऐसा कहकर ऐिएे
मदेश्वरको बारबार प्रणाग क्रिया ओर मस्तक चुन्झ ह
जोड़ वे चुप हो गयीं | उनके ऐसा कदनेवर महाला महेट
टोकलीलाका अनुरारण करनेक्े लिये बसा करना सीकर :
लिया | पावतीने जो कुछ कहां था, उसीको प्रसकाज्
करनेके लिये उद्यत होकर ये हँसने लगे । तदनत्तर है
भरे हुए शम्भु अन्तवनि हो केलासको चले गये |:
समय कालीके विरहसे उनका चित्त उन्होंकी ओर सिर
था | कैंठासयर जाकर परमानन्दर्में निम्न हुए मरे
अपने नन््दी आदि गणोंसे वह सारा बृत्तान्त कह उुनाया [वि
आदि सभी गण भी वह सत्र समाचार सुनकर अलन 5
हो गये ओर महान् उत्तव करने लगे | नारद [ उच्च 5
वहाँ महान मल होने छगा । सबके दुःख न्ट हो गये
रुद्रदेवको भी पूर्ण आनन्द प्रात हुआ।. ( अथाव ९
"+--75४७..१2८य-+
पावेतीका पिताके घरमें सत्कार, महादेवजीकी नटलीलाका चमत्कार, उनका मेना आदिसे
हा धधछ कै श्र (१
पावतीको मागना ओर माता-पिताके इनकार करनेपर अन्तृधान हो जाना
व्रह्माजी कहते हँ--नारद ! भगवान् शंकरके अपने
स्थानको चले जानेपर सखियोसहित पावती भी अपने रूपको सफल
करके महादेवजीका नाम लेती हुईं पिताजीके घर चली गयीं |
पावतीका आगमन सुनकर मेना और हिमाचल दिव्य रथपर
आएूढ़ हो हर्षसे विहल होकर उनकी अगवानीके लिये चले |
पुरोहित; पुरवासी, अनेकानेक सखियाँ तथा अन्य सब
सम्बन्धी भी आ पहुँचे । पावतीके सारे भाई मेनाक आदि
बड़ें हषके साथ जय-जयकार करते हुए उन्हें घर ले आनेके
लिये गये |
इसी बीचमें पार्वती अपने नगरके निक्रट आ गयीं |
नगरमें प्रवेश करते समय शिवा देवीने माता-पिताको देखा,
जो अत्यन्त प्रसन्न और हर्षसे विहछचित्त होकर दौड़े चले
आ रहे थे | उन्हें देखकर हषसे भरी हुईं कालीने सखियों-
सहित प्रणाम किया | माता-पिताने पूर्णरूपसे आशीर्वाद दे
। पुत्रीकों छातीसे लगा लिया और ०ओ) भेरी बच्ची ! ऐसा
/ ये
४. रत
/ '
कहकर प्रेमसे व्रिहल हो रोने छगे | तलइचाव् /
घरकी दूसरी-दूसरी ल्लियों तथा मामियोंने भी बड़ी पर:
साथ प्रेमपूर्वक उन्हें भुजाओंमें मरकर मेगा । 'देवि 6
अपने कुछका उद्धार करनेवाले उत्तम कार्यक्रो अच्छी
सिद्ध किया है। तुम्हारे सदाचरणसे हम सव छोग पता
गये! ऐसा कहकर सब लोग हषेके साथ कार ूप्िः
प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम करने लगे। ले क
और सुन्दर फूलोंसे शिवादेवीका सानन्द पूजन हियां*
अवसरपर विमानपर बैठे हुए. देवताओँने पार्वतीको हल
करके उनपर फूछोकी वर्षा करते हुए स्व॒ति की। नी
उस समय तुम्हें भी एक सुन्दर रथपर बिठाकर बरी!
सब लोग नगरमें ले गये | फिर आ्राह्मणों) सखियों तर 9
स्त्रियाने बढ़े आदरके साथ झिवाका घसके भीतर 2
कराया । स्तियोंने उनके ऊपर वहुत-सी वस्त॒एँ निर्शा हे
: ब्राह्मणॉनि आशीर्वाद दिये | मुनीख्र | पिता हिना का
६ । ही नतटलीलाका
# रद्रसंहिता ] # पायतीका पिताके घरमें सत्कार, महादेवजीकी तटलीलाका चमत्कार * २०५
ह माता मेनकाक्ो बढ़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने गहख्-
9 आश्रमकोी सफल माना ओर वह अनुभव किया कि कुणुच्रकी
फ अपेक्षा सुपुत्री ही श्रेष्ठ है। गिरिराजने ब्राह्मणों और वन्दी-
है जनेंकी धन दिया ओर ब्राह्मणेंसि मड़ल्पाठ करवाया।
मुने | इस प्रकार पावतीके साथ हर्पमरे साता-पिता। भाई
हुए ऐैथा भोजाइयाँ भी घरके ऑँगनमें प्रसन्नतापूर्वक बैठीं ।
तर तदनन्तर हिसवान् प्रसन्नचित्ते सबका आदर-सत्कार
फवरके गद्ञा-स्नानक्े छिये गये | इसी बीचमें सुन्दर लीला
8 करनेवाले भक्तवत्सल भगवान् झम्मु एक अच्छा नाचनेवार
!कनेठ बनकर मेनकाके पास गये। उन्होंने बायें हाथमें सींग
?ै/और दाहिने हाथ डमरू ले रख्खा था | पीठपर कथरी रख
हेश्छोड़ी थी | छाल वस्त्र पहने वे भगवान् रुद्र नाच और
दोंगानमें अअनी निपुणताका परिचय दे रहे थे | सुन्दर नटका
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$ कि + ४ ट है महक । $ १ 8 धटनण्छा हे. ह। ९ , आय आह की का जज के ह आ 7० जनक व
फ _ फ 5 ब मा 40० 20 आय आवक ः<
है 080 ह। १६५ < $ « है है. ् मी ४ 22. डे ० 9 ता जा, किल्के फ्८
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लिये नगरके सभी ख्री-पुदध एवं बाल्क ओर ब्रृद्ध भी
सहसा वहाँ आ पहुँचे | मुने | उस सुमधुर गीतको सुनकर
ओर उस मनोहर उत्तम नृत्यकों देखकर वहाँ आये हुए
सब लोग तत्काल मोहित हो गये | मेना भी मोही गर्यी |
उधर पावतीने अपने हृदयमें भगवान झांंकरका साक्षात् दर्शन
किया । वे त्रियूछ आदि चिह्न धारण किये अत्वन्त सुन्दर
दिखायी देते थे। उनका सारा अड़' विभूतिसे विभूषित था |
वे हृड्डियोंदी मालासे अलंकृत थे | उनका सुख सूये चन्द्र
एवं अमिरूष दीन नेत्रोसे उद्धासित था। उन्हेंने नागका
यजशोपवीत धारण किया था | उनके उस सुरम्य रूपकों देखकर
दुर्गा प्रेमावेशसे मूर्छछित हो गयीं | गोरवर्णविभूषित दीनबन्धु
दयासिन्धु ओर सर्वथा मनोहर महेश्वर पायतीसे कह रहे थे
कि ध्वर माँगो ।? अपने हृदयमें विराजमान महादेवजीकों इस
रूपमें देखकर पार्वती देवीने उन्हें प्रणाम क्रिया ओर मन-ही-
मन यह वर माँगा कि “आप मेरे पति हो जाइये ।? प्रीतियुक्त
हृदयसे शिवाकी बेसा कल्याणकारी वर देकर वे पुनः अन्तर्घान
हो गये और वहाँ पूवबत् भिक्षा सॉँगनेवाला नंद बनकर
उत्तम नृत्य करने लगे |
उस समय मेना सोनेक्नो थालीमें रक््खे हुए बहुत-से
सुन्दर रत्न ले उन्हें प्रसन्नताएवंक देनेके लिये गयों। उनका
वह ऐश्वर्य देखकर भगवान् दांकर मन-द्वी-मन बड़े प्रसन्न
हुए । परंतु उन्होंने उन रत्लेंको स्वीकार नहीं किया । से
भिक्षामं उनकी पुत्री शिवाक्ों ही मांगने छगे ओर पुनः
कोतुवबद्य सुन्दर सत्य एवं सन यरनेकों उयत हुए ।
धन जन ५ ६+-कुनक- हर । यात >> कट यह श्र है ग्ग्यन्त बल्ले अकब्मक, कक ब्दई ।
गेना उस भिक्षुक नब्की बात सुनकर अत्यन्त कृपित छो उदों
_] दे पी फः अवारने दा» ट्श्का, ्, सतत हर झ्परे च्यं ट्र
आर उसे डटय्ने-फटकारने लर्गीं। उनके मन्म उसे याद
सकाील ८ २३५. पृ कया । हट पे दा कि कब मठ सन, हटा श् ||
निकाल देनेकी इच्छा हुई । हसी बीच निरिराण टिसवाग
क कि ट थ्ग 3, बज * 4० # ह् हर पी होगे " शा क्र
गया शीसे महादर छोट अ्गये। उस्टनि आने सामने उस
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सराकझार मिन्लकादं डगनर्स सा देखा । मेसादी गस्ने
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२०५ ५ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5
कानोंमें कुण्डल और शरीरपर पीतवस्त्र शोभा पाते ई।
उनके चार भुजाएँ हैं | हिमवानने पूजाके समय गदाधारी
श्रीहरिको जो-जो पुष्प आदि चढ़ाये थे) वे सब उन्होंने भिक्षुके
शरीर और मस्तकपर देखे | तत्पश्चात् गिरिराजने उन भिक्षु-
शिरोमणिको जगत्ल्टा चतुमुख ब्रह्माके रूपमें देखा। उनके
शरीरका वर्ण छाल था और वे वेदिक सूक्तका पाठ कर रहे
थे | तदनन्तर शेलाजने उन कोतुककारी नय्राजकी एक
क्षणमें जगतके नेत्नरूप सूर्यके आकारमें देखा। तात | इसके
बाद वे महान् अद्भुत रुद्रके रूपमें दिखायी दिये | उनके
साथ देवी पाती मी थीं | वे उत्तम तेजसे सम्पन्न रमणीय
र॒ुद्र धीरे-धीरे हँस रहे थे। फिर वे केवल तेजोमय रूपमें
दृष्टिगोचर हुए | उनका वह स्वरूप निराकार। निरश्ञनः
उपाधिशृन्य, निरीह एवं अत्यन्त अद्भुत था। इस प्रकार
[ संक्षिप्त-शिवपुराण]
पर्स ज लडद़चस सब न & 2 बडडओ ड स & ड डस ड + 5छ उ:&<इ डइ३ड:ब:़:[उजछडस सड सऊनसस ससफकसन ससलससटसऊसऊय्स्ट्स्स्स्यय्स्य्स््स्य्स्स्स्स्स्स्य्स््य्स्य्स्स्स््य्य्य्य्स््स्स्य््स्स्स्स्ल्ल्डल्ल्््ड्ः
हिमवानने उनके बहुत-से रूप देखें। इससे उन्हें बढ़ा वित्त
हुआ और वे तुरंत द्वी परमानन्दर्म निमग्त दो गये | तर
सुन्दर लीला करनेवाले उन मिश्नु-शिरोमणिने हिखान ओ
मेनासे दुर्गाकों ही मिक्षाक्े रूपमें माँगा। दूसरी करे
ग्रहण नहीं की | परंतु शिवक्री मायासे मोहित होनेडे छा!
शेलराजने उनकी उस प्राथंनाकी ख्ीकार नहीं कलह
भिक्षुने कोई वस्तु नहीं ली ओर वे बहँसे अन्तर्वान हे ऐे'
तब मेना और देलराजको उत्तम ज्ञान हुआ अ
सोचने लगे--“भगव्रान् शिव हमें अपनी मायाते
अपने स्थानकी चले गये | यह विचाऱर उब दें
भगवान् शिवमें पराभक्ति हुई; जो महान मोक्षकरी ग्रातिः
बाली, दिव्य तथा सम्पूर्ण आनन्द प्रदान करनेबाद
( अथाव
“+-+औ<८द श्र *्स्ल्त+ १९$६«---
देवताओंके अनुरोधसे वेष्णव त्राह्मणके वेपमें शिवजीका हिमबानके घर जाना ओर शिव
4.0 पावतीका 6०5 करनेक
निन्दा करके पायेतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना
* ब्रह्माजी कहते हैं--नारद ! मेना और हिमवानऊी
भगवान् शिवके प्रति उच्चकोटिकी अनन्य भक्ति देख इन्द्र
आदि सब देवता परस्पर विचार करने लगे । तदनन्तर गुरू
बृहस्पति और ब्रह्माजीकी सम्मतिके अनुसार सभी मुख्य
देवताओंने शिवजीके पास जाकर उनको प्रणाम किया ओर
वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे |
देवता चोले--देवदेव ! महादेव | करुणाकर | शंकर |
हम आपकी शरणमें आये हैं; कृपा कीजिये | आपकी नमस्कार
है | खामिन् | आप भक्तवत्सलछ होनेके कारण सदा भरक्तोंके
कार्य सिद्ध करते हैं | दीनोंका उद्धार करनेवाले और दयाके
सिन्धु हैं तथा भक्तोंको विपत्तियेंसे छुड़ानेवाले हैं ।
इस प्रकार महेश्वरकी स्त॒ति करके इन्द्रसहित सम्पूर्ण
देवताओंने मेना और हिमवानकी अनन्य शिवभक्तिके विषयमें
सारी बातें आदरपूर्वक बतार्यी | देवताओंकी वह बात सुनकर
महेश्वरने उनकी प्रार्थना खीकार कर छी और हँसते हुए. उन्हें
आश्वासन देकर बिदा किया | तब सब देवता अपना कार्य
सिद्ध हुआ मानकर भगवान् सदाशिवकी प्रशंसा करते हुए
शीघ्र अपने घरको लोटकर प्रसन्नताका अनुभव करने छगे।
तदनन्तर भक्तवत्सल महेश्वर भगवान् शम्मु, जो मायाके स्वामी
हैं; निर्विकार चित्तसे. शलराजके यहाँ गये | उस सम्रय गिरि-
राज हिमवान् समामत्रनमें बन्चुर्गसे बिरे हुए पवी
प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे | इसी अवसरपर वहाँ सदाशिवने
किया । वे हाथमें दण्ड, छत्च; शरीरपर दिव्य वल्ष) हैँ
उज्ज्वल तिलक) एक हाथमें स्फटिककी माल्या और:
शालग्राम घारण किये भक्तिपूर्वक हरिनामका जय कर ए
ओर देखनेमें साधुवेघघारी ब्राह्मण जान पड़ते ये | उ्े
देख सपरिवार हिमवान उठकर खड़े हो गये । उ्े
अपूर्व अतिथिदेवताकी भूतलूपर दण्डके समान पक
भावसे साष्टाज्न प्रणाम किया | देवी पावेती अर
प्राणेश्वर शिवको पहचान गयी थीं | अतः उन्होंने गे
मस्तक झुकाया और मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताके साई
स्तुति की । ब्राह्मणस्पधारी शिवने उन सबको हैं।
आशीर्वाद दिया | किंतु शिवाकों सबसे अधिक मोर
श॒भाशीर्बाद प्रदान किया ) हौंछाघिराज हिमवानते #
से उन्हें मधुपक आदि -पूजत-सामग्री: भेंट की और
बड़ी प्रसन्नताके साथ वह सब ग्रहण किया | तलश्रार
हिमाचलने उनका कुंशल-समाचार पूछा । मुने | अर
पूवेक उन द्विजराजकी विधिवत पूजा करके गैल्राजन #
“आप कोन हैं १? तब उन ब्राह्मणशिरोमणिने गिरियरी ह
ही आदरपूर्क कहा |... : ता
स्रसंहिता ) # मेनाका फोपभवनम प्रवेश
भगवान शिवका हिमवानके पास सप्तर्पियोंको भेजना ३६ २०७
औ
“4 नल
॥
' हु
रा 5
रे
!
' ९ (
पे श्रेष्ठ ब्राह्मण बोले--गिरिश्रेष्ठ | मैं उत्तम विद्वान
व न्राद्मण हूं और ज्योतिषीकी घतिका आश्रय लेकर भृतलपर
3 परता रहता हूँ | मनके समान मेरी गति है । में सर्वत्र
_ समर और गुरुकी दी हुई शक्तिसे सर्वश हूँ | परोपकारी)
समा; दवासिन्धु ओर विकारनाशक हूँ । मुझे शात हआ
॥ तुम महदेवजीकी अपनी पुत्री देना चाहते हो । ड्स
हैं । क्रीपी ओर अविवेकी हैं ।
लपेटे रहते और योग साधते फिरते हैं | उनके पास पहननेके
लिये एक वस्त्र भी नहीं है | वेसे ही नंग-धड़ंग घूमते हैं।
आभूषणकी जगह सप धारण करते हैं । उनके कुलक्रा नाम
आजतक क्रिसीको ज्ञात नहीं हुआ | वे कुपात्र ओर कुशील
हैं | स्व॒भावतः विह्ारसे दूर रहते हैँ । सारे शरीरमें भस्म रमाते
उनकी अवस्था कितनी है;
यह किसीको ज्ञात नहीं । वे अत्यन्त कुत्तित जयका बोझ सदा
सिरपर धारण किये रहते हैं | वे भले-ुरे सबको आश्रय देने-
वाले, श्रमणश्नील, नागहारघारी, मिक्षुकः कुमार्गपरायण तथा
हटपूर्वक वेदिकमार्गका त्याग करनेवाले हैँ | ऐसे अयोग्य वरको
आप अपनी बेटी व्याहना चाहते हूँ ! अचलराज |! अवश्य ही
आपका यह विचार मद्नलदायक्र नहीं है | नारायणकुलमें
उत्मन्न | शानियंमे श्रेष्ठ गिरिराज | मेरे कथनका मर्म समझो |
ठुमने जिस पान्रको हँढ़ रखा है, वह इस योग्य नहीं है कि
उसके हाथमें पावतीका हाथ दिया जाय । शेलराज |
तुम्दीं देखो, उनके एक भी भाई-बन्धु नहीं हूँ ।
तुम तो बड़े-बड़े रतनोंकी खान हो | किंत उनके घरमें भूजी
भाँग भी नहीं है--वे सवथा निर्धन हैँ | गिरिराज | तम शीत
ही अपने भाई-बन्धुओंसे, मेनादेवीसे, सभी ब्रेटसे और पण्डितेसि
भी प्रयत्मपूर्वक पूछ लो । किंतु पावतीसे न पूछना।. क्योंकि
उन्हें शिवके गुग-दोपकी परख नहीं है ।
च्रह्माजी कहते हँ--नारद | ऐसा कदकर थे ब्राद्मण-
भरोसी मुन्दर स्पवाली दिव्य एवं सुलक्षणा कन्याको एक. देवा) जो नाना प्रकारकी लीला करनेवाले शान्तखवरुप शित्र ही
निरित, असल ऋरूप ओ र गुणहीन बरके हाथमें देना दीक्ष खा-पीकर आनन्दपूवक्त वहसे अपने घपरवों
/म ५ | थे रद्र देवता मरपठमें वास करते, शरीरमें सॉप चल दिये । ( अध्याय ३१ )
£ रा आ 4: ०-9. 90 ॥एए,ौाएएााा
(का! कापभपनमें प्रवेश, भगवान् शिवका हिमबानके पास सप्तर्पियोंको भेजना तथा हिमब्रानद्धार
री
नी
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उनका सत्कार, सप्तपियों तथा अरुन्धतीका ओर महरपिं बसिष्ठका सेना आर हिमवानको
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श, तसभपाकर पावताका पिवाह भगवान् शक साथ ऋकरतकऋ करनेके लिये कहना
अाज्री पहत ए--आएणस्प पाये शिव स्पा पैू हपर दाशाडा रहिए तक 55
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कम» न कत+नमे, आभ-+अप्यकत-ण्यनकुट। पराण्फ की + आअंजीर रा कु आवक के | पाल उच्च कया 5त--न्न् न की] रद ६.
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ब्रह्म) विष्णु और हर नाम धारण करती है, उन्हें कोन निर्धन
अथवा दुखी कह सकता है ! ब्रह्मलोकमें निवास करनेवाले
ब्रह्मा; क्षीरसागरमें रहनेवाले विष्णु तथा केलासवासी हर--ये
सब शिवकी ही विभूतियाँ हैं | शिवसे प्रकट हुई प्रकृति भी
अपने अंशसे तीन प्रकारकी मूर्तियोंको धारण-करती है | जगत्में
लोलाशक्तिसे प्रेरित हो वह अपनी कलासे बहुत-सा रूप धारण
करती है | समस्त वाडमयकी अधिष्ठात्री देवी वाणी उनके
मुखसे प्रकट हुई हैं ओर सर्वसम्पत्ख्रूपिणी लक्ष्मी वक्षःस्थल-
से आविर्भूत हुई हैं तथा शिवाने देवताओंके एकत्र हुए. तेजसे
अपनेको प्रकट किया था ओर सम्पूर्ण दानवोंका वध करके
देवताओंको खगंकी लक्ष्मी प्रदान की थी ।
देवी शिवा कब्पान्तरमें दक्षपत्ञीके उदरसे जन्म ले सती
नामसे प्रसिद्ध हुईं और हरको उन्होंने पतिके रुपमें प्राप्त
किया । दक्षने खयं ही भगवान शिवको अपनी पुन्नी दी थी |
सतीने पतिकी निन्दा सुनकर योगबलसे अपने शरीरको त्याग
दिया था । वे ही कल्याणमयी सती अब तुम्हारे बीय॑ और
मेनाके गर्मसे प्रकट हुई हैं | शैलराज | ये शिवा जन्म-जन्ममें
शिवकी -ही पद्नी होती हैं। प्रत्येक कल्पमें बुद्धिरुपा दुर्गा
ज्ञानियोंकी श्रेष्ठ माता होती हैँ | ये सदा सिद्ध, सिद्धिदायिनी
और सिद्धिरूपिणी हैं | भगवान् हर चिताभस्मके रूपमें सतीके
अख्थिचूर्णको ही खयं प्रेमपूर्वक अपने अज्ञंमें घारण करते हैं।
/ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा
अतः गिरिराज | ठुम स्वेच्छासे ही अपनी भज्गत्मयी कनाग्रे
भगवान् दृस्क्े हाथम दे दो | तुम यदि नहीं दोगे तो क
स्वयं प्रियतमक्रे खानमें चली जायगी | देवेश्वर शिव तुझ्या
पुत्नीका अनन्त बलेश देखकर ब्राह्मणक्रे रूपमें इसकी तथा
स्थानपर आये थे ओर इसके साथ विवाहकी प्रतिज्ञा करे झे
आश्वासन एवं वर देकर अयने आवास-स्थानको छोट गये वे ।
गिरे ! पाबतीकी प्रार्थनासे ही झम्भुने तुम्हारे पास आकर इसके
लिये याचना की ओर तुम दोनोंने शिवभक्तिमें मन व्याक्र
उनकी उस याचनाकों स्त्रीकीर कर लिया था। गिरेक्ष |
बताओ, फिर किस कारणसे तुम्हारी बुद्धि व्रिपरीत हो गयी!
भगवान् शिवने देवताओंकी प्रार्थनासे प्रभावित होकर हम से _
क्र पियोंकी और अरुन्धती देवीको भी तुम्हारे पास मेजा है।
हम तुम्हें यही शिक्षा देते हैं कि तुम पार्वंतीकों रदके हपा
दे दो | गिरे | ऐसा करनेपर तुम्हें महान आनन्द प्राप्त हेग
शेलेन्द्र | यदि तुम स्वेच्छासे अपनी बेटी शिवाकों शिव
हाथमें नहीं दोगे तो भावीके वल्से ही इन दोनोंका विवाह
जायगा | तात ! भगवान झंकरने तपस्यामें लगी हुई पाती
ऐसा ही वर दिया है। ईश्वर्की की हुई प्रतिश कमी पे
नहीं सकती । गिरिराज | ईश्वरके वशमें रहनेवाले समस्त तः
पुरुषोंकी भी प्रतिशञाका संसारमें किसीके द्वारा उल्ल्न हे
कठिन है | फिर साक्षात् ईश्वरकी प्रतिज्ञाके लिये वो कहीं
ही कया है ! ( अध्याय ३२-३३ ) ह
४++-४-<-4/68--+-»-.--
सप्तर्षियोंके समझाने तथा मेरु आदिके कहनेसे पत्लीसहित हिमवान्का शिवके साथ अपनी
पुत्रीके विवाहका निश्चय करना तथा सप्तर्षियोंका शिवके पास जा उन्हें
सब बात - बताकर अपने धामको जाना
_अह्याजी कहते ह--नारद ! तदनन्तर वसिष्ठने प्राचीन
कालमें राजा अनरण्यके द्वारा अपनी कन्या पद्माका पिप्पछादके
साथ विवाह करनेकी तथा घमंके वरदानसे पिप्पलादके तरुण
अवस्था; रूप) गुण, सदा स्थिर रहनेवाले योवन, कुबेर और
: - “इन्द्रसे भी बढ़कर धन-ऐश्वये; भक्ति; सिद्धि एवं समता प्राप्त
० छह. «४70६ कर
| ॥7
व
करनेकी तथा पद्माके स्थिर यौवन) सौमाग्य) सम्पत्ति एव मी
द्वारा परम गुणवान् दस पुन्नोंके प्राप्त करनेकी केंया 2000
कहा--शैलेन्द्र | तुम मेरे कथनके सारतत््वको समझकर
पुत्री पार्वतीका हाथ महादेवजीके हाथमें दे दो और
तुम्हारे मनमें जो कुरोष है; उसे त्याग दो.] आजते एक
रुट्रसंहिता | £ सप्तपियोंके समझानेसे हिमवानका शिवके साथ पातरतीके विवाहका निश्चय करता #.. २११
ट््
न ज | ! 00
हे 22| *
4. न “(५8 (
कक २
व्यतीत होनेपर अत्यन्त शुभ और हुलेभ मुहूर्त आनेवाला है |
उस समय चन्द्रमा लग्के खामी होकर अपने पुत्र बुधके साथ
झमें ही खित होंगे। उनका रोहिणीनक्षत्रके साथ योग
: शैगा। चन्द्रमा ओर तारे थुद्ध होंगे । मार्यशीष॑मासके अन्तर्गत
हर 2.
पु दोपो
सूण दोपोसे रहित सोमवारको, जब कि ल्मपर सम्पूर्ण श॒भ-
| महँवी दृष्टि होगी, पापग्रहोंकी दृष्टि नहीं होगी तथा बृहस्पति
रसे स्ानपर खत ऐँंगे; जहाँसे वे उत्तम संतान और पत्तियां
गैमाम्य देनेमें समर्थ होंगे | ऐसे मुहूर्तमें तुम अपनी कन्या
इह्प्रद्धति ऐशरी जगदम्या पावतीको जगत्-पिता भगवान
शिव हाथर्मे देकर कृतार्थ हो जाओ |?
एस पटवर शानिशिरोमणि मनिवर वसिए नाना प्रकारदी
नंद गरनेदाले भगवान् दिवका स्मरण करके रूप हो गये।
गह्ऋाएणजरी धघत सुनतार सेव ट। और पथ गीर्सा शत गिरिएजञञ
शत पड़े दिस्मित एए ओर दसप्रट्रर पंदतातस दाल |
हिमालवने फहा--गिरिराव मेरे, रह) सन्पमादन
छ
पर ४१३४ १(*४. आगोर $:+ » 45२९ अदि परदतर। !
स््टूफाक चा
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बे कक
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धरम या णयाप्प्यक॒ का पॉँ |।
॥६ 5 "२, “६:०१, ०
अत
'रण्एक रुका “याकाम्ण,
हर
हिमाचलकी यह वात सुनकर सुमेर - [दि पवत भली-
भाँति निर्णय करके उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले ।
पर्व॑तोंने कहा--महाभाग | इस समग्र विचार करनेसे
क्या लाभ ? जैसा ऋषिलछोग कहते हैं, उसके अनुसार ही कार्य
करना चाहिये । वास्तव यह कन्या देवताओंका कार्य सिद्ध
करनेके लिये ही उत्पन्न हुई है। इसने शित्रके लिये ही
अवतार लिया है; इसलिये यह शिवक्रो ही दी जानी चाहिये |
यदि इसने रुद्रदेवकी आराधना की है और रुद्रने आकर इसके
साथ वार्तोलाप किया है तो इसका विवाह उन््हींके साथ
होना चाहिये ।
ब्रह्माजी कहते हँं--नारद | उन मेरु आदि पर्तोंकी
यह बात सुनकर हिमाचल बड़े प्रसन्न हुए ओर गिरिजा भी
मन-ही-मन हँसने लगीं। अरुन्धतीने भी अनेक कारण बताकर)
नाना प्रकारकी बातें सुनाकर ओर विविध प्रकारके इतिहार्सोका
वर्णन करके मेनादेवीको समझाया | तब झोलपत्नी मेनका
सब कुछ समझ गयीं ओर प्रसन्नचित्त हो उन्होंने मुनियोको
अरुन्धतीजीकों ओर हिसमाचलकों भी भोजन कराकर स्वयं
भोजन किया। तदनन्तर ज्ञानी गिरिश्रेष्ठ दिमाचलने उन
मुनिर्योकी भमलीभाँति सेवा की । उनका मन प्रसन्न ओर सारा
भ्रम दूर हो गया था। उन्होंने हाथ जोड़ प्रसन्नतापूवषक उन
महरपियोंसे कहा ।
हिमालय बोले--महामाग सप्तपियों ! आयोग मेरी
बात सुर्ने । मेरा सारा संदेह दूर हो गया। गने शिव-पावतीफ़े
चरित्र सुन लिये । अब मेरा शरीर, मेरी पत्नी मेना) मेरे पत्र-
पुत्री; ऋद्धि-सिद्धि तथा अन्य सारी बस्तुएँ भगवान, शित्र्द
ही हैं, दूसरे किसीडी नहीं ।
अल्याज्ञ च्क [ फकटते श 8 445५ «७ | ए्ग्य एल 2०५ टि शसाचल ४, *
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सनी पूश्नीकी ओर आदरपूबक देखा आर पर्रय पर्दे
विवप्रित बरहे प्पियोद्ी गादर्म विदा दि
शेल्राज् पुन
रद्ता भाग
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7:20 *;
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२१२२
शिखरोकी सामान्य गति है--तुम्हारे सभी शिखर सामान्यरूपसे
पविन्न एवं श्रेष्ठ हैं ।
त्रह्माजी कहते है--नारद | ऐसा कहकर निर्मल
अन्त+करणवाले उन मुनियोनि गिरिराजकुमारी पायतीको हाथसे
छूकर आशीर्वाद देते हुए कहा--'शिवे | तुम भगवान्
शिवके लिये सुखदायिनी होभो। तुम्हारा कल्याण होगा ।
जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं; उसी प्रकार ठम्हारे गुणोक्ी
बुद्धि हो ।! ऐसा कहकर सब सुनिरयोने गिरिराजकों प्रसन्नता-
पूर्वक फल-फूल दे विवाहके पक्के होनेका दृढ़ विश्वास कर
लिया । उस समय परम सती सुमुखी अरुन्धतीने प्रसन्नता-
पूवेंक मगवान् शिवके गुर्णोका बखान करके मेनाको छुमा
लिया | तदनन्तर गिरिराज हिमवानने परम उत्तम माइलिक
लोकाचारका आश्रय ले हल्दी ओर कुड्डमसे अपनी दाढ़ी
मूँछका मारजन किया | तलयश्रात् चोग्रे दिन उत्तम लम्मका
निश्चय करके परस्पर संतोष दे। वे सपत्तपि भगवान्
शिवके पास चले गये । वहाँ जाकर शिवकोी नमस्कार और
विविध सूक्तियोंसे उनका स्तवन करके वे वसिष्ठ आदि सब
मुनि परमेश्वर शिवसे बोले ।
ऋषियोंने कहा--देवदेव | महादेव ! परमेश्वर !
महाप्रमो | आप प्रेमपूवक हमारी बात सुनें | आपके इन
सेवरकोने जो कार्य किया है, उसे जान लें। महेश्वर | हमने
नाना प्रकारके सुन्दर वचन ओर इतिहास सुनाकर गिरिराज और
मेनाको समझा दिया है ।गिरिएजने आपके लिये पार्वतीका वाग्दान
कर दिया है। अब इसमें कोई ननु-तच नहीं है। अब आप
४४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने १४
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
अपने पार्षदों तथा देवताओंके साथ उनके यहाँ विवाहके लिये
जाइये । महादेव | प्रभो | अब शीघ्र हिमाचलके घर परधाधि
ओर वेदोक्त रीतिक्े अनुसार पारयंतीका अपने लिये पाणिफ्
कीजिये |
सप्तपियोंका यह वचन सुनकर लोकाचारपरायण महेश
प्रसन्नचित्त हो हँसते हुएए इस प्रकार बोले |
महेश्वग्ने कह--महाभाग सद्तर्षियो | विवाहकों हो
मेने न कभी देखा है ओर न सुना ही है। तुमलोगेनि पे
जैसा देखा हो; उसके अनुसार विवाहकी विशेष विधिक
वर्णन करो |
संहेश्वरके उस छोकिक शुभ वचनको सुनकर वे श्र
हँसते हुए देवाधिदेव भगवान् सदाशिवसे बोले |
फ्रपियोने कहा--प्रभो ! आप पहले तो मार
विष्णुकी, विशेषतः उनके पार्पदोंसहित झीम बुल्य ढे। फरि
पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको, देवराज इन्द्रकों) समस्त ऋषियों
यक्ष; गन्धर्व, किनर। सिद्ध, विद्याथर और अप्णओंग
प्रसन्नतापूषंक आमन्त्रित करें | इनको तथा अन्य पंत
यहाँ सादर बुल्वा लें। वे सब मिलकर आपके का
साधन कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है !
प्रह्माजी कहते है--नारद ! ऐसा कहकर वे सं
ऋषि उनकी आज्ञा ले भगवान् शंकरकी खितिकी १०
करते हुए, वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक अपने धामको चलें गये |
( अध्याय ३४-९६
४० 5-अ+व्थए-0-7२5---3% ०
हिमवानका भगवान् शिवके पास रुम्पत्रिका भेजना, विवाहके लिये आवध्यक सामान जुदा)
मड़लाचारका आरम्भ करना, उनका निमन्त्रण पाकर पर्बतों और नदियोंका दिव्यरूपं
आना, पुरीकी सजावट तथा विश्वकमोद्वारा दिव्यमण्डप एवं देवताओंके निवासके
लिये दिव्यलोकॉका निमोण करवाना
नारदजीने पूछा--तात ! महाग्राज्ष | प्रमो | आप
कृपापूरवक यह बताइये कि सत्तर्षियोंके चले जानेपर हिमाचलने
क्या किया ।
नह्माजीने कहा--मुनीश्वर | अरुन्धतीसहित उन
सप्तपियोंके चले जानेपर हिमवानले जो कार्य किया; बह तुम्हें
| सप्तप्ियोंके जानेके बाद अपने मेरु आदि
भाई-बन्धुओंकी आमन्त्रित करके पुत्र और पत्नीसहित
महामनस्री गिरिराज हिंमवान् बढ़े हषका अनुभव के मा
तदनन्तर ऋषियोंकी आशाके अनुसार हिमवार्ते
पुरोहित गर्गजीसे बड़ी प्रसन्नताके साथ लम्न-पत्रिकी लिहवार
उस पत्रिकाको उन्होंने भगवान् शिवके पास भेजी | पृ
बहुत-से आत्मीयजन प्रसन्नमनसे नाना प्रकारकी
लेकर वहाँ गये । कैंठासपर भगवान शिवके समीर है
उन लोगेंने शिवकी तिलक लगाया और वह मर
रुद्रसंहिता |
४993
४£ हिमबरानका भगवान् शिवके पास रूसझपन्निका भेजना 5: १
दर्म दिया | वहाँ सगवान् शिवने उन सबका यथायोग्य
ब्रशेष सत्कार क्रिया | फिर वे सब छोग प्रसन्नचित्त हो
ग्रल्राजक्रे पास छोट आये | महेश्वरके द्वारा विशेष सम्मानित
गेकर बढ़े हर्षफ्रे साथ ल्टेंटे हुए. उन लोगोंको देखकर
दिमवानके हृदयर्मं अत्यन्त हर्ष हुआ | तत्मश्वात् आनन्दित
दी शेल्राजने नाना देशोंमें रहनेवाले अपने वन्धुओंकी लिखित
निमन््त्र० भेजा) जो उन सबको सुख देनेवाला था | इसके
बाद थे बड़े आदर ओर उत्साहके साथ उत्तम अन्न एवं
नाना प्रकारकी विवाहोचित सामग्रियोंका संग्रह करने लगे |
उन्देने चाल, गुड़, शक्कर; आठ) वृष, दही) घी, मिठाई,
गमकीन पदार्थ, मक्खन, पकवान) महान् खादिए रस और
नाना प्रकारके व्यज्ञन इतने अधिक एकच्र किये कि सूखे
ददाथकिे पहाड़ खड़े हो गये ओर द्रव पदार्थोकी बावड़ियाँ
पेन गयीं । झिवके पापदों ओर देवताओंके लिये हितकर
गाना प्रकारकी बस्तुएँ, मॉति-माँतिके बहुमूल्य वस्र। आमगमें
पाकर शुद्ध किये हुए. सुवर्ण रजत और विभिन्न प्रकारके
पणिरत्ष--इनका तथा अन्य उपयोगी द्वव्योंका विधिपूर्वक
ग्रह करके गिरिराजने मइलकारी दिनमें माड्रलिक कृत्य
परना आरम्भ किया | पतराजके घरकी खस़्रियोंने पार्व॑तीका
मंस्कार करवाया। भाँति-मॉतिके आभूषणोंसे विभूषित हुई
रामभवनकी उन सुन्द्री स्लियोंने साननद मप्नलकायंका सम्पादन
किया । मगरके ब्राह्मणोंकी स्लियोंने स्वयं बड़े हर्षके साथ
धपानारका अनुष्ठान किया | उसमें मद्नल्पूनक भाँति-भौतिके
इलाब सनाये गये । हर्पभरे हुदयसे उत्तम मदलाचारका
ऐग्गदन करके हिमालय भी सर्वतोभावेम बड़े प्रसन्न हुए
भर अपने निमन्त्रित बन्बुजनेद्धि आगमनक्री उत्सुकतायवक
गैक्षा पस्ने लगे ।
५ एसी दीचमें उनके निमन्धित बन्धुवान्थव आने छगे |
( साओके नियासयृत गिरिराज समेय दिव्य रूप धारण करे
; ली प्तारक मधियों तथा महारत्षोंकी यत्नागवक साथ छे अगर
पुदार सप एमिल्यके घर आये | मन्दशाच॒ल) धलाचड,
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प्रसन्नताके साथ वहाँ पदापंण किया । झोणमद्र आदि नद
ओर सम्पूर्ण नदियाँ दिव्य नर-नारियोंके रूप ,धारणकर नाना
प्रकाके अलंकारोंसे अलंकृत हो शिव-पावंतीका विवाह
देखनेके लिये आये | गोदावरी; यमुना सरखती, वेणी,
गड्ला) नर्मदा तथा अन्य श्रेष्ठ सरिताएँ भी बड़ी प्रसन्नताके
साथ हिमवानके यहाँ आयी | उन सबके आनेसे हिमाल्यकी
दिव्य पुरी सब ओरसे भर गयी | वह सब प्रकारकी शोभाओंसे
सम्पन्न थी | वहाँ बढ़े-बढ़े उत्सव हो रहे थे | ध्वजा-पताकाएँ:
फहरा रही थीं | बंदनवारोंसे उसकी अधिक शोभा होती थी ।
चारों ओर चँंदोवे तने होनेते वहाँ सूर्यका दर्शन नहीं होता था ।
भति-भॉतिकी नीछी; पीछी आदि प्रभा उस पुरीकी शोभा बढ़ाती
थी | हिमाल्यने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने यहाँ पथारे
हुए सभी छ्ली-पुरुषोंका यथायोग्य आदर-सत्कार क्रिया ओर
सबको अलग-अलग सुन्दर स्थानोंमें ठहराया | अनेकानेक
उपयुक्त सामग्री देकर सब्रको पूर्ण संतुष्ट किया ।
मुनिश्रे्ठ | तदनन्तर शोलराज हिमवानले प्रसन्न हो महान
उत्सवसे परिपूर्ण अपने नगरकों विचित्र रीतिसे सज़ाना
आरम्म क्रिया । सइकीको झाड़-ब्ुद्यरकर उनपर छिठकात्र
कराया | उन्हें बहुमूल्य साबनोंसे सुसलित एवं शोमित
किया । प्रत्येक घरके दरवाजेपर केले आदि माइलिक प्रक्ष
लगवायरे और उन्हें मालिक द्रव्येसि संयुक्त किया | ऑगनयो
केलेके खंभसि सजाया | रेशमकी होरोंम आमके परहस
बॉबिकर बंदनवारं बनवार्यी आर उन्हें उन संभेकि चारा और
लगवा दिया | मालतीके फ्टकी मालाएँ उस ( आँगन )
सव आर लटका दा गया | खबर तारा यह अगिनका
भाग अलन्त प्रदाशमान जान पड़ठा था | चांसा दिशाओं:
महलटलसूचक सुन ट्क्य खा गंध थे जा उस पाजजका राधा
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जो उस मण्डपका स्रख जान पड़ती थीं | नाना प्रकारकी
निरालो वस्तुओंका चमत्कार वहाँ छा रहा था। वहाँकी स्थावर
वस्तुओंसे जंगम ओर जंगम वस्तुओंसे स्थावर पराजित हो रहे थे
अर्थात् वे एकदुसरेसे बढ़कर शोमाशाली और चमत्कारपूणे
दिखायी देते थे | उस मण्डपकी ख्थलभूमि जलसे पराजित हो रही
थी अर्थात चतुर-से-चतुर मनुष्य भी यह नहीं जान पाते
थे कि इसमें कहाँ जल है ओर कहाँ स्थल । कहीं कृत्रिम सिंह
बने थे ओर कहीं सारसोंकी पंक्तियाँ | कहीं बनावटी मोर थे;
जो अपनी सुन्दरतासे मनको मोहे लेते थे। कहीं कृत्रिम
स्त्रियां थीं; जो पुरुषोंके साथ दत्य करती हुई देखी जाती
थीं। वे कृत्रिम होनेपर भी सब लोगोंकी ओर देखती ओर
उनके मनको मोहमें डाल देती थीं। उसी विधिसे मनोहर
द्वारपा् बने थे; जो स्थावर होनेपर भी जंगमोंके समान
जान पड़ते थे | वे अपने हाथोंसे घनुष उठाकर उन्हें खींचते
देखे जाते थे ।
द्वारपर कृत्रिम महालक्ष्मी खड़ी थीं। जिनकी रचना अद्भुत
थी | वह समस्त शुभ लक्षणोंसे संयुक्त दिखायी देती थीं। उन्हें
देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो क्षीरसागरसे साक्षात् लक्ष्मी
ही आ गयी हों | उस मण्डपमें स्थान-स्थानपर सजे-सजाये कृत्रिम
हाथी खड़े किये गये थे; जो असली हाथियोंके समान ही
प्रतीत होते थे । घुड़सवारोंसहित घोड़े ओर हाथीसवारोंसहित
हाथी बनाये गये थे | जहॉ-तहाँ रथियोंसहित रथ बने थे, जो
कृत्रिम अश्वोंसे ही खींचे जाते थे | उन्हें देखकर लोगोंको बड़ा
आश्चर्य होता था । इनके सिवा दूसरे-दूसरे कृत्रिम वाहन भी
वहाँ खड़े थे | पैदल सिपाहियोंकी झंत्रिम सेना भी वहाँ मोजूद
थी। मुने ! प्रसन्न चित्तवाले विश्वकर्माने देवताओं और
मुनियोंकी भी मोह ( आश्रय ) में डालनेके लिये वहाँ ऐसी
अद्भुत स्चनाएँ. की थीं । मण्डपके सबसे बड़े फाटकपर कृत्रिम
नन््दी. खड़ा था) जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल
कान्तिसे सुशोभित होता था | भगवान् शिवके वाहन नन्दीकी
जैसी आकृति है; ठीक वैसा ही वह भी था | उस कृत्रिम
नन््दीके ऊपर रत्नभूषित महादिव्य पुष्पक शोभा पाता था;
जो पह्वों तथा ब्वेत चामरोंसे सजाया गया था। उसके
वाम पाइ्वमें दो कृत्रिम हाथी खड़े थे; जिनका रंग विशुद्ध
केसरके समान था | वे चार दातवाले बनाये गये थे ओर साठ
वर्षेके पाठोंके समान दीखते थे | वे परस्पर स्नेह करते-से
प्रतीत होते थे | उनमें वड़ी चबक थी | इसी प्रकार सूर्यके
. - समान अत्यन्त प्रकाशमान दो दिव्य अश्व भी विश्वकर्माने
४६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5:
हगदकपमापारााग्यररयाफम पारस यनताप नल" प्रयकााप'उ न्पसइान्का नमक लउल कक पलक 9:2१ एममकक्ताफ्रपइह५त साइज व दाथ गनकम्पाकक पन्कममदाममत बराबर भाडगराकयगशप्पाइु भय न्ा नबाइमाए [का ३ल् पारा रा 95 मपकप काव्य दापचप पाक अप प्यार पाक न्टाप य दस वहा आह भपयह ० कार्य फम्य समन बाण...
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा्
बनाये थे, जो चर्बेर्से अलंकृत और दिव्य अगर
विभूषित थे। श्रेष्ठ स्नमय आमूषणोंसे समन्न। काना!
लोकपाल तथा सम्यूण देवता मी वहाँ विश्वकर्माद्ण खेर
थे; जो ठीक उन्हीं छोकपालों और देवताओंते मिल्तेजुले
थे | इसी तरह भूगु आदि समस्त तपोधन कप, अब
उपदेवता ओर सिद्ध भी उनके द्वारा वहाँ निर्मित हुए थे।
गरुड़ आदि समस्त पापदोंसे युक्त भगवान् विशुत
कृत्रिम विग्रहद भी विश्वक्र्माने बनाया था। जिसका सर
साक्षात् श्रीहरिके समान ही आश्रयजनक था। ना | २
प्रकार पुत्रों, वेदों ओर सिद्धोंसे घिरे हुए मुन्नवरहाः
भी प्रतिमा वहाँ बनायी गयी थी; जो मेरे समान ही वह
यूक्तोंका पाठ कर रही थी | ऐशावत हाथीपर चढ़े हुए के
इन्द्र भी वहाँ दल-बलके साथ खड़े थे, वे मी कृत्रिम |
बनाये गये थे और परियूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित है
थे | देवपें | बहुत कहनेसे क्या लाभ ! हिमाचससे प्र
हुए, विश्वकर्मने वहाँ शीत्र ही सम्पूर्ण देवसमाजके इत
विग्रहोंका निर्माण कर लिया था | इस प्रकार उदनि हि
मण्डपकी रचना की थी। वह मण्डप अनेक आश्रयत्ति युए
महान् तथा देवताओंकी भी मोह लेनेवाला था।
तदनन्तर गिरिराज हिमवानकी आशसे परम वुद्षि
विश्वकर्माने देवता आदिके निवासके ढिये उन-उनहे ृशि
लोकोंका भी यलवपूर्वक निर्माण किया । उन्हीं लेकोंग हे
उन देवताओंके लिये अत्यन्त तेजखी, परम अद्भुत ओर सब
बड़े-बड़े दिव्य मश्चों ( सिंहासनों ) की रचना की। बी
उन्होंने मुझ खयम्भू ब्रह्माके निवासके लिये क्षगमर्स
सत्यछोककी रचना कर डाली) जो उत्तम दीतिसे उद्ी'
रहा था | साथ ही भगवान् विष्णुके लिये भी क्षणमर्ज
दिव्य वैकुण्ठघामका निर्माण कर दिया) जो परम उहे
तथा नाना प्रकारके आंश्रयोंसे परिपूर्ण था। कही
विश्वकमोने देवराज इन्द्रके लिये भी .दिव्य) अर हक
एवं समस्त ऐश्वर्योंसे सम्पन्न ग्रहकी रचना की | अरे
पालेंके लिये भी उन्होंने प्रसन्नतापूवेक बढ़े 36३० लि
अद्भुत एवं बड़े-बड़े मवन बनाये । फिर मैंगे! ह
देवताओंके लिये भी उन्होंने क्रमशः विचित्र गहोंका
किया | परम बुद्धिमान विश्वकर्माकों भगवान् करी मं.
वर प्राप्त था; इसीलिये उन्होंने शिवके संतोषके लिये रा
इन सब वस्तुओंकी रचना . कर डाली. तदनन्तर उसी #
द्रसंहिंता ) # भगवान शिवका नारदजीकें छाया सब देवताओंकों निमन्त्रण दिर्ाना # २१०
ल्ल्च्््््स्स्््स्ल््स्स्ल्स्ख्स्््च्य्स्य्य्य्य्ल्ख्स्ख्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्च्य्य्स्य्य््स्स्स्च्स्स्स्य्म्स्म्ल्स्ल5
गान शंकरके लिये भी उन्होंने एक झोभाशाली गहका परम उच्ज्वछ होनेके साथ ही साक्षात् महादेवजीको भी
माण विया; जो दिवके चिहसे युक्त तथा शिवल्ोकर्ती आइचयमें डाल्नेवाली थी | इस प्रकार यह तारा लोकिक
ब्य भप्ननके समान दी अनुपम था। श्रेष्ठ देवताओंने उसकी व्यवहार करके हिमाचल बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान्
रि-भूरि प्रशंसा की थी | वह परम उज्ज्वल) महान प्रभापुञ-. झम्पके धमागमनकी प्रतीक्षा करने लगे । देवपे ! हिमालय-
उद्धासित, उत्तम ओर अद्भुत था | विश्वकर्मने भगवान्. का यह सारा आनन्ददायक बत्तान्त मैने तुमसे कह सुनाया ।
पत्नी प्रसन्नताके लिये वहाँ ऐसी अद्भुत रचना की थी; जो अब और क्या सुनना चाहते हो !. ( अघ्याय ३७-३८ )
नननजज-+--+ ० ८>च
भगवान् शिवका नारदजीके दारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका
मड़लाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके फेलाससे बाहर निकलना
नारजी बोले--विप्णुशिष्य महाप्राश तात विधात:! से देवी पार्वतीने बड़ी भारी तपस्या की ओर उससे संतुष्ट
पक्रो नमस्कार है । कृपानिधे | आपके मुँहसे यह अद्भुत होकर मेंने उन्हें यह वर दिया कि में पतिरूपसे वुम्दारा
था मुसते सुननेको मिली है। अब में भगवान चद्धमोलिके पाणिग्रहण करूँगा | पावतीकी भक्ति देखकर में उनके बच्ञमें
सम मप्नल्मय तथा समस्त पापराशिके विनाशक वेबाहिक हो गया हैँ | इसलिये उनके साथ विवाह करूँगा । ससपियेनि
रित्रको सुनना चाहता हूँ। मड्भलपत्रिका पाकर महादेवजी- लम्नका साघन और शोधन कर दिया है। अत्तः आजसे सातवें
दया किया १ परमात्मा शंकरकी वह दिव्य कथा सुनाइये । . दिन मेरा विवाह होगा । उस अवसरपर लोकिक रीतिका
प्रच्माजीने कहा--बेद | छुम बे बुद्धिमान हो । कक व को ते 5, विश
'वान् शंकरके उत्तम यशकों सुनो । मश्नल्यन्रिका पाकर. दि सब देवताओं। सुनियों और सिदधोंकी तथा हक लोगेको
धान शंकरने जो कुछ किया) बह बताता हैँ | भगवान भी मेरी ओरसे निमन्त्रित का | सत्र झछोग मेरे शासनकी
/ उस मद्बलपत्रिकाकों प्रसन्नतापृवक हाथमें छेकर हृदयमें धुदताको आर कक मम कस अपन प्कारने
(पका अनुभव करते हुए दँसने छगे | फिर उन 22 दल 2 कक लिये यर्दों आये |
गन्ने उसे झानेवारलेका सम्मान किया | तसश्रात् उसे प्रह्माजी कहते हँ--मुने |! भगवान् अंकरकी इस
पर विधिपूर्वक खीकार किया | इसके बाद ह्माचलके अशिकों शिरोधार्य करके ठुमने झीश दी सर्वत्र जाकर उन
3 आये हुए लोगोंवी बढ़े आदर-सम्मानके साथ विदा सबकी निमन्त्रण दे दिया । तटश्रात् झम्मुझे पास आकर
। । तदनन्तर उन सुनियोंसे कद्ा--प्ञापलोगेनि मेरे. “री आशके अनुसार तुम वहीं ठहर गये । मगवान् झिव भी
प्र्यंका भतीभौति सखादन किया, अब मैंने विवाह हक देवताभंक्कि आगमनकी उत्क्ठापूषक प्रतीक्षा करते
ग्रे पर लिया है। अतः आयश्योगोंकों मेरे विधादमें 5 अपने गगेकि साथ वहीं रहे । उनके सभी गये सम्यू्
| चाहिये ।! दिशाअमि नाचते हुए वर्धा बढ़ा भारी उत्सव मना रहे थे।
। इसी बीचमें मगवान् विष्णु सुत्दर बेप धारण किये अपनी
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२१६ ४४ नमो रुद्गाय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मन 5: [ संक्षिप्त-शिवपुराण]
मनाते हुए. वहाँ आये | उस समय महदेश्वरने वहाँ आये हुए
सब देवता आदिका एथकश्वथक् सहर्ष खागत-सत्कार किया ।
फिर तो केछास प्रव॑तपर बड़ा अद्भुत ओर महान् उत्सव
होने रूगा । देवाइनाओने उस अवसरपर यथायोग्य नृत्य आदि,
किया । विष्णु आदि जो देवता भगवान् शम्मुकी वेबाहिक यात्रा
सम्पन्न करानेके लिये इस रामय बहाँ आये थे; थे सब
यथास्थान ठहर गये । भगवान् शिवक्री आज्ञा पाकर सब
'लोग उनके प्रत्येक कार्यक्रों अपना ही कार्य समझकर
नियन्त्रित रूपसे करने लगे ओर इसे शिवकी सेवा मानने लगे |
उस समय सातों मातृकाएँ वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ
शिवको यथायोग्य आभूषण पहिनाने लगीं । मुनिश्रेष्ट !
परमेश्वर भगवान् शिवका जो स्वाभाविक वेष था; वही उनकी
इच्छासे उनके लिये आभूषणकी सामग्री बन गया | उस समय
नन्द्रमा स्वयं उनके मुक्ुठके स्थानपर जा विराजे | उनका जो
सुन्दर ललाय्वर्ती तीसरा नेत्र था; वही शुभ तिलक बन
गया । मुने ! कानोंके आभूषणोंके रूपमे जो दो सर्व बताये
गये हैं, वे नाना प्रकारके रक्नोंसे युक्त दो कुण्डल बन गये |
अन्यान्य अज्ञोंमें स्थित सप॑ उन-उन अज्ञौंके अति रमणीय
नाना रक्षसय आभूषण हो गये । उनके शरीरमें जो भस्म
रूगा हुआ था; वहीं चन्दन आदिका अच्जराग बन गया और
उनके जो गजचर्म आदि परिधान थे वे सुन्दर दिव्य दुकूल
बन गये ।
इस प्रकार उनका रूप इतना सुन्दर हो गया कि उसका
बर्णन करना कठिन है । वे साक्षात् ईश्वर तो थे हो, उन्होंने
पूरा-पूरा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया | तदनन्तर समस्त देवता,
यक्ष;-दानव, नांग। पक्षी, अप्सरा और महर्षिगण मिलकर
भगवान् शिवके समीप गये ओर महान् उत्सव मनाते हुए
: प्रसन्नतापूर्वक: उनसे बोले--महादेव | महेश्वर | सब आप
महादेवी गिरिजाकों ब्याह लानेके लिये हमलोगोंके साथ
चलिये; चलिये । हमपर कृपा कीजिये |? तत्यश्वात् विज्ञानसे प्रसन्न
दृदयवाले भगवान् विष्णुने भगवान शंकरको भक्तिभावसे
प्रणाम करके उपयुक्त प्रस्तावके अनुरूप ही बात कही ।
.. भगवान् विष्णु बोछे--शरणागतवत्सछ देवदेव |
महादेव | प्रभो ! आप अपने भक्तजनोंका कार्य सिद्ध करनेवाले
है; अतः गेरा एक निवेदन सुनिये । कल्याणकारी झमे!
आप ग्रह्मगत्रोक्त विधिक्रे अनुसार गिरिराजकुमार प#
देवीके साथ अपने विवाहका कार्य कराइये | हर ! बे
द्वारा विवाहकी विधिक्रा सम्यादन होनेपर वही छोक़में हक
त्रिख्यात हो जायगी, अतः नाथ | आप कुलछपर्मक्रे आुक्न
प्रेमपूबक मण्डपस्थापन ओर नान्दीमुख आद काले हर
टोकम अपने यशका विस्तार कीजिये |
त्रह्माजी कहते हैं--नारद | भगवान विुद्रे ऐप
कहनेपर लोकाचारपरायण परमेश्वर शम्भुने विधिक ”
कार्य क्रिया | उन्होंने सारा आभ्युदय्रिक कार्य कराते |
मुझको ही अधिकार दे दिया था। अतः वहाँ मुकि
साथ ले मेंने आदर ओर प्रसन्नताक्े साय वह खह
सम्पन्न किया | महामुने ! उस समय कश्यप) अक्रि व!
गोतम) भागुरि, गुरु) कप्व) बृहस्यति, झक्तिः वर्ष
पराशर, माकण्डेय, शिलापाक: अरुणपाढ) अत
अगस्त्य, च्यवन, गगे। शिल्गद) दधीचि, उपमत्ु। महा:
अक्तत्रण, पिप्पछाद, कुशिकः कौत्स तथा ग्रिघर
व्यास--ये और दूसरे बहुत-से ऋषि जो भगवार् कि
समीप आये थे, मेरी प्रेरणासे विधिपूर्वक वहाँ आम
कर्म कराने लगे | वे सब॒-के-सब वेदोंके पारंगत कि!
अतः वेदोक्त विषिसे वैवाहिक मड्गछाचार केसे
यज्ुवंद ओर सामवेदके विविध उत्तम यूक्तोद्वाए
रक्षा करने लगे | उन सब ऋषियोंने वड़ी प्रतकनताे
बहुत-से मज्गजलकार्य कराये । मेरी ओर झम्मेंगी **|
उन्होंने विश्नोंकी शान्तिके लिये प्रीतिपूर्वक ग्रहोंका औ |
मण्डलवर्ती देवताओंका पूजन किया | वह सब लोकित ः
कर्म यथोचित रीतिसे करके भगवान् शिव बहुत एई ।
और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंकों प्रणाम किया | * कै:
वे सर्वेश्वर महादेव देवताओं ओर हो क्
उस गिरिश्रेष्ठ केलाससे हर्षपूर्वक निकले । के
जाकर देवताओं और आह्मणोंके साथ भगवा ?* कि
नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं) सानन््द ढ़ है रथ.
उस समय वहाँ महेश्वरके संतोषके लिये देवता द
बहुत बड़ा उत्सव मनाया । बाजे बजे वर्षा हे
रत्य हुए । का
62४ ०.०७:
[संहिता |
शिलशनिभकीलिमिमिन शक िधि ली निय शनि नि कम मियद न अल बी अमल मककट जद ज लक छा कक जुल्म हार लसेलॉपिदनयामि सन्गीकांदमिकनिक॒ाकादन्वनशक्रशोम मक्का छान काकन्याम कक वा दाम कक मम ३ काम झा भाभ कक भा धया का गंध दा कान शक्कर क महममकमनालाका भव भा भ कक कप कप वध यम कम का भ कक आइतय७ काम |
४ भगवान शिवका बारात छेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान # २१७
स्पा" क मेक ाकाालाम साकार ५5 ;मन “महा पाक कक ७ पए->ह४०
भगवान् श्षिवका बारात लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्ान
प्रझ्मजी कहते हैं--मुने | तदनन्तर मगवान शम्मुने
मै आदि सब गणोंकों अपने साथ हिमाचलपुरीकोीं चलनेकी
ब्नतापूवक आशा देते हुए कद्दा--'तुमलोग थोड़े-से गर्णोको
| स्वबर शेप्र सभी छाग मेरे साथ बड़े उत्साह ओर आनन्द-
युक्त हो गिरियल दिमवानके नगरकों चछो |? फिर तो
बानी आज्ञा पाकर गणेश्वर शाड़ुकर्ण, केकराश्ष)
पल; परारिजात, विक्तानन, दुन्दुभ; कपाल3 संदारकः
क्रण्डक, विश्म्म, फि्यपिल, सनादक) आवेशनः
) परतक) चन्द्रतापन। काठ) कालक महाकाल) अग्निक;
मुख, आदिन्यमद्धां, घनावट) संनाह) वुामुद। अमोघ,
कट) सुमन्त्र, कोकपादोदर; संतानके, संधुपिद्ठ। कोछ्िल;
'भिट्र, नील) चतुवक्त्र) करण, अट्विरोमक) यज्याक्ष,
मन््यु। मेब्रमन््यु। काष्टागृद। विखूपाले। सुकेश, द्पभ३
तने) वालकेतु, पण्मुख॥, चेत्र, खथम्पभु+ लकुलीश॥
गन्तक, दीतात्मा। दत्यान्तकः भ्रश्निरिटि, देवदेयप्रिय;
7नि$ भानुक प्रमथ तथा वीरभद्र अपने असंख्य कोटि-कीटि
| तमा भृतोंकी साथ लेकर चले। नन््दी आदि गणराज असंख्य
सिपिर चले तथा क्षेत्रावल ओर भेरव भी कोटि-कोटि
वि! लेकर उत्सव मनाते हुए प्रेम और उत्साहके साथ चल
| ये सब सहस हाथोसे युक्त थे । सिर्पर जठका मुकुट
ण छिप हुए थे । उन सबके सस्तकपर चन्द्रमा ओर गलेमें
गए चिए ॥ तथा ये रूव-छझेन्सब भिनेत्रयारी थे । उन सबने
_न आयूषण पहन रक्से थे | सभी उत्तम भस्म भारण
॥ मे ओर हाए कुण्टल; केयर तथा मकद आदिसे
“व थे । एस प्रकार देवताओं नथा दर्सरे-दसरे गर्णाओं
है | झगयान शंकर अरे विवादके ल्यि टिमबासके नगर-
; शददी सव्नरेवनी बएन बनदार झूप उत्सव
आओ हर 5५) नफााक बाघ यहा ध्य ४एदझा | ८ दइगा 5३ -
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दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे महान् कोलाहल हो रहा था | वह जगत्-
का मइ्ल करता हुआ अमइलका नाश करता था । देवता
लोग शिवगर्णाके पीछे होकर बड़ी उत्सुकताके साथ बारातका
अनुसरण करते थे | समूर्ण सिद्ध ओर लोकपाल आदि भी
देवताओंके साथ थे । देवमण्डलीके मध्यभागमें गरुइके
आसनपर ब्ेठकर लरुक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चलछ रहे थे |
मुने | उनके ऊपर महान छत्र तना हुआ था, जो उनकी
शोभा बढ्मता था | उनपर चेंवर डुलये जा रहे थे और ये
अपने गर्णसि प्रिरे हुए थे | उनके शोभाशाली पापदोंने उन्हें
अपने ढंगसे आभूषण आदिके द्वारा विभूषित किया था।
इसी प्रकार में भी मृर्तिमान् वेदों) शार्त्रों, पुराणों, आगर्मों,
सनकादि महासिद्धा) प्रजापतियों) पत्नी तथा अन्यान्य परिजनोंके
साथ मार्गमें चलता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था ओर शिवकी
सेवार्मं तर था । देवराज इन्द्र भी नाना प्रकारके आभूषणोंसे
विभूषित हो ऐराबत हाथीपर आरूड् होकर अपनी सेनाके
बीचसे चलते हुए, इत्वन्त नुशीमित 4([९ ९५ ट़ो रहे ये | उस समय
बारातके साथ यात्रा करते हुए बहुत-से ऋषि भी अपने तेजसे
प्रकाशित दो रहे थ। थे शिवजीका विवाह देखमेके टिये बहुत
उत्कण्ठित थे | झाकिनी) बात॒धान) वेताछ, ब्दग्मराक्षस, भूत)
प्रेत) पिश्चाच: प्रभथ आदि गण; तुम्चुझक। नारद, हाहा ओऔर
हु आदि श्रेष्ठ गन्वव तथा विनर भी बड़े हपसे भरकर बाजा
बजाते हुए चले । सम्यृण जगन्माताएँ। गारी देवकन्याएँ,
गायत्री; सावित्री, रुश्मी ओर अन्य देवाद्ननाएं--थ नथा
दूसरो देवपत्नियों जो सम्यृ्ण जगतूदी साताएँ हैं. शॉकरजीक
वियाए् है; बह साचवार बड़ा परसक्षताद्ष आाथ हसम सश्मिश्नि
छा, कह :08 028 सदा बी कर. ७ #
होनेझे लिये गयी। पेंदं॥ घाररी, सि्दो आर मटपिदद्दाग
| ण्पृ ् हि ध्यी पि। रा । १ का है. | बह ध्थार च्ट्् । फ कु ५: 4 *् दर हम है।
पद न्गः का, 58॥ च्चा | मा (6 ।जरीम्ग3आी०शिाल & खा है| के यम कप, जा
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२१८ ४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्नह्मणे परमात्मने ४ [ संक्षिप्त-शिवपणा
न्भ्भ्भ्स्य््म्स्स्स्स्म्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्म्म्य्य्य्य्य्म्य्य्म्य्म्य्स्स्म्स््स्स्स्स््य्य्म््स्प्य्य्य््ल्ल्ल्ल््---् 5-5" "__रॉौनन तन ++-+न...............
ल्चजिजजनलल ले
आर. समा अममा जा. डलिचिललज तीज सी कम नस सननन कक न
हिमवानूद्वारा शिवकी बारातक्ों अग॒वानी तथा सत्रका अभिनन्दन एप बन्दन, भेनाक्
नारदजीको बुलाकर उनसे वरातियोंका परिचय पाना तथा शिव औएर
उनके गणोंको देखकर भय्से मूच्छित होना
त्रह्माजी कहते हें---तदनन्तर भगवान शिवने नारदजी-
को हिमाचलके घर भेजा । वे वहॉँकी विलक्षण सजावट देखकर
दंग रह गये। विश्वकर्माने जो विण्णु+ ब्रह्मा आदि समस्त
देवताओं तथा नारद आदि ऋपषियोंकी चेतन-सी प्रतीत होने-
वाली मू्तियाँ बनायी थीं उन्हें देखकर देवषि नारद चक्रित
हो उठे । तत्पश्चात् हिमाचलने देवर्पिको बारात बुला लेके
' लिये भेजा | साथ ही उस बारातकी अगवानीके लिये मनाक
आदि पवेत भी गये | तदनन्तर विष्णु आदि देवताओं तथा
आनन्दित हुए अपने गर्णेके साथ भगवान शिव हिमालब-
नगरके समीप सानन्द आ पहुँचे ।
गिरिराज हिमवानने जब यह सुना कि सर्वव्यापी शंकर
मेरे नगरके निकट आ पहुँचे हूँ, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ।
तदनन्तर उन्होंने बहुत-सा सामान एकत्र करके पत्रतों और
ब्राह्मणोंकों महादेवजीके साथ वातोलाप करनेके लिये भेजा | स्वयं
भी बड़ी भक्तिके साथ वे प्राणप्यारे महेश्वरका दर्शन करनेके
लिये गये | उस समय उनका हृदय अधिक प्रेमके कारण
द्रवित हो रहा था ओर वे प्रसन्नतापूवंक अपने सौमाग्यकी
सराहना करते थे | उस समय समस्त देवताओंकी सेनाको
उपस्थित देख हिमवानको बड़ा विस्मय हुआ और वे अपनेको
धन्य मानते हुए, उनके सामने गये | देवता और पर्वत एक
दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए ओर अपने आपको कृतकृत्य
सानने लगे । महादेवजीको सामने देखकर हिमालयने उन्हें
प्रणाम किया | साथ ही समस्त पर्वर्तों और ब्राह्मणोने भी
सदाशिवकी वन्दना की । वे बृषभपर आरूढ थे | उनके मुख-
पर प्रसन्नता छा रही थी | वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे
विभूषित थे और अपने दिव्य अज्ञोंके लावण्यसे सम्पूर्ण
दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे । उनका श्रीअड् अत्यन्त
'महीनः नूतन ओर सुन्दर रेशमी वस्नरसे सुशोमित था । उनके
मस्तकका मुकुट उत्तम रत्नोंसे जयित होनेके कारण बड़ी शोभा
पा रहा था । वे अपनी पावन प्रमाका प्रसार करते हुए. हँस
रहे थे | उनका प्रत्येक अज्ग भूषण बने हुए सर्पोंसे युक्त था
तथा उनकी अन्नकान्ति बड़ी अद्भुत दिखायी देती थी | दिव्य
कान्तिसे सम्पन्न उन महेश्वरकी सुरेश्वरगण हाथमें चर्वेर लिये
सेवा कर रहे थे | उनके बायें भागमें भगवान् विष्णु थे और
दादिने भागमें में था । पीछे देवराज इच्ध थे और अवक्ले
आदि भी पीछे तथा अगल-बगढमें विद्यमान ये | गन
के देवता आदि उन लोक-कल्याणकारी भगवान् भंकई
करते जाते थे | उन्होंने स्वेच्छासे ही दिव्य झरीर घाए
रखा था। वासतत्रमं वे साक्षात् पर्रह्म पर्मात्ा
इंश्वर, उपासकोंकों मनोब्रास्छित वर देनेवाके। कलाणसः
युक्त, प्राऊत गुणसि रहित, भक्तोंके अधीन खनेवाके '
कृपा करनेवाले, प्रकृति ओर पुरुषसे भी विल्य्षण तथाए
ननन््दत्वरूप हैं | उनके दर्शनके पश्चात् हिमवाते म
शिवके बामभागमें अच्युत श्रीदरिका दर्शन किया) जे
प्रकारके आभूषणेसि विभूषित-हो विनतानन्दन गठइओ
विराजमान थे । मुने | भगवानके दाहिने भागमें उद्ी
मुखोंसे युक्त, महाशोभाशाली तथा अपने परिवासे पंदुर
ब्रह्म की देखा | भगवान् शिवके सदा ही अल ग्रिज्ञ'
देवेश्वरोंका दर्शन करके परिवारसहित गिरिणजने अं
प्रणाम किया ।
इसी प्रकार भगवान् शिवक्रे पीछे तथा अगवा
हुए दीप्तिमान् देवता आदिकों भी देखकर गिएश
सबके सामने मस्तक झुकाया | तलश्रात् ;
आगे होकर हिमवान् अपने नगरकों गये।
महादेवजी, भगवान् विष्णु तथा खयम्भू ग्रहों मे है
ओर देवताओंसहित शीजतापूर्वक चलने का
उस अवसरपर मेनाके मनमें मगवान् शिवके दर ।
हुई । इसलिये उन्होंने तुमको बुल्वाया | उस समा
शिवसे प्रेरित होकर उनका हार्दिक अभिप्राव *
इच्छासे तुम वहाँ गये ।
मेना तुम्हें प्रणाम करके वोलीं-- / न्
होनेवाले पतिकों पहले मैं देखूँगी। शिवका
जिनके लिये मेरी बेटीने ऐसी उत्कृष्ट ताला कर
तात | उस समय भगवान् शिव भी मेन है
अहंकारको जानकर श्रीविष्णु और मुझसे अई
करते हुए बोले । ।
शिदलसे कछ्ा--तात | आप दोनों मेरी आशी *
संदिता | # हिमवानद्धारा शिवकी वारातकी अगबानी तथा सबका अभिनत्डदन 5४: वलननलटबअनअअ«णपन-गगबअ»+भमप---म-लप८ननमाऋ लत च गमिनान क...... हु श्र,
॥। भव्य ढेकर गिरिणयके दवापर चढथि कु ०... [7 न स्लललततता होकर गिरिराजके द्वारपर चलिये | हम
ते आयेंगे ।
३ डुनकर भगवान् श्रीददरिने सब देवताओंको बुछाकर
करनेके लिय कहा । शिवके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले
। देवताओंने श्ीम्र बसी ही व्यवस्था करके उत्सुकता-
वहसे प्रथकृश्ृंथक् यात्रा की।। मुने | सेना अपने
के सबसे ऊपरी भयनमें त॒म्हारं साथ खड़ी थीं ।
उपय भगयात् विश्वेश्वरने अपनेकों ऐसी वेप-भूषामें
॥) जिससे भेनाके द्वदयकोी ठेस पहुँचे | सबसे पहले
# जुदूसमें विविध वाहनोपर विराजित खूब सजे-घजे
“के साथ पताकाएँ फहराते हुए बसु आदि गन्ध्
फिर भणिप्रीवादि यक्ष, तदनन्तर क्रमसे यमराज;
) वरुण, वायु, कुबेर, ईद्यान, देवराज इन्द्र, चन्द्रमा,
धगु आभादि मुनीधर तथा ब्रह्मा आये। ये सब
र एक-से-एक विशेष सुन्दर शो भामय रूप-गुणसे
थे । इनमेंसे प्रत्येक दलके स्वामीको देखकर भेना
॥ कि "क्या ये ही शिव हैं ? नारदजी कहते--- प्यह् तो
सेवक हूँ |? भेना यह सुनकर बड़ी प्रसन्न होतीं ओर
पार मन-ही-मन कहती---ये उनके सेवक ही जब
_नदर एूँ, तब वे सबके स्वामी शिव तो पता नहीं
भुन्दर हृंगि |
। हौचमें वहाँ भगवान् विष्णु पधारे | वे
पर्पतन्न, श्रीसानू। नृतन उलधरके
* भुजाओंसे संयुक्त थे। उनका टावप्प झरोड़ों
उजिति कर रह था | ये पीताग्बर घारण
ऐसे पगसे प्रकाशित ह्ोरे थे। उनझ्ले
+न-्का 3 क+म पक सु श््प > बः
४४ पंगलरी शोमादों
सम्पूर्ण
रगन स्याम
्
ो जहा कंप्क
5९ ४;
जा
दर्ज ला ३ ऋ् #%
छान ध्ते मे | उनदा
पान सरस रही भी । पशक्षिराज गयड़ उनके
| गहे, चके आदि छत्तरोसे 2459 3288-42
फिल्में शीइत्सफा चिट घारण किसे थे
दिष्ण अपने अपेंय पसापूशसे प्रशाशमान ये |
५४ गे मद आन () सगे । दे बड़े हद
पति साह्षात् भगर ण़ू्
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उम्पू्ण कार्वक्ते अधिकारी तथा उनके प्रिय हैं | पावतीके
पति जो दूलद् थिव हैं, उन्हें इनसे भी वढुकर समझना
चाहिये । उनकी झोभाका वर्णन मुझसे नहीं हो सकता |
वे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अधिपति, सर्वेश्वर तथा खयम्प्रकाश
परमात्मा हैं |
प्रह्माजी कहते हें--नारद ! तम्हारी इस बातको
छुनकर मेनाने उन झुभलक्षणा उमाज्ो संद्यन् धन-वे भवसे
सम्पन्न, सोभाग्यवत्ती तथा तीमों कुछांके लिये सुखदायिनी
माना | वे मुखपर प्रसन्नता छाकर भीतियुक्त हृदयसे अपने
सर्वाधिक सोभाग्यका वारंबार वर्णन करतो हुई बोलीं ।
मेनाने कद्दा--इस समय में पावंतीको जन्म देनेके
कारण सर्वथा धन्य हो गयी। ये गिरीश्वर भी धन्य हूँ
तथा मेरा सब कुछ परम धन्य हो गया | जिन-जिन अत्यन्त
तेजस्वी देवताओं और देवेश्वरोका मेंने दर्शन किया ै, इ्म
सबके जो पति हैं, थे भेरी पुन्नीके पति होंगे। उसके
सोभाग्यका क्या वर्णन किया जाय ? भगपान् शिवक्ों पतिरुपमें
दानेके कारण पार्वतीके सोभाग्यका सो बयोंमें भी वर्णन
नहीं किया जा सकता |
प्ह्माजी कहते हँ--नारद ! मेनाने प्रेमपर्ण हुदये
जया ही उपर्युक्त बात कही) लो ही अज्जुत लीला करनेवाले
भगवान् रुद्र सामने आ गये [ तात ! उसके सभी गण
>ऊते तथा मेमाके अटंकारको चूर्ण करनेवाडे थे | भगवान
शिव अपने-आपको भायासे निलिय एवं निर्विद्गर दिग्याने
हुए वहाँ आये मुने ! उन्हें आया जान उुमने मेनायं!
शिवाके पतिक़ा दर्घन कराते डे उससे एस प्रकार कटा.
'नुन्दरि | देखा, ये 9 ७ दवा दर गर > दा
प्रामिके लिये शिवामे
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तुग्रर एंसा उहमेपर
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और पाश धारण किये हुए थे तो किन्हींके हाथों मुद्गर थे ।
कितने ही अपने वाहनोंको उल्दे चला रहे थे | कोई सींग,
कोई डमरू ओर कोई गोमुख बजाते थे; ग्णमेंसे करितनेके
तो मुँह ही नहीं थे | कितनोंके मुख पीठक्की ओर लगे थे
ओर बहुतोंके बहुतेरे मुख थे | इसी तरह कोई बिना हाथके
थे | किन्हींके हाथ उल्टे छग रहे थे और कितनोंके बहुत-से हाथ
थे । कितने ही नेत्रह्दीन थे; किन्हींके बहुत-से नेत्र थे। किन्दीके सिर
ही नहीं थे और किन्हींके बहुत खराब सिर थे, किन्हींके कान
ही नहीं थे और किन्हींके बहुत-से कान थे | इस तरह सभी गण
नाना प्रकारकी वेश-भूषा घारण किये हुए थे। तात |
वे बिकृत आकारबाले अनेक प्रवक गण बड़े वीर ओर
भयंकर थे। उनकी कोई संख्या नहीं थी। मुने | तुमने
अँगुलीद्वार रुद्रगणोंकी दिखाते हुए मेनासे कहां--
धवरानने ! तुम पहले भगवान् हरके सेवकोंको देखो, फिर
उनका भी दर्शन करना |? उन असंख्य भूत-प्रेत आदि
गणोंको देखकर मेना तत्काल भयसे व्याक्रुलू हो गर्यी ।
उन्हींके बीचमें भगवान् शंकर भी थे, जो निगुण होते
हुए भी परम गुणबान् थे। वे ब्रप्रभपर सवार बे|झओो
पॉच मुख थे ओर प्रत्येक मुखमें तीम-तीन नेत्र |के
सारे अन्नोंग विभूति लगी हुई थी, जो उनके ल्यि गज
काम देती थी | मस्तकपर जगाजूट और चद्माम्न झट
दस द्वाथ ओर उनमेंसे एकर्म क्रपाल लिये, शरीसर वरत
दुपद्रा ओर हाथ पिनाक एजं त्रिग्य॒७ आँखें भयानक अगर
त्रिकरल ओर हाथीकी खालका वस्त्र | यह सब देतम.
शिवाकी माता बहुत डर गयीं, चक्रित हो गयीं) बाह
देकर कॉपने लगीं ओर उनकी बुद्धि चक्र ज्री।झ
अवस्थामें तुमने अंगुलीसे दिखाते हुए उनसे का-मे
ही हैं भगवान शिव |? तुम्हारी यह बात सुनकर सती के
दुःखसे भर गयीं ओर दवाके झोंके खाकर गिरी है
लताके समान तुरंत भूमिपर गिर पड़ीं। यह कंत हि
ट्य्य है ? में दुराग्रहमें पड़कर ठगी गयी |? यों कहकर के
उसी क्षण मृच्छित हो गयीं | तदनन्तर सखियनि जब
प्रकारके उपाय करके उनकी समुचित सेवा की, तब गए
प्रिया मेना धोरे-धीरे होशर्मं आयी। ( अथाय ४१-४९
न्च््च्््स्क्र्््स्ल्य्े्<
मेनाका विलाप, शिवके साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, देवताओं तथा
श्रीविष्णुका उन्हें समझाना तथा उनका सुन्दर रूप धारण करनेपर
ही शिवको कन्या देनेका विचार ग्रकट करना
ब्रह्माजी कहते हैँं--नारद | जब हिमाचलप्रिया सती
मेनाको चेत हुआ तब वे अत्यन्त क्षुब्ध होकर विलाप एवं
तिरस्कार करने लगीं । पहले तो उन्होंने अपने पुत्रोंकी निन््दा
की) इसके बाद वे तुम्हें और अपनी पुत्रीको दुर्बचन
सुनाने लगीं ।
मेना बोलीं-भुने | पहले तो तुमने यह कहा कि “शिवा
शिवका वरण करेगी;? पीछे मेरे पति हिमवानका कर्तव्य बताकर
उन्हें आराधना-पूजामें छगाया | परंतु इसका यथार्थ फल क्या
देखा गया १ विपरीत एवं अनर्थकारी | दुबुद्धि देव्षें ! तुमने
मुझ अधघम नारीको सब तरहसे ठग लिया । फिर मेरी बेटीने
ऐसा तप किया) जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर है; उसकी उस
तपस्याका यह फल मिला) जो देखनेवालोंको भी ढुःखमें डालता
है। हाय | में क्या करूँ) कहाँ जाऊं कोन मेरे ढुःखको दूर
करेगा १ मेरा कुछ आदि नष्ट हो गया; मेरे जीवनका भी नाश
.. हो गया | कहाँ गये वे दिव्य ऋषि ! पाऊँ तो मैं उनकी दाढी-
५8
मूँछ नोच हूँ । वसिष्ठकी वह तपस्विनी पत्नी भी बड़ी कै ।
वह स्वयं इस विवाहके लिये अगुआ बनकर आयी
जानें किन-किनके अपराधसे इस समय मेरा सं
लट गया | ट
ऐसा कहकर मेना अपनी पुत्री शिवाकी ओर देही
उन्हें कद्ुबचन सुनाने छर्गीं--:अरी दुष्ट लड़की | की”
कौन-सा कर्म किया; जो मेरे लिये ढुःखदायक रिद है
तुझ दुशने स्वयं ही सोना देकर काँच खरीदा है *
छोड़कर अपने अज्ञोंमें कीचड़का ढेर पोत लिया । हीं [है
हंसको उड़ाकर तूने पिंजड़ेमें कोआ पाल लिया | प
दूर फंककर कुएँका जल पीया। प्रकाश पूनिकी *£
सूर्यको छोड़कर यत्नपूर्वक जुगनूको पकड़ा | चर हा
भूसी खा ली | घी फेंककर मोमके तेलका दस
लगाया । सिंहका आश्रय छोड़कर सियारका जे !'
बह्मविद्या छोड़कर कुत्सित गाथाका भवण किया |
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परम रक्सी हुए बशकी मड्गलमयी विभूतिको दूर हटाकर
चिवारी अम्मी राख अपने पल्ले बाँध ली; क्योंकि
भमसत धरे देवताओं और विप्णु आदि परमेश्वरोंफो छोड़कर
जानी झबुद्धिफे मारण दिवयो पानेके लिये ऐसा तप किया !
पपव)॥ मेरी सुद्धियो, तेरे रूपको और तेरे चरिप्रकों भी बार॑-
बार पियत्गरर ४ । हे तपस्थाका उपदेश देनेवाले नारदकों तथा
छा
पं भहायता फरनेयाली दोनों ससिियोकरी भी घियगर है। बेटी !
एन सो मातापिताकों भी बिफ्ार है। जिन्होंने तते सनम
मकर एंग्गरी चुद्धियत भी पिकार हे | सुपुद्धि
7 नि ग्ारा ६ के ५७० ः कद आहार कक 7 जला आ। कप
“जि उसे शाषपोदी भी पिदार ऐ। फुटार झुलवहे
3१५ च्क स् हि के हा फ दि 45: २ हु 395₹5 | _-
पररर ९। समग्र निया-दछतावोीं भी घिक्कार ! तथा मन
+ तु * की हा द्पें पि थ, पक अध पल प्रा
४ पक डियान उस संयगो दिएार हू। सुमने दो मेरा पर
की
२ ह। अआतघय आज, पु गण का के है हि एप्प "3 चाजा
६ ४० दिया। पर हे मेरा मरय ही ऐ | थे परदे एज
एज मेरे विमश में झाये। उरप्तोरि लोग सूप मुशे अपना
थक ध्ु
४ ६०शर३ । एप रुरडे मिलार दया साधा नई एुल्रा
“० चेछ दिए | हाय * थे बोश बयों नहीं & राई ! मेरा
एन करे गए ढ़ गया ! हें झपदा मेरी एची ही क्यों नी
्प्ण्क शक
कप ले १:+ आह “री बे. पक. ऋिककक
० आज | अर पर, ७) ० ४. एर
॥
७ की] ््य क क् ७. 5:
है ३९ ए३ एे शाका | आाइरी | शा हैं हेएा छिर इत्ट
४ मेनाका विछाप- शिवके साथ कन्याका विवाह न करतेका हठ 5
घर
फेक
डादूंगी, परंतु ये दरीरके टुकड़े लेकर क्या करूँगी १ हाय |
हाय | तुझे छोड़कर कहाँ चली जाऊं? मेरा तो जीवन ही
नष्ट हो गया |?
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद ! यह कहकर मेना मृब्छित
हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। शोक-रोप आदिसे व्याकुल होनेके
कारण वे पतिक्के समीय नहीं गयीं | देवप | उस समय सत्र
देवता क्रमशः उनके निकट गये । सबसे पहले में पहुँचा ।
मुनिश्रेष्ठ | मुझे देखकर तुम स्वयं मेनासे बोले |
नारदने कह(--अतिम्रते
4. घी
्.
| तुम्हें पता नहीं है; वास्तवमें
भगवान शिवका रूप बड़ा सुन्दर है। उन्होंने लीलासे ऐसा
रूप धारण कर लिया है; यह उनका बथार्थ रुप नहीं है।
इसलिये तुम क्रोध छोड़कर स्व हो जाओ | हृठ छोड़कर
विबादका कार्य करो ओर अगनी शथिवाक्रा हाथ शिवक्रे
हाथोंम दे दो ।
तुम्दारी यह बात सुनकर मेना तुमसे बीलीं-“*उठो, बहसे
दूर चले जाओ | तुम दुष्ठों ओर अधमोके शिरोमणि हो ॥?
मेनाके ऐसा कदनेपर मेरे साथ इन्द्र आदि सब देवता एवं
दिद्पाल क्रमशः आकर यो बोले-'पिसरॉकी कन्या मेने | तुम
एमारे वचनको प्रसन्नतापूवक्र ल॒तो। ये शिव निश्चय ही सबसे
उत्कृष्ट देवता हैं और सबकी उत्तम सुख देनबाले हैं | आपकी
पुत्नीफे अत्यन्त दुत्तद् तपको देखकर इन भ
श उन्हें दर्शन ह बे, पक >>
करूपापूवक उन्हें दर्शन ओर श्रेष्ठ बर दिया था |?
ध्क है हक धसनकर के अनार सब +- कक या
पे सुनकर सनातन इसताझस थे
बरके कहा-दिवद्ाा रूप बड़ा भयग॑ंय
श्री मर द्गी आप नफ.. पान-क वमयक 22027 900 6#०। 3०० क 7७७ फट क
पु: नष्टा दूः | आप हब इबता शव परडा
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तीर क् लर-चुकप्क की फनी 0६८2६ हा #कृल्च्छा प्र कक भक शाप ज्ी + अऑप्क्रा क्कक हक फल मर
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दर 3 आम, + 20 40७) #र्यिी आर 393 चक््क वा अायजक न] कुक अंक 27 वन
पहा ऊछामर पर बहता परत वकर 4। रज्यां तारा वयर्गाजरा
हू किलट- न्क || केक कल 2० पका आा्थ-फ शक | "की. राज 5 व ई+) १ कम या कक न
रानी सन | ईऐसलागदउइडासस पंख एड शसरखर हब आय
अक बन + 235८ डा कक हर रे की शृ कक जन
की अकलमान्नन पाप “7 ++ श का जाकर कक हर बा ऋपरीशीजलीर, चुन हि 9-0. + आफ रत
५ | अं जे भव 5 बे १ 5, + के की] का कु 5 जे, | 8 । पक टुब्ा + बे
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क्र रु
ट्ः जकू स्यगगि इरपाप+ (कतहाक कक 5: कह 3. अमर चाट आकर . हे 6 मुजराह कक ऑकुलाक नए
७.) *] 50११ - ञ् (ु * ब्य अजभु 7 4 नं न 5 फजी [ ड तर, अु [यघफ ,
त् ्क च््, न का बे
अबाइ-- वाट, "मा बा) २७05१ 4 नस्ल & ही ग्जीयाका अैनीयन आन पड जा जीत +क कफ
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२२२ ४ नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने ४ [ संक्षिप्त-शिवपुणा
हाथमें नहीं दूँगी; तुम सब छोग दूर दृट जाओ) किसीको गेर
पास नहीं आना चाहिये |?
ऐसा कह अत्यन्त विहल हो विद्यप करके भेना चुप हो
गयीं । मुने | वहाँ उनके इस बतवबिसे हाह्मकार मच गया ।
तब हिमालय अत्यन्त व्याकुल हो वहाँ आये ओर मेनाको
समझानेके लिये प्रेमपूर्वक तत्त्व दर्शाते हुए! बोले ।
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* ऐ' ( ह ३ सं 7४ ले है
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हि रे हर ९ हु 22 4 है लन्ड 'ई७
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इतनी व्याकुछ क्यों हो गयीं ! देखो तो; कौन-कौन-से महात्मा
तुम्हारे घर पधारे हैं | तुम इनकी निन््दा क्यों करती हो !
भगवान् शंकरकी तुम भी जानती हो; किंतु नाना नामरूपवालि
शम्भुके विकट रूपको देखकर घबरा गयी हो । में शंकरजीको
भलीमौति जानता हूं । वे ही सबके प्रतिपालक हैं, पूजनीयोंके
भी पूजनीय हैँ तथा अनुग्रह एवं निम्नह करनेवाले हैं | निष्पाप
प्राणप्रिये | इठ न करो) मानसिक दुःख छोड़ो । सुब्रते ! शीघ्र
उठो और सब कार्य करो । पहली बार विकटरूपघारी शम्भुने
मेरे द्वाररर आकर जो नाना प्रकारकी लीलाएँ की थीं, मैं
उनका आज पुम्हँँ सरण दिला रहा हूँ । उनके उस परम
माहतयको देख और समझकर उस समय मैंने और तुमने
अर्थ... >लप पूरा पमपदुल+ (१० नए २४-०५ ०ानण. अमन. ननओ पीजी स्िक2७4-०. >-वपमममाऑ
उन्हें कन्या देना स्वीकार किया था | प्रिये। अत
बातको प्रमाण मानकर साथंक करो |
इस बातकों सुनकर शिवाकी माता मेना हिमाक
से बोलीं--नाथ ! मेरी बात सुनिये और सनक भ़े
बैसा ही करना चादिये | आप आयनी पुत्री पार्वती
रस्सी बविकर इसे बरेग्यट्के पर्बससे सीचे गिए दीमिते।ए
मैं इसे: हरके हाथमें नहीं दँगी। अथवा नाथ! आते!
बेटीकी ले जाकर निदयतापुर्बक समुद्रमें डुवा दीजिये। गिर
एसा करके आप पूण सुखी हो जाइये । स्वामिन्! यदि हि
रूपधारी रुद्रकी आप पृत्री दे देंगेतो मे निश्चय ही व
दरीर त्याग दूँगी ।
मेनाने जब दृठपूर्बक ऐसी वात कही) तब पावती'
आकर यह रमणीय वचन बोलीं-:माँ ! तुम्हारी बुद्धि वो'
झुभकारक दै। इस समय विपरीत केसे हो गयी! ४
अवल्म्बन करनेवाली द्वाकर भी तुम धर्मक्ो केसे छोड़ री ।
ये रुद्रदेव सबकी उत्यत्तिके कारणभूत साक्षात् रत
इनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है । समस्त श्रुतियोम कह व
है कि भगवान् झम्मु सुन्दर रूपबाले तथा मुतद
कल्याणकारी महेश्वर समस्त देवताओंके लामी वयाए
प्रकाश हैं | इनके नाम ओर रूप अनेक हैं| मत:
श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि भी इनकी सेवा करते हैं | ये ५
अधिष्ठान हैं, कर्ता; हर्ता और स्वामी हैं। विकारोंकी
पहुँच नहीं है । ये तीनों देवताओंके स्वामी) अविनाश
सनातन हैं | इनके लिये ही सब देवता विंकर होकर
द्वारपर पधारे हैं और उत्सव मना रहें हैं। इस ।
सुखकी बात और कया हो सकती है ! अतः बल!
और जीवन सफल करो | सुझें शिवके हायमें सौंप दे
अपने गहस्थाश्रमको सार्थक करो | माँ! मुझे परमेशए 7
सेवामें दे दो | मैं स्वयं तुमते यह बात कहती है| 8 क्
इतनी-सी ही विनती मान छो | वदि तुम से ।
नहीं दोगी तो मैं दूसरे किसी वरका वरण नहीं कहे के
जो सिंहका भाग है; उसे दूसरोंकों ठगनेवाल ति े
सकता है ! माँ | मैंने मन वाणी ओर
हरका वरण किया है; हरका दी वरण किया है। मई
जेसी इच्छा हो; वह करो |? -: ह
प्रह्मजी फहते है---धारद | पार्वबतीकी यह वी पं
घेलेश्वरप्रिया मेना बहुत ही उत्तेजित हो गयी की
ीिजजःःा:ः:।:::स सॉऊसखसखसससक फसल य्उक्अअइअइअइ सन... ५७५ 3५+५७+.+भन७++»3७५»७ ७५५३-०५ मकार ५ ७५५७७-५७०७ ++ ०५८०3. ६५७००)... ७७०००. ५3५+५३०३००३/#०»
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रुद्संहिता ] ह। भगवान शिवका अपने परम झुन्द्र दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाका घसन्न होना #£ २२३
ऑॉय्ली हुई दु्वचन कहकर रोने तथा बिल्यप करने लगीं ।
वंदनन्तर स्वयं मैंने तथा सनक्रादि सिद्धोंने भी मेनाकों बहुत
समझावा। परत वे क्रिसीकी बात ने सानकर सबको डॉय्ती
रहीं। इसी बीचमे उनके सुदृद्द एवं महान हठकी वात
उनकर झिवरश्रिय भगवान विष्णु भी त॒रंत वहाँ आ पहुँचे
आर इस प्रदार बालि |
श्रीविष्णुन्े कहा--देवि ! तुम पितरोंकी मानसी पुत्री
एस उस्दं बहुत ही प्यारी हो; साथ ही गिरिराज हिमाल्यदी
गृगपती पत्नी दी ।हस प्रकार तम्हारा सम्बन्ध साक्षात ब्रह्माजीके
उन्तम कुलने है | संसारम तुम्हारे सहायक भी ऐसे ही हैं। तुम
पन्य हो।। में ठुससे क्या कहूँ ? तुम तो घर्मकी आधारभूता हो)
फिर भर्मका त्याग कैसे करती हो ? नुग्हीं अच्छी तरह सोचो
तो गही | सम्पृर्ण देवता, ऋषि, ब्ह्माजी और मैं--समी व्येग
विपरीत वात ही क्यों कहेंगे ? तुम झित्रकों नहीं जानती | वे
मिगुग भी हैं और सगुण भीहे। कुरूप भी हैं ओर सुरूप
भी | सबके सेव्य तथा सत्पुस्षोके आश्रय हैं | उन्होंने मृल्ट-
प्रशतिस्पा देवी एश्बरीका निर्माण किया और उसके बगलमें
भटपातमत्रा निर्माण करके विठाया। उन्हीं दोनेसि सगुण-रूपमें
गति तथा बद्याकी उत्पत्ति हुई। किर लोकोंका हित
फरनेक डिये ये स्वयं भी रुद्ध सुपसे प्रकट हुए । तदनन्तर वेद,
हा ता तथा न्यातर-जंगमरूपे जो कुछ दिखायी देता है, वह
शांध जग तू भी भगमास गंकरसे उत्स्न हध्ग 5
उय जगत भी भगवान शंकरते ही उत् टुआ | उनके
[
रूपका ठीक-ठीक वर्णन अबतक कोन कर सका है ? अथवा
कीन उनके रूपको जानता है ? मैंने ओर ब्ह्माजीने भी जिसका
अन्त नहीं पाया; उनका पार दूसरा कौन पा सकता है !
ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखाबी देता है
वह सब शिवका ही रूप है--ऐसा जानो | इस विपयमं कोई
अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये | वे ही अपनी लीलासे
एसे रूपमें अवबतीर्ण हुए हैं ओर शिवाके तपके प्रभावसे तुम्हारे
द्वारपर आये हैं। अतः हिमाचलकी पत्नी ! तुम दुःख छोड़ो
ओर शिवका भजन करो | इसमे नुम्हें महान, आनन्द प्राप्त
होगा ओर तुम्हारा सारा क्लेश मिट जायगा |
प्रह्माजी कहते ह--नारद ! श्रीविष्णुके द्वारा इस
प्रकार समझायी जानेपर गेनाका सन कुछ कोमल हुआ |
परंतु शिवको कन्या न देनेका हठ उन्हेंने तब भी नहीं छोड़ा ।
शिवकी मायासे सोहित होनेके कारण ही उन्होंने ऐसा दुराग्रह
किया था । उस समय मेनाने शिवक्के सहच्चकों स्वीकार कर
लिया । कुछ ज्ञान हो जानेवर उन्होंने श्रीदरिसि कहा--“्यदि
भगवान् शिव सुन्दर शरीर घारण कर लें) तब में उन्हें अगनी
पुत्री दे सकती हूँ; अन्यथा कोटि उपाय करनेपर भी नहीं
दूँगी | यह बात में सचाई ओर हृदवाके साथ कह रही हैं ।?
ऐसा कटकर हृदतायूयंक उत्तम ब्तवा पाल्न करनेयाली मेना
शिवक्री इच्छासे प्रेरित शों चुप हों गयों। धन्य है शिवकी
साया; जो सबकी मोह डा देती ह ! / क्षस्याव ४४ )
/गरान शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करता, गेनाझी प्रसक्षता और श्वमा-्रार्थना
तथा पुरवासिनी ख़ियोंका श्षिवके रूपका दर्शन करके जन्म और जीवसको सफल मानना
२२७
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चन्द्रदेव मस्तकका मुकुट बनकर उनकी शोभा बढ़ा रहे थे ।
इन सब साधनोंसे भगवान् शंकर सबेथा रमणीय जान पड़ते
थे। उनका वाहन भी अनेक प्रकारके आमभूषणोंसे विभूषित
था । उसकी महाशोभाका वर्णन नहीं हो सकता था। गद्ा
ओर यमुना भगवान् शिवको सुन्दर चर्वेर हुला रही थीं ओर
आठों सिद्धियाँ उनके आगे नाच रही थीं। उस समय मैं,
भगवान् विष्णु तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने वेषको
भलीमॉति विभूषित करके परवंतवासी भगवान् शिवके साथ
प्वल रहे थे । नानारूपधारी शिवके गण खूब सज-घजकर
अत्यन्त आनन्दित हो शिवके आगे-आगे चल रहे थे | सिद्ध;
उपदेवता+ समस्त मुनि तथा अन्य सब छोग भी महान् सुखका
अनुभव करते हुए अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक शिवके साथ यात्रा
कर रहे थे । इस प्रकार देवता आदि सब लोग विवाह देखनेके
लिये उत्कण्ठित हो खूब सज-धजकर अपनी पत्नियोंके साथ
परब्रह्म शिवका यशोगान करते हुए. जा रहे थे। विश्वावसु
आदि गन्धवे अप्सराओंके साथ हो शंकरजीके उत्तम यशका
गान करते हुए उनके आगे-आगे चल रहे थे। मुनिश्रेष्ठ !
मद्दे श्वरके हे. लराजके
शलराजके द्वारपर पधारते समय इस प्रकार वहाँ नाना
प्रकारका महान उत्सव हो रद्द था। मुनीश्वर | उस समय
४४ नमों रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने 5:
[ संक्षिप्त-शिवपुगण
कर 3 लय बज आजा आह अत बन जज नल जज
वहाँ परमात्मा शिवक्री जैसी शोभा हो रही थी। उसका कि...
रूपसे बर्णन करनेम॑ कीन सम हो सकता है! हें मे
विलक्षण रुपगे देखकर गना क्षणभरके टिये चित्र-टिलीजीए
गयीं । फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ बोलीं--महेश्व |
पुत्री धन्य है) जिसने बड़ा भारी तप किया और उम्र कहे.
प्रभावसे आप मेरे इस घरमे पथारे | पहले जो मेने आपगिई
अशक्षम्य निन्दा की है; उसे मेरी शिवाके खामी शिव |ढा
क्षमा करें ओर इस समय पृण्णतः प्रसन्न हो जायें !
त्रह्माजी कहते हैं--नारद ! इस प्रकार बात के
चन्द्रमोलि शिवकी स्तुति करती हुई शेलग्रिया मेने ऊ
हाथ जोड़ प्रणाम किया) फिर वे लजित हो गयीं। इतनेर (
बहुत-सी पुरवासिनी स्रियाँ सगवान् शिवके द्शनकी लक
अनेक प्रकारके काम छोड़कर वहाँ आ पहुँचों। जो की
बसे ही अस्तव्यस्तरूपमं दोड़ आरयी। भगवान् शंका |
मनोहर रुप देखकर वे सब मोहित हो गयीं। शिवके छा
हर्षको प्राप्त हो प्रेमपृर्ण हृदयवाली वे नारियाँ महेद्रती
मूर्तिकों अपने मनोमन्दिरमें विठाकर इस प्रकार वोर्छी
पुरवासिनियोने कहा--अहो ! हिमवानके गा
निवास करनेवाले लोगोंके नेत्र आज सफल हो गये | कि
जिस व्यक्तिने इस दिव्य रूपका दर्शन किया है! विश
उसका जन्म सार्थक हो गया है | उसीका जन्म सह है
डसीकी सारी क्रियाएँ: सफल हैं जिसने समूर्ण पाक
करनेवाले साक्षात् शिवका दर्शन किया है। पार्वतीने शिर हि
जो तप किया है; उसके द्वारा उन्होंने अपना सी पे
सिद्ध कर लिया | शिवको पतिके रूपमें पाकर ये वि ॥)
ओर कृतकइत्य हो गयीं । यदि विधाता शिवा ओर शक
युगल जोड़ीकों सानन््द एक-वूसरेसे मिला न देते वे?
सारा परिश्रम निष्फल हो जाता | इस उत्तम जोड़ीकी ।
ब्रह्माजीने बहुत अच्छा कार्य किया है। इससे एक
कार्य सार्थक हो गये | तपस्याक्े बिना मनुष्यकि विये ४
दर्शन दुलंभ है। भगवान् शंकरके दर्शनमात्रसे की हा
कृतार्थ हो गये । जो-जो सर्वेश्वर गिरिजापति शी
करते हैं, वे सारे पुरुष श्रेष्ठ है और हम उरी हि"
घनन््य हैं। कि
ब्रह्माजी कहते हैं---नारद ! ऐसी बात कई क
चन्दन और अक्षतसे शिवका पूजन किया अ व
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उनके ऊपर खीलोंकी वर्षा की | वे सब स्ल्ियाँ मे
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सुद्रसंदिता ] # मेनाह्वारा द्वारपर भगवान् शिवका एरिछल तथा उनके रूपको देखकर संतोपका अनुभव # श२५
:इननुक होकर खड़ी रहीं और मेना तथा गिरिरिजक्रे भूरे
: मग्यकी संगाहना करती रहीं । भुने ! स्वियोके मुखसे बसी शुभ
वार्ते उुनकर विष्णु आदि सब देवताभ्भोक्ते साथ भगवान्
शित्रकों बड़ा हर्ष हुआ | ( अध्याय ४५ )
५
'मैनाद्ारा द्वारपर भगवान् शिवका परिछन, उनके रूपको देखकर संतोपका अनुभव, अन्यान्य युवतियों-
द्वारा बरकी प्रशंपा, पावतीका अम्बिकापूजनके लिये वाहर निकलना तथा देवताओं ओर
भगवान् शिवका उनके सुन्दर रूपको देखकर प्रसन्न होना
प्रह्माजी कहते हैं--नारद ! तदनन्तर भगवान् शिव
'प्रसन्नचित है| अपने गणों। समस्त देवताओं तथा अन्य लोगेंकि
साथ कोवृद््यूचक गिरिराज दिमिवानके धाममें गये।
# रिम्रानलटबी अर) पढ़ी मेना भी उन स्रियोके साथ परके भीतर
'गर्यी और शम्भुकी आरती उतारनेके लिये हाथमें दीपकेसे
जी हुई थाली लेकर सभी ऋषिपकियों तथा अन्य टेक
"बाय आदरानक द्वारपर आबों | वहाँ आकर मेनाने सम्पूर्
(यताअंसि सेथित गिरिजापति मदेखर शांकरको। जो द्वारपर
प्रस्थित थे, बढ़ें प्यास्से देखा । उनकी अभप्नकान्ति मनोहर
श्याये; समान थी । उनके एक मुख ओर तीन नेत्र थे |
सप्र मुखारदिच्दपर मनन््द मुसकानकी छटा छा रही थी। वे
... 'छ और गुवर्ण आदिसे विभूदित थे | गलेमें मालतीकी माला
एन हुए थे। सुस्दर रतमय मुकुट धारण करनेसे उनका
पमाणएल उच्यल प्रभात उद्धासत हो रहा था। उण्ठमें
मुन्दर आगरण शोमा दे रहे थे | सुन्दर के और
(08: उसे शजार्यकीं विषेषित पर रू ॥। अभिद्
दा ३ +
मान विदर्तत एड झनप्म संत्यन्त सन सनाएुर) विजिप्त ए्न्य
0 575
/१५, च्प १ है| | ह
४ पारस उसप॥ बड़ी शांणा हा रह आ। चन्दन:
5 प् रे | शी $१५॥ एर्
) 5 * “६ सवार दिस उन जऊः
"5: 33 | पख्छानते पहिडस रणसय रएणे एफ खरा भा जा
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+ की 5३-५० है | हे हे कक >२० | मकान पी
४) ४६ ०, +५ रे है कि 4 4९१॥ व (४१८५
(की थे | डेनान
बज जल लाए 2२
“5 ब््प् कब्इ हक
गिरिराज ट्मिवानकी ओर उनके समस्त कुलकी भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगीं। उन्होंने अपने-आपको कृताथ माना ओर वे
बारंबार हृपषका अनुभव करने लगीं। सती मेनाका मुख
प्रस्नतासे खिल उठा था। ये अपने दामादवी शांभाका
सानन्द अवलोकन करती हुईं उनकी आरती उतारने लगीं।
गिरिजाकी कही हुई बातकों बारवार याद करके मेनाको बड़ा
विस्मव दो रह था। वे हपोत्फुछठ मुखारबिन्दस युक्त हे मन-दी-मन
यो कहने लगीं---'पावदीने मुझसे पट्ले ज़सा बताया था) उससे
भी अधिक सोन्दय में इन परमेश्वर शिवके अपग्नोर्म देस रही
हूँ । मदेखरका मनोहर लाबण्य इस समय अदर्णनीय है 0? ऐसा
सोचकर आश्रयंचकित हुई मेना अपने घर भीतर आयी ।
वर्शी आयी हुई
यरि प्रशंसा की ।
घनन्पय | ।! गाल
युवतियाने भी बरके मनोहूर रूपड़ी भूरि
ये बोरी---गिरिराशनन्दिनी दिया भन््य हैं;
दन्वाएँ बहने लर्गी--- पुर्गा ते खाक्षात्
भगवदता ६ । केछ देससे बन्याएं मरना मनाते बल---
प्मने 2 दखा ! भार मे गाली
है एस बता अवलोइन दिया है । एन्ट्रे पावर सिरिशं धन्य
है गयी |! शगयान गंवा सह रप
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२२८ # नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने # | संक्षिप्त-शिपणश
अंक 2-था०आ डक पक: +पहा--२००म मम.
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बहिसुंख हो । तुमने इस समय साक्षात् हरसे उनका गोत्र पृठा
है और उसे बतानेके लिये उन्हें प्रेरित क्रिया है । तुम्हारी यह
बात अत्यन्त उपहासजनक है | पवेतराज | इनके गोन्न) कुल
और नामको तो विष्णु ओर ब्रह्मा आदि भी नहीं जानने; फिर
दूसरोंकी क्या चर्चा है ! शैलराज | जिनके एक दिनमें करोड़ों
ब्रह्माओंका लय होता है, उन्हीं भगवान् शंकरको तुमने आज
कालीके तपोबलसे प्रत्यक्ष देखा है | इनका कोई रूप नहीं है;
ये प्रकृतिसे परे निर्गण, परबरहा परमात्मा हैँ । निराकारः
निर्विकार/ मायाधीश एवं परात्पर हैं | गोत्र; कुछ ओर नामसे
रहित खतनत्र परमेश्वर हैं। साथ ही अपने भरक्तकि प्रति बड़े
दयाछु हैं | भक्तोंकी इच्छासे ही ये निगुंणसे सगुण हो जाते हे;
निराकार होते हुए. भी सुन्दर शरीर धारण कर लेते हैं ओर
अनामा होकर भी बहुत-से नामवाले हो जाते हैँ । ये गोत्रहदीन
होकर भी उत्तम गोत्रवाले हैं, कऋुलहीन होकर भी कुलीन हैं;
पावंतीकी तपस्थासे ही ये आज तुम्हारे जामाता बन गये हैँ,
इसमें संशय नहीं है । गिरिश्रेष्ठ ! इन छीलाविहारी परमेश्वरने
चराचर जगत्कों मोहमें डाल रखा है। कोई कितना ही
बुद्धिमान् क्यों न हो, वह भगवान् शिवको अच्छी तरह नहीं
जानता ।
ब्रह्मजी कहते हैं--एुने ! ऐसा कहकर शिवकी इच्छासे
कार्य करनेवाले तुझ ज्ञानी देवर्षिने शेलराजकों अपनी वाणीसे
हृषे प्रदान करते हुए फिर इस प्रकार उत्तर दिया |
नारद बोलछे--शिवाको जन्म देनेवाले तात महाशैल |
मेरी बात सुनो और उसे सुनकर अपनी पुत्री शंकरजीके हाथमें
दे दो। लीलापूवंक रूप धारण करनेवाले सगुण महेश्वरका गोत्र
और कुछ केवल नाद ही है; इस बातको अच्छी तरह समझ
लो । शिव नादमय हैं और नाद शिवमय है---यह सर्वथा सच्ची
बात है | नाद और शिव--इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ।
शेलेन्द्र | सश्टिके समय सबसे पहले लीलाके लिये सग़ुण रूप
धारण करनेवाले शिवसे नाद ही प्रकट हुआ था | अतः वह
सबसे उत्कृष्ट है | हिमालय | इसीलिये मन-ही-मन सर्वेश्वर
शंकरके द्वारा प्रेरित हो मैंने आज अमी वीणा बजाना आरम्भ
कर दिया था ।
ब्रह्माजी कहते हँ--मुने ! तुम्हारी यह बात सुनकर
गिरिराज हिंमालयको संतोष प्राप्त हुआ .और उनके मनका
सारा विस्मय जाता रहा | तदनन्तर श्रीविष्णु आदि देवता तथा
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क्या नहीं; इसका तुम्हें पता ही नहीं है | बासवम तुम बढ़े
मुनि सब-के-सब विस्मयरदित हो नारदको साथुवाद देने छो।
महेश्वरकी गम्भीरता जानकर सभी विद्वान आश्रयत्रक्ष
बढ़ी प्रसन्ननाके साथ परस्पर ब्रोल--अहो | झिनदी शा
इस चिद्याल जगतका प्राकस्य हुआ है। जो पायल धर
बाधस्बरुप, खतन््त्र लीला करनेवाले तथा उत्तम मक्मे[
जाननेयोग्य हैं, उन त्रिडोकनाथ भगवान शम्मुग शत्रु
लोगनि भलीभौति दर्दन किया है ।!
तदनन्तर दिमाठ्यने विभिक्रे द्वारा प्रेरित हो भगवान् हि
अपनी कन्याका दान कर दिया । कन्यादान करते सम
2) मा
हमां कन्या सुम्यमह ददामि परमेश्वर।
भायाथ परियृद्धीप्व प्रसीद सकलेश्वर |
परमेश्वर | में अपनी यह कन्या आपको देता हूँ।
इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करें। सवंद |
कन्यादानसे आप संतुष्ट हां |?
इस मन्त्रका उच्चारण करके हिमाचलने अी
त्िलोकजननी पार्वतीको उन महान् देवता छके हर
दिया। इस प्रकार शिवाका हाथ शिवके हाथम एक 4
मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए | उस समय वे आने मे
महासागरको पार कर गये थे | परमेश्वर महादेवजीने पर
वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक गिरिजाके करकमलब्ो शी
हाथमें ले लिया | मुने ! लोकाचारके पालनकी आस
दिखाते हुए उन भगवान् शंकरने एथ्वीका स्व कक!
दात्? # इत्यादि रुपसे कामसम्बन्धी मन्त्रका पीठ क्या
समय वहाँ सब ओर महान् आनन्ददायक महीत्व हेने ८
पृथ्वीपर; अन्तरिक्षमें तथा खर्गमें भी जब-जयाता
गूँजने लगा | सब छोग अत्यन्त हर्षसे भरकर साइबर
नमस्कार करने छूगे | गन्धर्वगण प्रेमपूरक गे हे ह
अप्सराएँ उृत्य करने लगीं | हिमाचलके नगरे लोग भी
मनमें परम आनन्दका अनुभव करने लगे। उसे सर
उत्सवके साथ परम मद्गछ मनाया जाने लगा। मैं विप्यी
देवगण तथा सम्पूर्ण मुनि हृषसे भर गये । हम सब
पाप] ८ दं/म
+ विवाहमें कन्या-प्रतिग्रहके पश्चात् वरक्तों
अदरक
पाठ करता दै । पूरा मन्त्र इस प्रकार है--वीडदार्लर
तियद्दीता क्ामतते। (५ *
दात्कामायादात्कामो दाता कामः प्र
संहिता ७ | ४८ ) ह |
दटसहिता |] #शिवके वियादका उपसंहार; उनके दर द्षिया-वितरण: वर-पधूका कोहवरसें आनाऊ २२५९
विन्द्र ग्रमन्नतासे खिल उठे | तदनन्तर शांलराज दिमाचलने
'अच्न्त प्रमन्न हो शिवक्ते लिये कन्यादानकी बथोचित साद्नता
प्रदान दी | तटश्रात् उनके बन्डुजनोनि भक्तिपवंक शिवाका
पृथनन बरके नाना विधि-विधानसे भगवान शिवक्रों उत्तम द्रव्य
समर्पित किया । दिमालयने दह्ेजम अनेक प्रकारके द्रव्य, रत)
पात्र: एव छाख सुसझछित गोएँं। एक लाख सजे-सजाये घोड़े,
_परेड़ दथी और उतने ही सवर्ण जटित रथ आदि वस्व॒एँ दीं; इस
/7क'र परमात्मा शिवकों विधिपरूवक अपनी पुत्री कल्याणमंयी
पायतीका दान करके ट्रिमाल्य ऋृताथे हो गये | इसके बाद
ऑल्राजने बजुश्नंदकी साध्यंदिनी शाखा वर्णित सतोचके द्वारा
दोनों हाथ जोड़ प्रमन्नताप्यक उत्तम वाणी परमेश्वर शिवरतरी
स्तति की | तसश्रात् वेदवेता हिमाचलके आजा देनेपर मुनियाने
बड़े उत्लाहके साथ शझिवराक सिरपर अभिषेक किया ओर
महादेवजीका नाम लेकर उस अभिषेक्फी विधि पूरी की ।
मुने | उस समय बड़ा आनन्ददायक मद्दात्सव हो रहा था ।
( अध्याय ४८ )
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शिवके विवाहका उपसंहार, उनके द्वारा दक्षिणा-वितरण, बर-बधूक्रा कोहबर ओर बासभचनमें
जाना, वहाँ ख्रियोंका उनसे लोकाचारका पालन कराना, रतिकी प्रार्थनासे शिवरद्वारा
कामकी जीवनदान ख॑ वर-ग्रदान, वस्वधूका एकद्सरको मिश्टान्न
भोजन कराना आर शिवका जनवासेमें लाटना
प्रशाजी कहते ह--नारद ! तदनन्तर मेरी भाशा
र२ मशशरने ब्राद्मर्णोद्राय अग्निदी खापना करवायी ओर
दीप अपने आगे ब्रिठाकर वहाँ फ्राग्वेद। सजुवेद तथा
बिदक मन्त्रद्वारा अग्निम आहतियाँदी | तात | उस समय
(क्र भाई भनावने छाबादी अझ्ञलि दी और काली तथा
३ दोनोन आहएति देकर ल्ोयचासा आश्रय छें प्रसन्नता
3: आमिदेवनी परिफ्र्मा दी ।
गारद । सदनन्तर शिवत्री आशसे सनिर्येसि्ित मेने
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मेरी आशा पाकर अपने झ्ानपर आ संखंबग्राइन किया ।
इस प्रकार विधिपयकक उस अंबाहिक यश्चके पूर्ण है। जामेपर
भगवान् शिवने मुझ स्येकलए अक्ारी एण्गाम दान डकित्रा ।
फिर शम्सुने आचायबों गोदान दिया | सलदायक जे।
बड़े दान बताय गये है। ये भी सहेप सम्पध् दिये ।
वलश्वाव उन्हींन बात गोली
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वहाँ उन सबने आदसपूर्वक वर-बधूसे छोकाचारका राघादन रमन बनाइये । मेरे प्राणनायकरे जीवित हेनेए है
कराया | उस समय सब ओर परमानन्ददायक मद्दान उत्साह. प्रिया पायतीके साथ आपका सुन्दर विद्र परिह।
छा रहा था | तदनन्तर वे एसियोाँ उन लोककल्याणकारी इसों रंशय नहीं है। सर्वश्वर | आप सब बुद्ध के
दम्पतिकी साथ ले परम दिव्य वासभवन ( बीतुकागार ) में. समर्थ हि क्योंकि आप ही परमेश्वर हूँ। यह अकि के
गयीं और वहाँ मी प्रसन्नतापूवंक लोकाचारका सम्पादन क्या । क्या छाम ; ररबेश्वर | आप शोर मेरे पतिको जीव औीे।
इसके बाद गिरिराजके नगरकी छियोने समीप आकर मग्मल- पाल
कृत्य करके उन नवदम्पतीको केलिण्हमें पहुँचाया ओर जय-
ध्वनि करती हुई उनके गेंठबन्धनकी गाँठ खोलने आदिया
काये सम्पन्न किया ।
उस समय उन नूतन दम्पतिकों देखनेके लिये सोलह
दिव्य नारियाँ बढ़े आदरके साथ शीमतापूर्वेक वहाँ आर्मी |
उनके नाम इस प्रकार हँ--सरखती, लूथ्मी; सावित्नी; गग्ना)
अदिति; शचीः लोपामुद्रा, भसन्धती, अहृस्या, तुलसी, खाद्य:
रोहिणी, प्रथिवी, शतरूपा, संशा तथा रति। ये देवाग्ननाएँ
तथा मनोहारिणी देवकन्या। नागकन्या ओर मुनि-ननन््याएँ भी
वहाँ भा पहुँचीं | वहाँ जितनी छ्लियां उपस्थित थीं; उन सबकी
गणना करनेमें कोन समर्थ है ! उनके दिये हुए रत्तमय
सिंहासनपर भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्षक वेठे | उस समय
उन्हेंने शिवसे नाना प्रकारकी विनोदपू्ण बातें कहीं | तदनन्तर
प्रसन्नचित्त हुए. महेश्वरने अपनी पत्नीके साथ मिष्ठात्न भोजन
ओर आचमन करके कपूर डाला हुआ पान खाया ।
इसी अवसरपर अनुकूल समय जान प्रसन्न हुईं रतिने
दीनवत्सछ भगवान् शंकरसे कहा--“भगवन् ! पावतीका
पाणिग्रहण करके आपने अत्यन्त दुलेभ सौभाग्य प्रास किया ॥
है। बताइये; मेरे प्राणनाथको, जो सर्वथा स्वार्थरहित थे, ऐसा कहकर रतिने गाँठमें बंधा हुआ कामदेसो रे
आपने क्यों भस्म कर डाला १ अब यहाँ मेरे पतिको जीवित भस्म झम्भुको दे दिया और उनके सामने 'हनाय /
कीजिये और अपने अन्तःकरणमें कामसम्बन्धी व्यापारको. कहकर रोने लगी । रतिका रोदन नरक सस्खते 8,
जगाइये | आपको और मुझको जो समानरूपसे वियोगजनित देवियाँ रोने लगीं और अत्यंन्त दीन वाणीमें बे
संताप प्रात्त हुआ है; उसे दूर कीजिये | महेश्वर ! आपके. आपका नाम भक्तवत्सल है | आप दीनबन्ध न्हिी।
इस विवाहोत्सवर्मे सब छोग सुखी हुए हैं। केवल मैं ही हैं। अतः कामको लीनन-दान दीजिये और रतिक
अपने पतिके बिना दुःखमें डूबी हुई हूँ । देव | शंकर ! प्रसन्न॒ कीजिये | आपः 5.
होइये और मुझे सनाथ कीजिये | दीनबन्धो | परम प्रभो | त्रह्माजी को.
अपनी कही हुई बातको सत्य कीजिये | चराचर प्राणियों- सुनकर महेश्वर ..
सहित तीनों लछोकीमें आपके सिवा बूसरा कोन है, जो मेरे... - ही रतिपर
दुःखका नाश करनेमें समर्थ हो ?! ऐसा जानकर आप मुझपर . पहले
दया कीजिये । दीनोंपर दया करनेवाले नाथ | सबकी आनन्द ६ :.. सी
प्रदान करनेवाले अपने इस विवाहोत्सवमें मुझे भी उत्तवे- पति:
बल हक
है
रू ला
क हि र्ः
हरी #]
१५ अं
१
[(द्संदिता ]) # रातको सजे हुए धासग्ृहम शयन करके शिवका जनवासेमें आगमन #ः
अमर यानरी फनी अमन हलामनकुाान) चाही
क् देख रतिने महेख्वरकों प्रणाम किया । वद कृता्थ हो गयी ।
इसने म्ाणनाथकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिवका अपने
गवित पतिक्रे साथ हाथ जोड़कर वारंबार स्तवन किया |
'छीयहित कामकी की हुई स्ठतिको सुनकर दयाद्र-दृदय
पगद्ान् दंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए ओर इस प्रकार बोले |
शंकरने कहा--मनोभव | पक्कीसद्वित तुमने जो स्तुति
॥ है; उससे में बहुत प्रसन्न हूँ | खयं प्रकट होनेवाले काम |
'ग बर माँगो | मैं तुर्म्ई मनोवाझ्छित वस्तु दूँगा ।
शग्भुका यह वचन सुनकर कामदेव महान आनन्दमें
ग़म ही गया ओर हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गद्गद वाणी-
बोच्य |
फामदवने कह्ा--देवदेव महादेव | करुणासागर प्रमो !
; आप मुथ्नपर प्रसन्न हैं तो मेरे लिये आनन्ददायक होइये।
? | पृवदालमें मैंने जो अपराध किया था; उसे क्षमा
जिये | खजनोंकि प्रति परम प्रेम और अपने चरणोकी
न दीजिये |
पामदेवका यह कथन सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो
४--“प्त अच्छा ।* इसके बाद उन करुणानिधिने £सकर
ए-अमहमने कामदेव ! में तुमपर प्रसन्न हूँ | तुम अपने
से भयझो मिकाल दो | भगवान् विप्णुके पास ज्ञाओ और
) पर्से दाएर ही रहो |!
२३१
न आना
तदनन्तर काम शिवजीको प्रणाम करके बाहर आ गया ।
विष्णु आदि देवताओंने उसे आश्षीवाद दिया। इसके बाद
मगवान झंकरने उस वासभवनर्म पावेतीकों बायें बिठाकर
मिप्ठान्न भोजन कराया ओर पावतीने भी प्रसन्नतापूवक उनका
मुँह मीठा किया | तदनन्तर वहाँ लेकाचारका पालन करते
हुए आवश्यक इत्य करके मेना ओर हिमवानकी आशा ले
भगवान शिव जनवासेमें चले गये । मुने | उस समय महान
उत्सव हुआ ओर वेदसन्त्रोंकी घनि होने लगी। लोग चारों
प्रकारके वाजे बजाने लगे | जनवासेमें अपने स्थानपर पहुँच-
कर शिवने ल्येकाचारवश मुनिर्योकों प्रणाम किया | श्रीटरिको
ओर मुझे भी मस्तक घझुकाया । फिर सब देवता आदिने उनकी
वन््दना की | उस समय व्हों जय-जय॒कार; नमस्कार तथा सेमस्स
विधष्नोंका विनाश करनेवाली शुभदायिनी वेदघ्वनि भी होने
लगी । इसके बाद मेने, भगवान् विष्णुने तथा इन्द्र; झपि
ओर सिद्ध आदिने भी शंकरजीकी स्तुति की | गिरिजानायक
मदेश्वरकी स्तुति करके वे विष्णु आदि देवता प्रसन्नतापूवद्
उनकी यथोचित सेवार्में लग गये | तसश्रात् लीव्यपूर्यफ शरीर
धारण करनेवाले मट्देश्वर शाम्भने उन सबकी सम्मान दिया |
फिर उन परमेश्वरी आज्ञा पाकर से विष्णु आदि
देवता अत्यन्त प्रसन्न हो अपने-भगयने विधाम-स्थानयी गये |
( अध्याय ४९--० १ )
रातकों परम सुन्दर सजे हुए वासग्रहमें शयन करके प्रातःक्ाल भगवान् शिवका
जनवासेम आगमन
रापाजी फाते --सात! तदनन्तर भाग्यवानोंगें शेए
छ
* ध्याबक क.] ५3 | ने
४ ६ घर शिरियज् रिमयानने दागठियोंनीं शोहन गरानिरे
५ हक के आओ हज 'क जे; पन््णयाक ४३ लत आ जय थे अभर्णाणा ़ु ॥ *
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हि # ऋ* कल का ब्क्त्क हु ्न्ै
५ धन्य पदोओ भेदयर शिपगल्गि
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वहाँ उन सबने आदरपूर्वक वर-बधूसे लोकाचारका सम्पादन
कराया । उस समय सब ओर परमानन्ददायक महान उत्साह
छा रहा था । तदनन्तर वे स्लरियाँ उप लोककल्याणकारी
दम्पतिको साथ ले परम दिव्य वाराभवन ( कीतुकागार ) में
गयीं ओर वहाँ भी प्रसन्नतापूर्वक लोकाचारका राम्पादन वि ।
इसके बाद गिरिराजके नगरकी छिसेनि समीप आकर मर््नल-
कृत्य करके उन नवदम्पतीकी केलिण्रमं पह/ुँचाया ओर जय-
ध्वनि करती हुई उनके गेंठबन्धनक्ी गांठ खोलने आदिका
काये सम्पन्न किया ।
उस समय उन नूतन दग्पतिकों देखनेके लिये सोलह
दिव्य नारियों बड़े आदरके साथ शीभतापूवेक वहाँ आयी |
उनके नाम इस प्रकार ह---सरस्वती, लण्मी, सावित्नी। गन्ना
अदिति, शी) लोपासुद्रा, असन््धती, अहस्या; तुलसी) स्वाहा)
रोहिणी, प्रथिवी; शतरूपा; संश्ा तथा रति। ये देयाद्गनाएँ
तथा मनोह्यरिणी देवकन्या, नागकन्या ओर मुनि-कनन््याएँ भी
वहाँ आ पहुँचीं | वहाँ जितनी छ्लियाँ उपस्थित थीं, उन सबकी
गणना करनेमें कोन समर्थ है ! उनके दिये हुए रत्नमय
सिंहासनपर भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्बक बेटे | उस समय
उन्होंने शिवसे नाना प्रकारकी विनोदपूर्ण बातें कहीं । तदनन्तर
प्रसन्नचित्त हुए महेश्वरने अपनी पत्नीके साथ मिष्ठात्न भोजन
और आचमन करके कपूर डाला हुआ पान खाया ।
इसी अवसर्पर अनुकूल समय जान प्रसन्न हुईं रतिने
दीनवत्सल भगवान् शंकरसे कहा--“भगवन् ! पार्वतीका
पाणिग्रहण करके आपने अत्यन्त दुर्लम सौमाग्य प्राप्त किया
है | बताइये; मेरे प्राणनाथको, जो सर्वथा स्वार्थरहित थे;
आपने क्यों भस्म कर डाला १ अब यहाँ मेरे पतिको जीवित
कीजिये और अपने अन्तःकरणमें कामसम्बन्धी व्यापारकों
जगाइये | आपको और मुझकी जो समानरूपसे वियोगजमित
संताप प्राप्त हुआ है; उसे दूर कीजिये । महेश्वर | आपके
इस विवाहोत्सबर्में सब छोग सुखी हुए हैं। केवल में ही
अपने पतिके बिना ढुःखमें डूबी हुई हूँ । देव | शंकर ! प्रसन्न
होइये. और मुझे सनाथ कीजिये | दीनबन्धो | परम प्रभो |
अपनी कही हुई बातको सत्य कीजिये | चराचर प्राणियों-
सहित तीनों लोकौमें आपके सिवा दूसरा कौन है; जो मेरे
डुःखका नाश करनेमें समर्थ हो ! ऐसा जानकर आप मुझपर
दया कीजिये | दीनोंपर दया करनेवाले नाथ ! सबको आनन्द
प्रदान करनेवाले अपने इस विवाहोत्सवमें मुझे भी उत्सवं-
% शमी शदद्राय धाम्ताय प्रह्णे परमात्मने £ [ संभ्षित शिकषए्ष
2नकज०- कक प३७- ००-०० एक एमपी मा] / न कह. ा222१० ३७००५ पा "५ १० ना कमान क/मनेडभपा7घ३2०५ धाम भ "नर गकरि मना क-4४34४५००७५ ०६४७० ना पमह-कपामारााभाद ३७ > परम पममीनमद नुडपा न पा+ पा था वा नए #०क- ५०७७ पाक पर नाम ना 4३०१७ यथा #० 32७5 ५ भाकवाधभ नम पापा #१- ९5९० य ना ९-० दकदाककन्पन ५ वा...
0, ७ ७०००-७५ ॥ रन बरी 3 बन आल कण की अर ०० 3 जे करी 5-३ ००ता + कस 2न्नीतती-पिलननीी 3७, क्ज्य-बरीय पेन मनन ९.>ी+ बकन ७७७एएए७शआ0॥७७/॥/ए४श//श/शश//श//शिाशशी आम 3 रकम या बकम्यनए पाक...
सम्पन्न बसाइये । मेरे प्राणनाथके जीवित होनेए है
प्रिया पार्यतीके साथ आपका सुन्दर विह्वर पणि।
हसागे संशय नहीं है। सर्वेक्षर | आप सत्र बुह् हंः
समर्थ हैं। क्योंकि आप दी परमेश्वर हैँ । यहाँ अकि झे
तया छाम ! सर्वश्वर | आप झीम मेरे पतिकी जीवित ईजि|
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ऐसा कहकर रतिने गाँठमें बंधा हुआ कामदेव री
भस्म शम्भुको दे दिया और उनके सामने 'ह नये | * के
कहकर रोने लगी | रतिका रोदन छुनकर सरखते कर
देवियाँ रोने लगीं और अत्यंन्त दीन वार्णीमे कक
आपका नाम भक्तवत्सल है| आप दीनबन्ध और हा
हैं | अतः कामको जीवन-दान दीजिये और रतिकी *
कीजिये | आपको नमस्कार है ।? के
फट
ब्रह्माजी कहते है--नारद ! उन सह |
सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये। उते के
तत्काल ही रतिपर कृपा की । भगवान् ॥
दृष्टि पढ़ते ही पहले-जैसे रूप) वेष और की | |
मूर्तिधारी सुन्दर कामदेव उस मश्तसे ने श०
पतिको वैसे ही रूप, आकृति) मन्द सुस्कात
(हसंदिता ) # रातकों सजे हुए वासगृहम शयन करके शिवका जनवालेमे आगमन * २३१
कक
; देख रतिने महेश्वरको प्रणाम किया । वह कृतार्थ हों गयी | तदनन्तर काम शिवजीक्ों प्रणाम करके बाहर आ गया |
ने प्राणनाथकी प्राप्ति करानेबले भगवान् शिवका अपने विष्णु आदि देवताओंने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद
बित पतिक्रे साथ द्वाथ जोड़कर बारंबार स्तवन किया। भगवान शंकरने उस वासमवनर्में पावेतीकों बाय विठाकर
गसद्ित छामकी की हुई स्तुतिको सुनकर दयाद्-हृदय मिष्ठात्न भोजन कराया ओर पावतीने भी प्रसन्नतापूर्वक उनका
प्रान् झंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार वोले। मुँह मीठा किया | तदनन्तर वहाँ लोकाचारका पालन करते
इंकरने कहा--मनोमव | पक्ीसद्तित तुमने जो स्तुति डेट आवश्यक इृत्य करके मेना ओर ऐिमवानकी आशा ले
| है; उससे में बहुत प्रसन्न हूँ | खयं प्रकट दोनेवाले काम | मगत्रान् शिव जनवातमें चले गये । मुने | उस समय सहान्
7 बर मॉगो | में तुझे मनोवाझ्छित वस्तु दूँगा । उत्सव हुआ ओर वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होने लगी | लोग नारों
प्रकारके बाजे बजाने लगे | जनवासेमें अपने स्वानपर पहुँच-
कर शिवने ल्येकाचारवश मुनियोंकी प्रणाम किया | श्रीटरिको
और मुझे भी मस्तक झुकाया । फिर सब देवता आदिने उनकी
वनन््दना की | उस समय वहां जय-जयकार; नमस्कार तथा समस्त
$ अपर पेत है तो गए लिये आन डेदयक की गे। विष्नोका विनाश करनेवाली झुभदायिनी वेदघ्यनि भी होने
पे ! पवेकालमें मैने जो अपराध किया था; उसे क्षमा “गी | इसके बाद गने। भगवान् विष्णुने तथा इन्द्र) ऋषि
जिये । स्जनेकि प्रति पस्प प्रेम और अपने चरणोंडी और सिद्ध आदिने भी शंकरजीकी स्व॒ति की। गरिरिजानायक
कि दीजिये । मदेश्वरकी स्तुति करके ने विष्णु आदि देवता प्रसन्नतायूर्वद्
धामदेवका यह कथन सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो.“ ओ वंधोचित सेवामें लग गये । तसश्रात् लीटापूर्मक शरीर
3.--प्यटुत अच्छा ।? इसके बाद डन करुणानिधिने एँसकर... "रण करनेवाले महेख्वर दाम्भुने उन सबकी सम्मान दिया।
(--महागते बामदेय | में तुमपर प्रसन्न हैँ | तुम अपने. शिर उन परमेश्वरकी आशा पाकर थे विश्यु आदि
नेषे भगझे निकाल दो । भगवान् विप्णुके पास जाओ और. देवता अत्यन्त प्रसन्न हो अपने-अपने विश्वाम-स्वानरों गये ।
+ परसे दादर ही रहो ॥* ( अध्याय ४९--५० ६ )
शग्मुका यह बचने सुनकर कामदेव महान आनन्दमें
मंत्र है! गया ओर द्वाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गद्गद वाणी-
मोटा |
फामदेयनें कहा--देवदेव महादेव | करुणासागर प्रभो!
रातका परम सुन्दर सजे हुए वासग्ृहमें शयन करके प्रातःकाल भगवान् शिवका
जनवासेमें आगमन
प्रधाशी पदले --तात! सदनन्तर भाग्यगानमं शेष शोजन छसयां। शोजनके परझ्यात् हा-मुंद थी सूतश् उर्फ
गे पघट़र शिर्गिज रिमियासने दारानियोंरी रोहन मशारानेडे दिष्णु आदि सब देवा विधामदे शिये पस्यतापदर
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२रे२
वासमन्दिरका निरीक्षण किया । वहू भवन प्रज्वयलित हुए
सैकड़ों रक्षमय प्रदीपक्ि कारण अद्भुत प्रभासे उद्धासित
हो रहा था। वहाँ रक्षमय पात्र त्तथा र्क्रि ही कलश
रखे गये थे | मोती ओर मणियोंसे सारा भवन जगमगा
रहा था। रक्षमय दर्पणवी झ्ोमासे सम्पन्न तथा श्वेत चरोसि
अलंकृत था । मुक्तामणियोंती सुन्दर मालाओं ( बंदनवारों )
से आवेधशित हुआ वहू वासभवन बड़ा समृद्विशाली
दिखायी देता था। उसकी कहीं उपमा नहीं थी। व मद्दादिव्य)
अतिविचित्र, परम मनोहर तथा मनको आहाद प्रदान
करनेवाल्ा था। उसके फशेपर नाना प्रकारकी रचनाएँ:
की गयी थीं--बेल-बूटे निकाले गये थे | शिवजीके दिये
हुए. वरका ही महान एवं अनुपम प्रभाव दिखाता हुआ
वह शोभाशाली भवन शिवलोकके नामसे प्रसिद्ध किया
गया था । नाना प्रकारके सुगन्धित श्रेष्ठ द्रब्योसे सुवासित
तथा सुन्दर प्रकाशसे परिपूर्ण था | वहाँ चन्दन और अगर-
की सम्मिलित गन्ध फेर रही थी | उस भवमनमें फूर्लोंकी
सेज बिछी हुईं थी। विश्वकर्मोका बनाया हुआ वह भवन
नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे सुसझित था । भश्रेए्ठ रत्षोंकी
सारभूत सणियोंसे निर्मित सुन्दर हारोंद्रारा उस वासगहको
अलंकृत किया गया था। उसमें विश्वकर्माद्वारा निर्मित
कृत्रिम वेकुण्ठ; ब्रह्मल्लेक, केछास, इन्द्रभवन तथा शिवलोक
आदि दीख रहे थे। ऐसे आइ्चर्यजनक शोभासे सम्पन्न
उस वांसभवनकी देखकर गिरिराज हिमाल्यकी प्रशंसा
करते हुए मगवान् महेश्वर बहुत संतुष्ट हुए | वहाँ अति
स्मणीय रत्नजटित उत्तम पलंगपर परमेश्वर शिव बड़ी
प्रसन्नतासे छीलापूवक सोये | इधर हिमालयने बड़ी प्रसन्नतासे
अपने समस्त भाई-बन्धुओं एवं दूसरे लोगोंको भी भोजन
कराया तथा जो काय शेष रह गये थे, उन्हें भी पूर्ण किया ।
देलराज हिमालय इस प्रकार आवश्यक कार्येम लगे
हुए थे और प्रियतम परमेश्वर शिव शयन कर रहे थे ।
४ नमो रुद्राय शान्ताय ध्रह्मण परमात्मने #
[ सक्षिप्ततशिकुण्
च्ल्य्ल्च्य्य्य्ख्ख्यय्श््य्ल्य्श््ल्य्य्य््य्य्य्य्य्ख्य्य्स्स्म्य्म्म्म्म््म्म्््म्म्न्स्म्म्म्म्म्प्य्म्म्म्य्प्य्म्म्य्य्स्््््ज्जऊः
इसने्म ही सारी रात बीत गयी ओर प्रातकाब्योद्ध!
प्रमातकाल ऐनेतर धंयंवान् और उत्ताही पश्च
प्रकारके आजे बजाने छगे | उस समय श्रीविण्यु अरित्ष
देवता सानन्द उठे ओर आमने हइश्टदेव देवेश रल
स्मरण करके वहुसि कैलासकों चलनेके लिये बलीक
तयार ही गये | उन्होंने अपने वाहन भी सुर्गाश
लिये | तट्श्रात् धमकी शिवके समीप मेजा | बेकार
सम्पन्न॒ धर्म नारायणकी आज्ञसे वासग्हमें पहुँच फे
शंकररों समयाखित बात बोले--पप्रमथगग्गोंके खामी मे
उठिये; उठिये; आपका कल्याण हो | आप हमारे लि
कल्यागकारी होइये; जनवासेमे चलिये ओर वहाँ सबदेशा
को कृता्थे कीजिये [
घर्मकी यह बात सुनकर भगवान् महेक्व[
उन्होंने धर्मको कृपादश्सि देखा ओर शब्बाल्या'
इसके बाद धर्मते हँसते हुए. कहा--ुम आगे ई
में भी वहाँ शीम द्वी आऊँगा। इसमें संशव नहींहै।
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर धर्म जतवाे।
तत्मश्वात् शम्मु भी खय॑ वहाँ जानेकी उद्चत हुए।
जानकर मह्यन् उत्सव मनाती हुई त्रियाँ वहाँ आई
भगवान् झम्भुक्के युगल चरणारविन्दोंका दशत कर
मड्ुलगान करने लगीं | तदनन्तर लोकाचारत पुल |
हुए. अम्मु प्रातःकालिक इृत्य करके मेना ओर
आशा ले जनवासेकों गये | मुने ) उस समय वें
उत्सव हुआ । वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होने लगी ओर जो
प्रकारके बाजे बजाने लगे | अपने ख्ानपर ऑर्क
लेकाचारबद् मुनियोको, विप्णुकी और मुझको प्रणा/ न्
फिर देवता आदिने उनकी वन्दना की। उस झा
जयकार; नमस्कार तथा वेदमन्त्रोच्वारणकी मज्नलदागि
होने लगी | इससे सब ओर कोलाहल छा गया।
( अथाय
अक पादरी >काकी- कमी. करि- पी,
चतुर्थीकर्म जे दिनोंतक
त्रह्माजी कहते हैं---तदनन्तर विष्णु आदि देवता
तथा ऋषि कलास लोय्नेका -विचार करने लगे ।
हिमालयने जनवासेमें आकर सबको भोजनके लिये निमन्त्रित
बारातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना
किया | तत्पश्चात् देवेश्वर शिवको आमसन्तिंत के
तब अपने घरको गये और नाना प्रकारके विधान ४ प्
न की तयारी करने हगे | उन्होंने प्रसन्नता पर
: महसंहिता ] # मेनाकी इच्छाक अनुसार एक ब्राह्मण-पल्ीका पादंतीका पतिब्रतथसका उपदश दना # २रेरे
43 ू&--- धर देकर पफलाना हारी (अत प्रीति गए "करी दीन नयुकनी पहनी अनरी चिकनी उरी फनी, निर्मम परी "कक पान पी.
ग्रय भोजनक लिये परिवारसद्टित भगवान् शिवकी बयोचित
पैतिमे अपने घर बुल्वाण | शम्मुक्े, विष्णुक्े) मेरे) अन्य
रस देवताओंकि। मुनिर्योके तथा वहाँ आये हुए अन्य सब
हागाक भी चरणेंकि बड़े आदरके खाथ घोकर उन सबकी
शिरियजने मप्डपके भीतर सुन्दर आसनपर विठाया |
फ़िर अपने भाई-बन्धुओंका साथ लेकर उनके सहयीगतसे
टन सब अतिधिवोंकों नाना प्रकारके सरस पदाथाद्वारा
पृर्णयया तृत्त किया | मेरे, विष्णुक्के तथा द्वाम्भुके साथ सब॒
दोगाने अच्छी तरह भोजन क्रिया । नारद | विधिवत
भोजन और आचमन करके तृत्त आर प्रसन्न हुए रू
टेग हिमाख्यय आशा ले अपने-अनने डेरेपर गये) मुने !
इसी प्रकार तीसरे दिन भी गिरिराजने विधिवत् दान) सान
और आदर आदिये द्वारा उन सबका सत्कार किया।
नोधा दिन आनेयर शाद्वतापूर्वक सब्रिधि चतुर्थी कर्म
दुआ, भिसके बिना विवाहन्यश अधूरा ही रद्द जाता है।
उस समय साना प्रवारका उत्सव हुआ। साधुवाद और
उय-लपकारकी घनि हुई । बहुतसे सुन्दर दान दिये गये ।
भाति-भोतिके सुन्दर गान ओर बृत्य हुए। पॉचर्ये दिन
प्रव देखताआने बड़े एप ओर अलन््त प्रेमफे साथ शलराजफे
सचित फिया कि अब हमलोग यहसे जाना चाएते ६ |
आए आश। प्रदान फर ॥ उनकी यह बात झुन गिरिराज
एमदान हाथ जोड़कर बेले--प्देयगण | आपलोग
॥ 5 दिस और परे तः आपर क्या कर ।! पं
६ «]) आर हएर तथा गृतसार फक्रा कर या
गे व ध आप कैप जुत दल *- कर “ने ए्ातान बा
“0 उन्दोंत स्नो!दा जाप पुजत[३४३७) भय हक
च्हँ
तथा प्रसन्नतायूर्व॑क्क) उनके सौभाग्यक्री सराइना की । सुने |
उनके समझानेस गिरिराजने वारातओों जिंदा करना खाकार
ठग लिया । तत्यश्रात् भगवान, दम्मु यात्राके लिये उद्यत
दे देवता आदिफके साथ शंल्राजक्े पास आये। देवेधर
शिव देवताओंसदित ऋल्यसकी वाचाके लिये जब उद्यत
हुए, उस समव सेना उच्छरसे रोने लगी ओर उन
कझेपानिधानसे बीलीं |
कपा करके मेरी शिवाह्धां
| आप आशतोप ६ ।
मेनाने कहा--हृपानिधे
भलीभोति लाल्म-पालन छीजिये
पावतीके लहूसों अयराधोंकों शी तगा कजियंगा। मेरी बद्यी
जन्म-जन्ममें आपे चरणारविन्दागी भक्त री है ओर
हैगी | उसे नाते और ज्ञागते समय भी आने ल्वामी
महादेवके सिवा दूसरी क्रिसी वसलुकी सुपर नहीं रती।
यृत्युंजब ) आपके प्रति भक्तिभावक्गी यातें मुनते ही बद
एपकि आँसू बदाती हुई पुछक्ित ही उठती है ह्येर आयी
निन््दा सुनकर ऐसा मोन सांप लेते दे) माना मर दी गयी है |
#
रा बा]
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प्रह्माजी कहते ऐ--नारद ! ऐसा फटपर मेनकाने
अपनी बेटी झिपकोी होप दी आर उन द्नेक्ि सामने
ही उच्चल्वरसे रानी हुए वह माच्छित हो गयी । तब संद्ादेयप्रीन
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भेमाकी समशावार सचेत किया और उससे विदा है;
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* पथ *१ १ह १ ०४क * ५ धक्के + हः कु रब ् *-४ +-
५ दे ृ रे ५ आओ, अीओ हे हे जद रिक्त का
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सनक नहमा०>ड - अमकाथफ.. "मय रववीदक्पार न. “रह शधामएण. ७. ५० मरकरान-+ “- समएपपइर अर ू,. गरम ना. पर प्रएनपःप0,."बाइ-मालाथाहन-++य ७ +-नकपा+ पीकर. 'कीएपन्मामा--+०शा+- पं नडारवीकनय 5 कायम पान. स्दपगए--'कमाकतम5-बपाल्यन+3 -रारर-प+?+गा-. पानी डककिपमा+-
उत्सव मनाये । फिर उन्होंने नाना प्रकारके रत्नजण्ति सुन्दर
वर्ज्नों और बारह अआभूषपणेंद्वार राजोचित शज्गार करके
पावेतीको विभूषित क्रिया | तलश्रात् मेनाक्रे मनोभावकों
जानकर एक सती-साध्ची ब्राह्मणपत्नीनी गिरिजाकों उत्तम
पातिब्रत्यकी शिक्षा दी ।
ब्राह्मपपत्नी चोली--गिरिराजकिशोरी | तुम प्रेम-
पूर्वक मेरा यह वचन सुनो | यह घमेको बढ़ानेवालाः
इहलोक ओर परलोकमें भी आनन्द देनेबाला तथा श्रोताओंको
भी सुखकी प्राप्ति करानेवाला है | संसारमें पतित्रता नारी ही
धन्य है; दूसरी नहीं | वह्दी विशेषरूपसे पूजनीय हे । पतित्रता
सब लोगोंकोी पवित्र करनेबाली और समस्त पापराशिको नष्ट
कर देनेवाली है | शिवे | जो पतिको परमेश्वरके समान
मानकर प्रेमसे उसकी सेवा करती है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण
भोगोंका उपभोग करके अन्तमें कल्याणमयी गतिको पाती है |#
सावित्री) छोपामुद्रा, असुन्चती; शाण्डिली; शतरूपा, अनसूया)
लक्ष्मी, खघा$ सती; संशा3 सुमति; श्रद्धा, मेना और स्वाहा--
ये तथा ओर भी बहुत-सी स्तरियाँ साध्वी कही गयी हैं ।
यहाँ विस्तारभयसे उनका नाम नहीं लिया गया । वे अपने
पातितव्रत्यके बलसे ही सब लोगोंकी पूजनीया तथा ब्रह्मा$ विष्णु,
शिव एवं मुनीश्वरोंकी भी माननीया हो गयी हैँ | इसलिये
तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये।
वे दीनदयाछु) सबके सेवनीय ओर सत्पुरुषोंके आश्रय हैं |
श्रुतियों ओर स्प्तियोमें पतित्रता-धर्मकी महान बताया गया
है । इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है, वेसा दूसरा धर्म नहीं
है--यह निमश्चयपूवंक कह्दा जा सकता है।
पातितव्रत्य-चमममे तत्पर रहनेवाली ज्ञी अपने प्रिय पतिके
भोजन कर लेनेपर ही भोजन करे | शिवे | जब पति खड़ा हो;
तब साध्वी स्रीको भी खड़ी ही रहना चाहिये । शुद्धबुद्धि-
वाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पतिके सो जानेपर सोये और
उसके जागनेसे पहले ही जग जाय | वह छल-कपट छोड़कर
सदा उसके लिये द्वितकर काय ही करे । शिवे | साध्वी ख्लीको
चाहिये कि जबतक वस्त्ाभूषणोंसे विभूषित न हो ले तबतक
४4७ ४-७ंथथा कं“ 25663 3 जल नजर
# पत्या पतिन्रता सारी नान्या पूज्या विशेषतः ।
पावनी सर्वलोकार्नां सर्वपापोधनारिनी ॥
सेबले या पर्ति प्रेण्ण. परोश्रख्वच्छिने ।
श्ए भुत्तवाखिलान्भोगानन्ते पत्या शिवां गतिस् ॥
( शि० पु० रू० सं० पा० स्त॑० ज४ | ०-०० )
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मस ९
[ संक्षिप्त-शिवपुराण]
53 अब 33322: 0%% 7 5202%:022%%:0:3:: 5 27फ5 23233 मद जी
बह अपनेको पतिक्री दृष्टिके सम्मुख न छाये | यदि पति कि
कार्यते परदेशमें गया हो तो उन दिनों उसे कदारि शा
नहीं करना चाहिये। पतित्रता झ्री कभी पतिका गान
ले | पतिक्के कठबचन कहनेपर भी बह बदलेमे कई का
ने कहे । पतिक्रे बुलनेपर वह घरके सारे कार्य होड़
तुरंत उसके पास ली जाय ओर द्वाय जोड़ प्रेममे गत
शुक्राकर पृछे--मनाथ | क्िंसलिये इस दासीकों बुायव है!
थे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कपासे अरुर्फ
कीजिये |! फिर पति जो आदेश दे। उसका वह प्र
हृदयसे पालन करें| बह घरके दरवाजेपर देखतक एड़ी
रहे | दूसरेके घर ने जाब। कोई गोपनीय वात बक
हूर एकके सामने उसे प्रकाशित न करे | पतिके दिना5
ही उसके लिये पूजन-सामग्री स्वयं जुट दे तथा उनके हि
साघनके य्थोच्चित अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे ।पहि
आशा लिये बिना कहीं तीर्थ-यात्राके लिये भीन वात
लोगोंकी भीड़से भरी हुई समा या मेले आदिके उत्तं
देखना वह दूरसे ही त्याग दे | जिस नारीको तीषषातः
फल पानेकी इच्छा हो) उसे अपने पतिका चरणोदक री
चाहिये | उसके लिये उसीमें सारे तीर्य ओर क्षेत्र है
संशय नहीं है# |
पतित्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको पर #
भोजन मानकर ग्रहण करें और पति जो कुछ दे। उप मह
प्रसाद मानकर शिरोघार्य करे | देवता, पित0 अं)
सेवकर्र्ग/ गो तथा भिक्षुसमुदायके लिये अबकी भी
दिये ब्रिना कदापि भोजन ने करें । पातिहरत-बर्मम कह
रहनेवाली ग्रहदेवीको चाहिये कि वह घरकी सामग्रीको है
एवं सुरक्षित रक््खें | ग्रहकार्यमें कुशल हो। सदा मी
रहे और खर्चकी ओरसे हाथ खींचे रहे | पतिती #*
लिये बिना उपवास-त्रत आदि न करे! अत्यथा उसे रे
कोई फूल नहीं मिलता और वह परलोकमे नाग
होती है | पति सुखपूर्षक बेठा हो या इच्छानुसार है तरीडकि
अथवा मनोरज्जनमें छूगा हो; उस अवस्थामें आर
काये आ पड़े तो मी पतित्रता स्त्री अपने पतिकी का
उठाये । पति नपुंसव हो गया होः दुगतिमे ४(६| ही
_सेगी हो, बढ़ा हो, सुखी हो अथवा ढुंखी हो! ०
+सीर्थोर्थिनी तु या नारी पतिपादोदक पिवेत् !
सस्मिन् सवाणि तीर्थानि श्षेत्राणि च न शो: |
(शि० पु७ मत सं० पा० खे० ५४ | २५
)
पतित्नरतथमक्ता जप २७
रसद्रसंदिता ] 5 मताकी इच्छाक अनुखार ब्राह्मण-पलाका पावतीका पत्तित्नतथमक्ा डपदेश देना रू शदे५
मन अमल कक मम तकनीक मल डर तल जज नमन नील उन जल मत ली 3 लक मम मंबकार जबाब नई प तुपमपविमताउफाड्माक्षनध बहाने दथम कम यदकनतायाक पाक चुकमामनाक ततथ कक कककम काका धरम कमान लत; दककमनआा काम कम भ तन तइन कप भ कक इक ।यका जाप दर कर तक पाक पा
.............. 3. ७०-3५ ०-०० कार कप ३५८०५ -र मम मपकननी पक पान "लक जी जन पनन- नी "नमन मम मीन न न लगा-न न पवन पथ >मीप पन-4+ ५ कही + नमक पक करन- ५५ रजनी नमन प यननी पान नानय+ 5 मर न न न नी न ५५५ पककनने 3 >नीी 3 ननमीयन न“ पिपनर 35५39 ननन न नमन - "कक -3+ 3 लक कम «०१. _
काम“ करनी २ चय
का अल ाा॥ > रा ्ियओं
दरशामं नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्ल्छन ने करे |
ए्त्य दोनेपर घद दीन राशितक पतिकी अपना मुँहदन दिखाये
अति उससे अट्य रे | जबतक स्नान करके श्द्ध नद्धी
शाय। तवतक धनी कोई बात मी वह पतिक्रे कार्नोर्म न पढ़ने दे । .
अच्ठी तरद स्नान करनेके पश्चात् सबसे पदले बहू अपने पतिके
गुखका दर्शन करे) दुसरे क्लिसीका मुँह कदापि न देखे अथवा
मन-दी-मन पतिका चिन्तन करके सूर्यका दर्शन करे | पतिकी
आयु बदनेवी अभिद्यया सखनेवाली पतिगप्रता नारी हल्दी;
रोटी, सिन्दूर, काजल आदि; चोडी।, पान। मान्नलिक
आभूषण आदि; केशाका संवारना, चोटी गूँथना तथा हाय-
कान आभृषण--इन सबको अपने दारीरसे दूर न करे |
पविन, छिनाल या दुलटा। संन्यासिनी और भाग्यद्दीना
छियोकी बह कभी अपनी सखी ने बनाये । पतिसे दवप
प्यनदाली झीकगा वह कमी आदर न करे | वहीं
अपी ने खड़ी ही । कभी नंगी दोकर न नहाये | सती
जी ओबी, मूसल। झादू। सिल; जात ओर द्वारक्रे
नोधथ्फे नीचेचाली लकहीपर कमी ने बेढे । मेथुनकालफे
मिया और पविशी समयमें वह पतिके सामने धृष्टता न करे ।
जस-जिस पसर्मे पतिकी रुचि हो; उससे यह स्वयं भी प्रेम
१९ | पतियता देवी सदा पतिझा ऐत चाएनेवाली होती
यह पतिक एपमे एपं भाने | पतिके सुखपर विपादकी छाया
दस स्व्म भी विधादमें दब जाय तथा बह प्रियतम पति:
प्रति एमा चर्ताय कोर; जिससे दह उन्हें प्यारी लगे | पप्पात्मा
ह्धग ऐसे सम्पसि और पिपत्तिम भी परतिझ लिये एक-्सी
€ | आपने मे कभी विवार ने आने दे और सदा
बिल रहे । भी; नगद. मेज आदि रुमाप्त टी
“हफ *॥ पदागठा गरी परतितसि साधसा यह में पे कि
मा ' पटियों दा या विराने मे शा5 |
हो धन गाँवमें ऋतिया
है; वह गावम दु
था और निर्बन वनमें सियारिन होती है |
नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बेटे) दुष्ट पुदपक्े निकट
न छाय ओर पतिसे कभी कातर वचन ने बोले । क्विसीदी
निन््दा न करें | कल्इद। दुरसे दी त्याग दे | गुदजनेंके निकट
नतो उच्च खरसे ब्रोडे ओर नम ईसे। जो बादरते पतिको
आते देख तुरंत अन्न, जल, भोज्य बल: पान ओर वस्
आदिसे उनकी सेवा करती है; उनके दोनों चरण दबाती ऐ
उनसे मीठे वचन बोलती दे तथा प्रियतमके खेदकों दर
करनेवाले अन्यान्य उपायेसि प्रसन्नतायूर्वक उन्हें संतृष्ट करती है;
उसने मानो तीनों लोकोंको तृत्त एवं संतुष्ट कर दिया ।
पिता। भाई ओर पुत्र परिमित सुख देते £ूँ, परंतु पति अधीम
सुख देता हैं । अतः नारीकों सदा अपने पतिका
पूजन--आदर-सत्कार करना चाहिये । पति ही देवता ऐड
पति ही गुरु है ओर पति ही घर्म, तीर्थ एवं श्रत है एसहिये
सबकी छोड़कर एकमात्र पतिदी ही आराधना छरनी
चाहिये# |
जो दुल्लंद्धि नारी अपने पतिको त्यागकर एक्ान्तर्ों
विचरती है ( या ब्यभिचार करती है » बह उसके लोलफेओ
शयन करनेवाली कर उद्दी होती है। जो पगाये पयपरी कटा सग्प:
दइृछ्सि देखती है; यह ऐचातानी देखनेयाली ऐसी ? | हे पतियों!
छोड़कर अकेले मिठाई खाती है; बह गँगमें सेश्ररी ऐसी ९
अगवा बढ़रो होकर अरनी ही थिष्ठा सयाती है | हो परशिय
सू पहपर बोली है; बट मंगी होती ॥। ो शीत गा
कण शा ब्क
ग्प्या रखता ए। पा दुभाराणणा छोड़ी है । ही परलिती इज
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उत्सव मनाये । फिर उन्होंने नाना प्रकारके रतजटित सुन्दर
बर्खो। और बार आभूषणोंद्वारा राजोचित शप्नार करके
पार्वतीकी विभूषित किया । तलश्रात् मेनाक्रे मनोभावकों
जानकर एक सती-साध्यी ब्राद्मणपत्नीी गिरिजाकी उत्तम
पातिव्त्यकी शिक्षा दी ।
ब्राह्मणपपत्ती बोली--गिर्रिजकिशोरी ! तुम प्रेम-
पूर्वक मेस यह वचन सुनो । यह धर्मको बद़ानेवाला
इहलोक और परलोकमें भी आनन्द देनेवाला तथा श्रोताओंको
भी सुखकी प्राप्ति करानेवाला दे । संसारमें पतित्रता नारी दी
धन्य है) दूसरी नहीं | वही विशेषरूपसे पूजनीय दे । पतित्रता
सब छोगोंको पवित्र करनेबाली और समस्त पापराशिकों नष्ट
कर देनेवाली है | शिवे ! जो पतिको परसेश्वरक्के समान
मानकर प्रेमसे उसकी सेवा करती है; वह इस छोकमें सम्पूर्ण
भोगोंका उपभोग करके अन्तमें कल्याणमयी गतिको पाती है |+
सावित्री लोपामुद्रा, अरन्घती; शाण्डिली, शतरूपा, अनसूया:
लक्ष्मी) खघा; सती; संज्ञा सुमति) श्रद्धा, मेना ओर खाह्य--
ये तथा और भी बहुत-सी स्त्रियाँ साध्वी कही गयी हैं ।
यहाँ विस्तारमयसे उनका नाम नहीं लिया गया । वे अपने
पातित्रत्यके बलसे द्वी सब लोगोंकी पूजनीया तथा ब्रह्मा; विष्णु)
शिव एवं मुनीश्वरोंकी भी माननीया हो गयी हैँ | इसलिये
तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये ।
वे दीनदयाल) सबके सेवनीय ओर सत्पुरुषोंके आश्रय हैं ।
श्रुतियों और स्प्ृतियोंमें पतिब्रता-धर्मकी महान बताया गया
है । इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है; वैसा दूसरा धर्म नहीं
है--यह निश्चयपूवंक कहा जा सकता है।
पातिव्रत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाली छ्ली अपने प्रिय पतिके
मोजन कर लेनेपर ही भोजन करे । शिवे | जब पति खड़ा हो;
तब साध्वी स्लीको भी खड़ी ही रहना चाहिये । शुद्धवुद्धि-
वाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पतिके सो जानेपर सोये और
उसके जागनेसे पहले ही जग जाय । वह छल्-कपट छोड़कर
सदा उसके लिये हितकर काय ही करे । शिबे | साध्वी स््ीको
चाहिये कि जबतक वस्त्राभूषणोंसे विभूषित न हो ले तबतक
| अफा--माआानणकैमनपिःप-मप,
के नया पतनिन्रता सारी नान्या पृज्या विशेषतः ।
पावनो मर्वलोेकानां सर्वपापोधनाशिनाी ॥
सेबले या पति प्रेष्णा परमेश्वरबच्छिवे ।
श्इ भुत्तवाखिलान्मोगानन्ते पत्या शिवां गतिम ॥
( शि० पु० र० मं० पा० ख्ं० ५४ । ०-१० )
% नमो सद्राय शान््ताय ब्रह्मण परमात्मन ?
[ संक्षिप्त-शिवपुणण|
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यह अपनेको पतिकी इृश्टिके सम्मुख ने छाये | यदि पति हि
कार्यते परदेशगं गया हो तो उन दिनों उसे कंदापरि शा!
नहीं करना चादियें। पतित्रता स्री कभी पतिका नाग
&। पतिके कटठुबचन कहनेपर भी वह बदले कई छ।
ने करे। पतिक्रे श्ुल्लनेयर वह बरके सारे काय छोड
तुरंत उसके पास चली जाय ओर ह्वाथ जोड़ प्रेमते गत
झुकाकर पृछे--माथ | किसलिये इस दासीकों बुछय है
मुझे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कंपासे अनु
वीजिये !! फिर पति जो आदेश दे) उसका वह फ़
हुदयसे पालन करें। बढ घरके दरवामेपर देखक ही
रहे | दूसरेके घर ने जाय | कोई गोपनीय वात छह
हर एकके सामने उसे प्रकाशित न करें| पतिके कि
ही उसके लिये पूजन-सामग्री ख्ब जुदा दे तथा उनके
भाधनके बथोचित अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे |
आजा लिये बिना कहीं तीर्थ-यात्राके ल्यि भीव दो
लोगोंकी भीड़से भरी हुई समा या मेंठे आदिके उस
देखना बह दुरसे द्वी त्याग दे । जिस नारीकों तीयवात्
फल पानेकी इच्छा हो; उसे अपने पतिका चरणोदक (
चाहिये | उसके लिये उसीमें सारे तीर्थ और क्षेत्र हू इ
संशय नहीं हे# |
पतित्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको पस |
भोजन मानकर अहण करे और पति जो कुछ दे! उसे ४
प्रसाद मानकर शिरोधघार्य करें । देवता) पितर अति
सेवकवर्ग, गो तथा भिक्षुसमुदायके लिये अन्न
दिये बिना कदापि भोजन न करे | पातितरत-बर्मी
रहनेवाली गहदेवीको चाहिये कि वह घरकी सामग्रीकी
एवं सुरक्षित रक््खें | गहकारयमें कुशल हो। सदी #
रहे और ख्चकी ओरसे द्वाथ ख॑ंचे रहे। पतिकी ?
लिये बिना उपवास-ब्रत आदि न करें) अलग उसे उ
कोई फल नहीं मिलता और वह परलोकर्म तखगा।
होती है | पति सुखपूर्वक बैठा हो या इच्छाुताः करी
अथवा मनोसञ्ञनमें छगा हो) उस अवशस्था्मे
कार्य आ पड़े तो भी पतित्रता ख्री अपने पतिकों कया
उठाये | पति नपुंसक हो गया ही) दु्गतिम हा
हो) किसी
_रोगी हो, बूढ़ा हो) सुखी हे अथवा ईती फटा दुखी हैं!
# नीथौथिनी तु या नारी पतिपादोदक पिवेत्
सस्मिनू सवोणि वीथोनि श्षेत्राणि च ने संशय: । ।
( शि० पृ मर संठ पा० खेल ५४ | २५
रद्रसंहििता ] # मेनाकी इच्छाके अनुखार त्राह्मण-पल्लीका पावेतीकी पतित्रतधरमंका उपदेश देना के ३५०
ल्ज्ज््य््टच्च्स्य्य्ल्ल्ल््य्ल््लच्ल्््चचख्य्य्स््स्सय्य्स्स्स्स्सललल्स्स्स्र
दशा नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्लद्डन न करे |
रजखला होनेपर वह तीन राधितक पतिको अपना मुँहन दिखाये
अर्थात् उससे अलग रहे | जबतक स्नान करके शुद्ध ने हो
जाय तबतक अपनी कोई बात भी वह पतिके कार्नेमिं न पढ़ने दे । ,
अच्छी तरह स्नान करनेके पश्चात् सबसे पहले वह अपने पतिके
मुखका दर्शन करे) दूसरे किसीका मुँह कंदापि न देखें अथवा
मन-ही-मन पतिका चिन्तन करके सूर्यका दर्शन करे | पतिकी
आयु बढनेकी अभिलाषा रखनेवाली पतित्रता नारी इंल्दी;
गेली) सिन्दूर, काजल आदिः चोली) पानः मार्न्नलिक
आभूषण आदि; केशॉका सवारना; चोटी ग्रूँथना तथा हाथ-
कानके आभूषण--इन तबको अपने शरीस्से दूर न करें |
धोबिन। छिनाल या दुछटा; संन्यासिनी और भाग्यद्दीना
प्लियोंकी वह कभी अपनी सखी न बनाये । पतिसे द्वेष
रखनेवाली स्लीका वह कभी आदर न करे । कहीं
अकेली न खड़ी हो | कभी नंगी होकर न नहाये | सती
स्री ओखली, मूसल, झाड़/ सिल) जाँत ओर द्वारके
चौखटके नीचेवाली लकड़ीपर कभी न बैठे । मेैथुनकालके
सिवा ओर किसी समयमें वह पतिके सामने ध्रृष्टता न करे ।
जिस-जिस वबस्तुमें पतिकी रुचि हो; उससे वह खय॑ भी प्रेम
करे । पतिम्ता देवी सदा पतिका हिंत चाहनेवाली होती है |
तहत पतिके हृषमें हषे माने | पतिक्रे मुखपर विषादकी छाया
देख खयं भी विषादमें ट्वव जाय तथा वह प्रियतम पतिके
प्रति ऐसा बतांव करे, जिससे वह उन्हें प्यारी लगे । पुण्यात्मा
पतिप्नता प्री सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके लिये एकन्सी
रहे । अपने मनमें कभी विकार न आने दे और सदा
पेय धारण किये रे | घी, नमक) तेल आदिके समाप्त हो
जानेपर भी पतित्रता स्नी पतिसे सहसा यह न कहे कि
अमुद पस्तु नहों है । वह पतिको कष्ट या चिन्तामें न डाले ।
देवेश्वरि | पतित्रता . नारीके लिये एकमात्र पति ही ब्रह्माः
विणु ओर झिवसे भी अधिक माना यवा है। उसके लिये
अरना पति शिवरूप ही हैए । जो पतिकी आशाका उल्लशुन
पर ग्रवत और उपवास आदिके नियमका पालन करवदी हूँ;
बह पतिकी आयु एर लेती है ओर मसनेपर नरकरम जाती दँ।
णे छो पतिशे: झुछ कहनेपर छोधपूर्वक कठार उत्तर देती
* विददिष्पोहराबप... परिरेकोडपिकों. सत्र: ।
रतितशागः रेयेशि रदपह़ि: शिव एश ४३
श्र पट रतट रसर॥
है, वह गाँवमें कुतिया ओर निर्बन वनमें सियारिन होती है ।
नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बेंठे। दुष्ट पुरुषके निकट
न जाय ओर पतिसे कमी कातर वचन न॑ बोले । किसीकी
निन््दा न करे | कलहको दूरसे ही त्याग दे | गुरुजनोंके निकट
नतो उच्च खरसे बोले ओर न हैंसे | जो बाहरसे पतिको
आते देख तुरंत अन्न; जल; भोज्य बस्तु+ पान ओर वस््
आदिसे उनकी सेवा करती है; उनके दोनों चरण दबाती है;
उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतमके खेदको दूर
करनेवाले अन्यान्य उपायोंसे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है,
उसने मानो तीनों छोर्कोकी तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया।
पिता; भाई ओर पुत्र परिमित सुख देते हैं, परंतु पति असीम
सुख देता है । अतः नारीको सदा अपने पतिका
पूजन--आदर-सत्कार करना चाहिये । पति ही देवता है;
पति ही गुरु है और पति ही घर्म, तीर्थ एवं ज्रत है; इसलिये
सबकी छोड़कर एकमात्र पतिकी द्वी आराधना करनी
चाहिये# |
जो दुलुंद्धि नारी अपने पतिकों त्यागकर एकान्तमें
विचरती है ( या व्यभिचार करती है ); वह वृक्षके खोखलिमें
शयन करनेवाली क्र उद्की होती है। जो पराये पुरुषको कयक्षपूर्ण
दृष्टिसे देखती है, वह ऐँचातानी देखनेवाली होती है।जो पतिको
छोड़कर अकेले मिठाई खाती है; वह गाँवमें सूभरी होती है
अथवा बकरी होकर अपनी ही विष्ठा खाती है । जो पतिको
तू कहकर बोलती है; वह गूँगी द्ोती है। जो सीतसे सदा
ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्ययती होती है| जो पतिकी आँख
बचाकर किसी दूसरे पुरुपपर दृष्टि डालती है; बह कानीः
टेढ़े मुहचाली तथा कुरूपा दोती है । जैसे निर्जीब दारीर
तत्काल अपवित्र हो जाता है; उसी तरह पतिद्ीना नारी
भलीभॉति स्नान करनेपर भी सदा अयत्रित्र ही रहती दे |
लोकमें वह माता धन्य है। बद्द जन्मदाता पिता घनन््य है नथा
वह पति भी धन्य है; लिसके मरमें पतिमता देवी वास करती
है | पतिवरताक्ले पृण्पत्ते पिता; माता ओर पतिके कुलोंकी
् कस. के १ ओ निजी आल
* बता. दढा हुझूतोी पाधयन््एनि | !
नस हर थः हप 45.5 ्ं जल
इध्गफप्सद. परस्यिस्व पतिसेश समदत /!
"5 (दिल एप २८ आई कया इरंधा ०2४६ धरे ,
...................................छ७+धाककान५+भथ५+आव००+०१म ००० ब्ण__ नमक कवच खो चा ख खा चख चचि््यव्ल्च्य््ं््थ्थ्थ्थशश्श्य्य्य्प्््््त
२३८
तीन-तीन पीढ़ियोंके लोग खर्गलोकमें सुख भोगते द# । जो
दुराचारिणी छ्लियाँअपना शील भड्ढ कर देती है, वे अपने माता-
पिता ओर पति तीनोंके कुलोंको नीचे गिराती हैं तथा इसलोक
ओर परलोकमें भी दुःख भोगती हैं । पतिव्रताका पेर जहाँ-
जहाँ पथ्वीका स्पर्श करता है; वहाँ-वहाँकी भूमि पापद्वारिणी
तथा परम पावन बन जाती है ।[ भगवान् सूर्य) चन्द्रमा
तथा वायुदेव भी अपने-आपको पवित्र करनेके लिये दी
पतित्रताका स्पर्श करते हैं ओर किसी दृष्टिसि नहीं | जल भी
सदा पतिव्रताका स्पर्श करना चाहता है ओर उसका स्पशो
करके वह अनुभव करता है कि आज मेरी जडताका नाश
हो गया तथा आज मैं दूसरोंको पवित्र करनेबाठा बन गया |
भार्या ही णहस्थ-आशभ्रमकी जड़ हैं) भार्या ही सुखका मूल है;
भायसे ही घ॒र्मके फलकी प्राप्ति होती है तथा भार्या दी
'संतानकी बृद्धिमें कारण है ।
क्या घर-घरमें अपने रूप ओर लावण्यपर गत करनेवाली
स्त्रियाँ नहीं हैं ? परंतु पतिव्रता स्त्री तो विश्वनाथ शिवके प्रति
भक्ति होनेसे द्वी प्रात्त होती है । भायसे इस छोक और परलोक
दोनोंपर विजय पायी जा सकती है। भार्याह्दीन पुरुष देवयज्ञ:
पितृयश्ष और अतिथियश करनेका अधिकारी नहीं होता ।
वास्तवमें गहस्थ वही है; जिसके घरमें पतित्रता झत्री है।
दूसरी स्त्री तो पुरुषको उसी तरह अपना ग्रास ( भोग्य ) बनाती
है, जेसे जरावस्था एवं राक्षसी । जेसे गद्गाल्लान करनेसे
शरीर पवित्र होता है; उसी प्रकार पतित्रता सत्रीका दर्शन
करनेपर सब कुछ पावन हो जाता है॥ । पतिको ही इष्टदेव
माननेवाली सती नारी ओर गज्ञा्में कोई मेद नहीं है | पतित्रता
और उसके पतिदेव उमा ओर महेश्वरके समान हैं, अतः
... # सा धन्या जननी लोके स घन्यो जनकः पिता ।
धनन््यः स च पतिर्यस्थ गृहे देवी पतित्रता ॥
पितृवंदया मातृवंश्याः पतिवंश्यास्नयल्रयः |
पतिव्रताया: पुण्येन खगें सौख्यानि भुझते॥
... (९० पु० रु० सं० पा० खं० ५४ | ५८-५९ )
+ पतित्रतायाश्वरणी यत्र यत्र स्पशेरुवम् ।
तंत्र तत्र भवेत् सा हि पापहन्त्री सुपावनी ॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खें० ५४ । ६१)
_ भायों सूले शृहस्थस्य भायो मुरं सुखस्य च।
माया घमंफलावाप्त्मे भार्या संतानवृद्धये ॥
( शि० पु० रु० सं० पा० खं० ७४ (६४ )
५ यथा गज्ञावगाहेन शरीर पावन भवेत् ।
तथा पतिब्रतां दृष्ठा सकक पावन मवेत् ॥
>> पत ( शि० पुृ० रू० सं० पा० स्त० ५४। ६८ ;)
४ नमो रुद्भाय शान्ताय ब्रह्मण परसात्मने $
जात की क्यो >नाण-म.
पति---दोनों दम्पती घन्य ६ ।
2...
५
५४
५.५१
हि. पे
| ५ हु रे न् को है ४६ धर 8 भर फ है तक
१११७३ ०१५)११११३९३/
४ मु
हे 5 ५
६ ६.
४ पर ते हे ७ 5९'
ॉ
गिरिराजकुमारी ! इस प्रकार मेने तुमसे पतित्रताधान
वर्णन किया है। अब तुम सावधान हो आज मुझसे प्रणत्ा
पूवंक पतिब्रताके मेदोंका वर्णन सुनो। देवि ! पतिकी
नारियाँ उत्तमा आदि भेदसे चार प्रकारकी बतायी गगी ९
॥ संक्षिप्त-शिवपुराणा
विद्वान मनुष्य उन दोनोंका पूजन करें| पति प्रणव है औै
नारी वेदकी पचा; पति तप दे ओर स्री क्षमा; नारा तक
है ओर पति उसका फछ | शिवे | सती नारी और उसे
जो अपना स्मरण करनेवाले पुरुर्षोका सारण पाप है ते
हैं। उत्तमा, मध्यमा$ निकृष्ट और अतिनिक्ृश--े पर्िई
के चार भेद हैं | अब मैं इनके लक्षण बताता हूँ | थी
देकर सुनो । भद्गे ! जिसका मन सदा खम्तमें भी ओर
पतिको ही देखता है, दूसरे किसी परपुरुषको नहीं) वह है
उत्तमा या उत्तम श्रेणीकी पतित्रता कह्दी गयी है। गेल
मर कलम कलम अमन नी 3 नमक जल अलसी ज.35
# तार: पति; श्रतिनोरी क्षमा सा स स्वयं तय: !
फर्क पति: सत्क्रिया सा पन्नौ तो दम्पती कि ०5० )
हे हे
शि० पृ० र० सं० पा० खं० ५४। ४
ल् + ६. रहना
टरसंहिता !#दिव-पार्यती तथा उनकी वारातकी विदाईभगवान् शिवका सबको विदा करके केछासपर रहना # २३७
नम आस सा 3 रनफनअफअरनरनअरफर2र₹2व।ीती नीति डिक कि ड ज लट ् ओ ओ्् डड:ख ड स्अइक्अइसस__”।”_-ण“”ण/त” ली ा "35
जे दुसरे पुरुषको उत्तम बुद्धिसे पिता) भाई एवं पुत्रक्
॒मान देखती है; उसे मध्यम श्रेणीकी पतित्रता कहा गया
3 | पात्रती | जो मसनसे अपने घर्मका विचार करके
ग्रभिचार नहीं करती, सदाचारमें ही स्थित रहती है;
उसे निकृश अथवा निम्नश्रेणीकी पतित्रता कह्य गया है | जो
पतिक्रे मयसे तथा कुलमें कलड्टः छगनेके डरसे व्यभिचारसे
बचनेका प्रयत्त करती है। उसे पूर्वकालके विद्वानोंने अति-
निकृश्ठ अथवा निम्नतम कोटिकी पतित्रता बताया है | शिवे !
ये चारों प्रकारकी पतित्रताएँ समस्त लोकोंका पाप नाश करने-
वाली और उन्हें पवित्र बनानेवाली हैं। अन्रिकी सत्री अनसूया-
ने ब्रह्मा, विष्णु ओर शिव--इन तीनों देवताओंकी प्रार्थनासे
अतित्रयके प्रभावका उपभोग करके वाराहके शापसे मरे हुए.
४
५
ए
एक ब्राह्मणफो जीवित कर दिया था। शलकुमारी शिवे |
ऐसा जानकर तुम्हें नित्य प्रसन्नतापूवक पतिकी सेवा करनी
चाहिये । पतिसेवन सदा समस्त अभीष्ठ फर्कोको देनेवाला
| तुम साक्षात् जगदम्बा महेश्वरी हो और तुम्हारे पति
साक्षात् भगवान् शिव हैं। तुम्हारा तो चिन्तनमात्र करनेसे
स्त्रियाँ पतित्रता हो जायेगी | देव | यथपि तुम्हारे आगे यह
सब कहनेका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि आज लोकाचार-
का आश्रय ले मैंने तुम्हें सती-धर्मका उपदेश दिया है ।
ब्रह्माजी कहते हँ--नारद |! ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-
पत्नी शिवादेत्रीको मस्तक झुका चुप हो गयी । इस उपदेशको
सुनकर शंकरप्रिया पावंती देवीको बड़ा हषे हुआ ।
( अध्याय ५४ )
न -+»-+ 4० >०-->-ाणन>ब>न्- सिह. न. ॥०्ढन्भ+++>म४9>न+«« _अ>«»५.ऋन«+3+ 3.
शिव्र-पावेती तथा उनकी बारातक्री विदाई, भावत्रान शित्रका समत्त देवताओंकीं विदा करके
केलासपर रहना ओर पाव॑तीखण्डके श्रवणक्री महिसा
प्रह्माजी कहते है--नारद ! ब्राह्मणीने देवी पार्बतीकों
व्रतधमकी शिक्षा देनेके पश्चात् मेनाको बुलाकर कहा--
ग़रानीजी | अब अपनी पुत्रीकी यात्रा कराइये--इसे विदा
जये ।! तब “बहुत अच्छा? - कहकर वे प्रेमके वशीभूत हो
[। फिर घेयं धारण करके उन्होंने कालीको बुलाया ओर
कि वियोगके भयसे व्याकुछ हो वे वेटीको बारंबार
से लगाकर अत्यन्त उच्चखरसे रोने लगीं । फिर पार्वती भी
णाजनक बात कहती हुई जोर-जोरसे रो पड़ीं । मेना
९ शित्रा दोनों ही विरह-शोकसे पीड़ित हो मूछित हो गयीं |
तीके रोनेसे देवपत्नियाँ भी अपनी सुध-बुध खो बेठीं।
ते स्थियोँ वहों रोने छगीं। वे सब-की-सव अचेतन्सी हो
(। उस यात्राके समय परम प्रभु खाक्षात् योगीख्वर शिव
से पड़े, फिर दूसशा कौन हुप रह सकता था ? इसी झूमय
रने समस्त पुत्रों, मन्त्रियों और उत्तम ब्राह्मणोंके साथ
गरय शीम वहाँ आय पहुँचे ओर सोहटबश अरनी वच्चीको
दस्मे छूगाझर रोने छगे। प्लेटी ! तुम से छोड़कर कहाँ
्ज् जा
“ जा रे हो! ऐन्च कश्कर सोरे झगतकों सूता सानते हुए
ज्क्फ का मार निकल ६४०38 309 / किक. 8 ० कण.
स्यार बिला३ करने लगे | तव शानियर्नि सर एरोहितने
कल ए+कन्चू- दजए भ्ण ली दगयूः प रे ३398 07% पदिलादा के हक
कतार सापगरयों शपपृषत्ना अध्यात्मदेषाणं उपदेश
जे छाए पक
त न [ गज से ग्रह 5 गण शा+ दे रद +£24
' 5 ए भरा शुख र रीतिसे स्थाक्ताया । गझचीने अचक्चिष्णव-
से माता-पिता तथा गुरुकों प्रणाम किया | वे महामाया होकर
भी लोकाचारवश वास्वार रो उठती थीं । पावतीके रोनेसे
ही सब स्त्रियों रोने लगती थीं। माता मेना तो बहुत रोगी ।
भोजाइयोँ भी रोने छगीं। यही दा भाइयोंकी थी। शिवा-
की माँ? मामियाँ तथा अन्य युवतियाँ बार-चार रोदन करने
लगीं । माई ओर पिता भी प्रेम और सोहाइबद रोये
ब्रिना न रह सक्रे। उस समय ब्राह्मणनि मिलकर सबको
आदरपूर्वक समझावा ओर यह सूचित क्रिया कि यात्राक्रे
लिये यही सबसे उत्तम तथा सुखद ठप है |
तब हिमालय ओर मेनाने विवेकपूर्चक धैर्य धारण करके
शिवाक्रे बैठनेके लिये पालकी मेंगवायरीः श्ाहाणोंकी पत्नियोंने
शिवाकी उसपर चद्ाया ओर सबने मिल्कर आश्यीर्बाद दिया।
पिता-माता ओर ब्राह्मगनि सी आयनी दास कामना प्रकट को |
भना ओर दिमाल्यने पाइतीकी ऐसे-गसे सामान दिये; जो
महारानीके योग्य मे | नाना प्रकारके टर्योफी शाभ शशि भेंट
अ कर आई
ग़्या वकालत. सयुरा-का-वाभकाभपणाुव कक ्् व हि
हा का इच्रणक लिये परझ् दखण धा। पोदाने रममा
"कक छः
|
शा टन जो दर
गुठजनोंकी। मसाता-दिताझ, टू द्कन्र खाट्ममाओऋा संथा
क्-
प्न्ब
कक गे
अल मा करते: हे
है तक चर 2 है| ता कफ *य०-र ४2 सैन्उ हक ६ ् खाद्रा
ऋाजाज्यों ऋण दस्त सद्ाओा प्रण्म ऋरत पाद्ता #ऋ।
पुछासाइत होडमान ट्माचद के सनदुझ बर्यनिनल हो पोछ-
बा
| है.
न ८ प
२३८
भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्वक प्रतीक्षा कर रद्दे थ । वहाँ सब ठोग
बड़े प्रेम और आनन्दसे परस्पर मिले। उन सबने मगवान:
को . प्रणाम किया और उनकी प्रशंसा करते हुएए ने पुरीका
लोट गये ।
तदनन्तर कैलास पहुँचकर भगवान् शिवने पाय॑तीस
कहा--“देवेश्वरि | तुम सदासे ही मेरी प्राणप्रिया हो | तुम्हे
लीलापूर्वक इस वातकी याद दिला रहा हूँ | तुम्ह॑पूर्ब॑जन्मकी
बातोंका स्मरण है| अतः मेरे और अपने नित्य
सम्बन्धका यदि तुम्हें स्मरण हो तो बताओ ।? अपने प्राणनाथ
महेश्व॒की यह बात सुनकर डांकरकी नित्य प्रिया
पावंती मुस्कराती हुई बोलीं--:प्राणेश्वर ! मुझे सब बातेंका
स्मरण है, किंतु इस समय आप चुप रहिये और इस अवमरके
अनुरूप जो कार्य हो, उसीको शीघ्र पूर्ण कीजिये |
त्रह्माजी कहते है--नारद ! प्रिया पारव॑तीके सेकड़ें
सुधा-धाराओंके समान मधुर वचनको सुनकर लोकाचार-
परायण भगवान् विश्वनाथ बड़े प्रसन्न हुए | उन्होंने बहुत-सी
सामग्रियाँ एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको भाँति-
. भौतिकी मनोहर भोज्य वस्तुएं खिलायीं। इसी तरह अपने
विवाहमें पधारे हुए दूसरे लोगोंको भी भगवान् शंकरने प्रेम-
पूवक सुमधुर रससे युक्त नाना प्रकारका अन्न भोजन कराया |
भोजन करनेके पश्चात् उन सब देवताओंने नाना रत्नोंसे
विभूषित हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंके साथ आकर
प्रभु चन्द्रशेखरकी प्रणाम किया । फिर प्रिय बचमनोंद्वारा
प्रसन्नतापूवंक उनकी स्तुति एवं परिक्रमा करके शिव-विवाह-
की प्रशंसा करते हुए. वे सब लोग अपने-अपने धामको चले
गये । मुने ! साक्षात् भगवान् शिवने लोकाचारवश भगवान
विष्णुको और मुझको भी प्रणाम किया--ठीक उसी तरह, जैसे
वामनरूपधारी श्रीहरिने महर्षि कश्यपको नमस्कार किया
था। तब मैंने और श्रीविष्णुने शिवकों हृदयसे लगाकर
उनको आश्शीवांद दिया। तदनन्तर श्रीहरिने उन्हें परब्रक्म
# नमा रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन #
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परमात्मा मानकर उनकी उत्तम स्तुतिकी। इसके कहे
सद्दित भगवान, त्रिष्णु शिवसे बिंदा ले दिवाओर एि
प्रसन्नतापूषक हाथ शोद्ध उनके विवाह प्रांत ससेए
अयने उत्तम घामकोी गये | भगवान् शिव मी पार्वती के
सानन्द विद्दार करते हुए. अपने निवासभूत केयर
रहने लगे | समस्त शथित्रगणांकों इस विवाहे कह
मिला | थे अत्यन्त भक्तिपूर्वक शिवा ओर शिक्ी आए
करने लगे |
तात | इस प्रकार मैने परम मड्ढल्मव शिकीः
वर्णन क्रिया | यह शोकनाशक्र, आनन्ददायक तया पर
आयुकी ग्द्धि करनेवाला है। जो पुदष भगवान श्ति
शित्रामं मन लगाकर पत्रित्र हो प्रतिदिन इस प्रसव
अथवा नियमपूर्वक दूसरोंकों सुनाता है; वह शिवलो़ प्र
लेता दे | यह अद्भुत आख्यान कहा गया; जो मै
आवासस्थान दहै। यह सम्पूर्ण विष्नोंको शान्त के!
रोगोंका नाश करनेवाला है| इसके द्वारा खगे। गछ
तथा पुत्र और पौन्नोंकी प्राप्ति होती है। यह सम का
को पूर्ण करता इस लोकमें भोग देता और परलोकमे
प्रदान करता है| इस शुभ प्रसड्नकों सुननेसे अपमृलुकष
होता हैं और परम झान्तिकी प्राप्ति होती है। कह
दुःस्वप्नोंका नाइक तथा बुद्धि एवं विवेक आदिदा
है | अपने झुमकी इच्छा रखनेवाले छोगोंको गिर
सभी उत्सवोंमें प्रसन्नताके साथ प्रयत्वपुर्वंक इसका १6
चाहिये | यह भगवान् शिवको संतोष प्रदान करेगा
विशेषतः देवता आदिकी प्रतिष्ठाके समय तया कि
सभी कार्योक्रे प्रसड्में प्रसन्नतापूवंक इसका पाठ कल
अथवा पवित्र हो शिव-पार्वतीके इस कल्याणकारी ५
श्रवण करना चाहिये । ऐसा करनेसे समस्त कप
होते हैं । यह सत्य है; सत्य है। इसमें संशय 40
( अध्याय ९९]
--+-<६०+-++<९--.२०..-
॥ रुद्रसंहिलाका पायतीखण्ड सम्पूर्ण ॥
2 एए ०0० या “आप
रुद्रसंहिता, चत॒थे ( कुमार ) खण्ड
देवताओंद्वारा स्कन्दका शिव-पार्वतीके पास लाया जाना, उनका लाड़-प्यार, देवोंके मॉगनेपर शिवजीका
उन्हें तारक-अधके लिये खामी कार्तिकको देना, कुमारकी अध्यक्षतामें देवसेनाका प्रथान,
मही-सागर-संगमपर तारकासुरका आना ओर दोनों सेनाओंमें मुठभेड़, वीरभद्रका
तारकके साथ घोर संग्राम, पुनः श्रीहरि ओर तारकमें भयानक युद्ध
प्रन्दे बन््दनतुष्टमानसमतिग्रेमप्रियं प्रेमर्द
पूर्ण पूरणकरं प्रपूणनिखिलेश्वयेंकवार्स शिवम् ।
सत्य॑ सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रिय॑ सत्यदं
विष्णुव्रह्मनुत स्वकीयकृपयोपात्ताऊति शंकरम् ॥
वन््दना करनेसे जिनका मन प्रसन्न हो जाता हैः जिन्हें
॒ अत्यन्त प्यारा है; जो प्रेम प्रदान करनेवाले; पूर्णोनन्दमय)
कोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले; समूर्ण ऐश्रयोंके एकमात्र
वासस्थान और कल्याणखरूप हैं; सत्य जिनका श्रीविग्नह है;
सत्यमय हैँ; जिनका ऐख्वर्थ त्रिकालाबाधित है, जो' सत्यप्रिय
वे सत्य-प्रदाता हैं; ब्रह्म और विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं,
च्छानुसार शरीर धारण करनेवाले उन भगवान् शंकरकी
वन्दना करता हूँ |
भ्रीनारदजीने पूछा--देवताओंका मज्जछ करनेवाले
व | परमात्मा शिव तो सर्वसमथे हैँ । आत्माराम होकर भी
रोने जिस पुत्नकी उत्पत्तिके लिये पार्वतीके साथ विवाह किया
$ उनके बह पुत्र किस प्रकार उत्तन्न हुआ १ तथा तारका-
जा वध केसे हुआ ! ब्रह्मन् | मुझपर कृपा करके यह सारा
'तान्त पृर्णरूपसे वर्णन कीजिये ।
। एसके उत्तरमें ब्रह्मजीने कथाप्रसड्रः सुनाकर कुमारके
फासे उस ऐोने तथा कृत्तिका आदि छ; ज़ियोंके द्वारा
/पे पाले जाने; उन छट्टोंकी संतुष्टिकि लिये उनके छः मुख
/ए परने और कत्तिकाओंके द्वारा पाले जानेके कारण उनका
विविषय! मास ऐनेकी बात कही | तदसन्तर उनके झांंकर-
जि सेवामें टाये जानेदी कथा सुनायी । फिर ब्रद्मादीने
(“>भयगदान् शंबरने दुमारकों गोदमे दंठाइर अत्यन्त स्नेह
८! । देखताओंने उन्हें माना प्रकारफे पदार्थ, विद्याएँ- शक्ति
हक
7 ४६ उन्हने हृपपद व, सनपारादर कामारफो एस्मोत्ता ऐज्प
(८ तिल ५२ “5८ ध्े च्दिर् जप हैः हक ध्सों दिया | हु ्त्ि भ्य्त्- ध्ज
दिल हित एए विशार एसे घनोरर हार अधपित किणा !
साविन्नीने प्रसन्न होकर सारी सिद्धविद्याएं प्रदान कीं। मुनिश्रेष्ठ !
इस प्रकार वहाँ महोत्सव मनाया गया। सभीके मन प्रसन्न थे ।
विशेषतः शिव ओर पावंतीके आनन्दका पार नहीं था | इसी
बीच देवताओंने भगवान् शंकरसे कहा--प्रभो ! यह तारकासुर
कुमारके हाथों ही मारा जानेवाला है; इसीलिये ही यह ( पारव॑ती-
परिणय तथा कुमारोत्पत्ति आदि ) उत्तम चरित घटित हुआ
है । अतः हमलोगेकि सुखार्थ उसका काम तमाम करनेके हेतु
कुमारकी आशा दीजिये । हमलोग आज ही अख्न-गस्त्रसे
सुसज्ित होकर तारकको मारनेके लिये रण-यात्रा करेंगे |
च्रह्माजी कहते है---मुने | यह सुनकर भगवान् शंकरका
हृदय दयाद् हो गया । उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके
उसी समय तारकका वध करनेके लिये अपने पुत्र कुमारको
देवताओंकी सोप दिया | फिर तो शिवजीकी आशा मिल जाने-
पर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता एकच्र होकर गुदको आगे
करके तुरंत ही उस पर्वतसे चल दिये। उस समय अश्रीट्टरि
आदि देवताओंके मनमें पूर्ण विश्वास था ( कि ये अवश्य
तारकका वध कर डार्लेगे $ वे भगवान् शंकरके तेजसे
भावित हो कुमारक्के सेनापतित्वमें तारक॒का संद्ार करनेके
लिये ( रणक्षेत्रम ) आये । उघर महायली तारकने जब
देवताओंके इस युद्धोथ्रोगकी मुना; तब बह भी एक विश्याल
सेनाके साथ देवोंसे युद्ध करनेक्े लिये तत्काल द्वी चल पड़ा |
उसकी उस विद्याल वबाहिनीकी आती देख देवताओंकों परम
विस्मय हुआ | फिर तो वे वल्पर्वंक बारंबार सिंदनाद करने
लगे | उसी समय नुरंत ही भगवान डांकरकी ग्रेरणासे विष्णु
आह सम्एण देवताः दाआऋआकफ पत्त आदारादाएा हर ।
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५७० ४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन # | संश्षिप्त-शिवपुण
ह6.---.%-&-+-.००० ६. पका नमाहन-प७>-म्पा
ओर वे वीरोचित गर्जना करने छगे | डननी युद्ध-कामना
बलवती हो उठी ओर वे सब-के-सब कुमारवी अग्रणी बनाकर
बड़ी उतावलीके साथ मही-सागर-संगमको गये | डथर बहू
संख्यक असुरोसे घिरा हुआ वह तारक भी बहुत बड़ी सेनाके
साथ शीक्र ही वहाँ आ घमका, जहाँ वे सभी देवता खड़े थे |
उस असुरके आगमन-कालल्में प्रव्यकालीन मेघेक्रे समान गर्जना
करनेवाली रणभेरियाँ तथा अन्यान्य करक्रश शब्द करनेवाले
रणवाद्य वज रहे थे | उस समय तारकासुरके साथ आनेवाले
देत्य ताल ठोंकते हुए, गजना कर रहे ये | उनके पदाबातसे
पृथ्वी कॉप उठती थी | उस अत्यन्त भयंकर कोछाहलको मुन-
कर भी सभी देवता निर्भय ही बने रहे | वे एक साथ मिलकर
तारकासुरसे लोहा लेनेके लिये डटकर खड़े हो गये | उस समय
देवराज इन्द्र कुमारको गजराजपर ब्रेैठाकर सबसे आगे खड़े
हुए. | वे छोकपालंसि घिरे हुए थे ओर उनके साथ देवताओंडी
महती सेना थी। तत्पश्चात् कुमारने उस गजराजको तो महेन्द्र-
को ही दे दिया और बे खय॑ एक ऐसे विमानपर आरूद हुए, जो
परमाश्चयंजनक तथा नाना प्रकारके रज्ेंसे सुशोभित था | उस
समय उस विमानपर सवार होनेसे सर्वगुणसम्पन्न महायशस्वी
शंकर-पुत्र कुमार उत्कृष्ट शोभासे संयुक्त होकर सुशोभित हो
रहे थे | उनपर परम प्रकाशमान चेंवर डुलाये जा रहे थे |
इसी बीच बलामिमानी एवं महावीर देवता और देत्व क्रोघसे
विहल होकर परस्पर युद्ध करने लगे | उस समय देवताओं
और देत्योंमें बड़ा घमासान युद्ध हुआ । क्षणभरमें ही सारी
रणंभूमि रुण्ड-मुण्डोसे व्याप्त हो गयी ।
. तब महाबली तारकासुर बहुत बड़ी सेनाके साथ देवताओंसे
युद्ध करनेके लिये बेगपूर्वक आगे बढ़ा | उस रणदुर्मद तारक-
को युद्धकी कामनासे आगे बढ़ते देखकर इन्द्र आदि देवता
तुरंत ही उसके सामने आये । फिर तो दोनों सेनाओंमें महान
कोलाइल होने छगा | तलश्रात् देवों तथा असुरोंका विनाश
करनेवाला ऐसा इन्द्रयुद्ध प्रारम्भ हुआ, जिसे देखकर वीरछोग
इर्षोत्फुछ हो गये और कायरोंके मनमें भय समा गया | इसी
समय वीरभद्र कुपित होकर महावली प्रमथगर्णोंके साथ वीरा-
भिम्रानी तारकके समीप आ पहुँचे | वे बल्वाच गणनायक्
भगवान् शिवके कोपसे उत्पन्न हुए. थे, अतः समस्त देवताओं-
को पीछे करके युद्धकी अभिलाषासे तारकके सम्मुख डठ गये |
उस समय प्रमथगर्णों लथा सारे अलुर्रोके मनमें परमोछास
तन
७ छऋऋछ>##ऋ#ऋऋ-::555::::::::क्%. व
भा; अतः वे उस गद्दासमरमें परस्पर गुत्यमगुव्य हे जप
लगे | तदनन्तर वीरमद्रसे तारकका भयानक युद्ध हुआ | हैं
त्ीच अगुराकी सेना रणसे व्रिमुख हो भाग चती | इत कऋ
अपनी सेनाकी तितर-ब्रितर हुई देख उसका नायक ढ़
क्रोवसे भर गया ओर दस हजार भुजाएँ घारण करे किए
सवार हो देवगणाकी मार डालनेके लिये वेगपूर्वक तह के
झपटा | वह युद्धके मुद्ानेपर देवों तथा प्रमधगणत़े्
मारकर गिरने लगा | तब प्रमयगण्णोक्रे नेता महावर्दी #
उसके उस करमंक्रीं देखकर उसका वध करनेके टिवेक
कुपित ही उठे । फिर तो उन्होंने भगवान् शिवक्रे चणदढ
का ध्यान करके एक ऐसा श्रेष्ठ बिश्वल हायमें तथा, र*
तेजसे सारी दिल्लाएँ ओर आकाश प्रकाशित हो उठे |
अग्रसरपर महान कौतुक प्रदर्शन करनेवाले खामिकाविले!
ही वीरबाहुद्राय कहलाकर उस युद्धकों रेक्र दिया |
स्वामीकी आज्ञासे ब्रीरभद्र उस युद्धसे हट गये । वह हे
अमुर-सेनापति महात्रीर तारक कुपित हो उठा | वह बुद्ध
तथा नाना प्रकरके अल्लोंका जानकार था; अतः देवाः
ललकार-ललकरकर उनपर वार्णोकी इृश्टि करने ढगा।
समय बलवानोंमें श्रेष्ठ असुरराज तारकनें ऐसा महा का [
कि सारे देवता मिलकर भी उसका सामना ने कर पक |
भयभीत देवताओं को यों पिट्ते हुए देखकर भगवा अर
क्रोध हो आया और वे शीत ही युद्ध करनेके लिन का!
गये | उन भगवान् श्रीहरिने अपने आयुघ सुद्शवका |
शाह घनुपको लेकर युद्धखलमें महादेत्य ताकार 5४
किया | मुने | तदनन्तर सबके देखते-देखते श्र हे
तारकासुरमें अत्यन्त भयंकर एवं रोमाथकारी महाई६:
गया | इसी बीच अच्युतने कुपित होकर महाव् सिला९ हे
ओर धघकती हुई ज्वालाओंके-से प्रकाशवालें- आने *
उठाया | फिर तो श्रीहरिने उसी चक्रसे देलरान ही
प्रहार किया | उसकी चोटसे अत्यन्त व्यथित होकर दे
पृथ्वीपर गिर पड़ा | परंतु वह अछुस्नावक तीस ९
वलवान् था; अते; तुरंत ही उठकर उस देलमपवन *
क्तिसे चक्रके ठुकड़े-टुकड़े | मुने | मे
शक्तिसे चक्रके टुकड़े कर दिये | २ रन
विष्णु और तारकासुर दोनों बलवान, ये और दोनो है
बल था; अतः युद्धस्थलमें वे परस्पर जूझने लगे ।
( अधाव (*
++>+सस्श४ं--+2......
उद्संहिता | # ब्रह्माजीकी आज्ञासे ऊुमारंका युद्धफे लिये जाना) तांरकके साथ उनका भीषण संग्राम # २४६
० अल सका थ नका भीषण + ओर
व्रह्माजीकी आज्ञासे कुमारका युद्धके लिये जाना, तारकके स उन भीषण संग्राम ओर उनके
द्वारा तारकका वध, तत्पश्रात् देंबोंद्गारा कुमारका अभिनन्दन ओर स्तवन, कुमारका उन्हें
वरदान देकर केठासपर जा शिव-यात्रेतीके पास निवास करना
तब त्रह्माजीने कहा--शंकर-सुबन ख्ामी कार्तिक !
तुम तो देवाधिदेव हो | पार्बती-सुत ! विष्णु ओर तारकासुरका
यह व्यथ युद्ध शोभा नहीं दे रहा है। क्योंकि विष्णुके
हथों इस ताएकक़ी मृत्यु नहीं होगी | यह मुझसे वरदान
पाकर अत्यन्त बल्यान् हो गया है। यह मैं बिल्कुल
सत्य वात कह रहा हूँ। पावेती-नन्दन ! तुम्हारे अतिरिक्त
'इस पापीकी सारनेत्राछ्ा दूसरा कोई नहीं है; इसलिये
महाप्रभो | ठुम्हें मेरे कथनानुसार ही करना चाहिये।
परतप | तुम शीघ्र ही उस देत्यका वध करनेक्के लिये
तेयार हो जाओ; क्योंकि पार्वती-पुत्र | तारक॒का संहार
करनेके निमित्त ही तुम शंकरसे उत्तन्न हुए हो |
प्रह्माजी कहते हैं--मुने ! यों मेरा कथन सुनकर
शंकरनन्दन कुमार कार्तिक्रेय ठठाकर हँस पड़े और प्रसन्नता-
पृथक बोले--ध्तथास्तु-शेसा ही होगा !! तब महान
एश्यंशाली शंकरसुवन कुमार तारकासुरके वधका निश्चय
करके विमानते उतर पड़े ओर पेदल हो गये | जिस समय
महाबली शिव-पुत्र क्रमार अपनी अत्यन्त चमकीली शक्तिको,
जो लपटोंसे दमकती हुईं एक बड़ी उल्करा-सी जान पड़ती थीः
हाथमें लेकर पेंदलक ही दोड़ रहे थे, उस समय उनकी
अद्भुत शोमा हो रही थी | उनके मनमें तनिक भी व्याकुलता
नहीं थी । वे परम प्रचण्ड और अप्रमेय बल्झाली थे |
उन पण्मुखक्ो अपनी ओर आते देखकर तारक मुरश्रेष्ठोंसे
बोछा-- (क्या शनत्रुओंका संहर करनेवाल्ा कुमार यदी है!
में अकेला वीर इसके साथ युद्ध करूँगा ओर में ही समस्त
वीरों, प्रमथगर्णों, छोकपार्लों तथा श्रीहरिं जिनके नायक
हैं, उन देवोंको भी मार डाूँगा।?
तदनन्तर देवताओंको दुवंचन कहकर वह असुर तारक
भीपण युद्ध करने लगा | उस समय बड़ा विक्रट संग्राम
हुआ । तब झत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुमारने शिवजीक्रे
चरण-कमलोंका स्मरण करके तारकके वधका विचार किया |
फिर तो महातेजली एवं महाब॒ली कुमार रोपरावेशमें आकर
गजेना करने लगे और बहुत बड़ी सेनाके साथ युद्धके
लिये डटकर खड़े हो गये | उस समय समस्त देवताओंने
जय-जयकारका शब्द किया और देवपिंयोंने इष्ट-बाणीद्वारा
उनकी स्तुति की | तब तारक ओर कुमारका संग्राम पारम्भ
हुआ, जो अत्यन्त दुस्सह, महान् भयंकर और सम्पूर्ण
प्राणियोंकी भयभीत करनेबाद्य था | कुमार ओर तारक
दोनों ही द्क्ति-बुद्धम परम प्रवीण थे, अतः अत्यन्त
रोपवेशमें वे परस्पर एक दूसरेपर प्रहार करने छगे।
परम पराक्रमी वे दोनों नाना प्रकारके प्रैंतरे बदलते हुए.
गजना कर रहे थे और अनेक प्रकारके दाव-पेंचस एक-
दूसरेपर आव्रात कर रहे थे । उस समय देवता, गन्वर्द
ओर किनर---तभी चुपचात खड़े होकर बह दृश्य टेखने
रहे | उन्हें परम विर्य हुआ--चहाँतक कि बराय॒ुकछा चलना
बंद हो गया, सर्वक्षी ग्रमा फीड्ी पढ़ गयी और पर्दत
एवं दन-दाननोंसटित खरारी एस्ची,कोय उठी | इसी अवसस्पर
की छा
+ कक बता तक
ह्ाहणए लड़ +-कन्नक कम है १8 | छक्का इ०्ण ० 7 कशच, ४ “कक जण्णयहनयाा-नहुक, नजर हक उन-किन-नस्कन्का ये
ट्मिलय आदि परत स्नेट्ायिदस हूँ दर मारा रप्रगरः
५ <. अं ्ट्् ४ कक,
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0 का 2 5 स्तर | थक
+ 8" + ऋादू ध्थु कत हर ज्क हे का #
+ + (हणट-३४!
२७२
१६ नमो रुद्राय शाम्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ::
| संक्षिप्त-शिवषुरण
करो । तुम्हें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये |
में आज तुम सब लोगोंकी -आखोंके सामने ही इस पापीका
काम तमाम कर दूँगा ।? यों उन पवेतों तथा देवगर्णोको
ढादस बँघाकर कुमारने गिरिजा ओर अम्मुकों प्रणाग
किया तथा अपनी कान्तिमती शक्तिकी हाथम लिया । शम्भुपुन्र
कुमार महाबली तथा महान् ऐथ्रयंशाली तो थे ही । जब
उन्होंने तारकका वध करनेकी इच्छाते शक्ति हाथमें ली,
उस समय उनकी अद्भुत शोमा हुई। तदनन्तर शंकरजीके
तेजसे सम्पन्न कुमारने उस शक्तिसे तारकामुण्यर। जो
समस्त लोकोंकी कष्ट देनेवाला था; प्रहार किया | उस शक्तिके
आधपातसे तारकासुरके सभी अज्ग छिन्न-भिन्न हो गये ओर
सम्पूर्ण असुरगणोंका अधिपति वह महावीर सहसा धणशायी
हो गया। सुने | सबके देखते-देखते वहीं कुमारद्ारा
मारे गये तारकके प्राणपलेरू उड़ गये | उस उत्त्कृष्ट वीर
तारककी महासमरमें प्राणरहित होकर गिरा हुआ देखकर
वीरबर कुमारने पुन; उसपर वार नहीं किया। उस
महाबली देत्यरांज तारकके मारे जानेपर देवताओंने बहुत-
से असुरोेंकोी मौतके घाट उतार दिया | उस युद्धमें कुछ
असुरोंने भयभीत होकर हाथ जोड़ लिये, कुछके शरीर
छिन्न-भिन्न हो गये ओर हजारों देत्य मृत्युके अतिथि बन
गये | कुछ शरणार्थी देत्व अज्ञलि बाँधकर “्याहि-पाहि---
रक्षा कीजिये; रक्षा कीजिये? यों पुकारते हुए कुमारके
शरणापन्न हो गये | कुंछ मार डाले गये ओर कुछ मैदान
छोड़कर भाग गये । सहस्तों देत्य जीवनकी आशासे भागकर
पातालमें घुस गये | उन सबकी आशाएँ भग्न हो गयी थीं
ओर मुखपर दीनता छायी हुई थी ।
मुनीख्वर | इस प्रकार वह सारी देत्यसेना विनष्ट हो
गयी । देवगर्णोके भयसे कोई भी वहाँ ठहर न सका | उस
दुस॒त्मा तारकके मारे जानेपर सभी लोक निष्कण्य्क हो
गये ओर इन्द्र आदि सभी देवता आनन्दमम्न हो गये |
यों कुमारको विजयी देखकर एक साथ ही सम्पूर्ण देवताओं
तथा तिलोकीके समस्त प्राणियोंकी महान् आनन्द प्राप्
हुआ | उस समय भगवान् शंकर भी कार्तिकेयकी विजयका
समाचार पाकर प्रसन्नतासे भर गये ओर पार्व॑तीजीके साथ
ग्णोसे घिरे हुए. वहाँ पधारे | तब जिनके छृदयमें स्नेह
समाता नहीं था; वे पावतीजी परम प्रेमपूर्वक सूर्यके समान
तेजखी अपने पुत्र कुमारकों अपनी गोदमें लेकर छाड़-
प्झ्ख्ल्चय््य्य्य््ख््य्स््््ल्चख्च्च्स्ख्च्य्च्ख््च्य्स्य्यस्चस्न्स्स्न्म्य्स्स्स्य्प्य्य्य्य्य्य््स्स्ल्लल्ल्ज"-- एन" >ससरभणरनम करा इक
प्यार करने छगीं। उसी अव्सरपर आपने पुत्रसि कि ह
हिमालयने बन्धुलान्त्रों तथा अनुयाय्रियोक्रे साथ श्रम
शम्भु) पावेती और गुहका स्तबन किया | तलश्रात का
देवगण, मुनि) सिद्ध - और चारणोंने शिवननदन का
आम्भु ओर परम प्रसन्न हुई पार्वतीकी स्तुतिढी।#
समय उपदेयोनेि बहुत बड़ी पुप्य-र्पा की | समे प्र
बजे बजने लगे। विशेवरूपसे जयकार ओर ना
शब्द बारंबार उच्चख्वस्से गूँजने छगे। उस समय कर
एक महान विजयोत्सवं मनाया गया। जिसमें क्री
विशेषता थी ओर वह स्थान गाने-बजनेके शब्द ह
अधिकाधिक ब्रह्मत्रोपसे व्याप्त था | मुने | समस्त देवाओं
प्रसन्नतापृवेंक गा-बजाकर तथा हाथ जोड़का भा
जगन्नाथक्री स्तुति की | तलश्रात् सबसे प्रश॑तित हा
अपने गर्णसे बिरे हुए भगव्रान् रूद्र जगजननी मरी
साथ अपने निव्रासखान कछास परवतकों चले गये |
इधर तार्ककों मारा गया देखकर सभी देखा
तथा अन्य समस्त प्राणियोंक्रे चेहरेपर हंसी खेलने छा
वे भक्तियूर्वक शंक्र-सुचन कुमारकी खुति करे छो-
'देव | तुम दानवश्रेष्ठ तारकका हनन करनेवाले हे हर
नमस्कार है | दांकर-नन््दन ! तुम बाणामुरके प्रात आह
करनेवाले तथा प्रलम्बासुरके विनाशक हो | तुम्हाप ही!
परम पवित्र है, तुम्हें हमारा अभिवादन है|
चह्माजी कहते हँ---पुने | जब विष्णु आदि देवता!
इस प्रकार कुमारका स्तवन क्रिया। तब उन:
देवोंको क्रमशः नया-नया वर प्रदान किया। की
पर्वतोंको स्तुति करते देखकर वे शंकर-तनय पसर्ख
हुए और उन्हें वर देते हुए बोले ।
स्कन्दने कहा--भूघरो ! तुम सभी पंत तपतिएई'
पूजनीय तथा कर्मठ और ज्ञानियोंके लिये सेवनीय ह
ये जो मेरे मातामह ( नाना ) पर्वतश्रेष्ठ हिबारिर
महाभाग आजसे तपस्वियोंके लिये फलदाता होगे। |
तब देवता बोले--कुमार ! यों अठु॒ए्णा की
मारकर तथा देवोंको वर प्रदान करके ठमने
तथा चराचर जगत्को सुखी कर दिया । भरे '
प्रसन्नतापूर्वक्क अपने माता-पिता पावती ओर कक
करनेके लिये शिवके निवासभूत कैछांसपर पी
कप रपाल पद,
रुद्रसंहिता ] # शिवाका अपनी मैलसे गणेशको उत्पन्न करके द्धारपालू-पद्पर नियुक्त करना $:
शछ३
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त्रह्माजी कहते है---सुने ! तदनन्तर सब देवताओंके
साथ विमानपर चढ़कर कुमार स्कन्द शिवजीके समीप
केलास पहुँच गये | उस समय शिव-शिवाने बड़ा आनन्द
मनाया । देवताओंने शिवजीकी स्व॒ति की | शिवजीने उन्हें
वरदान तथा अमयदान देकर विदा किया | मुने | उस
अवसरपर देवताओंको परम आनन्द प्राप्त हुआ। थे शिव:
पार्वती तथा शंकरनन्दन कुमारके रमणीय यशका बखान
करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये | इधर परमेश्वर
शिव भी शिवा) कुमार तथा गरणेके साथ आनन्दपूर्वक
उत्त पव॑तपर निवास करने छगे। मुने [| इस प्रकार जो
शिव-भक्तिसे ओतप्रोत; सुखदायक एवं दिव्य है; कुमारका
वह सारा चरित्र मेने तुमसे वर्णन कर दिया; अब और
क्या सुनना चाहते हो ! ( अध्याय ९--१२ )
*+++०<छकब्प्रआ%)- ब्रक्ले.+
शिवाका अपनी मेलसे गणेशकों उत्पन्न करके द्वारपाल-पदपर नियुक्त करना, गणेशद्वारा शिवजी-
के रोके जानेपर उनका शिवगर्णोके साथ भयंकर संग्राम, शिवजीद्वारा गणेशका शिरब्छेदन,
कुपित हुई शिवाका शक्तियोंकों उत्पन्न करना ओर उनके द्वारा प्रढय मचाया जाना,
देवताओं और ऋषियोंका स्तवनढ्वारा पावेतीको प्रसन्न करना, उनके द्वारा
पत्रको जिलाये जानेकी बात कही जानेपर शिवजीके आज्ञानुसार
हाथीका सिर लाया जाना ओर उसे गणेशके घड़से
जोड़कर उन्हें जीवित करना
खतजी कहते एँ--ताखारि कुमारके उत्तम एवं अद्भुत
[सान्तकी सुनकर नारदजीको बढ़ी प्रसन्नता हुई । उन्हेंनि पुनः
4मपृ्क प्रच्माजीसे पूछा ।
नारदजी बोले--देवदेव ! आप तो शिवसम्बन्धी ज्ञानके
भगाए सागर एू । प्रजानाथ | मैंने स्वामी कातिकके सदद्भत्तान्त-
3) जो अमृतसे भी उत्तम हैं; सुन लिया। अब सणेशका उचम
4 मुनना चाहता एूँ। आप उनका जन््म-इत्तान्त तथा
ध्य चरितः सो सम््भ मप्लोंफे लिये भी मइलूखरूप ऐै:
न्ज 7५
कक" किक ् हा कप सारटदा न्यादी ५०-०० न 23॥ "का ऋण वीजा
खतज्ञा पहते है-मटासान नासददा छल्म दच्न
सुनकर ब्रह्माजीका मन हर्पसे गद्वद हो गया | वे शिवजीका
स्मरण करके बोले |
च्रह्माजीने कहा--नारद ! पहले जो मैंने विधिएृर्थक
गणेद्की उसत्तिका वणन किया था कि शनिकी दृष्टि वडनेसे
गणेशका मस्तक कट गया था। तव उसपर द्वाथीदा मुख छगा
दिया गया था। बह छत्यान्ररदी कथा है ! क्षत्र स्वेनसक्पमों
बढित हुई गग्नेशक्री उन््मन्कयाझ्ा वर्णन करता हूँ, झिसमसें
झपाद शंकरने ही उनका मस्तक काट लिया था | मनसे ! इस
छ कक
- ०० ५ लक कक
नल टीइ, किशन कुल कश्य्ाजा न्द्शा सस्सा बा बु ्स्कशकना अमन््के ही ६: अहक ८ 35 ह 2 88% |
दपयन डुनछए भर नहा छरना चाझयदा सेयाक भागय
8 लक दल्टा“ मारा अत मी व लललकप आन जे हल्.. बी ७२० कर जल कफ याक- फ् न
गुरणज इपल्डाशरारा: साएशलं आर मे जि ४७ #ज कल; आय कर
ज्न्प्क दृ जे चर [ रे जै अर रे
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२४४ ४४ नमो रुद्राय शान्ताय शअह्मणे परमात्मने 5 [ संक्षित्त-शिवपुणणाए
सगुण ओर निगंण भी हैँ। उन्हींकी लीलासे सारे विश्वकी .. -_.#0ै85 र् का | (4 “ 222 ।
रे हा
खष्टि, रक्षा ओर बिनाश होता है | मुनिश्रेष्ट | अब प्रस्तुत 27 हर ॥! ५
विषयको आदरूर्वक श्रवण करो |
एक समय पार्वतीजीकी जया-विजया नामवाली सख्ियों
उनके पास आकर विचार करने लछगीं--'सखी | सभी गण
रुद्रके ही हैं | नन््दी; भज्जी आदि जो हमारे हैं; वे भी शिवके
ही आज्ञापालनमें ततर रहते हैँ | जो असंख्य प्रमथगण हैं;
उनमें भी हमारा कोई नहीं है | वे सभी शिवाज्ञापरायण होकर
द्वासर खड़े रहते हैं । यद्यपि वे सभी हमारे भी हैं, तथापि
उनसे हमारा मन नहीं मिलता। अतः पापरहिते | आपको
मी हमारे लिये एक गणकी रचना करनी चाहिये ।!
त्रह्माजी कहते है--मुने | जब सखियोंने पार्वतीजीसे
ऐसा. सुन्दर वचन कहा; तब उन्होंने उसे हितकारक माना
ओऔर बेंसा करनेका विचार भी किया | तदनन्तर किसी समय
जब पावंतीजी स्नान कर रही थीं; तब सदाशिव नन््दीको डरा-
धमकाकर घंरके मीतर चले आये । शंकरजीकी आते देखकर
स्नान करती हुईं जगज्जननी पाती उठकर खड़ी हो गर्यीं |
उस समय उनको बड़ी लज्जा आयी | वे आश्चयंचकित हो
गयीं | उस अवत्तरपर उन्होंने सखियोंके वचनको हितकारक तथा
सुखप्रद माना | उस समय ऐसी घटना घटित होनेपर परमाया
परमेश्वरी शिवपत्नी पाबतीने मनमें ऐसा विचार किया कि
मेरा कोई एक ऐसा सेवक होना चाहिये, जो परम शुभ:
कार्यकुशल ओर मेरी ही आज्ञामें तत्यर रहनेवाला हो; उससे
तनिक भी विचलित होनेवाला न हो । यों विचारकर पार्वती
देवीने अपने शरीरकी मेलसे एक ऐसे चेतन पुरुषका निर्माण
किया; जो सम्पूर्ण झुभलक्षणोंसे संयुक्त था | उसके समी अज्भ
सुन्दर एवं दोषरहित थे। उसका वह शरीर विश्ञाल, परम
शोभायमान और महान् बलू-पराक्रमसे सम्पन्न था । देवीने उसे
अनेक प्रकारके वस्त्र: नाना प्रकारके आभूषण और बहुत-सा
उत्तम आशीवोद देकर कह्य--तुम मेरे पुत्र हो। मेरे अपने
ही हो । तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है |
पीवेतीके ऐसा कहनेपर वह पुरुष उन्हें नमस्कार करके बोला |
: < शणेशने कहा--माँ |! आज आपको कौन-सा कार्य आ
पड़ा है १ मैं आपके कथनानुसार उसे पूर्ण करूँगा |? गणेशके
पूछनेपर पावंतीजी अपने पुत्रकों उत्तर देते हुए बोलीं |
॥|
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| ॥।
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# १ १ बे गा हे पर 25 ] । |
!है ह कि है" मा > ड न |
शिवाने कहा--तात ! तुम मेरे पुत्र हो) मेरे आ
हो | अतः तुम मेरी बात सुनो | आजसे तुम मेरे धर
हो जाओ। सत्पुत्र ! मेरी आज्ञाके बिना कोई भी हू
मेरे महलके भीतर प्रवेश न कंरने पाये; चाहे वह कहते '
आये; कोई भी हो।वबेय | यह मैंने तुमसे बिल्कुल तल है
कही है|
प्रह्माजी कहते हैँ--मुने | यों कहकर पार्वतीने गो
के हाथमें एक सुदद॒ छड़ी दे दी | उस समय उनके ई
रूपको निहारकर पार्वती हर्षमम्म हो गयीं । उन्होंने पस मे
पूर्वक अपने पुत्रका सुख चूमा और कृपापखश हो
लगा लिया | फिर दण्डधारी गणराजकी अपने हार
कर दिया। बेटा नारद | तदनन्तर पावतीनत्दन
गणेश पार्वतीकी हितकामनासे हाथमें छड़ी लेकर रह
पहरा देने छंगे | उधर शिवा अपने पुत्र गणेशकी
दरवाजेपर नियुक्त करके ख्यं सखियोंके साथ ली *
लगी | मुनिश्रेष्ठ | इसी समय भगवान् शिव) जो परत कप
तथा नाना प्रकारकी लीलाएँ रचनेमें निपुण है द्वार *
पहुँचे | गणेश उन पाब॑तीपतिको पहचानते तो ये हें)
बोल उठे--:देव | माताकी आज्ञाके बिना ठ॒म
न जाओ | माता स्नान करने बैठ गयी हैं । ठुम कं
हृद्गसंहिता ]
बाहते हो ? इस समय यहाँसे हट जाओ !? यों कहकर गणेश-
ने उन्हें रोकनेक्रे लिये छड़ी हाथ ले ली। उन्हें ऐसा करते
देख शिवजी बोले--'मूर्ख | तू किसे रोक रहा है ! दुर्बुदे |
क्या तू मुझे नहीं जानता ? मैं शिवक्े अतिरिक्त और
कोई नहीं हूँ |?
फिर महेद्ंबरके गण डसे समझ।कर हटानेके
लिये वहोँ आये और गणेशसे बोले--सुनो, हम मुख्य
दिवगण ही द्वारपाल हैं ओर- स्वब्यपी भगवान शंकरकी
आज्ञाप्ते तुम्हें इटनेके लिये यहाँ आये हैं | तुम्हें भी गण
पमझकर हमछोगोंने मारा नहीं है, अन्यथा तुम कबके
मारे गये होते | अब कुशल इसीमें है कि तुम खतः ही
(दूर हट जाओ । क्यों व्यर्थ अपनी मृत्यु बुला रहे हो !
._ अह्याजी कहते हैँ--मुने | यों कहे जानेपर भी
धमाल नन््दन गणेश नि्भग्र ही बने रहे । उन्होंने शिवग्णोंको
डिक ओर दरबाजेको नहीं छोड़ा | तव॒ उन सभी शिच-
ने शिवजीके पास जाकर सारा चृत्तान्त उन्हें सुनाया ।
ने ! उनसे सब बातें सुनकर संसारके गतिस्वरूप अद्भुतलीला-
हारी महेश्वर अपने उन गणोंक्ो डाँटकर कहने लगे |
महेश्वरने कहा/--“गणों ! यह कौन है; जो इतना
न्हूडूल होकर झनरुक्की भाँति बक रहा है ! इस नवीन
रिपालको दूर भगा दो । तुमछोग नपुंसककी तरह खड़े
करे उसका जृत्तान्त मुझे क्यों सुना रहे हो ।! विचित्र लीछा
पनेवाले अपने स्वामी शंकरके यों कहनेपर वे गण पुनः
ऐं लौट आये । तदनन्तर गणेशद्वारा पुनः रोके जानेपर
जीने गर्णोकी आज्ञा दी कि व्तुम पता लगाओ, यह कौन
/और क्यों ऐसा बार रहा है ? गणेने पता लगाकर
या के प्ये धीगिरिजाके पुत्र हैं तथा दवारपालके रुपमें
(० है ।! तब हीलारूप झंकरने विचित्र लीला करनी चाद्टी
न 5 गर्षोदा गेय ५ चः इसलिये
“5 भरने सर्येद्ा गये भी गलित कराना चाहा | इसलि
मम कक सर ४." ० नि
“अप तथा देवताओंकी बुल्मकर गणेशजीसे भीयण युद्ध
प्राण) पर
++ ५५ ५ का दर को से रे
5 योर भी गषेशनों पराद्धित म दर सके ।
० बे ++-
! नह गा कम कर पक हट । श्जीने नमी व लिली आम
जल खाइशाण सहधर जाये । गगेशाड़ीने मातादे:
३: पक पानत्एा रि
एस सत्य दिए तय शणिने उन्हें बल
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देव शिवडीद्ध पक्षम आा गये:
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6 7 0 +०७३ ३८७७७०१३॥७ ४ ]0 5 जाकर प॑दिशाए-
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४ गणेशद्वारा शिवजीके रोके जानेपर उनका शिवगर्णाके साथ भयंकर संग्राम *
से गणेशजीका सिर काठ दिया | जब यह समाचार पार्बतीजी-
की मिला) तब वे क्रुद्ध हो गयीं ओर बहुत-सी शाक्तियोंको
उत्पन्न करके उन्होंने विना बिचारे उन्हें प्रठय करनेकी आशा
दे दी | फिर तो शक्तियोंके द्वारा प्रछव मचायी जाने लगी |
उन शक्तियोंका बह जाज्वल्यमान तेज सभी दिद्याओंकों दग्घ-
सा किये डालता था। उसे देखकर वे सभी शिवगण भयभीत
हो गये और मागकर दूर जा खड़े हुए ।
मुने | इसी समय तम दिव्यदर्शन नारद वहाँ आ पहुँचे |
तुम्दारा वहाँ आनेका अभिप्राय देवग्णोंको सुख पहुँचाना था ।
तब तुमने मुझ्न देवताओंसद्ित झंकरको प्रणाम करने कटा
कि इस विपयर्म सबको मिलकर विचार करना चाहिय | तथ
वे समी देवता ठुझ् महामनाके साथ सलाह करने लगे कि
इस दुःखका शमन केसे हो सकता है | सिर उन्होंने यही
निश्चय किया कि जबतक गिरिजादेवी कृपा नहीं करेंगी, तद
तक सुख नहीं प्राव हो सक्रेगा। अब इस विपयगे और
विचार करना व्यय है । ऐसी धारणा करके सम्दोर सहित
सभी देवता और ऋषि सगयठी शिवाफ़रे निझंद शये ओर
मल 2 £2+7:- आर स्ट ४ प्रसक् ये
छाप शान्तिद लिये उर्में प्रनक्ष इसने हरे |
382 पक च्य
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७ |जआण) पर का पम्प
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पृ दा ड्न्ट् आरा रस श्रार उरसेद! सांद्ाद्वारा सदा 228 8६
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जे /४ नमो रद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5: [ संश्षित्त-शिवरपुणा
नलल्सस्स्ल्स्स्ल्स््य्य्य्य्ल्स्य्ल्ल्य्य्य्य्स्य्स्य्य्य्य्स्सय्य्स्स्स्न्न्स्स्स्स्ल्लल्न्न्ल्ल्ल्ल्स्च्च्च््च्
शिवपत्नि | तुम्हें प्रभाभ है । चण्डिके | तुर्म्ह हमाण
अभियादन प्राप्त हो। कब्याणि | तुम्हें बारंबार प्रणाम दै।
अम्बे | तुम्दीं आदिशक्ति हो । त॒म्हीं सदा सारी सश्टिकी
निर्माणकरत्नीं) पालिकाशक्ति और संहार करनेवाली हो।
देवेशि | तुम्होरे कोपसे सारी भ्रिछोकी विकल हो रही है,
अतः अब प्रसन्न हो जाओ और क्रोधको श्ान्त करो | देवि |
हमलोग तुम्हारे चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ।
ब्रह्माजी कहते है--नारद ! यों नारद आदि ऋियों-
द्वारा स्तुति किये जानेपर भी परादेवी पार्बतीने उनकी ओर
क्रोधमरी दृश्सि ही देखा; किंतु कुछ कहा नहीं । तब उन
ऋषियोंने पुनः उनके चरणकमलोंमें सिर झुकाया ओर भक्ति-
पूर्वक हाथ जोड़कर पावतीजीसें निवेदन किया ।
प्षियोंने कहा-देवि ! अभी रुँह्रार होना
चाहता है; अतः क्षमा करो; क्षमा करो । अम्बिके ! तुम्हारे
स्वामी शिव भी तो यहीं स्थित हैं; तनिक उनकी ओर तो
दृष्टिपात करो । हमलोग) ये ब्रह्मा विष्णु आदि देवता तथा
सारी प्रजा--सब तुम्हारे ही हैं ओर व्याकुल होकर अज्ञलि
बँघे तुम्हांर सामने खड़े हैं । परमेश्वरि ! इन सबका
अपराध क्षमा करो । शिवे | अब इन्हें शान्ति प्रदान करो। .
ब्रह्माजी कहते है--8ने ! सभी देवर्षि यों कहकर
अत्यन्त दीनभावसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर चण्डिकाके
सम्मुख खड़े हो गये | उनका ऐसा कथन सुनकर चण्डिका
प्रसन्न हो गयीं । उनके हृृदयमें करुणाक्रा संचार हो आया।
तब वे ऋषियोंसे बोलीं |
देवीने कहा--ऋषियो ! यदि मेरा पुत्र जीवित हो
जाय और वह तुमलोगोंके मध्य पूजनीय मान लिया जाय तो
संहार नहीं होगा | जब तुमलोग उसे ध्सर्वाध्यक्षःका पद् प्रदान
कर दोगे तमी लोकमें शान्ति हो सकती है, अन्यथा तुम्हें
सुख नहीं प्राप्त हो सकद्रा ।
ब्रह्माजी कहते हैं--मुने | पावतीके यों कहनेपर तुम
संभी ऋषियोंने उन देवताओंके पास आकर सारा चृत्तान्त
कह सुनाया । उसे सुनकर इन्द्र आदि समी देवताओंके चेहरे-
पर उदासी छा गयी । वे शंकरजीके पास गये और हाथ
जोड़कर उनके चरणोंमें नमस्क्रार करके सारा समाचार
निवेदन कर दिया । देवताओंका कथन सुनकर शिवजीने
कहा--“ठीक है, जिस प्रकार सारी त्रिलोकीको सुख मिल
सके) वही करना चाहिये | अतः अब उत्तर दिशाकी ओर
जाना चाहिये और जो जीव पहले मिले, उसका सिर काटकर
उस बालकके शरीरपर जोड़ देना चाहिये |?
त्रह्माजी कहते हैं--मुने | तदनन्तर शिवजीकी आशञा-
पालन करनंबाले उन देवताओंने वह सारा कार्य सम्पन्न
किया । उन्होंने उस शिश्यु-शरीरकों धोठिकर विवि
उसकी पृजा की | फिर वे उत्तर दिश्वाकी ओर गये | झ्लँ
उन्हें पहलि-पहलछ एक दातवबाल्ा एक हाथी मिला | उहँ
उसका सिर छाकर उस शारीरपर जोड़ दिया | हाथीजे ले
सिरको संयुक्त कर देनेके पश्चात् सभी देवताओंने मार
शिव आदिकों प्रणाम करके कहां कि हमलोगनि का
क्राम पूरा कर दिया | अब जो करना शेप है; उसे भाक्ले
पूर्ण करें | |
त्रह्माजी कहते हँ--तब शणिवाज्ञायात्नमर्माः
देवताओंकी बात सुनकर सभी देवों ओर पार्षदोंक्ी म
आनन्द हुआ | तलश्वात् ब्रह्मा, विष्णु आदि उमी हे
अपने स्वामी निर्गुणस्वरूप भगवान् शंकरकों प्रणाम #
बोले--धस्वामिन | आप महात्माके जिस तेजसे हम
उसन्न हुए हैं; आपका वही तेज वेदमन्त्रके अफ्नि
इस बालकम प्रवेश करे |? इस प्रकार सभी देवता
मिलकर वेदमन्त्रद्वारा जलको अभिमन्त्रित क्रिया) फि शि
का स्मरण करके उस उत्तम जलको वालकके शरीसपर हि
दिया | उस जलका स्पर्श होते ही वह बालक शिवेद
शीघ्र ही चेतनायुक्त होकर जीवित हो गया ओर सेगे हुए
तरह उठ ब्रैंठा ) बह सोमाग्यशाली वालक अब ६
हा! ॥
ह 2८ । पक
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२2 दल
7227 कक कर 0)
2222 “2 ८2 '<££ कि 8
कप न्पफ को प 2 . प
: रुद्रसंहिता |
६ पार्वतीद्वारा गणेशजीकों चरदान; देवोद्वारा उन्हें अग्नपूज्य माना जाना 5:
२४७
' था। उसका मुख हाथीका-सा था । शरोरका रंग हरा
' छाल था | चेहरेपर प्रसन्नता खेल रही थी | उसकी आइझति
क्मनीय थी ओर उसकी सुन्दर प्रमा फेल रही थी।
/ मुनीस्यर ! पायतीनन्दन उस बालककी जीवित देखकर वहाँ
उपस्थित सभी लोग आनन्दमग्न हो गये ओर. सारा दुःख
विलीन हो गया | तब हृष-विभोर होकर सभी लोगोंने उस
बालकको पावतीजीको दिखाया | अपने पुत्रको जीवित देखकर
पावेतीजी परम प्रसन्न हुईं । ( अध्याय १३--१८ )
+-+--+ 75७9 *2८२-----
” आय.
पावतीद्वारा गणेशजीको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्ष-
पद प्रदान ओर गणेश-चतुर्थीत्रतका वर्णन, तत्पथात् सभी देवताओंका
उनकी स्तुति करके हर्पपूवक अपने-अपने खानको छोट जाना
ब्रह्माजी कहते हँ--म्ुने ) जब विकृत खल्रूपवाले
गिरिजा-पुत्र॒गजानन व्यग्रतारहित होकर जीवित हो उठे;
तब्र गगनायक देवोने उनका अभिषेक किया । अपने पुत्रको
देखकर पावतीदेवी आनन्दमरन हो गयीं ओर उन्होंने हर्पातिरिक-
से उस ब.ल्कको दोनों हाथथोंस पकड़कर छातीसे लगा लिया ।
फिर अम्बिकाने प्रसन्न होकर अपने पुत्र गणेशकों अनेक
प्रकारके वस्र ओर आभूषण प्रदान किये | तदनन्तर सिद्धियोंने
अनेकी विधि-विधानसे उनका पूजन किया ओर माताने अपने
सवदुःखहारी हाथसे उनके अड्जॉका स्पर्श किया | इस प्रकार
शित्र पत्नी पावतीदेवीने अपने पुत्रका सत्कार करके उसका
मुख चूम। ओर प्रेमपूर्वक्क उसे वरदान देते हुए. कहा--
पेय ] इस समय तुझे बढ़ा कष्ट झेलना पड़ा है | किंतु
बतऊतकृत्य हो गया है। तू घन्य है | अबसे सम्पूर्ण
देपताशोंमें तेरी अग्रपृजा होती रहेगी और तुझे कभी दःखका
पमन। नहा करना पड़ेगा । चूँकि इस समय तेरे मुखपर
पिन्यूर दी व रष्टा है, इसल्यि मनुप्योंफी सदा सिन्दरसे तेरी
| रण परना नाटिये। जो मनुष्य पुप्त। चन्दन, सुन्दर गनन्वः
दा
मन सम
। ४ ए जायगे--एनमे ऐेशमात्र भी संगाव नहीं है |
प्रदायक परस ह--मुने ! मोधरी देदीने झपन एन्र
धर
पा कण बकरे बिक) ञ्क
के. जी है चाजा झरारणा गण्ता दास ओआभरदा
कक । जल 45 व बैक आधा 5. | काम! 4. | न अक
| > ०४] (४६१६०५१ ५ 44-थ | पे
३
दम
ध, जड ब ध
॥ | ऋतु कर
ह गमस्तार करके विधिवृर्वक तेरी पूजा करेगा; उसे सारी
मिद्धियों एसगव हो जागेंगी और उसके सभी प्रकासके विष्न
था आ का
शिरिडारी
पक
जा 3.। अ्शकुस्म्आा ह. 4
| न
शान्त हो गया । तदनन्तर इन्द्र आदि देवताअंनि हर्पातिरेक्ते
शिवाकी स्तुति की ओर उन्हें प्रसन्न करके वे भक्तिभावित
चित्तते गणेशदेवकी लेकर शिवद्जीके समीप चले । वहाँ
पहुँचकर उन्होंने त्रिलोकीकी वल्थाण-कामनासे भवानीक्े
उस बारूकको शिवजीकी गोदमें वठा दिया । तब शिवजी
भी उस बालकके मस्तकपर अपना करकमल फेरते हुए
देवताअंसे बोले--ध्यह मेरा दूसरा पुत्र है| ततश्रात्
गेणेशने भी उठकर शिवजीके चरणोंमें अभिवादन किया ।
फिर पावतीकी। मुझको, विप्णुकों ओर नारद आदि सभी
ऋषियोको प्रणाम करके आगे खड़े होकर उन्होंने कहा---
“यो अमिसान करना मनुप्योंका स्वभाव ही है;
आपलोग मेरा अपराध क्षमा करें |? तत्र मैं; शंकर और
विष्णु--इन तीनों देवताओंने एक साथ ही ये मपृवक उन्हें
उत्तम वर प्रदान करते हुए कद्ा--भ्सुखरो | ज्षस प्रिात्रीमें
हम तीनों देवोंकी पृजा होती दे, उसी तरह तुम सबयों इन
गणशका भी पूजन करना चाहिये । सनुप्योत्रा चाहिये कि
पहले इनकी पूजा करके तसश्वात् हमलोगोंका पजन करें |
ऐसा करनेसे हमलंगोंकी पृज्ा सम्पन्न हे! जागगी | देवगणो।
अतः
यदि >अर्जी। ध्नयी दादा उर्जा पट + # ह इटा ल्यन्य प्यद्ा पुनन
किया गया तो उस पृझमका एल नष्ट है! जायगा--उस्में
अन्यथा विचार करनेकी आवश्यक नहीं ह |
कक ध्बी
द्रान कई जि [ >> जा] क््जे कल ध्यू कट किक किम्मा आई कक द
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शिवजीने कहा--गिरिजानन्दन | निस्संदेह में तुझपर
परम प्रसन्न हूँ । मेरे प्रसन्न हो जानेपर अब तू सारे जगतको
ही प्रसन्न हुआ समझ । अब कोई भी तेरा विरोध नहीं कर
सकता | तू शक्तिका पुत्र है? अतः अत्यन्त तेजखी है ।
बालक होनेपर भी तूने महान् पराक्रम प्रकट किया है
इसलिये तू सदा सुखी रहेगा । विश्वनाशके का्यमें तेरा नाम
सबसे श्रेष्ठ होगा | तू सबका पूज्य है; अतः अब मेरे
सम्पूर्ण गणोंका अध्यक्ष हो जा।
इतना कहनेके पश्चात् महात्मा शंकर अत्यन्त प्रसन्नताके
कारण गणेशको पुनः वरदान देते हुए बोले--
धशणेश्वर ! तू भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी
तिथिको चन्द्रमाका शुभोदय होनेपर उत्पन्न हुआ है ।
जिस समय गिरिजाके सुन्दर चित्तसे तेरा रूप प्रकट हुआ;
उस समय सात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था । इसलिये
उसी दिनसे आरम्म करके उसी तिथिमें तेरा उत्तम ब्रत
- करना चाहिये | वह ब्रत परम शोमन तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका
प्रदाता है | वर्षके अन्तमें जब पुनः बही चतुर्थी आ
जाय+ तबतक मेरे कथनानुसार तेरे ब्रतका पालन करना
चाहिये । जिन्हें संसारमें अनेकों प्रकारके अनुपम सुखोंकी
कामना हो, उन्हें चतु॒र्थीके दिन भक्तिपूर्वक विधिसहित
तेरा पृजन करना चादिये | जब मार्गशीप मासके दृणाह्
चतुर्थी आये) तब्र उस दिन प्रातःकाल स्तान करे क्र
लिये बआह्णसि निवेदन करे | पर्वोक्त विधिसे उपबात हो |
फिर आातुकी। मेँगेकी। श्वेत मंदास्की अब ऑ
मूर्ति बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ा करे और मंक्षिक
नाना प्रकारके दिव्य गन्वों। चन्दनों ओर पुण्णोते कई
पूजा करें | पुनः रात्रिका प्रथम प्रहर बीत बेर
करके दूवदिलोंसे पूजत करना चाहिये। यह दूरवा कि
बारह अंगुल लम्बी और तीन गॉठॉबाजी होनी चा्ठि|
ऐसी एक सी एक अथवा इक्कीस दूवते उम्र सा
प्रतिमाक्की पूजा करे। तटश्रात् घूष, दीफ ओर कं
नैवेद्य) ताम्बूछ। अ्ध्य॑ और उत्तम-उत्ता पर्याक्
गणेशकी पृजा करे और सतबन करके उसके आगे प्र
करें | यों गणेशकी पूजा करनेके पश्चात् बहका
पूजन करें| तलश्रात् हर्पपूर्वक आह्णोंकी पूजा कई 5
मिष्ठज्षका भोजन कराये | उनके भोजन कर लेने ः
खयय भी नमकरद्दित मिश्नका ही प्रसाद पाये | कि गई
स्मरण करके अपने सभी नियमोंका बरिसजेन कर दे।
प्रकार करनेसे यह झमत्रत पूर्ण होता है।
"बेटा । यों ब्रत करते-करते जब वर्ष पूरा हे वर
त्रती मनुप्यक्रो चाहिये कि वह अतकी पूर्तिके लियेवतोवान
कार्य भी सम्पन्न करे । इसमें मेरे आशवुसार वर रत |
भोजन कराना चाहिये | बतीको चाहिये कि कहें |
स्थापित करके उसपर तेरी मूर्तिकी पूजा करें| गे
वेदविधिके अनुसार वेदीका निर्माण करके उपर #
कमल बनाये, फिर. उसीपर धनकी कंजती सु
करे | पुनः मूर्तिके सामने दो द्नियों और दी 7
विठाकर विधिपूर्वक उनकी - पूजा करे और री
भोजन कराये | रातमें जागरण करे | प्राताकार उरी! हि
करके पुनरागमनके लिये विउजेन कर दे भे है
आश्यीर्वाद ग्रहण करें, खस्तिवांचन कराये कं
पूर्तिके लिये पुष्पा्ञलि निवेदित करे | कि हा
नाना प्रकारके कार्योकी कल्मना करें | ईं पक
बतको पूर्ण करता है; उसे अमीष्ट पलती पाहि
गणेश ! जो श्रद्धासहित अपनी: शर्तिके । हक दे
तेरी पूजा करेगा; उसके सभी मनोरथ सतीश
मनुष्योंकी सिन्दूर। चन्दन) चविड।
अनेकों उपचारोंद्वार गणेश्वर्का पूजन करों
रुद्रसंदिता | # खामिकार्तिक और गणेशकी वाल-छोला, दोनोंका विवाहके त्रिपयपे विधाद्
'९3-००३०००० रा ५०७००००० >> "कमरा ७७2 वान "पक इथ ५२०७५ ७१३३० फर मा + नह ०३७३७ ५ महा "गाए पर पाक १ धार अममा॥ 9३० मम मन नम ७ ४७ मह/४३७०५९४ +पहाघ ०१ वभ७४३५३४०४०+ पा काम ॥ल्०ज ४ मऊ; आर मनाया ७०३+ न मन मकमम न पकनफनकल् ५४ नायर पपार ना न न पर आन नाम पास मकक- ०
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जो छोग नाना प्रकारके उपचांरोंसे भक्तिपूबेक तेरी पूजा करेंगे;
उनके विश्नोंका सदाके लिये नाश हो जायगा और उनकी
- कार्यसिद्धि होती रहेगी। सभी बर्णके छोगोंको, विशेषकर
झ्लियक्रो यह पूजा अवश्य करनी चाहिये तथा अभ्युदवकरी
कामना करनेवाले राजाओंके लिये भी यह शत अवश्यकर्तव्य
: है। मती मनुप्य जिस-जिस बस्तुकी कामना करता है; उसे
- पिद्चय यह बस्त॒ प्राप्त हो जाती है; अतः जिसे किसी वस्तुकी
भि्यपा हो; उसे अवश्य तेरी सेवा करनी चाहिये |
ब्रह्माजी कहते हँ--मुने ! जब शिवजीने महात्मा
णिशको इस प्रकार बर प्रदान किया) तब सम्पूर्ण देवताओं,
8 ऋषियों और शिवके प्यारे समस्त गणेनि “तथास्व॒?
हकर उसका समर्थन किया ओर अत्यन्त विधिपूवेक गणाधीश-
7 पूजन किया । तत्पश्रात् शिवगणोंने आदरपूर्यवक नाना
कारकी पूजनसामग्रीसे गणेश्वरकी विशेषरूपसे अचेना की और
नके चरणोमि प्रणाम किया | मुनी धर | उस समय गिरिजा
(वीकी जो आनन्द प्राप्त हुआ, उसका वर्णन मेरे चारों मुखेंसे
ती नहीं हो सकता; तब फिर में उसे केसे बताऊँ | उस
प्वृसरपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं | अप्सराए दृत्य
एने लगीं । गन्धर्वश्रेष्ठ गान करने लगे ओर पुष्पोंकी वर्षा
शैने लगी । इस प्रकार गणेशके गणाधीश-पदपर प्रतिष्ठित
शैनेपर व्दों महान् उत्सव मनाया गया | सारे जगतमें शान्ति
धावित हो गयी और सारा दुःख जाता रह | नारद | शिव
और पाव॑तीको तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ और सर्वत्र अनेक
प्रकारफे सुखदायक मज्जलछ इने लगे | तदनन्तर सम्पूर्ण देवगण
ष
|
*
|
२४९
कम
ओर ऋषिगण जो वहाँ पधारे हुए. थे, वे सभी शिवकी आशा-
से अपने-अपने स्थानक्रो चले | उस समय वे शिवजीकी स्तुति
करके गणेश ओर पार्वतीकी वारंबार प्रश्नंसा कर रहे थे ओर
'केसा अद्भुत युद्ध हुआ! यों परस्पर वार्ताद्मप करते हुए
चले जा रहे थे | इधर जब गिरिजादेवीका क्रोध शान्त हो गया;
तब शिवजी भी जो खात्माराम होते हुए, भी सदा मक्तोका कार्य
सिद्ध करनेके लिये उद्यत रहते हैं; गिरिजाके संनिक्रट गये
ओर लोकोंकी हितकामनासे पूर्ववत् नाना प्रकारके सुखदायक
कार्य करने छगे | तब में त्रह्मा ओर विष्णु दोनों भक्तिपूर्वक
शिव-शिवाकी सेवा करके शिवक्री आज्ञा छे अपने-अपने घाम-
को लोट आये | जो मनुप्य जितेन्रिय होकर इस परम माड़लिक
आख्यानकी श्रवण करता हैं) वह सम्पूर्ण मज़लोंका भागी होकर
मज्नल-मवन हो जाता है | इसके श्रवणसे पुत्रद्दीनकों पुत्रकी
सिधेनकी घनकी। भायोधीकों भायोकरी। प्रजाथीकों प्रजाकी
रोगीको आरोग्यकी ओर अभागेको सोभाग्यकी ग्राप्ति होती है |
जिस छ्लीका पुत्र ओर घन नष्ट हो गया हो ओर पति परदेरा
चला गया हो, उसे उसका पति मिल जाता है । जो शोक-
सागरमें ड्रब रहा हो; वह इसके श्रवणसे निस्संदेह शोकरदिित
हो जाता है । यह गणेश-चरितसम्बन्धी अ्न्थ जिसके घरमें
सदा वर्तमान रहता है; वह सइ्बल्सम्पन्न होता है---इसमें
तनिक भी संद्ययकी गुंजाइश नहीं है। जो यात्राके अवसरपर
अथवा किसी भी पुण्यपर्वपर इसे मन लगाकर सुनता है; बह
श्रीगणेशजीकी कृपासे सम्पूर्ण अमीष्ट फल प्राप्त कर लेता है |
( अध्याय १९ )
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खामिकार्तिक ओर गणेशकी वाल-लीला, दोनोंका परस्पर विवाहके विषय विवाद, शिवजीद्वारा पथ्वी-
परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रखान, गणेशका माता-पिताकी परिक्रमा करके उनसे प्रृथ्चरी-
परिक्रमा खीकृत कराना, विश्वरूपकी सिद्धि आर बुद्धि नामक दोनों कन्याओंके साथ
गणेशका विवाह ओर उनसे क्षेम तथा लाभ नामक पृत्रोंक्री उत्पत्ति,
एुमारका एृथ्वी-परिक्रमा करके लोटना ओर क्षव्ध होकर ऋश्य
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प्यार करनेके कारण माता-पिताका सुख दिनोंदिन बढ़ता जाता
था और वे दोनों कुमार प्रीतिपूर्वक आनन्दके साथ तरह-
तरहकी लीटाएँ. करते थे | मुनीधधर | वे दोनों बालक स्था मि
कार्तिक और गणेश भक्तिपूरित चित्तते रादा माता-पिताक़ी
परिचर्या किया करते थे । इससे माता-पिताका मद्दान स्नेह
घण्मुख और गणेशपर शुक्कपक्षेक चन्द्रमाकी भोति दिन-
प्रतिदिन बढ़ता ही गया। एक समय शिव ओर शिवा
दोनों प्रेमपूर्वक एकान्तमें बेठकर यों विचार करने लगे कि
“हमारे ये दोनों पुत्र विवाहके योग्य हो गये, अब इन दोनोंका
शुभ विवाह कैसे सम्पन्न हो हमें तो जेसे पडानन प्यारा है)
वैसे ही गणेश भी है।” ऐसी चिन्तामें पड़कर वे दोनों छीछावश
आनन्दमम्म हो गये । मुने ! माता-पिताके त्रिचारकों जानकर
उन दोनों पुत्रोके मनमें भी विवाहकी इच्छा जाग डउटी।
वे दोनों “पहले में विवाह करूँगा) पहले में विवाह करूँगा!--
यो बारंबार कहते हुए परस्पर विवाद करने लगे | तव जगत्-
के अधीश्वर वे दोनों दम्पति पुत्रांकी वात सुनकर लोकिक
आचारका आश्रय ले परम विस्मयको प्राप्त हुए | कुछ समय
बाद उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंकी बुलाया और उनसे इस
प्रकार कहा ।
शिव-पार्वती बोले--5पुत्रो | हमछोगोने पहलेसे ही
एक ऐसा नियम बना खखा है; जो तुम दोनोंके लिये
सुखदायक होगा । अब हम यथार्थरूपसे उसका वर्णन करते
हैं, तुमलोग प्रेमपूर्वक सुनो । प्यारे बच्चो | हमें तो तुम दोनों
पुत्र संमान ही प्यारे हो? किसीपर विशेष प्रेम हो--णेसी बात
नहीं है; अतः हमने तुमछोगोंके विवाहके विषयमें एक ऐसी
शर्त बनायी है; जो दोनोंके लिये कल्याणकारिणी है; ( वह
शर्त यह है कि ) जो सारी प्रथ्व्रीकी परिक्रमा करके पहले
लोट आयेगा; उसीका शुभ विवाह पहले किया जायगा ।
ब्रह्माजी कहते है--मुने ! माता-पिताकी यह बात
सुनकर शरजन्मा महाबली कार्तिकेय तुरंत ही अपने स्थानसे
पृथ्वीकी परिक्रमा करनेके लिये चल दिये। परंतु अगाध-बु द्धि-
सम्पन्न गणेश वहीं खड़े रह गये । वे अपनी उत्तम बुद्धिका
आश्रय ले बारंबार मनमें विचार करने लगे कि ५्थव में क्या
करूँ १ कहाँ जाऊं ! परिक्रमा तो मुझसे हो नहीं सकेगी;
क्योंकि कोसभर चलनेके बाद आगे मुझसे चला जायगा नहीं |
फिर सारी प्रथ्वीकी परिक्रमा करके में केसे सुख प्राप्त कर
४४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन 5
[ संक्षित्त-शिवपुराण:
22 .- फनी“ 4 करनी न का-५७ ५ मकान 3 भी ाक--49-4#+-जदा#ी 33 -393433 3 2-39 ७७७“क24१३७७७-५९३-५+-५रा"%04-+ पलक 3-4" यारी-* अमन पहरि.+९०७०१९७०+०१९५ ०३ ७+०५५५४०७ ५०५००)
2.७9.“ व
“सप्तम ७०० गहन इा०-५#०९५/#१ ०),
रकूँगा ?? ऐसा विचारकर गणेदने जो कुछ किया; उसे झलो|
उन्होंने अपने घर छोट्कर विधिपृ्वक्र लान किया और गह
पितासे इस प्रकार कहा |
गणेशजी बोले--पिताजी एज माताजी | मैने आ
लोगोंकी पूजा करनेके लिये यहाँ दो आसन खात्ति बे है|
आप दोनों इसपर बिराजिये ओर मेरा मनोरथ पूर्ण क्रीकि।
त्रह्माजी कहते हँ--मुने ! गणेंशकी बात मुक्ा
पार्वती ओर परमेश्वर उनकी पूजा ग्रहण करनेके लिये आता
विराजमान हो गये । तब गणेशने उनकी विधिपू्रक पूज है
ओर बार॑बार प्रणाम करते हुए उनकी सात बार प्रदक्षिण ब्रै।
बैठा नारद | गणेश तो बुद्धिसागर थे ही, वे हय बोझ
प्रेममन्न माता-पिताकी बहुत प्रकारसे स्त॒ति करके बोले |
गणेशजीने कहा--दे माताजी | तथा हें वितर|
आपलोग मेरी उत्तम बात झुनिये ओर शीत ही मे इ.
विवाह कर दीजिये ।
ब्रह्माजी कहते हँ--सुने ! महात्मा गणेशव्ा ऐप
वचन सुनकर वे दोनों माता-पिता महाबुद्धिमान गणेश वह!
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पावतीका जैसा मनोरथ था; उसीके अनुसार विश्वकर्माने व्ह्
विवाह किया । उसे देखकर ऋषियों तथा देवताओंको परम
हष प्राप्त हुआ | मुने ! गणेशकों भी उन दोनों पत्नियोंके
मिलनेसे जो सुख प्राप्त हुआ। उसका वर्णन नहीं किया जा
सकता । कुछ कालके पश्चात् महात्मा गणेशके उन दोनों
पत्नियोसे दो दिव्य पुत्र उत्तन्न हुए | उनमें गणेशपत्नी सिद्धि-
के गर्भसे क्षेम!नामक पुत्र पेंदा हुआ और बुडिके गर्भसे
जिस परम सुन्दर पुत्नने जन्म लिया, उसका नाम ८ लाभ?
हुआ । इस प्रकार जब गणेश अचिन्त्य सुखका भोग करते
हुए. निवास करने लगे, तब दूसरे पुत्र खामिकार्तिक पृथ्वी-
की परिक्रमा करके छोटे | उस समय नारदजीने आकर कुमार
स्कन्दको सब समाचार सुनाये । उन्हें सुनकर कुमारके मनमें
बढ़ा क्षोम हुआ ओर वे माता-पिता शिवा-शिवके द्वारा रोके
जानेपर भी न रुककर क्रोश्चपब॑तकी ओर चले गये |
देवषें | उसी दिनसे शिव-पुत्र खामिकार्तिकका कुमारत्व
फलकी ग्राप्ति होती है | इधर स्कन्दका बिछोह हो झोः
उमाको महान् दुःख हुआ । उन्होंने दीनभावते अपे छा
शिवजीसे कद्ा--धप्रभो | आप मुझे साथ लेकर वहाँ चब्यि
तब प्रियाको सुख देनेके निमित्त खयं भगवान् शंकर आ।
एक अंशसे उस परत्॑तपर गये और सुखदायक मलिकाजुनना
ज्योतिलिक्षके रूपमें वहाँ प्रतिष्चिंत हो गये | वे सलुदय
गति तथा अपने सभी भक्तोंके मनोरथ पूर्ण कंसनेवाले है
आज भी शिवाक्रे सहित उस पर्वतपर विराजमान हैं।
वेट नारद ! वे दोनों शिवा-शिव भी पुत्र-सनेहे हि
होकर प्रत्येक पर्वपर कुमारकों देखनेके लिये जाते हर ।
अमावास्ाक्रे दिन वहाँ खय॑ शम्मु पधारते हैं ओर कक
दिन पार्वतीजी जाती हैं । मुनीश्वर ! तुमने खामिकातिंक ओ!
गणेशका जो-जो ब्वत्तान्त मुझसे पूछा था; वह सब मैंने करे
कह सुनाया | इसे सुनकर बुद्धिमान मनुष्य समस्त पाए पु
हो जाता है और उसकी सभी शुभ कामनाएँ पर
जाती हैं । जो मनुष्य इस चरित्रक्रो पढ़ता अथवा पढाव !
एवं सुनता अथवा सुनाता है, निस्संदेह उसके सभी गो
सफल हो जाते हैं | यह अनुपम आख्यान पापा
कीतिपद, सुखवर्धक, आयु बदढ़ानेवाल) खगगी परी
करानेवाला) पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला मोक्षप्रद/ शिर्की
उत्तम ज्ञानका प्रदाता, शिव-पार्वतीमें प्रेम उतन्न केले
ओर शिवभक्तिवर्धक है | यह कल्याणकारकः शिवजीके ऑ
शानका दाता और सदा शिवमय है; अतः मोक्षक्ामी *
निष्काम भक्तोंको सदा इसका श्रवण करना चाहिये। (अाव ' "
"7-७ ७ ६७००...
॥ रुद्रसंहिताका कुमारखण्ड सम्पूर्ण ॥
रुद्रसंहिता ] ४: शिवजीद्वारा पृथ्वी-परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रस्थान # २०१
शिवा-शिवने कहा--रेय ! तू पहले काननोंसहित
इस सारी एथ्वीकी परिक्रमा तो कर आ । कुमार गया हुआ
है; तू भी जा ओर उससे पहले छोट आ ( तब तेरा विवाह
पहले कर दिया जायगा ) |
प्रह्माजी कहते हैँ--मुने | नियमपरायण गणेश माता-
पिताक़ी ऐसी बात सुनकर कुपित हो तुरंत बोल उठे |
गणेशजीने कहा--हे माताजी ! तथा है पिताजी !
आप दोनों सर्वश्रेठः धर्मह्प और महाबुद्धिमान् हैं,
अतः धमानुसार मेरी बात सुनिये | मेने सात बार प्रथ्वीकी
परिक्रमा की है; फिर आपलोग ऐसी वात क्यों कह
रह!
ब्रह्माजी कहते हँ--मुने | शिव-पार्वती तो वड़े
लीडानन्दी ही ठहरे, थे गणेशक्रा कथन सुन लोकिक गतिका
आश्रय लेकर बोले ।
शिव-पावेतीने कहा--पुत्र॒ ! तूने समुद्रपर्यन्त
'विस्तारवाली बड़े-बड़े काननेसे युक्त इस सह्तद्वीपवती विद्याल
भणीकी परिक्रमा कव कर ली?
पह्माजी कहते हँ---मुने | जब शिव-पार्वतीने ऐसा कहा
तय उसे मुनकर महान् चुद्धिससन्न गणेश बोले |
।
: _गणशज्ीने कहा--माताजी एवं पिताजी | मैंने अपनी
। 3दस आप दोनों शिव-पात्रतीकी पूजा करके प्रदक्षिणा कर ली
अतः नये समुद्रपयन्त प्रथ्वीकी परिक्रमा पूरी हो गयी।
' भम$ पंप्ररभूत वेदों और शास्तरोंमें जो ऐसे वचन मिलते हैं,
| पता ४ अपवा असत्य ! (वे वचन ई कि) जो पुत्र
'पतानीया दी पूजा करके उनकी ग्रदक्षिण करता है। उसे
४+ परकमाजनित फछ सुल्म हो जाता है । जो माता-पिता-
#€ अर उइवर तोषणाचाऊ़े टिये जाता दे, वह माता-पिता-
४ आप मझनआद पापत सागी होते ए क्योंकि प्रफे
"पे आवीवदाता चरपनरोम ही गद्य दीर्म है | अन्य
“१-4 इर शनेरर पाप्त झेते हैं, परत पर्मद [ खरमनृत
ध जब पे सन ते सुएन | पचरे लिये / साता-सिता )
हा न कप ॥ थे या सदर टोघ परे ही दागमान
४ पर-३ पर ४ रगते रते हैं;
हा
नि +क >छ कक
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| 54 0. जल ५ ५ ् हि भर.
है | हमने तेरी बह बात
असत्व हो जायगा तो ) निस्मंदेह वेद भी अतत्य हो जायगा
ओर वेदद्वाय वर्णित आपका यह खरूप भी झूठा समझा
जायगा | इसलिये या तो शीघ्र ही मेरा झुभ विवाह कर
दीजिये अथवा यों कह दीजिये कि वेद-शास्र छठे हैं । आप
दोनों धर्मरूप हैँ, अतः भलीमॉति विचार करके इन दोनोंमें जो
परमोत्तम प्रतीत हो, उसे प्रयत्लपूर्वक करना चाहिये |
ब्रह्माजी कहते हँ--मुने ! तब जो बुद्धिमानोंमे श्रेष्ठ
उत्तम बुद्दिसथन्न तथा सहान ज्ञानी हैं; वे पायंतीनन्दन गणेश
इतना कहकर चुप हो गये । उधर वे दोनों पति-पत्नी जगदीशथर
शिव-पावती गणेशके वचन सुनकर परम विस्मित हुए ।
तदनन्तर वे यथार्थमभापी एवं अदूभुत बुद्धिवाले अपने पुत्र
गणेशकी य्रशंसा करते हुए वोले |
शिवा-शिवने कहा--जेय ! तू मद्यन् आत्मबलसे
समत्न है; इसीसे तझमें निर्मल बुद्धि उन्न हुई है | तूने जो
वात कही है, वह बिल्कुल सत्य है। अन्यथा नहीं है | दुःखका
अवसर आनेपर जिसकी बुद्धि विश्विष्ट हो जाती है; उसका
दुःख उसी प्रकार बिनष्ट हो जाता है, जेसे सूर्वक्रे उदय होते
ही अन्धकार । जिसके पास बुद्धि ६; वद्दी बलवान है; वुद्धिद्ीन-
के पास बल कहाँ | पुत्र ! वेद-शात्र ओर पुणाणोंमि बाठकके
लिये धर्म-पालनकी जेसी बात कही गयीं; बहू सब तने पूरी कर
ली । वूने जो बात की दहे। बह दूसरा कोन छर सकता
मान ली; अय इनके विपरीत
नहीं करेंगे |
ब्रह्माजी कहते ह--नारद ! वो कवर उस दं।नोंने
बुद्धिसागर गणेशकों सान्यना दी भीर फिर थे उसके सिम
सम्पन्धर्म उत्तम विचार इसने ठगे | इसी समथ जब प्रसन्न
बुद्धिवाले मजापति दि पडा रिव४ड उथगड़ा पटा चंचा,
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२५२
ड्द्वः ट
पारवतीका जैसा मनोरथ था उसीके अनुसार विश्वक्रमने वह
विवाह किया । उसे देखकर ऋषियों तथा देवताओंको परम
हष प्राप्त हुआ | सुने ! गणेशकी भी उन दोनों पत्नियोकि
मिलनेसे जो सुख प्राप्त हुआः उसका वर्णन नहीं किया जा
सकता । कुछ काछके पश्चात् महात्मा गणेशके उन दोनों
पत्नियोंसे दो दिव्य पुत्र उत्पन्न हुए. । उनमें गणेंशपत्नी सिद्धि-
के गर्भसे “क्षेम'नामक पुत्र पदा हुआ ओर बुद्धिके गर्भसे
जिस परम सुन्दर पुत्रने जन्म लिया; उसका नाम लाभ!
हुआ । इस प्रकार जब गणेश अचिन्त्य सुखका भोग करते
हुए. निवास करने छंगे, तब दूसरे पुत्र स्वामिकार्तिक प्रथ्वी-
की परिक्रमा करके छोटे | उस समय नारदजीने आकंर कुमार
स्कन्दकों सब समाचार सुनाये । उन्हें सुनकर कुमारके मनमें
बड़ा क्षोभ हुआ ओर वे माता-पिता शिवा-शिवके द्वारा रोके
जानेपर भी न रुकफर क्रोश्चपबेतकी ओर चले गये ।
देवषं | उसी दिनसे शिव-पुत्र स्वामिकातिकका कुमारत्व
/ नमों रुद्भाय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने $
औ जल बू#ऋ १. 5क ३० » रा5 न ओआ आओ ओऔ+ ५+,03ह]3.०7*.८ कला ५औ5.की फकरीर # फन्क
[ संक्षिप्तशिवाुगणा
जन्म ५आी
( कुऑरना ) य्रत्िद्ध द्वो गया । उनका नाम तिदेद्री। खिछ्ष
हो गया | बह झुभदायक, सर्बपापहारी। पृष्यमय और
ब्रद्मनर्यती शक्ति प्रदान करनेवाला दे । का्तिककी पूर्णिमाग्रे प्र
देवता, ऋषि/तीथ ओर मुनीश्वर सदा कुमारका दरत कलेेमि
( क्रीजपर्ब॑तपर ) जाते हूँ । जो मनुध्य कार्तिकी पणिक़रेत्ि
कतिका नक्षत्रका योग होनेपर खामि का्तिकका दर्शन छह
उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोर
फलतओी य्रा्रि होती दे । इधर त्कद॒का बिछोह हो बा
उग्ाकी महान दुःख हुआ । उन्होंने दीनमावसे असे लो
शित्रजीसे कृक्ष--प््रभो ! आप मुझे साथ लेकर वहं चलि।
तब प्रियानी सुख देनेके निमित्त खगं भगवान् शंका भरे
एक अंशसे उस पर्वतपर गये और छुखदावक मछिकजुतवाक
उ्योतिर्ठिकक्ले रूपगें वहाँ प्रतिष्ठित दो गये । वे स्युस
गति तथा अपने सभी भक्तीके मनोरथ पृ कंसेवारे है॥
आज भी शिव्राके सहित उस पर्वतपर विराजमान हैं
बेणा नारद ! वे दोनों शिवा-शिव भी पुत्र-लेहस कि
होकर प्रत्येक पर्वपर कुमारक्रों देखनेके लिये जाते ६ प्
लीद क्शनी >- न
अमावा्याक्रे दिन वह्दों खय्यं शम्मु पधारते है ओर पृ :
दिन पार्वतीजी जाती हैं | मुनीखर ! तुमने खामिवाति
गणेशका जो-जो बृत्तान्त मुझसे पूछा था) वहें 7० ये हर
कह सुनाया । इसे सुनकर बुद्धिमान् मत॒ष्य उमस् पर
हो जाता है और उसकी सभी शुभ काम: के
जाती हैं | जो मनुष्य इस चरित्रकों पदता अब पहुंद
एवं सुनता अथवा सुनाता है; निल्संदेह उस सम शो
सफल हो जाते हैं | यह अनुपम हक
कीर्तिपद, सुखबर्धक, आयु वद़ानेवाल) हू
करानेवाला; पुत्र-पौन्रकी बुद्धि करनेवाला) मीक्षप्रद)
उत्तम ज्ञानका प्रदाता, शिव-पाव॑तीमें प्रेम उतरे है
और शिवभक्तिवर्धक है | यह कंल्याणकारवें) शिवजी
शानका दाता और सदा शिवमय है अतः हे
निष्काम भक्तोंको सदा इसका श्रवण करना चाहिये। (अर
>>. 8 60---*-
॥ रुद्रसंदिताका कुमारखण्ड सम्पूण ॥
७७७८: ८ २२ एण
मुद्संदिता |
मिभ्रयाभयाककमह कंगाल भक पान त कमा कं गए भााभ भा कब मा लभभाभुअाााााााारा राम पारा ाा४७७७७४/४४७७७७/ेशल्श//॥//शशआआ/ल्रए्ी७७७४४४७४४७७७७७७७८८४७४७४४७७/#७७र॥र/४शशशशरशशशशशशश्षक
गुंइ-के-झंड मदमत गजराजोंसे; सुन्दर-मुन्दर धोड़ोंवे,
नाता प्रकारके आकार-प्रकारयाले रथों एवं शिविकार्सि
अडंकझृत थे । उनमें समवानुसार इथकूश्थक क्रीडखल बने
बे और वेदाब्ययनकी पाठशालाएँ भी भिन्न-भिन्न निर्मित हुईं
थीं | वे पापी पुझुषोके छिये मन-वाणीसे भी अगोचर थे |
उन्हें मदाचारी पुण्यश्नील महात्मा ही देख सकते थे | पति-
- गेबापरायण तथा कुथमंसे विमुख रहनेवाली पतित्रता नारियोनि
टन नगरके उत्तम खत्मोंकों सर्वत्र पवित्र कर रक््खा था |
मम महाभाग झूरवीर. देत्य और श्रुति-स्पृतिके अर्थके तत्त्वशञ
(व खबमपरायण ब्राह्मण अपनी ल्लियाँ तथा पुत्रोंके साथ
वास करते थे | उनमें मयद्वारा सुरक्षित ऐसे सुद्ढ़ पराक्रमी
गिर भरें हुए. थे; जिनके केश नील कमछके समान नीले और
४ तारक-पुत्रोंके प्रभावसे संतप्त हुए देवाकी त्रह्माके पास करुण पुकार #
ि्यनाभाभमाानाध भा कथन न इपका कप 9 वह व ५ अप ३ नम भ हा ३2 १३2: ल् पारा हा धरा मामा पाना मनी ना पर. गाव ७० आभआ मा परम धा मम॒दश्र मना मापा नाभि पाए मा यहा इन एक नाना २५ नए नाक यम ा/४७४००७५ ०७४५ हरमयम मम १४ "वा मम 8++-++३ ५५७०७ इ०ा३3 3 ३+नाा 9-०२ 33. मानक" अ-नमका-33द-9०७न॥- वार नाक पकपनन कस पा परनअपमक
र५५
घुंघराले थे। वे सभी सुशिक्षित वे, जिससे उनमें सदा युद्धकी
छाल्ता भरी रहती थी। वे बड़े-बड़े समरोसे प्रेम करनेवाले थे,
ब्रढ्मा ओर शझिवका पूजन करनेसे उनके पराक्रम विश्युद्ध थे;
वे सूबे, मरद्वण ओर मदेन्द्रके समान बी ये ओर देवताओं-
के मथन करनेवाले थे | वेदों, शास्त्रों ओर पुराण;में जिन-जिन
धर्मोका वर्णन किया गया है; वे सभी घर्म ओर शिवके प्रेमी
देवता वहाँ चारों ओर व्याप्त थे ] उन नगरोंमें प्रवेश करके
वे देत्य सदा शिवभक्तिनिरत होकर सारी त्रिलेकीको वाधित
करके विशाल राज्यका उपभोग करने लगे | मुने | इस म्रकार
वहाँ निवास करनेवाले उन पुण्यात्माओंके सुख एवं ग्रीतिपूर्वक
उत्तम राज्यका पालन करते हुए. बहुत लंबा काल व्यतीत
हो गया। (अध्याय १ )
---->सक्स्श्र्चक्ल्ल््8
तारक-पुत्रोंके प्रभावसे संतप्त हुए देवोंकी ब्रक्माके पास करुण पुकार, ब्रह्माका उन्हें शिवके
पास भेजना, शिवकी आज्ञासे देवोंका विष्णुकी शरणम जाना ओर विष्णुका
उन देत्योंकी मोहित
सनत्कुमारजी कहते हँ--महपे ! तदनन्तर तारक-
(भीफ़े प्रभावसे दग्घ दुए इन्द्र आदि सभी देवता दुखी हो
रसपर सलाह करके ब्रद्मजीकी शरणमें गये। वहाँ सम्पूण
ताओने दीन होकर प्रेमपूर्वक पितामहको प्रणाम किया ओर
अवसर देखवर उनसे अपना दुखड़ा सुनाते हुए क्या ।
। देवता बोछे--धातः | त्रिपुरंकि खामी तारक-पुन्नोंने
था भगासुरने समस्त खर्गवासियोंकों संतस कर दिया दे।
क्षन् | इसलिये इगलोग दुखी होकर आपकी शरणमें आये
.। आप उनके चचका बीए उपाय कीजिये, निससे इमलोग
(रथ रंटू शक |
£ ग्रद्माज्ञने कद्ा-देवगणी ! तुम्ई उन दानवेतसे
&07 ग नहीं कजा आएिये। में उसके बधका उपाय
2 पता ४ । गसगयान शिव तम्दारा दल्याण वरेगे | भने ही
| $5घघ7) शगाथा ४ उते बार हाथों गा ता
नेत्र में । साय ही भिपुरमें इनसडा पुष्य थीयर्दिंगत
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करके उन्हें आचार-श्रष्ट करना
पर गये, जहाँ ब्रप्रभज शिव आसीन थे | तब उन सबसे
अज्जलि वॉधकर देवेश्वर शिवको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और
कंधा झुकाकर ह्ोकोर्के कल्याणकर्ता झंकरवा स्तवन किया |
मुने | इस प्रकार नाना प्रकारके दिव्य स्तोनोंदारा निश्वूल्थारी
परमेश्वर्की स्तुति करके स्ाथ-साधनर्म निषृण इन्द्र आदि
देवताओंने दीनभावसे कंपा झुकाये हुए द्वाथ जोड़कर प्रस्तुत
खार्थकों निविदन करना आरम्भ किया ।
देवताओंने कहा-मद्दादेत | तारकफे पुत्र तीनों
[इयाने मिलकर इन्द्रसदित समस्त देवताऋझि पराटा कर दिया
है । भगवन ! उन्हांने मिलाहोफी तथा सुनी्षर्येद्ष आपने
अधीन कर लिया ई ओर समूर्ण सिद्ध स्थार्मोकरी नए!
बारके सारे जगतूकी उलीटिय छर रक्या ४ | ये दाइग दे॑स्य
समम्त यन्नदागोकों खयं स़ृदय बरते है । उन्दाने ऋष-धर्मया
न न (॥वथंत्द !
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समत्फुमारज।
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२५७
कान्जाब भा ा-एचका कया मानाम
% नमो रुद्राय शान्ताय अद्यग परमात्मने #
[ संक्षिप्त शिवपुणणा;
सनत्कुमारजी कहते हँ--मद्दर्त ! उन तप्स्वी देत्यॉंकी
यह बात सुनकर त्रद्मा अपने स्वामी गिरिशायी भगवान् शंकर:
का ध्यान करके बोले ।
ब्रह्माजीने कहा--असुरो ! अमरत्य सभीकी नहीं मिल
तकता) अतः तुमलोग अपना यद विचार छोड़ दो। इ सके
अतिरिक्त अन्य कोई वर जो तुम्हें बचता हो) माँग ढो।
क्योंकि देत्यो | इस भूतलपर जहाँ कहीं भी जो प्राणी जन्मा
है अथवा जन्म लेगा) वह जगतूमें अजर-अमर नर्दी हो सकता |
इसलिये पापरद्वित अमुरो ! तुमलीग खय॑ अपनी बुद्धिसे विचार-
कर मृत्युकी वश्चना करते हुए. कोई ऐसा दुलभ एवं दुस्साव्य
वर माँग लो) जो देवता और अपुरोंके लिये अशक्य हो |
उस प्रसद्भमें तुमलोग अपने बलका आश्रय लेकर एथक एथक्
अपने मरणमें किसी द्ेतुकों माँग लो) जिससे तुम्दारी रक्षा दो
जाय और मृत्यु तुम्हें वरण न कर सके ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--महरषें ! त्रह्माजीके ऐसे
वचन सुनकर वे दो घड़ीतक ध्यान हो गये, फिर कुछ
सोच-विचारकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजीसे बोले ।
द्वैत्योनि कहा--भगवन् | यद्यपि हमलोग प्रवल पराक्रमी
हैं, तथापि हमारे पास कोई ऐसा घर नहीं है, जहाँ हम शत्रुओं-
से सुरक्षित रहकर सुखपूर्वक निवास कर सकें; अतः आप हमारे
लिये ऐसे तीन नगरोंका निर्माण करा दीजिये, जो अत्यन्त अद्भुत
और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे सम्पन्न हों तथा देवता जिनका
प्रधषण न कर सके । छोकेश ! आप तो जगदगुरु हैं। हम-
लोग आपकी कृपसे ऐसे तीनों पुरोमे अधिष्ठित होकर इस
पृथ्चीपर विचरण करेंगे। इसी बीच तारकाश्नने कहा कि
विश्वकर्मा मेरे लिये जिस नगरका निर्माण करें वह स्वर्णमय
हो और देवता भी उसका भेंदन न कर सकें। तलश्वात्
कमलाक्षने चादीके बने हुए अत्यन्त विशाल नगरकी याचना
की और विद्युन्मालीने प्रसन्न होकर वज्रके समान कठोर लोहे-
का बना हुआ बड़ा नगर माँगा | ब्रह्मन ! ये तीनों पुर
मध्याहके समय अमिजित् मुहूतेमें चन्द्रमाके पुष्य नक्षत्रपर
स्थित होनेपर एक स्थानपर मिला करें ओर आकाशरमें नीले
बादलापर स्थित होकर ये क्रशः एकके ऊपर एक रहते हुए
लोगोंकी दष्टिसे ओझल रहें । फिर पुष्करावते नामक काठमेधों-
के वर्षा करते समय एक सहसखत वर्षके बाद ये तीनों नगर
परस्पर मिले ओर एकीमावको प्राप्त हों; अन्यथा नहीं | उस
समय कृत्तियासा भगवान् शंकर जो वैरमावसे रहित, सर्वदेव-
ब्कड
करी ऋत केनी नमन. आने. गम. जी. जयती के. >मीन गयी मीन पान परममा- चयन आन. सात. वशीा+- आर मोगा सहन मी रस अमन -आन फोन +>अर्लीी: अर पी “रीति आना उसी अमी। अरमीण यानी जीन युकिरि उक्त जनन, सदारमीी-. प्रधम समीर,
मय और सबके देव हैं। छीछापूर्वक समूर्ग साम्रफित्ि
एक असम्भव रधार बेठकर एक अनोखे बाणे छो
एंगेका भेदन करें । तु भगवान् शंकर सदा झाद्याँ
बन्दनीय) पूज्य और अभिवादनके पात्र हैं। अतः वे झ्ं
वी कैसे भस्तर करेंगे--मनर्म ऐसी धारणा करे झऐ
हुलेश बरकी माँग रहे ६ ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यासजी ! उन रखें
कथन सुनदुर खथ्टिकर्ता छोकपितामद् बद्याने शिवजी लए
करके उनसे कहा कि अच्छा) ऐसा ही दोगा । कि पक
भी आशा देते हुए. उस्दोंनि कद्यं--दें मं ! तुम पे
नॉदी और लोदेक तीन नगर बना दो ! यों मयती औ
देकर हरद्वाजी उन ताएऋ-पत्रनोके देखते-देखते आगे
खर्गकी चछे गये | तदनन्तर बेयेशाडी मबने आने तो
नगरोंका निर्माण कर्ता आरम्म किया। उसने ताला
लिये लगमय कमलाक्षके लिये रजतगव और विद्ुलमालक
ढौदमय--यों तीन प्रकारके उत्तम दुर्ग तैयार किये। वे
#ऋमशः सवा अन्तरिक्ष और भूतलपर निर्मित हुए मे |
के द्वितमें तत्मर रहूनेब्राला मय उन तीनों पुरगेक्री ता
आदि अध॒रोकि दबाऊे करके खब्ब भी उसमे प्रवेश क्र ।!
इस प्रकार उन तीनों पुरोंको पाकर महाव् बसपा
वे तारकानुस्के लड़के उनमें प्रविष्ट हुए और उम्रल *
उपभोग करने लगे । वे नगर कब्यव्रक्षोंते व्याति पंप
घोड़ोंसे सम्यन्न थे | उनमें मणिनिर्मित जालियेंसि आ*
बहुतेरे महल बने हुए थे | वे पत्नरागक बने हुए एं
मण्डलके समान चमझीले विमानेंसे) जिनमें चारों और
लगे थे, शोमायमान थे । कैंलास-शिखरके समन |
चन्द्रमाके समान उज्ज्वल दिव्य प्रासादों तथा गोपुरंए
अद्भुत शोभा हो रही थी । वें अप्सराओं) शत
तथा चारणोंसे खचाखच भरे ये | प्रत्येक मत ।
तथा अभिहोत्रशालाकी प्रतिष्ठा हुईं थी | उन दि
परायण शास्त्रज् ब्राह्मण सदा निवास करते | वे
कूप+ तालाब और बड़ी-बड़ी तडैयोंसे तर्था सप
खगेसे च्युत हुए इक्षोंसे युक्त उद्यानों ओर वर्नोति
थे | बड़ी-बड़ी नदियों, नदों और छोटी-छोटी मं
जिनमें कमल खिले हुए, थे; उनकी शोभा और वह
उनमें सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अनेत्ी 7
लदे हुए. चुक्ष लगे थे, जिनसे वे नगर विशेष मनोहर
रुद्धसंदिता
पुंड-के-झंड मदमत गजराजेंसि, सुन्दर-मुन्दर घोड़ीति;
नाना प्रकारके आकार-प्रकास्वाले रथों एवं शिविकार्थेति
अछक्ृत थे | उनमें समयानुसार प्रथकू-प्रथक् क्रीडाखल बने
वे और वेदाव्ययनकी पाठशात्यरए भी भिन्न-भिन्न निमित हुई
थीं | वे पापी प्रुरुषोके लिये मन-वाणीसे भी अग्रोचर थे |
उन्हें सदाचारी पुण्यशील महात्मा ही देख सकते थे | पति-
; सेबापग़यण तथा कुधर्मसे बिमुख रहनेवाली पतित्रता नारियंनि
: उन नगरेक्रे उत्तम खलोंकों सर्वत्र पवित्र कर रखा था।
: उनमें मह्ाभाग शरीर. देत्य और श्रुति-स्द्रतिके अर्थके तत्त्वश्ञ
!
|
4
|
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व॑ खधमंपरायण व्राह्मम अपनी ब्लियों तथा पुत्रोंके साथ
निवास करते थ | उनमें मयद्वारा सुरक्षित ऐसे सुद्ढ पराक्रमी
गिर भरे हुए थे, जिनके केश नील कमलके समान नीले ओर
निम्न मि न नि मम कमा 20924 का अलदीजिक अब कल अब 3 नल मएअनााअबरंा_ाा__भभााांंए_घभ्घघछ््छभ््शआआओआशीाशशीीशाशशश/शा्काा शा आभार ााए॥७७७७रर#४्रशल्रशशशर४ा॥्राशणा शत
४४ तारक-पुत्रांके प्रभावसे संतप्त हुए देवाकी त्रह्माके पास करुण पुकार # र्णण
बा बा
घुँघराले थे | वे सभी सुशिक्षित थे; जिससे उनमें सदा युद्धकी
लालसा भरी रहती थी। वे बढ़े-बढ़े समरोसे प्रेम बरनेवाले थे
ब्रह्म ओर झिवका पूजन करनेसे उनके पराक्रम विश्युद्ध थेः
वे सूबे, मरद्रण ओर महेन्द्रके समान बली ये ओर देवताओं-
के मथन करनेवाले थे | वेदों, शाह्यों ओर पुराणोंम जिन-जिन
घर्मोक्रा वर्णन किया गया है; वे सभी घर्म ओर शिवके प्रेमी
देवता वहाँ चारों ओर व्याप्त थे । उन नंगरोंमं प्रवेश करके
वे देत्य सदा शिवमक्तिनिस्त होकर सारी त्रित्योकीको बाधित
करके विशाल राज्यका उपभोग करने लगे | सुने ! इस प्रकार
वहा निवास करनेवाले उन पुण्यात्माओंके सुख एबं प्रीतिपूर्वक
उत्तम राज्यका पालन करते हुए बहुत लंबा काछ ब्यतीत
हो गया। (अध्याय १ )
न्््ज्खच्य््न्च्य्भिध््््टिज+
तारक-पुत्रोके प्रभावसे संतप्त हुए देवोंकी त्रह्माके पास करुण पुकार, त्रह्माका उन्हें शिवके
पास भेजना, शिवकी आज्ञासे दवोका विष्णुकी शरणमें जाना आर बिप्णुका
उन दत्योंकों मोहित करके उन्हें आचार-अ्रष्ट करना
सनत्कुमारज्जी कहते हँ--महपें ! तदनन्तर तारक-
भक्ति प्रभावसे दग्घ हुए इन्द्र आदि सभी देवता दुखी हो
रतर सद्गद करके ब्रद्ममीकी शरणमे गये | वहाँ सम्पूर्ण
पताओने दीन दोकर प्रेमपूर्वक पितामहको प्रणाम किया ओर
सर देखकर उनसे अपना दुखड़ा सुनाते हुए, कद ।
पवत। ब(छे--घधातः | त्रिपुरोंके खामी तारक-पुत्रोंने
भा मवामुरने समस्त खर्गवासियोंकी संतत्त कर दिया दे।
इन ! इसोलिये इमलोग दुखी होकर आपकी शारणमें आये
5 आप उनके बषका कोर उपाय कीजिये, जिससे इमलोग
हम २ए के |
भरशाजीन कदा--देवगणों ! तुम्द उन दामवेंसि
किए गा नहीं कस्ता चादियें | मैं उसके बषदा उपाय
+। एं। नगयान् शिव उस्दारा कस्याण करेंगे | मैंने दी
$ व बग्यां है झतः भरे हाथों इसझा बंध होना
जि पं | खय ही निएरने इसका पुण्य नोडजदिगत
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22 नल
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है । पं शक मक,
ह कक करा+२ ५ + 4॥
"]
६3७. ० 25 जज कद जा
पर गये; जहाँ व्ृप्भषप्यज्त शिव आसीन थे | तब उन सबने
अज्ञलि बॉधकर देवेश्वर शिवको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और
कंधघा झुकाकर टोकीके कल्याणकर्ता झंकरकां सबने किया ।
मुने | इस प्रकार नाना प्रकारके दिव्य सोन्ोंद्ारा तिद्यूलधारी
परमेश्वरक्ी लुति करके खाय-साधनर्म निपुण इन्द्र आदि
देवताओंने दीनभावसे कंचा सुकाये हुए दायथ जोइकर प्रसुत
खार्थकोी निवेदन करना आरम्भ किया । द
देवताआने कहा--मद्यदेव | तारकके पुत्र तीनों
भाइयोने मिलकर इन्द्रसट्ति समस्त देवताओफी पराल कर दिया
| भगवन् ! उन्हांन तिलाकोओी तथा
अधीन कर लिया ई आर समन सिद्ध
मनीखर्ा की अनने
स्वताओा नए था!
करदे सारे जगातऊे। उ्तीटित दर सका 2 |] थे दादण दंस्प
समसस यक्षमागोत्री खप गंदग इसने हे | उरसमे मापलांया
गसाारन इदबरुस छारदाडईाीा एन) रद 2 ] २ ।
नित्य 2 वे तार अपनी गया गये: आह
क + ः." +- सका
हे; इसीडिये 4 सच्छादुनार से. गाज इससे सतत | ।
दि 7 जि लग वर 4 के कई तक
हर ला आय | को आल दे हि केक
5 ७ हल डा 0 * है]
हु कर 2 हा ड
रुसनप्ामझारसा बसी ईू+-+हुब हक बाज 3४!
च्कछ
श्श्द्
हुए, उन स्वरगवासी इन्द्रादि देवोंकी बात सुनकर शिवजी उत्तर
देते हुए बोले ।
शिवजीने कह[--देवगण | इस समय वे निपुराधीश
महान् पुण्य-कार्योमं छगे हुए हैँ; ओर ऐसा नियम & फ़ि
जो पुण्यात्मा हो, उसपर विद्वानोंकी किसी प्रकार भी प्रह्मर नह
करना चाहिये | में देवताओंके सारे महान् कशेंक्री जानता हैँ;
फिर भी वे देत्य बड़े प्रव् हूँ; अतः देवता ओर असुर
मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते | वे तारक-पुत्त सब-के-
सब पुण्यम्पन्न हैं; इसलिये उन सभी त्रिपुरवासियोंका बंध
दुस्साध्य है | यद्यपि में रणककेश हूँ; तथापि जान-बूझकर
मैं मित्र-द्रोह केसे कर सकता हूँ; क्योंकि पहले किसी समय
ब्रह्मजीने कहा था कि मित्रद्रोहसे बढ़कर दूसरा कोई बड़ा
पाप नहीं है । सत्पुरुणने ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा
ब्रत-भड़ करनेवालेके लिये प्रायश्वित्तवा विधान किया दे;
परंतु कृतन्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं दे ।# देवताओ !
तुमछोग भी तो धर्मश्ञ हो, अतः घमंदश्सि विचार-
कर तुम्हीं बताओ कि जब वे दत्य मेरे भक्त हैं) तब में
४४ नमों रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5!
[ सं क्षिप्त-शिवपुणणा]
00000 भाणपप रतन
उन्हें केसे मार सकता हूँ | इसलिये अमरो | जब वे खेत
मेरी भक्तिम॑ तलर है, तबतक उनका वध अतम्परै|
तथापि तुमलेग विष्णुक्रे पास जाकर उनसे के बाप
निवेदन करो |
तदनन्तर देवगण भगवान् विश्णुके सम्रीपर ेझ!
उनके द्वारा ऐसी व्यवस्था की गयी कि जिससे वे असर खे-
सनातन थमसे जिमुख होकर संधा अनाचासराया हे ख्े|
बेदिक घमका नाथ होनेसे वहाँ झ्लियोंने पातिव्रत-बर्म छोड़ हि।
पुदत इस्धियोंके वश हो गये | यों त्ली-पुरुष सभी दुख
दे गये | देवाराबन) श्राद्ध) यज्ञ) बतः तीर्य, शिवविणुस
गणेश आदिका पूजन) स्नान) दान आदि सभी गुप्त अक्
नष्ट हो गये । तब माया तथा अलक्ष्मी उन पुरे
पहनी | तपसे प्राप्त लूब्मी वहसे चली गयां। इस कक
वहाँ अबर्मका विस्तार हो गया। मुने | तब शिवेद्ा।
भाइयोंमदित उस देत्यगजकी तथा मयकी मी शक्ति इ/
हो गयी | ( अध्याय ९-!
देबोंका शिवजीके पास जाकर उनका स्तवन करना, शिव्रजीके त्रिपुर-बथके लिये उद्यत न होने
और विष्णुका उन्हें समझाना, विष्णुके बतलाये हुए शिव-मन्त्रका देवोंद्ारा तथा विष्षुद्ात
जप, शिवजीकी प्रसन्नता ओर उनके लिये विश्वकर्मादारा सर्वदेवमय रथका निमोण
व्यासजीने पूछा--सनत्कुमारजी | जब भाइयों तथा
पुरवासियोंस हित उस दत्यराजकी ट् बुद्धि विशेषरूपसे मोहाच्छन्न
हो गयी; तब उसके बाद कोन-सी घटना घटी ? विभो |
वह सारा वृत्तान्त वर्णन कीजिये ।
सनत्कुमारजीने कहा--महष॑ं |! जब तीनों पुरोंकी
पूर्वोक्त दशा हो गयी; देत्योंने शिवाचनका परित्याग कर दिया;
सम्पूर्ण स्री-धर्म नष्ट हो गया और चारों ओर दुराचार फैल
गया, तब भगवान् विष्णु और ब्रह्मके साथ सब देवता
कैलास पर्यतपर गये ओर सुन्दर शब्दोंमें शिवकी स्तुति करने
लगे--“मद्देश्वर देव | आप परमोत्कृष्ट आत्मबल्से समन्न हैं;
आप ही सृश्टिके कर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता रुद्र हैं;
परअरह्मस्वरूूप आपको नमस्कार है ।? यों महादेवजीका स्तवन
करके देवोंने उन्हें साशज्ज प्रणाम किया। फिर भगवान्
विष्णुने जलमें खड़े होकर अपने ला पे खामीं परमेश्वर शिवका मन- हैं।आप ही रजोगुण, सत्वगुण और व... परमेश्वर शिवका मन-
ही-मन स्मरण करके तन्मय हो दक्षिणामूर्तिक
प्रकटित रुद्रमन््त्रका डेढ़ करोड़की संख्यातक जा कि
तबतक सभी देवता उन महदेश्वर्मं मत लगाकर यो
स्तुति करते रहे ।
देवोने कहा-प्रभो ! आप समख प्रा
आत्मस्वरूप, कल्याणकर्ता और भक्तोंकी पीड़ा हलेगर
आपके गलेमें नीछा चिह है; जिससे आए मी
कहलाते हैं | आप चिद्रप एवं प्रचेता हैं) आप स्व
प्रणाम है | असुरनिकन्दन ! आप ही हमारी सारे आरकि'
निवारण करनेवाले हैं, अतः सदासे आप ही हम '
और आप ही सवंदा हमलोगोंके वन्दनीय है| पक
आदि हैं और आप ही अनादि भी हैं | आप ही
अव्यय, प्रभु) प्रकृति-पुरुषके भी साक्षात् ले 7 गए वा
हैं | आप ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणरे
# अहम च सुरापे च स्तेने भप्नत्नते तथा। निष्कृतिविंद्िता सद्धिः कृतप्ते नास्ति निष्कृतिः !
( शि० पु० रु० सं० युद्ध० बे? |
रुद्रसंहिता | कं
व्रा) विष्णु और रुद्र होकर जगतके कर्ता) मर्ता ओर संहारक
पते हैं | आप ही इस भवसागरसे तारनेवाले हैँ | आप समस्त
गियेकि खामी, अविनाशी) वरदाता। वाइ्मयस्वरूप) वेद-
तिपाद और वाच्य-बाचकतासे रहित हैँ । योगवेत्ता योगी आप
शानसे मुक्तिकी याचना करते हैं | आप योगियेकि हृदय-
मठ्यी क्णिकापर विराजमान रहते हैं | वेद और तंतजन
दूते हैँ कि आप पर्रह्मखरूप) तत््वरूप, तेजोरशि ओर
गलर हे | शर्ब | आप सर्वव्यापी। सर्वात्मा और ब्रिछलोकीके
पति हैं | भव ! इस जगतूमें जिसे परमात्मा कहा जाता हे)
हू आप ही हूँ | जगदगुरो ! इस जगतूमे जिसे देखने, सुनने
पवन करने तथा जानने योग्य बताया जाता है ओर जो
गत भी सूक्ष्म तथा महानसे भी महान् है। वह आप
| हूँ । आप चारों ओर हाथ) पर) नेत्र) सिर, मुख, कान
गर नाकबाले हैं; अतः आपको चारों ओरसे ममस्कार दे |
व्यापित । आप सर्वक्ष) सर्वेश्वद, अनाब्ृत ओर विश्वल्प हैं;
प विस्याक्षोो सत्र ओरसे अभिवादन है| आप सर्वेश्वरः
व्यक्ति रत्यमय। कब्याणकर्ता। अनुपमेय और करोड़ों
कि समान प्रभाशादी हैँ; आपको हम चारो ओरसे दण्डवत्
शाम दरते विश्याणयाध्य, आदि-अन्तगृन्यः टच्चीसवें
ये, नियामयरहित तथा समस्त प्राणियोंकों अपने-अपने
पिर्मि प्रतृत्त करनेवाले आपको हमारा सब ओरसे प्रणाम है ।
पि प्रकृति भी प्रवतंक, सबके प्रपितामद ओर समस्त
फंस ब्याप्त ६ आप परमेश्वरकी हमारा नमस्कार है।
जया तथा झाते-तखके शाता विशज्नन आपकी वरदायक,
#॥त रतन निवास करनवाटा, खयम्भू 3गर श्रति-तत्तश्ष
पढाते हैं) नाथ | आपने जयतमें अनेकों ऐसे काय क्रिये
कला एगार्गी संगयत यरे हो उंसाजियें देवता) आते,
क्षय और अन्पान्य खावर-जद्नम भी आपकी ही लुति
हित हैं। म्गी ! प्रिपरयाली दलोने इसे प्रायः नप्-सा
हि कष 5 भा पज्यप शीम दी उन अनुयंदा विगा
४॥ रससांये रद सजिये क्योकि देखलन । हम देदोंडे
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आपके शरणापन्न हुए हैं। अब आपकी जेसी इच्छा हों$
वसा कीजिये |
सनत्कुमारञ्नी कहते ह--मुनिवर ! इस प्रकार
महेश्वरका स्तवन करके देवगण दीनभात्रसे अज्ञलि बॉधकर
सामने खड़े हो गये | उस समय उनके मस्तक झुके हुए थे ।
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इस प्रकार भब सुरेन्द्र आदि देखान मटथरपी लुति की आर
विणुने ईंदान-सम्बन्धी सन्द्रका जप किया? तय सर्मेशर
भगवान शिव प्रसन्न हो गये आर शप्रार सयार दे वर्दी प्रझाद
हो गये | उस समय परायतोपति झिवदा सन प्रत्न था |
क्र
ब८ 7 सन्दीदखरदगी पीट सउतरभार पिध्याडा :
नयी नचयवविशाों पॉादस इतरखर वाया आल;
बट अब लक मम अल न्प नकल,
फ्िया और फिर ये सरदीपर हाथ उेझहर खाट ते गये अर
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२५८ ५: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन 5 [ संक्षिप्त-शिवपुणा]
वे विष्णु अथवा अन्य कोई द्वी उन्हें क्यों नहीं मास्ते ?
मुनीश्वर | शम्मुके ये बचन सुनकर उन समस्त देखताओंका!
तथा श्रीदर्कि भी मन उदास दी गया। जय खश्िकता
२ आर जन रु ० ख मी
ब्रहने देखा कि देवताओं आर विष्णुद्ध मुखपर 3 दाभी
छा गयी है। तब उन्होंने हाथ जोड़कर झम्भुसे कहना
आरम्म किया ।
व्रह्माजी बेलि--स्मेब्वर ! आप योगवेत्ताओर्म श्रं५)
परतरह्य तथा सदासे देवों और ऋियोंकी रक्षार्मे ततर
अतः पाप आपका स्थश नहीं कर सकता ) साथ ही आपके;
अवेशते ही तो उन्हें मोहमं डाला गया है | इसके प्रेस््क ते
आप ही हैं। इस समय अबश्य ही उन्हेंने अपने ध पका परित्याग
कर दिया है और वे आपकी भक्तिसे बिमुख हो गये हैं; तथापि आपके
सिवा दूसरा कोई उनका वध नहीं कर सकता। देवों ओर ऋपियों-
के प्राणपक्षक महादेव | ताथुओंकी ख्ताके लिये आपके द्वारा उन
स्लेच्छोंफका वध. उचित है । आप तो राजा के अतः
राजाको धर्मानुसार परापियोंका वव करनेसे पाप नहीं लगता;
इसलिये इस कॉटेकी उखाड़कर साथु-आ्राह्म गांकी रा कीजिये
राजा यदि अपने राज्य तथा स्वलोकाधिपत्यको खिर
रखना चाहता हो तो उसे अपने राज्यमें एवं अन्यत्र भी ऐसा
ही व्यवहार करना चाहिये | इसलिये आप देवगणोंकी रक्षाके
लिये उद्यत हो जाइये, विलम्ब मत कीजिये | देवदेवेश !
बड़े-बड़े सुनीश्व७ यज्ञ) सम्पूर्ण बेद; शास््र) मैं ओर विष्णु
भी निश्चय ही आपकी प्रजा हैं। प्रभो | आप देवताओंके
सार्वभौम सम्राट हैं| ये श्रीहरि आदि देवगण तथा साशण
जगत् आपका ही कुठुम्ब है । अजन्मा देव | श्रीहरि आपके
ः झुबराज हैं और मैं त्रद्म आपका पुरोहित हूँ तथा आपकी
आज्ञाका पालन करनेवाले श॒क्र राजकाये समालनेवाले मन्सत्री
हैं । सर्वेश ! अन्य देवता भी आपके शासनके नियन्त्रणमें
रहकर सदा अपने-अपने कारयमें तत्यंर रहते हैं | यह बिल्कुल
सत्य है ।
सनत्कुमारजी कहते है--व्यासजी [ ब्रह्माकी यह बात
सुनकर सुरपालक परमेश्वर शिवका मन प्रसन्न हो गया । तब
उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा ।
शिवजी वोले--ब्रह्मन | यदि आप मुझे देवताओंका
सम्राट बतल् रहे हैं तो मेरे पास उस पदके योग्य कोई ऐसी
सामग्री तो है नहीं; जिकसे में उस पदको ग्रहण कर सकूँ; क्योंकि
तो भेरे पास कोई महान दिव्य रथ है, न उसके उपयुक्त
किक नलन लि: «55७७७ ७ -#ऋ छल
है
सारथि है और ने रग्रामम विजय दिल्ानेयाले केसे फू
वाणी मई. कि जिन लेकर में ग्ोगोक़
रंगामम उसने प्रबल देत्योंका वध कर स्कू । बंका
थे चुप दी गये । परंतु शिवजीकी झीज्र प्रलुत होते न देलम्र
तमल देवता, क्या आदि ऋषि अलन्त बाबुढ
दुल्ली दो गये । तब भगवान् हरिने उनसे कहा ।
भगवान विष्णु बेले--देवों तथा गति !
क्यो दुखी ही रहे हो ? तुम्हे अपने सरि हुःखडा परिलषाग
देना चांहिय | अब तुम सब ठोग आददरूर्यक मेरे वात!
देवाण ! तुम्दां छोग बिचार करी कि महा ई९
आराधना सुल्ताध््य ग्ी होती। मेंने एसा दा हि
दाराधनमें पहले महान कट झेलना पडता ई। पीछे
दृदता देखकर इश्देव अवश्य प्रतक्न होते दे । परत *
समस्त गणोंके अध्यक्ष तथा परमेश्वर दे । ये तो आ%
ठहरे। अतः पहले ५३०० का उच्चारण कर्क किए नमः के
करे | फिर शिवाय! कहकर दो वार गुर्भका उच्च
उसके बाद दो बार “कुछ का प्रयोग कर्स फिर
नमः? ८3० जोड़ दे । ( ऐसा करनेसे ' ३० नम:
शुभ शुभ कुर कुद शिवाय नमः 32! यह मे से
बुद्धिविशारदों ! यदि तुमलोग शिवदी प्रतक्षता !
मन्त्रका पुनः एक करोड़ जप करोगे तो शिव
तुम्हारा कार्य पूर्ण करेंगे |? मुने ! प्रभावशीर श्र
यों कहा) तब सभी देवता पुनः शिवाराधन के
तत्पश्नात् श्रीहरि भी देवों तथा सुनियीकि कयी
हेतु शिवमें मन लगाकर विशेषज्ूपसे विधिपूवंक ४!
हो गये | मुनिश्रेष्ठ |! इंधर देवगण वैय॑त्सत्र है
(शिव? शिव? यों उच्चारण करते हुए एक कई
सामने खड़े हो गये | इसी समय खर्य साक्षात् है
स्वरूप धारण करके प्रकट हो गये और ये बहने ही
श्रीशिवजी वोले--रें ! तरक्षन. 2
ब्रतका पालन करनेवाले मुनियो ! मे तुमे *
प्रसन्न हो गया हूँ; अतः अब ठुमलेग 5
बर् माँग लो ।
देवताओमे कहा--देंवाधिदेव ! क्या
यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो देवोंकी ला
करके शीघ्र ही त्रिपुरका संहार कर दीजिये |
दीनबन्धु तथा कृपाकी खान ढ ।
8 की
रुद्रसंदिता |
४: सर्वदेवमय रथका वर्णन, शिवजीका उस रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्रस्थान 5:
री
ज्््ल्ल्ल्ल्स्स्स्ल्ल्लस्् ्ल्ललट्ल्टलल्ल्श््््य्य्य्स्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्ख्य्य्य्य्स्््य्य्य्स्य्स्म्स्म्य्ख्स्य्स्ख्स्श्क्ल्ण-
ट्म देवताओंकी बारवार विपत्तियोंसे रक्षा की हैं; अतः इस
समय भी आप हमारी रक्षा कीजिये |
सनन्त्कुमारजी कहते हँ--बह्ायन् ! तब ब्रह्मा ओर
विष्णुसद्दित देवोकी वह बात सुनकर शिवजी मन-दी-मन प्रसन्न
टुए, ओर पुनः इस प्रकार बोले |
... महेश्वरने कहा-हरे ! ब्रह्मन् ! देवगण ! तथा
, भुनियों ! अब त्रिपुरको नट्ट हुआ ही समझो । तुमठोग आदर-
पृथक मेरी बात सुनो ( ओर उसके अनुसार कार्य करो )।
गने पहले ज़िस दिव्य रथ) सारथि; धनुप और उत्तम बाणकों
; अग्रीकार किया के; वह सब झञीप्र ही तेयार करो। विष्णो
: तेथा विधे | निश्चय ही तुम दोनों त्रिदोकीके अधिपति हो;
.मल्यि तुम चाहये कि मेरे लिये पयत्नपूर्वक सम्राटके योग्य
सारा उपकरण प्रलुत कर दो | ठुम दोनों खछश्टिफे सजन और
पालन-कायम नियुक्त हो; अतः त्रिपुरको नष्ट हुआ समझकर
नास पड़नका कारण, शवजाद्वारा
।. सपेदेवसय रथका वणन, शिवजीका उस रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्रस्थान, उनका पशुपरति
जीद्वारा गणंशका पूजन ओर त्रिपुर-दाह,
तहावताके लिये यह काये अवध्य करो | यह झुभ
मन्त्र ( जिसका ठुमलागने जप किया हे ) मदन पुण्यम्यः
तथा मुझे प्रसन्न करनेवात्य है | यह भुक्ति-सक्तिका दाता
समूर्ण कामनाओंका पूरक ओर शिव-मक्तोके लिये आनन्द-
प्रद है । यह खर्गकामी पुरुषोंके लिये घन, यश ओर आयु-
की बृद्धि करनेवाल्य है । यह निष्कामके लिये मोल तथा साधन
करनेवाले पुरुषकि लिये भुक्ति-मुक्तिका साधक है। जो मनुप्य पवित्र
होकर सदा इस मन्त्रका कीतन करता हैं; सुनता दे: अथवा
दूसरेकी सुनाता हैं, उसकी सारी अभिलयाएँ पूर्ण हो जाती हें |
सनत्कमारजी कहते ह--मुने ! परमात्मा शिवकी
यह बात सुनकर सभी देवता परम यसन्न हुए ओर ब्रद्मा तथा
विष्णुकी तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ | उस समय विश्व-
कमाने शिवके आशानुसार विश्वके हितके लिये एक सवदेवगय
तथा परम शीभन दिव्य रथका निर्माण क्रिया |
( अध्याय ६--८ )
देवताओंकी
१.7०. ६-- ४
मयदानवका त्रिपुरसे जीवित वच निकलना
व्यासजीने कहा--शेबप्रवर समत्कुमारज्ी ! आपदी
44 पड़ी उत्तम है, आप सर्वश्ञ हैं | ताव ! आपने परमेश्वर
पिता जो कया सुनावी दे; बहू अत्यन्त अद्भुत ई । अब
मात विखकगाने शिवर्जीके लिये जिस देवमय एवं पर-
४४ दि्य रखा निर्माण फ्िया था। उसया वर्णन डीजिये ।
सूतर्जी कहत ई--ससे |! व्यासीदी यह बात रुमवर
पडर सनतुसार शियन्रीके चरणकमछाला सारण करके
आर
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व्िप्रद्ध ! सत्ताईसों नक्षत्र भी उस वामचक्रकी दी शामा बढ़ा
री थीं। विपश््ठ | छहीं ऋतएँ उन दोनों पर्टियोत्ी नेगि
बनी । अन्तरिति रखा अग्रभाग ःआ आर मन्दसचलगे रथदी
ठकका खान गद्य किया | उदवायल बयेर अलाइड--य
दानों उस रघाह इबर £ए | मदामंद अधिएणन हब्स और
शहल्वितायत ते उसके आखियरान दा खतल््ार सस रपट बग;
उत्तरायण और दरिगायन--दीनों लोडबारप्) सुद्ृ्त बन््पुर
(रट्ला) स्टाए उसकी व ड 7 2]4ाएफ इस घेरा ना वाह
अम्रनागठ छग सनदाा निर्मेप अनदूुष ६ मोखशलआड़।
दम स्व ाराार एप व आह 208 हि 7 आर, +
तथा सम अर मान व्य॥,एँ 5४ | भदमू [दव ताजा ब:: पर
हा ड़
रह जनक बा कक ही नि कह हक आफ कर ब्रा आह का +, 7“ 7 + | ५ + समान न्पि हि
पी प् आदर ध् “(६५९१ , *ै६ ५ ४ 47. न प ण्ड २७ || न्हएँ का न हे रं हक ह, के रु
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आश्रम उसके पाद बने | रादृस्त फर्णोसि सुग्रोभित शेषनाग
बन्धनरज्जु हुए ओर दिशाएँ तथा उपदिशाएँ: उसके पाद बनीं ।
पुष्कर आदि ती्थनि राजटित स्वणमय पताकाओंका स्थान
ग्रहण किया ओर चारों समुद्र उस रथके आच्छादन-वस्त बने |
गज्ना आदि सभी श्रेष्ठ सरिताओंने सुन्दरी स्लियोंका रूप धारण
किया और समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो हाथ नंबर छे
यत्र-तत्र स्थित होकर वे रथकी शोभा बढ़ाने छगीं। आबह
आदि सातेों वायुओंने स्वर्णमय उत्तम सोपानका काम संभाला |
लोकालछोक पवत उसके चारों ओरका उपसोपान ओर मानस
आदि सरोवर उसके सुन्दर बाहरी विपमसान हुए | सारे
वर्षोचछ उसके चारों ओरके पाश बने और नीचेके छोकोंक्े
निवासी उस रथका तल भाग हुए | देवाधिदेव भगवान त्रद्षा
लगाम पकड़नेवाले सारथि हुए. ओर ब्रह्ददेवत 5“कार उन
ब्रह्मदेवका चाबुक हुआ | अकारने विशाल छत्रका रूप धारण
किया । मन्द्राचल पाइव भागका दण्ड हुआ | शेलराज हिमालय
धनुष ओर खय॑ नागराज शेष उसकी प्रत्यञ्या बने | श्रतिरूपिणी
सरस्वती देवी उस धनुषकी घण्टा हुईं और महातेजस्वी विष्णु
बाण तथा अम्नि उस बाणके नोक बने | मुने ! चारों वेद उस
रथमें जुतनेवाले चार घोड़े कहे गये हैं | इसके बाद शेप बची
हुईं ज्योतियाँ उन अश्वोंकी आभूषण हुईं | विपसे उत्पन्न हद
वस्तुओने सेनाका रूप धारण किया; वायु बाजा बज नेवाले
और व्यास आदि मुख्य-मुख्य ऋषि वाहवाहक हुए. | मुनीश्चर |
अधिक कहनेसे क्या लाभ) मैं संक्षेपमें ही बतलाता हूँ कि
ब्रह्माण्डमें जो कुछ वस्तु थी? वह सब उस रथमें विद्यमान
थी । इस प्रकार बुद्धिमान् विश्वकर्माने ब्रह्म और विष्णुकी
आज्ञासे उस शुभ रथका तथा रथसामग्रीका निर्माण किया था ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--महर्े ! इस प्रकारके महान
दिव्य रथमें, जो अनेकविध आश्ररयंसे युक्त था, वेदरूपी
अश्वोंकोी जोतकर ब्रह्माने उसे शिवको समर्पित कर दिया |
शम्भुको निवेदित करनेके पश्चात् जो विष्णु आदि देवोके
. सम्माननीय एवं त्रिशूछ धारण करनेवाले हैं, उन देवेश्वरकी
प्रार्थना करके ब्रह्माजी उन्हें उस रथपर चढ़ाने छगे | तब
महान् ऐश्वयंशाली सर्वदेवमय शम्मु रथ-सामग्रीसे युक्त उस
दिव्य रथपर आरूदू हुए! | उस समय ऋषि, देवता, गन्धर्व,
2 लोकपाल ओर ब्रह्मा-विष्णु भी उनकी स्तुति कर रहे थे ।
गानविद्याविशारद् अप्सराओंके गण उन्हें घेरे हुए थे | सारथि-
: स्थानपर ब्ह्माको देखकर उन वरदायक धम्भुकी विशेष
" हुईं | छोककी सारी वस्तुओंसे कल्पित उस रथपर शिवजी
४ नमी रुद्राय शान्ताय बहाण परमात्मन ४ [
आच्च्च्च्च्च्च्च्य्च्यच्च्य्थ्च्य्य््स्सस्स्स्स्स्फ्म्प्फ्स्स्प्फ््प्पलपटटडटडलजर.-_- #“““++७०४४०ी जी ीी जनम अपन साम पतन यानन पर जि १ी00000॥0॥0ए0एएएययिशममपमम रुक कफ फ फ पक फल मा इन
संक्षिप्त-शिवषुणा[
पद ही रहे थे कि वेदसाभूत वे घोड़े सिरके वह भूमि
पड़े । प्रथ्मीम भूकम्प आ गया | सारे पर्गत आमाने छो।
सदशा झंपनाग शिवजीका भार ने सह सकनेक्े कर श्र
दी कप उठे | तब उसी क्षण भगवान् धरणीप्ल उ्म
नन््दीअरका रुप धारण क्रिया ,और रथके नीचे बन के
ऊपरका उठाया; परंतु नन्दीश्वर भी रथालद महेगे
उत्तम तेजका सहन ने कर सके, अतः उन्होंने तत्कढ ही एन
तुटने टक दिये। तत्यश्वात् भगवान् अह्याने शिवजी
हाथमे चाुक ले प्रोड़ोंकी उठाकर उस श्रेष्ठ सक्के
किया | तदनन्तर महेद्वाद्वरा अधिष्ठित उस उत्तम एप
हुए ब्रद्माजीने रथमें जुते हुए मन और वायुक्े समान वेग
वेदमय अश्रोक्ती उन तपस्वी दानबोंके आकाशखित तीनों]
लक्ष्य करके आगे बढ़ाया। तत्यश्वात् लोकके कब्वाग
भगवान् रद्र देवोकी ओर दृष्टिपात करके कहने छोगे-
श्रेष्ठ ! यदि तुमलोग देवों तथा अन्य प्राणियोंके विधय १
उयक् पदुत्वकी कल्पना करके उन पद्मओंका आधित
प्रदान करोगे, तभी में उन असुरोंका संहार कलूंगा
वे देत्यश्रे. तभी मारे जा सकते हैं; अन्यथा उरी
असम्भव है |?
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुने ! अगाध बुद्धि
देवाधिदेव भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर सभी के
पशुत्वके प्रति सशझ्जित हो उठे) भिससे उनका मन हि
गया । तब उनके भावको समझकर देवदेव अमिकाति ४
करुणा हो गये | फिर वे हँसकर उन देवताओंते इस #ः
बोले | ।
शस्भुने कहा--देवश्रेष्ठो ! पश्माव प्राप्त हविए
तुमलोगोंका पतन नहीं होगा | मैं उत्त पद्यभावसे वि की ४
उपाय बतलाता हूँ; सुनो ओर वसा ही करो | समाहित ५७
देवताओ | मैं तुमलोगोंसे- सच्ची प्रतिशा करता हूँ हि
दिव्य पाशुपत-ब्रतका पालन करेगा। वह पश्चुलते ा
जायगा । सुरश्रेष्ठो | तुम्हारे अतिस्क्ति जो अन्य प्राणी !
पादयपतजतको करेंगे, वे भी निल्सदेह पहले बृटआ
जो नेड्डिक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षा! !
वर्षतक अथवा तीन वर्षतक मेरी सेवा करेगा अर रा |
वह पद्त्वसे विभुक्त हो जायगा | इसल्यि 2 7
तुमलोग भी जब इस परमोत्कृष्ट दिव्य ब्रतका पालन हे
उसी समय पश्ुत्वसे मुक्त हो जाओगे--इसमें $£
नहीं है ।
|
रुद्रसंहिता ]
हे अमान
आम गिर ी श ध़छ उदै् धथ 455 5555559455 5973 न] ४७७/७/८ए"/""/४॥र/॥/४श/श//"-"शशश/आशआ/॥आआआर७७७७७॥७४७७४ंभ७७७७७०७७७७७७७७७७७७४७७७४७७//७एशेश/श///॥////श/शश/शोाी।
सनत्कुमारजी कहते हँ--महर्षे ! परमात्मा महेंश्वर-
# बचने सुनकर विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा---
तंथतिः--बहुत अच्छा; ऐसा ही होगा | इसीलिये बड़े-बड़े
रवता तथा असुर भगवान् झंकरके पत्मु बने ओर पय्चत्वरूपी
।दसे बिमुक्त करनेवाले रुद्र पश्मयपति हुए | तभीसे महेश्वरका
धाणुपति! यह नाम विश्वर्म विख्यात हों गया | यह नाम समस्त
टकमं कल्याण प्रदान करनेवाल्य है । उस समय सम्पूर्ण देवता
था ऋषि हमम्म होकर जय-जयकार करने लगे और देवेश्वर
बता) विष्णु तथा अस्वान्य प्राणी मी परमानन्दमम हो गये ।
इस अवसरपर महात्मा शिवका जेसा रूप प्रकट हआ था
उसका वणन सेकड़ों वर्षों भी नहीं हो सकता । तदनन्तर जो
या तथा सम्ूर्ण जगतके स्वामी ओर समस्त ग्राणियोंके सुख
दान करनेवाले हूँ, थे महेश्वर यों सुतज्ञित होकर निपुरका
पंद्वार परनेके लिये प्रश्चित हुए | जिस समय देवदेव
महादेव निपुरका विनाश करनेके लिये चले, उस अवसरपर
रंपराज आदि सभी प्रधान-प्रधान देवता भी उनके साथ
पखित हुए. । परबेतके समान विशालकाय उन सुरेश्वरोंका मन
उमन्न था) वे सूबके समान प्रकाशित दो रहे थे। वे समी
तपमि एल, शाल, मुसल) भुशुण्डि ओर नाना प्रकारके पर्व॑त-
ने विशाल आयुोकी घारण करके द्वाथी घोड़े। सिंह
सम और बेडोंपर सवार हो चल रहे थे | उस समय जिनके
एरीर परम प्रयाशमान थे और मन महान् उत्साहदसे सम्पन्न
भे तथा भी नाना प्रसार अख्र-शस्योंसे सुमझित थे; थे इन्द्र:
/ण। ॥र फिष्णु आदि देव शम्बुकी जय-जयकार बोलते
पड आगेआगे लछे | सनी दण्डी एवं जयधारी मुनि
| भदन उनसे और आदाशचारी सिझ तथा आरण पु्णोकी
लि लाने 5से । विल्न्द्र | निषपुरकी यात्रा करते समय जितने
एरे निरद्यद साथ थे; उसयी गंणसा करके जोन पार था
6 पधावि से ऊछा बस छझरता ह। योगरिन !
/ ५88) रा शक पर ! जेह्य्श तथा दइर्गगासते धिरवर
20200 इ पद 0 रेड रोग वर ड
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५४ शिवजीका पश्मपति नाम पड़नेका कारण, शिवजीद्धारा गणशका पूजन 5
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नसीब नाना. पी»? ७ स्अिलयमन डे बीज जजीओयी न कि+२* लगा ब्ब- ओ ना
मारा रात: _ाणाणभामणणा॥॥्ाभाभााआा४णााभााआआााएए्॥७एएएएाए न
बल्शाली वीर गणाध्यक्ष लक्ष्य-ल्क्षणक्री परवाह न करते हुए
महेश्वरकी घेरकर चल रहे थे |
व्यासजी ! तदनन्तर महादेव शम्पु सम्पूर्ण सामग्रियों-
सहित उस रथपर स्ित हो उन सुरद्रोहियोंके तीनों पुरोंको
पूर्णतया दग्ध करनेके लिये उद्त हुए। उन्होंने रथके शीप॑-
स्थानपर स्थित हो उस महान् अद्भुत धनुपपर प्रत्यश्ना चदायी
ओर उसपर उत्तम वाणका संघान करके वे रोपावेशसे
होठकी चाटने छगे | फिर घनुपक्री मूठको दृद्तापूवक पकड़-
कर ओर दृष्टिम दृष्टि मिलाकर वे वहाँ अचलभावसे खड़े दो
गये । परंतु उनके अगूठेके अग्रमागर्म स्रित होकर गणेश
निरन्तर पीड़ा द्वी पहुँचाते रहे, जिससे वे तीनों पुर त्रिशूलधारी
शंकरका लक्ष्य नहीं वन सके । तब पनुप-बाणधारी
मुझकेश विरूपाक्ष शंकरने परम शोभन आकाशवाणी सुनी ।
(उस ब्योमवाणीने कहा--) 'ऐड्ययशाली जगदीश्वर ! जबतक
आप इन गणेशकी अच॑ना नदीं कर लेंगे, तबतक इन
तीनों पुरोका संह्र नहीं कर सकेंगे ? तब ऐसी बात
सुनकर अन्धकासुरके निदन्ता मगवान् शिवने भद्धकालीकों
बुलाकर गजाननका पूजन किया | जब दृर्पपृर्वक विधि-विधान-
सहित अग्रभागमें स्थित उन विनावककी पृजा की गयी, तब
वे प्रसक्ष ही गये | फिर तो भगवान् दांकरकी उन तारक-पुत्र
महामनस्वी दंत्यकि तीना नगर यथोक्तरुपने आकाग्मर्म स्थित
दीख पढ़ें | इस विपयर्म कुछ लोग ऐसा करने हूँ कि अर
शिवजी त्वय॑ खतन्त्र; परम्रझ्ा) संगुण) निममुग) संधि रा
अलक्ष्य, स्वामी, परमात्मा) निरक्नन) परशदेवमय परलदयोद्ि
उगाज आर पंरेटिरआज 5 बट शेप | उंधा ली? अत
उपास्य कोई नदी ३, तब संबधि सन्दरनीव परस्थदाम्यरूप उसे
देखबर महहररक विययर्स यद बात उचित गयीं शान पठ्ली
कि उनकी कायलदि ऋग्यती कृपाएर अवहम्यित दे | रत
वैधापिदप परंदानी मउपर | शरण
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२६२ ४ नमो रुद्राय शल्ताय त्रह्मण परमात्मन :: | संश्षित्त- शिवप॒ाए
पका ४७252 या 3ामक ०२ जन आओ पक ही पक डप लक ससनलन
त्रिपुरनिवासी देत्योंके वधका पम्य भी आ गया दे | विभो ! पुर भी भक्त दा गये और एक साथ ही चार हार)
इसीलिये ये पुर एकताकों पाप्त हो गये हैं । अतः देखेश ! मसछायाली भूमिपर गिर पड़ | उस समय रिवजीओ प्र
जबतक ये त्रिपुर पुनः बिलग हीं उसके पहले ही आप अ तिक्मण कर देनेके कारण गकड़ों दल उकाक्षि
जग छोड़कर इन्हें भस्म कर डालिये ओर देवताओं- अभि जलकर दाद्मकार मत्रा दे थे | जब भेद
का कार्य सिद्ध कीजिये | वरिकाद जलने छा तब्र उसने अपने खामी मक्का
/गव्रान् इॉकरका रूरण किया और मकहीआ मरे
देखकर परम भक्तिपूर्यक गाना प्रकारे विद्यप ऋता:
व उनसे कहने लगा |
धुने | तदनन्तर शिवजीगे घनुपकी डोरी चढ़ाकर उसपर
ये पाशुपतात नामक बाणका संथान किया ओर उसे वे
त्रिपुरपंर छोड़नेका विचार करने लगे | शंकरजीने जित समय
अपने अद्भुत धनुषको खींचा था, उत तमय अभिजित् मुहूर्त तारकाक्ष बोछा--+भत्र | आप हमपर प्रक्ा ,
पछ रहा था| उन्होंने घनुपक्री टंकार तथा डुल्मह हमें जात हो गया 2? | इस सत्यके प्रभावसे आप प्नि:
सिंहनाद करके अपना नाम धोषित किया और उन महमुरों-. भाशयोंगद्वित दमका दग्व करेंगे। भगवन | जो देवता 5
३५३८६ स क् ३ पक रे के अलुरक्े लिये अग्राष्य $ बढ ( आपके सकते कर
5 ; नोौकपर अमगि- डलेभ लाभ दम प्राप्त दो गया। अब जित-जिस वोरिए
“नम धारण करें, वहाँ हमारी बुद्धि आपकी भक्ति मई
( की हे है थ आर 80 202 2
५ 26६ रहे |? मुने ! यों थे देत्य विलाप कर ही रहे थे कि शिरई
० 0! . े ५ रा 32 00700 2 आशा्ते उस अम्निने उन्हें अद्भुत रीतिसे जलाकर रात कै
हर पु 4 लि 22५2 १ वना दिया । व्यासजी ! और भी जो बालक और वृद्ध शत
2 हर ; 22 2:22) थे, वे शिवाशानुसार उस अम्रिद्वारा शीघ्र ही जलकर भर.
8 ३ हो गये | यहाँतक कि उन त्रिपुरमें जितनी ल्लियाँ और पु
(9६ व ये, वे सब-के-सब उस अमिसे उसी प्रकार दण हो फे
हे ६5% & 2 जैसे कल्पान्तमें जगत् भस्म हो जाता है | कि
। है भीषण अग्निसे कोई भी ख्थाबर-जंगम विना जले गहींका
हि किंतु असुरोंका विश्वकर्मा अविनाशी मय व ष़ा
न क्योंकि वह देवोंका अविरोधी, गस्भुके तेजसे सुरक्षि #
पक ।
पद्धक्त था| विपत्तिके अवसरपर भी वह महेसवरका शा!
वना रहता था। जिन देत्यों तथा अन्य प्राणियोंका मां
अभाव अथवा कत-अक्ततके प्राप्त होनेपर नाशकारक पतन ् क्
होता, वे विनाशसे बचे रहते हैं | इसलिये सतुक
अत्यन्त सम्भावित--उत्तम कर्मके लिये ही प्रबल कह
चाहिये; क्योंकि निन्दित कर्म करनेसे प्राणीका विनाश हो व
है अत | करे४ | न्
क्षय और जो विशेषर है । अतः ग्ित कर्मका आचरण भूलकर भी न क# ५
देव प्रतिष्ठित थे और जो पसे पापका विनाशक तथा "मय भी जो दैत्य बन्धु-वान्धवोंसहित शिवजीकी [री
८ +आाह जी जाज्वस्थमान शीघ्रगामी बाणने उने तत्पर थे, वे सब-के-सब शिव-पूजाके प्रभावसे ( दूसरे बला
द्ग्घ कर द्या | तत्पश्चात् वे तीनों गणोंके अधिपति हे गये । ( अध्याय ९-(० ।
9 57 ;
90) द अल
क् श # क्लब बा छजव [7(777--- उसम्भाव्य: सक्धि: कंतेंग्य एवं हि। गहंणात् क्षीयते 2] हा अल हे
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( शि० उु० रु० स॒॑० युद्ध० खें० हक ।
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न््ख्ख् ््य््य्य्य्य्य्य््य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्स्स्स्स्य्य्य्य्स्य्स्य्स्स््ः
अलमारी अम्मा +.
द्वाक्
देवाके स्तवनसे शिवजाका कोप श्ान्त हाना आर शिवजाका उन्हें वर दना, सय
दानवका शिवजीके समीप आना ओर उनसे बर-याचना करना,
शिवजीसे वर पाकर मयका वितललोकर्म जाना
व्यासजीने पूछा--महावुद्धिमान् सनत्कुमारजी ! आप
तो ब्रक्षाक्रे पुत्र और शिवभक्तोंमिं सर्वश्रेष्ठ हैं; अतः आप धन्य
ह हैं| अब बह बतछाइये कि त्रिपुरके दग्व दो जानेपर सम्पूर्ण
: देवताओंगे क्या क्रिया ? मय कहाँ गया और उन त्रिपुराध्यक्षी-
मै कया गति हुईं ? यदि यह ब्वतान्त दाम्मुकी कथासे सम्बन्ध
6 स्तनवात्य दो तो बढ़ सत्र विस्ताखूरवक मुझसे वर्णन कीजिये ।
/ सूतजी कहते हँ--सने ! व्यासजीका प्रश्न सुनकर
४ सुट्टिकर्ता बद्माके पुत्र भगवान समत्कुृमार श्िवजीके युगल
£ आरणका सारण करके बोले |
सनत्कुमारजीने कहा--महाबुद्धिमान् व्यासजी | जब
'मं'खरने दल्मेसि सचाखच भरे हुए सम्पर्ण त्रिपुर्को भस्म
कर दिया; तव सभी देवताओंकों महान आश्चर्य हुआ ।
उन समय झंकरजीके महान भयंकर रोंद्र रूपको; जो करोड़ों
मयोफ समान प्रकाशमान और प्रल्यकाीन अग्रिकी मँँति
तिशस्यी था तथा जिसके तेजसे दसों दिशाएँ प्रच्चकित-सी
गगप रही थीं; देसकर साथ ही दिमाचछ-पुत्री पावतीदेवीकी
इतर इषिपात करके सुसूर्ण देवता भयभीत दो गये। तव मुख्य-
कप इयता पिनग्न दीफर सामने खड़े हो गये | उस अवसरपर
वश) आप भी देखाओंडी बाहिमीकी भयभीत देखकर
£+४ था रए गे) ऊछ बोल गे सक्र। व चार्स अआरत शग्नुका
आम वरन लग | ततआत् ब्रद्म सी शियजीके उस रुपको
/ 03 भयभल है गये । तब उन्दोने उरे हुए विष्णु तथा
गा भार चप प्रदश् समन सावधसीयतेक डसे गिरेहानाटरित
के ५.५ हो इंभाई भा ६7 ये पैसा एशॉसस #जॉध)
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त ६ कई -ै३ैक९ «८६३3३ पोल बा सर हाई
देवताओने ऋहा--भगवन् ! देवदेवेश ! वदि आप
हमपर प्रसन्न हैं ओर हम देवगर्णोंकों अपना दास समझकर
बर देना चाहते हूँ तो देवसत्तम | जब-जब देवताओपर
दुःखकी सम्भावना हो, तब-तत्र आप प्रकेड होकर सदा
उनके डुःखोंका विनाश करते रहें |
समनत्कुमारज्ञी कहते हँ--महर्प | जय ब्रह्मा) यिय्णु
ओर देवताओंने भगवान् रुद्रसे ऐसी पार्थना की। तथ
वे शानत तथ[ प्रसन्न इोकर एक साथ ही सबसे बीले--*अच्छा:
सदा ऐसा दी होगा ।! ऐसा कहकर झंकरजीने, जो सदा
देवांका डुःल हरण करनेयाले हूँ, प्रसन्नतायुक देवोकिो
जी कुछ अभीश था वह सारा-का-सारा उन्हें प्रदान कर
दिया । इसी समय मय दानव जो शिवजीयी ऊुगके बसे
जलनेसे बच गया था, शम्भुक प्रसन्ष देखकर हर्वित मनसे
वहाँ आया । उसने विनीत भावसे हाथ जोड़वर प्रेमपरेकः
इर तथा मन््यान्य देवोंको भी प्रणाम किया। फिर यह
दिवजीक चरणांगं लोट गया । ततलओआत् दानव्थ्प्र मयगे
उठकर दिवजीकी ओर देखा | उस समय प्रेमक दारण
उसका गर्म भर आया और बंद सक्तिवण सित्तसे उस ही
खलुति करने लगा । दिजलेध ! मदर किये गये लयनकी
सुनकर परमेजर शिव प्रसन्न हे गये. और आइये
उससे केले | |
3 हु
शिवजीने कहा -चवानवणण० शय ! थे हुक्ञपर प्रसक्त
शत ल्ा फ् 4
आग हे और पति हमे जाई पीट |
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गे किये ९ कम ० का ्क ज्च् > है जे
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क जा 5० +5 * ४ कक जज $ -क ७» * +$ ८ न आआ 4
९४ जज अं पल - कागज आ5ा
] न
शदछ
वहाँ प्रसन्नचित्तसे मेरा
निवास कर | मेरी आज्ञसे कभी भी तुझम॑ आमसुर भावका
प्राकय्य नहीं होगा |
>> ०. >3 आर मत 4 तर 9 पलक... 8. फमाकी-.. धन 4:23 अं ही“ पाक 2.9. ३... आया "जह-+3-ल न ा-.आनयीक.. जारी ...आानी- आन, थम ण+ नमी न.
न हो। नाथ | निरन्तर आपके शुभ भजनम तल्लीन रूकर
निर्मय बना रहूँ ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यासजी | दंकर तो सबके
स्वामी तथा भक्तवत्सल हैँ | मयने जब इस प्रकार उन
परमेश्वरकी प्राथना की; तब वे प्रसन्न होकर मयसे थोले ।
महेश्यरने कह--दानवसत्तम |! तू गेरा भक्त हे
तुझमें कोई भी विकार नहीं है; अतः तू धन्य है। अब में
तेरा जो कुछ भी अमीटट वर दे। वह सारा-का-सारा तुझे
प्रदान करता हूँ | अब तू मेरी आश्ञासे अपने परिवारसहित
वितछ लोकको चला जा | वह स्वगंसे भी रमणीय दे | तू
भजन करते हुए निर्भर द्वोकर
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुने | मयने मददत्मा
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन 5
[ संक्षिप्त-शिवुणद्
शंकरकी उस आज्ञाकों सिर झुकाकर खीकार क्लिआ
उन्हें तथा अन्यान्य देवोंकी भी प्रगाम करके वह वितस्यम्न
नूछा गया । तदनन्तर महदिवर्जी देवताओंक्र उठ छत
कायेकी पृण॑ कएक दवा पाचता। आमने पुत्र और कह
गणोंसिदित अन्तवान दो गये | जब परिवस्मंत आर
हंकर अन्तर्टित दो गये। तब बढ़ घनुप, बा से:
सारा उपकरण भी अदृश्य दो गया । ततख्ात् ब्रह्मा) रिए
तथा अन्यास्य दय। मुनि) गत्वते किनर। नाग सेफ; अत
मनुपष्योंकी महान ह्प प्रात्त हुआ | वे समी शंकर उछ
यडाका बखान ऋरत हाए अआननन््दपृूर्वक आने अमने थरड
चले गये वर्दों पर्चकर उन्हें परम सुखकों थ्राति हैं|
महर्पें | इस प्रकार मेने शशझिमोडि इकरजीका विशाल चाह
जो त्रिपुर-विनाशकों सूचित करनेबाल तथा पसंद कट
युक्त दे) सारा-का-सांस तुम्द तुना दिया | ( अथाव ११४१)
| 4 (७ + '
दम्भकी तपस्या ओर बिष्णुद्दारा उसे पृत्र-आपिका वरदान, शब्गचूडका जन्म, ते आर उप
वर्प्रात्ति, बह्माजीकी आज्ञासे उसका पुष्करमं तुलसीके पास आना ओर उसके साथ
वातोलाप, त्रह्माजीका पुनः वहाँ प्रकट होकर दोनोंको आशीब वाद देना ओर
शह्चूडका गान्धव विवाहकी विधिसे तुलसीका पाणिग्रहण करना
तद्ननन््तर जलन्धरकी उत्पत्तिसे लेकर उसके चधतक-
का प्रसकहू खुनाकर सनत्कुमारजीने कहा--मुने | अब
शम्मुका दूसरा चरित्र प्रेमपूवेक श्रवण करो । उसके सुनने मात्नसे
शिवभक्ति सुदृढ़ हो जाती है। व्यासजी ! शह्युचूड नामक
एक महावीर दानव था; जो देवोंके लिये कण्टकखरूप
-था | उसे शिवजीने रणके मुहानेपर चिशूलसे भार डाला
था । शिवजीका वह दिव्य चरित्र परम पावन तथा पापनाशक
है | तुमपर अधिक स्नेह होनेके कारण मैं उसका वर्णन
करता हूँ; तुम प्रेमपूषक उसे श्रवण करो | ब्रह्माके पुत्र
जो महर्षि मरीचि थे, उनके पुत्र कश्यप हुए । ये मननशील,
घमिष्ठ, सृष्टिकतों, विद्यासम्पत्न तथा प्रजापति थे | दक्षने
प्रसन्ष होकर अपनी तेरह कन्याओंका विवाह इनके साथ
कर दिया | उनकी संतानोंका इतना अधिक विस्तार हुआ
कि उसका वर्णन करना कठिन है | उन कब्यप-पत्नियोंमें
एकका नाम दनु था। वह श्रेष्ठ सुन्दरी तथा महारूपवती
थी। उस साध्वीका सौभाग्य बढ़ा हुआ था । मुने |
उस दनुके बहुत-से महाबली पुत्र उत्पन्न हुए | विस्तार-
यसे उनके नाम नहीं गिनाये जा रहे हैं। उनमें एकका
नाम विप्रलित्ति था जो महान् बलनगाक्रमत समद्र ४|
उसका पुत्र दम्भ हुआ जो जितेखिया पार्क
विष्णुभक्त था | जब उसके कोई पुत्र नहीं ह४) के ँ
वीरको चिन्ता व्याप्त हो गयी | उसने
बनाकर उनसे श्रीकृष्ण-मन्त्र प्राप्त किया और पुल
घोर तप करना आरम्भ किया । वहाँ खुदद अपन
कृष्ण-मन्त्रका जप करते हुए. उसके एक ले
गये | तब उस तपस्वीके मस्तकतते एक हे ज्लाए
निकलकर सर्वत्र व्याप्त हो गयां। वह
पु
((५
इतना हु
कि उससे सम्पूर्ण देवता) मवि तथा मु हैः
उठे | तब बे इन्द्रको अगुआ वनाकर बह्माके व
हुए. । वहाँ उन्होंने सम्पूर्ण सम्पत्तियर्क दाता हि
प्रणाम करके उनकी स्तुति फी और फिर विशेषज्ञ हे
होकर अपना सारा बृत्तान्त उनसे के 3 ह
बात सुनकर ब्रह्मा मी उन्हें साथ लेकर रहे ता
बिण्णुकों सुनानेके लिये बैकुण्ठको चलें | जा
"सब लोगोंने च्रिलोकीके अधीश्वर तथा खत परमार
ज्|भध्यॉरज २५७०
विनीतभावसे प्रणाम किया ओर किर हाथ जोड़कर उनकी
लुति करने लगे |
देवता बोलि--देवदेव ! हमें पता नहीं कि वहाँ कौन-
ता कारण उतन्न हो गया है । हम किसके तेजसे संतत्त हा
उठे हें; बहू आप ही बतलाइये | दीनबन्धा ! अपने दुखी
सेबकके स्षक तो आप ही हैं; अतः शरणदाता ! रमानाथ |
हम शरणागतोकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।
सनत्कमारजी कहते हँ---मुने ! ब्रह्मा आदि देवताओं-
के वचनकी सुनकर दरणागतबत्सल भगवान् विष्णु मुस्कराय
ओर प्रेमपूर्वक बोले ।
विष्णुन कहा--अमरो ! शान्त रहो, घबराओं मतः
भयभीत ने होओ | कोई उलटयलट नहीं होगा; क्योंकि
अभी प्रत्यक्षा समय नहीं आया हैं। (यह तेज तो )
दम्म नामक दानवका है, जो मेरा भक्त हे ओर पुन्रकी
कामनासे तप कर रहा है । में उसे वरदान देकर श्ान्त
फर दूँगा ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुने ! भगवान् विष्णुके
यो ऋनेपर अक्मा आदि देवताओंकी व्यग्रता जाती रही,
थे सभी धंये घारण करके अपने-अपने घामको लोट गये |
रपर भगवान् अच्युत भी बर प्रदान करनेके लिये पुष्करको
पल पड़े) जद बंद दम्म नामक दानव तप कर रहा था ।
पहाँ पहुंचकर श्रीदरिने अपने मन्त्रका जप करनेवाले
भक्त पम्मज्षी सान्लना देते हुए मधुर वाणीमे कदा--
पर अंग !? तब विष्णुका उपयुक्त वचन सुनकर ओर
गंगे उपब्यत देखकर दम्म बड़ी भक्तिके साथ उनके चरणों-
| छटरांद है गया और बारंबार स्तुति करने हुए बोला ।
पृस्धन फहा--देवापिदेव !
सर 4.२
फसल्नयल ! आप
धर. २। समानाथ ! मुसपर कृपा बीजिये । सिल्यकेश
जि एड एसा बीर पुत्र दीजिये, जो आपका मत्ता तथा
तन पंत राउत्त हो । बहू ला
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समयके उपरान्त उसकी भाग्ववती पत्नी गर्भवती हो गयी ।
वह अपने तेजसे बरके भीतरी भागकों प्रकाशित करती हुई
शोभा पाने लगी। मुने ! श्रीकृष्णके पापंदोका अग्रणी जो
सुदामा नामक गोवग था) जिसे राधाजीने शाप दे दिया था;
वही उसके गरभमं प्रत्रिश हुआ था। तदनन्तर समय आनेपर
साधा दम्भपत्नीने एक तेजतलीी बालकों जन्म दिया । तब
पिताने बहुत-से मुनीब्रोंकी बुल्यकर उसका विधियृर्यक
जातकम आदि संस्कार समन्न किया | द्विजोत्तम | उस पुभ्रक्े
उत्पन्न होनेपर बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया। फ़िर शुभ
दिन आनेपर पिताने उस बालकका एसा नामकरण
केया | वह अयने पिताक घरम गुक्ल्यक्षके चन्द्रमाकी भति
बढ़ने लगा । वह अत्यन्त तेजी था; अतः उसने ब्रचपनमें
ही सारी विद्याएँ सीख लीं। वह नित्य बाल्क्रीशी करके
अपने माता-पिताका हर्ष बद़ाने लगा और अपने समस्त
कुठुम्वियोंका तो वह विशेषरूपसे प्रेम-माजन हो गया |
तदनन्तर जब श़ूचूड बड़ा हुआ; तब बढ जगीयब्य
निके उपदेशसे पुष्कर जाकर बअद्ाजीका प्रसन्न करनेफे
लिये भक्तिपूनक तपत्या करने छगा | उस समय वह एकांग्र-
मन हो अपनी इन्द्रियोंकी कायूम॑ करके गुरूपदिए अद्धवियाका
जप करता रहा। यों पुप्करम तपर्थया करते हुए दानयराज
शहुचूडको वर देनेके लिये लोकगुद एवं ऐकयंशाली क्रग्मा
री दी वहां पधारे और उस दानवेद्धसे बेडि--न्यर मांग !?
ब्रगाजीकी देखकर उसने अत्यन्त नप्नताप उन अभनियादन
किया और फिर उत्तम वागीसे उनकी लुति वी। नलथास्
उसने ब्रद्मासे वर मौँगते हुए फदा--नगयन ! ने इेबताओफ
लिये अजय हा जाऊ |? तब प्रद्मानी परस प्रसन्न ट्री २२ दाद
तथासु--एऐला दी होगा ।? हि नह
भीकछाकयन बद्दान दिा। भा मगतूद सम्प्भ गंड3!
भी मुझ और संयंत्र विजय प्रदान
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पहुँचा जहाँ घर्मष्यजकी पुत्री तुलसी तप कर रही थी |
सुन्दरी तुलसीका रूप अत्यन्त कममीय और मनोहर था|
वह उत्तम शीटसे सम्पन्न थी | उस सवीको देखकर शत़चूड
उसके समीप ही ठहर गया और मधुर वाणीमें उससे बोला ।
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शह्नचूडने कह--सन्दरी | तुम कौन हो ? किसकी
पुत्री हो तुम यहाँ चुपचाप बैठकर क्या कर रही हो ?
यह सारा रहस्य मुझे बतताओ |
सनत्कुमारजी कहते हैं--मने
लकाम वचन सुनकर तुल्सीने उससे कहा ।
तुलसी बोली--मैं धर्मध्वजकी तपस्विनी कन्या हूँ
२५ से कि 4
और यहाँ तपोवनर्म तप कर रही हूँ | आप कौन हैं ? सुख-
पूवंक अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये; क्योंकि नारीजाति
ब्रह्मा आदिको भी मोहमें डाल देनेवाली होती है | यह विष-
तुल्य, निन्दनीय; दोष उत्पन्न करनेवाली, मायारू पिणी तथा
विचारशीलोंकी भी श्रह्जुलाके समान जकड
कक ॥ मान जकड़
होती है | ्थ
'पनत्कमारजी कहते हैं--महर्रें | ठुलली जब इ्स
भकार रसभरी बातें कहकर चुप हो गयी, तब उसे मुसकराती
देखकर शह्डचूडने भी कहना आरम्भ किया |
उज्जचूड वोछा--देवि | तुमने जो बात कही है,
| शब्डचूडके ये
का ब् छ
«४ समा रुद्राय शान्ताय नहयग परमात्मन ८:
“5+5++०+3०-०++०५२७०५७०५................
[ संक्षित-शिवपुरागा
व सारी-की-गारी मिश्या हो, ऐसी
सत्य हे और
मुनो । द्ोभने !
2 आग्रगी हो। गेंद तो ऐसा विचार है ढ्ि जैसे मैं पद
कमी नहीं हूँ, उसी प्रकार स॒म्र भी क्राम-यराबीना नही है|
फिर भो इस साय में अद्ाजीकी आज्ते तुम्दारे कमर
आया हूं आर गान्यव विवाददी विधिसे तुम्द ग्रहण दहग।
भद्र | क्या तुम मुझ नदों जानती हो अथवा तुमने अमन
मरा नाम भी नहीां सुना द ? अरे ! देवताओंग माह
डालतत्राढा झाउुचूट में दा हूँ । में दनुका वंदाज तथा का
गामक दानवका पुत्र हूं। पृत्कालमे में औीदरिका पादद थ।
गया नाम सुदामा मोप था | इस समय मैं राधिकाजके शाम
दानव्राज झातचूड दोकर उत्तनन्न हुआ हूँ | थे बाएं
बातें मुत्त शात ई। क्योंकि श्रोक्ृण्णके प्रभावे मुझे अरे
पूमजन्मका स्मर्य बना हुआ है
बात नहीं है । उसमे कुछ
ऊछ अगनत्य भी | इसका विवश मुग्नने
जगमूर्म जितनी प्रतित्रता ना ह, उम्र
सनत्कुमारजों कहते हँ--मुने ! तुल्तीके एम
या कहकर झद्धचूड चुप हो गया | जब दानवरजने आह
पूवक तुलसीसे ऐसा सत्य वचन कहा) तब वह पर परत
हुईं ओर मुसकराकर कहने लगी |
तुलसी बोलो--भद्र पुद्ष ! आज आपने करे
सात्विक बिचारते मुझे पराजित कर दिया है | जो ए४
स्रीद्वारा परास्त न हो सके, वह संसारमें धन्यवादक ४
हैः क्योंकि जिसे त्वी जीत लेती है, वह पुद्य तदाचार ह
डुए; भी सदा अपावन बना रहता है । देवता हि *
पमस्त मानव उसको निन््दा करते हैं । जनता ह
भरणाशोचमें ब्राह्मण दस दिनोंमें, क्षत्रिय बारह दिन ।
वेश्य पंद्रह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है तथा झुद्धी गरदि ऐ
मासमें हो जाती है--ऐसा। वेदका अनुझातन कै दी ह
पराजित हुए पुरुयकी झुद्धि चितादाहक्रे अतिरिक *
किसी प्रकारसे सम्मव ही नहीं है। इसी कार. हा
पितर उसके द्वारा दिये गये पिण्ड-तर्पण आदिको है
अहण नहीं करते तथा देवता भी उसके बा के
गये पुष्प-फछ आदिको स्वीकार नहीं करते । हि
ज्रियोंद्वारा आहत हो जाता है; उसके ज्ञान) बी! कक
होम, पूजन, विद्या ओर दानसे क्या छाम ! की ;
ये सभी निष्फल हो जाते हैं । मैंने आपके विर्थो! |
ओर शानकी जानकारीके लिये ही आपकी पर
व्यय
१४ ०95: ७.
जा
यद्रसंदिता ] # शहुचूडका अखुरराज्यपर अभिषेक, उसके द्वारा देवोका अधिकार छीना जाना २६७
क्योंकि कामिनीकी चाहिये कि बहू अपने मनोनीत कान््तकी
परीक्षा करके ही उसे पतिल्पसे वरण करें |
सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यासजी ! जिस समय
तुलसी या बार्ताल्यप कर रही थी; उसी संमय खुश्कितां ब्रह्मा
वहाँ आ पहुँचे ओर इस प्रकार कहने लगे |
त्रह्माजीने कहा--शझ्डचूड ! ठुम इसके साथ क्या
ब्यथम वाद-विवाद कर रहे हो ? तुस गान्धव-विवाहकी मिधिसे
इसका पाणिग्रहण करो; क्योंकि निश्चय ही तुम पुदपरत्न हो और
यहू सती-साच्वी नारियाम रत्नखलूपा हे। ऐसी दछ्शाम निपुणाका
निपुणके साथ समांगम गुणकारी ही होगा। ( फिर ठुल्सीकी
ओर लक्ष्य करके बाले--) सती-साध्यों तुलसी ! वू एसे
छ
गणवान् कान्तकी क्या परीक्षा ले रही ३ तो देवताओं,
असुरो तथा दानवोंका मान मदन करनेवाह्ा इ। सुन्दरी !
तू इसके साथ समृर्ग लोकोंम सबंदा उत्तम-उत्तम खानोंपर
चिरकालतक यथेष्ठ विहार कर | शर्ीरान्त होनेपर बह पुनः
गोलोकर्म श्रीकृष्णकी ही प्रात होगा ओर इसबी मृत्यु दो
जानेपर तू भी वेक॒ण्ठमं चतुर्भन भगवानकों प्राप्त करेगी ।
सनत्कुमारञजी कहते है--मुने ! इस प्रकार आशीयाद
देकर ब्रह्मा अपने धामकी चले गये | तब दानव झर्चूडने
गान्धवे-विवाहक्की विधिसे तुलसीका पाणिग्रदण किया । यों
तुल्सीके साथ विवाह करके वह अपने पिताके सानकीा चला
गया और मनोरम भवनमें उस रमणीके साथ विद्यार करने
लगा । ( अध्याय १३--२१ )
जा आर 28» 3
शहूचूडका असुरराज्यपर अभिषेक ओर उसके द्वारा देवोंका अधिकार छीना जाना, देवोंका व्रत्माकी
शरणम जाना,
दाक्का उन्हें साथ लेकर तिष्णुके पास जाना, विष्णुद्वारा शहचूडके जन्मका
रहसयोद्घाटन आर फिर सबका शिवके पास जाना और शिवसभारम उनकी
झाँकी करना तथा अपना अभिग्राय ग्रकट
सनत्कुमारजी कहते हँ--महर्प ! जब शउचूडने
तप बरऊे वर प्राप्त कर लिया ओर वह विवादित दोकर अपने
धर लोट आया; तब दानवों और देव्योंको यड़ी प्रसब्नता हुई ।
पे सभी अमुर तुरंत ही अपने लोकसे निकलकर अपने गुर
घुकाइवका साथ छे दुरू बनाकर उसके निकट आये ओर
वितययूयक उसे प्रगाभ करके अमेकों प्रकारसे आदर प्रदर्शित
परत दुए उसदा खबन वरने लगे। फिर उसे अपना ते जलती स्वामी
पम धत्यन्त प्रमझावते उसके पाल दी खड़े हो गये | उपर
कमकुखर रा चूरने भी भरने कुझगुद सुक्यावका माता
भे कर बड़े आदर ओर भक्तिक साथ उन्दें साधा
४ पम दे । पदनस्तर गुर शुकाबा्यने समर असुर्य # चथ
पट उग से सम्मदिति शयुयुदुल दागझे तथा
लेप पा दग। इम्ज्यूप शद्धयूर प्रदार
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प्रभाद्वीन दी गये | इधर घूरबीर प्रतवाती दमग्सकगार दानवसत्
शझचूडने भी सम्पूर्ण ढोककोी जीमकर देवताओं दा साथ
अधिकार छीन छिया। बह तिलोकाडा आने अवीन कर्क
सम्यूण लोकोपर शासन करते लगा और स्वर्य इन्द्र बनह्र सारे
यज्षमागोंकी भो हृड़पने ढगा तथा आरनी रचित कूपरे। शाम)
सूप) अमि; यम ओर वायु आदि भथिार्शदा थी प्राठ्य
कराने लगा | उस समय गदान बेड पंसझूमल समन मे ततीर
शपचूद समस्त देखताओं। अरुर्गें
नागा; किनेरें॥ खंडन
कः श्ख ! आजम
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देवताओंके अतिरिक्त रामी जीव सुखी थे । उनमे किसी
प्रकारका विकार नहीं उत्पन्न होता था । चारों बर्णों ओर
आश्रमोंके सभी लोग अपने-अपने घमम स्थित रददतें थे ।
प्रकार जब वह ब्रिलोकीका शासन कर रहां थां। उस समय
कोई भी दुखी नहीं था; केबल देवता श्ातृ-द्रीहरबश दुःछ
उठा रहे थे | मुने ! महाबली शझ्ुचूड गेलेकनियामी
श्रीकृष्णका परम मित्र था। साधुस्वभाववाला व सदा श्रीकृष्ण-
की भक्तिमें निएत रहता था । पूर्वशापवश उसे दानत्रकी
योनि्म जन्म लेना पड़ा था; परंतु दानव द्वोनेपर भी उसकी
बुद्धि दानवकी-सी नहीं थी।
प्रिय व्यासजी | तदनन्तर जो पराजित होकर राज्यसे हाथ
धो बैठे थे, वे सभी सुरगण तथा ऋषि परस्पर मन्त्रणा करके
ब्रह्माजीकी सभाकी चले | वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीका
दर्शन किया ओर उनके चरणोंमें अभिवादन करके विशेषरूपसे
उनकी स्तुति की । फिर आकुलतापूर्वक अपना साथा ब्रत्तान्त
उन्हें कह सुनाया । तब ब्रह्मा उन सभी देवताओं तथा मुनियों-
को ढाढदस बेंघाकर उन्हें साथ ले सत्पुरुषोकी सुख प्रदान
करनेवाले वेकुण्ठलोककी चल पड़े | वहाँ पहुँचकर देवगणों-
सहित ब्रह्माने रमापतिका दर्शन किया । उनके मस्तकपर
किरीय सुशोभित था; कानोंम॑ कुण्डल झलमला रहे थे और
कण्ठ वनमालासे विभूषित था । वे चतु््॑ज देव अपनी चारों
भुजाओंमें शह्डू) चक्र! गदा और पद्म धारण किये हुए थे |
श्रीविग्रहपर पीताम्बर शोभा दे रहा था और सनन्दनादि सिद्ध
उनकी सेवामें नियुक्त थे । ऐसे स्रव्यापी विष्णुकी झाँकी करके
ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनीश्वरोंने उन्हें प्रणाम किया और
फिर भक्तिपूबेंक हाथ जोड़कर वे उनकी स्तुति करने लगे |
देवता बोले--सामथ्येशाली वैकुण्ठाधिपते ! आप देवों-
के भी देव और लोकके स्वामी हैं | आप त्रिलोकीके गुरु हैं ।
श्रीहरे | हम सब आपके शरणापन्न हुए हैं, आप हमारी रक्षा
कीजिये । अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले ऐश्वर्यशाली
त्रिलोकेश |! आप ही लोकोंके पालक हैं | गोविन्द |! लक्ष्मी
आपमें ही निवास करती हैं ओर आप अपने भक्तोंके प्राणस्वरूप
हैं, आपको हमारा नमस्कार है | इस प्रकार स्तुति करके सभी
देवता श्रीहरिके आगे रो पढ़े | उनकी बात सुनकर भगवन
विष्णुने ब्रद्मासे कहा ।
विष्णु वोले--अह्मन् | यह वैकुण्ठ योगियोंके लिये
भी दुल्म है | तुम यहाँ किस लिये आये हो ? तुमपर कौन-सा
'- आ पड़ा ६ £ वह यथाथरूपसे मेरे सामने वर्णन करो ।
. शरीरका वर्ण अत्यन्त गौर था । वे सभी
सनत्कमारजा कहते हँ--मुनें |! श्रीहरिकी बचा
सुनकर बहाजीन विनप्रमावसे सिर झुकाकर उन्हें बा
प्रणाम किया और अज्जलि बॉबकर परमात्मा विष्णुक्रे सम
घित हा देवताओं कष्ठते भरी हुई शद्मचूडकी सारी इजूत
कह सुनायी । तब समस्त प्राणियाक्त भावाक जाता भार
श्रीहरि उस बातकों सुनकर दँस पढ़े ओर वक्त उस झूसक
उदमारन करते ए बाले ।
श्रीभगबानन कहा--क्मछ्योनि ! में झद्ठपूत्
सांग ध्रृत्तान्त जानता | पूव॑जन्मम वह मदातंजली गत गे
जे मेरा भक्त था। में उसके ज्रत्तान्तसे सम्बन्ध रखबवाह़ ई
पुसातन इतिद्वासका वर्णन करता हें) छुतो। इसमे किसी
का रंदिद नहीं करना चाहिये | भगवान् शंकर सब कह
करेंगे । गोलाकर्म मेरे द्वी रूप श्रीकृष्ण रहते हैं | उनकी
श्रीरावा नामसे विख्यात हे । बह जगजननी तथा मी
परमोत्कृ2 पॉयत्ी मूर्ति है | वही वहाँ दुल्दरत्पर्त हि
करनेबाली दे । उनके अड्जसे उद्भूत वहुत-त गोप
गोपियोँ भी वहाँ निवास करती हूँ । वे नित्य रधाह/
अनुवर्तन करते हुए उत्तम-उत्तम क्रीड़ाओंमं तलर रही
वही गोप इस समय शम्मुकी इस लीलसे मोहित हेकर श*
अपनेको दःख देनेवाली दानवी योनिको प्राप्त हो गया ई
श्रीकृष्णने पहलेसे ही दद्रके निश्यलसे उसकी मृत्यु वि्षो
कर दी है। इस प्रकार वह दानव-देहका परिताग कई 5
कृष्ण-पार्पद हो जायगा | देवेश ! ऐसा जातकर ठाह ५
करना चाहिये | चलो, हम दोनों शंकरकी शराम चछ
शीम्र ही कल्याणका विधान करेंगे। अब हैंगे
समस्त देवोंको निर्मय्र हो जाना चाहिये |
कहकर बहा
सनत्कुमारजी कहते हैँ---पने ! या के
विष्णु शिवलोकको चले । मांगम वे मन-ही-मंन मे
सर्वेश्वर शम्मुका स्मरण करते जा रहे ये । व्यापजी
प्रकार वे. स्मापति विष्णु ब्रह्माके साथ उरी
शिवलोकमें जा पहुँचे, जो महान् दिव्य!
भौतिकतासे रहित है | वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिवरजीती हे
का दरशन किया । वह ऊँची एवं उत्के४ प्रभाववाल
प्रकाशयुक्त शरीरोंवाले शिव-पार्षदोंसे पिरी होनेके हर
रूपसे शोमित हो रही थी । उन पार्षदीकी ।
कान्तिसे युक्त महेश्वरके रूपके सहश थी | उनके 4 ॥
थीं, पाँच मुख ओर तीन नेत्र थे । गलेमें न
रुद्रसंदिता ] $ देवताओंका रद्धफे पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, झद्वद्वारा उन्हें आश्वासत # २६५९
विश फेर आ जाया पा की यम कारक आशा पारा रा ारआााााााआभ“ंभभंभभम7॥७७७७४७७७७७७॥७४७४७७७॥७/७एेएशश///४७७७॥॥/0७0एश॥0/0४४॥७७७७७७॥७/७॥७४॥/ए७८ए"स्शश॥/शाशओ ७ आल
सद्रात्ष ओर मस्मके आमरणसे विभूषित थे। वह सनोहर सभा
नत्रीन चद्धमण्डलके समान आकारताढी और चोकोर थी।
उत्तम-उत्तम ममियों तथा दहीरोंकि दारोंते वह सजायी गयी थी |
अमृत्य रनोंके बने हुए कमल-त्रोंसे सुशोमित थी । उसमे
मभियाका जाट्योंसे युक्त गवाक्ष बने थे, जिससे वह चित्र
विचित्र दीख रही थी । दंकरकी इच्छासे उसमे पद्मराग मणि
जड़ी हुई थीं। जिससे वह आअदुमुत-सी लग रही- थी | वह
समन्तकमणिकी बनी हुई सेकड़ों सीढ़ियंसि युक्त थी | उसमें
नोरें आर इद्धरनील मणिके खंगे लगे थे, जिनपर खगसृत्नते
प्रधित चतदनके सुन्दर पछवर लथ्क रहे थे, जिससे बह मनका
माद झती थी। वह भल्ेभाति संस्कृत तथा सुगन्बित वायुसे
सुवालित थी | एक सदस्ष बोजन विस्ताखाली वह सभा बहुत-
से किररोंसे खबाखच मरी थी । उसके मधच्यमागर्में अमूल्य
सलेक्ाय निर्मित एक विचित्र सिंहासन था) उसीपर उम्रामइत
'शेकर पियजमान थे । उन्हें सुरेखर विष्णुने देखा । ८
तीएकाओसि धिरे हुए चन्द्रमाफे समान लग रहे थे | वे
(5, कुण्दल आर रत्नींकी सालाओंते विभूषित थे | उनके
॥र अग्र्म मझ रमावी हुई थी और वे लोटा-क्रमछ पारण
किये हुए थे | महान् उल्लासते मरे हुए उमराकान्तका सन
शान्त तथा प्रसन्न था। देवी पार्यतीने उन्हें सुवासित ताम्बूल
प्रदान किया था जिसे वे चया रहे थे | शिवगग हाथमं इबेत
चँवर लेकर परमभक्तिके साथ उनकी सेवा कर रहे थे ओर
सिद्ध भक्तिवश सिर झकाकर उनके सतवनम लगे थे । थे
गणातीत, परेशान, चिदेवोके जनक सबब्यापी, निर्विकत्य)
निराकार। स्वेबच्छानुसार साकार) कल्यागलहूप, मसायारहितः
अजन्मा। आदर मायाके अधीश्वर, प्रकृति ओर पुदयसे भी
परालर, सवतमथ, परयिणतम आर समतायुक्त हैं । ऐसे
विशिष्ट गुगोंते युक्त शिवकी देखकर ब्रद्मय ओर विष्णुने द्वाथ
जाड़कर उन्हें प्रभाम किया ओर फिर वे ल््तुति करने लगे ।
विविध प्रकास्से लुति करके अन्तर्म वे बोलि--भगवन् !
आप दीनां आर अनाथाोंक सहायक दीनेंकि प्रतिवालक:
दीनबन्धु) जिलाकीके अधीबर और दारणागतसत्सल |
गारोश | हमारा उदार काजिय | परमेश्वर | एमपर कृपा कीलिय ।
नाथ ! दस आपके दो अवान हां। अब आपकी जलती इच्छ
हो) वसा करें | ( अध्याव २९-३० )
जजज्+->->_लाए्5उ >-प+++
घताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्रद्मरा उन्हें आश्वासन ओर चित्रस्थक्ो
गहचूडके पास भेजना, चित्ररथके लोटनेपर रुद्र
का गणों, पुत्रों आर भद्रकालीसदित युद्धके लिये
प्रधान, उधर शह्नचूडका सनासाहत उुष्पभद्धाक तठपर पड़ाब डालना
तथा दानवराजक दत आर शका वतचात
सनत्फुमार जी कहते ह--मुने ! तदसल्तर जो अत्यन्त
पाक पास दी गये थे, उन अदा और वि्युत्ा बचने
पुर जिएडी सदशन और सेषगजगाऊँे समान गग्भीर
आन 7]
शबज्षीन कदा--४ एंर ! दे प्रझ्यन | सुमहोग शाप
हज] उन ॥एछ भेयकी लबभा झाग दी | निरसरेट
कई अत्पय हगा। में ाइचूरया सत्य वु्यास्स यधाध
सम मा 072 766 270 5 /000।
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सनत्कुमारजी कहते हैँ--व्यासजो | महेशरके उस
अम्ृतस्तावी वचनको सुनकर सम्पूर्ण देवताओंकी परम आनन्द
नात्त हुआ | उस समय उन्होंने समझ छिया कि अब दानव
शज्भचूड मरा हुआ ही है । तब मददेश्वरके चरणोंमें प्रणिपात
करके विष्णु वेकुण्ठको और ब्रद्मा सत्यलोककी चले गये तथा
सम्पूण देवता भी अपने-अपने स्थानको प्रसित हुए | इधर
उन महादद्रने, जो परमेश्वर, दुश्ञेके लिये कालर्य ओर
सत्पुरुषोंकी गति हैं, देवताओंकी इच्छासे अपने मनमें गाज चूड के
वधका निश्चय किया | तब उन्होंने प्रसन्नतापुवंक अपने प्रेमी
गन्धवेराज चित्ररथकों दूत बनाकर शीत ही शह्चूडके पास
भेजा | चित्ररथने वहाँ जाकर श््चचूडकों खूब समझाकर कहा,
परंतु उसने बिना युद्ध किये देवताओंको राज्य लोटाना स्वीकार
नहीं किया ओर कहा--मैंने ऐसा दृढ निश्रय कर लिया है
कि महेश्वरके साथ युद्ध किये बिना नतो में राज्य ही वापस
दूँगा और न अधिकारोंको ही लैटादुँगा | तू कल्याणकर्ता
रुद्रके पास छोट जा और मेरी कही हुईं बात यथार्थरूपसे
उनसे कह दे। वे जैसा उचित समझंगे, वैसा करेंगे |
तू व्यर्थ बकबाद मत कर |?
सनत्कुमारजी कहते हैं--.पुनिश्रेष्ठ | यों कहे जानेपर
वह शिवदूत युष्पदन्त ( चित्र॒रथ ) अपने स्वामी महेश्वरके
पास छोट गया और उसने सारी बातें ठोक-ठीक कह दीं |
तब उस दूतके वचनको सुनकर देवताओंके खामी भगवान्
शंकरको क्रोध आ गया। उन्होंने अपने वीरभद्र आदि
गणोंसे कहा | द
रुद्र बोले--हे वीरभद्र ! हे नन्दिन् ! क्षेत्रपाल | आठों
भेरव |! मैं आज शीघ्र ही श हैचूडका वध करनेके निमित्त
चलता हूँ, अतः मेरी आज्ञासे मेरे सभी षलशाली गण आयुध्ोंसे
लेस होकर तैयार हो जायें और अभी-अभी कुमारों ( खामि कार्तिक
और गणेश ) के साथ रणयात्रा करें। भद्गकाली भी अपनी
सेनाके साथ युद्धके लिये प्रस्थान करें |
जनत्कुआरजी कहते हैँ--मुने ! ऐसी आज्ञा देकर
शिवजी अपनी सेनाके साथ चल पड़े । फिर तो सभी वीरगण
हृषेमम होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे | इसी समय सम्पूर्ण
सेनाओंके अध्यक्ष स्कन्द और गणेश भी इसे भरे हुए कवच
धारण करके सशस्त्र शिवजीके निकट आ पहुँचे। फिर वीरभद्र,
.
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मी
हे समर किला दल कम नमन नल सबक कल के डए इचवस्शश्थिम्म्म्लसमिल्लल्लिज्ज्डज--
॥ संक्षित-शिवपुराणा
नन्दी, मद्गकाल) सुभद्रक) विशालक्ष, बाग, पिज्या,
विकग्पन) विलय) जिक्ति, मणिमद्र, वराप्कल, कीठ, दो
विकार; ताम्रठोचन, कालंकर, श्र।भद्र, कालनिड्ठ, कर्क
बलोसात्त, रंगस्लाच्य, दुर्जन तथा दुर्गम आदि गणवाक हे
अधान-यथान सेनापति थे, शिवजीके साथ चढ़े | अडे
गणोंकी धज््या करोड़ों करोड़ थी | आ्ों भंख़, पक्न्न
भर्वकर र८) आठों वमु, इन्द्र, बारहों आदिय, अग्नी ब्रा
विश्वकर्मा, दोनों अशिनीकृमार, कुबेर; बम; निम्न॑ति, तक
वायु) बढ) छुथ, मजेल तथा अन्यात्य ग्रह पए
कामदेव, उग्रदंट्र, उम्रदण्ड, कोरट तथा क्षेटम आल
शीत दी मदथरका अनुगमन क्रिया । खबं मोहेशी
भद्काली भी सो भुजा घारण करके शिवजीके साथ ्
वे उत्तमोत्तम रतोंसे बने हुए विमानपर आरुढ़ यीं। अं
शाररपर लाल चन्दनका अनुलेय लगा था ओर लहर
शोभा पा रू था। वे हर्पप्रम्म होकर हँसती, नावतीओं
उत्तम तरसे गान करती हुई आपने भक्तोंक्रो अगर
शत्रुओंकी भय प्रदान कर रही थीं | उनकी एक योज में
भोपणाकार जिहा ल्पलपा रही थी। वे अपने होंगे थे
चक्र, गंदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुप्र बाण, एक वेश क्
विस्ताराल| गहरा गोल्यकार खप्पर, गगनजुम्मी
एक योजन लंबी शक्ति, मुद्गर, मुसल, वचन) खड़े) रे
फलक, वेष्णवात्त) वादणास््र) वायव्यात्न) नागपाश) वाणयाई
गन्धर्वाल्न, अ्रह्मास्र, गारुडाल्न) पर्जन्यात्र) पाग्ाता
इम्मणासत्र, पवेतात) महान् पराक्रमी सूर्यात्र। शल्ताः
महानल, महेश्वरात्न, यमदणष्डासत्र, सम्मोहनात्न वर्षो का
दिव्य अन्न ओर अन्यान्य सैकड़ों दिव्यास्र धारण डर क्
थीं। करोड़ों योगिनियाँ तथा डाकिनियाँ उनके ला
फिर भूत) प्रेत, पिशाच, कृष्माण्ड, ब्रह्मराक्षत) वेताक
यक्ष और किंनर आदिसे बिरे हुए स्कदने पते
आकर उन चन्द्रशेखरको प्रणाम किया ओर उती्
पाश्चमागमें स्थित होकर सहायकका खान आह हि
तंदनन्तर रद्वरूपधारी शम्म्र अपनी सारी सनकी " *'
करके शह्लुचूडके साथ छोहा लेनेके लिये निर्मला
बढ़े ओर देवताओंका उद्धार करनेके लिये चंद्रमा
तटपर मनोहर वव्वृक्षके नीचे खड़े हो गये | के
व्यासजी | उधर जब शिवदूत चल गरवाः हे ह
शड्नचूडने महलके भीतर जाकर ठुलसीते वह
कह सुनायी |
/ डिये उयत हो अपने वीर सेनापतिको बुलाकर
जज की कक
रुद्रसंदिता ]
शझचूडने कहा--“देवि | झम्भुके दूतके मुखसे
( रनिमन्त्रण सुनकर ) में युद्धके लिये उद्यत हुआ हूँ. ओर
उनसे जुझनेके लिये में निश्चय ही जाऊँगा। तुम इसके लिये
मुस्स आशा दो |? यों कहकर उस जश्ञानोंने अपनी प्रियाकों नाना
प्रकारत समझावा । फिर ब्राह्ममुह्तमें उठकर प्रातःक्ृत्व
सात किया और पहले नित्यकर्म पूरा करके वहुत-सा दान
दिया। तसश्र/त् अपने पुत्रक्की सम्पूर्ण दानवोंके राज्यपर
अभिषिक करके उसे अप्रनी भार्या, राज्य ओर सारी सम्पत्ति
समपित कर दी | पुनः जब उसकी प्रिया तुलसी रोती हुई
उसकी रणयात्राका नियेध करने छगी, तब राजा झह्डचूडने
नाता प्रकारकी कथाएं कहकर उसे ढादस वेंघाया | तदनन्तर
उस समाहत दानवराजने कबंच धारण करके युद्ध करनेके
उसे आदेश
4 हुए कहा |
शहुचूड वालछा--सेनापते ! मेरे सभी वीर, जो
सत्र कावास कुशल ओर समरमे शोभा पानेवाले हैँ, आज
लअिच धारण करक युद्धके लिये प्रथान करें । शरीर दानवों
और दा छियायी ठुकड़ियाँ तथा बलशाली कझ्लोंकी निर्भाक
नाए अश्न-शय्स सुप्रशित द्वोकर सगरसे बाहर निकर्के ।
हा प्रारत पराक्रम प्रकट करनेवाले जो असुरोंके पचास
इल ४) थे भी देवोके पक्षपाती शम्मुस्ते युद्ध करनेके लिये
पपित हो। मेरी आशमे धोग्मोके सो कुछ भी कचसे
ववपित हे शग्सके ताथ छोदा झेनेफे लिये शीम ही निकले ।
पिदकओ) मात दोहदीं तथा काडकोंकों भी मेरी यह आशा
(ह दी कि च ग2 4; से सम्राम करनेक्र लिये रण-सामग्रीसे
४१.० ए १5 |
सनतयमार्जी
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२७३
उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाल्ा था। पुण्वक्षेत्र भारतमे वह
कपिल्का तपःस्ान कहछाता था | वह भूभाग पश्चिम समुद्रसे
पूर्व, मलयपवंतसे पश्चिम, श्रीशेलते उत्तर और गन्वमादनसे
दक्षिण था | उसकी चोड़ाई पाँच योजन ओर लंबाई पाँच तो
योजन थी। भारतके उस भागमें उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली
तथा झुद्ध स्कटिकके समान खच्छ जलसे परिपूर्ण पुष्पभद्रा ओर
सरखतो नामकी दो रमणीय नदियाँ बहती हैँ । सदा सोभाग्यसे
संयुक्त रहनेवाली ल्वणसागरकी प्रिया भागा पुप्पमद्रा सरखतीके
साथ हिमालवबसे निकली दे ओर गोमन्तपवंतकों बार्ये करके
पश्चिम समुद्रमं जा मिली दे। वर्दां पहुँचकर शउ्ुचूडने
शिवजीकी सेनाको देखा |
मुने ! उसने पहले शिवजीके पास एक दानवेश्वरफो
दुतके रूपम भजा। उसने शित्र्जीसे युद्ध न करनेके लिये
कहा ओर शिवजीने उसे देवताअंका राज्य लोग देनेकी बात
कही | अन्तम महखरने कद्ा-- दूत | एम किसीका भी पक्ष
नहीं लेते; क्योंकि टूम तो कभी खतन्न रहते ही नहीं, सदा
भक्तीके अबीन रदते ई ओर उनकी इच्छासे उन्हींका ढार्य
करते रहते हैं । देखो; पूनकालम अद्माकी प्रायनासे पदछे-पदल
प्रल्य-तमुद्रम श्ीहरि ओर दल्वश्रेष्ठ मधु-केटभरा भी युद्ध हुआ
था। पुन भक्ताके हितकारी उन्हों श्रीविष्िणुने देवताभंकि
प्राथना करनेपर प्रह्ददके कारण टिरसपत्श्चिपुछा 9 टेट
था | तुमने यह भी ठुना होगा क्लि पहले जो मम जिपरोकि
ताथ युद्ध वरके उनेें भग्म कर ठाड़ा था; व नी ददोनी
प्राथनापर दी हुआ था । प्यडालमे सर्देच्चसे जगज्ननीज नो
शुम्भ आदिके साथ सुद्ध हुआ था और विनमे उन्दोंने उस
दुत्यंका वध कर उाहझा था। व नी दंबताआफ प्रासा
परमेपर ही घटने का भा | दे हा हे पागए ह59॥ 5४
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जी नई बन घर बडे 2 है +.. 3.८ ् ६ कत्ड चर 2 5 था
2४ नमों रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने $
वीक विता- "की अध्टान-नबज०मकी-+-०+. यू.
२७२ | संक्षिप्त-शियपुणाणाह
७०७०... *अधाहन्पुकरप्य+ पका ही र५७३०4+--.. "एम बूही'. धन-+-रााका' मय)... >->पकमप३मयपाहम+3०+- पैक" क- "7 रकक+ क 3 का... “या. -. 3४० २७ +-अफममदुकमष-बढा,
उचित समझेगा। वेसा करेंगा। मुझे तो देवताओका काय
करना ही दे |? यो कदुफर कल्याणकर्ता मदेबर चुव दी गये |
कब» >है० ह
तब झज्जचूडका बह दूत उठा और उसके पान चढ द्ि।
( अथाव ३१-१९)
देवताओं ओर दानवोंका युद्ध, शहचूडके साथ वीरभद्रका संग्राम, पुनः उसके साथ भद्रकादीका भा
युद्ध करना ओर आकाशवाणी सुनकर निश्वत्त होना, शिवजीका शह्डचूडके साथ युद्ध शा
. आकाशवाणी सुनकर युद्धसे निश्वत्त हो विष्णुकों ग्रेरित करना, पिष्णुद्वारा शहृचूढके
कमच ओर तुलसीके शीठका अपहरण, फिर रुद्रके हाथों त्रिशलद्वारा
शहूचूडका वध, शहकी उत्पत्तिका कथन
सनत्कुमारजी कहते हँ--महर्प | जब उस दूतने साथ बृद्षति घमसुद्ध करने लगे | इस प्रकार उतर महदुद
शइचूडके पास जाकर विस्तारपृूतंक्क शिवजीका बचने कई
सुनाया तथा तत्त्वतः उनके यथार्थ निश्रयकी भी प्रकट क्रिया,
तब उसे सुनकर प्रतापी दानवराज शहचूडने भी परम
प्रसन्नतापूयक युद्धको ही अज्ञीकार किया | फिर तो बह तुरंत
ही मन्त्रियोंसहित रथपर जा बेठा ओर उसने अपनी सेनाकी दंकरके
साथ युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। इधर अपिलेश्वर
शिवजीने भी तत्काल ही अपनी सेनाकोी तथा देबाकी आगे
बढनेकी आज्ञा दी और स्वयं भी लीलावश युद्धके लिये संनद
हो गये । फिर तो शीघ्र ही युद्ध आरम्भ हो गया ) उस समय
नाना प्रकारके रणवाद्य बजने लगे | वीरेंके शब्द और
कोलाहल चारों ओर गूँज उठे । मुने | इस प्रकार देवताओं
ओर दानवोंका परस्पर युद्ध होने छगा | उस समय वे दोनों
सेनाएँ घर्मपू्वेक जूझने लगीं | खय॑ महेन्द्र बपपर्वाके साथ
लड़ने छगे और विप्रचित्तिके साथ सूर्यका धर्मयुद्ध होने लगा |
विष्णु दम्भके साथ भीषण संग्राम करने लगे | काल्यसुरसे
काछ) गोकर्णसे अभि, कालकेयसे कुबेर, मयसे विश्वकर्मा,
भयंकरसे मझत्यु, संहारसें यम, काछाम्बिकसें वरुण,
चश्चलसे वायु) धटपछसे बुध, रक्ताक्षसे शनैश्वर, रक़सार-
से जयन्त। वचांगणोंसे वसुगण, दोनों दीपछ्िमानोंसे दोनों
अश्विनीकुमार; धूम्नसे नल्कूबर, धुरंधरसे घर्म, गणकाक्षसे
मनज्नछ) शोभाकरसे वेश्वानरः पिपिट्से मन्मथ) गोकामुख,
चूर्ण, खज्ज; धूम्र। संहल प्रतापी विश्व और पलाश नामक
असुरोंसे बारहों आदित्य घमपूर्वक लोहा लेने रंगे | इस प्रकार
शिवकी सहायताके लिये आये हुए, अमरोंका असुरोंके साथ
युद्ध द्ोने लगा । ग्यारदों महारुद्ध महान् बछ-पराक्रमसे सम्पन्न
ग्यारह भयंकर असुस्-वीरोंसे मिड गये | उम्र और चण्ड
आदिके साथ महांगणि, राहुके साथ चन्द्रमा और शुक्राचार्यके
नन्दीद्वर आदि सभी शिवगण श्रेष्ठ दानवोंकि ताथ ढंद
_ुरने छंगे । विस्तारमयसे उनका प्रथक बन हद
गया दे | सुने ! उस रुूमय सारी सेनाएं निसतर युद्ध दर
थीं आर शम्भु काव्यसुतके साथ वद्वृक्षक तीच वेरुद्ी
| उधर शदह्गचूड भी रताभरणासि विभूपत हैं क्र
दानबोंके साथ रमणीय रत्नसिदासनपर वेठा हुआ वो हे
देवताओं तथा अमनुरोगं चिस्काल्तक अलन्त मवातढ़ $
होता रह्य | तदनन्तर शझ्भुचूड भी आकर उस मगर छा
जुट गया | इसी ब्रीच महावल्ी वीर वीरभद असर
वबल्शार्ल्य शझ्भचूडस देचूडते जा भिड़े | उस युद्ध दानव हि
जिन अब्लोंकी वर्षा करता था। उन-उनको वीफद हर
खेलम अपने बाणांसे काट डालते थे।
व्यासजी ! इसी समय देवी भद्रकालीने उमर
बड़ा भयंक्रर सिंहनाद किया | उनके उस शब्दकी 5
सभी दानव मूच्छित हो गये | उस समय देवीने व
अद्ृहास क्रिया ओर मधुपान करके वे रफऊे कर
करने लगीं | उनके साथ ही उग्रदंष्टा, उम्रदः्ड
ने भी मधुपान किया तथा अन्यान्य देवियोने मी के
पीकर युद्धथलमें नाचना आरम्म किया | उसे त्मव कि
तथा देबोंके दलोमें महान् कोलाइल मच गया ! के
समुदाय बहुत प्रकारसे गर्जना करता हुआ हम
तदनन्तर कालीने शझ्डचूडके ऊपर
शिखाके समान उद्दीस आग्नेयात्न चलाबा) १२5
वेष्णबास्नसे उसे शीघ्र ही शान््त कर दिया | 7 5
भद्रकालीने उसपर नारायणास््रका प्रयोग किया | की
दानव-शत्रुकी देखकर बढ़ने छगा । वंब
समान उचद्दीत्त होते हुए नायबंगालकी के के
ऑर्ड
है.
न 0 आर्भिणार्म 0 ७४४४७र्िओं
मदर संहिता ] शइचूडके साथ देवा
दस्टकी भाँति भूमिपर लेट गया और वारंबार प्रणाम करने
ठग | तव उसे दानवरकी नप्न हुआ देखकर बह अम्ल निव्वत्त
गया । तलशब्रात् दवान उसपर मन्त्रपूवक बहाज्र छाड़ा |
वग अख्रकी प्रत्वलित होता हुआ देखकर दानवराजने भूमि-
र खड़े दोकर उसे प्रणाम किया ओर ब्रह्माज्नस ही उसका
निवारण कर दिया । तदनन्तर बह दानवराज ऋषित ही उठा
ओर वेगयूर्वक अपने धनुपको खींचकर देवीके ऊपर मन्त्र-
2 करते हुए दिव्यास्नेक्री वर्षा करने हगा । भद्रकाली
मरसूनिरन अपने विस्तृत मुखको फेछाकर उन आअख्ोंकों
गले गयीं और अद्रद्वामपृर्षक्त गजेना करने लर्गी, जिससे
नये भयभीत हो गये | तब शब्दुचू डने कालीक् ऊपर एक
पथ योजस ही शक्तिसे बार क्रिया। परंतु देवीने अपने
“प्याख्समृदसे उसदे लो ठुकद़ें कर दिये | थीं उन दानोमें
परजाज्तक युद्ध द्वोता रहा और सभी देवता तथा दानव
॥ बनवर उस दस्त रहे | अन्त देवीने महान कपविश-
उसबर वग्यूसक सुप्टि-पहार क्रियोा। उसकी चोटसे वह
निवगज चकर पाड्मे लगा और उसी क्षण मूच्छित हो
थ। फर क्षणगर्र ही उसवी चेतना छोद आयी ओर सह
3 नयद्ी हश्णा परंतु उस प्रतापीन मातुचुद्धि दनेके कारण
बीक साथ वाहुयुद्ध साय किया । तब देवीने उस दानव
पर उसे यारबार पुमाया ओर बड़े कोपसे वेगएयंक
4 उछाह दिया । प्रतापी श्यूद वेगसे ऊपरी
पणीयर मिरकर पुन) उठ खड़ाएदओआ। उस
कर
>>
कहो
फल लयन्नम
७ अभण तन
जीना
ना
“उवुझम पर तानके अं आस्त नहा शुझं था वदक
“जत गग प्रनक्ष गा। ततघात बढ़ उद्यालीको प्रणाः
2 न हम वि म अशक आ 5 मित कम परः पा कक गाप
)* 4, | +$ छंद बासयत जंन परदात *१९+ मई ६ (45 4र
बिईड सेकर
(0) दानयादत रखा
ने बच्चे तो | गे नसतेखर यद्ा था आावशिपशी ५२०००
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ग्ैका संग्राम पुनः शिवजीका दाब्बचडके साथ युद्ध 5 २७दे
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उस समय क्या कहा
करनेकी रूपा
कै 8 ग्टा ऊाग
कालीका वह कथन सुनकर मट्ख्वरन
और कौन-सा काय किया ? उसे आप वर्णन
करें; क्योंकि मेरे मम उसे सुननेकी प्रवल
उठी £ |
सनत्कुमारर्जी।
कल्यागकर्ता, परमेश्वर ओर बहें
द्वारा कहे हुए बचनको सुनकर उरी आश्वसन देते हुए
हँसने लगे । तदनन्तर आकादइवाणोकी सुनकर तच्वज्ञान-
विधारद सखयं शंकर अपने गणोके साथ समरभूमियी और
चले | उस समय ये महावृृप ननन््दीडेखर सवार थ और
उन्हींक्रे समान पराक्रमी वीरभठ्ठा भरत और क्षत्रपाठ आद
उनके साथ थे | रणमभूमिम पहुंचकर मह्थरने बीर>ूप भारण
किया | उस समय उन रुद्रड्ी बढ़ी शोभा हो रही थी ओर
मूतिमान् कालझसे दीख रद भे। जब शातुचूदकों दृ्ि
शियमीपर पड़ी) तब वह विमानसे उत्तर यड्ढा अ्यर परस
भक्तिके साथ दण्डकी भाँति प्रथ्यीवर ठाटकर उसने विरक्ष दत्त
उन्हें प्रणाम किया | इस प्रकार नमत्तार करतक परच्ात् से
तुरत ही अपने विमानपर जा बठा ओर भारण कर दे
उसने पनुफ्याण उठाया। किर तो दानों आरस दानव दा डी छग
गयी । मों ब्यूर्थ दी वागचर्पा करनेयाडि दिय और यायचूट+
बंद उम्र सुद्ध मकड़ी सपेत्तिक चंशता सां। अस्त सप्रम्पल-
भें झाइचूडका बंध करनेके ह्थि झदावदी मदवरव सना
आपना खदू आशीूल उठाया जिमहझा निमार-।
बहता है जिये भा आग जो ही 5
निधि हरनेड वि
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दिला सुनित अर्वर से समा
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न ४ नग्ों सद्गाय शान्ताय ब्रह्मण परमातानने :: | संक्षित्त-शिवपुणण]
च्न्स्स्स्य्य्य्य्य्स्य्स्य्य्स्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्स्स्य्य्य्य्स्य्स्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्प्प्य्य्प्य्स्प्य्लल्ल्ल्लज्ज्
उस कायके लिये प्रेरित किया । फिर तो शिवजीकी इच्छागे
विष्णु बहँसे चल पड़े | वे तो मायाविगर्मि भी श्रेष्ठ मायात्री
दरे | अतः उन्होंने एक ब्वद्ध आदाणका ने चारण हिया
ओर शज्भुचूडके निकट जाकर उनसे यो कहा ।
वृद्ध ब्राह्मण बोहि--दानवेन्द्र | इस समय में बानक
होकर तुम्हारे पास आया हैं, तुम मुरी शिक्षा दो। दीन-
वत्सल | अभी में अपने मनोरथकों प्रकट नहीं कूँगा।
( जब तुम देना स्वीकार कर लोगे, तब ) पीछे मे उसे
वताऊँगा और तब तुम उसे पूर्ण करना ।? आदाणवी बात
सुनकर राजेन्द्र श्नचूडका मुख और नेत्र ग्रसन्नतासे खिल
उठे | जब उसने “ओम? ऋहकर उसे खीकार कर लिया; तत्र
ब्राह्मणने छल्पूर्वक कहा--भमैं तुम्हारा कबच चाहता हैँ |
यह सुनकर ऐयंशाली दानवराज शद्भचूइने, जो ब्राद्मगभक्त
और सत्यवादी था) वह दिव्य कबच जो उसे प्राणके समान था)
५ के अ+ किजयता थी रजनी
६.7 |
7५
ध्ब्छ
|
खत
|
पक +
# | के बस
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5) है । हिल ०० ॥ है।
ब्राक्मणको दे दिया । इस प्रकार श्रीहरिने मायाद्वारा उससे वह्
कवच ले लिया और फिर शह्नचूडका रूप धारण करके
वे दुलसीके पास पहुँचे। वहाँ जाकर सबके आत्मा एवं
तलसीके नित्य स्वामी श्रीहरिने शब्ठचूडरूपसे उसके शीलका
' कर लिया |
3सगी समय वि्णुभगवानते झम्भुसे आनी गीत
कई सुनायी | ते दिवरजीने शज्लचूठके वधक्के निमित गज
उद्दीम बअशल हागमें लिया | परमात्मा शंकर क किक
नामक निश्ूल अआनी उल्हृष्ठ प्रभा विखेर रहा था । हे
सारी दिल्लाएँ। प्ृश्ची और आयाम प्रकाशित हो उठ | ह
मध्यादफालीन करोड़ी सूर्य तथा प्रलयाम्रिकी शिलाके कर
समकाणझ था । उसका नियारण करना असम्भ था |
दुधध। कभी व्यर्थ ने देनेयाला और झन्रुओंका संदर *
नह नेक अत्यन्त उम्र समूह, समूर्ण गरन्नाम्नोंक्र कछ
भवंदर ओर गोरे देवताओं तथा अनुरोक्े लिये दुल्ह
बह एच ही सानपर ऐसा दमक रा था। मानों ला
आश्रय लेकर सम्ूर्ण ब्रद्माण्डका संहार करनेके ल्थि उद्रा।
उनकी लंबाई एक हजार घनप और चोड़ाई से दाप *
उस जीव-आप्रत्घरूप झलका किसीके द्वारा निर्माग नहीं !
था | उसका हुय नित्य था | आकाशम चकर अत ।
बद जिशूल शिवजीकी आज्ञासे शदचूडके ऊपर गिए औ
उसी क्षण उसे राखकी ढेरी बना दिया। विप्र | मे
वह झूल मनके समान बेगशाली या। वह शीघ्र ही अं
कार्य पूर्ण करके शंकरके पास आ पहुँचा ओर हि आई
मार्गति चला गया ) उत समय खर्मम ढुन्दुमियों वन
गन्धर्व और किन्नर गान करने छगे । देवों तथा #
स्तुति करना आरम्भ किया ओर अप्सयाएँ दल कल ढ
शिवजीके ऊपर लगातार युप्योंकी वर्षा होने लगी और ४
विष्णु, इन्द्र आदि देवता तथा मुनिगण उनकी ग्रह !
लगे । दानवराज श्भुचूड भी शिवजीकी इप्त गर
हो गया और उसे उसके पूर्व ( औक्षष्णयार्षद-) हावी
गयी । शह्ठुचूडकी दृडियोंसे शद्धु-जातिका प्राहुर्मा ० 5
शद्भका जल शंकरके अतिरिक्त समस्त देवताओंकि हि हे
माना जाता है | महाम॒ने ! श्रीहरि और लक्ष्मीरी ते.
सम्बन्धियोंको भी शाहुका जल विशेषस्पसे अल हु
किंतु शिवके लिये नहीं । इस अकार बची |
शंकर उमा) स्कन्द और गणोंके साथ प्रसन्नताएवी कैव है
पर सवार हो शिवलेककों चले गये । भगवान् विषय
लिये प्रस्थान किया और देवगण परमाननदमर हा
अपने लोकको चले गये | उस समय जग 6
परम शान्ति छा गयी । सबको निर्विव्नल्पसे 5
लगा । आकाश निर्मल हो गया ओर सारी शत
की लक ४ ७
जज ७ ब>ब्तः- »-. अब हो * कमा... वि के 8७ ७» व के | ५ है रेल)
प्रसंहिता ) # बिष्णुद्धारा तुझसीक
छ-हरणका वणन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विप्णुकी शाप 5
'फ-सरी >मा--.धरममम मीन नायाननमोए कमाना
रा का के +् ् चर री कर
इतग मसंड्लकाय दाने छम | मुन / इस प्रकार सन तुमसे
मध्थिक तिल चरित्रका वर्णन किया है। वह आनन्द्दायक)
। बे *., हि
स्वदुःखडारी, लक्ष्मीप्द् ओर सम्ण कामनाओआंब पूर्ण करन॑-
वाद्य है। ( अध्याय ३६--४० )
>-+-+->उस्थफप्रस्ट्संप-मिशसाडकस नई
विप्णुद्रारा तुलसीके शील-हरणका बणन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विष्णुको शाप, शम्भद्ारा
तुलसी ओर शालग्राम-शिलाके माहात्म्यक्रा वर्णन
फिर ब्यासजीफक॑ पूछतेपर सनत्कुमारजीन
फहा--मह्५ | स्णभूमिर्में आकाझ-वाणीको. सुनकर
जब दनब्वर झम्भुने श्रीदरिकों प्रेरित करिया। तब वे
गत दी अपनी मायासे ब्राद्ममफा वेष धारण कर
पशुचूटक पास जा पहुँच ओर उन्होंने उससे परमोत्कृ्
सच गांग लिया | फिर शहुचूडका रुप बनाकर वे तुल्साके
परी भर चड़े ) वर्धा पहुचकर तुलसीक महलके
दाएक विकेट नगारा बजाया ओर जयब-जयकारसे सुन्दरी
पुटमीकी अपने आगमनयी सूचना दी । उसे सुनकर सती-
साथी तुझतीने बड़ आदरके साथ झरोखेके रास्त राजमार्गढी
और लॉक ओर अपने पतिको आया हुआ जानकर वद्द
परभानन्रभ निभग्म हे! गयी । उसने तत्काल ही ब्रादर्णोफो
भव दान वरके उनसे मलाचार कराया ओर फिर अपना
पार फिद्ा | इपर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये
भाषाष शयू धूडका ल्ूरूप चारण करनेवाले भगवान् विष्णु
अपन उपरवर दी तुझसीफ नवगर्म गये | तुलसीने पतिर्पमें
हब हुए अगपालकां पृ हिया। बष्टतली नाते ह
/ मोर उनके चाध रण किया । तब उस साथ्वीन सुख;
/ मध्य और - अकपषण्म ब्यतिकम देलकर संवप्र विद्यार
गे
इ। उस दोनपर ) हट कान ला,
उन्द्
चूँकि तुम पापाण-सदश कठोर दयारदित ओर हुए है)
इसलिये अय तुम मेरे शाससे पापाय-सल्ूय ही दो जाओ |
सनत्कुमारजी कहते ह--मुने ! यो कहकर शर्त
चूडकी वह सती-साथ्वी पत्नी तुलसी पूट-फूडकर रोने लगी
और झोकाते दाकर बहुत तरद-से बिलाप करने लगी । इसनेम॑
वहाँ भक्तचत्सठ भगवान् शंकर प्रकट दी गये ओर उन्दोंनि
समझाकर कहा--देवि | अब तम दुःखकों दूर करननादी
मेरी बात सुनो ओर ओऔरीदरि भी स्वस्थ मनसे उसे झवग करें;
क्योंकि तुम दोनोके लिये जो सझुतकारक दोंगा। व भें
कहगा | भद्दे ! तुमने ( जिस मनोरमकी लेमार ) ता किया
था) बहू उसी तपस्या फछ दे । भह्य। वह अन्यथा की
हां समता द * इसाडिय सुम्द सन हाँ कोट प्रात
हुआ दे । अब तुम इस दार्गरकी लागकर दिव्य दंदू भास्ण
कर ल और रूभमीके समान द्लकर निल्य छीडरिक *
( पकुण्ठभे ) पिद्र करती रहा। तुम्दास बह बरीएे नि हु
छोड़ दागी। नदी रुपमे परिर्तित दे सादगी । न मंदी
भारतबपम पुष्यदया गंशरदीक सासस प्रालद देंगी।
मंदादीव ! कछ उाडद पधाल भी बरदे प्रलयमभ
सामग्री उसीया प्रधान स्वाग -।
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तमा सरुद्भाय शान्ताय द्रद्मण प्रमात्मन ४
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जी न आय समता वार. अमर अन्यन्क-ममााान इनका 33 रम>9०-२०-म न -आबग१ ला: किक कल न आनाकामाम्कम्कम्कम्कम्क _आन्ममाकूताम वन म्माकि-पान,
न्ाजीजीीजी डी जी जीजा ब्की न्ीओरी जीती: अर समीिकती जी उरी री कीनजी ता जीन बी जीजी नं री जी जमीनी ््आ्य़ं़ं़्ॉ॑ंचथ़्थज2घज आओ इइ,- इनकन््फनफ मम कमएफन्फन्क 9.46 0400४
नी बीजजीफीसी जीजीरीरसययघ
बहत प्रकारतके पुण्याका ८ दि करनेताला होगा । हें |
शालग्राम-शिलाके असर तुलशीपत्रकी दे करेगा
जन्मान्तरम ख्ीवियोगकी प्राति शगी तथा जो शर्त दूर काल
तुलूती-पन्र को हृटायेगा) हि भी भावषादीन छोग। और सात
जम्मोंतक रोगी बनी रढेगा । जे महाश्ामी पुदंष शॉलिश्राए:
शिला3 तुलसी औए शर््धओ एकत्र रखकर उनके रा करता
है, बह श्रीहरिका प्यारा होता दे ।
सनत्कुमारजी कहते दे-आतजी | हल श्र कार कहकर
गंकरजीनें उस समय शालग्राम-शिला आस तलगीके परम
पृण्यदायक मादाल्यका! वर्णन किया । तलश्वात् वे श्रीदरिक॥/
तथा ठुलूतीकी आनन्दित करके अन्तवान हो गये । इस प्रकार
उस
दिव्य रूप धारण कर टिया । तन कमठापति विश उस
ऊकर वेकुण्ठती चल गेय । उसके छोड़े हुए
गाडवी गंदी प्रकट ही म पी ओर भगवान अच्युत मे ४५
तडपर मनुष्योकाी पुण्यप्रदात कर्नवाली गिलाक हमे कह
॥ गये । मुने | उत्म दीड अनेक प्रकाए हद क
रखते दे । उनमे जी शिलाए गण्डकीक जेलम गए 0
खा पण्यप्रद देती हू ऑरि जे खल्यर ही एे नई है
>ने पित्वला कदा जाता ढे शौरें व प्राणियोंके लिये एकाकए
ती है। ब्यासजी | हे प्रकार ठम्दोरे पलक 22३
ने शम्पुका साण। चरित) जो पुष्मप्रदात हथा महुद
तारी कांमनाओंकों पैण करतवाड तुम्हें छुती लि!
ग़्गल
सदा सत्पुरुणेंका कस्यार करनेवाले शम्मु औरयने खानकी.. हि. चुत आख्यान) जी बयु# माहात्थतें एयुक ४
चले गये । ईंघर शग्ड का कथन सुनकर देलरं को बड़ी. भोग आर मो का प्रदाता ढं/ तुमसे वर्ग कर दि
प्रसन्नता हुईं । उसने ऑन उस शरीरसका परित्यांग कर्क योर क्या सुनना चर्हिते है! ( अथाव ४
उम्ाद्वारा शम्शके नेत्र हर लिये जानेपर अन्धकारम शम्शक पसीनेसे अन्धकाउरकी सरवी उत्पत्ति ह्ए
की पुत्रार्थ तपया और शिवक उसे पुत्ररुपभ देना, हिरण्याक्षका प्रिलोगीर
जीतकर एथ्वीको ससावलूम ल जाना और वराहरूपधारा वेष्णुद्गार उसकी
सनत्कुमारजी करे है---व्यालजी ! अब जिस
प्रकार अन्चकासुरने परमात्मा शम्भुके गणाध्यक्ष-पदकी प्राप्त
किया. था। महिश्वर्स्क उस मन्नलमय चरितकी श्रवण
करो । मुनीखवर ! अन्ध ऋसुरने पहले शिवजीके साथ वड़
परंतु पीछे बारवार सात्विक भावके
प्रस्ष कर लिया; क्योंकि नाना
प्रकारकी छीलाएँ. करनेवाले शम्स शेण्णागतरइ्ञः तथा परम
भ्क्तव॒त्सल हैं । उर्नेका माह्त्म्य पर
व्यासजीते पुछा-+सेनेशाली मुनिवर ! वह अन्चक
कौन था और भूतल्पर किसे वीय॑वानके कुलमें उत्तन्न हुआ
था ! देत्योंमें प्रधान तश्ी महामनस्खी उस बलवान अन्यकका!
खरूप केसा थीं बह किसका पुत्र थी १ उसने परम
तेजखी शम्भुकी गणाव कैसे प्रात किया १ यदि
अस्क गणेश्वर हो गया तैंए तो वह परम धघन्यवादका
पात्र है ।
सनत्कुमारजीनें (--छुने ! पूवकालकी बात है,
एक समय मक्तीपर कई करनेवाले तथा देवताअर्के चन्रवता
८ भगवान है| ऋरस्को विह्यर करनेकी इच्छा हुईं । तब वे
और गणौकी साथ के अपने निव[सभूत केछास-
पर्व॑तसे चलकर काशीएुर्सेनि आये । वहां उद्होंने 3 फः
अपनी राजधानी वनाय और भेख नामक है
नियुक्त किया ) फिर पावतीर्जर्कि साथ रहते हुए ।
सुख देनेवाली अनैर्क प्रकासी लीला. 7. ह
समय वे उसके वरदानक प्रभाववर।
गणेश्वरों और शिवाके सौर्ट मन्दरावलपर
भी तरह-तरहकी करी! करने ठगे ।
प्राक्रमी कपर्दी शिव मन्दराचल
इस प्रकार जब पार्बतीने मूगें) छ4
अपने करकमलेसे हस्के ने
के मुद जानेके कारण बह
कैल गया । पावतीके दीथीकी में:
कारण शम्मुके ललाठमें स्थित मे गिसे सतह हक
प्रकट हो गया और जलकी बहुत-सी दे 2
तदमन्तर उन कुँदोने एक गर्मका घाएं
उससे एक ऐसा जीव प्रकट डी? हकी 3
था | वह अत्यन्त भयंकर: क्रोधी। अत
जयाघारी) काले रंगका) मंठेलय्े भिन्न बेड
ञ्त्श्ढ्ा
रुद्संद्िता ] 5 उम्राह्मय शम्मुके नेत्र मूँद छिय जानिपर अन्यकारम अत्यक्रासुरको उत्पत्ति ४
असीम
वह. आनभी जान. आधन--ऑदान
बाला था | उसके कण्ठसे घोर घर-घर शब्द निकल रहा
॥। बंद कमी गाता; क्रमी हैँसता ओर कभी रोने छगता था
था जबड़ीकी चायते हुए नाच रहा था। उस अद्भुत दृश्यवलि
चबछे प्रकट दनेपर शिवर्जी मुसकराकर पावतीजीस बोले |
श्रीमहेश्यरने कहा--प्रिये ! मेरे नेत्रोकों मूँदुकर
गम दी तो यहू कमे किया है; फिर तुम्र उससे भव क्यों
% रही ही ?? शंकरजीके उस बचनको सुनकर गौरी हँस पढ़ी
ओर उसके नेज्रपरसे उन्हूंनि अपने द्वाथ हटा लिये। फिर तो
प्टोग्रकाश छा गया। परंतु उसे प्राणीका रूप भयंकर दी
थगा सद्म भीर अन्धकारसे उत्पन्न दोेनेके कारण उसके नेत्र
नी अंधे थे । तब वैसे प्राणीकों प्रकट दुआ देखकर गौरीने
पर्स पूछा |
गारीन कह(--मगवन् | मुझ्ते सच-सच बताइये कि
एस्टगेदि सामने प्रकट हुआ बह वेंडीछ प्राणी कीन दूं ।
बंद वी अत्यन्त मयंकर है । किस निमित्तका लेकर किसने
सकी या कीट और यह फिसका पुत्र दे !
सनत्कुमारज्ञी कहत ह--महर्य |! जब लीतआ रचमे-
इज तथा तीनों. टं।कंकी जननी गीरीन खुश्किताडी उस
मनी सुट्धिद्य पिपर्भ मो प्रश्न किया, तब छीला-बिद्ारी
भगवान बगर आती प्रियाके उस बचनकों सुनकर यूछ
(मान आर से प्रकार बयोठ |
पाए “तनमन” पहनने काम .-3 2 फेदानन कोहनी नमामुकरम.. साहनी... अर. अमा।-ंदामनन चलानी. अत सलमान आमानी। कान अनभ..203.323रननी अर. आता... चीज. आा.. भ कऋ
श्र
न जा रा आर * चक. आनो।.. जमनम का अर -ज नाना बनना निम्न. आता. गन पुन. मय. की. जीन री
संतानाथ वयश्चर्याके लिये प्रेरित किया था। वहाँ बह कब्यपनन्द्न
हिस्याल वनका आश्रय ले पुत्र-यातिके लिये पार क्रय करने
ठटगा | उसके मनभें मददेखरके दर्शनक्की इच्छा थीं; अतः
वह क्रोध आदि दोगोंकी अपने काबू्म करके टुँठओी मंति
मिइचल होकर समाधिस्थ हो गया । ट्विजन्ध | तब जिसनभी
घ्यजाम ब्रपका चिद्द वतमान दे तथा जी पिनाक पार
करनेवाले हैँ; वे मंद्देशा उसकी तपस्यासि परणतवरा प्रसन्न
दीकर उसे बर प्रदान करनेके लिये चछे और उस स्थानपर
पहुंचकर देल्वप्रवर हिरिप्याक्षते वीछि |
किक
महेशन कहा--देलनाथ | अब
की विनाद्य मत कर | किसलिये तूने इस झतवा आश्रय
लिया दे? तू अपना मनोरथ तो प्रकट कर | में बरदाता
शंकर हैं; अतः तेरी जा अभिलापा दोगो। बंद सब में सुर
प्रदान करूँगा ।
खनत्कुमारजी कहत एँ--महँगें ! माएफ उस
सरस वचनको सुनकर दत्यराज दिर्पात्ध परम प्रसन्न हुझा ।
उसने गिरीशफे सरणंगे नमस्कार करूं अभेझ प्रदारत
उनकी खुलि की फिर वेद अजछि बधि सिर झुकाकर कंदने
लगा |
ग > हे
हिरण्यासन कहा--सडनाड है मर उनमे
डॉ ््
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जीसे पुत्र प्रात्त करके वह महामनख्वरी देत्य परम प्रसन्न हुआ |
उसने अनेकों स्तोच्रोंद्रारा रुद्रकी पूजा करके प्रदक्षिणा की और
फिर वह अपने राज्यको चला गया | गिरीशसे पुत्र प्राप्त कर
लेनेके बाद वह प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन ४
[ संक्षिप्त-शिवुगण
----------.-
असम: का. छत
इस पुथ्वीकों अपने देदा रसातलमें उठा ले गया। त रेखाओं
मुनियों और सिंदोंने अनन्त पराक्रमी विष्णुकी आग ई|
फिंए तो भगवान विष्णु सर्मात्मक सन्षमव विकराठ वाह
वाएकर शूशुनके अने्ो प्रद्मरोंस प्रथ्वीकों विदा झड़
पाताड-लाक्ग जा मुसे । यर्दा उन्होंने कभी मे द्ट्नेवारे आग
आगडी दाड़ंस तथा थरूथुनसे सेकड़ों देलोंका कचूमर किए
कर आपने वज-साइश कठोर पांद-प्रद्रेंस निशाचरोंती के
मथ डाला | वसश्नात् अद्भुत एवं प्रचण्ड तेज्खी बिणु
करोड़ी सु्यकि समान प्रकाशमान सुदरंन-चक्रे रिस्माड़े
प्रज्यलित मिरकी का छिया और दुए देलोंका बबक फ
कर दिया ) बद् देखकर देवराज इन्धकों बड़ी प्रतषत है। :
उन्दोंनि उन असुर-राज्ययर अन्धक्रकों अभिषिक्त ऋश्लि।
फिर गद्मत्मा इच्ध ब्रिणुकी अपनी दा्दद्वाग पाताहवेक |
पथ्वीकी छाते हुए, देखकर परम प्रसन्न हुए और अने दा.
पर आकर पूर्वतत् खर्ग और भूतलकी रक्षा के ढो। जा
वाराहरुप धारण करके उत्तम कार्य करनेवाले उम्रत्यधा मे
प्रसन्नचित्त हुए. समस्त देवों) मुनियों ओर पद्मयोनि की
प्रशंसित होकर अपने लोकको चले गये । इस प्रकार वहा
धारी विण्णुद्वारा अस॒ुस्रज हिर्पाक्षके मारे जानेपर हम दर
मुनि तथा अन्यान्य सभी जीन सुखी हो गये । ( अधा ४१]
ह जा आय :>- 2 (७
हिरण्यकशिपुकी तपस्सा ओर तक्षासे वरदान पाकर उसका अत्याचार, नृर्सिहद्दारा उसका
भरे ञ ८५
वध आर ग्रह्मादको राज्य्राप्ति
सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यासजी ! इधर वराहरूप-
धारी श्रीहरिके द्वारा इस प्रकार भाईके मारे जानेपर हिरण्य-
कशिपु शोक ओर क्रोधसे संतत्त हो उठा | श्रीहरिके साथ बैर
करना तो उसे रुचता ही था; अतः उसने संहारप्रेमी वीर
असुरोंको प्रजाका विनाश करनेके लिये आजा दे दी। तब वे
संहारप्रिय असुर खामीकी आज्ञाको सिर चढाकर देवताओं
और प्रजाओंका विनाश करने छगे । इस प्रकार जब उन दृष्ट-
चित्तवाले असुरोंद्वारा सारा देवलोक तहस-नहस कर दिया गया;
तब देवता स्वगेकी छोड़कर गुप्तरूपसे भूतलछपर विचरने लगे |
उधर भाईकी मुत्युसे दुखी हुए हिरण्यकशिपुने भाईको
जलाझ्लि देकर उसकी सत्री आदिको ढाढ़स बेंधाया | तयश्चात् '
रे
उस देत्यराजने अपने लिये विचार किया कि प्तैं अजेय, अज़र
“. «. चौर अमर हो जाऊँ | मेरा ही एकच्छत्र साम्राज्य रहे ओर
पतिद्वन्द्दी. कोई न रह जाय !? यों चारणा बनाकर वह
मन्दराचलूपर गया और वहाँ एक गुफामें अवन्त धो! हे
करने लगा | उस समय वह पेरके अगूठेके बढ छ्ड
उसकी भुजाएँ ऊपरकी उठी थीं और दंष्ट आवाशी *
लगी थी | उसकी तपस्थासे संतप्त होकर देवताअकी पल
हो उठा | वे ख्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोकमम जा पहुर्पे के
ब्रह्मासे अपना दुखड़ा कह सुनाया । व्यासजी ! ९ हे
+ भर जाहिके सारे ४
इस प्रकार कहनेपर खयम्भू अक्षा ऋूगुः दक्ष 2 हा
देत्येश्वरके आश्रमपर गये | तब जिसने अपने ्
छोकोंको संतत्त कर दिया था; उस हिरप्यकशिषन देश!
लिये आये हुए पद्मयोनि ब्रद्माको अपने सामने का
उधर पितामहने भी उससे कहा---“व९ माँग |! की 4
ब॒द्धि मोहित नहीं हुईं थी; उस अछुसने विधातती
बाणीको सुनकर इस प्रकार कहा | (
हिरण्यकशिपु चोला--ऐधरयंशाली प्रजापति
* (३
की बाल पहुंच । यर्दों भीईरिने देवताओं
(गाव सुनवर उन्हें आशसन दिया और
दिये परनेवा बेचते दिया । तब देवता
८१] । तेदनन्तर महात्मा विणने ऐसा
रह
"जप लिए हर आषा मनुप्यका था |
| | हट
डर 4५ ॥ ६
आप
हि]
मद्रसंहि की बहता | असास
मद ! में चादता हूँ कि खगमे, भूतलपर, दिनम॑, रातमं) ऊपर
अपवया मीच--कहीं भी झस्र, अख्र) पाण) वच्नर; युष्क वृक्ष)
प्रयत। कट अग्निके रूपमे द्ात्रके प्रहारसे, देवता) देत्य3 मुनि
द्व विंहना आपद्ारा रे हुए जीवोंके द्वावों मुझे कमी भी
पत्युका भय न हो |
समनन्कुमारजी कहते 6--मुने ! दिर्यकशिपुके बंसे
चने सुगवर पद्मवानि बहाके मनर्म दयाका भाव जाग्रत दव
दा | उन्होंने मनद्वी-मन विश्णुकी प्रणाम करके उनसे
“दलन् | मे तुझपर प्रसन्न 6 अतः तुझे सारा वस्त॒ुण
प्रात हगी । तूने छियानवे हजार वर्षोतक तप किया है; अब
मेरी बागना पूर्ण ही चुकी ४; अतः तपसे विरत होकर उठ
और दानसक्ति राब्यका उपभोग कर ।? बद्याकी वाणी सुनकर
इरस्पकसिपूया मुख प्रसन्नतासे खिछ उठा । इस प्रकार जब
[एन उस दानव-राज्यपर अभिपिक्त कर दिया, तब वह
४ उठा और त्रिडोकीकी नष्ट करनेका विचार करने
छगा | फिर ती उसने संस्यूर्ण धर्मेका उच्छेद करके संग्रामर्म
देवताओं भी जीत लिया। तब देवता भागकर विष्णु-
और मुनियोकी हुःख-
शीभ टी उन दलके
अपने शानको छोट
रुप धारण किया; मो
बहू अलग्त भयंकर
प पिद्यछ दीस रद था | उसका मुख ब्यृव पल ट्ुभ्य
का माहिया बड़ी सुद्धर थी और नल तीखे थे। गर्दमपर
स्ग रह थीं। दाद दी आयुध थे | उससे करोड़
पुज६६+5 ०७ 24304 3५ ४८८० ६ ४ चर क्र बी
कन्ण्हैः ण्व
४१.
चरदान पाकर हिरण्यक्रशिपुका अत्याचार, नसिहद्धारा उसका वध #... २७९,
ऋकरक आओआपक नगरम प्रत्मष्ट हाए हूँ ; क्योंकि मुझे इनक मूति
बड़ी विकराल दीख रही ६ | अतः आप युदसे दृत्कर इनकी
शरणम जाइये | इनसे बदकर बिलोकीम दूसरा बोई सादा
नहीं है, इसलिये आप इन मसूगेन्द्रक सामने झुककर $
रश्ज्यका उपर्भोग कोजिय। अपने पुत्रकी बात सुनकर उस
दुरात्माने उनसे कहा--थथ ! क्या नू भयमीत दे गया
अपने पुन्नसे यो कहकर दत्यकि अधिपति राजा द्स्थिदशिपुन
बली दत्यांकी आज्ञा देत टरए कहा-- पारा | तमदाग इस
बेहोल श्रकटि और नेत्रवाल सिदकी पकड़ लो ॥ तब सामीकी
आज्ञासे उन मगेद्धफों पकड़नेद्नी इच्छासे थे सनी बनें
देत्व रणभूमिमें घुसे; परंतु जैसे रूपी अभिन्मपासे अभिमें
प्रवेश वरनेवाले परतिंग जलू-भुन जाते हैं; उसी तरद थे सब-
के-सब भणभरमं दी जलकर मस्त दा गये । दताफे दग्ध ईं
जानेपर भी वहू इत्यराज सथृण इक्ति। आप,
श अऊुझ ओर पावक आदिसे उन गगेख्फ साथ होंडा
लेता द्वी रहा | इस प्रकार बहुत काशतक भयानक सुद्ध हुआ |
अन्तर्म उन सू्निंदने वद्ञके लगाने बठोर आानी अनेन्
भुजाओस उस देल्की वफठे लिया आर उसे अपने आनुअपर
लिखकर दानवांठा सका विदीय करनाल सस्माट रांते उस |
७ाती चीर डाटी तथा लुगसे घाव हुए उसदठा हुद्यनदलल-
की निकाल लिया |
गया | तव भगवान
अग्न चूरुचर दी गप थे)
इम्जि। अर्थ
शक
॥4२ त्तां जुर९| «० 3०% 8] ४६९ है
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मम क्ष्न ह
बुं।॥एने दारदारहा आह
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४९“३६४५१६ ५ १ शत -श, ५ | 7, प 7, _ ६८ 6.० ,.,
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कक जे के ओके. हा के + औ.त ७ म और ४ आल 5 4 ० घन ता चित अक +हआाओ
भाइयोंके उपाल्म्भसे अन्चक्रका तप करना
आ आ नगर लए 7 ्प्ृ््््॒टणस्चसस्स्स््त्ण
ओर वर
हि # *ह # बा के
8 के 5
५४ नमो सद्भाय शान्ताय अह्गे परमात्मने ४४
[ संश्षित्तशिवपुणा;
पपम्रमक्रसएजणएफेंएनेम सकी सूप कह रन रकम कद आल
४ का है बी हज अत आफ मन अफिजर नस मजमी ५ न्ी स् जात च चाल
पाकर ब्रिलोकीकों जीतकर स्वेच्छाचारम प्रवृत् गत,
उसके मस्त्रिमोंद्दारा शिव-परियारका वर्णन, पराबतीके सान्दयपर मोहित होकर अच्यकता ओं
जाना और सन्दीक्षरके साथ युद्ध, अस्थक्रके ग्रहाररों नन््दीशरकी मृच्छो, पावतीके जाग
हनसे देवियोंका अकट होकर युद्ध
५ | (७ त्नि ना
शुक्राचायकका निगला जाना,
(५
गि8।
करना, शिवक्रा आगमन ओर थुद्े, शिवद्ारा
शिवकी ग्र्णासे विश्युक्का करालीरूप बाश
करके दानवोंके सक्तका पान करता, शिवका अन्यकक्ों अपने
त्रिशुलम पिरोना ओर युद्धकी रामापि
सनत्कुमारजी कहते हँ--अुनिवर ! एक समय
हिसण्याक्षका पुत्र अन्चक अपने भाइयकि साथ विद्यरम संलग्न
था । उसी समय उसके कामामक्त मंदान्य भाइयोंनि उससे
कहा--ओरे अंधे | तुम्हें तो अब राज्यसे क्या प्रयोजन पा
हिसण्याक्ष तो गूर्ख था जो उसने घोर तपद्वाएं शंकरजीकी प्रमन्न
करके भी तुम-जैसे कुरूप) बेडौल) कलिग्रिय ओर नेत्रद्दीनकी प्रात
किया । ऐसे तुम राज्यके भागी तो हो नहीं सकते; क्योकि भल|
तम्हीं विचार करो कि कहीं दूसरेसे उत्मन्न हुआ पुत्र भी राज्य
पाता है ! सच पूछो तो निश्चय ही इस राज्यके भागी हमीं
लोग हैं ।?
-. सनत्कुमारजी कहते ह--सुने | उन छोगोंकी वह
बात सुनकर अन्चक दीन हो गया । फिर उसने खबं ही
बुद्धियूबंक विचार करके तरह-तरहकी बातोंसे उन्हें शान्त किया
और रातके समय वह निर्जन वनमें चला गया । वहाँ उसने
हजारों वर्षातक घोर तप करके अपने शरीरको सुखा डाला ओर
अन्तमें उस शरीरको अभिमें होम देना चाह्य | तब ब्रह्माजीने
उसे बैसा करनेसे रोककर कहा--“दानव | अज् तू बर माँग
ले | सारे संसारमें जिस दुलेभ वस्तुको प्राप्त करनेकी तेरी
अभिलाषा हो; उसे तू मुझसे ले ले ।? पद्मयोनि ब्रह्मके वचन-
को सुनकर वह देत्य दीनता एबं नम्नतापूर्वक कहने लगा--
“मगबन | जिन निष्ठुरोंने मेरा राज्य छीन लिया है, वे सब देत्य
आदि मेरे रूत्य हो जाये, मुझ अंधेको दिव्य चक्षु प्राप्त हो
जाय; इन्द्र आदि देवता मुझे कर दिया करें और देवता)
द्त्य ) गन्धर्ब, यक्ष) नाग) मनुष्य; देत्योंके शत्रु नारायण;
सवमय शंकर तथा अन्यान्य किन्हीं भी प्राणियोंसे मेरी मृत्यु न
हो ।? उसके उस अत्यन्त दारुण बचनको सुनकर ब्रह्माजी
सशझ्लित हो उठे और उससे बोले ।
क् त्रह्माजीने कंहा-देत्थेन्द्र | ये सारी बातें तो हो
:-॥ किंतु तू अपने विनाशका कोई कारण भी तो स्वीकार
कर रथ मगोंफि जगत ओर ऐसा प्राणी ने हुआ द और
आगे होगा ही जो कालके गालमे ने गया हो | फिर तुझे)
मत्पुदतकी तो अशथ्न्त लंबे जीवतका विचार लाग व
साहिय ; अछ्यकि इस अनुसयमरें बचनकों छुतकर हे हैं
पुनः बोझ |
अन्धकीने कहा-अ्भो ! तीनों कार्लेम जे उ्त
मध्यम और नीच नारियोँ होती है। उन्हीं नारियेंगे वोई जाएं
नारी मेरी भी जननी होगी । वह मनुष्यलोकके ह्यि हु
तथा शरीर) मन और वचनसे भी अगम्य है| उ्
भावके कारण जब मेरी काम-भावना उतन्न हो जाग) दे श
नाक्ष हो । उसकी वात सुनकर ख़बम्मू भगवान पक्ष रे
आश्चर्य हआ | वे शंकरजीके चरणकमलोका सं रे
गज न वो
लगे | तब शम्भुक्री आज्ञा पाकर वें उस अखकत है
शी ही जो कुछ |
च्रह्माज्ीने कह(--देंत्यवर | हू, के 3 वी
की रच ह/।
तेरे वे सभी सकाम बचन पूर्ण होंगे | दलेद £ मं! * ही
अपना अभीष्ठ प्राप्त कर और सदा वीरोंके सॉर्य हे
रह | मुनीश | हिर्याक्षपुत्र अन्धकक कह ववा
हड्डियों द्वी शेप रह गयी थीं । पे व्रह्माक हि
ह्ड्डि द्वी शेष रह गम हो
सुनकर शीघ्र ही भक्तियूर्वक उन लोकेदबरके
और इस प्रकार बोला ।
अन्धकने कहा--विभे ! जब मेरे शरीर
हड्डियों मात्र ही शेष रह गयी हैं; तब भे्े है ॥;॒
सेनामें प्रवेश करके में केसे युद्ध कर सकूँगा। अर: है
अपने पवित्र हाथसे मेरा स्पर्श करके ईए गरीखी
बना दीजिये | पर
सनत्कुमारजी कहते हैं--द ' अल ४
सुनकर ब्रह्माजीने अपने हाथसे उसके शरीर ि
फिर वे मुनिगणों तथा सिद्धसमुहोंसे भहीभौति हैः
देवताओंके साथ अपने घामको चटे गये |
|
रद्संदिता ]
मय करते,द्वी उस देत्यगजका शरीर मय-पूरा हो गया। जिससे
उसमे बटका संचार हो आया तथा नेत्रेंक्ि थ्रात हो जानेसे वह
मुद्दर दीखने लगा | तब उसने प्रसन्नतापृर्वक्त अपने नंगरमें
प्रवेश किया | उस समय प्रह्मंद आदि ओेए दानवेने जब उसे
बद्धान प्रात करके आया हुआ जाना, तब वे सारा राज्य उसे
पर्माथत करके उसके बशवर्ता भ्रत्य हे गये । तदनन्तर
मन्वक सेना और भृत्ववर्गकोी साथ ले खर्गकों जीतनेके लिये
गया । व संग्राममें समस्त देवताओंकी पराजित करके उसने
वह्रयारी इस्रकी अपना करद बना लिया । उसने वत्र-तत्र
हरुतेसी छड़ाइयोँ छड़कर नाग, सुपर्णों) श्रेष्ठ राक्षसों, गन्वर्वो)
रो) मनुष्यों, बढ़ेबड़े पव॑तों, वृक्षों और सिंह आदि
एस चौपाबेकी भी जीत लिया । वहाँतक कि उसने चराचर
पिछकीकी अनने वद्मर्म कर लिया । तदनन्तर वह रसातलमें,
भूवदार तथा लगें जितनी सुन्दर रूपवाली नारियों थीं)
समय इजायोेकी, जो अत्यन्त दर्शनीय तथा अपमे अनुकूल
(४) साथ लडर विभिन्न पर्यतोपर लथा नदियोंके रमणीय तयों-
7९ विद्वर करने छण्त | देल्यगाज अन्धक सदा दुर्शका द्वी से
ता था। उसझे बुद्धि मदसे अंधी हो गयी थो, जिससे उस
ही इसमे कुछ भी शान नहीं रद गया कि परलोकर्म
आदगवा सु इनेयाढा भी कोई कर्म करता चादिये | इस
अपार बह झशमनस्ती देत्य उन्मत हो अपने सारे प्रधान-
4 गन युवाओं कुतकंबादसे पराजित बरके द्ल्वोसट्त मणुण
४4% भर्मोता विज्ाया करता हुआ विचरण करने टगा।
भर संदसे अभिनृत्त हो वेद) देवता, आह्षण और गर आदि
पिंड जग मदद मानता था । यारब्धवश उसकी आय सगामत
₹%क कौ
अन्धकका बरदानके ध्रभावसे त्रिदोकीकों जीतकर स्वेच्छाचारमं प्रवृत्त होना #
र्८र्
हुए हैं । लोपड़ियोंकी माला दी उस जयधारीका आमूषण हे |
उसके ह्वायर्म त्रियल है तथा एक विशाल घतुप बाण ओर
तृणीर भी वह घारण किये हुए दे । उसका अन्नसूत्र लष्ठ दी
रह्म दे | उसके चार भुजाएँ तथा डंबी-लंबी जयएँ हैं ) बद्
खद्ठढ) त्रिद्युल ओर लकुट घारण किये हुए है । उसकी आकृति
अल्यन्त गोर है ओर उसपर भस्मका अनुलेप लगा हआ दे |
बहू अपने उत्कृष्ट तेजसे सुशाभित हो रहा है | इस प्रकार उस
श्रेष्ठ तपस्वीका[ लाया बेष ही अदमृत है । उससे थोड़ी दी
दूरपर इमने एक ओर पुरुषकों रेसा के लो विक्ृयल बानर
सा हैं । उसका मुख बड़ा भवंहर है | वह सभी आयुध घारण
किये हुए है, परंतु उसका हाथ रून्न हे । वहू उस तपस्वीकी
रक्षा्में तत्पर ६ । उसके पास ही एक बूढ़ा सफेद रंगका
ब्ंठ भी बेठा ५ | उस बेठे हुए तयसीके पराइ्यभागमें इमने
एक शुभलक्षणसथत्ना नारीकों भी देखा दे | व थूतटार
रस्मसखखूपा दे | उसका रूप बड़ा मनोरम £ और तदशी
नाते बचद मनको मोदे लेती हे । मूँगे, मोती; मणि, सुबण) रस्म
ओर उत्तम बस्रोसे वदू सुलजित ४ | उसके गम सुन्दर
मालाए लक ग्ट्री ६] ( डातिक कद बंद इतना सुन््दर्रा है,
दि; ) भिसने उसे एक बार देख लिया, उ्तीता नं आरा
करना सफट ई | उसे फिर इस होकमें अन्य व्तच्यक देनेस
क्या प्रयोजन । यह दिव्य लाश पृण्यात्मा मुनिचर सदैव
सॉन्या एवं प्रवतसा लाया ८ । दरबरद् | ब्या तो उनका
शव उपलर्य अर 7 55 अते४ पक औडी 5 विर
रद | 920%:2॥ 9] बेपन 26 8 है, । ेु
समत्युमारजा फहते हविफप इस ।
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ज्के.. का च्
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१८+ हे है
कमी
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बे लटाटााटलमनटटनलबनअटल्लललस्न्क्ननननसनाम
५४ नमो रुद्राय शान्ताय
हम 9 आमिर कभी जीती जी अजीज जप ल्ीी जी अं नजर जीअ्कशीननी ५१ जिम जज जज जी वी, अत जप ीजाननी जम जन अतीक बी कमीज जी जीओी
सा मुखवाला डरपोक निशाचर।
जर्जर हो गये ई
मन्दभाग्यता | तेरी सेना
भी यदि तुझमें कुछ सामथ्य दो तो
और आकर कुछ अपनी कस्वृत
पापियोंका विनाश करनेवाला बज़सरीखा भयंकर शेख 3;
जिसके सारे अर 4६ पिसे
| कहाँ मेरा यह खरप और को तेरी
भी तो नईीके बराबर है । फिर
युद्धके लिये तेयार दी जा
दिखा । भेरे पा तुा-जेसे
कोमल हे । एसी दर्ार्भे
प्रतीत दो) वह कर ।3
और तेरा शरीर तो कमलके समान
विचार करके तुझे जो रुचिकर
कहते हँ--सुनिवर ! मन्जियोक्री वात
सुनकर (माता) पाब॑तीपर मोहित हुआ वह है: नव राक्षस विशाल
सेना छेकर चल दिया और वहाँ पहुंचकर नन््दील्वस्से युद्ध
करने लूगा | बड़ा भयानक युद्ध हुआ । उस समय युद्धलर्म
चर्बी, मजा) मांस और रक्तकी कीच मच गयी। वहाँ सिर कटे
हुए. घड़ नाच रहे ये और कच्चा मांस खानेवाले जानवर
चारों ओर व्याप्त हो गये ये; जिससे वह बड़ा भगेकर लग
रहा था । थोड़ी ही देसमें द्वेत्म भाग खड़े हुए । तंत
पिनाकधारी भगवान् शंकर दक्ष-कत्या सतीको भलीभौति घीरज
चँंधाते हुए. बोलें---प्रिये ! मैंने जो पहले अत्यन्त भयंकर मद्दात,
पाशुपत-ब्तका अनुष्ठान किया थेठ उसमें रात-दिन तुम्दारे
प्रसंगवश जो हमारी सेनाका विनाश हुआ है, यह विश्न-सा
आ पड़ा है। देवि ! परणधर्मा प्राणियोंका जो अमररोपर
आक्रमण हुआ है? यद्द मानो पुण्यका विनाश करनेवाला कोर
ग्रह प्रकट दो गया है । अतः अब मैं पुनः किसी निर्जेन वें
जाकर उस परम अद्भुत दिव्य ब्रतकी दीक्षा दूँगा और उस
कठिन ब्रतका अनुष्ठान करूँगा । सुन्दरि | तुम्हाण शोक और
भय दूर हो जाना चाहिये ।! क्
कहते हैं--छुने ! इतना कहकर उम्र
प्रभाशाली महात्मा शेकर धीरेसे अपना सिंगा बजाकर एक
अत्यन्त भयंकर पावन वनमें चले गये । वहाँ वे एक इजार
वर्षोके लिये पाशुपत-ततके अनुशाममें तत्पर हो गये। इस ब्रत-
का निभाना देवों और असुरोंकी शक्तिके बाहर है । इधर
शील्गुणसे सम्पन्न पतित्रता देवी पार्वती मन्दराचलपर ही रह-
कर शिवजीके आगमनकी प्रतीक्षा करती रहती थीं | यद्यपि
पुत्नस्थानीय वीरकगण उनकी सुरक्षामें तत्पर ये; तथापि उस
गुहदके भीतर अकेली रहमेके कारण वे सदा भयभीत रहती
थीं, जिससे उन्हें. बड़ा हुःख होता था। इसी बीच वरदानके
प्रभावसे उनन््मत्त हुआ वह द्वेत्मव अन्यक, जिसका घैये
- कामदेवके बाणोसे छिन्न-भिन्न हो गया था अपने मुख्य-मुख्य
हम
ब्रह्मण परमात्मने # [ संश्षित्तशिवपुणा]
नर मरी री जीत जा वी डकरी। पी करी जी जन्ी "की एती चाही की ही परी की ची
योधाओंकी साथ छे पुनाः उत्त गुर चद 2747
भनिर्नासिद्धित उसने वीएकगगके साथ अल का ड़
किया । उस समय सभी वीरेनि अन्न) जछ ओऔए रह
परिताग कर दिया था। इस प्रकार व युद्ध दाद
ती पॉँच दिन-राततक चढता रहा । अन्त देलोंगी पु
ते घट हुए. आयुर्थोके ५ द्ास्से नन््दीदका भर बड़
गया; जिंटसे वे गुदाद्वासपर दी गिर पड़े और मुख्ितिहेण।
उनके गिरनेसे गुहाका सारण दरवाजा ही ढक गय) झ््ि
उसका खोला जाना अतम्भव था । फिर देह्येति दो है
सोरे बीस्रकाणकी आने अछ् ममूद्ेंसि आव्छाद्ि के त्ि।
तथ पारवतीने भगवान, विस और बक्षाजीद सण हि!
छारण करे दी जादी) ने (र[यणी) ऐलदी) वैलाव) पर!
अक्रति। बादगी) वीयंगी) टीवेरी) बक्षेखरी) गाणी »।
देवियोंके रूपमें समस्त देवता) यह तिंके परी भर
बख्नाओंति मुंतजित द्कर अपने-अपने वहनोएए के
बढ
पारवतीके पास आ पहुँचे और
कुछ समय बाद भगवान् शिव
युद्ध हुआ । तद॒नन्तर गुक्राचार्यको ठंजीवनी वियाई
देखोंकी जीवित करते देखकर भेतना शिवजी उती
गये । इससे देत्य ढीले पड़े गये |
व्यासजी ! अन्यक महान पराक्रम वीर अर
शिवके समान बुद्धिमान, यो डी मिलते
वह उन््मोदके वशीभृत हो रही
राक्षतेक्रि साथ प्रिद के।
भी आ गये । फिते
8
! सैंकड़ों वरदान
था । रची बरहुए९
शस्तराह्नोंकी चोटसे उतकी शरीर जजर हो गया ।' ०
शिवजीपर विजय पानेके लिये उसमे दूसरी मा
जब प्रत्यकालीन अभिके ड्रमाल इरीर पाए हर क्
भूतनाथ अिपुरारि शंकरने अपने तिंड मै
छेद डाला) तब गिरि हुए उसके हो
यूथ अन्धक प्रक हो गये । उससे सात एक
गयी । वे विक्ृत मुखवाले भयंकर रफिें अबकी पे हे
पराक्रमी ये | ईए प्रकार जब पशुपतिद्वा हसन ः
घावोसि निकले हुए अलन्त गरम-गरम +
सैनिक उत्नन्न होने लगे तेते बहुत-सी बुध
आक्रान्त होनेके कारण कुपित हुए.
प्रमथनाथ शिवकों बुलाकर योगबलसे
धारण किया) जिसका पंख
विकराल और वक्लाल्मात्र था | *'
लकलछा था । जब उन देवीने रणमूमिर्
स्ट्रसदिता
अपसायर रा. 3७ 707० कलमन्न्ीमप "नकल... "जय... अन्नम यमन -33-प पवन री.भनिनाा-3५ नम गाया नौका खनन ढरदाानम
मुगठ चरणोंसे प्रथ्यीकों अर्लक्ृत किया, तब सभी देवता
, इनडी लुति करने छगे । तलश्ात् भगवानने उनकी
/ बुद्धिक) परत किया । फिर तो वे क्षयार्त होकर रणके मुद॒सि-
, उन सेमिकोकि तथा देल्ययजक्े शरीरसे निकले हुए अत्यन्त
सनगगस्स दथिस्का पान करने लगी ( जिससे राक्षतंकरा
सन्न दना बंद ही गया ) | तदनन्तर एकमात्र अन्धक दी
थे रद । यद्यपि उसके शरीरका रक्त सूख गया था, तथीपि
टू अपने कुठानित सनातन क्षात्र-धर्मका स्मरण करके
वबिनाशी भगवान शंकरके साथ भयंकर थपषड़सि। बद्ज-सध्श
नुओं और चरणीसे, ब््नाकार नखेति, मुख, भुजा भर
उससे संग्राम करता रहा | तब प्रमथनाथ शिवने रणभूभिमें
सी हुदय विदी्ण करके उसे शान्त कर दिया । फिर विश्व
विकर उसे सवाणुफे समान ऊपरकी उठा टिया। उसका
गन गरीर गीचकी लटक रहा था। सूयकी किरणेनि उसे
उस दिया। पयनके संकोंसे युक्त मेघोंने मूसत्यधार जल
# ननन्दीश्यरद्ारा श॒क्राचार्यका अपहरण, शिवद्धार उनका निगल जाना के २८३
देन्ययाजने अपने प्रार्णोकरा परित्याग नहीं किया ।
बरसाकर उसे गीला कर दिया | द्िमखलण्डके समान शीतल
नम्द्रमाकी किरणनि उसे विश्वीश कर दिया फिर भी उस
उसने विशेष-
रूपसे शिवजीका सबने किया | तब ऋदणाके अगाध सागर
शम्मु प्रनन्न हो गये ओर उन्हेंने उसे प्रेमपृर्वकक गरमाध्यभ-
का पद प्रदान कर दिया | तलश्रात् युद्ध समाप्त दी जानेपर
लोकपारेनि नाना प्रकारके सारगर्भित स्तोत्रद्वारा विधिपू्॑क
शिवजीकी अर्चनाक्की ओर हरित हुए अक्षा) विष्णु आदि
देवनि ग्दन झुकाकर उत्तमोत्तम स्तुतियंद्धारा उनका स्तवन
किया । फिर जय-जयकार करते हुए वे आनन्द मनाने लगे |
तदनन्तर शिवजी उन सबको साथ लेकर आनन्दयू्क
गिरिराजकी गुफाको छोट आये | वहाँ उन्हंनेि अपने ही अंश्-
भूत पूजनीय देवताओंको नाना प्रकारतदी मभंट समर्पित करे
उन्हें विदा किया ओर खर्य प्रमुदित हुई गिरिरानकमार्गके
साथ उत्तमोत्तम लीलाएँ करने लगे | ( अध्याय ४४--४६ )
&->> ४, है (०८...
न्दीश्रदारा श॒क्राचायकरा अपहरण और शिवद्वारा उनका निगला जाना, सा वषके वाद झाक्रका
शिवलिश्टके रास्ते बाहर निकलना, शिवद्धारा उनका शुक्र' नाम रखा जाना, गशक्रद्वारा जपे गये
पत्युजय मस्त्र आर शित्राशेत्तरशतनामस्तोत्रका वर्णन, शिवद्वारा अन्
बल कि
न्यकर्का वर-शदान
२८७
% नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्णे परमात्मने ४
[ संक्षि्तशिवुणा|
जिन मीन न.
जाकर. प्रमभरेश्वेश शिवकी यह समाचार सुनाया । तय
शिवजीने कद्दा--'नन्दिन । तुम अभी तुरंत ही जाभी
और देल्योंके बीचसे छिजश्रेट्ठ शुक्ताचायक्रों उसी प्रकार
उठा लाओ जैसे बाज लवाकों उठा ले जाता दे )?
शी कहते हँ--मह्यों ! इृपभव्यजके था
कहनेपर नन्दी सॉड़के समान बढ़े जोरसे गरजे ओर तुरंत दी
सेनाको लॉघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ भगुवंशके दीपक
श॒ुक्राचार्य॑ विराजमान ये | बहा समस्त देत्य हा्थोर्म पाश)
खज्ढ) वृक्ष) पत्थर और पर्व॑तखण्ड लिये हुए. उनक क्री ख्वा
कर रहे ये। यह देखकर बलशाली नन्दीने उन देत्योंको
विक्षुब्ध करके श॒क्राचायंका उसी प्रकार अपहरण कर लिया,
ज्षेसे शरम हाथीको उठा ले जाता है। महाबली नन््दीद्वार
पकड़े जानेपर शुक्राचार्यके वस््न खिसक गये | उनके आभूषण
गिरने लगे और केश खुल गये । तब देवशत्रु दानव उन्हें
छुड़ानेके' लिये सिंहनाद करते हुए नन््दीके पीछे दोड़े
ओर जैसे मेघ जलकी वर्षो करते हैं; उसी तरद नन््दीश्वरके
ऊपर बज) त्रिशूछ) तलवार» फरसा। बरेंढी ओर गोफन
आदि अज्लोकी उम्र वृष्टि करने छंगे। तब उस देवासुर-संग्रामके
विकराल रूप धारण करनेपर गणाधिएज नन््दीने अपने
मुखकी आगसे सैकड़ों शर््रोको भस्म कर दिया और उन
भुगुनन्दनकी दबोचकर शबरुदलकों व्यथित करते हुए वे
शिवजीके समीप आ पहुँचे तथा_शीघ्र ही उन्हें निवेदित करते
हुए. बोले--“भगवन् | ये शुक्राचाय॑ उपस्थित हैँ |? तब
'भूतनाथ देवाधिदेव शंकरने पवित्र पुरुषद्वारा प्रदान क्िये
हुए. उपहारकी भॉति शुक्राचार्यकी पकड़ लिया ओर विना
कुछ कह्दे उन्हें फलकी तरह मुखर्म डाल लिया | उस समय
समस्त असुर उच्चखरसे हाह्मयकार करने लगे |
व्यासजी | जब गिरिजिश्वरने शुक्राचार्यकी निगल लिया;
तब देत्यॉँंकी विजयकी आशा जाती रही । उस समय
उनकी दशा सँँडरहित गजराज) सींगहीन सॉड़, मस्तकविहीन
देह, अध्ययनरहित ब्राह्मण» उद्यमह्दीन प्राणी; भाग्यहीनके
उद्यम . पतिरहित स्री. फलवजित बाण, पुण्य-
हीनोंकी आयु) बतरहित वेदाष्ययन, एकमात्र वेभवशक्तिके
बिना मिप्फल हुए. कर्मसमूह, झूरताहीन क्षत्रिय और
सत्यके बिना धर्मसमुदायकी भाँति शोचनीय हो गयी।
देल्योंका सारा उत्साह जाता रहा | तब अन्धकने महान
दुःख प्रकट करते हुए अपने झुरंबीरोंको बहुत उत्साहित
और कद्दा--“वीरो | जो रणाज्नण छोड़कर भाग जाते
7, उनवी ख्याति आययशरूपी काल्मिसे महिन हो जी
और उन्हें इस ठोकमगें तथा परलोकमे-कहीं भी मुह हूं
मिलता | यदि युनज॑न्मरूपी मठका अडह्ण ऋ्लेफे
भरातीर्य--रणवीर्यमं अबगादन कर डिया जाते
तीगोमें क्ञाक) दान सौर तपदी क्या आवश्यकता हैवरश
इसका फछ रणभूमिमें प्राणत्याग करेेंसे ही प्रात हे छ
9 ॥ देशराजके इस बचनको पूर्णह्पते धाण इसे
ट्वैत्म तथा दानव रणभेरी बजाकर रणमूमिम प्रभात
टूट पड़े ओर उन्हें मथने लगे तथा बाण) सं) ब्रश
कठोर पत्थऊ भुशुण्डी, भिन्दिपाल) शक्ति भहि। प्र
खट्याऋ पह्धिश) तिश्वुक्क) लकुढ और मुफद्िए पहा
करते हुए. भयंकर मार-काट मचाने लगे। झव 4
अत्यन्त बमासान युद्ध हुआ । इसी बीच विनाकक हें
नन््दी) सोमनन््दी) बीर नैगमेय और महांवदी वेशात +
उग्र ग्णोने निश्वल) शक्ति और बाणसमूहँंकरी पाता!
वर्षा करके अन्थककों अंबा बना दिया ।फिए वे
तथा असुर्रोकी सेनाओंमें मद्दान् कोढाइल मच गया ||
शब्दकों सुनकर शम्मुके उदरम खित गुक्राचाय आधा
वायुकी भाँति निकलनेका मार्ग ढूंढ़ते हुए पक काले
उस समय उन्हें रुद्रके उदरमें पातालतह्वित
ब्रद्ा। नारायण) इन्द्र, आदिय और
भुवन तथा. वह प्रमथासुस्सेग्राम भी दीत
इस प्रकार वे सौ बर्षोत्क शिवजीकों कुष्िमं चा
भ्रमण करते रहे; परंतु उन्हें उसी प्रकार कोई छिद्े
पड़ा) जैसे दुष्की दृष्टि सदाचाररीके ठिद्रको नहीं देव
तब भगुनन्दनने शवयोगका आश्रय ले एक मे
किया | उस मन्त्रके प्रभावसे वें शम्भुके जठसज्ञसे
लिड्मार्गसे बाहर निकले । तब उन्हेंने 5
किया । गौरीने उन्हें पुत्ररूपमें खीकार कर लिया और कि
बना दिया । तदनन्तर कंरुणासागर महेबर ४
शुक्राचार्यकोी वीयके रास्ते निकला हुआ देखकर बुर्का:
बोले | चूँकि पैर
महेश्वस्ने कहा--अंगुनन्दन ( चूँकि का ँ
मार्गसे श॒ुक्रकी तरह निकले हो? अर
कहलाओगे | जाओ), अब तुम मेरे पुत्र ही गये |.
. सनत्कुमारञजी कहते है-४
यों कहनेपर सूर्यके सहश कान्तिमान
प्रणाम किया और वे ह्वाथ जोड़कर स्व॒ृति करने की |
अप्सरार्भकि
तर र्गिः
रू
बढ
ञ
||
तिवर | देव!
शुक्नने पुन गि
गद्संदिता ] # शुक्रद्वारा जपे गये झत्यंजय मन्त्र तथा शिवाशेत्तर शतनाम स्तोचका वर्णन %. २८५
चा+
असनमजोरे अऑगियागव्मम्पानकीय
टक्रत कद्वा--मंगबन | आपके पैर, सिर; नेत्र, हाथ
ओर थुजाएँ अनन्त हैं। आपकी मूर्तियोंकी भी गणना नहीं
ही सकती । एसी दक्षार्म म॑ आप स्तुतल्यकी सिर बुक्ाकर किस
: प्रवार सत॒ति क"भँ । आपकी आठ मूर्तियाँ बतायी जाती हैं और
, आय अनन्तमृति भी हं । आप सम्ूर्ण नुरयों और अनुरोकी
अत कक ०
#मना पूर्ण करनेबाछि हूँ तथा अनिष्ट इश्सि देखनेपर आप
मंदार भी कर डालते हैं। ऐसे स्तवनके योग्य आपकी में
किले प्रकार स्तुति करूँ |
सनत्कृमारज़ी कहते हँ--मुने ! इस प्रकार झुक्रने
दिवजीकी सलृति करके उन्हें नमस्कार किया और उनकी
आशसे मे पुनः दानबॉकी सेनामें प्रविष्ठ हुए। ठोक उसी तरह
जने चस्धमा गेधोवी पय्म प्रवेश करते हँ। व्यालजी | इस
प्रकार रणभूमिम घंकरने जिस तरद शुक्रको निगल लिया था;
4९ इसान्त तो तुम्दं सुता दिया | अब शम्मुफ़े उदरमें शुकने
जिले सस्तेकी जप किया था) उसका वर्णन सुनो ।
मर्दर्ष | बह मर इस प्रकार ऐ---
(3७ नमस्ते देखेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतसब्य-
मदादवाय दस्तिपिक्ुल्डोचनाय बजाय चुद्धिरूपिणे प्रैयाप्र-
पंसनप्छदायारणेयाय प्रैदोस्यप्रभवे श्वराय इराय दरिनेश्राय
पृभान्तकरणायानझाय गगेशाय छोकपरााय मंदाशुजञाय
मेहाइ साय घूछित मदाद ड्रिणि प्राय मदेखराय अब्ययाय
काउडपिणे नीज्प्रीयाय महोर॒रय गणाध्यक्षाय स्वोत्मने
प्र4नावनाय स््य सस्पुस्सप्रे पारियाप्रसुमताय मद्षणरिगे
दस्काय नपो बल्तगाय पशुपतये न्यज्ञाय शूरपाणये सृपफेलये
फैय अहिने लिखविदने >कुदिति मदायशये सुमेधराय
सर्वेहराय ह्रिण्यश्रवसे द्वारिणे भीसाय भीमसपताक्रमाय ए*
नमो नमः र>
इसी श्रेष्ठ मन्त्रका जप करके झुक्त गग्नुफे जठर-पिजुरसे
लिड़के रास्ते उत्तट बीय॑की तरद निके थे । उस समय
गोरीने उन्हें पु्ुरूपसे अपनाया और जगदीद्र शिवने अजर-
अमर बना दिया । तब वे दूसरे शंकरके सइश झोभा ने
लगे। तीन इजार वर्ष ब्यतीत दोनेके पश्बात् थे दी वेदमिि
मुनिवर शुक्र पुन। इस भूतहूपर महेश्यससे उत्न्न हुए | उस
# उ जो देवताओंफे र्वासो, युर-असुरद्ारा वलिदिक यूत और
भविष्यके महान् देवता। इरे और पोठे नेतींसे यूक्तः भंद्याबंटी)
नुद्धिस्वरूप, आपंवर धारण करनेबाऊ़े) अपिर्द्पा निदेकाऊ
अ्पत्तियान,, ईश्वर, इक इरिनेय, प्रतयफ्ररी अध्लिरवरूप)
गगेरा। लोकपाल, मद्दाभुज, मढ्ाइसा। जिशुझ भारत करनेताडे।
बीबी दादवाले) फाटलरूप) नरेखर। अधिनाशा, कःथरूपी
नीलकण्ठ, महींदर) गधाध्यज्ष) सर्वात्ता। सबको उन करनेबाजे।
सर्वग्यापी, सत्युक्तों इटानेताडे, पारियात परववपर उतने गत बाएत
फरनेबाले, अद्वाचारी। परेदानप्रतिपाव, तप सलित सोमावड
ना
पईचनेवाड़े) परशुपति, विधि्ट अहीचिजे, घटाया ब५54ना
पायापरारी, अदाबारी। द्िज्ञाड पारंय करनेबाे, दम्इपररी
महावपत्ी, भू38र, (दाने विकास करनबाईे। वीचा और पच३१६
वीछ लगानेंदाठे) सभा इइलिक, अडइक्सियिी ७४2;
समयानवाती, ऐप्स उपायोक सह रसला आप नह २ 4५
कर इनेवाडे) पूरय दावीकि विदाछ क अर व ७ बदार बछाए
कक न के का # ताक | जप का के तन ] 8०%; ना
प्थियओक ७542 कह) / ९ ब अ-्यच कक बात, 7 3<२०२'
;: ऊ तक हे > के प्र तक नह
हे आर ई७ 7 इत 9३ ९ कम 7
दाग इंजींद वी 3 इट[७ै३3़, हक 0. # जज *ज २4
9 ० पा
5: 4 ४
२८६
जी कस. के # बता. 2 पिजनलफिकनीयलगीएमी + उननी>> ०० 7 2 नी हा आओ >> 5 २५ हित 5
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समय उन्होंने घेशाली एसं तपत्थी दानवरज अन्यकको
देखा । उसका शरीर सूख गया था ओर बहू त्रियुल्गर लटका
हुआ परमेश्वर शिवका ध्यान कर रहा था| ( सं शिवजीके
१०८ नामोंका इस प्रकार स्मरण कर रहा था--)
महादेव--देवताओंग गहन) पिरुपाक्ष-विकराल
नेत्रोंवालि, चन्द्राधकृतशेखर--नास्तकपर अर्तनस्द्र भारण
करनेवाले, अम्त---अमृतस्वरूप, शाश्वत--एनातन+ स्थाणु---
समाधिस्थ होनेपर टूँठके समान खिर, नीलक्रण्ड--गर्लओं
नील चिह् धारण करनेवाले, पिनाक्ी--गिनाक नामक
धनुष घारण करनेवाले, वृपभाक्ष-्रपभकके नेन्र-सरीशे
विशाल नेत्रेंबाठे, महाज्ञेय--ल्महान्? रूपसे जागगे योग्य,
पुरुष---अन्तयोमी, सर्वकामद--सम्पूर्ण कामनाओंकों पूर्ण
करनेवाले, कामारि---करामदेबक्रे शत्रु, कामद्हन---कामदेव-
को दग्ध कर देनेवाछे, कामरूप--इच्छानुसार रूप घारण
करनेवाले, कपर्दी--विशाल जटाओंब[|ले, विरूप--विकराल
रूपधारी, गिरिश--गिरिवर केलासपर शयन करनेबालि,
भीस--भयंकर रुपवाले, सक्की--बड़े-बढ़े जबड्रोंवलि,
रक्ततासा---छाल वच्नधघारी, योगी-योगके . शत,
कालद॒हन---कालको भस्म कर देनेवाले, त्रिपुरक्ष--त्रिपुरोंके
संहारकतों, कपाली--कपाल घारण करनेवाले, गृढ्बत---
जिनका ब्रत प्रकट नहीं होता, गुप्तमन्त्र--गोपनीय मन्त्रों-
वाले, गम्भीर--गम्भीर खभाववाले, भावगोचर--भक्तोंकी
भावनाके अनुसार प्रकट होनेवाले, अणिमादिगुणाधार---
अणिमा आदि सिद्धियोंके अधिष्ठान, त्रिलोकैश्वर्यदायक---
त्रिछोकीका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, वीर--बलशाडी,
वीरहन्ता--शन्रुवीरोंकी मारनेवाले, घोर--दुष्टोंके लिये
भयंकर, विरूप--विक्रट रूप धारण करनेवाले, मांसल---
मोटे-ताजे शरीरवाले, पहु--निपुण, महामांसाद---श्रेष्ठ फल-
का गूदा खानेवाले, उन्मत्त--मतवाले, सैरव---काल-
भैरवखरूप, महेश्वर--ददेवेश्वरोंमें भी श्रेष्ठ, त्रैलोक्यद्रावण--
जिलोकीका विनाश करनेवाले, छुब्ध--स्जनोंके लोभी,
छःपघक-महाव्याधस्वरूप, यज्ञसूदून--दक्ष-यक्षके बिनाशक,
कत्तिकासुतयुक्त--कत्तिकाओंकि पुत्र ( स्वामिकार्तिक ) से युक्त,
उन््मत्त-उन्मत्तका-सा वेष घारण करनेवाले, कत्तिवासा-गजासुरके
चमड़ेको ही वच्नरूपमें धारण करनेवाले, गजक्ृत्तिपरीधान--
हाथीका चरम लपेटनेवाले, क्षुब्ध--भक्तोंका कष्ट देखकर
क्षुब्ध हो जानेवाले, भुजगर्भूषण---सर्पोकी भूषणरूपमें
घारण करनेवाले, दृत्तालम्ब---भक्तोंके अवबल्म्बदाता;
£ मम सद्भाय शान्ताय ब्रद्मण परमात्मने #
आन >#़ >>
[ संक्षित-शिवपणणा
बेताल--सेतालखूूप, घोर--ब्रोर; शाकितीए्स्ि-
शकिनियोद्धारा' सम्रारधित, अबोर--आओोरयगड़े प्र
घोरट्त्यप्न--भयंकरदेत्योके संद्वारक। धोखोप-६ग
शब्द करनेसालि, चनत्यति--सनत्यतिखर्प) भम्ताइ-हांऐं
भस्म समानेवालछे, जटिछक--जठधारी, शुद्ध फ्
भरुण्दशतसेवित--सेकड़ीं भेरुण्डनामक पह्षियेद्षए
भूतेशवर--भूतेकि अधिपति, भूतनाथ--भूतगर्गकि गए
भूताथ्षित--सजभूतोंकी आश्रय देनेवाले, खग-नाते
फ्रोधित--करीधयुक्त, निष्ठुर--हुर्शंपर कठोर लहर
वरछि। चग्ड--प्रचण्ड पराक्रमी। चण्ठीश--चण्डीडे प्र)
चण्डिकाशिय--चण्डिकाके प्रियतम,। चण्डतुम्ड-२
कुपित मुखनाऊे, गरुमान--नदइखल्प) विलिंा-
छाप) शमभोजन--दावका भोग लगानेवाले) ठेटिश
कुद्ध दोनेपर जीम लयल्पानेवाले; महारोद-अलत
सत्यु--मृ त्युख्वलूप, सत्योरगोचर--मुत्युकी भी पु
झत्योशूस्यु--मृत्युके भी काल; महासेन--विशाल | पे
कार्तिकेयस्थरूप, इमशानारण्यवासी--ईमशान एवं मँ
विचरनेवाले, राग--प्रेमखलूप) विराग--आतकि
रागान्धय--प्रेममें मस्त रहनेवाले। वीतराग-7
शताचि---तेजकी असंझ्य चिनगारियोंते युक्त) परत
गुणरुप, रज :--रजोगुणरूप » तमः --तमोगुणल्य ! हे
धर्मखरूप, अधर्म--अधर्महूप, वासवाहुन-ईई
भाई उपेन्द्रखलूप, सत्य--सत्यरूप) असत्य-- लत मै
सत्रप---उत्तम ल्पवाले, असदूप--बीमेत्स के
अद्देतुक--हेतु रहित, अर्धनारीखर--आंषा पुर्क है.
6 भाव!
स्लरीका रूप घारण करनेवाले, भातु-सेंयेलल) भाई
शतप्रभ--कोटिशत सूर्योके समान प्रमशातरी कै
यशंस्॒रूप, यज्ञपति--यशेश्वर, रुद्र ---संहारकर्ता
ईश्वर, वरद--वरदाता, शिव--कब्याणलह।
शिवकी इन १०८ मुतियोंका ध्यान करनेसे वह दी
महान भवसे मुक्त दो गया#| उे भयसे मुक्त हो गया# | उस समय
चा + का हे नी विज ऑे बन ढक 9
) पएः
भदादेव॑. विरूपाओं.. चर्द्ा्धशतशेजरर।
# महादेवं भ् न
अमृत शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठ पिनाकित:
वृषभाक्ष॑ महाशेय पुरुष सर्वकामदर्ग
| ॥
कामारि कामदहन कामरूप केपदिवा: क्
विरूप॑ गिरिशं भीम॑ सकिणं . रक्तवास्त ।
योगिनं॑ कालदहनं .त्रिपुरप्त. कैपालितर
इसंदिता ] # छुकद्वारा जपे गये शिवाष्टोत्तरशतनामस्तोचका वर्णन, शिवद्वारा अत्थककों बरप्रदाव # २८७
#
कलम मी नि लि फल किक नरक िर मलयालम मर लश्कर सम कल ज लजि मलजअम न क
लम्बी नीज जन रण
थी स्ालमान्यालनमन्पनमीा-मधा+-ननका य्स
कत #-. + ऑन मन मिनी नी औज कक 4 ७०,०ह कार 3 ॥ (मी >जममन- अगीनोन््णकण ३००त की नो जी:
बारों मंकरने उसे सुक्त करके उसे विश्यूद्क्क अप्रभागस सनत्कृमा एजी कहते है--सुने ! सद सुनकर अन्चकने
पर झिया और दिव्य अमतकी वन््रसे अभिषिक्त कर थ्रूमिपर अपने घुटने देक दिन आर फिर वेद दाथ जोइकर
था ) तत्यश्रान मद्रात्मा मदेखर उसने जो ऋछ किया था। कॉपता हुआ सगयान उम्रापतिसे बोला ।
पे सबका सास्थनापूर्वक वर्णन करते हुए. उस मरधद॑त्य पन्वकने कहा--भगवन ! आपकी सदिमा अनि
पद्म वाल | । विना मैंने पहले र्ात्गर्भ दर्मगह्द बागीसे आपकी जो
ईश्वरन कहा-दे देल्ेद्र ! में तेरे इखिय- दीन) दीन तथा नीच सेनीच कहा है और मूर्खनावश्
पद, नियम) शी और बसे प्रसन्न दो गया हँ। अतः झोकमें जो-जो निन्णित कम किया $ प्रभो | उस सबके!
|| अब तू काई बर माँग ले | देत्थेक्रि राजाविराज | आप अपने मन स्थान ने दें अर्थात् उसने भूछ जाये।
ग निरन्तर मेरी आराधना की 4) इससे तेशण सारा कह्मप. अहादेव ! में अत्यन्त झछा ओर दसी हू । मते कामदोपयदा
5 गा और अब तू बर पानेफे बोस द्वो गया दे | इसीडिये. पर्वतीके विपय्में मी जो दूधित भावना कर ही थी; उसे
ऐसे बर देवेक लिये आया हूँ। क्योंकि तीन दमार आप क्षमा कर दे । आपको तो अपने कृपण) दुसी एवं
है प्र
गतिक बिसा साये-पीये ध्राण थारण किये रदनेसे तूने जो. दीन भक्तार सदा हो विगेय दा करनी चादियि | में उसी
ने कमाया ६) उसके फड्खरूप तुश्े सुखकों प्राति दोसी तरहका एक दीन भक्त ८ और आपकी ग्राम आया ई ।
कक,
दिय] देखिये; मेने आपके सामने अक्षठ यप सकती दे | अब
५४७७७: आपको मेरी रक्षा करनी चादिये। थे ववलननी बाजती देती
जो ल | गुाधसन्प गम्नार । भावषगा रस |. री मुसपर प्रसन्ष ही जाय आर बाय 3 न 5 गो कप मु
मभिमादियुथा भरे जिलोकी धर्यदायकम् ॥ कृपादशिति देखें । चछरोस्र ! कड़ा
३ ५ 5 के 3
पीर रद थोर॑ दिख्यं मसिल परदे । धेव और क्यों मैं तुच्ठ कैय ? चन्दमी आर
जि भरत 4. मसदेखरस ॥ उसकी सन नहीं कर सकता । दादी | क्ीों नो पझा उदार
पदीपदाबंग दुच्प.. उप. बाबरनस् । व ओर कद बुदाआ$ सस्यु ला झोम फऋोब हआादि दीपद
कं "जरआ क कक ञ हे डि पल हि धर हैं
जनों... पुततिककुमर्च... कुतियाससस ॥ यशीजूत से / जात सरी शायद लांच 4या तुझना | ! ;
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दीप 20 33] 0 अल कम मूखर | आप ये सुद्धधधलपुत्र संदीददी सर पुल
जब बे दाल पार शाकिनिवृनित व टपतॉवापि वियार 55 है आए उजओं शय कँते हो.
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२८८
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने
[ संक्षिप्तशियषुणा]
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तो माता-पिता ( उम्ा-मददेश्वर ) को प्रणाम करके वह इतकृत्स
हो गया | उस समय पायेती तथा बुद्धिमान शंकरने उसका
मस्तक सूघकर प्यार किया । इस प्रकार अन्चनने प्रसन्न हुए
चन्द्ररोरसे अपना सारा मनोरय प्राप्त कर लिया | मुने !
महादेवजीकी कृपासे अन्वककों जिस प्रकार परम सुक्षद
खच तप <[
गगाध्यक्षयद प्राप्त हुआ था। वह सागणाण एस
शषतान्त मनि तुझई सुना दिया और मृल्युंतमत्न ;
वर्णन कर दिया । यह मन्त्र झुत्युका विनाशक और कम
कामनाओंका फल प्रदान करेवाल दै।झे पफ्रहड
जपना चादिय | ( अबाव ४४४)
“----ः-3$-- ८८४5: ८००
शुक्राचायकी घोर तपस्या ओर इनका शिवजीको चित्तरत् अपेण करना तथा अध्मृत्ष्टकसोगा!
उनका स्तवन करना, शिवजीका असन्न होकर उन्हें सतसंजीयनी
विद्या तथा अस्यान्य बर प्रदान करना
सनत्कुमारजी कहते है--व्यासजी | मुनिवर शुक्रा-
चायेकी शिवसे मृत्युंजय नामक मृत्युक्रा प्रशमन करनेयाली
परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी; अब उसका वर्णन करता हैँ;
सुनो | पूर्वंकालकी बात है; इन भगुनन्दनने वाराणसीपुरीम जाकर
प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए बहुत कालूतक घोर तप
किया था । वेदव्यासजी | उस समय उन्होंने वहीं एक शिवलिड्गकी
स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कृप
तैयार कराया । फिर प्रयक्षपूवंक उन देवेश्वस्की एक लाख
बार द्रोणभर पश्चाम्मतसें तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्योंसे स्लान
कराया | फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन) यक्ष-
कर्दम# और सुगन्धित उबटनका उस लिड्डपर अनुलेप
किया । तलश्चात् सावधानीके साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक
( अमल्तास » घतूर, कनेर; . कमल, मालती, कर्णिकार:
कदम्ब) मौलूसिरी, उत्पछ, मछिका ( चमेली ) शतपन्नी,
सिन्धुवार; ढक; बन्धुकपुष्प ( मुलदुपहरी » पुंनाग) नाग-
केसर, केसर; नवमछिक ( बेलमोगरा ) चिविलिक
( रक्तदला ) कुन्द ( माधपुष्प » मुचुकुन्द ( मोतिया )
मन्दार, बिल्वपत्र, गुमा। सख्चुक ( सझ्आ » बृक
( धूप » गैंठिवन। दौना। अत्यन्त सुन्दर आमके
पल्छकव, तुलसी, देवजवासा, बृहसत्री, कुशाकु, नन््दावर्त
( नॉदरूख » अगस्त्व, साल, देवदारु, कचनार)
कुरबक ( गुलखेरा » दुर्बाछुए कुरंयक ( करसैला-)--
इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पल्ल्बोसे तथा नाना
प्रकारके रमणीय पन्नों ओर सुन्दर कमलौसे शंकरजीकी
विधिवत् अर्चना की । उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये |
_तथा शिवलिज्ञके आगे नाचते हुए शिवसहस्तनाम एवं
एटघयययघय 5 सससस इसी चल न न... नक ५७०2० ७७
# एक प्रकारका अक्न-लेप, जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और
. कटझीौलकों मिलाकर बनाया जाता है ।
आन्यान्य सोन्रोंका गान करके शंकरजीका सब ज्नि।
इस प्रकार शुक्ताचार्य पाँच दजार वर्षोतक नाना पन्ना
विधि-विधानसे सदेखरका पूजन करते रहे। परंठु ज मे
थोड़ा-सा भी वर देनेके लिये उद्यत होते नहीं देखा) #
उन्होंने एक दूसरे अत्यन्त दुत्सह एवं घोर नियत आह
लिया । उस सम्रय झुक़ने इन्द्रियॉसहित मतके अर
चशलतारूपी मद्दान दोषको बारवार भावनाह्णी के
प्र्ञालित किया | इस प्रकार चित्तस्नको निर्मल कम
पिंनाकधरी शिवके अर्पण कर दिया और सवय पूछा
पान करते हुए तप करने छगे। इस प्रकार उ् £
सहस्त वर्ष ओर बीत गये | तब भगुनन्दत कु
हृठचित्तसे घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर पद
गये । फिर तो दक्षकन्या पार्वृतीके खामी साक्षाद् कि
शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सहखों सो ही
थी, उस लिड्से निकलकर शुक्रसे वोले |
;
महेश्वरने कहा--महाभाग भ्गुतस्दत कि
तपस्थाकी निधि हो | महामुने ! में त॒स्हारे इस
तपसे विशेष प्रसत्न हूँ । भार्गव | तुम अपना 7४ ४
९५ प्रीतिपूर्वक १0
वाओ्छित बर माँग लो | मैं प्रीतिपूषंक ठग्हार पे ५
पूर्ण कर दूँगा । अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई 4
नहीं रह गयी है ।
हि
सनत्कुमारजी कहते है--हने ! झुममुके पु
सुखदायक एवं उत्कृष्ट बचनको सुने! कु ४
आनन्द-समुद्रमं निमम हो गये। उने
पक
शुक्रका शरीर परमानन्दजनित रोमाअकें की
हो गया | तब उन्होंने हर्षपू्वक शम्परे के
किया | उस समय- उनके नेत्र इषसे लिए
मठुसंदिता | # आुक्राचायकी घार तपस्या और इनका शिवज्ञीकों अपना चित्तरत्ञ अर्पण करता #
"अर. एमपहमकमपऋग_-रममम. आग
++ सर >अाररीन्क्नरी . हर-+5-न. मम. 2. अमर. >पानीी ही ानमाम-नडा++- समीर"... लना--बदामग- नमी... दर +--स्ीविना मनन. साहनी अननेर..जम दान जया" म- ० ाा-स..
पे मकर अझस्ि रमफ़र जवब-जबकार करते हुए
मृतियारीक्ष बरदाबक शिवकी स्तुति करने लगे |
भागने करदां--ूवस्खरूप भगवन् | आप भिलोकीका
दि करतेदे लिये आह्यगर्भे प्रकाशित हे हैं और अपनी
इनसे किरणोसे समस्त आअन्नकारकों अभिनृत करके रातमें
पिचस्नेयाले असुरोदा मनोरध नष्ट कर देते हे | जगदीशर !
आप नमस्कार है | घोर अन्यकारके दिये चतस्थरुप
धंवर | आप अम्ृतक प्रवाटसे परिएणं तथा जगतके सभी
प्रागियकि ने है |आप अपनी अमर्योंद तेज्रोमस किरणेसि
आकायमें और मूवठपर आबर प्रकाश फैलते ६, मिसते सास
अंपवार दर हो जाता है। आपको प्रणाम हे | सर्वव्यापिन !
आय पायन पस--योगगमागया आश्रय छेनेयालोंक्री सदा गति
पसा उपद्यदत : | भुवन-जीवस ! आपके विना भा:
इस हक कल जीवित रह सकता हे | सर्पफूलके संतोप-
दाता ! आप निश्चठ सायुरुपसे संम्पृूण प्राणियोंदी पद
परनेयालि हैं, आपयोी अभिवादन दे । विश्क्के एकेसाः
आयतकताो | आप दास्णागदस्थया अगर आअभियी एउ्सरान्न
ना ॥। पाये आपगा ही सझय हैं | अ्यपके दिग
ड्
स्का ज थ9५ >> ब०झ-- 5 | [ श्र न््ल् रा
सन परम मन पड नमी सम ५१ 30-रपरप पान ९ -+ कम मगर भा ९३-३० -+प+ 3. मर दु>*-फमन-*५
२८९,
७"4००७०-आम्मथा--5५..००-०.ी.. "जे पटक पलाांणाक नरमी,
शेड हैं| इसडिये आप परालर प्रशकों में वारबार प्रभाम
करता हे | भाप शंकर । आय समस्त प्रानिवोक्त
रो गिवोगे ते रिनियां 5 मत्येत लेप व्वाव हे और मे
अप परमात्माका उस है) अहम | ब्गावी >ग ठ्पररम्पराआंसे
यहू चराचर विश्व बिल्तारडों प्राम हुआ है। आठ; मे सारे
आपकी नमत्कार करता दूँ। मुक्तपुरुषदि बन्चों ! अगप
विश्वकें समस्त प्रागियोद खहया प्रशागनेद्धि सस्यूर्न
वोगदबिकों गियाह फलेयाओ जोर परीशयलय 6 आय
अपनी इन अश्मूर्तियेंसि युक्त होकर इस फेंठ हुए पिखको
भरीभोंति विख्लत बले है अतः आपयोी गेय अधिवादन दे ।9
सानिरानिर्िनू व तनरस्साः
गर्स्स नयस्यविभवानि
दिययते.. गगन
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अब हि का बमणकना-कनके पु हे हे
[ ३]५)| +३१॥<« ९६ |
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टकपवंस.. जअगीटरिी सकल |
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पीयूपपूरपरियृ रि 4 22008:
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नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन #
[ संक्षिप्तशिवपुफ्ा
विीकिलिगिनि निकल.
तो माता-पिता ( उमा-्मदेशवर ) की प्रणाम बरके बहू कतकूस
हो गया | उस्ष समय प ती तथा बुद्धिमान, शंकरने उसका
मस्तक सूँघकर प्यार किया । इस धकार आस्यकने प्रसन्न हूं
चन्द्रशेख॒स्से अपना सारा मगोरथ प्राप्त कर लिया । म॒ने !
महादेवजीकी कृपासे अन्चककी जिस प्रकार परम छुतद
'अम्णऑन्नन्मीफन्साक,
गणध्यक्षयद प्राप्त हुआ था। वह सागआणा पु्त
ब्त्तान्त मैने तुम्दे सुना दिया ओर मृत्युंजमत्ता म
धर्म कर दिया। यह मन्त्र झुत्युका विनाशक ओएरा
कामनाओंका फल प्रदान करनेबाल है।झे प्रक
अपना चार्ट । ( अबाप ४४]
शुक्राचार्यकी घोर तप और इनका शिवजीकों चित्तरत् अपैण करना तथा अश्मयेष्क सोडा!
्स
उनका स्तवन करना, शिवजीका प्सन्े होकर उन्हें मतसंजीवनी
विद्या तथा अन्यान्य बर प्रदान करना
सनत्कुमारजी कहते ह-ज्यातजी | मुतिवर शक
चार्यकी शिवसे मृत्युंजय नामक मत्युका शशमन करनेयाली
परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी; अब उसकाव एन करता हैं;
सुनो। पूर्वआलकी बात दै? इन भंगुनन्दनने वाराणसीपुरीम जाकर
प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए. बहुत कालतक घोर तप
किया था | वेदव्यासजी | उस समय उन्होंने वहूं।एक शियवलिकजकी
स्थापना की और उसके सामने द्वी एक परम स्मणीय कूप
तैयार कराया | फिर प्रयक्पूवक उन देवेश्वस्को एक लाख
बार द्रोणमर पग्चाम्ृतसे तथा बहुतन्से सुगन्धित द्रव्यंत्ति स्लान
कराया । फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूषंक चन्दन) यक्ष-
कर्दम# और सुगन्धित उबदनका उस लिक्षपर अनुलेप
किया । तल्वश्रात् सावघानीके साथ परम प्रेमपूवेक राजचम्पक
( अमलता[स >» धतूरः कनेर$ - कमल; मालती, कणिकार)
कदम्ब, मौलसिरी) उत्पछ) मलिका ( चमेली ) शतपत्रीः
सिन्धुवार5 ढाकः बन्धूकपुष्प ६ गुलदुपहरी ) पुंनाग) नाग-
केसर, केस>. नवमह्िक ( बेलमोगण )) चिविलिक
( सक्तदछा ) कुन्द ( माधपुष्प » सुचुकुन्द ( मोतिया )
मन््दार। बिल्वपत्र। गूमा) मरुबक ( सदझ्आ » इक
( धूप 9 गैंठिवन, दौना। अत्यन्त सुन्दर आमके
पल्कव, तुलसी; देवजवासा) बृहत्पत्री, कुशाडु: नन्दावर्त
( नौदरूख ) अगस्त) साल: देवदारं। कंचनार)
कुख्क ( गुलुखेरा ) दुर्वाहु७ कुरंय्क ( करसेला-)--
इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पहल्लवेसे तथा नाना
प्रकास्के रमणीय पन्नों और सुन्दर कमलोसे शंकरजीकी
विधिवत अर्चना की । उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये ।
तथा शिवलिड्रके आगे नाचते हुए शिवसहखनाम एवं
# एक प्रकारका अझ्ू-लेप, जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और
हा हे) रे कड्झछको मिलाकर बनाया जाता है ।
हे हर
अन्यान्य सोनींका गाने कस्क शंकरजीकी सका लि
इस प्रकार शुकाचाय पंच इजार बर्षोतक गाता कक
विधि-विवानसे मंदेशस्का पूजन करते रे परंतु बे :
योडास। भी वर देनेके लिये उद्यत होंते नहीं देखा
उद्दोंनि एक दूसरे अत्यन्त इुत्सह एवं घोर निवमझ्न $
लिया । उस समव झुक़ने इन्द्रियोंसहित मर
चशलतारूपी मद्वान, दोषको बारवार भवनात्ण '
प्रज्ञालित किया । इस प्रकार चित्तस्नको निर्मल करे
पिनाकधारी शिवके अर्पण कर दिया और ख भ
पान करते हुए. तप करने लगे । इस प्रकार उरे
सहस्त॒ वर्ष और बीत गये। तन भूगुनत्त के
दृदचित्तसे बोर तप करते देखकर महेंवर उनाए 5
गये | फिर तो दक्षकन्या पावेतीके खामी सका
शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सह सयोति *
थी 9 उस लिड़्से निकलकर >29 शुक्रसे बोले |
भहेश्वस्ने कहा-महाभाग अआयुनर '
तपस्थाकी निधि हो । महाम॒ने ! मे
तपसे विशेष प्रसन्न हूँ। भागव | ठग अपना “
वाड्छित बर माँग लो । प्रीतिपूर्वक तग्हाएं
पूर्ण कर दूँगा । अब मेरे पाठ तुम्हारे ल्यि कोर
नहीं रह गयी है ।
सनत्कुमारजी कहते है--मुने ! शाम मर
सुखदायक एवं उत्कृष्ट बचनको सुर्तके रे ॥
आननन््द-समुद्रमें निमभ ह्दो ग्ये | उन
शुक्रका शरीर परमानन्दजनित ' का
हो गया । तब उन्होंने दर्घपूवक शम्भुके कप
किया | उस समय उनके हनेंते हर्धसे लिए
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जनक ही 40. जननी जज दा
रुद्रसंहिता ] # शुक्राचार्यक्री घोर तपस्या और इनका शिवजीको अपना चिचरत्न अपेण करना के. २६९
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वे मर्तकपर अज्ञलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्ट-
मूर्तिवारी# वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे |
भारगवने कहा--सूर्यस्वरूप भगवन् ! आप त्रिछोकीका
हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैँ ओर अपनी
. इत किरणोंसे समस्त अन्धकारकों अभिभूत करके रातमें
विचरनेवाले असुरोंका मनोरथ नष्ट कर देते हैँ । जगदीश्वर |
आपको नमस्कार है । घोर अन्धकारके लिये चब्द्ृस्वरूप
शंकर | आप अमृतके प्रवाहसे परिपूर्ण तथा जगतके सभी
प्राणियोंके नेत्र हैं।|आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणोंसे
आकाशमें और भूतलपर अपार प्रकाश फेलछाते हैँ; जिससे सारा
अंधकार दूर हो जाता है; आपको प्रणाम है। सर्वव्यापिन् !
आप पावन पथ--योगमार्गका आश्रय लेनेवालोॉंकी सदा गति
तथा उपास्यदेव # । झुवन-जीवन ! आपके बिना भला:
इस छोकमें कीन जीवित रह सकता है | सपकुलके संतोष-
दाता | आप निश्चक वायुरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि
करनेवाले हैं; आपको अभिवादन है । विश्वके एकमात्र
पावनकर्ता | आप शरणागतरक्षक ओर अगिकी एकमात्र
शक्ति हैँ | पावक आपका ही खरूप है | आपके विना
मृतकोंका वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता।
जगत्के अन्तरात्मा | आप प्राणशक्तिके दाता। जगत्खरूप
ओर पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले हैं; आपके चरणोंमें
में सिर झुकाता हूँ | जलखरूप परमेश्वर | आप निश्चय ही
जगतके पविन्नकर्ता ओर चित्र-विचित्र सुन्दर चरित्र करने-
वाले हूँ | विश्वनाथ ! जलमें अबगाहन करनेसे आप विश्वको
निर्मेल एवं पविन्न बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार
है । आकाशरूप ईश्वर ) आपसे अबकाश प्राप्त
करनेके कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर
सदा खमाववश >शस लेता है अर्थात् इसकी परम्परा चलती
रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात्
नष्ट हो जाता है; इसलिये दयालु भगवन | मैं आपके आगे
नतमस्तक होता हूँ । विश्वम्भरात्मक | आप ही इस विश्वका
भरण-पोषण करते हूँ । स्वव्यापिन् | आपके अतिस्त्ति
दूसरा कोन अशानास्थकारको दूर करनेमें समर्थ हो सकता
है | अतः विश्वनाथ ! आप मेरे अजश्ञानर्पी तमका विनाद
कर दीजिये। मागभूषण ! आप स्तवनीय पुरुर्षेमिं सबसे
न ज 0 23720% 5 लक
४ पृथ्वी, जल, अम्नि, वायु, आकाश) वजमान, चन्द्रमा और
पूर्च--शम आठेमिं अषिछित शर्म) भय, रुद्र, उम्च, भौम;
शषति, मशदेव झौर ईशान--ये अष्टसूतियोंके नाम ५ ।
हे
।
थ० पु० झंं० ३७---
श्रेष्ठ हैं । इसलिये आप परातपर प्रभुको में बारंबार प्रणाम
करता हूँ. | आत्मखरूप शंकर | आप समस्त प्राणियोके
अन्तरात्मामें निवास करनेवाले) प्रत्येक रूपमें व्याप्त हैं और में
आप परमात्माका जन हूँ। अष्मू्तें | आपकी इन रूपपरम्पराअसे
यह चराचर विश्व विस्तारको प्राप्त हुआ है; अतः में सदासे
आपको नमस्कार करता हूँ। मुक्तपुरुषोंके बन्धो | आप
विश्वके समस्त प्राणियोंके खरूप) प्रणतजर्नोके सम्पूण
योगक्षैमका निर्वाह करनेवाले और परमार्थस्वरूप हैं । आप
अपनी इन अश्मूर्तियोंसे युक्त होकर इस फैले हुए; विश्वको
भलीभौति विस्तत करते हैं; अतः आपको मेरा अभिवादन है |%
5 7 नम डक
# त्वं भाभमिराभिरभिभूय तमस्समस्त-
मस्त॑ नयस्यभिमतानि निशाचराणाम् ।
देदीप्प से दिवमणे. गगने द्विताय
लोकनयस्य जगदीरवर तन्नमर्ते ॥
लेकेउतिवेलमतिवेलमह्दा महीमि-
निर्मासि कौ च गगनेडखिललोकनेत्रः ।
विद्राविताखिव्तमास्सुतमो हिममांशो
पीयूपपूरपरिपूरित तन्नमस्ते ॥
त्व॑ पावने पथि सदा गतिरप्युपाल:
कर्त्वा विना भुवनजीवन जीवतीद ।
स्तब्बप्रम्ननविवर्धितसवजन्तों
संतोपिताहिकुल सर्वग वे नमस्ते ॥
विश्वेकपावक नतावक पावकोक-
शक्ते ऋते. मृतवतामृतदित्यकार्यण ।
प्राणिष्यो. जगहों... जगदान्तरात्म॑-
स्व॑ पावकः प्रतिपद॑ शमदों नगत्ते ॥
पानीयरूप प्रमेश जगत्पवित्र
सचित्रातिचित्रसुचरित्रकरो डसि नूनम् ।
विदर्व पवित्रममरूू दिल. विखनाथ
पानीयगाइनत. एतदतो. नतोीड$स्मि ॥
आकाशरूपवह्िरन्तरुतावकाश-
दानाद विकसरमिदेशवर विश्वमेतत् ।
त्वत्तस्सदा सद॒य संश्वसिति खमावात्
घपंकोचमेति मवतोइसि नतस्वतत्त्वाम् ॥
विश्वन्भरात्मक विभषि विभोड्त्न विद
को विश्वनाथ मवतोध्न्यतसस्तनो5डरि: ।
स त्वं विनाशय तमी मम चादिनूप !
सतव्यातरः परपरं प्रनालतस्तवान ॥
२९०
£ नमो रुठ्राय शान्ताय ब्राह्मण परमात्मने #
[ लंक्षिततशिवपुराणा
लहर ननिसलापीलीजयाडाा3280वति2लइाध्ाभकआाइ परान्य३ब्मापरप्यूज-परम कब पतन पम्प पापा पदक मम 35:723:57:5524+%446#७5७#4##७&%७9%# ७७७७४ ७उ७४७४४#७७४#४४४४४ ४४४४४
सनत्कुमारजी कहते ह-मुनिबर | भरगुनन्दन
शुक्रने इस प्रकार अध्मृत्येटकस्तोत्रद्वारा शिवजीका रावत
करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया |
जब अमित तेजस्ी भागवने महादेवगी इस प्रकार स्तुति की
तब शिवजीने चरणोंमें पड़े हुए उन द्विजवरकों अपनी दो नें
भुजाओँसे पवाइकर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक गेघ-गर्जन-
की-सी गम्भीर एवं मधुर वाणीमें कहा | उस समय शंकरजीके
दातोंकी चमकसे सारी दिशाएँ: प्रकाशित हो उठी थीं |
महादिवजी बोले--विप्रवर कवे ! तुम मेरे पाचन भक्त
हो | तात | तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे)
लिड्डस्थापनजन्य पुण्यसे, लिक्नकी आराधना करनेसे, चित्तका
उपहार प्रदान करनेसे। पवित्र अटल भावसे; अविमुक्त मद्दक्षेत्र
काशीमें पावन आचरण करनेसे में तुम्हें पुन्ररूपसे देखता हूँ;
अतः तुम्हारे लिये मुगे कुछ भी अदेय नहीं है | तुम अपने
इसी शरीरसे मेरी उदरदरीमें प्रवेश करोगे और मेरे भेष्ठ
इन्द्रियमागंसे निकलकर पुत्ररुपमें जन्म ग्रहण करोगे ।
महाशुचे | मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या
है, जिसका मैंने ही अपने महान तपोबल्से निर्माण किया है
उस महामन्त्ररू्पा विद्याकों आज में तुम्दें प्रदान करूँगा;
क्योंकि तुम पवित्र त्पकी निधि हो, अतः तुमर्मे उस विद्याको
घारण करनेकी योग्यता वर्तमान है | तुम नियमपूर्वक जिस-
जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वर्की इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे;
वह निश्चय ही जीवित हो जायगा--यह सर्वथा सत्य है ।
भााााााााभााआाााारई “७० लल आम अअाााााअा
तुम आकाशर्म अत्यन्त दीक्षिमान् तारार्यसे खित हेओोगे।
तुम्दारा तेज सूर्य ओर अगिके तेजका मी अकिमा मर
जायगा | तुम गद्दोग प्रधान माने जाओगे | जो बी बका
पुझष तुम्हारे सम्मुस्त रहनेपर यात्रा करेंगे) उनका खा ब्रा
तु्दारी दृष्टि पढ़नेते नए हो जायगा । सुन्रत | तुझोरे उस
देनेपर जगवम मलुष्योकि विवाह आदि सम्रस्त घमद्रा
सफल होंगे | सभी नन््दा ( प्रतिपदा। पष्ठी और ए्रद्ण]
तिभियाँ तम्हार रायोगस शुभ दो जायेगी और तु्यरे रे
वीर्ससशन्न तथा बहुत-सी संतानदाछे दोंगे। तु्रे
सापित किया हुआ यद शिवलित गुक्रेश! के नामते गिल
दोगा | जो मनुप्य इस लिएकी अचना करेंगे, उद्दँ
प्राप्त दो ज्ञायगी | जो| छोग वर्षपर्यन्त नक्त्रपपाय है
शुकबास्के दिन शुक्रकूपक्के ललसे सारी क्रियाएँ उप्र के
आतेशकी अर्चना करेंगे) उन्हें जिस फलकी प्रति होगी।
मुझे श्रवण करो। उन मनुष्येमि वीयंकी भविकता होगी। उरे
वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा; वे पुत्रवात् तथा पुल
पौभाग्यसे सम्पन्न होंगे | इसमें तमिक भी संदेह न
थे सभी मुष्य बहुत-सी विद्याओंके शता और खुले ४
देंगे | यों वरदान देकर महादेव उसी लिद्ञर्म सम ५
तब भगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमननसे अपने धाम
गये । व्यासजी ! यों झुक्राचाबेंकी जिस प्रकार आपने वो
मृत्युंजय नामक विद्याकी प्राप्ति हुई थी। वह वत्तात
तुमसे वर्णण कर दिया । अब ओर क्या के
बाणासुरकी तपझा और उसे शिवद्वारा वरप्राप्ति, शिवका गणों और पुत्रोंसहित उसके नगर वि
करना, बाणपुत्री ऊधाका रातके समय खममें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा
द्वारकासे अपहरण, बाणका अनिरुद्धको नागपाशमें बाधना, हुर्गाफे स्तवनसे अनिरुद्धका
वन्धनसुक्त होना, नारददारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई)
शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें
जुम्भणास्तसे मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना
व्यासजी बोले--सर्वक्ष सनत्कुमारजी | आपने अनुग्रह
करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुन्दर कथा सुनायी है, जो
शंकरकी कृपासे ओतप्रोत है । अब मुझे शशिमोलिके उस
अधिकमामााशभाा.. "जा: 32७ अा[-कमावतान-पादाकयामा..ध-- आज -8०५ ६.६. 00७ धव३०ाा॥ ३७ पार था..." ४०"... मी. भा ::....3... भा वयशा धा-धा.........६. 24४०७ -भ-काओ.-..., धन राधा - कक १७७५७ ७
पर
उत्तम चरित्रके श्रवण करनेकी इच्छा है, जिसमें उन्होने
होकर बाणासुरको गणाध्यक्ष-पद प्रदान किया या हि
___सनत्कुमारजीने कहा आता ६. कहा--व्यासजी | परम
वि 80 कक लक लि किक गन 3. जा
आत्मसखरूप तव रूपपरम्पराभिराभिस्तत॑ हर
च्रावररूपमेतत् ।
सवोन्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्य॑ नतोंडसि परमात्मजनो5छमुर्ते ॥
श्त्यध्मूतिभिरिमामिरवन्धवन्धो युक्त: करोषि खल॒विश्वजनीनमू्तं ।
एतत्ततं॑ सुवितत प्रणतप्रणीत सर्वार्थसाथपरमाथ्थ
ततो नतो$स्मि ॥ हा
( शि०. घु० रु० सं० युद्खण्ड ५० | न्
द्रसंदिता ] # बाणासुरकी तपस्या और उसे शिवद्धारा चर-प्राप्ति' शिचका उसके नगरम निवास # २९२१
विशशभिमशमिजिल न नकल तन म कम ननन मिशन म दी मिनिट न मल मद अ पक नटसल मनी मद ममकक डक अकआ आ आल लक बल आना इन मारा ं।शी््रश।00॥४७७॥एशशश/शशशशशनाल्ररएआ्एरश्णणा॥% ७७0७७ ७७७४७४७७४७७४७॥७॥७॥७४४७७७७ए७ए॒ए "यूथ
!स कथाको; जिसमें उन्होंने प्रसन्न हेकर बाणासुरको गणनायक
नाया था; आदरपूर्वक श्रवण करो । इसी प्रसड्ञमें मह्मप्रभु
करका वह सुन्दर चरित्र भी आयेगा। जिसमें उन्होंने
!णासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्णके साथ संग्राम किया था |
यासजी | दक्षप्रजापतिकी तेरह कन्याएँ कदयप मुनिकी पत्नियाँ
थीं) वे सब-की-सव पतिब्रता तथा सुशीला थीं । उनमें दिति
बसे बड़ी थी; जिसके लड़के देत्य कहलाते हैं| अन्य
क्ियोंसे भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्नरूपसे
उसन्न हुए थे। ज्येष्ट पक्षी दितिके गर्भसे सर्वप्रथम दो महाबली
पत्र पेदा हुए; उनमें हिरण्यकरशिपु ज्येष्ठ था और उसके छोटे
भईका नाम हिरण्याक्ष था | हिरण्यकशिपुके चार पुत्र हुए ।
उन देत्यश्रेष्ठॉंका क्रमशः हद, अनुहाद, संहाद और प्रह्मद
ग़म था। उनमें प्रहाद जितेद्धिय तथा महान बिष्णुमक्त
हुए । उनका नाश करनेके लिये कोई भी देत्य समर्थ न हो
पका । प्रह्मदका पुत्र विरोचन हुआ वह दानियोंमें सर्वेश्रेष
था । उसने विप्ररूपसे याचना करनेवाले इन्द्रको अपना सिर ही
है डाछा था । उसका पुत्र बलि हुआ | यह मह्दानी और
शेवभक्त था| इसने वामनरूपधारी विष्णुको सारी प्रथ्वी दान
कर दी थी। वलिका औरत पुत्र बाण हुआ | बह शिवभक्त)
पानी; उदार, बुद्धिमान) सत्यप्रतिश्ष और सहस्थोंका दान
केरनेवाला था | उस असुरराजने पूर्बकालमें त्रिलोकीको तथा
जिलोकाधिपतियोंकों वल्पूर्बक्क जीतकर शोणितपुरमें अपनी
राजधानी बनाया ओर वहीं रहकर राज्य करने रूगा | उस
समय देवगण शंकरकी कृपसे उस शिवमक्त बाणासुरके
किकरके समान हो गये थे | उसके राज्यमें देवताओंके
अतिरिक्त और कोई प्रजा हुखी नहीं थी | शजुघर्मका बर्ताव
करनेवाले देवता शन्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे | एक समय
नई सहासुर अपनी सह्खों धुजाओंसे ताली बजाता हुआ ताण्डव
इस करके मदेश्वर शिवकों प्रसक्ष करमेकी चेश करने
जगा | उसके उस जत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये |
फिर उन्होंने परम प्रसन्न हे उसकी ओर कृपाइश्सि देखा |
भेगवान् शंकर तो सम्पूर्ण लोकोके ख्ामी, शारणागतबत्सछ और
भेक्तेवाज्छा-कल्पतर ही ठहरे | उन्होंने बलिनन्दन महासुर
पाणके वर देनेकी इच्छा प्रकट की |
पुने | वलिनन्दन महादैत्य वाण शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और
रस तुद्धिमान् था । उसने परमेश्वर शंकरको प्रणाम करके उनकी
लुति की ( और कहा ) |
दाणासुर योला--प्रभो | आप मेरे रञ्नक हो जाइये
और पुत्रों तथा गर्णोसहित मेरे नगरके अध्यक्ष बरमकर सर्वया
प्रीतिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--महर्षे ! वह बलिपुत्र बाण
निश्चय ही शिवजीकी मायासे मोहमें पड़ गया था, इसीलिये
उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले द्ुराराध्य महेश्वरकों पाकर भी
ऐसा वर माँगा । तब ऐश्वयंशाली भक्तवत्सल शम्मरु उसे वह
वर देकर पुत्रों और गणोंके साथ प्रेमपूर्वक वहीं निवास करने
लगे | एक बार बाणासुरको बड़ा ही गव॑ हो गया । उसने
ताण्डवनत्य करके शंकरको संतुष्ट किया | जब बाणासुरको यह
शात हो गया कि पावतीवक्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं; तब वह
हाथ जोड़कर सिर झुकाये हुए बोला ।
बाणासुरने कहा--देवाधिदेव महादेव | आप समस्त
देवताओंके शिरोमणि हैँ | आपकी ही इपासे में बली हुआ
हूँ | अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये | देव | आपने जो
मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान्
भारखरूप लग रही हैं; क्योंकि इस चिलोकीमें मुझे आपके
अतिरिक्त अपनी जोड़का ओर कोई योद्धा द्वी नहीं मिला ।
इसलिये वृषध्वज | युद्धके बिना इन पर्वत-सरीखी सहतसों
भ्ुजाओंकोी लेकर में क्या करूँ । मैं अपनी इन परिपुष्ठ
भुजाओंकी खुजली मिटानेके लिये युद्धकी छालसासे नगरों तथा
पवतोको चूणे करता हुआ दिग्गर्जोकि पास ग्रया; परंठु वे भी
भयभीत होकर भाग खड़े हुए | मैने यम्को योद्धा, अग्निको
महान् कार्य करनेवाला, वरुणको गोओेंका पालनकर्ता गोपाल,
कुबेरकी गजाध्यक्ष, निऋतिको सेरन्त्री और इन्द्रको जीतकर
सदाके लिये करद बना लिया है | महेश्वर ) अब मुझे किसी
ऐसे युद्धके प्रात्त होनेकी वात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ
या तो शन्रुओंकि छार्थेति छूटे हुए शखत्रात्नोंसे जणर होकर
गिर जायें अथवा हजारों प्रकारसे शतन्रुकी भुजाओंको ही
गिरायें | यही भेरी अभिवाषा है, इसे पूर्ण करनेकी कृपा करें |
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुनिश्रेष्ठ / उसकी बात
सुनकर भक्तबाघापहारी तथा महामन्युस्वरूप रुद्रको कुछ क्रोध
आ गया | तब वे महान् अद्भुत अमश्दहास करके बोले |
रुद्बने कहा--“अरे अभिमानी ! सम्यूर्ण देत्योंक्रे कुलमें
नीच ! तुझे सर्वथा घिक्कार हैः पिक्वार दे | व् बिका पुत्र
ओर मेरा भक्त है। तेरे लिये ऐसी वात कहना उचित नहीं
है।अब तेण दर्फ चूर्ण द्ोगा । तुझे शीम ही मेरे समान
बलवानके तायथ मकुसात् मदान् मीषण युद्ध प्राप्त होगा | उस
बन ओअधधवििमीजयण-3जलमी 3 ््््््अ्ज्िि2,522क5ि:इइदडएउएयतएः :::क/::ड:्ि।स्म्मस्स्ेससेसस्सल्ल्ल्स्स््ल्ल्ल्ल््््््््् जम जज कर पका न व्याप्त
संग्राममें तेरी ये पर्वत-सरीली भुजाएँ,. जलोनी लकड़ीकों तरद
शखस्ताख्से छिन्न-मिन्न द्ीकर भूमिपर गिरेंगी | दुष्टातान | तरे
आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यद्ध मनुष्यके सिखाला मयूर-
घ्वज फदरा रहा है; इसका जब वायु-भगके बिना द्वी पतन दी
जायगा। तब तू अपने चित्तमें समझ लेना कि व् मद्दान
भयानक युद्ध आ पहुँचा हे । उस समय तू घोर संग्रामका
निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ वहाँ जाना । इस समय
तू अपने महलको लोट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण दे ।
दुर्मते | वह“ँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्मात दिखायी देंगे |? यों
कहकर गरवहारी भक्तवत्सल भगवान् शंकर चुप दो गये ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--म॒ने | यह सुनकर वाणा-
धुस्ने दिव्य पुष्पोंकी कलियोंसे अज्ञलि भरकर रद्रकी अभ्य्चेना
की और फिर उन महादेवको प्रणाम करके वहू अपने
धरकी छौट गया । तदनन्तर किसी समय देववश उसका बह
ध्वज अपने-आप दूटकर गिर गया | यह देखकर बाणासुर
हर्षित हो युद्धके लिये उद्यत हो गया। वद अपने दृदयमें
विचार करने छगा कि कोन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देशसे
आयेगा जो नाना प्रकारके शस्नाक्लोंका पारगामी विद्वान होगा
ओर मेरी सहर्खों भुजाओंकी इंघनकी तरह काट डालेगा तथा
मैं भी अपने अत्यन्त तीखे शरस्प्रोंसे उसके सेकड़ों टुकड़े कर
डालूँगा | इसी समय शंकरकी प्रेरणासे वह काल आ गया | एक
दिन बाणासुरकी कन्या ऊपा वेशाख मासमें माधवकी पूजा करके
माड्लिक »ज्ञास्से सुतज्ित हो रातके समय अपने गुप्त अन्त+-
पुरमें सो रह्दी थी, उसी समय वह ख्त्रीमाव--( कामभाव) प्राप्त
हो गयी । तब देवी पावतीकी शक्तिसे ऊषाको खम्ममें श्रीकृष्णके
पौच अनिरुद्धका मिलन प्राप्त हुआ | जागनेपर वह व्याकुल
हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखासे सप्नर्मे मिले
हुए उस पुरुंषको ला देनेके लिये कहा |
तव चित्रलेखाने कहा--'देवि | तुमने स्प्नमें जिस
पुरुषको देखा है; उसे भछा; मैं केसे छा सकती हूँ, जब कि
मैं उसे जानती द्वी नहीं ।! उसके यों कहनेपर देत्यकन्या ऊषा
प्रेमान्ध होकर मरनेपर उतारू हो गयी; तब उस दिन उसकी
उस सखीने उसे बचाया । मुनिश्रेष्ठ | कुम्भाण्डकी पुत्री चित्र-
लेखा वड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषासे पुनः बोली ।
चित्रलेखाने कह[---सखी | जिस पुरुषने तुम्हारे मनका
4६२० किया है? उसे बताओ तो सह्दी | वह यदि जिलोकीमें
” . भीष्टेगातो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी।
५ नमी दद्भाय शान्ताय अद्मण परमात्मने ४
3 जता #ैभ कमीरब हनी अविनजन्ना ॑जबी ५
[ संक्षिप-शिवपुराणाह
करार एप्प परत पतन ानपकधक उतर पुरे "मप्र पन्मी पर पन्मनफर: पक मएरापपदा ढक पटानी प कपास रो परम प ० मकर या उमर त्ड कापपूद डक.
७ 2मफनकान- कुल, कोने सनीीना नाम अमन... डिनर नवमी अभी बानी" अमीनणाएं" धीमी अ+ जानी की बी जी 2 क्म जरा जमे नयी समान
सनत्कृमारजी कहते हँ--मद् ! यों ऋछर क्रिः
उलाने बसे पेपर देवताओं) दंत्यों। दातवों। एयो
सिदों। नागों ओर से आदिके चित्र अद्वित किये।प्लि
धदू मनुष्योका सित्र बगने लगी । उनमें वृण्णियंश्धियोंत्र पक
आरम्भ दोनेपर उसमे शरः बसुदेख) राम) कृष्ण ओर नए
प्रशुम्भका सिम बताया । हिरए जेब उसने प्रधुननत्त
अनिददका नित्र खींचा तब उसे देखकर ऊथा छत १
गती | उसका मुख अतनत दो गया और दृदव हि पर
दी गया ।
ऊपाने कद्ठा-भंखी ! रातमें जो मेरे पात्र आग
था और जिंसने शीम दी गेरे चित्ततपी खको बुग व्वि है
बहू चोर पुरुष यद्दी द ।? तंदनन्तर ऊपाके अनुरोध बेर
चिम्रठेसा ब्येठ कृष्ण चमुरईशीकी तीसरे पहर द्वाक्मईः
परेँचकर क्षणमात्रम दी पलंगपर बैठे हुए. अनिदद्धको महा
उठा छाबी | बंद दिव्य योगिनी थी | ऊप्ा अपने प्रिवतमग्
पाकर प्रतन्न दो गयी। इधर अन्तःपुरके द्वारकी सा करेवार
द्ेतघारी पर्रेदारोंने चेश्ठअंति तथा अनुमानसे इ। ब्ो
लक्ष्य कर लिया | उन्होंने एक दिव्यशरीरघारी) दर्शनीए
ताइसी तथा समरप्रिय नवयुवककों कन्याके साथ दु्दाय
आचरण करते हुए देख भी लिया | उे देखकर करे
अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले उन महावली पुरुषोने
बाणासुरक्के पास जाकर सारी बार्ते निवेदन करते हुए कह !
द्वारपाल बोले--देव ! पता नहीं) आपके अल्प
बल्थूव॑क प्रवेश करके कोन पुरुष छिपा हुआ रै कि
इन्द्र तो नहीं है, जो वेब्र बदलकर आपकी कया कक
कर रहा है १ महावाहु दानवणाज | उसे यह देविये
और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये। ईर झल्लेग
कोई दोध नहीं है । है
सनत्कुमारजी कहते कक कि | बस
बचन तथा कन्याके दूपित हौनेका के हु
दानवराज बाण आश्रयचकित ही गया | तदनन्तर व कि
होकर अन्तःपुरमें जा पहुँचा । वहाँ उसने मर
वर्तमान दिव्यशरीरघारी अनिरद्धकी देखा हि
आश्रय हुआ । फिर उसने उसका व देखनेक कक
सैनिकोंकी भेजकर आशा दी कि इसे मैंरे की
अनिरुद्धपर आक्रमण किया ।.तंब अनिझ्डने वी
दस इजार सैनिकॉकी कालके इंवाडे के दिया । हि
५ मिसंदिता ])._ # शिवका गणी और पुत्नीसद्ठित उसके नगरम निवास करना #
२९३३
ने आन या. गला >मीन आती ७. + नं ऑष्कक
- - धमुंख्य सेता-पर-सेना आने छगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका
स बनाने लगे। तदनन्तर उन्होंने बाणासुरका बंध करनेके
ये एक शक्ति हाथमें छी; जो काछममिके समान भर्यकर
[। फिर उसीसे रथकी बैठकर्में बैठे हुए वाणासुरपर प्रहार
या | उसकी गहरी चोट खाकर वीरबर बाण उसी क्षण धोड़ों-
हित वहीं अन्तर्धान हो गया । फिर महावीर बलिपुत्र बाणा-
रने, जो महान् बलसम्पन्न तथा शिवभक्त थां। छलपूर्बक
गपाशसे अनिरुद्धकी बाँध लिया | इस प्रकार उन्हें बॉधकर
गैर पिंजरेमें केंद करके वह युद्धसे उपराम हो गया । तसश्रात्
ण कुपित होकर महावर्ी सूतधुत्रसे बोला ।
वाणासुरने कहा--सूतपुत्र | घास-फूससे ढके हुए
गगाध कुएँमें ढकेलकर इस पापीकी मार डाल ) अधिक क्या
हूँ) इसे सवेथा मार ही डालना चाहिये |
॥
. सनत्कुमारजी कहते दँ--मुने | उसकी वह बात
निकर उत्तम मन्त्रियेमे श्रेष्ठ धर्मचुद्धि निशाचर कुम्माण्डने
"णासुरसे कहा |
. कुम्भाण्ड बोला--देव | थोड़ा विचार तो कीजिये ।
अप तमझसे तो यह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होताः
'बोंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आइत हो जायगा |
गक्रममें तो यह विष्णुके समान दीख रह्य है। जान पड़ता
आपपर कुपित होकर चन्द्रचूडने अपने उत्तम तेजसे इसे
: दिया है | साइसमें यह शशिमौलिकी समानता कर रहा
क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर
इटा हुआ है | यह ऐसा बली है कि यद्यपि नाग इसे बल-
इस रहे हैं, तथापि यह इमलेगोंको तृणवत् ही समझ
है |
सनत्कुमारजी कद्दते हँ--व्यासजी | दानव कुम्माण्ड
नीतिके शाताओंमें श्रेष्ठ था | वह बाणसे ऐसा कहकर फिर
नदद्धसे कहने लगा |
फुस्भाण्डने कहा--पमराघम ! अब तू वीरवर देत्यराज-
सुति कर ओर दीन बाणीसे थ्सैं हर गया? यों वारवार
फेर उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार कर | ऐसा करनेपर द्वी
पु हो सकता है। अन्यथा तुझे बन्धन आदिका कएट मोगना
गो ॥! उसकी वात सुनकर अनिरुद्ध उत्तर देते हुए बोले |
अनिरुद्धने कह--दुराचारी निशाचर ! ठुसे क्षद्रिय-धर्मका
नर ९। ओर | शुखवीरके लिये दीनता दिखाना और
ले दुख मोड़कर भागना मरणसे भी बढ़वर कथ्दायक द्वोता
है | मेरे विचारसे तो विरुद्धाचरण कॉँटेकी तरह चुभनेबाला
होता है | बीरमानी क्षत्रियके लिये रणभूमिमें सदा सम्मुख
लड़ते हुए मरना ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े
हुए दीनकी तरह मरना कदापि नहीं# ।
सनत्कुमारजी कहते हँ--पुने | इस प्रकार अनिरद्धने
बहुत-सी वीरताकी बातें कहीं, जिन्हें सुनकर बाणासुरको महान्
विस्मय हुआ ओर उसे क्रोध भी आया | उसी समय समस्त
वीरोंके, अनिरद्धके और मन्त्री कुम्भाण्डके सुनते-सुनते बाणा-
घुरके आश्वासनार्थ आकाशवाणी हुई ।
आकाशवाणीने कहा--महाबरी बाण | तुम बलिके
पुत्र हो, अतः थोड़ा विचार तो करो | परम बुद्धिमान् शिव-
भक्त | तुम्हारे लिये क्राध करमा उचित नहीं है | शिव समस्त
प्राणियोंके ईश्वर; कर्मोंके साक्षी और परमेश्वर हैं | यह सारा
चराचर जगत् उन्हींके अधीन है| वे ही सदा रजोगुण, सत्त्गगुण
ओर तमोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु ओर रुद्ररूपसे लोकों-
की सृष्टि, भरण-पीषण ओर संहायर करते हूँ | वे सर्वान्तर्यामी,
सर्वेश्वर, सबके प्रेरक) सर्वश्रेष्ठ विकाररहित, अविनाशी) नित्य
ओर मायाघीश दोनेपर भी निर्गुण ईं | बलिके श्रेष्ठ पुत्र
उनकी इच्छासे निबंलकोी भी बलवान समझना चाहिये ।
महामते | मनमभे यों विचारकर खस्थ हो जाओ | नाना प्रकारकी
लीलाओंके रचनेमें निपुण भक्तवत्सल भगवान् शंकर गवंकों
मिट देनेवाले हैं | वे इस सम्रय तम्दारे गव॑ंको चूर कर देंगे |
सनत्कुमारजी कहते है--महामुने | इतना कहकर
आकाशवाणी बंद हो गयी | तब उसके वचनको मानकर
बाणासुरने अनियद्धका वध करनेका विचार छोड़ दिया | तदनन्तर
विबेले नागोंके पाशसे बंधे हुए अनिरुद्ध उसी थ्षण दुर्गाका
स्सरण करने लगे |
अनिरुद्धने कहा--शरणागतवत्सले | आप यश प्रदान
करनेवाली हैं, आपका रोप बड़ा उम्र ह्वोता है। देवि | में नागपाशसे
ब्ँधा हुआ हूँ. ओर नागोंकी विपच्चालसे संतत्त हो रहा हूँ।
अतः शीत पधारिये ओर मेरी रक्षा कीजिये |
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुनीश्वर ! जब अनिदद्धने
पिसे हुए काले कोयलेके समान कृष्णवर्णवाली कालीको इस
प्रकार संतुष्ट किया; तब वे च्येष्ठ कृष्ण चतदशीकी महारात्रिमें
# शतिवस्व रे अयी नर सम्मुसे सदा।
ने वीरमानिनों सूमी दोनत्वेव उनाश्चछे: ॥
( शि० पु० ३० सं० युद्यस्ट ५३। २५ )
२०३
वहाँ प्रकट हुईं | उन्होंने उन रापझमी भयानक बाणोको
भस्मसात् करके अपने बलिए गुक्कीके आपातरों उस नाग- ज्ञरकी
विदीण कर दिया | इस प्रकार दुर्गनो अनिदद्धकी अन्चन-
मुक्त करके उन्हें पुनः अन्तःपुरमें पहुँचा दिया ओर स्वयं
वहीं अन्तथॉन हो गयीं। इस प्रकार शिवकी शक्तिल्लसख्या
देवीकी कृपासे अनिरुद्ध कष्ठटते छूट गये; उनकी सारी व्यथा मिट
गयी ओर वे सुली हो गये | तदनन्तर प्रशुग्ननन््दन आनिमद्ध
शिवशक्तिके प्रतापसे विजयी ही आगी प्रिया बराणननयाक।
पाकर परम हर्षित हुए और अपनी प्रियतमा उस ऊपाये
साथ पूर्वबत् सुखपूर्वक विहार करने छगे । इधर पोच् अनिम्दके
अदृश्य हो जाने तथा नारदजीके मुखसे उसके बाणासुरके द्वारा
नागपाशसे बाँघे जानेका समाचार सुनकर बारह अलोदिणी
सेनाके साथ प्रद्यम्न आदि वीरोंकी साथ ले भगवान श्रीकृष्णने
शोणितपुरपर चढ़ाई कर दी | उधर भगवान् श्रीडद्र भी अपने
भक्तके पक्षमें सज-चजकर आ डटठे। फिर तो श्रीकृष्ण ओर
श्रीशिवका बड़ा भयानक युद्ध हुआ | दोनों ओरसे ज्वर छोड़े
गये । अन्तमें श्रीकृष्णने खय॑ श्रीरद्रके पास आकर उनका
स्तवन करके कहा--०स्वव्यापी शंकर | आप गुर्णोस्ते निलिप्त
होकर भी गुणोंसे ही गुणोंकी प्रकाशित करते हैं। गिरिशायी भूमन् |
आप सप्रकाश हैँ । जिनकी बुद्धि आपकी मायासे मोहित
हो गयी है, वे स्त्री; पुत्र, ग़ह आदि विषयोंग आसक्त होकर
दुःखसागरमें ड्रबते-उतराते रहते हैं | जो अजितेन्द्रिय पुरुष
प्रारब्धवाश इस मनुष्य-जन्मको पाकर भी आपके चरणोंमें प्रेम
नहीं करता, वह शोचनीय तथा आत्मवश्चक है| भगवन् |
# नमो रुद्राय शासरताय अत्यगे परमात्मने #
[ संश्षिप्तशिगपुणा
आप गयद्वारी । आपने ही तो इस गर्बहे बरा्ने-शा
दिया था| अतः आओी दी आशसे में बाणासुी भुगके।
छदन करनेके छिये यहाँ आया हूँ। इसल्यि पहतते|
अप इस युद्धते निश्वत्त ही जाइये। प्रभे। मुझे बज
भुजाओंकी काटनेक लिये आज्ञा प्रदान कीजिये, मिसे भय
का शाप ब्यथ न ही |?
महश्यरन कहा--तात ! आपने ठीक ही ऋष
मैने ही इस देत्यराजकी शाप दिया है ओर मेरी है अर
आप साणासुरकी भुजाएँ काथनेके लिये यहाँ पयोर है £
रमानाय ! दे? | क्या कहाँ, में तो सदा भक्तोके है
रूता # । ऐगी दद्मामें वीर ! मेरे देखते वाणी मत
काटी जा सकती हैँ ? इसलिये मेरी आशत्ते आ ४
जम्मगासद्वारा मुसे जुम्मित कर दीजिये, तलश्रात् आ
अभीट कार्य समन्न कीजिये ओर सुखी होइये |
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुनीखर ! शंडर्जः
कहनेपर शार्ज्रपाणि श्रीदरिकों महान विसय हुआ | वे
सुद्ध-ख|गपर आकर परम आनन्दित हुए । बा
तदनन्तर नाना प्रकारके अज्लोंके संचालनमें निषु हे
तुरंत द्वी अपने धनुपपर जम्भगाल्नका पंधान कस
पिनाकपाणि शंकरपर छोड़ दिया | इस बढार मो
जम्भणाख्रद्वारा जम्मित हुए. शंकरको मोहमें वर्क
गदा ओर ऋषि आदिसे ब्राणकी सेनाक पंद्वर के द्मो|
( अध्याय १९-४६
>ौ+०*<3-9-8--+»--- !
श्रीकृष्णदारा बाणकी श्ुजाओंका काटा जाना, सिर काटनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णकों शिवा ऐ
ओर उन्हें समझाना, श्रीकृष्णका परिवारसमेत द्वारकाको लोट जाना, बाणका ताण्डब बला
शिवको प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानोंके साथ महाकाललकी पाप
सनत्कुमारजी कहते हँ--महाप्राश् व्यासजी | छोक-
लीलाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्ण और शंकरकी उस परम
अद्भुत कथाको श्रवण करो | तात | जब भगवान् रुद्र लीला-
वश पुत्रों तथा गर्णोसहित सो गये; तब देत्यराज बाण
श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुआ | उस समय
कुम्भाण्ड उसके अब्वोंकी बागडोर सैंभाले हुए था और वह
नाना प्रकारके शजस्तास्मोसे सज्ञित था | फिर वह मह्ाबली
बलिपुत्र भीषण युद्ध करने लगा | इस प्रकार उन दोनोंमें
चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा; क्योंकि विष्णुके
अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उघर बलवान बाणासुर
उत्तम शिवभक्त था | मुनीश्वर ! तदनन्तर वीबवान मं
जिन्हें शिवकी आज्ञासे बल प्राप्त हो चुका था। वि
बाणके साथ यों युद्ध करके अत्यन्त कुपित है 38!
शतन्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् है
आदेदसे शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाणकी बहुतररी ४
को काट डाला | असन्तमें उसकी अत्यन्त सुन्दर चींः
ही अवशेष रह गयी और शंकरकी कृपासे शी पा
व्यथा भी मिट गयी । जब बाणकी स्मृति उप : है 7. ;
वीरभावको ग्रात्त हुए. श्रीकृष्ण उसका ऐिर कीं: 3
उद्यत हुए; तब शंकरजी. मोहनिद्राकों लागाः ह
हुए ओर बोले |
कक,
» रुद्गने कहा--देवकीनन्दन | आप तो सदासे मेरी
“आजांका पालत करते आये हैं | भगवन् | मैने पहले आपको
।'जिस कामके लिये आशा दी थी, वह तो आपने पूरा कर
“दिया | अब बाणका शिरइछेदन मत कीजिये और सुदर्शन
“चक्रको लोग लीजिये | मेरी आशासे यह चक्र सदा मेरे
भक्तोपर अमोध रहा है। गोविन्द ! मैंने पहले ही आपकी
गंयुद्धमें अनिवार्य चक्र और जय प्रदान, की थी; अब आप इस
[ग्युद्धसे निवृत्त हो जाइये | लक्ष्मीश | पूर्वकालमें भी तो आपने
द्ेैमिरी आज्ञाके बिना दधीच, वीरवर रावण ओर तारकाक्ष
'टआदिके पुरोपर चक्रका प्रयोग नहीं किया था | जनाद॑न !
क्माप तो योगीश्वर, साक्षात् परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियोंके
'हिपमं रत रहनेवाले हैं | आप खय॑ ही अपने मनसे विचार
गैनिये | मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं
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शा । मेरा बह वचन सदा सत्य होना चाहिये। मैं आपपर
मे पसत्त हूँ । हरे | बहुत दिन पूर्व यह गवंसे भरकर उत्मत्त
[६ उठा और अपने आपको भूल गया था | तब अपनी भुजाएँ:
6 जदा हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोला--प्मेरे साथ
/*४ कीजिये ? तब मैंने इसे शाप देते हुए. कहा--प्थोड़े
| पु तेरी भुजाओंका छेदन करनेबाला आयेगा। तब तेरा
6 गये गल जायगा ? ( बाणकी ओर देखकर ) कहा---५मेरी
) आशासे तेरी भुजाओंकों काटनेवाले ये भीहूरि आये हैं ।*
“हद्रंसंहिता ] _# बाणका खिर काटनेको उद्यत श्रीकृष्णतो शिवका रोकना और उन्हें समझाना #% २९५
_3+४-“पमकपरू खडे,
( फिर श्रीकृष्णसे ) ःभब आप युद्ध बंद कर दीजिये और
बर-वधूको साथ ले अपने घरको व्लेट जाइये |? यों कहकर
महेश्वरने उन दोनोंमें मित्रता कप दी ओर उनकी आशा ले
वे पुत्रों ओर गणोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये |
समनत्कुमारजी कहते हँ--मुने | शम्मुका कथन
सुनकर अक्षत शरीरवाले श्रीकृष्णने सुद्शनको छीटा लिया ओर
विजयश्रीसे सुशोभित हो वे बाणासुरके अन्तःपुरमें पधारे।
वहाँ उन्होंने ऊपासह्िित अनिरुद्धको आश्वासन दिया और
बाणद्वारा दिये गये अनेक प्रकारके रत्मसमूहोंको ग्रहण किया।
ऊप्राकी सखी परम योगिनी चित्रलेखाकों पाकर तो श्रीकृष्णको
महान् हथे हुआ । इस प्रकार शिवक्रे आदेशानुसार जब
उनका सारा कार्य पूर्ण हो गया, तब वे श्रीहरि हृदयसे शंकर-
को प्रणाम कर और बलिपुत्र बाणासुरकी आज्ञा ले परिवार-
समेत अपनी पुरीको लौट गये | द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने
गरुडको विदा कर दिया ) फिर हथ॑पूर्वक मिन्नोंसे मिले और
स्वेच्छानुसार आचरण करने लगे |]
इधर नन्दीश्वरने बाणासुरको समझाकर यह कहा---
(भक्तशादूल | तुम वारंबार शिवजीका स्मरण करो | वे भक्तोंपर
अनुकम्पा करनेवाले हैं, अतः उन आदिगुरु शंकरमें
सन समाहित करके नित्य उनका महोत्सव करो |? तब
द्वेघरहित हुआ महासनखी बाण नन््दीके कहनेसे घेये घारण
करके तुरंत ही शिवस्थानको गया । वहाँ पहुँचकर उसने नाना
प्रकारके स्तोत्रोंद्रारा शिवजीकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम
किया । फिर वह पादोंसे द्ुमकी छगाते हुए और हाथोंको घुमाते
हुए नाना प्रकारके आलीढ और ग्रत्यालीढ आदि प्रमुख
स्थानकॉद्वारा सुशोभित नुृत्योंमें प्रधान ताण्डव नृत्य करने
लगा । उस समय वह हजारों प्रकारसे मुखद्वारा बाजा बजा
: रहा था ओर बीच-बीचमें भोहोंको मटकाकर तथा सिरको
कँपाकर सहख्रों प्रकारके भाव भी प्रकट करता जाता था | इस
प्रकार उत्यमें मस्त हुए महाभक्त वाणासुरने मद्यान् नृत्य
करके नतमस्तक हो तरिशूलधारी चन्रशेखर भगवान् रुद्रको
प्रसन्न कर लिया | तब नाच-गानके प्रेमी भक्तवत्सल श्गवान्
हर हित होकर वाणते बोले |
रुद्रने कहा---बलिपुत्र प्यारे वाण | तेरे रत्यसे मैं संतुए
हो गया हूँ; अतः देल्वेन्द्र | तेरे मनर्मे जो अभिलापा हो)
उसके अनुरूप वर माँग ले |
सनत्कुमारजी कहते हँ--हने ! शम्भुदी यात सुनकर
२० कजननामपननममीन न न्नमान मी जनम, असम मान
डे
दैत्यगाज बाणने इस प्रकार बर माँगा--पोरे घाव भर जायें
बाहुयुद्धकी क्षमता बनी रहें) मुझे अश्षय गणनायकल प्राप्त दो
शोणितपुरमें ऊपापुत्र अर्थात् गेरे दोहित्रका राज्य दो
देवताओंसे तथा विशेष करके विष्णुरे गेरा बेरभाव मिट
जाय) मुझमें रजोगुण और तमोगुणरों युक्त दूषित देसभावका
पुनः उदय न हो; मुझमें सदा निर्विकार शम्मु-मक्ति बनी रहे
और शिव-भक्तोंपर मेरा सनेद्र और समस्त प्राणियोपर दयाभाव
रहे ।? यों शम्मुसे वरदान मॉगकर बलिपुत्र मदामुर बाण
अज्ञलि बॉधे रुद्रकी स्तुति करने लगा | उत समय उसके
नेत्रोंम प्रेमे असू छल्क आये थे | तदनन्तर जिसके सार
0 अमनीकि_ “कमा हि £ 2३... ५
न्ाशा+-> कक
६१8 गमस प्र कु स्ध्ति ्ि उठे ये; यू बल्निदन ९.
दिखी प्रगाम करके मीन हो गया | आने फेक
प्रायता सुनकर भगवान् शंकर तुझे उबदुछप्र हे झा
यो कद हुए वर्दी अन्तर्थान हो गये। तब गम
मद्रादाललको प्राप्त हुआ रुदका अनुचर बाग पर
निम्न दी गया । आ्यासजी ! इस प्रकार मैंने एम द्
नित्य छोड़ा करनेवाले समस्त गुद्जनेकि भी एड छ
भगवान इंकरका बरागविपयक् चरितः जो पर
क्णप्रिय मसुर वचनोंद्वारा ठुतते वन कर सा |
( अबाब १६
(| वाया व लकी
ः ग़जासुरकी तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शित्रद्वारा उसका बंध, उसकी गरक्षी
( ए आ] /र कर. ("७ के
शिवक्का उसका चमे धारण करना और 'कत्तिवास! नामस विख्यात हनी
तथा कृत्तिवासेथ्वर लिज्ञकी स्थापना करना
सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यातजी ! अब परम
प्रेमपूवक शशिमीलि शिवके उस चरित्रको अवण करो) जिसमें
उन्होंने त्रिद्नलद्वारा दानवराज गजासुरका वध किया था ।
गजासुर महिषासुरका पुत्र था | जब उसने सुता कि देवताओंसे
प्रेरित होकर देवीने मेरे पिताको मार दिया था, तब उसका
बदला लेनेकी भावनासे उसने घोर तप किया | उसके तपकी
ज्वालासे सब जलने लगे । देवतार्भनि जाकर ब्रह्माजीसे अपना
- दुःख कहा) तब ब्रह्माजीनी उसके सामने प्रकट होकर उसके
प्राथंनानुसार उसे वरदान दे दिया कि वह कामके वश होने-
वाले किसी भी स्त्री या पुरुषसे नहीं मरेगा, महाबली और
सबसे अजेय होगा ।
वर पाकर वह गवर्म भर गया | सब दिशाओं तथा
सब लोकपालोंके स्थानोपर उसने अधिकार कर लिया | अन्तमें
भगवान् शंकरकी राजधानी आनन्दवन काशीमें जाकर वह सबको
सताने छगा । देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की | शंकर
कामविजयी हैं ही । उन्होंने धोर युद्धमें उसे हराकर निशूलमें
पिरो लिया | तब उसने भगवान शंकरका स्तवन किया ।
शंकरने उसपर प्रसन्न होकर इच्छित वर माँगनेको कहा ।
तब गजाखुरने कहा--दिगम्बरखरूप मददेशान ! यदि
आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपने त्रिश्वू छकी अभिसे पवित्र हुए.
मेरे इस चमंकी आप सदा घारण किये रहें । विभो | मैं पुण्य
गन्वोंकी निधि हूँ, इसीलिये मेरा यह चमे विखत्क
तपरूपी अग्निकी ज्वाला पडकर भी दुख वह £
दिगम्बर ! यदि मेरा यह चर्म पुण्यवात् न ह्ेत वे
में हे आपके अज्ञोंका सह केसे प्रात हेत | गेश'
आप तुष्ट हैं तो मुझे एक दूसरा वर और द्कि॥
यह कि ) आजसे आपका नाम #कत्तिवाता! विलय
सनत्कुमारजी कहते हैं--8ने ! गचहण मं
भक्ततत्सल शुंकरने परम प्रसन्नताएवत्र रेशई
गजसे कहा--“तथालुः--अच्छा। ऐसा ही हेग |
प्रसत्नात्मा भक्तप्रिय मद्देशान उस दाववराव गरी
मन भक्तिके कारण निर्मल हो गया था उन: बति|
ईश्वरने कहा--दानवराज | तेरा ई
मेरे इस मुक्तिसाघक क्षेत्र काशीमें मेरे लि ही
जाय । इसका नाम कत्तिवासेश्वर होगा । यह है
के लिये मुक्तिदाता) महान् १तकोंका विनर) भे के
में शिरोमणि और मोक्षप्रद होगा | यों कहर 4
शिवने गजासुरके उस विद्याल चमकी हक की
मुनीश्चर | उस दिन बहुत बड़ी उद्दा री हु
निवासी सारी जनता तथा प्रमथगण कं
ओर ब्रह्मा आदि देवताओंका मन हर्षसे को
हाथ जोड़कर महेश्वरको नमस्कार करके उरी (४
“४५०५-४२ 5४ ४७०-४७+-+--
रुद्रसंदिता ] & विद्छ और उत्पर्त नामक दैत्योंका पावतीपर मोहित होना और उनके द्वारा मारा जाना # २९०७
स्ल्च्लच्ख्््स्च्य्ल्ल्ल्ल्ल््््ल््यय्््य्य्य्ख्य्य्श्स्स््ख्ऊ्आ२ओओ99२॥्»9»ऊओओओओ२ओ२२ऊ५ओ॥ओ२५२५५्»ण्््प्््््््य्््प्प्््््ख्य्््प्प्््-- ल्4+ ७
दुन्दुभिनिर्शेद नामक देत्यका व्याप्ररूपसे शिवभक्तपर आक्रमण करनेका विचार और
शिवद्वारा उसका वध
सनत्कुमारजी कहते है--व्यासजी ! अब मैं चन्द्रमौलिके
उस चरित्रका वर्णन करूँगा, जिसमें शंकरजीने दुन्दुमिनिराद
नामक देत्यकों मारा था। ठुम सावघान होकर अ्रवण करो ।
दितिपुत्र॒महाबल्ली हिरण्याक्षके विष्णुद्धारा मारे जानेपर
दितिको बहुत दुःख हुआ । तब देवशर््न दुन्दुमिनिह्ांदने
उसको आश्वासन देकर यह निश्चय -किया कि “देवताओंके बल
व्राह्मण हैं । ब्राक्षण नष्ट हो जायेंगे तो यश नहीं होंगे, यश न
होनेपर देवता आहार न पानेसे निबछ हो जायगे। तब में
उनपर सहज ही विजय पा दूँगा |! यों विचारकर वह ब्राक्षणों-
को मारने छगा । ब्राह्मणोंका प्रधान स्थान वाराणसी है; यह
सोचकर वह काशी पहुँचा ओर वनमें वनचर बनकर समिधा
लेते हुए, जलमें जलचर बनकर स्नान करते हुए और रातमें
व्याप्त बनकर सोते हुए वब्राह्मणॉंकी खाने लगा |
एक बार शिवरात्रिके अवसरपर एक भक्त अपनी पर्णं
शाल्म देवाधिदेव शंकरका पूजन करके ध्यानस्थ बेठा था |
वलाभिमानी देत्यराज दुन्दुभिनिद्ँदने व्याप्रका रूप धारण
करके उसे खा जानेका विचार किय॥ परंतु वह भक्त दृढचित्तसे
'शिवद्शनकी लालस!| लेकर च्यानमें तह्लीन हो रहा था; इसके
लिये उसने पहलेसे ही मन्त्ररूपी अस्थका विन्यास कर लिया था |
“इस कारण वह देत्य उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ न हो
पका | इधर स्वत्यापी भगवान् शम्भुको उस दुष्ट, रूपवाले
धत्यफे अभिप्रायका पता छग गया.। तब शंकरने उसे मार
“गलनेका विचार किया। इतनेमें, ज्यों ही उस दैत्यने व्याज्नल्पसे
उस भक्तको अपना आस बनाना चाह्दा; त्यों दी जगतकी
रक्षाके लिये मणिखरूप तथा भक्तरक्षणमें कुशल बुद्धिवाले
त्रिछोचन भगवान् शंकर वहाँ प्रकट हो गये और उसे वगलमें
दबोचकर उसके सिरपर बच्नसे भी कठोर घूँसेसे प्रह्यर किया |
उस मुष्ठि-प्रहारसे तथा काँखमें दबोचनेसे वह व्याप्र अत्यन्त
व्यथित हो गया ओर अपनी दहाड़से पृथ्वी तथा आकाशको
कपाता हुआ मृत्युका ग्रास बन गया | उस भयंकर शब्दको
सुनकर तपखियोंका दृदय कॉप उठा । वे रातमें ही उस
शब्दका अनुसरण करते हुए उस स्थानपर आ पहुँचे | वहाँ
परमेश्वर शिवको बगलमें उस पापीको दबाये हुए देखकर सब
लोग उनके चरणोंमें पढ़ गये ओर जय-जयकार करते हुए
उनकी स्ठ॒ति करने छगे |
तद्नन्तर महेश्वरने कहा--जो मनुष्य यहाँ आकर
श्रद्धापूवक मेरे इस रूपका दशंन करेगा) निस्संदेह में उसके
सारे उपद्रवोंकी नष्ट कर दूँगा। जो मानव मेरे इस चरित्रको
सुनकर ओर हृुदयमें मेरे इस लिड्का स्मरण करके संग्राममें
प्रवेश करेगा, उसे अवश्य विजयकी प्राप्ति होगी |
मुने ! जो मनुष्य व्याप्रेश्वरके प्राकस्यसे सम्बन्ध. रखने-
वाले इस परमोत्तम चरित्रक्ों सुनेगा, अथवा दूसरेको सुनायेगा,
पढ़ेगा या पढ़ायेगाः वह अपनी समस्त मनोवाडझ्छित
वस्तुओंको प्राप्त कर छेगा और अन्तमें सम्पूर्ण दुःखोंसे
रहित होकर मोक्षका भागी होगा । शिवलीलासम्बन्धी
अमृतमय अक्षरोंसे परिपूर्ण यह अनुपम आख्यान खर्ग, यञ् ओर
आयुका देनेवाला तथा पुत्र-पौत्रकी इंड्धि करनेवाला है |
( अध्याय ५८ )
४
है 3४४४४“ +>«<>ट३८०-२-०५+-
ह.
हे
! पिंदल ओए उत्पल नामक देत्योंका पावंतीपर मोहित होना ओर पर्व॑तीका कन्दुक-परद्रद्ारा
# सनत्कुमारजी कहते हँ--व्यासजी ! जिस प्रकार
मकर शिवने संकेतसे देत्यकों लक्ष्य कराकर अपनी प्रियाद्वारा
4 पे फराया था; उनके उस व्वरिच्रकों तुम परम प्रेम-
१5६ उपण बस | विद आर उत्तछ नामझ दा नद्ास्तत्व
/ | +एने प्रश्ाजीसे किसी पुद्पक्रे दाथसे न मरनेका वर
फ
7 ु औअकतः++>न्यम्बक
' । हा पक जय द्वैर द्वा३? ९" या जात ५ हा | ॒ |
श्ज्य |
(१७ छे +३
चर २ रथ कक, ३८--
है उनका काम तमाम करना, कन्दुकेथरकोीं खापना ओर उनकी महिमा
तव देवताभने ब्रह्माजीक्रे
सुनाया । उनकी कप्र-कद्मानी
कद्दा--छुमझोग श्िवासद्षित शिवका आदरपूर्यक स्मरण
करके घंव घार्ण करो। वे दानों देत्य मिश्वय द्वी देवीके
हर्थी मारे जायेंगे।शिवसद्वित शिव परमेश्वर, कस्यागर्छता
|
च््ा
अननीनओ, कक हित चर म् धनन्चि
ओर भफइहााए हें । बे दोण ही तमदछायोक्धा सस्थार अरिसि ।
पात जाकर अपना दुःख
सुनकर ब्रझमाने उनसे
(रत ५००» अं -३०--मन्कुन-कब-ता लायी जे के
श्थ्८
सनत्कुमारजी कहते दँ--मुने ! देवोंति यों कदकर
ब्रद्धाजी शिवका स्मरण करते हुए मीन द्वो गये | तब देवगण
भी आनन्दित होकर अपने-अपने बायीं छोट गये |
एक समय नारदजीके द्वारा पावतीके सोखयकी प्रशंसा
सुनकर वे दोनों देत्थ उनका अपइरण करनेकी बात सोनने
लगे ओर पाव॑तीजी जहाँ गेंद उछाल रही थीं; वहीं ने
जाकर आकाशमें विचरने लगे | वे दोनों मोर हुराचारी थ |
उनका मन अत्यन्त चश्चल हो रह्या था | वे गणीका रूप धारण
करके अम्बिकाके निकट आये | तब हुष्टीका संहर करनेवालि
शिवने अवहेलनापूरवेंक उनकी ओर देखकर उनके नेत्रासे
प्रकठ हुई चश्चलताक्रे कारण तुरंत उन्हें पहचान लिया | फिर
तो सर्वस्वरूपी महादेवने दुर्गतिनाशिनी दुर्गाक्रों कथाक्षद्वारा
सूचित कर दिया कि ये दोनों देत्य हैँ, गण नहीं | तात !
तब पार्वती अपने स्वामी महाकोतुकी परमेश्वर शंकरके उस
नेच्रसंकेतको समझ गयीं | तदनन्तर स्ज्ञ शिवकी अर्थाद्निनी
पावतीने उस संकेतकी समझकर उसी गेंदसे एक साथ ही उन
दोनोंपर चोट की | तब महादेवीकी गेंदसे आहत होकर
वे दोनों महाबली दुष्ट देत्व चक्कर काठ्ते हुए उसी प्रकार
भूतलपर गिर पड़े, जैसे वायुके झेकेसे चश्चल होकर दो पके
हुए ताड़के फल अपनी ढंठलसे टूय्कर गिर पड़ते हैं अथवा
जैसे वज़के आबातसे महागिरिके दो शिखर ढह जाते हैं |
| न् 5 लििनाओन ही जरी 3 “जल ५.
४ भमा रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने ४
5 के 3सआ एम #ज
| संक्षिततिकुगण
ज्स्स्म्म्््म्स्य्प्स््स्स्ल्््
इस झकार अकाय॑ करनेके लिये उद्यत उन दोनों झेके
घतशायी करके बढ़ गेंद लिझ्वल्पर्म परिणत हो णी। कर
हुषटका नियारण करनेयाछा वह ढिद्ढ कलुकेशले माफ
विस्यात हुआ ओर ज्यष्ठेश्रके समीय छित हो शा
काञीम॑ छित कन्हुकेधर लिऊक्त दर्शेक्रा विवागक मो
मोझ्षका प्रदाता और राबंदा संत्युद्धोंकी सम अमाओी
पूण करनेबाल दे ) जो मनुष्य इस अनुपम आजा
पूर्वक मुनंता, सुनाता अथवा पढ़ता के उसे मान हुत
फदा | वह इस लाकम नाता प्रकारक सम्यृ्ण उत्तात्ततुत
भोगकर अन्त देखडुलभ दिव्य गतिक्रो प्राप्त कर ऐव ६
त्रह्माजी कहते हँ--मनिसत्तम | मेवे क
रा्रंद्िताक़े अन्तर्गत इस युद्धखण्डका वर्णन ऋषि
यद् क्षण्ड सम्ूर्ण मनोरथोंका फछ प्रदान केबल (
इस प्रकार मैंने पूरी-कीयूरी रुद्धसंहिताका वर्णन कर लि
यह शिवजीको सदा परम प्रिय है ओर भुक्तिमुक्तिता £
प्रदान करनेवाली
<.. २ «६. अन्यागाह कोन. जऑ.
फ४य 5 ह ४ भहा के हीफज अपी ०5 5० ५७5
कर बन अप>म>»मन
के #ौ- ६ + ६४ + ६ ५ ७»
खूतजी कहते हँ--इस प्रकार शिवातुगमी
नारद शंकरके उत्तम यशकों तथा शिवआतनामझ्रे कर
कतार्थ हो गये ) यों मैंने सम्पूर्ण चरिजंमिअपात॥6
कल्याणकारक यह ब्रह्म ओर नारदकां सवाई ॥ हा
दिया, अब तुम्दारी ओर क्या सुननेकी इच्छा है/( अधा |
हाई बा 20 २०
॥ रुद्रसंदिताका सुद्धलण्ड सम्पूर्ण ॥
"या ९; कं
॥ रुद्रसंहिता समाप्त ॥
जज |
8
र्ि
िफ--7५5- १८
शतरुद्रसंहिता
'. शिवजीके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष,
वन्दे महानन्द्मनन्तलीलं महेश्वरं स्वविभुं महान्तस् ।
४. गौरीग्रिय॑ कार्तिकविप्नराजसमुद्भव॑ शंकरमादिदेवम ॥.
. जो परमानन्दमय हैं, जिनकी लीलाए अनन्त हैं, जो
' ईश्वरोंके भी ईश्वर, सर्वव्यापक, महान» गोरीके प्रियतम तथा
: खामि कार्तिक और विश्नराज गणेशको उत्पन्न करनेवाले हैं,
. उन आदिदेव शंकरकी मैं वन्दना करता हूँ ।
शोनकजीने कहा--महाभाग सूतजी ! आप तो
६ पुराणकर्ता ) व्यासजीके शिष्य तथा ज्ञान ओर दयाकी निधि
हैं, अतः अब आप शम्भुके उन अवतारोंका वर्णन कीजिये,
जिनके द्वारा उन्होंने सत्पुरुषोंका कल्याण किया है।
खतजी वोले--शौनकजी ! आप तो मननशील व्यक्ति
हैं, अतः अब मैं आपसे शिवजीके उन अवतारोंका वर्णन करता
है? आप अपनी इब्द्रियोंको वदमें करके सद्धक्तिपूवंक मन लगाकर
अवण कीजिये । मुने ! पूर्वकालमें सनस्कुमारजीने नन््दीश्वरसे,
जो सत्पुरुषोंकी गति तथा शिवस्रूप ही हैं, यही प्रश्न किया
४ उस समय नन््दीश्वरने शिवजीका सरण करते हुए उन्हें
गे उत्तर दिया था |. ै
नन््दीश्वरने कहा--मुने ! यों तो स्वब्यापी सर्वेश्वर
रवके कत्प-कल्पान्तरोंमें असंख्य अवतार हुए हैं, तथापि
3 समय में अपनी बुद्धिके अनुसार उनमेंसे कुछका
"णन करता हूँ । उन्नीसवाँ कल्प, जो रवेतल्योहित नामसे
वेज़्यात है, उसमें शिवजीका '्सद्योजातः नामक अवतार हुआ
_ वह उनका प्रथम अबतार कहलाता है । उस कल्ममें
गेयर ब्रह्मा
गत दे गया कि यह पुरुष ब्रह्मरूपी परमेश्वर है, तब उन्होंने
"जल बॉधकर उसकी पन्दना की | फिर जब भुवनेश्वर अह्ाको
ता लग शा कि यह सयोजात ऊँमार शिव ही हैं, तब उन्हें
धन ह३ हुआ | वे अपनी पदूलुद्धिसे बारंबार उस परबह्मका
पन्तन फरने लगे । त्रद्माजी “यान कर हो रहे थे कि वहाँ
व बेधवाल़े चार पशस्वी कुमार प्रकट हुए । वे परमोत्कृष्ट
नंत्सत्त दथा परअफ़के स्वस्प थे । उनके नाम थे---.सुनन्द,
अघोर ओर ईशान नामक पाँच अवतारोंका वर्णन
नन््दन; विश्वनन्द और उपनन्दन | ये सब-के-सब महात्मा ये
ओर ब्रह्माजीके शिष्य हुए | इनसे वह ब्रद्मलोक व्याप्त हो
गया | तदनन्तर सद्योजातरूपसे प्रकट हुए परमेश्वर शिवने
परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको ज्ञान तथा सष्टिरवनाकी शक्ति
- शदान की | ( यह सद्योजात नामक पहला अवतार हुआ | )
पंदनन्तर “रक्त? नामसे प्रसिद्ध बीसवाँ कल्प आया | उस
कल्पमें ब्रह्माजीने रक्तवर्णका शरीर घारण किया था। जिस
समय तह्माजी पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे थे, उसी समय उनसे
> उत्रेश्कट हुआ। उसके शरीरपर लाल रंगकी माला और छाल
ही वजन शोभा पा रहे ये । उसके नेत्र भी लाल थे ओर वह
आभूषण भी छाल रंगका ही धारण किये हुए था | उस महान
आत्मबलूसे सम्पन्न कुमारको देखकर ब्ह्माजी ध्यानस्थ हो गये |
जब उन्हें शात हो गया कि ये वामदेव शिव हैं, तब उन्होंने
हाथ जोड़कर उस कुमारको प्रणाम किया । तत्पश्चात् उनके
विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नामके चार पुत्र
उस्नन्न हुए; जो सभी लाल वस्त्र धारण किये हुए थे | तब
वामदेवरूपधारी परमेश्वर शम्मुने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको
शान तथा सष्टिरचनाकी शक्ति प्रदान की | ( यह ध्वामदेव?
नामक दूसरा अवतार हुआ | )
इसके बाद इक्कीसवाँ कल्प आया, जो थीतवासा” नामसे
ऊहा जाता था । उस कल्पमें महाभाग त्रह्मा पीतवस्नघारी
हुए | जब वे पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे थे, उस समय
उनसे एक महातेजखी कुमार उत्नन्न हुआ | उस ग्रौढ़
ऊमारकी भुजाएँ विद्याछ थीं और उसके रारीरपर पीताम्बर
सलमत्य रहा था। उस ध्यानमम्म बालकको देखकर ब्रद्मजीने
अपनी बुद्धिके बलसे उसे 'तत्युदुघ? शिव समझा । तथ
उन्होंने ध्यानयुक्त चित्तसे सम्पूर्ण ल्लोकद्ारा नमत्कृत मद्यदेयी
शांकरी गायत्री ( तत्पुरुपाय विद्यदे महादेवाय धीमदि ) का
जप करके उन्हें नमस्कार किया, इससे महादेवजी प्रसन्न ह्टो
गये । तलश्चात् उनके पाउ॑भागसे पीतवन्नधारी दिव्यकुमार
मकट हुए। वे सब-के-सब योगमार्गके प्रवर्तक हुए । ( यह
'तत्युदप? नामक तीसरा अवतार हुआ | )
तलश्चात् ख़यम्नू बल्माके उस पीतयर्ण नामक कस्पऊे बीत
जानेपर पुनः दूसरा ऋद्य यव्नत्त डुआ । उसका नाम ्विवः ।
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सरस+.- चार. जग; का रननतक>-कोत-क "कमान. “जी -आनन के
था । जब एकाणंवकी दामें एक राइस दिव्य नम आतीत द्वी
गये, तब ब्रद्माजी प्रजाओंकी सुष्टि करनेकी इच्छा हुली है
विचार करने लगे | उस समय उन गहनेजस्थी अह्माके समझ
एक कुमार उत्पन्न हुआ । उस महापराक्रमी आलकऊे दारीरका
रंग काछा था | वह अपने तेजसे उद्दीत्त द्ष रहा था
तथा काछा वसर्त, काली पगड़ी ओर काला यशेपत्रीत
धारण किये हुए था | उसका मुकुट भी काछठा था ओर
ज्ञानके पश्चात् अनुलेपन--चन्दन भी काछे रंगका दी था |
उन भयंकरपराक्रमी, महामनस्वी, देवदेवेशर, अलोकिक)
कृष्णपिड़ल वर्णबाले अघोरको देखकर ब्रद्माजीन उनकी वन्दनां
की | तत्पश्चात् त्रद्मजी उन भक्तवत्सल अबिनाशी अथोारत्र)
ब्रद्दालूप समझकर इष्ट वचनेंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे |
तब उनके पाश्वभागसे कृष्णवर्णयाले तथा काले रंगका
अनुलेपन घारण किये हुए, चार महामनस्वी कुमार उत्नन्न
हुए. | वे सब-के-सब परस तेजस्वी, अव्यक्तनामा तथा शिस-
सरीखे रूपवाले थे। उनके नाम थे--#ष्ण, ऋृष्णशिख,
कृष्णास्य ओर कृष्णकण्ठघ्ुक्ू | इस प्रकार उत्पन्न होकर
इन महात्माओंने ब्रह्मजीकी सष्टिस्चनाके निमित्त महान
अद्भुत 'घोर! नामक योगका प्रचार किया | ( यह पअवोरः
नामक चोथा अवतार हुआ | )
मुनीश्वरो | तदनन्तर ब्रह्माका दूसरा कल्प प्रारम्भ हुआ |
वह परम अद्भुत था और ५विश्वरूप” नामसे विख्यात था |
उस कल्पमें जब ब्रह्माजी पुत्रकी कामनासे मन-ही-मन शिवजी-
का ध्यानकर रहे थे, उसी समय महान सिंहनाद करनेवाली
विश्वरूपा सरखती प्रकट हुईं तथा उसी प्रकार परमेश्वर
भगवान् ईशान प्रादुभत हुए, जिनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके
समान उच्ज्वल था और जो समस्त आशभूषणोंसे विभूषित ये |
उन अजन्सा। सवव्यापीः सर्वान्तर्यामी, सब कुछ प्रदान
करनेवाले, स्वेस्वरूप, सुन्दर रूपवाले तथा अरूप ईशानको
देखकर ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया । तब शक्तिसहित विभु
ईशानने भी त्रह्मको सन्मार्गका उपदेश देकर चार सुन्दर
एाओ<॑- कस ..---
शिवजीकी अध्टमूर्तियोंका तथा | ह हज ह ह |
शिवजीकी अध्मूर्तियोंका तश् अधनारीनरूपका सविस्तर वर्णन...
नन््दीभ्वरजी कहते हैं--ऐशवर्यशाली मुने ! अब तुम
महेश्वरके उन श्रेष्ठ अवतारोंका वर्णन श्रवण करो, जो छोकझें :
सबके सम्पूर्ण कार्योको पूर्ण करनेवाले अतएव सुखदाता हैं |
तीत : यह जुगत् उन परमेश्वर शम्पुकी आठ मूर्तियोंका
"एज्प ही है । जैसे सूतमें मणियाँ पिरोयी रहती हैं, उसी तरह
४ मो रुद्गाय शान्ताय ब्रह्मण परभातस्मन ::
: आठ मूर्तियाँ ये हैं---शर्ब, भव) रुद्/ उम्र) हम
ओर 4
[ संक्षिप्त-शिवुरापरा[
अ # «मोह. आयाम
६-3+७9.०-कन-७०+नमक बे. डजजजजजजजजजत्तचत जज >> ्ाझ्ू्य
हक
पलिकीकी कत्यना की | उन उसने हुए भिमुओेंक वा ए-
जड मुख्दी, शिस्पणण्डी ओर अर्थमुण्ड | वे योगानु्रर हा
की पालन करके योगगतिको प्राप्त हो गये। ( कह ईशान क्र
पचियों अवतार हुआ । ) द
सयंश सनत्कुमारजी ! इस प्रकार ने जगत हिम्नलत
से स्योगात आदि अवतारोंका प्राकत्य संक्षिपसे वात झ्लि।
उनका बढ सारा लाकदितकारी व्यवद्वार यायातस्वह्पप्े का
में वतमान दे | मंदेश्वरकी ईशान, पृद्य, धोछ वामदेत ४
अहा--से पॉन मु्तियाँ विश्वपतुपसे प्रसिद्ध हैं । इनमे ह
जो शिवत्धह्म तथा सबसे बड़ा के पहला कहा जाता है।
साक्षात् प्रऊृतिक भोक्ता क्षेत्रहमं निवास करता है| शिई
दूसरा त्वर्प तत्युदप सामसे ख्यात दें । वह गु्ेक्ि आकर
तथा भोग्य सब्ंशमें अविष्ठित है । पिनाकृघारी शिव
अथार नामक तीसरा स्रूप कै वह धर्मके टिये अयी
नुद्धितत्वका विस्तार करके अंदर विराजमान रूता है | वा
नामबाल्य झंकरका चौया स्वहूप अहंकारका अधिवन है ।'
सदा अनेकों प्रकारका कार्य करता रहता है। विष
बुद्धिमानोंका कथन दे कि शंकरका ईशानरसंरेक' ९
कर्ण, बाणी और सर्वव्यापी आकाशका अर्पेश[
महेश्वर्का पुरुष नामक रूप त्वक) पाणि और सर
वायुका खामी है | मनीवीगण अबोर नामवाले पके
रस, रूप और अम्निक्का अधिष्टान वतलवते हैं । गए
वामदेवसंशक ख्रूप रसना, पायु। रस और बह्का लात
जाता है | प्राण, उपस्थ) गन्ध और प्रप्वीका रे कि
सद्योजातनामक रूप बताया जाता है | कब्याणका्ी मुह
शंकरजीके इन खरूपोंकी सदा प्रयत्नपूवक वन हर
चाहिये; क्योंकि ये श्रेयशआराप्तिम एकमात्र देत हैं | गे
इन सद्योजात आदि अवतारोंके प्राकस्यकी पढ़ता अर हर
है, वह जगतमें समस्त काम्य भोगेंका उपभोग की ।
परमगतिको प्राप्त होता है | |
वे 27
यह विश्व उन अश्मूर्तियोंमें व्यात्त होकर खिंत | ्ा
)
ईशान ओर महादेव | शिवजीके इन शव हे
पृथ्वी, जछ, अग्नि; वायु+ आकाश) श्षत्ररों
हे कर्ला
अधिष्ठित हैं । शासत्रका ऐसा निश्चय ' श |
शिवज्ञीकी हि [न रे रह
धतरुद्रसंदिता |. # की अप्टमूर्तियांका तथा अधनारीनररूपका सविस्तर वर्णन # ३०१
० री आ-ा4. आओ... 5» पयननीी करनी ७+ ७ सन वि..3अ७..3.उ2रमीगीयीीय. जीन जानी. बज... शी नीम... अनन...3 अना..3 ऑियनीनी विकारों अभा3 पडता किस यमन 23 अं यने 3 यान के
महेश्वरका विश्वम्भरात्मक रूप ही चराचर विश्वकों घारण
किये हुए. है | परमात्मा शिवका सलिलात्मक रूप जो समस्त
जगत्को जीवन प्रदान करनेवाला है; “मव? नामसे कहा जाता
है | जो जगतके बाहर-भीतर वर्तमान है और खयं ही विश्वका
भरण-पोषण करता तथा स्पन्दित होता है, उग्ररूपधारी प्रभुके
उस रूपको . सत्पुरष ०उग्रः कहते हैं । महादेवका जो
सबकी अवकाश देनेवाला स्वव्यापी आकाशात्मक रूप है; उसे
भीम? कहते हैं | वह भूतबृन्दका मेदक है। जो रूप समस्त
आत्माओंका अधिष्ठान; सम्पूर्ण क्षेत्रोमें निवास करनेवाल्या और
>बेकि भव-पाशका छेदक है; उसे 'पश्मुपतिःका रूप समझना
»चाहिये | महेश्वरका सम्पूण जगतकी प्रकाशित करनेवाल् जो
नामक रूप है, उसे ईशान? कहते हैं। वह द्युलेक्मे
ण करता है | अमृतमयी रश्मियोंवाला जो चन्द्रमा सम्पूर्ण
वबको आह्ादित करता है; शिवका वह रूप “महादेव?
ससे पुकारा जाता है। आत्मा? परमात्मा शिवका आठवाँ
' है | यह मूर्ति अन्य मुर्तियोंकी व्यापिका है | इसलिये सारा
व शिवमय है । जिस प्रकार वृक्षके मूलकी सींचनेसे उसकी
लाएं पुष्पित हो जाती हैं; उसी तरंह शिवका पूजन करनेसे
वखरूप विश्व परिपुष्ट होता है | जेंसे इस लोकमें पुत्न-पोत्र
दिको प्रसन्न देखकर पिता हर्षित होता है; उसी तरह विश्व-
| भलीमाँति हर्षित देखकर शंकरकी आनन्द मिलता है ।
लिये यदि कोई किसी भी देहघारीको कष्ट देता है तो
स्संदेह मानो उसने अष्टमूर्ति शिवका ही अनिष्ठ किया है ।
नत्तुमारजी ! इस प्रकार भगवान् शिव अपनी अष्मूर्तियों-
/प समस्त विश्वको अधिष्ठित करके विराजमान हैं; अतः तुम
गे भक्तिभावसे उन परम कारण रुद्रका भजन करो |
। थरिय संनत्कुमारजी | अब तुम शिवजीके अनुपम अधैनारी-
(९ रुपका बणन उुनो | महाप्राज्ञ | वह रूप बह्माकी कामनाओं-
। पूर्ण करनेवाला है । ( सृष्टिके आदिमें ) जब सश्टिकर्ता
अआद्गश रची हुईं सारी प्रजाएँ विस्तारको नहीं प्राप्त हुईं;
१ भ्मा उतर दुःखसे दुखी हो चिन्ताकुल हो गये । उसी
प्र यों आकाशवाणी हुई-..पब्रह्ननू ! अब मेथुनी सृश्टिकी
ना करो |? उस व्योमवाणीकों सुनकर अद्माने मैथुनी सृष्टि
; मे फरनेका विचार किया; परंतु इससे पहले नारियोंका कुछ
है गनते प्रकट ही नहीं हुआ था; इसलिये पद्मवोनि अदा
# नी छह रचनेमें समर्थ न हो सके | तब वे यों विचार कर
। हुक ऊपके बिना मेथुनी प्रजा उत्पन्न नहीं हो तऊती:
6 उरी उयत हुए | उस समय ब्रक्षा परयाशक्ति
ई
५3७.+>पअपानक ००५ नाना भ 2५५०० 4० भमर पा &४-३५++५१५ ०९ साफ ४३७५५ कक ३५०७० पा भाक-9-५७७३७/७०७७३५७७५)॥३५५४७०० ३०५५ म७०००५॥आन पका, >जपाकव-९०६५३७५७०५५+०० अमान भवा७ ३७५/५३+ना ५४४ पाए» /#पअपा*3००७३०३७/७४३क ७-५ +क व माप कान्ट नाक एन भरे कै नाम पका कनन+--)५+2 0-2० जन न नमन
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कक ५० वकयालननी' पेजनाना जन 3 «री ता न “मनी 8 3० जमा. पकननारे बाणन "ययाकमज--3 की. 4 अणक वा जा अ3ननी छ, निन्कमऑिग कक >। 5$ अीजिअी जी 7 ऑ्का १७-कीजीफा ७020-42 लक
शिवासहित परमेश्वर शिवका प्रेमपूर्वक ह्ृदयमें ध्यान करके
घोर. तप करने लगे | तदनन्तर तपोडनुष्ठानमें लगे हुए
ब्रद्मके उस तीजत्र तपसे थोड़े ही समयमें शिवजी प्रसन्न
हो गये | तब वे कष्टहारी शंकर पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदा
मूर्तिमें प्रविष्ट होकर अधनारी-नरके रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट हो
गये ! उन देवाघिदेव शंकरको पराशक्ति शिवाके साथ आया
हुआ देख ब्रह्माने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें
प्रणाम किया और फिर वे हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे ।
तब विश्वकर्ता देवाधिदेव महादेव महेश्वर परम प्रसन्न होकर
ब्रह्मासे मेधकी-सी गम्भीर वाणीमें बोले |
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इंश्वरसे कहा--महाभाग वत्स ! मेरे प्यारे पुत्र:
पितामह ! मुझे तुम्दारा सारा मनोरथ प्ृर्णतया ज्ञाव हो गया
है | हमने जो इस समय प्रजाओंकी ब्रद्धिक्त लिये बोर तप
किया है; तुम्हारे उस तपसे में प्रसन्न हो गया हैँ ओर तुम्हें
तुम्हारा अभीष्ट प्रदान करूँगा । या त्वभावसे ही मधुर तथा
प्रम उदार वचन कहकर झिवजीने अपने शरीरके अबथंभागसे
दिवादेवीकों प_रथकू कर दिया | तव दिवस प्रथक्क होकर प्रकट
हुई उन परमा शक्तिको देखकर ब्रह्मा जिनन्नमावसे प्रणाम ऋरदके
उनते प्रार्थना करने लगे |
ब्रह्मले कहा--डदिव ! स्टिदा प्रारम्न्भ तम्हारे पति
देवाधिदेव परमात्मा रम्जुने मेरी छष्ठि दी थी आर ( मेरद्वारा )
३०२
<+>--गगहनयी३०-- 4 ग्मााूह "९०५०० यही३७०..4०+४++ ७ एम्मकम्पेक,. ध्ा्ाायााामपाउम॥+मांम नाकाम भामयाकाद बादाम बता ाउ कमान का सयलाइ तारा «मई
का >+ * जोश अमन अमनीना कली कनमीे उ«मगन |" अर. सी. बे. आन. सारी. हम. हे.
शक्ति बअह्ाकों प्रदान कर दी। मुतरां जगमवीरि्रर
शिवा देवोने आगनी भोहोंके मध्यमागसे आने है छा
प्रभावाली एक शक्तिकी रचना की | उस शक्तिक्रों केक
देवशे्ठ भगवान शंकर) जो छीटाकारी, कश्हारी और इसे
तन जऑिश, ब्की
मकमानो-पाकी.. धनी. मदर पाक-#--+बैसिमन रही नभाइधााी "सन. अर -+ पा .अनन-नमी "साािी -पलरीयन ने, मिक-न्नररि+तदील++न्#र न पिचढुकी. ५. आग, नी. अनग अ#. नी. आय न्ा >> जिन, वजन अनी।. जजी. ज्ज्जीः
सारी प्रजाओंकी रचना की थी । शिने | तब गंने देवता
आदि समस्त प्रजाओंकी मानसिक स॒ष्टि की। परतु बारयार रनना
करनेपर भी उनकी धृद्धि नहीं हो रद्दी है, अतः अब मी ख्री-
पुरुषके समागमसे उत्पन्न होनेबाली खष्टिका निर्माण करके
अपनी सारी प्रजाओकी बृद्धि करना चाहता हूं । किंतु अभीतक
तुमसे अक्षय नारीकुलका प्राकम्य नहीं हुआ 9 इस कारण
' तारीकुलकी सृष्टि करना मेरी शक्तिके बाहर दे। चूँकि सारी
शक्तियोंका उद्दमस्थान तुम्हीं हो, इसलिये में तुम अपिलेश्य0
परमा शतक्तिसे प्रा्ना करता हूँ । शिव | में तुम्हे नमस्कार
करता हूँ; तुम मुझे नारीकुलकी सष्टि करनेके लिये शाक्ति
प्रदान करो; क्योंकि शिवत्रिये | इसीकी तुम चराचर जगत्नी
उत्पत्तिका कारण समझो । वरदेश्वरि | में तुमते एक ओर
वरकी याचना करता हूँ, जगन्मातः ! कृपा करके उसे
भी मुझे दीजिये | में तुम्हारे चरणोंमे नमस्कार करता हूँ ।
( वह वर यह है--) ध्सर्वव्यापिनी जगजननि ! तुम चराचर
जगत्की बृद्धिके लिये अपने एक ससमर्थ रुपसे मेरे पुत्र
दक्षकी पुत्री हो जाओ ।? ब्रह्माद्वारा यों याचना किये जानेपर
परमेश्वरी देवी शिवाने पतथास्तु--ऐसा ही होगा? कहकर वह
तागर $ ईँगते हुए. जादम्बिकासे बोले |
शिवर्जीन कहा--<देवि ! परमेग्री व्रह्माने पा
तुम्दारी आरानना की हे; अतः अब तुम उनपर प्र्ल है
जाओ ओर उनका सारा मनोरथ पूर्ण करो ।! तब रिद
परमेश्वर दियकी उस आशाका सिर झुकाकर ग्रहण $ि
ब्रशाके कशनानुसार दक्षकी पुत्री होना खीकार कर
मुने ! इस प्रकार शिवादेयी ब्रह्माकों अनुपम भक्ति प्रदय
डग्भुके शरीरम प्रविष्ट हा गयीं । तसश्ात् भगवा
भी तुरंत ही अन्तर्थान दो गये । तभीसे इस लोकमे 5
की कलाना हुई और मैथुनी सृष्टि चल पड़ी। इससे
न आनन्द प्राप्त हआ | तात | इस प्रकार मे
शिवजीके मद्ान अनुपम अधथनारी-नणर्ध ह्यक्ा वा
दिया; यह सत्पुरषोंद्रे लिये मद्नलदायक है। (अथाप
वाराहकर्पम होनेवाले शिवजीके प्रथम अवतारसे लेकर नवम ऋषभ-अबतारतकका वन
ननन््दीश्वरजी कहते हें---सर्व्ष सनत्कुमारजी ! एक
बार रुद्रने हर्षित होकर ब्रह्माजीसे शंकरके चरित्रका प्रेमपूर्वक
वर्णन किया था | वह चरित्र सदा परम सुखदायक है । ( उसे
तुम श्रवण करो | वह चरित्र इस प्रकार है | )
शिवजीने कहा था--ब्रह्मन् |! वाराहकल्पके सातवें
मन्वन्तरमें सम्पूर्ण छोकोंकी प्रकाशित करनेवाले भगवान् क्पेश्वर,
जो तुम्हारे प्रपोत्र हैं; वेवस्वत मनुके पुत्र होंगे । तब उस
मन्वन्तरकी चतुयुगियोंके किसी द्वापरयुगमें में छोकोंपर अनुग्रह
करने तथा ब्राह्मणोंका हित करनेके लिये प्रकट हूँगा | त्रह्मन !
युग-प्रवृत्तिके अनुसार उस प्रथम चतुर्युगीके प्रथम द्वापरयुगमें
जब प्रभु॒खयं ही व्यास होंगे, तब मैं उस कलियुगके अन्तमें
ब्राह्मणोंके हितार्थ शिवासहित श्वेत नामक महामुनि होकर प्रकट
हूँंगा । उस समय हिमालयके रमणीय शिखर छागल नामक
पर्वेतश्रेष्ठरर मेरे शिखाधारी चार शिष्य उत्पन्न होंगे | उनके
नाम होंगे--श्वेत, स्वेतशिख, ब्वेताश्व और इ्वेतलोहित | ये
चारों ध्यानयोगके आश्रयसे मेरे नगरमें जायूँगे । वहाँ वे
मुझ अविनाशीको तत््वतः जानकर मेरे भक्त हो जायेंगे तथा
: » जरा और मृत्युसे रहित होकर परब्रद्मकी समाधिमें छीन
पाँचवें द्वापरमें सविता व्यास नामसे कहे
रहेंगे | वत्स पितामह ! उस समय मनुष्य ध्यान $
दान) धर्म आदि कर्महेतुक साधनोंद्राय मैण देश
सकेंगे | दूसरे द्वापरमें प्रजापति सल्य,व्यास होंगे। 37
मैं कलियुग सुतार नामसे उत्न्न होऊँगा । वहाँ भी मेरे
शतरूप, हृपीक तथा केतुमान् नामक चरि
शिष्य होंगे । वे चारों व्यानयोगके बरूछ मेरे नगसी
ओर मुझ अविनाशीको तत्वतः जानकर भेर्फे
तीसरे द्वापरमें जब भार्गव नामक व्यास होंगे
नगरके निकट ही दमन नामसे प्रकट होऊेगा | 8
मेरे बिशोक, विशेष, विपाप और पापनाझन नामक है
होंगे | चतुरानन ! उस अवतारमें मैं शिष्योक्री ता |
की सहायता करूँगा ओर उस कल्युगर्म
बनाऊँगा | चौथे द्वापरमें जब अज्ञिरा वॉर करे
उस समय मैं सुहोत्र नामसे अवतार देगा । है.
भी मेरे चार योगसाधक महात्मा पुत्र होंगे। बनना
होंगे--सुमुख, दुर्मुखर) दुर्दम और दुरतिक्रम ! है
भी इन शिष्योंके साथ मैं व्यासकी सहायता ही
तब *
# शिवजीद्वारा द्सवबेंसे छेकर अट्टाइंसव योगेश्वरावतारोंका वर्णन # ३०३
: शंतरुद्रसंदिता |
रनमपनमीर नी.
शिष्य होंगे | प्रजापते | उनके सहयोगसे में योगमार्गकों सुदढ़
बनाऊँगा | सन्मुने ! इस प्रकार मैं व्यासका सहायक बनूँगा।
ब्रह्मन् ! उसी रूपसे मैं बहुत-से दुखी भक्तोंपर दया करके
उनका भवसागरसे उद्धार करूँगा | मेय वह ऋषम नामक
अवतार योगमार्गका प्रवतक, सारखत व्यासके मनको संतोष देने
वाल्य ओर नाना प्रकारसे रक्षा करनेवाला होगा | उस अवतारमें
मैं भद्रायु नामक यजकुमारकी, जो विषदोषसे मर जानेके
कारण पिताद्वारा व्याग दिया जायगा। जीवन प्रदान करूँगा |
तदनन्तर उस राजपुत्रकी आयुके सोलहवें वर्षमें ऋषम ऋषि,
जो मेरे ही अंश हैं, उसके घर पधारेंगे । प्रजापते ! उस
राजकुसारद्वारा पूजित होनेपर वे सद्बपधारी कृपा मुनि उसे
राजघर्मका उपदेश करेंगे | तत्यश्चात् वे दीनवत्सल मुनि हृषित
चित्तसे उसे दिव्य कवच) शह्ठु ओर सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश
करनेवाल्या एक चमकीला खड्ड प्रदान करेंगे | फिर कृपापूर्वक
उसके शरीरपर भस्म लगाकर उसे बारह हजार हाथियोंका बल
भी देंगे। यों मातासहित भद्गायुकी मलीभाति आश्वासन देकर
तथा उन दोनोंद्वारा पूजित हो प्रभावशाली ऋषम मुनि
स्वेच्छानुसार चले जायँगे | ब्रह्मन् ! तब राजर्षि भद्दायु भी:
रिपुगणोंकी जीतकर और कीर्तिमालिनीके साथ विवाह करके
धर्मपूर्वक राज्य करेगा | मुने ! मुझ शंकरका वह ऋषभ नामक
नवा अवतार ऐसा प्रमाववाल्ा होगा; वह सत्पुरषोंकी गति तथा
दीनोंके लिये बन्धु-सा हितकारी होगा । मेने उसका वर्णन तुम्हें
सुना दिया । यह ऋषभ-चरित परम पावन) महान् तथा खर्ग)
यान करनेपर में ऋषभनामसे अवतार ढूँगा | उस समय यश और आयुको देनेवाला है अतः इसे प्रयल्लपूर्वक
शंराशार) गगे। भाग॑व तथा गिरिश नामके चार महायोगी मेरे सुनना चाहिये | ( अध्याय ४ )
४७० ०६३०००-”
शिवजीद्वारा दसवेंसे लेकर अड्डाईंसर्वें योगेश्वरावतारोंका वर्णन
कड्ढन नामक महातपस्त्री योगी होऊंगा | त्रह्मन् ! वहाँ भी मेरे
वार योगताघक महात्मा पुत्र होंगे। उनके नाम बतलाता हूँ,
पुनो--सनक, सनातन) प्रभावशाली सनन््दन और स्वब्यापक
नेमेल तुथा अहंकाररहित सनत्कुमार | उस समय भी कह्ढू
गमधारी में सविता नामक व्यासका सहायक बनूँगा और
नेव्ेत्तिमागेंकी बढ़ाऊंगा | पुनः छठे द्वापरके प्रब्नत्त होनेपर
जब मृत्यु लोककारक व्यास होंगे ओर वेदोंका विभाजन करेंगे;
उस समय भी में व्यासकी सहायता करनेके लिये लोकाक्षि
नामसे प्रकट होऊँगा ओर निधृत्ति-पथकी उन्नति करूँगा | वहाँ
भी मेरे चार हृद्त्ती शिष्य होंगे | उनके नाम होंगे--सुधामा,
विरजा, संजय तथा विजय | विधे | सातवें द्वापरे आरम्भमें
जब शतक्रतु नामक व्यास होंगे, उस समय भी में योगमार्गमें
परम निपुण जेगीपव्य नामसे प्रकट होऊँगा और काशीपुरीमें
गुफ़के अंदर दिव्यदेशमें कुशासनपर बैठकर योगको सुदृढ़
नाऊंगा तथा शतक्रतु नामक व्यासकी सहायता और संसार-
भयसे भक्तोंका उद्धार करूँगा | उस युगमें भी मेरे सारस्वतः
श्रेगीश, मेघवाह और सुवाइन नामक चार पुत्र होंगे | आठवें
दपरके आनेपर मुनिवर वसिष्ठ वेदोंका विभाजन करनेवाले
ैदव्यास होंगे | योगवित्तम ! उस युगमें भी मैं दधिवाहन
गमसे अवतार रूँगा और व्यासकी सहायता करूँगा | उस
पम्य कपिल, आसुरि, पञ्चनशिख्व और शाल्व॒ल्पूर्वक नामवाले
(रे चार योगी पुत्र उलचन्न होंगे, जो मेरे ही समान होंगे ।
ध्न् | नर्वी चतुयुंगीके द्वापरयुगमें मुनिश्रेष्ठ सारख्वत व्यास
'पमसे प्रसिद्ध होंगे । उन व्यासके निवृत्तिमार्गकी इद्धिके लिये
शिवजी कद्दते हैँ--्रक्मन् ! दसवें द्वापरमें त्रिधामा
मेक मुनि व्यास होंगे | वे हिमालयके रमणीय शिखर
वोत्तम “युवुज्ञपर निवास करेंगे | वहाँ भी मेरे श्रुतिविदित
रि उप्र हंगे । उनके नाम होंगे--मछू, वलबन्धु+ नरामित्र
र पे धत केतुशज्ञ । ग्यार॒द्वें द्वापरमें जब जिश्वतनामक
पे शेंगे, तब मैं कलियुगमें गद्गाद्वारमें तप नामसे प्रकट
ज्व। वर्ट भी मेरे छम्बोदर, लम्बान, केशल्म्व और
“मे नामक चार हृद्मती पुत्र होंगे | बारदर्वी चतुर्य॑भीके
5पुण्न शततऊ
शत मामके वेदत्यास होंगे | उस समय में
है.
$ 4 ६. | नर ७ ० न]
"ुई बी हक ५ ३ 5 कालियश ४०७. थे जज जल] री ज
5 रत सनपर कटियुणमें देमकण्चुकमें जाकर अत्रि
नामसे अवतार लूँगा और व्यासकी सहायताके लिये निवृत्तिमाग॑-
को प्रतिष्ठित करूँगा । महामुने ! वहाँ भी मेरे स्वक्ष, समचुद्धि
लाध्य और शवर्व नामक चार उत्तम योगी पुत्र दंगे । तेरहवें
द्वापरयुगमें जब धर्मखरूप नाणयण व्यास द्वोंगे, तब में परव॑त-
श्र गन्धमादनपर वालखिसल्या श्रमम महानुनि वलि नामसे उत्पन्न
टरंगा। ब्दोँ भी मेरे सुधामा) काक््यप, वसिष्ठ ओर विरजा नामक
चार मुन्दर पुत्र दोंगे। चोदहवी चत॒र्युगीके द्वापरयुगमें जब
र्ष बामक ब्यात हागे; उस समय में अद्वियक्ते वंच्र्ें गौतम
नामसे उलस दाझजेगा। उस कलियुगर्न भी अन्ि, वदद, अ्रवण
को 25 सफर हक हट ॥ हफफ्रिरर के ध्द के कि फ्श्ल़््व ०० टाएरस हर. जय
ऊझोर इनाडिप्ट्ट मर पुत्र दश ! यंद्रटुव दाएरस जब चव्यादाफि
# १
हे
व्यड/-बरमयेअ+प्पनका++--न महक +मयकयुड---१३७-३५-५. ५+-.-कलनैन्पे-स्मीश--्कन्क
>ा- आश्रय नमी पाननिरि+ जन नम. टी पकमीगाम+ ८, सबके. +न्ी यामी विज,
२०४
६29. आंध- आन ऋ-आ#-प 2 मपननओत कम पा... &. चय अधम.
बी
एम. शिकमआा, पाम्मायाजमक, आज आयकर कमा आह आन
2. की जता पी. अगाी मी >॥ १ क ५.७ + ही बरी.
व्यास होंगे, उस समय में द्िमालयके पर्ठणागग खित वेदशीर्स
नामक पर्वंतपर सरखतीके उत्तरतठका आश्रय छे बेदशिरा
नामसे अवतार ग्रहण करूँगा | उस समय महापराक्रमी वेद दर
ही मेरा अछ्न होगा । वहाँ भी मेरे चार दृढ़ पराकगी पुत्र होंगे |
उनके नाम होंगे--कुणि। कृणिब्राहु, कुशरीर ओर कुनेभ्रक ।
सोलह द्वापरयुगर्म जब व्यासका नाम देव होगा) तब में
योग प्रदान करनेके लिये परम पुण्यमय्र गोकर्णवन्ग गोकर्ण
नामसे ग्रकट होऊँगा। वहाँ भी गेरे काइयप) उदन| च्यवन
ओर बृहस्पति नामक चार पुत्र द्वोंगे। वे जलके समान निर्मल
और योगी होंगे तथा उसी मार्गके आश्रयसे शिबल्ोकक्तों प्राप्त
हो जायेंगे | सतरहर्थी चतुयुगीक्ते द्वापरयुगम देवकृतंजय व्यास
होंगे, उस समय में हिमालयके अत्यन्त ऊँचे एस रमणीय
शिखर महालय पवतपर गुहावासी नामसे अवतार धारण करूँगा;
क्योंकि हिमालय शिवक्षेत्र कहलाता है । वहीं उतथ्य) वामदेब,
महायोग और महावरू नामके मेरे पुत्र भी होंगे | अठारहवी
चतुयुगीके द्वापरयुगर्म जब ऋतंजय व्यास हंंगे, तब में
हिमालयके उस सुन्दर शिव्वरपर, जिसका नाम शिक्षण्डी पर्यत
है-ओर जहाँ महान् पुण्यमय सिद्धक्षेत्र तथा सिद्धोंद्वारा सेवित
शिखण्डीवन भी है; शिखण्डी नामसे उतलनन््न होझऊँगा | वहाँ भी
वाचःअवा। रचीक, श्यावास्थ ओर यतीश्वर नामक मेरे चार
तपस्वी पुत्र होंगे | उन्नीसव द्वापरमें महामुनि भरद्वाज व्यास
होंगे | उस समय भी में हिमालयके शिखरपर माली नामसे
उत्तनन होऊँगा और मेरे सिरपर लंबी-लंवी जयाएँ: होंगी | वहाँ
भी मेरे सागरके-से गम्भीर खभाववाले हिरिण्यनामा, कौसल्य,
लोकाक्षि और प्रधिमि नामक पुत्र होंगे | बीसबीं चतर्युगीके
द्वापरमें दोनेवाले व्यासका नाम गोतम होगा । तब में भी
हिमवानके इष्ठभागमें स्थित पब॑तश्रेष्ठ अद्द्यसपर, जो सदा
देवता, मनुष्य) यक्षेन्द्र; सिद्ध और चारणोंद्वारा अधिष्ठित रहता
है; अदहस नामसे अवतार धारण करूँगा । उस युगके मनुष्य
अट्टहासके प्रेमी होंगे । उस समय भी मेरे उत्तम योगसम्पन्न
चार पुत्र होंगे । उनके नाम होंगे--सुमन्तु, बर्बीरि: विद्वान
कम्बंन्ध और कुणिकन्धर । इक्कीसवें द्वापरबुगमें जब बाच:-
श्रवा नामके व्यास होंगे; तब मैं दारक नामसे प्रकठ होऊँगा |
इसलिये. उस शुभ स्थानका नास «दारुवनः पड़ जायगा |
वहाँ भी मेरे . छक्ष, दार्मायणि; केतुमान् तथा गौतम नामके
चार परम योगी पुत्र उत्तन्न होंगे | बाईसबीं चतुरयुगीके द्वापरमें
जब झुप्मायण नामक व्यास होंगे, तब मैं भी वाराणसीपुरीमें
(इ७छ: भीस नामक महाशुनिके रूपये अवतरित होऊँण । उस
४ नमो रुद्राय शान्ताय बह्मण परमात्मन ::
अमीर. >नेपआम.. ९... 2--+्रामामम्रिकापत आम... के कम कर... 3... से कमेल्-नी-नाओ॥. ०५. गे... ऋाक+-ऑ बढ
कट 0.७ का. # 2... .2“+, आर मा मान बी पजनमीम अडरीय.. धन जय कररा३ो-गा। ऑन अम..... आपराम वी साक-+7१९५- आन.
अिनननी--+ बाकी
फडियुगर्म इन्द्रसद्वित समस्त देवता मुझ द्ययुप्रया
दन करेंगे । उस अबतारमें भी मेरे भह्ी,
ओर दवेसकरेतु नामक चार परम थार्मिक पुत्र होंगे।
चतुसुगीम जब तृणब्रिन्तु मुनि व्यास होंगे, का 7
कालिजरगिसिर झ्वेत नामसे श्रकट होडँगा | को
उदिक सुददक्य) देखल और कवि नामसे प्रसिद् चा
पुत्र होगे । चौगीससी चतुर्युगीर्म जब ऐशर्यशाली ख बा
तब्र उस युग में नेमिसद्षेत्रभ झली नामक मदाक्ेग
उलनन टरगा | उस सुगम भी मेरे चार तपल्ली शिय ४
उनके नाम द्वोंगे--आालिदोत, अग्नियेश, युववाव और शा
बस
पर्स द्वायर्म जब व्यास दाक्ति नामसे प्रतिद होंगे
में भी प्रभावशाली एवं दण्डधारी महायोगीके हमें
ट्रेंगा । मेरा नाम मुण्डीथर दोगा | उत आताखं मे
कुण्ठकर्ण, कुम्भाण्ड ओर प्रवाहक मेरे तपल्ली शिषर ६
टब्बीस्े द्वापरमें जब्र व्यासका नाम पराग्वर होगे
भंद्रवट नामक नगरमें सहिष्णु नामसे अवतार दा]
समय भी उलूक, विद्युत) झग्बूक ओर आबलवनत न
चार तपल्ली शिष्य द्वंगे | सत्ताईसर्वे द्वापरमें जब आए
व्यास द्वंगे, तब में भी प्रभाततीर्थम सोमझर्मा नशे
हूँगा। वहाँ भी अक्षपाद, कुमाछ उदूक औए व व
प्रसिद्ध मेरे चार तपत्वी शिष्य होंगे। अद्वईसें बाण:
भगवान् श्रीदरि पराशरके पुत्रर्यमें द्ेपायन नामक लव.
पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अपने छठे अंशसे वसुदेवके #8 हे
रपमें उततन््न द्वोकर वासुदेव कहलायेंगे | उसी उम्र ४४
में भी लोकोंको आश्रर्यमें डालनेंके लिये वोगमावे
अरह्यचा रीका शरीर धारण करके प्रकट होझूँगा। हि ४
भूमिमें मृतकलूपसे पड़े हुए. अविच्छिल्त शरीओो हे ५
ब्राह्मणोंके हित-साधनके लिये योगमायाके आय 38 न
जाऊँगा ओर फिर तुम्हारे तथा विष्णुके ताथ मेक हर
मयी दिव्य गुहामें प्रवेश करूँगा | ब्रह्म ! हें हा
लकुली होगा | इस प्रकार मेरा यह कायावतार उद *
कहलायेगा और यह जबतक प्रथ्वी कायम रहेगीःव ह
परम विख्यात रहेगा | उस अवबंतारमें भी मेरे + ..
शिष्य होंगे | उनके नाम कुशिक गेम
होंगे । वे वेदोंके पारगामी ऊध्वेरेता ब्राह्मण योगी ६
मादेश्वर योगको ग्राप्त करके शिवल्लोकको चले गाँ।
९
3.
उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले
परणात्पा शिवने वैबसूत मन्वन्तरके मी
उहीर न
। संक्षितन-शियुणञा]
+ जय ऋ# ब॒ मकर +>ू व] है जमे के + व्ध्या के. जय «+ अछ छने ध्य
चना + ० अाम-ाक.. न आओ पु >फन्जमेककक. सम,
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शतरुद्रसंहिता |
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श्वरावतारोंका सम्यक रूपसे वणन किया था। विभो ! अद्दाईस
व्यास क्रमशः एक-एक करके प्रत्येक द्वापरमें होंगे और
येगेश्वरावतार प्रत्येक कलियुगके प्रारम्भमें । प्रत्येक योगेश्वरावतार-
के साथ उनके चार अविनाशी शिष्य भी होंगे, जो महान
खशिवमक्त और योगमार्गकी इंद्धि करनेवाले होंगे | इन पश्चुपति-
के शिप्योके शरीरोंपर भस्म रमी रहेगी, लल्यट तिपुण्ड्डसे
'सुशोभित रहेगा ओर रुद्राक्षक्षी माला ही इनका आभूषण
'होगा | ये सभी शिष्य धर्मपरायण, वेद-वेदाहुके पारगामी
“विद्वान और सदा बाहर-मीतरसे लिजझ्जञर्चनमें तत्पर रहनेवालि
होंगे । ये शिवजीमें भक्ति रखकर योगपूर्वक ध्यानमें निश्ठा
रखनेवाले और जितेन्द्रिय होंगे । विद्वार्नने इनकी संख्या एक
से बारह बतलायी है ! इस प्रकार मैंने अद्दाईस युगेंके ऋरमसे
मनुसे लेकर कृष्णावतारपर्यन्त सभी अवतारोंके लक्षणोंका वर्णन
कर दिया | जब अरतिसमूहोंका वेदान्तके रूपमें प्रयोग होगा
तब उस कल्पमें कृष्णद्वेपायन व्यास होंगे। या महेश्वरने
ब्रह्माजीपर अनुग्रह करके योगेश्वरावतारोंका वर्णन किया और
फिर वे देवेश्वर उनकी ओर दृष्टिपात करके वहीं अन्तधान
हो गये । ( अध्याय ५ )
नन््दीशरावतारका वर्णन
यहॉँतक वयारीस अवतारोंका वर्णन किया गया | अब
दीश्वरावतारका वर्णन किया जाता है ।
सनत्कुमारजीने पुछा--प्रमो ! आप महादेवके अंश-
उत्पन्न होकर पीछे शिवको केसे प्रात हुए. थे ! वह सारा
तान्त में सुनना चाहता हूँ, उसे वर्णन करनेकी कृपा करें ।
नन््दीश्वर बोले--सर्वश्ञ सनत्कुमारजी ! मैं जिस प्रकार
हदेवके अंशसे जन्म लेकर शिवको प्राप्त हुआ, उस
पड्ञका वर्णन करता हूँ; तुम सावधानीपूर्वक श्रवण करो ।
/लाद नामक एक धर्मात्मा मुनि ये | पितरोँके आदेशसे
/हीने अयोनिज सुब्रत मृत्युद्दीन पुत्रकी प्राप्तिके लिये तप
८के देवेश्वर इन्द्रको प्रसन्न किया । परंतु देवराज इन्द्रने
ह पुत्र प्रदान करनेमे अपनेको अतसर्थ बताकर सर्वेश्वर
(ः शक्तिसम्पन्त महादेवकी आराधना करनेका उपदेश दिया |
(7 शिलाद भगवान महादेवको प्रसन्न करनेके लिये तप करने
| | उनके तपसे प्रसन्न होकर महादेव वहाँ पधारे और
८पिमा।पमग्न शिल्दकी थपथपाकर अगाया | तब शिलादने
पा सवन किया ओर भगवान् शिवके उन्हें वर देनेको
; कि हेनेपर उनसे कहा--ध्प्रभो। में आपके ही समान
। हा अयोनिज पुत्र चाहता हूँ |? तब शिवजी प्रसन्न होकर
वाल |
द शिवज्ञीने कहा--तपोधन विप्र !. पूर्वकालमें र्माजीने,
ः न पैथा चहूँ-बड़े देवताओंने मेरे अवतार धारण करनेक्े
। हे ४ रे जदारा नशे अराधना की थी। इसलिये मुने !
टी जर जगवका सता हूँ, फिर भी तुम मेरे पिता बनोगे
के । / फशरा अपानिज पुत्र होऊँगा तथा मेरा नाम
# | हु ।
शिक पु 5६० ३९---
नन््दीदरवरजी कहते है--मुने ! यों कहकर कृपाछ
शंकरने अपने चरणोंमें प्रणियत करके तामने खड़े हुए शिलाद
मुनिकी ओर कृपाइष्टिसे देखा ओर उन्हें ऐसा आदेश दे वे
तुरंत ही उमासहित वहीं अन्तर्थान हो गये । महादेवजीके चले
जनेके पश्चात् महामुनि शिल्दने अपने आश्रम आकर
ऋ्षियोंसे वह सारा जत्तान्त कह सुनाया । कुछ समय बीत
जानेके बाद जब यशवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके
लिये यज्क्षेत्रतको जोत रहे थे, उसी समय में शम्भुकी आशसे
यशञके पूर्व ही उनके शरीरसे उत्पन्न हों गया | उस समय मेरे
शरीरकी प्रभा युगान्तकालीन अग्निके समान थी | तब सारी
दिशाओंमे प्रसन्नता छा गयी और 'शिलाद मुनिकी भी बड़ी
प्रशंसा हुईं। उधर शिलादने भी जब मुझ बालकको प्रलूय-
कालीन सूर और अमग्निके सहश ग्रभाशाली, त्रिनेत्र, चतुभुज,
प्रकाशमान, जटामुकुटथारी, त्रिग्वूछ आदि आयुर्धेसति युक्त
संवेथा रुद्ररूपम देखा, तव वे महान् आनन्दर्म निमग्न
हो गये ओर मुझ प्रणम्यकी नमस्कार करते हुए कहने छगे |
शिलाद वोछे--सुरेश्वर ! चूँकि तुमने नन्दी नामसे
प्रकट होकर मुप्ते आनन्दित किया है, इसलिये में तुम आनन्दमय
जगदीश्वर्की नमस्कार करता हूँ ।
नन््दीश्वरजों कहते हँ--मुने ! तदनन्तर जैसे निर्धन-
को निधि प्राप्त हो जानेसे प्रसन्नता होती दूं) उसी प्रकार भेरी
प्रासिसे दर्पित होकर पिताजीने महेश्वरत्ती भर्ीभोति बन्दमा
की ओर फिर मुझे लेकर ये शीम ही अपनी पर्णशाद्मओों चल
दिये। महामुने ! जब में शिल्दकी ऋव्यार्म परैंच गया, तय
मैंने अपने उस स्पह्षा परित्याय करके मनुष्यरूप चारण कर
लिया | तदनन्तर शाल्ट्रायन-नन्दन पुत्रचल्लछ शिक्षदने मेरे
३०६
जातकम आदि सभी संस्कार राग्पन्त किये | फिर पौसओं वर्धओं
पिताजीने मुरी साक्ोपाज़् सम्पूर्ण वेदीका तथा अन्यान्य शा्तरो-
का भी अध्ययन कराया | सातयों बर्ध पूरा हानेपर झिवजीकी
आजशसे मित्र और वरुण नामके मुनि मुझे देखनेके लिये पिलाओीके
आश्रमपर पधारे । शिलाद मुनिने उनकी पूरी आवभगत्त की |
जब वे दोनों महात्मा मुनीशखर आनन्दपूर्कक आसनपर विराज
गये, तब्र मेणे आर बारबार निदाएफर बोले |
मित्र ओर चरुणने ऋआऋदह(--'तात शिलांद [यद्यपि तुम्दारा
पुत्र नन््दी सम्पूर्ण शास्त्रेकि अर्थका पारगामी बिद्वान् है, तथापि
इसकी आयु बहुत थोड़ी हे | हमने बहुत तरहसे विचार करके
देखा, परंतु इसकी आयु एक वर्मसे अधिक नहीं दीखती |?
उन विप्रवरोके यों कहनेपर पुत्रवत्सल शिलाद नन्दीकों छातोगे
लिपयाकर दुःखातें हो फूट-फूयकर रोने लगे | तब पिता और
पितामहकी मतककी भाँति भूमिपर पड़ा हुआ देख नन््दी
शिवजीके चरण-कमर्लोका स्मरण करके प्रसन्नतापूर्यक पूछने
लगा--“पिताजी ! आपको कौन-सा ऐसा दुःख आ पड़ा है
जिसके कारण आपका शरीर कॉप रहा है और आप रो रहे
हैं ? आपको वह दुःख कहाँसे प्रात्त हुआ है में इसे ठीक-
ठीक जानना चाहता हूँ ।?
॥ नमो रद्गाय शान्ताय बह्मणे परमात्मने 5
[ संक्षिप्तशिवुणा]
पितान कहा--जेदा ! तुम्द्रारी असायुक्े इश्क!
अधन्त दुली हद रह 4 ( तुम्हां बताओ ) भरे
कीन दूर कर सकता हे ! में उसकी शरण ग्रहण करू
पुत्र वाला--गिताजी ! में आपके सामने दा
है और यह बिल्कुल सत्य बात कह रहा हूँ कि चारे
दानके यम, काल तथा अच्यास्य प्राणी--ये सब-केसव |
मु मारता चादढ तो भी मेरी वाल्यकाहमें मुलु की
अतः आप हुक्षी मत दे ।
पिताने पूछा--मेरे प्यारे छाछ | तुमने ऐग १
तय किया दे अथवा तुम्दं कौन-सा ऐसा शान) कोर
प्रात्त ऐ जिसके बलपर तुम इस दादण हुक
कर दागे ; २७
पुत्रन कहा--तात ! में न तो तपसे मलुग्े €
ओर न विद्यासे | मैं मदादेवजीके मजनते मृत्युकी गे!
इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है |
नन््दीश्वरजी कहते हैं--मुने ! यो कहर मी
मुकाकर पिंताजीके चरणोंमे प्रणाम किया और हि:
प्रदक्षिण' करके उत्तम वनकी राह छी।.. (अब
नन््दीश्वरके जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहका वर्णन
नन्द्केश्वर कहते हँ--मुने ! वनमें जाकर मैंने
एकान्त स्थानमें अपना आसन लगाया और उत्तम बुद्धिका
आश्रय ले मैं उम्र तपमें प्रदत्त हुआ, जो बड़े-बड़े मुनियोंके
लिये भी दुष्कर था। उस समय मैं नदीके पावन उत्तर
तटपर सुदृदृदरूपसे ध्यान छगाकर ब्रृठ गया और एकाग्र तथा
समाहित मनसे अपने हृदयकमलके मध्यमांगमें तीन नेत्र, दस
भुजा तथा पाँच मुखवाले शान्तिस्वरूप देवाधिदेव सदाशिवका
: ध्यान करके रुद्र-मन्त्रका जप करने छगा | तब उस जपमें मुझे
तल्लीन देखकर चन्द्रार्भूषण परमेश्वर महादेव प्रसन्न हो गये
ओर उमासकह्वित वहाँ पधारकर प्रेमपूर्वक बोले |
शिवजीने कहा--'शिलादनन्दन ! तुमने बड़ा उत्तम
तप किया है । तुम्हारी इस तपस्थासे संतुष्ट होकर मैं तुम्हें वर
देनेके लिये आया हूँ | तुम्हारे मनमें जो अभीष हो, वह
माँग लो ।? महादेवजीके यों कहनेपर मैं सिरके बल उनके
चरणोमं लोट गया और फिर बुढ़ापा तथा शोकका विनाश
करनेवाले परमेशानकी स्तुति करने छगा | तब परम कष्टहरी
वृपभव्यज परमेश्वर शम्भुने मुझ परम भक्तितमनर्ट
जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आये ये और गे 2
चरणोंमें पड़ा था, अपने दोनों हार्थोते पकड़# हे
और शरीरपर हाथ केरने लगे | फिर वे जगवीश ह
तथा हिमाचलकुमारी पार्वती देवीकी ओर हर
कृपाहए्िसे देखते हुए यों कहने छगे-वत्स न ६
विप्रोंको तो मैंने ही भेजा था । महाग्राश | परे ँ
कहाँ; तुम तो मेरे ही समान हो | इसमें तनिक भी का
तुम अमर, अजर दुःखरहित) अव्यय ओर कक 2
गणनायक बने रहोगे तथा पिता और 4
प्रियजन होओगे । ठममें मेरे ही समान वे
मेरे पाइवैभागमें खित रहोगे और तुमपर नि बे
बना रहेगा । मेरी कृपासे जन्म) जे ओर ४
अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे |?
थे कः
नन््दीश्वरजी कहते हैं--सने 'अपक $
शम्भुने कमछोंकी बनी हुईं अपनी
8
क् शतरुद्रसंहिता ] # नन्दीश्वरके जन्म: वरप्राप्ति अभिषेक और विवाहका वर्णन #
३०७
, तुरंत ही मेरे गलेमें डाल दिया | विप्रवर | उस शुभ मालाके. है। तदनन्तर मक्तवत्सठ भगवान् शंकरने अपने अतुलब॒ल-
में पढ़ते ही में तीव नेत्र और दस भुजाओंसे सम्पन्न हो
प्रातथा द्वितीय शंकर-सा प्रतीत होने लगा। तदनन्तर
'मेश्वर शिवने मेरा हथ पकड़कर पूछा-ध्वताओ) अब तुम्हें
नि-सा उत्तम वर दूँ ? फिर उन वृषध्चजने अपनी जयमें
पंत दवरके समान निर्मेल जलको हाथमें ले प्तुम नदी हो
ञओ ' यों कहकर उसे छोड़ दिया | तब वह जल उत्तम
ग्से वहनेवाली, खच्छ जलूसे परिपूर्ण, मद्दान् वेगशालिनी/
ज्व्ख्पा पॉच सुन्दर नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो गया |
नेक नाम ई--जठोदका, तचिख्रोता। वृषध्वनि, स्वरणोदका
पैर जम्पूनदी । सुने | यह पद्मनद शिवके प्ृष्ठमागकी भाँति
प्मसुभ 4। महेखरके निकट इसका नाम लेनेसे यह परम
न द्वो जाता है। जो मनुष्य पश्चनदपर जाकर स्नान और
गप करके परमेश्वर शिवका पूजन करता है, वद शिवसायुज्य-
7 प्रपष्त होता है--इसमें संशय नहीं है । तसश्चात् झम्मुने
मिल दरा-प्थव्यये ! में मन््दीका अभिषेक करके इसे गणाध्यश्
पता चद्धता हूँ । इस विपयमें तुम्हारी क्या राय है ??
तय 0 इक लक
न त्तः ञ्सा चाट[--- देदेदश न || आप मनन गशाव्यउ-पद
, .। हर सफते हैं; क्योंकि परमेश्वर ! यह शिलादनन्दन मेरे
2” १ एुपरससा है, इसलिये नाथ | यद् मु्ते बहुत दी प्यार
शाली गर्णोको बुलाकर उनसे कहा ।
शिवजी बोले---गणनायको.!ठुम सब लोग मेरी एक आशा-
का पालन करो। यह मेरा प्रिय पुत्र नन्दीश्वर सभी गणनायकीका
. भ्रष्यक्ष और गर्णोका नेता है; इसलिये तुम सब लोग मिलकर
इसका मेरे गरणेके अधिपति-पदपर ग्रेमपूवेंक अभिषेक करो ।
आजसे यह नन्दीश्वर तुमलोगोंका स्वामी होगा |
नन््दीश्वरजी कहते है--मुने ! शंकरजीके इस कथनपर
सभी गणनायकॉने “एवमस्तु? कहकर उसे स्वीकार किया और
वे सामग्री जुगनेमें छग गये | फिर सब देवताओं और मुनियेनि
- मिलकर मेरा अभिषेक किया । तदनन्तर मरुतेंकी मनोद्गारिणी
दिव्य कन्या सुयशासे मेरा विवाह करवा दिया। उस समय
मुझे बहुत-सी दिव्य वस्तुएं मिरललीं। महामुने ! इस प्रकार
विवाह करके मेने अपनी उस पत्नीके साथ शम्भु; शिवा, ब्क्षा
ओर श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया । तब चिलोकेश्वर
भक्तवत्सल भगवान् शिव पत्नीसहित, मुझसे परम
प्रेमपूबेक्र बोले | |
इईंश्वरने कहा--सत्पुत्र | यह तुम्हारी प्रिया सुयशा और
छुम मेरी बात सुनो । तुम मुझे परम प्रिय हो, अतः में स्नेह
पूवक तुम्हें मनोवाज्छित वर प्रदान कर्ूूँगा | गणेश्वर नन््दीश !
देवी पावतीसह्तित में तुमपर सदा संतुष्ट हूँ, इसलिये वत्स |
तुम मेरा उत्तम वचन श्रवण करो |तुम मेरे अटूठ प्रेमी,
विशिष्ट, परम ऐ्वर्य सम्पन्न) महायोगी, महान् धनुर्धारी
अजेय, सबकी जीतनेवाले, महाबली और सदा पूज्य
होओगे । जहाँ में रहूँगा; वहाँ तुम्हारी स्थिति होगी ओर जहाँ
तुम रहोगे, वहाँ में उपस्थित रहूँगा । यद्दी दशा त॒म्दारे पिता
ओर पितामहकी भी होगी । पुत्र | तुम्हारे ये मह्बली पिता
परम ऐवयशाली, मेरे भक्त ओर गणाध्यक्ष दंगि। बत्स | ये
ही नियम तुम्दारे पितामहपर भी लागू दंगे | अन्तर्म तुम सब
ल्ेग मुझसे वरदान प्राप्त करके मेरा सांमिष्य प्राप्त करोगे |
नन्दीश्वरजी कहते हँ--मुने | तत्श्वात् मद्मभागा
उमादेवी वर देनेके लिये उत्सुक हो मुझ नन््दीसे ब्ोर्ली---
थैय ! तू मुझसे भी वर माँग छे) में तेरी सारी अमीर
कामनाओंकी पूर्ण कर दूँगी ।? तब देवीके उस वचनकों
छुनकर मेने दाथ जोड़कर कहा--प्देति ! आपके चरण
मेरी सदा उत्तम भाक्ते बनी रद |? मेरी याचना सुनकर देवीने
कृह्--'एवमलु--णएसा ही देगा | फिर गित्रा नन््दीरी
प्रियवमा पक्षी सुबशाते दांर्ल्ये ।
जय ्ज ,
मु
+
रु न
-ज
बढ 5
पु
.. केबीने का जले व थे 900 7 ननल्लल्ललललललललसॉसनपणनल८न कहा--बत्से | तुग भी अपना अभीष् सर ग़दण
करो--तम्हारे तीन नेत्र होंगे | तुग जसा-बन्धनगे मद जाओगी
और पुत्र-गौत्रोंसे सम्मन्न रहोगी तथा तुम्दारी मुझ और अपने
स्वामीम अटल भक्ति बनी रहेगी |
नन्दीश्वर जी कहते हैं--मुने ! तदनन्तर शिवजीनी
आजासे परम प्रसन्न हुए. ब्रद्मा। विष्णु तथा समस्त देवगणोंने
भी प्रेमपूर्वंक हम दोनोंको बरदान दिये | तलश्रात् परमेश्वर
शिव कुठम्बसहित मुझे अपनाकर तथा उम्रासद्रित प्रपार
आरूढ़ हो सम्बन्धियों एवं बान्धरेक्रि साथ अपने नियाससथ का
४ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्माण परमात्मने ::
४ ४७ ६०५ सेन जा कर पक -जयन-ऊ-न-> के जण काने पर बल करपाह >> ७ ना राशी आय शसिकििंूू >
चडे गये | तब वहाँ उपस्थित तिश्णु आदि समस्त देखा है!
प्रशंशा तथा शिव-शियाकी सतुति करते हुए आओ
धामका चल दिये | बत्स | इस प्रकार मेने तुमे भरे
अनतारका अंत कर दिया। मदामने | यह मनुः
सदा आनन्ददायक ओर शिव्रभक्तिका वर्क है | ३
मानत्र भक्तिभावित चितसे मुझ नन््दीके इस झम्म,
अभिषेक ओर विवाइके जृत्तान्तकों सनेगा अब
सुनायेगा तथा पद़ेगा या दूसरेको पढ़ायेगा। वह इस हो!
मुख भोगकर अन्त परमगतिक्ों श्राप्त हेगा। (अ
कालभेखका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या और शिव जीका ग्रसन्न होकर उनकी पत्नी गुचिणः
गर्भसे उनके पृत्ररुपमें ग्रकट होनेका उन्हें
तद्नन्तर भगवान् शंकरके भेरबावतारका वर्णन
करके ननन््दीश्वरने कहा--महामुने ! परमेश्वर शित्र
उत्तमोत्तम लीलाएँ रचनेवाले तथा सत्पुम्षोके प्रेमी हूँ ।
उन्होंने मार्गशीर्ष मासके कृप्णपक्षदी अश्मीको भैरवल्यसे
अवतार लिया था | इसलिये जो मनुष्य मार्गशीर्पमासद
केष्णा'्॒टमीको कालमेज़के संनिकट उपबास करके राज्िमें
जागरण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है । जो
मनुष्य अन्यत्र भी अक्तिपूषक जागरणसहित इस ब्रतका
अनुष्ठान करेगा; वह भी महापापोंसे मुक्त होकर सह तिको
प्रा्त हो जायगा | प्राणियोंके लाखों जन्मोंमें किये हुए जो पाप
हैं, वे सब-के-सब काल्मैरवके दर्शनसे निमूंल हो जाते हैं |
जो मूर्ख कालमभेरवके भक्तोंका अनिष्ट करता है, वह इस
जन्ममें दुःख भोगकर पुनः दुर्गतिको प्राप्त होता है | जो लोग
विश्वनाथके तो भक्त हैं परंतु काल्मैरबकी भक्ति नहीं करते,
उन्हें महान् दुःखकी प्राप्ति होती है | काशीमें तो इसका विशेष
प्रभाव पड़ता है । जो मनुष्य वाराणसीमें नियास करके काल-
भैरवका भजन नहीं- करता; उसके पाप शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी
भाँति बढ़ते रहते हैं।जो काशीमें प्रत्येक भोमवारकी
कृष्णाष्टमीके दिन कालराजका भेजन-पूजन नहीं करता, उसका
उप्य कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान क्षीण हो जाता है ।
_तद्नन्तर नन््दीश्वरने वीरभद्र तथा शरभावतारका
त्तत्तान्त खुनाकर ऊहा--अकह्मपुत्न | भगवान् शिव जिस
/ भर प्रसन्न होकर विश्वानर मुनिके घर अवतीर्ण
डैए थे, शशिप्रोढिकि उस चरितक्ो तुम्र प्रेमपूर्वक
भूवण् करो | उस समय बे तेजकी निधि अस्निरूप सर्वात्मा
वरदान देना
परम प्रभु शिव्र अभिलोकक्े अधिपतिह्पते गह्मति
अवतीण हुए, थे | पूर्वकालकी बात है) नर्मदाके सर
गम॑धुर नामका एक नगर था | उसी नगरमें विशवनर
एक मुनि निवास करते थे। उनका जन्म शाग्डिल
हुआ था | वे परम पावन) पुष्पात्मा) शिवमक्त, ्र
निधि ओर जितेत्दिय ये | ब्रह्मचर्याश्रममें उनकी की
थी | वे सदा त्रद्मयश्षमें तत्यर रहते थे | फिर उद्ोने बच
नामकी एक सदगुणबती कन्यासे विवाह कर स्थि
ब्राह्मणोचित कर्म करते हुए देवता तथा पितरोंके ग्रिव
वाला जीवन बिताने लगे | इस प्रकार जब गा |
व्यतीत हो गया, तब उन ब्राह्मणकी मार्या शुविभाती
उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली थी। अपने पतिते के
'प्राणनाथ ! स््रियोंके योग्य जितने आनन्दम्द भोग है
सबको मैंने आपकी कृपासे आपके साथ रहकर भोग ्ि
परंतु नाथ । मेरे हृदयमें एक लालता चिस्काल्से की
और वह गहस्थोंके लिये उचित भी है; उसे आप पूर्ण |
करें | स्वामिन् ! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ ओर कट
वर देना चाहते हैं तो मुझे महेश्वर-सरीखा
कीजिये। इसके अतिरिक्त मैं दूसरा वर नहीं चाहते |
नन््दीश्वरजी कहते है--पने ! कप हम
पवित्र ब्रतपरायण ब्राह्मण विश्वानर क्षणभरके आर
हो गये और हृदयमें यों विचार करने लगे-: माँ!
इस सूक्ष्माज्ञी पत्नीने कैसा अत्यन्त दुलभ वर
यह तो मेरे मनोरथ-पथसे बहुत दूर है | अच्छी)
सब कुछ करनेमें समर्थ हैं | ऐसा प्रतीत होते
है ४
[ संश्षित्त-रिवाणा
ज४ ३
शतरुद्रसहिता ]
# कालभेरवका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या #
३०९,
उन अम्मुने ही इसके मुखमें बैठकर वाणीरूपसे ऐसी बात
कही है, अन्यथा दूसरा कौन ऐसा करनेमें समर्थ हो सकता है |
तदनन्तर वे एकपन्नीत्रती मुनि विश्वानर पत्नीको आश्वासन देकर
वाराणसीमें गये और घोर तपके द्वार भगवान् शिवके वीरेशा
लिड़की आराधना करने लगे । इस प्रकार उन्होंने एक वर्षपयेन््त
भक्तिपूवंक उत्तम वीरेश लछिड़की त्रिकाल अचना करते हुए
अद्भुत तप किया | तेरहवाँ मास आनेपर एक दिन वे द्विजवर
प्रातःकाल त्रिपवगामिनी गड़ाके जलमें स्नान करके ज्यों ही
वीरेशके निकट पहुँचे, त्यों ही उन तपोधनको उस लिझ्ञके
प्य एक अप्टर्षीय विभूतिविभूषित बालक दिखायी दिया ।
उस नम्न शिश्षुक्के नेत्र कानोंतक फेले हुए थे, होठोंपर गहरी
लालिसमा छायी हुईं थी, मस्तकपर पीले रंगकी सुन्दर जय
सुशोभित थी ओर मुखपर हँसी खेल रही थी | वह शेशवोचित
: अलंकार और चिताभस्म धारण किये हुए था तथा अपनी
लीलासे हँसता हुआ श्रुतिसूक्तोंका पाठ कर रहा था | उस
। बालककों देखकर विश्वानर मुनि कृतार्थ हो गये और आनन्दके
;$ कारण उनका शरीर रोमाश्वित हो उठा तथा बारंबार “नमस्कार
ग है, ममस्कार है? यो उनका हृदयोद्वार फूट पड़ा । फिर वे
अभिलापा पूर्ण करनेवाले आठ पद्मोंद्वारा वालरूपधारी परमानन्द-
खरूप दाम्भुका सवन करते हुए बोले ।
विश्वानरने कह(--भगवन् ! आप ही. एकमात्र
अद्वितीय ब्रह्म हैं, यह सार जगत् आपका ही स्वरूप है, यहाँ
अनेक कुछ मी नहीं है। यह विल्कुछ सत्य है कि एकमात्र
रद्के अतिरिक्त दूसरे किसीकी सत्ता नहीं है, इसलिये मैं आप
महेशक्ी शरण अहण करता हूँ। शम्भो |! आप ही सबके
कर्ता'र्ता हैं, तथा जैसे आत्मधर्म एक होते हुए भी अनेक-
रुपसे दीखता है, उसी प्रकार आप भी एकरूप होकर नाना
र्पा्म व्यात हैं। फिर भी आप रूपरहित हैं | इसलिये आप
५बरक अतिरिक्त में किसी दूसरेकी शरण नहीं ले सकता ।
' जैसे रज्जुमें सपे, सीपीमे चाँदी और मृगमरीचिकामें जल्प्रवाहका
भान भिथ्या है, उसी प्रकार; जिसे जान लेनेपर वह विश्वप्रपश्च
भप्पा भातित होता है; उन महदेशवरकी में शरण लेता हूँ ।
ग्वी ! जल्म जो रीतलता, अभिमें दाहकता; सूर्य गरमी,
'पद्धमाम आदादकरिता, पुप्पमे गन्ध और दृग्धर्मं घी वर्तमान
!0 बेर उप्पपऊा ही स्वरुप है; अतः में आपके शरण हैँ | आप
“+5एत एोफर शब्द सुनते हैं; नासिकाविद्दीन होकर सूँवते
६ । पेर ने दगेएर भो दरतक चले जाते है, ने पह्ीन होकर
लि र 5 म््छु १४ कि हर डे कि शत
४ ४.७ हयात ४ 3९ हजछतराद् हाकर कया समस्त रखा
([
शाता हैं ! भमछा। आपको सम्यक् रूपसे कौन जान सकता है।
इसलिये मैं आपकी शरणमें जाता हूँ । ईश ! आपके रहस्पको
नतो साक्षात् वेद ही जानता है न विष्णु, न अखिल विश्वके
विधाता ब्रह्मा न योगीद्र ओर न इन्द्र आदि प्रधान
देवताओंकी ही इसका पता है। परंतु आपका सक्त उसे जान
लेता है, अतः मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ | ईश | न
तो आपका कोई गोन्न हैन जन्म है; न नाम है न
रूप है, न शील है और न देश है; ऐसा होनेपर भी आप
त्रिलोकीके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण कामताओंकों पूर्ण करनेबालि
हैं, इसलिये मैं आपका भजन करता हूँ | स्मरारे ! आप सबे-
खरूप हैं, यह सारा. विश्वप्रपश्य आपसे ही प्रकट हुआ है। आप
गोरीके प्राणनाथ, दिगम्बर ओर परम शान्त हैं | बाल;
युवा और बृद्धरूपमें आप ही वर्तमान हैं । ऐसी कौन-सी वस्तु
है, जिसमें आप व्याप्त न हों) अठः में आपके चरणोंमें
नतमस्तक हूँ ।#
नन््दीभ्वरजी कहते हँ--मुने ! यों स्तुति करके विप्रवर
विश्वानर हाथ जोड़कर भूमिपर गिरना ही चाहते थे, तबतक
सम्पूर्ण बृद्धोंके भी बुद्ध वाल्रूपधारी शिव परम हित होकर
उन भूदेवसे बोले |
# विशधानर उवाच--
एक अद्दीवाद्वितीयं समस्त सत्य॑ सत्य नेह नानात्ति किंचित् ।
एको रुद्रो न द्वितीयोप्वतस्थे तस्मादेक॑ त्वां प्रपये मद्देशम ॥
कर्ता हर्ता त्वं द्वि सर्वत्य शम्मो नानारूपेष्वेकरूपो5प्यरूप: ।
यद्॒त्प्रत्यग्धर्भ एको5प्यनेकस्तस्मान्नान्य॑ त्वां विनेशं प्रपथे ॥
रब्नी सर्प: शुक्तिकायां च रौप्य॑ नैरः पूरत्तन्द्गाज्ये मरीची ।
यद्वत्तदद्िखगेष प्रप्ञों यलिन् शाते ते प्रपये मदेशम ॥
तोये शेत्यं द्ादकत्वं च वद्ी तापो मानो शीतनानी प्रसाद: ।
पृष्पे गन्षों दु्पमध्येडपि सर्पियंचच्छन्नों त्वं ततस्तलां प्रपये ॥
घधब्द गृदरणात्वश्रवार्तं द्वि जिमरस्यप्ाणत्तव॑ ब्यइप्रिरावांति दरात |
व्यक्ष: परवेत्व॑ रसशोध्प्यनित्: कर्त्वां समन्यग्ेत्यतस्ववां प्रषये ॥
नो वेदस्त्वामीय साक्षादि वेद नो वा विष्णु्नों विधातासिटरस्य ।
नो वोगीन्द्रा नेद्धसुझ्याश्ष देवा मतों बेद त्वाम्ननस्त्वां श्रपये ॥
नो ते गोश्ं नेश मन््मापि लास्या नो वा हर्ष नव दाझे न देश: ।
स्थन्भूतध्यी-परत्व विलोगवा; स्वागत क्ामान् पूरदेरद सठे वास ॥
त्वत्त: सर्व त्वं दि सब स्ररारे त्व॑ नोरगल्व थे. मनोपविश्वानत: ।
त्व॑ं बे वृद्धल्पं युवा त्वं व वाठसवच्च बत् लि मास्थास्तां नरीट्न ॥
( शि+ पू० झोरदसीड़ित 2३ (६२-००८* )
३१० ४ नमो रुद्राय शान्ताय घह्ाण परमाताने * [ संक्षिप्त-शिवपुगणा
7:६7
कक
» ८५ भाव
ट है ध
ड़ आ
| (/ रु रर्वान्तर्गाती, ऐडयंसशन्न) शर्य तथा मत ख बुद़
0२३. हालनेवाछि हैं| भा) आप सर्वशसे कौनसी बह कि
$ | फिर भी आप मुझे दीनता प्रकट करनेवादी याच्यके प्री
आहट दोनेके दिये क्यों कद रहे हूं! मदेशान | ऐस बक्
आपनी जैसी इच्छा दवा) वसा कीजिये ।
नन््दीश्वरजी कहते हँ--नें ! पवित्र व्रत का
विश्वानस्के उस्त बचनको सुनकर पावन शिमत्मवारी रहते
ईसकर शुति ( विश्वानर ) ते बेलि--अवते ! तुमे को
टुदयर्म अपनी पत्नी शुचिप्मतीके प्रति जो अभिलापा कर एह
१, बढ निल्सदेद शोड्धे दी समयमें पूर्ण हो जावगी। मह्मे
ई शुनिष्मतीके गर्भ तुम्दाा पुत्र द्वेकर प्रकट हेड | *
नाम सद्पत्ति देगा । में परम पावन तथा समझ देवताओं
लिये धिय शोऊगा | जो मनुष्य एक वर्भतक शिवर्जर्क एक
तुम्दारद्वारा कथित इस पुण्यमव अभिलापाध्क सोना थे
काल पाठ करेगा) उसकी सारी अभिलापाएँ वह पर
देगा | इस स्लोन्रका पाठ पुत्र क्षेत्र और घनकी १
सर्वथा शाम्तिकारक सारी विपत्तियोंका विनाश) छा
वारूरूपी शिवने कहा--मुनिश्रेष्ठ विश्वानर ! तुमने. मोन्नह्प सम्यत्तिका करती तथा समस्त कामनाओकी पृ थे
आज मुझे संत॒ष्ट कर दिया है । भूदेव | मेरा मन परम प्रसन्न हो. वाला दूँ । निल्सदेह यह अक्रेछा दी समस्त सोतकि उमा:
गया है; अतः अब तुम उत्तम बर मे गे लो | यह सुनकर ननन््दीश्वरजी कदते हैं--मुने ! झता ऋ#
मुनिश्रेष्ठ विश्ानर कृतकृत्य हो गये और उनका मन हर्षम्मब्ालल्पघारी शम्पु) जो सत्पुदपोंकी गते 8 अन्त्ीत है
गया | तब वे उठकर बालरूपधारी शंकरजीसे बोले लक थे क
हो गया | तब वे उठकर बालरूपधारी शंकरजीसे बोले | तब विप्रचर विश्वानर भी प्रसन्न मे आपने ।
विश्वानरने कहा--प्रभावशाली मददेश्वर | आप तो छोट गये । ( अध्या ८
प्ज्ष्च््च
कर
शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकव्य, तरह्माद्वरा वालकद्ला संस्कार करके गृहपति' ना रहा
_नारदजीढवारा उसका भविष्य-कथन, पिताकी आज्ञासे गृहपतिका काशीर्म जाकर तप कह!
इन्द्रका. वर देनेके लिये प्रकट होना, गृहपतिका उन्हें ठुकराना, शिवजी का प्रकट हकिर ४ हक
“7: * - बरदान देकर दिवपालपद ग्रदान-करना तथा अग्ीक्षर लिज्न और अग्निका महल
' नन््दीश्वरजी कहते हैँं--सुने ! घर आकर उस ब्राह्मण- सुखपूर्वक प्रसव होनेके अभिष्ायतत गर्भके रूपकी कु
ने बढ़े दर्षके साथ अपनी पत्नीसे वह सारा इत्तान्त कह सुनाया । वोला सीमन्त-संस्कार सम॒न्न कराया तु बुर
उसे सुनकर विप्रपत्नी क्ुचिप्मतीको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। अनुकूल होनेपर जब बृहस्पति केन्द्रवर्ती हुए और ;
बह अत्यन्त प्रेमपूवंक अपने भाग्यक्ी सराहना करने छगी । योग आया तब शुभ लग्तमें भगवान शंकर लि हा
तंदनन्तर समय आनेपर ब्राक्षणड्वारा विधिपूर्वक गर्भाधान-कर्म कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान हैतथाओ आओ
सम्पन्न किये जानेपर वह नारी गर्भवती हुईं | फिर उन विद्वाव्ु बुझानेवाले, समस्त अरिशेंके विनाश और गू० कह
घुनिने गर्भके स्पन्द्न करनेसे पूर्व ही पुंस्वकी इद्धिके लिये तीनों छोकेकि निवासियोंकों सब तरहसे 3 क्रय
2 पी वर्णित विधिकें अंनुसार सम्यक् रूपसे पुंसवन-संस्कार झविष्मतीके गर्भेसे पुत्नसुपमें प्रकट हुए | 2 बुक
[...] वलश्रात् आठवों मदीना आनेपर कृपाद् विश्वानरने वहन करनेवाले वायुके वाहन गेव दिशोरि पी
शततरुद्रसंहिता | # शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकब्य # ३११
ल्ड्ःाः:्अं>2>32अअंििज+ड+--------- णफ:फ: हसन व ्््स्च््स्च्च्िच्य्चचचचखिस्आ्च्खखआ्आखस्ट्ट्स्स्थ्स्स्च्स्स्स्स्स््+
पर वस्न-से वन गये अथौत् चारों ओर काली घटा उमड़ हुआ | फिर वे हाय | मैं मारा गया? यों कहकर छाती
आयी | वे घनघोर बादल उत्तम गन्धयाले पुष्पसमूहोंकी वर्षा पीटने छगे और पुत्रशोकसे व्याकुल होकर गहरी मूच्छकि
करने लगे | देवताओंकी दुन्दुमियाँ बजने छगीं | चारों ओर. वशीभूत हो गये | उघर अझुचि७ष्मती भी दुःखसे पीड़ित हो
दिल्यएँ निर्मल हो गयीं | प्रणणियोंक्रे मनोंके साथ-साथ सरिताओं- अलन्त ऊँचे खरसे हाह्मकार करती हुईं ढाढ़ मारकर रो पड़ी)
का जल निर्मल हो गया। प्राणियोंकी वाणी सर्वथा कल्याणी उसकी सारी इच्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुछ हो उठीं । तब पत्ली-
और प्रियमापिणी हो उठी । सम्पूर्ण प्रसिद्ध ऋषिसुनि तथा के आर्तनादको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छा त्यागर्कर उठ बेठे
देवता, यक्ष) क्रिंनर, विधाधर आदि मन्नल द्रव्य लेलेकर और “एऐं ! यह क्या है ! क्या हुआ ?? यों उच्चखरसे बोलते
पधारे | खयं ब्रह्माजीने नम्नतापूवक उसका जातकर्म-संस्कार ड्ुएए कहने छगे---“गहपति ! जो मेरा बाहर विचरनेवाला प्राण,
किया और उस ब|छकके रूप तथा वेदका विचार करके यह भेरी सारी इच्धियोंका खामी तथा मेरे अन्तरात्मामें निवास
निश्चय किया कि इसका नाम गहपति होना चाहिये | फिर करनेवाछा है, कहाँ है १? तब माता-पिताको इस प्रकार
ग्यारहवें दिन उन्होंने नामकर्मकी विधिके अनुसार वेदमन्त्रों- अत्यन्त शोकग्रस्त॒ देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न हुआ
का उच्चारण करते हुए उसका ध्ग्हपति? ऐसा नाम- वह बालक गशहपति मुसकराकर बोला |
करण किया । तलश्चात् सबके पितामह ब्रह्मा चारों चेदोंमें गृहपतिने कहा--माताजी तथा पिताजी ! बताइये, इस
कथित आश्वीर्वादात्मक मन््त्रेद्याय उसका अभिननन््दन स््तय आपलोगोंके रोनेका क्या कारण है ! किसलिये आपलोग
करके हंसपर आहूुद हो अपने छोकको चले गये । कूट-फूटकर रो रहे हैं ! कहाँसे ऐसा भय आपलोगोंको प्राह-
तदुपरान्त शंकर भी लोकिकी गतिका आश्रय ले उस बालककी हुआ है १ यदि मैं आपकी चरणरेणुओंसे अपने शरीरकी रक्षा
उचित रक्षाका विधान करके अपने वाहनपर चढ़कर अपने ढ&छर लूँ तो मुझपर काछ भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता;
धामको पधार गये | इसी प्रकार श्रीहरिने भी अपने छोककी फिर इस तुच्छ। चश्चल एवं अल्प बल्वाली मृत्युकी तो बात
णाइ ली | इस प्रकार सभी देवता, ऋषि-मुनि आदि भी प्रशंसा द्वी क्या है। माता-पिताजी ! अब आपलोग मेरी प्रतिज्ञा
करते हुए अपने-अपने स्थानकों पधार गये । तदनन्तर ब्राह्मण सुनिये---'यदि में आपलोग्रोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न
देवताने यथासमय सब संस्कार करते हुए बालकको वेदाध्ययत <रूँगा जिससे मृत्यु भी भयभीत हो जायगी । में सत्पुरुषोंको
कराया | तलखात् नरवों वर्ष आनेपर माता-पिताकी सेवामें कुछ दे डालनेवाले सर्वन्न मृत्युंजयकी भलीभोति
पैर रहनेदाले विश्वानर-नन्दन गहपतिको देखनेके लिये वहाँ आराधना करके महाकाछको भी जीत देगा---यद में आप-
गारदजी पधारे । बालकने माता-पितासहवित नारदजीको प्रणाम ठोस बिल्कुल सत्य कह रहा हूँ ।?
किया | फिर नारदजीने बालककी हस्तरेखा, जिहवा, ताल कि के
आदि देखकर कहा--प्रुनि विश्वानर ! मैं व॒म्हारे पुत्रके नन््दीश्वरजी कहते ईँ--सने ! तब वे द्विजदम्पृति
सणोंका वणन करता हूं; तुम आदरपूबक के उसे श्रवण करों । जो शोकसे संतप्त ह्टी रहे थे, ग्ृहपतिके एसे धवचन; जो अका[ल-
ठुम्दारा यह पुत्र परम भाग्यबान् है, इसके सम्पूर्ण अड्जीके में हुई अमृतकी घनघोर बृष्टिके तमान थे; सुनकर संतापरहित द्त
उ्वग शुभ हैं । किंतु इसके सर्वंगुणसम्धन्त) सम्पूर्ण शुभ- हो कहने छगे--'्वैंण ! तू उन शिवदी शरणमें जा, जो
गति समत्वित और चन्द्रमके समान समूर्ण निर्मेह द्रद्म आदिके भी कर्ता) मबत्राहन, अपनी मदेससे कभी च्युत
क् अआाझते ुशोमित दोनेपर भी विधाता ही इसकी रक्षा करें । न होनेवाले और विशदी रक्षामणि £ |?
अमलिय रब तरहके उपायोद्दार इस शिकश्ञकी रक्षा करनी
ः चाददेः क्योंकि विधाताके विपसेत होनेपर गुण भी दोप हो छाता. नत्दीशबरजी कदते हं--उने ! माता-पिताड़ी आशा
५ सुसे श्ग दे कि इसके बारहयें वर्षमें इसपर बिजली पाकर यहपतिने उनके चरण प्रणाम किया । फिर उनझी
$ «- रे
प्रा अचदारा विप्न आयेगा |? यो क हर नारदजा झुसत प्ररुक्षणा कएक अआ बहुत तरहत आश्थालन दे वे यहसे
अप के दंत हे देवलोक्री चछे गये | चल पड़े और उस काझीपुर्सध शा पहले, जो बद्या और
५ ५ परेड | गारदबीय कथन सुनकर पत्नीसहित नारायण आदे देवोकि लिये ( नी) दुष्प्राध्य, मशपख्यके संहापक्ष
च्छ
का
जिनसे पर उम्स लिया कि यद हे बड़ा भयंकर वन्भनपाव विदा करनेवाली आर विरशगद्ारा सुर थी दया जो
;
रा
ज्क
5
#
३१२
कण्ठप्रदेशम हारकी तरह पड़ी हुई गग्गात सुशोभित तथा विचित्र
गुणशालिनी हरपत्नी गिरिजासे विभूषित थी । वहाँ पहुंचकर
वे विध्रवर पहले मणिकर्णिकापर गये | यहाँ उन्होंने विधिए॑सक
स्नान करके भगवान विद्वनाथका दर्शन किया । फिर
बुद्धिमान गृहपतिने वरमानम्दगग्ग ही निलोबीक प्राणियीकी
प्राणरक्षा करनेवाले शिवकों प्रणाम क्रिया । उगा रामय उनको
अज्ञलि बी थी ओर सिर झुका हुआ था। थे बारबार उस
शिवलिड्की ओर देखबर हुदयमें हर्षित हो रह थे ( और कह
सोच रहे थे कि ) यह लिड़ निस््देह स्पशरूपसे आनन्दकन्द
दी दे | ( वे कहने लगे--) अदहे | आज मुझे जो सर्ध्यापी
श्रीमान् विश्वताथका दहन प्राप्त हुआ इसलिये इस चराचर
त्रिछोकीमें मुझसे बढ़कर धन्यवादका पात्र दूसरा कोई नहीं है |
जान पड़ता है; मेरा भाग्योदय दोनेसे दी उन दिनेमि महर्षि
नारदने आकर बेंसी बात कही थी, जिसके कारण आज में
कृतकृत्य हो रहा हूं ।
ननन््दीभ्वरज़ी कहते हँ--मुने | इस प्रकार आनन्दामृत-
रूपी रसोंद्रार पारण करके गृहपतिने शुभ दिनमें स्वंद्दितकारी
दिवलिडज्भकी स्थापना की और पविन्न गज्ञाजलसे भरे हुए.
एक सो आठ कलशोंद्ाए शिवजीको स्नान कराकर ऐसे
घोर नियमोंको खीकार किया, जो अक्ृतात्मा पुदषोंके लिये
दुष्कर थे | नारदजी ! इस प्रकार एकमात्र शिवमें मन
लगाकर तपस्या करते हुए महात्मा गहपतिकी आयुक्ा एक
वर्ष व्यतीत हो गया । तब जनन््मसे बारहवाँ वष आनेपर
मारदजीके कहे हुए; उस बचनको सत्य-सा करते हुए वज्रचारी
इन्द्र उनके निकट पधारे ओर बोले--विप्रवर ! मैं इन्द्र हूँ
ओर तुम्हारे शुभ भतसे प्रसन्त होकर आया हूँ । अब तुम
वर भाँगो) में तुम्हारी मनोबाड्छा पूर्ण कर दूँगा )
तब गशहपतिने कह--मधवन् ! मैं जानता हूँ, आप
वद्भधारी इन्द्र हैं; परंतु चृन्नशत्रो |! मैं आपसे बर याचना
करना नहीं चाहता, मेरे वरदायक तो शंकरजी ही होंगे |
इन्द्र बोले--शिशो ! शंकर मुझसे भिन्न थोड़े ही हैं ।
अरे ! में देवराज हूँ; अतः तुम अपनी मूर्खताका परित्याग
करके वर माँग छो, देर मत करो |
03. 3३.
गुहपातन कहा--पाकशासन | आप अहृल्याका सतीत्य
४ नमो रद्राय शान्ताय त्रह्मण परमात्मने ४:
| संक्षि्तशिवपुणण॥
स्स्स्स्च्स्््स्स्ल्््स्स्स्््स्थ्स्स््ख्स्च्च्स्स्न्य्च्स्स्च्ल्स्च््थ्स्च्प्स्ण्म्स्थ्य्प्म्य्य्प्प्फ्फ्ल्ज्सय्
नंद्र करनेयाले दुराचारों पयतआन्रु ही है ने | भा बचे
कयोकि में सगुवतिक अतिरिक्त किसी अन्य देवके साम्े हो-
झ्पते प्राथना करना नहीं चाहता ।
नम्दीश्वरजी कहते है--मुने ! गृहपतिके उस बने
गुगनकर इंद्के नेत्र आचसे छा हो गये । वे आने अंग
बजकी उठाकर उस बॉठ्कक्ों इराने-चमकाने ठो | क्ष
बिजलीकी ज्यालाओंत व्याप्त उस वच्नकों देखकर बन
गहपतियी नाएदजीके वाक्य स्मरण हो आये । रि ते वे झे
से ब्याकुल होकर मूच्छित दो गये। तदनत्तर आवास
को दूर भगनेताले गीरीपति झगम्सु बढ०ँ प्रकट हो गये थे
अपने दस्तलशसे उसे जीवनदान देते हुए-से वोढे--बह
उठ) उठ । तेत कब्याण दो |? तब राजिके मद दे हु
कमलकी तरह उसके नेत्रकमछ खुल गये और उसने उठ
अपने सामने सैकड्ठों सर्येत्ति भी अधिक प्रकाशमात इसे
उपस्यित देखा | उनके ललाटमे तीसरा नेत्र चमक ख $
गेम नीछा चिए था; स्वजापर दृषभका खल़प दीत सर
वबामाझमें गिरिज्ादेत्ी विराजमान थीं। मेसक्रार च्/
हुझोमित था। बड़ी-बड़ी जटओंसे उनकी अड्ु् गे ६
रही थी। वे अपने आयुध त्रियूछ और आजग पु! पे
किये हुए. ये। कर्पूरके समान गोखर्णकरा शरीर अपनी ॥४
बिखेर रहा या) वें गज-चर्म छोटे हुए ये ।उ्देँ देह
शासत्रकथित छक्षणों तथा गुरु-बचनोंसे जब गहोंति ४
लिया कि ये महादेव ही हैं; तब हर्षक्ने मारे उतके ५
आँसू छलक आये, गला ईैँध गया और शरीर रोमाकि!
उठा । वे क्षणमरतक अपने-आपको भूलकर चिनईट कं
त्रिपुन्नक पर्बतकी भाँति निशचल खड़े रह गये | जे बे
करने, नमस्कार करने अथवा कुछ भी कूहनेमे ता
हो सके, तब शिवजी मुसकराकर बोले | +
ईश्वरने कहा--खहपते ! जान पढ़ता के 4 ५ क्
इन्द्रसे डर गये हो | बत्स [ तुम भयभीत मंत हेओं
मेरे सक्तपर इन्द्र और वज्धकी कौन कहें) वमणर्ज . हे ह
प्रभाव नहीं डाछ सकते । यह तो मैंने तग्दारी परीक्ष
और मैंने ही तुम्हे इन्द्रढ्म घारण करके डर है न
अब में तुम्हें वर देता 'हूँ---आजसे तुम अमित
[
पकड़ जात. पता." लमकिमन्प७ >न्यन्यड,
वतारों का के ०३०
शतरुद्रसंहिता ] # शिवजीके महाकाल आदि द्स अबतारोंका तथा ग्यारह रुद्व-अववारोका वर्णन # हेरै३
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तीओगे | तुम समस्त देवताओंके लिये वरदाता बनोगे ।
भग्ने | तुम समस्त प्राणियोंके अंदर जठराग्निर्पसे विचरण
फरोगे | तुम्हें दिक्पालरूपसे धर्मगज और इन्द्रके मध्यमें
एज्यकी प्राप्ति होगी । तुम्दारेद्वारा स्थापित यह शिवलिड्र तुम्हारे
गमपर धअग्नीश्वर? नामसे प्रसिद्ध होगा | यह सब प्रकारके
पैजोंकी वृद्धि करनेवाला दोगा। जो लोग इस अग्नीश्वर लिड्डके
भक्त हंगे, उन्हें बिजली ओर अग्निका मय नहीं रह जायगां) अग्नि-
मान्य नामक रोग नहीं होगा और न कभी उनकी अकाल्ूमृत्यु ही
शेगी । ऋशीपुरीमें स्थित समूर्ण समृद्धियोंके प्रदाता अग्नीश्वरकी
भलीभोति अर्चना करनेवाला भक्त यदि प्रारब्धवश किसी अन्य
8 ७ नजननननननननननननननननननननमनलनन 5 भक ्श्व्खश्ध वचन ख खश्वश्वशखजखजिशल् व ख्््््य््ख्ख्ख्थ्थचचचखिच्िचच्म्य्चस्सस्स्िय 4५-म्पााक- फिल्म. आकार.
स्थानमें भी मृत्युको प्राप्त होगा तो भी वह वहिलोकमें
प्रतिष्ठित होगा ।
नन््दीजवरजी कहते हँ--मु॒ने | यों कहकर शिवजीने
गहपतिके बन्धुओंको बुलाकर उनके माता-पिताके सामने उस
अग्निका दिकृपति पदपर अभिषेक कर दिया ओर स्वयं उसी
लिड्ल्में समा गये | तात ! इस प्रकार मेने तुमसे परमात्मा
शंकरके ग्रहपति नामक अग्न्यववारका, जो दुष्ठोंको पीड़ित
करनेवाला है; वर्णन कर दिया । जो सुदृढ़ पराक्रमी जितेद्धिय
पुरुष अथवा सत््वसम्पन्न स्नियाँ अग्निप्रवेश कर जाती हैं, वे
सब-के-सब अग्निसरीखे तेजस्वी होते हैं| इसी प्रकार जो ब्राह्मण
अग्निहोत्रपरायण) ब्रह्मचारी तथा पश्चामिका सेवन करनेवाले
हैं, वे अभिके समान वर्च॑स्वी होकर अग्निलोकमें विचरते हैं ।
जो शीतकालमे शीत-निवारणके निमित्त बोझ-की-बोझ लकड़ियाँ
दान करता है अथवा जो अम्िकी इष्टि करता है, वह अभिके
सेनिकट निवास करता है । जो श्रद्धापूवषंक किसी अनाथ
मृतकका अमिसंत्कार कर देता है; अथवा स्वयं शक्ति न
दोनेपर दूसरेको प्रेरित करता है; वह अभम्निल्लोकमें प्रशंसित
होता है । द्विजातियोंके लिये परम कल्याणकारक एक अग्नि
ही है | वही निश्चितरूपसे गुरु) देवता, ब्रत, तीर्थ अर्थात्
सब कुछ है | जितनी अपावन वस्तुएँ हैं, वे सब अग्निका
धसर्ग होनेसे उसी क्षण पावन हो जाती हैं; इसीलिये अग्निको
पावक कहा जाता है । यह शम्मुको प्रत्यक्ष तेजोमयी दहना-
त्मिका मूर्ति है; जो सृष्टि रचनेवाली, पालन करनेबाली और
संह्दर करनेवाली है । भरा, इसके ब्रिना कौन-सी वस्तु
दृष्टिगोचर हो सकती है | इनके द्वारा मक्षण किये हुए, धूप,
दीप, नेबेय, दूध, दह्दी) घी ओर खाँड़ आदिका देवगण
खगगम सेवन करते हूँ । ( अध्याय १४-१५ )
शिला १३ ७ “६०३ "४०.3
शिवजीके महाकाल अ [दि द्स अवतारोंका तथा ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन
. तद्नन्तर यप्षेश्वरावतारकी बात कद्दकर नन््दीश्वर-
ने कहा--मुने ! अब शंकरजीके उपासनाकाण्डद्वारा सेवित
भशफाल आदि दस अवतारोंका वर्णन भक्तिपूवक श्रवण
5 | उनमें पट्छा अवतार “महाकाल? नामसे प्रसिद्ध हैः
[) सल्युरुषकी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाद्य है । उस
८ रो शक्ति भक्तोंको मनोबाब्छा पूर्ण करनेबाली महा-
3 हें । दूसरा ध्तारः नामक अवतार हुआ जिसकी
' एक तारदेदी हुईं । वे दोनों भुक्तिसक्तिके प्रदाता तथा
“अपने सेपकफे लिये तुसदायक है | प्याल भुक््नेशः नामसे
] ्
रे
१६ पु० अम> ३४०---
तीसरा अवतार हुआ । उसमें वाढ्य भुवनेशी शिया शक्ति
हुईं, जो सजनोंकी सुख देनेवाली हैं | चोथा भक्तोंके लिये
सुखद तथा भोग-मोक्ष प्रदायक प्योदश श्रीविशेद्य! नामक
अवतार हुआ ओर पोडश्ी-ओ्रीविद्या शिवा उसनी दाक्ति
हुई | पाँच अवतार भ्मेर्रर मामसे प्रसिद्ध हुआ, जो
सबंदा मक्तोड़ी कामनाओंको पृर्थ करनेबाटा ३। इस अबतार-
की शक्तिका नाम दे भेर्ी गिरिजा) जो अपने उपास्ोद्धी
अभीछधदायिनी हैं | छठा
नामसे कहा जाता ५ ओर भमजझानप्रदा गेरडदझा माप
शियादतार धंश्ठम्रमलऊ!
३१४ # गमा रद्भाय शान्ताय त्रह्मण परमात्मन # [ संश्षितत-शिवुणा]
हट दर के कलम कक पल हल असल अमर पट दर डक लक नल मकर दस नव पद के कल न लक हल नमन कल कम जल अ नम समन मद कक नकद
छिन्नमसता हे | सामूर्ण मगोरोक्रि दाता झग्शुका सात
अवतार '्घूमवान! नामसे विख्यात हुआ | उस अपतारई/
श्रेष्ठ उपापकीकी छालसा पूर्ण करनेवाढी शिवा धूमानत्ी
हुईं | शिवजीका आठवों सुलदागक अवतार धगणाएुलः दे
उसकी शक्ति महान आनसददायिनी चगठागुती नामसे विए्यात
हुई । नो शिवायतार ध्मात॥? नागरों कद्ठा जाता ३ । उस
समय सम्यूणे अभिलामाओकी पूर्ण करनेंयाली झवांणी माती
हुई । शम्मुके मुक्ति-मुक्तित्त फल प्रदान करनेवाले दसमें
अवतारका नाम प्कमलछ? ह्ै। जिसमे अपे भक्तोंका स्वथा
पालन करनेबाली गिरिजा कमला कदलायी | ये ही धिसओआंफे
दस अबतार हैं| ये सब-के-सब भक्तों तथा सत्पुदुषोकि लिये
सुखदायक तथा भोग-मोक्षके प्रदाता हैँ । जो लोग महात्मा
शंकरके इन दसों अबतारोकी नितिकारभावते तेवा करते हैँ, उन्ें
ये नित्य नाना प्रकारके सुल्व देते रहते ६ | मुने | इस प्रकार
मैंने दर्सा अबतारोंका माद्दात्मम वर्णन कर दिया | तन्न्रशास्तरमें
तो यह सर्वकाम्रप्रद बतछाया गया है | मुने ! इन शक्तियों
की भी अद्भुत महिमा दे | तन््त्र आदि शाख्रमं इस मदिमा-
का सर्वकामप्रदरूपसे वर्णन किया गया है। ये नित्य
दुश्ेंफों दण्ड देनेवाली ओर ब्रह्मतेजजी विशेष
रूपसे चृद्धि करनेवाली हैं | ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे
महेश्वरके महाकारू आदि दस शुभ अवतारोंका शक्तिसहित
वर्णन कर दिया । जो मनुष्य समस्त शिव-प्वोक्े अवृसरपर
इस परम पावन कथाका भक्तिपूवंक पाठ करता है; वह
शिवजीका परम प्यारा हो जाता है | ( इस आख्यानका पाठ
करनेसे ) ब्राह्मणके ब्रह्मतेजकी वृद्धि होती है, क्षत्रिय विजय-
लाभ करता है; वेश्य धनपति हो जाता है और झूद्रको सुल्ल-
की प्राप्ति होती है | खघर्मपरायण शिवभक्तोंको यह चरित
सुननेसे सुख प्रात्त होता है ओर उनकी शिवभक्ति विशेषरूपसे
बढ़ जाती है ।
मुने | अब में शंकरजीके एकादरा श्रेष्ठ अवतारोंका
वर्णन करता हूँ, सुनो । उन्हें श्रवण करनेसे असत्यादिजनित
बाधा पीड़ा नहीं पहुँचा सकती । पूर्वकालकी वात है, एक
बार इन्द्र आदि समस्त देवता देत्योंसि पराजित हो गये ।
तब वे भयभीत हो अपनी पुरी अमरावतीको छोड़कर भाग
खड़े हुए; । यों देत्योंद्वारा अत्यन्त पीडित हुए. वे सभी देवता
कश्यपंजीके पास गये । वहाँ उन्होंने परम व्याकुल्तापूर्बक
. दाथ जोड़ एवं मस्तक झुकाकर उनके चरणोंमें अभिवादन
किया और उनका भलीमौति स्तवन करके आदरपूर्वक अपने
अआनिका कारण प्रकट किया तथा द॑स्यंद्रार परराक्नि हे
उसने हुए आने सार हुःखोकी कह सुतावा | तह | क्ष
उनके पिता कश्याजी देवताओंकी उस कट्यद्धनग्ने सक्त
अधिक हुसी नहीं हुए; सयोंकि उनकी बुद्धि सिवर्म भस
थी | मुने | उन शान्तब॒द्धि मुनिने बेये थारण करे देर
की आश्वासन दिया ओर ल्वय॑ परम हफपूक विक्षाणर
काशीकी चल पढ़े | वर्श पर्ुुंचकर उद्दधनि गद्ाके इसे
सामने करके आना सित्य-मिंयम पूर किया ओर हि बह
पूरक उमासदित सर्वक्षर भगवान् विश्वनाथकी मलमविवक
की। तदनन्तर गम्भुदशानके उससे एक खिलिक्ल
सापना करके ये देवताओंके द्विताय॑ परम प्रसक्नताफ़् शे
तेय करने लगे। मुने | शित्रत्नीके जरणकमलम अत
मनवाछे पेयशाठी मुनिवर कदयपक्ों जब यों तप ऋले हु
बहुत अधिक समय व्यतीत दो गया। तब सतल्ुक्ष्रि ए
खहूप दीनबन्धु भगवान शंकर अपने चरणोंमें तहीन मकर
कश्यप क्षपिकों वर देनेके लिये वढ्ोँ प्रकट हुए । मे
मसेखर परम प्रसन्न तो ये दी) अतः वे अपे भक्त हर
कश्यपसे बोले--भबर माँगो |)? उन महेशवस्तो देखे ६
प्रसन्न बुद्धिवाछे देवताओंके पिता ऋश्यपजी दमन रे पे
और द्वाथ जोड़कर उनके चरणोंमें नमस्कार इक है
करते हुए, यों बोले---“मददेववर ! मैं उर्वया आता शा
हूँ । ख्वामित ! देवताओंके दुःखका विनाश अं रे
अभिलापा पूर्ण कीजिये । देवेश ! में पुत्र दुःतते कि
दुखी हूँ; अतः ईश ! मुझे सुखी कौनिके के
देवताओंके सहायक हैं | नाथ ! महाबली देलोंन है
और यक्षोंकों पराजित कर दिया है। इसलिये शम्भो | *
मेरे पुत्रल्पसे प्रकट होकर देवताओंके हिये आदर
बनिये ।?
नन््दीरवरजी कहते हँ-मने ! कश्यप
कहनेपर सर्वेश्षर भगवान् शंकर उनसे लक
होगा? यों कहकर उनके सामने ही वर्ीं ५,
तब कश्यप भी आननन््दके गत द्दी आने €/
तब कश्यप भी महान् के साथ तुर ही
को लौट गये । वहाँ उन्होंने वह साणा वतन
देवताओंसे कह सुनाया । तदनन्तर भगवान् री
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वचन सत्य करनेके लिये कश्यपद्वारा सरमीर व
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रूप घारण करके प्रकट हुए | उस 7 बे हा
उत्सव मनाया गया । सारा जगत् शिवमय
पं
सभी ते
कश्यपसुनिके. साथ-साथ
छू
शतरुद्गसंहिता ]
दो गये | उनके नाम रक्खे गये--कपाछी, पिड्चल;
भीम) विल्पाक्ष) विलोहित, शास्ताः अजपाद; अहिबुध्न्य
शम्भु, चण्ड तथा भव | ये ग्यारहों रुद्र सुरभीके पुत्र कहलाते
हैं। ये सुखके आवासस्थान हैं तथा देवताओंकी कार्यसिद्धिके
लिये शिवरूपसे उत्मन्न हुए. । ये कश्यपनन्दन वीखर रुद्र
महान् बलयराक्रमसम्नन्न ये; इन्होंने संग्राममें देवताओंकी
सहायता करके देत्योंका संहार कर डाला । इन्हीं रुद्रोंकी
कंपसे इन्द्र आदि देवगण देत्योंको जीतकर निर्भय हो गये ।
# शिवजीके 'दुवोॉसावतार! तथा 'हनुमद्वतार'का वर्णन #
ल्कक +++ के
३२९७५
उनका मन खत्य हो गया ओर वे अपना-अपना राज्य-का्ये
संभालने छगे | अब भी शिव-सखरूपघारी वे सभी महारुद्र
देवताओंकी रक्षाके लिये सदा खमगमें विराजमान रहते हैं ।
तात | इस प्रकार मेने तुमसे शंकरजीके ग्यारह रुद्र-
अवतारोंका वर्णन कर दिया | ये सभी समस्त लेकोंके लिये
सुखदायक हैं । यह निर्मेछ आख्यान सम्पूणे पापोंका विनाशक,
घन) यश ओर आयुका प्रदाता तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको
पूर्ण करनेवाल्ा है। ( अध्याय १६-१८ )
++->_ बा 24+क<:६:52:- 4०
शिवजीके “दुवोसावतार' तथा 'हनुमदव॒तार'का वर्णन
नन््दीश्वरजी कहते हँ--महामुने ! अब ठुम शम्भुके
एक दूसरे चरितको, जिसमें शंकरजी ध्मके लिये दुर्वासा होकर
प्रक हुए थे, प्रेमपू्वेक श्रवण करो । अनसूयाके पति
ब्रद्ववेत्ता तपस्वी अत्रिने ब्रह्माजीके निर्देशानुसार पत्नीसहित
ऋशक्षकुल परवेतपर जाकर पुत्रकामनासे घोर तप किया ।
उनके तपसे प्रसन्न होकर बक्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों
उनके आश्रमपर गये | उन्होंने कह्दा कि “हम तीनों संसारके
इंपपर हैं | हमारे अंशसे तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकीमें
विख्यात तथा माता-पिताका यश बढ़ानेवाले होंगे ।? यों कह-
फर वे चले गये । ब्रक्षाजीके अंशसे चन्द्रमा हुए, जो
देवताओंके समुद्रमें डाले जानेपर समुद्रसे प्रकट हुए. थे ।
वि्णुके अंश्से श्रेष्ठ संन््यास-पद्धतिको प्रचलित करनेवाले
'दत्तः उत्न्न हुए और रुद्रके अंशसे मुनिवर दुर्वासाने
जन्म लिया ।
इन दुर्वातने महाराज अम्बरीपकी परीक्षा की थी। जब
सुदर्शनचक्रने इनका पीछा किया; तब शिवजीके आदेशसे
अम्बरीपक़े द्वारा प्राथंना करनेपर चक्र शान्त हुआ | इन्होंने
“शयराय् रामकी परीक्षा की | कालने मुनिका वेष धारण करके
क् जोणमके साथ यह शर्त की थी कि कोरे साथ बात करते तमय
शेरमके पास कोई ने आये; दो आयेगा, उसका निर्वासन कर
. दिए आगगा ।! दुर्वासाजीने हठ करके रष्मणको भेजा) तव ओीराम-
. | रत रप्सयता त्याग कर दिया। इन्दोंने मगवन भीकृष्णओं
सेल सी और उनसझे श्रीरक्िगणीसदित रघमें जेता । इस
क१ 5 ०» व्कल नाक. ७ 2 >> « भू सट्टा 7
४ पुराला मनन आने विद्चिप्त चरित्र किये |
मुने ! अब इसके वाद तुम हनुमानजीका चरित्र श्रवण
करो । हनुमद्पसे शिवजीने बड़ी उत्तम डलीलाएँ की हैं ।
विप्रवर ! इसी रूपसे महेश्वरने भुगवान् रामका परम द्वित
किया था | वह सारा चरित सब प्रकारके सुखोंका दाता है, उसे
तुम प्रेमपूष्रेंक सुनो | एक समयकी बात है; जब अत्यन्त अद्भुत
लीला करनेवाले गुणशाली भगवान् झम्झुको विष्णुके मोहिनी-
रूपका दशन प्राप्त हुआ) तब वे कामदेवक्रे बार्णेसि आइत
हुएकी तरह क्षुर्व हो उठे | उस समय उन परमेश्वरने राम-
कार्यकी सिद्धिके लिये अपना बीयंपात किया | तब सप्तर्पियोनि
उस वीयको पत्रपुटकरमें स्थापित कर लिया; क्योंकि शिवजीने
ही रामकार्यके लिये आदरपूर्वक उनके मनमें प्रेरणा की थी |
तत्यश्रात् उन मदहफियोंने श्ाम्भुके उस बीयकों रामकार्यकी
सिद्धिके लिये गोतमकन्या अज्जनीमें कानके रास्ते स्थापित कर
दिया | तव समय आमनेपर उस गर्भसे शम्मु महान बल-परा-
क्मसमन्न वानर-शरीर घारण करके उलन्न हुए, उनका नाम
हनूमान् रक्खा गया । मदबली कपीश्वर दनूमान् जब शिशु दी
ये, उसी समय उदय होते हुए सूर्यविम्रकों छोटा-सा फल
समझकर तुरंत ही निगल गये | जब देवताओने उनदी प्रार्थना
दी, तब उन्होंने उसे महावटी सूर्य ज्ञानफर टगल दिया | तब
देवापिदोने उन्हें शिवक्रा अपतार सादा ओर बहुत वरदान
दिया | तदनन्तर इबमान अऋापनत हंपित दाफर आरनी साताऊे
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पास गये आर उन्हाते सद पट
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रनाया | ६5५९, ४६०५) 3 ५] 7 पर [९ ६.+% 2५7: १३९2० ३ |)
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अत कड़े ७० फल ज-ननननअम ->>-ा भी 7 «७.» मन जब रकमसीकज मे अदल श कब
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कलामवांरलात लि कक 5 एक हब या तल न्ी का तल लीड जज डी डी जीव ड जी जीत जी जी धनी तधीज औजीच> री सर र
पड )2 2000, ४५ हे रुआाशरों उसन्न हुए मुम्रावर्क पाग चले गये | इगके प्ि
8 आज 02०30 तार भी अनुशा मिल चुकी थी।
४! ह _
तदनन्तर नन्दीश्वर्ने भगवान् रामऋआ-समूत्र बस खत
नर्णन करके कंद्घा--मुने ! इस प्रकार कील लगते लत
तहते आीशमका कार्य पूरा किया; नाता प्रकाज़ो लीगाएं बं।
अमुरोंका मान-मर्दन क्रिया) भूतहपर राममत्तिडी खा
और त्वय॑ भक्ताम्गप्य होकर सीता-रामको सुख प्रदाव जिए।
॥|
है े ये उद्धावतार ऐलयशाली इनमान् लक्ष्मगके प्रागदातः उमर
है देवताओंके गर्वद्ारी ओर भक्तोका उद्धार करनेवाले हैं| मे
आप ् वीर हयूमान् गंदा रामकार्यम तर रहनेवाठे। ठोझग एम
शक पा ऐ |... नाम विख्यात) देत्योकि संदारक और भकतवलल रत!
5३2 8 शो को । ; इस प्रकार ग्ने इनूमानजीका 22 चरित--जे घक वीवि
है मा जि आयुका वलेक तथा शण अभीष्ट फर्डोका दीतों
श बर्णन कर दिया | जो मनुष्य इस चरितकी भत्ति(वक का
हि के >प है अशया समादित लिक्तम्े दूसरेकी मुनाता है, वह इस हो
ग सम्यूर्ण भोगोंफी भोगकर अन्तमें परम मोहकों था #
लीं | तदनन्तर रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष ददमान् सूर्यत्षी आशा
लेता दे । ( अथाव ९५४९ )
-...क्फेलससककसए
शिवजीके पिप्पलाद-अबतारके ग्रसज्ञम देवताओंकी दर्धीचि मनिसे अखि-याचना, दधीविका
शरीरत्याग, वज-निर्माण तथा उसके द्वारा इत्रासुरका वध, सुबचोका देवताओंकी
शाप, पिप्पलादका जन्म और उनका विस्तृत वृत्तान्त
तद्ननतर महेशावतार तथा दृषेशाचतारका
चरित सुनाकर नन्दीश्वरने कहा--महाबुद्धिमान्
सनत्कुमारजी ! अब तुम्त अल्यन्त आह्ादपूर्वक महेश्वरके
“पिष्पलाद? नामक परमोत्कृष्ट अवतारका वणेन श्रवण करो | यह
उत्तम आख्यान भक्तिकी वृद्धि करनेवाल्ा है । मुनीश्वर !
एक समय देत्येंने बचासुरकी सहायतासे इन्द्र आदि समस्त
देवताओंक्री पराजित कर दिया । तब उन सभी देवताओं-
ने सहसा दीचिके आश्रममें अपने-अपने अल्लोंको फेंककर
तत्काल ही हार मान ली । तसश्चात् मारे जाते हुए वे इन्द्र-
बलसे समथन्न तथा समस्त देत्योंका अधिपति है | आह
ऐसा प्रयत्न करो जिससे इसका वध हो पके | बुदि
देवराज ! में धर्मके कारण इस विषय एके उपाय हक
हूँ; सुनो । जो दधीचि नामबाले महामुनि है? व तप |
जितेन्द्रिय हैं । उन्होंने पूर्वकालमें शिवजीकी समारार्त ।
वज़-सरीखी अखियाँ हो जानेका वर गीत क्रिया का
तुमछोग उनसे उनकी हड्डियोंके लिये याचिन करो | ३2 है
दे देंगे | फिर उन अख्थियोंसे वश्रदण्डक तिर्मोण की
निश्चय ही उससे इनासुरको मार डालनों ?
_>ान्यायालांकी
सहित सम्पूर्ण देवता तथा देवधि शीघ्र ही ब्रह्मलोकर्मे जा पहुँचे नन््दीभ्वरजी कहते हैं-सनें * व्रह्माका हक
और बहढँ ( ब्रह्माजीसे ) उन्होंने अपना वह दुखड़ा कह सुनाया । सुनकर इन्द्र देवगुर बृहस्पति तथा देवताओंकी था
देवताओँका वह कथन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मनें सारा रहस्य
यथार्थरूपसे प्रक: कर दिया कि प्यह सब त्वश्ाकी करवूत है?
ही दधीचि ऋषिके उत्तम आशभ्रमपर पर 2
सुवर्चौसहित दधीचि मुनिका दशन किया और आदर
ल्वष्ठने कि पका करनेके जैक ४0)
हल दी तुमलोगोंका वध करनेके लिये तपस्याद्वारा इस महा- जोड़कर उन्हें नमस्कार किया) फिर कल
४ +»< ) इच्ातुस्की उसन्न किया है । यह देत्य महान आत्म- अन्य देवताओंने भी य्नतापूरवेक उन्हें लिए इक |
सा
/ शतरुद्रसंहिता ) # शिवजीके पिप्पलाद-अवतारके प्रसझमें देवताओंकी दधीचि मुनिसे अस्थि-याचना ६ २३१७
[मुनि विद्वानमं श्रेष्ठ तो ये ही, वे तुरंत ही उनके अभिप्रायको
(ताइ गये । तब उन्होंने अपनी पत्नी सुबर्चाको अपने आश्रमसे
_अन्यत्र भेज दिया | तत्श्रात् देवताओंसहित देवराज इन्द्र)
जो खार्थ-साधनमें बड़े दक्ष हैं; अर्थशास्रका आश्रय लेकर
_मुनिबरसे बोले ।
_:.. इदद्ने कहा---“मुने ! आप महान् शिवभक्त, दाता तथा
।
रिणागतरक्षक हैं। इसीलिये हम सभी देवता तथा देवषि
५-चशद्वारा अपमानित होनेके कारण आपकी शरणमें आये
(ईमिवर ! आप अपनी वज्ञमयी अस्थियाँ हमें प्रदान कीजिये;
3 योकि आपकी हड्डीसे वद्धका निर्माण करके में उस देवद्रोहीका
हि करूँगा |? इन्द्रके यों कहनेपर परोपकारपरायण दधीचि
निने अपने स्वाम्ती शिवका ध्यान करके अपना शरीर छोड़
४ या। उनके समस्त बन्धन नष्ट हो चुके थे, अतः वे तुरंत
#" ब्रह्यलोककी चले गये | उस समय वहाँ पुष्पोंकी वर्षा होने
की ओर सभी लोग आश्रयचकित हो गये | तदनन्तर इन्द्रने
'प ही सुरभि गोको श्रुद्मकर उस शरीरको चटबाया और उन
इयेसि अज्न निर्माण करनेके लिये विश्वकर्माको आदेश दिया |
/ रन््द्रकी आश पाकर विश्वकर्मने शिवजीके तेजसे सुददढ़
| मुनिकी वज्जमयी इृड्डियेसि सम्पूर्ण अल्लोंकी कब्पना की |
है रीढ़की हड्डीसे वच्न ओर ब्रह्मशिर नामक वाण बनाया
!॥ अन्य अखियंसि अन्यान्य बहत-से अख्चोंका निर्माण किया ।
4 शिवजीके तेजसे उत्कर्षको प्राप्त हुए इन्द्रने उस बज्को
२ क्रोघपूर्वक चृच्रासुरपर आक्रमण किया, ठीक उसी तरह
रुंद्रने यमंगजपर धावा किया था | फिर तो कवच आदिसे
है है >> हा ााई
प्नद्वास उन्रासुरक पैवंतशिखर-सरीखे सिरकी काठ गिराया )
+ उस समय खगवासियेंनि महान् विजयोत्सव मनाया)
पर पुष्पांकी वृष्टि होने लगी ओर सभी देवता उनकी स्त॒ति
- लूग। तदनन्तर महान् आत्मवलसे सम्पन्न दवीचि मुनिकी
जि पत्मी सुदर्चो पतिके आशानुसार अपने आश्रमके भीतर
/॥ ॥् देयताआंके लिये पतिको मरा हुआ जानकर यह
/:0)) शाप देते हुए बोली ।
' खुबसाने फहा--०अटरो | इच्धसहित ये सभी देवता
(६ ६ <रर अरया वार्य सिद्ध करनेमें निषुण) मूर्ख तथा
कह रनदेगे ये सम-फेसव आइसे मेरे शापत्त पशु द्दो
#॥ इस प्रार उस तरस्विनी मुतिदत्नी सवचाने उमर ड्म्द्र
मा जला खर दे दिया | दसखातू उस पति-
| उपत्ने जुनेश विचार झिएा | छिर तो मनस्दिमी
ज््््््च्ल्ल्टख्ल्लच्लयस्लस2ल्ल्ल््ल्लल्ख्ल््य्य्ययश््खश्ख्यश्शख्य्य्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्यय्य्थ्स्सखस्लाण
ति सुरक्षित हुए इन्द्रने तुरत ही पराक्रम प्रकट करके.
सुवर्चाने परम पविन्न छकड्ियोंद्वारा एक चिता तैयार की |
उसी समय शंकरजीकी प्रेरणासे सुखदायिनी आकाशवाणी हुई
वह उस मुनिपत्नी सुकचोको आश्वासन देती हुईं बोली )
आकाशबाणीने कहा--झञजे ! ऐसा साहस मत करो;
मेरी उत्तम बात सुनो | देवि । तुम्हारे उदरमें मुनिका तेज
वर्तमान है; तुम उसे यक्नपूवक उत्पन्न करो । पोछे तुम्हारी
जेसी इच्छा हो, बेंसा करना; क्योंकि शास्रका ऐसा आदेश
है कि गर्भवतीको अपना शरीर नहीं जलाना चाहिये अर्थात्
सती नहीं होना चाहिये ।
नन््दीश्वरजी कहते हैं--मुनीश्वर | यों कहकर वह
आकाशवाणी उपराम हो गयी । उसे सुनकर वह मुनिपत्नी
क्षणभरके लिये विस्मयर्म पड़ गयी । परंठु उस सती-साध्वी
सुवचोंकी तो पतिछोककी प्राप्ति ही अभीष्ठ थी, अतः उसने
बैठकर पत्थरसे अपने उदरको विदी्ण कर डाछा | तब उसके
पेट्से मुनिवर दधीचिका वह गभे बाहर निकेछ आया। उसका
शरीर परम दिव्य और प्रकाशमान था तथा वह अपनी प्रभासे
दर्सा दिशाओंकी उद्धासित कर रह्य था। तात ! दधीचिके
उत्तम तेजसे प्रादुर्भृत हुआ वह गर्म अपनी छीछा करनेमें
समर्थ साक्षात् रुद्रक अबतार था। मुनिप्रिया सुबचनि
दिव्यस्वरूपधारी अपने उस पुन्नकी देखकर मन-हीं-मन समझ
लिया कि यह रुद्रका अवतार है| फिर तो वह महा|साध्यी
परमानन्दमम हो गयी और श्ीत्र ही उसे नमस्कार करके उसकी
स्ुति करने लगी। मुनीश्चर ! उसने उस ख्रूपकी अपने
हृदयम घारण कर लिया ) तदनन्तर पतित्रोककी कामनावाली
विमलेशक्षणा माता सुवर्चा मुसकराकर अपने उस पुन्नसे परम
स्नेहपूर्वक बोली |.
खुबचाने कहा--ताव परमेशान ! ठुम इस अश्वत्य
वृक्षके निकट चिरकालतक खित रहो | महाभाग ! तम समस्त
प्राणियोँक्कि छिये मुखदाता हाओ और अब मझे प्रेमर्बक पति
लाकमें जानेके लिये आशा दा। वहाँ पतिके साथ रहती हुई
मे रद्रसूयधारी तुम्दारा ध्यान करती रदेंगी।
नन््दीश्वरज्ञी कहते ह--हुने ! राध्यी सुव्ेनि अपने
पुत्रसे यो कटकर परम समाधिद्वारा पतिका ही अतुगदस किया |
सानयर ! इस प्रदार द्धा।चरढटा सुंबधां शिवा टर्म प्रटे+ 4२
अपने पततेसे जा मिली ओर आनखपएवढ दाफरजीरों हपा ररने
लगी । वात ! इतमेने ही हुपने भर हुए इल्टसरित समस्त
2008, जाम 4 ७ मै आन
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तरुद्रसंहिता |
४ शिवजीके पिप्पछाद-अवतारके प्रसह्ूरम देवताओंकी दधीचि मुनिसे अस्थि-यायना # ३९७
ख्च्््््कब्य््य्ल्ख्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्लच्य्य्य्य्य््य्च््य्य्य्य््यय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्स्स्ञा
ते विद्वानोमें श्रेष्ठ तो ये ही; वे तुरंत दी उनके अभिप्रायकी
ढु गये । तब उन्होंने अपनी पत्नी सुवर्चाको अपने आश्रमसे
न्यत्र भेज दिया । तलुश्वात् देवताओंसहिंत देवराज इन्द्र
| खार्थ-साधनमें बड़े दक्ष हैं, अथैशासत्रका आश्रय लेकर
निवरसे बोले । ेु
इन्द्रने कह[--“मुने | आप महान् शिवभक्त) दाता तथा
रणागतरक्षक हैं। इसीलिये हम सभी देवता तथा देवर्ि
पशद्वा। अपमानित होनेके कारण आपकी शरणमें आये हैं ।
पप्रवर | आप अपनी वच्रमयी अखियों हमें प्रदान कीजिये;
थोंकि आपकी हड्डीसे वज्ञका निर्माण करके मैं उस देवद्रोह्दीका
धर करूँगा | इन्द्रके यों कहनेपर परोपकारपरायण दधीचि
निने अपने खवामी शिवका ध्यान करके अपना शरीर छोड़
'औआ। उनके समस्त बन्धन नष्ट हो चुके थे, अतः वे तुरंत
ब्रह्नलोकफी चले गये | उस समय वहाँ पुष्पोंकी वर्षों होने
और सभी लोग आश्रर्यचकित हो गये । तदनन्तर इद्धने
॥म ही सुरभि गोको बुलाकर उस शरीरको चटवाया और उन
/सि अख्र निर्माण करनेके लिये विश्वकर्माको आदेश दिया।
इचद्धकी आशे पाकर विश्वकर्माने शिवजीके तेजसे सुदृढ़
मुनिकी वज़मयी हृडियोंसे सम्ूर्ण अ्लोकी कल्पना की ।
के रीढ़की हड्डीसे वज् ओर ब्रह्मशिर नामक बाण बनाया
| अन्य अखियंसे अन्यान्य बहुत-से अद्लोका निर्माण किया |
॥ शिवजीके तेजसे उत्कर्पको प्राप्त हुए इच्धने उस वज्रको
क्रीधपूर्यंक चृत्रामुरपर आक्रमण किया, ठीक उसी तरह
रुपने यमरजपर धावा किया था | फिर तो कबच आदिसे
भति मुरक्षित हुए इन्द्रने तुरंत ही पराक्रम प्रकट करके.
दर वनामुरक परवतशिखर-सरीखे सिरकी काट गिराया |
#; उस समय खर्वासियोंने महान विजयोत्सव मनाया,
(र पुणोंवी ब्रष्ि होने लगी और सभी देवता उनकी स्तुति
#' छगे | तदमन्तर मद्दान् आत्मवल्से सम्पन्न दधीचि मुनिकी
8'ए पतन सुबचों पतिके आशानुसार अपने आश्रमके भीतर
ई# रे देवताओके लिये पतिकी मरा हआ जानकर वह्
६67 “४7 गण देते हुए बोली |
# पपवाने कहा--प्यहों ! इन््रसहित ये सभी देवता
20 “अपना काये सिद्ध करनेमें निषुण, मूख तथा
लि ये सब-के-सव उाजसे मेरे शापसे पश्ष हे
/+... 5 उस तपसख्िनी मुन्िपत्नी सुवर्चाने उन इन्द्र
हि, | ताप) शाप दे दिया । तत्यश्ात् उस पति-
४ ने आनेश विचार किया | फिर तो मनखिनी
/
सुबचोने परम पवित्र लकड़ियोंद्यरा एक चिता तैयार की |
उसी समय शंकरजीकी ग्रेरणासे सुखदायिनी आकाशवाणी हुईं,
वह उस मुनिपत्नी छुक््चौंको आश्वासन देती हुईं बोली ।
आकाशवाणीने कहा--प्राज्े | ऐसा साहस मत करो;
मेरी उत्तम बात सुनो । देवि ! तुम्हारे उदरमें मुनिका तेज
वर्तमान है; तुम उसे यक्वपूवक उत्पन्न करो | पोछे तम्हारी
जैसी इच्छा हो, वेसा करना; क्योंकि शासत्रका ऐसा आदेश
है कि सर्भवतीकों अपना शरीर नहीं जलाना चाहिये अर्थात्
सती नहीं होना चाहिये ।
नन््दीश्वरजी कहते हँ--मुनीश्वर | यों कहकर वह
आकाशवाणी उपराम हो गयी | उसे सुनकर वह मुनिपत्नी
क्षणभरके लिये विस्मयर्म पड़ गयी | परंतु उस सती-साध्वी
सुवर्चाको तो पतिलोककी प्राप्ति ही अभीष्ठ थी, अतः उसने
बैंठकर पत्थरसे अपने उदरको विदीर्ण कर डाला । तब उसके
पेय्से मुनिवर दधीचिका वह गमे बाहर निकछ आया। उसका
शरीर परम दिव्य और प्रकाशमान था तथा वह अपनी प्रभासे
दर्सा दिशाओंकी उद्धासित कर रह्य था | तात | द्धीनिकरे
उत्तम तेजसे प्राहुमूंत हुआ वह गे अपनी लीला करनेमें
समय साक्षात् रुद्रका अवतार था। मुनिप्रिया सुबचनि
दिव्यस्वर्पधारी अपने उस पुत्रकी देखकर मन-ही-मन समझ
लिया कि यह रुद्रका अवतार है। फिर तो वह महासाध्यी
परमानन्दमम्म हो गयी ओर शीघ्र ही उसे नमस्कार करके उसकी
स्तुति करने छगी। मुनीध्वर ! उसने उस खरूपकी अपने
दृदयमें ध।रण कर लिया | तदनन्तर पतिलोककी कामनायाली
विमलेक्षणा माता सुबचों मुसकराकर अपने उस पुत्रसे परम
स्नेहपूवक बोली ।
सुबचोने कहा--तात परमेशान | तुम इस अश्वत्य
वृक्षके निकट चिरकालतक खित रहो | महाभाग ! तुम समस्त
प्राणियेंकि लिये सुखदाता होओ और अब मुझे ग्रेमपूर्वक पति
लोकम जानेके लिये आशा दो। वहाँ पतिके साथ रहती हई
में दद्धरूपधारी तुम्हारा ध्यान करती रहेंगी |
नन््दीश्वरजी कहते ह--भने ! साम्वी सुवर्चाने अपने
उन्नत या कहकर परम समाधिद्वारा पतिका ही अनुगमन किया |
मुनेयर । इस प्रकार द्धीचिपत्नी सुबर्चा शिवल्रोक्रमें पहुँचकर
अपने पविते जा मिद्ठी ओर आनन्दपूर्वक शंकरनीरी तेबा करने
लगा | तात | इतनेन ही ह्पर्भ भरें हुए
देवता चुनकक साथ आमन्त्रत
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का ॥ कर दिया । जो मनुष्य से चरितकों भक्तिक:
त ञ ट' या पा शत ० जी »
दी , ._ादित नित्तसे दूसरेक्ो त॒नाता है, वह इत दे
_ भागोंत्रे भोगकर अन्तमें परम मोजन्े प्रातः
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* ( अच्याव ११ ४
3 गवान् श प्रमक्ा ग
गव्ान् रामक-समा! पति केसे
ञ्च
विस्तृत टपान्त |
ला हे 7 समस्त देत्योंका अधिपति है। ऋः
देवराज ह हक जिससे इसका वध हो सढ़े। बुद्विका
पक इस विपयमें एक उपाव ऋदठ
, ..च नामवाले महायनि हैं, वे ताली
वज़्सरीली, । कह पूवकालमें शिवजीकी तमारापता क्र
पुमलेग अखियाँ हो जानेका वर प्राप्त किया है।आ
दे देंगे | अर दड्डियोके लिये याचना करो | वे आम
ने अखियोंसे वन्नदण्डका निर्माण करे हा
इनासुरको मार डालना |? प्र
नन््दीश्वरजी कहते हैं--ुने ! अह्ञाका कह क |
की हे दैवगुर इहस्पति तथा देवताओंक़ों तय हेदुत. हे
स से शषिके उत्तम आश्रमपर आये । कहाँ इदी
धरनिका दर्शन किया और आदर 77
नमस्कार किया; फिर देवगुरु वृहलाति 7
भी नम्नताप्रवंक उन्हें सिर झकाया | दर
|]
॥।
[४शतरुद्रसंहिता ] # शिवजीके पिप्पलादू-अबतारके प्रसझमें देवताओंकी दधीचि मुनिसे अस्थि-याचना < ३१७
नि बिद्वानमं श्रेष्ठ तो ये ही; वे तुरंत ही उनके अभिप्रायको
[ढ़ गये | तब उन्होंने अपनी पत्नी सुर्चाको अपने आश्रमसे
ध्न्यत्र भेज दिया | तवश्रात् देवताओंसहित देवराज इन्द्र)
तो खार्थ-साधनमें बड़े दक्ष हैं; अरथशासत्रका आश्रय लेकर
युनिवर्से बोले |
;.. इन्द्रने कहा--मुने |! आप महान् शिवभक्त, दाता तथा
।रणागतरक्षक हैं। इसीलिये हम सभी देवता तथा देवर्षि
पश्द्वात अपमानित होनेके कारण आपकी शरणमे आये
प्रवर | आप अपनी वज्रमयी अख्थियाँ हमें प्रदान कीजिये;
पॉकि आपकी हड्डीसे वज्ञका निर्माण करके मैं उस देवद्रोहीका
प् करुगा |? इन्द्रके यों कहनेपर परोपकारपरायण द्धीचि
नेने अपने खामी शिवका ध्यान करके अपना शरीर छोड़
/ था। उनके समस्त बन्धन नष्ट हो चुके ये, अतः वे तुरंत
» ब्रह्मलोककी चछे गये | उस समय वहाँ पुष्पोंकी वर्षा होने
#गी और सभी लोग आश्रर्यचकित हो गये । तदनन्तर इच्द्रने
6/+ ही सुरभि गोको बुलाकर उस शरीरको चटवाया और उन
# गत्ते अब्न निर्माण करनेके लिये विश्वकर्माको आदेश दिया |
इद्रकी आज्ञा पाकर विश्वकर्मने शिवजीके तेजसे सुदृढ
पुनिकी वज्रमयी दृद्ियोंसे सम्पूर्ण अज्लोंकी कल्पना की |
$ रीढ़की हड्डीसे वज्ञ और ब्रह्मशिर नामक वाण बनाया
॥ अन्य अखियोसे अन्यान्य बहत-से अद्योंका निर्माण किया ।
॥ शिवजीके तेजसे उत्कर्षको प्राप्त हुए इन्द्रने उस वजच्रको
( कोधपूर्वक वृच्ासुरपर आक्रमण किया, ठीक उसी तरह
'दने यमराजपर धावा क्रिया था । फिर तो कवच आदिसे
/“गॉंति मुरक्षित हुए इन्द्रने तुरत ही पराक्रम प्रकट करके.
द्वारा तजासुरके पर्वतशिखर-सरीखे सिरकी काट गिराया।
(४: उस समय खर्गवासियोंने महान विजयोत्सव मनाया;
) हर 3-7 वृष्टि होने लगी और सभी देवता उनकी स्तुति
# डगे | तदनन्तर महान् आत्मवलूसे सम्पन्न दधीचि मुनिकी
0 पत्नी मुबर्चा पतिफे आशानुसार अपने आश्रमक्े भीतर
4 7 देवताओंके लिये पतिकों मरा हुआ जानकर यह
पु
कह हरे रण देते हुए बोली |
8 'उपेचन कहा--छहो ! इनच्रसट्ति ये सभी देवता
है
हू 5 >प थे संब-के-लब आजसे मेरे शापसे पशु हो
/) , ह8र उस तपखिनी मुमिपत्ली उुवचाने उन इन्द्र
ह।/ ३ शास्यश शार दे दिया । तसथधात् उस पति-
व एम जानेदा दिद्वार किया । छिर तो मनन
स॒वचोने परम पवित्र लकड़ियोंद्ररा एक चिता तैयार की ।
उसी समय शंकरजीकी प्रेरणासे सुखदायिनी आकाशवाणी हुईं,
वह उस मुनिपत्नी सुवर्चाकी आश्वासन देती हुई बोली ।
आकादवाणीने कहा--प्राजे | ऐसा साहस सत करो)
मेरी उत्तम बात सुनो । देवि | तुम्हारे उदरमें मुनिका तेज
वर्तमान है; तुम उसे यत्ञपूर्वक उत्पन्न करो । पोछे तुम्हारी
जेंसी इच्छा हो; वेसा करना; क्योंकि शासत्रका ऐसा आदेश
है कि गर्भवतीकों अपना शरीर नहीं जलाना चाहिये अथौत्
सती नहीं होना चाहिये ।
ननन््दीश्वरजी कहते हँ--मुनीखवर | यों कहकर वह्
आकाशवाणी उपराम हो गयी । उसे सुनकर वह मुनिपतली
क्षणभरके लिये विस्मयर्में पढ़ गयी। परंतु उस सती-साध्वी
सुवर्चाकों तो पतिलोककी प्राप्ति ही अभीष्ट थी; अतः उसने
बेठकर पत्थरसे अपने उदरको विदी्ण कर डाछा | तब उसके
पेट्से मुनिवर दधीचिका बह गर्भ बाहर निकल आया | उसका
शरीर परम दिव्य और प्रकाशम्तान था तथा वह अपनी प्रभासे
दर्सा दिशाओंकी उद्धासित कर रहा था। तात ! दर्धीचिके
उत्तम तेजसे प्रादुभूत हुआ वह गर्भ अपनी लीला करनेमें
समर्थ साक्षात् रुद्रका अवतार था। मुनिप्रिया सुवचनि
दिव्यस्वरूपधारी अपने उस पुत्रकों देखकर मन-ही-मन समझ
लिया कि यह रुद्रका अवतार है। फिर तो वह महासाध्यी
परमानन्दमम्न हो गयी और शीघ्र ही उसे नमस्कार करके उसकी
स्तुति करने लगी | मुनीधर |! उसने उस खरूपकी अपने
हृदयमें घारण कर लिया | तदनन्तर पतिलोककी कामनायाली
विमलेक्षणा माता सुवर्चा मुसकराकर अपने उस पुचसे परम
स्नेहपूर्वक बोली ।
खुबचांन कहा--तात परमंजश्ान | तुम इस अश्वत्य
वृक्षके निकट चिरकालतक स्थित रहो | महाभाग |! तम समस्त
प्राणियोँके लिये सुखदाता होओ ओर अब मुझे प्रेमपुर्वक पति-
लोकमें जानेके लिये आशा दो | वहाँ पतिके साथ रहती हुई
मे रद्रूपधारों तुम्दारा ध्यान करती रहेंगी | द
ननन््दश्चरजी कहते हे--मुने | साथ्वी मुवचाने अपने
पुत्रसे या कटकर परम समाधिद्वारा पतिका ही अनुगमन किया |
मानवर ; इस प्रकार दर्धाच्ििपत्नी सुबर्चा शिवल्रेकर्म परँचकर
अपने पतिते जा मिली और आनन्दपूर्यक्र शंकरनीडी या करने
लगी | ठात | इतनेन ही हृपमे भरे हुए इन्द्रसटटेत समस्त
देवता नुनिदोकद्के साथ आमन्त्रित हुएदी तर द्ीअतासे
्क
लक
क.. + औिन््मञमाक
३१८
है.
उफफाकाशी 4... अण का कि. क न. ० रिया अकन- न जमीन मनन 7+-अनिगागािक्ा० कै न्नााओ है टीजिओी के
तद्दों आ पहुँने । तय धराक्ष तुझ्ियाडे अक्ाने उस लाना
नाग गिणछाद रकतवा । फिर सर्मी देवता गंदीजाव सनाकर
अपने-अपने चागवों राझे गये । तब्नन्तर मंदान ऐेअपशाली
द्धावतार पिणलाद उसी अब गीने जोगी दिततकामनासो
सिरकालिक तामे प्रउस हुए । टोकालाएा अनुरस्य
करनेवाले पिणलादका मी तग्या करते हुए बहुत बढ़ा रामय
हज वर्यत्षककी आखुाछे मनुप्यक्रों तथा शिल्प
की वीड़ा नदी दी सकती । यह गेश बचने खंगा की|
यदि कही झाति मेरे बचनकाो अनादर के ज मुझे
पीड़ा परुचायेगा सी सद निल्संदेद भरा हो जा | क।
इगीडिये उस भयंस भीत हुआ गहलेप् शनेशर कि हे
भी नसे मलुस्योंझि कभी पीड़ा नहीं पहुँचाता | पुन
व्यतीत दो गया ।
तदनन्तर पिप्पछादने राजा अनस्पको कन्वों पद्माशे पिभाईं
फरके तमण हो उसके साथ विल्ास लिया । उन सुनिके
दस पुत्र उत्तन्न हुए, जो सब-फेसाब पिताके ही समान मद्राद्मा
और उग्र तपस्री थे। वे अपनी गाता पके सुल्तवी प्रद्ठि
करनेवाले हुए । इस प्रकार महाप्रभु शंकरफ टीलायतार मुनि-
वर पिप्पलादने महान ऐ.उर्यशाली तथा नाना प्रकारकी लीत्याई
कीं | उन कृपालने जगतगे शनेश्वर्री पीीदाको
जिसका निवारण करना राबकी शक्तिके बाहर थां। देखकर
छोगोंकी प्रसत्नतापूवक यह वरदान दिया कि “जन्मसे लेकर
प्रहार नि लीलटासे मनुध्यरुप धारण केवल शिर
उत्तम चरित तुर्ई गुगा दिया। यह तसृण कमा
करनेवाला है| गाधि, कीसिक और महाम॒ुति खिला
तीनों छास्य किये आनेगर झनेश्रजनित परीड़त्न
देसे है । ने मुनियर दपीनि, जो परम छाती स्थुर्णः
तथा मदन शिवभक्त थे। धन्य दें। जिनके वहाँ लो»
मदधर मिंगलाद नामक पुत्र देकर उसने हुए। ते!
आख्यान निर्दोफ खर्गप्रद। ुत्नइजनित दोषेकार्र्क
मनोरभोंका पूरक और शिवभक्तिकी विशेष इेदि के
( अथाव २८
भगवान् शिवके ठिजेथ्वरावतारकी कथा--राजा भद्गायु तथा रानी
/् # कि
क्रीतिमालिनीकी धारमिक च्ठताक्की परीक्षा
तद्नन्तर चैदयवाथ अवतारका वर्णन करके
नन््दीश्वरने द्विजेश्चरवतारका असछ. चलाया।
थे बोले--तात | पहले जिन वपश्रेष्ठ अद्रायुका परिचय
दिया गया था और जिनपर भगवान झिवने क्रषभरूपसे
आअनुग्रह किया था; उन्हीं नरेशके धमकी परीक्षा जेनेके
किये वे भगवान् फिर ह्िजेश्वरूपसे प्रकट हुए ये ।
ऋषमके प्रभावसे रणभूमिमें शत्रुओपर विजय पाकर
शक्तिशाली राजकुमार भद्रायु जब राज्यसिंहासनपर आरूठ
हुए। तब राजा चन्द्राह़द तथा रानी सीमन्तिनीकी बेटी
सती-साध्वी कीतिमालिनीके साथ उनका विवाह हुआ |
किसी समय राजा भद्रायुने अपनी धर्मपत्नीके साथ बृसन्त
ऋतुमें वन-विहार करनेके लिये एक गहन बनमें प्रवेश
किया | उनकी पत्नी शरणागतजनोंका पालन करनेवाली थी ।
राजाका भी ऐसा ही नियम था | उन राजदस्पतिकी घर्ममें
कितनी हृढ़ता है इसकी परीक्षाके लिये पार्वतीसहित
भगवान् शिवने एक छीझा रची | शिवा और शिव उस
: बनमें ब्राक्मणी ओर ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए. | उन दोनोंनि
: छीलापूर्वक एक मायामय व्याप्रका निर्मोण किया.। वे दोनों
भवसे विह्नल हो व्याप्रसे थोड़ी ही दूर आगे रोते-निलाते
, परंतु उन बाणोंसे उस महंंवी बयक्नी
भागने छो और व्यात्र उनका पीछ लेगा
उन्हें इस अग्रस्थार्मे देखा | वे आह्ृपदमा
वितुर दो महाराजकी शरणमें गये और इसे पक"
व्राह्मण-दग्पतिने - कहा--/हरत |
कीजिये, रक्षा कीजिये | वह व्याप्त हैं देवर व
लिये आ रहा है। समस्त परणियोंकी 5 का हे
देनेवाला यह. हिंसक प्राणी हे 8
4९ £2॥ छः
बनाये, इसके पूर्द ही अप हैंमे दो
॥
उन दोनोंका यहू करुणकन्दन पर
ज्यों ही घनुप उठाया, त्यों ही वह न
वहवेवा
पहुँचा । उसने ब्राह्मणीकी पकड़े लिया | है: को
वा शम्मे |
हा नाथ | हा प्राणवल्लम | ६ शम्भी | ६
इत्यादि कहकर रोने और विकाप केरवे लगी 7 के
था । उसने ज्यों द्वी तरक्मणीको की
27%
हो.
तने तीर
4
त्ों डी भद्रायुने तीखें बराणोंसे उसे?
परवीरी
नहीं हुई। वह ब्रह्मणीको बंलपूवेक यो कि
दूर निक्रल गया । अपनी पकीकी
शतरुद्गसंद्िता |
>रमकाममु्ारकर कप #न+ “पक +करी पर पारी पपपनमिनी पपन्न ननरी मनन कर जननी" नह न नभीन पर पक नी ० नी पिन नाप री नय ५ मानी १५" न्हानत री ननाननी नाननी पथ नल री न भराननग नाम प पानी न नानी ५५९५७ ०५प नी नानी जन नमन नमी नी नमन "नाप बनी + करन ० कवच नरीी कलम कली नी नी भी वी की १ ०
इस ब्राह्मणको बड़ा दुःख हुआ और वह बारंबार रोने
गा | देशतक रोऋर उसने राजा भद्गायुसे कक्क--“राजन |
हरे वे बड़े-बड़े अस्न कहाँ हूँ ? दुखियोँकी रक्षा करने-
दम तुम्दारा विद्ाल धनुष कहोँ है ? सुना था तुममें बारह
जार बड़े-बड़े हाथियोंका बल है | वह बल क्या हुआ !
हरे श्भ) खडे तथा मन्त्रान्न-वियासे क्या लाभ हुआ !
सरोकी श्लीण होनेसे बचाना क्षत्रियका परम घ्म है।
॥रमंश राजा अपना धन ओर प्राण देकर भी शरण आये
४० दीन-दुखियोंकी रक्षा करते हैं। जो पीड़ितोंकी प्राण-
धव्वा नहीं कर सकते। ऐसे छोगोंके छिये तो जीनेकी अपेक्षा
२ जाना ही अच्छा दे !?
बिन
# उस प्रकार. ब्राह्ममका विछाप और उसके मुखसे
पपने पराक्रमकी निन्दा सुनकर राजाने शोकसे मन-दी-मन
“पु प्रकार विचार किया--भअहो | आज भाग्यके उलट-फेरसे
/0 पराक्रम नष्ट हो गया | मभेरे.धर्मका भी नाश हो गया |
#त: अब मैरी सम्दा, राज्य ओर आयुका भी निश्चय
४० नाश हो जायगा |? यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मणके
'णोमें गिर पढ़े और उसे धीरज बँधाते हुए. बोले---
क्षन् | मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है | मद्दामते ! मुझ
“#अयाधमपर कृपा करके शोक छोड़ दीजिये। में आपको
ताश्छित पदाथे दूँगा | यह राज्य, यद्द रानी. और मेरा
शणीर सब कुछ आपके अधीन है | वोलिये; आप क्या
ते ई!
प्राह्मण चोले--राजन् | अंधेको दर्पणसे क्या काम १
भिज्ञ मॉँगकर जीवन-निर्वाद करता हो) बढ वहुत-से घर
९ कया करेगा | जो मूर्ख है? उसे पुस्तकसे क्या फाम
जिसके पास स्री नहीं है, वह घन लेकर क्या करेगा!
; पी चले गयी, मेने कभी काम-सुखका उपसोग नहीं
([। अतः कामभोगके लिये आप अपनी इस बड़ी रानीको
' दे दीजिये ।
! राज़ाने कद्दा--पद्धान ! क्या यही तुम्हारा धर्म है
" सुई मुद्ने यदी उपदेश किया दे ? क्या तुम नहीं जानते
पग्ी छीक़ा सर्ण खर्ग एवं मुयशकी हानि करनेवातल्म
/ फफ़ाक उपभोग्ते हो पाप कमाया जाता है; उसे
(0
री
(॥ ापश्चिचोदाग भी पोषा महीं ज्वा सदता |
है
$
“राजन ! में अपनी तपस्यासे रूपंकर
। ये पिंड
है शहरण वो
9५ ५ के बरी शाम | प ५ ः भू े
आई ऊर हदिशागन-नमेसे पापका भी नाश पर
+# भगवान शिवके घिजेश्वरावतारकी कथा #
३९९
2 पर भारनन ८५७५ पपाकपूत-इ०७१७७७:#घ७५५ | वज ४ पारा भ 9०.९ ५५३०३०००»३५७५#०७-3५/४५३३७७+ा ०७ पहन ३५००३." नह ० १७० ॥९७५ ०००. ४५३३१७ ४० माममक ७३.५०" मय ७५ “य४३१५७७»प०+प४०-/3५४४१७५४»० ५ मन 3५-४० पाक ७ डाक -+>+ मम मा- १ "व '५५००प॒ जन >न७३-धक नहा कक #॥ "पान -#उन पा +म कया" पर ५७० >3७9००७१७५++७-+०मामग+३ पान 3339 4:+काननी जाना-कननक ५4 जनज पे धकनक
आूँगा | छ्िर परप्ली-संगस किस गिनती है !- अतः
आप अपनी इस भायांकी मुझे अवश्य दे दीजिये !
अन्यथा आप निश्चय ही नरकर्म पड़ेंगे |
ब्राक्षमकी इस बातपर राज़ाने मनद्वीमन विचार
किया कि ब्राह्मणक्रे प्राणोंकी रक्षा न करनेसे मद्दापाप होगा;
अतः इससे बचनेके लिये पत्नीको दे डालना ही श्रेष्ठ है |
इस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी पत्नी देकर में पापसे मुक्त हो
शीघ्र ही अम्निमें प्रवेश कर जाऊंगा। मन-ही-मन ऐसा
निश्चय करके राजाने आग जलावी ओर ब्राह्णको बुलाकर
उसे अपनी पत्नीकों दे दिया । तसश्वात् स्नान करके
पवित्र हो देवताओंकों अगाम करके उन्होंने अम्निकी
दो बार परिक्रमा की और एकाग्रचित्त होकर भगवान शिवका
ध्यान किया। इस प्रकार राजाकों अम्निर्मे गिरनेके लिये
उद्यत देख जगत्पति मगवान् विश्वनाथ सहसा वढों प्रकट
हो गये | उनके फँच मुख ये | मस्तकपर चन््रकछा आभूषणका
काम दे रद्दी थी | कुछ-कुछ पीले रंगकी जय लब्की हुईं
थी । बे कोटि-कोटि सूर्यक्रे समान तेजस्वी थे। हाथोंमें त्रिश्ूल;
खद॒वाड़, कुठार, ढाछः म्ुंग। अभय) वरद ओर पिनाक
धारण किये, बैलकी पीठपर बैठे हुए भगवान् नीलकण्ठको
राजाने अपने सामने प्रत्यक्ष देखा। उनके दरशनजनित
आनन्दसे युक्त दो राजा भद्रायुने हथथ जोड़कर सतवन किया |
राजाके स्त॒ति करतेपर पावंतीके साथ प्रसन्न
हुए महेश्वरले कहा--राजन् । तुमने किसी अन्यका चिन्तन
ने करके जो सदा-संदा मेरा पूजन किया है तुम्दारी इस
भक्तिफे कारण और ठुम्दारे द्वारा की हुई इस पवित्र ललुतिको '
सुनकर में बहुत प्रसन्न हुआ ॥ । तुम्इरे भक्तिभावकी
परीक्षाके लिये में खयं ब्राह्मण बनकर आया था। जिसे
ब्याप्ने अ्रस लिया था। बह ब्राक्षणी और कोई नहीं, ये
गिरिराजनन्दिनी उमादेवी दही थीं । तुम्दार याण मारने
भी जिसके शरीरकी चोट नहीं पर्दची, बढ व्याम भायानिमित
था। नुम्दारे पर्षकों देखनेके लिये दी मेने तुमग्धारी पत्नीको
माँगा था। इस कीविमालिनीकी और तम्ययें नक्तिस भी
लंतुए्ट हूँ। तुम कोई दुरून बर सोंगे। में उसे देगा |
राजा राह डकीो + का साइकाए
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दाताओंगे श्रेष्ठ ६ । आपे में दूसरा कोई सर नहीं माँगता ।
गेरी यही इच्छा दे कि में, मेरी रानी, गेरे गाता-विता।
पद्माकर वेश्य ओर उसके पुत्र गुनय--इस सबती आप
अपना पाश्व॑वर्ती सेवक बना ढीजिये |
ततश्रात् रानी कीतिमालिनीने प्रणाम कण अपनी
भक्तिसे भगवान् शंकरको प्रसन्न किया और सह उत्तम चर
मॉंगा--मददिव | गरे पिता लन्द्ाढ्ाद और माता सीमन्तिनी--
इन दोनोंकी भी आपके समीप निवास प्राप्त दी ।? भक्तवछाल
भगवान् गोरीपतिने प्रसन्न होकर 'एसमलु! कहा और उन
दोनों पति-पत्नीको इच्छानुगार बर देकर वे क्षणभरम अन्तर्नान
# नग्ा रुद्नाय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मन ४
| संक्षित-शिवपुणा]
ही गये । इधर राज़ाने भगवान झंकरका प्रसाद प्राक
गशनी कीतिमाडिनीके साथ प्रिय विधयोंका झप्ोगझ्षिशओं
दस दर वर्षतिक राज्य करनेंके पश्चात् आने पुत्र
देकर उन्दोंने शिवजीके परमपदकों प्राप्त किया | खाश्े
रानी दोनों दी भक्तिपूर्वक मदादेवजीकी पूझ् के माह
शिवक बामका थ्राप्त हुए । यह परम पविक्र पाना
अत्यन्त गोपनीय भगवान शिवक्ा विचित्र गुगकुद ३
विद्वानोंका सनाता दे अगवा खर्म भी शुद्दवित्त देकर पृ
के वह इस लोक भोगऐशर्यको प्रातकर अत कद
शियकी ब्राप्त दोता दे | ( अबाव २६ '
किम ----मपप- फनी नपाननपपनम८3 नि... ७" 0 -३३-३०--.६७-६-७-६-+--२५--३७०००००७
भगवान शिवका यतिनाथ एवं हंस नामक अवतार
नन््दीश्वर कहते हँ--मुने ! अब में परमात्मा शिवके
यतिनाथ नामक अवतारका वर्णन करता हैं | मुनीश्वर !
अरबुृदाचल नामक परव॑तके समीप एक भील रहता था; जिसका
नाम था आहु+ । उसकी पत्नीको लोग आहुका कहते थे | वह
उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली थी। वे दोनों पति-पत्नी महान
शिवभक्त थे ओर शिवक्री आराधना-पूजामें लगे रहते भे।
एक दिन वह शिवभक्त भील अपनी पक्के लिये आद्ारकी
खोज करनेके निमित्त जंगलमें बहुत दूर चला गया | इसी
समय संध्याकालमें मीलकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शंकर
संन्यासीका रूप घारण करके उसके घर आये | इतनेमें ही उस
घरका मालिक भील भी चला आया और उसने बड़े प्रेमसे
उन यतिराजका पूजन किया | उसके मनोमाबकी परीक्षाक्षे लिये
उन यतीश्वरने दीनवाणीमें कहा--“भील | आज रातमें यहाँ
रहनेके लिये मुझे स्थान दे दो | सबेरा होते ही चला जाऊुँगा,
तुम्हारा सदा कल्याण हो !?
भील बोल--खामीजी ! आप दीक कहते हैं, तथापि
मेरी बात सुनिये । मेरे घरमें स्थान तो बहुत थोड़ा है। फिर
उसमें आपका रहना केसे हो सकता है !
भीलकी यह बात सुनकर स्वामीजी वहाँसे चले जानेको
उद्यत हो गये ।
तब भीलनीने कहा--प्राणनाथ ! आप स्वामीजीको
स्थान दे दीजिये | घर आये हुए. अतिथिको निराश न
लौटाइये । अन्यथा हमारे गहस्थ-घर्मके पालनमें बाधा पहुँचेगी |
आप खामीजीके साथ सुखपूर्वक घरके भीतर रहिये और मैं
बड़े-बड़े अख्न-शस्य लेकर बाहर खड़ी रहूँगी |
पत्तीकी यह बात सुनकर भीलने सोचा--अग्रे |
बंदर निकालकर में भीतर कैसे रह सकता हूँ ! स्वाद:
अन्यत्न जाना भी मेरे लिये अवमंकारक ही होगा।4
दी कार्य एक शदखके लिये सता अनुचित हैं। आ :
दी घरके बादर रहना चाहिये। जो होनहार होगी) है ।
होकर दी रदेगी | ऐसा सोच आग्रह करके उसने छ्
पंन्यासीजीको तो सानन्द बरके भीतर रख दिया और हो
भील अपने आयुथ पास रखकर परे बाहर छड़ी हक
रातमें जंगली क्रूर एवं दविंसक पद्मु उसे पीड़ा देने को।
भी ययाशक्ति उनसे बचनेके लिये महाव् यह कि
तरद यक्ष करता हुआ वह भील बल्वाव होकर मे 4
प्रेरित हिंसक पद्मुओंद्वारा वहपू्वक खा लिया व!“
काल उठकर जब यतिने देखा कि ह्विंक पधमी
भीलको खा डाला है; तब उन्हें बढ़ा ढुःख हुआ के
दुखी देख भीलनी दुःखसे व्याकुल होनेपर भी है
दुःखको दबाकर यों बोली--खामीजी /आ 5
लिये हो रहे हैं ! इन भीलराजका तो इस सी ह!
हुआ | ये धन्य ओर इतार्थ हो गये, जो ईह हि
प्राप्त हुए । मैं चिताकी आग जलकर ना कु
करूँगी । आप प्रसन्नतापूर्वक मेरे लिये ४ चित |
दूं; क्योंकि स्वामीका अनुसरण पे कह
धर्म है |! उसकी बात सुनकर संन्यादा शा
की और भीलनीने अपने धर्म के अवुसार उरहः है
इसी समय भगवान् शंकर अपने साक्षात क्
प्रकट हो गये ओर उसकी अशेसा करते ई०
।
'शतरुद्गवसंहिंता ]
“धन्य हो; धन्य हो। में तुमपर प्रसन्न हूँ | तुम इच्छानुसार
४
का
38.
प ]
श बे
हा
काम
ना
वर माँगो | तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है |?
शा ठ
गे ९ ६ 9) 2 ्ः ज््द्
भगवान् शंकरका यह परमानन्द्दायक वचन छुनकर
की बड़ा सुख मिला। वह ऐसी विभोर हो गयी कि
सी भी बातकी सुध नहीं रही | उसकी उस अवस्थाको
# भगवान शिवके कृष्णद्शन नामक अचतारकी कया *
३२१
लक्ष्य करके भगवान् शंकर और भी प्रसज्ञ हुए ओर उसके न
मॉँगनेपर भी उसे वर देते हुए बोले--५मेरा जो यतिरूप हैः
यह भावी जन्ममें हंसूूपसे प्रकट होगा और प्रसन्नतापूरवक
तुम दोनोंका परस्पर संयोग करायेगा | यह भीछ निषरधदेशकी
उत्तम राजधानीमें राजा वीरसेनका श्रेष्ठ पुत्र होगा | उस
समय नलके नामसे इसकी ख्याति होगी ओर ठुम विद
' नगरमें मीमराजकी पुत्री दमयन्ती होओगी | ठुम दोनों मिलकर
राजमोग भोगनेके पश्चात् वह मोक्ष प्राप्त करोगे; जो बढ़े-बड़े
योगीश्रोंके लिये भी दुलंभ है |
नन्दीश्वर कहते हँ--मुने ! ऐसा ,कहकर भगवान
शिव उस समय लिडझ्गरूपमें स्थित हो गये | वह भील अपने
धर्मसे विचलित नहीं हुआ था; अतः उसीके नामपर उस
लिड्को “अचलेश? संज्ञा दी गयी। दूसरे जन्ममें वह आहुक
नामक भील नेषध नगरमें वीरसेनका युत्र हो महाराज
नलके नामसे विख्यात हुआ और आहुका नामकी भीलनी
विदर्भ नगरमें राजा भीमकी पुत्री दमयन्ती हुई ओर वे
यतिनाथ शिव वहाँ हंसरूपमें प्रकट हुए । उन्होंने दमयन्तीका
नलके साथ विवाह कराया | पूव्रजन्मके सत्कारजनित पुण्यसे
प्रसन्न हो भगवान् शिवने हंसका रूप धारणकर उन दोनेको
सुख दिया। इंसावतारधारी शिव भौँति-माँतिकी वार्ते करने
और संदेश पहुँचानेमें कुशल ये | वे नल और दमयन्ती
दोनेकि लिये परमानन्ददायक हुए । ( अध्याय २८ )
शा ८ 2--7<» ---->
भगवान् शिवके क्ृष्णदशन नामक अवतारकी कथा
न्दीश्वर कहते है--सनत्कुमारजी ! मगवान शम्मुके
उत्तम अवतारका नाम कृष्णदर्शन है, जिसने राजा
ही शान प्रदान किया था | उसका वर्णन करता हूँ,
| भाददेय नामक मनुके जो इष््वाकु आदि पुच्र थे, उनमें
में नाम नभग था, जिनका पुत्र माभाग नामसे प्रसिद्ध
। नाभागफे ही पुथ्र अम्बरीप हुए, जो भगवान् विष्णुके
५ तथा जिनकी ब्राद्मणमक्ति देखकर उनके ऊपर महर्पि
। मसनन हुए ये। नुने | अम्बरीपके पितामह जो नभग
नि छ& उनके चरिष्रका वर्णन सुनो । उन्हींगो भगवान्
| दान प्रदान किये था। सतुपृत्त नभग बड़े वुद्धिमान्
ने दि पाधपनऊे एिप दीघसाल्तक् इन्द्रियसंवमपु्ेक
"मे निज्यम रा । इसी दीचमें इप्काक आदि भाइयने
जलिब कार हग्य ने देखर पिताही सम्ाति आपसमें दोट
जे
रू
4० पु७ ४२० ॥ है
ली ओर अपना-अपना भाग लेकर वे उत्तम रीतेसे राज्यका
पालन करने लगे | उन सबने पिताकी आशासे ही घनका
बँटवारा किया था । कुछ कालके पश्चात् ब्रद्मचारी नभग
गुरुकुल्से साक़ेपाइ़ वेदोंका अध्ययन करके वहाँ आये । उन्होंने
देखा सब भाई सारी समत्तिका बेटवारा करके अपना-अपना
भाग ले चुके हैं। तब उन्होंने भी बढ़े स्नेट्से दायभाग पाने-
की इच्छा रखकर अपने इश्याकु आदि बन्धुओसे द्रदा--
ऋाइयो | मेरें लिये भाग दिये बिना ही आपलोगनि आउपसर्भ
सारी समत्तिका बैंटवारा कर ल्यान। अतः अब प्रसन्ताएूयक
मसे भी टिस्ला दीजिये। में अपना दायमाग लेनेक्ने लिये दी
यहाँ आया हूँ ।? ह
नाई दोके--डइेव समत्तिता बेंडयग ही रह था। परम
ध्यान ऋआ का है दे
समय इस ठुस्दोरे छेप ब्यव दैना चूठ गई थे । अब इस
अं लो कप सन सइसर मसलन पकसनरन्ुन 3 न अनन्त जम * «2 सिर
समय पिताजीको ही तुम्दारे हित देते / |
? इसमें संशय नहीं है | “
भाइयोका यह वचन सुनकर मभग- वि यड्ा मिम्याय हुआ |
वे पिताके पास जाकर ब्रोछे-...; तात [ मे नियाज्ययन लिये
युककुलमें गया या और यहां अबतक अद्षनारी दवा टू | उसी
बीचमे भाइयोंने मुझे छोड़कर आपसों घन बंटवारा सर
लिया । वहाँसे छौटकर जब गनि आने दिलोके यादओं उनसे
<छ तब उन्होंने आपको गेरा दिव्ता बता दिया | अत; उस;
लिये में आपकी सेव्रामें आया है 7 नभगकी बहू बात मुनकर
पिताको बड़ा विस्मय 5आ। श्राउदेवने पुत्रकी आशानन देते
55 कहा-- बेटा | भाइयोंकी उस ्रातपर विश्वास ने करों |
वह उन्होंने तुम्हें ठगनेके लिये कढी ६ | मैं कुद्धार लिये भोग-
जाधक उत्तम दाय नहीं बन सकता, पा उन बमभत
यदि मुझे ही दायके रूपमें तुम्हें दिया ऐ तो # नुझ्दारी जीवेका-
| छझक उपाय बताता हूँ, सुनो | इन दिनों उत्तम चुद्धिवाले
आज्ञिरसग्रोन्नीय ब्राह्मण एक बहुत बड़ा यश्ञ कर रहे है,
उस कर्ममें प्रत्येक छठे दिनका काय वे ठीक-ठीक नदी समझ
पाते--उसमें उनसे भूल हो जाती ९ | तुम वहाँ जाओ
और उन ब्ाक्षणोंको विश्वेदेवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दिया
करो | इससे वह यज्ञ शुद्धलूपसे सम्पादित होगा | वहू यज्ञ
समाप्त होनेपर वे ब्राह्मण जब स्वगंकी जाने लगेंगे, उस समय
संतुष्ट होकर अपने यरसे बचा डआ सारा धन तुम्हें दे दगे |
पिताकी यह्द बात उनकर सत्यवादी नभग बड़ी प्रसन्नताके
साथ उस उत्तम यज्ञमें गये। मुने | वहाँ छठे दिनके कममें
वृद्धिमान् मनुपुच्ने वेश्वदेवसम्बन्धी दोनों सृक्ताका स्पष्टल्पसे
आज्ञिरस ब्राह्मण
देकर खर्गलाकको
अछा--धुम कौन हो ! जो इस
घनको ले रहे हो । यह तो मेरी सम्पत्ति है। तुम्दें किसने यहाँ
मेजा है | सब बातें टीक-ठीक बताओ [?
>की “यह तोथशसे बचा हुआ घन है; जिसे
षियोने मुझे दिया है । अब (३ मेरी ही सम्पत्ति है | इसको
लेनेसे तुम मुझे कैसे रोक रहे हो !
केहा--ध्तात | हम
दोनोंके इस झंगड़ेमें
तुग्दारे पिता ही पंच रहेंगे | जाकर उनसे
एंछो और वे जो
# नमो रुद्राय शान्ताय अध्ाग परमात्मने ४
[मे उन्हींता के
। संक्षिप्त-शिवृषुणा;
उसमे ठीक-ढीऊ यहाँ माकर बताओ | उमब्ली त
> हर नभागने गिताके पास बाकर उक्त जे करे मे
एकता । आददेवकों कोई पुरानी वात बाद भर जी
उल्दींच आगनाव सिने चरणकमछोंका बिल ऋछोे
झपा कद |
४ ब्+ व. ० ४४ कफ ८ का. सह + ०4 #न >-ज ६० 6 ४7७०० ५3.४० ९८ /७ 4७ हर
ि | गंय प्
मठ बोले --तात ! थे गदग जे तुम्हें वह पर छेसे
गैक २॥ हैं, गयात् भाषान शिव ईं | वो वो उंसाज़े
कल हो उन्हींक। 2 | परंतु सजसे शत हुए घतपर उन
अधिजार है | यश करनेसे जो घन बच जाता है उसे भ
अड्ड भाग निश्चित किया गया है । अतः बाबर! :
आल आदण करनेके अधिकाती तर्वेश्वर महादेव हे
उनके इच्छाते ही दूसर लोग उस वलुब़े हे फ् |
भगवान् झिय सुमपर कृपा करनेके लिये ही वहाँ का ।
धारण करके आये हैं | तुम व्ीं जाओ और उन्हें परत हो
अपने अपराभझ लिये क्षमा माँगो और प्रणामूतक आ
लुति करो |? नभग पिताक़ी आजसे वह गये ओर मार
सगाम करके हाथ जोड़कर बोले--.. महेश्वर ! वह सर शिक्
के आपकी है । किर यरत्ते बचे हुए धनके हिये वो
है क्या ३ | निश्चय दी इसपर आपका अधिकार है मो |
पिताने निर्णय दिया है । नाय | मैंने ययार्थ बात ने झें |
कारण भ्रमवश जो कुछ कह्ा है; मेरे उपत्त आए
जमा कीजिये | मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर वहआ!
करता हूँ कि आप मुझपर ग्रसन्न हों |”
ऐसा कहकर नभगने अत्यन्त दीनतापूर्ण हृदय #
हाथ जोड़ महेश्वर कृष्णदर्शनका स्तवन किया | उपर हल
भी अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए भागवाद |
सुति की | तदनन्तर मगवान् रुद्रने मन-द्ीमन पह
नभगको कृपाइश्सि देखा और मुस्कराते केक । हा
उप्णद्शन बोले--'नभग | दग्हरे खतरे हे
सुकूल बात कही है, वह ठीक ही है | ठुमने भी हि
कारण सत्य ही कहा है | इसलिये में बन पु है
पे ्ि त्रह्मतत्तका ।
हि मम है
है
इसे अहण करो | इस छोकमें निर्विकार रहकर कह
अन्तमें मेरी ऋपासे तुम्हें सद्गति प्राप्त हि ह (6
भगवान् रुद्र सबके देखते-देखते वर्दी पे सात
ही श्राद्धदेव भी अपने पुत्र नभगके साथ
आये | इस छोकमें विपुल भोगोंका उपभोग
शतदरुद्गसंदिता ] # भगवान् शिवक्ते अवधूतेश्वरावतारकी कथा और उसकी महिमाका वर्णन
वे भगवान् शिवके धाममें चले गये | ब्रद्मनू ! इस प्रकार
तुमे मैंने भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतारका वर्णन
किया । जो इस आख्यानको पढ़ता और सुनता है, उसे सम्पूर्ण
मनोवाज्छित फल प्राप्त हो जाते हैं | ( अष्याय २९ १
भगवान् श्षिवके अवधृतेश्रावतारकी कथा और उसकी मद्दिमाका वर्णन
ननन््दीश्वर कहते हँ--सनत्कुमार | अब तुम परमेश्वर
शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन सुनो) जिसने इन्द्र-
के घ॒मंडको चूर-चूर कर दिया था | पहलेकी बात है इन्द्र
न्ता 5
न कक
क्मूर्ण देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर भगवान् शिवका
दर्शन करनेके लिये केलास पर्वतपर गये | उस समय बृहस्पति
ओर इन्द्रके शुभागमनकी बात जानकर भगवान् ,शंकर उन
दोनोंकी परीक्षा लेनेके लिये अवधूत बन गये । उनके शरीरपर
कोई बख्र नहीं था। वे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी
होनेके कारण महाभयंकर जान पड़ते थे । उनकी आकृति
बढ़ी युन्दर दिखायी देती थी। वे राइ रोककर खड़े ये।
बृहस्पति ओर इन्द्रने शिवके समीप जाते समय देखा, एक
भद्भुत शरीरघारी पुरुष रास्तेके बीचमें खड़ा है । इन्द्रको
अपने अधिकारपर बड़ा गये था | इसढिये वे यह न जान
सके कि ये साक्षात् भगवान् शंकर ईं । उन्होंने मार्ममें खड़े
हुए. पुरषसे पूछा--“तुम कौन हो ! इस नग्न अवधूतवेशरमें
; फेस आये हो ! तुम्हारा नाम क्या है ! सय बातें ठीक-ठीक
बताओ | देर न करो | भगवान् शिव अपने खानपर हैं या
ईंस समय कहीं अन्यत्र गये हैं ! में देवताओं तथा गुझरुजीके
प्ताय उन्हींके दर्शनके लिये जा रहा हूँ।?
इन्द्रके बारंबार पूछनेपर भी मद्दान् कीतठुक करनेवाले
/ ओएड्ारदारी मद्ायोगी भिलोकीमाथ शिव कुछ न वोले |
। जुप दी रे | तब अपने ऐशर्यका घमंड रखनेवाले देवराज
रद्रने रोपगें आकर उस जटाघारी पुरुषको फटकारा और इस
. अपार बा ।
इन्द्र बा८झ--अर मूद | दमते | त् वारबार प्छनेपर
उत्तर नहीं देता ! अतः तुझे बद्धसे मारता हूँ । देखे
धन पेरी रझा करता ६ |
पे हेड उस दिगमर पुरपफी और वोपपूर्वक देखते
५ थ रद्न उसे भार दाउनेडे लिये बन्न उठाया | यह देख
ः पाप उररने धान हो उस बजा सन्नन कर रिया ।
| ४ 5५ आर 3४३ या | इणलिफे पे पशरशा प्रहार ने
प्,
जाते ही भयागान साप्द्ा! ८६ चंद
सके | तदनन्तर वह पुरुष तत्काल ही क्रोधके कारण तेजसे
प्रज्यलित हो उठा) मानो इच्रको जलाये देता दो । भ्ुजाओंके
स्तम्भित हो जानेके कारण शचीवल्लभ इन्द्र क्रोधसे उस सर्पकी
भाँति जलने लगे, जिसका पराक्रम मन्त्रके बलसे अवरुद्ध हो
गया दो । बृहस्पतिने उस पुरषको अपने तेजसे प्रज्वलित होता
देख तत्काल ही यह समझ लिया कि ये साक्षात् भगवान् हर
हैं | फिर तो वे हाथ जोड़ प्रणाम करके उनकी स्तुति करने
गे । स्तुतिके पश्चात् उन्होंने इन्द्रको उनके चरणोंमें गिरा
दिया और कहा--८दीननाथ महादेव | यह इन्द्र आपके चरणोर्मे
पढ़ा है । आप इसका ओर मेरा उद्धार करें | हम दोनोंपर
क्रोध नई प्रेम करें । महादेव | शरणागत इन्द्रकी रक्षा
कीजिये | आपके ढब्याटसे प्रकट हुई यह आग इन्हे जक्ानेके
छिये आ रही है |?
चुदृस्पतिकी यह बात घुनकर अवधूतवेषघारी कझणासिन्धु
शिवने हंसते हुए कहा--“अपने नेत्रसे रोपवश दाहर निकछी
हुई अग्निको मैं पुनः कैसे घारण कर सकता हूँ। क्ष्या सर्प
अपनी छोड़ी दुई केंचुलको फिर ग्रहण करता है !?
बृहस्पति योले--देव | भगवन् ! भक्त सदा द्वी कृपा-
के पात्र दते हैं | आप अपने भक्तवत्सछ नामको चरितार्य
कीजिये ओर इस भयंकर तेजको कहीं अन्यत्र ठाल दीजिये |
रुद्रने कह--देवगरा ! में तुमपर प्रसन्न ४ | उसछिय
उत्तम वर देता हूँ । दन्द्रकों जीवनदान देनेफे कारण आजसे
तुम्दया एक नाम जीव भी द्वोगा | मेरे छल्याटवर्ती नेद्धसे हू
यटू आग प्रकट हुई २3 इसे देखता नर्री सूट
इसकी में वहुत दूर छोट्रगा।
३.
द् सस।
सं | अतः
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विसस यद इख्दर्ो पीड़ा:
एसा कदर भरने वेब्खदत उस अद्भुप अग्मफी रावम
पुकर भयदात् शवन झार महुंदने चढ़े दिएा | या द्द्न
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परिणत द्वोी गया) जी सिन्धुयुत्र जलन्थर नामसे विल्लात [|
किर देखताओंकी प्रार्सनाते भगवान खिवने दी अहुरंडे छा
जहन्वरका वध किसा था। अवधूतस्पसे ऐसी बुर ढंग
करके लोककक््यागकारी शंकर वहंसे अन्तात हे गे । हि
छब देवता अत्यन्त निर्भभ एवं गृत्ी हुए |छझओे
बुदत्यति भी उस भयसे मुक्त दी उत्तम मुस्के मंग्ी हु
जिसे डिये उनका आना हुआ था। वह भाव फि
दर्शन पाकर झतार्थ हुए । इंद्र और बृहलति प्रसव!
आप सासकों लले गये । समत्कुमार ! इस प्रकार मी
परमेश्र सियके असचूतेधर नानक अवतारका वर्णन फ्नि
जो हुएंकी दण्ड एवं भक्तोंकी परम आनन्द प्रदाव इसे
४ | यद दिव्य आज्यान पायका निवारण करे ये
भोग, मो तथा सम्पूर्ण मनोयाडझ्छित फनी श्राप द्ण्न
है। जो प्रतिदेन एकाम्रचिच दो इसे घुतता या हर
बद ३६ छोकमें उूर्ण मुर्लोका उपभोग करके ५०,
गति प्रात्त कर छेता दे | आग
भगवान् शिवके भिक्ुवयोवतारकी कथा, राजकुमार ओर हविजकुमारपर $पा
नन््दीदवर कहते हें--मुनिश्रेष्ठ | अब तुम भगवान
शब्भुके नारी-संदेहभश्गलक भिक्षु-अवतारका वर्णन सुनो) जिसे
उन्होंने अपने भक्तपर दया करके ग्रहण किया था | विदमे
देशरमे सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे) जो घममें तत्पर,
सत्यशील और बड़े-बड़े शिवभक्तोंसे प्रेम करनेवाले ये।
घमंपूवंक एथ्वीका पालन करते हुए! उनका बहुत-सा समय
सुखपूवंक बीत गया। तदनन्तर किसी समय शाल्वदेशके
राजाओंने उस णाजाकी राजधानीपर आक्रमण करके उसे चारों
ओर्से घेर लिया | बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ:
जिनके पास बहुत बड़ी सेना थी, राजा सत्यरथका बड़ा
भयंकर युद्ध हुआ । शन्नुओंके साथ दारुण युद्ध करके उनकी
बड़ी भारी सेना नष्ट हो गयी । फिर देवयोगसे राजा भी शास्यों-
के हाथसे मारे गये | उन नरेशके मारे जानेपर मरनेसे बचे
हुए. सैनिक मन्त्रियोंसहित मयसे विहलल हो भाग खड़े हुए ।
मुने |! उस समय विदभराज सत्यरथकी महारानी शन्नुआँसे
: घिरी होनेपर भी कोई प्रयत्न करके रातके समय अपने नगर-
से बाहर निकल गयीं। वे गर्भवती थीं; अतः शोकसे संतत्त
: हो भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई वे
5
घीरे-धीरे पूर्व॑देशाकी ओर बहुत दूर चछी |
होमेपर रानीने भगवान, शंकरकी दयासे एक निमह '
देखा | उत समयतक वे बहुत दूरका रास्ता वी
थीं | सरोवरके तटपर आकर वे सुकुमारी रानी न
वृक्के नीचे बैठ गयीं | भाग्यवश उसी
के नीचे ही रानीने उत्तम ग़ुणोंसे युक्त अमे पं
दिव्य बालकको जन्म दिया जो सभी अंम लय
था । दैववश उस वालककी जननी मरी के ह
प्यास लगी | तब वे पानी पीनेके लिये उतत की
इतनेमें दी एक बड़े भारी ग्राहने आकर रानीगी हज
बना लिया | वह बालक पैदा द्वोते दी माता है
और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस ताले किनारे सर
रोने छगा । इतनेमें ही उसपर कंपां करी हा
वहाँ आ गये और उस शिश्युवी रक्षा करने
प्रेरणासे एक ब्राह्मणी अकस्मात् वहाँ ऑ गयी
थी, घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाद करती दा
अपने एक वर्षके बालककों गोद लिये डे है
के तटपर पहुँची थी | उसने एक अनाग शिक्ष॒त
_>मम्य.. भय
तरुद्रस द्विता ] # भगवान् शिवके भिक्ष॒वर्यावतारकी कथा, राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा #
वास. आधा अमन,
फुते देखा | निबेन बनमें उस बालकको देखकर ब्राह्मणीको
पड़ा विस्मय हुआ ओर वह मन-ही-मन विचार करने छगी--
'अह्दी | यह मुझे इस समय बढ़े आश्रयेकी बात दिखायी
देती है कि यह नवजात शिकज्षु, जिसकी नारू भी अमीतक नहीं
कटी है; एरथ्वीपर पढ़ा हुआ है | इसकी माँ भी नहीं है |
पिता आदि दूसरे कोई सहायक भी यहाँ नहीं दिखायी देते ।
क्या कारण हो गया ! न जाने यह किसका पुत्र है ! इसे
जाननेवाला यहाँ कोई भी नहीं है; जिससे इसके जन्मके
विधयमें पूछूँ। इसे देखकर मेरे द्भृदयमें करुणा उत्नन्न दो
गयी है | में इस वालकका अपने औरस पुत्रकी मौंति पालन-
पोषण करना चाहती हूँ । परंतु इसके कुक और जन्म आदिका
शान न दोनेके कारण इसे छुनेका साइस नहीं होता ।?
आक्षणी जब इस प्रकार विचार कर रही थी; उस समय
भक्तवत्सल भगवान् शंकरने बड़ी कृपा की | बड़ी-बड़ी छीलाएँ:
करनेवाले मह्देश्वर एक उंन्यासीका रूप घारण करके सदसा
वहाँ आ पहुँचे; जहाँ वह ब्राद्मणी संदेदर्म पढ़ी हुई थी और
' यथार्थ वातको जानना चाहती थी। भेष्ठ भिक्षुका रूप घारण
करके आये हुए करुणानिधान शिवने उससे हँसकर कहां--
आह्षणी | अपने चित्तमें संदेह भोर खेदको स्थान न
| यह बालक परम पवित्र है। तुम इसे अपना ही पुत्र
प्नी और प्रेमपूषंक इसका पालन करो |
ब्राञ्रणी बोली--प्रभो | आप मेरे भाग्यसे ही यहाँ
परे हैं। इसमें संदेह नहीं कि मैं आपकी आशासे इस
लकका अपने पुत्रकी ही भाँति पालन-पोषण करूँगी। तथापि
विशेषरूपसे यह जानना चाहती हूँ कि वाद्धवर्मे यह कौन है)
शिक पुत्र है, और आप कौन हैँ; जो इस समय यह पधारे
. भिशुवर ! मेरे मनमें बार-बार यह वात आती है कि आप
अ्यासिन्पु शिव ही हैं ओर यद बालक पूर्वजन्ममें आपका
छा रद है। किसी कर्म-दोपत यह इस दुखस्थार्मे पढ़
ि२। इसे मागकर यह पुनः आपकी कृपासे परम कल्याण
॥ भाद। ऐगा | भे भी आपकी मायासते दी मोदित दो मार्ग
हार पढे आ गयी हूँ । आपने द्वी इसके पाल््नके छवि
'गेपएंनेजा
निरुप्वर शिवन कहा--प्राझ्णी ! सुनो, ये
3४ सिउनदध पिद्भेशात सत्यरपक़ा पु ३। ठा्परपक्ा
०३३ हे 5 दप्त गदन 9 शण्णा ै |
एव ध्च्य है एफने शीक्ापूपक आने मददसे दाइर शा
कक 8 | ने | 3 रद: रे ८ थ्डु ञ्श्छ्ो जप दिया ।
। |
लकी ६छणया
शेर५
सबेरा होनेपर वे प्याससे पीड़ित हो सरोवरमें उतरी | उसी
समय देववश एक गआहने आकर उन्हें अपना आह्वार
बना लिया |
ब्राक्मणीने पूछा--मिक्षुदेव | क्या कारण है कि इसके
पिता राजा सत्यरथ भ्रेष्ठ भोगोंके उपभोगके समय बीचर्म री
शाल्त्रदेशीय शन्नुओंद्ारा मार डाले गये | किस कारणसे इस
शिशु॒की माताकों आहने खा लिया ? और यह शिश्वु जो
जन्मसे ह्वी अनाथ ओर बन्धुद्दीन हो गया, इसका क्या कारण
है! मेरा अपना पुत्र भी अत्यन्त दरिद्र एवं. भिक्षुक क्यों
हुआ तथा मेरे इन दोनों पुत्रोंकी भविष्यमें कैसे सुख
प्राप्त देगा ?
भिक्षुयर्य शिवने कहा--इस राजकुमारके पिता
विदर्भराज पूवजन्ममें पाण्डयदेशक्रे श्रेष्ठ राजा थे ।चे संग
घर्मेकि ज्ञता घे ओर सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूवंक पालन करते
ये | एक दिन प्रदोपकालमें राजा भगवान् शंकरका पूजन
कर रहे थे और बढ़ी भक्तिसे त्रिलोकीनाथ मद्दादेवजीकी
आराघनामोंं संलम में | उसी समय नगरमें सब्र ओर बढ़ा
भारी कोछाइल मचा | उस उत्कट शब्दकों सुनकर राजाने
बीचमें ही भगवान् शंकरकी पूजा छोड़ दी और नगरमें क्षोम
फेलनेकी आशग्ज्स्लासे राजभवनसे बाइर निकल गये | इसी
समय राजाका महाबली मन्त्री शन्रुको पकड़कर उनके उमीप
के आया । वह झन्नु पाण्डयराजका ही सामन्त था। उसे
देखकर राजाने क्रोधपूवक उसका मस्तक कटवा दिया ।
शिवपूजा छोड़कर नियमको समाप्त किये विना दीदी राजाने
रातमें भोजन भी कर डलिया। इसी प्रकार राजकुमार भी
प्रदाषकालम शिवजीकी पूजा किये बिना द्वी मोजन करके सी
गया । बद्दी राजा दूसरे जन््ममें विदर्भराज हुआ था।
शिवजीकी पूज़ाम विष्न होनेके कारण झन्ुओने उसकी सुस्त
भोगऊे वीचर्म दी मार डाला । पूनजन्सर्म जो उसका पुत्र था,
वद्द इस जन््ममें भी हुआ 4। सित्रदीडी पृजाका उछ&:;म
फऊझरनेक कारण बंद दरिद्रताकी प्राप्त हुआ है | इस हो माता
एवंजन्मनें छलसे अयनी दोतड़ों भार टाझा था | १
पायक कारन हां पर इस हझनमन आइडइ द्वाग माता गा |
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पश्चात् भगवान् शिवकी आराधना करें | भगवान् शित उसका मुस्दर आम उसने पर बना रक्त था | वह उत्तम
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कल्याण करंगे।
इस प्रकार ब्राद्ाणीकों उपदेश देकर भिशभु ( श्रेष्ठ
तन्यामी ) का शरीर घारण करनेवाके भक्तवत्सक्क शितने उसे
अपने उत्तम ख्रूपका दर्शन कराया | उन्हें साक्चात् धिय
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जानकर ब्राक्मणपत्नीने प्रणाम किया और प्रेमसे गद्वदवागी-
द्वारा उनको स्तुति की | तत्पश्चात् भगवान शिव वहीं भनन््तघोन
हो गये । उनके चले जानेपर ब्राह्यणी उस बालकको लेकर
अपने पुत्रके साथ घरको चली गयी | एकचक्रा नामके
आने वेद तथा राजकुमारका भी परठ्नयोग्रा ले
सलासमय आदाणनि उने दोनोंका बल्येखरीत ढंत्ा:
दिया । थे दोनों थ्िसकी बूजामें तसर रहते हुए बढ है|
हंए | शाण्डिल्थ मुनिके उपदेशसे निवमपणाय होेऐ
शुभ मत रकर प्रदोषकालर्म इंकरजीडी पूज इसे)
एक दिन द्िजदुमार राजकुमाऱों ताय सब्थि झ्नि।
नम ध्लान करके लिये गया | वहाँ उसे विफ़ि
हुआ हक सुन्दर कलश भिरू गया। इस प्रकार अ्
धंकरफी पूजा करते हुए उन दोनों कुमारोंका उती बन ए
पर्ष व्यतीत दो गया | तदनन्तर एक श्षि सु
आहागकुगाए के साथ बने गया । वहाँ आजा!
गर्ससेकस्या आ गयी | उत्के पिताने वह कला पशु
दे द। गन्वर्मकन्थासे विवाद करके सजकुमार है
राज्य भोगने लगे | जिस ब्राक्षणपत्ीने पहले आने
भाँति उसका पाहन-यीषण किया या, वह्दी उस उम्र
हुई ओर यह ब्रादाणकुमार उसका भाई हुआ। एज
धर्मगुत था | इस प्रकार देवेशर शिवक्ी आपका
राजा धर्मगुप्त अपनी उस रानीके साय विद्मदिशों हे
छुक्षका उपभोग करने लगा । यह मैंने तुमसे विके।5
अवतारका वर्णन किया दै। जिन्होंने राजा बारी व
में मुख प्रदान किया था| यह पवित्र ऑला। का
प्रमपावन, चार्रों पुरुषार्थका सावक तथा प्मू 3
देनेवाला | जो प्रतिदिन एकाम्रचिंच हक ४ ॥
या सुनाता है; वह इस लोकमें सम्पूर्ण भेगेंका रा
अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। (आई |
नमन मल मत
शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा, उपमन्युकी तपसमा और उन्हें उत्तम वरकी ग्राति
नन््दीश्वर कहते हैँ--..सनत्कुमारजी | अब
शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन करूँगा, जिन्होंने बहस
भाई धोम्यका हितसाघन किया था | उपमन्यु न्याप्नपाद मुनि-
के पुत्र ये । उन्होंने पूर्वजन्ममें ही सिद्धि प्रात्त कर ली थी ओर
वतमान जन्ममें मुनिकुमारके रूपमें प्रकट हुए थे। वे शैशवा-
वस्थासे ही माताके साथ मामाके घरमें रहते थे और दैववश
दरिद्र ये। एक दिन उन्हें बहुत कम दूध पीनेकों मिल्ला |
इसलिये अपनी मातासे वे बारबार दूध मॉँगने लगे | उनकी
तपस्िनी माताने घरके भीतर जाकर एक उपाय किया ।
य
उज्छवृत्तिसे छाये हुए; कुछ बीजोंको पिला शतक
पानीमें घोलकर कृत्रिम दूघ तैयार किया |
कर वह डसे पीनेको दिया | माँके दिये $7 द्प मा
दूधको पीकर बालक उपमन्यु बोले--“है हि बी 4
इतना कहकर वे फिर रोने लगे । बेटेका कक (
मॉँको बड़ा दुःख हुआ। अपने हे केश
आँखें पोंछकर उनकी लक्ष्मी-ैसी माताने जी
लोग सदा वनमें निवास करते हैं | हमें वई दे का
सकता है । भगवान शिवकी कृपाके बिना कि"
शतरुद्रसंदिता] # शिवजीके किरातावतार के प्रसड्मे श्रीकृष्णद्वारा दु्वासाके शापसे पाण्डवोकी रक्षा #
३२७
मिलता | बत्स | पूवजन्ममें भगवान् शिवके लिये जो कुछ
' किया गया है) वर्तमान जन्ममें बी मिलता है |
.. माताकी यह बात सुनकर उपमन्युने भगवान् शिवकी
, आराधना करनेका निश्चय किया | वे तपस्थाके लिये हिमालय
। पब्रृतपर गये ओर वहाँ वायु पीकर रहने लगे | उन्होंने आठ
इंटंका एक मन्दिर बनाया ओर उसके भीतर मिद्ठीके
/ शिवलिइकी स्थापना करके उसमें माता पावतीसहित शिवका
आवाइन किया | तत्यश्वात् जंगलके पत्र-पुष्प आदि ले आकर
* भक्तिमावसे पश्चाक्षर मन्त्रके उच्चारणपूवक साम्ब शिवकी पूजा
करने लगे | माता पाती और शिवका ध्यान करके उनकी
[जा करनेके पश्चात् वे पञ्माक्षर मन्त्रका जप किया करते थे ।
इस तरह दीरघकाल्तक उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की |
मुने | बालक उपमन्युकी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित
त्रिभुचन संतप्त हो उठा । तब देवताओंकी प्रार्थनासे उपमन्यु-
के भक्तिभावकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् दंकर उनके
समीप पधारे | उस समय शिवने देवराज इन्द्रका। पाव॑ंतीने
शचीौका, नन्दीश्वर बुपभने ऐरावत हाथीका तथा शिवके गर्णोनि
सम्पूर्ण देवताओंका रूप घारण कर लिया । निकट आनेपर
तुरेखर-रूप-घारी शिवने बालक उपमन्युकों वर माँगनेके लिये
#श । उपमन्युने पहले तो शिवभक्ति माँगी; फिर अपनेको
इन्द्र बताकर जब उन्होंने शिवकी निन्दा की, तब उस बालकने
(भगवान् शिवके अतिरिक्त दूसरे किंसीसे कुछ भी लेना
भिस्वीकार कर दिया | वे इन्द्रको मारकर खय॑ भी मर जाने
4 उद्यत हो गये। उन्होंने जो अघोरासखत्र चलाया उसे
॥7दीने पकड़ लिया ओर उन्होंने अपनेको जलानेके लिये जो
भम्निको धारणा की, उसे भगवान् शिवने शान्त कर दिया |
"| रेर थे सक्-फेसच अपने यथाथ' स्वसख्पमें प्रकट हो गये !
उयने उपमन््गुको अपना पुत्र माना और उनका मस्तक
संघकर कहा--£वत्स ! मैं तुम्दारा पिता और ये पावतीदेवी
तुम्हारी माता हें । त॒म्दें आजसे सनातनकुमारल प्राप्त होगा ।
मैं तुम्हारे लिये दूध, दही और मधुके सहर्लों समुद्र देता हूँ ।
भक्ष्य-मोज्य आदि पदार्थके भी समुद्र तुम्हारे लिये सुलभ
होंगे । में तुम्हें अमरत्व तथा अपने गणोंका आधिपत्य प्रदान
करता हूँ ।? ऐसा कहकर शम्मुने उपमन्युकों बहुत-से दिव्य
वर दिये । पाशुपत-बरत, पाशुपत-ज्ञान तथा न्रतयोगका उपदेश
क्रिया | प्रवचनकी शक्ति दी ओर “अपना परमपद अर्पित
किया । फिर दोनों हाथोंसे उपमन्युकों ह्ृदयसे लगाकर उनका
मस्तक सूँत्रा ओर देवी पारवतीकों सॉपते हुए, कद्दा--ध्यद्र
तुम्हारा वेठा है ।? पावतीने भी बढ़े प्यारसे उनके मस्तकपर
अपना करकमल रक््खा ओर उन्हें अक्षय कुमार-पद प्रदान
किया । शिवने संतुष्ट होकर उनके लिये पिण्डीभूत एवं
अविनाशी साकार क्षीर-सागर प्रस्तुत कर दिया। साथ ही योग-
सम्बन्धी ऐड्वर्य, नित्य संतोष, अक्षय ब्रह्मविद्या तथा उत्तम
समृद्धि प्रदान की। उनके कुछ और गोन्रके अक्षय होनेका
वरदान दिया और यह्द भी कह कि मैं तुम्हारे इस आश्रमपर
नित्य निवास कर्ूलूँगा |
इतना कहकर भगवान् शिव अन्तघोंन हो गये | उपमन्यु
वर पाकर प्रसन्नतापूवक घर आये | उन्होंने मातासे पत्र वातें
बतायी | सुनकर माताको बड़ा हर्ष हुआ | उपमन्यु सबके
पूजनीय और अधिक सुखी द्वो गये | तात | इस प्रकार नि
तुमसे परमेश्वर शिवक्े सुरेश्वरादबतारका नर्णन किया ह।
यह अवतार सत्पुरुषोंकों सदा द्ौ सुख देनेबाला ई । स॒रेश्वरा-
वतारकी यद्द कथा पापको दूर करनेवाली तथा सम्पूर्ण
मनोवाड्छित फर्लोको देनेवाली जो इसे भक्तिपृर्वक
मुनता या सुनाता दे) वह सम्यूर्ण सुसोंको मोगकर अन्त-
में भगवान शिवको प्रात देता दे । ( अव्यान ३२ ;
शिवजीके किरातावतारके प्रसड्रमें श्री कष्णद्ार। छेतवनमें देवास के शापसे पाण्डवीकी रक्षा, व्यासजीका
भजुनका शक्रविद्या आर पाधिवपूजनकी विधि बताकर तपके लिये सम्मति देना, अजुनका
इन्द्रफीर पयतपर तप, इन्द्रका आगभन ओर अज्ञुनकों वरदान, अज्जुनका शिवजीके
उद्देश्यसे पुनः तपर्म प्रदत्त द्वाना
फ्नन्तर पाचती के दिराए प्रसझु्से एए लटिल- दर्तक
'श टज् सपनाराकी, फिर अध्यस्थामा-भदतारकीो
ते पदणर सन्दीम्परजी सगे कहते हे
पल पान रे का |
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क्र 4३११३ घने पुर आन रा “4५ का कप ० कक कक» जनक हम
ऊषनारओं वे पद! उता | उस हा हे म्में उन्द्नविर हक नाम ८ 6
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अरे >ाययमयनरनािक-पोपर ४... के. जी "े.न०7-3+ यश पक याहीकननं करता. ओम नया कब का आर
९०--- -सया७--7+ आग. २०) परीयाओनमम हम अं, १-पनयाकपूकिणम 3-3 पोमामनःपीमयक,
के क्त +- र् गः पूथे'
पाष्डव सर्य्वारा दी हुई बब्लोरिका आश्रय लेकर सुश्धपूवक
अपना समय बिताने लगे । विप्रवर ]) उसी क्माय सुयोसनने
आदरपूर्यक मुनिवर हुर्वासाकों छल करनेके प्रयोडनत पाण्डली-
के निकट जानेके लिये ग्रेरित किया । तब महू हुर्सासा
अपने दस हजार शिप्योके साथ आनन्दपुर्क वहाँ गये और
पाण्डबेंसे मनोडनुकूल भोजनकों याचना को | तब ठने सभी
पाण्डबोंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दुर्बास आदि तपस्ली
मुनिर्योकी स्नान करनेके लिये भेजा । मुगीधर ! इधर
अन्नभावके कारण वे सभी पाण्डय बडे संकथ्म पद गसे
ओर मन-ही-मन प्राण त्याग देनेका विचार करने टगे। तथ
द्रोपदीने श्रीकृष्णका सारण किया । मे तक्ताल ही वां था
पहुँचे और शाक ( के पत्ते ) का भोग लगाकर उन सभी
तपस्वियोंको तृ॑प्त कर दिया । फिर तो मदपि हु्वासा अपने
शिष्योंको तृत्त हुआ जानकर वहोंसे चलते बने । इस प्रकार
श्रीकृष्णकी कृपासे उस समय पाण्डव संकटसे मुक्त हुए |
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवेक्ी शिवजीनी
आराधना करनेकी सम्मति दी | फिर व्यासजीने भी आकर
उन्हें शंकरके समाराधनका आदेश देते हुए. कद्दा--शिवजी
सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाले हूँ | वे भक्ति करनेसे
थोड़े ही समयमें प्रसन्न हो जाते हैं | इसलिये सभी लोगेफो
शंकरजीकी सेवा करनी चाहिये। वे महेश्वर प्रसन्न दोनेपर
भक्तोंकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते दे, यहाँतक कि वे
इस लोकमें सारा भोग ओर परलोकमें मोक्षतक दे डालते
हैँ-यह विल्कुल निश्चित बात है । इसलिये भुक्ति-मक्तिल्पी
फलकी कामनावाले मनुष्योंकों सदा शम्भुकी सेवा करनी
चाहिये; क्योंकि भगवान् शंकर साक्षात् परम पुरुष, दुष्टोंके
संहरक और सत्पुरुषोंके आश्रयखरूप हैं| अब अर्जुन पहले
टढ़तापूबंक शक्रविद्याका जप करें | तब इन्द्र पहले परीक्षा
लेंगे; पीछे संतुष्ट हो जायेंगे। प्रसन्न होनेपर वे सदा
विष्नोंका नाश करते रहेंगे और फिर शिवजीका श्रेष्ठ मन्त्र
प्रदान करेंगे?
नन््दीदवरजी कहते हँ--मुने | इतना कहकर व्यास-
' जी अजुनको बुल्यकर उन्हें शक्रविद्याका उपदेश देनेको उच्यत
हुए; तब तीक्ष्णबुद्धि अजुनने स्नान करके पूर्वमुख बेठकर उस
विद्याको ग्रहण कर लिया । फिर उदारबुद्धि मुनियर व्यासजीने
अजुनको पार्थिवलिज्नके पुजनका विधान बतलाकर उनसे कहा ।
श
४ नमो सक्षाय शास्ताय अताण परमात्मने #
धाकुरपानियाा5ा एप लए तनन्तजरश भी जम एव मकागह एप य क/॑ंकए>सभककान्कत+उअफ कादकल्उर सावन कक रकम जा भमलार जज. «ली
अथवा ३७७ पआाग--पानना-कमममामाानक पा + पथ -+-४-नया्कनमनाकननकऊनक न पक न "यॉनय नए - पालन ककया आर नमन परपपन >> कान म वन भभ "मा कम भबकक-+ ० पकनती कट ४७७४४ कक.
कजन्सीिक चल अमान ॥॑रीएआ (+ अ्शनण्-मामियुरी >मित। अल २... + आमने ेननइन्ममण,
- कमलॉका स्मरण करके तुरंत ही अन्तर्धान हम
ब्यासजी बोले--थार्य ! अब तुम वहँसे पस साई
स््कील पर्वतपर जाओ और वहाँ जाएनवीके तलर री
सम्पकूरूपसे तपस्या करों। यह विद्या अच्छे है
तुम्दारा हित करती रहेगी |” अरजुनकों ऐसा आशिक
व्यासजी पाण्डवेंसि कहने लगे-हपभेष्टो | ठुषत से दा
धर्मपर हृढ़ बने रद्दो, इससे तुम्हें सवंथा 8 पिद्दि प्रा!
होगी; इसमें अन्यया विचार करनेकी आवश्यकता नह है!
नन््दीश्वरजी कहते हँ--हने | इस ह्रका कि
व्यास उन पाण्डवोंको आशीर्वाद दे तथा शिव
गये । अं!
शिव-मन्त्रके धारण करनेसे अजुनर्मे भी हक" ह
गया । वे उस समय उद्दीत्त हो उठे। भअ दे
सभी पाण्डवॉको निश्चय हो गया कि अवश्य ही हमाए *ि'
होगी; क्योंकि अजुनमें विपुल तेज उततन््न हो गया है ०
उन्होंने . अर्जुनसे कह्ा- ) “्व्यासजीके कृथनसे (पा कं ह
होता दे कि इस कार्यको केवल दुर्म्दी कर सकते हे
दूसरैके द्वारा कभी भी सिद्ध नहीं हो सकता औ
और हमलोगोंका जीवन सफल बनाओ ॥? तव इनक!
भाइयों तथा द्रोपदीसे अनुमति मोगी | उन की हि
विछोहका दुःख तो हुआ पर कायकी महंत हर
अनुमति दे दी | फिर तो अजुन मनःद्दीमत मै
शतरुद्ग॒संहिता | # किरातावतारके प्रसज्ञम झुक नामक देत्यका झूकर-रूप घारण करके अजुनके पास आना % ३२९
उस उत्तम पर्बत ( इन्द्रकीछ ) को चले गये | वहाँ पहुँचकर . शंकरका मन्त्र बताया ओर उसका जप करनेकी आशा दी ।
वे गज़जीके समीप एक मनोरम ख्थानपरः जो खगसे भी तदनन्तर अपने अनुचरोंकों सावधानीके साथ अजुनकी रक्षा
: उत्तम ओर अशोकबनसे सुशोमित था ठहर गये । वहाँ द
' उन्होंने स्नान करके गुरुवरको नमस्कार किया ओर जेंसा
: उपदेश मिला था; उसीके अनुसार स्वयं ही अपना वेष
बनाया । फिर पहले मन-द्वी-मन इन्द्रियोंका अपकर्प करके वे
; आसन छगाकर बेंठ गये | तलश्वात् समसूज्रवाले सुन्दर
| पाथिव ( शिवक्तिक्ष ) का निर्माण करके उनके आगे अनुपम
तैजोगशि शंकरका ध्यान करने छगे। वे तीनों समय स्नान
करके अनेक प्रकारसे बारंवार शिवजीकी पूजा करते हुए
उपासनामें तत्पर हो गये | तब अजुनके शिरोभागते तेजकी
व्यात्य निकलने लगी। उसे देखकर इन्द्रके गुतचर मयभीत
ही गये। वे सोचने छगे--यह यहाँ कब आ गया १ पुनः,
उन्होंने ऐसा विचार किया कि यह घटना इन्द्रको बतला देनी
चाहिये । ऐसा सोचकर वे तत्काल ही इन्द्रके समीप गये |
गुप्तचरोत्ते कद्दा--देवेश ! बनमें एक पुरुष तप कर
दवा है परंतु हमें पता नहीं कि वह देवता है; ऋषि है) सूर्य
| अथवा अग्नि हँ | उसीके तेजसे संतप्त होकर हम आप-
$ संनिकट आये हूँ | हमने उसका चरित्र भी आपसे निवेदित
५5४२ दिया । अब आप जेसा उचित समझें) वेसा कर | करनेका आदेश देकर वे अजुनसे बोले--भद्र | तुम्दहं कभी भी
# नन््दीश्वरजी कहते हँ---मुने | उन गुप्तचरोंके यों कहनेपर . ्रमोदेपू्वक राज्य नहीं करना चाहिये । १ स्तप ! बद विद्या
(स््रकों अपने पुत्र अर्जुनका सारा मनोरथ ज्ञात हो गया । उम्हारे लिये अयस्करी होगी। ताधकरकों तवथा धेयें धारण
॥बवे पर्वतरक्षकोंको विदा करके स्वयं वहाँ जनेका विचार हिये रहना चाहियेः रक्षक्ष तो भगवान, डिव ई ही। बे
रन लरो | पिप्रवर | इन्द्र अर्जुनकी परीक्षा करनेके लिये. समत्तियाँ ओर फल ( मोक्ष ) दोगों तथानल्पसे दंगे। इसमें
# अद्यचारी ब्ाद्मणका वेप बसाकर वहाँ पहुँचे । उससमय पनिक भी संशय नहीं दे (?
(| आया हुआ देखकर पाण्पुपुत्र अजुनने उनकी पूजा की ननन््दीनवरजी ऋदते ६--सुने 4 इस पकार संजुुसकों
(हर उसकी ख्तुति करके आगे जड़े हों पूछने छगे-- वरदान देकर देवरात इन्द्र शिवर्जीह चरनक्रमलछाका सरण
का गे, ! बताइये, इस समय कहँसे आपका छुभागमन -करते हुए, अपने शवनकों छींड गये । तप मदबीर अपुनने
३४ भा ६ ?? इसपर प्रातणंबपधारी इन्धसे अनेकों ऐसे बचने... भी सुरेखरहों प्रणाम किश आर किए वे मनी पद्म करे
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! श्र हु जा आणा # नया रद ज्ञाय | जय के कक बल *०+ ्् मल कल पलक उपरेशानर कद मार न श्य > ८ >+ ०्ह्-लछट्रड -- से ैल्7/*सहल 50 8%हुआ। रद फ का ् "पा
है ! 29 जनिषत ८ ६ शछ-त्त डिग साया पर जय शव उप दटानश्वय् इन्ठस उपबबश्चशात जिया जद्द्दा से तर! रन दुंग |
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4 प्र देय हिल व्कीक, नें न्को + ण्णगर शक पट कार उकन्यात- कु द््प्ड हर श्र न फा सर भयः कर के पु ना ए्गय क् किलर फ्, न
हि] ७७ तब आउनसे रपह्यत प्रकूट हह़र इन्दरत अशुना पाद्ू ६ अएदाय ३३- -२८ /
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किशतापतरक प्रत:न मक नामक देत्वका शाकार-हूप पारण ऋरक अजुनक पास आदवा, शियत्राओ
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झरण करके शम्भुके सर्मात्कए _याक्षर मन्यका जप करते हुए
धोर तप करने छगे | उस तपस्याका ऐसा उत्फए शेज प्रदट
हुआ, जिससे देवगण विश्मित ४ गये। पन; से शिवभी>े वास
गये ओर समाहित चित्तसे वोछे | ु
देवताअनि कहा---सर्मेग | क मनुष्य आपके जिले
तपस्माम निरत ४ ॥ कुछ चाहता है।
च्बः
ननन््दीशयरजी कहते “मु । यो बद्कर देवता ओं-
ने अनेक प्रकारसे उनकीं लुति की। फिर उनके सर्णाकी और
लगाकर वे विनमप्रभावसे € ड़ हो गये । तब उदासुदि
एवं प्रसन्नात्मा महाअ्रभु शिवजी उस वचनमो मुनकर ठठाकर
हँस पड़े और देवताओंसे इस प्रकार ब्रोले ।
शिवजीने कहा--देवताओ ! अब तुमलछाग अप
सानको छोट जाओ | में सब तरहसे तुमलोगेका क्रार्य समन्न
करूँगा | यह विल्कुछ सत्य है, इसमें संदेइकी गुंजाइइ
नहीं है ।
नन्दीश्वरजी कहते हँ--मुने ! शम्मुके उस बचनको
सुनकर देवताओंको पूर्णतया निश्चय हो गया | तब थे सब
अपने खानको लौट गये । इसी समय मूक नामक देत्य
बक़रका रूप धारण करके वहाँ आया | विय्रेन्द्र | उसे उस
पमय मायावी दुरात्मा दुर्योधनने अजुनक्ने पास भेजा था ।
वह जहाँ अर्जुन ख्ित थे, उसी मार्गसे अत्यन्त वेगपूर्वक पर्वत-
शिखरोंको उखाड़ता, वक्षोंकी छिन््त-भिन्न करता तथा अमनेक
प्रकारके शब्द करता हुआ आया | तब अजुनकी भी हृष्ट
उस मूक नामक असुरपर पड़ी, पे शिवजीके पादपक्ोंका
सरण करके यों विचार करने ल्गे |
नयाकुछ हो जाय; वह झत्रु ही है | आचारसे कुलका, शरीरसे
भोजनका, वार्ताल्यपसे शाजशानका और नेत्रसे स्नेहका परिचय
मिलता है। आकारसे, पीठ ठालसे, चेश्टासे, बोलनेसे तथा
ने और मुखके विकारसे मनके भीतरका भाव जाना जाता
डे | नेत्र चार मकारके कह्दे गये हैं--उज्ज्वल, सरस, तिरछ्े
ईरि छाछ | विद्वानोंने इनका भाव भी प्रथक-पथक बतलाया
# नमो रूद्राय शान्ताय त्रह्मग पर मात्मन
० 52३39 ८ 4 24 अत ब का: आय न जज भाप यम कर का: 7 अ तछ तक मा अप >> 5 क+ ज> रन जल लक कऊ + ० पर
| संक्षिप्त-शिवुफ
प्फ्प्य्प्फज...
दे । नेत्र प्ित्रका संगंता दोनेपर उज्म्रढ पुत्रदगनढ़ छा
/ए कामनीके य्रात्त दनेवर बक और अगर दंत जे
अंक ठा आगे £ | ( इस निय्रगक्के अनुसार / इसे देखे हू
॥ी सारी उम्ल्यां #उपित हो उरी ह, अतः क तल
धनु दी ४ और आर आठमे योग्य है । इधर मेरे झ्े (्
क भाशा भी ऐसी # गजन | जो तुझे ढ् देश कि
उ्त हो, उत्े तुम बिना किसी अकारका विचार विये २
कर टालिता तथा ईनिे उसीलिये आयुष मां तो बज
राता दे । यों गिसारकरर अजुन वाणका संबान के
/ड्कर पड़े दो गये |
क्ना
न अल ढक ३० न | 3० जा] /ल् मनी आन...
४ बीन भक्तमल्मल भगवान गंकर अर ए
उनकी भक्तिकी परसीक्ष ओर उत्त देलका गा अं
डिग्रे आर दी कराँ आ पहुँचे। उत तम्रव उक्के ता
ग्ोंका यू भी था और थे महान् अदूमुत त॒शिक्षि मत
ला भारण किये हुए बे | उनकी झछ ऊँ पम
उन्दनि वत्लसण्डोंस इशानध्यज बाँध खखायथा उसे कर
संत धारियाँ चमक रही थीं, पीठपर वाणेतेमर हुआ हक
बंधा थ। ओर थे ल्वय॑ बनुष्-वाण घारण हिवे हुए )|
दाव्दसे वबराकर अर्जुन तोचनें लगे-अल्ले ! हे "
शिच तो नहीं हैं, जो यहाँ शुभ करनेके लिये 9] क् रा
मेने पहलेसे ही ऐसा उन ख़खा है | पुतः हक
व्यासजीने भी ऐसा ही कहा है तथा देवताओंने मी
अरण करके ऐती ही घोषणा की है कि शिवजी हल हे
ओर सुलदाता हैं । वे मुक्ति प्रदाव करनेके काए हे
कहे जाते हैं | उनका नामस्मरण करनेंते मह॒घवोंक हि !
स्थाण होता है । जो लोग सर्वभावते उनका मर हि
उन्हें स्वप्नमें भी दुःखका दर्शन नहीं होता | है
ऊुछ डुःख आ ही जाता है तो उसे कर्मगतित हा
चाहिये। तो भी वहुतकी आशश्ढा होनेपर भी हा
अथवा उसे विशेषरूपसे प्रारब्धका ही दोग गो पी
अथवा कभी-कभी - भगवान् शंकर अपनी इच्छोे जो
अधिक ढुःख भुभताकर किर-विस्संदेह' उसे रे
विपको अम्नत और अमृतकों विप बना देते
किरातवेषधारी बढ 2 अजुनका ड रे युद्ध ज्
दतरुद्रसंहिता ] * अज़ुन और शिवदुतका वातालाप: किरातवेषघारी शंकरके साथ अजुनका युद्ध # रेरेर
लाली,
33०० न-कन+ “मनन न नमन“ “नमन नमन नकनन न कननल्नन+ न मनन + नमन ननन नमन नमक +५+५ नमन 4 कम कल नल क न बन कक नमन कक क ० मन पन्् ् क 6 क्खल्खध शचणररि खिल
उनकी इच्छा होती है) बैसा वे करते हैं | मा; उन समर्थकों वे वारंबार नमस्कार करके स्तुति करने छगे | उस समय उन
कौन मना कर सकता है। अन््यान्य प्राचीन मक्तोंकी भी ऐसी दोनेने देत्वके उस क्रूर रूपक्ी ओर इृष्ठिपात किया। उसे
हो » अजुनको ४ महान्
ही घारणा थी अतः भावी भक्तोंको सदा इसी विचारपर देखकर शिवजीका मन संतुष्ट हो गया और अजुनको महान्
अपने मनको खिर रखना चाहिये | लक्ष्मी रहे अथवा चली “ हो “कक
2268 /.॥ "0 हर
| ।
लोग निन््दा कर अथवा प्रशंसा; परंतु शिवभक्तिसे दुःखेंका "
विनाश होता ही है। शंकर अपने भक्तोंको, चाहे वे पापी हों
या पुण्यात्मा; सदा सुख देते हैँ । यदि कभी वे परीक्षाके
लिये भक्तको कष्टमें डाल देते हैं तो अन्तमें दयालस्वभाव
होनेके कारण वे ही उसके सुखदाता भी होते हैँ | फिर तो वह
भक्त उसी प्रकार निर्मल हो जाता है; जेसे आगमें तपाया
हुआ सोना शुद्ध हो जाता है | इसी तरहकी बातें मेने पहले
भी मुनिर्येकि मुखसे सुन रक्खी हैं; अतः में शिवजीका भजन
करके उसीसे उत्तम सुख प्राप्त करूँगा !? ४
अजुन यों विचार कर ही रहे थे; तबतक बाणका
लक््यभूत वह सूअर वहाँ आ पहुँचा । उधर शिवजी
भी उस सूअरके पीछे लगे हुए दीख पड़े । उस
समय उन दोनेंके मध्यमें बह शकर अद्भुत शिखर-सा
दीख़ रह्य था | उसकी बड़ी सहिमा भी कही गयी है । तब
भक्तवत्सल भगवान् शंकर अजजुनकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे
आगे बढ़े | इसी समय उन दोनोंने उस झृक़रपर बाण
चलाया । शिवजीके वाणका लक्ष्य उसका पुच्छभाग था ओर
अजुनने उसके मुखको अपना निशाना बनाया था। शिवजी-
का बाण उसके पुच्छभागसे प्रवेश करके मुखके रास्ते निकल
गया और झीम्र ही भूमिमें विदीन दो गया | तथा अर्जुनका
' पाण उसके पिछले भागसे निकलकर बगलमें ही गिर पड़ा ।
तब यह शूकरअूपभारी देत्य' उसी क्षण मरकर भूतलूपर गिर
: डा | उसे समय देवताओंकों महान् हमे प्राप्त हुआ । उन्होंने
: न्हण तो जय-जयकार करते हुए पुष्योंकी श्वाष्टि की, फिर
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जाय; मृत्यु अखोंके सामने ही क्यों न उपस्थित हो जाये | ४ 2)
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सुख प्रात हुआ । तसश्रात् अजुन मन-ही-मन विशेषदूपसे
सुखका अनुभव करते हुए कहने लगे-“अहो ! यह श्रेष्ठ देत्य
परम अद्भुत रूप धारण करके मुझे मारनेक्े लिये ही आया
था; परंतु शिवजीने ही मेरी रक्षा की है। निस्संदेह उन परमेश्वरने
दी आज ( इसे मारनेके लिये ) मेरी बुद्धिको प्रेरित किया £ |?
ऐसा विचारकर अजुनने शिव-नामसंहीत॑ंन किया ओर फिर
बारबार उनके चरणंमिं प्रणाम ऋएछे उनकी लुति की |
/ अब्याय ३९ )
“++औै एस इलफा 2...
हे के स््ि | 4५ पदतक । 7९ की ्् (तवेषधारी शी हा शिवजी के ९, लि है क्नक कि पुहचाननेपर 4 ?
. भजन आराशवदतका बातोलाप, िरातवेपधारा शिवजीक साथ अछ्चुनका युद्ध, पहचाननंपर अन॒नद्राग
गिय् 4 है गीक भजु | फरे वग्द ४ ब कर > ग्वः न का अज वि न कम ५
,. गपस्तुति, शतज्ञाका अजुनका वरदान दकर अन्तथान हाना, अज्ुनका आश्रमपर लोटकर
( भाइयोंसे मिलना, श्रीकृप्णका अजुनसे मिलनेके लिये वहाँ पधारना
१! हज जँ 3 ॥ ज़ न रेट हि कर रे कि कं धन दर हे
# ॥ | [ ह - ८ | बी यू ड ततें *जजुछ कक रच पृ चर "८१ “के “चअ'” सार: कटी. | 2 कर +>स्मकाल्भक- ञ्औ दे ॥ %-जतफू जे कल कह 7५ औन्कल्का.. का ० त्रुँंफक >4+ नेक चा हे न्त-क बी उतनी स्केनक ० का
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ँ यानी आल 4 2 पैक 2९ पक म्5 |] जो शक. >- ०3 का. रद छू क्र हद |
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भक्तिएएक मुने । भगवान >....- - जड़
; ४: हा यो... अडिकी नुदीको गषना न >
दइफरज धंज्या नहीं » । #/ जा रे ता, फ प्रश्न ठप
आपके कोड |
गुणांकी ३]
ग्नेमं ते भेद 7) ।
फे है; फ़िर 2 दि हूँ; में तो एक्र ज््
आप
गया तत रंकरका / 7] 2
/ तत्र वे हैजते हुए पुनः अल रह पतन यद्र |
दे ए2
नन्रीश्यरज् ४:
पर अजञनिने हक 'ऊहते हैं--महें येक़रजके थक
किया और फिर 23...3.. मेक हो तदाकिक्नो £
अजुनिने +मेपूक गद्दद वाणीमें कहना आत्म #
से सबके अंदर दि..." / आप तो सं ही न
पिनाक सशोभित हे हे ) हैं ( अत: पट-चठती बो!
अणाम हे का पनिये | भगवन् |
गजचर्मक्षा |
अब जिस कल हे आपके दर्नते ही विष है ४
६ ५ परापिद्वि -£
॥ कृपा कीजिये स्अ जे ओककी परातिदि शहर
वस
/ मुझ्पर शत्रओद्वाए हे है
नन््दीरवरजी | 8 ० 4
भक्तवत्सछ ऊहते हैं-ुने / इतना क्र #
हाथ जोड़कर हिल रकरको नमस्कार क्विवा और £*ै
सं कक झुकाये हुए उनके मिकट बड़े है
[#शतरुद्गसंहिता ) # शिवजीके छाद्श ज्योतिर्लिज्ञावतारोंका सविस्तर वर्णन # ३३५
हअर्जुन मेरा अनन्य भक्त हैः तब वे भी परम प्रसन्न हुए। अपने भाई युधिप्ठिस्से सबंदा नाना प्रकारके धमंकाये
झफिर उन महेइवरने अपने पाग्रपत नामक अश्नको, जो सवंदा कराते रहो ।
पसमल ग्राणियोंके लिये ढुर्जय है) अजजुनकों दे दिया और इस नन््दीश्वरजी कहते हैं--हुने ! यों कहकर शंकरजीने
- की गा का अर्जुनके मस्तकपर अपना कर-कमल रख दिया ओर अर्जुन-
द्वारा पूजित हो वे शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये | इस प्रकार
भगवान् शंकरसे वरदान ओर अख्लन पाकर अजुैनका मन प्रसन्न
हो गया । तब वे अपने मुख्य गुद शिवका भक्तिपूर्वक स्मरण
करते हुए, अपने आश्रमकों लोट गये । वहाँ अर्जुनसे मिलकर
सभी भाइयोंकों ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ मानो मस्तक शरीरमें
* प्राणका संचार हो गया हो | उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली
द्रोपदीकों भी अत्यन्त सुख मिला | जब उन पाण्डवोंकों यह
जशञात हुआ कि शिवजी परम संतुष्ट हो गये हैं, तव उनके
हषका पार नहीं रहा । उन्हें उस सम्पूर्ण ब्ृत्तान्तके सुननेसे
तृप्ति ही नहीं होती थी । उस समय उस आश्रमम महामनस्ती
पाण्डवोंका भल्ा करनेके लिये चन्दनयुक्त पुष्योंकी ब्रृष्टि होने
लगी | तब उन्होंने हृ्पूर्षक सम्पत्तिदाता तथा कब्याणकर्ता
। हा रे “82 ' ल्ज्र शिवको नमस्कार किया और ( तेरह वर्षकी ) अवधिको समाप्त
0८ याद न) हुई जानकर यह निश्चय किया कि अवश्य ही हमारी विजय
न्कर5 5 होगी | इसी अवसरपर जब श्रीकृष्णको पता चला कि अज्ुन
आए उलक्सा > ८ इककत्ट:.. लौयकर आ गये हैं, तब यह समाचार सुनकर उन्हें बड़ा सुश्ल
0०७७४७४७४४७४७४४ मिला और वे अजुनसे मिलनेके लिये वहाँ पघार तथा कहने
शिवजी वाजे->व्स | मेने तुम्हें अपना मद्न अच्न दे लगे कि “इसीलिये मेने कह्दा था कि दांकरजी सम्पूणे कटका
या | इसे धारण करनेसे अब तुम समस्त शत्रओंके लिये. विनाश करनेवाले दूँ। में नित्य उनकी सेवा करता हूँ, अतः
जय हो ज्ञाओंगे | जाओ, विजय-लाभ करो | साथ ही में. आपलोग भी उनकी सेवा करें|? मुने ! इस प्रकार मैने
क्णसे भी कहूँगा, वे तुम्हारी सहायता करेंगे; क्योंकि रॉकरजीके कियत नामक अबतास्का वणन किया | जो इसे
फष्ण मेरे आत्मखरूप, भक्त और मेरा कार्य करनेवाले. छुनता अथवा दूसरेकों सुनाता दे; उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण
| भारत | भरे प्रभावसे तुम निष्कण्टक राज्य भोगो और दो जाती दे | ( अच्वाय ४०-४१ )
है|
जम
शियजीके द्वादश ज्योतिलिड्रावतारोंका सविस्तर वणन
नद्ाम्यरज़ी कहते हु--मुने ! अब तुम सर्वव्यापी नागेशख्वर सेलुबन्धपर रामेशबर और शिवाहयर्म घुइमस्वर ।
पंत शरद पारद् अन्य च्योतिर्तिपृस्धदपी अदतारोंका भमे ! परमात्मा शम्नके ये ही वे बारट आदरार में | थे दा
० कर « जएपए स्यातालप्नस्थचपा अवतारकि ४ने ; पररनात्मा शास्जुक वे हां वे बार आउशार इ।े ये बहा:
थे फपण करो: जो अनेक प्रकार मप्नल करनेवाले ५ं। और राश इसेसे मत॒प्देडी गय अशरहा आस प्रदान
न ३ 5७
स्नेह >> पे एं--। सोशष्ट्रसी तोममाग: ीशैदयर फरते है। गे ! उनमें पहला आरतार सेप्रखावऱा 5 । यड
83 ७ के ० 5४४ री] ५
आजम, इेजाओत्म भराद्ाोडे ओहरमे अमरेदपर,.. सादापद इुज4रा बिनाश हरनेयाल्या 4 । :ेमदा पूएन हरनमे
्ड सक+ जऋ
१९९ + हर टक्मार्म भीगदाबार: शाशीगे कि्दटापए 2 ० पद कप पल ता के हक कब आल क
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हज उपर पंम्मश्चर जिलानूमिर्म पदम्याय दाषादपमओोे.. बामक टगायसार 0720 7
३३६
# नमा रद्राय शान्ताय अहयग परम त्मन 5
[सं क्षित-शिवषप्र
जल वाउक कक चास्या ७-5: ७७४० जो ्लच्च्च्च्-ज
ि
धर
खत दे । पूर्वकालमें चस्धमाने उनकी पूजा की थी । सह
सम्पूर्ण पापोंका विनाझ करनेबाल्य एक सस्द कुण्ड दे। जिसमें
स्नान करनेसे बुद्धिगान् मनुध्य सम्पूर्ण शैगोंसि मुक्त दो जाता
है | परमात्मा शिवक्रे सोभेश्वर नामक महाहिउरका दहन
करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता | और उत्ते भोग और गोश्न
सुलभ हो जाते है । तात | डंकरजीका मे ल्लिकारुन मामक
इंसरा अवतार श्रीशेलपर हुआ | बहू भक्तोंको अभीश फुल
भदान करनेवाल्य है । मुने | भगवान् शिव परम प्रस नतापूर्यफ
अपने निवासभूत कैहासगिरिसे छि]ल्ररुपमें श्रीशलपर पभारे
5 | पुत्र-मातिके लिये इनकी स्तुति की जाती २ । मुने | सह
जो दूसरा ज्योतिलिंज्ग है, वह दर्शन और पूजन करनेसे महा
छुलकारक होता है और अन्त मुक्ति भी प्रदान कर देता
है--इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तात | झंकरजीका
“डाकाछ नामक तीसग अबतार उजगिनी नगरीमें हुआ |
वह अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाह्य हैं | एक बार रत्नमाल-
निवासी दूषण नामक असुर जो बेदिक धर्मका त्रिनाझक,
विप्रद्रेही तथा सब कुछ नष्ट करनेवाल्ा था, उजप्रिनीमें जा
पहुँचा । तब वेद नामक श्राह्मणके पुत्रने शिवजीका ध्यान
किया । फिर तो शंकरजीने तुस्त ही प्रकट होकर हुंकारद्ारा
उस अछुरकों भस्म कर दिया | ततसश्रात् अपने भक्तोंका
सर्वथा पालन करनेवाले शिव देवताओंके प्रार्थना करनेपर
डाकाड नामक ज्योतिर्लिज्ञखखल्पसे वहों प्रतिष्ठित ही गये ।
*न महाकाछू नामक हिल्ठका प्रयलपूर्वक दर्शन ओर पूजन
करनेसे मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्त
उसे परम गति प्राप्त होती है। परम आत्मबल्से सम्पन्न
परमेश्वर शम्भुने भक्तोंको अभी अल प्रदान करनेवाल्य ऑंकार
नामक चौथा अबतार घारण किया | सुने | विन्ध्यगिरिने
भक्तिपूवंक विधि-विधानसे शिवजीका पार्थिवलिज् खापित
किया । उसी लिड्से विन्ध्यका मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेव
अकट हुए. | तब देवताओंके प्रार्थना करनेपर भुक्ति-मुक्तिके
“दाता भक्तवत्सल लिड्नल्पी शंकर वहाँ दो स्पॉर्में विभक्त हो गये।
मुनीधवर | उनमें एक भाग ओकारमें ओंकारेघर नामक
उत्तम लिड्ञके रुपमें प्रतिष्ठित हुआ और पूंसरा पार्थिव छिड्
परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ । मुने ! इन दोनोंमें जिस
किसीका भी दर्शन-पूजन किया जाय, उसे भक्तोंकी अभिव्मप्रा
पत करमेबाड।
पर ब्ब
के ् न कुज्ज्क ८ कक अन जान के
कै | ष | हक कै; के 3
ञज्ञञ्तौ ्क ञं ।
पमदना चाहिये। महमुत्रे | झ क्
दीनों गदादिव्य आोतिकलोत्र आम
दिया । बरखाओ स्ियके ऑन अवतार नाम है छेद!
पढे कदर ज्वोविलिश्नक्समे खत है । मुने ! को
जी नर-नारायग नामक अपतार हैँ, उनके प्रा्की क्र
शिवजी द्वागिरिक हदार झिलरपर खित हो गे) ले
उस कदरियर छिफ़्ं सित्य पा करते है। कॉ गत
ओर पूजन करनेत्राछे भक्तोके असीश प्रदान के है|
गर्य-पर दूत इण भी शिव इस खग्दके विशेषत्यते छत
शिवओका बद अवतार समूर्ण अभौवद्रो पद ऋे।
दे | मदाशभु झमुके छठे अवतार वात मंझांगी
ईत अयतारम उद्दोंने बड़ीयड़ी लीलाएँ हे ओ
भामामुस्द मिनाझ्ष या है । कामरत्य केडे की
शजा सुदक्षिण विव्रज्ीके भक्त वे। भीमानुर उन्हें पक्षित
एव था । तब्र इंकरमीने अपने भक्तकों हु कोंशे 7
अत अमुस्ता वध करके उनकी रक्षा जो।ब्रिक्
सुदक्षेणके आर्थना करनेपर सब शंकरजी गक्िनोमे मर
नामक ज्योतिलिध्र्नल्पसे खत हो गये | नुने | को 6
त्रत्माण्डखज्प तथा भोग-मोश्षक्रा प्रदाता है; वह किखेश रे
तात्बा अवतार करा्ममें हुआ | मुक्तिदाता तिद्ितल
भगवान् शंकर अपनी बुरी काममें ज्वोतिरलिज््मों दिए
विष्णु आदि स्मी देवता, कैलासपति शिव और मे
उनका पूजा करते हैं | जो. काझी-विश्वनायके के हे
नित्य उनके नामोंका जय करते रहते हैं; वे कमंते विरि हीं.
ऊवल्य-पदक भागी होते हैं । चद्धशेखर सिवा हे |
पामक आठवों अवतार है, वह गौतम ऋषिके प्रा हा
पर गौतमी नदीके तटपर प्रकट हुआ था | गेतली और
उन मुनिकों प्रसन्न करनेके लिये शंकरजी प्रेमपूर्की लव हे
स्र्पसे वहाँ अचछ होकर स्ित हो गये । और
महेथरका दर्शन और स्पर्श करनेसे सारी का '
हा ह 3 । गई
हो जाती हैं । तत्पश्चात् मुक्ति भी मिल जाती | ते
अनुप्हसे शंकरप्रिया परम पावनी गड्ना गौताहें लें
यहाँ गौतमी नामसे प्रवाहित हुईं । उनमें का पा
वैद्यनाथ नामसे प्रसिद्ध है । इस अबतारों को |
छीलाएँ करनेवाले भगवान शंकर रावणके लिये आए
शतरुद्वसंहिता |
%# शिवजीके द्वादश ज्योतिर्लिज्ञावतारोँंका सविस्तर वर्णन #
३३७
?॒ ये | उस समय रावणद्वार अपने लाये जानेको ही कारण
नकर महेश्वर ज्योति्लिक्न खरूपसे चिता-भूमिमें प्रतिष्ठित
गये | उस समयसे वे भिलोकीमे वेद्यनाथेश्वर नामसे
ख्यात हुए । वे भक्तिपूवक दर्शन और पूजन करनेवालेको
गमीक्षके प्रदाता हैं | मुने | जो छोग इन वेद्यनाथेश्वर
के माहाृत्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं, उन्हें यह भुक्ति-
क्तिका भागी बना देता है | दसवाँ नागेश्वरावतार कहत्यता
| यहू अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये प्रादुभृंत हुआ था |
द सदा दुर्शेशो दण्ड देता रहता है। इस अवतारमें
जीने दास्क नामक राक्षसक्रोी, जो घमंबाती था;
रकर वेश्योंके खामी अपने सुप्रिय नामक भक्तकी रक्षा की
॥। तस्श्वात् बहुत-सी छीलाएँ करनेवारे वे परात्पर प्रभु
म्मु छोकोंका उपकार करनेके लिये अम्बिकासहित ज्योतिलि!ज़-
सुपसे ख्ित दो गये । मुने ! नागेश्वर नामक उस
|वलिश्कका दर्शन तथा अचेंन करनेसे राशि-के-राशि महान्
(तक तुरंत विनष्ट हो जाते हैं | मुने | शिवजीका ग्यारहवों
पतार रामेश्वरावतार कहलाता दे । वह श्रीयमचद्धका
व. करनेवाह्य है । उसे भोरामने ही खापित किया
+। जिन भक्तवत्सल शंकरने परम प्रसन्न होकर श्रीरामको
पूरक विजयका वरदान दिया, वे ही लिट्रूपमें आविभूत
(। भुने | लव श्रीरमक्े अत्यन्त प्रार्थना करनेपर वे
। मन््चार ज्योतिलि॥रूपसे स्थित हो गये | उस समय
#गने उनकी भदीमोति सेवायूज़ा की । रामेश्वर्की अ;
#माकी भूतटपर किसीसे तुल्मा नहीं की जा सकती |
सदा सुकिमुक्तिकोीं प्रदायिनी तथा भक्तोंकी कामना
+ फरनयादी ६ | जो गनुप्य सद्धक्तिपू्वक रामेश्वर छिफ्लको
गड्डाजलसे ल्लान करायेगा। वह जीवन्मुक्त ही है| वह इस
लोकमें जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं, ऐसे सम्पूण
भोगोंकी भोगनेके पश्चात् परम शानकों प्राप्त होगा | फिर
उसे केवल्य मोक्ष मिल जायगा | घुछ्मेश्वरावतार शंकरजीका
वारह॒वाँ अवतार है। वह नाना प्रकारकी लीलाओंका कर्तो,
भक्तवत्सल तथा घुश्माको आनन्द देनेवाला दे । मुने |
घुश्माका प्रिय करनेके लिये भगवान् शंकर दक्षिण दिशामे
स्थित देवशेलके निकय्वर्ती एक सरोवरमे प्रकट हुए । मुने !
घुश्माके पुत्रकों सुदेदने मार डाला था | (उसे जीवित करनेके
लिये घुशमाने शिवजीकी आराधना को | ) तब उनकी भक्तिसे
संतुष्ट होकर भक्तवत्सछ शम्भुने उनके पुत्रको बचा लिया ।
तदनन्तर कामनाओंके पूरक आम्भु घुश्माकी प्रार्थनासे उस
तड़ागर्म ज्योतिलिड्ुल्ूपसे स्थित हो गये | उस समय उनका
नाम घुर्मेखवर हुआ । जो मनुष्य उस शिवलिद्वका भक्तिपूवक
दर्शन तथा पूजन करता है; वह इस ल्लेकमें सम्पूर्ण सुलको
भोगकर अन्तमें मुक्ति-लाम करता है। सनत्कुमारजी ! इस प्रकार
मेंने तुमसे इन बारह दिव्य ज्योतिर्लिझेंका वर्णन किया | ये
सभी भोग ओर मोक्षके प्रदाता हैँ । जो मनुष्य ज्योतिलिझ्लींकी
इस कथाकों पढ़ता अथवा सुनता दे। वह सम्यूण पापसि मुक्त
हो जाता है तथा भाग-मोक्षकों प्राप्त करता दे । इस प्रकार भने
इस शतदुद्नामकी संहिताका वर्णन कर दिया | बढ शियके
सो अवतारोंकी उत्तम कीर्तिसे सम्पन्न तथा समूर्ण अभीष्
फल्मेकों देनेवाली दे। जो मनुष्य इसे नित्य समाशितिचित्तसे
पढ़ता अथवा मुनता दे; उसकी खारी छाल्याएँ: पूर्ण दो जाती
हैँ और अन्तम उसे निश्चय दी मुक्ति मिल जाती ६ ।
( अध्याय ४२ )
"| _तै. 24 जम की बल आन हि
॥ शतरुद्रसंद्ता सम्पूर्ण ॥
जे ५० ् ४२०
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4, (॒ ध
बा,
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कोयिरुद्रमंदिता
हाद्श
यो धत्ते निजमायय्रेथ भुचनाकारं श्रिफारोज्डितो
यस्याहु: करुणाकटाक्षविभन्री स्वगीपवर्गाशियो ।
प्रत्यग्योधसुखाहय हि सदा पह्यरित य॑ सोगिन-
को, क्रो दि श्र रख कक न्य
खस्म शेलसुतायिताद्ूबपुप शखनमम्तजसे ॥ १ ॥
जो निर्विकार दोते हुए भी अपनी मायासे दी विखंद
विश्वका आकार धारण कर लेते हूँ, स्वर्ग ओर आपने ( मोक्ष )
जिनके कृपाकटाक्षके दही वेभव बताये जाते हैँ तथा सोगीजन
जिन्हें सदा अपने हृदयके भीतर अद्वितीय आत्मशानानन्द-
खरूपमें हो देखते हैं; उन तेजोमय भगवान् शंकरकी, जिनका
आधा क्वारीर शैलराजकुमारी पार्वतीस सुमित दे) निरन्तर मेरा
नमस्कार है ॥ १ ॥
कृपाललितदी क्षण स्मितमनोज्वक्त्रास्तुज
दशाइझूकलूयोज्ज्वलं शमितवोरतापत्रय म्
करोतु. किमपि.. स्फुरत्परमसीसख्यसचिद्द पु-
घेराधरसुताभुजोहलयितं॑ मही. मप्जलूम् ॥ २॥
जिसकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर दे) जिसका
मुखारविन्द मन्द मुस्कानकी छटठासे अत्यन्त मनोहर दिखायी
देता है? जो चन्द्रमाकी कलासे परम उच्ज्यल है, जो आध्यात्मिक
आदि तीनों तापोंकोी शान्त कर देनेमें समर्थ है, जिसका स्वरूप
सच्चन्मिय एवं परमानन्दरूपसे प्रकाशित होता हे तथा जो
गिरिराजनन्दिनी पावेतीके भ्रुजपाशसें आवेधित है, वह शिव-
नामक कोई अनिर्बचनीय तेजःपुलञ्न सबका मझ्ढछ करे ॥२॥
ऋषि बोले--सूतजी | आपने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी
कामनासे नाना प्रकारके आख्यानोंसे युक्त जो शिवावतारका
माहात्म्य बताया है? वह बहुत ही उत्तम है। तात ! आप पुनः
शिबके परम उत्तम माहात्म्यका तथा शिवलिड्गकी महिमाका
प्रसन्नतापूवेंक वणन कीजिये | आप शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः
धन्य हैं। प्रभो | आपके मुखारविन्दसे निकले हुए भगवान
डिव॒के सुरम्य यशरूपी अमृतका अपने कणपुणेद्वारा पान करके
हम तृप्त नहीं हो रहे हैं, अतः फिर उसीका वर्णन कीजिये |
व्यासशिष्य ] भूमण्डलमें, तीर्थ-तीर्थमं जो-जो शुभ लिज्ढ हैं
अथवा अन्य स्थलोर्म भी जो-जो प्रसिद्ध शिवलिज्ष विराजमान
हैं, परमेश्वर शिवके उन समी दिव्य छिड्>नोंका समस्त लोकोंके
हिंतकी इच्छासे आप वर्णन कीजिये ।
ज्योतिलिंड़ों तथा उनके उपलिद्वेक्रा अगन एव उनक दशन -पूज़नकी महिमा
सतजीने कह(-महर्पियों ! समर तीये किक
प् हूछठ इिज्लम हाँ थे तिश्ित है | उन. शिवलिब्रोगन
गगना नहीं है। तंसाति में उनका किचितू बन कद्ध
थी का भी दृश्य देखा जाता दे तथा जिलका
स्मरण किया जाता के। बढ सब भगवान् शिव ई
है भी तल शिय के लह्यसे भिन्न नहीं है। तवुशण।
भगयान झम्मुने सब लोगापर अनुग्रद कक लिये है
आमुर और मनुश्योतद्वित तीनों लोक हिला ।
४? रासादे। समस्त लोकपर कृपा करनेके उदशतई भा
महेश तीर्ग-सीर्यम और अन्य स्लो भी नाना अक्रए
नारण करते # | जदा-जदा जब -जत भकोंने मक्तियांक ४
डम्भुका सारण किया। तहाँतहां तबस्तद अआवार ९
करके वे स्थित ही गये; छोकोॉका उपकार केस लि
खर्य आगे खल्पभूत लिश्नकी कलना की । उ
करके शिवभक्त पुदय अवश्य सिद्धि प्रात कर
्राक्णों | भूमण्डलमे जो लिक्न हैं उनकी गणना हर री!
तथापि में प्रधान-प्रधान शिवलिज्नीका परत! देता
मुनिश्रेष्ठ शौनक ! इस भूततपर जो म्ृस्यय
है, उनका आज मैं वर्णन करता हूँ। उनकी वी ः
पाप दूरहो जाता दे | सौराषट्रमें सोमनाथ) श्रीशल्पर बे
नकल महाकाल) ओंकारतीर्थ्म परम: हिसार
|
आसोमनाथका दर्शन करनेके सियि काम,
अन्तर्गत प्रमासक्षेत्रम जाना चाहिये । * श्रम
ज्योतिर्तिक जिस पर्वंतपर विराजमान
श्रीपर्वत है । यह स्थान मद्रास प्रान्तके कृष्णा हि
तटपर दै । इसे दक्षिणता कैशस कहते हर हक ।
मद्ाकालेखवर मालवा प्रदेशर्म हा 4
नामक नगरीमें विराजमान ।
पुरी भी कहते हँ । ४. इस शिवलिश्नकी अकसर हा
ओंकारेश्वरका स्थान मालवा प्रान्तर्मे नर्मदा नदी वर्क
से खंडवा जानेवाली रेलवेकी छोटी हर कम
दै । वहाँसे यह स्थान ७ मील इईर द्द दे *
अमलेश्वर नामक दो श्थक-परथक् हि हम
ज्योतिरिज़्के दो खरूप माने गये हैं।
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[ तथा उनके उपलिड्ञाका चणन
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>__>>-+->>>््य््य् ल_ च_-___ __ _ __ _ _ल्खसल्न्घध]घ&घऑऑ्ं्स/वस्व्वटव82चतः
पर क्रेदौर डाकिनीमें मीमशक्लुर/ वाराणसीमें विश्वनाथ,
गोदावर्रीके तट्पर ब्यर्म्मक चिताभूमिम वेद्यनोथ, दाढकावनरमे
नागेश 3 सेतुवन्धर्मे रामेश्चर तथा शिवाल्यम घुश्मेश्वर का
शिशिमिमिमििनिनिमििनिफ न कलीड लकी अजब जी अर अब, ला रा आरा एएएएएएएएड
५ अंफिदारनाथ या केदारिधर हिमालयके केदार नानक
शिखरपर खित ई । शिखरसे पूर्वको ओर अलकननदाके
तटपर ओआीवदरीनाथ अवस्थित हई और पश्चिम मन्दाकिनी-
के किनारे श्रकेदारनाथ विराजमान ई । यद सान दरिद्वारसे १५०
मील भीर ऋषिकेशसे १३२ मील दूर दे । ६. अ्रीभी मशंकरका
स्थान वम्वईसे पूर्व और पूनासे उत्तर भीमानदीके किनारे उसके
उद्दमसान सद्य परवंतपर दे । यद्द स्थान लारीके रास्तेसे जानेपर
नासिक्से लगभग १२० मील दूर दे । सप्म पर्वतके उस शिखरका
नाम) जदों इस ज्योतिलिंद्॒का प्राचीन मन्दिर ऐ डाकिनी हे ।
श्ससे अनुमान होता दे कि कभी यहाँ डाकिनी और भूत्तोंका
निवास था । शिवपुराणकी एक कथाके आधारपर भीमशदुर ज्योति-
टिल्न आसामके कानरूप जिलेमें योदह्दादीके पास शद्षपुर पद्दाद्रीपर
स्पित बताया जाता ६ । कुछ लोग कह्दते ई कि नेनोतारू जिलेके
उज्जनक नामक स्थानमें एक विश्ञाल शिवमन्दिर दे, वह्दी भोमशकुर-
पा स्थान दै। ७. काशीके श्रीविश्वनाथजी तो प्रसिद्ध दी दें ।
८, यह ज्योति्िज्व व्यम्दक या ध्यम्बफेशरफे नामसे प्रसिद दै। वम्वई
प्रान्सके नासिक जिलेमे नासिक पदग्मवटीसे १८ मील दूर गोदावर्राफे
उद्रमसान अद्रगिरिफे निकट गोदावररीफें तटपर ही इसकी सिति
है। ९. यह स्वान संधाल परगनेर्मे ३० आई० रेलपेफे जसीडोद
रटेशनके पास वैधनामपामके नामसे प्रसिद्ध है । पुराणेके
भनुपार यही सितानूमि है। कद्दी-कई्दी 'परज्यां वंधनाथं च! ऐेसा
पाठ मिझ्या दे । श्सफे मनुसार परलीर्मे बेधनायद्यी सिति है।
इक्षिण देदराराद नगरसे श्पर परभनी नामक एक जंकशन दे ।
१हते परटीतक एक आंच डाश्न गयो ६। शस परली रटेशनसे
थोड़ी दूरपर परी गोबफे निकट क्रीपंधनाथ नामक ज्यातिजिक्त
है। १०. सागेरा नानक ज्योति्िभ्वका स्थन बढौदा राज्यके अन्तर्गत
मामपीद्ाएयाप ईशामकभ्म आरई-बरएइ मोलरं दूरोपर ४ ।
शस्वसदन इसीग गाय दें | गोइ-बंई दरास्दापनड़े स्पानमें
'दरपटन शठ माने ए। श्स पाठक जनुसार नो यशी रन सिद्ध
हे २३ 4१४४ 45 दाखपक जिंवंट फोर उसे पेज अन्कोव ह।
बाई दिण एरागरऊे अज्गंत जौरा पाममें झित दि
५३ है 5७२ 3२5३० # नसांने है $ जे झध 4ी सर्व ऋर् ना हा-
व् ३५ थोड़े उत्ता-पर्ने स्थित दागेश ( जानेएर ) शिश्किहु ही
थे २७४७७४४॥ ६३। ११. प्यरानेदर 5३ हो सेटुबच दी
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स्मरण करे । जो प्रतिदिन प्रात:काछल उठकर इन बारह नार्मों-
का पाठ करता है; वह सब पार्पोसि मुक्त हो सम्पूर्ण सिद्धिवोंका
फल प्राप्त कर लेता है |#
मुनीथ्वरों | जिस-जिस मनोरथकी पानेकी इच्छा रखकर
श्रेष्ठ मनुष्य इन बारह नार्मोका पाठ करेंगे, वे इस लोक और
परलोकर्म उस मनोर थकी अवच्य प्राप्त करंगे। जो घुद अन्तः-
करणवाले पुरुष निष्काम भावसे इन नामोका पाठ करेंगे
उन्हें कभी माताके गर्भम निवास नहां करना पड़ेगा | इन सबके
पूजन माचसे द्वी इदलोकमें समस्त वर्णोके लोगेकि दुःखोंका
नाश हो जाता है ओर परलोकमें उन्हें अवश्य मोक्ष प्राप्त होता
है | इन बारह ज्योतिलिज्ञोंका नेवेद्य यत्नपूर्वक अ्दण करना
( खाना ) चाहिये | ऐसा करनेवाले पुरुपके सारे पाप उसी
क्षण जलकर भस्म हो जाते हैं ।
यह मैंने ज्योतिर्लि|]ज्ोंके दर्शन ओर पूजनका फल बताया ।
अब ज्योतिलिझृकि उपलिद्ग बताये जाते हं। मुनीश्वरों |
ध्यान देकर सुनो | सोमनाथका जो उपलिड्ड है; उसका नाम
अन्तफेधर है | वह उपलिड्र मद्दी नदी ओर समुद्रके संगमपर
स्थित है | मलिकार्जुनसे प्रकट उपलिद्ग मद्रेशवरके नामसे
प्रसिद्ध है । वह भागुकक्षमें खित है और उपासकोंकों मुस
देनेवाडा ६ । मद्गाकालसम्बन्धी उपलिक् दुग्घेश्वर या दूधनायके
नामसे प्रसिद्ध है) वह नमदाके तठपर हे तथा समस्त पार्पोका
निवारण करनेवाला कष्दा गया दे। अंकिरेश्वरसम्बन्धी उपलिफ
कर्दमेश्वरके नामसे प्रसिद दे | वद विन्दु सरोचरफे तटपर
हैं । शनका स्थग ददराबाद राज्य अलगत दौदतागरद
स्टेशनसे १२ मील दूर बेर गाँवके पास दे । श्स खानयो दी
टिवालय कइते ६ ।
# सोराट़ू सोमनाथ च॑. ओशेडे मटिससुनन ।
उम्बविन्द “नहर जि 7 मी परमखरव )॥
फरार इएनबलपथ शाम भोनशइं सरन |
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पंरायद्धा थे पद व्यनूण- दाषयाएड |
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है और उपासकमकों पम्पूणं गनोयाडिछित फछ श्रदान करता
है। केदारेथरसम्बन्धी उपछित्र भूतेबरके नामते श्रस्तिद्ध
है ओर यमुना-तटपर स्वत है। जो लोग उसका दर्शन
ओर पूजन करते हैं, उनके बड़ेरो-बड़े वापोंका यद्द
निवारण करनेबाला बताया गया है | भीमअंकर सम्बन्धी
उपलिज्ञ भीमेश्वरके मामसे प्रसिद्ध है | यद भी सह पर्मतपर
ही स्थित दे और मद्दान् बलकी सृद्धि करनेयाला ९. गोगिया:
सम्बन्धी उपलिक्षका नाम भी भूतेशर दी है, चंद गछिका
रुद्राय शान्ताय अहाण परमास्मने 5
क्् अइनअनओलकईलईटहईओइ& इि € ंाआंनलननिािधिलनलनचनओ्ु्् ं। कक: -फयप-त<<स>..... न्स्च्च्स्म्स्स्स्प््म्ण्ल्प्ट-.0ह.3._ _
[ संक्षिततकीवपुणण्
#रखतीक तदपर स्थित है और दर्शन हमको
पापा दर छेताद | रग्रेथरसे शरकठ हुए उपलिद्क् ग॒ेश
और मुझ बरहे प्रकट हुए. उपलित्षकों व्यामेक्ष द्मृज्ार|
आहाणी | इस अकार झोदों मम ज्यातिलिखेंक उपक्िंग्र
परिचय दिया । ये दर्शनमात्रसे पापद्ारी तथा कृत
अभीष्टफ दाता द्वाते हैं | मुनित्रो ! ये मुख्तार
हुए प्रधान-प्रभान पित्रलिद्ष बताये गये | अब अब कर
शिवलिय्ञोंका संगत सुनो | ( अब | |
उत्पत्तिके प्रसइझ्में गड़ा आ
[[सण्क नर रन
काशी आदिके विभिन्न लिज्ञोंका वर्णन तथा अत्रीबरकी
शिश्रके अत्रिके तपोबनमें नित्य निम्नास करनेकी कथा
सतजी कहते हैँ--मुनीश्चरो | ग/ाजीफे तटपर
मुक्तिदायिनी काशीपुरी सुप्रसिद्ध है । वद भगवान् शिनकी नियास-
स्ली मानी गयी है । उसे शिवलिश्षमयी ही समझना चादिये।?
इतना कहकर सूतजीने काशीके अभिमुक्त कृत्तिवासेश्वर, तिल-
भाण्डेश्वर, दशाश्वमेघ आदि और गश्गञसागर अ दिक्के संगमेश्वर,
भूतेश्वर, नारीशचर, वहकेश्वर, पूरेश्व,, सिद्धनायेश्वर, दूरेश्वर,
शज्ञेबर, वेयनाथ, जप्येश्वर, गोपेश्वर, रंगेशवर, वामेश्वर,
नागेश, कामेश, विमलेश्वर; प्रयागके ब्रद्ोश्वर, सोमेश्वर,
भारद्ाजेश्वर, झूलटक्छेश्वर, माधवेश तथा अयोध्याके नागेश
आदि अनेक प्रसिद्ध शिवलिज्ञोंका वर्णन करके अन्ीश्वरकी
कथाके प्रसड़में यह बतलाया कि अन्िपत्ञी अनसूयापर कृपा
करके गज्जाजी वहाँ पधारोीं | अनसूयाने गज्ञाजीसे सदा वहाँ
निवास करनेके लिये प्रार्थना की ।
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तंत्र गज़ाजीने कहा--अनयूये |! बदि हुए झे
र्धतक की हुई शंकरजीकी पूजा और पतितेवाका क मेरे
दो तो मई देवताओंडा उपकार करनेके लिये वहाँ दद् है हित
रहूंगी | पतिमरताफा दर्शन करके मेरे मनकों जेंती फ्र््
धती दे) बेसी दूसरे उपायोसे नहीं होती । त्त अपर
यई ईनि तुमसे सच्ची बात कही है| पतितता जगा छा
करनेसे मेरे पापोका नाश दो जाता है ओर में कि
ग़ुद्ध दो जाती हूँ; क्योंकि पतित्रता नारी पाते प्मा
परित्र द्वोती हे | अतः यदि तुम जगतका कला की"
चादइती हो और लोकद्वितके लिये मेरी माँगी हुई बल ६
देती हो तो में अवश्य यहाँ स्विसरल्पते निवास कहेंगे
खूतजी कद्दते हँ--मुनियों | गदड्गाजीकी कह
सुनकर पतित्रता अनसूयाने वर्धभरका वह साण पु
दे दिया । अनसूयाके पतित्रतसम्बन्धी उस महा
देखकर भगवान् महादेवजी प्रसन्न हो गये और पर्खि मिंे
तत्काल प्रकट हो उन्होंने साक्षात् दशन दियां।
शम्भु बोलढे--साध्यवि अनयूये ! ठग्हाय के है
देखकर में बहुत प्रसन्न हूँ। प्रिय पतित्रते | वर
क्योंकि तुम मुझे बहुत ही प्रिय हो । क्
उस समय वे दोनों पति-पत्नी अद्भुत सुन्दर आहत ४
पञ्ममुख आदिसे युक्त भगवान् शिवको वहाँ प्रकट ही
बड़े विस्मित हुए | उन्होंने हाथ जोड़ नमस्कार हा
करके बड़े भक्तिमावसे भगवान् शंकरका पूजन
फिर उन लोककल्याणकारी शिवसे कहा |
आ्राह्मणद्स्पति बोले--देवेश्वर [| यदि
हैं और जगदम्बा गड्रप मी प्रसन्न हैं तो आप ईए
आप
तो
क्रोटिद्द्रसंद्िता# ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा तथा उसके आश्रममें'नन्दिकेश नामसे निवास करनाऋ३४१
ल्स्स्ल्स्ल्ल््लल्स्स्स्ल्स्ल्ख्ल्स्ल्य्य्य्््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्प्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्प्य्य्स्म््य्प्य्म्म्स्स्प्स्स्स्स्म्स्स्म्ल-
निवास कीजिये और समस्त लोकोंके लिये सुखदायक हो जाइये | जहाँ वे ऋषिशिरेमणि रहते थे, प्रतिष्ठित दो गये । इन्ही
तब गड्ढा और शिबर दोनों ही प्रसन्न हो उस स्थानपरःः शिवका नाम वहाँ अचीशर हुआ ।. (६ अध्याय २-४ )
ह 5 /ल | धर्मकी 34.०] े आ: गे (जर>ज्द्रोलगा!
ऋषिकापर भगवान् शिवक्की कृपा, एक असुरसे उसके धमकी रक्षा करके उसके आश्रमर्म 'नन्दिकेश
नामसे निवास करना ओर वर्षमें एक दिन गड्जाका भी वहाँ आना
तदनन्तर श्रीसूतजीने जब .बहुत-से शिवलिब्नेकि कथा-
प्रसज्ञ सुना दिये, तब ऋषियोंने पूछा--'महामते सूतजी ।
वैशाख शुक्द्य सतमीके दिन गड्जाजी न्मदामें कैसे आयी !
इसका विशेपरुपसे वर्णन कीजिये । वहाँ महादेवजीऋ नाम
नन्दिकेशवर केसे हुआ ? इस बातको भी प्रसन्नतायुवक बताइये |
सतजीने कद--महर्पियो ! एक त्राक्षणी थी, जिसका
गरम ऋषिका था | वह किसी ब्राक्षणकी पुत्री थी और एक
ब्रद्मणकी दी विधिपूर्वंक व्याददी गयी थी । विप्रवरों | यद्यपि वह
द्वेजपत्नी उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली थी; तथापि अपने
पूवजनमफे किसी अश्युभ कर्मके प्रभावसे ध्वाल्वेधव्यको प्राप्त
दी गयी । तब वह ब्राह्षणपत्नी ब्रह्मचर्यत्रतक्े पालनमें तत्पर
दे पाथिवपूजनपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगी । उस
प्रय अवसर पाकर मूह नामसे प्रसिद्ध एक दुए और वलवान
अमुर, जो बड़ा मायावी था; कामबाणसे पीड़ित होकर वहाँ
गया । उस अत्यन्त सुन्दरी कामिनीकों तपस्या करती देख वह
(भमुर उसे नाना प्रकारके छोभ दिखाता हुआ उसके साथ
#म्मौगकी याचना करने छगा । मुनीर्वरों | परंतु उत्तम मतका
ल्न करने तथा शियके ध्यानमें तत्पर रदहनेवाली वह सांध्यी
प्रकट हो गये । भक्तवत्सल परमेश्यर शंकरने उस कामविद्वल
देत्थराज मूहुको तत्काछ भस्म कर दिया ओर आह्णोक्री ओर
जिरनर»-«»मयॉकि. ल्ममीनती
कृपाहडिसे देखकर मक्तवी रक्षाके लिये दत्तचित्त दो कदा--
ध्वर माँगों ।? म्टेब्बरका यहू चचन नुनकर उस माधच्यी आद्ाग-
री कामभायसे उसपर दृष्टि न डाल सकी । तपस्पामें छगी
"6३ उस ब्राह्णीने उस असुरका सम्मान नहीं किया; क्योंकि
मी > ५
४६ अत्यन्त तपोनिष्ठ और शिवध्यानपरायणा थी | उस
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शव भुउती| तिरस्कृत हो उस देत्यराज मूदने उसके ऊपर
पे पद दिया और फिर भरना विकेट रूप उसे दिखाया ।
8 छाद उस बुष्शत्माने मपदायक दुर्वचन फद्ा ओर उस
पायुमोीत पारंदार पास देना आरग्न फ्िया | उस रूमय
र ड्सड् सयत पर्स उठी और अनेक बार स्लेंदपूर्षक शिव-
परत पुत्र परन लगी | उस तन्पद्दी द्दियरुनीने भगपानू
अपन ट्य् >> बा दर २५९: >्च्चराक कक अपल # का,
४ एफश आक्य छे रफूणा पा।शिवद्ा नाम जरनेायाल!
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प्लीने उनके उस आनन्दजनक सकत्मय स्पा दर्शन
किया । फिर सबको सुख देनेवाले परमेद्वर शाग्नुतों प्रभाम
बरपे शुद्ध अन्तःकरणवाली उस सा्चीने द्राथ
छुफाकर उनती लुति की ।
भ्क
गदर मल
क्षपिका बोटी-देखेव मदादेव ! आरणासतवस्सल !
आप दीनदन्पु ई। नक्तारं सदा रध्य कम्नेयड ईब्चर | |
आपने नूटनामक असुस्स मेरे हर
आपके दाग यह हुए अनुर माय गया | एन
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३४२ ४ नमो रुद्भाय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने * [ संल्षिप्त-शिवणणा]
#कापीशमअकरायाउब उमा सम दसतकानतररथपरकापा पतन का बताकर पता सब्पक5ा>2 २०0 कद कर त+ शक भाएकातकासक्रात्लातइ रआहक तल उक मद भइत भाप मामला त्त पक कादर हा पा अा कपल _ द_ इक मद कक सद्शाशर पर परतककदामवुफय नमाज ऋप कलर दपभपफ न कसारनकाप पा. 5४9७४ ७७८ कक. 3 यापधाएशायानब कार
महादेवजीने कहा--#पिके ! तुम नदासारिणी ओर
विशेषतः मुझमें भक्ति रखनेवयाली दे | तुमने मुझ़्री जा-जा सर
माँगे हैं) वे सब मेने तुम्/ दे दिये ।
ब्राह्मणों | इसी बीचमें श्रीतिण्णु ओर ब्रह्मा आदि देवता
वहाँ भगवान् शिव्रका आनिर्भाव हुआ जाने इंपरी भरें हुए,
आये ओर अल्न्त प्रेमपूर्वक शियकों प्रणाम करके उसे सबने
उनका भलीमौति पूजन किया । फिर युद्ध हृदगरे दाथ जोड़े
मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति भी को | इसी सम्रय साथ्यी
देवनदी गद्ठा उस ऋषिकासे उसके भाग्यकी सराहना करती
हुईं प्रसन्न चित्त दो बोली ।
गड्ाने कहा--ऋषिके ! वेशाख मासमें एक दिन
यहाँ रहनेके लिये मुझे भी तुम् वचन देना चाहिये । उत्त दिन
में भी इस तीर्थम निवास करना चाहती हूँ ।
बच्ची यु.
सूतजी कहते हैँ--महर्पियों ! गढ़ाजीओी के ज
मुनकर उत्तम जअतका पालन करनेयाली सती साथी श्रीक्षे
लोकदितके लिये प्सन्नतापूर्वक्ष कद्दा--बहुत अच्छा, एप
हा |! भगनान् शित्र ऋषिकाको आनन्द प्रदान करेड़ेलि
अत्यन्त प्ररान्न दी उस पार्थिव लिव्नम आने ए कं
गिलीन द्वा गये । यह देख सब देवता आनन्दित हो कि
तथा ऋषिकाओी प्रशंसा करने छगे और आनेआने परे
से गये । उस दिनसे न्मदाका वद्द तीर्य ऐश उत्ता ओ
पासन दो गया तथा सम्पूर्ण पापा नाश कलेगहे ली
ब्दों नन्दिकेशके नामसे विख्यात हुए । गड्गा मी
वैश्ञाधमासकी रुप्ममीके दिन झुभक्ी इच्छा आने
पापकों घोनेके लिये वद्ाँ जाती हैं, जो मतुष्योत्त वे:
किया करती दें । ( अथाव (7
प्रथम ज्योतिरलिज्ञ सोमनाथके प्रादुभोवक्री कथा और उसकी महिमा
तदनन्तर कपिला नगरीके कालेश्वर, रामेश्वर आदिकी मद्दिमा
बताते हुए. सूतजीने समुद्रके तटपर स्थित गोकर्णक्षेत्रके
शिवलिज्ञोंकी महिमाका वर्णन किया | फिर भद्दाबल नामक
शिवलिड्जका अद्भुत माहात्म्य सुनाकर अन्य बहुत-से शिवलिश्नों-
की विचित्र माहात्म्य-कथाका वर्णन करनेके पश्चात् ऋषियोंके
पूछनेपर वे ज्योतिर्लिज्ञोंका वर्णन करने लगे |
सखूतजी वोले--ब्राह्मणो | मैंने सदगुरुसे जो कुछ सुना
है, वह ज्योतिरलिब्लोंका माहात्म्य तथा उनके प्राकस्यका प्रसड्ः
अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपसे ही सुनाऊँगा | तुम सब लोग
सुनो । मुने ! ज्योतिलिड्डो्में सबसे पहले सोमनाथका नाम
आता है; अतः पहले उन्हींके माहात्म्यको सावधान होकर
सुनो । मुनीश्वरो | महामना प्रजापति दक्षने अपनी अश्विनी
. आदि सत्ताईंस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ किया था |
: चन्द्रमाको ख्वामीके रूपमें पाकर वे दक्षकन्याएँ विशेष शोभा
पाने लगीं तथा चन्द्रमा भी उन्हें पत्नीके रूपमें पाकर निरन्तर
सुशोभित होने छगे | उन सब पत्नियोंमें भी जो रोहिणी
नामकी पत्नी थी; एकमात्र वही चन्द्रमाको जितनी प्रिय
थी, उतनी दूसरी कोई पत्नी कदापि प्रिय नहीं हुईं । इससे
दूसरी ज्रियोंको बड़ा दुःख हुआ | वे सब अपने पिताकी
शरणमें गयीं | वहाँ जाकर उन्होंने जो भी दुःख था; उसे
पिंताको निवेदन किया | द्विजो | वह सब सुनकर दक्ष भी
ढुखी हो गये और चन्द्रमाके पास आकर शान्तिपूर्वक बोले ।
दक्षने कद्दा--कलानिधे | तुम निम्मठ कुल
हुए हो | तुम्दारे आश्रयर्मे रहनेवाडी जितनी प्लियाँ हे
सबके प्रति तुम्दारे मनमें न्यूनाधिकमाव कों है! कह
अधिक और किसीको कम प्यार क्यों करते हो !अवक श
मो किया; अब आगे फिर कभी ऐसा विषमतापू
तु नहीं करना चाहिये; क्योंकि उ0े में
बताया गया दे | हि
खूतजी कहते हैँ--मदर्षियों ! आपने दर हे
स्वयं ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष धरे कु ।
उन्हें पूर्ण निश्चय हो गया था कि अब पर आगे हर
होगा | पर चन्द्रमाने प्रबल भावीसे विवश होकर कह ै
मानी | वे रोहिणीमें इतने आसक्त हो गये ये हि ६ |
पत्नीका कभी आदर नहीं करते ये | इस हक
दुखी हो फिर स्वयं आकर बा क्
तथा न्यायोचित बर्तावके छिये प्रार्थवा करे कर
दक्ष बोले--चन्द्रमा ! सनो) में पे हम
तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ | फिर भी ठमने मेरी हे शी
इसलिये आज शाप देता हूँ कि तुम्हे क्षवी
सखूतजी कहते है--दक्षके इतनी व गे
. चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त हो गये | उनके
+
#
न्+
तब
समय सब ओर महान् हाह्मयकार मच गया । 4
ऋषि कहने लगे कि 'द्वाय | हाय | अब की
कौटिद्द्रसंदिता ] # प्रथम स्योतिलिन्न सोमनायके यादुर्भावकी कथा और उसकी महिमा *
>परमकथनइा2७.ा७+#७ ४०2४४ पा ५४०५५ ५३०५ व पमहक.२५० नाम ५३३४ + भा कार पा ५७ ५ नए 2७ ३७०५७2३७ ०००५४ ५५० भर न्मभ गा ५३५०० पक कह १०3 भम ५९० ॥४७४/भप भागा +* मधु पक या पा भाप न या + "पाक गवाह भा नाना मा रत पा प्यार कप ४+ ५४०१३ ॥नउ भव प भार मना नव प१९- पान मर ननाकबन ५ महा या पर > कम न् जनक 5
३४३
चन्धमा कैसे ठीक होंगे ?? मुने ! इस प्रकार दुःखमें पड़कर वे
सब छग विद्व हो गये । चद्धमाने इन्ध आदि सब देवताओं
तथा ऋषियकी अपनी अवस्था सूचित की | तब इन्द्र आदि
देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजीकी शरणमें गये |
उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा--देव्ताओ !
नो हुआ, सो हुआ | अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता ।
अतः उसके निवारणके लिये में तुम्हे एक उत्तम उपाय
बताता हूँ । आदरपूर्वक सुनो । चन्द्रमा देवताओंकि
साथ प्रभास नामक श्रम क्षेत्र जाये. ओर वहाँ मृत्युंजय
सनत्रका विधियूवक्त अनुष्ठान करते हुए भगवान् शिवकी
आराधना करें। अपने सामने शझिवलिद्गकी खापना करके
. बहू चन्द्रदेव मित्र तपस्था करें । इससे प्रसन्न होकर शिव
।. उन्हें श्षयरद्वित कर देंगे ।
तब देवताओं तथा क्मपियेंकि कहनेसे श्रह्माजीकी आज्ञा
फे अनुसार चद्धमाने वहाँ छः मद्दीनीतक निरन्तर तपत्या की)
मृत्यु जयमन्त्रस भगवान् वृपभप्यजका पूजन किया । दस करोड़
मनन््नफा जप और झुत्युंजयका ध्यान करते हुए. चन्द्रमा वहाँ
स्थिरचित्त होवार लगातार खड़े रहे । उन्हें तपस्या करते
देस भकऊवत्सल भगवान् शंकर प्रसन्न हो उनके सामने प्रकंट
हे गये ओर अपने भक्त चन्द्रमासे बोले |
इांकरजीने कहा--चद्धदेव ! तुम्हारा कल्याण दो;
एम्दरे मनमे जो अमोश हो, बद वर माँगो ! में प्रसन्न हूँ।
तुगदं सथृू० उत्तम वर प्रदान करूँगा |
चन्द्रमा वोके--देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो
मेरे लिये क्या असाध्य हो. सकता है; तथापि प्रभो ! शंकर !
आप मेरे झरीरके इस क्षयरोगक्रा निवारण कीजिये । मुझसे
जो अपराध बन गया हो, उसे क्षमा कीजिये ।
शिवज़ीने कहा--चन्द्रदेव | एक पक्षमें प्रतिदिन
तुम्हारी कला क्षीण हो ओर दूसरे पतश्षम फिर वह निरन्तर बढ़ती
रहे |
तदनन्तर चन्द्रमने भक्तिभावत्त भगवान् शांकरकी
स्ु॒ति की । इससे पहले निराकार होते हुए भी वे भगवान्
शिव फिर साकार हो गये । देवताओऑपर प्रसन्न हों उस क्षेत्रके
माहत्म्यकी बढ़ाने तथा चन्रमाके यशक्रा विस्तार करनेके लिये
भगवान् झंकर उन्हींके नामपर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और
सोमनाथके नामसे तीनों ल्ोकमं विख्यात हुए. । ब्राह्मणों ]
सोमनाथका पूजन करनेसे थे उपासकृके क्षय तथा कोढ़
आदि राोगोंका नाश कर देते हैं । ये चन्द्रमा धन्य हैँ, कृत
कृत्य हैं, जिनके नामसे तीनों छोककि स्वामी साक्षात् भगवान
शंकर भूतल्को पवित्र करते हुए प्रभासक्षेत्रमें विद्यमान हूँ ।
वहीं सम्पूर्ण देवताअंने सोमकुण्डकी भी खापना की है
जिसमें शिव और अद्धाका सदा निवास माना जाता है ।
चन्रकुण्ड इस यूतलपर पापनाइन तीयके रुपमें प्रसिद्ध ऐ |
जो मनुष्य उसमें स्नान करता दे। यह सब परापोसे मुक्त दो
जाता ६ | क्षय आदि जो असाध्य रंग दोते हैं, थे सब उस
कुण्डम छः मासतक समान करनेमासले न दी बनाने ६।
मनुष्य लिस फहके उद्देशयसे इस उत्तम दीसका सेवन बरता
कै उस फटी स्वधा प्राप्त ऋर ता ई--इसमें संशय
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की हुई मदहाकालवी पूजाता आदस्पुवक इशन जिला | शजाक
शिवपुजनका सद आश्चयमस उत्सन 20 80
प्रणाम किया ओर किर सदू जात नियासथानिषर येठ भागी ।
वालिनके उस बालकने भी यह सारी पूजा इसी थी। अत
घर आनेपर उसने कीमृइटलदा शियजीकी जा कान थे विचार
किया | एक सुल्दर पत्थर लागर उसे आने सिलग्स साड़ी
ही दूरपर देसरें शिविरफे एलान्त शानम रत दिया और उगाव।
दिवलि॥ गाना। फिर उसने शक्तितवक कुनिम गरना अठकार
बस्तर, धूप, दीप और अक्षत आदि द्रव्य शुदधयर उनके द्वारा
पूजन करके सनेहिपत दिव्य नेबंध भी आपित ता । धुन्दर
सुन्दर पत्तों और फूलस बारबार पूजन करके भाँति भततित सर्प
किया ओर बारंबार भगवानके चरण मस्तक सु ढावा ) इसी
समय ग्वालिनने भगवान् शिवम आसक्तचित्त ६० अपने पुत्त-
को बड़े प्यास्से भोजनके लिये बुलाया | परंतु उनका मन त्ता
भगवान् शिवकी पूजार्म लगा हुआ था। अतः अब वारबार
बुछानेपर भी उस बालकफी भोजन करनेकी इच्छा नर्दी हुई
तब उसकी माँ स्वयं उतके पास गयी और उसे शिसके आगे
आँख बंद करके ध्यान लगाये बेठा देख उमका द्ाथ पकड़कर
लींचने छगी। इतनेपर भी जब वह ने उठा, तब उसने क्रीचर्म
आकर उसे खूब पीठ | खींचने ओर मारन-पीटमपर भी जब
उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने वहू शिवलिक उठाकर
दूर फेंक दिया ओर उसपर चढ़ावी हुई सारी पूला-सामग्री
नष्ट कर दी। यह देख बालक ह्ाव-हाय? करके रो उठा।
रोषसे भरी हुईं ग्वालिन अपने बेंटेकी डॉट-डपटकर पुनः घरमें
चली गयी । भगवान् शिवकी पूजाकी माताके द्वारा नष्ट की
गयी देख वह बालक “देव | देव | महादेव !? की पुकार करते
हुए. सहसा भूच्छित होकर गिर पड़ा । उसके नेन्नोंसे आँसुओंकी
धारण प्रवाहित होने छगी । दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ;
तब उसने आंखें खोली ।
आँख खुलनेपर उस शिशुने देखा, उसका वही शिकश्रिर
भगवान् शिवके अनुग्रहसे तत्कारू महाकालका सुन्दर मन्दिर
बन गया, मणियोंके चमकीले खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे
थे | वहाँकी भूमि स्फण्किमणिसे जड़ दी गयी थी । तपाये
हुए. सीनेके बहुत-से विचित्र कलश उस शिवाल्यको सुशोभित
करते थे | उसके विशाल द्वार, कपाट और प्रधान द्वार सुवर्ण-
मय दिखायी देते थे | वहाँ बहुमूल्य नील्मणि तथा हीरोंके बने
हुए चबूतरे शोभा दे रहे थे | उस शिवाल्यके मध्यभागमें
दर्यानिधान शकरका रक्षमय छिह्ढ प्रतिष्ठित था । ग्याल्निके
डक उसने
उस पुन देखा उगे शियलित्रपर उसकी अपनी हीरे
(४ गजन-आमओ सुसानजित है। कद सब देख वह बत्क ?
उद्धकर हाड़ा दी गया। उसे मनदी-मन बढ़ा आश्ष
जार वह परमानन्द क समुद्रत निमग्र-्सा हा गया।
भगवाव डियका स्तुति करह उसने बारवार उतके के
मद्ाह ऋझाया और मसूर्वास देनेके पश्चात् ऋूगाड
हिवाडयस चादर निकला । बंदर आकर उसने आगे हि.
केला । बड़ उद्धमसमऊ समान शोभा या झा था| कं
हूझछ तत्व सु मत दोकर विसित्र एवं पस उल्तहके
प्रकाशित दाने लगा । फिर बढ उस सबनके मदर
सन प्रकारदी झोभाओंसे तम्यन्न था। उस मतों खतरा
एव ओर सुपर दी जद गये थे। प्रदोषकालम खाद
प्रयेश करके वाहकने देखा, उसकी माँ दिव्य सकते
हे एक मुस्दर पुंगार सी रही हे | रतमब अख्काएँ
सभी अ| उद्दीत दी रो है और वह श्त् से
तम्रान दिसायी देती दे | तुखते बह हुए उए $
पी मालाओकी बड़े बेगसे उठाया। वह मगर रह
फपापान्न दी चुकी थी | ग्वालिनने उठकर देला। ०
आपवे-सा दी गया था| उसने मद्दात् आनतग वि है
पटेकी छातीसे छगा लिया | पुत्रके इतत्त गिरिया्ती
प्रसादका बद सारा वत्तान्त मुनकर खाडितन
दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे खत |
अपना नियम पूरा करके णतमें सइसा वहाँ आये और
पुत्रका वह प्रभाव) जो इंकरजीको संतुष्ट कलेकर्स '
मन्त्रियों और पुरोद्चितोंसहित राजा चकित ह
देख परमानन्दके समुद्रमें ड्रब गये आर नेतते पर.
बहते तथा प्रसन्नतापूर्वक शिवके नामत्री कह नर ।
उन्होंने उस बाल्कको दुंदयसे लगा ल्यि | हक
समय वहाँ बड़ा भारी उत्सव होने छगा | 7
विभोर होकर महेशवर्के नाम और परी हि
इस प्रकार शिवका यह अद्भुत माहत्य ले
बड़ा द॒र्थ हुआ और इसीकी चर्चा वह ता
समान व्यतीत हो गयी | 2
युद्धके लिये नगरकों चारों ओस्ते हे रे |
राजाओंने भी प्रातःकारू अपने गुत्तचरोके
अद्भुत चरित सुना । उसे छुनकर उध आश्रर
और वहाँ आये हुए सब नरेश एलन ईं दक ै
बोले--'ये राजा चखसेन बढ़ें भारी हि
ते खत र्क
लग से
की कफ हीरम्मऔ-ममा--१०की कागाए०भ-.. सहन,
अत
>पात “जीन ातनया-ाु०-ए-पाहानम पा आ#+ ाम्यायी मय. समि--जबेक-नी की.
रा जी जज अर तो हटा. ऋनी जी औ. आचार बम अ#. मा आम न री
उनपर विज्ब पाना कठिन है । थे सवथा निर्मव द्वोकर
पतद्फी नगरी उजयिमीका पालन करते हैँ | जिसकी पुरीके
बालक भी ऐसे शिवभक्त हैं; वे राजा चद्धसेन तो महान
शुयमक्त हें दी | इनके साथ विरोध करनेसे निश्चय ही भगवान्
शिव क्रीथ करेंगे ओर उनके क्रीबसे हम सब छोग नष्ट हो
जायेगे । अतः इन नरशके साथ दगे मेल-मिलाप ही ऋर लेना
चाद्रिय | एसा हनेपर भद्देश्वर हमपर बढ़ी हुपा करेंगे |
सूतजी कहते द--न्राक्षणो | ऐसा निश्चय करके शुद्ध
(दुयवाले उन सब भूपालाने हथिवार डाछ दिये। उनके मनसे
परमाव निकल गया। वे सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न दवा चन्द्र-
प्नकी अनुमति छे महावालकी उस रमणीय नगरीके भीतर
गये | वर्शं उन्होंने मद्ाकालका पृजनेन किया । फिर वे सब-के
सत्र उस खालछितके मद्दान् अभ्युदयपर्ण दिव्य सोभाग्यकी
भूरि-बूरि प्रशंसा करते हुए उसके घरपर गये | वर्श राजा
चद्रसनने आगे बढ़कर उनका खागत-सत्कार किया । वे वहु-
नृज्य आखनोपर बैठे ओर आश्चयंचक्रित एवं आनन्दित
ए। गपवाडकके ऊपर झपा करनेके लिये खतः प्रकट हुए
डायालय और शियलिक्षत्न दददन करके उन सब राज़ाअंनि
अपनी उत्तम बुद्धि भगवान् शिवके चिन्तनर्मे छगायी | तद-
तर उन सार संस्शोन भगवान शझियकी रूपा प्राप्त करनेके
में उस गोपशिशुकों बहुत-सी वल्लुएँ प्रसक्नतापूर्वक भेंट
। || | कम्पुण जनपद जो बटसेस्यक गोव रहते थे; उस सबका
जज उन्टीव उठी बाजबाक) बना दिसा |
कै. रण समन समस्त देवताओते पृजित परम तेजस्वी वानर-
ट (रत इपमानजी वर्दा प्रकढ हुए । उनके आते दी जय गाशा
; ४ ब्व३ दो गये | उन सबने भक्तिभानसे मिनम्न
धुलया ) राजाओस पृणित से यानरण्
कण, पवक धोचर्मे बड़े और उस गोपधालपड़ो
है दा गुर उसे मोतीदी और देवा हुए बडि--
इइपारी थी गये दंत
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परुम्पराके अन्तगंत आठवीं पीटोम महायशस्थो नन्द उत्पन्त
दंगे जिनके वर्दहा लाझात् भगवान् नारायण उनके प्ुच्ररुपसे
प्रकट हो श्रीकृष्ण मामसे प्रसिद्ध दंगे | आअजसे यह गापदुमार
इस जगतर्म श्रीकरके नामसे विशेष ख्याति प्राप्त करेगा ।?
सतजी कहते ह--आहक्षणो |! ऐसा कहकर अज्ञनी-
नन््दन शिवल्चल्प वानरराज दनुमानजीने समस्त राजाओं तथा
महाराज चद्धसेनको भी हृपाहण्टिसे देखा | तदनन्तर उन्हूंनि उत्
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बुद्धिमान गोपवाझूफ ओउरकी बड़ी
प्रसनाझे उस आचार-यदास्मा उप
दिवकी बहुत प्रिय है | इसके बाद परम
जी चन्द्रसेन व
देखते दर्द अन्तर्थान ह। गये । पे रथ राज
सम्मानित है मंदारान चम्मेनरी शाला जे उन जमे दे
देसे दी लीट गये । मराविशसी धोडर ही दसमाग जी वे उपरेड!
प्रसन्नताक सास दिलो-
दिया। जा शायान
परस हटाए एरमान-
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वबाइह हिमर्स आज्िक रे साय व रण) "बानी 7 ह॥ा।त |
हि श् मकर पर ह है. 'कीश + ् हट न व्क
भशन चन्फाम उ्यर सारण भाटर देपायं है! रा:
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मय आन ०० कक कि सार सा रकाएका
पिन्ध्यक्ली कया, ओंकारों पश्गेः
ध [ प्षिततशिगुतणा
! लिआ के 32. कस प्रश्ाक्ा ०!
१ छल) ॥तांत्र 6 37 4/265/6|
#ज वदीशी आप न हद 0.2३ न्॒ डर *७ + च्ब्प , ७ शव कै च्
नपयातने के है 8 आग मा इज को + भक्ताड अगी व देते
5वियाने कहा... भाग शत । . मे आफ. छा ॥+्छिन +र ; ग) "मं अ्मीश के ३
फिकी रक्षा करई 'नियाले ॥ताफाल गागक शिनाड 7 ।) बड़ी और ड्झय काया॥ अमन्न € |)
' अद्भुत कथा बनायी ३। 3... हे करके नी ८ वतिछि+का फ्स्ध्यि तय श्र जा आल
| परिचय < जिये कार का का गा. न नीप मुसफर प्रमन्त ह ते भत्ते कर 8,
! जो प्योतिलिक है, उसके ३॥9॥/. ४ कया मुगाइ्य | द 4-६. ॥जिके, औो थे हबकओ सिद्ध अल है|
३ श् ७ ३
सतजी योले--आहगय) । ऑदर तो परगेशु 8
पेशक ज्योति भें जिस हि पकड़ 5 ॥;
सुनो । एक समयकी
व | अपवमें जो सदाशिव का हि सं
हे विख्यात ढ 3 पाथिवयूर्तियें ।
४... तो । तद्मन्तर जहाँ ४-९ हुई; बे ० कक ४४४
स्थिति है, वहों भत्ापू्वक जाकर उसने अमलेश्वर भी कहते हैं) । इस प्रकार ओर औरफ
शिवकी पार्थिव मूर्ति बी और ७. मासतक ये दोनों शिवलिड भक्तोंकी अभीष्ट परत प्दाव लोहे
पल्लू 5... राधना करके शिव में तत्पर हो बह अपनी / उस समय देवताओं आओ
सानसे हिलातक नहीं | विन्ध्याचलकी श्सी तपस्या पएजा की और भगव।न् इषभध्वजको पु कह हि
देखकर पावेतीपति गये | उन्होंने विन्याचलको "९ आत किये | पप्श्चात् देवता अपने-अपने सम
पेह खरूप दिखाया, जो योगियोकि लिये , डुल्भ है । विन्ध अधिक य्रसन्नताका अबुभत के द
ने भसतन्न हे उस तय उससे बोले... (विन कायको पिद्ध किया और '
-२० ८
कटिमसंद्संद्िता | हा
नजर उनलनन्कन्क /वन+ने. आह
कबीर के औक बनी जमा. आन औ का पायी ० हे थे काना करन फल मी 8 अर. सी खा जा आर मर आरशिआ
एगतान
फिर नर्त आना
उता ४६--इमर्म
परिवापका त्याग दिया | के
ग्रंकरका पूजन करता ६;
और आपने अरभीष्र
मंगब नहीं।
प्रद्धप इस अकीप
बट साताओई गा
प्रात्त क
््
फल]
फ्रारिखिर तथा भीमशंकर मासक ज्योतिर्िद्ठाकभ आविभविका कथा तथा
को
सूतज़ी छत हे->जादी गो सगवाद विष्णुफे जो मर-
नारायण नामक दो अवतार 4 आर मारा यद्रिकाथम
तीथर्म तपत्या बरते ६; उन दनाने पाथित शिवछिक्क बनाकर
उसमें खिल द्वा पूजा अदण करनेके लिये भुगयान गम्सुसे
प्रार्थना की | शिवजी भक्तीक अधीन इनक कारण प्रति
उनके बसाथ हुए, पराथियलिद्र्म प्रण्तित दनक्त लिये आया
#रवत थे | जब उन दोनसकि पराथितयूजन करते बहुत दिन
शत गये, तव एक समय परमेश्वर दिवने प्रसन्न देकर कद्भ---
“में तुम्दारी आराधनासे बहुत संत हैँ । तुम दोनों गुझ़से वर
मांगों ।! उस समय उनके ऐसा कटनेपर नर और नारायपणने
टोगोकि दतिकी कामसासे कहा--देवेशशर । यदि आप प्रसन्न
हैं ओर यदि भुप्त बर देना चादते हूँ तो अपने खल्यसे पूजा
इदण परनेफ लिये यदी झित ज्ञ णाउये ।?
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उयीरनपीक/ 4नौन्नानमा+- नेगायोकुममविशारि---मन-प-पआऋ- “.%-- आन पानी ऑन +ननन-समकनिकन पाक. 8 पनामनय आनत-..प.. फनी "र्शीिआ
परम जी.
ते 4 20 88
सतऊजा फापते प--मद्ांपया | ऊपर आडया दाल
प्र् £-023। व शाप कह 3, है; ४५
कीट हुआ आर उसका आरायगात नी फल मिलता २५
वह सब यहां तुम्हे बता दिया । इसदे:
दाद भ॑ उत्तम
नामक ज्र्या ध्ट तिल न्म्द्वा 88 थे प्भ्य र ५ है|
र झ्यातिलडाफका राग झा! । | म्याएदर ६८
कार्य
४ २
20
टाटा
उच्का भाहान्म्सस्
और मक्तोंकी दर्शन देनेके लिये स्वयं केदारेखरके नागते प्रतिद्ध
ही वर्दों रूते ई। व दर्शन और पूजन करवेवाले भक्तोंको
सदा अभीष्ठ बल प्रदान करते £ । उसी दिनसे जार मिसने
भी भक्तिभावसे केदारेखरका पूजन जिया; उसके लिये स्वप्ममें
भी हुःख दुलभ हो गया। यो भगवान् शिवद्धा प्रिय भक्त
वहाँ शिवलिद्कके निकट शिवरे रूपसे अद्ित वण्य ( ककुण
या कड़ा ) चढ़ाता दे वद्द उस सल्ययुक्त स्वरूपदत दशन
करके समस्त पापति मुक्त दवा जाता के। साग दी जावन्गुफ़ भी
ही जाता रे। जो यदरीवनकी यात्रा ऋता है) डसे भी
जीवन्मुक्ति प्राप्त होती ४ । नर और माराबगके तथा केदरेवर
शिवके रूपका दशोन करते मनुष्य मोश्का भागी ऐसा ई)
इसमें संशय सही हे। छेदारखरमें भक्ति रसमेदाण जो पुरुष
बदवी यासा आरम्ध करके पाह्म:; पदननेऊे
पहल भागों दी नर जाने ऊँ थे नी 3 जाने ६--पृर्मर्म
विचार करनेठी आवश्यवया मर्दों ह। रू वेडारतोसर्ग पहचनर
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भयानक परसाक्रमी तष्ट भीगने आनी मातात पृ - «मा !
गेरे पिताजी कहोँ हैं ? तुम आगली क्यों रदती ही £ मे सईद रस
जानना चादता है | अतः यथाथ बात बताओ |!
कर्वाओ बोली-जेश | रामणके छोड़े भाई कुम्गकण
तेरे पिता थे। भाईराद्ित उस मद्बाबली तीएी। भआीरामन मार
डाला । गेरे पिताका नाम कांड ओर गांताका नाम पुप्की
था | विराध मेरे पति थे, जिन्हें पृत्रकालो रामने मार डाटा ।
अपने प्रिय खामी के मारे जानेपर गे अपने माता-पिताके पार
रहती थी | एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त उनि्क चिल्य
सुतीक्णकी अपना आहार बनानेके लिये गये । थे बड़ तपल्ी
और मद्दात्मा ये। उन्होंने कृपषित हाकर मर मातानतताय। नहा
कर डाला । वे दोनों मर गये। तबत मे अकाली दाकर वेद
दुःखके साथ इस पर्व॑तपर रददन लगी । भें कार अवलम्त
| रह गया । में असद्दाय ओर हुःखते आतठुर दकर यदा
निवास करती थी | इसी समय मदहान् अरू-पराकंत पम्प
राक्षस कुम्मकर्ण जो रावणके छोटे भाई ये) बद्ों आये। उन्होंने
बलात्कारपूर्वक मेरे साथ समागम् किया | फिर वे मु 3
लड्ढा चले गये। तत्पश्नात् तुम्दारा जन्म हुआ। तुम भी
पिताके समान ही महान् बलवान ओर पराक्रमी द्वो | अब में
तुम्हारा ही सहारा लेकर यहाँ कालक्षेप करती हूँ ।
सूतजी कहते हे--न्राक्षणो ! ककंटीकी यह बात
सुनकर भयानक पराक्रमी भीम कुपित दो यइ विचार करने
लगा कि में विष्णुके साथ केंसा बर्ताव करूँ ! इन्हंनि मेरे
पिताकी मार डाला । मेरे नाना-मानी भी उनके भक्तके
हाथसे मारे गये | विराधको भी इन्होंने ही मार डाला ओर
इस प्रकार मुझे बहुत दुध्ख दिया । यदि में अपने पिताका
पुत्र हूँ. तो श्रीहरिकी अवश्य पीड़ा दूँगा |?
ऐसा निश्चय करके भीम महान् तप करनेके लिये चला
गया । उसने ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये एक हजार वर्षातक
. महान तप. किया । तपस्याके साथ-साथ वह मन-दी-मन इृष्ट-
देवका ध्यान किया करता था। तब लोकपितामह ब्रह्मा उसे
बर देनेके लिये गये ओर इस प्रकार बोले |
चह्माजीने. कहा--भीम ! में तुमपर प्रसन्न हूँ; तुम्हारी
जो इच्छा हो; उसके अनुसार वर माँगो ।
भीम वोलछा--देवेश्वर | कमछासन ! यदि आप प्रसन्न
द हैं ओर मुझे वर देना चाहते हैं तो आज मुझे ऐसा बल
टीजिये, जिसकी कहीं तुलना न हो |
« नमी रद्धाय शाल्ताय अधयण परमात्मन
[ संक्षिप्त-शिवपुणणा
पिकजनपपकरण्माक, या ------त->लज+-++++++++ा+++त तर अ ७-७ +कमेकमी:-- आतनहफतका / आग लीई 3 ब्ब बे क+ आन्जडी न््मयाक जल." ज्वशाओ कल. चाहे ॥ २ प्र+ती भी... »+--न-ी “लीन 2... /मी-2० दमन ल्रि.-.नपीकमाान-भरीका. अर - “पानी भा नानम>-
न्न्न जब ने 3 अननन्का मना “7 | * 0 भर न् बल
दर -२-त- जीप “बन कमनकन++म५ तार मना मिनीीक न
सूतजी कहते ह--दिता कझकर उम एक
अदाजीनोीं नमह्कार किया ओर अश्याजी भी उसे अमर! के
8 आने धमकी चछ गये । अड्ाजीए अलत्त कहपत्न
सबसे आने वर आया ओर माताक़ प्रगाम के शत
पूरक थे गयसे बेला--र्मो ! आतब्र तुम मेरा वह देखो।॥
आदि चेनताओं तंगी इनका संदायता करवट 2408
पद्ान, र्धिर कर डादूंगा। ऐसा कहकर मयातक पक
भीमने 72. आदि देवताओंकों जीता ओर उत खडे
आपने अपने लानत मिकाल बाद किया | कलर
देवताओंडी प्रगति उनका पक्ष छेनेवाले श्रीदृरिको भी उसे
शुद्दन दण्या । किए प्रशान्नताधएवक पुथ्मीवी जीतनोंप्राएम
किया । सबसे पहुले बंद कॉमटप देशके गज पुदतिगत
औआतने छिये गया । बर्दो रजक साथ उतका भवकर युद्ध
ला | नए अमुर शीमने अक्षाजर्क दिये हुए वर
दिये आशित रनेयाऊे मद्दावीर मशरणज तुदशिगओ पाल के
दिया और सम सामग्रियोंसद्दित उतका राज्य तथा फए आग
अधिकारों कर लिया। भगवान् शिवर्क मय भें
परम पर्मात्मा राजाकों भी उसने कैद कर लिया ओर अर
रैरॉति बेदी शलऊर उन्हें एकान्त खातमे वैदे के दिया । का
उन्होंने भगवानक्ी प्रीतिक छिय शिवकी उत्तम पारषित रू
बनाकर उन्दींका भजन-पूजन आर8्म के दिया ।
बारबार गड्ञाजीकी लुति की आर मानलिक सात ऑदि ५4
पार्गिय एजनवी विविसे शंकरजीका एज समन्न के | वि
पूवेक भगवान् शिवक्ता ध्यान करके वे प्रणव
( ४ नमः शिवाय ) का जप करने छगें।अ। हें दूत! है
काग करनेके लिये अवकाश नहीं मिलता था | उन् दिन
साध्वी पत्नी राजबल्लभा दक्षिणा प्रेम गा
करती थीं। वे दम्पति अनन्यभावसे कल्यी ता
भगवान् शंकरका भजन करते और प्रतिदिन उद्दीकी कर
तत्यर रहते ये । इधर वह राक्षस वर्क दे
यशकर्म आदि सब घर्मोका लोप करने हो (हा
लगा---'तुमलोग सब कुछ झझ दो ।
राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ ले उसने सांग पं
[ओर
वशरमें कर लिया । वह वेदों, शान
बताये हुए. धर्मका लोप करके
खय॑ ही उपभोग करने लगा । गे हो
तब सब देवता तथा ऋषि अलन्त पी रे दो ह
तटपर गये और शिवका अंरिधिन तथा
जो.
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हे हि (2 6 ः+
अटिस्द्धलंहिता ]
४ कयरेंम्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिलिज्ञक्ति आधिभावकी कथा *#
३७५१
सिम्नऑमान्््गाकानारमड- "रमन पक नर "मा" हान्+ मादक 3-७ दाह पद न" आही-'पऑआ2+०५ पाया “न "नमन +मकक्॥४ ० यान. अतिषामपोमाकममा एम -#ननक>म+* "मनन पहना भार पु» > सही. - भाम-नरानमयिकानविशन- की. 'र+-सआनरमदि कक. सकननन -*ममओ).2-.ह"-“पााममयाड+ पेन नाम भाह+ ना ॥०++गाइ पाक 9 फनन न. आती,
_+पन्न्णा-नकीढ़ी. ुमपाकथनयइनमायुक--ाछल्क०-६पाका---परीकक9 "3 मप्पषमणा "को जत. अकन पाकन--जमिी३>०मी०-भ-गरयूवैन 3४ नम गुर ४ ““म्पहाम मम अा;* पर" ०-धक पुरा.
उनके इस प्रकार ल॒ति ऋरतेपर भगवान शिव अलन्त प्रसन्न
ट देवताओंसे बोछि--देवगण तथा महपियों ! में प्रसन्न हूँ
पर माँगा | तुम्हारा कीन-सा कब सिद्ध करें ??
देवता बाझू-देवेशर ! आप अन्तवगी ६, झतः
पके मनकी सारी बातें जानते है | आपसे कुछ भी अश्ात
नी दे | प्रभो ! महेश्वर | कम्मकर्णसे उत्तन्न ककटीका बलवान्
प्र रान्षस भीम बअ्रद्याजीके दिये हुए बरसे शक्तिशाली हो
दवताआंबत निरन्तर पीड़ा दे रहा दे । अतः आप इस
हुथदायी रालसका नाश कर दीजिये। हमपर कृपा कीजिये)
विलम्ब ने कीजिये |
घस्भुन कहा--देवताओ | कामरुप देशके राजा
सदद्षिग मर श्रेंठ् भक्त है | उनसे मेरा एक संदेश कह दी |
फेर नुम्दारा सारा कार्य शीत द्वी पूरा हो जावगा । उनसे
लॉ कासखणम दशक आधिपति मम दाराज. सुद लिए !
हमी |! तुम मेर सियोप भक्त ट्ष । अतः प्रेमपृवंक मेरा भजन
“प। बुए रास भीम ब्द्याजीका वर पाकर प्रवल ही गया
4॥। इसीलिय उसने त्द्ारा तिरस्वार किया दे | परंतु अब
$ उस दए मे मार टार्देंगा। इसमें संदेह नं हैं |
खुतजी फल एप--न्राद्णा ! तय उस सब देवताओंने
परप्रताप्रवक यर्दो जाकर उसे सद्ाराजसे शम्मुदी कही हुई
परी बात कए सुनायी । उससे बह संदेश कहकर देवताओं
“रे भदपियाको बड़ा आनन्द प्राप्त रुआ और थे सक-फेसव
दी अपने-अपने आलमकों चले गये |
श्पर भगवान थित झो अपने सभाक साथ लोऋट्ितको
नाप आने वकोे सा दरनेके लिये लाइर उस द निकट
हे कं ९ 22 कि
3 शी पुमपद पर्य ठटर गये इती समय कामरप्रमरशन
"रब पक: छत गाद धान लगाना अर क्य।
% भंभे ये किसोने सजकने जावर वह दिया कि गणा तुम्दारे
३५ ी *)७, 3 5, २९४५ ६०.५ ६४ १ ६ रण -.3 ऋ ०
म
$ ब् ब्ोछ
ॉ है| ४ 3, ही है १5 जी ) न्रा
अं उस सच ६ |
चला
40000 रो
रक्षाका भार तंपकर कहा--में चराचर जगतके खामी
भगवाव शिवका पूजन करता हूँ |? तब राक्षत भीसने भगवान्
इंकरके प्रति वहुत तिरस्कारयुक्त दुर्वाचन कहप्र राजाको
घमकाया ओर भगवान् शंकरके पार्थिव छिक्लयर तलवार
चल्ययी | वह तलवार उस पाथिव लिझ्नका सं भी नहीं करने
पायी कि उससे साक्षात् भगवान् हर वहाँ प्रकट दो गये ओर
बीले--८दुखी, में भीमेश्वर है ओर अपने भक्तकी रक्षाफे लिये
प्रकट हुआ हूं | मेरा पहलेसे ही यह ते दे कि मे सदा अपने
भक्तकी रक्षा करँ ) इसलिये भक्तोकी सुख देनवाले मरे बलकी
ओर दृश्टिपात करों
एसा कटकर भगवान् शिवन पिनाकसे उसकी तलयारके
दी ठुकड़े कर दिये | तब्र उस राक्षमने फिर अपना चिश्ूल
चल्या) परंतु शम्मुने उस दुषके त्रिद्यूडफ़े भी सेकड़ों ठुकड़े
कर डाले | तदनन्तर डंकरजीके साथ उसका धार युद्ध हुआ,
जिसस सारा जगत् क्षुब्ध दि उठा । तब नाझजीने आकर
भगवान् द्ंकरसे प्राथना की |
नारद वोछ--गोंकी प्रमर्भे ठालनेयाले मपरेश्वर !
मेर नाथ | आप क्षमा करें, क्षमा करें । तिमकेदी काटनेके
लिये कुब्दाड़ा चअडानेकी क्या आवश्यकता ४ | झीम दी इसका
संहार ऋर डालिय |
गारदजीक
हुकारमानत उस
ते शकार सायना ऋरन 7
सर्प
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फ्ॉक्ुफक न» कृत
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अ्यार-्ग्पाक,
«०. ७ ९... ++ >रीमेन्न्मीाणन "मिशन 3 मीन आय जा जि, च्ब्क्त अनयकनी जी. नहीन न दर 7 8 के;
राक्षसोंकी दत्ध कर दिया । तंदनन्तर भगवान् थे! करती कृपा
इन्द्र आदि समस्त देवताओं और एुनीखशकोी शान्ति मिली
तथा सम्पूर्ण जगत् ख़थ हुआ | उक्ष समय देवताओं ओर
विशेषतः सुनियोंगे भगवान शंनरसे प्रा ना की कि प्रभो | आप
यहाँ लोगोंकी सुख देनेके लिये सदा निवास करें । यद देश
निन्दित माना गया दे | यदाँ आनेवाले छोगेको प्रायः कुः्स 2
प्रात होता है । परंतु आपका दर्शन करनेस यहाँ सबका
% गयी सद्दात सात्ताय धटाते परमात्मद् है
से रःक- सकल समन कक पक-ककानपन-पपकभ»क के +कनन-प पान पम्प कना+ + ३ -प नमन जम
#. &. क. ऋे:ओ रु जा अमणा 3 डर 3 बच
| संक्षिप्-शिवपुरणा[
२७२ ज-...-ाथाआ2 मापा नमिाआ गाए ००० क-इम्कन- पके *पाकिनन्कनगारेलपार*पर ५ वानी महा पक मयाह-ऋ्ादक पाप ना या ४ - एक? "न यह पमपपाहनाहदायाक भा "राय ११: ० तनााा कक
हा >> जी जानी. अा 3ेजनाएं आनमान सनी... डर जन जन्मनाननन "जया भरना भोज जज का अमान जी.
ऊ्लीणग द्वागी । भाव भीमरांकरके नागसे विज्यात हैगे |
सबके समर्ण मनोरथोकी सिद्धि करेंगे । आपका के न्नोीः
छिह सदा पूजनीय और रामस्त आपत्तियेक्रा निवाण के
बाली छा ।?
सूतजी कहते है--बद्वाणों | उनके इस प्रका प्रा
करनेपर लोकदितकारी एवं भक्तवत्तल परम हत ॥
प्रस्तापूर्तक यर्दी खित दो गये । ( अथाब -ह )
बाबा... “के अप न
ताक, "->भणकन्मनकी .-न्ब 2, 3७५“ ५3..-“* रे कसम
विश्वेश्वर ज्योतिर्ठिज्ञ आर उनकी महिमाके प्रस$में पश्चकोशीकी महत्ताका प्रतिपादन
सूतजी कहते ह-मनिवरों | अब में काशीके विश्वे-
श्वर नामक ज्योतिर्दिज्गका माद्मत्य बताऊँगा। जो मद्रापातकका
भी नाश करनेवाला ह । ठुमलोग सुनो | इस भूतलपर जो
कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर होती ऐ+ वह राखिदानन्द्खलूप) निर्वि-
कार एवं सनातन ब्रद्वाव्प दे । अपने कैवल्य ( अद्वेत )
भावमें ही रममेंवाले उन अद्वितीय परमात्मामें कभी एकसे दो
हो जामेकी इच्छा जाग्रत् हुई# । फिर वे द्वी परमात्मा सगुणरूपर्म
प्रकट हो शिव कइलाये | वे शिव द्वी पुछघ और ख्ली दो रुप
प्रकट हो गये । उनमें जो पुरुष था; उसका (शिव? नाम हुआ
और जो जी हुईं) उसे “शक्ति? कहते ई । उन चिदानन्द-
खरूप शिव और शक्तिने खय॑ अद्ृष्ट रहकर खभावसे द्वी दो
चेतनों ( प्रकृति और पुरुष ) की सृष्टि को | मुनिवरों | उन
दोनों माता-पिताओकी उस समय सामने म॑ देखकर वे दोनों
प्रकृति और पुरुष मह्दान् संशयमें पड़ गये | उस समय निगुण
परमात्मासे आकाशवाणी प्रकट हुई---“ठुम दोनोंको तपस्या
करनी चाहिये। फिर तुमसे परम उत्तम सष्टिका विस्तार होगा |?
दे प्रति और पुरुष बोले--प्रभो ! शिव | तपस्याके
लिये तो कोई स्थान दे ही नहीं | फिर हम दोनों इस समय
कहाँ स्थित होकर आपकी आज्ञाके अनुसार तप करें ।?
तब निर्गण शिवने तेजके सारभूत पॉच कोस लंबरे-चोड़े.
शुभ एवं सुन्दर नगरका निर्माण किया) जो उनका अपना ही
खरूप था | वह सभी आवश्यक उपकरणोसे युक्त था । उस
नगरका निर्माण करके उन्होंने उसे उन दोनोंके लिये भेजा।
वह नगर आकाशमें पुरषके समीप आकर स्थित हो गया ।
तब पुरुष--श्रीहरिने उस नगरमें स्थित हो सष्टिकी कामनासे
# “स द्वितीयमैच्छत! ( दृहदारण्यक उ०---१ | ४ । ३ )
. इस भ्रुतिसे भी यद्दी वात सिद्ध होती दे ।
(झयका थ्यान करते हुए बहुत वर्षोतक ता किया उठ
परिक्षमके कारण उनके शरीरसे स्वेत जलको अनेक पाएँ
प्रकट हुई: मिनसे सारा शल्य आकाश सा हे गया ।
बुला झुछ भी दिशस्ायी नदीं देता था | उपे देखकर भा
विष्णु मन-ददी-मन बोल उठे--यई कैसी अद्भुत बल
देती है ? उस समय इस आश्रयकी देखकर उद्दोंने आरा
दिलाया) जिससे उन ग्रभुके सामने दी उनके एक कार मो
गिर पड़ी । जद्दाँ चर मणि गिरी, वह सात
नामक मद्दान तीर्थ हो गया । जब पूर्तोक् जहर कह
पश्नक्ोशी डूबने ओर बहने लगी? तंग तिर्गण शिवने गे
उसे अपने त्रिग्यलके द्वारा धारण कर लिया | फिर विष मे
पत्नी प्रकृतिके साथ वहीं सोये | तब उनकी नामित एक
प्रकट हुआ और उस वमलसे ब्रद्ा उ7- हुए | है
उत्त्तिमें भी शंकरका अदिश ही कीरण था की
शिवकी आजा पाकर अझ्ुत उंष्ट आरम्भ की
त्रद्माण्डमें चौदद भुवन बताये । अह्ा्ड कक
पचास करोड़ योजनका बताया है | फिर भगवीर
सोचा कि “श्रद्माण्डके भीतर कर्मपाइसे
कैसे प्रात कर सकेंगे ?? यह सोचकर
पञ्नक्रेशीको इस जगतमें छोड़े दिया ! हक
८ध्यह पञ्चक्रोशी काशी लोकमे कृल्याणदायिनी हर
नाश करनेवाली ज्ञानदात्री तथा मोक्षकी ही द्वव १४
मानी गयी है | अतएव मुझे परम भव । गा
ने “्अविमुक्तःलिज्ञकी स्थापना की है ' (वह
हरे ! तुम्हें कमी इस क्षेत्रका लाग नहीं हु कि
कहकर भगवान् हरने काशीपुरीकी खंगे
दैधे
उद्दोने मि
जद डर ह अ ढ़ 3९७ छह हक हा डर
५ ओीकिजितबा *+ 5» हब; » ५5 ०» 5 न्> मी
[ए करोटिब्द्रसंद्िता ] ४ बाराणसी तथा विद्श्वरका माहात्य #
>पकक्केनकबी-.. ५ थे उक.. )+-म्मकनकतर- जम >+-नमनमीन ञरीओाण
हर र/भपरकामपााभावअयातातारयहीवपपान्यदकाइमितान्यकभय कार कापभशाका+पय वन्य हम पा करन कक गम ० वा धा कया ०० माह प्प७म या या ६००5२, >32%0#७७४४ए#४/४##एशशशाशक्ि्ि्णएथ।
वे। कर मर्नलोकके जगत छोड़े दिया | व्रद्माजीका एक दिन न
बन चर के [ ६* _ यसो
॥8 ऐसा इनिपर जब सारे जगतुका प्रत्य हो जाता के तब भी. छाए पड
हे तिश्रव ही इस काशीपुरीका नाश नहीं होता । उस समय... | कक
भगवान शिव इसे त्रिश्वपर धारण कर छेते है और जब बह्मा-.. आप,
के दोरा पुनः नय्री खष्टि की जाती है; तब इसे फिर वे इस नूतढ-.. >होएँ ५ %॥॥/
!
मन कल
अल
। छल कै क्त
(0००७ 7
(५
$
॥ 7२ खापित कर देते हैं| कर्मोक्रा कर्पण करनेसे ही इस पुरी- . घड़े
की भ्काशीः कहते हैं | कापझ्मीमें अविमुक्तेद्वर लिज्न सदा विराज-
मान सता दे | वह मद्वापातक्की पुरेषोक्ी भी मोक्ष प्रदान
फरनवाल है | मुनीखरों | अन्य मोक्षदायक् थामोर्म सारूप्य
आदि मुक्ति प्रात होती है | केवड इस काश्ञीर्म ही जीवोंको
सायुज्य नामक सर्वोत्तम मुक्ति सुलभ होती है । जिनकी
& दी भी गति नहीं दे, उनके लिये वाराणसी पुरी ही गति है । 27 ॥।
£ गद्मपुण्यमयी पश्चकोशी करोड़ों दृत्याओका घिनाश करनेवाली मे | 20५ कद
; ई । यहाँ समस्त अमरगण भी मरणकी इच्छा करते हैँ | फिर
: इलरोकी ते। वात ही क्या है । यह शंकरकी प्रिय नगरी काश्नी अविमुदठ्य बोछे--ऋलसलूपी रोगके सुन्दर ओपध
; सदी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हे | देवाधिदेव मदादेव ! आप वास्तनम तीना ्यककि लामी तथा
ब्रद्मा ओर विष्णु आदिफे द्वारा भी सेयनीय 7 । देय । झाशी-
पुरीको आप अयनी राजधानी स्वीकार करें। में अखिन्त सुलकी
प्राप्तेकि लिये यहाँ सदा आपका ब्यान छगाये शखिरमादसे बैठा
रहूँगा। आप दी मुक्ति देनेवाले
क् न हे ॥
।. परस्यमफ्रपति) जो भीतरसे ससगुणी और बाहरसे तगोगुणी
(१६ गये ६, कालाग्नि रद्रके नामसे विख्यात हैँ | वे निगुण
'शने टुए भी सगुणरुपमें प्रकट हुए शिव हूँ । उन्होंने बारंबार
प्रणाम करके निगुंग शिवसे इस प्रकार कदा |
मद बोलि--विखनाथ ! महबर | में आपका ही हूँ;
(मन संशय नहों है। साम्य महदिव | मेंस आत्मजर
सतजिये | जगवते | लोफपरितदी दामनासे आपको सदा
एना अआदिये । जगजाध ।! में
ं
क्र्पा
यदँ
आपसे प्रार्थना करता हूँ | आप
सार जीउेदा उद्धार कर |
बिक खत * शक ््ब
हूं, दसरा कोर नदीं । अतः
]
हा
रा >> छा
तेया लब्यूग काननाओआफ प्र
न् छा रो अच्छा * 3]
अप दतारक ये उसा-
न
साएत सदा या पिराजसान २८ | रदाराय ! आज समसत
आयात संतारसा गर्स पार कार । दर? ही बारदार प्रारना
जज पथ ! 4 + डा करा कम कह | पु ता कक कक 40 न हक न
फरता £ एक कांप जान सा हा कार ; र
खतजा बदल ईै>शआदाना ! जब व देना से
हु
शंकरस इस ग्रद्यर प्रार्थना दो तय से
हा
९४..8 ॥.
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शव
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करते हैं | उस उत्तम मद्ायोगया -7 है पराशुवत योग ।
उसका श्रतियोद्वारा प्रतिपादन हुआ है। वह भोग ओर मोकश्नदप
फल प्रदान करनेवाल्त दे । मद्ेश्वरि ! बारणशी पुरी निवास
करना मुझे सदा ही अच्छा लगता है | जिस काग्ण् में सत्र
कुछ छोड़कर काश्नीम रहता #, उसे बताता हैँ मुनो | जो
मेरा भक्त तथा मेरे तत्वका ज्ञानी के ये दोनों अवश्य ही मोल
भागी होते हूँ । उनके लिये तीर्थकी अपेक्षा नई है । निद्ठित
और- अविहित दोनों प्रकास्के कर्म उनके लिये समान है ।
उन्हें जीवन्मुक्त ही समझना चा दिये । वे दोनों कई भी 48
तुरंत ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हँ । यदू मेने निश्चित
बात कही है। सर्वोत्तमशक्ति देवी उम्रे ! इस परम उत्तम
अविमुक्त वीर्थमं जो विशेष बात दे? उसे तुम मन लगाकर
सुनो। सभी वर्ण ओरसमस्त आ श्रमेकि लोग चादे वे बालक) जवान
या बूंढे, कोई भी क्यों न हों-“यदिं इस पुरीमे मर जायें तो मुक्त
हो ही जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। सी अपविन्र दो या
पवित्र, कुमारी हो या विवाहिता: विधवा हो + वन्व्या। रजल्ला,
प्रसुता) संस्कारहीना अथवा जैसी-तैंसी--कैंसी ही क्यों न दो
यदि इस क्षेत्रमें मरी हो तो अवश्य मेक्षकी भागिनी होती दै--
इसमें संदेह नहीं है । स्वेदज, अण्डज) उदुभिज्न अथवा
जरायुज प्राणी जैसे यहाँ मरनेपर मोक्ष पाता है) वैसे और
कहीं नहीं पाता । देवि ! यहाँ मरनेवालेके लिये न शानकी
अपेक्षा है न भक्तिकी; ने कमंकी आवश्यकता है न दानकी।
न कमी संस्कृतिकी अपेक्षा है और न धर्मकी हीः यहाँ नाम-
दीतेन) पूजन तथा उत्तम जातिकी भी अपेक्षा नहीं होती ।
जो मनुष्य मेरे इस मोक्षदायक क्षेत्रम निवास करता है, वह
चाहे जैसे मरे! उसके लिये मोक्षकी प्राप्ति सुनिश्वित है
प्रिये | मेरा यह दिव्य पुर गुछासे मी गुह्मतर है । ब्रह्मा आदि
देवता भी इसके माहात्म्यको नहीं जानते | इसलिये यह
महान क्षेत्र अविम॒ुक्त नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि नेमिष आदि
सभी वीर्थेंसि यह श्रेष्ठ है। यह मरनेपर अवद्य मोक्ष देनेवाला
है । धर्मका सार सत्य है; मोक्षका सार समता है तथा समस्त
क्षेत्रों एवं तीर्थोका सार यह “अविमुक्तः तीर्थ ( काशी ) है---
ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। इच्छानुसार भोजन) शयन,
क्रीडा तथा विविध कर्मोका अनुष्ठान करता हुआ भी मनुष्य
यदि इस अविमुक्त तीथमें प्राणांका परित्याग करता है तो उसे
मोक्ष अर जाता है । जिसका चित्त विषयोंमें आसक्त दै
ओर जिसने धमकी रुचि त्याग दी है, वह भी यदि इस
क्रम मृत्युकों प्राप्त ढेता दे तो पुनः संसार-बन्धनमें -नहीं
« नमो रुद्धाय शास्ताय ब्रह्मण परमात्मने $#
[ संक्षिप्तशिवुुपा,
््च््त्लन््य््ज्ै६2कथु््पक्६थ्स्य्य्य्प्प्यखचख्श्यश््श््श् ल
>> सेल जीन था व खिय्णननगाीी की जी आयी
पड़ना | हिर जो ममतासे रहित वी७ सचगुगी) कस
कर्म फुशछ और कंतपिनिके अभिमानते रख हेड चाप
7्ती भी कामका आरम्म ने करनेवाले हैं उनदी ते ग॥॥
क्या है। थे सब मुझमें द्वी खित ई ।
इस काशीपुरीमे शिवभक्तोंद्ार अनेक शिव राम
हे
किये गये दूं । पार्बति ! वे सझू्ण अभी! देनेवाठे आ
मोक्षदायक & । चार्यों दिद्याओंम पॉच-ोच कस फै ह#
यह द्षेत्र ःअविमुक्तः कद्ा गया 2, बह सब आफ गेक्ाफ)|
जीवकी मृत्युकालमे यह क्षेत्र उपलत्य हे जाय ते
अवश्य मोद्षतरी प्राप्ति द्वोती दे । बदि निष्माप मनु क्र
परे तो उसका तत्काल मोक्ष दो नाता है ओर जो पी पु;
परता के बंद कायव्यूदरंकों प्रात्त होता है। उठे पढे वर्ा
अनुभव करके द्वी पीछे ोक्षद्री प्राति होती है। ४८९६
उस अविमुक्त क्षेत्र पातक कर्ता है, वह हज ॥£
मैली यातना पाकर परापका कह भेगनेंके पश्मात है
पाता है | शतकोदि कब्येमिं भी आमने किये हुए कट
नहीं दोता । जीवको अपने द्वारा किये ग़्वे शुभाशुम *
फल अवब्य ही भोगना पड़ता है । केवल अप
नरक देनेवाला द्वोता ढे केबल शर्म कम खगरी ।
करानेबाला होता दे तथा थम ओर अमन को हे
मनुष्य-बानिकी प्रार्ति बतायी गयी दै। अंश
और शुभ कर्मकी अधिकता होनेपर उर्ती है
होता है । शुभ कमकी कमी और अंश हा
होनेपर यहाँ अवम जन्मकी प्राप्ति: होती है | 7
शुभ और अश्यम दोनों ही कमा है हे बात
जीवको सच्चा मोक्ष प्राप्त होता है । यदि
दर्शन किया कै वमी के व
आदरपूर्वक काशीका
काशीमें पहुँचकर म्व्युकी प्राप्ति हेती है | मे है
जाकर गज्ञामें लान करता हैः उसके किया
कर्मका नाद हो जाता है | परठ प्रारव्ध की
नहीं होता) यह निश्चित वात है | जिसकी
जाती है; उसके प्रारब्ध कर्मका भी क्षय हे है
जिसने एक ब्राह्मणको भी काशीबार्स कार्य ह ह
काशीवासका अवसर पाकर मोक्ष लाभ करतीं :
0... ४५ + ।| इत तरह
खूतजी कहते हँ--8निवरों * “
तथा विव्वेश्वर लिक्लिका मंजर माहातव बर्य
ध्व्य
।
]|
#.. + ० .. ऑिनसाा,-क गहिन ऑनान्ममा-म न हा अत की
कीटिदद्ठसंदिता ]
० करनेबाद्य हि न ज-छ न इज
करनेत्रात्या ई। इसकऋ
दा माद्दत्म्य बताऊँगा;
सत्यदायकी मांग और मोक्ष प्रदान
बाद में ऋ्यस्रक्त नामक च्योतिलि
व्यस्वक ज्योतिर्लिशके प्रसझमे महर्षि गोतमके द्वारा किये गये परोपक्ारकी कथा # ३५५
"ाार्ड
|
जि वनकर सदम्य क्यभरम समस पातआत सुक्त हों जाता ६ ।
५ अध्यक २३ )
>+-ब्य::>(“+८.-+*
व्यम्बक ज्योतिर्लिजके प्रसड्रम महर्षि गातमके द्वारा किये गये परोपकारकी कथा, उनका तपके ग्रभावसे
अध्य जल श्राप्त करके ऋषियोंकी अनाइए्टिके कष्टसे रक्षा करना; ऋषियोंका छलपूर्वक
उन्हें गोदत्यामें फँसाकर आश्रमसे निकालना आर शुद्धिका उपाय बताना
खूतज्ी कहते ई--मुनिवरों ! सुनो) मैने सदर व्यासजीके
मुखसे जसी सुनी है उसी रुपमें एक परापनादइक कथा सुर्म्
मुना रहा हूँ। पृूचकालकी बात छ गोतम नामसे विख्यात
एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे, भिनकी परम थामिक पत्नीका नाम
अद्त्या था | दर्षिण दिश्यार्मे जो ब्रक्षगिरि ६) वहीं उन्हें
दस जार बर्षोतक तपस्या की थी । उत्तम ब्रतका पाल्न
फरनेयालि महर्पियों ! एक समय वहाँ सो वर्षोत्क बड़ा
भयानक अवर्पण हो गया । सब लोग महान दुःखमें पढ़े
गये । इस भूतलपर कईीं गीला पत्ता भी नहीं दिखायी देता
था । फिर जीवों आधारभूत जल कहाँसे दृष्टिगोचर होता ।
उस समय भुनि। मनप्यक पश्ु) पक्षी और मुंग--सब बहसे
दसों दिशाओंओ चले गये | तव गौतम ऋषिने छः मददीनेतक
पप वर के यझग़ी प्रसन्न किया | बझुणने प्रकट द्वोकर वर
' मागनेका कदा--क्यूपिने प्रष्टिफे लिये प्राथना की। बर्णने
+-+>'देवता आई पिवानके दिरद्ध तुष्टि ने करके में तुः
इस्ठाई असुस्यर तुम्हें सदा अछय रइनेवाडा जल देता
"हैं । तुम एक गया तयार बरो |!
सेवन करता हक वसा द्वी फल पाता दे | मद्षन् पुरुषक्की सेवासे
मद्तत्ता मिलती दे आर श्षुद्रकीं सेबरासे शुद्रता | उत्तम पुदपां
का यह स्वभावद्वयी है कि वे दूसरेकि दुःखकों नहीं सदन
कर पाते | अपनेको दुःख प्राप्त हो जाय, इसे भी स्वीकार
कर लेते हूँ । किंतु दूससोंके दुःखका निवारण दी करते हैं |
दवाडु। अभिमानशृत्य, उपकारी ओर जितेन्द्रिय--ये पुप्थफे
चार खंभे हैँ, जिनके आधारपर यद एप्यी टिकी हुई ऐ ।४
दनन्तर गीतमजी वहाँ उस परम दुलभ जलको पाकर
विधिवृर्वक निल्ब-नेम्ित्तिऊ कम करने लगे | उने सुनीश्यरने
बहा नित्य दोमकी सिद्धिके लिये घान। भो और अनेक प्रकार-
फे नीयार बाँआ दिये | तरह-तरफे धात्य, मंति-शातिद बा
ओर अनेक प्रदास्के फ-एूछ वद्धीं उदटदा उठे । यद समाचार
छुनकर वर्दा दुसरचूसर सदसों पिन, पदप्षो तथा
आप आर रने छगे | मद बने इस चूसगटलमें
बड़ा सुन्दर दी गया। उस अक्षय जहके संयोग अमाउड्टि
के टिये दुः्सदावनी नर्शी रद गयी । उस वनर्म झनेद्
अगर अरब आय आने पिया आए पंत:
बहु त्यक
फिर छ्
३५६ # नमा रुद्राय शान्ताय बदाण परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवषुणण
ज्य्य्य्य्य्श्य््य्ल्ल््ल्स्ह्ल्तल्ल्ज्ज्जज----+--+- कट न हद गनिशरलकरअ तरल रल5+्७ डण्न्न्ज्प्प्प्य््य्स्स्स्स्लज-
तब ये बोले---*भगवन् | यदि आप दें वर देना चाहे
तो ऐसा कोई उपाय वीमिये, जिससे साल कपि टॉट-
फंटकारकर गोतगकी आश्रम बादर निकाछ 4; |?
गणशजीने कहा--ऋषियों | तुम सत्र छोग मुनों |
इस समय तुम उचित ताय नहीं कार रहे हो | बिना किसी
अपराधके उनपर क्रोध करनेके कारण तुम्दारी दनि दी दगी।
जिन्हंने पहले उपकार किया हो; उन्हें यदि पुलस दिया जाय
तो वह अपने लिये द्वितकारक नहीं दाता | जब उपद्षारीकों
दुःख दिया जाता दे; तब उससे इस जगतें अपना दी नाश
होता है ।# ऐसी तपत्या करके उत्तम फछकी सिद्धि दी जाती दे
खय॑ं ही शुभ फलका परित्याग करके अद्दितकारक फलको नदी
अहण किया जाता । ब्रद्माजीने जो यह कहा दे रि अगाभु
कभी साधुताको और साधु कभी असाधुताको नहीं अदण करता,
यह वात निश्चय ही ठीक जान पड़ती है | पटछे उपयासके
कारण जब तुमलछोगोंको दुःख भोगना पड़ा था; तब मर्दि
गोतमने जलकी व्यवस्था करके तुम्हें सुख दिया । परंतु इस
समय तुम॒ सब छोग उन्हें दुःश्न दे रहे हो | तंसारमें ऐसा
कार्य करना कदापि उचित नहीं | इस बातपर तुम सब
छोग सर्वथा विचार कर लो | ख्रियोंकी शक्तिसे मोहित हुए.
तुमछोग यदि मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम्हारा यह बर्ताव
गोतमके लिये अत्यन्त हितकारक ही होगा, इसमें संशय नहीं
है। ये मुनिश्रेष्ठ गौतम तुम्हें पुनः निश्चय दी सुख देंगे |
अतः उनके साथ छछ करना कदापि उचित नहीं । इसलिये
तुमलछोग कोई दूसरा वर माँगो |
सूतजी कहते हँ--ब्राह्मणो ! महात्मा
ऋषियोंसे जो यह बात कही, वह यद्यपि उनके लिये हितकर
थी, तो भो उन्होंने इसे नहीं स्वीकार किया । तब भक्तोंके
अधीन होनेके कारण उन शिवकुमारने कहा---ततुमलछोगोनि
जिस वस्तुक्े छिये प्रार्थना की है, उसे में अवश्य करूँगा ।
पीछे जो होनहार होगी, वह होकर ही रहेगी |” ऐसा कहकर
वे अन्तर्धान हो गये। मुनीस्वरों | उसके बाद उन दुष्ट
ऋषियोंके प्रभावसे तथा उन्हें प्राप्त हुए. बरके कारण जो घटना:
घटित हुई; उसे सुनो । वहाँ गौतमके खेतमें जो धान और
जी थे,*“उनके पास गणेशजी एक दुर्बंल “एाप्रझएप 675. डैवड गाय बनकर गये। बनकर गये |
# अपराध विना तस्मे क्रुध्यत दानिरेव च
उपस्कृत॑ पुरा यैस्तु तेम्यो दुःख हित॑ नहि।
जदा च दीचते दु:खं तदा नाशों भत्रेदिष्ट ॥
( शि० पु० को० रु० सं २५। १४-१५ )
गणेराने
दिये हुए करके कारण बढ़ गो कॉपती हुई बहों जद्न फ
ओर जी चरने लगी | इसी समय देववश गौतम क्लोअ
गये । वे दयाडु ठद॑रें, इसडिये मुद्दीभर तिनके टेक उह
उस गौकी दकने छो | उन तिनकोंका सर दते ही के
प्रथ्यापर गिर पढ़ी और क्षपिके देखते-देखते उसी
मर गयी |
वे दूशर-दूसरे ( देगी ) ब्राक्षण और उनी हुए कि
ब्दधां छिप हुए राब छुछ देख रहे ये | उस गेके गे है)
सब्र-के-राब बार उठे--गौतमने यह क्या कर झल् !
गोतम भी आाश्रर्यचकित दो, अहल्याको वुलक रात
हुदवसे हुःक्षपू्वक्क बोले---देवि | वह क्या हुआ के
हुआ ! जाने पड़ता दे परमेश्वर मुझपर कुपित हो गे है|
अब क्या कर्लह ? कहाँ जाऊँ ? मुझे हत्या लग गयी |!
इसी समय ब्राद्माण और उनकी पत्नियाँ गेतमड़ो हमे
ओर दुर्बचनोंद्वाय अदल्याक्रों पीड़ित करने हर्गी| अर
दुबुद्धि शिश्य और पुत्र भी गौतमकों वारवार पटकले
विकारने लगे |
ब्राह्मण बोले--अब तुम्हें अपना मैँद वहीँ शि॥
अर गेहलारेत्र हैँह केश!
चादिये | यहाँसे जाओ, जाओ | गोहल्यरिका मुह
तत्काल वन्ननदित स्लान करना चाहिये । जबतईके हुए
आश्रममें रद्देगे, तवतक अभिदेव और पिता हारे
हुए किसी भी दृष्य-कब्यकों ग्रहण नहीं करेंगे। मि
पापी गोहत्यारे | तुम परिवारसहित यहाँते अत चहे व
विलम्ब न करो | ््ि ं
ख्तजी कहते हैँ--ऐसा कहकर हा फ्री पक
पत्थरोंसे मारना आरम्म किया | वें गरर्लियोँ दे का है
ओर अहल्याको सताने छगे। उन दुदध्धक हक न
धमकानेपर गौतम बोले--मुनियो ! में यहँते अतः ऐ
रहूँगा? ऐसा कहकर गौतम उस खानसे तल
और उन सबकी अज्ञासे एक कोस दूर जाकर अत
लिये आश्रम बनाया | वहाँ भी जाकर उन कक हुं
'जबतक तुम्दारे ऊपर हत्या छंगी है ववत हा कष
यज्ञ-यागादि कर्म नहीं करना चाहिये । किती ही
देवयश या पितृयशके अनुष्ठानका तुम्हे अं मर
गया है |? मुनिवर गौतस उनके कंथनावुलाः वार
एक पक्ष बिताकर उस दुःखसे दब हे हक मा
मुनियोसे अपनी शुद्धिके लिये प्रार्थना. के |
दीनमावसे प्रार्थना करनेपर उन ब्राक्षणोंने है पक
तुम अपने पापको प्रकट करते हुए तीन वर. ४५
आजा ० ->नकण्कु-क जय (०५७ का..क्न्ई-अणक- + .....+]र अप स्अ्टअ--.3 & हे. फ्ल्डक
काटिसद्रसदिता )
पैसरित गमांतमकी आराघनास संनतष्ठ हा
०५
न् शिवका दर्शन देना ूू. रे५७
3 जैन" + टुनननईं.. वसा. अन्य “जिडरओ सका सवोकरी
नि 050 यह |... दा महानितक 2 कप जनक संत दरों
परिकम। करों | फिर छोटकर यहाँ एक मह्दनेतक अत करो |
उसके बाद इस बह्वागिरिकी एक सो एक परिक्रमा करनेके
पश्ात् ठग्दारी दाद्धि दोगी | अथवा यर्दों गड़ाजीकी ले आदर
उन्दीकफे जय कान करो तथा एक बरोड़ पाथित्र लिए
बनावार भद्यदेजजीकी आराधना करों। फिर गज्जार्म सक्ान
बरके इस प्रवतकी ग्यारह बार परिक्तमा करों। तटश्रात्
सी बरढकि जलसे पार्थिव शिवलिक्रकों झाम करानेपर
; तुंग्दाग उद्धर होगा ।! उन क्रपियेकि इस प्रकार ऋहनेपर
गोतमने ध्वहुत अच्छा? कहकर उसकी बात मान ली । वे
ग्रोछ--ध्मुनिवरों ! भें आा अओंगानोंकी आशसे यहाँ
पाधिवपूजन तथा ब्रह्मगिरिकी परिक्रमा करूँगा (? ऐसा
आन न ९ करनेफे
कदिकर मुनिश्वेड् गातमने उस प्रवतकी परिक्रमा करनेफ
पश्चात् पाथित्र लिट्रोक्का निर्माण दरके उनका पूजन किया ।
साथी अददल्याने भी साथ रृकर वह सब्र कुछ किया ।
उस समय शथिप्य-प्रशिष्य उन दोनोंकी सेवा करते थे ।
(€ अध्याय २४-२५ )
जरा 64
जाए या पथ गाए +४७७७एएएछा
पत्नीसद्ित गोतमकी आराधनासे संतुष्ट हो भगवान् शिव्रका उन्हें
दुशन देना, गड्ञाकों वहाँ खापित
करके खर भी खिर होना, देवताओंका वहों बृहस्पतिके सिंहराशिपर आनेपर गझाजीके विशेष
माहात्म्यका खीकार छरना, गज्ञाका गातमी ( या गोदायरी ) नामसे ओर शिवका
व्यम्बक ज्योतिर्लिड्क नामसे विख्यात होना तथा इन दोनोंकी महिमा
सूतजी कहते दू>-पर्वीसद्दित गौतम '्पिफे इस
प्रचार आयपना करनेपर संत हए भगवान शिव वह्दों
शिया ओर प्रमथगर्णकि साथ प्रकट दो गये । तदनन्तर प्रसन्न
(हए उपानिधान घंकरने कहा--मद्दामुन | भ मुम्दारो
उत्तम भफिसे बहुत प्रसन्न हूँ | तुम कोई बर माँगो।? उस
परम मदात्म शम्मुझ सुर्दर हपक़ी देखकर आनन्दित हुए
'शोतमल भफिभावमे शंकरओ) प्रणास करके उसकी सात
/0। छ्ी रुति और प्रमाम करे दोनो दाथ जोड़कर
के उनके सामने लड़ ही गये और बोह--देव | मु:
अिभार बर दौणिये ।?
भगवान, शिवने कदा--मुने ! तुम घन््य हो)
कृतक़ल दो और सदा ही जिप्याप हो । इन इशेंने स॒म्दारें
साथ छल फिया । जगतफ़े लोग नुम्दारे दर्शनसे परापरद्ित
है जाते हैं | फिर सदा मेरी मक्तिमं तसर रनेवाले सुम
क्या पापी द्वी? सुने । सिने दरत्माओने तुमपर अत्याचार
किया क वे दी पायी) दुराचारी और दल्वारे हैं। उनके
दशानस दुधर लाग पाषिठ दवा जायेंगे । ये संबद्ध
इतर ई | उन की उद्धार नर्य हे समता ।
प्रष्ट यात्त मर वर आडाए गीत ग2 दादा. है. "5८7
३२५८ ४ नमो रुद्राय शान्ताय अक्षण परमातमने ३ [ लंक्षिएरिवृणा
>कमिकाकण७७. .-दरमव००-पानमीनमदममा+मगा न पाशा नाकाम मी.
अमन आम्कामक--पोममकरिन्पन्मकनअकगा-.. गे... "का-शपोव्य>-पमममय--पाहरीक--फक+-३>-जक.. :0-34%+-पकमम- +-. किक.
#न->उमपोकरा-नाा ० नमकनयाा
पॉँच आदमियोंने जो कह दिया या कर दिया। बढ अल्यशा
तहीं हो सकता | अतः जो हो गया, सो रहे | देवेश | यदि
आप प्रसन्न ईं तो मुझे गह्ठा प्रदान कीजिये ओर ऐसा
करके लोकका महान उपकार बीजिये। आपकी मेरा नमस्कार
है, नमस्कार है ।
यों कहकर गौतमने देवेशर भगवान शिवक्रे दोनो
चरणारविन्द पकड़ लिये ओर लोकद्वितकी कामनाते « उ्हें
नमस्कार किया ।तब शंकरदेवगे पृथिवी और स्वगेके सारभूत
जलकोी निकालकर, जिसे उन्होंने पदलेसे ही रस छोड़ा था
और विवाहमें ब्रद्माजीके दिये हुए, जलमेंसे जो कुछ शेष रह
गया था, वह सब भक्तवत्सल झम्मुने उन मीतम मुनिको
दे दिया | उस समय गड़ाजीका जल परम मुन्दर छीका रूप
घारण करके वहाँ खड़ा हुआ । तब मुनिवर गौतमने उन
गड्स्ाजीकी स्तुति करके उन्हे नमस्कार किया ।
गोतम वोले--गज्े | तुम धन्य हो, कृतकृत्य दो।
तुमने सम्पूर्ण भुवनको पविच्न किया है | इसल्यि निश्चित रूपसे
नरकमें गिरते हुए. मुझ गौतमको पवित्र करो |
तदननन््तर शिवजीने गज्ञाले कहा--देवि | तुम
मुनिको पवित्र करो और तुरंत वापस न जाकर बेवखत मनुके
अद्चाईसवें कलियुगतक यहीं रहो ।
गड़ाने कहा--महद्देश्वर | यदि मेरा माहात्म्य सब नदियोंसे
अधिक हो और अम्बिका तथा गणोंके साथ आप भी यहाँ रहें,
तभी में इस घरातलूपर रहूँगी।
गद्ाजीकी यह बात सुनकर भगवान् शिव बोले---
गज्जे | तुम धन्य हो । मेरी बात सुनो । मैं ठुमसे अलग नहीं
हूँ, तथापि मैं तुम्द्ारे कथनानुसार यहाँ स्थित रहूँगा | तुम
भी स्थित होभो ।
अपने खामी परमेश्वर शिवकी यह बात सुनकर गड्ढमने
मन-ही-मन प्रसन्न हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की | इसी समय
देवता, प्राचीन ऋषि, अनेक उत्तम तीर्थ और नाना प्रकारके
क्षेत्र वहाँ आ पहुँचे | उन सबने बड़े आदरसे जय-जयकार
करते हुए; गौतम) गड्ठडा तथा गिरिशायी शिवका पूजन किया |
तदनन्तर उन सब देवताओंने मस्तक झुका हाथ जोड़कर उन
सबको प्रसन्नतापूर्वक स्तुति की | उस समय प्रसन्न हुई गन्ना
भोर गिरीशने उनसे कह्य--श्रेष्ठ देवताओ ! बर. माँगो |
तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे वह बर इम तुम्हें देंगे |?
अकृमपदता- राम --कााए एकता एमए गए ाएद दम पारक---फममाना फाररा॥पआप-कृरयाा.चु--फण्पकंता“ की" पका&- ादाभमअप मादक" कप कब -- पे 7७ कानयसबफत्कंकत+न्>न--भ.
22 २>-दु>»->+्रपए->ग--"-न्0--+0+ ++माी+- की... पाार+-डमा।प&७+००० कान ../“पापक 37 १० ०ा+ ३) पककामन. रमन 9-आ.3. मनी शा य“3...न्नक. हरि... >> - का मयन..“पाममपमा-०4०“ायुडकआफ-आा.. हवस न्थ- 4 -नइ>+-पाकानकग «यु
,परम सुद्दद् बृहस्पतिजी जब-जत्र
0 आाा न आाआओ 33 नाम +->.++33.>+33७.-.-43- 8-3 ५७ «५ा३ कक -पआ०क नाक -७३१० ३०-५० क ०
देवता बोले--देवेदर | बदि आप खत! है के
तरिताओर्म अंछ गक्के | यदि आप भी प्रसन्न है ते झ्ञाए हए
मनुष्येका प्रिय करनेके लिये आपडोंग दृपापूवक झंति॥
कर |
गडद् बार्ली--देवताओ ) फिर तो सबका प्रिय भझहे
लिये आपलोग खयं दही यददों क्यों नहीं झते ! मे १
गीतमजीऊे पापका प्रश्नालन करके जेते आयी हूँ। उसी ॥|
लीट जाऊँगी | आपके समाजमें यहाँ मेरी कोई विशेष पे
जाती दे। इस बातका पता कैसे छगे ! यदि आप मे
विशेषता सिद्ध कर सके तो मैं अवश्य कहाँ एूँगी-फ
संशय नं है | |;
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सव देवताओने कहा--गर
तब-तब हम सब लोग यहाँ आया करेंगे कस
ग्यारह वर्षोतक लोगोंका जो पातक यह है
मल्ि हो जानेपर हम उसी पापराशिको संग रे
पूर्वक तुम्द्दारे पास आयेंगे । हमने हद
कही है । सरिद्वरे | महादेवि! अतः क्र
समस्त लोकॉपर अनुग्रह् तथा इमारों प्रिय के ।
नित्य निवास करना चाहिये | गुर जग दो"
तभीतक ह_ृवम यहाँ निवास करेंगे | उसे थे
त्रिकालस्नान और भगवान शैंकरका के कैह।
होंगे | फिर तुम्दारी आशा लेकर ऑर्गि है ०
जवणका के कन
फोटिवद्रसंदिता ] वैद्यनाथेश्वर ज्योतिलिश्ञके
>पॉह्गा४ १४०० ुक"-म/ की)... "०२७७ /अमात- बम. रर्नका-
अमीर यहिनााभषामम-दयपार करा र०क सार. पृ: ॥ह/ए: धरम पा मय मन करत भिक कमर हर वन कवि ३०९५ अर पा ३५ हरी ५; “पी पक पहनी पद पक इन “पिया एमी कह पवार मन पा ३ +म न रे ५८“. अनाज ९ .".+०+न५ ५ कर +मरभिममआ ५". नर एल्मनमी पी पी मी गत ५ ही". प्यारी फनी एन *पननपन" जनल नी“.
सूतती कहते हँ--इस प्रकार उन देवताओं तथा
महर्यि दीतमके प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकर और सरिताओंमें
श्रेष्ठ गठ्ठा दोनों व्ाँ खित हो गये । वरहँंकी गड्ढा गोतमी
| गांदावरा ) नामसे विख्यात हुईं ओर भगवान् शिवका
स्योतिमय लित्ठ व्यम्बक कहल्यया । यह ज्योतिलिक् महान
पातकोका नाझ् करनेबात्य दे । उसी दिनसे लेकर जब-मब
लति मिंह गश्िम खित दोतें हैं; तब-तब सब तीथे क्षेत्र)
दयता; पुष्कर आदि सरोवर; गज्ञा आदि नदियों तथा श्रीविष्णु
अद दवंगण अवश्य ही गोतमीके तव्पर पधारते और वास
करते ई। थे सब अबतक गोतमीके किनारे रहते हैं, तवतक
अपने स्ानपर उनका कोई फछ नहीं होता | जब वे अपने
३५९९
सीन
+>.. + कीं अजमओी आजा बक
पाकव्यकी कथा तथा महिमा £#
'अनममीग नीता >जगी १ टी. अमन सकीना ये हरी छा अर यओीएीं जन के विजय ना > _+
प्रदेश लोट आते हैं, तभी वहाँ इनके सेबनका फल मिलता
है। यह ब्यम्बक नामसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिज्त गौतमीके तस्पर
स्वित है ओर बड़े-बड़े पातकोका नाश करनेबाला है । सो
भक्तिभावसे इस तव्यम्बक् लिक्षका दशन। पूजन स्तवन एवं
वन््दना करता है; वह समस्त पायोसे मुक्त हो जाता है ।
गौतमके द्वारा पूजित व्यम्यक नामक ज्योतिलिज्न इस लोकमें
समस्त अभीशेकी देनेवाला तथा प्रलछाकर्म उत्तम मोश्र
प्रदान करनेवाल्य है | मुनीधरों | इस प्रकार तुमने जो कुछ
पूछा था; वह सब मैंने कह सुनाया | अभ्न और क्या सुनना
चाहते हो; कहो [ में उसे भी तुम्हें बताऊँगा। इसमें संशय
नद्दी है । ( अध्याय २६
चकित 5-7
वेद्चनाथेधवर ज्योतिलिड्के प्राकव्यकी कथा तथा महिमा
सूतजी कहत हू--अब में वेद्नायेबर ज्योतिर्लित्रका
पद्री मादत्म बताऊंगा । सुनो ! राक्षमराज रावग नो बड़ा
बिमानी ओर आपने अईकारफी प्रकट करनेवाला था;
पेम परदत कंटासपर भक्तिभावते भगवान् शिवक्री आराधना
९ २4 था | कुछ फाटतक आराधना करनेपर जब मदादेबजी
नन्न नं हुए, तव यह शियकी प्रसज्नताके लिये दसरा तप
वे एगा। पुलरलपुल्मनदन श्रीमान् रायणने सिद्ध स्वान-
हे इिनांलय परयात दाश्चग प्चोसि भरे हए बमर्भ प्रथ्यीपर
मे बदुत बडा गंदी जोदफर उसमें अम्मकी सखापमा थी
र दस पास से भगयान शिवरों स्थापित करदे एयन
सिने किया । प्रीष्य 'झूनुमें वह पाँच अग्नियेफ़ बीचमें वैंठता)
का कृपाप्रसाद पाकर राक्षस राबणन नतमस्तक दी द्वाय
जाइकर उनसे कद्दा- देवेश्वर ! प्रसन्न ददये | में आपके
लड्ढामें ले चलता हूँ । आप मेरे इस ममोरयकी सफल
कीजिये । में आपकी शरण आया हूँ ।!
स्रणक एसा कदटनेपर भगयान् शंकर बड़ संदर्भ परदे
गये ओर अनमने दाकर बोछि-- सशानसरातस ! मेरी सारगर्णित
बात सुनो | तुम मेरे इस उत्ता रन
परको ले जाओ | परंतु जब तुम इसे कई चूमिप रुच दगें
तब यह यर्दी सुस्तिर दा जायग॥8 इसमें सर्प
मंद हद । ४
_ मै है गा ५ छ
तुम्दारी जैसी इच्छा दे॥ यैंसा छगे ।!
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हुआ) जो सत्पुरुषोकी भोग और मोक्ष देनवालछा है | यद दिव्य)
उत्तम एवं श्रेष्ठ ज्योतिलिक्न दर्शन और पूजन भी समह्त
पर्पोको हर लेता हे और मोक्षकी प्राति कराता 3 । : ६. शिय-
लिज्ञ जब सम्पूर्ण लोकोंके दितके छिये वर्दी सित हू गया;
तब रावण भगवान् शित्रका परम उत्तम बर पाकर अपने
घरको चल गया | वहाँ जाकर उरा महान अमुरने बड़े हपड़े
साथ अपनी प्रिया मन्दोदरीको सारी बातें कद सुनायी । इन्ट
आदि सम्पूर्ण देवताओं ओर निर्मछ मुनियोगि जत्र यद पमाना र
सुना; तब वे परस्पर रालाह करके वहाँ आधे | उन राबका मन
भगवान शिवमें लगा हुआ था | उन सब देवताओंमे उ्म
ध्कर शक
समय बहां बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवका विशेष पूजन किया |
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वहाँ. भगवान शंकरका प्रत्यक्ष. दर्शन करके देवताओंने उस
# नग्ा रुद्राय शान्ताय ब्हाण परमातयने ::
राम ->>मुअकाक ->नमभात-ञपन का. कन्पारनन्मयक.. भा > चल च+यापुत-बकनन-0०4 ७० + पािकान्ययडइा-ब..>०म मम... 0 ००७७अंजाओं _4+०+-परा' ०० पेडापैाा+-॥ाहड.. पाक के ्यक
नम 2-९ हर _चिकनयू- च् ञ्कृ _उन्नककन्क
अैकय अल ाामतत पाकर जीजा वनचिक-स >र-परककज पास आज अक 3 +--.39“-सकम्कीक-"पाकाक, ७3-९-ब७-धयाकुण--+>१००४०७०७७ जदबू७०--सक 3... ३०ऑनड+५-अडन-इप-ममाक, ण्त्ल्ज्ल्ल्ललजफलजलललज-- 34+39300»७-७७३७७-प>३००७००...,
|. संक्षिक्त-शिवुणगा्
शिवलि /को विधिनरत् खापना की और उसका वैद्य के
एवकर उराकी जन्दना और सतरन करके वे कक
नल गये |
ऋषियोतनि पूछा--सूतजी ! जब वह शिक्ि #
सित दो गया तथा राबण अपने बरडो चढा ॥7/ 7
कीन-गी मटना घटित हुई--यह आप बताइये |
सूतजीने कद्ा-आद्षणों ! भगबाद शिक्का 7
उत्तम चर पाकर महान अमुर रावण असने परकों चद प।
वर्ड उसने आनी ग्रियासे सब बातें कहीं और के छत
आनन्द का अनुभव करने लगा | इधर इस समाचार कुछ
देवता घबरा गये कि पता नहीं यह देवद्रोही महाहुर का
भगपान् शिवके बरदानसे वछ पाकर क्या करेगा | कहे
नारदजीका भेजा | नारदजीने जाकर राबणोे ऋा-॥
कलास पर्ृतकी उठाओ) तत्र पता लगेगा कि शिकीहिं
हुआ वरदान कद्तिक सफछ हुआ |? रावपको कह वा से
गयी | उसने जाऋर क्रेल्ासको उखाड़ लिया | इक #
फछास दिल उठा | तब गिरिजाके कहनेते ते»
रशवणको त्रमंडी समझकर इस प्रकार शाप दिया ।
महादेवजी वोके--रे रे दुष्ट मक्त दु्व॑द्धि जा हि
अपने वलूपर इतना धमंड न कर | तेरी इन इवओ
धमंड चूर करनेवाला वीर पुरुष शीत्र ही हैं
अवतीण होगा |
सखूतजी कहते हैं--इस प्रकार कहाँ जे पं ः
उसे नारदजीने सुना । रावण भी असन्न चित हैं ग
था, उसी तरह अपने घरको छोट गया । इस ## ॥!
वेनाथेश्वरका माहात्य वताया है | इसे उननेव न
पाप भस्म हो जाता है | ( अथात ९
|
न्प्पणः
ले ०२००
बात: 7-८ 2-4 >> अशिकब
धर [मक् ने (तिलिं
नागेश्वर न ज्यातिर्लिज्गका
श ब प्रसड्भ
पनाऊंगा | दारुका नामसे प्रसिद्ध कोई राक्षसी थी; जो पार्वतीके
वरदानसे सदा उमडम भरी रहती थी | अत्यन्त बल्वान् राक्षस
दारुक उसका पति था | उसने वडुतसे राक्षसोंकी साथ लेकर
वहा सत्पुरुषोका से ट
हक व्युस्षोंका हार मचा रक््खा था | वह छोगोंके यज्ञ ओर
का नाश ऊरता कफिरता था | पश्चिम समुद्रके तटपर उसका
एक वन था, जो सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा रता था | उस
प्रादुभोाव ओर उसकी महिमा... ह
बनका विस्तार सब ओरसे सोलह योजन या । हक ;
विछासके लिये जहाँ जाती थी। वहीँ भूमि) हे के हि
उपकरणोंसे युक्त वह वन भी चला जाता गे | है हा
उस वनकी देख-रेखका भार दारकाकों वीं हक की
अपने पतिके साथ इच्छानुसार उसमे भा ४
राक्षस दारुक अपनी पक्षी दारुकाके सींग 5 ओट 48
भय देता था | उससे पीड़ित हुई प्रजाने गे हे
जाकर उनको अपना दुःख सुनाया |
६
झोटिसद्रसंदिता ] # नागेश्वर नामऋझ ज्योति डुका प्रादर्भाव और उसकी मद्दिमा # डक!
>न्नकनन्ऑफन. गीक
डिक स्थि राछ्योदी बह शाप दे दिया कि थ्ये राक्षस यदि
इप्यीपर थाणियोंशी ईसा या व्ेेका विश्वेस करेंगे तो उसी
गये आपने अणोसे हाथ थी बटगे |? दवताओनि जब यह
पात तुतां। तब उन्दाने देसचारी राउमॉपर चढ़ाई कर दी |
शध्स घबराये। वाद वे लड़ाईमें देवताओंकी मारते तो ममिके
शापत स्थय॑ मर जाते है और यदि नहीं मारते तो पराजित
दावर सूर्खा मर जात॑ है । उस अवस्वार्म राक्षती दारुकाने
दवा कि समयवानीके बरदानसे में इस सारे बनको जहाँ चाह;
ना सयत्ी हूँ ।? यो कदकर बह समस्त बनक ज्यो-कातत्या
'छ जकिर समुद्रम जा बसी । राक्षसत्येग पृप्यीपर ने रहकर जलमें
निर्भव रदने लगे और बाँ ध्राणियोंक्री पीड़ा देने लगे |
एक बार बहुत सी नार्वे उधर आ निकलीं, जो मनुप्यतति
परी भी । राक्षसनि उसमें बड़े हुए सब ढोगोंकों पकड़ टिया
ओर येडियेसि बधकर कागगारतें शल दिया | ने उन वारबार
पमनिर्या देंगे लगे | उनमें मुप्रिय नामसे प्रसिद्ध एक बइ़य
व भी उस दलका सरदार था | यह बड़ा संदाचारी) भस्म-
द्वालपारी तथा मगवान् सियक्रा परम सक्त था। सप्रिय
जिवकी पुओ किये बिना भोजन नहीं फरता था । वह लग॑ तो
मकर की पूजन बरता ही था। बहतसे अपने साथियोंओं भी
गाने शिव पूजा सिल्य दी थी। फिर सब छोग लग: शिवाय?
का की जय ओर शकरजीडा ध्यान करने छगे | सुश्रिययो
| गान, शियक्ता दर्शन भी हैता था | दागक राश्षसरों जय
ते ऊतकों पता साफ़ तब उसने आर मसप्रियवी धम्गाया |
7 * भाती राक्षस सुप्रियकों मारने दोड़े । उनसे साउसेसी आया
॥ सपिय & मेत्र नकते ऋवचर दे गये, बंद धमत गियद्धा
४ >पेन और उनके सामीका जप परने ध्या ।
श5
४ 4ईपपलिमे फा--रेपेखर ३| /२ भरी रछ्ठा पोडिये |
"आयकर (५) ! इध्ट्ता मफकरसल हित एन
१० 5 “(८५ | जई। 3३ उयर (| 5 र सप 4 रे ) व रा !
जन कै
शम्मुने प्रमन्न दो खर्य पागपतान्व लेकर प्रधान-प्रघान रास:
उनके सारे उपकरणों तथा सेवकीशों भी तत्काल ही नए झकर
दिया ओर उन नष्टइन्ता दांकरने अपने भक्त सुप्रियक्ती रक्षा
की | तलआआत अद्भुत छठी करमेगले ओर लील्ससे ही शरीर
धारण करनेवाले झम्मुने उस वनकी यह वर दिया कि आजसखे
इस बनर्म सदा ब्राद्मण) क्षत्रिय। वेब्य और थूद्र--इनन चार्से
वर्णकि धर्मोका पान द्वो । यदाँ श्रेठ्ठ मुनि निवास करें ओर
तमेगुगी राक्षस इसमें कभी न रहें । शिवधर्मके उपदेशक/
प्रचारक और प्रवतेक होग इसमें निवास करें ।
खूनजी कदते हँ--इसी समय राक्षसी दाककाने दीन-
चित्तसे देवी पावेतीकी स्तुति की । देवी पार्चती प्रसन्न दो गयी
और वोलीं--घताओं) तेंग क्या कार्य करूँ !? उसने कंदा---
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३ # नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5 वललनलल्लणन&णञनतन नम >> "माल #__.[संकरिएष : संक्षिप्तशिगुणश
2७७ भार ७ काम ३००२ ण कप इनपकण्ए
7४5७४-४४--४-६०४ ८७०७८७०३०४५.#५ कब # >> 2 # ६.० “० /325६६-२६७७७० ७७ ०७०००नाने +#० +० ३ पत-५_ अरऔिआा5+ 5 ०» +
पुत्नोंको पैदा करेंगी) वे सब्र मिलकर इस बनमें निमास करें,
ऐसी मेरी इच्छा है |?
शिव बाले--प्रिये | यदि तुम ऐसी बात कहती हो तो
मेरा यह वचन सुनो । हैं भक्तोका पालन फेरनक लिये प्रसन्नता-
पूवेक इस वनमें रहूँगा। जो पुरुष यहाँ वर्णपके य नम
तत्पर हो प्रेमपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह समनर्ती राजा शेगा ।
कलियुगके अन्त और सत्ययुगके आरम्भ गहासेनका पुत्र
धीरसेन राजाओंका भी राजा होगा। वह भेरा भक्त ओर असन्त
पराक्रमी होगा और यहाँ आकर मेरा दर्शन करेगा | दर्शन
करते ही वह चक्रवर्ती सम्राट हो जायगा ।
शा के.
कफ बी के ० अभय
सूतजी कहते हँ--श्राक्मणो | इस प्रतम कल
लीटाएं: करनेवाले वे दम्पति परस्पर हासथयुक्त वर्तावा फे
लग वहाँ छित हो गये | ज्योतिर्लिशललल्प महतेरओं
गागशर कइलाये और शिवा देवी नागेशरीके नामे रिए।
हुईं । से दोनों ही सल्युरुषोंको प्रिय है |
इस अकार ज्योतियोंक स्वामी नागेथर नामक झत्ेर
ज्योतिलिशक्ि छपमें प्रकट हुए | वे तीनों लेके का
कामनाओको सदा पूर्ण करनेवाले है| जो प्रतिल्षि अशफ़
नागेडरफेप्रादुभविका यह प्रसड़ सुनता कै वह बुद्धिव
गदापतकका नाश करनेब्राछे समूर्ण मनोसयोंत्री पर
छ्ता)। ( अथाव पे!
>>» ५०--- ४) (२०००-०७
ज्योतिलिडे ५ हि त्म्य गन है
रामेश्वर नामक ज्योतिलिड्के आविर्भाव तथा माहात्म्यक्रा वे
खुतजी कहते है--ऋषियो | अब मैं यह बता रा
कि रामेश्वर नामक ज्योतिलिड्र पहले किस प्रकार प्रकट हुआ |
इस प्रसज्जको तुम आदरपूर्वक सुनो | भगवान् विष्णुके रामा-
वतारमें जब रावण सीताजीको हरकर लझ्ढामें ले गया, तब
सुमीवके साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतटपर
आये । वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्रको पार
करेंगे ओर किस प्रकार रावणको जीतेंगे | इतनेमें ही श्रीरामको
'यास छगी । उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले
आये । भीरामने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तबतक
उन्हें स्मरण हो आया कि थैंने अपने स्वामी भगवान् शंकरका
दर्शन तो किया ही नहीं | फिर यह जल केसे ग्रहण कर सकता
हूं: ? ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको नहीं पीया | जल रख
'देनेके पश्चात् रघुनन्दनने पाथिव-पूजन किया | आवाहन आदि
सोलह उपच्ारोंको प्रस्तुत करके ,विधिपूर्वक बड़े प्रेमसे शंकर-
चीकी अचेना की । प्रणाम तथा दिव्य स्तोत्रोंद्ारा यत्नपूरवक
अंकरजीको संतुष्ट करके औरामने भक्तिभावसे उनसे प्रार्थना की ।
अलीराम बोले--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मेरे
स्वामी देव महेश्वर | आपको मेरी सहायता करनी चाहिये |
. - आपके सहयोगके बिना मेरे कायकी सिद्धि अत्यन्त कठिन है।
रावण भी आपका ही भक्त है | वह सबके लिये स्वथा दुर्जय
है। परंतु आपके दिये हुए वरदानसे वह सदा दर्पमें भरा
रहता है | वह त्रिभुवनविजयी महावीर है । इधर मैं भी
आपका दास हूं, सवंधा आपके अधीन रहनेवाला हूँ |
नर
सदाशित ! यह विचारकर आपको मेरे प्रति पत्षात #
चादिये |
खूतजी कहते हें---इस प्रकार ग्रार्या ओर बा
नमस्कार करके उन्होंने उच्चखर्से जब गए की है
इत्यादिका उदघोष करते हुए शिवका खबन हि
उनके मन्त्रके जप और ध्यानमें तलर हो गोे। 6
पुनः पूजन करके वे स्वामीके आगे नाचने लगे हर
उनका हृदय प्रेमसे द्ववित हो रहा या। फिए उ हे
संतोषके लिये गाल बजाकर अव्यक्त शरद हि
समय भगवान् शंकर उनपर बहुत अमन नं
ज्योतिमय महेश्वर वामाज्जञभूता पाव॑ती तया हा
साथ शास्रोक्त निर्मल रूप धारण करके वर रे
हो गये । श्रीरामकी भक्तिसे संवुर्शचेत के का
उनसे कहा--«ओ्रीराम ! तुम्हारा कल्याण हे कक है है
उस समय उनका रूप देखकर वहाँ उपखित हा
पवित्र हो गये । शिवघमंपरायण हक ग ।॒
पूजन किया | फिर भौति-माँतिकी स्व॒ति- एत 4
उन्होंने भगवान् शिवसे लड्ढामें रावणक सर्थ हे ओ
अपने लिये विजयकी प्रार्थना की |” बा
प्रसन्न हुए सहेश्वरने कहा--“महाराज ! हिल
भगवान् शिवके . दिये हुए विजयसूचः बा हे
आजाको पाकर भ्रीरामने नतमस्तक ही का
पुनः प्राथेना की ।
| उप ॥(]
क्रटिस्द्रसंदिता ] # घुझ्माकी शिवभक्तिसे उसके मरें हुए पुजका ज्ीचित होना *
िमिलिलिनिनिमिकििनकिविवििलिमिनियिक जज अत 3 सलानशइजदलॉ को मम मराकातभभभका७ ताक भा + ०७४०७] ३००४०७०००० मई सााा्र्रएणणा॥०७७७ऋ ०० ०७७७७७/८/८#"शभ्शशश/श/शश/रशणशणणाशाशआआ्न्
जे |. की. तलाक पॉहनरीय्याओ- प्नाक
अआकी ९७० 0 अमनपरीडिजन. थे... डी जननी -पधितो जदनन-+-ऑावा सके सती. अत "तमाम
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4 सरीकम-१गभयशाममकर मनपाग 2 +
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हे बा हज का भर ऐ+
यदि आप संतप्र
धाराम बयाल--मर स्वामी धंदार
हराम हरपॉडज उन कला#सरकाए।
जय. चयन ३०२भीअआया*फयाक नमक
दूसरोकी म
दी जगवक ट्ोगकि परविच्र करने तया मलाई करने है
लिये सदा वर्धा निवास करें ।
सूतजी कद्दत हं--आीयमके ऐसा कदनेपर सगयान
शिव वहाँ ज्योतिटिज्फे रूप खित हो गये । तीनों होफोर्म
रामेश्रक नामसे उमड़ी प्रशिद्दि हुई | उनके प्रध्यदस हू
अपार समुद्रकों अगायात पार करके ओऔरामने रायय आई
यक्षमोंका शीम दी संदर किया और अपनी प्रिया
प्रात्तकर लिया | तदसे इस सूतरदूपर राम अदभुत
महिमाऊा प्रसार हुआ । भगवान् रामेर्रर सदा भंग ओर
मोक्ष देनेवाले तथा भक्तोकी इच्छा पूर्ण करनेवाले ६ई। जो
दिव्य गठ्गाजलसे रामेश्वर शियकती भक्तिपृ्वक स्नान कराता
है, वद जीबन्मुछ ही है। इच संसारमे देवदुलेभ समस्त
भोगाका उपभोग दरके अन्तर्म उत्तम शान पाकर यद निश्चय ही
फेंवल्य मोउको प्राप्त कर लेता ई। इस प्रफार मने तुमस्यांति
भगवान् शिवके रामेथ्वर नामक दिव्य ज्योतिदित्रका वर्थन
फिया। जो अपनी मंदिसा सुननवात्यक समस्त पाप दा उप्रदरण
नसनेयात्य दे | ( अध्याय ३१ )
खंताफो
पुदमाफी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित हाना, घृश्मेथर शिवका
प्रादभाव तथा उनकी महिमाका वणन
घूतती कऋदते ई--भब भे पुश्मेश नाम स्योतिर्किक्के
रुका आर उसके माहात्मका वर्गन ऊरसेंगा | सुमियरों |
पान इवर सुनो । दक्षत दियागे एक प्रेष्ठ दर्वत है।
अ5 थे नाम रेयगेरि द । बंद देसमेंगें अज्भरत तथा नित्य
शर्म भागते रम्पन ४। उसीद नियद कद भरद्रायपुलमें
सन पुपमा सामक अद्ाउचा धाहण रहते थे | उनदी प्रिय
हा मुदत पे बह स्रदा शिव परास्यगे
वर २७ मपी। परदे पाम-जजर्म उ:घ्र भ्गे हर नदी
3 कह
ँ 7. ३ $४ ०० ् «.. 4 5 गे
| छ कते झती गाही थी | 4३५ मयमी थी दवाओं
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जे २ वर्य, पु। जरी 7 हर तू. # न 5५ ] कम १*
ब्राद्मगयं तो हुएत नहीं दाता थार परंतु उननने इनी बस
दुखी खाती भी। पढ्ीगं आर दूसरे छाग मगे उसे साना
मारा करते थे यई पतिये आरचार पृधरदे हिके पाता
| धार ञ्क
पति उसी शर्मीप्देस देहर स्मशझयी मे,
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परंतु इसभा सन नहा मारा था । अन्तताकदा ढआदागनव
री,
ह४छ उपाय ब्य का परत छंद संग नहीं हडय | हब
न रे का +
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पस्माव प्रति इसस पिशद कय दिया । दिगदगे रह
4: %+* पिच ई- 43७४ ५६ ॉव ॥$3 $+ $8 ३६25 १५ ४५
0.4 पके स्का हा श्र जी
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ओर स्ट्वणसम्पन्न पुत्र हुआ। सुस्माका कुछ मान बढ़ी |. ओः अब भर सिन्ता करनेते क्या दूँगा |! इस तल कि।..
इससे सदेदाके मनमें डाह गैदा दी गयी। समयपर डस. करके उसने शिवके भरोसे पय॑ धारण किया औऋखखा |
भुन्नका विवाद हुआ | पुत्रवधू घरमें आ गयी । अब तो बद. तुअका अनुभव नहीं किया । वह पूर्ववत् पायित खिंत..'
और भी जलने लगी--उसवी बुद्धि भ्रष्ट मी गयी ओर एक... लेकर खलनित्तत शिवके नामोंका उद्चाण ऋती हू
दिन उसमे रातमें सोते हुए पुत्रको छुरेसे उसके शरीफ. उस तालाब किनारे गग्री | उन पार्थिव हिश्लेश्ने वो
टुकड़े-टकड़े करके मार डाला और कटे हुए. अ पवों उसी. डालकर जय बंद टीट्मे लगी तो उसे आना पुत्र रे
तालाबमें ले जाकर डाल दिया) जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्यिय. तालाब किनारे सड़ा। दिखायी दिया |
लिझ्ोका विसर्जन करती थी । पुत्रके अध्वीकों उस ताल्मबं
कुँककर बह लोट आयी ओर पघरमें मुल्लपूक सो गयी |
झुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिनका पूजनादि कर्म करने लगी ।
ओेछ ब्राह्मण सुधर्मा खये भी नित्यकर्मगें छग गये ।
हसी समय उनकी ज्येष्ठ पक्नी सुदेहा भी उठी ओर बड़े
आनन्दसे घरके काम-काज करने लगी; क्योंकि उसके छूुदयओों शव योछि---दुमुलि ! मैं दर पर ।
सार कह पक 0 टी कक 2 के जेट माँगो । बरी हुष्टा सौतने इस बच्चेकी मार डाल थी। |
आतःश्काल जब बहुने उठकर पतिबी शब्बाकों देखा तो गे पलक अलग ः
वह खुनसे भीगी दिखायी दी और उसपर दारीसके कुछ मे उप विशलत् माल्या ।
६६ ५
सूतजी कद्दते दँ--आक्षणो | उत त्मप आ आ
पुत्रको जीवित देंसकर उसदी माता घुश्माकी न तेल
और ने विंधाद । व पूर्वनत् लख बनी झही। इक
उसपर संनुष्ट हुए. ज्वोतिःत्लल्प महेंद्र बिव ग्रह
सामने प्रकठ दो गये |
: कहते हैँ--तब शिवकी प्रणा॥ 5
टुकड़े दृश्गोचर हुए इससे उसको बड़ा दुश्भ हुआ। सूतजी 2 छ् घुश्माने बर नर वही
उसने सास ( घुद्मा ) के पास जाकर निवेदन क्रिया--- हे समय यहू' वर मंगा-- हे 3 हे
<उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली आयें ! आपके युन्र कहाँ. क अतः आपको इसकी सका क चाहिये कि
जये १ उनकी शस्या रक्तले मीगी हुईं हे ओर उसपर शरीरके शिव वोछे--उसने तो बड़ा भागी आर
कुछ छुकड़े दिखायी देते हैं | हाय ! मैं मारी गयी | तुम उसपर उपकार क्यों करती हे! हुए का कर
'किसने यद दु कर्म किया है १? ऐसा कहकर वह चेंटेडी छुद्ेद्वा तो मार डालने ही योग्य है ।
प्रिय पत्ती माँति-भाँतिस करण विढाप करती हुई रोने लगी ।
सुंध्मीकी बढ़ी पत्नी सुदेहा भी उस समय हाय !
मी सारी गयी ।? ऐसा कहकर दुःख डूब गयी ।
उसने ऊपरतसे तो दुःख किया; किंतु मन-ही-मन वह
इसे भरी हुई थी। घुस्मा भी उस समय उस वधूके
दुःखको सुनकर अपने नित्य पाथिव-पूजनके त्रतसे विचलित
नहीं हुईं | उसका मन बेटेको देखनेके लिये तनिक भी
उत्सुक नहीं हुआ | उसके पतिकी भी ऐसी ही अवस्था थी ।
जबतक नित्य-नियम- पूरा नहीं हुआ; तबतक उन्हें दूसरी
किसी बातकी चिन्ता नहीं हुईं । दोपहरकी पूजन समाप्त
इनेपर घुश्माने अपने पुत्रकी भयंकर शय्यापर इश्पित किया:
तथापि उसने मनमे किंचिन्मात्र भी दुःख नहों माना।
वह सोचने लगी--“जिन्होंने यह बेणा दिया था, वे ही इसकी
रा करेंगे । वे भक्तप्रिय कहलाते हैं; कालके भी कार
हैं और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। एकमात्र वे प्रभु॒सर्वेश्वर
अम्मु ही हमारे रक्षक हैं | वे माछा इथनेवाले पुरुषकी
अति जिनको जोड़ते हैं, उनको अछग भी करते हैं ।
[]
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्औ ऑ्िलस|
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रॉटिय्ट्संदिता |] & दांकरजीकी आराधनालसे भगवान निष्णुको सुद्शन चक्की प्राप्ते # रेषप
के. का. रयीओं..टयाननो-.. "सना. “फीफा. का) पे पपइुकराक्ीढ. मनी... 5
घुद्मान कद्वा--देव | आउके दर्शनमाचने पातक नहीं
दूरता | इस समय आयका दर्शन ऋरके उसका पात्र भस्म
हे आय । 5) आकार वरमेवॉलॉपर भी उपकार करतों हैं
$ दर्यनमाजसे पाप बहुत दूर भाग जाता दे ।# प्रभो |
रद अठ्भुत समपदवाइय मैंने सुत्र रक््या है । इसलिये सद्या-
नव | जिसने ऐस्स कुकर्म किया के बदी करें। में ऐसा
गकते ( मुते तो बुत करमेयालेम्न भी भव्य दी
स्स्मा दे ) |
ऐएनज्नी काुत ई--पुध्माझ ऐसा कहनेपर दबासिर
मकवत्सल मदथर ओर भी प्रसन्न हुए तथा इस प्रकार बोले-
'पुछी | हु बाई 3थैर भी यर गर्धंगा । में तुम्हारे लिये दितऋर
2ग7; कक तुम्दारी इस भक्तिति ओर विक्ार-
(इस्व स्वन्वयत मन॑ बुत पधसच्त ष्ठ्। !
भगपान शिवकी बात सुनकर पुश्मा बोली--प्रभो |
पद आग वर देगा सादी ई तो लछागोंही रक्ताफे लिये सदा
फक वियास उजिये ओर मेरे सामसे ही आयी ख्याति हो।!
व मार विन अ्र्पगत प्रसन्न होग़र कहा--र्धी तुम्दारे
हे सानस पु्तदर कदायता हुआ सदा थ्डों निधास कर्ंगा
स्वर पे हस्त सूवरायक होऊंती । मेय दाम ज्योतिर्लिद
०7 आन मं]
च्क
का
+९ >+ 5
)| यंद साग्यर थ्वीयलठिदस्]झ अआलय
> ३ "आर इस ही दोगा औग्रर्म दिग्य खआमते
हर ६ (८ जज | कई छड है ८
आज $ 4 वा संगरर सदा द्शनभायत ज्प्लं १९४६४/ 8
का देनेबात्म दो | सुनते ! तुम्दारे उंचने दोतेवाली एक सौ एफ
पीडियंतिक एसे ही अड् पुत्र उसन्न होंगे, इसमें संशय नर्दों
है। ये सब-के-सब मुन्दरी मरी, उत्तम घन और पूर्ण अगयुत्ते
सम्पन्न दंगे, चनुर ओर विद्वान होंगे, उदार तया भोग
ओर मोश्वल्पी फ्द पानेके अधिझारी होंगे। एक सी एड
पीदियोतक सभी पुत्र गुर्णाम वद़े-लदे दोगे | तुम्दारे वंश
एसा विस्ता7 बड़ा दाभादायक दोगा ।?
ऐसा कहकर भगवाग् शिव न्दों ज्योतिर्टिप्रक रूपमें स्विद
हे गये । उनकी घुदमेश सामसे प्रसिदि दुई और उस सरोधरतड़
नाम थिवाल्य ही गया । सृधना प्ृद्मा »गैर मुरेदा-- गा
आफर तत्पघल ही उस शिवलिफ्ररी पक थी एके द्धियायई॑
परिक्रम की | पूजा करके परस्थर मिलकर मनका मील दर
करके ये सब ब्वों बड़े सुसझा अनुभव करने बल्गे | पृ
जीवित देख मुदेदा बदुत लज्त दुई और पत्ति ढथा पुश्माछ्े
छम्राप्राथना वरझे उसने आने णायझ्े नियारणके छिग्रे प्रा+
ख्िपे किया । मुतीयरों | इस प्रद्रर बद पुद्मबरणि: प्राग्ट
हुआ । उसका दर्गन ओर पूजन करनेसे सदा झुखओं परद्ध
दोती दे | मद्ययों | इस तरह मैंने तुमसे गरद ज्याति्ित्रों ऐ.
मदिंसा बतादी | ये सम लिए सम्पूर्ग धम्माओंफ प्र दवा
भाग आर मोत देवयाछे ई | थो इसे इातिलिद्रयें ढमादे
देता अर मुनता के चंद स्व पराउस मुच्च हों धाम का
भ्यग अयर मात पाता | । ( अच्यय $२-३३ 3
दारदा ज्यानिर्छितो$ मादिसरस् ही समाति न
ऑन आ "लक करन अन्हीं+-ममाग गान +०९-१घक००ा०»करगा
गंझग्ज! भराधनासे भगवान म्य्षि मा उपटना ३ किक ध्
। पकरजीकी भराधनासे भगवान् जिष्णुले सुदशन चक्रफी प्रातति सेव
! च त्णौत # की
) उसके द्वारा दत्वीका संदार
३६६
उन महाबल्ी ओर पफ्क्रती दतल्येसि पीड़ित ही देवताओंने
देवरक्षक भगवान् विष्णुसे अपना साय दुःख कहा | तब श्रीदरि
केलासपर जाकर भगवान् शिवकी विभिपूर्वक्त आशघना करने
लगे ) वे हजार नामसि थिवकी सखुति करते तथा प्रत्येक
नामपर एक कमल चदाते थे। तब भगवान् शंकरने सिण्णुकरे
भक्तिभावकी परीक्षा करनेके लिये उनके लाये हुए. एक इजार
कमलछोंमसे एकको छिपा दिया | शिव्रकी गायाके कारण संटित
हुईं इस अद्भुत घटनाका भगवान् विष्णुको पता नहीं लगा |
उन्होंने एक फूछ कम्र जानऋर उसकी खोज आरम्भ नी ।
दद्ताएूबक उत्तम अतका पालन करनेवाले श्रीदरिने भगवान
जे ८7
उः प्र क्यत॑
शिवकी प्रसन्नताके लिये उस एक फूलवी प्राप्तिफे
सारी इथ्वीपर भ्रमण किया । परंतु कहीं भी उन्हें वह फूल
नहीं मिला | तब्र विश्वुद्चेता बिप्णुने एक फूलकी पर्तिके
लिये अपने कमलसहृश एक नेत्रकों ही निकालकर चदा
दिया | यह देख सबका दुःख दूर करनेवाले भगवान् शंकर
बड़े प्रसन्न हुए और वहीं उनके सामने प्रकट दो गये | प्रकट
होकर वे श्रीहरिसे वोडे--<हरे ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हैँ ।
तुम इच्छानुसार वर माँगो । मैं तुम्हें मनोबाज्छित वस्तु दूँगा |
तुम्दारे लिये मुझे कुछ भी आदेय नहीं है ?
विष्णु बोले--नाथ ! आपके सामने मुझे क्या
कहना
है । आप अन्तयाँमी हैं, अतः सब कुछ जानते हैं, तथापि
आपके आदेशका गौरव रखनेके लिये कहता हूँ | दैत्योंने सारे
जगत्को पीड़ित कर रखा दे । सदाशिव ! हमलोगोंको सुख
नहीं मिलता | खामिन् ! मेरा अपना अज्न-शस््र देत्योंके
क्घर्में काम नहीं देता । परमेश्वर ) इसीलिये मैं आपकी
शरणमें आया हूँ |
रतजी कहते हँ---श्रीविष्णुका
देवाधिदेव महेश्वस््ले तेजोसशिमय अपना
दे दिया | उसको पाकर भगवान विष्णने
यह वचन सुनकर
सुदर्शन चक्र उन्हें
उन समस्त प्रबल
% नमो रुद्राय शान्ताय ब्रकझ्षण परमात्मने ४
[ संक्षिप्त-मशिवपत्र
४७ ं आख द ख खखधखव छखइख ध खधख छू चणिभच्च्च्ड्ड्डज2सटस
टैल्पोंका उस चक्रके द्वारा बिना परिश्रमके ही एंद्वर करत
इससे सारा जगत् स्वस्थ हो गया । देवताओंकी मी कह में.
और अपने लिये उस आयुधको पाकर भगवा वि
अत्यन्त प्रसन्न एवं परम सुखी हो गये ।
फ्ाषियोंने पूछा--शिवके वे सह न
हैं, बताइये, जिनसे संतुष्ट होकर महेंश्वरने मी हे
प्रदान किया था ? उन नामोंके महात्यका #
श्रीविष्णुके ऊपर दंकरजीकी जेसी $पा हुई
यथायथेरूपसे प्रतिपादन कीजिये । का
झुद्ध अन्तःकरणवाले उन हक हि
सुनकर सूतने शिवके चरणारविन्दोंका
इस प्रकार कहना आरम्भ किया |
!/
7१5७ ०४७ 2.+.....हतह
भगवान् विष्णुद्यरा पटित शिवसहसनाम-सोत्र
सूत उवाच
श्रूय्त भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुशो महेश्वरः ।
तद॒दू कृथयाम्यय झैौद॑ नामसहस्कम् ॥ १ ॥ -
खतजी बोले--मुनिवणे ! सुनो, जिससे महदेश्वर संतुष्ट
ते हैं; वह शिवसदखनाम-स्तोच्र आज तुम सबको सुना
राह ।|१॥
विष्णुरुवाच
शिवों हरो ख्डो रुद्रः आर शर्भुमदिक
अर्धिगम्य: सदाचारः हार्वः शी
भगवान विष्णुने कह ३ मई है ।
२ हरः-भक्तोंके पाप-ताप हर ठेनेवालें) * |
४ रुख्:-डुःख दूर करनेवाले) ५ इक
काटियद्संदिता |
। पृप्पचनाः-पुपक्र समान खिछे हुए नेतरवाड़े, ७ अर्थि-
गस्ब:-प्राथिदय प्राप्त दनिवाटे, < सदाचार:-शेठ आचरण-
य25) ५ गा्ब;-संद्वारकारी, 3०. शम्भुः-कल्याण-नि्ेतन,
/$ मदेखा:-मद्ान इइबर ॥ २॥
सन्ज्ापीदशन्तमालिपिंश्य
पेदान्सस्परसंदोद:
विधग्मरेश्वरः ।
पाली नीलछोंदितः ॥ ३ ॥
४६ चब्द्रापीदः-बद्धमाकी शिरोभूषणके रुपमें धारण
६रतवा७ १३ अब्दमीलिए-सिरपर चन्द्रमाका मुकुट धारण
परनेयाड १४ विश्वम-स्ेत्वरूप) १७ विश्वम्भरेखरः-पविश्व-
के मेरणसोपण करनेवाले आविप्णुके भी दखर; १६ चेदान्त-
कारवंदाद:-वंदान्तक सासत्य संबिदानन्दमय ब्रद्मकी साकार
४ १० कपाली-हाथर्म.ं कपोल पारण करनेवाझ १८
नीडछोद्वितः> ( यलम॑ ) तनीझू और ( दोष अडभर्मि ) लादित
; पर्ययाः।॥ ३ ॥
ब्रज छः
१
| न
/ भयानाथारो 5, प्र स्ठ्यो
|
गारीनतां
सेएमूर्तिथिश्रयूर्तिखिवर्ग स्वर्ग साथनः
रागेउर: |
॥४॥
9५ ध्यानाधार:-घ्यान# आधार) २० क्परिचंद्रयय:-पश)
० आर पलतुओीं सीमासे आविभाग्य+ २९१ गोौरीनर्ता-सौरी
प्रात पायतीडीके पर्चि, ३२२ गणेबरः-प्रमथगर्णोक स्वामी)
२३ अएमूवि।>जज, भतित यायुक आदर) सूर्य) नन््द्रसा। पप्यो
जी 400 3. 502
4,[(5 ६ .$+ ४१ हूं ४;
४१ ३१4 | “*, $3 'जु 5
हिल ति प् क् का का
पट पुरुर। २५ विस्गस्यगंसाधनाः-र आभ:
५५ + क्र हि ० ्जँ (रा लि] 320 अमन ड
हे व खकी पास करानयाड ॥ ४ ॥
-. जज
(५ भगवान विष्णुद्धारा पठित शिवसदस्थनाम-स्तोच् #
मिलियन शिशशिलिनिकि शशि नमक लक नी जला लुा॒कलयकारकरानरफरइइानकांगल पका कम कम ुआ 2 भकम कक का ककभ पका थाना कक भकभा कम करन ३क कक कक ककम कक भा कम बावाक कम का कम कककम इक भा कषकक कक ककऋक न कभ कक कम तन भभ कक भक्ाम
क्रभाम्कागामामा इनक का इन कमरा ॥७॥७७७४३४४७४७श॥शशरनार॥ा॥ल्000७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७#/७७७/#आाांगााााााााअक पक भा 5 रामपाल
रे६७-
श्टरवनयारमाकंतक करण करत फर्म एफ मर रस कर ४ मकर मरना २८ कमला २० अदरक पर: आना; पदक प+ पक माह कप नरप4*पघ 5; पलकर थक कर पिसमसक प+ बार पाक पर पका उपर पाए तप म नर पासुरफऋमाइर८म गुम उकी वर पकककयल्
४20७७७॥७७॥ ७७०७ ०७७७७ा७ ७ जा आता शाम पलक आम नम न लत बल
पविन्न पुरुषोर्म मी सबते श्रेष्ठ ३९ सर्वश्रमाणमंय्रादी-सम्पू्णे
प्रमाणर्म सामज़स स्थापित करनेदाछे, ४० बृपाउु;:-अपनी
घजाम वृपषमका चिट्ठ धारण करनेवाले, ७१ सृप्नाइनः-युपमभ
या धमकी बादन बनानेबाले ॥ ६ ॥
ईशः पिनाकी खदवाद्ी चित्रवेपशिरंतनः ।
तमोहरों महायोगी ग्ोंप्ता अद्या चर धूजदि ॥०७ 9
४२ इंशः-लामी या शासक) ४३ विनाद-पिनाक सॉसझ
धनुष धारण करनेवालि। ४७४ खटयाह्नी-साटक पायेकी आऊृति-
का एक आयुध धारण करनेवलि। 9५ थिन्रदेषप-विधिभ पैप-
चारी। ४६ विरंतनः-पुराण (अनादि) पुदयोक्ता। ४७ तमोदर:-
अज्ञानान्पकारदकों दूर करनेवाले, ४८ मदायोगी-मदान् सोगते
समन्न) ४५ गोपा-रक्षक) ५० मद्या-सुशिकर्ता, ५३घूर्सटि:-
जटाके भारस युक्त | ७ ॥
कालकाल:. ऊत्तियासा: सुमगः प्रमाप्मदः ।
उन्ृभ्रः पुएपों जुष्यो दुर्धासाः पुरशासनः ॥<८ प
3३ कालकाल:-कोलफे भी काछ। ७३ कृतियार्र-
गशसुरद चाही बख दे रूपमें धारण करनेवाले) ७४ सुनगः-
गे भग्यगाटं, ध४ प्रगरमस 5:-आ झा रस्वल्प जवया। प्रभाव 5
वाच्याथ, ७६ उश्चम्र--मम्पनरद्िति, ५७ पुदपर-म्रयोी
आत्मा; ७८ सुप्यः्नीयन करने सोस्प, ४९ दुबाखा:-ुर्पासा?
गामक सुविक सायर्म अग्तीे। 4० पुरशासनस-चीन माधामय
सुर पुराका दमन छरब शत ॥ ८ ॥|
दिम्वायुध: सबनागुटः परसेी प्रसार ।
भद्द
ओर किलो, कद व रत लटेसश्3५२५+अज+म जज चित्तवृत्तियोंफ़े . निरोधसे अनुभवर्म आनेगोग्य,
है है| कोदण्दी-धनुर्धर, ७४७ नीलूकणठ: >ऊण्ठ्म शिलाहूल
विषका नील चिए्व धारण करनेवाले, ७५ पर्थपी-
'परशुघारी ॥ १० ||
दिशालाक्षो मगय्याघ: सुरेशः सूर्यतापनः |
धम्घाम क्षमाक्षेत्र भगवान् भगनेश्रभित् ॥ ११ ॥
७६ विशद्याछाक्षः-यड़े बड़े नेन्रोवाले, ७७ शगमच्याधः--
दवमें व्याध या किरातके रूपमें प्रकट हे शूफरकफे ऊपर बाण
उल्नेवाले, ७८ सुरेश:ः-देवताओंके स्वामी, ७९ सूर्यतापन:--
सुग्रंको भी दण्ड देनेवाले, ८० धरंघाम-धर्मफ्े आश्रय,
४३ शक्षमाक्त्रम-क्षमाके उत्पत्ति-स्थान, ८२ भगवान्-सम्पूर्ण
ऐश्वयं, घर, यश, श्री, शान तथा वेराग्यके आश्रय,
< दे सगनेत्रभित्-भगदेवताक्े श्ेत्रका भेदन करनेवाले ॥|११॥|
उम्र: पशुपतिस्ताक्ष्य: प्रियभक्त: परंतपः ।
दाता दयाक्रों दक्ष: कपदी कामशासनः ॥॥ १२ ॥
<४ उञ्रः-संहारकालमें भयंक्र रूप धारण करनेवाले,
<५ पुपति:-मायासूपमें दैँधे हुए. पशबद्ध पशुओं ( जीबों ) को
पत्तज्ानके द्वारा मुक्त करके यथ थेरूपसे उनका पालन
'फरनेवाले, ८६ वाक्ष्य:-गरुड़ल्प, ८७ स्रियभक्तः-भक्तोंसे प्रेम
करनेवाले, ८८ पर तपः-शन्रुता रखनेवालोंको संताप देनेवाले,
“४ दाता-दानी, ९० दयाकरः-- दयानि धान अथवा छृपा
रमशानभूमिमें
करनेवाले, ९७ महेश्वरः-महान् इेदवर या परमेश्वर, ९८
# नमो रुढाय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने 5
बच्ग्म्च्य्च्खच्च््क्क्पक्िलििजक->>-
ँायया..यक->रबीओ+ आन. 3 ञमीनशपाकक या नाक 3. कक ना मम. > वक. आन न
शनत्यस्पतत ही जानने योग्य, १० 4 पुगतन:-सक्े गा
१०७ नीतिः-न्याय-स्तल््प, १०८ सुनीति:-उत्तम ज्लिडे
॥०+ थधुद्यास््मा-विश्ुद्ध अत्मत्वरुप, १० सोम--उरत
333 सोगरता-सद्धगापर प्रेम रसनेवाले।॥२ पुह्क-
आत्मानन्द्स परियूर्ण || १४ ||
घोमपोध्मतपः सौम्यो महातेजा महायुतिः
पेजोमग्रो5मतमयो 5 उम्रयत्र सुधापतिः ॥ ॥५॥
3१३ सोमपः-सोमपान करनेवाले अथवा सोफ़ाफ
घन्दमाके पोलक, ११४ अम्ृतप:ः-समाविक्रे दवा घ्ष
अम्रतका आखादन करनेवाले, ११५ सौम्य--भरडे
सीम्यरूपधारी, 44६ मद्दातेजाए-मद्गात्तेज्से हर
११३०मद्वायुति:-परमकान्तिमान्, १ १८तैजेमयः-पकागक्का
343 अम्तमयः:-अम्ृतरूप, २० अव्रमयः-अनब्ल्। १
सुपापति:-अमृतके पाठक ॥ २५॥ ;
भजातशत्रुरालोक:. सम्भाव्यों हव्यवाहक।
छोककरों चेदकरः सूत्रकाःः सगाततः ॥।
१३२२ जअजातशय्रुः-जिनके मनमें कभी कि #
राभुभाव नहीं पैदा हुआ, ऐसे समदर्शी, १२३ बह
अकाशत्वरूप, १२४ सम्भाव्य:-सम्माननीय) २५ हयण्हव
भम्निस्वल्ू्प, १२६ लोककरः:-जगतके लष्टा, १२० केन्र-
वेदकों प्रकट करनेवाले, १२८ असल
चतुदंश माहेश्चर सूत्रक्रि प्रणेता, १२९ सनातन:
सल्प ॥ १६ ॥
महपिकपिछाचार्यों विश्वदीप्िद्विलोचतः । हे
पिनाकपाणिम्ृदेवः खल्लिदः खिल ॥ !
१३० मदपिंकपिलाचार्य:-सांख्यशात्रके प्रणेत भरे
कपिलाचार्य, १३१ विश्वंदीप्तिः-अपनी प्रमाते सकी है
करनेवाले, १ ३२ ब्रिलोचनः-तीनों छोककि दर!
पिनाकपाणि;-हाथमें पिनाक नामक धनुष हि हक
१३४ भूदेव:---( थ्वीके देवता--ब्राक्षण अथवा प हर
३१३५ स्वस्तिद:---कल्याणदाता, ३३६ स्वखिहदट
कारी, १३७ खुधीः:--विदुद्ध बुद्धिवाले ॥ १० ॥
पा: सर्वगोचरः |
पघातृधामा घासमकरः सर्वेंगः मिल
घद्यसग्विस्वसक्सर्य; कर्णिकारप्रियः केंकि।
करेगे #
१३८ धातृधामा-विश्वका हरे हि
तेजवाले, १ ३९ घामकरः-तेजकी
॥
कटिस्ट्रसंदिता )
४8० संवगः-संवब्यापीी 4४4. सर्वगोचर:-सबर्मं व्याप्त)
)४ से वरक्षयूक-चबद्मा जीक उसादक) १४३ विस्नयऋ-लजगतके
धष्ठ) 7४४ संगा-चशित्यरूप) ३४७५ काणिक्रारप्रिय:-कनेरफ
शी प्रसंद करनेबालि, १४६. कविस-परिकाल-
4र्टा ॥ ४८ || ह
मासते विसासों गोशाखः शिवों भिप्रगनुत्तसः
ग्राज्योदकों मब्यः पुष्काठ: स्थरतिः स्थिर: ॥१९ ॥
त्-
४४७ घाख-आतिकेवके छोटे माई शासस्यरूप,
बट विश्ञारः-स््द्रलं छोटे भाद विशज्ञावस्यरुप
ब्यया विशाल सामक क्रषि। ६४९ गोशझ्ाखः-बेदबाणीगी
गाजिलोका बिलार करमेवार दिवः-म इलमय,
)७५॥ लिपगनुसमः-भवरोंगगा निवारण करनेयबाल्लि वेथों
/ शानियोँ ) में सर्वन्र ज२ गउाएन्रोदकर-गठ्रझे
प्रयारनप जलड़ों सिर्पर धारण करनेबाे, $७३ भम्प+-
६:॥णल्यूप: पुप्कछा-पर्णतम अथवा व्वापव३
4७५७५ स्थपति:>न्नद्ञाण्डस्थी भवनके निर्माता ( धर्
)55 स्थिर:-असखड़ अथया स्थाणुरूप ॥ १९॥
44५०
१५
विदिगास्दा पिभेयास्मा
फयों. सनायथ
भुनवाइनसारधि: ।
सुकाधपिइिए छसंशयः ॥ २० ॥
गर्म सथनेयाओि। $ ७८ विधेयास्सा-
शी घने और इब्टियोम जगनी इस्छाऊ अनुसार काम छत
गए 3७३ सृधदाइमसारधि-ल्या:ीतिक रथ ( (गैर )
$) सच्राच्ध इस्नदाल पुद्धिरप सार
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मुजाथारी
फूृटिनाइसे अपने
३६९
७.७ आई न +-न्
परमावर्ता5निवृत्तात्मा धमपुन्नः सदाशिवः |
पकल्मपश्रनुर्बाहद सवासो दुरासइ: ॥ २२ ॥
१७२ समसादत+-तठसासरचकफाी भलामाप्त हुम्फाासा
आत्मा कईले भी दृदा नहीं दे। ऐसे, १3४ धमपुझः--पर्स
या पुम्पकी राशि। १७५ सदाश्चितः-निरन्तर कल्यगढाए
अफस्मपः-यापरदित; धुवाहः-चार
पुराकसानिन्स सोगीयन भी बड़ी
बसा पाल छकूं. एल
१७९ गुरासद:-यरस दुर्जय ॥ २२ ॥
दर्शनों इुर्गमों
अध्यात्मगोगनिरयः
म्जप 43993
१ >८
हुद्यमनिदिर्मे
वुग संपायुधनत्रिद्यारद:
शुतन्तुस्तन्तुपर्धना ॥ २२ |
६८० पुर्लभा-भक्तितदीन पुक्पोकी कठिनतान
ट्रीनियालि, $ ८१ दुगगः-जिनक निकट पहुंचना किसी रे लिये ये
काटने , हित) ग74द२ शराज-सातससतात रा करगेक
टिये दुर्गल््प अमया दुख) १4३ संर्यायुवश्िशारद:-सप्पूर्ण
पक प्रयोगको इेछाये कूल, १८४ अध्यास्मयोगतिल पा-
अध्यामयोगर्म खित, १८५ सुतस्तुः-मुस्दर विलततत पान
प्लुशठा ६८६ सन्तुबईबः-तंदनत्य सकातुकी
दानवाल ॥ २३ |
पधु्ानकां पियछ्आरएा नयदईाता।
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३७० % नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मगे परमात्मते 5*
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पुराणोंद्वारा प्रतिपादित), २०० रिपुजीबएरः -शन्नुओकि प्राण
दर लेनेवाले, २०१ बली-बअलशाली ॥ २५ ॥
महाहदी महागते:. सिद्धुवुन्दारव न्दितः ।
व्याध्रचमौम्बरो ब्याली मद्राभूतो मद्रानिधिः ॥ २६ ॥
२०२. महाददद+>भरमानन्दफे मद्दानू, सरोवर
२०वे महागरतः-मदान् आकाइारूप) २०४ सिर दवृन्दारवल्दित:-
सिद्धों और देवताओंद्वारा वन्दित, २०५ ज्याप्रचमाम्बरः-व्याप्-
चर्मको वस्रके समान धारण करनेवाले) २०६ ब्याली-सर्पोको
आभूषणकी मौति घारण करनेवाले, २०७ महाभुत्त “>भिकाल
में भी कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्थरूप, २०६ मद्दानिधिः-
सबके मदह्दन् निवासथान ॥ २६ ॥
अमृताशो5मतवपु: पाश्चजन्यः
पतञ्चविंशतितस्वस्थः.. पारिजात;
प्रभज्जनः |
परावर: ॥ २७ ॥
२०५ अम्ृताशः-जिनकी आशा कभी विफल नही ऐसे
अमोघसंकल्प, २१० अम्तवपु:-जिनका कलेबर कभी नष्ट
न दो ऐसे--नित्यविग्रह, २११ पाग्चजन्य:न्याश्नजन्य नामक
शहुस्वस्य, २१२ प्रनन््जनः-वायुस्वलूप अथवा संद्यरकारी
२१३ पतञ्चविंशतितस्वस्थः-प्रकृति, महत्तत््व (बुद्धि ) अहंकार;
चक्षु) श्ोत्र; श्राण, रसना, त््वकू) वाक्, पाणि) पायु) पाद)
उपस्थ मन शब्द, स्पर्श) रूप, रस) गन्ध; पृथ्वी, जल) तेज,
वायु और आकाश-इन चोबीस जड तत्त्वॉसहित पचीसरवे
चेतनतत्त्व पुरुषमें व्याप्त, २१४ पारिजातः-याचकोंकी इच्छा
पूर्ण करनेमें कल्पबृक्षरूप, २१७ परावर:-कारण-कार्यरूप ॥२७॥
सुरूभ: सुच्रतः झरो ब्रह्मवेदनिधिनिधिः ।
चर्णाश्रसगुरुवर्णी शब्रुजिच्छच्युतापनः ॥२८॥
. २१६ सुऊूभः-नित्य निरन्तर चिन्तन करनेवाले एक-
'निष्ठ श्रद्धालु भक्तको सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, २१७ सुच्रतः--
. उत्तम व्रतधारी; २१ ८ शरः-वयोयेसम्पन्न; २१५ ब्रह्मवेदनिधि:-
ब्रह्मा और बेदके प्रादुर्भावके स्थान) २२० निधिः-जगत्रूपी
रक्ञके उत्पत्तिस्यान) २२१ वर्णौश्नसगुरुः-वर्णों और आश्रर्मोंके
गुरु ( उपदेश » २२२ वर्णी-त्रह्मचारी, २२३ शात्रुजित्--
अन्धकासुर आदि शजन्नुओंकी जीतनेवाले, २२४७ शत्नतापनः-
आन्रुओंकी संताप देनेवाले | २८ ॥ हु
जआाश्वमः क्षपण; . क्षामी ज्ञानवानचलेश्वर: ।
धमाणभूतोी दुर्शेयः सुपर्णो वायुवाहनः ॥२९॥
२२७: आश्रमः-सबके . विश्रामस्थानं+ २२६ क्षपणई3--
जन्म-मरणके कंष्टका मूलोच्छेद करनेवाले) २२७ क्षाम-
प्रल्यकालओं प्रजाओ क्षीण करनेवाले, २२८ ज्ञववात्-हे
२२० अचछेदबरः-पर्यतीं अथवा खावर पदायंक्रि ला
२३०. प्रमाणभूतः-नित्यसिद्ध प्रमाणहुय) २३। हुनेए-
फठिनतासे. जाननेयोग्य,. २३२ सुपण/वैद्मय हु
पंसनाछे) गदइरूप। २३३ वायुवाहनः-आने मे वाह
प्रयाध्षित करनेयाले ॥ २९ ॥
धनुवंदो गुणराशिगुणाकः ।
सत्यपरोध्दीनो. धर्माड्ी पर्मप्रापह ॥०
२३४ धनुर्घरा-पिनाकधारी) २३५ पहुदेः-कति
आता, २३६ गुगराशिः-अनन्त कब्याणमय गुग्त्रे ४
२३७ गुणाकरः-सदगुणोंकी खानि। १३८ छत्पा-त
घरूप, २२% सत्यपर -सत्यपरायण) २४० मंदी
रदित--उदारः घर्माद्ः-धर्ममय किहिि
धनुधरो
सत्यः
ष्ट््धई
२४२ धर्मसाघनः-धर्मका अनुष्ठान करनेवाले ॥ २९ |
अनन्तदृष्रानन्दो द्ण्डो “सार मिल दमा ।
अभिवाद्यो... महामायो ह! ३
२४३ अनन्तदृष्टि-असीमित दृश्विछि। २४४ मरी
परमानन्दमय) २४५ दण्ड -दुर्शंकी दण्ड
दण्डखलूप, २४९ दमयिता-दुदान्त
करनेवाले, २४७ दम -दमनस्वरूप, १४८
करनेयोग्य+ २७९ महामाय _मायावियोंकी का दे
महामायावी) २७० विश्वकर्मकार: -संसाखी ९४
कुशल ॥ ३१ ॥
चीतरागो. विनीताव्मा तपसस््वी
उन््मत्तवेष:. प्रच्छन्नी जितकामी
२५१ चीतरागःन्यूणतः
मनसे विनयशील अथवा मनको
तपस्वी-तपस्यथापरायण);
सम्पूर्ण भूतोंके उलादक एवं से!
पागलोंके समान वेष परे ;
मायाके पर्देमँ छिपे हुएए १४४ २)
२७०८ अजितप्रियः-भगवान, विष्णुक प्रेमी ॥ *
धरलोक ;
कल्याणप्रकृतिः. कप: ;।
, प्रमुत्व।
तरस्वी तारकोी धीमान प्रधान:
दाता
कल्याणप्रकृतिः
दानवीकी
पा
२५४
जज
अटि दुदसंदिता |
अफीनना... डे
है +.०आ टशेकटर- असकती- मारने अनार सारी... वनालायोकली पिन ये न “की जन. "न डी गला की जज
२६० कल्ास्मर्थ। २६१. सव्शोक्यज़ापति:-सम्यूथ
प्रतदी प्रडोफके पॉाछक) २६२ तरस्वी-यगसार्ल)
२६३ छरद:-ठद्धारक। २६७ धीमान-विशुद्ध चुद्धिस युक्त)
२६५. प्रयानः-सबसे ओेए्क २६६ प्रदुः-सर्वसमर्थः
३२६७ प्रभ्ययः-अधिना थी ॥ ३३ ॥
कार नवदितास्मा कल्यादिं। कसेलेक्षणा: ।
पंदृशरडयंतपज्ञों: नियमों नियता श्रयः ॥3४॥
नं६८ छोकपाठ:-समस ठोककी रखा करनेवाले
२६४६ ध्न्तद्िवात्मा-सत्तयामी आत्मा अधबा अदृब्य
परप्ग्रऊ फस्पादिः-कल्यफेिे. आदिकारण:
३७१ कमएसण:-्ाठक समान नेबरवाडि, २०२ घेद-
प्रछर्धवरव:- पद अर शायद अर्थ एवं तलकों
अमन) २७३ अनियमः-नियन्तभरट्ति, २७४ नियता-
बय:-सापके सुनिश्चित आध्रयस्थान ॥ ३४ ॥
सूर्च: शनि: फ्रेंसुदरा
परभदा
२३०
ये विउुमाछलिः ।
हगगयागापणा 5 सपथ;
धक्टूः
आध्िय्य:ः ॥५'4॥
बकण परआ-यद्धभास्यसे आहादकारी, २७५६ सूर्चा-
उक्त उचित इतुनृत सूक २७७ दनिः-शनेश्रररूप:
5०८ ६:-वतुनासक प्रटृस्व्प॥ २७९ याक्ष:-सुन्दर श्र
विवुमन्धविः-चुगवी सी हाल काॉलिया
बष्छि बज हरी आडिओ महक जाए,
भें, २८३ मुसवायापणः-भुगर्पधारों
कायविराओे २८४ सनप्रः-गरराजत | २५ !॥
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दिन एवं संबत्तर आदि कालरूपने स्थित, अश्िक्राउलरूर)
२९९ च्याप्तिः-व्यापकतासरूप, ३०० प्रमाणम>प्रत्यज्षददि
प्रमागस्वरूप, ३०१ परम तपः-उत्कूष्ट तात्यास्वरूप ॥ २७ ॥
सवद्शनः ।
सर्वर: सिद्धों मद्दारेता मद्राबलः ॥ ३८ ॥
संचत्सरऋरों मन्त्रप्रत्ययः
खड़ा:
3०३ संयच्सरकर:-संवत्सर आदि काछझूविशागके उत्पादक
३ मन्त्रप्त्ययः-चद आदि मन्जोंसे प्रतीत ( प्रत्यक्ष ) देने-
योग्य, ३०४ सर्वदर्शन:-संब्फ स्वज्ी, ३०७ अलः-अर्न््मा।
३०६ सर्बधरः-सबके शासक) ३०७ सिद्रः-निदियोंक आभ्य
३०८ महारेता-शेए बीयबाले) ३०९ मदाइऊः-प्रगधगर्गों को
मदहती संगालस सम्मन्न ॥ ३८ ॥
योगी योग्यो मदहातेया: सिद्धि: सर्वारिस्प्रदः ।
पसुर्धसुमना: सत्य सर्वपापइरों... हरा ॥ ३९ ॥
हर ७
१० योगी सोस्यः-सुयाग्य सोगी, ३११ मंदातेज्ञा-
न त॑जय सम्यक्ष:। ३१२ छिप असमसल खपनाह ह0
३१३ सवादिः-सव बूताई आ देकारण। ३१४ अप्रदः-३ दि
की मदमशकिद अधिदय: ३१७ बसुस-न्व चूतोंदे वासस्पानर
३१६ परुमनाउ-उंटार मनदारि। ३१७ सापाननसयस्वकफ
३५८ खसपापदरो& दर;-ममस्ाे पापा
हाय एर सानस फरूद ॥ २५ ॥
सु ाधशाभन: प्रीफन
शासिप्णनॉ न थे
धराजिप्णुनों उन ब्येनय
पररइगग #ग्नप
पदावं प्रदुचिणुनि:
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अननन पनामा>>पणक->-पनत..
३५9०
पुराणोंद्वारा प्रतिपादित) २०० रिपुजीवहरः-शत्रुओंके प्राण
दर लेनेवाले, २०१ बली-बलशाली ॥ २५ ॥
महाहदी महागरत॑ः सिद्धवृन्दारवन्दितः ।
व्याप्नचमाम्बरों ब्याली महाभूतों महानिधिः ॥ २६ ॥
२०२ महाहृदः-परमानन्दके महान्ू सरोवर;
२०३ महागते:-महान् आकाशरूप, २०४ सिद्धुवृन्दारवन्द्तः-
सिद्धों और देवताओंद्वारा वन्दित) २०७ व्याप्रचमोस्वर:-व्याप्र-
चमको वस्चके समान धारण करनेवाले, २०६ व्याली-सर्पोंको
आमभूषणकी भाँति धारण करनेवाले, ३०७ महाभूतः-त्रिकाल-
में भी कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, २०८ महानिधिः-
सबके मदह्ान् निवासस्थान ॥| २६ ॥
अम्ृताशो5म्तवयुः पास्जन्यः प्रभन््जनः ।
पद्चतिशतितस्वस्थः.. पारिजातः परावरः ॥ २७ ॥
२०९ अम्ताश+-जिनकी आदा कभी विफल न हो ऐसे
अमोघसंकल्प, २१० अम्ुतवु:-नजिनका कलेवर कभी नष्ट
न दो ऐसे--नित्यविग्रह, २११ पाव्यजन्येः-पाग्चजन्य नामक
शहुस्वरूप, २१२ प्रभमन्जनः-वायुस्वरूप अथवा संहारकारी:
२१ ३ पद्मविशतितष््वस्थः-प्रकृति; महत्तत््व (बुद्धि ) अहंकार,
चक्ष) श्ोत्र, ध्राण: रसना, त्वकू? वाक) पाणि, पायु) पाद;
उपस्थ, मन) शब्द, स्पशे, रूफ, रस) गन्ध; प्रथ्वी, जल) तेज;
वायु ओर आकाश-इन चोबीस जड तत्त्वोंसहित पचीसर्वें
चेतनतत्व पुरुषमें व्याप्त, २१४ पारिजात:-याचकोंकी इच्छा
पूर्ण करनेमें कल्पबृक्षरूप, २१७ परावर:-कारण-कार्यरूप ॥२७॥
शूरो ब्रह्मवेदनिधिनिधिः ।
शतब्रुजिच्छन्रुतापनः ॥२८॥
२१६ सुलभः-नित्य निरन्तर चिन्तन करनेवाले एक-
निष्ठ श्रद्धालु भक्तको सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, २१७ सुच्चतः-
उत्तम ज्तधारी, २१८ श्रः-शोय॑सम्पन्न; २१९ ब्रह्मवेदनिधि:-
ब्रह्मा ओर वेदके प्रादुर्भावके स्थान, २२० निधिः-जगत्रूपी
रज्के उत्तत्तिस्यान, २२१ वर्णाश्रमगुरु:-वर्णों ओर आश्रर्मोंके
गुरु ( उपदेश )» २२२ वर्णी-अह्चारी, २२३ शज्ुजित्-
अन्धकासुर आदि शन्रुओंको जीतनेवाले, २२४ झत्नुतापनः-
दान्रुओंको संताप देनेवाले || २८ ॥
सुरूम: सुचतः
चर्णा श्रमगुरुवर्णी
जाश्षमः क्षपण: श्वासोी ज्ञानवानचलेश्वर: ।
प्रमाणभूतों दुर्शयः सुपर्णा वायुचाहनः ॥२९॥
२२० आश्रम:-सवर्के विश्रामस्थानं+ २२६ क्षपण:--
% नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्ममे #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
4....-२०३--..3-/००००५+-५०-५५७. ५०७०७» ५६५५५५५५५५५»- पापा +-+-»७+५»५..५...५++3-स ३» ॥»+५-०.५५५++«4+५« 4 भा 9७७७» »क॥ 3५५ »७.७७३७५ ३५६७४ ४3५#३8॥०॥७०५०३३३३७५४४॥३३३७३३ 2 गया) ०क+३४॥89१8»++हए+हह ३-४४ पा मम पाता पा 5 ७-७" पाक पाक मा पा ५६५ धपया१० ५ 9७५४७ पान म७५३५ मकान वाभा ५ ल्+ माइक पाक
अर राननी जुरना- कमा ये री सारी हा.
आकर.
जन्म-मरणके कष्टका मूलोच्छेद करनेवाले, २२७ क्षाक-
प्रलयकालमें प्रजाको क्षीण करनेवाले, २२८ ज्ञानवान्-शानी,
२२५ अचलेइवरः-पर्वतों अथवा स्थावर पदार्थोके खामी)
२३० प्रमाणमूत्तः-नित्यसिद्ध प्रमाणरप, २३१ दुर्ञेयः-
कठिनतासे जाननेयोग्य, २३२५ सुपर्ण:-वेदमय सुन्दर
पंखवाले) गरुड़रूप, २३३ वायुवाहनः-अपने भयसे वायुको
प्रवाहित करनेवाले ॥ २९ ॥
धनुधरों.. धनुवेदो गुणराशिगुणाकरः ।
सत्यः सत्यपरोध्दीनो धर्माज्ञे। धमंसाधनः ॥रेण
२३४ धनुधेरः-पिनाकघारी, २३५ धनुवेदः-घनुवेदके
ज्ञाता २३६ गुणराशि:-अंनन्त कल्याणमय गुणोंकी णशि,
२३७ गुणाकरः-सद्गुणोंकी खानि। २३५ सत्यः-न्सल-
खरूप, २३९ सत्यपरः-सत्यपरायण, २४० अदीनः-दीनताते
रहित---उदार, २०३ धर्मोड़ष-धमेमय विग्रहवाले)
२४२ धर्मसाधनः-घमंका अनुष्ठान करनेवाले ॥ ३० ॥
अनन्तदृष्टिरानन्दोी दण्डो दुमयिता दमा ।
अभिवाद्यो.. महामायो. विश्वकरमविशारदः ॥रे१४
२४३, अनन्तद॒ष्टि:-असीमित दृष्टिवाठे, २४४ आनलः-
परमानन्दमय, २४५ दण्डः-दुशेंको दण्ड देनेवाले अथवा
दण्ड्खरूप, २४६ दमयिता-दठु्दान््त दानवोंका दमन
करनेवाले, २४७७ दमः-दमनसखरूप, २४८ अभिवाद्य/न्तगाम
करनेयोग्य, २४७९५ महामायः-मायावियोंकी भी मोहनेवाले
महामायावी) २५० विश्वकर्मविशारदः-संसारकी वृष्टि करनेमे
कुशल ॥ ३१ ॥ द
चीतरागो विनीतात्मा तपसवी. भूतभावनः |
उन््मत्तवेष: अच्छन्नी.. जितकामी$ जितप्रियः ॥३२॥१
२५१ वीतरागः-यूणतः विरक्त+ २५२ विनीतात्मा-
मनसे विनयशील अथवा मनको वशमें रखनेवाले। ** रे
तपस्वी-तपस्यापरायण; भूतभावतः-
सम्पूर्ण भूर्तोकि उत्तादक एवं रक्षक/ रेण५ 3 स्मत्तवेषः-
पागलेंके समान वेष धारण करनेवाले) र८ई वा
मायाके पर्देमँ छिपे हुए, २५७ जितकामः-कीमेविओ!
२०८ अजितग्रियः-भगवान् विष्णुके प्रेमी ॥ ३२९ ||
२०७०४
वैलोकप्रजापति
कल्याणप्रकृरतिः कल्पः स्ंठ
; ॥३२॥
तरस्वी तारको धीमान् प्रधानः अमभुख्यक
- अपावार
२७९. कल्याणप्रकृतिः-कल्याणकारी
२६० कल्पः-उमथ्थ . २६१ सर्वेछ्ोंकप्रज़ापति :-सम्पूर्ण
ओकोंगी प्रजके पाठक) २६२ तरस्वी-वेगशाली,
२६३ करक:-उद्धारक/ २६४ धीमान-विशुद्ध बुद्धिसे युक्त/
२६५. प्रधानः-संबसे श्रेष्ठ, २६६ प्रभुः-स्वसमथ)
२६७ अब्ययः-अविना शी ॥ ३३ ॥
ख्रेकपालोउन्तहिंतात्मा कल्पादिं: कमलेक्षणः ।
वेदझास््राथतस्वज्ञो 5नियमो नियताश्रयः ॥३४॥
२६८ लोकपाछः-समस्त लोकोंकी रक्षा करनेवाले;
२६९ अन््तर्दितात्मा-अन्तयांमी आत्मा अथवा अदृश्य
खश्पकाले; कल्पादिः-कल्पफे. आदिकारण
२७१ कमलेक्षण:-कमलके समान नेच्रवाले, २७२ वेद-
शख्ययत्त्वज्:-वेदों ओर शाझसत्रोके अथ एवं तत्तको
जननेवाले, २७ ३ अनियमः-नियन्त्रणरहित, २७४ नियता-
अ्य:-सब्के सुनिश्चित आभ्रयस्थान ॥ ३४ ॥
फंड: सूर्य: शनिः केतुरवराह्ो विद्वुमच्छविः: ।
भक्तितयः परत्रह्म * मसगबाणाप॑णो5नघः ॥३७॥
२७५ चन्द्रः-चन्द्रमार्पसे आहादकारी, २७६ सूर्य:-
सकी उस्त्तिके हेतुभूत -सूस, २७७ शनिः-इनैश्वररूप,
२५८ छेतु:-केतुनामक ग्रहस्वरूप। २७९ वराष्र४-सुन्दर शरीर-
वाले, २८० विद्युमच्छविः-मूँगेकी-ली छाछ कान्तिवाले,
र्७०
२८३ भक्तिवश्यः-भक्तिके द्वारा भक्तके वदमें होनेवाले;
१२८२ परद्ा-यरमात्मा, २८३ मगबाणाप॑णः-मृगरूपधारी
परप बाण चलानेवाले, २८४ अनघः-पापरहित || ३५ ॥
अद्िद्रयालयः: कान्तः परमात्मा जगहुरू ।
सर्वेकमोलयस्तुणो. मक्नल्यो.. मज्ञछाचृतः ॥३६॥
१८५ भद्नि:-केलास आदि पव॑तस्वरूप, २८६ अव्दया-
रबः-बरुएस ओर मन्दर आदि पर्वतोंपर निवास करनेवाले)
१८९ चान्तः-सबके प्रियतम), २८८ परमात्मा-परत्रह्म
फेक, २८९ जगहुरुः-समस्त्र संसारके गुरु, २५० सर्वेकर्मा-
कसम कमोंक्रे आश्रयस्थान, २९१ तुष्टः-सदा
+ फछ, २९२ भन्ल्यः-मड्डलकारी, २९५३ महनलावृतः-
3 'फल्कारिणी शक्तिसे संयुक्त | ३६ ॥|
ऋत्या दीघतपा: स्थविष्ठ: स्थबिरों धुवः ।
ऋतसदत्सरों व्याप्तिः प्रमाणं॑. परसं॑ तपः ॥३७॥
हे 5३ भद्ातपा:-महानू तपखी, २५५७ दीर्घतपाः-दीरकाल-
फेर डरनेदाले, २९ ६ स्थवि्ठ:-सत्यन्त स्थूल, २९७ स्थविरों
2३:
६. याचीन एवं अत्यन्त सिर; २९८ अहः संवत्सरः--
# भगवान विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्ननाम-स्तोतच् #
वि सी बन व ली जिन कई
2 सन3-नी' प०-मी-3+-> >म उअममम«-मकन--+जनकि-मयननरी फनी अननं जे ने थी.» देरी अभी यड आगाज
दिन एवं संवत्सर आदि कालरूपसे स्थित, अंशकालस्वरूप)
२९५९ व्याप्तिः-व्यापकताखरूप, ३०० प्रमाणम-्रत्यक्षादि
प्रमाणखरूप, ३०१ परम तपः-उत्कृष्ट तपस्यासरूप | ३७ ॥
संवत्सकरों.. सन्त्रप्रत्ययः सर्वदर्शनः ।
अजः सर्वेश्वःः सिद्धों महारेता महाबरूः ॥ ३८ ॥
३०२ संवत्सरकरः-संवत्सर आदि कालविभागके उत्पादक,
३०३ मन्त्रप्रत्ययः-बेद आदि मन््त्रोंसे प्रतीत ( प्रत्यक्ष ) होने-
योग्य, ३०४ सर्वेद्शनः-सबके साक्षी, ३०५ अजः-अजन्मा)
३०६ सर्वेश्वरः-सबके शासक, ३०७ सिद्धः-सिद्धियोकि आश्रय)
३०८ महारेता-श्रेष्ठ चीयवालि, ३०९ महाबरू-प्रमथगर्णोंकी
महती सेनासे सम्पन्न || ३८ ॥
योगी योग्यो महातेजा:ः सिद्धि: सर्वोदिरिग्रहः ।
वसुवेसुमना: सत्यः सर्वपापहरो.. हरः ॥ ३९ ॥
३१० योगी योग्यः-सुयोग्य योगी, ३११ महातेजा:-
महान् तेजसे सम्पन्न, ३१२ सिद्धिः-समस्त साधनेक्े फल)
३१३ सर्वादिः-सब भूततोंके आदिकारण, ३१७ अग्रहः-इन्द्रियों-
की ग्रहणशक्तिके अविपय) ३१७ वसुः-सब भूतोंके वासस्थानः
३१६ वरुमनाः-उदार मनवाले, ३१७ सत्यः-सत्यस्वरूप,
३१८ स्वपापहरो; हरः-समस्त पापा अप्रहरण करनेके
कारण हर नामसे प्रसिद्ध | ३९ ॥| क्
सुकीर्तिशोभनः श्रीमान् वेदाज्ो वेद्विन्मुनिः।
अआाजिष्णुमजन मोक्ता छोकनाथों दुसाघरः ॥ ४० ॥
३१९ सुकीर्तिशोभनः-उत्तम कीर्तिसे सुग्योमित द्वोनेयाले,
३२० श्रीमान--विभूतिस्वरूपा उमासे सम्पन्न। ३२१ वेदाड़:-
वेदरूप अज्ञेवाले, ३२२ वेदविन्मुनिः-वेदकिा विचार
करनेवाले मननशील मुनि; ३२३ आअ्राजिप्णु:-एकरस प्रकाश-
सखरूप, ३२४ भोजनम-शानियोंद्वारा मोगने योग्य अमृतस्वरूप,
३२५ भोक्ता-पुरुपरूपसें उपभोग करनेवाले, ३२६ छोकनाथ:-
भगवान् विश्वनाथ, ३२७ दुरशाधरः-अजितेन्द्रिय पुरुषोद्वारा
जिनकी आराधना अत्यन्त कठिन दे ऐसे || ४० ॥
अम्ृतः शाश्वतः शानतों वाणहस्तः प्रतापवान |
कमण्डलुघरो.. धन्ध्री अवाह्मनसगोचरः ॥ ४१ ॥
३२८ अमृतः शाखतः-सनातन अमृतस्वरूप)
३२९ शान्तः-द्वान्तिमय, ३३० वाणहस्तः प्रतापवान-द्वाथर्मे
बाण घारण करनेवाले प्रतापी दीर, ३३१ कमण्डछुघरः-करमण्डलु
धारण करनेवाले, ३३३ धन्वी-पेनाकवारी, ३३३ अबार-
मनसगाीचरः-मन ओर वाणीछे अविपय ॥ ४२ |
शेजर्
4 नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संश्षिप्त-शिवपुराणाडू
अ्रतीन्द्रियो - महामायः सवोबासश्रतुष्पथः |
कॉल्योगी . महानादों महोत्साहोी महाबलरः ॥ ४२ ॥
इ३४७ अतीन्द्रियो महामाय:-इन्द्रियातीत एवं महामायावी:
३३७ सवोवासः-सबके वासस्थान, ३३६ चतुय्पथः-नारों
पुरुषा्थोंकी सिद्धिके एकमात्र मार्ग) ३३७ कालूयोगी-ग्रलूयके
सम्रय़्॒ सबको कालसे संयुक्त करनेवाठे, ३३८ महानादूः-
गम्भीर शब्द करनेवाले अथवा अनाहत नादरूपः
६३५९ - मद्दोत्साहों महाबलः-महान् उत्साह और बलछसे
सम्पन्न | ४२ ॥ हे
महाचुद्धिमंदावीयों.. भूतचारी.. पुरंदरः ।
निश्ञाचरः. गअेतचारी महाशक्तिमहाशुतिः ॥ ४३ ॥
३४० सहाबुद्धि:-श्रेष्ठ जुद्धिवालि, ३४१ महावीये:-अनन्त
पराक्रम्मी) ३२४२ भुतचारी-भूतगणोंके साथ विचरनेवाले,
३४४ पुरदरः-त्रिपुरसंहारक, ३४४ निशाचरः-रात्रिमें विचरण
करनेवाले, ३४५७ प्रेतचारी-प्रेतोंके साथ भ्रमण करनेवाले,
३६४६ भहाशक्तिमंद्वाद्युति:-अनन्तशक्ति एवं श्रेष्ठ कान्तिसे
सम्पन्न || ४२ ॥
अनिर्देशयवपु: श्रीमान् सर्वाचार्यमनोगतिः ।
बहुश्ुुतो3 महामायो. नियतात्मा घुवोष्घुब: ॥ ४४ ॥
अनिर्शेश्यवषु:--अनिवचनीय
3छए७ स्वरूपवालि,
8छ८:- आभीसान-ऐस्वयेवान्, ३४९ सर्वाचायंमनोगतिः-सबके,
लिये अविचार्य मनोगतिवाले, ३५० बहुश्रुतः-बहुश अथवा सर्वृश,
३०१ अमहामायः-बड़ी-से-बड़ी माया भी जिनपर प्रभाव नहीं
डाल सकती ऐसे, ३५२ नियतात्मा-मनको वशमें रखनेवाले;
३७३ घुवोष्घुवः-म्रुव ( नित्य कारण ) और अखुब ( अनित्य
कार्य. )-रूप ॥ ४४ ॥
थओोजस्तेजोद्यतिधरी जनकः सर्वज्ञासनः ।
नृत्यभियों नित्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रकाशकः ॥ ७५ ॥
६०४ ओजस्तेजोद्युतिधरः-ओज ( प्राण और बल )
पेज ( शोये आदि गुण ) तथा ज्ञानकी दीप्तिको घारण करने-
वाले, ३५७ जनकः-सबके उत्पादक, ३५६ सर्वशासनः-
सबके शासक, ई७७ नृत्यप्रियः-उत्यके प्रेमी, ३५८ नित्य-
नृत्य+-अतिदिन ताण्डव रृत्य करनेवाले, ३७५ प्रकाशात्सा-
प्रकादखलूप) ३६० प्रकाशकः-मूर्य आदिको भी प्रकाश देने
दाहे ] ४५ ॥ |
स्पष्टाश्रों व्रुधों मन्त्र: समानः सारसम्प्लबः |
'्वृगरादिकयुगाव्तों गम्मीरों वृषवाहनः ॥ ४७६ ॥
स्नल्चलल्च्च्य्य्च्स्स््य्श्श्य्य््स्स्ल्ज्य्य्श्य्श्य्य्य्श्स््स्य्ल्य्य्स्ख्य्य्य्य्य्स्य्स्ख्य्सय्स्स्य्य्य्स्स्ल्ल्ल््््ि््््िििि-ह---
३६१५ स्पष्टाक्षर-ऑंकाररूप स्पष्ट अक्षखाले, ३६९
बुधः-शानवान्! ३६३ सन्त्रः-ऋकः साम और यजुबेदफे
मन्त्रखरूप, ३६४ समानः-सबके प्रति समान भाव रखनेवाले,
३६५७ सारसम्प्लवः-संसारसागरसे पार होनेके लिये नौकारुप
३६६ युगादिकृद्युगावतः-युगादिका आरम्भ करनेवाले तथ/
चारों युगोंको चक्रकी तरह घुमानेवाले) ३६७ गम्भीरः-
गाम्मीयंसे युक्त, ३६८ बृषदाहनः-नन्दी नामक वृवभपर
सवार होनेवाले || ४६ ॥ द
हृष्टो5विशिष्टः शिष्टेष्ट: सुछभः सारशोधनः ।
तीथरूपस्तीथनामा. तीर्थदस्यस्तु. तीर्थदः ॥४०४
३६५ हृष्ट:-परमानन्दस्वरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३७० भवि-
शिष्टः-सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, ३७१ शिष्टेष्ट:-शिष्ट पुरुषीः
के इष्टदेव, ३७२ सुऊम:-अनन्यचित्तसे निरन््तर स्मरण
करनेवाले भक्तोंके लिये सुगमतासे प्राप्त होनेयोग्क
३७३ सारशोधनः-सारतत््वकी खोज करनेवाले, ३७४ तीथंरूपः-
तीर्थसवरूप, ३७५ तीर्थनामा-तीर्थनामधारी, अथवा जिनको
नाम भवसागरसे पार छगानेवाल है। ऐसे, ३०६ तीर्थददब/-
: तीर्थसेबनसे अपने खरूपका दर्शन करानेवाले अथवा गुरुइंपाए
प्रत्यक्ष होनेवाले, ३७०७ तीर्थदः-चरणोदकसखरूप तीर्थंकर
देनेवाले || ४७ ॥ द
भपांनिधिरधिष्ठानं_ दुजयो जयकालवित् |
प्रतिष्ठितः प्रमाणझो हिरण्यकवचों हरिः ॥ ४४ #
३७८ अपानिधिः-जलके निधान समुद्ररूप॥, ३७५ अपि
ष्टानम--उपादानकारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय अथवा जगतृरू
प्रपद्चके अधिष्ठान, ३८० दुजयः-जिनको जीतना कठिन है ऐसी)
३८१ . जयकालूवित्-विजयके अवसरको समझनेवाले। 4)
प्रतिष्ठिः-अपनी मह्िमामें स्थित, ३८३ प्रमाणज्ञः-प्रमा्णोर
ज्ञाता, ३८४ हिरिण्यकवचः-सुवर्णमय कवच धारण करनेवाडे
३८५ हरि:-श्रीहरिस्वरूप || ४८ ॥
विमोदनः सुरगणो विद्येश्ञों बिन्दुसंश्रयः ।
चालरूपोडबलोन्मत्ती5विकर्ता गहनो गुहः ॥ १९ ४ क्
३८६ विमोचनः-संसारबन्धनसे सदाके लिये छुड़ा देनिगओ
३८७ सुरगणः-देवसमुदायरूप) ३८८ विद्येशः-सम्पूर्ण विद्या
खामी) ३८९ बिन्दुसंश्रयः-विन्दुल्प प्रणवक्के अ्शिग
३५० बालरूपः-ब्रालकका रूप धारण कलेगा!
३९१ अबलोन्मत्त:-बलसे.. उन््मच ने. इर्वीर्टि
३९२ अविकर्ता-विकाररद्वित, ३९३ गहदनः-टुबेविखला 7
वयाण जे, न नाग काने | अनोत + कक शि्कीननाण
कोटिरुद्रसंदिता |]. के भगवान् विष्णुद्गारा पठित शिवसहस्त्रताम-स्तोतच्र #
अम्यः ३९४ गुहः-मायासे अपने यथार्थ खरूपको छिपाये
गखनेवाले ॥ ४९ |
करण कारण कर्ता सर्वबन्धविमोचनः ।
म्यवसायों व्यवस्थान:ः स्थानदों जगदादिजः ॥ ७० ॥
३९५ करणम्-ससारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन)
१९३ कारणम-जगत्के उपादान और निमित्त कारण;
३९७ कृतो-सवके रचयिता। ३५९८ स्ववन्धविमोचनः--
स्मूण वन्धनोंसे छुड़ानेवाले, ३९९ व्यवसायः-निश्चयात्मक
शनखरूप, ४००. ब्यवस्थानः-सम्पूर्ण जगत्की व्यवस्था
ऋरनेवाले, ४०३ स्थानदः-मुव आदि भक्तोंको अविचल स्थिति
पदान कर देनेवाले, ४०२ जगदादिजः-रिरिण्यग भ॑रूपसे
धगतके आदिमें प्रकद होनेवाले || ५० ॥
गुरुदो छलितो$भेदो भावात्माउन्मनि संस्थितः ।
वीरेधरो वीरभद्रो वीरासनविधिविंराट् ॥ ५१ ॥
४०३ गुरुदः-ओेष्ठ वस्तु प्रदान करनेवाले अथवा जिज्ञा-
सुको गुरुकी प्राप्ति करानेवाले, ४७०४ छलितः-सुन्दर
खह्मवाले) ४०५ अभेदः-भेदरहित, ४०९ भावात्माउडव्मनिं
उंस्वितः-सत््वरूप आत्मामें प्रतिड्ठित) ४०७ वचीरेश्वरः-चीर-
) ४०८ चीरभद्रः-वीरभद्र नामक गणाध्यक्ष,
६०३ वीरासतविधि:-बीएसनसे वैठनेवाले। ४३० विरादू-
मशिल्रह्माण्डखरूप || ५0) की
वीरचूडामणिवेत्ता चिदानन्दों नदीधरः ।
भाजाधारखिशूली च शिपिविष्ट: शिवालय; ॥ ५२ ॥
है “आप पंतपक 80 श्रेष्ठ. ७१२ वेता-विद्वान/
की असर “विज्ञानानन्दस्वरुप, ४१७ नदीधरः-मस्तक-
धारण करनेवाले, ४१५ जाज्ञाधारः-आज्ञाका
है करनेवाले, ४१६ श्रिश्यूली-जजिश्वूलघारी, ४१७ शिपि-
कर “पेजेमयी किरणोंसे -प्याप्त, ४१८ शिवालय;-भगवती
5 आश्रय || ५२ || क्
वालखिल्यो सदाचापसिम्मांशुबंधिरः खगः ।
एसः सुशरणः सुन्रह्मग्यः सुधापतिः ॥ ७५३ ॥
आकर 0४२१ तिम्मांशु:-नसूय रूप, ४२२ बधिरः-
रे, ९२ के ने सुननेवाले, ७४२३ खगः-आकाशझ-
कप मदर हे “अरम सुन्दर, ४२५ सुशरणः-सबके
. छ३, ७२, अयरूप, ४२६ सुब्रह्मण्य:-आहाणोंके परम
क् उधापतिः-अमृतकल्शके रक्षक | ५३ .]|
उऊदे
मधवान्कीशिको गोमान्विरासः सर्वसाधनः ।
ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रस्ुद-) ५७ ॥
४२८ मधवान् _ कोशिक:-कुशिकवंशीय इन्द्रस्वरूप)
४२९ गोमान-प्रकाश-किरणंसि युक्त, ४३० विराम:-समस्त
प्राणियोंके छयके स्थान, ४३४ सर्वत्ाधनः-समस्त कामनाओंको
सिद्ध करनेवाले, ४३२ ललाटाक्षः-लव्यटमें तीसरा नेत्र धारण
करनेवाले, ४३३ विश्वदेह:--जगतस्वरूप, ४३७ सखारः-नसारू
तत्वरूप, ४३५ संसारचक्रश्ठवतू-संसारचक्रकों धारण करंने-
वाले || ५४ ॥
अमोधदण्डो मध्यस्थोी हिरण्यो त्रद्मवचेसी |
परसार्थ: परो मायी शम्बरों व्याप्छोचनः ॥ ७७ ४
४३६ अमोघदण्डः-जिनका दण्ड कभी व्यथ नहीं जाता
है ऐसे, ४३७ मध्यस्थः-उदासीन) ४३८ हिरण्यः-सुवणे
अथवा तेजःस्वरूप, ४३५९ ब्रह्मवर्चसी-बम्रह्मतेजले सम्पत्क
४४० परमाथ:-मोक्षरूप उत्कृष्ट अर्थकी प्राप्ति करानेवालि,
४४१ परो मसायी-महामायावी, ४४२ शम्बरः-कब्याणप्रद:
४४३ व्याघ्रलोचनः-व्याप्रके समान भयानक नेत्रोंवाले | ५५॥
रुविविरक्ि स्वबेन्धुवाचस्पतिरहपंतिः ।
रविविरोचनः स्कनन््दः शास्ता वेचस्वतो यमः ॥ ५६ ४
४४४ रुचिः-दीसिरूप, ४४७ विरख्विः-अरह्मस्वरूप॥ ४४६९
स्वर्बन्धु:-स्वर्तलकमें बन्धुके समान सुखद, ४४७ वाचस्पति:-
बाणीके अधिपति। ४४८ अहर्पतिः-दिनके स्वामी सू्यरूप,
४४५९ रवि:-समस्त रसोंका शोषण करनेवाले, ४५० विरोचन:-
विविध प्रकारसे प्रकाश फेलानेवाठे, ४५३ स्कन्दः-स्वामी
कार्तिकेयरूप, ४५२ शाखा वेवस्वदों यमः-सवपर शासन
करनेवाले सूर्यकुमार यम ॥ ५६ ॥
युक्तिरुक्तकीर्तिश्चव साझुराग:. परजयः ।
कैलासाधिपतिः कानतः सबिता रविकोचनः ॥ ७७ ॥
४५३ युक्तिरुन्षतकीर्ति:--अश्ट ह्योगस्वरूप तथा ऊच्बेलेकमे
कैली हुई कीर्तिसि युक्त, ४५४ सानुरागः-भक्तजनोंपर प्रेम
रखनेवाले, ४७५ परंजयः-दूसरोंपर विजय पानेवाले, ४५३
कैलासाधिपतिः-कैलासके. स्वामी, ४५७ कान्तः-कमनीय
अथवा कान्तिमान) ४५८ सविता-समत्त जगतको उत्पद
करनेवाले, ४५५९ रविलोचन:ः-सूयेलल्ूप नेत्रवाले || ५७ ॥|
विद्वतमो. वीतमयों.. विश्वभत्तानिवारितः ।
नित्यो. नियतकल्याणः पुण्यश्षवरणकीतनः ॥ ८८ व
+पायामयात्नममााा५७5 नाना पा ३०७ वह ० पा मानक पा गया डा पाए पा्ाहन ता पादप महा का व९ दधभा॥४ 9 न२०+>+ «3 यादु> ००.० ७७४३५७+७५ ५७“ य२०- ४५७ ल्न्मक़ कथन ७ ४७०५० +» काम क७५३०० १५ पा» ०३ पा॥ 0540: ॥॥०४ न" यम पाह# न राम ना गर्-ृ०-कषनकपा ० कम," >रमान्न्न्+ न
३७४
% नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
४६० घिद्धत्तमः-विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, परम विद्वान
४६१ वीतभयः-सब प्रकारके भयसे रहित, ४६२ विश्वभर््ता--
जगत्का भरण-पोषण करनेवाले, ४६३-अनिवारितः-जिन्हेँ
कीई रोक नहीं सकता ऐसे, ४६४ नित्यः-सत्यस्वरूप, ४६५-
नियतकल्याण:-सुनिश्चितरूपसे कल्याणकारी, ४६ ६-पुण्य-
क्रवणकीतनः-जिनके नाम, गुण) महिमा ओर खरूपके श्रवण
तथा कीत॑न परम पावन हैं, ऐसे || ५८॥
दूरश्रवा विश्वसहोीं ध्येयो दुःस्वसननाशनः ।
उत्तारणो दुष्कृतिहा विज्ञेयो दुस्सहो$भवः ॥ ७५९ ॥
४६७ दूरश्रवा+-सवव्यापी द्ोनेके कारण दूरकी बात भी
पुन लेनेवाले, ४७६८ विश्वसहः-भक्तजनोंके सब अपराधोंको
कृपापूवक सह लेनेवाले, ४६५ ध्येयः-ध्यान करने योग्य,
४७५- दुःस्वम्ननाशनः-चिन्तन करनेमात्रसे बुरे खप्नोंका नाश
करनेवाले, ४७१ उत्तारण:-संसारसागरसे पार उतारनेवाले,
४७२ दुष्कृतिहा-पापोंका नाश करनेवाले, ३७३ विज्ञेय-
जाननेके योग्य, ४७४ दुस्सहः-जिनके वेगको सहन करना
दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है; ऐसे, ४७५ अभ्वः-संसार-
वन्धनसे रहित अथवा अजन्मा ॥ ५९ ||
अनादिभूभुंचो लक्ष्मीः किरीटी त्रिदशाधिपः ।
चिश्वगोप्ता विश्वकत्ता सुवीरों रुचिरांगदः ॥ ६० ॥
४७६ अनादिः-जिनका कोई आदि नहीं है, ऐसे सबके
कारणखरूप, ४७७ भूमखुवो छक्ष्मीः-भूछोक ओर भुवर्छककी
शोभा, ४७७८ किरीटी-मुक्ुटधारी; ४७९ त्रिद्शाधिपः-देवताओं-
के खामी, ४८० विश्वगोप्ता-जगत्के रक्षक, ४८१ विश्वक्तो-
संसारकी स॒ष्टि करनेवाले, ४८२ सुवीरः-श्रेष्ठ वीर, ४८३
रुचिरा्नदः-सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले || ६० ||
जननी जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्धवः ।
वसिष्ठ: कद्यपों भालुर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ६१ ॥
४८४ जननः-प्राणिमात्रकों जन्म देनेवाले, ४८५ जन-
धत्मादिः-जन्म लेनेवालेंके जन्मके मूल कारण, ४८ ६ प्रीतिमान्-
प्रसन्न, ४८७ नीतिमान--सदा नीतिपरायण, ४८८ धवः--
सबके स्वामी, ४८५ वसिष्ट-मन और इन्द्रियॉंको अत्यन्त
वशमें रखनेवाले अथवा वसिष्ठ ऋषिरुप, ४९० कदयपः-द्रष्ट
अथवा कश्यप मुनिल्ष, ४९१ भानुः-प्रकाशमान् अथवा सूये 5
रूप, ४९२ भीमः-हुशकोी भय देनेवाले, ४७९३ भीमपराक्रम:-
अतिशय भयदायक पराक्रमसे युक्त || ६१ ॥
नल क्लतनान--
आज
हि
प्रगवः सत्पथाचारों महाकोशों महाघनः ॥
जन्माघिपी महादेव: सककागमपारगः- ॥ ६२ #
४९४ प्रणवः-ओंकारस्वरूप, ४९५ सपमायचा:-
सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले, ४९६ महाकोश्ः-अग्रमवादि
पाँचों कोशोंकों अपने मीतर धारण करनेके कारण मशदोशस्प,
४९७ महाघनः-अपरिमित . ऐश्वयेवाले अथवा कुबेगक़ो मे
धन देनेके कारण महाघनवान+ ४९८ जम्म्यविष+-जन्म
( उत्पादन ) रूपी कायके अध्यक्ष ब्रह्मा ४९९ अहादेवः-
सर्वोत्कृष्ट देवता; ५००-सकलागमपारगः-समस्त शज्नोंके
पारंगत विद्वान || ६२ ॥
तत्व॑ तत्त्वविदेकात्मा विश्लुर्विश्वविभूषणः ॥
ऋषिग्राह्मण.. ऐश्वयंजन्मस्त्युजरातिगः | एव
. ५५०१ तत््वम--यथार्थ तत्वरूप, ७०२ तत्वविदू-यपार्य
तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ५०३ एकात्मा-अद्विदीय आम-
रूप, ५०४ विभुः-सर्वत्र व्यापक, ५०५७ विश्वविभूष्मः-समूर,
जगतको उत्तम गुणोंसे विभूषित करनेवाले, ५०६ ऋषिः-सन्तर-
जरातिगः-ऐशध्ये) जन्म) मृत्यु ओर जरासे अतीत ॥ ६३ ॥
पश्चयज्ञसमुत्पत्तिविदवेशों... विमलोद्यः ।
आत्मयोनिरनायन्तो वत्सलो भक्तलोकष्क ॥ ६४ #
५०९ पतञ्नयज्ञसमुत्पत्तिः-पतञ्च मद्दायशोंकी उस्त्तिके है
५१० विर्वेशः-विश्वनाथ, ५११ विमछोदयः--निर्मेल अम्मुदय-
की प्राप्ति करानेवाले धर्मूप॥, ५१२ आतव्मयोनिः-खबम्भू
५१ ३ अनायन्तः-आदि-अन्तसे रहित, ५१४ वत्सलः-मक्तकि
प्रति वात्सल्य-स्नेहसे युक्त, ५१५ भक्तलोकरक्-
आश्रय ॥ ६४ ॥
गायत्रीवललभः प्रांशुविश्वावासः प्रमाकरः
शिशुगिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशग्रुह्य ॥ ६५ #
५१६ गायत्रीवक्॒मः-गायत्री मन्त्रके प्रेमी) ५३० आड़”
ऊँचे शरीरवाले, ५१८ विश्वावासः-सम्पूण जगतके अर्किर्ि
स्थान, ७५१९ प्रभाकरः-सूयेरूप, ७५२० शिश्षुः-बाल्कश।
5२१. गिरिरतः-केलास परवंतपर_ रमण करनेवाकि
७५२२ सम्राद-देवेब्वरोंके भी ईश्वर, ५२३ सुपेणः सुसतवुर्र
'द्रष्ठा) ५०७ ब्राह्मण:-अहवेत्ता, ७०८ ऐशस्रयंजन्मएव्यु- '
|
प्रमथगर्णोकी सुन्दर सेनासे युक्त तथा देवशनुआंक ध्
करनेवाले ॥ ६५ ॥
अमोधोडस्प्टिनेमिश्व कुमुदो विगतज्वरः
स्वयंज्योतिस्तनुज्योतिरात्मज्योतिर्चल्चलः # ६६ #
फोटिरुद्रसंहिता ]
५२४ अमोघो5रिष्टनेमि:-अमोध संकल्पवाले महर्षि
* कश्यपरूप; ५२८ कुमुदः-भूतलको आह्ाद प्रदान करनेवाले
चद्धमारूप।, ५२६ विगतज्वरः-चिन्तारंहित, ५२७ स्वयंज्योति-
छजुज्योतिः-अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले सूक्ष्म
ध्योतिःखलूप, ५२८ आत्मज्योतिः-अपने स्वरूपभूत शानकी
प्रभासे प्रकाशित, ५२९ अचब्वलः-न्वश्वलतासे रहित || ६६ ||
पिड्ल:.. कपिलश्मश्रुभौलनेत्रस्रयीतनुः ।
शानस्कन्दी महानीतिर्विश्वोत्पत्तित्पप्छवः ॥ ६७ ॥
५३० पिक्चलः-पिज्जलव्णवाले, ५३१ कपिलस्मश्रुः-कपिल
परणंकी दाढ़ी-मूछ रखनेवाले दुर्वासा मुनिके रूपमें अवतीण)
५३२ भालनेत्र:-ललायमें तृतीय नेत्र घारण करनेवाले,
५३३ प्रयीतनुः-तीनों लोक या तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, ऐसे,
५३४, श्ञानस्कन्दो महानीतिः-ज्ञामप्रद ओर श्रेष्ठ नीतिवाले,
"रेप विश्वोत्पत्ति:-जगतके उत्पादक, ५३६ उपप्लव:--
पशरकारी ॥ ६७ ॥
भगो विवस्वानादित्यों योगपारों दिवस्पतिः ।
ऊल्याणगुणनामा च थापहा पुण्यद्शनः ॥ ६८ ॥
५२७ भगो विवस्वानादित्यः-अदितिनन्दन भग
एवं: विवस्वान्) ७३८ योगपारः-योगविद्यार्मे. पारंगत,
५३५९ दिवस्पतिः-स्वर्गलोकके स्वामी) ७५४० केल्याणगुणनामा--
फ्याणकारी गुण ओर नामवाले, ५४१ पापहा-पापनाशक,
५४२ पुण्यद्शनः-पुण्यजनक दर्शनवाले अथवा पुण्यसे दी
जिनका दर्शन होता है, ऐसे ॥ ६८ ॥
ददारकीतिरुच्योगी सयोगी सदसन्मयः।
गक्षत्रमाली नाकेशः स्वाधिष्ठानपदाशञ्रयः ॥ दर ह.
4४३ उदारकीति:-उत्तम की्तिवाले, ५४७४ उद्योगी-
ग्योगशील, ५४५ सद्योगी-श्रेष्ठ योगी, ५४६ सद्सन्मय:ः--
रि्सलप, ५४७ नक्षत्रमाली-नक्षत्रोंकी मालासे अलंकृत
भकाररुप, ५४८ नाकेश:-स्वर्गके स्वामी, ५४५९ स्वाधिष्ठान-
'एश्रय:-खाधिष्ठान चक्रके आश्रय ॥ ६९॥
। पवित्र: पापहारी च सणिपूरों नभोगतिः।
#उण्टरीकमासीन: शक: शान््तो वृषाकपि: ॥ ७० ॥
हि शक पचिन्न: पापहारी-नित्य शुद्ध एवं पापनाशकः
“भणिपूर नामक चक्रख्वरूप, ५ण२ नभोगतिः--
भ्द्् पारी भ्् ७.
बा ५३ हृत्पुण्दरीकमासीन:-हृदयकमलमें स्थित,
९९६ पक्र:-इन्द्ररूप,.. एच... शान्तः-शान्तखरूप)
क् एा्प:-हरिहर || ७० ||
$ भगवान विष्णुद्धरा पठित शिवसहस्रनाम-स्तोतच्र #
उष्णो ग्रहपतिः कृष्णः समर्थो3नर्थनाशनः
अधसंशतब्रुरझयः पुरुहृतः.. पुरुश्न॒तः 0 ७१ ५
जुणज७ उष्णः-हालाहल विषकी गर्मासि उष्णतायुक्त:
७५८ गृहपतिः--समस्त ब्रह्माण्झ्रझपी गहके खामी:
५५९ क्रृष्ण:-सच्िदानन्दस्वरूप, ५६० समथः-सामथ्ये-
शाली। ५६१ अनर्थनाशनः-अनर्थत्ा नाश करनेवाले,
5५६२. अधर्मशन्रुः-अघमंनाशक,._ ५६३ वज्ञेय:--
बुद्धिकी पहुँचसे परे अथवा जाननेमें न आनेवाले)
५६४ पुरुहृतः पुरुश्र॒तः-बहुत-से नामोंद्वारा पुकारे और सुने
जानेवाले || ७१ ॥
ब्रह्मगम्मो... बृहद्र्भो. धर्मधेनुधनागमः ।
जगद्धितेषी सुगतः कुमारः कुशलागमम ॥. ७२ ॥.
५६५ बह्मगर्भः-अद्या जिनके गर्भस्थ शिश्ञुके समान हैं,
ऐसे, ५६६ बृहृद्वर्म:-विश्वत्रह्माण्ड प्रलयकालमें जिनके गर्भमें
रहता है, ऐसे; ५६७ घमंधेनुः-धममरूपी घूषमको उत्पन्न करनेके
लिये घेनुखरूप, ५६८ घनागम:-घधनकी प्राप्ति करनेवाले; ५६५
जगद्धितेषी-समस्त संसारका हित चाहनेवाले, ५७० सुगतः-
उत्तम शानसे सम्पन्न अथवा बुद्धखरूप, ५७१ कुमार
कार्तिकेयरहूप, ५७२ कुशछागमः-कल्याणदाता ॥ ७२॥
हिरण्यवर्णा ज्योतिष्मान्नानाभुतरतो ध्वनिः ।
अरागी नयनाध्यक्षो विश्वामित्रीं धनेश्वरः ॥ ७३ 0
७५७३ हिरण्यवर्ण: ज्योतिप्मान-सुबर्णफे समान गौर
वर्णाले तथा तेजखी, ५७४ नानाभूतरतः-नाना प्रकारके
भूतोंके साथ क्रीडा करनेवाले, ५७५ ध्वनिः-नादस्वरूपः
७५७६ अरागः-आसक्तिशून्य, ५७७ नयनाध्यक्ष:-नेत्रोंमें द्रष्टा
रूपसे विद्यमान, ५७८ विश्वामित्रः-सम्यूणं जगतके प्रति
मेत्री भावना रखनेवाले मुनिखरूप। ५७९ धनेश्वरः-धनके
खामी कुबेर ॥ ७३ ॥
ब्रह्मज्योतिव सुधामा मद्दाज्योतिरलुत्तमः ।
मातासहोी मातरिदवा नभस्वान्नागह्ारष्टक् ॥ ७४ ॥
७५८० ब्रद्माज्योति:-ज्योतिःसखरूप ब्रह्म, ५८१ वसुधामा-
सुवर्ण और र्नोंके तेजसे प्रकाशित अथवा वसुधासवरूपः
ज८२ महाज्योतिरनुत्तमः-सूर्य आदि ज्वोतियंद्ति प्रकाशक
सर्वोत्तम महाज्योतिःखरू्प, ७८३ मातामहः-मातृकार्मके
जन्मदाता होनेके कारण मातामहू, ५८४ मातरिश्वा ननस्वानू--
आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, ७८७ नागद्वारटऋ-सर्पम्य
हार धारण करनेवाले ॥ ७४ ॥
३७६
भा
पुलस्त्यः पुलष्टी5गस्त्यों जातूकण्यः पराशरः ॥
निरावरणनिरवारो. वैरल्च्यो. विष्टरश्रवा: ॥ ७७ ॥
७५८६ पुलस्त्य:-पुलस्त्य नामक मुनि; ५८७ पुलद्द/-
पुल नामक ऋषि, ५८८ अगस्त्यः-कुम्मजन्मा अगस्त्य
अधि, ७८९ जातूकण्यं:-इसी नामसे प्रसिद्ध मुनि, ७९०
पराशरः-छक्तिके पुत्र तथा व्यासजीके पिता सुनिवर पराशरु
५९१ निरावरणनिवोरः-आवरणशून्य तथा अवरोधरहितः
७९२ वेरन्च्यः-अह्ाजीके पुत्र नीललोहित . रुद्र)
७९३ विष्टरश्नवा:-विस्तृत यशवाले विष्णुखरूप ॥ ७५ |
आत्सभूरनिरुद्धो5 त्रिज्ञौनमू्िमदहायशाः ।
छोकवीराग्रणीर्वीर३चण्डः सत्यपराक्रम: ॥ ७६ ॥
७५९४ आत्मभू:-खयम्भू ब्रह्माआ ५९७५ अनिरुद्धर-
अकुण्ठित गतिबवाले, ७९६ अश्निः-अजञि नामक ऋषि, अथवा
त्रिगुणातीठ, ५९७ ज्ञानसमूर्तिः-शानस्वरूप, ७९८ महायश्ा:-
महायशस्वी,५५५९ छोकवीराग्रणी:-विश्वविख्यात वीरोंमें अग्रगण्य,
६०० वीरः-झूरबीर, ६०१ चण्डः-प्रलयके समय अत्यन्त क्रोध
करनेवाले, ६०२ सत्यपराक्रम:-सच्चे पराक्रमी | ७६ ॥
व्यालाकल्पो मद्दाकल्पः कल्पवृक्षः कलाघरः ।
' अलंकरिष्णुरचलो रोचिण्णुविक्रमोन्नदः ॥ ७७ ॥
६०३ व्याछाकल्पः-सरपोके आमभूषणसे श्वक्कलार करने-
वाले. ६०४ महाकढ्प:-महाकल्प-संशक काल्स्वरूपवाले;
६०७ कल्पवृक्ष:-शरणामगर्तोकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्ष-
फे समान उदार ६०६ कलछाधघरः-चन्द्रकलाघारी;
६०७ अलंकरिप्णुः-अलंकार धारण करने यां करानेवाले,
६०८ अचलः---विचलित न होनेवाले, ६३०९ रोचिष्णु:-प्रकाश-
मान). ६१० विक्रमोत्बतः-पराक्रममें बढ़े-चढ़े ॥ ७७ ॥
आयु; शब्दंपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः ।
असंसृप्टोडतिथि।ः शक्रग्रमाथी पादपासनः ॥ ७८ ॥
६११ जायुः शबव्दपतिः-आयु तथा वाणीके स्वामी,
६१२ वेगी प्लवनः-वेगशाली तथा कूदने या तेरनेवाले,
६१३ शिखिसारथिः-अग्निरूप सहायकवाले, ११४ असंसृप्ट:-
निर्लप, ६१७ अतिथि:-प्रेमी भक्तकि घरपर अतिथिकी भौँति
उपस्थित हो उनका सत्कार ग्रहण करनेवाले, ६१६ शक्क-
प्रमाथी-इन्द्रया मानमर्दन करनेवाले, ६१७ पादुपासनाः-
वृक्षोपर या वृक्षोंके नीचे आसन लगानेवाले || छ्ट।॥
- , चसुश्नवा दृव्यवाहः ग्रतप्ती विश्वभोजनः ।
जप्यो ज़रादिशसनों लोद्वितात्मा तनूनपात् ॥ ७९ ॥
# नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने
[ संश्चिप्त-शिधपुराणाडु
६१८ चसुश्रवाः-यशरूपी घनसे सम्पन्न, ६१९ हृष्यवाह!-
अग्निखरूप, ६२० प्रतप्तः-सूयरूपसे प्रचण्ड ताप देनेवीले,
१२१ विशवभोजनः-प्र्यकालम विश्व ब्रह्माण्डको अपना ग्रास
बना लेनेवाठे, ६२२ जप्यः-जपने योग्य नामवाले;
६२३ जरादिशमनः-लुढापा आदि दोषोंका निवाग्ण करनेवालि,
१६२४ लोहितात्मा तनूनपात-लोहित वर्णवाले अम्नसूप
॥ ७९ ॥ द
वृहदश्वो
निदावस्तपनो
नभोयोनिः सुग्रतीकस्तमिस्रहा ।
मेघः सक्ष: परपुरंजयः ॥ ८० ॥
६२० बृहद॒रवः-विशाल अश्ववाले, ६२६ नमोयोनिः-
आकाशकी उत्तत्तिके स्थान। ६२७ सुप्रतीकः-सुन्दर शरीर:
वाले, ६२८ तमिखहा-अशानान्धकारनाशक, ६२५९ निदाघ-
स्तपनः-सपनेवाले ग्रीष्मरूप, ६६० मेघः-बादलोंसे उपलक्षित
वर्षारूप, ६३१ स्वक्षः-सुन्दर नेत्रोवाले, ६३२ परपुरंजयः-
त्रिपुररूप शन्नुनगरीपर विजय पानेवाले || ८० ॥
सुखानिऊः सुनिष्पन्न: सुरभिः शिशिरात्मकः ।
चसनन््ती माघवों ओष्मी नभसस््यो बीजवाहनः ॥7८१ ४
६३३ सुखानिकः-सुखदायक वायुको प्रकट करनेवाे
शरत्कालूरूप, ६३४ सुनिष्पक्नः-जिसमें अन्नका सुन्दररुपते
परिपाक होता है। वहूं हेसन्तकालरूप, ६३५७ सुरकिः
शिक्षिरात्मकः-सुगन्धित मलयानिल्से युक्त शिशिर ऋतुरू
६३६ वसन््तः साधवः-नचेत्र-वेशाख--इन दो मासोसे युक्त
वसन्तरूप, ६३७ ओप्मः-ओष्म ऑऋतुरूप, ६३4 नभख्ः-
भाद्रपदमासरूप, ६३१५ बीजवाहन;ः-धान आदिके बीजोंकी
प्राप्ति करानेवालछा शरत्काछ ॥ ८१॥
अद्विरा गुरुराज्रेयो विमलो विदववाहनः ।
पावनः . सुमतिविंद्वांस्त्रेवचियों. वरवाहनः ॥“4३ #
६४० अड्जिरा गुरु-अज्ञिरा नामक ऋषि तथा उनके .पुत्र
देवगुरु बृहस्पति, ६४१ आ्रेयः-अन्रिकुमार इुबांता)
६४२ विमलः-निर्मल, ६४३ विद्वववाहनः-सम्यूण अगतका
निर्वाह करानेवाछे, ६४४ पावनः-यवित्र करनेवाऐे
६४५ सुमतिविद्वान-उत्तम बुद्धिवाले विद्वान, ६४३६ त्रैविद्रः-
तीनों वेदोंके विद्वान् अथवा तीनों वेदोंके द्वारा ग्रतिपादितः
१४७ वरवाहनः-च्रप्भरूप श्रेष्ठ वाहनवाले || ८२ ॥
पक्षेत्रपालकः ।
विद्वगालव : ॥ “ये #
मनोवुद्धिरदंकारः.. क्षित्रज्ञः
जमदुग्निबंलनिधिर्विंगालो
कोटिरुद्रसंहिता |
६५८ मनोबुद्धिरहंकारः:-मनः बुद्धि और अहंकारखरूप;
६४९ क्षेत्नज्ञ:-आत्मा; ६०० क्षित्रपाऊुक:-दारीररूपी क्षेत्रका
पालन करनेवाले परमात्मा; ६५१ जमदग्तिः-जमर्देग्नि नामक
फ्रपिरप,, ६०२ बलनिधि:-अनन्त बलछके सागर
६५३ विगालः-अपनी जयासे गज्ञाजीके जलूको टपकानेवाले,
६५४ विश्वगालवः-विश्वविख्यात गाछव मुनि अथवा प्ररूय-
कालमें कालाग्निस्पसे जगतको निगल जानेवाले | ८३ ॥
अधोरो$चुत्तरोि यज्ञः श्रेष्टो निःश्नेयसप्रदः ।
शेछो गगनकुन्दाभोी. दानवारिररिंद्मः ॥ ८४ ॥
६५५ अघोरः-सोम्यरूपवाले, ६५६ अलुत्तरः-सर्वश्रेष्ठ;
६५७ यज्ञ: श्रेष्ठ--श्रेष्ठ यशरूप+, ६७८ निःश्रेयसप्रद:-
कल्याणदाता, ६०५९ श्ैलः-शिलामय लिड्भरूप, ६६० गगन-
कुल्दाभः-आकाशकुन्द---चद्धमाके समान गौर कान्तिवाले,
६६१ दानवारिः-दानव-शत्रु, ६६२ अरिंदमः-शन्रुओंका
दमन करनेवाले ॥ ८४ ॥
रजनीजनकश्नारुनि:दाल्यो लोकशल्यछक ।
चतुर्वेदश्नतुभावइ्चतुरश्वतुरभियः ॥८५॥
६६३ रजनीजनकश्रारुः-सुन्दर निशाकर रूप);
१६४ निःशल्य:-निष्कण्टक, ६६० लछोकदाल्यशक-दारणागत-
जनेकि शोकशस्यको निकालकर खयय घारण करनेवाले;
१६६ चतुबदः-चारों वेदोंके. द्वारा जाननेयोग्य)
१६७ चतुभोवः-नचारों पुरुषार्थोकी प्राप्ति. करानेवाले/
१३८ चततुरक्षतुरप्रियः-चतुरे एवं चतुर पुरुषेंके प्रिय |॥८५॥
पाक,
जास्तायोधथ._समाम्नायस्तीर्धदेवशिवालयः ।
पहुरूपो महारूपः स्वेरूपश्रराचरः ॥८६॥
१६३९ आस्ताय:-वेदखरूप,. ६७०. समास्नाय३--
गरसमरास्ताय--शिवसूत्ररूप, ६७१ तीर्थदेवशिवालूयः-ती थौं-
और शिवाल्यरूप, ६७२ वहरूप हुरूपः-अनेक रूपवाले;
**रेसहारूप:-विराट्रूपधारी, ६७४ सर्वरूपश्चराचरः-नचर
और अच्र सम्यूण ह्पवाले ॥८६॥
| न्यायनिर्मायको न््यायी स्यायराम्यो निरक्षनः ।
१ हलमदों देवेन्द्ः . सर्वशसप्रभझ्षनः ॥<७॥
! हा ५»५ न्यायनिम्मायको न््यायी-न्यायकर्ता तथा न्यायशील,
पायगम्य-न्याययुक्त आचरणसे प्राप्त होनेयोग्य:
।._ १३ निरञ्षनः-निर्मल
ह छद्ड
१३९ के ते ) ६७८ सहसखमूरा-सहसों सिखाले;
९ | पेद्धाओंफे
शि७
(
ताओंके खामी, ६८० सर्वशख्रप्रभअ्षनः-
उस शरछोंको नष्ट कर देनेवाले |८७||
३० अं> '४८---
!..
# भगवान विष्णुद्धार! पठित शिवसहख्नाम-स्तोच्र %
काम थारराभकाथा। यक्माक या दामाद मा नाभु॥ा ३ ााारंभाभाभ॥उभभ ३ ७७७७७॥७७॥७ए्ए--"-७७॥७/७/७७॥४/७४७॥॥ए"श/श/श////श/श/शशशशश८णर/णाआा॥््७५४७७७७७७७७७४७७७७७७७७७७७७७७७/७/-#"श///शश/श///////श।ाश।श।/ा किकिय्ख्य्ल कब मकरडिनफ्रयाका पका उलय#पकप पसल्ेपराउअपसालुक्नास्क फसनदनदास/त पान पद कया कम एरिकमाए५+ह भा इ॒भभकवद सात पु भृरतशल् दास का गदर फिल्म करभरफाभकर प्रा. >रतफएीभका शरपाम शाम ९ पप्रधक अर दा सके कप का पद नपसपुफसदआक 5 लए पा भ॥रदहपक़++क काश रा न्॒उसचतर पा भरपघतक दारू पर
९228२ अपूजकरं न १2 सबक ३ पाप: उमाहपबड “कर 524 09# दा ८ फ्र क्र पाए: पभप दाह करमा:न््पतकामा पाप सरकार क 9 भ कुएं पा".२८+#घ; २5 सर ०-/५५५ पान उह> स्ुन्ल ३५५४5 ध:सप५ एप एमए 45 3४८ कक पा; 42. ल् अर एप उपर: क >. ५३४५-4८ ३ _#-2८4-27 क>--अ
सुण्डो विरूपो विक्रान्तो दण्डी दान्तों गुणोत्तमः ।
पिड़लाक्षी जनाध्यक्षो नीलग्मीयो निरामयः ॥८<८0
६८१ सुण्डः-मुंड़े हुए सिरवाले संन्यासी, ६८२ विरूप:-
विविध रूपवाले, ६८३ विक्रान्तः-विक्रशील, ६८४
दुण्डी-दण्डधारी, ६८५ दान्तः-मन और इन्द्रियोंका दमन
करनेवाले, ६८६. ग़ुणोत्तमः-गुणेंमें. सबसे श्रेष्ठ
६८७ पिक्नलाक्षः-पिड़ल नेत्रवालें, ६८८ जनाध्यक्षः-
जीवमान्रके साक्षी) ६८९ नीरग्रीवः-नीलकण्ठ,;
निरामयः-नीरोग || ८८ ॥
सहस्रबाहु: सर्वेशः दशरण्यः सर्चछोकछक ।
पद्मासनः पर ज्योतिः पारस्पस्यफलमदः ॥८५॥
६९१ सदस्तबाहु:-सहर्खों भ्रुजञाओंसे युक्त, ६५९२
सर्वेशः-सबके खासी, ६५३ शरण्यः-शरणागत-हिलेपी,
६९४ सर्वलोकष्टक-सम्यूण लोकोंकों धारण करनेवाले;
६०७५. प्मासनः-कमलके आसनपर विराजमानः
६५६ पर ज्योति--परम प्रकाशखरूप, ६९७ पारम्पय्ये-
फलग्रदः-परम्परागत फलकी प्राप्ति करानेवाले || ८९ ||
पद्मगर्सा सहागर्भा विश्वगर्सों विचक्षण; )
परावरज्ञों. वरदो.. वरेण्यश्वच महास्वनः ॥९०॥
६९८ पद्मगर्भ:-अपनी नाभिसें कमलको प्रकट करनेवाले
विष्णुरूप, ६९५ महारर्भ:-विराट ब्रह्माण्डको गर्भमें धारण
करनेके कारण महान् गर्मवाले, ७०० विश्वगर्भ:-सम्पूर्ण
जगत्की अपने उदरमें धारण करनेवाले, ७०१ विचक्षणः-
चतुर; ७०२ परावरश्धः-कारण और कार्यके जाता:
७०३ वरदः-अभीश वर देनेवाले, ७०४ वरेण्यः-वरणीय
अथवा श्रेषन््ठड/ ७०५ सहास्वनः-डमरूका गम्भीर नाद
करनेवाले | ९० ॥
देवासुरगुरुद वी
देवासुरमह्यमित्रो
६५९०
देवासुरनमस्कृतः ।
देवासुरमहे श्वरः ॥९ १॥
७०६ देवासुरगुरुदवः-देवताओं तथा अमुरोके गुरुदेव
एवं आराष्य/ ७०७ देवासुरनमस्क्ृतः-देवताओं और अनुरोमे
वन्दित, ७०८ देवासुरमहामित्रः-देवता तथा असुर दानक्त
बड़े मित्र, ७०९ देवासुरमहेश्वर:-देवताओा ओर असुर्गक
महान् ईश्वर | ९१ ॥
देवासुरेखरों. दिव्यों
देवदेवमयो5 चिन्त्यो
देवासुरमहाश्नयः |
दुबददात्मसमग्नद३ ४ दब |
. ७१० देवासुरेखरः-देवताओं ओर
अनुरः शा्क)
३५७८
# नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाहु
र्न्ज्ज्ज्ज्पम्प्श्््ं्त्ंऊं३्ंणजः-स:::,:ज:ओ:ः:ाः:::े:ाः-+-::लजबफ जई .स्ऑउा:सचचचॉॉडाः कस उस्क् क् ल्अअड उक्क्कइफइपवॉह इअअनन-त--+०>««+«_«««««««+«७..........ह..0ह.तहहतह.तह.ह0हक.ततहसत_ न्न । सी आज, असल की जीन जल 3 कल कल ््््््भ्भ्भ्््भ्म्भ्््म््््मभ्म्म्भ्भ््््;”्न््भ्भ्व ् भा भा ्स2ट2टरपरन2न2नभ<भभ८म मा दपपकपपकम्भाकमकंर कम कप ध 5 पका >> प ५ व मक्का कब अमल मम
हिन+अजपरममान न नर न न ५५ > अर हनन भा पहनी +प पआमनन ५ करी ५ >पमीनन नया पु आन्र पा "कम ५ ५७५ 7४“ »+/»४//+-््न््न्स्न्" | च चलन नै ++तहतझ+ेत- पा 5
७११ दिव्यः-अलोकिक खरूपवाले, ७३२ देवासुरमहाश्रयः
देवताओं और असुरोंके महान् आश्रय; ७१३ देवदेवसय:--
देवताओंके लिये भी देवतारूप, ७१४ अविन्त्यः-तचित्तकी
सीमासे परे विद्यमान, ७१५ देवदेवात्मसस्भवः-देवाधिदेव
ब्रह्माजीसे रुद्ररूपमें उत्पन्न || ९२॥
सथोनिरसुरव्यात्रो.. देवसिंहों.. दिवाकरः |
विव्वुधाग्रचरश्रेष्ठ: सवदेवोत्तमोत्तम:ः ॥ ९३ ॥
७१३ स्योनि:-सत्यदार्थोकी उत्पत्तिके हेतु, ७३७ असुर-
व्यात्रः-असुरोंका विनाश करनेके लिये व्याप्ररूप:
७१८ देवसिंह:-देवताओंमें श्रेष्ठ, ७१९ दिवाकरः-सूर्यरूप,
७२०. विवुधाअचरश्रेष्ठ-देवताओंके . नायकोंमें. सर्वश्रेष्ठ,
७२१ सर्वदिवोत्तमोत्तमः-सम्पूर्णं श्रेष्ठ देवताओंके भी
शिरोमणि ॥ ९३ ॥
शिवज्ञानरतः. श्रीमाब्छिखिश्रीपर्च॑तप्रियः ।
वज्हस्तः सिद्धखन्ली नरसिंहनिपातनः ॥ ९४ ॥
७२२ शिवज्ञानरतः-कल्याणमय शिवतत्त्वके विचारमें
तत्पर, ७२३ श्रीमान-अणिमा आदि विभूतियोंसे सम्पन्न;
७२४ शिखिश्रीपवतश्रियः-कुमार कार्तिकेयके निवासभूत
श्रीशूक नामक पवतसे प्रेम करनेवाले, ७२५ वचञ्ञहस्तः-
वज्रधारी इन्द्रढप8॥ ७२६ सिद्धखन्नः-शन्नुओंको मार गिरानेमें
जिनकी तलवार कभी असफल नहीं होती। ऐसे
७२७ नरसिंहनिपातनः-शरभरूपसे बरसिहकों धराशायी
करनेवाले || ९४ ||
ब्रह्मगरी लोकचारी धर्मचारी धनाधथिपः।
नन्दी नन्दीश्वरोडनन्तो नग्नब्॒तधरः छुचिः ॥ ९५॥
७२८ ब्रह्मचारी-भगवती उमाके प्रेमकी परीक्षा लेनेके
लिये प्रह्मचारीरुपसे प्रकट/ ७२५ लोकचारी-समस्त लोकोंमें
विचरनेवाले) ७३० धर्मचारी-धर्मकाा आचरण करनेवाले,
७३१ धनाधथिपः-चनके अधिपति कुबेर, ७३२ नन््दी-
नन्दी नामक गण, ७३३ नन्दीखरः-इसी नामसे प्रसिद्ध
वृषभ), ७३४ अनन्तः-अन्तरहिंत, ७३५ नग्नब्रतघरः-
दिगम्बर रहनेका त्रत घारण करनेवाले, ७३६ झुचिः-नित्य-
जुद्ध ॥ ९५॥
लिद्ञाध्यक्षः सुराध्यक्षों योगाध्यक्षो युगावह:ः ।
स्वरर्मा स्वर्गतः खवगंल्वरः स्वर्मयस्वनः ॥ ९६ ॥
७३७ लिझ्ध्यक्ष:-लिद्वदेदके द्रश, ७३८ सुराध्यक्ष:--
देवताअंके अधिपति, ७३५ योगाध्यक्ष:-योगेश्वर,
७४० युगावह:-युगके निर्वाहक, ७४१ खधरमा-आत्मविचारूप
धर्ममें स्थित अथवा खधर्मपरायण, ७४९२ ख्र्गतः-खर्गलोकमें
स्थित, ७४३ स्वगेस्वरः-स्र्गलोकमें जिनके यशका गान किया
जाता है, ऐसे, ७४४ स्वरमयस्रनः-सात प्रकारके खरोसे युक्त
घ्वनिवाले [| ९६ ||
बाणाध्यक्षों बीजकरतों धर्मकृछमंसग्भवः ।
दुम्मोडलोसो5थविच्छम्भुः. सर्वभूतमहेश्वरः ॥ ९७ ॥
७४७ बाणाध्यक्षः-वाणासुरके खामी अथवा वाणलिड्ढ
नर्मदेश्वरमें अधिदेवतारूपसे स्थित, ७४६ बीजकर्ता-बीजके
उत्पादक, ७४७ धर्मकूद्मंसम्भवः-धर्मके पालक और उत्पादक,
७४८ दम्भ:-मायामयरूपघधारी, ७४९ अलोभः-लेभरहित;
७५० अधथंविच्छस्भुः-सबके प्रयोजनको .जाननेवाले कल्याण
निकेतत शिव, ७५३ सर्वभूतसहेंश्वरः-सम्यूर्ण प्राणियोंके
परमेश्वर || ९७ ||
रमशाननिलयस्न्यक्ष सेतुरप्नतिमाक्ृतिः ।
लोकोत्तरस्फुटालोकरूयम्वकोी.. नागभूषणः ॥ ९८॥
७७५२ र्मशाननिरूय;-इमशानवासी, ७७३ न्यक्षः-
त्रिनेत्रधारी, ७५४ सेतुः-घर्ममर्यादाके पालक) ७५५ अग्रतिमा-
कृति:ः-अनुपम॒ रुपवाले, ७५६. छोकोत्तरस्फुटलोकः-
अलेकिक एवं सुस्पष्ट प्रकाशसे युक्त, ७५७ व्यस्बकः-
तिनेत्रधारी अथवा ब्यम्बक नामक ज्योतिलित्े
७७८ नागभूषणः-नागहारसे विभूषित || ९८ ॥
अन्धका रिसंखद्वेषी विप्णुकन्धरपातनः ।
हीनदोषी$क्षयगुणोी दक्षारि:ः पूपदन्तमित् ॥ ९९॥
७५९ अन्धकारिः-अन्धकासुरका . वध करनेवाले)
मखट्वेषी-दक्षेके यज्ञका विध्यंस करनेवाले)
७६१ विष्णुकन्धरपातनः-यश्मय विष्णुका गला काटनेवाले
७६ २ हीनदोष:--दोषरहित, ७६३ अक्षयगुणः-अविनाशी गुणेपि
सम्पन्न, ७६४ दक्षारिः-दक्षद्रोही, ७६८ पूपदन्तमित्-यूता
देवताके दाँत तोड़नेवाले [| ९९ ॥|
घूजटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलो5नवः ।
अकाल: सकलाधारः पाण्डुराभों म्ुंडो नंद ॥१००॥
७६६ घूजेटि:-जटाके भारसे विभूषित; ७६७ खण्डपरथः”
खण्डित परञुवाले, ७६८ सकलको निष्कलः-साकार एव
निराकार परमात्मा, ७६५ अनवः-वापके सझसे शा)
७७० अकार:-कालके प्रभावसे रहित, ७७३ सकलाधारः-
सबके आधार: ७७२ पाण्डुरामा-छेत कान्तिवाट/
७७३ ख्दो नटः-सुखदायक एवं ताण्डवद्वत्यकारी | १०९
७६०
कोटिरुद्रसंहिता |
पूर्ण: पूरयिता घुण्यः सुकुमारः सुलोचनः ।
सामगेयश्रियो3क्रूरः पुण्यकीतिरनासयः ॥१० १॥
७७४ पू्ण-सर्वव्यापी परबह्म परमात्मा, ७७८ प्रयिता-
मक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले, ७७६ पुण्यः-परम पवित्र)
७७७ सुकुमारः-सुन्दर कुमार रह जिनके, ऐसे;
७७८ सुलोचनः-सुन्दर नेत्रवाले, ७७९ सामगेयप्रिय;-
तामगानके प्रेमी, ७८० अक्रूरः-क्रूरतारहित, ७८१ पुण्यकीर्ति:-
पवित्र कीर्िवाले, ७८२ अनामयेः-रोग-शोकसे रहित || १०१॥|
मनोजवस्तीथंकी. जठिलो... जीवितेश्वरः ।
जीवितान्तकरो नित्योी वसुरेता वसुप्रदः ॥१०२॥
७८३ मनोजवः-मनके समान वेगशाली, ७८४ तीथकरः-
तीथकि निर्माता; ७८५ जटिछ:-जगाधारी, ७८६ जीवित्तेदवर:-
सबके प्राणेश्वर, ७८७ जीवितान्तकरः-प्रठयकालमें सबके
जीवनका अन्त करनेवाले; मित्यः-सनातन;
७८९ वसुरेता:-सुवर्णमय वीयवाले, ७९० वसुप्रद:-
घनदाता ॥१०२॥
७८८
सद्वतिः सत्कृतिं:ः सिद्धि: सज्नातिः खलकण्टकः |
फेराघोो.. महाकालूमूतःः. सत्यपरायणः ॥१०३॥
७९१ सद्गति:-सत्पुरुषोंके आश्रय, ७९२ सल्कृतिः-झुभ
फर्म करनेवाले, ७५९३ सिद्धिः-सिद्धिस्वरूप, ७९४ सज्जाति:-
पत्ुरुषोके जन्मदाता; ७५० खलकण्टकः-नुष्टोंके लिये कण्टक-
औप) ७९६ कलछाधरः:-कल्यघारी, ७९७ सहाकालभूतः-
'शकाड नामक ज्योतिलिज्ञखख्प अथवा कालके भी काल
शैनेसे महाकाल, ७ ९८ सत्यपरायण:-सत्यनिष्ठ [१०३॥
लोकलावण्यकर्ता व लोकोत्तरसुखालयः ।
पन््रसंजीवनः शास्ता छोकगूढ़ों सहाधिपः ॥३०४॥
९६ लोकछावण्यकर्ता-सब - छोगोंको सौन्दर्य प्रदान
पाले, ८०० लोक्ोत्तससुखालय:-लोकोत्तर सुखके आश्रय;
दे । पन्द्रसंजीवनः शास्ता-सोमनाथरूपसे चन्द्रमाको जीवन
है गे करनेवाले सर्वशासक शिव, ८०२ लोकगूढः-समस्त
रे मे अव्यक्तरपसे व्यापक, ८०३ सह्याधिप:--महेर्वर || १०४]
का रोकबन्धुलोंकताथ: कृतज्ञः कौीरतिमूषणः ।
“नपायो5शर: कास्तः सर्वशस्रस्तुतां बरः ॥१०७॥
प्छ । हे लक: लेकोंके बन्चु एवं
जा शकेगूपण कर कृतजुः-उपकारको माननेवाले, ८०५६
। वशसे विभूषित, ८०७ अनपायो5श्षरः-
है]
$# भगवान विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्त्तनाम-स्तोच #%
३२७९
विनाशरहित-अविनाशी। ८०८ कान्तः-प्रजापति दक्षका अन्त
करनेवाले, ८०९ सर्वशद्रस्तां वरः-सम्पूणे शख््रधारियोमें
श्रेष्ठ ॥ १०५ ॥
तेजोमयोी.. धुतिघरों... छोकानासग्रणीरणुः ।
छुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जेयो दुरतिक्रमः ॥१०६॥
८१० तेजोमयो शुतिधरः-तेजख्वी और कान्तिमान:
८११ लोकानामग्रणीः-सम्पूर्ण जगतके लिये अग्रगण्य देवता
अथवा जगत्को आगे बढ़ानेवाले, 4१२ अणुः-अत्यन्त सूक्ष्म:
८१३ शुचिस्मितः-पवित्र मुस्कानवाले, ८१७ प्रसन्नात्मा-
हृषेभरे छृदयवाले, ८१७ दुर्जेयः-जिनपर विजय पाना
अत्यन्त कठिन है; ऐसे; ८१६ दुरतिक्रमः-दुलडूनथ [१०६ ॥
ज्योत्तिमंयो जगन्नाथोी निराकारो
तुम्बवीणोी महाकोपो विशोकेः
८१७ ज्योतिमंयः-तेजोमय, ८१८ जगन्नाथः-विश्वनाथ,
८१९ निराकारः-आकाररहित परमात्मा, 4९२० जलेशवर:--
जलके स्वामी, «4२१ तुम्बवीणः-तूँबीकी वीणा बजानेवाले,
«4२२ महाकोपः-संहारके समय महान् क्रोध करनेवाले;
«२३ विशोीक:-शोकरहित, ८२४ शोकनाशनः:-शोकका नाझ
करनेवाले || १०७ ||
त्रिकोकपसिलोकेशः सवशुद्धिरवीक्षजः ।
अव्यक्तलक्षणो देवो व्यक्ताव्यक्तों विशाम्पतिंः ॥ १०८ ॥
८२५ पब्रिकोकपः-तीनों छोकोका पालन करनेवाले,
८ २६ ब्रिलोकेशः-त्रिभुवनके स्वामी, ८२७० सबंशुद्धिः-सबकी
शुद्धि करनेवाले, ८२८ अधोक्षजः-इच्द्रियों ओर उनके विषयोंसे
अतीत, 4२९ अव्यक्तलक्षणो देव:-अव्यक्त लक्षणवालि देवता,
८३० व्यक्ताब्यक्तः-स्थूल-सूक्ष्मरूप, ८३१ विशाम्पति:-
प्रजाओंके पालक || १०८ || |
वरशीली वरगुणः सारो मानभनी सयः ।
चह्मा विष्णु: प्रजापालो हंसो हंसगतिवयः ॥ १०९॥
जलेदइवरः ।
शीकनाशनः ॥१०७॥
८३२ वरशीलः-»४्ठ स्वभाववाले, ४३३ वरगुणगः-उत्तम
गुणोंवाले, 2३४ सारः-सारतत्त्य। ८३५ मानधनः-स्वामिमान-
के धनी; 4३३ मयः-सुलस्वक्प,. <३७ श्रहद्मा-सश्किता
ब्रह्मा/ ८३८ विष्णु: प्रजापालः-प्रजापाल्क विष्णु, ८३९ इंसः-
सूर्यस्वरूप, हंसगतिः-ह सके समान चालवबाछि,
८४१३ वसः-गदठड़ पश्षी ॥ १०९ ||
चेधा विधाता चाता च ख्रष्ठा हर्ता चतुमुंखः ।
क्ैलासशिखरावासी सर्वावासी सदागति: ॥ ३१० ॥
<3०
माय का मई या राणा ०७७४७ थार था थामा ््ााभाआा॥४७७४७७॥आ७ जंग आक9 «भा ा।॥ ७४७७७"
३८०
८४२ बेधा विधाता धाता-ब्रह्मा/ धाता ओर विधाता
नामक देवतास्वरूप, ८४३ स्रष्टा-सृष्टिकर्ता। «४४ हतो-
संहारकारी, <४५ चतुमुंखः-चार मुखवाले ब्रह्मा;
८४६ केलासशिखराबासी-केलासके. शिखरपर निवास
करनेवाले, ८ ४७ सवोवासी-सबब्यापी, ८४८ सदागतिः-निरन्तर
गतिशील वायुदेवता || ११० ॥
हिरण्यगर्भो द्ुहिणो भूतपालोइथ भूपतिः।
सद्योगी योगविद्योगी वरदोीं ब्राह्मणप्रियः ॥ १११ ॥
८४९ हिरण्यगर्मे:-अह्या: द्ुहिणः-अज्मा)
<५१ भूतपालः-प्राणियाका पालन करनेवाले, ८५२ भुपति:-
पृथ्वीके स्वामी, ८७५३ सद्योगी-श्रेष्ठ योगी, ८५४ योगविद्योगी-
योग-विद्याके ज्ञाता योगी;। «५७५ वरदः-वर देनेवालिे,
८७६ ब्राह्मणप्रियः-बाह्मणेके प्रेमी ॥| १११ ॥
देवप्रियो देवनाथोी देवज्ञो देवचिन्तकः ।
विषमाक्षो विज्ञालाक्षो बृषदो वृषव्धनः ॥ ११२॥
&'3५०
८५७ देवग्नियों देवनाथः-देवताओके प्रिय तथा रक्षक;
८५८ देवज्ञः-देवतत्वके श्ञाता, ८५५९ देवचिन्तकः-देवताओंका
विचार करनेवाले, ८६० विषमाक्षः-विषम नेत्रवाले,
८६१ विशालाक्षः-बड़े-बड़े नेत्रवाले, ८६२ बृषदो वृषवर्धनः--
घर्मका दान ओर वृद्धि करनेवाले || ११२॥
निर्ममोी. निरहंकारी निर्मोहो निरुपद्रवः ।
दपहा दर्षदो दृप्तः सवतुपरिवतंकः ॥ ११३॥
८६३ निर्ममः-ममतारहित, «६४ निरहंकारः-अहंकार-
शून्य, ८६७ निर्मोहः-मोहशून्य। ८६६ निरुपद्धवः-उपद्रव या
उत्पातसे दूर, <६७ दर्पह्या दपंदः-दर्पषका हनन और खण्डन
करनेवाले, ८६८ दृप्त:-स्वाभिमानी, ८६९ स्ेतुपरिवतंकः-
समस्त ऋत॒ओंको बदलते रहनेवाले |) ११३ ॥
सहस्नजित् सहस्वार्चिः सिनिग्धप्रक्रतिदक्षिण: ।
भुतसत्यसवन्नाथ: अभी भूतिनाशनः ॥ ११४ ॥
सहलजित्-सहल्लोपर विजय पानेवाले,
सहलाचि:-सहसों किरणोंसि प्रकाशमान सूर्यरूप,
८७२ स्निग्धप्रक्ठधतिदक्षिण:-स्नेहयुक्त, स्वभाववाले तथा
उदार <०३२ भूुतभब्यन्वन्नाथ:-नूत, भविष्य और
वतमानकै स्वामी, ८७४ प्रभवः-सवक्ौ उत्पत्तिके कारण;
८७७ नूतिनाशनः-हुप्टके ऐश्वयका नाश करनेवाले ॥ ११४)
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“७१
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने +#
च्ु्चखच्स््ओओओओओं्श्खश्ल््ल््््य्य्य्य्थ्य्मस्य्न्स्म्य्न्य्य्य्य्य्सय्य्य्ययय्यलचचििलि]सट--ेेे।ै।हफह«२₹ं। च पता पपहकन"पेदममा- यान दआन- राम पर
[ संश्षिप्त-शिवपुराणा
अथॉ5नर्थां महाकोशः परकार्यैंकपण्डित:।
निष्कण्टकः कृतानन्दो निब्याजों व्याजमर्दनः ॥ ११५
८७६ अथोः-परमपुरुषा थरूप, ८७७ अनर्थः-प्रयोजर
रहित, ८७८ महाकोशः-अनन्त घनराशिके स्वामी
८७९ परकार्येकपण्डितः-पराये कार्यको सिद्ध करनेकी कला
एकमात्र. विद्धान: निष्कण्टकः-कण्टकरहित
८८१ क्ृतानन्दः-नित्यसिद्ध आनन्दस्वरूप, ८८२ निव्योज
व्याजमदनः-स्वयं कपटरहित होकर दूसरेके कपदक
नष्ट करनेवाले ॥ ११५ ॥ द
सस्ववान्सात्विकः सत्यकीर्ति: स्नेहक्नतागमः ।
अकम्पितो गुणग्राही नेकात्मा नेककर्मकझत् ॥११६।
८८५०
८८३ सच्ववान-सत्त्वगुणसे युक्त, ८८४ सात्तिकः-सत्त
निष्ठ, ८८५ सत्यकीर्ति:-सत्यकीर्तिवाले, ८८६ स्नेहक्ृतागमः-
जीवोंके प्रति स्नेहके कारण विभिन्न आगमगमोंको प्रकाशमें छाने:
वाले, 4८७ अकम्पितः-सुस्थिर, ८<« गुणग्राही-गुणोंका
आदर करनेवाले, ८८५ नेकात्मा नेककर्मकझत्--अनेकरूप होकर
अनेक प्रकारके कर्म करनेवाले || ११६ ॥
सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः सुकरो द्क्षिणानिकरः ।
नन्दिस्कन्धघधरो घु्यः अकटः ग्रीतिवधनः ॥११७॥
८९० सुप्रीतः-अत्यन्त प्रसन्न) <९१ सुझुखः-झुत्दर
मुखवाले, ८९२ सूक्ष्म-स्थूलभावसे रहित, <९३ सुकरः-
सुन्दर दाथवाले, ८९४ दक्षिणानिलः-मलयानिलके समान
सुखद, ८९५ नल्दिस्कन्धधरः-नन्दीकी पीठपर सवार होने-
वाले, ८९६ छुर्यः-उत्तरदायित्वका भार वहन करनेमें समय)
८९७ प्रकटः-भक्तोंके सामने प्रकट होनेवाले अथवा शानियक्ि
सामने नित्य प्रकट, ८९८ प्रीतिवर्धनः-ग्रेम बढ़ानेवाले || १ १७
अपराजितः सर्वसत्वों गोविन्दः सत्त्ववाहनः ।
अछतः खध्॒तः सिद्ध: पूतमूर्तियंशोधनः ॥११४॥
८९५९ अपराजितः-किसीसे परास्त न होनेवाले। ९००
सबंसस्वः-सम्पूर्ण सत्त्वगुणके आश्रय अथवा समस्त प्राणियोंकी
उत्पक्तिके हेतु, ९०१ गोविन्द:-गोलेककी प्राप्ति कर्ेत्राठ
९०२ सस्ववाहनः-सत्त्वस्वरूप धर्ममय व्ृप्भसे वाहनका कीं
लेनेवाले, ९०३ अछ्टतः-आधाररदित, ९०४ स्वष्ठता-आवे
आपमें ही खित, ९०७ सिद्धः-नित्यसिद्ध। ९०६ पृतमूतिः-
पवित्र दरीरबाले; ९०७ यद्योधनः-सुयशके धनी | ११८ ॥
वठबानेकनायकः ।
श्रुतिमानेकवन्धुरनेकक्रत् ॥ +
वाराहशःज्ष्टव्छठ्री
श्रुतिप्रकाश:
"इक...
शोटिस्संदिता ]
९०८ वाराहम्श्ञशक्छुज्ी-वाराहको मारकर उसके दाढ़-
रुपी शक्ञोंकी धारण करनेके कारण श्रद्धी नामसे प्रसिद्ध
९०९ बलवान-शक्तिशाली। ९१० एकनायक: -अद्वितीय नेता:
९११ श्रुतिप्रकाश ,-वेदोंकों प्रकाशित करनेवाले) ९१२ श्ुति-
मानू-वेदशनसे सम्मत्न। ९१३. एुकवत्: :-सबके एकमात्र
सहायक, ९१४ अनेकक्ृत-अनेकः प्रकारके पदार्थोकी सृष्टि
करनेवाले ॥ ११९ ॥
प्रीवत्सलशिवारम्भः शान्तभद्रः समी यशः।
भूशयो. भूषणो भूतिसुतकृद्सूतभावनः ॥३२०॥
९१५ श्रीवत्सरुक्षिवारम्भः-श्रीवत्सधारी विष्णुके लिये
मइलकारी, ९१६ शान्तमद्रः-शान्त एवं मझुलछरूप, ९१७
पमः-सर्वत्र॒ समभाव रखनेवाले, ९१८ यशः-यशखरूप;
९१९ भृशयः-उथ्वीपर शयन करनेवाले; ९२० भूषणः--
सबको विभूषित करनेवाले; ९२१ भूतिः-कल्याणखरूप, ६२२
भूतकृत-प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले, ९२३ भूतसावनः--
भूतेंकि उद्यादक || १२० ॥
भकस्पो भक्तिकायस्तु कालहा नीललोहितः ।
सत्यप्नतमहात्यागी नित्यशान्तिपरायण: ॥१२१॥
९२४ जकम्प:-कम्तित न होनेवाले, ९२५ भक्तिकायः-
मक्तिखहूप, ९२६ कारृहा-कालनाशक) ९२७ नीलछोहितः-
नीढ और छोहित वर्णवाले, ९१८ सत्यत्नतमहात्यागी-संत्य-
क़पादे एवं महान् त्यागी, ९२९ नित्यशान्तिपरायणः-
गेज्तर शान्त || १२१ ॥ ु
पराथवृत्तिचंतीं. विरक्तस्तु विशारदः ।
शुभदः शुभकतों व झुसनासा झुभः खवयम् ॥१२२॥
क् हि पिश्त पराथबृत्तिवेरद “परोपकाखती एवं अभीष्ट वरदाता;
। चैराग्यवान्) ९३२ विशारदः-विश्ञानवान/
'
९३२३ शरद: ५ शक करनेवाले
' शुभरः शुभकर्ता-शुभ- देने ओर करनेवाले, ९३४.
शुननाम्ा शप्नः खयम-सवयं होनेके
कर शुभ: खयम-खय॑ शुमखरूप होनेके कारण शुभ-
है दा | १२२ |
: है। नली
, जल : साक्षी ह्वकतों कनकप्रभः ।
मि घ् क्री प्यस्थ $ शत्रुध्नो
2; भद्ठी सध्यस्थः शतन्रुध्तो विध्चनाशनः ॥१२३॥
2... १३५ अनर्धितः ५
हम पक “याचनारहित, ५३६ अगुणः-निगुणः
४ 3 2
ब३ ७४७. शी एवं कतृत्वरहित, ९३५८ कनक-
(ा ग्पप् उपमान कान्तिमान्। ९३९ खमावभद्रः-खमावतः
! 5३९ सुध्यस्थ-उद्गासीन, ९४१ शप्ुध्तः-
४ भगवान विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्रनाम-स्तोत्र #
गेब्खयसदिता सा न्नननननननननरनर-नर्नननऋनननगनगनऋननननननननरननननन तन त_ विफल लए
३८९
शतन्रुनाशक, ९४२ विध्ननाशनः-विष्नोंका निवारण करने-
बाले [| १२३ ॥
शिखण्डी कवची झूली जटी मुण्डी च कुण्डली ।
अस्त्यु:.. स्वेदकसिंहस्तेजोराशिमेहामणि: ॥१२४॥
०४३ शिखण्डी कवची झूलछी-मोरपंख, कवच और त्रिशूछ
धारण करनेवाले, ९४४ जटी मुण्डी कुण्डली-जट) मण्डमाल
और कवच धारण करनेवाले) ९४५ अदुत्यु:-रुत्युरहित:
९४ ६ सर्हकसिंहः-सर्वशोर्मे श्र ९४७ तेजोराशिमहामणिः-
तेज:पुञ्ञ महामणि कोस्ठ॒भादिरूप ॥ १२४ ॥
असंख्येयो5प्रमेयाव्मा वीर्यवान् चीयकोविदः ।
वेह्स्चैव.. वियोगात्मा. परावरमुनीखरः ॥१२५॥
९४८ असंण्येयो5प्रभियात्मा-अछजय नम) रूप और
गुणोंसे युक्त होनेके कारण किसीके द्वारा मापे न जा सकनेवालि,
०४५९ वीरग॑वान चीयकोविदः-पराक्रमी एज पराक्रमके शाता;
९०० वेथः-जाननेयोग्य, ९७५१ वियोगात्मा-दीर्घकाल्तक
सतीके वियोगमें अथवा विशिष्ट योगकी साधनामें संलग्न हुए
भनवाले, ९५२ परावरसुनीखरः-भूत और भविष्यके शाता
मुनीश्वर्रूप || १२५ ॥।
अनुत्तमोी. दुराधर्षो मधुरप्रियद्शनः ।
सुरेशः शरणं सबबः शब्दन्क्ष सता गतिः ॥१२६ ॥
५७५३ अनुत्तमो दुराधर्ष:-सर्वोत्तम एवं हुजेंग। ९५४
मधुरप्रियद्शनः-जिनका दर्शन मनोहर एवं प्रिय छूगता है;
ऐसे, ९५५८ सुरेशः-देवताओंके $श्व ९५६ शरणस--आश्रय-
दाता; ९१५७ सर्व:-सर्वखरूप, ९५८ शब्दत्ह्म स्वॉगतिः--
प्रणवरूप तथा सत्पुरुषोंके आश्रय | १२६ ॥
कारूपक्ष:. केलिकालः कडझ्ृणीकृतवासुकिः ।
महेष्वासों महीभतों निष्कलक्ी विश्वड्डुछः ॥१२७॥
«७५९. कारपक्षः-काल जिनका सहायक हैः ऐसे)
५६० कालकालः-कालके भी काल) ९६१ कक्ृणीकृतवासुक्तिः-
बासुक्ि नागको अपने हाथमें कंगनके समान धारण करनेवाले,
०६२ महेष्वासः-महाधनुर्धर ९६३ मही भर्ता-दृथ्वीपाल्क;
९६४ निष्कलह्ू:-कैलकशन्य, ५६६७५ विश्यद्लुलः-बन्धन-
रहित ॥ १२७ ॥
चुमणिस्तरगिधेन्यः घिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।
चिहवत्तः संद्बतः स्तुत्यो ब्यूदोरस्को महाभुजअः ॥4२८॥
९६६ द्युमणिख्तरणिः-आका शर्म मणिक्के समान प्रकाश:
विमिमिनिनिमनकन लक लीक. ु॒॒इआासिसााइकइुकशयकमभाकम कम का |
न ननननननी आती कननरीनी नननीयननना नली नी कमल जि +*
मान तथा भक्तोंको भवसागरसे तारनेके लिये नोकारूप सूये
९६७ धघन्यः-कृतकृत्य+ ९६८ सिद्धिदः सिद्धिलाधनः-
सिद्धिदाता ओर सिद्धिके साधक, ९६५ विश्वतः संबरतः-
सब ओरसे मायाद्वारा आवुत, ९७० सतुत्यः-स्तुतिके योग्य,
५७१ व्यूढोरस्कः-चोड़ी छातीवाले, ५७२ महाअुजः-बड़ी
बाँहवाले || १२८ ॥
ही अंग नि निशतली नरनारायणग्रियः ।
निर्लपो निष्प्रपल्चात्मा निव्यज्ी व्यक्ञनाशनः ॥१२९॥
९७३ सर्वयोनिः-सबकी उत्पत्तिके स्थान;
५७४ निरातड्ृ:-निर्भय/, ९७५ नरनारायणग्रियः-नर-नारायंणके
प्रेमी अथवा प्रिययम, ९७६ निलछपी निष्म्रपदञ्चात्मा-दोष-
सम्पकंसे रहित तथा जगत्-प्रपश्नसे अतीत संवरूपवाले,
९७७ निव्यज्धः:-विशिष्ट अज्गभवाले प्राणियोंके प्राकट्यमे हेतु)
९७८ व्यद्शनाशनः-यज्ञादि कमोर्मे होनेवाले अड्गवेगुण्यका
नाश करनेवाले || १२९ ॥ ह
स्तव्यः स्तवश्रियः स्तोता व्यासमूर्दिनिरद्ुुदः ।
निरवचद्यसयोपायो. विद्याराद्ी रसप्रियः ॥१३०॥
९७५ स्तब्यः-स्तुतिके योग्य, ९८० स्तवग्रियः-स्तुतिके
प्रेमी, ९८१ स्तीता-स्तुति करनेवाले, ९८२ व्यासमूर्तिः--
व्यासखरूप,.. ९८३. निरह्ुशः-अछ्भुशरद्ति-स्वतन्त्र,
१८४ निरवच्यमयोपायः-मोक्षप्राप्तिकि निर्दोष उपायरूप)
५९८५ विद्याराशिः-विंद्याओंके सागर ९८६ रसमग्रिय:-
व्रह्मानन्द्रसके प्रेमी || १३० ॥
ग्रदान्तवुद्धिरक्षुण्ण. संग्रही नित्यसुन्द्रः ।
वेयाघ्रधुर्यों धान्नीशः शाकल्यः शवरीपतिः ॥१३१॥
"०८७ प्रशान्तबुद्धिः-शान्त बुद्धिवाले, ९८८ अक्षुण्ण:-
क्षोभ या नाशंसे रहित, ९८५ संग्रही-भक्तोंका संग्रह करने-
वाले; ९९० नित्यसुन्दरः-सतत मनोहर, ५९१ वैयांघ्धुर्ग:-
व्याप्रचर्मधारी, ६५९२. धात्रीश्ः-अ्ह्लाजीके स्वामी)
९९३ शाकल्य;-शाकल्यकऋ्रिहप, ९९४ शवरीपति:--
सत्रिके स्वामी चन्द्रमाषप || १३१ ॥
परमार्थंगुरुदेत्तः सूरिराश्चितवत्सलः ।
लोसमो रसज्ञों रसदः सवसच्चावलम्बनः ॥१३२॥
०९९० परमार्थगुरईतः सूरिः-परमाथंतत्वका उपदेश देनेवाले
शानी शुरू दत्ता्रेयल्प, ९९६ आश्वितवत्सर्:-शरणागतोपर
दया करनेवाले, ६०७ सोमः-डउग़ासद्वितः ५९८ रसजः--
# नमो रुद्गाय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संश्षिप्त-शिवपुराणाडू
भक्तिरसके ज्ञाता) ९९९ रसदः-अ्रेमरस प्रदान करनेवाले, |
१००० सर्वेसस्वावरूम्बनः-समस्त प्राणियोंकी सहारा
देनेवाले || १३२ ॥
इस प्रकार श्रीहरि प्रतिदिन सहस्त नामोंद्रार भगवान्
शिवकी स्त॒ृति, सहल्ल कमलोंद्वारा उनका पूजन एवं प्रार्थना '
किया करते थे | एक दिन भगवान् शिवकी लीलासे एक
कमल. कम हो जानेपर भगवान् विष्णुने अपना कमलोपम
नेत्र ही चढ़ा दिया | इस तरह उनसे पूजित एवं प्रसन्न हो
शिवने उन्हें चक्र दिया और इस प्रकार कहा--हरे ! सब
प्रकारके अनथोंकी शान्तिके लिये तुम्हें मेरे स्वरूपका ध्यान
करना चाहिये । अनेकानेक दुःखोंका नाश करनेके लिये इस
सहखनामका पाठ करते रहना चाहिये तथा समस्त मनोरथों-
की सिद्धिके लिये सदा मेरे इस चक्रकों प्रयत्मपूवक धारण
करना चाहिये, यह सभी चक्रोमें उत्तम है | दूसरे भी जो
छोग प्रतिदिन इस सहखनामका पाठ करेंगे या करायेंगे
उन्हें स्वप्नमें मी कोई दुःख नहीं प्राप्त होगा। राजाओंक|
ओरसे संकट प्राप्त होनेपर यदि मनुष्य साज्ेपाक़्न विधिपू्वक
इस सहख्नाम-स्तोन्रका सौ बार पाठ करे तो निश्चय हे
कल्याणका भागी दह्वोता है । यह उत्तम स्तोत्र रोगका नगर)
विद्या और धन देनेवात्य/ समूर्ण अमीश्टकी प्राति कराने
बाला) पुण्यजनक तथा सदा ही शिवभक्ति देनेवाला है| जि
फलके उद्देश्यसे मनुष्य यहाँ इस श्रेष्ठ स्तोत्रका पाठ करेंगे।
उसे निस्संदेह प्राप्त कर छेंगे | जो प्रतिदिन सबेरे उठकर
मेरी पूजाके पश्चात् मेरे सामने इसका पांठ करता हैः सिद्धि
उससे दूर नहीं रहती । उसे इस छोकमें सम्पूर्ण अभीश्को
देनेवाली सिद्धि पूर्णतया प्राप्त होती है और अन्तमें वह बाज
मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है ।
सूतजी कहते हँ--मुनीश्वरो ! ऐसा कहकर स्वदेवेशर
भगवान् रुद्र श्रीहरिके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गी |
भगवान् विष्णु भी शंकरजीके वचनसे तथा उस गुम चक्रती
पा जानेसे मन-द्वीमन बड़े प्रसन्न हुए | फिए हे
प्रतिदिन शम्मुके ध्यानपूर्वक इस स्तीत्रका पाठ करने
लगे । उन्दोंने अपने भक्तोंकों भी इसका उपदेश हा ;
तुम्हारे प्रशनके अनुसार मगने यह प्रसन्न स॒तायों कै
श्रोताओंके पापको इर लेनेवाला है। अब और क्या हीं
चादते द्वो ? ( अथाव रे5ह ।
००--०-२०-ह९)-३-७७-३:-०--९
न्डिःःः़ररःः्ः!/।स:च।सअ2टआटयटयथथखआथअआणआण़?़ओ़चख चख चश् यश वश च आखच-अआआसख्खखिडिआिि आल
2७्७णाणशाणाााआाजा आर आशा न सी मरी मी 3 मम मी मन दी मर मोम बी मम नीलम वन्य, परयअमर अकाामा
भगवान् शिवकों संतुष्ट करनेवाले त्रतोंका वर्णन, शिवरात्रि-व्॒तकी विधि एवं महिमाका कथन
तदनन्तर ऋषियोंके पूछनेपर सूतजीने शिवजीकी आराधना-
के द्वारा उत्तम एवं मनोवाड्छित फल प्राप्त करनेवाले बहुत-से
महान छी-पुरुषेके नाम बताये । इसके बाद ऋषियोंने फिर
एछा--व्यासशिष्य ! किस ब्तसे संतुष्ट होकर भगवान् शिव
उत्तम सुख प्रदान करते हैं. ! जिस ब्रतके अनुष्ठानसे भक्तजनों-
को भोग ओर मोक्षकी प्राप्ति हो सके, उसका आप विशेषरूपसे
. बेन कीजिये | |
सूतजीने कहा--महर्षियो ! तुमने जो कुछ पूछा है;
वहीं वात किसी समय ब्रह्मा, विष्णु तथा पाबेतीजीने भगवान्
शिवसे पूछी थी | इसके उत्तरमें शिवजीने जो कुछ कह, . वह
में तुमलोगोंको बता रहा हूँ।
भगवान् शिव बोले--+ेरे वहुतससे व्रत हैं, जो भोग
ओर मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं | उनमें मुख्य दस व्रत हैं;
जिन्हें जावालश्रुतिके विद्वान् “दशा शैवत्रत? कहते हैं । द्विजोंको
पद यक्षपूवंक इन ब्रतोंका पालन करना चाहिये । हरे ! प्रत्येक
.. भहमीको केवल रातमें ही भोजन करे । विशेषतः कृष्णपक्षकी
अश्मीकी भोजनका स्वथा त्याग कर दे । झुक्तुपक्षकी एकादशी-
जे भी भोजन छोड़ दे । किंतु ऋृष्णपक्षकी एकादशीको रातमें
पेत पूजन करनेके पश्चात् भोजन किया जा सकता है । शज्ल-
पक्ी त्रयोदशीको तो रातमें भोजन करना चाहिये; परंतु
रैणपक्षकी चतुदंशीकों शिवव्रतधारी पुरुषोंके हिये भोजनका
सवा निषेध है । दोनों पक्षोमें प्रत्येक सोमवारको प्रयत्मपूर्वक
जल रातमें ही भोजन करना चाहिये | शिवके श्रतमें तत्पर
जलवा लेगेंकि लिये यह अनिवार्य नियम है | इन सभी
मोम बतकी पू्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्त
ये भोजन कराना चाहिये | द्विजोंकी इन सब ब्तोंका
, मत पालन करना चाहिये । जो द्विज इनका त्याग करते
; के चोर हेते हैँ । मुक्तिमार्गमें प्रवीण पुरुषोंको मोक्षकी
३३ सह चार ब्रतोंका नियमपूर्वक पालन करना
। पा *' | पे चार अत इस प्रकार हैं---भगवान् शिवकी- पूजा;
; पे _ जप, शिवमन्दिरमें उपवास तथा काझीमें मरण ।
;/ हा मार्ग हैं | सोमवारकी अष्टमी और कृष्णपक्ष-
कर जप दो तिथियोंको उपवासपूर्वक शत खा
१ अपप तक लव संतुष्ट करनेवाला होता है; इसमें
0 आवश्यकता नहीं है ।
५ । इन चारोमिं भी शिवरानिका द्रत ही सबसे अधिक
बलवान है । इसलिये भोग ओर मभोक्षरूपी फलकी इच्छा
रखनेवाले छोगोंकों मुख्यतः उसीका पालन करना चाहिये | इस
ब्रतकों छोड़कर दूसरा कोई मनुष्योंके लिये हितकारक ब्रत
नहीं है। यह न्रत सबके लिये धर्मका उत्तम साधन है ।
निष्काम अथवा सकास भाव रखनेवाले सभी मनुष्यों, वर्णों,
आश्रमों; स्वियों, बालकों, दासों, दासियों तथा देवता आदि
सभी >> आक लिये यह श्रेष्ठ अत हितकारक बताया
गया हैं ।
माघमासके कृष्णपक्षमें शिवरात्रि तिथिका विरोष माहात्म्य
बताया गया हे | जिस दिन आधी रातके समयतक वह तिथि
विद्यमान ही; उसी दिन उसे ब्रतके लिये ग्रहण करना चाहिये ।
शिवरात्रि करोड़ों हत्याओंके पापका नाश करनेवाली है ।
केशव |! उस दिन सबेरेसे लेकर जो काय करना आवश्यक
है, उसे प्रसत्नतापूषक तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर
सुनो । बुद्धिमान पुरुष सबेरे उठकर बढ़े आनन्दके साथ स्नान
आदि नित्य कर्म करे |) आल्स्यको पास न आने दे | फिर
शिवालयमें जाकर शिवछिज्गका विधिवत् पूजन करके मुझ
शिवको नमस्कार करनेके पश्चात् उत्तम रीतिसे संकल्प करे---
संकटप
देवदेव मद्दादेव नीलकण्ड नमो5स्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यई देव. शिवरात्रित्रत॑ तब ॥
तव प्रभावादेवेश ! भिविध्नेन भवेदिति।
कामादाः शात्रवों मां वे पीडां कुर्वन्तु नेव हि ॥
“देवदेव ! महादेव ! नीलडकण्ठ |! आपको नमस्कार हे |
देव ! में आपके शिवरात्रि-्रतका अनुष्ठान करना चाहता हूँ ।
देवेशवर ! आपके प्रभावसे यह ब्रत बिना किसी विध्न-बाधाके
पूर्ण हो ओर काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें ।?
ऐसा संकल्प करके पूजन-सामग्रीका संग्रह करे ओर
उत्तम स्थानमें जो शाञ्अप्रसिद्ध शिवलछिज्ञ हो, उसके पास
रातमें जाकर खय॑ं उत्तम विधि-विधानका सम्यादन करे। फिर
शिवके दक्षिण या पश्चिम भागमें सुन्दर खानपर उनके निकट
2 न 3
१. शुड्पक्षसे मासका आरम्भ मानसेसे फाल्युन मासकी छृष्य
बयोदशी माध मासकी कही गयी दे । जहाँ झृष्णपक्षसे मातका
आरम्भ मानते हैं, उनके भतुतार यहाँ मादा अर्थ फाब्णुन
समझना चाहिये ।
२८४
ही पूजाके लिये संचित सामग्रीको रक्खे । तदनन्तर श्रेष्ठ पुरुष
वहाँ फिर स्नान करे | स्नानके बाद सुन्दर वस्त्र ओर उपवस्त
धारण करके तीन बार आचमन करनेके पश्चात् पूजन आरम्भ
करे | जिस मन्त्रके लिये जो द्रव्य नियत हो, उस मन्त्रको
पढ़कर उसी द्रब्यके द्वारा पूजा करनी चाहिये | बिना मन्त्रके
महादेवजीकी पूजा नहीं करनी चाहिये | गीत) वाद्य, दृत्य
आदिके साथ भक्तिभावसे सम्पन्न हो रात्रिके प्रथम पहरमें
पूजन करके विद्वान् पुरुष मन्त्रका " जप करे । यदि मन्न्रज्ञ
पुरुष उस समय श्रेष्ठ पाथिव लिड्रका निर्माण करे तो नित्य-
कमे करनेके पश्चात् पार्थिव लिज्ञका ही पूजन करे । पहले
पाथिव बनाकर पीछे उसकी विधिवत् स्थापना करे | फिर
पूजनके पश्चात् नाना प्रकारके स्तोन्नोंद्वारा भगवान् वृषभध्वजको
रुंतुष्ठ करे । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समय
शिवरात्रि-बतके माहात्म्यका पाठ करे | श्रेष्ठ भक्त अपने ब्रतकी
पूर्तिकि लिये उस माहात्म्यको श्रद्धापूवंक सुने । रात्रिके चारों
पहरोंमें चार पार्थिव लिज्ञोंका निर्माण करके आवाहनसे लेकर
विसर्जनतक क्रमशः उनकी पूजा करे ओर बड़े उत्सवके साथ
प्रसन्नतापूर्वक जागरण करे । प्रातःकालू स्नान करके पुनः
बढ०ँ पार्थिव शिवका स्थापन और पूजन करे | इस तरह ब्रत-
को पूरा करके हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर वारंबार नमस्कार-
पूर्वक भगवान् शम्पुसे इस प्रकार प्रार्थना करे ।
प्राथना एवं विसजन
नियमो यो महादेव क्तश्रेव त्वदाज्ञया।
विसृज्यते मया स्वामिन् चत्रतं॑ जातमनुत्तमम् ॥
चग्रतेनानेन. देचेश यथाशक्तिकृतेन. ख।
संतुट्रो भव दार्वाद्य कृपाँ कुक ममोपरि ॥
धमहादेव | आपकी आज्ञासे मेने जो ब्रत ग्रहण किया था;
स्वामिन् | वह परम उत्तम त्रत पूर्ण हो गया ! अतः अब
उसका विसजन करता हैँ | देवेश्वर शर्व | यथाशक्ति किये
गये इस त्रतसे आप आज मुझपर कृपा करके संतुष्ट हों |?
तसश्चात् शिवको पुष्पान्नक्कति समर्पित करके विधिपूर्वक
दान दे । फिर शिवको नमस्कार करके ब्रतसम्बन्धी नियमका
विसर्जन कर दे | अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्त ब्राह्मणों;
विशेषतः संन्यासियोंकों भोजन कराकर पूर्णतया संतुष्ट करके
स्वयं भी भोजन करे |
हरे | शिवरात्रिकों प्रत्येक प्रहरर्म श्रेष्ठ शिवभक्तोंको जिस
प्रकार विशेष पृज्ञा करनी चाहिये, उसे में बताता हूँ; सुनो |
प्रथम प्रदरमें पार्थिव छिड्ठकी खवापना करके अनेक सुन्दर
% नमों रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
| संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
न्च्स्य्स्स्स्य््स्य््ख््य््स्स्स्म्य्य्य्य्य्य्य्य्स्स्य््स्य्स्स्य्य्य्स्स्य्स्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्स्स्य्य्य्य्य्य्य्क्ॉजःः:ः::ःः न्7१न्ःन्रःःा:-::: स्का.
उपचारोंद्वारा उत्तम मक्तिभावसे पूजा करे | पहले गन्ध, पुण
आदि पॉँच द्रव्योंद्रारा सदा महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये |
उस-उस द्र॒व्यसे सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रका उच्चारण करके
उ्रथक-प्रथक वह द्वव्य समर्पित करे | इस प्रकार द्र॒व्य-सम्पणके
पश्चात् भगवान् शिवकों जलधारा अपिंत करे | विद्वान् पुरुष
चढ़े हुए द्र॒व्योक्रो जलधारासे ही उतारे | जल्धाराक्े साध-
साथ एक सो आठ मन्त्रका जप करके वहाँ निर्गुण-सगुणर्
शिवका पूजन करे | गुरुसे प्राप्त हुए मन्त्रद्वारा भगवान् शिव-
की पूजा करे | अन्यथा नाममन्त्रद्वारा सदाशिवका पूजन करा
चाहिये । विचित्र चन्दन, अखण्ड चावल और काले तिलोंपे
परमात्मा शिवकी पूजा करनी चाहिये | कमल और कमेरके
फूल चढ़ाने चाहिये | आठ नाममन्त्रोंद्रार शंकरजीको पुण
समर्पित करे | वे आठ नाम इस प्रकार हैं--भव, शव रद
पश्ुपति, उग्र, महान$ भीम और ईशान | इनके आसरमभमें श्र
ओर अन्तमें चत॒र्थी विभक्ति जोड़कर “श्रीमवाय नमः? इत्यादि
माममन्त्रोंद्यारा शिवका पूजन करे । पुष्प-समपेणके पश्चात्
धूप, दीप ओर नेवेद्य निवेदन करे | पहले प्रहरमें विद्वान
पुरुष नेवेद्यके लिये पकवान बनवा ले । फिर श्रीफल्युकत
विशेषाध्य॑ देकर ताम्बूल समर्पित करे | तदनन्तर नमस्कार
ओर ध्यान करके गुरुके दिये हुए! मन्त्रका जप करे | गुरद
मन्त्र न हो तो पद्चाक्षर ( नमः शिवाय ) मन्त्रके जपसे भगवा
शंकरको संतुष्ट करे? घेनमुद्रा दिखाकर उत्तम जहसे तप
करे | पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार पाँच ब्राह्मगोंकों भोज
करानेका संकल्प करे | फिर जबतक पहला प्रहर पूरा ते :
जाय, तबतक महान उत्सव करता रहे |
१. धेनुम॒द्राका लक्षण इस प्रकार दै---
वामाजुलीनां मध्येघु दक्षिणानुल्किसथा ।
संयोज्य तज्जनी दकषा मध्यमानामयास्तथा ॥
दक्षमध्यमयोवामां तर्जनी च. नियोजयैद |
वामयानामया. दक्षकनिष्ठा च. नियोजयेव ॥
दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेद ।
विहिताधोमुखी चैपा. पेनुसुद्रा. अवीर्तिता ॥
ध्वार्यें हथकी अँगलियोंके वीचमें दाहिने दायका अँगलियोंक।
संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमार्में. छगाये । दादिनि
हाथकी मध्यमार्मे वायेँ हाथकी तजनीका मिलावे । फिर
द्वाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दा
हाथकी अनामिकाके साथ वारयें हयथकी कनिष्ठिकाका संयु्क
फिर इन सबका मुख नीचेकी ओर करे । यहां बेनुमुद्रा हें
गया ड्ट !!
कोटिरुद्रसंहिता |
दूसरा प्रहर आरम्भ होनेपर पुनः पूजनके लिये संकल्प
करे | अथवा एक ही समय. चारों प्रहरोंके लिये संकल्प करके
पहले प्रहर्की भाँति पूजा करता रहे | पहले पूर्वोक्त द्वव्योसे
पूजन करके फिर जलघारा समर्पित करे । प्रथम प्रहरकी अपेक्षा
दुगुने मन्त्रोका जप करके शिवकी पूजा करे। पूर्वोक्त तिल,
जौतथा कमल-पुष्पोसे शिवकी अचेना करे | विशेषतः विल्वपत्रेसे
परमेश्वर शिवकां पूजन करना चाहिये । दूसरे प्रहरमें ब्रिजोरा
नीबूके साथ अध्य देकर खीरका नेवेद्य निवेदन करे | जनाद॑न !
इसमें पहलेकी अपेक्षा मन्त्रोंकी दुगुनी आवत्ति करनी चाहिये ।
फिर ब्राक्षणोंकी भोजन करानेका संकल्प करे | शेष सब बातें
पहलेकी ही भाँति तबतक करता रहे, जवतक दूसरा प्रहर पूरा
न हो जाय । तीसरे प्रहरके आनेपर पूजन तो पहलेके समान
. ही करे; किंतु जोके खानमें गेहूँका उपयोग करे और आकके
पूछ चढ़ाये | उसके वाद नाना प्रकारके घूष एवं दीप देकर
पूएका नवेद्य भोग छगाये | उसके साथ भाति-भातिके शक
भी अपित करे । इस प्रकार पूजन करके कपूरसे आरती उतारे |
अनारके फलके साथ अर्ध्य दे और दूसरे प्रहरकी अपेक्षा दुगुना
मनत्र-जप करे। तदनन्तर दक्षिणासहित ब्राह्मण-मोजनका
संकल्प करे और तीसरे प्रहस्के पूरे होनेतक पूर्बवत्
उत्सव करता रहे | चौथा प्रहर आनेपर तीसरे प्रहरकी
का विसजन कर दे | पुनः आवाहन आदि करके विधिवत्
जा करे। उड़द, कैंगनी, मूँग, सप्तथान्य, शह्ढीपुप्प तथा
वैलपन्रोंसे परमेश्वर शंकरका पूजन करें | उस -प्रहरमें भाँति-
भेतिकी प्रिठाइयोंका नैवेय छगाये अथवा उड्दके बड़े आदि
नाक उनके द्वारा सदाशिवकों संतुष्ट करे | केलेके फलके
पथ अथवा अन्य विविध फरलेंके साथ शिवकों अर्ध्य दे ।
तीसरे प्रहरकी अपेक्षा दूना मन्त्र-जप करे और यथाशक्ति
“ण-भोजनका संकल्प करे | गीत; वाद्य तथा दृत्यसे शिवकी
>यपनापूपक समय बिताये । भक्तजर्नोंको तबतक महान
फरते रहना चाहिये, जबतक अरुणोदय न हो जाय ।
भब्णोदय होनेपर पुनः स्नान करके सॉति-भाँतिके पूजनोपचारों
बे अ+४*स शिवकी अचना करे | ततल्वश्रात् अपना
! नाना प्रकारके दान दे और ग्रहरकी तंख्याके
"अर बहणों तथा संन्यासियोंकी अनेक प्रकारके भोज्य
ष्घ का भोजन कराये | फिर शंकरको नमस्कार करके
९ वुद्धामान् पुरेष उत्तम स्तुति करके निम्ना-
फैन मनन प्रायना केरें--.-
# शिवरात्रि-बतकी विधि एवं महिमाका कथन #%
वा मम ३७५५+ ७५ माह भया/2 का भा मम ह/2० (७०३३५ «गवाह 9 ॥धा गए पन्ा्नाक नम नाय॒२७७+ नानक कमान नया # ५७ मप्र पार रा म>-ह >> 3 नम फना9+ब.-७+५++- नम +न३+ मनन ५५०५० ++3++->नकन+-+3+-+न+-3++७+५+नज-+3+-+-मर कम ७३» फाक -पा-.४५+-ब०>++२++++नन नमन -ननानावपक न पक न+ ०२ न+ 3 ना+4++ 3 +3->आक
२०303: फतरनप७+तरभपुमपाअमभ अभय परम कमममग १ हि ५ +जनफ मम प रन पे पक नमन» मे आर मम पर कप पालन पान कप न परम कप नाक पान मनननम पनीर पानन- नमन नमन मनन नमन बनना करनना फनी पन नी भी चल ली िचििच्चिलििन्ी अ ं डिसबइ कॉक्नससडघय:यओ:चयचओलण::स लक
४४७७४७७७७७७७४/७एतााां भांग ता पक मलबे ं अआाा आम 0०३ आए
तावकस्त्वद्वतग्राणस्व्वचित्तोडहू सदा झड़ !
कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्य तथा कुरु ॥
. अज्ञानाथदि वा ज्ञानाजपपूजादिक सया।
कृपानिधित्वाज्कात्वेव. भूतनाथ प्रसीद॒ मे ॥
अनेनेवोपवासेन. यज्ञात॑ फलमेव च।
तेनेव प्रीय्तां देवः झंकरः सुखदायकः ॥
कुके मम महादेव भजन तेडस्तु सबदा।
माभुत्तस्य कुके जन्म यत्र त्वं नहि देवता ॥
'सुखदायक कृपानिधान शिव ! में आपका हूँ | मेरे प्राण
आपमें ही छगे हैं ओर मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन
करता है। यह जानकर आप जसा उचित समझें, वसा करें |
भूतनाथ | मैंने जानकर या अनजानमें जो जप और पूजन
आदि किया है, उसे समझकर दयःसागर होनेके नाते ही आप
मुझपर प्रसन्न हों | इस उपवास-ब्तसे जो फल हुआ हो;
उसीसे सुखदायक भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों | महादेव !
मेरे कुलमे सदा आपका भजन होता रहे । जहॉँके आप इष्ट-
देवता न हों; उस कुलमें मेरा कभी जन्म न हो |?
इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् भगवान् शिवको
पुप्पाज्ञलि समर्पित करके बआाहाणोंसे तितक ओर आशीर्वाद
ग्रहण करे | तदनन्तर शम्भुका विसर्जन करे। जिसने इस
प्रकार ब्रत किया हो, उससे में दूर नहीं रहता | इस ब्रतके
फलछका वर्णन नहीं किया जा सकता । मेरे पास ऐसी कोई
वस्तु नहीं है, जिसे शिवरात्रि-त्रत करनेवालेके लिये में दे न डालूँ ।
जिसके द्वार अनायास ही इस ब्रतका पालन हो गया, उसके
लिये भी अवश्य ही मुक्तिका बीज बो दिया गया। मनुप्योंको
प्रतिमास भक्तिपूर्वक शिवरात्रित्रत करना चाहिये | तलश्रात्
इसका उद्यापन करके मनुष्य साड्जोपाज़ फल लाभ करता है |
इस व्रतका पालन करनेसे में शिव निश्चय ही उपासकके समस्त
दुःखोंका नाश कर देता हूँ और उसे मोग-मोक्ष आदि सम्पूर्ण
मनोवाड्छित फल ग्रदान करता हूँ ।
सूतजी कहते है--महर्षियों ! भगवान् शिवक्रा यह
अत्यन्त हितकारक और अद्भुत वचन सुनकर श्रीविष्णु अपने
धामको लोट आये | उत्तके बाद इस उत्तम ब्रतका अपना
हित चाहनेवाले लोगंमिें प्रचार हुआ | किसी समय केशवने
नारखजीसे भोग ओर मोक्ष देनेवाले इस दिव्य शिवरात्रित्तका
वर्णन किया था | ( अध्याय २७-३८ )
अ-+९5<&$%.४2:--9*““:
शि७ पु अं० ७०...
ऋषि बोले--पूतजी ! अब हमें शिवरात्रि-अतके
उद्यापनकी विधि बताइये, जिसका अनुष्ठान करनेसे साक्षात्
भगवान् शंकर निश्चय ही प्रसन्न होते हैं |
खतजीने कहा--ऋषियो ! तुमलोग भक्तिभावसे
आदरपूर्वक शिवरात्रिके उद्यपनकी विधि सुनो, जिसका
अनुष्ठान करनेसे वह ब्रत अवश्य ही पूर्ण फल देनेवाला
होता है । लगातार चोदह वर्षोतक शिवरात्रिके शुभव्रतका
पालन करना चाहिये । त्रयोदशीको एक समय भोजन
करके चतुर्दशीको पूरा उपवास करना चाहिये ।
शिवरात्रिके दिन नित्यकर्म सम्पन्न करके शिवालयमें जाकर
विधिपूवक्क शिवका पूजन करे । तलश्वात्ू वहाँ
यक्ञपूर्वक एक दिव्य मण्डडख बनवाये, जो तीनों लोकोंमें
गोरीतिलक न/मसे प्रसिद्ध है | उसके मध्यभागमें दिव्य
लिड्तोमद्र . मण्डलकी रचना करे अथवा मण्डपके भीतर
सबतोभद्र मण्डलका निर्माण करें। वहाँ प्राजापत्य नामक
कलग्ोकी स्थापना करनी चाहिये | वे शुभ कल्श वस्त,
फूल ओर दक्षिणाके साथ होने चाहिये । उन सबको
मण्डलके पाश्वमाममें यक्ञयूबंक स्थापित करे । भण्डपक्े
मध्यभागमें एक सोनेका अथवा दूसरी धातु तोॉँबे आदिका
बना हुआ कलश स्थापित करे। ब्रती पुरुष उस करूशपर
पाबंतीसहितः शिवकी सुबर्णमयी प्रतिमा बनाकर रक़्खे |
बह प्रतिमा एक पल ( तोले ) अथवा आधे पल सोनेकी होनी चाहिये
या जैसी अपनी शक्ति हो, उसके अनुसार प्रतिमा बनवा
छे । वाममभागमें पार्वतीकी ओर दक्षिण भागमें शिवकी
प्रतिमा स्थापित करके रात्रिमं उनका पूजन करे | आल्स्य
छोड़कर पूजनका काम करना चाहिये। उस कार्यमें चार
ऋत्िजोंके साथ एक पवित्र आचार्यका वरण करे और
उन सबकी आजा लेकर भक्तिपूषक शिवकी पूजा करे।
श़्तको प्रत्येक प्रहरमें प्रथक-प्रथक् पूजा करते हुए जागरण
करे | बती पुरुष भगवत्सम्बन्धी कीर्तन गीत एवं
ठुत्म आदिके द्वारा सारी रात विताये | इस प्रकार
जय
%# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
'शिवरात्रि-त्रतके उद्यापनकी विधि
सशय नहा द |
- [ संक्षिप्त-शिवपुराणाहु
विधिवत् पूजनपूर्वक भगवान् शिवको संतुष्ट करके प्रातःकाल
पुनः पूजन करनेके पश्चात् सविधि होम करे | फिर
यथाशक्ति प्राजापत्य विधान करे । फिर ब्राह्मणोंको भक्तिपूवक
भोजन कराये ओर यथाशक्ति दान दे ।
इसके बाद वस्त्र, अलंकार तथा आभूषणोंद्वारा पत्ीसहित
ऋत्विजोंको अल्ंकृत करके उन्हें विधिपूतक पृथक-गृथक दान
दे । फिर आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त बछड़ेसहित गोका
आचायको यह कहकर विधिपृ्वक दान दे कि इस दानसे भगवान्
शिव मुझपर प्रसन्न हों । तत्यश्चात् कलशसहित उस मूर्तिको
वच्थके साथ वृषभकी पीठपर रखकर सम्पूर्ण अलंकारोसहित
उसे आचार्यकोी अर्पित कर दे | इसके बाद हाथ जोड़
मस्तक झुका बढ़े प्रेमसे गद्धद वाणीमें महाप्रभु महेश्वरदेवसे
प्राथना करे |
प्रार्थना
देवदेव महादेव शरणागतवत्सछ ।
प्रतेननेन देवेश कृपा कुझ. मसोपरि ॥
मया भक्त्यनुसारेण ब्तमेतत् कंत॑ शिव ।
न्यूनं सम्पूर्णा। यातु पसादात्तव शंकर ॥
अज्ञानायथदि वा ज्ञानाजपपूजादिक मया ।
कृत॑ तदसतु कृपया सफर्क तब शंकर ॥
<देवदेव ! महादेव ! दारणागतबत्सल ! देवेश्वर |
इस ब्रतसे संतुष्ट हवा आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये |
शिव शंकर ! मैंने भक्तिभावसे इस ब्तका पालन किया दें ।
इसमें जो कमी रह गयी हो, वह आपके ग्रसादसे पूरी है
जाय | शंकर ! मैंने अनजानमें या जान-बूझकर जो जा
पूजन आदि किया है, वह आपकी कृपासे सफल हो |”
इस तरह परमात्मा शिवको पुष्याज्ञक्कि अप कर्फ
फिर नमस्कार एवं प्रार्थना करे। जिसने इस प्रकार त्रत ६४
कर लिया, उसके उस बअतमें कोई न्यूनता नहीं रहती !
उससे वह मनोवाड्छित सिद्धि प्राप्त कर ठेता है; इतम
( अध्याय ३९ )
अनजानमे शिपरात्रि-ब्रत करनेसे एक भीलपर भगवान् शंकरकी अद्भुत कृपा
फपषिय र्निं पूछा--पतजी | पू्रकालम किसने इस भी पुस बतका पालन करके किसने कानों पीर्ि पर
उत्तम अवयनिजतका पात्न किया था और अनजानमें किया था |
सेल] * का धन नननननपनललललनल कह या ] % अनज [नर्मे शिवरात्रि-त्रत करनेंसे भीलपर भगवान, शंकरकी अद्भुत कूपा हैं
्श्टीःीःीयलल जहर फनी अिन्मी "कही की दी चेडआर पियकरी अधाा अंक
इस विधयमें एक निादका प्राचीन इतिहास सुनात! हूँ;
सब पापोंका नाश करनेवाल्ग
बनमें एक भील रहता मी
उसका कुडुम्व बड़ा था तथा पे बलवान, और क्ूए खाते
क हेनेके साथ ही ऋरंप्तापूण कर्ममें तर रहता था। वेंई
प्रतिदेन बनमें जाकर ग्गोंकों मस्त और, वहीं रहकर
बातों प्रकारकी चोरियोँ करता था । उसने बचपनसे दी
कमी कोई शुभ कर्म नहीं किया था| ई- प्रकार बनमें रहते
हुए उस दुरात्मा भीलका बहुत समय बीत गया । तदनन्तर
एक दिन बढ़ी सुन्दर एवं शुभकारक शिवरात्रि आयी |
किंतु वह दुरात्मा घने जंगलमें निवास करनेवाला मैं
'इसल्यि उस ब्तकों नहीं जानता । उसी दिन उस
भीलके माता-पिता ओर पत्नीने भूखसे पीड़ित होकर उससे
पाचना की--वनेचर ! हमें खानेकी दो ।
) घूमने लूगा । देवयोगसे उसे उस द्नि
: और सूबे अस्त हो गया । इससे उसको बड़ा $ः « हुआ और
बह सोचने लगा--“अब में क्या करूँ ! कहाँ जाऊँ ! आज
ते कुछ नहीं मिला । घरमें जो बच्चे हैं; उनका तथा माता-
पैतका क्या होगा १ मेरी जो पत्नी है, उसकी भी क्या दशा
शेगी ! अतः मुझे कुछ लेकर ही घर जानी चाहिये; अन्यथा
न " ऐसा सोचकर वह व्याघ एस जलाशयके समीप
पहुंचा और जहाँ पानीमे उतरनेका घांद था। वहाँ जाकर
उद्दा है गया । वह मन-दी-मन यह विचार करता था कि
हूँ कोई -न-कोई जीव पानी पीनेके लिये अवश्य आयेगा ।
उसके मारकर कृतकृत्य हो उसे साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक
धो जाऊँँगा ।! ऐसा निश्वय करके वह व्याध एक बेलके
९ च्दु हे के और वहीं जछ साथ .लेकर बैठ गया ।
। कक जा केवल यही चिन्ता थी कि. कब कोई जीव
बिक 5 के का मारुगा । इसी प्रतीक्षाम
कक वह ब ठा रहा । उस णतके पहले पहरम॑
रेस चौक हरिणी वहाँ आयी, जो चकित होकर जोर-
हे डे रही हा | ब्राक्षणो ] उस मगीको देखकर
लक हुआ ओर: उसने तुरंत ही उसके वध ल्यि
न एक बाणका संधान किया। ऐसा करते
। शपके घब्केसे थोदा-्सा जछ और विल्वपत्र
3८७
कमफन्डन्ककाम्कन्पाटकमा यम 84200
करी. न्मी नी भी कब. यानी अली पनीर चओी अमाम्कामा ०52 अं
नीचे गिर पढ़े । उसे पेड़के नीचे शिवलिज्ञ था। उक्त
जल और बिल्वपत्रसे शिवकों मर्ंस पहरकी पूजा समन
गयी । उस पूजाके माहात्म्यसे उस व्याधका बहुत-सा पातक
तत्काछ न्ट हो गया । वहाँ होनेवाली खड़खड़ाहयकी
सुनकर हरिणीने भयसे ऊपरकी ओर देखा !
व्याधको देखते दी वह व्याकुट हो गयी और बोलीं-7
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9
व्याचने केंदा- “मर्ज
मेरे कुठम्बके लोग भूखे ७) मरते: तुमकी मारकर उनकी भूख
व्याघका वह दारुण . वचन सुनकर तेंथां जिसे रोकना
कठिन था) उस 5४ भीलको वाण ताने देखकर म्गंगी सोचने
धब में वंयीं कहूँ ! कहाँ जाऊ * अच्छी कोई
उपाय सवती हू ।' ऐसा विचास्कर उसने वहाँ इस प्रकार
मभी वोली-7भीठ : मेरे मांससे तुमको छुख दोगा)
इस अनर्थकारी श्रीरके लिये इससे अधिक मदद, पुस्यका
कार्य और नया हो सकता है १ उपकार करनेवाले प्राणीक
३८८ # नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने * [ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
४७७७ छिप ससययाकककउफब»>_- मल मल अब लक न मम मलि दस
प्प्प्प्स्प्प्प्प्प्प्प्य्प्प्च्य्य्स्स्ल्ट्ल्ल््
इस लोकमें जो पुण्य प्राप्त होता है; उसका सो वषोंमें भी वर्णन
नहीं किया जा सकता# | परंतु इस समय मेरे सब बच्चे
मेरे आश्रममें ही हैं | मैं उन्हें अपनी बहिनिको अथवा खामीको
सॉंपकर छौट आउऊँगी। बनेचर.! तुम मेरी इस बातको
मिथ्या न समझो | मैं फिर तुम्हारे पास लौट आडूँगी,
इसमें संशय नहीं है | सत्यसे ही घरती टिकी हुई है, सत्यसे
ही समुद्र अपनी मर्यादामें स्थित है ओर सत्यसे ही निर्रोसे
जलको धाराएँ गिरती रहती हैं | सत्यमें ही सब कुछ
स्थित है |
सूतजी कहते हँ--म॒गीके ऐसा कहनेपर भी जब
व्याधने उसकी बात नहीं मानी, तब उसने अत्यन्त विस्मित
एवं भयभीत हो पुनः इस प्रकार कहना आरम्भ किया |
. झूगी बोली--व्याध [ सुनो मैं तुम्हारे सामने ऐसी
रापथ खाती हूं; जिससे घर जानेपर मैं अवश्य तुम्हारे पास
लोट आडुँगी | ब्राह्मण यदि वेद बेचे और तीनों काल
संध्या न करे तो उसे जो पाप छगता है, पतिकी आज्ञाका
उल्लक्डन करके स्वेच्छानुसार कार्थ करनेवाली स्लियोंको जिस
पापकी प्राप्ति होती है, किये हुए उपकारको न माननेवाले,
भगवान शंकरसे विमुख रहनेवाले, दूसरोंसे द्रोह करनेवाले,
धमंको लॉघनेवाले तथा विश्वासघात और छल करनेवाले
लोगोंको जो पाप लगता है, उसी पापसे मैं भी लिप्त हो जाडूँ;
यदि लोय्कर यहाँ न आऊँ |
इस तरह अनेक शपथ खाकर जब म्गी चुपचाप खड़ी
हो गयी, तब उस व्याधने उसपर विश्वास करके कहा--
थअअच्छा, अब तुम अपने घरको जाओ ।? तब वह मृगी
बड़े दृषेके साथ पानी पीकर अपने आश्रम-मण्डल्में गयी।
इतनेमें ही रातका वह पहला पहर व्याधके जागते-ही-जागते
बीत गया | तब उस हिस्नीकी बहिन दूसरी “मृगी, जिसका
पहलीने स्मरण किया था, उसीकी राह देखती हुई जल
पीनेके लिये वहाँ आ गयी | उसे देखकर भीलने खयं
बाणको तरकससे खींचा | ऐसा करते समय पुनः पहलेकी
मत मन लक की जल मलटज जन मल कपल जन खलर -िद कक
# उपंकारकरस्थेव य॒त् पुण्यं जायते. त्विद ।
तत् पुण्यं शक्यते नव वकक्तुं वर्षशतैरपि ॥
( शि० पु० को० रुू० सं० ४० । २६ )
स्थिता सत्येन धरणी सत्येनेव च वारिधिः ।
सत्येन जल्थाराश्चसत्ये स्व प्रतिष्ठितम ॥
(् डि० पु० को ० डइ० सं० ४० । २९ )
उसके द्वारा महात्मा शम्भुकी दूसरे प्रहरकी पूजा समत्न हो
गयी | यद्यपि वह प्रसड्गवश ही हुई थी, तो भी व्याधके लिये
सुखदायिनी हो गयी | झुगीने उसे बाण खींचते देख पृछा--
'वनेचर | यह क्या करते हो !? व्याधने पूर्ववत् उत्तर
दिया--'में अपने भूखे कुठ्धम्बकों तृप्त करनेके ढिये तुझे
मारूँगा |? यह सुनकर वह मृगी बोली |
स्गीने कहा--व्याध | मेरी वात सुनो | मैं धन्य
हूँ | मेरा देह-घारण .सफल हो गया; क्योंकि इस अनित्य
शरीरके द्वारा उपकार- होगा। परंतु मेरे छोटे-छोटे बच्चे
धरमें हैं| अतः मैं एक बार जाकर उन्हें अपने खामीको
सोंप दूँ; फिर त॒म्हारे पास लौट आउऊँगी |
व्याध वोला--तम्झरी बातपर मुझे विश्वास नहीं है|
में तुझे मारुँगा, इसमें संशय नहीं है |
. यह सुनकर वह हरिणी भगवान् विष्णुकी शपथ खाती
हुईं बोली--धव्याध | जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो।
यदि में लोटकर न आउऊँ तो अपना सारा पुष्य हर
जाऊँ; क्योंकि जो वचन देकर उससे पलट जाता है; वह
अपने पुण्यको हार जाता है| जो पुरुष अपनी विवाह्षिता
सत्रीकों त्यागकर दूसरीके पास जाता है, वेंदिक पमका
उललड्डन करके कपोलकल्पित धर्मपर चलता कै भगवाव
विष्णुका भक्त होकर शिवकी निन््दा करता है; माता-पिताकी
निधन-तिथिको श्राद्ध आदि न करके उसे सूना बिता देता
है तथा मनमें संतापका अनुभव करके अपने दिये हुए
वचनको पूरा करता है, ऐसे छोगोंको जो पाप छा है
वह्दी मुझे भी लगे, यदि में छोग्कर न आऊँ |?
सूतजी कहते है---उसके ऐसा कहनेपर व्याधने
उस मृगीसे कहा--“जाओ |? मुगी जछ पीकर दूर
अपने आश्रमको गयी | इतनेमें ही रातका दूसरा प्रहर भी
व्याधके जागते-जागते बीत गया | इसी समय तीसरा 6
आरम्भ हो जानेपर मृगीके छोटनेमें वहुत विलम्ब हुआ मं
चकित हो व्याघध उसकी खोज करने लगा | इतनेमें ही उतने
जलके मार्गमें एक. हिरनको देखा | वह बड़ा दष्ट:पृष्ट या ।
उसे देखकर बनेचरको बढ़ा इर्ष हुआ और वह घबुपा
बाण रखकर, उसे मार डालनेको उद्यत हुआ | ऐश करते
समय उसके प्रारब्धवश कुछ जल और बिल्वपत्र का
लिश्रपर गिरे; जससे उसके सौमाग्यसे भगवान् -शि'
कोटिरद्रसंदिता | % अनजानमें शिवरात्रि-ब्॒त करनेसे भीलपर भगवान् शंकरकी अद्भुत कृपा # . ३८९
एण्के मतमें बड़ा हर्ष हुआ ओर
*
।
|
तीसरे प्रहर्की पूजा सम्पन्न हो गयी | इस तरह भगवानते
उसपर अपनी दया दिखायी । पत्तोंके गिरने आदिका शब्द
मुनकर उस मृगने व्याधकी ओर ' देखा ओर पूछा--“क्या
करते हो !? व्याधने उत्तर दिया--मैं अपने कुठुम्बको भोजन
देनेके लिये तुम्हारा वध करूँगा |? व्याघधकी यह बात सुनकर
तुरंत ही व्याधसे इस
प्रकार बोला | ह
हरिणने, कहा-मैं धन्य हूँ । मेरा दृष्ट-पुष्ट
होना सफल हो गया; क्योंकि मेरे शरीरसे आपलोगोंकी तृप्ति
हेगी | जिसका शरीर परोपकारके काममें नहीं आता, उसका
सब कुछ व्यर्थ चला गया। जो सामर्थ्य रहते हुए भी किसीका
उपकार नहीं करता है, उसकी वह सामर्थ्य व्यथ॑ चली जाती
है तथा वह परलोकमें नरकगामी होता है# | परंतु एक बार
पुझ्े जाने दो | में अपने बालकोंको उनकी माताके हाथमें
पर और उन सबको धीरज बैँधाकंर यहाँ लौट
आऊंगा | | रक्त |
. उसके ऐसा कहनेपर व्याघध मन-ही-मन बड़ा विस्मित
ध -0र | उसका दृदव कुछ शुद्ध हो गया था ओर उसके
, .* पापपुन्ञ नष्ट हो चुके थे | उसने इस प्रकार कहा ।
|
है
)
||
|
|
/
री]
पे बींडकर चले जाओगे | फिर आज मेरा
व्याध वोछा--जो-जो यहाँ आये, वे सब तुम्हारी ही
। पर बातें बनाकर चले गये; परंतु वे वश्चक अमीतक यहाँ
गह छोटे हैं । मृग ! तुम भी इस समय संकटमें हो, इसलिये
जीवन-
फेसे होगा !
* भय वोला--व्याध | मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो ।
व पल नहीं है| सारा चराचर ब्रह्माण्ड सत्यसे ही टिका
घ | जिसकी वाणी झूठी होती है; उसका पुण्य उसी क्षण
| क है; तथापि भील ! तुम मेरी सच्ची प्रतिशा सुनो ।
का मैथुन तथा शिवरात्रिक्े दिन भोजन करनेसे जो
' कप गवाहदी देने, घरोहरको हड़प लेने तथा
हक द्विजको जो पाप द्वोता है; वही पाप मुझे भी
३ भें लोगकर न आई | लिन ब गज मुखसे कभी शिवका
गे दे पतामय्य॑युक्तथ नोपकारं करोति वै।
ए्तानष्य भवेध्यर्य परत्र॒ नरक अलेव ॥
( ध्वि० पु० को० २० सं० ४० । ५७ )
नाम नहीं निकलता) जो सामथ्य रहते हुए. भी दूसरोंका उपकार
नहीं करता, पर्वके दिन श्रीफल तोड़ता, अभश्ष्य-मक्षण करता
तथा शिवकी पूजा किये बिना ओर भस्म लगाये बिना भोजन
कर लेता है, इन सबका पातक मुझे लगे, यदि मैं लोथ्कर
न आऊ |
सूतजी कहते हँ--उसकी बात सुनकर व्याधने
कहा--८जाओ) शञीत्र लोगना |? व्याधके ऐसा कहनेपर मृग
पानी पीकर चला गया | वे सब अपने आश्रमपर मिले | तीनों ही
प्रतिशाबद्ध हो चुके थे। आपसमें एक दूसरेके बृत्तान्तको
मलीभाति सुनकर सत्यके पाशसे बँघे हुए उन सबने यही
निश्रय किया कि वहाँ अवश्य जाना चाहिये | इस
निश्चयके बाद वहाँ बालकोंको अश्वासन देकर वे सब-
के-सब जानेके लिये उत्सुक हो गये | उस समय जेठी मगीने
वहाँ अपने खामीसे कहा--०सखामिन् | आपके बिना यहाँ बालक
केसे रहेंगे ! प्रभो ! मैंने ही वहाँ पहले जाकर प्रतिज्ञा की है;
इसलिये केवल मुझकों जाना चाहिये | आप दोनों यहाँ रहें |?
उसकी यह बात सुनकर छोटी मगी वोली--५वहिन ! में
तुम्हारी सेविका हूँ; इसलिये आज में ही व्याधके पास जाती हूँ )
तुम यहीं रहो ।? यह सुनकर मृंग बोला--“में ही वहाँ जाता
हूँ | तुम दोनों यहाँ रहो; क्योंकि शिश्वुओंकी रक्षा मातासे दी
होती है ।? खामीकी यह बात सुनकर उन दोनों मगियोंने घर्मकी
दृष्टिसे उसे खीकार नहीं किया | वे दोनों अपने पतिसे प्रेमपूर्यक
बोलीं---धप्रमो | पतिके बिना इस जीवनको घिक्कार हैं ।?
तब उन सबने अपने बच्चोंको सांन््त्वना देकर उन्हें पड़ोसियंकि
हाथमें सौंप दिया और खय॑ शीम्र ही उस स्थानकों प्रखान
किया; जहाँ वह व्याधशिरोमणि उनकी प्रतीक्षार्मे वेठा था।
उन्हें जाते देख उनके वे सब बच्चे भी पीछे-पीछे चले आये ।
उन्होंने यह निश्चय कर ल्यिा था कि इन माता-पिताकी
जो गति होगी वही हमारी भी हो | उन सबकी एक साथ
. आया देख व्याधकों बड़ा दृषे हुआ | उसने घनुपपर वाण
रखा [| उस समय पुनः जल ओर विल्वपत्न शिवके ऊपर
गिरे | उससे शिवकी चोथे पहरकों शुभ पूजा भी सम्न्न दो
गयी | उस समय व्याधका सारा पाप तत्काल भत्म दो गया |
इतनेमें ही दोनों मृगियाँ ओर म्ग वो उठे--व्याथ-
शिरोमणे | शीम कृपा करके इमारे शरीरकों खायक्र करो |?
उनकी यह बात सुनकर व्याधको बड़ा विस्मय हुआ ।
शिवपूजाके प्रभावसे उसको दुलंभ ज्ञान प्राप्त हो गया | उसने
सोचा--०ये मृग ज्ञानहीन पश्च होनेपर भी धन्य हैं, सर्वथा
आदरणीय .हैं; क्योंकि अपने शरीरसे ही परोपकारमें लगे हुए
हैं। मैंने इस समय मनुष्य-जन्म पाकर भी किस पुरुषार्थका
साधन किया £ दूसरेके शरीरको पीड़ा देकर अपने शरीरको
पोसा है | प्रतिदिन अनेक प्रकारके पाप करके अपने कुठ॒म्बका
पालन किया है ) हाय | ऐसे पाप करके मेरी क्या गति होगी !
अथवा में किस गतिको प्राप्त होऊँगा ! मैंने जन्मसे लेकर अब-
तक जो पांतक किया है; उसका इस समय मुझे स्मरण हो
रहा है | मेरे जीवनको धिक्कार है, घिक्कार है |? इस प्रकार
शानसम्पन्न होकर व्याघने अपने वाणकों रोक लिया और
कह्--श्रेष्ठ मुगो ! तुम जाओ । तुम्हारा जीवन धन्य है |?
व्याधके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर तत्काल प्रसन्न हो
गये और उन्होंने व्याघकों अपने सम्मानित एवं पूजित
स्रूपका दशन कराया तथा कृपापूर्वक उसके झरीरका स्पर्य
करके उससे प्रेमसे कह्य--*भील ! में तुम्दारे अतसे प्रसन्न हूँ ।
# नमो रुद्राय शास्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
__-
हे ह ह्राना -+म्म-:-#---०
+ फ्े > पट थ न 40४
थ्र््न | ट प्पोः बन
८“ “““प्प दि ्ि
अिम्मन उलण डॉ पर
सरल मकंकसमर अरे सके कपल बन डट जन्म [ संक्षिप्त-शिवपुराणाड
वर माँगो |? व्याध भी भगवान् शिवके उस रूपको देखकर तक्काह
जीवन्मुक्त हो गया और “मैंने सब कुछ पा लिया? यों कहता
हुआ उनके चरणोंके आगे गिर पड़ा | उसके इस भाव
देखकर भगवान् शिव भी मन-दी-मन बढ़े प्रसन्न हुए और
उसे “गुह? नाम देकर कृपाइश्सि देखते हुए उन्होंने उसे दिव्य
वर दिये |
शिव बोले--व्याघ ! सुनो; आजसे- तुम अद्जवेरपुरमें
उत्तम राजधानीका आश्रय ले दिव्य भोगोंका उपभोग करो |
तुम्हारे वंशकी वृद्धि निर्विन्नक्पसे होती रहेगी | देवता भी
तुम्हारी प्रशंसा करेंगे | व्याध | मेरे भक्तोंपर स्नेह रखनेवाले
भगवान् श्रीयम एक दिन निश्चय ही तुम्हारे घर पधारंगे ओर
तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे | तुम मेरी सेवामें मन लगाकर
दुलभ मोक्ष पा जाओगे |
इसी समय वे सब स्ुग भगवान् शंकरका दर्शन ओर
प्रणाम करके म्गयोनिसे मुक्त हो गये तथा दिव्य-देहधारी हो
विमानपर बेठकर शिवके दर्शनमात्रसे शापमुक्त हो दिव्यधामको
चले गये | तबसे अज्जुद पर्वतपर भगवान् शिव व्याधिश्वरे
नामसे प्रसिद्ध हुए, जो दर्शन और पूजन करनेपर तत्काल -
भोग ओर मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं | महर्षियो ! वह व्याप
भी उस दिनसे दिव्य भोगोंका उपभोग करता हुआ अपनी
राजधानी में रहने लगा | उसने भगवान् श्रीगामकी कृपा पाकर
शिवका सायुज्य प्रात्त कर लिया | अनजानमें ही इस बतका
अनुष्ठान करनेसे उसको साथुज्य मोक्ष मिल गया; फिर जो
भक्तिभावसे सम्पन्न होकर इस ब्रतको करते हैं, वे शिवका थुभ
सायुज्य प्राप्त कर लें; इसके लिये तो कहना ही क्या है | सम
शाज्रों तथा अनेक प्रकारके धर्मोंके विषयमें मलीमॉति विचार
करके इस शिवरात्रि-त्रतको सबसे उत्तम बताया गया हम |
इस छोकमें जो नाना प्रकारके ब्रत, विविध तीर्थ) भाँति-भों
विचित्र दान, अनेक प्रकारके यज्ञ) तरह-तरहके तप तथा
बहुत-से जप हैं, वे सव इस शिवरात्रि-बतकी समानता न
कर सकते | इसलिये अपना हित चाहनेवाले मनुष्यकिी ईप
शुभतर ब्रतका अवश्य पालन करना चाहिये । यह शिवरत्रि-
श्रत दिव्य है | इससे सदा भोग और मोश्षकी ग्रातति होती है |
महर्षियो | यह शुभ शिवरात्रि-ब्रत ब्रतराजके नामसे विख्यात
है | इसके विपयर्म सब बातें मैंने तुम्हे बता दीं। अब
क्या सुनना चाहते दो ? ( अध्याव ४? /
4... कह ींशकशक०----..६-६.._
ध्ड्ड््
|
तक
आम
|
2;
'. ६ | जो ज्ञानरूप अविनाशी,
|
..... एहज्तयतततात८८)८७+२+<... मुक्ति आर भक्तिके
.. क्षियनि पूछा--सूतजी । आपने बारंबार मुक्तिका
गम लिया है । यहाँ मुक्ति मिलनेपर क्या होता है ? मुक्तिमें
होती है ? यह हमें बताइये |
सतजीने कहा--महर्षियो ! सनो । में तुमसे संसार-
सालोक्या, सांनिध्या तथा चौथी सायुज्या |
रस शिवरात्रिज्तसे सब भकारकी मुक्ति सुलभ हो जाती
इतरहित साक्षात् शिव हैं,
| में उसका लक्षण बताता हूँ,
पी | बिनसे यह समस्त _गव् उत्पन्न होता है, जिनके
४7 इसका पालन होता है तथा
णैन होता है, थे ही शिव हैं | जिससे यह सम्पूण
भाप्त है, वही शिवका रुप है। मुनीश्वरों ! वेदोंमें शिवके दो
गये हैं निष्कल
जताते निवनत्त॑ च संचिदानर्संशितम्
2 सब है
7 रक्त जैव पीतश्च न रवेतो! नील एव च
स्। निगुंगीो निरुपाधिश्चाव्यय:
| न हखो न च॒ हप॑श्च॒ न स्थूल; यूदन एव च ॥
! कोटिरुद्रसंदिता _ क् % मुक्ति ओर भक्तिके स्रूपका विवेचन +: द ३९१
द सरूपका विवेचन
भगवानका भजन अत्यन्त उकर माना गया है | इसलिये
संतशिरोभणि पुरुष मुक्तिके लिये भी शिवका भजन ही
मोक्ष देनेवाली है। वह जाई महापुरुषोंके कृपा-प्रसादसे
उुलभ होती है । उत्तम प्रेमका अछुर
द्विजो | वह भक्ति भी सगुण ओर नियुंणके भेदसे दो प्रकारकी
भक्तिके दो प्रकार और बताये गये हैं । नेडिकी
प्कारकी जाननी चाहिये और अन्न डिकी एक ही प्रकारकी |
भकारकी भक्तियोंके श्रवण आदि भेदसे नो अक्न जानने
चाहिये । भगवानकी कृपाके बिना इन भक्तियोंका सम्पादन
होना कठिन है और उनकी कपासे सुगमतापूर्वक इनका
पाधन होता है । द्विजो । भक्ति ओर ज्ञानको भम्भुने
>7 दूसरेसे भिन्न नहीं बताया है। इसलिये उनमें भेद
नहीं करना चाहिये | ज्ञान और भक्ति दोनोंके ही साधकको
नदा सुल्ल मिलता है | ब्राह्मणो ।! जो भक्तिका विरोधी है,
उसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं । भगवान् शिवकी भक्ति
करनेवालेको ही शीघ्रतापूर्वक ज्ञान प्रात होता है | अतः
मुनीश्चवरो | महेश्वरककी भक्तिका साधन करना आवश्यक है |
उसीसे सबकी सिद्धि होगी, इसमें संशय नहीं है। महर्पियो !
तुमने जो कुछ पूछा था, उसीका मैंमे वर्णन क्रिया है |
इस प्रसज्ञकों सुनकर मनुप्य सब पापोंसे निस््संदेह मुक्त हो
जाता है | ( अध्याय ४१ )
झुद्धे निरक्षन: ॥
का! बाचो निवर्तन्ते भ्षप्राप्य मे ही सह | तदेव परम॑ प्रोक्त॑ अल्लैव शिवसंडकन् ॥
गई व्यापक बद्धत तथंव ब्यापक लिदनू । मायातोत॑ पता गान द्द्घातीत विनत्तरन् ॥
पकषाप्निथ् भेद शिवक्षानोदवार इुंवम | भभनाड़ा. खिवस्वैव वक्षममृत्वा जैतों दिना। ॥
५ शि० पु० को० ३० ० ४ (। १२०११]
रे९२
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्ह्मणे परमात्मने+
नचचच्च्च्चचय्स््य््य्स्स्स्स्य्लस्स्स्स्य्स्य्स्स्य्स्क्ल्स्प्स्क्स्य्स्स्स्ल्स्ल्फप्पि..
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा
शिव, विष्णु, रुद्र ओर त्रह्माके खरूपका पिवेचन
ऋषियोने पूछा--शिव कोन हैं! विष्णु कौन हैं !
रुद्र कोन हैं और ब्रह्मा कौन हैं ! इन सबमें निर्गुण कौन है !
हमारे इस संदेहका आप निवारण कीजिये |
खूत जीने कह---महर्षियो | वेद और वेदान्तके विद्वान
ऐसा मानते हैं कि निगुण परमात्मासे सर्वप्रथम जो सगुणरूप
प्रकट हुआ, उसोका नाम शिव है| शिवसे पुरुषसहित
प्रकृति उत्पन्त हुईं उन दोनोंने मूलस्थानमें स्थित जलके
भोतर ठप किया । वह स्थान पद्मक्रोशी काशीके नामसे
विख्यात है; जो भगवान् शिव्रक्ो अत्यन्त प्रिय है | यह जल
सम्पूर्ण विश्व व्याप्त था | उस डलका आश्रय ले योगमायासे
युक्त श्रीहरि वहाँ सोये | नार अर्थात् जलको अबन ( निवास-
स्थान ) बनानेके कारण फिर “नारायण? नामसे प्रसिद्ध हुए और
प्रकृति “नारायणी? कहलायो । नारायणके नाभिकमलछसे जिनकी
उत्पत्ति हुईं वे ब्रह्मा कहलाते हैं | त्रह्मेने तपस्या करके
जिनका साक्षात्क/र किया, उन्हें विष्णु कहा गया है । ब्रह्मा
ओर विष्णुके विवादको शान्त करनेके लिये निर्मुण शिवने जो
रूप प्रकट किया, उसका नाम “महादेव? है। उन्होंने कहा--
'में शम्पु ब्रह्माजीके ललछाटसे प्रकड होऊँगाः इस कथनके
अनुसार समस्त छोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो त्रह्माजीके
ललाटसे प्रकट हुए, उनका नाम रुद्र हुआ | इस प्रकार रूप-
रहित परमात्मा सबके विन्तनका विषय बनतेके लिये साकार-
रूपमें प्रकट हुए | वे ही साक्षात् भक्तवत्सल शित्र हैं | तीनों
गुणोंसे भिन्त शित्रमें तथा गुणोंके घाम रुद्रमें उसी तरह
वास्तविक भेद नहीं है; जैसे सुवर्ण और उसके आभूषणपमें
नदी हे | दोनोंके रूप ओर कम स मान नि | दानों समानरुपसे
भक्तोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाले हैं | दोनों समानरूपसे
सबके सेवनीय हैं. तथा नाना ग्रकारके छीला-विहार करनेवाले
हू | भयानक-राक्रमी रुद्र सबंथा शिवख्प ही हैं। वे भक्तों
के कायकी सिद्धिके निमित्त विष्णु और ब्रह्माकरी सहायता
करनेके लिये प्रकट हुए हैं | अन्य जो-जो देवता जिस कऋमसे
प्रकट हुए हूँ, उसी क्रमसे लयको प्राप्त होते हैँ | परत
उद्धदेव उस तरह लीन नहीं होते । उनका साक्षात् झिवमें
ही लव होता दै। ये प्राकृत प्राणी र्रमें मिलकर ही ल्यको
प्राप्त द्वंते हूँ | परंतु रुद्र इनमें मिलकर लूयकों नहीं प्राप्त होते |
यह भगवतों श्रुतिका उपदेश है। तव लोग दुद्धका भजन
करते हैं) किंतु दद्ध किसीका भजन नहीं करते | वे भक्त-
वत्सल होनेके कारण कभी-कभी अपने-आप भक्तजनोंका
चिन्तन कर लेते हैं | जो दूसरे देवताका भजन करते हैं, वे
उसीमें छीन होते हैं; इसीलिये वे दीम॑कालके वाद रुद्रमें दीन
होनेका अवसर पाते हैं | जो कोई रुद्रके भक्त हैं, वे तक्काल शिव
हो जाते हैं; अतः उनके लिये दूसरेकी अपेक्षा नहीं रहती ।
पह सनातन श्रुतिका संदेश है |
द्विजो | अज्ञान अनेक प्रकारका होता है; परंतु विज्ञनत्
एक ही स्वरूप है | वह अनेक प्रकारक नहीं होता | उसके
समझनेका प्रकार में बताऊँगा, तुमलेग आदरपूर्वक मुनो।
ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ भी यहाँ देखा जाता है! वह
सब शिवरूप ही है) उसमें नानात्वकी कबत्यना म्रिथ्या है।
सश्कि पूर्व भी शिवकी सत्ता बतायी गयी है; सश्कि मे
भी शिव विराज रहे हैं, सष्टिके अन्तमें भी शिव रहते
ओर जब सब कुछ शत्यतामें परिणत हो जाता है। उस समय भी
शिवकी सत्ता रहती ही है। अतः मुनीश्वरो ! शिवको ही चहुगुण
कहा गया है। वे ही शिव शक्तिमान् होनेके कारण शुगर!
जाननेयोग्य हैं | इस प्रकार वे सगुण-निगुंणके भेदसे दो
प्रकारके हैं | जिन शिवने ही भगवान् विष्णुको सम्पूणे सनातग
वेद, अनेक वर्ण, अनेक मात्रा तथा अपना ध्यान श्र
पूजन दिये हैं, वे ही सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर कल
सनातन श्रति है। अतएब शम्भुको “वेदोंका प्राकव्यकृता? तय
'वेदपति ) कहा गया है | वे ही सबपर अनुग्रह करनेवाले साक्षाव्
न 6 तथा निगु ध्
शंकर रह | कतो, भर्ता, हता, साक्षी, तथा निगुण भीष श
हैं | दूसरोंके लिये काछका मान है; परंतु काल्खलम रा
लिये कालकी कोई गणना नहीं है; क्योंकि वे सक्षात् सैं
महाकाल हैं ओर महाकाली उनके आश्रित हैं । त्राक्षण) ४
ओर कालीको एक-से ही बताते हैं | उन दोनोंने सल रह
करनेवाली अपनी इच्छासे ही सब कुछ प्राप्त किया 4।
शिवका कोई उत्पादक नहीं है । उनका कोई पालक ह
संहारक भी नहीं है | वे खयं सबके हेतु हैं | एक हार
भी अनेकताको प्राप्त हो सकते हैं और अनेक होकर मे
एकताको | एक ही बीज बाहर होकर वृक्ष ओर फेछ हा
रूपमें परिणत होता हुआ पुनः बीजभावको प्राप्त हो जात | ।
इसी प्रकार शिवरूपी महेश्वर खयं एकसे अनेक होनेमें दें हे
यह उत्तम झिवज्ञान तत्त्वतः बताया गया दे । शनवरोर्द 3
द्वी इसको जानता है; दूसरा नहीं ।
नर त्रगन
मुनि वोले--सूतजी | आप लक्षणपत द्वित शक !
जाज्कच्यक्ा-.. 7
कोटिरुद्रसंहिता |
कीजिये, जिसको जानकर मनुष्य शिवभावको प्राप्त हो जाता
% शिवसम्बन्धी तत्त्वज्ञानका वर्णन तथा उसकी महिमा #*
ज>ज>- खा ख्खखचच खा वख्ख्खआखख़ख़़ यखच़चचचचय्य्यय््य्प्स्य्य्प्स्स्सससस्स्स्सता
इे९रे
कऋषियोंका यह प्रश्न सुनकर पोराणिकशिरोमणि सूतजीने
है। ग़रा जगत शिव कैसे है अथवा शिव ही सम्पूर्ण जगत् भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके उनसे कहा ।
कैसे हैं !
( अध्याय ४२ )
>+---<<ऊ्ल्ल्न्क्च्सक्,.<
शिवसम्बन्धी तख्वज्ञानका वर्णन तथा उसकी महिमा, कोटिरुद्रसंहिताका माहात्म्य एवं उपसंहार
सूतजीने कदह--ऋषियो ! मैंने शिवज्ञान जैसा सुना
है; उसे बता रहा हूँ | तुम सब लोग सुनो, वह अत्यन्त गुद्न
ओर परम मोक्षखरूप है | ब्रह्मा, नारद; सनकादि मुनि;
ब्यास तथा कपिल---इनके समाजमें इन्हीं छोगोंने निश्चय करके
शनका जो खरूप बताया है, उसीको यथार्थ ज्ञान समझना
चाहिवे | सम्यूण जगत् शिवमय है; यह ज्ञान सदा अनुशीलन
करनेयोग्य है | सर्वज्ञ विद्वानको यह निश्चितरूपसे जानना
चाहिये कि शिव सवंयय हैं । ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो
कुछ जगत् दिखायी देता है; वह सब शिव ही हैं । वे महा-
देवजी ही शिव कहलाते हैं | जब उनकी इच्छा होती है; तब
वे इस जगत्की रचना करते हैं | वे ही सबको जानते हैं;
उनकी कोई नहीं जानता । वे इस जगत्की रचना करके
स्व सके भीतर प्रविष्ट होकर भी इससे दूर हैं । वास्तवमें
उनका इसमें प्रवेश नहीं हुआ है; क्योंकि वे निर्लिपत, सच्िदा-
गनद्खस्प हैं । जैसे सूर्य आदि ज्योतियोंका जलमें प्रतिबिम्व
पड़ता है; वास्तवमें जलके भीतर उनका प्रवेश नहीं होता:
बह पकार साक्षात् शिवके विषयमें समझना चाहिये | वस्तुतः
हे वे खयं॑ ही सब कुछ हैं| मतभेद ही अशान है; क्योंकि
१ किसी द्वेत वस्तुकी सत्ता नहीं है । सम्पूर्ण द्ानोंमें
बह न दिखाया जाता है; परंतु वेदान्ती नित्य भक्वित
के ऑन 2ट न हैं। जीव परमात्मा शिवका ही अंश हैः
जलकर यासे मोहित होकर अवश हो रहा है और अपनेको
लहर समझता है । अविद्यासे मुक्त होनेपर वह शिव ही
बन | शिव सबको व्याप्त करके स्थित हैं और सम्पूर्ण
उनुओमे व्यापक हैं | वे जड और चेतन--सबसके
कक बके ईश्वर होकर
हि की कल्याण करते हैं | जो विद्वान् पुरुष वेदान्त-
के अल ले उनके साक्षात्कारके लिये साधना करता हैः
जग फछ अवश्य प्रात्त होता है। व्यापक
सकी काप्ठमें पा है; परंतु जो उस काष्ठका
रैक है । अप वही असंदिग्धरूपसे अग्निको प्रकट करके
बा तरह जो बुद्धिमान् यहाँ भक्ति आदि साधनों-
... जन करता है, उसे अवश्य शिवका दर्शन प्राप्त होता
शि० पु० अ्ं० (९६०----
है, इसमें संशय नहीं है। सर्वत्र केवल शिव हैं; शिव हैं)
श्षिव हैं; दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वे शिव भ्रमसे ही सदा
नाना रूपोमे भासित होते हैं ।
जैसे समुद्र, मिद्ठी अथवा सुवणं--ये उपाधिमेदसे नानाल-
को प्राप्त होते हैं; उसी प्रकार भगवान् शंकर भी उपा-चेयेसि
ही अनेक रूपोंमें भासते हैं । कार्य ओर कारणमें वास्तविक
भेद नहीं होता । केबल भ्रमसे भरी हुई बुद्धिके द्वारा ही
उसमें भेदकी प्रतीति होती है | भ्रम दूर होते ही भेदबुद्धिका
नाश हो जाता है । जब बीजसे अछुर उतन्न होता है, तब
वह नानात्वको प्रकट करता है; फिर अन्तमें वह बीजरूपमें दी
स्थित होता है और अड्भूर नष्ट हो जाता है। श्ञानी वीजस्परमे
ही स्थित है और नाना प्रकारके विकार अद्भुरूूप हैं | उन
विकारस्वरूप अड्डुरोंकी निवत्ति हो जानेपर पुरुष फिर श्ञानी-
रूपमें ही खित होता है--इसमें अन्यथा विचार नहीं करना
चाहिये | सब कुछ शिव है और शिव ही सब कुछ हैं । शिव
तथा सम्पूर्ण जगतमें कोई भेद नहीं हैः फिर क्यों कोई अनेकता
देखता है और क्यों एकता ढूँदता है । जैसे एक ही संय
नामक ज्योति जरू आदि उपाधियोंमें विशेषरूपसे नाना भ्रकार-
की दिखायी देती है? उसी प्रकार शिव भी हैं । जेसे आकाश
सर्वत्र व्यापक होकर भी स्पर्श आदि वन्धनमें नहीं आता; उसी
प्रकार व्यापक शिव भी कहीं नहीं बंधते । अहंकारसे युक्त
होनेके कारण शिवका अंश जीव कहत्यता है | उस अहंकारसे
मुक्त होनेपर वह साक्षात् शिव ही है। कर्मोके भोगमें छित्त होनेके
कारण जीव तुच्छ है और निर्लितत होनेके कारण शिव महान
हैं| जैसे एक ही सुवर्ण आदि चाँदी आदिसे मिल जानेपर
कम कीमतका हो जाता है? उसी प्रकार अहंकारयुक्त जीव
अपना महत्व खो बैठता है | जैसे क्षार आदिसे शुद्ध किया
हुआ उत्तम सुवर्ण आदि पूर्वबत् बहुमूल्य हो जाता है, उसी
प्रकार ॒संस्कारविशेषसे झुद्ध होकर जीव भी झद्ध द्टो
जाता है ।
पहले सद्गुरुकों पाकर मक्तिभावसे झुक्त दी शिवदुद्धिसे
उनका पूजन और स्मरण आदि करे । गुरुमें शिवबुद्धि करनेसे
९४
व रा रचा चिता
सारे पाप आदि मल शरीरसे निकल जाते हैँ | उस समय
अज्ञान नष्ट हो जाता है और मनुष्य ज्ञानवान् हो जाता है।
उस अवस्थामें अहंकारमुक्त निर्मल बुद्धिवालछा जीव भगवान्
शंकरके प्रसादसे पुनः शिवरूप हो जाता है । जैसे दर्पणमें
अपना रूप दिखायी देता है; उसी तरह उसे सर्वत्र शम्प्रुका .
साक्षात्कार होने लगता है | वही जीवन्मुक्त कहलाता है | शरीर
गिर जानेपर वह जीवन्मुक्त ज्ञानी शिवमें मिल जाता है ।
शरीर प्रारब्धके अधीन है; जो उस देहके अभिमानसे रहित
है, उसे ज्ञानी माना गया है | जों शुभ वस्तुको पाकर हर्षसे
खिल नहीं उठता, अश्युभको पाकर क्रोध या शोक नहीं करता
तथा सुख-दुःख आदि सभी दन््दोंमें समभाव रखता है; वह
शानवान् कहलाता है |# आत्मचिन्तनसे तथा तत्त्वोंके. विवेकसे
ऐसा प्रयत्न करे कि शरीरसे अपनी एथकृताका बोध हो जाय |
मुक्तिकी इच्छा रबनेवाला पुरुष शरीर एर्व उसके अभिमानको
त्यागकर अहंकारयूृत्य एवं मुक्त हो सदाशिवमें विछीन हो
जाता है | अध्यात्मचिन्तन एवं भगवान् शिवकी भक्ति--ये
शानके मूठ कारण हैं । भक्तिसे सोधनविषयक प्रेमकी
उपलब्धि बतायी गयी है | प्रेमसे श्रवण होता है; श्रवणसे
सत्सक्ष प्राप्त होता है और सत्सज्से शानी गुरुकी उपलब्धि
होती है | गुरुकी ऋपासे ज्ञान प्राप्त हो जानेपर मनुष्य निश्चय
ही.मुक्त हो जाता है | इसलिये जो संसझदार है; उसे सदा
शम्भुक़ा ही भजन करना चाहिये | जो अनन्य भक्तिसे युक्त
होकर शम्भुका भजन करता है, उसे अन्तमें अवश्य ही मोक्ष
प्रात हो जाता है। अतः मुक्तिकी प्रासिके लिये भगवान् शंकरसे
बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है | उनकी शरण लेकर जीव
संसारबन्धनसे छूट जाता है |...
ब्राह्मणो | इस प्रकार वहाँ पधारे हुए ऋषियोंने परस्पर
निश्चय करके जो यह शञानकी बात बतायी है। इसे अपनी
बुद्धिके द्वारा प्रयत्नपूवंक धारण करना चाहिये । मुनीश्वरों |
तुमने जो कुछ पूंछा थां। वहू सब मेने तुम्हें तबा दिया । इसे
॥।
४ नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने #
5 2 न - 7 हर “+-०-“>र्न३+3७६2-...-.+०-
हु बा | है ॥
ह्य् 555 १४०० | कक कद ाजिडटस पक
॥ कोटिरुद्ग॒संदिता सम्पृण ॥
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
तुम्हें प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये । बताओ, अब और
क्या सुनना चाहते हो !
वाहन जरा न्नीय। नमन पपन्नननी- समान करी मम सनम न्नमीननमम-मीयोपननमी पननमा-ी- करनी समा,
ऋषि वोले--व्यासशिप्य ! आपको नमस्कार है।
आप धन्य हैं; शिवभक्तोंम श्रेष्ठ हैं । आपने हमें शिवतत्त-
सम्बन्धी परम उत्तम ज्ञानका श्रवण कराया है । आपकी कपाे
हमारे मनकी भ्रान्ति सिट गयी | हम आपसे मोश्षदायक
शिवतत्त्वका ज्ञान पाकर बहुत संतुष्ट हुए हैं।
खसूतजीने कहा--छिजो ! जो नास्तिक हो, श्रद्धाहीन
हो और शठ हो; जो भगवान् शिवका भक्त न हो तथा इस
विषयको सुननेकी रुचि न रखता हो। उसे इस तत्तशनका
उपदेश नहीं देना चाहिये | व्यासजीने इतिहास, पुराणों) वेद
ओर शास्त्रोंका बारंवार विचार करके उनका सार निकालकर
मुझे उपदेश दिया है | इसका एक बार श्रवण करनेमात्रपे
सारे पाप भस्म हो जाते हैं; अभक्तको भक्ति प्राप्त होती ६
और भक्तकी भक्ति बढ़ती है | दुबारा सुननेसे उत्तम भक्ति
प्राप्त होती है | तीसरी बार सुननेसे मोक्ष प्राप्त होता है । अतः
भोग और मोक्षरूप फलकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इसका
बारंत्रार अवण करना चाहिये | उत्तम फलको पानेके उद्देशे
इस पुराणकी पाँच आदृत्तियाँ करनी चाहिये । ऐसा करनेपर
मनुष्य उसे अवश्य पाता है, इसमें संदेह नहीं है। क्योंकि यह
व्यासजीका वचन है | जिसने इस .उत्तम पुराणकों सुना है
उसे. कुछ भी दुलभ नहीं है ।
यह शिव-विज्ञान भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है |
यह भोग और मोक्ष देनेवाल्ा तथा शिवभक्तिकों बढ़ानेवाल
है । इस प्रकार मैंने शिवपुंयणकी यह चौथी आनन््ददापिनी
तथा परम पुण्यमयी संहिता कही है; जो कोटिस्दर्हिताई
नामसे विख्यात है | जो पुरुष एकाग्रचित्त हो भक्तिभावर्त हु
संहिताकोः सुनेगा या सुनायेगा) वह समस्त भोगोंका उपभोगकर्रो
अन्तमें परमगतिकों प्राप्त कर लेगा । ( अध्याय ४२ )
क ०० व नाक
गा
कर. है. अं है [९ 2
४). ->-चा65 (2 ढ>>-..4- ! ४ ६३५४
# शुर्भ ठब्घ्वा ्न- हृष्येत कुप्येलब्व्वाशुभ॑ नहि । इन्द्रेपु समता यस्य शानवानुच्यते' - दि सः ॥
न 3 कु * 3 [| ! । ९० है ग
(शि० पु० का० ९० सं० ४३ | ३* /
ध उमामंहिता
भगबाव् श्रीकृष्णके तपसे संतुष्ट हुए शिव ओर पार्वतीका उन्हें अभीष्ट वर देना तथा शिवकी महिमा
यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्नष्टा रजःसंश्रयः
संहत्तो तमसान्वितों गुणवर्ती मायामतीत्य स्थितः ।
तत्यानन्द्मनल्तवोधससर्ू .. बद्यादिसंज्ञास्पद
नित्यं सरवसमन्वयादघिगत॑ पूण शिव घीमहि ॥
'जो रजोगुणका आश्रय ले संसारकी सृष्टि करते हैं, सत्व-
गुण समन्न हो सातों भुचनोंका घारण-पोषण करते हैं, तमो-
ए॒ण्से युक्त हो सबका संहार करते हैं तथा त्िगुणमयी मायाकों
ढधकर अपने शुद्ध खरूपमें स्थित रहते हैं; उन सत्यानन्द-
खह्म; अनन्त बोधमय, निर्म एवं पूर्ण ब्रह्म शिवका हम
धान करते हैं। वे ही सश्किलमें ब्रह्मा, पालनके समय विष्णु
ओर संहरकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं तथा सदैव सात्विक-
भावक़ी अपनानेसे ही प्राप्त होते हैं ।
ऋ्रषि वोले--महाश्ानी व्यासशिष्य सूतजी ! आपको
नमसार है। आपने कोटिरद्र नामक चौथी संहिता हमें सुना
हे अब उमासंहिताके अन्तर्गत नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे
।
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छा
उक्त जो परमात्मा साम्व सदाशिवका चरित्र है; उसका वर्णन
फीजिये |
सूतजीते कहा--शोौनक आदि महर्षियो ! भगवान्
करका सहल्मय चरित्र परम दिव्य एवं भोग और मोक्षको
देनेवाल्त है | तुमलोग प्रेमसे इसका श्रवण करो पूर्वकाल्में
भनिवर व्यासने सनत्कुमारके सामने ऐसे ही पवित्र प्रश्नको
अखित किया था और इसके उत्तरमें उन्होंने भगवान् शिवके
उतत चरित्रका गान किया था |
उस समय पुत्रकी प्राप्तिके निमित्त श्रीकृष्णके हिसवान
९ जाकर महर्षि उपमस्युसे मिलने, उनकी बतायी हुई
'दतिके अनुसार भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करने;
[
ई उनके तपसे प्रसत्न होकर पावती, कार्तिकेय तथा गणेशसहित
| ! प न
शिविफ्ि है पर नै
कट होने तथा श्रीक्ृषष्णके द्वारा उनकी स्तुतिपूषक
थे हअरू॥ फेथा सुनाकर सनत्कुमारजीने कहा---श्रीकृष्ण-
उनकर भगवान् भव उनसे बोले--प्वासुदेव | तुमने
कक ९० कया है; वह सब पूर्ण होगा ।? इतना कहकर
न् शिव फिर वोले--. ध्यादवेन्द्र ! तुम्हें साम्त
तु
। के एक महापराक्रम्तो वलवान् पुत्र प्राप्त होगा। एक
अनपोने भयानक संवर्तक ( प्रल्यंकर ) सूर्यकी शाप
दिया था कि पुम मनुष्ययोनिर्मे उत्पन्न होओगे? अतः वे
संवतक सूय ही तुम्हारे पुत्र होंगे | इसके सिवा जो-जो वस्तु
तुम्हें अभीश है; वह सब तुम प्राप्त करो ।?
सनत्कुमारजी कहते हें---इस प्रकार परमेश्वर शिवसे
सम्पूर्ण बरोंको प्राप्त करके श्रीकृष्णने विविध प्रकारकी बहुत-
सी स्तुतियोंद्वारा उन्हें पूर्णतया संतुष्ट किया। तदनन्तर भक्त
वत्सला मिरिराजकुमारी शिवाने प्रसन्न हो उन तपस्री शिवभक्त
महात्मा वासुदेवसे कहा ।
पावेती बोलीं--परम बुद्धिमान वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण
में तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ । अनघ ! तुम मुझसे भी उन मनो-
वाब्छित बरोंको ग्रहण करो, जो भूतलपर दुलेभ हैं ।
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श्रीकृष्णने कहा--देवि | यदि आप मेरे इस सत्य
तपसे संतुष्ट है और मुझे वर दे रही हैँ तो में यद्द चाहता हैँ
कि ब्राह्मणोंके प्रति कभी मेरे मनमें ढेप ने दो; में सदा
द्विजोंका पूजन करता रहूँ । मेरे माता-पिता नद्ा _ मुझसे संतुष्ट
रहें | में जहां कहीं भी जाऊं समस्त ग्राणिवोंके प्रति मेरे
३९ दे
7 नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मण परमात्मने #
| संक्षित-शिवपुराणाइ
चतचच्च्च्च्चल्ललच्च्चचच्च्च्यच्चच्च्य्ऊ्ििििस्सिपफमपपन<त++---
हृदयमें अनुकूल भाव रहे | आपके दरशशनके प्रभावसे मेरी
संतति उत्तम हो। मैं सेकड़ों यज्ञ करके इन्द्र
आदि देवताओंको तृप्त करूँ | सहस्तरों साधु-संन्यासियों और
अतिथियोंकी सदा अपने घरपर अ्रद्धासे पवित्र अन्नका भोजन
कराऊं | भाई-बन्धुओंके साथ नित्य मेरा प्रेम बना रहे तथा
में सदा संतुष्ट रहेूँ ।
सनत्कुमारजी कहते हे--श्रीकृष्फा वह वचन
सुनकर .सम्पू्ण अमीशेंको देनेवाली सनातनी देवी पार्वती
विस्मित हो उनसे बोलीं---“वासुदेव | ऐसा ही होगा । तुम्हारा
कल्याण हो ।? इस प्रकार श्रीकृष्णपर उत्तम कृपा करके उन्हें
उन बरोंको देकर पार्वतीदेवी तथा परमेश्वर शिव दोनों वहीं
एलबम
अन्तर्धान हो गये | तदनन्तर. केशिहन्ता श्रीकृष्णने म॒निषा
उपमन्युको प्रणाम करके उनसे वर-प्राप्तिका सारा सम्राचार
बताया | तब उन मुनिने कहा--«“जनाद्दन ! संसारमें भगवान्
शिवके सिवा दूसरा कौन महादानी ईश्वर है तथा ऋषके उम्र
दूसरा कौन अत्यन्त दुस्सह हो उठता है | महायशख्ी गोविन्द !
दान) तप) शौर्य तथा स्थिरतामें शिवसे बढ़कर कौन है।
अतः तुम शम्भुके दिव्य ऐश्वयंका सदा श्रवण करते रहो ।#
तदनन्तर उपमन्युके द्वारा शिवकी महिमा सुननेके वाद
उन मुनीश्वर्को नमस्कार करके वसुदेवनन्दन केशव मन-दी-मन
शम्भुका स्मरण करते हुए! द्वारकापुरीको चले गये |
( अध्याय १-३ )
+>-> री दी७४८६२२६४५..-००
नरकमें गिरानेवाले पापोंका संक्षिप्त परिचय
सनत्कुमारजी कहते हें---व्यासजी | जो पापपरायण
जीव महानरकके अधिकारी हैं, उनका संक्षेपस्ते परिचय दिया
जाता है; सावधान होकर सुनो । परख्त्रीको प्राप्त करनेका संकल्प,
पराये घनको अपहरण करनेकी इच्छा, चित्तके द्वारा अनिष्ट-
चिन्तन तथा न करने योग्य कमेमें प्रदत्त होनेका दुराग्रह--ये
चार प्रकारके मानसिक पापकर्म हैं | असंगत प्रछाप ( बेसिर-
पैरकी बातें » असत्यभाषण; अप्रिय बोलना और पीठ पीछे
चुगली खाना--ये चार वाचिक ( वाणीद्वारा होनेवाले ) पाप-
कम हैं | अभक्ष्य-भक्षण; प्राणियोंकी हिंसा, व्यर्थंके कार्योंमें
लगना ओर दूसरोंके धनको हड़प लेना--ये चार प्रकारके
शारीरिक पापकर्म हैं | इस प्रकार ये बारह कर्म बताये गये;
जो मन वाणी ओर शरीर इन तीन साधनोंसे सम्पन्न होते हैं |
जो संसार-सागरसे पार उतारनेवाले महादेवजीसे द्वेष करते हैं,
वे सब-के-सब नरकोंके समुद्रमें गिरनेवाले हैं। उनको बड़ा भारी
पातक लगता है। जो शिवज्ञानका उपदेश देनेवाले तपस्वीकी:
गुरुजनोंकी ओर पिता-ताऊ आदिकी निन्दा करते हैं, वे उन्मत्त
मनुष्य नरक-समुद्रमें गिरते हैं | ब्रह्महृत्यारा, मदिरा पीनेवाला; सुवर्ण
चुरानेवाला; गुरुपत्नीगामी तथा इन चारोंसे सम्पर्क रखनेवाल्ा
पाँचवीं श्रेणीका पापी---ये सब-के-सब महापातकी कहे गये हैं।
जो क्रोपसे, लोभसे, भयसे तथा द्वघसे ब्राह्मणके
वधके लिये महान् मर्ममेदी दोपका वर्णन करता है,
वह त्रद्मद्दत्यारा होता है | जो त्राह्मणको बुल्मकर उसे कोई वस्तु
देनेके पश्चात् फिर ले लेता है तथा जो निर्दोष पुरुषपर दोषा-
रोपण करता है, वह मनुष्य भी ब्रह्महृत्यारा होता है। जो भरी
सभामें उदासीन भावसे बेठे हुएं श्रेष्ठ द्विजकों अपनी विद्याके
अभिमानसे अपमानित करके उसे निस्तेज ( हतप्रतिम ) कर
देता है; उसे ब्रह्मह॒त्यारा कहा गया है । जो दूसरोके यथा
गुणोंका भी बल्यत् खण्डन करके झूठे गुणोंद्वारा अपने आपको
उत्कृष्ट सिद्ध करता है, वह भी निश्चय ही अह्महत्यारा होता है।
जो सॉड़ोंद्वारा बाही जाती हुई गोओंके तथा गुरुसे उपदेश ग्रहण
करते हुए द्विजेंके कार्यमें विष्न डालता है, उसे बद्वहत्याग
कहते हैं | जो देवताओं, ब्राह्मणों तथा गौओंके उपयोगके लिये
दी हुईं भूमिको हर लेता है; उसे ब्रह्महत्यारा कह्य गया है।
देवता और ब्राह्मणके घनको हर लेना तथा अन्यायसे धन
कमाना ब्रह्महत्याके समान ही पातक जानना चाहिये । मिं0
किसी त्रत, नियम तथा यज्ञको ग्रहण करके उसे त्याग देना
तथा पशञ्चमहायशोंका अनुष्ठान न करना मदिरापानके समान
पातक बताया गया है | पिता और माताको त्याग देना शी
गवाही देना, ब्राह्मणसे झूठा वादा करना। शिव:
भक्तोंकी मांस खिलाना तथा अमभक्ष्य वस्तुका भा
करना ब्रह्महत्याके तुल्य कहा गया है | वनमें निसगा
प्राणियोंका वध कराना भी ब्रह्महत्याके ही ठ॒ल्य है | सर
पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणके धनको त्याग दे | उप परम
के कार्यमें भी न लगाये, अन्यथा त्रह्महृत्याका दोप लगता $ |
5520 , 2८ बज गन 2८० पल 5० >> +२># 5 >5 २2324. २७८ 32240 3 ने तल नकल कक
# महर्षि उपभन्युके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति शिवतत्तके उपदेश तथा उपमन्युकी कथा वायवायसंहितामें विस्तारसे कद्दी जायगी।
उम्ासंदिता ] # नरकम गिरानेवाले पापौंका संक्षिप्त सनन्नननननननसन2नर2न2नएन6 «५ पवब ४... ३९७ ५४ दननत्टअअ्स्क्कनन न चप ०४
गोरे मार्गमें, वनमें तथा गाँवमें जो छोग आग ढलगाते हैं, अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं तथा सहन न होनेपर
वे भी ब्रह्महत्या ही करते हैं | इस तरहके जो भयानक पाप
है वे ब्रह्नहत्याके समान माने गये हैं । ्
श्राह्मपक्े द्रव्यका अपहरण करनां, पंतृक समत्तिके बँटवारे-
में उलट-फेर करना, अत्यन्त अभिमान ओर अधिक को
करना; पालण्ड फैलाना, कृतघ्नता करना, विषयोंमें अत्यन्त
आमक्त होना; कंजूसी करना, सत्पुरुषोसे द्वेघ रखना परस्ती-
“मांग करना, श्रेष्ठ कुछकी कन्याओंको कलड्लित करना,
0 वोगबगीचे; सरोवर तथा ज्री-पुरुषोंका विक्रय करना;
तीयात्रा, उपवास तथा व्रत एवं उपनयन आदिका सौदा
करना, ज्ीके धनसे जीविका चलाना, स्रियोंक्रे अत्यन्त वशीभूत
शेना। प्लियोंकी रक्षा न ऊरना तथा छलसे परायी ब्नरियोंका
पवन करना, बक्षचर्य आदि | प्रतोंको त्याग देना; दूसरोंके
ऑचारका सेवन करना, असत्-शात्रोंका अध्ययन करना,
पूरे तकंका सहारा लेना, देवता, अग्नि, गुरु, साधु तथा
नक्षणकरी निन््दा करना, पितयज्ञ ओर देवयशको त्याग देना,
बुरे स्वभावकों अपनाना,
गासिक होना, पापोमें ना ओर सदा श्वूठ बोलना---इस
तर्क पापोसे युक्त ज्ी-पुरुषोंको उपपातकी कहा गया है |
गे मनुष्य गैओं, ? स्वामी, मित्र तथा
"सती मह्त्माओंक़े कार्य नष्ट कर देते हैं, वे नरकगामी माने
है| जो जहणोको हु: देते है उन्हें मारनेके लिये शज््र
व है, जे द्िज होकर ब्रोंकी सेवा करते हैं तथा जो
वश मदिरापान करते हैं, जे गपपरायण, क्र तथा हिंसा-
* प्री हे जो गरेशाल्में, अमिमें, जलमें, सड़कोंपर,
पे तप वगीचोम तथा देवमवक न
पे जमा त्याग करते हैं, बॉस, इंट, पत्थर, काठ,
ह । और कीलोंद्वारा जो पस्ता रूघते या रोकते हैं, दुसरोंके
ते मेड़ ) मिय देते हैं, छलसे शासन
प्ले हैं, छल-कपटके ही कार्योमें छगे रहते हैं, किसीको ठग-
ही उपयोग
ह मित्र, वाल, बृद्ध, ढुबेल। आतुर;
'.. भृत्र, कक *अुजनोंको भूखे छोड़कर खय॑ खा लेते
मा उप खयं नियमोंकों ग्रहण करके फिर उन्हें
प बा रण करके भी फिरसे घर बसा छेते
। क्् 'पमाका भेदन करनेवाले हैं, गोओंको
रत हे
दे भरते और बारंबार उनका दमन करते हैं, जो
उमेका पोषण नहीं करते, सदा उन्हें छोड़े रखते हैं,
भी बल्पूर्वक उन्हें हल या गाड़ीमें जोतते हैं अथवा उनसे
असह्य बोझ सिंचवाते हैं, जो उन पञ्चओंकोी खिलाये बिना
है भार ढोने या हल खींचनेके काममें जोत देते हैं,
बंधे हुए भूखे पश्चुओंको चरनेके लिये नहीं छोड़ते तथा
भारसे घायछ, रोगसे पीड़ित और भूखसे आतुर गाय-
यत्नपूंक पालन नहीं करते; वे सब-के-सब गो-
' हत्यारे तथा नरकगामी माने गये हैं |
जो पापिष्ठ मनुष्य बेलोके अण्डकोश कुटवाते हैं और
पन््ध्या गायको जोतते हैं, वे महानारकी हैं। जो आशासे घर-
पर आये हुए भूख, प्यास और परिश्रमसे कष्ट पाते हुए और
अन्नकी इच्छा रखनेवालि अतिथियों,
पुरुषों, दीनों, वाल) वृद्ध, ढुबंल एवं रोगियोंपर कृपा नहीं
करते, वे मूढ़ नरकके
] उसका कमाया हुआ धन घरमें ही रह जाता है | भाई-
बन्धु भी +मशानतक जाकर छोट आते हैं, केवछ उसके किये
जो औचित्यकी सीमाको लॉघकर मनभाना कर वसूल करता
है तथा दूसरोंको दण्ड देनेमें ही रुचि रखता है, वह राजा
नरकमें पकाया जाता है | जिस राजाके राज्यमें प्रजा घूसखोरों,
अपनी रुचिक्रे अनुसार कम दाम देकर अधिक कीमतका माल
ले लेनेवाले अधिकारियों तथा चोर-डाकुओंसे अधिक सतायी
जाती है, वह राजा भी नरकोंमें पकाया जाता है | परायी
स्त्रियोंक्रे साथ व्यभिचार और चोरी करनेवाले प्रचण्ड पुरुषों-
को जो पाप छगता है, वही परख्रीगामी राजाको भी लगता
है। जो साधुको चोर और चोरकों साधु समझता है तथा बिना
'बिचारे ही निरपराघको प्राणदण्ड दे देता है; वह राजा नरकमें
पड़ता है | जिस किसी पराये द्रव्यकों सरसों वरावर भी चुरा
लेनेपर मनुष्य नरकमें गिरते हैं, इसमें संशय नहीं है | इस
तरहके पापसे युक्त मनुष्य मरनेके पश्चात् यातना भोगनेके
लिये नूतन शरीर पाता है; जिसमें सम्मृर्ण आकार अभिव्यक्त
रहते हैं | इसलिये किये हुए. पापका प्रायश्रित्त कर लेना
चाहिये | अन्यथा सो करोड़ कत्योंमें भी बिना भोगे हुए
पका नाश नहीं हो सकता | जो मन, वाणी और शसेर-
दारा खबं पाप करता, दूसरेसे कराता तथा किसीके दुष्कमका
अनुमोदन करता है; उसके लिये पायगति ( नरक ) दी
फल है | ( अध्याय ४-६ )
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४: नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने # -
[ संक्षिप्त-शिवपुराणो:
आजा चर अत. कमा थता.. मीना मीन पानी जमा. सभी चारमा. पानी खाना. कतार. आननी अमन्-.. समन
"+बाउक:;:॒ब2 .+4-आा2 रा. पाााााायाधात्रानाभान्राना नाना भा भोममानाानाााााााााा जाम आ अर + का ममकरसल वीक
अमन... कक ता. ऋानमीया' फामनीी. सनी. खबानी.. सब... गत कमा. आन) अमाम. जुनि.. हे. खानी. मन इमा".. बरी.
पापियों और प्रुण्यात्माओंकी यमलोकयात्रा
सनत्कुमारजी कहते हँ---व्यासजी ! मनुध्य चार प्रकारके
पापोंसे यमलोकमैं जाते हैं | यमलछोक अत्यन्त भयदायक और
भयंकर है | वहाँ समस्त देहधारियोंको विवश होकर जाना
पड़ता है। कोई ऐसे प्राणी नहीं हैं, जो यमलोकमें न जाते हों ।
किये हुए. कर्मका फल कतौको अवश्य भोगना पड़ता है;
इसका विचार करो । जीवोंमें जो शुभ कर्म करनेवाले, सौम्य-
चिंत्त और दयांछ हैं, वे सोम्यमार्गसे यमपुरीके पूर्व द्वारको
जाते हैं | जो पापी पापकर्मपरायण तथा दानसे रहित हैं; वे
भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोककी यात्रा करते हैं । मरत्य॑लोक-
से छियासी हजार योजनकी दूरी लाॉँधकर नानारूपवाले यम-
छोककी स्थिति है, यह जानना चाहिये | पुण्यकर्म करनेवाले
छोगोंको तो वह नगर निकटवर्ती-ला जान पड़ता है; परंतु
भयानक मार्गसे यात्रा करनेवाले पापियोंकी वह बहुत
दूर स्थित दिखायी देता है | वहाँका मार्ग कहीं तो तीखें
कॉॉंसे युक्त है; कहीं कंकड़ोंसे व्याप्त है; कहीं छूरेकी धार-
के समान तीखे पत्थर उस मार्गपर जड़े गये हैं, कहीं बड़ी
भारी कीचड़ फेली हुई है । बड़े-छोटे पातकोंके अनुसार
वहाँकी कठिनाइयोंमें भी भारीपन और हल्कापन है । कहीं-
कहीं यमपुरीके मागगपर लोहेकी सुईके समान तीखे डाभ
फेले हुए हैं।
तद्ननन््तर यमपुरीके मार्गकी भीषण यातनाओं और
कणष्टोका वणन करके सनत्कुमारजीने कह[--व्यासजी |
जिन्होंने कभी दान नहीं किया है; वे छोग ही इस प्रकार
दुःख उठाते ओर सुखकी याचना करते हुए. उस मार्गपर
जाते हैं । जिन्होंने पहलेसे ही दानरूपी पायेय (राहखच ).
ले रक््ला है, वे सुखपूवंक यमलोककी यात्रा करते हैं |
इस रीतिसे कष्ट उठाकर पापी जीव जब प्रेतपुरीमें पहुँच जाते
हैं, तब उनके विषयमें यमराजको सूचना दी जाती है ।
उनकी आशा पाकर दूत उन पापियोंकों यमराजके आगे छे
जाकर खड़े करते हैं | वहाँ जो शुभ कर्म करनेवाले लोग
होते हैं, उनको यमराज स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और
अब्य॑ निवेदन करके प्रिय वर्तावके द्वारा सम्मानित करते हें
और कहते हँ--:वेदोक्त कर्म करनेवाले महात्माओ | आप-
लोग धन्य हैं, जिन्दींने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्म
किया द | अतः आपल्ेग दिव्याज्ननाओंके भोगसे भूपित ...
त््च्क
#2 शिय-हय हा है कप 329... पाना छा []
४/ या +> जल के था कापर का कर कफ 2;
जज +
॥॥॥
ि की] ।
+
जज 2 ॥ै5 ॥|।
-
तथा सम्पूर्ण मनोवाज्छित पदार्थोंसे सम्मन््न निर्मल खगलोकर
जाइये । वहाँ महान् भोगोंका उपभोग करके अन्त पुष्यक
क्षीण हो जानेपर जो कुछ थोड़ा-सा अश्युभ शेष रह जायः उसे
फिर यहाँ आकर भोगियेगा |? जो धर्मात्मा मनुष्य होते है वे
मानो यमराजके लिये मित्रके समान हैं। वे यमराज
सुखपूबक सोम्य धर्मराजके रूपमें देखते हैं । -
किंतु जो क्रूर कर्म करनेवाले हैं; वे यमराजकों भा
रूपमें देखते हैं | उनकी दृष्टिमें यमराजका मुख दाढकि
विकराल जान पड़ता है। नेन्न टेढी भोहेंसे युक्त प्रतीत होते है |
उनके केश ऊपरको उठे होते हैं | दाढी-मूँछ बड़ी-बड़ी होती है |
ओठ ऊपरकी ओर फड़कते रहते हैं । उनके अगर
भुजाएँ होती हैं, वे कृपित तथा काले कोयलोंके ढेर-से दिखायी
देते हैं | उनके हाथोंमें सब प्रकारके अख्न-शस्त्र उठे होते |
वे सब प्रकारके दण्डका भय दिखाकर उन पापियोंकों डस्ते रहे
हैं | बहुत बड़े मैंसेपर आरूढ़, छाछ वल्र और छाल मार्ट
धारण करके बहुत ऊँचे महामेरुके समान इृश्टिगोचर दवोत॑ ई |
उनके नेत्र प्रज्यलित अग्निके समान उद्दीत्त दिखायी देते ६ ।
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# उनका शब्द प्रलयकालके मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर होता
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# सरकौंकी अद्वाईस कोटियाँ तथा रौरवादि नरकोंकी नामावली #
३९९,
है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महासागरकों पी रहे हैं,
गिरिराजको निगल रहे हैं ओर मुँहसे आग उगल रहे हैं |
(>> पिन ओआऋनना- हक. ही 3यही कौ. कननी
उनके समीप प्रछ्यकालकी अग्निके समान प्रभावाले मृत्यु
देवता खड़े रहते हैं। काजलके समान काले कालदेवता और
भयानक ऋतान्त देवता भी रहते हैं | इनके सिवा मारी, उम्र
महामारी, भयंकर कालरात्रि, अनेक प्रकारके रोग तथा भौँति-
मॉतिके भयावह कुष्ठ मूर्तिमांन् हो हाथोंमें शक्ति, झूल;
अछ्ुश) पाश) चक्र और खड्ग लिये खड़े रहते हैं ।
बज़तुल्य मुख धारण करनेवाले रुद्रगण क्षुझ तरकस और
धनुष धारण किये वहाँ उपस्थित होते हैं | सभी नाना प्रकारके
आयुध घारण करनेवाले; महान् वीर एवं भयंकर हैं
इनके अतिरिक्त असंख्य महावीर यमदूत, जिनकी अज्ञकान्ति
काले कोयलेके समान काली होती है; सम्पूर्ण अस्न-शत्त्र लिये
बढ़े भयंकर जान पड़ते हैं | ऐसे परिवारसे घिरे हुए घोर
यमराज तथा भीषण चित्रगुप्तको पापिष्ठ प्राणी देखते हैं ।
यमराज उन पापकर्मियोंकों बहुत डॉव्ते हैं और भगवान्
चित्रगुप्त धर्मयुक्त वचनोंद्वारा उन्हें समझाते हैं| ( अध्याय ७ )
नरकोंकी अड्भाईस कोटियों तथा प्रत्येकके पाँच-पाँच'नायकके ऋरमसे एक सो
चालीस रोखादि नरकोंकी नामावली
सनत्कुमारजी कहते हं--व्यासजी | तदनन्तर यमदूत
अलन्त तपे हुए पत्थरपरं बड़े वेगसे दे मारते हैं;
गाने वज़से बड़े-बड़े वृक्षोंकी धराशायी कर दिया गया हो ।
उप समय शरीरसे जजर हुआ देहघारी जीव कानसे खून
ने लगता है और सुध-बुध खोकर निश्वेष्ट हो जाता है ।
मे बायुका स्र्श कराकर वे यमदत फिर उसे जीवित कर
हैं ओर उसके पापोंकी शद्धिके लिये उसे नरक समुद्र
.. औठ देते हैं। परथ्वीके नीचे नरककी सात कोटियों हैं, जो
है '। तेलक अन्त घोर अन्धकारके सीतर स्थित हैं | उन
हो अद्ईंस क्ोटियाँ हैं । पहली कोटि घोरा कही गयी है ।
है एे नुषोग है; जो उसके नीचे खित है | तीसरी अतिब्रोरा,
, रेप मशकेण, पॉचर्वी घोररूपा, छठी तलातला; सातर्वी
८ जप हज ऋल्रात्रि, नर्वी भयोत्तणआ, उसके नीचे
। कप ) उसके भी नीचें महाचण्डा, किए चण्डकोछाहल्य
निन्न प्रचण्डा है, जो चण्डोंकी नाविका ऋंही गयी
३
है; उसके बाद पद्मा। पद्मावती, भीता ओर भीमा है,
भीषण नरकोंकी नायिका सानी गयी है | अठारहवीं कराला)उन्नीसर्वी
बिकराला और बीसर्वी नरककोटि वज्रा कही गयी है | तदनन्तर
त्रिकोणा। पद्मकोणा, सुदीर्धा, अखिलातिंदां, समा, भीमवला,
भोग्रा तथा अद्यईसवीं दीप्तप्राया है । इस प्रकार मैंने तुमसे
भयानक नरक-कोटियोंके नाम बताये हैं | इनकी संख्या
अठ्ठाईस ही है । ये पापियोंकों यातना देनेवाढी हैं । उन
कोटियोंके क्रशः पॉच-पाॉँच नायक जानने चाहिये ।
अब उन सब कोटियोंके नाम बताये जाते हैं, मुनों। उनमें
प्रथम रोरव नरक है) जहाँ पहुँचकर देहधारी जीव रोने लगते ह।
महारौरवकी पीड़ासे तो महान् पुरुष भी रो देते हैं । इसके
वाद शीत और उष्ण नामक नरक हैं । फ़िर सुधोर, दे ।
रोखसे सुधोरतक आदिके पाँच नरक नावक माने गये ईं |
इसके वाद सुमहातीद्ष्ण, संजीवन) महातम) विलोस, विल्येप,
कण्टक) तीत्रवेग) कराल, विकराल: प्रकृम्पमन: मह्यवक्रः
छु००
काल, कालसून्र। प्रगर्जन) सूचीमुख/ सुनेतिः खादकः
सुप्रपीडन, कुम्मीपाक, सुपाकः-क्रकच; अतिदारुण; अज्जञार-
राशिभवन/ मेरु। असुक्प्रहित। तीक्ष्णतुण्ड; शकुनि; ह
महासंवतंक, क्रतु) तप्तजन्तु) पहुलेप, प्रतिमांस, तरपूद्धव
उच्छवास, सुनिरुच्छवास, सुदीर्घ, कूट्शाल्मलि, दुरिष्ट,
समहावाद) प्रवाद, सुप्रतापन, मेघ, दूध; शाल्म, सिंहमुख;
व्याप्रमुख, गजमुख; कुक्कुरमुख, सृकरमुख, अजमुख, महिष-
मुख, घृकमुख; कोकमुख; ब्ुकमुख, ग्राह, कुम्मीनस, नक्र;
से कूम) काक) णभ्र। उद़क, हलोक, शादूंल, क्रथ, क्कठ)
मण्छूक, पूतिमुल, रक्ताक्ष) पूतिस्त्तिक। कणधूम्र, अग्नि,
कृमि) गन्धिवपु, अग्नीध्र; अप्रतिष्ठ, रधिराभ, श्वभोजन; लाला-
भक्ष) अन्त्रमक्ष) स्वभक्ष, सुदारुण, कण्टक, सुविशाल; विकट;
कटपूतन) अम्बरीष, कयाह, कष्टदायिनी वैतरणी नदी) सुतस्त-
लोहशयनः एकपाद प्रपूरण, घोर असितालवन; अस्थिभज्ञ
४ नमों रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
॥ संक्षिप्त-शिवपुराणाड
१34७ ##४७७७७७४७-७७#७##&###छ७धाआा2४2७9७७७७७2७ ८८८७2 4७5 सर कक 8. की सामपमपफायताअइ कया सभा पयह कर यदधर्कान पर
सुपूरण, विछातस, असुयन्त्र, कूटपाश) प्रमर्दन, महाचूष॑
असुचूण; तप्तढोहमय) पर्वत, छ्ुरधारा; यमलपर्बत, मूचकृप
विष्ठाकूप, अश्रुकूप, शीतल क्षारकूप, मुसलोदूखल) यन्त्र, शिलष,
शकट, लाड़ल, तालपत्रवन, असिपतन्रवन, महाशकर-
मण्डप, सम्मोह; अस्थिभन्ञ) तप्त, चश्चल/ अयोगुड ( लेहेकी
गोली ), वहुदुःख, महाक्लेश, कश्मछ; शमल, मदर
हालाहल, विरूप, खरूप, यमानुग/ एकपादः त्रिपाद तीर
अचीवर ओर तम |
इस प्रकार ये अटूठाईस नरक और क्रमशः उनके पॉच-
पाँच नायक कहे गये हैं | अदठाईस कोटियोंके क्रमशः गेख
आदि पॉच-पाँच ही नायक दताये जाते हैं। उपयुक्त २८
कोय्योंको छोड़़र लगभग सो नरक माने जाते हैं ओर
महानरक-मण्डल एक सो चालीस नरकोंका बताया
गया है | # ( अध्याय ८ )
+->>-<8%2872-9-*--
विभिन्न पापोंके कारण मिलनेवाली नरकयातनाका वर्णन तथा कुक्कुखलि, काकबलि
एवं देवता आदिके लिये दी हुईं बलिकी आवश्यकता एवं महत्ताका प्रतिपादन
सनत्कुमारजी कहते है--व्यासजी | इन सब भयानक
पीड़ादायक नरकोंमें पापी जीवोंको अत्यन्त भीषण नरकयातना
भोगनी पड़ती है। जो मिथ्या आगम ( पालण्डियोंके शास्त्र )
में प्रवनत्त होता है; वह द्विजिह नामक नरकमें जाता है ओर
जिहाके आकारमें आधे कोसतक फेले हुए तीकष्ण हलोंद्वारा
वहाँ उसे विशेष पीड़ा दी जाती है | जो क्रूर मनुष्य माता-
पिता और गुरुको डॉय्ता है; उसके मुँहमें कीड़ोंसे युक्त विष्ठा
दूँसकर उसे खूब पीठ जाता है । जो मनुष्य शिवमन्दिर
बगीचे, बावड़ी; कूप, तड़ाग तथा ब्राह्मणके स्थानको नष्ट-
भ्रष्ट कर देते ओर वहाँ स्वेच्छानुसार रमण करते हैं; वे नाना
प्रकारके भयंकर कोल््हू आदिके द्वारा पेरे ओर पकाये जाते
हैं तथा प्रर्यकालपयेन्त नरकाम्रियोंम पकते रहते हैं ।
परस्त्रीगामी पुरुष उस-उस रूपसे ही व्यभिचार करते हुए
मारे-पीटे जाते हैं । पुरुष अपने पहले-जेसे शरीरकोी धारण
करके लोहेकी बनी ओर खूब तपायी हुई नारीका गाढ़
आलिज्ञन करके सब ओरसे जलते रहते हैँ । वे उस
दुराचारिणी स््रीका गा आलिन्नन करते और रोते हैं । जो
सत्पुरुषोंकी निन्दा सुनते हैँ, उनके कानोंमें लोहे या तंबे
आदिकी बनी हुई कीलें आगसे खूब तपाकर भर दी जी
हैं; इनके सिवा जस्ते, शीशे और पीतछको गलाकर पानीकें. -
समान करके उनके कानमें मरा जाता है । फिर वारंबाए
गरम दूध और खूब तपाया हुआ तेल उनके कानोमें डाल
जाता है | फिर उन कानोंपर वज्ञका-सा लेप कर दिया जाता
है| इस तरह क्रमशः उनके कानोंकों उपर्युक्त वखुओंए
भरकर उनको नरकोंमें यातनाएँ दी जाती हैं | क्रमशः सभी
नरकोंमें सब ओर ये यातनाएँ: प्राप्त होती हैं और सभी
नरकोंकी यातनाएँ बड़ा कष्ट देनेवाली होती हैं । जो माता:
पिताके प्रति भौंहिं टेढी करते अथवा उनकी ओर उद्दण्डताः
पूर्वक दृष्टि डालते या हाथ उठाते हैं, उनके मुखोंकों अन्त
लेहैकी कीलोंसे दृढ़तापूर्वक भर दिया जाता है | जो मंद
लुभाकर स्लियोंकी ओर अपलक दृश्सि देखते हैं, उनकी आता
में तपाकर आगके समान छाल की हुई सूड॒याँ मर दी जाती ९!
जो देवत अ्नि; गुरु तथा ब्राह्मणोंकों अप्रमाग निवेदन
किये बिना ही भोजन कर छेते हैं; उनकी जिहा और मु
लोहेकी सेकड़ों कीें तपाकर टूँस दी जाती है| जी दा
धर्मका उपदेश करनेवाले महात्मा कथावाचककी निन्दा कले
# यहाँ अद्भाईस कोटियोंका पहले पृथक वर्णन आया है, फिर प्रत्येकके पाँच-पॉच नायक बताकर ठीक एक सी चार्लीतत तब
नामोल्लेख किया गया दे । कोटियेंकी संख्या मिला देनेसे सब एक सौ अभइसठ होते हैं ।
उम्रासंहिता | # यमठोकके मार्ग खुविधा प्रदान करनेवाझे विविध दानोंका वर्णन #
है देवता, अम्रि ओर गुरुके मक्तोंकी तथा सनातन धर्मशासत्रकी
भी खिलियां उड़ाते हैं, उनकी छाती, कण्ठ) जिह्ना; दॉतोंकी
पंधि, ताड; ओठ, नासिका, मस्तक तथा सम्पूर्ण अज्ञोकी
संधिये्भ आयके समान तपायी हुईं तीन शाखावाली लेहेकी
कील मुद्गरोंसे ठोकी जाती हैं| उस समय उन्हें बहुत कष्ट
ऐैता है । तलरश्रात् सब ओरसे उनके घार्वोपर तपाया हुआ
| नमक छिड़क दिया जाता है| फिर उस शरीरमें सब ओर
' वह भारी यातनाएँ होती हैं। जो पापी शिव-मन्दिरके पास अथवा
देवताके वगीचोंमें मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनके लिक्
ओर अण्डकोशको लोहेके मुद्ररोंसे चूर-चूर कर दिया जाता है
तथा आगे तपायी हुई सूइयाँ उसमें भर दी जाती हैं, जिससे मन
भीरं इच्धरियोंको महान् दुःख होता है । जो धन रहते हुए भी
एके कारण उसका दान नहीं करते और भोजनके
उमय घरपर आये हुए अतिथिका अनादर करते हैं, वे पाप-
कल पाकर अपवित्र नरकमें गिरते हैं& । जो कुत्तों और
गेओंक्र उनका भाग अर्थात् बलि न देकर खय॑ भोजन कर
पते ह उनके खुले हुए मुँहमें दो की्लें ठोक दी जाती हें
| पमगजके मार्कका अनुसरण करनेवाले जो श्याम और शब॒
_* ६ सवले तथा चितकबरे ) दो कुत्ते हैं, में उनके लिये यह
अन्रका भाग देता हूँ, वे इस बलिको ग्रहण करें |? पश्चिम,
गद्य दक्षिण और नेकऋंत्य दिश्ामें हनेवाले जो पुण्यकर्मो
कोए हैं बे मैरी इस दी हुईं वलिक़ो ग्रहण करें? इस अभिप्रथाके
ऐे मन्ेसे क्रमशः कुत्ते और कोएको बलि देनी चाहिये । जो
दे। यलपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके विधिवत् अम्निमें
शिव्सम्बन्धी सन््त्रोंद्रार बलि समर्पित करते हूं,
ला रे त पे जा“ 3९ ललक के में कमनलकर लक 75्के कर नह: ४2 करे प5
डे०२ै
वे यमराजकों नहीं देखते और खर्ममें जाते हैं। इसलिये
प्रतिदिन बलि देनी चाहिये |
एक चोकोर मण्डप बनाकर उसे गन््ध आदिसे
अधिवासित करे | फिर ईशानकोणमें धन्वन्तरिके लिये और
पूर्व दिशामें इन्द्रके लिये बलि दे। दक्षिण दिशामें यमके
लिये, पश्चिम दिज्यामें सुदक्षोमके लिये और दक्षिण दिशामें
पितरोंके लिये बलि देकर पुनः पूर्व दिशामें अयमाको अबका
भाग अर्पित करे । द्वारदेशमें धाता और विधाताके लिये बलि
निवेदन करे | तदनन्तर कुर्तों) कुत्तोंके स्वामी और पक्षियोंके
लिये भूतलपर अन्न डाल दे | देवता, पिंतर; मनुष्य, प्रेत,
भूत; गुह्यक, पक्षी, कृमि ओर कीट--ये सभी गहस्थसें अपनी
जीविका चलाते हैं| खाह्यकार, खधाकार; वषटकार तथा
हन्तकार--ये धर्ममयी घेनुके चार स्तन हैं। खाह्मकार नामक
स्तनका पान देवता करते हैं, खधाका पितर लोग) वषटकार-
का दूसरे-दूसरे देवता और भूतेश्वर तथा इन्तकार नामक
स्तनका सदा ही मनुष्यगण पान करते हैं। जो मानव श्रद्धा-
पूर्वक इस धर्ममयी घेनुका सदा ठीक समयपर पालन करता
है, वह अम्निह्ेत्री हो जाता है। जो खस्थ रहते हुए भी
उसका त्याग कर देता है; वह अन्धकारपूर्ण नरकमें ड्बता
है | इसलिये उन सबको बलि देनेके पश्चात् द्वारपर खड़ा
हो क्षणमर अतिथिकी प्रतीक्षा करे | यदि कोई भूखसे पीड़ित
अतिथि या उसी गाँवका निवासी पुरुष मिल जाय तो उसे अपने
भोजनसे पहले यथाशक्ति शुभ अन्नका भोजन कराये । जिसके
घरसे अतिथि निराश होकर छोटता है; उसे वह अपना पाप दे
बदलेमें उसका पुण्य लेकर चला जाता है।। ( अध्याय ९-१० )
" जअन्च्च्का्इ्स.-
कि थमलोकके मार्गमें सुविधा अदान करनेवाले विविध दानोंका वर्णन
कक न्यासजी बोले--प्रभो ! पापी मनुष्य बड़े दुःखसे दीजिये, जिनसे जीव सुखपूर्वक यममार्गपर यात्रा करते हैं ।
। जे १५५ हल
+ भोगम जाते 7---7--.. आप मुझे उन धर्मोका परिचय खनत्कुमारजीने कहा--सुने ! अपना किया हुआ | अब आप मुझे उन धर्मीका परिचय
है 4 पेत्पपि ये दान न प्रवच्छन्ति तृष्णया ॥
सनत्कुमारजीने कहा--मुने ! अपना किया हुआ
भतिर्थि चावमन्यते काले प्राप्त मृहाश्रमे | तस्मात् ते दुष्कृतं प्राप्य ग्च्छन्ति निरवेड्शुचौ॥
| श्यामश्च
थे वा
शबलश्षेव॒
परुणवायब्या
( भतिषिव॑स्य भग्नाशो
पे
'४९ ३७ झं० ५२...
(शि० पु० उ० सं० १० । ३१-३२ )
यममार्यानुरोपको । यो छ्तस्ताम्यां प्रवच्छामि तो गृष्ठीतमिर्म॑ वलिस, ॥
याम्या नेक्रंत्यवायसा: । वायसा: पुण्यकर्माणस्ते प्रगृहन्तु में
ब॒लिन ॥
( शि० पु० उ० सं० २० । ३५-३६ )
गद्ात्मति. निवर्तते । सतल्मे दुष्कृतं दत्ता पुण्यनादाय गच्छति ॥
( शि० पु० 3० सं० 2०५; ४८ )
छ०२
अमशम का विना विचरे किक हक जो ७३३ 7 स्स्क्लनलननननत+ कर्म बिना विचारे विवश होकर भोगना पड़ता है।
अब में उन धर्मोंका वर्णन करता हूं; जो सुख देनेवाले हैं |
इस छोकमें जो श्रेष्ठ कर्म करनेवाले, कोमलछचित्त और दयाल
पुरुष हैं, वे भयंकर यममार्गपर सुखसे यात्रा करते हैं । जो
श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जूता और खड़ाऊ दान करता है, वह मनुष्य
विशाल घोड़ेपर सवार हो बड़े सुखसे यमलोकको जाता है |
त्र दान करनेसे मनुष्य उस मार्गपर उसी तरह छाता लगाकर
चलते हैं, जैसे यहाँ छातेवाले छोग चलते हैं | शिविकाका दान
करनेसे मनुष्य रथके द्वारा सुखसे यात्रा करते हैं | शय्या और
असनका दान करनेसे दाता यमलोकके मार्गमें विश्राम करते
ड० सुलपू्षक जाता है। जो बगीचे लगाते और छायादार वृक्षका
आरोपण करते हैं अथवा सड़कके किनारे वृक्षारोपण करते हैं,
वे धूपमें भी बिना कष्ट उठाये यमलोकको जाते हैं । जो मनुष्य
ऊलवाड़ी लगाते हैं, वे पुष्पक विमानसे यात्रा करते हैं |
देवमन्दिर बनानेवाले उस मार्गपर घरके भीतर क्रीड़ा करते
हैं । जो यतियोंके आश्रमका निर्माण कराते हैं और अनाथोंके
लिये घर बनवाते हैं, वे भी घरके भीतर क्रीड़ा करते हैं । जो
देवता, अग्नि) गुरु) ब्राह्मण, माता और पिताकी पूजा करते
हैं; वे मनुष्य खयं भी पूजित हो अपनी इच्छाके अनुकूल
मार्गद्वारा सुखसे यात्रा करते हैं | दीपदान करनेवाले मनुष्य
सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जाते हैं | गहदान
करनेसे दाता रोग-शोकसे रहित हो सुखपूवक यात्रा करते हैं |
गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले मानव विश्राम करते हुए जाते हैं ।
बाजा देनेवाले उसी तरह सुखसे यात्रा करते हैं, मानो अपने
धर जा रहे हों | गोदान करनेवाले लोग सम्पूर्ण मनोवाज्छित
वस्तुओंसे भरें-पूरे मार्गद्वारा जाते हैं | मनुष्य उस मार्गपर इस
छोकमें दिये हुए. अन्न-पानको ही पाता है । जो किसीको पैर
धोनेके लिये जल देता है, वह ऐसे मार्गसे जाता है, जहाँ जल-
की सुविधा हो | जो आदरणीय पुरुषोंके पेरोंमें उबटन लगाता
है, वह घोड़ेकी पीठपर बैठकर यात्रा करता है ।
व्यासजी | जो पाय) अम्यज्ञ ( अज्ञराग ), दीपक, अन्न
ओर घर दान करता है, उसके पास यमराज कभी नहीं जाते |
सुवर्ण और रत्नका दान करनेसे मनुष्य दुगम संकटों और
स्थानोंकी लॉँबता हुआ जाता है | चॉँदी, गाड़ी ढोनेवाले बेल
और फूल्ोंकी माल्या दान करनेसे दाता सुखपूर्वक यमलोकमें
जाता है | इस तरहके दानोंसे मनुष्य सुखपूर्वक यमल्लेककी
यात्रा करते हैँ और खर्गमें सदा माति-भाँतिके भोग पाते हैं |
तब दानोंमें अन्नदानको ही उत्तम बताया गया है। क्योंकि
# नम्रो रुद्गाय शान्ताय बह्मणे परमात्मने ::
| संक्षिप्त-शिव्रपुराण
वह तत्काल तृप्ति प्रदान करनेवाल्य, मनको प्रिय लगनेव
है. ० ञप ्चु
तथा बल और बुद्धिको बढ़ानेबाला है। मुनिश्रेष्ठ ! अन्नदाः
पमान दूसरा कोई दान नहीं हैं। क्योंकि अन्ने ही प्रा
उत्तन्न होते हैं ओर अन्नके अभावमें मर जातें हैं | अतण
अन्नदानसे महान् पुण्य बताया गया है; क्योंकि अन्नके दि
भूखकी आगसे तप्त हुए समस्त प्राणी मर जाते हैं। आ
अन्नकी ही सब छोग प्रशंसा करते हैं; क्योंकि अन्नमें ही
कुछ प्रतिष्ठित है | अन्नके समान दान न तो हुआ है ओर;
होगा | मुने | यह सम्पूर्ण जगत् अन्नसे ही धारण किया जात
है । लोकमें अन्नको वलकारक बताया गया है; क्योंकि अन्ना
| छोकमें अन्नको बल ताया गया है;
ही प्राण प्रतिष्ठित हैं |#
ना हुए अन्नकी कभी निन््दा न करे और न किसी
तरह उसे फेंके ही | कुत्ते और चण्डाल्के लिये भी ब्रिया
5आ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता | जो मनुष्य थके-मोँदे
और अपरिचित पथिकको अन्न देता है और देते समय कष्ा
अनुभव नहीं करता, वह समृद्धिका भागी होता है |
महामुने ! जो देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंक
अन्नसे तृत्त करता है, उसे महान पुण्यफलकी प्राति होती है।
अन्न ओर जलका दान झूद्र और ब्राह्मणके लिये भी समानर्म- क्
से महत्त्व रखता है | अन्नकी इच्छावाले पुरुषसे उसका गोत्र;
शाखा, खाध्याय और देश नहीं पूछना चाहिये |
अन्न साक्षात् ब्रह्मा है; अन्न साक्षात् विष्णु और शिव है |
इसलिये अन्नके समान दान न हुआ है और न होगा | जे
पहले बड़ा भारी पाप करके भी पीछे अन्नका दान करेवाद
हो जाता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर खर्गलेकरमें जाता है।
अन्न, जल, घोड़ा गो; वच्न) शय्यों, छत्र और आसन--ईने
339,» कक ५३७५३ ७५» .५...-५०७3+७)ज७७ ७०७५» ५७ क ६ ५. .3»3०...3७..33.....3५.2...2...3....2.2.3...3333»:>७ नरम +नजकामनन»कम«+म मत मन क+म
# सवेधामेव दानानामन्नदानं पर स्मृतम् ।
सय: प्रीतिकरं हथ॑ वलवबुद्धिविवर्धनम॥
नानज्नदानसम॑ दान विद्यते मुनिसत्तम ।
अन्नाह्ृववन्ति भूतानि तदभावे प्रियन्ति च॥
अतषण्व महत्पुण्यमन्नदाने. प्रकीर्तितन् ।
तथा क्षुपापक्िना तप्ता प्रियन्ते सर्वदेहिनः॥
अन्नमेव प्रशंसन्ति सर्वभन्ने प्रतिष्ठितम् ।
अन्नेन सइशं दान न भूतं॑ न भविष्यति॥
अन्नेन धार्यते सर्व विश्व॑ जगदिदं मुने ।
अन्नमूर्जेस्करं लोके प्राणा झन््ने प्रतिछ्ितः॥
( शि० पु० उ० स॒ं० ५ ११ ७-१ ८१२४१२९*६१* ॥$
उम्ासंहिता | .
आठ वस्तुओंके दान यमलोकके लिये उत्तम माति गये है |
इस प्रकार दान-विशेषसे मनुष्य विभानपर ब्ंठकर धर्मराजके
भगरःं जाता है; इसलिये सबको दान करना चाहिये । महाम॒ने !
६ जरूदान, जछाशय-निर्माण: बुक्षारोपण, संत्यभाषंण और तपकी महिमा हे
ज््ल्ल््ल्ल्ल्स््अ्स््््ल्ल्ः्लन्च्सल्व्च्््चवचचससलत्ल
४०३
जो इस प्रसज्ञकों सुनता अथवा श्राद्धमें ब्राह्मणोंको सुनाता हैः
उसके पितरोंकों अक्षय अन्नदान प्राप्त होता है ।
( अध्याय ११ )
लि >> ४2<2०००
जलदान, जलाशय-निर्माण, इक्षारोपण, सत्यभाषण ओर तपकी महिमा
सनत्कृमारजी कहते हैँ--व्यासजी ! जलदान सबसे
श्रेष्ठ है । वह सब दानोंमें सदा उत्तम है; क्योंकि जल सभी
जीवसमुदायको तृप्त करनेवाछा जीवन कहा गया है#। इसलिये
बड़े स्नेहके साथ अनिवायरूपसे प्रषादान ( पॉसछा चलाकर
दृस्रोंकी पानी पिछानेका प्रबन्ध ) करना चाहिये। जलाशयका
निर्माण इसलोक ओर परलेकमें भी महान आनन्दकी प्राप्ति
करनेवाल्ा होताहै--यह सत्य है) सत्य है। इसमें संशय नहीं है |
इसलिये मनुप्यकों चाहिये कि वह कुआँ; बावड़ी और तालाव
वनवाये । कुएँमें जब पानी मिकल आता हैं; तब वह पापी
पुरुषके पापकर्मका आधा भाग हर लेता है तथा सत्कर्ममें छगे
हुए मनुप्यके सदा समस्त पापोंको. हर लेता है । जिसके
खुदवाये हुए. जलाशयमें गो) ब्राह्मण तथा साधुपुरुष सदा
पाती पीते हैं, वह अपने सारे. बंशका उद्धार कर देता है ।
जिसके जलाशयमें गरमीके मौसममें भी अनिवायरूपसे पानी
टिका रहता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटको नहीं प्रात
होता | जिसके पोदरेमें केवल वर्षाऋतु्में जल ठहस्ता है,
उत्ते प्रतिदिन अम्नदोच्न करनेका फछ मिलता है---ऐसा बह्माजी-
का कथन है | जिसके तड़ागमें शरत्काहइतक जल ठहरता हैः
स्प्े रह गोदानका फूछ मिलता है--इसमें संशय नहीं है |
जिसके तालाबमें हेमनत और शिश्िर ऋतुतक पानी मौजूद
एता है; वह बहुत-सी सुवर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणासे युक्त यशका
पल पाता है। जिसके सरोवरमें वसन््त और ग्रीष्मकाल्तक
पी बना रहता है; उसे अतिरात्र और अश्वमेध यशोंका फल
मेला है--ऐसा मनीषी महात्माओंका कथन है।
.. “पर व्यास | जीबोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जलाशब-
# हे, ९ लगामेमें
४ +पेम फलका वर्णन किया गया । अब बुक्ष छ |
५ है, उनका वर्णन सुनो | जो वीरान एवं दुर्गम स्थानोर्म
६ है अनेवाली
: 3 ज्याता है; वह अपनी ब्रीती तथा गी सम्पूर्ण
प रत परम दानामासमुत्तम॑ तदा ।
प्रवपां जोबपुश्षानां तर्पणं जीवसं- स्मृतन् ॥
(शि० पु० उ० सें० १२। १)
पीढ़ियोंको तार देता है। इसलिये चक्ष अवश्य लगाना चाहिये# |
ये चृक्ष लगानिवालेके पुत्र होते हैं, इसमें संशय नहीं । वृक्ष
लगानेवाल्य पुरुष परलेकमें जानेपर अश्नय लोकोंको पाता है ।
पोखरा खुदानेवाला) वृक्ष लगानेवाल्ा और यज्ञ करानेवाला
जो द्विज है; वह तथा दूसरे-दूसरे सत्यवादी पुदघ--ये खगसे
कभी नीचे नहीं गिरते ।
सत्य ही परबद्या है; सत्य ही परम तप है; सत्य ही श्रेष्ठ
यज्ञ है और सत्य ही उत्कृष्ट शाह्मशन है | सोये हुए पुरुषोंमें
सत्य ही जागता है; सत्य ही परमपद है; सत्यसे ही प्थ्वी टिकी
हुई है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है | तप) यज्ञ, पुण्य,
देवता, ऋषि और पितरोंका पूजन, जल और विद्या--ये सब
सत्यपर ही अवलम्बित हैं| सबका आधार सत्य ही है । सत्य
ही यश) तप) दान, मन्त्र, सरखतीदेवी तथा ब्रह्मचय॑
है। ओऑकार भी सत्यरूप ही है। सत्यसे ही वायु चलती
है, सत्यसे ही सूर्य तपता है; सत्यसे ही आय जलाती है और
सत्यसे ही खर्ग टिका हुआ दे | छोकमें सम्पूर्ण वेदोंका पालन
तथा सम्पूर्ण तीथॉंका स्नान केवल सत्वसे सुछ्भ हो जाता है |
सत्यसे सब कुछ प्रात होता है; इसमें संशय नहीं दे | एक
सहख अश्वमेध और छाखों यज्ञ एक ओर तराजूपर रक्खे
“जायें और दूसरी ओर सत्य हो तो सत्यक्ी ही पलड़ा भारी
होगा । देवता) पितर, मनुष्य, नाग राक्षआ तथा चराचर
प्राणियोंसहित समस्त लोक सत्यसे ही प्रसन्न होते हँ | सत्यको
परम घमम कहा गया है। सत्यको ही परमपद बताया गया है ओर
सत्यको ही परञह्म परमात्मा कहते हैं | इसलिये सदा सत्य वोलना
चाहिये। । सत्यपरायण मुनि अलन्त दुष्कर तप करके खर्ग-
ला न 2 न पन
+% अतीतानागताव् सर्वान् पिवृव॑र्शास्तु तारथत् ।
कान्तारे वृक्षरोपी अस्तलाद दक्षांस्तु रॉपयेत ॥
( द्ि० पु० 3० सं० २2१ | ७ )
३ सत्यमेव परं॑ मह्य संत्वनंत पता: ।
सत्यमेव परों. यश्वः संत्यनेव पर शुतन् ॥
सत्य चुप्तेप जागति सर्व थे परसे इस ।
सत्येनंव धूता धध्वी सत्वे सर्व अधिप्ठिवन ॥
७०४३
को प्राप्त हुए हैं तथा सत्यधर्ममें अनुरक्त रहनेवाले सिद्ध
पुरुष भी सत्यसे ही खर्गके निवासी हुए. हैं | अतः सदा सत्य
बोलना चाहिये | सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई घर्म नहीं है ।
सत्यरूपी तीथ अगाध; विशाल); सिद्ध एवं पवित्र जलाशय है ।
उसमें योगयुक्त होकर मनके द्वारा स्नान करना चाहिये |
सत्यको परमपद कहा गया है। जो मनुष्य अपने लिये, दूसरेके
लिये अथवा अपने बेटेके लिये भी झ्ठ नहीं बोलते वे द्ी
खगगंगामी होते हैं | वेद, यश्ञ तथा मन्त्र--ये ब्राक्षणोंमें सदा
निवास करते हैं; परंतु असत्यवादी ब्राह्मणोंमें इनकी प्रतीति
नहीं होती | अतः सदा सत्य बोलना चाहिये ।
लो 5 ४० ०४०२६
औ-+ अ--ओ---+ “सतऔ-.+ लॉ >+-+ -+» न+ 5
अजीज जिज्च्िच्िज् जज जज -्ततलज्जतलत्ञज ल् डआअअआचच व वलचचच लि चावल जज वतन ी_नीतक?न4न सनम जन +मक«-“न५७५०१७-+५००५००भा>+५०५०००
तद्नन्तर तपकी बड़ी भारी महिमा बताते हुए
सनत्कुमारजीने कहा--मुने ! संसारमें ऐसा कोई सुख नहींहै
जो तपस्याके बिना सुलम होता हो । तपसे ही सारा सुख मिलता
है, इस बातको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं | शानः विशान
आरोेग्य, सुन्दर रूप; सोमाग्य तथा शाश्वत सुख तपसे ही प्राप्त
होते हैं | तपस्यासे ही ब्रह्मा बिना परिश्रमके ही समर
विश्वकों स॒ुष्टि करते हैं | तपस्यासे ही विष्णु इसका
पालन करते हैं । तपस्याके बलसे ही रुद्रदेव संहर
करते हैँ तथा तपके प्रभावसे ही शेष अरशेष भूमण्डलको
धारण करते हैँ | ( अध्याय १२ )
वेद ओर पुराणोंके खाध्याय तथा विविध ग्रकारके दानकी महिमा, नरकोंका वर्णन तथा उनमें
गिरानेवाले पापोंका दिग्दशैन, पापोंके लिये सर्वोत्तम प्रायश्ित्त शिवसरण
तथा ज्ञानके महच्चका प्रतिपादन
सनत्कुमारजी कहते हँ--मुने | जो वनमें जंगली
फूल-मूल खाकर तप करता है और जो वेदकी एक ऋचाका
खाध्याय करता है; इन दोनोंका फल समान है । श्रेष्ठ द्विज
वेदाध्ययनसे जिस पुण्यकों पाता हैः उससे दूना फल वह
उस वेदको पढ़ानेसे पाता है। मुने ! जैसे चन्द्रमा ओर सूर्यके
बिना जगतमें अन्धकार छा जाता है; उसी प्रकार पुराणके
बिना श्ञानका आलोक नहीं रह जाता है--अज्ञनका अन्धकार
छाया रहंता- है । इसलिये सदा पुराणका अध्ययन करना
चाहिये । अज्ञानके कारण नर॒कमें पड़कर सदा संतप्त
होनेवाले लोक॑को जो शासत्रका शन देकर समझाता हैः
वह पुराणवक्ता अपनी इसी महृत्ताके कारण सदा पूजनीय
है।जो साधु पुरुष पुराणवक्ता विद्वानको दानका पात्र
समझकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे उत्तमोत्तम वस्तुएं देता
है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो सुपात्र ब्राह्मणको
भूमि, गो, रथ) हयथी और सुन्दर घोड़े देता है? उसके पुष्यफलका
वर्णन सुनो । वह इस जन््ममें ओर परलोकर्म भी स्मू
अक्षय मनोरथोंकों पा लेता है तथा अश्वमेधयशके फलका भी
भागी द्वोता है ।
मुनीश्चर ! जो पुरुष भगवान् शिवकी कथा सुनता ऐ
बह कर्मोंके विशाल वनको जल्मकर संसारसे तर जाता ह |
जो दो घड़ी, एक घड़ी अथवा एक क्षण भी भतक्तिमावत्े
भगवान् शिवकी कथा सुनते हैं; उनकों कभी ढुरगति नह
द्वोती | मुने ! समूर्ण दानों अथवा सम्पूर्ण यशोंमें जे
पुण्य होता है; वही फछ शिवपुराण सुननेसे
प्रात्त हो जाता है । व्यासजी | विशेषतः कलियुगर्म पुराण
सिवा मनुष्योंके लिये दूसरा कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं दै | वह
उनके ढिये मोक्ष एवं ध्यानलूपी फल देनेवाला बताया गया है।
मनुष्यों
शिवपुराणका अबृण और शिव-नामका कीतेन मठय
तपी यश्ञश्व॒ पुण्य च देवर्पिपितूपूजने | आपो विद्या च ते सर्वे सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
सत्यं यशस्तयों दानं मनन््त्रा देवी सरस्वती । अह्मचर्य॑
तथा सत्यमोंकारः सत्यमेव च ॥
सत्येन वायुरम्येति सत्येन तपते रवि: । सत्येनाग्निर्निदेति स्वर्ग; सत्येन तिए्ठति ॥
पालन॑ सववेदानां
सवतीर्थावगाइनम् । सत्येन वहते लोके सर्वमाष्नोत्यसंशयम् ॥
अइवमेघसह्ल॑ च सत्यं च तुलया धृतम् | लक्षाणि
क्रववरचैव सत्यमेव विशिष्यते ॥
सत्येन देवा: पितरों मानवोरगराशक्षसा: | प्रीयन्ते सत्यतः सर्वे लोकाश्व सचराचराः ॥
सत्यमाहु: पर परम सत्यमाहुः
परं॑ पदम् । सत्यमाहु: पर ब्रद्दा तस्मात्सत्य॑ सदा वदेत् ॥
( शि० पुृ० उ० सं० १२ | २३--२१
॥
हंप्रोसंदिता |
लिये कत्पवृक्षका रमणीय फल कै इसमें संशय नहीं है।
यश दान; तप और तीथथैसेवनसें जो फल मिलता है,
उसीको मनुष्य पुराणोक्रे भ्वणमात्से था लेता है ।
प्रतिदिन सुपात्र छोगोंकों बड़े-बड़े दान देने चाहिये)
वे दान दाताके उद्धारक होते हैं । विप्रवर | छुवर्णदानः
गेदन और भूमिदान--ये पवित्र दान हैं; जो दाताको
५ तो तारते ही हैं, लेनेवाल्ेंका भी उद्धार कर देते हैं ।
॥ मुवर्णदान, गोदान और पएथ्वीदान--इन श्रेष्ठ दानोंको करके
मनुष्य सब पापोसे मुक्त हो जाता है। तुलादानकी बड़ी
प्रशंश की गयी के गो ओर प्रथ्वीके दान भी प्रशस्त एवं
समान शक्तिवाले हैं। परंतु सरखतीका दान इन सबसे
अधिक उत्तम है | नित्य दुह्ठी जानेवाली गाय छाता; वस्त्र)
जूता तथा अन्न ओर जल--ये सब वस्तुएं याचकोंको
देनी चाहिये | ब्राह्मणोंकी तथा अपीडित याचकोंको जो
पंकत्पपूर्वक्त धनादि बस्तुओंका दान किया जाता है; उससे
दाता मनखी होता है । लोकमें [जो-जो अत्यन्त अमीष्ट ओर
प्रिय है; वह यदि घरमें हो तो उसे अक्षय बनानेकी
इन्छावाले पुरुषको गुणवान् पुदंषको दान करना
चाहिये । तुला-पुरुषका दान सब दानोंमें उत्तम हे।
शो अपने लिये कल्याण चादे, उसे तराजूपर बैठना और
अपने शरीरसे तोली गयी वस्तुका दान करना चाहिये ।
दिनमें; रातमें, दोनों संध्याओंके समय, दोपहरमें, आधीरातके
पमय तथा भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों का्लोंमें मन)
वाणी और शरीरद्वारा किये गये सारे पापोंकी तुला-पुरुषका
दान दूर कर देता है |
इसके याद ब्रह्माण्डदानका माहात्म्य एवं
श्र्माणका वर्णन करके समत्कुमारजीने कहा--
पनरोमे भेष्ठ व्यास | पाताल्छोकसे ऊपर जो नरक हैं,
गा वणन मुझसे सुनो) पापी पुरुष उन्हींमें यातनाएँ भोगते हैं |
० रो, ताछ, विवसन या विशसन) महाज्वाल,
र हर लवण, विल्लेहित, पीव वहानेवाली बेतरणी, कृमि
* ) इेमिभोजन, कृष्ण, असिपत्रवन) दारुण लालाभक्ष
। के पे, वहिज्याल, अधःशिरा) संदंश, काल्सूत्र,
(३ नीक पे ) रेधन: इ्वभोजन: अप्रतिए, महारौरव
कि े इत्यादि वहुत-से दुःखदायक नरक वहाँ हैं।
४ उनेने जो पापकर्म-परायण पुरुष पकाये जाते हैं
सनक
हा ४१६, नेम हप ए पा पे जय
पे “मय: वेगन करता हुं। सावधान द्वोकर सुनो |
& सरकोंका वर्णन तथा उलमे गिरानेवाले पापाँका दिग्दृशन #ः
3 सडपटटटपपप्पिटडडपनायपपननिधायिपययधमनियनयनिि यान तभ तन ननलतनननननननतत__
छण्ज
पर पाभानन»भ आती का पदक पेन कक करी पिया.
जो मनुष्य ब्राहणों। देवताओं तथा गोओंके लिये हितकर
कार्यके सिवा अन्य किसी कार्यकरे लिये झूठी गवाद्दी देता
है अथवा सदा झठ बोलता है। वह रौरब नरकमें जाता है ।
जो अ्ुण ( गर्भस्थ शिक्व ) की हत्या और सुबर्णकी चोरी
करनेवाल) गायको कटघरेमें बंद करनेवाला) विश्वासघाती,
शराबी, ब्रह्महत्यारा। दूसरोंके द्रव्यका अपहरण करनेवाला
तथा इन सबका संगी है; वह मरनेपर तप्तकुम्भ नामके
नरकमें जाता है । गुरुके वधसे भी इसी नरककी प्राप्ति
होती है । बहिन) मात0 गो तथा पुत्रीका वध करनेसे
भी तसकुम्ममें ही गिरना पड़ता है । साध्वी स्वीको
ब्चनेवाछा) अधिक ब्याज लेनेवाला) केश-विक्रय करनेवाला
तथा अपने भक्तको त्यागनेबाला--ये संब पापी तप्तलोद
नामक नरकमें पकाये जाते हैं | जो नराधम गुरुजनोंका
अपमान करनेवाल्य तथा उनके प्रति दुवंचन बोलनेवाला है
और जो बेदकी निन्दा करनेवाला, वेद बेचनेवाला तथा अमम्या
छीसे सम्भोग करनेवाला हैः वे सब-के-सब लवण नामक नरकर्मे
जाते हैं | चोर विलोहिंत नामक नरकमें गिरता है । मयोदाको
दूषित करनेवाले पुरुषकी भी ऐसी दी गति होती दे । जो
पुरुष देवता; ब्राह्मण और पितृगणसे द्वेष करनेवाला है
तथा जो ख्मको दूषित ( उसमें मिलावट ) करता के बह
क्मिमक्ष नामक नरकमें पड़ता है । जो दूषित यज्ञ ( वुसरोंको
हानि पहुँचानेके लिये आमिचारिकि प्रयोग या हिंसाप्रधान
तामस यज्ञ ) करता दै। वह झमीश नामक नरकर्मे पड़ता है।
जो नराघम पितृगण, देवगण और अंतिथियोंकी छोड़कर
( बलिवेश्वदेवके द्वार देवता आदिका भाग उन्हें अपंगण किये
बिना दी ) भोजन कर छेता कै। वह उम्र छालाभक्ष नरकमें
गिरता दै। जो शख््रसमृहोंका निर्माण करता कै वह भी उसी-
में जाता दै | जो द्विज अन्व्यजसे सेवा ठेता दे असत् दान
प्रहण करता हैः यशके अनधिकारियोंसे यश कराता द और
अमक्ष्य भक्षण करता है) ये सब-के-सब दथिरोंध ( पृथवद्द )
नामक नरकमें गिरते हैँ । जो सोमरसकों वेचनेवबाले हैं, उनकी
भी यही गति होती है। वज्ञ ओर आमको नष्ट करनेवाल्या थोर
वैतरणी नदीमें पड़ता है |
ओो नयी जबानीसे मतवाले हो धर्मकी म्यांदाकों तोड़ते
हैं, अपविन्र आचार-विचारसे रहते हैं ओर छछ-कपटसे जीविका
चलाते हैं; वे झृत्व नामक नरक ने ते है] जी अझारण दी
वृद्धोंकों काटता दै। वह अधिपत्रवन नासक नरक जाता हे |
भेड़ोंको बेचकर जीविका चलनेवाले तथा पश्चुओंकी हिंसा
करनेवाले कसाईं वह्िज्वाल नामक नरकमें गिरते हैं | भ्रश-
चारी ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर वेश्य तथा जो कच्चे खपड़ों अथवा
इंट आदिको पकानेके लिये पजावेमें आग देता है, ये सब
' उसी बहिज्वाल नरकमें गिरते हैं | जो ब्रतोंका लोप करनेवाले
तथा अपने आश्रमसे गिरे हुए हैं, वे दोनों ही प्रकारके पुरुष
अत्यन्त दारुण संदंश नामक नरककी यातनामें पड़ते हैं ।
जो ब्रह्मचारी होकर भी खप्नर्म वीयेस्वछन करते हैं तथा
जो पुत्रोंसे विद्या पढ़ते हैं, वे श्वमोजन नामक नरकृमें गिरते
हैं | इस तरह ये तथा ओर भी सेकड़ों, हजारों नरक हैं; जिनमें
पापकर्मी प्राणी यातनाओंकी आगमें डालकर पकाये जाते हैं ।
इन उपयुक्त पापोंके समान ओर भी सहसों पापकर्स हैं, जिन्हें
नरकोंमें पड़कर मनुष्य भोगा करते हैं| जो लोग मनः वाणी
ओर क्रियाद्यारा अपने वर्ण और आश्रमके विरुद्ध कर्म करते हैं,
वे नरकमें गिरते हैँ | नरकमें सिर नीचे करके छूटकाये गये
प्राणी खरगलेकमें रहनेवाले देवताओंको देखा करते हैं और
देवतालोग भी नीचें दृष्टि डालनेपर उन सभी अधोमुख
नारकी जीवोंकों देखते हैं । पापीलोग नरक-भोगके अनन्तर
क्रमशः उन्नति करते हुए स्थावर; कृमि, जरूचरः पक्षी) पशु,
मनुष्य, धर्मोत्मा मानव; देवता तथा मुमुक्षु होते और अन्तमें
मोक्ष प्राप्त कर लेते हैँ | जितने जीव खर्गमें है, उतने ही
नरकमें हैं | जो पापी पुरुष अपने पापका प्रायश्रित्त नहीं करता;
बही नरकमें जाता है ।
कालीनन्दन | खायम्भुब मनुने महान पापोंके लिये
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमाताने $
बा-ल३बडइ-स जन अं 5
नी-+.->-+जज ली डी जि
| छंक्षित-शिवपुराण॥;
महान और छघु पापोंके लिये हूघु प्रायश्रित्त वताये
हैं | उन अशेष पापकर्मक्के लिये जो-जो प्रायश्वित्त-सम्ब्धी
कम बताये गये हैं, उन सबमें भगवान् शंकरका सर
ही सर्वश्रेष्ठ प्रायश्रित्त है । जिस पुरुषके चित्त पाप-
कम करनेके अनन्तर पश्चात्ताप होता है, उसके लिये तो एक
मात्र भगवान् शिवका स्मरण ही सर्वोत्तम प्रायश्रित्त है। प्रातः
काल; सायंकालछ) रातमें तथा मध्याह आदिमें भगवान् शिवा
स्मरण करनेसे पापरहित हुआ मनुष्य माहेश्वर घामको प्राप्त कर
लेता है । भगवान् शिवके स्मरणसे समस्त पापों और करेशोंका
क्षय हो जानेंसे मनुष्य खर्ग अथवा मोश्ष प्राप्त कर लेता है ।
जिसका चित्त जप) होम और पूजा आदि करते. समय निरन्तर
भगवान् महेश्वरमें ही लगा रहता हो उसके लिये इच्ध आदि
पदकी प्राप्तित्म फछ तो अन्तराय ( विष्न ) ही है। मुने ।
जो पुरुष भक्तिमावसे रात-दिन भगवान् शिवका समर करता
है, उसके सारे पातक नष्ट हो जाते हैं । इसलिये वह कभी
नरकमें नहीं पड़ता | नरक्त ओर खर्ग--ये पाप और पुणे
ही दूसरे नाम हैं | इनमेंसे एक.तो दुःख देनेवाढा है और
दूसरा सुख देनेवाला | जब एक ही वस्तु कभी प्रीति प्रदात
करनेवाली होती है और कभी दुःख देनेवाली बन जाती है! एव
यह मिश्चय होता है कि कोई भी पदार्थ न तो दुःखमय है और
न सुखमय ही है । ये सुख-दुःख तो मनके ही विकार हैं| शन
ही परअह्म है और ज्ञान ही तात्विक बोधका कारण है |
सारा चराचर विश्व ज्ञानमय ही है | उस परम विशानसे मिल
दूसरी कोई वस्तु नहीं है | ( अध्याय १३--१६ )
“णअज्जक्तक्लच्छ
के आनेके हो हे ५५ वर्णन (१)
मत्युकाल निकट आनेके कोन-कोनसे लक्षण हैं, इसका वर्णन
इसके पश्चात् द्वीपों, ठछोकों ओर मन्नुओंका परि-
चय देकर संग्रामके फल, शरीर एवं स्त्रीखभाव
आदिका वर्णन किया गया । तदनन्तर कारूके विपय-
में व्यासजीके पूछनेपर समनत्कुमारजीने कहा--मुनि-
श्रेष्ठ | पु्वंकालमें पावतीजीने नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ
मुनफर परमेश्वर शिवकों प्रणाम करके उनसे यही बात
पृष्ठी थी ।
पार्वती बोलीं--भगवन ! मेने आपको कृपाते कम
मत जान लिया । देव ! जिन मन््त्रोंद्रारा जिस विपिस जि
प्रकार आपकी पूजा होती है; वह भी मुझे शात शे हे ।
किंतु प्रभो | अब भी एक संशय रह गया है| वह रद
काल्चक्रके सम्बन्धमें | देव ! मृत्युका क्या चिह् है! आई
क्या प्रमाण है ? नाथ ! यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मी
सब बातें बताइये ।
उम्रासंदिता है # गत्सुकाल निकट आनेफे कौन-कौन-से लक्षण हू / इसका वर्णन 2५
ीरधजण-००न७ “मम "भवन रमन पवभा४* काम इमाम ए् 79 गय्क०३० ० एम० नाम पाअम्नावहदाक मय भा पान* पद आना पाक + मना दया न प् उप + ३-२० फम+फ यम पाक नभ -2पल् न आाभवयभ 9 पा नवारधभाक न १५४ अम इनकम नगर न.9३७७०५4-०९५+॥५/४७७फाम॥ 3 +मपा-+नमक-+- ९ म#५>आम.++५ ;४3+38५80५+4>-पह००५+*७क१५५०९-३४श सअका+-प०+५५७७७७ ०५७१३ काका» ॥म
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महादेवजीने कहा--प्रिये ! यदि अकस्मात् शरीर सब
ओरसे सफ़ेद या पीछा पड़ जाय और ऊपरसे कुछ छाल दीखे
पे यह जानना चाहिये कि उस मनुष्यकी मृत्यु छः महदीनेके
भीतर हो जायगी । शिवरे | जब मुँह, कान नेत्र और जिह्ाका
घम्भन हो जाय, तब भी छः महीनेके भीतर ही मृत्यु जाननी
चाहिये । भद्दे ! जो रुर मुगके पीछे होनेवाली शिकारियोंकी
"पानक आवाजको भी जल्दी नहीं सुनता। उसकी मृत्यु भी
५: महीनेके भीतर ही जाननी चाहिये | जब सूर्य, चन्द्रमा
| अभिक्े सांनिध्यसे प्रकर होनेवाले प्रकाशकों मनुष्य नहीं
कि उसे सब कुछ काला-काला--अन्धकाराच्छन्न ही
जप देता है, तव उसका जीवन छः माससे अधिक नहीं
! बी | देवि ! ग्रिये | जब मनुष्यका वाया हाथ लगातार एक
शाह फड़कता
हू | फड़कता ही रहे, तय उसका जीवन एक मास ही
थे
ण्प कि कक । न
श कक जानना चाहिये | इसमें संराय नहीं है | जब
| भ््
अगड़ारई आने छगे और ताछ सूख ज्ञाय) तब
४ पनुण ण्क <>
/ 57 रक मासतक ही जीवित रहता है--इसमें संशय
(2०५
जी ््क >याानम__- मनन मकान, >े.. मिनममयाममिक
नहीं है | त्रिदोपमं जिसकी नाक बहने छगे, उसका जीवन
पंद्रह दिनसे अधिक नहीं चलता | मुँह और कण्ठ सूखने
लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी
आयु समाप्त हो जायगी । भामिनी ! जिसकी जीम फूल जाय
ओर दॉतोंसे मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीनेके
भीतर ही मृत्यु हो जाती है | इन चिहोंसे मृत्युकालको समझना
चाहिये | सुन्दरि ! जल, तेल, घी तथा दर्पणमं भी जब अपनी
परछाइ न दिखायी दे या विक्ृत दिखायी दे; तव कालचक्रके
ज्ञाता पुरुषको यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः
माससे अधिक शेष नहीं है । देवेश्वरे ! अब दूसरी बात सुनो,
जिससे - मृत्युका ज्ञान होता है। जब अपनी छायाको
सिरसे रहित देखे अथवा अपनेको छायासे रहित पाये;
तब वह मनुष्य एक मास भी जीवित नहीं रहता ।
पावती | ये मेने अड्लेंम प्रकट होनेवाले मृत्युके
लक्षण बताये हैँ। भद्रे | अब बाहर प्रकट होनेवाले
लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो । देवि | जब चन्द्रमण्डल या
सूयमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे; तब आधे मासमें
ही मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। असन््धती महायान; चन्द्रमा---
इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओंका दर्शन न हो)
ऐसा पुरुष एक मासतक जीवित रहता है। यदि ग्रहोंका दर्शन
होनेपर भी दिशाओंका ज्ञान न हो--मनपर मूढ़ता छायी रहे
तो छः महीनेमें निश्चय ही मृत्यु हो जाती है।
यदि उतथ्य नामक ताराका; श्रुवका अथवा सूय्यमण्डलका भी
दर्शन न हो सके; रातमें इन्द्र-घनुप ओर मध्याहमें उल्कापात होता
दिखायी दे तथा गीध ओर कोवे घेरे रहें तो उस मनुष्यकी
आयु छः महीनेसे अधिककी नहीं है | यदि आकाझमें सह्तर्पि
तथा खगमार्ग (छायापथ ) न दिखायी दे तो कालश पुदुषोंको
उस पुरुषकी आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये । जो
अकस्मात् सू और चद्धमाको राहुसे ग्रस्त देखता दे ओर सम्पूर्ण
दिशाएँ जिस घूमती दिखायी देती हैं, वह अवश्य ही छः
महीनेगें मर जाता है| यदि अकस्मात् नीली मक्लियाँ आकर
पुरुषको घेर लें तो वालवमें उसकी आयु एक मास द्वी रोष
जाननी चांहिये | यदि गीच, कोत्रा अथवा कबूतर सिरपर
चढ़ जाय तो वह पुरुष जञञीत्र ही एक सासके भीतर ही मर
ज्ञाता है; इसमें संद्याय नहीं है । ( अध्याव १ ७-२५ )
कमन्>म०--म. क-जननी-न+ उएनाओओ
+्
कालको जीतनेका उपाय, नवधा शब्दबह्म एवं तुंकारके अनुसंधान
# ममो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
| संक्षिप्त-शिवपुराणा३
और .
उससे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन
देवी पावतीने कहा--प्रभो | काछते आकाशका भी
नाश होता है। वह भयंकर कार बड़ा विकराल है। वह
खर्गका भी एकमात्र खामी है | आपने उसे दग्ध कर दिया
था; परंतु अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्रारा जब उसने आपकी
स्तुति की; तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः.
अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुआ--पूणेतः सखवस्थ हो गया । आपने
उससे बातचीतमें कहा--“काल | तुम सत्र विचरोगे, किंतु
लोग तुम्हँ देख नहीं सकेंगे |? आप प्रभुकी क्षपादष्टि होने
- और वर मिलनेसे वह कार जी उठा तथा उसका प्रभाव
बहुत बढ़ गया। अतः महदेश्वर | क्या यहाँ ऐसा कोई साधन है
जिससे उस कालकों नष्ट किया जा सके १ यदि हो तो मुझे
बताइये; क्योंकि आप योगियोंमें शिरोमणि और खतन्त्र
प्रभु हैं । आप परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं ।
शिव बोले--देवि | श्रेष्ठ देवता, देत्य, यक्ष) श्त्स)
नाग और मनुष्य--किसीके द्वारा भी कालूका नाश नहीं किया
जा सकता; परंतु जो ध्यान-परायण योगी हैं, वे शरीरधारी
होनेपर भी सुखपूबवक कालकों नष्ट कर देते हैं | वररोद्दे !
यह पाश्चमीतिक शरीर सदा उन भूतोंके गुणोंसे युक्त ही
उतन्न होता है ओर उन््हींमें इसका लय होता है । मिद्दीकी
देह मिट्टीमें ही मिल जाती है | आकाशसे वायु उत्तन्न होती है
वायुसे तेजस्तत््व प्रकट होता है, तेजसे जलका प्राकय्य बताया
गया है ओर जलसे प्रथ्वीका आविर्भाव होता है। पृथ्वी
आदि भूत क्रमशः अपने कारणमें छीन होते हैं | पृथ्वीके
पाँच, जलके चार, तेजके तीन और वायुके दो गुण होते हैं ।
आकाशका एक मात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदिमें जो
गुण बताये गये हैँ, उनके नाम इस प्रकार हैं--शब्द,
स्पश) रूप, रस ओर गन्ध | जब भूत अपने गुणको त्याग
देता है, तब नष्ट हो जाता है ओर जब गुणको ग्रहण करता
है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है। देवेश्वरि |
इस प्रकार तुम पॉँचों भूतोंके यथाथं ख्रूपको समझो |
देवि |! इस कारण कालको जीतनेकी इच्छावाले योगीको
चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयक्षपू्षक अपने-अपने कालमें
उसके अंशभूत गुणोक्रा चिन्तन करे |
योगवेत्ता पुदधको चादिये कि सुखद आसनपर बेंठकर
विशुद्ध लत (ग्राणावाम ) द्वारा योगाभ्यास करे। गतमें
जब सब लोग सो जाय, उस समय दीपक बुझाकर अन्षकारं
योग धारण करे | तजनी अंगुलीसे दोनों कार्नोकों बंद करे
दो घड़ीतक दबाये रक््खें | उस अवस्था अमिग्रेरित
शब्द सुनायी देता है | इससे संध्याके बादका खाया हुआ
अन्न क्षणभरमें पच जाता है और सम्ूणे गेगों तथा ज्वर
आदि बहुत-से उपद्रवोंका शीघ्र नाश कर देता है | जो सापक
प्रतिदिन इसी प्रकार दो घड़ीतक शब्दब्रह्गमका साक्षाक्ार
करता है; वह मृत्यु तथा कामको जीतकर इस जगत
खच्छन्द विचरता है ओर सबंश एवं समदर्शी होकर समूणे
सिद्धियोंकों प्राप्त कर लेता है | जैसे आकाशमें वषसि युक
बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्दको सुनकर योगी
तत्कारू संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । तदनन्तर योगियों-
द्वारा प्रतिदिन चिन्तन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमश! सूक्षपे
सूक्ष्मतर होता जाता है। देवि ! इस प्रकार मैंने तुम्हें शब्दतझके
चिन्तनका क्रम बताया है। जेसे धान चाहनेवाल पुर
पुआलको छोड़ देता है; उसी तरह मोक्षक्की इच्छावाल
योगी सारे बन्धनोंको त्याग देता है |
इस शब्दब्रह्मको पाकर भी जो दूसरी वस्तुकी अभिया|
करते हैं) वे मुक््केसे आकाशकों मारते और भूख-प्यापती
कामना करते हैं | यह शब्दब्रह्म ह्वी सुखद, मोक्षका कर
बाहर-मीतरके भेदसे रहित, अविनाशी और समस्त उपाधि
रहित परत्रह्म है | इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते दे | ने
लोग कालपाशसे मोहित हो शब्दबह्मको नहीं जानते। वे
पापी और कुबुद्धि मनुष्य मौतके फंदेमें फँसे रहते हूँ
मनुष्य तभीतक संसारमें जन्म लेते हैं; जबतक सबके
आश्रयभूत परमतत्त्व ( परत्रह्म परमात्मा ) की प्रा न
होती । परम तत््वका शान हो जानेपर मनुष्य जद्म-मृत्युक
वन्धनसे मुक्त हो जाता है । निद्रा और आलस्य साधनाकों बहु
बड़ा विश्न है। इस.शत्रुको यलपूर्वक जीतकर सुखद आप ।
पर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्मका अम्यास करना
सौ वर्षकी अवस्थावाला वृद्ध पुरुष आजीवन इसका अं!
करे तो उसका शरीररूपी स्तम्भ मृत्युक्ो जीतनेवाण ऐ
जाता है और उसे प्राणवायुक्षी शक्तिको बढ़ानिवाल अपैय
प्रात्त होता दे | बृद्ध पुरुषमें भी शुब्दत्रद्वाके अम्यात्री
होनेवाछे छामका विश्वास देखा जाता के फिर तंग मठुष्की
नी
उम्ासंदिता ] # काल या झुत्युकी जीतकर अमरत्व भाप्त करम्रेक्की चार यौगिक साथनाएँ #
कक अब फटी अली ीतीि?ओं जी ना आन फिण शमी मयमसा- नर नमन दान न्रननम-+मे अमन सनम मन पिन समन“ ९५५4 नी जनम" कनन-प नमन नमक * पका फिपकनना" चकत- पान चिकन ना “पक आन न रनन+म ५ *िदनना “पेय “पे ०नन नस मन सनी ा७+मम“ पा ना--कननन परी ३५ पक “नाना “मनन इतन--९५> मा ३. न “पे दना-+* ०-५ “पडा मन पान समान पान" सर इल्आर- कक ९०५ री“ पर मर पुर पडा "रा सा#र पिता पर पा पका मय पडा पा “पितमममार ७. नि सर जन रद फेर चिकन पक स्प>+नरम न गिरा नी पिन चिकनी इनक नि फेननम पार वन्ननी
इस साधनासे पूर्ण लाभ हो, इसके लिये तो कहना ही क्या
है। यह शब्दब्नझ न ओंकार है न मन्त्र है; न बीज है;
ने अक्षर है | यह अनाइत नाद ( बिना आघातके अथवा बिना
वजाये ही प्रकट होनेवाला शब्द ) है। इसका उच्चारण किये
' बिना ही चिन्तन होता है । यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है |
प्रिये | शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष यत्रपूर्वक निरन्तर इसका
अनुप्तंधान करते हैं| अतः नो प्रकारके शब्द बताये गये हें,
जिन्हें प्राणवेत्ता पुरुषोंने लक्षित किया है | में उन्हें प्रयक्ष
करके वता रह हूँ । उन शब्दोंकों नादसिद्धि भी कहते
हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं---
घोष) कांस्य ( ज्ौँस आदि ) शक्ञ ( सिंगा आदि 3
परण्य, वीणा आदि, बॉँसुरी,दुन्दुमि, शझ् और नवाँ मेघ-गर्जन----
इन नो प्रकारके शब्दोंकों त्यागकर तुंकारका अम्यास करे ।
इस प्रकार सदा ही ध्यान करनेवाल योगी पुण्य और पापोंसे
लिप्त नहीं होता । देवि | योगाभ्यासके द्वारा सुननेका प्रयत्न
फेरनेपर भी जब योगी उन शब्दोंको नहीं सनता और
अभ्यात॒ करते-करते मरणासन्न हो जाता है; तब भी वह
दिन-रत उस अभ्यासमें ही लगा रहे । ऐसा करनेसे सात
दिनेमि वह शब्द प्रकठ होता कै; जो मृत्युको जीतनेवाल्य है |
देवि ! वह शब्द नो प्रकारका है. । उसका मैं यथार्थरूपसे
वन करता हूँ । पहले तो घोषात्मक नाद प्रकट द्वोता है; जो
अत्शुद्धिका उत्कृष्ट साधन है | वह उत्तम नाद सब
ऐकी इर लेनेवाला तथा मनको वश्ञीभूत करके अपनी
ओर सींचनेवाला है | दूसरा कांत्य-माद है। जो प्राणियोंकी
७.०० #००गा>क०#० का क। “पी :..2 प्स्प्ष
9७२,
नल सनम नमन पैरा तन पहना. 3५ पारा फरमान" पान उरी नमन रकम सर पक काम पर पहन "पका एन हक रत पहन न पहन पर िवमनार ५. कम परत कान १७७४ पिजा-रीभेकक २ रे७+म नानी पिता टीन पतन परम फकमाम हम.
गतिको स्तम्मित कर देता है | वह विष, भूत ओर अह्द भादि
सबको बाँघता है---इसमें संशय नहीं है। तीसरा “ज्ञ-नाद है;
जो अभिचारसे सम्बन्ध रखनेवाल्य है | उसका शन्रुके उच्चाटन
और मारणमें नियोग एवं प्रयोग करे | चौथा घण्टा-नाद है
जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं | वह नाद सम्पूर्ण
देवताभेंकों आक्ृष्ट कर लेता है; फिर भूतलके मनुष्योंकी
तो बात ही क्या है | यक्षों और गन्धवोंकी कन्याएँ. उस नादसे
आदृष्ट हो योगीको उसकी इच्छाके अनुसार महयसिद्धि प्रदान
करती हैं तथा उसकी अन्य कामनाएँ भी पूण्ण करती हें ।
पाँच नाद वीणा है; जिसे योगी पुरुष ही संदा सुनते हैं ।
देवि ! उस बीणा-नादसे दूर-दर्शनकी शक्ति प्राप्त होती है ।
वंशीनादका ध्यान करनेवाले योगीको सम्पूर्ण तत्त्व प्रात्त हो
जाता है। दुन्दुमिनादका चिन्तन करनेवात्य साधक जरा
और मृत्युके कश्से छूट जाता है । देवेश्वरि | शद्भुनादका
अनुसंधान होनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेको शक्ति प्राप्त
' हो जाती है | मेघनादके चिन्तनसे योगीकों कभी विपत्तिका
सामना नहीं करना पड़ता। वरानने | जो प्रतिदिन एकाग्र
चित्तसे ब्रह्मरूपी ठुंकारका ध्यान करता है; उसके लिये कुछ
भी असाध्य नहीं होता। उसे मनोवाजओ्छित सिद्धि प्राप्त हो
जाती दे | वह सर्वश; सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी
होकर सर्वत्र विचरण करता है। कभी विकारोंके वश्चीभूत नहीं
देता | वद्द साक्षात् शिव ही है; इसमें संशय नहीं है ।
परमेश्वरि | इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्यके नवधा
खल््पका पूर्णतवा वर्णन किया है। अब ओर क्या सुनना
चाहती दो १ ( धरध्याय २६ )
के या सत्युको जीतकर अपरत् भाप्त करेकी चार योगिक साधनाएँ--आणायाम, भमध्य्त
अम्निका ध्यान, सुखसे वायुपान तथा छुड़ी हुईं जिह्वाद्वरा गलेकी घोटीका सपशे
ए् ००
. पवदी बोलीं--प्रमो | यदि आए प्रसन्न हँ तो योगी
ण्ण केशजनित श्द् क को जिस ३.
है 'राजनित वायुपदकी जिस प्रकार प्राप्त होता है; वह
२ एसे बताइये | ह
हिलह शक ३५६ फहा-सुन्द्रे | पहले मैंने योगियेकि द्वितकी
पी का हक जिसके अनुसार योगियोंने काल्पर
आकर पी योगी जिस प्रकार वायुका ख़ल्प धारण
हज कह “यर्म भी कहा गया है| इसलिये योगशक्तिके
.... 3 की जानकर ग्राणायाममें तत्पर हो जाय ।
बज गुर -
है; 46
“हर आधे भाउमें ही वह आये हुए. काल्को बीत
लेता है | हृदयमें स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्निको उद्दीत
करनेवाली है । उसे अग्निका सहायक बताया गया ६ ।
वह वायु बाहर ओर भीतर सत्र व्यात ओर मह्दान् दे |
ज्ञान) विज्ञान और उत्साह--सबकी प्रउत्ति बायुसे दी दोती ६।
जिसने यहाँ वायुको जीत लिया; उसने इस सम्पूर्ण जगतूपर
विजय पा ली ।
25% हम «0 पलक ज़रा हम »55. मृस्यक, 4“
साधकको चाहिये कि वद जत आझोर मत्युका हलवा
इच्छासे सदा धारणा खित रहा के बामदबथ दाग्यशा
भलीमॉति घारणा ओर घ्यानर्म तार रदना चाहुय |
'
3१०
अमर कली...
# नमी रुद्ठाव शान्दाय प्रह्ण परमात्मचे +
संश्षिप्त-शिवपुराणाडू
मुखसे घोकनीकों फूँक-फूँककर उस वायुके द्वारा अपने सब
कार्यकों सिद्ध करता है; उसी प्रकार योगीको प्राणायामका
अभ्यास करना चाहिये। प्राणायामके समय जिनका ध्यान
किया जाता है; वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्तों मस्तक; नेत्र; पेर
ओर ह्वथोंसे युक्त हैं तथा समस्त अन्थियोंको आव्त करके उनसे
भी दस अंगुल आगे स्थित हैं | आदियमें व्याहृति ओर*“अन्त्मे
शिरोमन्त्रसहित गायत्रीका तीम बार जप करे ओर प्राणवायुको
रोके रहे | प्राणोंके इस आयामका नाम प्राणायाम दे | चन्द्रमा
ओर सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते दे । परंतु प्राणायाम-
पूर्वक ध्यानपरायण योगी जानेपर आजतक नहीं छोटे हैं
( अर्थात् मुक्त हो गये हैँ )। देवि | जो छ्विज सौ वर्षोतक
तपस्या करके कुशोंके अग्रभागसे एक बूँद जल पीता दें) वह
जिस फलको पाता है, वही ब्राह्मणोंको एकमात्र धारणा अथवा
प्राणायामके द्वारा मिल जाता है | जो द्विज सवेरे उठकर एक
प्राणायाम करता है; वह अपने सम्पूर्ण पापको शीघ्र ही नष्ट
कर देता ओर ब्रह्मलोककों जाता है। जो आललस्यरहित दो
सदा एकान्तमें प्राणायाम करता है; वह जरा ओर झृत्युको
जीतकर वायुक्के समान गतिशीछ हो आकाशर्म विचरता दे ।
वह सिद्धोके खरूप, कान्ति, गेघा, पराक्रम और श्योय॑को
प्रात्त कर लेता है | उसकी गति वायुके समान हो जाती है तथा
उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुखकी प्राप्ति होती है ।
देदेश्वरि | योगी जिस प्रकार वायुसे सिद्धि प्राप्त करता
है, वह सब विधान मैंने बता दिया |अब तेजसे जिस तरह
वह सिद्धि छाभ करता है; उसे भी बता रहा हूँ। जहाँ दूसरे
लोगोंकी बातचीतका कोछाइल न पहुँचता दो, ऐसे झान्त
एकान्त स्थानमें अपने सुखद आसनपर बेठकर चबरूमा ओर
सूर्य ( वाम और दक्षिण नेन्न ) की कान्तिसे प्रकाशित मब्यवर्ती
देश अमष्यभागमें जो अभिका तेज अव्यक्त रुपसे प्रकाशित द्वोता
है, उसे आल्स्यरहित योगी दीपकरदित अन्धकासू्ण स्थानमें
चिन्तन करनेपर निश्चय ही देख सकता है---इसरमें संशय नहीं
है | योगी द्यथकी अंगुलियोंसे यत्नपूवक दोनों नेन्नोंकी कुछ
कुछ दबाये रक्ले ओर उनके तारोंकों देखता हुआ एक़ांग्र
चित्तते आधे महूर्ततक उन्हींका चिन्तन करे | तदनन्तर
अन्वकारमे भी ध्यान करनेपर वह उस ईश्वरीय च्योतिको देख धकत्ता
४ । बढ ज्योति सफेद: छाछ) पीली, काढी तया इन्द्रधनुषके
समान रंगवाली होती दे | भंदिके वीचमें ललाटवर्ती वालस्र्य-
के समान तेजवाके उन अभिदेवका साक्षात्कार करके योगी
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला दो जाता हैं तथा मनोवास्छित
का हे अत. न्यार “रम»--. कट नम गेनया-मप भा... आन | ये हरि
शरीर घारण करके क्रीडा करता है | वह योगी कारण-तलक्े
शान्त करके उसमें आविष्ट होना; दुसरेके शरीरमें प्रवेश कज़ा,
अणिमा आदि गुणोंको पा लेना, मनसे ही सब कुछ देखना,
दूरकी बातोंकों सुनना ओर जानना; अद्श्य हो जाना, वहुत-
से रूप धारण कर लेना तथा आकाशमें विचरा इसादि
सिद्धियोंकों निरन््तर अम्यासके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है । जे
अन्थकारसे परे और सूर्यके समान तेजखी है; उसी इस
महान ज्योतिर्मय पुरुष ( परमात्मा )को मैं जानता हूँ । उन्हीं
जानकर मनुष्य काल या मृत्युकों लाँघ जाता है। मोके
लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है |# देवि! इ
प्रकार मैंने तुमसे तेजस्तत्वके चिन्तनकी उत्तम विधिका वर्णन
किया है; जिससे योगी कालपर विजेय पाकर अमरलकों गत
कर लेता है ।
देवि | अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ जिसे
मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती ।
देवि | ध्यान करनेवाले योगियोंकी चौथी गति ( गबना।
बतायी जाती हैं । योगी अपने चित्तको वें करके ययायोग
स्थानमें सुखद आसनपर बेठे | वह शरीरको ऊँचा कर
अज्जलि बाँधकर चेंचकी-सी आकतिवाले मुखके द्वाए पे
धीरे वायुका पान करे । ऐसा करजनेसे क्षणभरमें तक
भीतर स्थित जीवनदायी जलकी बूँदें पपकने लगती हूँ। उने
बूँदोंको वायुके द्वारा लेकर दँघे | वह गीतछ जल अमृत
स्वरुप है । जो दोगी उसे प्रतिदिन पीता कै: वह कभी ४3
अधीन नहीं होता | उसे भूख-प्यास नहीं लगती का
शरीर दिव्य और तेज मद्दान् हो जाता है। वह वह ६ कह
और वेगमें धोड़ेकी समानता करता है। उसकी दृष्टि गई ०
स्थान तेज हो जाती है और उसे दूरकी भी बाते कस
हैं | उसके केश काले-काले और घुँवणले हो जाते ॥
अड्नकान्ति गन्धव एवं विद्याघरोंकी समानता करों है| $
मनुष्य देवताओंके वर्णसे तो वर्षतिक जीवित रहता ६ ।
अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिके वुल्य ही पा
उसमें इच्छानुसार विचरनेंकी भक्ति आ जाती दे कक क्
सदा ही सुखी रहकर आकाशमें विचरणकी शक्ति क्
कर लेता दे । _ विलिक
नमन नकलानी ककनी फनी न न
्फ्न्य 5 ९ हे वि
# वेदाइमे्त पुरुष मद्दान्तमादित्यवर्ण तमतः परत
' दिल्वातिगत्युमे नह प्न्थां 66:
तमेव विदित्वातिदृत्युमेति नान््य: पन् वियते प्राय/ हि
( शि पु ७ 2 0 2 । यु हुई [ “।
उमासंदिता ]
# भ्रगवती उम्राके कालिका-अवतारकी कथा कह
उर२
बग़नने ! अब मृत्युपर विजय पानेकी पुनः दूसरी विधि
बता रहा हूँ, जिसे देवताओंने भी प्रयत्नपूवंक छिपा रकखा
है तुम उसे सुनो। योगी पुरुष अपनी जिहाकों मोडकर
तालुमें लगानेका प्रयत्म करे | कुछ काहूतक ऐसा करनेसे
वह क्रमशः लंबी द्ोकर गलेकी घॉटीतक पहुँच जाती है।
तदनम्तर जब जिह्बासे गढेकी घाटी सटती है; तब शीतल सुघा-
का ज्ाव करती है | उस सुधाको जो योगी सदा पीता है; वह
अमरत्वको प्राप्त होता है । ( अध्याय २७ )
भगवती उमके कालिका-अवतारकी कथा--समाधि ओर सुरथके समक्ष सेधाका
देवीकी कृपासे मधुकेटभके वधका ग्रसड़ सुनाना
इसके अनन्तर छायापुरुष, संग कश्यपवंश:
सन्वन्तर, मनुवंश, सत्यत्रतादिवंश, पिठृकरुष तथा
यासोत्पत्ति आदिका वर्णन खुननेके पश्चात् सुनियोने
उतजीसे कहा--अह्मवेत्ताओँमें श्रेष्ठ सूतजी ! इमने आपके
खे भगवान् शिवक्री अनेक इतिहासोंसे युक्त रमणीय कथा
नी) जो उनके नानावतारोंसे सम्बन्ध रखती है तथा मनुष्यों-
शी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है | अब इम आपसे
गंगजननी भगवती उम्राका मनोहर चरित्र सुनना चाहते हे ।
जह् परमात्मा महेश्वरकी जो आद्या सनातनी शक्ति हैं
३ उम्र नामसे विख्यात हैं। वे ही त्रिलोकीकों उत्पन्न करनेवाली
राशक्ति हैं | महामते | दक्षकन्या सती और हिमवानकी
पुत्री पावती-ये उमाके दो अवतार हमने सुने । सूतजी ! अब
उनके दुूसर अवतारोंका वणन कीजिये | लक्ष्मीजननी जगदम्बा
उमाके गुणोंकी सुननेसे कोन बुद्धिमान पुरुष विरत हो सकता
| शानी पुझेष भी कमी उनके कथा-श्रवणके शुभ अवसरको
भी छोड़ते |
सतजीने कहा--महात्माओ | तुमछोग घन्य हो और
शा इतकृत्य हो; क्योंकि पर अम्वा उमाके महान् चरित्रके
रिप्मे पूछ रहे हो । जो इस कथाकों सुनते; पूछते ओर
रचते हैं, उनके चरणकमलोकी धूलिको ही ऋषियोंने
पे थाना है | जिनका चित्त परम संवित्-खरूपा श्रीउमादेवीके
उनमे लीन है, वे पुरुष घन्य हैं, कृतकत्य हूँ; उनकी माता
- और कुछ भी धन्य हैँ । जो समस्त कारणोंकी भी कारपरूपा
) ''र) उम्राकी स्तुति नहीं करते, वे मायाके गुणोंसे मोहित
-/ भपशेन ईं--इसमें संशय नहीं है । जो कदणारतकी
| पा भशदेवीका भजन नहीं करते, वे दंसारल्पी
5 गज में पड़ते हैं। जो देवी उम्राको छोड़कर दूसरे
हे *अकी घरय लेता है, बह मानो गड़गजीको छोड़कर
कक निड्े लिये मर्खलफे जलाशयके पास जाता है ।
भ्नानते धर्म आदि चारों पुरुषाथोंकी अनावास
प्राप्ति होती है; उन देवी उम्ाकी आराधना कौन श्रेष्ठ पुरुष
छोड़ सकता है ।
पूवकालमें मह्दमना सुरथने महर्षि मेघासे यही बात पूछी
थी । उस समय मेघाने जो उत्तर दिया; में वही बता रहा हूँ;
तुमलोग सुनो । पहले खारोचिष मन्वन्तरमें विरथ नामसे
प्रसिद एक राजा हो गये ईं | उनके युत्र सुरय हुए, जो
महान् बल ओर पराक्रमसे सम्पन्न थे | वे दाननिपुण; सत्य-
वादी, खघमंकुशछ, विद्वान, देवीमक्त, दयासागर तथा
प्रजाजनोंका भछीभोति पालन करनेवाले थे । इन्द्रके समान
तेजस्वी राजा सुरथके प्रथ्वीपर शासन करते समय नो ऐसे
राजा हुए, जो उनके हाथसे भूमण्डलका राज्य छीन लेनेके
प्रयलमे लगे थे | उन्होंने भूपाल सुरथकी राजघानी कोलापुरी-
को चारों ओरसे घेर लिया | उनके साथ राजाका बड़ा भवानक
सुद्य हुआ | उनके शबुगण बढ़े प्रवक्क थे | अतः युद्धमें
भूपाल सुरथकी पराजय हुईं | शस्रुओंने खारा राज्य अपने
अधिकारमें करके सुरथकों कोलापुरीसे निकाल दिया | राजा
अपनी दूसरी पुरीमें आये और वहाँ मन्त्रियोंक साथ रहकर
राज्य करने लगे | परंतु प्रवछ विपक्षियंनि वह्शों भी आक्रमण
करके उन्हें पराजित कर दिया । देवयोगसे राजाके मन्त्री आदि
गण भी उनके शत्रु बन बैठे ओर खजानेमें जो धन संचित
था, वह सब उन विरोधी मन्ब्री आदिने अपने द्वायमें
कर लिया |
तब राजा सुरथ शिकारके बहने अकेले दी घोडपर सवार
हो नगरते पादर निकले और गहन वनमें चले गये । यहाँ
इधर-उधर धृमते हुएए राजाने एक श्रेष्ठ इुनिका आश्रम देखा,
जो चारों ओर फूलोफे बगीचें लगे होनेते वड़ी शोभा पा रहा
था| वहाँ वेदमन्चोंकी ध्यनि गूंन रही थी | सब जीव-जन्लु
शान्तभावसे रदते थे। मुगिके शिर्ष्या, प्रशि्ा तया उनके थी
शिप्दोंने उठ आभ्रमकों दब आरते पर सा या | महमते !
दियदर भेघाऊ प्रदावतसे उस आधिसम सदाबकी अ पआाद
४१२
# नमो उद्राय शान्ताथ तहाणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
अल्प शक्तिवाले गो भादि पश्ुओंको पीड़ा नहीं देते थे ।
वहाँ जानेपर मुनीश्वर मेघाने मीठे वचन, भोजन और आसन-
दारा उन परम दयादर विद्वान नरेशका आदर-सत्कार
किया |
एक दिन राजा सुरथ बहुत ही चिन्तित तथा मोहके
वशीभूत होकर अनेक प्रकारसे विचार कर रहे थे । इतने-
में ही वहाँ एक वेश्य आ पहुँचा । राजाने उससे पूछा---
(भैया | तुम कौन हो और किसलिये यहाँ आये दो ? क्या
कारण है कि दुखी दिखायी दे रहे दो ? यह मुझे बताओ ।?
गशाजाके मुखसे यह मधुर वचन छुनकर वेश्यप्रवर समाधिने दोनों
नेत्रोंसि आँसू बढ़ाते हुए प्रेम और नप्ततापूर्ण वाणीमें इस
प्रकार उत्तर दिया |
घेश्य वोला--राजन | में वेश्य हैँ | मेरा नाम समावि
| मैं घनीके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ । परंतु मेरे पुत्रों और
ब्रीआदिने घनके लोभसे मुझे घरसे निकाल दिया दे । अत
अपने प्रारब्धकर्मसे दुखी हो में वनमें चला आया हूँ ।
ऋद्णासागर प्रभो । यहाँ आकर में पुरे) परच्ों, पत्नी, भाई-
नतीजे तथा अन्य सुदृदक्कि कुशल-समाचार नहीं जान
पाता ।
राजा बोले--जिन दुराचारी तथा घनके लोभी पुत्र
आदिने तुम्हें निकाल दिया है; उन््हींके प्रति मूड नीवी
भाँति तुम प्रेम क्यों करते हो !
देश्यने कद्दा--राजन | आपने उत्तम बात कही है ।
आपकी वाणी सारगर्भित हक तथापि स्नेहपाशसे बँधा हुआ
मेरा मन अत्यन्त मोहको प्राप्त हो रहा है ।
इस तरह मोहसे व्याकुछ हुए वेश्य और राजा दोनों
मुनिवर मेधाके पास गये | वेश्यसहित राजाने हाय जोड़कर
मुनिको प्रणाम किया और इस प्रकार कह्--“भगवन् | आप
हम दोनोंके मोहपाशकों काट दीजिये । मुझे राज्यल्श्मीने
छोड़ दिया ओर मैंने गहन वनकी शरण ली; तथापि राज्य छिन
जानेके कारण मुझे संतोष नहीं है | और यह वैश्य है) जिसे न्ली
आदि खजनोंने घरसे' निकाल दिया है; तथापि उनकी ओरसे
इसकी ममता दुर नहीं हो रही है | इसका क्या कारण है !
बताइये | समझदार होनेपर भी हम दोनोंका मन मोह
व्याकुछ हो गया; यह तो बढ़ी भारी मूखंता है।
।
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्ट्ट् 2 ॥0 कह!
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( | ॥॥/ ॥॥ 2 302.
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_न्लल्लिः
फ्रषि वोले---राजन ) सनातन अक्तिखरूपां है
महामाया कद्दी गयी हैँ | वे ही सबके मनकी खींचकर 75
दाल देती हैं | प्रमो | उनकी मायासे मोहित द्वोनेके हा
उम्रासंदिता |
# मेंघाका समाधि और खुरथको भज्जु-कैटभके बधका प्रसक् खुनाना #
ब्रद्मा आदि समस्त देवता भी परम तत््वकोी नहीं ज्ञान पाते;
फिर मनुष्योंकी तो वात ही क्या है ? वे परमेश्वरी ही रज्ञ,
तल और तम--इन तीन गुणोंका आश्रय ले समयानुसार
'हमूर्ण विश्वकी सुष्ठि, पाछन और संद्वार करती हैं | नृपश्रेष्ठ
जिसके ऊपर वे इच्छानुसार रूप घारण करनेवाली वरदायिनी
वादम्वा प्रसन्न द्वोती हैं; वही मोहके घेरेको लॉघ पाता है |
है राजाने पूछा--मुने ! जो सबको मोहित करती हैं, वे
देवी मह्षमाया कोन हैं ! और किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव
हुआ है ! यह कृपा करके मुझे बताइये | -
ऋषि बोले--जव सारा जगत् एकार्णवक्के जरमें निमग्न
पा और योगेश्वर भगवान् केशव शेषकी शय्या बिछाकर
पोगनिद्राका आश्रय ले शयन कर रहे थे, उन्हीं दिनों मगवान
दिशुके कानेके मलसे दो असुर उत्पन्न हुए, जो भूतलपर
मधु और कैय्भके नामसे विस्यात हैं | वे दोनों विशालकाय
पैर अपुर प्रत्यकालके सूर्यकी भाँति तेजखी थे । उनके
पदढे बहुत बड़े थे | उनके मुख दाढोंके कारण ऐसे
विकराढ दिखायी देते ये, मानो वे सम्पूर्ण जगतको खा
जानेके लिये उद्यत हों | उन दोनोंने भगवान् विष्णुकी नाभिसे
रे हुए कम्रलके ऊपर विराजमान ब्रह्माको देखकर पूछा---
कक | व् कौन है ? ऐसा कहते हुए वे उन्हें मार डालनेके
“+ उद्यत हो गये | ््चाजीने देखा--ये दोनों दैत्य आक्रमण
नो चाहते हैं और भगवान् जनाद॑न समुद्रके जलमें सो रहे
! ## कब उन्देने परसेख़रीका सवन किया और उनसे प्रार्थना
अभिके | तुम इन दोनों दुर्जय असुरोंको मोहित करो
जनता भगवान् नारायणको जगा दो |?
० 3३ |
के करनी कट प्रकार भधु ओर कैटभके नाशके
लक गे ! करनेपर सम्यूण॑ विद्याओंकी अधिदेवी
हैरी शकिके रुपये ग्रस्थुन शुक्ला द्वादशीकों भेलोक्य-
मल प्रकट हो महाकालीके मामसे विख्यात
"ओके आकाशवाणी हुई-/कमलछासन | डरो
| या गो के भइुडेटभको मारकर मैं तुम्हारे कप्य्कका
कप श्र वे महामाया भीइरिके. नेत्र और
भ उज्े हे करी के अव्यक्तजन्मा ब्रह्म के हृष्टिपथर्मे
कद का 5 ली देवाधिदेव हुपीकेश जनाद॑न
या जसने दोनों देस्य मधु और कैंटम-
(पर फोर लह जय अतुल तेजली बविधष्णुका पॉनच
3 हुआ । तब महामायाक्रे प्रभावते
धो
४९३
-2 १, ७७७८८: ; है
आर 0४ 27 2772
हट कि कं ४६९४ 422
"री ३९) ई 7 र + 00१५
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मोहित हुए उन श्रेंठ्ठ दानवोंने लक्ष्मीपतिसे कद्दा--प्तुम
हमसे मनोवाड्छित वर ग्रहण करो |!
नारायण बोले---यदि तुमत्ओेग प्रसन्न हो तो मेरे हाथसे
मारे जाओ | यही मेरा वर दे | इसे दो । मैं तुम दोनसे
दूसरा वर नहीं माँगता |
ऋषि कहते हँ--डन असुरोंने देखा, सारी पृथ्वी
एकार्णवके जलमें ड्रबी हुई है; तब वे केशवसे वोले--हम
दोनोंको ऐसी जगह मारो, जहाँ जलसे भीगी हुई घरती न
हो । पहुत अच्छाः कहकर भगवान् विष्णुने अपना
परम तेजस्वी चक्र उठाया ओर अपनी जौबपर उनके मस्तक
रखकर काय डाढा | राजन | यहू कालिकाकी उत्पत्तिका
प्रसझ् कहा गया है | मद्गामते |! अब महारुक्ष्मीके प्रादुर्भायकी
कथा सुनो । देवी उम्र निविकार ओर निराकार द्वोकर भी
देवताओंका दुःख दूर करनेके छिये युगनयुगर्मे साफारतूप
घारण करके प्रकट द्वोती हैं । उनका दरीस्रहाय उनकी
ऋी चर
हे चर वेभव कहा रु न लीजामे कर इसलिये कर न ली
इच्छाका वेभव कहा गया दे | वे लाज़ान इसाल्व सकद दाह
छा
ऋषि
2 न कक आन करते ाज जी.
हू कि नक्तेजन उनके गुणाका गान करते रह )
( शच्याव २८---४५ )
छरछ
७3 एक फरपानमन-+ कमान मम
ऋषि कहते है--राजन ! रभ्म नामसे प्रसिद्ध एक
असुर था, जो देत्यवंशका शिरोमणि माना जाता था । उससे
प्रहातेजम्बी महिष नामक दानवका जन्म हुआ था | दानवराज
महिष समस्त देवताओंको युद्धमें पराजित करके देवराज इन्द्रके
सिंद्दासनपर जा बैठा ओर स्वर्गलोकर्मे रहकर त्रिलोकीका राज्य
करने लगा | तब पराजित हुए. देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये ।
ब्रह्माजी भी उन सबको साथ ले उस स्थानपर गये; जहाँ
भगवान् शिव ओर विष्णु विराजमान ये । वहाँ पहुँचकर सब
देवताओंने शिव ओर फेशवको नमस्कार किया तथा अपना
तब वृत्तान्त वथार्थरूपसे ब्योरेवार कह सुनाया । वे बोले--
“भगवन् | दुरात्मा महिषासुरने हम सबको समराद्रणर्मे जीतकर
सर्गलोकसे निकाल दिया है | इसलिये हम इस मत्यंलोक्मे
भटक रहे हैँ ओर कहीं भी इ्मे शान्ति नहीं मिल रही है।
उस असुरने इन्द्र आदि देवताओंकी कोन-कोन-सी दु्दशा नहीं
की है | सूर्य, चन्द्रमा, वरुण; कुबेर; यम; इन्द्र, अग्औिः वायु
गन्धवे, विद्याधर ओर चारण---हइन सबके तथा अन्य लोगेंके
भी जो कतंव्यकर्म हैं, उन सबको वह पापात्मा असुर खयं
दही करता है | उसने देत्यपक्षकों अमय-दान कर दिया है।
इसलिये हम सब देवता आपकी शरणमें आये हैं | आप दोनों
हमारी रक्षा करें ओर उस असुस्के वघका उपाय श्ञीत्न ही सोचे;
बयोंकि आप दोनों ऐसा करनेर्में समर्थ हैं |?
देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् शिव ओर विष्णुने
अत्यन्त क्रोध किया | रोधके मारे उनके नेत्र घूमने लगे । तब
अत्यन्त क्रोघसे भरे हुए. भगवान् शिव और विष्णुके मुखसे
तथा अन्य देवताओंके शरीरसे तेज प्रकट हुआ । तेजका वह
मिद्दन् पुञ्ञ अत्यन्त प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें प्रकाशित
हो उठा । दुरगांजीके ध्यानमें छगे हुए सब देवताओंने उस
पैजको प्रत्यक्ष देखा | सम्पूण देवताओंके शरीरोंसे निकला हुआ
बह अत्यन्त भीषण सेज एकत्र हो एक नारीके रुपमें परिणत
शे गया । वह नारी साक्षात् मह्दिषिसर्दिनी देवी थीं। उनका
प्रकाशभान मुख भगवान् खिवके वेजसे प्रकट हुआ था |
भुजाएँ विष्णुके तेजसे उत्पन्न हुईं थीं। केश यमशाजके तेजसे
आविभूत हुए! ये | उनके दोनों स्तन चन्द्रमाके तेजसे प्रकट
हुए. ये । कटिभाग इन्द्रके तेजल तथा जद्डा और ऊद वरुणके
तेजसे पेदा छुए ये । एथ्वीके तेजसे. नितम्बका और ब्रह्माजीके
पेजसे दोनों चरणोंका आविभाव हुआ था | पैरॉकी अंगुलियों
मर्यके तेजसे और दाथकी अंगलियों वसुर्ओक्ते पेजमे उलस्र
# नमो रुद्भाय शाम्ताय ब्रह्मण परमातमने +
| संक्षिप्त-शिवपुराणाह
सम्पुर्ण देवताओंके तेजसे देवीका महालक्ष्मीरूपमे अवतार और उनके द्वारा महिषासुरका वध
हुई थीं। नासिका कुबेरके, दाँत प्रजापतिके, तीनों नेत्र.अगिरे
दोनों भोहें साध्यगणके, दोनों कान वायुके तथा अन्य देवताओंक
सैजसे प्रकट हुए थे | इस प्रकार देवताओंके तेज्नसे प्रक
हुई कमलालया लक्ष्मी ही वह परमेश्वरी यी | समर
देवताओंकी तेजोराशिसे प्रकट हुईं उन देवीको देखकर उब
देवताओंको बड़ा हष प्राप्त हुआ | परंतु उनके पास कोई अद्न
नहीं था । यह देख ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने शिवा देवीको अच्न-
शस्ञसे सम्पन्न करनेका विचार किया । तब महेश्वरने महेधरी-
को झूछ समर्पित किया | मगवान् विष्णुने चक्र। वरुणने पा९)
अग्निदेवने शक्ति; वायु देवताने घनुष तथा बाणोंसे भरे दो
तरकस और शचीपति इन्द्रने वच्र एवं धण्य प्रदान किये।
यमराजने कालदण्ड) प्रजापतिने अश्वमादा) ब्रह्माने कमप्डडु
एवं सूर्यदेवने, समस्त रोमकूपोंमें अपनी किरण अपित कीं |
कालने उन्हें चमकती हुईं ढाठ और तबवार दी धीरसाणे
सुन्दर द्वर तथा कभी पुराने न होनेवाके दो दिव्य व्त भें
किये | साथ ही उन्होंने दिव्य चूडामणि, दो कुण्डल) बहुत
कड़े) अध॑चन्द्र, केयूर। मनोहर नूपुरः गलेकी हँतुली और थे.
अँगुलियोंमं पहननेके लिये रक्नोंकी बनी अँगूठियाँ भी दी |
विश्वकर्मोने उन्हें मनोहर फरसा मैट किया | साथ ही अनेक
प्रकारके अज्ज और अमेद्य कवच दिये | सपुद्रने उंदा बुस्य
एवं सरस रहनेवाली माला दी और एक कमढका फूल मंद
किया । हिमवानने खवारीके लिये सिंह तथा आभूषणके दिये
नाना प्रकारके रत्न दिये। कुबेरने उन्हें मघुसे भण पात्र अत
किया तथा सर्पोके नेता शेंषनागने विचिन्र रचनाकीशरी
सुशोभित एक नागद्वार मेंठ किया? जिसमें नाना कट
सुन्दर मणियाँ गूँथी हुई थीं। इन सबने तथा दूसरे देवताने
भी आभूषण और अज्ज-शम्त्र देकर देवीका सम्मान किया |
तत्श्वात् उन्होंने बारंबार अद्ृह्यस करके उचखरसे गर्णना की ।
उनके उस भयंकर नादसे सम्पूर्ण आकाश गज उठा । हि
बढ़े जोरकी प्रतिध्वनि हुईं जिससे तीनों लोकोंमे बट
गयी । चारों समुद्रोंने अपनी मर्यादा छोड़ दी | शेख 5 हे |
लगी | उस समय महददिषासुरसे पीड़ित हुए देवताओनि देंवीर
जय-जयकार की । ह
- तदनन्तर सब देवताओंने उन मद्दाल्दमीखल्पा पर
जगदम्बाका भक्ति-गद्गद वाणीद्वारा खवन किया | व्म
त्रिल्लोकीकों क्षोभप्रस्त देख देवबैरी देंत्य अपनी सम उठ
ऋवच आदिसे सुसक्चित कर द्वार्थोर्मे दथियार छे मदया
5भासंदिता |
सड़ेँ हुए | रोषसे मरा हुआ महिषासुर भी उस झब्दकी ओर
व््य करके दौड़ा ओर आगे पहुँचकर उसने देवीको देखा;
जो अपनी प्रभासे तीनों छोकोंको प्रकाशित' कर रही थीं | इस
पमय महिषासुरके द्वारा पालित करोड़ों शस्तधारी मह्यवीर वहाँ
आ पहुँचे | चिक्षु+ चामर, उंदग्न) कराछ, उद्धत) वाध्कल;
ताम्र, उग्रास्य। उम्रवीयं, विडाछ, अन्धक) दुधर; दुमुंख;
त्रिनेत्र ओर महाहनु--ये तथा अन्य बहुत-से युद्धकुशछ
धूरवीर समराष्ट्रणमें देवीके साथ युद्ध करने लगे | वे सब-के-
पव अल्न-शत्नोंकी विद्यामें पारंगत थे | इस प्रकार देवी ओर
दैत्गण दोनों परस्पर जूझने छगे | उनका वह भीषण समय
मार-काटमें ही वीतने छगा। इस तरह भयानक युद्ध होनेके
शरद महिपासुर देवीके साथ मायायुद्ध करने लगा |
तब देवीने कहा--रे मूढ़ ! तेरी बुद्धि मारी गयी है ।
तृ ९३ हठ क्यों करता है ! तीनों छोकोंमें कोई भी अमुर
युद्ध मेरे सामने टिक नहीं सकते !
# देवी उग्राके धारीरले सरस्वतीफा आाविभोद +
छेर५
यों कइकर स्वकलामयी देवी कूदकर मह्िषासुरपर चढ़
गयीं और अपने वैरसे उसे दबाकर उन्होंने भयंकर शूलसे
उसके कण्ठमें आघात किया । उनके पेरसे दबा होनेपर भी
महिषासुर अपने मुखसे दूसरे रूपमें बाहर निकलने छगा । अभी
आधे शरीरसे द्वी वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने
प्रभावसे उसे रोक दिया | आधा निकला होनेपर भी वह महा-
अधम देत्य देवीके साथ युद्ध करने छूगा | तब देवीने बहुत
बड़ी तलवारसे उसका सिर काटकर उस असुरको धराशायी
कर दिया | फिर तो उसके सेनिकगण ५हाय ! द्वाय !!
करके नीचे मुख किये भयभीत हो रणभूमिसे भागने और
त्राहि-नाहिकी पुकार करने छगे | उस समय इन्द्र आदि सब
देवताओंने देवीकी स्तुति की | गन्धव गीत गाने लगे और
अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। राजन | इस प्रकार मैंने तुमसे
देवीके मह्दालक्ष्मी-अवतारकी कथा कह्दी है | अब तुम सुसख्थिर
चित्तसे सरखतीके प्रादुमोवका प्रसड़' सुनो | ( अध्याय ४६ )
>+->-++्अ्ट्रच्डकि्क््_5
देवी उम्ाफे शरीरसे सरखतीका आविभोव, उनके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास
दूत भेजना, दूतके निराश लोटनेपर झुम्भका क्रमशः धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड तथा
र्ूबीजकी श्रेजना ओर देवीके दाशा उद्र सबका मारा जाना
'ुपि कहत हैँ--पूर्वकालमें शुम्भ और निश्ञम्भ
पामके दो प्रतापी दैत्य थे, जो आपसमें भाई-माई थे । उन
रैनेने चराचर प्राणियोंसहित समस्त बिलोकीके राच्यपर
'उक्षक् आक्रणण किया | उनसे पीड़ित हुए देवताओंने
दैगाह्य पर्वतकी शरण ली और सम्पूर्ण अभीशेंको देनेवाली
अभूतजननी देवी उम्राका स्तवन किया ।
देवता वोढे--महेश्वरि दुर्ग | आपकी जय हो । अपने
भदेजनोंका प्रिय फरनेवाली देवि | आपकी जय हो | आप
“नो लेकोंकी रक्षा करनेवाली शिवा हैँ | आपको वारंबार
परत दे । आप ही मोक्ष प्रदान करनेवाली परा अम्दा हैं ।
कक पे पर्वार नमस्कार है। आप समस्त सुंसारकी उलत्ति;
जप और झुशर करनेवाछी है| आपको नमस्कार है !
उच्च और ताराहूप धारण करनेवाली देवि |! आपको
. ९ ३। डिज्रमसता आपका ही छल्प हैं | आप ही
स्य्ाई। आपको नमत्कार है। सुवनेश्वरि | आपको
हर , भेररूपिषि | आपको नमस्कार है। आप ही
५ जार धृ्नावती हैँ | आपको वास्ंयार नमस्कार
“हमें शे प्रिषुससुद्दरी और सातड्ठी हैं । आपके
यारंबार नमस्कार है | अजिता, विजञया) जया; भज्जला
और विलासिनी--ये सभी आपके ही विभिन्न रूपोंकी संग्ाएँ
हैं । इन सभी खझूपोर्मे आपको नमस्कार है| दोखी ( माता
अथवा कामघेनु )-रूपमें आपको नमस्कार हे | घोर आकार
धारण करनेवाली आपको नमस्कार दे | अपराजिता-रूपमें
आपको प्रणाम है | नित्या महाविद्याके रूपमें आपको बारवार
नमस्कार है ! आप ही शरणाग्तोंका पावम करनेवादी दद्वाणी
8 । आपको वारंबार नमस्कार है| वेदान्तके द्वारा आपके पी
व्रूपका बोध होता है । आपको नमस्कार दे | आप परमात्मा
हैं | आपको मेरा प्रणाम दें। अनन्तकोटि अद्याण्हेंका संचालन
करनेयाली आप जगदम्बाकों वारंबार नमस्कार दे [&
है. देवा ऊ्ु :---
लय दुगगें सहेशानि जयारमीय जनभ्रिये ।
तैलेक्यतागदारिण्ये शिवावे ते नमी समः ॥
नमो झुक्तिदायिन्स पराग्दाये नो नमः ।
नम: घमस्वत्त तारों ठछापिस्पित्दसल डा गिआ ॥
फाथ्कारूपसन्पन्ने नमस्वाराटले.. नमः :
जाओ
थे रूप व फि जा कक हि
द्िन्नमस्ताखरूपाने जी यपाप चअस5?
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४२६
संज्वाशकम्मनम मर रब आर आाककर्रयम५कमक न कभी भभवाहपदब#+ कप पकराताहा्ीययमाइ॒बम सकाएअरम गत कण पाए बकयदररदरवनय कलर 5/ के अचल वाइस पार ध कमर का भरकर धर फ़ जलाकर दाम पा पूल्पाकवनुच कप कन॥्पदारदाडम महहरभपरऋम दावा चाप जय यशरध न दम वार कक पका सका कप कल.
देवताओंके इस प्रकार स्ठुति करनेपर वरदायिनी एवं
कल्याणरूपिणी गोरी देवी बहुत प्रसन्न हुईं | उन्होंने समस्त
देवताओंसे पूछा--५आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं !?
तब उन्हीं गोरीके शरीरसे एक कुमारी प्रकट हुईं । वह सब
देवताओंके देखते-देखते शिवशक्तिसे आदरपूर्वक बोली---
'<माँ | ये समस्त स्वरगंवासी देवता निशुम्म और शुम्भ नामक
प्रबल देत्योंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी रक्षाके लिये मेरी
स्ठ॒ृति करते हैँ ।? पावंतीके शरीरकोशसे वह कुमारी निकली
थी, इसलिये कोशिकी नामसे प्रसिद्ध हुईं। कोशिकी ही
साक्षात् झम्भासुरका नाश करनेवाली सरखती है । उन्हींको
उग्रतारा और महोग्रतारा भी कहा गया है । माताके शरीस्से
खतः प्रकट होनेके कारण वे इस भूतलपर मातड़ी भी
कहलाती हैं । उन्होंने समस्त देवताओंसे कहा--५तुमलोग
निर्भय रहो। में खतन्त्र हूँ । अतः किसीका सहारा लिये
बिना ही तुम्हारा कार्य सिद्ध कर दूँगी |? ऐसा कहकर वे देवी
तत्काल वहाँ अदृश्य हो गर्यी ।
एक दिन शुम्भ ओर निशुम्मके सेवक चण्ड और
मुण्डने देवीकों देखा | उनका मनोहर रूप नेत्नोंको सुख प्रदान
करनेवाला था | उसे देखते ही वे मोहित हो सुध-बुध खोकर
पृथ्वीपर गिर पड़े; फिर होश ं आनेपर वे अपने राजाके
पास गये और आरभम्भसे ही सारा वृत्तान्त बताकर बोले---
महाराज | हम दोनोने एक अपूब सुन्दरी नारी देखी
है, जो हिमालयके रमणीय शिखरपर रहती है और सिंहपर
सवारी करती है |? चण्ड-मुण्डकी यह बात सुनकर महान
अछुर झम्मने देवीके पास सुग्रीव नामक अपना दूत
भेजा और कहा--“दूत |! हिमालयपर कोई अपूर्व सुन्दरी
रहती है | तुम वहाँ जाओ ओर उससे मेरा संदेश कहकर
भुवनेशि नमस्तुम्यं नमस्ते भेरवाक्नते ।
नमोंइस्तु बगलामुख्ये धूमावत्ये नमी नमः ॥
नमझिपुरसुन्द्य मातम्ये ते नमो नमः ।
अजितायै नमस्तुम्यं विजयाये नमो नमः ॥
जयाये मन्न॒लायेँ ते विलासिन्ये नमो नमः ।
दोग्मीरूपे नमस्तुम्यं नमो घोराक्नतेडस्तु ते ॥
नमो5पराजिताकारे नित्याकारे नमों नमः ।
शरणागतपालिन्ये रुद्राण्ये ते नमो नमः ॥
नमो वेदान्तवेधाये नमस्ते परमात्मने ।
अनन्तकोट्जिद्ाण्डनायिकाये नम्मो. नमः ॥
( शि० पु० उ० सं० ४७ | ३---२१ ० )
#* नमो रुद्राय शान्ताय प्रह्मणे परमात्मने #
[ सक्षित्त-शिवपुराणा_
उसे प्रयत्नपूवक यहाँ के आओ |? यह आज्ञा पैक
दानवशिरोमणि सुग्रीव हिमालयपर गया. और जगदला
महेश्वरीसे इस प्रकार बोला | द
दुतने कद्दा--देवि | देत्य श॒म्मासर अपने महा
बल ओर विक्रमके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात है।
उसका छोटा भाई निश्म्म भी वैसा ही है। अम्भने मुझ
तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है | इसलिये मैं यहाँ आया
हूँ | सुरेश्वरि | उसने जो संदेश दिया है; उसे इस समय
सुनो । “मैने समराज्रणमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर
उनके समस्त रत्नोंका अपहरण कर लिया है | यज्ञमें देवता
आदिके दिये हुए. देवभागका में खयं ही उपभोग
करता हूँ | मैं मानता हूँ कि तुम स्त्रियों रन हे। ख
रत्नेके ऊपर स्थित हो। इसलिये तुम कामजनित सके
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ब्तवे ७ संदेश सुनकर [तनाव
इतके सुँहसे श॒ुम्मका यह संदेश सुनकर भेंट
भगवान् शिवकी है, ल्ल्भा ४“ प्रकार कई
वान शिवकी प्राणवल्लमा महामायाने इस प्रकार कई
तुग्धर
देवी बोलों--डूत ! ठम सच कदते हो।
कथनमे थोड्वासा भी असत्य नहीं दे | परत नि हि
से एक प्रतिश कर छी है। उसे सुनो | जो मय है
पहुढ:
उम्राल॑दिता ]
चूर कर दे, जो मुझे युद्धमें जीत ले; उसीको में पति
बना सकती हूँ, दूसरेकी नहीं | यह मेरी अटल प्रतिज्ञा
है | इसलिये तुम श॒ुम्भ और निशुम्भको मेरी यह प्रतिज्ञा
वता दो | फिर इस विषयमें जेसा उचित हो, बैसा वे करें ।
देवीकी यह बात. सुनकर दानव सुग्रीव छौट गया |
वहाँ जाकर उसने विस्तारपूर्वक्क राजाको सब बातें बतायीं ।
दूतकी वात सुनकर उग्र शासन करनेवाल्य श॒ुम्भ कुपित
है उठा और बलवानोंमें श्रेष्ठ सेनापति धूम्राक्षते बोला--
धृध्राक्ष / हिमाल्यपर कोई सुन्दरी रहती है। तुम शीघ्र
वह जाकर जैसे भी वह यहाँ आये; उसी तरह उसे ले
आओ | असुर््रवर | उसे छानेमें तुम्हें भय नहीं मानना
चाहिये | यदि वह युद्ध करना चाहे तो तुम्हें प्रयक्षपूर्वक उसके
ताथ युद्ध भी करना चाहिये ।?
अम्भकी ऐसी आज्ञा पाकर दैत्य धूमप्नलोचन हिमाल्यपर
गया और उमाके अंशसे प्रकट हुई भगवती भुवनेश्ररीसे
कश--नितमिनि ! मेरे खवामीके पास चलो, नहीं तो तुम्हे
भरवा डाढूँगा | मेरे साथ साठ हजार असुरोंकी सेना है |?
देवी वोलीं--वीर ! तुम्हें दैत्यगजने भेजा है। यदि
पु मार है डालोगे तो क्या करूँगी। परंतु युद्धफे बिना
भय वहाँ जाना असम्भव है | मेरी ऐसी ही मान्यता है |
देवीके ऐसा कहनेपर दानव धूम्नलोचन उन्हें पकड़नेके
लिये दौड़ा | परंतु महेश्वरीने (हूं? के उच्चारणमातरसे
उसको भस्म कर दिया | तमीसे वे देवी इस भूतलपर
अवती कहछाने छगीं। उनकी आराधना करनेपर वे अपने
गे शतुओंका संहार कर डालती हैं| धूम्राक्षके मारे
“नर अत्यन्त कुपित हुए देवीके वाहन सिंहने उसके
आबे हुए समस्त असुरगणोंको चवा डाछा। जो
न बेचे) वे भाग खड़े हुए । इस प्रकार देवीने दैत्य
पलेचनको भार डाह्म | इस सम्राचारकों सुनकर प्रतापी
+भन बड़ा क्रोध किया | वह अपने दोनों ओठोॉको दाँतोंसे
फेर रह गया। उसने क्रमश: चण्ड, मुण्ड तथा
'डेदेज नामक असुरोंको भेजा | आशा पाकर वे देत्य
# देबीके द्वारा सेना और सेनापतियोंसहित निशुम्भ एवं श॒ुस्भका संहार 5:
नलच्च्च्य्च्च्च्च््य्च्य्य्य्य्य्स्य्य्य्स्स्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्स्स्स्स्ल्ल्ल्ल्टट----"क्)>.-->>>->-->>-..>-...-
आये थे; तो भी अन्तमे उन्हें उस्र उत्तम टोककी
७१७
उस स्थानपर गये, जहाँ देवी विराजमान थीं। अणिमा
आदि सिद्धियोंस सेवित तथा अपनी प्रभासे सम्पूर्ण
दिशाओंको प्रकाशित करती हुई भगवती सिंहवाहिनीको
देखकर वे श्रेष्ठ दानव वीर बोले--देवि ! तुम शीघ ही
गुम्भ और निश्चम्मके पास चले, अन्यथा तुम्हें गण और
वाहनसहित मरवा डालछंगे | वामे ! झुम्मको अपना पति
बना लो । लोकपाल आदि भी उनकी स्तुति करते हैं |
झुम्भको पति बना लेनेपर तुम्हें उस महान आनन्दकी प्राप्त
होगी; जो देवताओंके लिये भी दुल्भ है |?
उनकी ऐसी बात सुनकर परमेश्वरी अम्बा
सर॒स भधुर वाणीमें बोलीं |
देवीने कहा--अद्वितीय महेश्वर परतहा परमात्मा
सबंत्र विराजमान हैं, जो सदाशिव कहलते हैं। वेद भी
उनके तत्त्वको नहीं जानते, फिर विष्णु आदिकी तो बात
ही क्या है। उन्हीं सदाशिवकी मैं सूक्ष्म प्रकृति हूँ । फिर
दूसरेकी पति केसे बना सकती हूँ । सिंहिनी कितनी ही
कामातुर क्यों न हो जाय, वह गीदड़को कभी अपना पति
नहीं बनायेगी। हथिनी गदहेको और वाधिन खरगोशको
नहीं वरेगी । देत्यो | तुम सब छोग शृठ बोलते हो; क्योंकि
कालरूपी सर्पके फंदेमें फंसे हुए हो | तुम या तो पातालको
लोट जाओ या शक्ति हो तो युद्ध करो ।
देवीका यह क्रोध पैदा करनेबाछा वचन सुनकर वे
देत्य बोले--“हमलोग अपने मनमें तुम्हें अबल्य समझकर
मार नहीं रहे थे। परंतु यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी ही
इच्छा है तो सिंहपर सुखिर होकर बैंठ जाओ और युद्धके
लिये आगे बढ़ो !! इस तरह वाद-विवाद करते हुए
उनमें कलह वढ़ गया ओर समराज्जणमें दोनों दलयॉपर तीखे
बाणोंकी वर्षा होने छगी। इस तरह उनके ताथ लीलापूर्वक
युद्ध करके परमेश्वरीनि चण्ड-मुण्डसहित महान अमुर
रक्तत्रीजकोी मार डाह्य | वे देववेरी असुर द्वेपच्रुद्धि करके
॥ प्राप्ति
( अच्याव ४७ )
मुस्कराकर
हुईं, जिसमे देवीके भक्त जाते ई |
“++>-#-<2<ऋ(£४>-+>--
देवीके द्वारा सेना और सेनापतियोंसहित निशुम्भ एवं शुम्भका संहार
का हे न कर
से ऋषि पि कहते “श्जन् ! प्रशंसनीय पराक्रमशाली
जप असुर यम्भने इन क्र 3 चल,
हक इने श्रेष्ठ देत्योंका मारा जाना सुनकर
5५% थे र ह गर्णोक्ो < हब ९
| इंजेंप गणोंकों युद्धके लिये जानेकी आशा दी,
हा
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तर
नयी... [न्ट -. पाने नाथ. 2
८४ जडब+ श्ाथस
जो संग्रामका नाम झुनते ही दृसे खिल उठते
उसने कहा--आज मेरी आशसे काहक,
दोहद तथा अन्य अमसुर्यग बड़ी मारी सेनाझे साथ मंगटित
हो विजयकी आशा रखकर शीघ्र युद्धके लिये प्रस्थान करें |?
निशुम्म और श॒म्म दोनों भाई उन देत्योंकों पूर्वोक्त आदेश
देकर रथपर आरूढ़ हो खयं भी नगरसे बाहर निकले ।
उन महाबली वीरोंकी आशासे उनकी सेनाएँ. उसी तरह युद्धके
लिये आगे बढ़ीं, मानो मरणोन्मुख पतन आगमें कूदनेके लिये
उठ खड़े हुए हों | उस समय असुरराजने युद्धस्थलमें मृदज्ग+
मदल; भेरी, डिण्डिम, झाँझ ओर ढोल आदि बाजे बजबाये |
उन जुझाऊ बाजोंकी आवाज सुनकर युद्धप्रेमी वीर हृष
एवं उत्साहसे भर गये; परंतु जिन्हें अपने प्राण ही अधिक
प्यारे थे; वे उस रणभूमिसे भाग चले । युद्धसम्बन्धी
ब््नों तथा कवच आदिसे आच्छादित अद्भवाले वे
योद्धा विजयकी अभिलाबासे अस्त्र-शस्त्र धारण किये युद्ध-
स्थलमें आ पहुँचे | कितने ही सैनिक हाथियोंपर सवार थे)
बहुत-से देत्य घोड़ोंकी पीठपर बैठे थे और अन्य असुर
रथोंपर चढ़कर जा रहे थे | उस समय उन्हें अपने-परायेकी
पहचान नहीं होती थी । उन्होंने असुरराजके साथ
समराज्भणमें पहुँचकर सब ओरसे युद्ध आरम्म कर दिया |
बारंबार शतप्नी ( तोप ) की आवाज होने छगी, जिसे सुनकर
देवता काँप उठे । धूछ और धुएँसे आकाशमें महान्
अन्धकार छा गया। स्का रथ नहीं दिखायी देता था ।
अत्यन्त अभिमानी करोड़ों पैदल योद्धा विजयकी अमिलाषा
लिये युद्धस्थलमें आकर डट गये थे | घुड़सवार, हाथीसवार
तथा अन्य रथारूढ असुर भी बड़ी प्रसन्नताके साथ
करोड़ोंकी संख्यामं वहाँ आये थे | उस महासमरमें काले
पर्वतोंक समान विशाल मदमत्त गजराज जोर-जोरसे चिग्धाड़
रे थे; छोटे-छोटे शेल-शिखरोंक समान झट भी अपने
गलेसे गछगल ध्वनिका विस्तार करने लगे | अच्छी भूमिमें
उत्पन्न हुए घोड़े गलेमें विशाल कण्ठहार धारण किये जोर-
जोरसे हिनहिना रहे थे | वे अनेक प्रकारकी चालें जानते थे
ओर हाथियोंके मस्तकपर पेर रखते हुए. आकाशमार्गसे
पक्षियोंकी भाँति उड़ जाते थे । शन्रुकी ऐसी सेनाको
आक्रमण करती देख जगदम्बानें अपने घनुषपर प्रत्यञ्वा
चदायी । साथ द्वी शत्रुओंकों हृतोत्साह करनेवाले बंटेकों भी
बजाया । यह देख सिंह भी अपनी गर्दन और मस्तकके
केशोंकोी कंपाता हुआ जोर-जोरसे गजना करने लगा |
उप्त समय हिमालय पवतपर खड़ी हुईं रमणीय आभूषणों
ओर अब्लोंसे सुशोभित शिवा देवीकी ओर देखकर निश्रुम्
सतना रमणियोक्ते मनोभावक्रों समझनेमें निपुण पुरुषकी
५, तु ध े
>४ नमा रुद्रायं शान्ताय ब्रह्मण परमाकमने 5:
हम-यायाननाकरान करा नकहानहा्पपरकयअठााभााअपका्ता का भल्दधु अमर पलर्फाफध ८ सं्पपनचसम कर कदम र+ उनका -७+ का सर स्लक पतन भरत "मा ता मध्य यह चावला मकान क्दा एन कककगक इ-कत > जल पड टला टली ज कलम
ल्ल्ल्ज्िि++++घ 5 +++++5+++++5+5+*++*+5+_+_+++++3ेेः-ससस मना नााय्पपटा::-:&-सस लत
| संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
भांति सरस वाणीमें बोछा--महेश्वरि ! तुम-जैसी सुन्दरियोक्े
रमणीय शरीरपर माल्तीके फूलका एक दल भी डाल दिया
जाय तो वह व्यथा उत्पन्न कर देता है | ऐसे मनोहर
शरीरसे तुम विकराल युद्धका विस्तार केसे कर रही हो ?
यह बात कहकर वह महान् अछुर चुप हो गया। तथ
चण्डिका देवीने कहा--थमूढ़ असुर | व्यर्थकी बातें क्यों
बकता हैं? युद्ध कर अन्यथा पातालको चला जा ! यह
सुनकर वह महारथी वीर अत्यन्त रुष्ट हो समर-मभूमिमे वाणोंकी
अद्भुत वृष्टि करने लगा, मानो बादल जलकी धारा वसा
रहे हों | उस समय उस रफक्षेत्रम वर्षा ऋतुका आगमन
हुआ-सा जान पड़ता था । मदसे उद्धत हुआ वह अमर
तीखे बाण, झूल, फरसे, भिन्दिपाल, परिध, धनुप, मुझुण्डि,
प्रास, क्षुरप्र तथा बड़ी-बड़ी तल्वारोंसे युद्ध करने लगा |
काले पर्वतोंके समान बड़े-बड़े गजराज कुम्मख्थल विदीण हो
जानेके कारण समराज्भणमें चक्कर काटने लगे | उनकी परीठपर
फहराती हुई झुम्म-निश्वम्मकी पताकाएँ जो उड़ती हुई .
बलाकाओं ( बगुलों ) की पंक्तियोंके समान बेत दिखायी देती
थीं, अपने स्थानसे खण्डित होकर नीचे गिरने लगी | क्षत-
विक्षत शरीरवाले देत्य प्रथ्वीपर गिरकर मछलियोंकि समान
तड़प रहे थे | गर्दन कट जानेके कारण घोड़ेकि समूह बड़े
भयंकर दिखायी देते थे | कालिकाने कितने ही देत्योंको मोतके
घाट उतार दिया तथा देवीके वाहन सिंहने अन्य बहुत-सं
असरोंको अपना आहार वना लिया | उस समय देलेकि
मारे जानेसे उस रणभूमिमें रक्तकी घाए वहानेवाढ
कितनी ही नदियाँ बह चलीं | सैनिकोंके केश पानी सेवारकी
भाँति दिखायी देते थे ओर उनकी चादर सफेद फनका श्रम
उत्पन्न करती थीं । द
इस तरह घोर युद्ध होने तथा राक्षसोंका महान् संहार है
जानेके पश्चात् देवी अम्बिकाने विपमें बुझे हुए तीख बाग
द्वारा निशुम्भभो मारकर धराशायी कर दिया। अपने अत
रक्तिशाली छोटे भाईके मारे जानेपर थ॒म्म रोपत भए गा
आर रथपर बेठकर आठ भुजाओंसे युक्त हां महश्वर प्रिया क्
अम्बिकाके पास गया | उसने जोर-जोरसे शर्ट बजाया ऑए
शतन्रुओंका दमन करनेवाले धनुप्रकी दुस्सह टंकारबवनि क|
तथा देवीका सिंह भी अपने अयालोंको हिलाता हुआ दद्ई
लगा .। इन तीन प्रकारकी ध्वनियोंसे आकाद्ामण्डल गूँज उठी |
तदनन्तर जगदम्बाने अद्ृह्यस किया। जिससे -तमट
असुर संत्रस्त दो उठे | जब देवीने झुम्मसे कह कि 'ठम व
रु
उमासंहिता ] # देवता
क्या थड ड़ छ के के की आय आरा रा शीश थशशीया
सिरतापूर्षक्त खड़े रहो? तब देवता बोल उठे--“जय हो)
जय हो जगदम्बाकी ।! इस समय देत्यराज शुम्मने बड़ी
भारी शक्ति छोड़ी) जिसकी शिखासे आगकी ज्वाला निकल
रही थी । परंतु देवीने एक उल्काके द्वारा उसे मार गिराया |
थुम्भके चलाये हुए बाणोंके देवीने ओर देवीके चलाये
हुए बाणोंके श॒म्भने सहर्ों हुकड़े कर दिये | तलश्चात्
चण्डिकाने त्रिशूल उठाकर उस महान् असुरपर आघात
किया | त्रिश्वलकी चोटसे मूज्छित हो वह इन्द्रके द्वारा पंख
काट दिये जानेपर गिरनेवाले पर्वतकी भाँति आकाश) प्रथ्वी
तथा समुद्रको कम्पित करता हुआ घरतीपर गिर पड़ा |
तदनन्तर झूलके आधातसे होनेवाली व्यथाको सहकर
उस महावलली असुरने दस हजार बॉँहें धारण कर लीं और
देवताओंका भी नाश करनेमें समर्थ चक्रोंद्रारा सिंहसहित
महेश्वरी शिवापर आघात करना आरम्भ किया । उसके चलाये
हुए चक्रोंकी खेल-खेलमें ही विदीण करके देवीने त्रिश्यूल
उठाया और उस असुरपर घातक प्रह्मर किया | शिवाके
ओंका गये दूर करनेके लिये तेजःपुअरूपिणी उमाका प्रादुभोव *
लोक-पावन पाणिपड्डजसे मृत्युको प्राप्त होकर वे दोनों असुर
परम पदके भागी हुए |
उस महापराक्रमी निशुम्भ ओर भयानक बलशाली
ञुम्भके मारे जानेपर समस्त देत्य पातालमें घुस गये, अन्य
बहुत-से असुरोंको काली ओर सिंह आदिने खा लिया तथा
शेष दत्य भयसे व्याकुल हो दसों दिशाओंमें भांग गये ।
नदियोंक[ जल स्वच्छ हो गया । वे ठीक मागसे बहने लगीं |
मन्द-मन्द वायु बहने छगी। जिसका स्पर्श सुखद प्रतीत
होता था; आकाश निर्मल हो गया | देवताओं ओर ब्रह्मर्पियोने
फिर यज्ञ-यागादि आरम्म कर दिये | इन्द्र आदि सब देवता
सुखी हो गये | प्रमो | देत्यराजके वध-प्रसड़से युक्त इस परम
पवित्र उमाचरित्रका जो श्रद्धापूबंक वारंबार श्रवण या पाठ
करता है; वह इस लोकमें देवदुर्लभ भोगोंका उपभोग करके
परलेकमें महामायाके प्रसादसे उमाधामको जाता है | राजन् !
इस प्रकार शुम्मासुकका संहार करनेवाली देवी सरखतीके
चरित्रका वर्णन किया गया, जो साक्षात् उम्ाके अंशसे
प्रकट हुईं थीं | ( अध्याय ४८ )
गा +- 7-7
देवताओंका गर्व दूर करनेके लिये तेजःपुल्लरूपिणी उम्राका प्रादुर्भाव
मुनियोने कहा--सम्यूण पदार्थोक्े पूर्ण शाता
सूतजी ! मुबनेश्वरी उमाके; जिनसे सरखती प्रकट हुई थीं;
अवतारका पुनः वर्णन कीजिये । वे देवी परख्रह्म, मूल-
पकृति, ईंश्वरी, नियाकार होती हुई भी साकार तथा नित्यानन्द-
भयी सती कही जाती हैं |
सूतजीने कह(--तपस्वी मुनियो ! आपलोग देवीके
उत्तम एवं महान् चरित्रकों प्रेमपूर्वक सुनें; जिसके जानने
गत्रस मनुप्य परम गतिको प्राप्त होता है। एक समय देवताओं
और दानवॉम परस्पर युद्ध हुआ | उसमें महामायाकरे प्रभावसे
देवताओंकी जीत हो गयी | इससे देवताओंको अपनी शूरवीरतापर
*ज गय हुआ | वे आत्म-प्रशंसा करते हुए. इस बातका
चार करने वो कि ८हमलेग धन्य हैं, धन्यवादके योग्य हैं।
सुर एमारा क्या कर लेंगे। वे हमल्ेगोंका अत्यन्त दुस्सह प्रभाव
असफर भवभीत हो ध्माग चलो, भाग चले !? कहते हुए.
'परल्शकम् घुस गये | वमारा बल अद्भत द्रुत है ! हमम॑
“अपैजनक तेज है। हमारा वछ और तेज देत्यकलका
, गा करनेने समर्थ है! अहो ! देवताओंका कैसा सौमाग्य
है ६९
:* सम प्रकार ये जललें-तहाँ डींग हाँकने लगे |
उनन्तर उसी समय उनके समक्ष तेजका एक भंदान पुञ्न
प्रकट हुआ, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था |
उसे देखकर सब देवता विस्मवसे भर गये । वे रुँधे हुए
गलेसे परस्पर पूछने छगे--ध्यह क्या है? यह क्या दे?
उन्हें यह पता नहीं था कि यह शध्यामा ( भगवती उमा ) का
उत्कृष्ट प्रभाव है; जो देवताओंका अभिमान चूर्ण
करनेवाला है !
उस समय देवराज इच्रने देवताओंको आशा दी---
'तुमलेग जाओ और यथार्थरूपसे परीक्षा करो कि यह कौन
है | देवेन्द्रके भेजनेसे वायुदेव उस तेजःपुञ्के निकट
गये | तब उस तेजोराशिने उन्हें सम्बोधित करके प्रझा---
(अजी | तुम कान हो !! उस मदहान् तेजके इस प्रकार
पूछनेपर वायु देवता अभिमानपृचक्त बोलि--£में वायु हैं,
सम्पूण जगतका प्राण हूँ; मुझ सवाधार परमेशरमें दी यह
स्थावर-जंगमरूप सारा जगत् ओेतप्रोत हू । में ही समन्त
विश्वका संचालन करता हैँ ? तव उस मदहतेजने
प्वायों ! यदि तुम नगवक्े संचालनमें समय हो
तृण रखा हुआ दे | इसे भरनी इच्छा अनुसार
तो सही |? तब बायुदेवताने सना उपाय ऋरक
शक्ति लगा दी | परंत वह लिनका भरने
०" टॉ---
ता यद
चछार्य
आपनी मारी
भ्क छत
स्ानत उलसनार
ढै२०
जनन्न्न्न्न्न्न्ेचधधटरश्च्ृफकक का आवक, चॉब़्ा ख 44404 नि शक भि ाशश्नअअ फऋ ऋ ऋ ऋ ऋ अऋऋ ृ इ%(अ ऋइकछफउफ[ फखऋखच न -;”्॒इृ2:2*::<:<:<:-5:2:2ै::253
भी न हटा | इससे वायुदेव लज्जित हो गये | वे चुप हो
इन्द्रकी सभामें लौट गये और अपनी पराजयके साथ वहाँका
सारा वृत्तान्त उन्होंने सुनाया | वे बोले--५देवेन्द्र | हम सब
लोग झूठे ही अपनेमें सर्वेश्वर होनेका अभिमान रखते हैं;
क्योंकि किसी छोटी-सी वस्तुका भी हम कुछ नहीं कर
सकते |? तब इन्द्रने वारी-बारीसे समस्त देवताओंकों मेजा।
जब वे उसे जाननेमें समथ न हो सके, तब इन्द्र खयं गये |
इन्द्रको आते देख वह अत्यन्त दुस्सह तेज तत्काल अदृश्य
हो गया | इससे इन्द्र बड़े विस्मित हुए. और मन-ही-मन
वोले--- “जिसका ऐसा चरित्र है, उसी सर्वेश्वरकी में शरण
लेता हूँ |? सहखनेत्रधारी इन्द्र वारंबार इसी भावका चिन्तन
करने लगे | इसी समय निरछल करुणामय शरीर धारण
करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शिवप्रिया उमा उन देवताओं-
पर दया करने ओर उनका गर्व हरनेके लिये चेत्रशुक्छा
-नवमीको .दोपहरमें वहाँ प्रकट हुईं । वे उस तेजःपुञ्ञके
बीचमें विराज रही थीं; अपनी कान्तिसे दसों दिशाओंको
प्रकाशित कर रही थीं और समस्त देवताओंको सुस्पष्टरूपसे
यह जता रही थीं कि 'मैं साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही हूँ ॥
वे चार हाथोंमें क्रशः वर, पाश। अछुश और अमय
धारण किये थीं | श्रुतियाँ साकार होकर उनकी सेवा करती
थीं | वे बढ़ी रमणीय्र दीखती थीं तथा अपने नूतन यौवन-
पर उन्हें गये था | वे छाल रंगकी साड़ी पहने हुए थीं।
लाल फूलोंकी माला तथा छाल चन्दनसे उनका श्रृद्भार
किया गया था । वे कोटि-कोटि कन्दर्पोॉके समान मनोहारिणी
तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान चटकीली चाँदनीसे सुशोभित
थीं। सबकी अन्तयामिणी, समस्त भूतोंकी साक्षिणी तथा
परत्रह्म खरूपिणी उन महामायाने इस प्रकार कहा |
उमा बोलीं--में ही परत्रह्म, परम ज्योति, प्रणवरूपिणी
तथा युगलख्पघारिणी हूँ । में- ही सब कुछ हूँ । मुझसे
भिन्न कोई पदार्थ नहीं है| में निराकार होकर भी साकार
हूँ, सर्वेतत्व-खरूपिणी हूँ | मेरे गुण अतर्क्य हैं । में
नित्यखरूपा तथा कार्यकारणरूपिणी हूँ | में ही कभी प्राण-
वल्लमाका आकार धारण करती हूँ और कभी प्राणवललभ
पुरुषका । कभी स्री ओर पुरुष दोनों रूपोंमें एक साथ
प्रकट होती हूँ ( यही मेरा अर्थनारीश्ररूप है )। मैं सर्व-
रूपिणी ईश्वरी हूँ म॑ ही उश्कर्ता त्रंहा छू | में ही जगत्पालक
विष्णु हूँ तथा में ही संहार्कर्ता रद्र हूँ। सम्पूर्ण विश्वको
: मोदमें डालनेवाली मद्दमाया में दी हूँ | काली, लक्ष्मी और
हि के कर
४ नमों रुद्राय शान््ताय बत्रह्मण परमात्मने ४
| संक्षिप्त-शिवपुराणा,
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| का है “न नकश कर ध्टः
सरखती आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ तथा ये सकल कलाएँ मेरे
अंशसे ही प्रकट हुई हैं । मेरे ही प्रमावसे तमलोगोंने
सम्पूर्ण देत्योॉपर विजय पायी है | मुझ सर्वविजयिनीकों न
जानकर तुमलोग व्यर्थ ही अपनेको सर्वेश्वर मान रहे हो।
जैसे इन्द्रजाल करनेवाला सूज्रधार कठपुतलीको नचाता है
उसी प्रकार मैं ईश्वरी ही समस्त प्राणियोंको नचाती हूँ।
मेरे भयसे हवा चलती है; मेरे भयसे ही अग्निदेव सबको
जछाते हैं तथा मेरा भय मानकर ही छोकपालगण निस््तर
अपने-अपने कमोंमें लगे रहते हैं| में सर्वथा खतन्त्र ह
ओर अपनी छीलासे ही कभी देव-समुदायकों विजयी बनाती
हूँ तथा कभी दैत्योंको | मायासे परे जिस अविनाशी पगतः
धामका श्रुतियाँ वर्णन करती हैं; वह मेरा ही हम है ।
सगुण और निर्गुण--ये मेरे दो प्रकारके रूप माने गये है।
इनमेंसे प्रथम तो मायायुक्त है और दूसरा मायारहित |
देवताओं ! ऐसा जानकर गर्व छोड़ो और मुझ
प्रक्ृतिकी प्रेमपूषंक आराधना करो |#
# उमोवाच-- क्
परं॑ अह्य परं ज्योति: प्रणबद्धन्द्रलूपिणी । '
अंहमेवास्मि सकले मदन्यों नास्ति कश्नन ॥
४ छ- गीके 65 9
उमासंहिता ] # देवबीके द्वारा दुगमासुरका बध तथा उनके दुर्गा आदि नाम पड़नेका करण # ४२१
देवीका यह करुणायुक्त वचन सुन देवता भक्तिमावसे
मस्क झुकाकर उन परमेश्वरीकी स्तुति करने छगें--
'जगदीश्वरि | क्षमा करो । परमेश्वरि ! प्रसन्न होओ।
म्रातः | ऐसी कृपा करो; जिससे फिर कभी हमें गये न हो ।?
तबसे सब देवता गयव॑ छोड़ एकाग्रचित्त हो पूवंबत् विधि-
पूवक उमादेवीकी आराधना करने लगे | ब्राह्मणो ! इस प्रकार
मैंने तुमसे उमाक्े प्राहुर्भावका वर्णन किया है। जिसके
श्रवणमात्रसे परमपदकी प्राप्ति होती है। ( अध्याय ४९ )
++-+- ऊपर +त-
देवीके द्वारा दुगमासुरका वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और
आमरी आदि नाम पड़नेका कारण
मुनि्याने कहा--महाप्राश्ञ सूतनी ! हम सब छोग
प्रतिदिन दुर्गजीका चरित्र सुनना चाहते हैं | अतः आप
और किसी अद्भुत लीलातत्तवका हमारे समक्ष वर्णन कीजिये ।
पराशिरोमगे सूत | आपके मुखारविन्दसे नाना प्रकारकी
दब मधुर कथाएँ. सुनते-सुनते . हमारा मन कभी तृप्त
नहीं होता |
सूतजी बोले--मनियो ! दुर्गम नामसे विख्यात एक
अपर था; जो रुसका महाबलवान् पुत्र था | उसने
ब्चाजीके वरदानसे चारों वेदोंको अपने हाथमें कर लिया
: गा तथा देवताओंके लिये अजेय बल पाकर उसने भूतलपर
पहुतसे ऐसे उत्पात किये; जिन्हें सुनकर देवल्लोकमें देवता
भी कमित हो उठे । वेदोंके अदृश्य हो जानेपर सारी
पेदिक क्रिया नष्ट हो चछी | उस समय ब्राह्मण और देवता
भ दुगाचारी हो गये | न कहीं दान होता था न अत्यन्त उग्र
पर क्रियाजाता था; न यज्ञ होता था और न होम ही किया
ता फ | इसका परिणाम यह हुआ कि प्रथ्वीपर सो वर्षोतक-
_डिये वर्षा बंद हो गयी । तीनों छोकोंमें हाद्मयकार मच
3७०+०००+9०->3ववरनन नमन नस ननम न न० हि
गया | सब छोग दुखी हो गये | सबको भूख-प्यासका महान्
कष्ट सताने छगा। कुआँ, बावड़ी। सरोवर; सरिताएँ. ओर
समुद्र भी जलसे रहित हो गये । समस्त वृक्ष ओर लताएँ भी
सूख गयीं | इससे समस्त प्रजाओंके चित्तमें बड़ी दीनता आ
गयी | उनके महान् दुःखको देखकर सब देवता महेश्वरी
योगमायाकी शरणमें गये ।
देवताओने कहा--महामाये ! अपनी सारी प्रजाकी
रक्षा करो; रक्षा करो | अपने क्रोधषको रोको, अन्यथा सब लोग
निश्चय ही नष्ट हो जायँगे | कृपासिन्धो | दीनवन्धो | जैसे
झुम्भ नामक देत्य। महावली निशुम्भ, धूम्राक्ष# चण्ड)
मुण्ठ, महान् शक्तिशाली रक्तत्रीजअ. मघु) केटम तथा
महिषासुरका तुमने वध किया था) उसी प्रकार इस दुर्गमासुर-
का शीघ्र ही संहार करो | वालकोंसे पग-यगपर अपराध बनता
ही रहता है | केवल माताके सिवा संसारमें दूसरा कोन है; जो
उस अपराधको सहन करता हो । देवताओं ओर आ्राह्मणोपर
जब-जब दुःख आता है; तब-तब ज्ाप्र दी अवतार लेकर तुम
सब् लोगोंको सुखी बनाती दो ।
निराकारापि साकारा सववतत््वखरूपिणी । अप्रत्यक्यगुणा. नित्या कार्यकारणरूपिणी ॥
कंदाचिद्रयिताकारा कद्ाचित्पुरुपाकृति: । कद्ाचिदुभयाकारा सर्वाकाराहनीखरी ॥
विरज्ञिः सष्टिक्ताहं जगन्माताहमच्युतः । र्द्रः संह्वारकर्ताई सर्वविश्वविभोहिनों ॥
फालिका कमलावाणीमुखा: सर्वो हि शक्तय: । मदंशादेव संजातात्तवेभा:. सकला: कल: ॥
है भत्मभावाज्विता: सर्वे युष्मामिदितिनन्दना: । तामविशाय मां यूय॑ वृथा सर्वेश्वनानिनः ॥
यथा दारुतयों योपां नतंयत्यैन्द्रजालिक: । तथेव सर्वभूनानि.. नर्तवान्यदनीखरी ॥
अइयाद् वाति पवनः सर्व दहति हृब्बभुक। लोकपाला: प्रकुवन्ति खतकर्नाण्वनासम ॥
कदाचिद्देववर्गा णां कृदाचिद्ितिजन्मतान् । करोमि विजय सन््वकू खतनन््त्रा निवलेल्या ॥
भविनारिपरं थाम मायातोत॑ परात्परम्। श्रुतयों वर्गवन्ते चच्दद्र्प तु मेवे छि॥
पु लिमुर्ण चेति मद्रप॑ दिविध॑ मतन_् । मावाशइलित चैर्क दिला हादनाश्लिन् |
एवं विशाय मां देवा: स्व स्वं गये विहाय ल॥ भझुत प्रणवोपेता;: प्रदसि मां सनादरंग्न्
(शि० पए० 2० रे० ४%। ३७--३६९ )
४२२
देवताओंकी यह व्याकुरू प्रार्थना सुनकर कृपामयी
देवीने उस समय अपने अनन्त नेत्रोंसे युक्त रूपका
दर्शन कराया । उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला
हुआ था ओर वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष)
बाण, कमछ तथा नाना प्रकारके फल-मूल लिये हुए
थीं | उस समय प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देख उनके सभी
नेत्रोंमे करणाके आँसू छलक आये । वे व्याकुछ होकर
लगातार नो दिन और नो रात रोती रहीं | उन्होंने अपने
नेत्रोंसे अश्रुजलकी सहसों घाराएँ प्रवाहित कीं । उन धाराओँ-
से सब छोग तृप्त हो गये भोर समस्त ओषधियाँ भी सिंच
गयीं । सरिताओं ओर समुद्रोंमे अगाध जल भर गया । प्रथ्वीपर
साग और फल-मूलके अद्भुर उत्न्न होने छगे | देवी शुद्ध
हृदयवाले महात्मा पुरुषोंको अपने हाथमें रक््ले हुए. फल
बॉटने छरगीं। उन्होंने गोओंके लिये सुन्दर घास और दूसरे
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प्राणियोंके लिये यथायोग्य भोजन प्रस्तत किये | देवता ब्राह्मण
ओर मनुष्योसद्वित सम्पूर्ण प्राणी संतुष्ट हो गये | तब देवीने
देवताओंसे पूछा--ध्तुम्हारा ओर कोन-सा कार्य सिद्ध करूँ ९?
उस समय सब देवता एकत्र होकर बोले--“देवि ! आपने
सर लोगोंको संतुष्ट कर दिया। अब कृपा करके दुर्गमासुरके
४६ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #:
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
दारा अपहृत हुए. वेद छाकर हमें दीजिये |! तब देवीगे
तथास्तःु कहकर कहा--“देवताओ | अपने घरको जाओ,
जाओ | में शीघ्र ही सम्पूर्ण वेद लाकर तुम्हें अर्पित करूँगी।
यह सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए । वे प्रफुल् नी
कमलके समान नेत्रोंवाली जगगद्योनि जगदम्बाकों भलीभौति
प्रणाम करके अपने-अपने धामको चले गये | फिर तो खा
अन्तरिक्ष और प्रृध्यीपर बड़ा भारी कोछाहल मच गया; उसे
सुनकर उस भयानक दैत्यने चारों ओरसे देवपुरीक्ो घेर ल्या।
तब शिवा देवताओंकी रक्षाके लिये चारों ओरसे तेजोमय मण्डल्का
निर्माण करके खय॑ उस घेरेसे वाहर आ गयीं | फिर तो देवी
ओर देत्व दोनोंमें घोर युद्ध आरम्भ हो गया | समयाज्नपर्े
दोनों ओरसे कवचको छिन्न-मिन्न कर देनेवाले तीखे बाणोंकी वर्षा
होने छगी। इसी बीचमें देवीके शरीरसे सुन्दर रूपवाली काली)
तारा, छिन्नमस्ता, भ्रीविद्या, भ्ुवनेश्वरी, भैरवी, वगला
धूम्ना, श्रीमती त्रिपुरखुन्द्री और मातज्ञी-ये दस महाविद्याए
अख्न-शस्त्र लिये निकलीं | तलश्रात् दिव्य मूर्तिवाली अ्ंस्य
मातृकाएँ प्रकट हुईं । उन सबने अपने मस्तकपर चद्धमाका
मुकुट धारण कर रक््खा था ओर वे सब-की-सब विदुत्के
समान दीपिमती दिखायी देती थीं | इसके वाद उन ,
मातृगणोंके साथ देत्योंका भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ । उन
सबने मिलकर उस रौरव अथवा दुर्गम देत्यकी सो अश्षेशिणी
सेनाएँ नष्ट कर दीं | इसके बाद देवीने त्रिशुलकी धारसे उत्त
दुर्गम देत्यको मार डाला | वह देत्य जडसे खोदे गये दृश्ष
भाँति प्रृथ्वीपर गिर पड़ा। इस प्रकार, ईश्वरीने उस तः
दुर्गभासुर नामक देत्यको मारकर चारों वेद वापत
देवताओंको दे दिये ।
तव देवता बोले--अम्बिके ! आपने हमलोगेफ़े हि
असंख्य नेत्रोंसे युक्त रूप धारण कर लिया था) इसलिये पति
आपको “झताक्षी? कहेंगे | अपने शरीरसे उत्तन्न हुए शा
द्वारा आपने समस्त लोकोंका भरण-पोषण किया है ५५
ाकम्भरी'के नामसे आपकी ख्याति होगी। शिवे !
दुगम नामक महादेत्यका वध किया है, इसलिये हॉगे
कल्याणमयी भगवतीकों <दुर्गा? कहेंगे | योगनिद् कसर
नमस्कार है| महावले ! आपको नमस्कार दै | शानदार
आपको नमस्कार है। आप जगन्माताकों बाखार
> ८" परमेश्वरीका वरीकां हे
है | तत्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा जिन _ करेगा हे
होता है; उन अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन * ४
भगवती दुर्गाको वारंवार नमस्कार दे | मातः ! आता
उम्रासंहिता | % देवीके
वी ओर दरीरकी पहुँच होनी कठिन है | सूर्य, चन्द्रमा और
अमि--ये तीनों आपके नेत्र हैं | हम आपके प्रभावको नहीं
जोनते; इसलिये आयकी स्तुति करनेमें अप्तमर्थ हैं | सुरेश्वरी
माता शताक्षीकोीं छोड़कर दूसरा कौन है, जो हम-जैसे अमरों-
7९ दृश्थित करके ऐसी दया करे | देवि | आपको सदा ऐसा
है यल्न करना चाहिये, जिससे तीनों छोक निरन्तर विध्न-
व्रवाओंसे तिरस्कृत न हों । आप हमारे शत्रुओंका नाश
| रती रहें | क्
देवीने कह--देवताओ |! जैसे वछड़ोंको देखकर गोएँ:
श्र हो उत्तावदीके साथ उनकी ओर दौड़ती हैं, उसी
रह में तुम सबको देखकर व्याकुछ हो दौड़ी आती हूँ ।
37 न देखनेसे मेरा एक क्षण भी युगके समान बीतता है।
/ इग्ह अपने वच्चेके समान समझती हूँ. और तुम्हारे लिये
“गे श्ाण भी दे सकती हूँ | तुमलोग मेरे प्रति भक्तिभावसे
पयोमित हे; अतः तुम्हें कोई भी चिन्ता नहीं करनी
चाहिये । में तुम्हारी सारी आपत्तियोंका निवारण करनेके लिये
रा उद्त हूँ। जैसे पूर्वकालमें तुम्हारी रक्षाके लिये मैंने
'लॉक़ो मारा है; उसी प्रकार आगे भी असुरोंका संहार
क्रियायोगक्रा वर्णब-ेबीकी मूर्ति एवं मन्दिस्के निर्माण आदिका महत्व 5;
च्क्
3२३
करूंगी---इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये | यह में सत्य-
सत्य कहती हूँ | भविष्यमें जब पुनः झुम्भ और निश्नम्भ
नामके दूसरे देत्य होंगे, उस समय मैं यशोमयी देवी
ननन््दपत्नी बशोदाके गर्भले योनिजरूप धारण करके गोकुलमें
उत्पन्न होऊँगी ओर यथासमय उन असुरोंका वध करूँगी |
ननन्दको पुत्री होनेके कारण उस समय मुझे ल्लेग “्नन्दजा
कहेंगे | जब में पश्रमरका रूप घारण करके अरुण नामक
असुरका वध करूँगी, तब संसारके मनुष्य मुझे “प्रामरी? कहेंगे।
फिर में भीम ( भयंकर ) रूप धारण करके राक्षसोंको
खाने लगूगी, उस समय मेरा “मीमा देवी? नाम प्रसिद्ध होगा।
जब-जब प्रथ्वीपर असुरोंकी ओरसे बाधा उत्तन्न होगी, तब-तब
में अवतार लेकर प्रजाजनोंका कल्याण करूँगी--इसमें संशय
नहीं हैं । जो देवी शताक्षी कही गयी हैं; वे ही शाकम्भरी
मानी गयी हैं तथा उन््हींको दुर्गा कहा गया है | तीनों नामोंद्वारा
एक ही व्यक्तिका प्रतिपादन होता है | इस प्रथ्वीपर महेश्वरी
शताक्षीके समान दूसरा कोई दयाछ देवता नहीं है; क्योंकि वे
देवी समस्त ग्रजाओंकों संतत्त देख नो दिनोंतक रोती रह
गयी थीं | ( अध्याय ५० )
"7+<कचपक्न-ब०+३०*+-
लीके क्रियायोगका वर्णन--देवीकी मूर्ति एवं मन्दिरके निमोण, खापन और पूजनका महत्,
रा अम्बाकी श्रेष्ठ ता, विभिन्न मासों और तिथियोंमें देवीके व्रत, उत्सव ओर पुजन
आदिके फल तथा इस संहिताके श्रवण एवं पाठकी महिमा
मे 0९ स के कप ब्रह्मपुत्र; सवश् सनत्कुमारंं होती है; भक्तिसे ज्ञान होता है ओर जञनसे भक्ति होती ६--
अत क्रियायोगका वर्णन सुनना चाहता ऐसा शास्तरोंमें निश्चय किया गया है। मुनिश्रेष्ठ ! मोक्षका प्रधान
न कियायोगका रक्षण क्या है उसका अनुष्ठान करने-
९ फेस फलकी है
आल भासि होती है तथा जो परा अम्बा उमाको
हल दल अब हैं, वह क्रियायोग क्या है ! ये सब बातें मुझे
मे |
्ि हक६- अर कक देपायन | तुम
पर झुगे। शो" उ रहे हो, वह सब मैं बताता हूँ; ध्यान
रस्म तीन के , कैवायोग, भक्तियोग--थे श्रीमाताकी
!। पिस्सा जे “गे कहे गये हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले
ट्रैक 3. का ताक ताथ संयोग होता है, उसका नाम
पे... पष्म वस्तुओंके साथ जो संयोग होताहै,
ध्द्स्ण
दब
(हब हू ड़ |
पके ६... ९ | देवीके साथ आत्माकी एकताकी
हर गो गया है। तीनों योगोंमें जो क्रिया-
“पं प्रतिशदन फिया जाता हैं। कर्मते भक्ति उत्पन्न
है]
कारण योग है, परंतु योगके ध्येयका उत्तम साधन क्रियायोग
है। प्रकतिकों माया जाने ओर सनातन ब्रह्मको मायावी अथवा
मायाक्रा स्वामी समझे । उन दोनंकि खरूपको एक दूसरसे
अभिन्न जानकर मनुप्य संसार-बन्बनसे मुक्त हो जाता दे |&
कालीनन्दन ! जो मनुप्य देवीके लिये पत्थर; लकड़ी
अथवा मिद्ठीका मन्दिर बनाता हूँ; उसके पुस्यकछका चर्णन
सुनो | प्रतिदिन योगके द्वारा आशरबना करतेबालिकों कि
महान् फलकी प्राप्ति होती है, वह साय फड उस पुदुणकोा मिल
जाता दे जो देवीके लिये मन्दिर बनवाता £ | शीमाताशा
मन्दिर बनवानेवाल्य धर्मात्मा पुदप अपनी पदले बीती हुई तथा
# गाया तु प्रति विदवान्मायाव ऋष्ा आाजयन ।
अनभिन््न॑ ताइशता . पसुच्यते
(शि० (० ३० म० ४२ ; २३२ ]
& भा जलन जनम है कु य्म है
4 «० २९ की
४२४ हैं नमो रुद्रायं शॉन्ताय ब्रद्मणे परंमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा£ं
स्च्य्य्य्न्य््य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्यय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्च्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्््स्ि्ःः"""-5
आगे आनेवाली हजार-हजार पीढियोंका उद्धार कर देता है | करोड़ों
जन्मोंमें किये हुए थोड़े या बहुत जो पाप शेष रहते हैं, वे
श्रीमाताके मन्दिरका निर्माण आरम्भ करते ही क्षणभरमें नष्ट
हो जाते हैं | जेसे नदियोंमें गद्ढा, सम्पूर्ण नदोंमें शोणमद्र,
क्षमामें पृथ्वी, गहराईमें समुद्र ओर समस्त ग्रहोंमें सूरयदेवका
विशिष्ट स्थान है; उसी प्रकार समस्त देवताओंमें श्रीपरा अम्बा
श्रेष्ठ मानी गयी हैं | वे मस्त देवताओंमें मुख्य हैँं। जो
उनके लिये मन्दिर बनवाता है; वह जन्म-जन्ममें प्रतिष्ठा पाता
है। काशी कुरुक्षेत्र; प्रयाग; पुष्कर, गद्भासागर-तटः नेमिषारण्य,
अमरकण्टक पर्व॑त, परम पुण्यमय श्रीपर्वत; शानपर्वत, गोकण)
मथुरा; अयोध्या ओर द्वारका इत्यादि पुण्य प्रदेशोंमें अथवा
जिस किसी भी स्थानमें माताका मन्दिर बनवानेवाल मनुष्य
संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है | मन्दिरमें इंटोंका जोड़ जब-
तक या जितने वर्ष रहता है; उतने हजार वर्षोतक वह पुरुष
मणिद्वीपमें प्रतिष्ठित होता है | जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न
उमाकी प्रतिमा बनवाता है; वह निर्मम होकर अवश्य उनके
परम धाममें जाता है। झम ऋतु, झम ग्रह और शुभ नक्षत्रमें
देवीकी मूतिकी स्थापना करके योगमायाके प्रसादसे मनुष्य
कृतकृत्य हो जाता है | कल्पके आरम्मसे लेकर अन्ततक कुलूमें
जितनी पीढ़ियाँ बीत गयी हैं ओर जितनी आनेवाली हैं, उन
सबको मनुष्य सुन्दर देवीमूर्तिकी स्थापना करके तार देता है |
जो केवल जगद्योनि परा अम्बाकी शरण लेते हैं, उन्हें
मनुष्य नंहीं मानना चाहिये । वे साक्षात् देवीके गण हैं | जो
चलते-फिरते; सोते-जागते अथवा खड़े होते समय “उमा? इस
दो अक्षरक्के नामका उच्चारण करते हैं, वे शिवाके ही गण हैं ।
जो नित्य-नैमित्तिक कर्ममें पुष्प, धूप और दीपोंद्वारा देवी परा
शिवाका पूजन करते हैं, वे शिवाक्े धाममें जाते हैं। जो
प्रतिदिन गोबर या मिद्टीसे देवीके मन्द्रको लीपते हैँ अथवा
उसमें झाड़ू देते हैं, वे भी उमाके धाममें जाते हैं । जिन्होंने
देवीके परम उत्तम एवं रमणीय मन्दिरका निर्माण कराया है,
उनके कुलके लोगोंको माता उमा सदा अश्शीर्वाद देती हैं |
वे कहती हैँ; थये लोग मेरे हैं। अतः मुझमें प्रेमके भागी बने
रहकर सो वर्षोतक जीयें ओर इनपर कभी कोई आपत्ति न
आये |? इस प्रकार भरीमाता रात-दिन आशीर्वाद देती हैं।
जिसने महादेवी उमाकी शुभमूर्तिका निर्माण कराया है, उसके
कुलके दस हजार पीढ़ियोंतकके व्येग मणिद्वीपमें सम्मानपूर्वक
रहते हैँ | मह्ममायाकी मृर्तिको स्थापित करके उसकी भलीभॉति
पूजा करनेफे पश्चात् साधक मिस-निस मनोरथके लिखे
४७७७ रा
प्रार्थना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है |
जो श्रीमाताकी स्थापित की हुईं उत्तम मूत्तिको मधुमिशित पीते
नहत्गता है; उसके पुण्यफलकी गणना कौन कर सकता है। चन्दन:
अगुरु) कपूर, जगामांसी तथा नागरमीथा आदिसे युक्त जह
तथा एक रंगकी गौओंके दूधसे परमेश्वरीको नहलये । तलश्रात्
अशदरशाज्डरधूपके द्वारा अ्रिमें उत्तम आहुति दे तथा पृत और
कपू रसहित बत्तियोंद्वारा देवीकी आरती उतारे |
अष्टमी, नवमी, अमावास्यार्में अथवा शुह्लपक्षकी
दश्मी तिथियोंमें गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा
विशेष पूजा करनी चाहिये । रात्रिसूक्त, श्रीसूक्त
कृष्ण पक्षी
पञ्ममी और
जगदमाक़ी
अथवा देवी
सूक्तको पढ़ते या मूछमन्त्रका जप करते हुए देवीकी आगपना
करनी चाहिये । विष्णुकान्ता ओर तुछ्सीको छोड़कर शेष परम
पुष्प देवीके लिये प्रीतिकारक जानने चाहिये | कमलका पुण
उनके लिये विशेष प्रीतिकारक होता है | जो देवीकी सेने-
चाँदीके फूल चढ़ाता है; वह करोड़ों ऐिद्धोंसे युक्त उनके पर
धाममें जाता है | देवीके उपासकोंको पूजनके
अन्तम सदा
अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्राथना करनी चाहिये | 'जगत्को
आनन्द प्रदान करनेवाली परमेश्वरि ! प्रसन्न होओ' इल्ादि
वाक्योंद्वारा स्तुति एवं मन्त्रपाठ करता हुआ देवीके भजन
लगा रहनेवाला उपासक उनका इस प्रकार ध्यान
करे | देवी
सिंहपर सवार हैं | उनके हाथोंमें अमय ओर वरको खाएं
हैं तथा वे भक्तोंकी अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली हैं | ३0
प्रकार महेश्वरीका ध्यान करके उन्हें नवेद्के
रूपमे नातों
प्रकारके पके हुए फछ अपित करे | जो परात्मा शम्मुशफिती
नेवेद्र मक्षण करता है, वह मनुष्य अपने सारे पापपझी / है
धोकर निर्मल हो जाता है । जो चेत्र झक्का ठृतीयाकों भव
प्रसन्नताके लिये ब्रत करता है; वह जन्म-मरणके वस्धनत पे
हो परमपदको प्राप्त होता है। विद्वान पुरुष इसी तृतीय!
दोल्लेत्सव करे | उसमें शंकरसहित जगदम्बा उम्र पं
करे | फूल; कुछुम) वस्त्र; कंपूर। अगुरु) चन्दन) धृ के
नेंवेद्य, पुष्पह्ार तथा अन्य गन्धदद्वव्योद्यारा शिवसकित पं |
कल्याणकारिणी महामाया महैश्वरी श्रीगोरी देवीका
पूजन कर
उन्हें झूलेमें झछाये | जो प्रतिवर्ष नियमपूर्वकत उक्त तियिक
देवीका त्रत और दोल्णेत्सव करता हैः उसे शिवा देवी
अभीष्ट पदार्थ देती हैं ।
वैशाल मासके शुक्ल पक्षमें जो अक्षय दृतीया
है, उसमें आल्स्यरदित हो जो जगदम्बाका ब्रत करवा
नेढा) माल्ती, नम्पा) नपा ( भदुउल » बन्भूक
सता है व
टुपहूरिगं /
ध्य
उमासंहिता ] # देवीके क्रियायोगका वर्णन--देवीकी मूर्ति एवं मन्द्रिके निर्माण आदिका मद््य ऋ ४२५
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और कमलके फूलेसे शंकरसहित गौरीदेवीकी पूजा करता है; इसमें संशय नहीं है| इस नवरात्र ब्तके प्रभावका वर्णन
बह करोड़ों जन्मोंमे किये गये मानसिक, वाचिक ओर शारीरिक करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पद्मानन महादेव तथा पडानन
परपोका नाश करके घर्म; अर्थ, काम और सोक्ष--इन चारों कार्तिकिय भी समर्थ नहीं हैं। फिर वूसरा कोन समर्थ
पुरषा्थोकों अक्षयरूपमें प्राप्त करता है | हो सकता है। मुनिश्रेष् | नवरात्त्रतका अनुष्ठान करके
विरथके पुत्र राजा सुरथने अपने खोये हुए राज्यको प्राप्त कर
'लिया । अयोध्याके बुद्धिमान् नरेश ध्रुव्ंधिक्रमार सुदर्शनने
इस नवरात्रत्नतके ग्रमावसे ही राज्य ग्राप्त किया; ओ पहले
उनके हाथसे छिन गया था। इस ब्रतराजका अनुष्ठान
और महेश्वरीकी आराधना करके समाधि वैश्य संतारबन्धन-
से मुक्त हो मोक्षके भागी हुए थे। जो मनुष्य आश्विनमासके
जाट जम मो शुक्लपक्षम विधिपूवंक ब्त करके तृतीया) पद्चमी) सप्तमी)
ह जीत". हुक < पाली ३ द कल हर अ'टमी) नवमी एवं चतुर्दशी तिथियोंकों ५ देवीका पूजन
शिवा देवीको विराजमान करे | तत्पश्रात् बुद्धिमान् पुरुष है, देवी शिवा निरन्तर उसके सम्यूर्ण अभीष्ट मनोरथकी
प६ भावना करे कि परा अम्बा उमादेवी सम्पूर्ण जगतकी पूर्ति करती रहती हैं | जो कार्तिक, मार्गशी्ष, पौष) माघ
के हिये ५ कर न 2 ओर फाब्गुन मासके झुक्कु पक्षमें तृतीयाकों त्रत करता
के मत तथा छाछू कनेर आदिके फूलों एवं सुगन्धित धुपोंसे
हर हल कप कक आग हा मज्नेलमयी देवीकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण म ज़लको प्राप्त कर
थे हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये € पाहि देवि जम नकल छेता है। झ्लियोंकी अपने सोभाग्यकी प्राति एवं रक्षाके लिये
प्रप्नान् दीनवत्सले ) |? इन बाकि देवीकों संतुष्ट ईसे महान् अतका आचरण करना साहिये तथा
गए ओर वागान: खाये लोगो अगर वो लेजे मे पुरुषोंकी भी विद्या, धन एवं पुत्रकी आत्तिके लिये इसका
प्राम या नगरकी सीमाके अन्ततक | हर अनुष्ठान करना कऋहिये | इनके सिवा अन्य भी जो देवीकी
पर उत्त रथपर देवीकी पूजा करे और नाना प्रकारके जम उसक्ष॒ उृच्याकी
छोत्रेसे उनकी स्तुति करके फ़िर उन्हें बहाँसे अपने घर भक्तिभावसे आचरण करना चाहिये ।
छे आये | तदनन्तर सेकड़ों बार प्रणाम करके जगद म्बासे यह उमासंदिता परम पुण्यमयी तथा शिवभक्तिको बड़ाने-
“मनी करे । जो विद्वान् इस प्रकार देवीका पूजन; शत वीली है। इसमें नाना प्रकारके उपाख्यान दे। यद कल्याण-
<३ रपोत्तव करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका .मेयी संहिता भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली दे । जो इसे
अभंग करके अन्तमें देवीके धामको जाता है | भक्तिभावसे सुनता या एकाग्रचित्त ह्ेकर सुनाता अथया
पढ़ता या पढाता है; वह परम गतिकों ग्रात्त होता ६ | भिसके
भावण और मासकी गुद्ठा गैयाको कटा *ँ ; शा हि री पक
फिफंक अम्गाका हल कक वि इतीयाकों जो। (रे सुन्दर अक्नरोंम लिखी गयी यद्द संदिता विधिवत्
"अब मं हे त्ते आर पूजन करता हे, वह इस लोक- पूजित होती है; वह सम्यूर्ण अमीशेकों श्रात् कर स्था
४७) नि एवं धन आदिसे सम्पन्न होकर सुख
5 न न भृत मेत कय पिशाचादि वदष्टासे कभी भय
नि हू अन्त कु ल्येकोंसे हर ८ | उस (3 प्रत्त आर | “-444<५« दुष्टातत ऊनयों भाप
हे दे ६ तथा म॑ सब लोक ऊपर विराजमान
य्येप्ठ शुक्ला वृतीयाको ्॒त करके जो अत्यन्त प्रसन्नताके
ताथ मद्देश्वरीका पूजन करता है; उसके लिये कुछ भी
अवाध्य नहीं होता । आषाढके शुक्षपक्षकी वृतीयाकों
अपने वेभवके अनुसार रथोत्सव करे | यह उत्सव देवीको
अल्नत्त प्रिय है | पृथ्वीकों रथ समझे, चन्धमा और सुर्यको
उसके पहिये जाने, वेदोंको घोड़े ओर ब्रह्माजीको सारथि
श्र पुत्र गोत्र श्र हि नशा लिकफा अपय पात
अ्क्मं जाता दै। नहीं होता | वह पुत्रों आद सम्यत्तिका अवश्य पाता
'जरव्च जता ट की जक ३; शिवाह्नी मक्ते चाटवेवार
कि है; इसस संशव नया दे अतः शिवाका शक आइचबाल़
न अमासक शुझुपक्षम नवरात्त्रत करना चादिये | पुरुषोंकों सदा इस परस पुष्यसवी रमगीय उस्ा-हंद्नाऊा
7 जप उम्तूर्ण कामयाएँ सिद्ध द्वो ह्वी जाती हैं, अ्रवण एवं पाठ करना चाहिये । अप 5६ |
॥ उमासंद्विता सम्पूण ॥
5.
ऊ श्र ञ्
५०९ १०७ पझृ७ ५७-....
कैलाससंहिता
ऋषियोंका खतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे प्रश्न--अणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध
नसः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे ।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे ॥
जो प्रधान ( प्रकृति ) और पुरुषके नियन्ता तथा सृष्टि;
पालन और संहारके कारण हैं; उन पार्बतीसहित शिवको
उनके पार्षदों ओर पुत्रोंके साथ प्रणाम है ।
ऋषि बोले--सूतजी ! हमने अनेक आख्यानोंसे
युक्त परम मनोहर उमासंहिता सुनी | अब आप शिवतत्त्वका
शान बढामेवाली केलाससंहिताका वर्णन कीजिये ।
व्यासंजीने कहा--पुत्रो | शिवतत्त्वका प्रतिपादन
करनेवाली दिव्य कैलाससंहिताका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेम-
पूर्वक सुनो । तुम्हारे प्रति स्नेह होनेके कारण ही में तुम्हें यह
प्रसज्ञ सुना रहा हूँ ।
इतना कहकर व्यासजीने काशीमें मुनियोंके तथा सूतजीके
संवाद, व्यास-सुनि-संवाद, शिव-पार्बती-संवाद, शिवजीके
द्वारा पारवतीके प्रति संन्यास-पद्धति; संन्यासाचारः संन्यास-
मण्डल) संन्यासपद्धतिन्यास, वर्णपूजन) प्रणवार्थपद्धति आदि
प्रसंगोंका वर्णन करके पुनः ऋषिगण तथा सूतजीके मिलन
एव संवादकी अवतारणा करते हुए सूतजीके प्रति ऋषियोंके
प्रश्नका यों वर्णन किया ।
ऋषि वोले--महामाग सूतजी ) आप हमारे श्रेष्ठ गुर
हैं | अतः यदि आपका हमपर अनुग्रह हो तो हम आपसे
एक प्रश्न पूछते हैं । अद्धाढ शिप्योपर आप-जैसे गुरुजन
सदा स्नेह रखते हैं, इस बातकों आपने इस समय हमें प्रत्यक्ष
दिखा दिया | मुने ! विरजा-होमके समय पहले आपने जो
बामदेवका मत सूचित किया था, उसे हमने विस्तासपूर्वक
नहीं सुना। अब हम बड़े आदर और श्रद्धाके साथ उसे सुनना
चाहते हेँ। कृपासिन्धों ! आप प्रसन्नतापूवक उसका वर्णन करें |
फ्रपियोंकी यह वात सुनकर सूतके दझरीरमें रोमाश्च हो
आया | उन्होंने गुढ्के भी परम उत्कृष्ट गुर महादेवजीको)
त्रिभुवनजननी महादेवी उम्राकों तथा गुरु व्यासकों भी भक्ति-
पूर्वक नमस्कार करके मुनियोंकों आहादित करते हुए गम्भीर
वाणीमें इस प्रकार कद्दा
सतजी वोछे-झनियो ! त॒म्दारा कल्याण हो) तुम
सब लोग सदा घुखी रहो । मद्गभाग गद्दात्माओं | तुम भगवान
शिवक्रे भक्त तथा दृढ़तापूवंक त्रतका पालन करनेवाले हे
यह निश्चितरूपसे जानकर ही में तुमलछोगोंके समक्ष इस विपय-
का प्रसन्नतापूर्वक वर्णन करता हूँ | ध्यान देकर सुनो । [पे
कालके र॒थन्तर कस्पमें महासुनि वामदेव माताके गर्मसे बाहर
निकलते ही शिवतलके शाताओर्म सर्वेश्रेष्ठ माने जाने छो|
वे बेदों, आगमों, पुराणों तथा अन्य सब शाज्रोंके भी तालिक
अर्थकों जाननेवाले ये | देवता, असुर तथा मनुष्य आदि
जीवोंके जन्म-कर्मोंका उन्हें मलीभाँति श्ञान था | उनका समूए
अज्ज़ भस्म ठगानेसे उज्ज्वल दिखायी देता था। उनके मस्तक
पर जयाओंका समूह शोभा देता था। वे किततीके आशित
नहीं थे | उनके मनमें किसी वस्तुकी इच्छा नहीं थी | वे
शीत-उष्ण आदि इन्द्ोंसे परे तथा अहंकारशूत्य ये | वे दिगवर
मह्शानी महात्मा दूसरे महेश्वर्के समान जान पढ़ते ये।
उन्हींके-जैसे खमाववाले बड़े-बड़े मुनि शिष्य होकर उन्हें पेरे
रहते ये । वे अपने चरणोंके स्पर्शजनित पुण्यसे इस १ध्वीक
पवित्र करते हुए सब ओर विचरते और अपने चित्त
निरन्तर परमधाम-सखरूप परह्म परमात्मामें लगाये रहते में।
इस तरह घूमते हुएए वामदेवजीने मेरके दक्षिण शिलर-
कुमार/शज्ञमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया; जहाँ मयूराइनः मि
कुमाझ ज्ञानमय शक्ति धारण करनेवाले; समस्त अबुर्क
नाशक और सर्व॑देव-वन्दित भगवान् स्कन्द रहते में | उन
साथ उनकी शक्तिभूता “गजावछी? भी थीं । वहीं ह
नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर था; जो समुद्रके समान अगर्ष की
विशाल दिखायी देता था | उसका जछू ठंडा और खाई
था | वह सरोवर खच्छ, अगाघ एवं वहुल जलरागितत प्
था | उसमें सम्पूर्ण आश्चर्यजनक गुण विद्यमान ये | 4
जलाशय स्कन्दसामीके समीप ही था | महावुनि वामदेवी
शिष्योंके साथ उसमें खान करके शिखरपर बैठे हुए गाव ३
सेवित कुमारका दर्शन किया | वे डरते हुए तय उरोत
तेजस्वी ये । मोर उनका श्रेष्ठ चाइन था | उनके चार
थीं | सभी अज्ञोंसे उदारता सूचित होती थी । मकृंढ ऑ
उनकी शोभा बढ़ा रहे थे | रलभूत दो झक्तियाँ उव
उपासना करती थीं | उन्होंने अपने चार ह्वार्थमिं क्रमश व
कुक्कुझ बर और अभय धारण कर रकक््खें थे ।_ लदग
दर्शन और पूजन करके उन मुनी्षरने बड़ी भर्क्तिए का
स्तवन आरम्म किया |
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कैलाससंहिता] # ऋषियोंका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्द्से प्रणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध # ४२७
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वामदेव वोछे--जो प्रणवके वाच्यार्थ; प्रणवार्थके प्रति-
पदक; प्रणवाक्षरूूप बीजसे युक्त तथा प्रणवरूप हैं। उन
आप खामी कारतिकेयकी वारंबार नमस्कार है । वेदान्तके
अर्पभूतत ब्रह्म ही जिनका खल्प है, जो वेदान्तका अर्थ करते
६ वेदान्तके अर्थक्ों जानते हैं और नित्य विदित हैं; उन
सनन््दखामीको वारंबार नमस्कार है । समस्त प्राणियोंकी छृदय-
गुम्ममे प्रतिशित गुहको नमस्कार है । जो खय॑ गुद्य हैं, जिनका
पुष्य ै तथा जो गुद्य शात््रोके शाता हैं; उन स्वामी
ग्रशकियकों नमस्कार है | प्रभो। आप अणुसे भी अत्यन्त
अगु और महावसे भी परम महान् हैं, कारण और कार्य
अभद भूत और भविष्यके मी जाता हैं। आप परमात्मखरूप-
0 नमस्कार है । आप स्कन्द ( माताके गर्भसे च्युत ) हैं |
रन ( गर्मते सुवलन ) ही आपका रूप है । आप सूर्य
; अप्थके समान तेजल्धी हैँ | पारिजातकी मालसे सुशोमित;
“5६ अयदि धारण करनेवाले आप स्कन्दस्वामीकों सदा नम-
हे है। अप शिवके शिष्य और पुत्र हैं, शिव ( कल्याण )
पबशड़े हूं, श्िवकों प्रिय हैं तथा शिवा और शिवके लिये
आ्रए एड प्ि
जा निधि हैँ। आपको नमस्कार है | आप गद्गाजी-
५८७ बे,
५... पन्ने शायन करनेवाले हैँ | आप मदावुद्धिमान
र ६ | पृदक्षर सन््त्र आपका शरीर है | आप
पका विधान करनेवाले हैं। आपका रूप छ:
॥ है. आआ..
|
वयरी.. अानका+ 3-० मम. वाहन" फेक... क+ २३म ७ 3-33 कक“) कान एस. "म॥-कॉन)-कनममक.. खिल
मागेसे परे है। आप पडाननकों बारंबार नमस्कार है ।
द्वादशात्मन् | आपके बारह विशाल नेत्र और बारह उठी हुई
भुजाएँ हैं | उन मुजाओंमे आप बारह आयुध धारण करते हैं ।
आपको नमस्कार है | आप चतुर्भुजरूपधारी, शान्त तथा
चारों भुजाअंमिं क्रमशः शक्ति, कुक््कुट। वर और अभय
घारण करते हैं | आप असुरविदारण देवकों नमस्कार है |
आपका वक्ष/स्थल गजावलीके कुचोंमें लगे हुए कुछ्कमसे
अज्लित है। अपने छोटे भाई गणेशजीकी आनन्दमयी महिमा
सुनकर आप मन-ही-मन आनन्दित होते हैँ | आपको नमस्कार
है | ब्रह्मा आदि देवता; मुनि और किंनरगर्णोसे गायी जाने-
बाली गाथा-विशेषके द्वारा जिनके पवित्र कीरतिधामका चिन्तन
किया जाता है; उन आप स्कन्दको नमस्कार है । देवताओंके
, निरमेंछ किरीयको विभूषित करनेवाली पुप्ममालाआंसे आपके
मनोहर चरणारविन्दोंकी पूजा की जाती है । आपको
नमस्कार है । जो वामदेवद्वारा वर्णित इस दिव्य स्कन्दस्तोच्रका पाठ
या अ्रवण करता है; वह परमगतिको प्राप्त होता है । यह स्तोच्न
बुद्धिको बढ़ानेवाला, शिवभक्तिकी चृद्धि करनेवाला, आयु,
आरोग्य तथा घनकी प्राप्ति करानेवाला और ठदा सम्पूर्ण
अमीष्टको देनेवाल्य है | ४
# वामदेव उवाच---
#यनपने अप...
>> तलमः प्रणवार्थाय प्रणवा्विधायिने ।
प्रणवाक्षरवोजाय प्रणाय नमो नमः ॥
वेदान्ता्थंखरूपाय वेदान्ताथंविधायिने |
वेदान्ताथविंदे नित्यं विदिताय नमो नमः ॥
नमो गुद्दाय भूतानां गुद्दस्रु निश्चिताय च |
गुल्याय मुझ्चरूपाय गुपझ्लागमविदे नमः ॥
अणोरणीयसे तुर्न्य॑ मदतोंडईपि म्दीयसे ।
नमः परावरशाय परनात्मखरूपिण ॥
रकन््दाय स्कन्दरुपाय. मिदि्राण्णतेनसे |
नमो. मन्दारमालेयन्मुकुटादियते. सदा ॥
शिवशिप्याय पुत्रायथः शिवस्य शिवदापिने।
शिवप्रियाय. शिववोरानन्दसिषये. नमः ॥
गाय्नेयाय नमसुन्य॑ कार्तिकेयाय पीमते ।
उम्ापुत्राय मदते दरकाननशाविने ॥
पटठक्षर॒शरयीराय पटविदरयबिधादिने ।
पठध्वातावरूपाय पर्मुसाव नमों नमः?
द्वादशावतनेत्राय टआइशपवदारय ।
दाद शायुपगराय दारशात्मन् नमाघ्ग्तु थे ॥
चतुनुजाय शान्याव
वरदानवदस्ताय
मणइब्टीकुदाडिप टुगाग वि दब ४
दमा कक व >टफक जाए ला न व हा आज [7 कह वि
ध्यॉड। कै 6.३ ४१ ९,६+/८]., 4 १५१, जी मम! |
७२८
लंच जज ती जी रल ताल. लाख
वामदेवने इस प्रकार देवसेनापति भगवान् स्कन्दकी
स्तुति करके तीन बार उनकी परिक्रमा की और प्रथ्वीपर दण्ड-
की भाँति गिरकर नतमस्तक हो बारंबार साष्ठाक़्॒ प्रणाम और
परिक्रमा करनेके अनन्तर वे विनीत भावसे उनके पास खड़े
हो गये । वामदेवजीके द्वारा किये गये इस परमार्थपूर्ण स्तोच्न-
को सुनकर महदेश्वरपुत्र भगवान् स्कन्द बड़े प्रसन्न हुए. | उस
समय वे महातेन वामदेवजीसे बोले--भ्मुने | में तम्हारी
की हुईं पूजा) स्तुति और भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ |
तुम्हारा कल्याण हो । आज में तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य
सिद्ध करूँ ! तुम योगियोंमें प्रधान; सर्वथा परिपूर्ण और निःस्पृह
हो | इस जगतमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसके लिये तुम-जैसे
वीतराग महर्षि याचना करें; तथापि धर्मकी रक्षा और सम्पूर्ण जगत-
पर अनुग्रह करनेके लिये तुम-जैसे साधु-संत भूतलूपर विचरते रहते
हैं | ब्रक्मन् | यदि इस समय मुझसे कुछ सुनना हो तो कहो; मैं
लोकपर अनुग्रह करनेके लिये उस विषयका वर्णन करूँगा |
स्कन्दकी वह बात सुनकर महायमुनि वामदेवने विनयाबनत
हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा |
वामदेव बोले--भगवन् | आप परमेश्वर हैं | अलौकिक
ओर लौकिक--सब प्रकारकी विभूतियोंके दाता हैं | सर्वज्ञ,
स्वेकर्ता, सम्पूर्ण शक्तियोंकी धारण करनेवाले और सबके
खामी हैं | इम साधारण जीव हैं | आप परमेश्वरके समीप
बोलनेकी शक्ति या बात करनेकी योग्यता हममें नहीं है; तथापि
यह आपका अनुग्रह है कि आप मुझसे वात करते हैं । महा-
ए॑एएएएोा आज..." ७-3 जाम किन
# नमो रुद्भाय शान्ताय त्रह्मणे प्रमात्मने #
॥ संक्षित्त-शिवपुराणाइ
अभ््माओ"-गाह आधा“ यय-० मम ममपक नमक. झुक "यान-गाक, (2-आकुनमपाय "2-५० कु पाहमप बुझा.
2७ 65.3 अली फिज 3» पनी पक जननी समीर" जजरीनएमन+ परम यतम- २ सनी जमा. नॉसीपनी री ७. सरी पक समीर नी धो आन
प्राश् | में कृतार्थ हूँ | कणमात्र विश्ञानसे प्रेरित हो आप
समक्ष अपना प्रश्न रख रहा हूँ | मेरे इस अपराधको आप
क्षमा करेंगे | प्रणव सबसे उत्तम मन्त्र है| वह साधा
परमेश्वरका वाचक है | पश्चओं ( जीवों ) के पाश ( बन्धन )
को छुड़ानेवाले भगवान् पशुपति ही उसके वाच्याय है |
'ओमितीदं स्वम? ( ते० उ० १।८ । १ )--ऑकार ही
यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला समस्त जगत् है; यह सनातन श्रुति
का कथन है । “ओमिति ब्रह्म! ( तै० उ० १।८।१)
अर्थात् (3० यह ब्रह्म है? तथा भव होतद् ब्रह्म
( माण्छटू० २ )--“यह सब-का-सब ब्रह्म ही है |? इत्यादि बातें
भी श्रुतियोंद्वारा कही गयी हैं | इस प्रकार मेने समश्ि तथा
व्यश्टिभावसे प्रणवार्थवा श्रवण किया है । तालय॑ यह है कि
समष्टि और व्यष्टि--समी पदार्थ प्रणवके ही अर्थ हैं, प्रणवके
द्वारा सबका प्रतिपादन होता है--यह बात मैंने सुन रक्खी है |
महासेन | मुझे कभी आप-जैसा गुरु नहीं मिला है; अतः बा
करके आप प्रणवके अर्थका प्रतिपादन कीजिये । उपदेशकी
विधिसे तथा सदाचार-परंम्पराको ध्यानमें रखकर आप हम
प्रणवार्थंका उपदेश दें |
मुनिके इस प्रकार पूछनेपर स्कन्दने प्रणवखरूप अद्तीय
श्रेष्ठ कछाओंद्वारा लक्षित तथा सदा पाइवभागमें उमाको साथ
रखनेवाले और मुनिवरोंसे घिरे हुए भगवान सदाशिवको
प्रणाम करके उस श्रेयका वर्णन आरम्म किया) जिसे श्र
भी छिपा रखा है । ( अध्याय १-११)
जीती जमा “पक 2 .पन्मन- बम.
प्रणवके वाच्याथरूप सदाशिवके खरूपका ध्यान, वर्णाअ्रम-धर्मके पालनका महत्व, ज्ञानमयी पूजा,
संन्यासके
श्रीस्कन्दने कहा--महाभाग मुनीश्वर वामदेव |! तुम्हें
साधुवाद है; क्योंकि तुम भगवान् शिवके अत्यन्त भक्त हो
और शिव-तत्वके शाताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो। तीनों लोकोंमें
कहीं कोई ऐसी बस्तु नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; तथापि तुम
लेकपर अनुग्रह करनेवाले हो, इसलिये तुम्हारे समक्ष इस
विप्रयका वर्णन करूँगा | इस लोकमें जितने जीव हैं, वे सब
नाना प्रकारके शास्रोंसे मोहित हैं | परमेश्वरक्की अति विचित्र
मायाने उन्हें परमार्थले वश्चित कर दिया है। अतः प्रणवकके
कि: इसकी ससफफस यअल्ॉइञओऊझओडझडझ पुनः डी िलनिननन>+ बन... आस नजनमणणज
पूवोज्ञभ्ूत बान्दीश्राद्ध एवं ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन
मैं अपना दाहिना हाथ उठाकर ठुमसे शपथपूवक कहता ६
कि यह सत्य है; सत्य है, सत्य है। में वारंबार ३७
सत्यको दोहराता हूँ कि प्रणवके अर्थ साक्षात् शिव ही है|
श्रतियों, स्मृति-शार्त्रों, पुराणों तथा आगमोंमें प्रधानतया उन्हीं!
प्रणबका वाच्यार्थ बताया गया है । जहाँसे मनसहित वा
उस परमेश्वरक्को न पाकर ल्लैद आती है, जिसके आनन्द?
अनुभव करनेवाला पुरुष किसीसे डर्ता नई) व्रक्षी
विष्णु तथा इन्द्रसहित यह सम्पूर्ण जगत् भूतों और ईद
समुदायके साथ सर्वप्रथम जिससे प्रकट होता क जो परमार्ण
खय॑ किसीसे और कभी भी उत्लन्न नहीं द्वोता। जि?!
अद्यादिदेवमुनिर्किनरगीयमान-गाथाविशेषशुचिचिन्तितकी तिंधाम्ने |
इन्दारकामठकिरीटविभूषणल्लक्.पूज्याभिरामपदपक्षज॒ ते नमोथ्स्तु ॥
इति स्कन्दस्तव॑ दिव्यं वामदेवेन भापितम् | यः पढेच्छुणुयाद्यापि स याति परमां गतिन् ॥
महाप्रशाकरं
प्षेतच्छिवभक्तिविवर्धनम् । आयुरारोग्यवनकृत्सवंकामप्रद॑
सदा ॥ का
( शि० पु० कै० सं० ११। देसाई
कलाससंद्तिता ]
निकट विद्युत) सूर्य ओर चन्द्रमाका प्रकाश काम नहीं देता
क्या जिमके प्रकाशसे ही यह सम्यूणं जगत् सब ओरसे
प्रकाशित होता है; वह परब्रह्म परमात्मा सम्पूर्ण ऐश्व्यसे
पमन्न होनेके कारण खयं ही स्वृंश्वर पशिव? नाम धारण करता
है |# दृदयाकाशके भीतर विराजमान जो भगवान् अम्भु
गुमुक्षु पृष्षेकि ध्येय हैं, जो स्वव्यापी प्रकाशात्मा, भासखरूप
एवं चिन्मय हैँ, जिन परम पुरुषकी पराशक्ति शिवा
भक्तिभावते सुलभ मनोहरा, निर्शंण, अपने गुणोंसे ही
निगूद और निष्कल हैँ, उन परमेश्वरके तीन रूप हैं--
स्ूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे | मुने ! मुम॒क्षु योगियोंकों
नित्य क्रमशः उनके इन खरूपोंका ध्यान करना चाहिये ।
वे शम्भु निष्कछ, सम्पूर्ण देवताओंके सनातन आदिदेव,
रान-क्रिया-खभाव एवं परमात्मा कह्दे जाते हैं, उन देवाधिदेव-
को सक्षात् मूर्ति सदाशिव हैं | ईशानादि पाँच मन्त्र उनके
शरीर हं। वे महादेवजी पश्चकलछा-रूप हैँ | उनकी अफ्नकान्ति
शद्ध फण्किके समान उज्ज्वल है। वे सदा प्रसन्न रहनेवाले
तथा शीतल आभासे युक्त हैं | उन प्रभुके पाँच मुख; दस
भुजाएँ ओर पंद्रह नेत्र हैं | “ईशान? मन्त्र उनका मुकुट-
मश्डत मस्तक है | पतत्पुरुष” मन्त्र उन पुरातन प्रभुका मुख
| 'अथोए मन्त्र हृदय है। ध्वामदेव? मन्त गुह्मय प्रदेश है
वृष 'सचाजात? मन्त्र उनके पैर हैं | इस प्रकार वे पश्चमन्त्र-
भहे।वेदीसाक्षात् साकार और मिराकार परमात्मा हैं ।
“वंशता आदि छः शक्तियाँ उनके शरीरके छः अज्ञ हैं ।
पब्दादि शक्तियोंसे स्फुरित हृदय-कमलके द्वारा सुशोभित
९ | वामभाणमें मनोन्मनी नामक अपनी शक्तिसे विभूषित हैं |
अब मे मन्त्र आदि छः प्रकारके अर्थोको प्रकट
के हिये जो अ्थोपन्यासकी पद्धति है, उसके द्वारा प्रणवक्के
मं ओर व्यष्टिसम्ब्धी भावार्थका वर्णन करूँगा; परंतु
४3 उपदेशका क्रम बताना उचित "मे बताना उचित हैः इसलिये उसीको इसलिये उसीको
* ५) वाचो निवततन्ते अप्राप्प मनसा सह ।
धान यस््य वै विद्वान्न विमेति कुतश्नन |
पलाजगदिर सर्द विधिविध्ट्विन्द्रपूवंकम् ।
7६ भूवेद्धिययामै: प्रथम रन्प्रचयते | .
न पेन्पदसते यो वे कुतश्वन कदाचन ।
छूने भातते विपुन्न च सयों न चन्द्रमा: ॥
३ भारी पिनावोदं जगत् उव समन््तत |
बन रुूम्पणी! सासा सवश्वरः सयनस् ॥
( शि० पु० दौ० सें० १२ । ७-१० )
कै वर्णाभमधमके पालनका महत्त्व, शानमयी पूजा $
-प्पपक्फपपफेततफपफक्पसफपपप्स पट्टा मय
छ3र२य
सुनो । मुने | इस मानवलोेकमें चार वर्ण प्रसिद्ध हैं | उनमेंसे
जो ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर वेश्य--ये तीन वर्ण हैं, उन्हींका
वेदिक आचारसे सम्बन्ध है | त्रेवर्णिकोंकी सेवा ही जिनके
लिये सारभूत धर्म है; उन झद्गोंका बेदाध्ययनमें अधिकार
नहीं है । यदि सब चेवर्णिक अपने-अपने आश्रम्-घधर्मके
पालनमें हादिक अनुरागके साथ लगे हों तो उनका ही
श्रुतियों और स्म्ृतियोंमं प्रतिपादित घर्मके अनुप्ठानमें
अधिकार है, दूसरेक़ा कदापि नहीं । श्रुति और स्थम्रतिमें
प्रतिपादित कमका अनुष्ठान करनेवाल्य पुरुष अवश्य सिद्धिको
प्राप्त होगा, यह बात वेदोक्तमार्गको दिखानेवाले परमेश्वरने
खयं कही है | वर्णव्म और आश्रमधर्मके पालनजनित
पुण्यसे परमेश्वर्का पूजन करके वहुत-से श्रेष्ठ मुनि उनके
सायुज्यको प्राप्त हो गये हैं | ब्रह्मचर्यके पालनसे ऋपपियोंकी,
यशकर्मोके अनुष्ाानसे देवताओंकी तथा संतानोत्यादनसे
वितरोंकी तृत्ति होती है--ऐसा श्रुतिने कहा है | इस प्रकार
ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा पितृ-ऋण--इन तीनोंसे मुक्त
हो वानप्रस्थ-आशअ्ममें प्रवि.्ठ होकर मनुष्य शीत, उच्णं
तथा सुख-दुःखादि इन्द्रोंकी सहन करते हुए जितेद्धिय,
तपस्वी और मिताहारी हो यम-नियम आदि योगकरा अभ्यास
करे; जिससे बुद्धि निश्चल तथा अत्यन्त दृढ़ हो जाय | इस
प्रकार क्रमदः अभ्यास करके शुद्ध-चित्त हुआ पुरुष सम्पूर्ण
कर्मोका संन्याव कर दे । समस्त कर्मोक्ा संन्यास करनेके
पश्चात् शनके समादरमें तत्यर रहे । शानके समादरकों ही
शानमयी पूजा कहते हैं । वह पूजा जीवकी साक्षात् शित्रक्े
साथ एकताका वोध कराकर जीवन्मुक्तिष्पष फछ देनेगाली
है | यतियोंके लिये इस पूजाको सर्वोत्तम तथा निर्दोष
समझना चाहिये । महाप्राज्ञ | तुमपर स्नेद्र होमेके कारण
लेकानुग्रहकी कामनाते में उस पूजाकी विधि बता रा हैँ,
सावधान हाकर छुनो ।
. साधकको चाहिये कि वह तथूर्ण शाजोके तत्त्या्रे
शाता, वेदान्तज्ञानकें पारंगत तथा बुद्धिमान ग्रेटर
आचायकी शरणमें जाय | उत्तम बुद्धिते घुक्त एवं चतुर
साधक आचायके समीप जाकर विवधिपृक्क दष्टअगाम
आदक द्वाय उन्हें वन्नात्रक झठुद कर । ूछर सुदद्ा व्यटा
ले बह वारह् दिनतिया छाल पृ व#ूए ४ | तहलतनन्तदर
शुक्डपसकी चतुर्थी वा दशमांड़ प्र! छ्ाड़ वि.परन् बगान-
फर शुद्चित हुआ विद्वान साबद्म निवाद््म धरडे गुदा
कक. न
शार्बाक्ता दिापस चआानमाडाद ऋर
बुल्मकर दास
8२३०
विश्वेदेवोंकी संशा सत्य ओर वसु बतायी गयी है । प्रथम
देवभाडमें नान््दीमुख-देवता ब्रह्म, विष्णु ओर महेश कह्दे
गये हैं । दूसरे ऋषिभ्राद्धमें उन्हें ब्रह्मषि, देवषिं तथा राजर्षि कहा
गया है । तीसरे दिव्य शआाद्धमें उनकी बसु; रुद्र और
आदित्य संज्ञा बतायी गयी है । चौथे मनुष्य्राद्धमें सनक
आदि चार मुनीश्वर ही नान्दीमुख-देवता हैं । पाँचवे भूत-
श्राद्धमं पॉच महाभूत, नेत्र आदि ग्यारह इन्द्रिय-
समूह तथा जरायुन आदि चर्तर्विध प्राणिसमुदाय
नानन्दीमुख माने गये हैं | छठे पितृश्राद्धमं पिता, पितामह
ओर प्रपितामह--ये तीन नान्दीमुख-देवता हैं । सातवें
मातृश्राद्धमें माता; पितामह्ी ओर प्रपितामही--इन तीनको
नानदीमुख-देवता बताया गया है तथा आठवें आत्मश्राद्यमें
आत्मा; पिता; पितामह ओर प्रपितामह--ये चार नान्दीमुख-
देवता कहे गये हैं #। मातामहात्मक श्ाडमें मातामहः
प्रमातामह और बवृद्धप्रमातामह--ये तीन नान्दीमुख-देवता
सपक्वीक बताये गये हैं। प्रत्येक भाद्धमें दो-दो ब्राक्षण करके
जितने ब्राह्मण आवश्यक हों, उनको आमन्त्रित करे और
स्वयं यक्पूवंक आचमन करके पवित्र हो उन ब्राह्मणोंके
पैर घोये । उस समय इस प्रकार कद्दे--“जो समस्त सम्पत्तिकी
प्राप्तिमं कारण, आयी हुईं आपत्तिके समूहको नष्ट करनेके
लिये धूमकेतु ( अमर ) रूप तथा अपार संसारसागरसे पार
लगानेके लिये सेतुके समान हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणघूलियाँ मुझे
पवित्र करे । जो आपत्तिल्पी घने अन्यकारकों वूर करनेके
लिये सूये, अभीष्ट अथंको देनेके लिये कामघेनु तथा समस्त
तीर्थोके जल्से पवित्र मूर्तियाँ हैं; वे ब्राह्मणोंकी चरणघूलियाँ
मेरी रक्षा करें !? न॑
ऐसा कह पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर साष्ाड़्ः प्रणाम
करे । तत्यश्वात् पूर्वाभिमुख बैठकर भगवान् शंकरके युगल
चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए; इृढ़तापूवक आसन ग्रहण
रे | हाथमें पविन्नी ले शुद्ध हो नूतन यशोपवीत धारणक्र
१. सनक सनन्दन। सनातन भौर सनत्कुमार |
# पमंसिन्धुकार आदिने आत्म-श्रादमं मी तीन द्वी नानदीमुख
कहे ई---आत्मा, पिता और पितामह ।
+ समस्तसंपत्समवाप्तिहेतव: समुत्वितापत्कुल्धूमकेतवः ।
अपारसंसारसमुद्रसेतव: पुनन्तु मां आाद्वणपादरेणवः ॥
आपदध्नध्वान्तसदस्रभानव: समीहितार्थापंणकामघेनव: ।
समलतीयर्थाम्वुपवित्नमृतंयो रक्षन्तु मां आह्मणपादर्पांसवः ॥
( शि० पु० कै० सं० १२ | ४४-४५)
अप ना५५०) पा कमा ७० "नया पर वय३५५ मा") ५५-3५७५७ ७५७५८) ५५०५७+ गा +७+३७-१०७०७५५७५७७५५७०५५*७०३-५ ५+५+/७-१ ७५००-५५ ३५६७७७+॥ा७न गन न ७५५७४ यान +9भ ४-० खिल आटा मा ल39 5253 ++ौ. ५५5०-७3 ७० ८३५७३७आ+>पमकरस>4५५५..५ ७० ! वहन अपल+9०- - काम -कना ५५ -+प नाक ०“ न -- कक + ">> ०-8० काम ना ना दाता जप; शक २४ + 5०००५ वार मल. *-भ ० प+++था पिन पलक नमक" +०-+न८
तीन बार प्राणायाम करे | तदनन्तर तिथि आदिका सण
करके इस तरह संकल्प करें--'मेरे संन्यासका अज्ढभूत जे
पहले विश्वेदेवका पूजन, फिर देवादि अश्टविष श्राद्ध तथा अन्त
मातामहइ-श्राद्ध है, उसे आपलोगोंकी आशा लेकर में पाव॑ण
विधिसे सम्पन्न करूँगा ।? ऐसा संकल्प करके आसनके ल्यिद्धि!
दिशासे आरम्म करके उत्तरोत्तर कुशोंका त्याग करे | ततलशआत्
आचमन करके खड़ा हो वर्णक्रमका आरूम करे | आने .
हाथमें पविन्नी धारण करके दो ब्राह्मणोंके हाथोंका सश करे
हुए. इस प्रकार कहे--
(विइवेदेवाथं भवन्तो बृणे।
भवद्धयां नान्दीक्षाद्धे क्षण: प्रसादनीयः ।॥'
अर्थात् “हम विश्वेदेव आ्राद्धके लिये आप दोनोंका वण
करते हैं । आप दोनों नान्दीभद्धमें अपना सम्रय देनेकी
कृपा करें |? इतना सभी श्राद्धोंके ब्राह्मणोंके लिये कहे | खत
ब्राह्मण-वरणकी विधिका यही क्रम है।
इस प्रकार वरणका कार्य पूरा करके दस मण्डलोंश
निर्माण करे | उत्तरसे आरम्भ करके दसों मण्डलेंका अक्षर
पूजन करके उनमें क्रमशः ब्राक्षणोंकों स्थापित करे | हि
उनके चरणोंपर भी अक्षत आदि चढ़ाये |तदनन्तर समोषा
पूर्वक विश्वेदेव आदि नामोंका उच्चारण करे और कुश पृण।
अक्षत एवं जलसे 'इदं वः पाद्यमम?ः कहकर पाद्य निवेश
करे # |
इस प्रकार पाद्य देकर खय॑ भी अपना पैर घो हे औ
उत्तराभिमुख हो आचमन करके एक-एक श्रादके हि
जो दो-दो ब्राह्मण कल्पित हुए हैं; उन सबको आौए
बिठाये तथा यह कहदे---/विर्वेदेवखरूपसथ प्रह्वर्क
3 ६ जनक न न नम कक न
# प्रथम मण्डल्म दो विश्वेदेवोंके लिये, फिर आठ मरण्डकों
क्रमशः देवादि आठ श्राद्धोंके अधिकारियोंके ढिये तथा ही
मण्डल्म सपक्षीक मातामद आदिके लिये पाध अर्पण करने चाहिये |
अपंण-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार दै--- ु
8० सत्यवमुसंशकाः विश्वेदेवा: नान्दीमुखा: मूभुवः तः & हे
पा पादावनेजन पादप्रक्षालनं वृद्धि ॥ १ ॥ # जफ्नविष्युकिकर
नान््दीमुखाः भूमृवः खः इदं वः पा पादावनेजन पदियक्षारर
वृद्धि: ॥ २॥ * देवपितरहमपिक्षत्रपयों नान््दीमुखाः बी! है
इंद वः पाधथं पादावनेजन पादप्रक्षालन इंद्धिः ॥ ३ ॥ है
इसो प्रकार अन्य श्रार््धेके लिये वाक््यकी ऊी #ी
चादिये ।
कैठाससंहिता |
इदमासनम ४--विश्वेदेवखरूप ब्राह्मणके लिये यह आसन
त््र्पित के यह कह कुशासन दे खय॑ भी हाथमें
कुध्य लेकर आसनपर स्थित हो जाय | इसके बाद कहे--
'असिन्नान्दीमुखभराद्धे विश्वेदेवार्थ भवद्धयां क्षण: क्रियतास:--
इस नान््दीमुख भ्राद्धमें विश्वेदेवके लिये आप दोनों क्षण
(प्म्रय प्रदान ) करें ।? तदनन्तर 'आप्जु्तां भवन््ती---आप दोनों
हृण करें !? ऐसा कहदे । फिर वे दोनों श्रेष्ठ आह्मण इस प्रकार
क्र दे 'प्राप्ज्याव--हम दोनों ग्रहण करेंगे |! इसके बाद
जमाने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणेंसे प्रार्थना करे--'मेरे मनोर्थकी
[वि हे, संकल्पकी सिद्धि हो--इसके लिये आप अनुग्रह करें |”
तसश्रात् ( पद्धतिके अनुसार अध्य दे; पूजन कर ) झुद्ध
केलेके पत्ते आदि धोये हुए, पात्रोंमें परिपक्क अन्न आदि भोज्य
पदा्थोकों परोसकर पथकूश्रथक् कुश विछाकर और खयं
वर्द जल छिड्ककर प्रत्येक पात्रपर आदरपूर्वक दोनों हाथ
व पृथिवी ते पान्रम?% इत्यादि मन्त्रका पाठ करे | वहाँ
खित हुए देवता आदिका चतुर्थ्य॑न्त उच्चारण करके अक्षतसहित
जल ले 'खाद्यर बोलकर उनके लिये भत्न अर्पित करे और
अत्तमें 'न मम? इस वाक्यका उच्चारण करे || सर्वत्र--माता
आदिके लिये भी अन्न-अर्पणकी यही विधि है |
अन्तमें इस प्रकार प्राथना करे--
यत्पादपभ्रससरणाद्._ यस्थ नामजपादपि ।
न्यूनं कम सवेत् पूण त॑ वन््दे साम्बमीश्वरम ॥
'जिनके चरणारविन्दोंके चिन्तन एवं नामजपसे न्यूनतापूण
"११% पवा अधूरा | ट्ि
भपता अधूरा कर्म भी पूरा हो जाता है; उन साम्ब सदाशिव
$ उम्रामदेश्वर ) की मैं बन्दना करता हूँ ।?
हे स्पा पाठ करके कहदे--आह्मणो ! मेरे द्वारा किया
«7 पई नान््दीमुख आद्ध यथोक्तरूपसे परिपूर्ण हो, यह आप
“६! ऐड प्रार्थनाके साथ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकों प्रसन्न करके
"ना आशीाद के और अपने हाथमें लिया हुआ जल छोड़
का धप्कीपर दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम करे और
है 7 आयपोते कहे--ध्यह अन्य अमृृतरूप हो |? फिर
कक पक क्षय जोड़ अलन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रार्थना
' अस्द्रसूक्तजा चमकाध्यायसद्दित ७-७... पमकाध्यावसद्ित पाढ़ करे । पुरुष करें । पुरुप-
कि रा * हे पात्र दौरपिपान आद्यगस्म नुसेडझुतेड्टत सुदोमि
आ
५ ५ ५४ प्रयाग रस प्रदार एइ--+» सत्ययवचुसंशकेन्यो
४ 44५ कु हि हल ये
४४६७५. "जज मन्योस पर : स्वाहा मम! ध्त्वा के
5५५७० ५: रपट हू हत्थाक य
गे खने
# संनन््यासके पूर्वाज्भुत नान््दीकार्, ब्रह्मययज्ञ आदिका वर्णन #
>£ 4
...लजनननललन नल दा आ 3 आओ ट ख ्स्स्स्स्च्च्च्च्च्स्च्च्च्च्य्स्स्य्च्स्य्च्य्स्च्स्स्स्स्स्य्स्स्स्स्स््स्स्स्रि
सक्तकी भी विधिवत् आवृत्ति करे | मनमें भगवान् सदाशिवका
ध्यान करते हुए. 'ईशानः सर्वविद्यानाम्र! इत्यादि पाँच मनन््त्रोंका
जप करे | जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुके, तत्र दद्वसृक्तका
पाठ समास्तकर.क्षमाप्रार्थनापू्वकक उन ब्राक्मणोंको पुनः
'अम्रतापिधानमसि खाहा? यह मन्त्र पढ़कर उत्तरापोशनके
लिये जल दे |
तदनन्तर द्वाथ-गैर थो आचमन करके पिण्डदानके
स्थानपर जाय । वहाँ पूर्वांभिमुख बेंठकर मोनभावसे तीन वार
प्राणायाम करे | इसके बाद में प्नान््दीमुख? श्राद्धका अन्नभूत
विण्डदान करूँगा? ऐसा संकल्प करके दक्षिणसे लेकर उत्तरकी
ओर नो रेखाएँ खींचे और उन रेखाओंपर ऋ्रमशः बारह-
बारह पूर्वाग् कुश विछाये । फिर दक्षिणकी ओरसे देवता आदि-
के पॉँच# स्थारनोपर चुपचाप अक्षत और जल छोड़े ।
पितबर्गके तीनों। स्थानोपर क्रमशः अक्षत। जल छोड़कर नवें
मातामहादिके स्थानपर भी माजन करे । तत्पश्रात् “अन्न
पितरो माद्यध्वम्? कहकर देवादिके पाँचों स्थानपर क्रमश:
अक्षत-जल छोड़े | इस प्रकार अवनेजन दे पाँचों खानोंपर
प्रत्येकके लिये तीन-तीन पिण्ड दे॥ । ( इसी तरह शेष खानोंपर
भी करे।) अपने णह्यसृत्रमें बताबी हुईं पद्धतिके अनुसार सभी
पिण्ड पृथकू-वरथक् देने चाहिये | फिर पितरोके साद्रुष्यके लिये
जल-अक्षत अर्पित करे | तलश्वात् अपने छ्ृदय-कमलम सदा-
शिवदेवका ध्यान करे और पूर्वोक्त 'व्यादपप्रसरणात्" * * * ४
इत्यादि इछोकका पुनः पाठ करके ब्राह्मणेक्रों नमस्कारपूर्वक
यथाशक्ति दक्षिणा दे | फिर चुटियोंक्रे लिये श्वमाप्रार्थना
करके देवता-पितरोंका विसजन करे । पिण्डॉका उत्सग करके
_ री ७ जीज--++5
# देव, ऋषि, दिव्य, मनुष्य भोर भूत--सनके पंच खान
समझने चाहिये ।
+ पिता आदि, माता भादि सवा अत्या भादि--ये दीन
सान ४ ।
| उस्त समव शत अव्यर फटू--+शुर्पन्तं भंदागगी मास्दोद्रा:
शुन्न्न्तां विष्णवों नाम्दीमुझा: छुल्पगग मेजर सानाप गा: ॥ पद
प्रथम रेखापर मार्मन छरे तमप कोई । इसे नक्ार नग्प रेघाऊादर
नी ऊुइता अंडे ।
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४ नमो रुद्गराय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने 5
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र्न्््सख्च्य्य्य्थ्ख्ख््््््यऊ्््ं्ंश्शश््श्च्श्ख्य्च्ुशख््ञ्ख्ञच़््््््ंश्»्आओओओ॥आओओओखऊ:ड:::ड:िफडसअस उइउ उइइड लक 4 ऊडइकइकइअइक्अइस्: हरमाााा०० २ कक बंमााक
उन्हें गौओंकों खानेके लिये दे दे अथवा जलमें डाछ दे |
तत्पश्चात् पुण्याहवाचन करके खजनोंके साथ भोजन करे |
दुसरे दिन प्रातःकालू उठकर शुद्ध बुद्धिवाला साधक
उपवासपूर्वक ज्त रक््खे | काख ओर उपस्थके बालेको छोड़-
कर रोष सभी बाल मुड़वा दे, परंतु शिखाके सात-आठ बाल
अवश्य बचा ले | फिर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहिनकर
शुद्ध हो दो बार आचमन करके मौन हो विधिवत् भस्म धारण
करे | पुण्याहवाचन करके उससे अपने-आपका प्रोक्षण कर
बाहर-भीतरसे शुद्ध हो होम) द्रव्य और आज्ना्यकी दक्षिणाकरे
द्रव्यको छोड़कर शेष सभी द्रव्य महेश्वरापेण-बुद्धिसे ब्राह्मणों
ओर विशेषतः शिवभक्तोंको बाँट दे । तदनन्तर गुरुरूपधारी
शिवके लिये वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे प्रथ्वीपर दण्डवत्-प्रणाम
करके डोरा, कोपीन) वस्त्र तथा दण्ड आदि जो धोकर पवित्र
किये गये हों, धारण करे | तदनन्तर होमद्रव्य ओर समिधघा
आदि लेकर समुद्र या नदीके तटपर, पर्बंतपर; शिवालयमें,
वनमे अथवा गोशालामें किसी उत्तम स्थानका विचार करके
वहाँ बैठ जाय ओर आचमन करके पहले मानसिक जप करे ।
« फिर ४» नमो अहयणे” इस मन्त्रका तीन बार जप करके “अप्लि-
मीछे पुरोहितम? इस सन्त्रका पाठ करे | इसके बाद “अथ
महाब्रतम?, 'अभियें देवानाम?, 'एतस्य समाम्नायस?, “3० इछे
त्वोर्जे ववा वायवस्थः, “अग्न आयाहि वीतये? तथा :शं नो देवी-
“४77 >+<-६&&#<-००+२
रभीष्टये? इत्यादिका पाठ करे | तलश्रात् पमयरसतज्ञभ
ने ल ग? 'पशञ्चसंवत्सममयम?, 'समाम्नायः समास्नातः, 'अथ
शिक्षां प्रवक्ष्यामिः, 'बृद्धिरादेचः, 'अथातो धर्मजिश्ञासा), 'भयाते
बह्मजिज्ञासाः---इन सबका पाठ करे । तदनन्तर यथात्म्प्त
वेद; पुराण आदिका खाध्याय करे। इसके बाद “»* ब्रह्मणे नमः,
८४ इन्द्राय नमः?, “४ सूर्याय नमः”, “४ सोमाय नमः), '
प्रजापतये नमः?, “४० आत्सने नमः”, “*» अन्तरात्मने नम्म/,
८७४ ज्ञानात्मने नमः?, ७» परमात्सने नमः इत्यादि रुपसे
ब्रह्मा आदि शब्दोंके आदियें ८3३०” और अन्तमें नमः? लगा
उनके चतुर्थ्यन्त रूपका जप करे | इसके बाद तीन मुद्ठी पत्तू
लेकर प्रणवक्के उच्चारणपूर्वक तीन बार खाय और प्रणव है
दो बार आचमन करके नाभिका स्पर्श करे | उस समय आगे
बताये जानेवाले शब्दोंके आदिमें प्रण/ और अन्त बम
स्वाह्? जोड़कर उनका उच्चारण करे। यथा--#* भाक्षने
नमः स्वाहा?, “3» अन्तरात्मने नमः स्वाहा), “3” ज्ञानाक्मने
नमः स्वाहा? “3 परमात्मने नमः स्वाहा”, “ड* प्रजापतमे
नमः स्वाह?, इति | तदनन्तर प्रथक्-वरथक् प्रणवमन्त्रते# |
दूध-दही मिले हुए. घीको ( अथवा केवल जलको ) तीन
बार चाटकर पुनः दो बार आचमन करे | इसके बाद मन
'स्थिर करके सुस्थिर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठकर शाल्लोक
विधिसे तीन बार प्राणायाम करे । ( अध्याय १२)
सन्यास्ग्रहणकी शास्त्रीय विधि---गणपति-पूजन, होम, तच-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश,
५ $ शी
स्वसंन्यास ओर दण्ड-धारण आदिका प्रकार
रुकन्द कहते है--वामदेव | तदनन्तर मध्याह्काल्में
स्नान करके साथक अपने मनको वश्चमें रखते हुए, गन्ध पुष्प
और अश्षत आदि पूजा-द्रब्योंकी ले आये और नेऋग्यकोणमें
देवपूजित विष्नराज गणेशकी पूजा करे | “गगानां सवा? इत्यादि
मन्त्रसे विधिपूवेक गणेंशजीका आवाहन करे | आवाहनके
पश्चात् उनके खरूपका इस प्रकारं ध्यान करना चाहिये।
उनकी अज्ञकान्ति छाल है; शरीर विद्याल है। सब प्रकारके
आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैँ। उन्होंने अपने कर-कमलॉमें
क्रमशः पाद्य) अड्डा) अक्षमाल्ा तथा वर नामक मुद्राएँ घारण कर
रक््खी हैं | इस प्रकार आवाहन और ध्यान करनेके पश्नत
शम्सुपुत्र गजाननकी पूजा करके खीझः पूआ। नारियिठ औ
गुड़ आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदन करे । तलश्रात् वाद!
आदि दे उन्हें संतुष्ट करके नमस्कार करे ओर 'आपने अभी
कायकी निर्विष्न पूर्तिके लिये प्रार्थना करे ।
तदनन्तर अपने गह्मसून्नमें बतायी हुई विधिके अर
औपासनाग्निमें आज्यमागान्ना हवन करके अग्निदेवतातलर
यजशविषयक स्थालीपाक होम करना चाहिये | इसके मई.
लय तथा बर नामक मुद्राए धारण कर “भू: स्वाहा? इस मन्त्रसे पूर्णाहुति दम क्र | मन्त्रसे पूर्णाहुति होम करके इंवनका #
ब के है ख्खि | तृतीय
# पर्मसिन्धुकारने इसके छिये तीन मन्त्र लिखे हैं । प्रथम वार चाटकर कहे---“त्रिवृदसि”, द्वितीय वार शरददसि' और दें ः
बार धविवृदर्सि!
!
प्रकट कब ने १8 तर ग्निग +अमकि तियाँ न 8 8 क है| उदयन
कुशकण्टिकादे। अनस्तर अग्नि जो चार आहुतियाँ दी जाती दें; उनमें प्रथम दोको 'आधार' और अन्तिम दोकी हट
ब्भ. ची. न नौ का बिक
फ्द्द्त
दूं । प्रजापती और दन्द्के उरृंश्यसे “भाबार! तथा अग्नि और सोमके उद्दे इयसे “आज्यभाग” दिया जाता ई ।
उ्नात करें । आठल्य्यरहित बाण) कल कण कह
गयत्री-मत्त्रकी जे करता रहे । तदनन्त- स्नान करके सर्य-
बालकों तथा उपासनासम्बन्धी
निलदोम आदि, करके मोन हो आशा छे चर पकाये |
फिर अग्नि समिधा चचद और धीकी से और सद्यो-
जतादि पाँच मन्लेसि ४: करके | अग्नि उर्मा-
पहित महेँश्वर्की भावना करे. और गौरीदेवीका चिन्तन करते
हुए. 'गौरीमिंमाय #' इस मन्त्रसे एक सौ आठ बार होम करके
'बग्तये स्विथ्कृते स्वाहए ई7 मन्त्रसे एक वार आहुति दे ।
आमनपर बैठकर
द्रक्षमुहुते अनितंक गायत्रीका जप करता रे । इसके बोर्ड
लान करे । जो जल्से स्नान करनेमे
कुशपर खले । पुनः घींसे चस्को मिश्रित करे । इसके वीर
ग्राहुति मन्त्र) रुद्रसक्त तथा सद्योजातादि परचि मन्त्रोका
फोर और इनके दाण एकण्ला आहुति भी दे । चित्तकी
भावान् शिवके चरणारविन्दर्म छशकर प्रजापति इन्ह? विश्वे-
देव और बद्याके लिये भी एक-प्क आहति दे । ईन सबके
पके आदिम अं» और अन्त
चुतुर्णन्त उच्चारण करे यथा---#* प्रजापतये नमः स्वाहा--
दि ) | तलश्ात् पुण्याहवाचन कराकर “अग्नये स्वाहा
(म झ्वते अग्निके मुखमें आहति देनेतर कार्य सथत्न
४$६॥ फ़िर प्राणाय स्वाहा! इत्यादि पॉच मन्त्रोंद्वाण घुतसद्दित
नए आहुति दे । इसके बाद “अग्लग्रे स्विष्ठह्ूते स्वाद
ईद एक आहुति और दे । तदनन्तर फिए पहवर तथा
डे पान गन््त्रेंका जप करें । मदेशादि च॒व्यूद्द मन््त्रीका
हे री]
* 05 कर। इस प्रकार तन्न्र-दीम करके अपन
६दमन पुरय साज्ज ऐम क्रे्
भरते प्ररतित किया गया दै। उसका निर्वाह करके विस्ज
आर तल न । उद्यीमस तचरूप इसे शरीरमें छिपे ५.
क्ः
हि रश रू रत परदार १--मौरामिमाव सलिलानि तरत्पेक
.६ ६5 का सतुधरी । अछयपदी सपररी बनूवु
सदत्यप्षण
5३, ६3, 3... रे न >प् ४२५ मं ज्कजक 5
! आंच बच, नह १ (् ए्ग्देद ज० | ख्० र् चर, | डे २ )
३४ हे
६१७ (७ [०७ ७४५--५
तत्व-समुदायकी शुद्धिके लिये विरजा होम करना चाहिये ।
डुस समय यह कह्दे कि “मेरे रीर्में जो ये
इन सबको शुद्धि हो |) हरे ;
लिये आरुणकेतुक मन्त्रोंका पाठ करते हुए उध्वी आंद तच्वसे
लेकर पुरघतत्वप्यन्त क्रमशः सभी तत्वोंकी शुद्धिता निमित्त
हूं, उन्हे
कहा गया दैं.। उन नाम ये दै--निर्यति) गे? राग) विदा
ओर कली । ये पॉनचों मायासे उलनन््न हू 'मार्या 5 प्रक्भति
विद्या? । ईस श्रुतिम प्रदत ही माया कंदी गयी ट्। उससे
तस्वोंको जानमिवाल को ९ हल
च्वॉकों ने ४ बाला विद्वान, भोचेड ही कंद्द गे: | ह
मियाते प्रकृतिसे नीच पर यह पुर प्रकतित | पर
८ + न. ए्की रे जे सु >> का उम्र ये न. गे उप बढ 5 सा हक
ट || ज््सत का५ि.। छ्- ्। गज 5446 5 ८७७४ है इसत
स्द्द्ती ८) उसी प्रकार प्रद्धई 4 #त आर 5 ॥ त॑ मा डः पाल
जन कैच
कर जन्न्क रा तनकार जन पाए है का धन, हु रे श्र के न श्
उदा 3५४ 32 &40 25 55 40 2 रु ;
कक च्या बजा करी जज क्र बन ड ड़ क पि कि
चज्युर हट आऋाउ्यरर साद- फंड ०4५ +॥ >>. 3. >्क३े हा है ९९: ८2९६
सना ऋचा २००४ 7 एझऋ 5४5 जप
४3३७
प्रतिपादित हुआ है । मुनीश्वर | प्रथ्वीसे लेकर शिवपय॑न्त जो
तत्त्वसमूह है, उसमेंसे प्रत्येकको क्रमशः अपने-अपने कारणमें
लीन करते हुए उसकी झुद्धि करो | ( १ (्रथिव्यादिपश्चक,
२ दब्दादिपश्चक, ३ वागादिपश्वक, ४ शभोत्रादिपश्चक,
५ शिरआदिपश्लक, ६ त्वगादिधातुसप्तक, ७ प्राणादि-
पञ्चक, ८ अज्नमयादिकोशपञ्चक ९ मन आदि पुरुषान्त
तत्व+. १० नियत्यादि तत्त्वपञ्चक ( अथवा पद्चकड्चुक )
ओर ११ शिवतत्वपञ्चक--ये ग्यारह वर्ग हैं; इन एकांदश-
वर्गंसम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें “ परस्मे शिवज्योतिषे इद न मम!
इस वाक्यका उच्चारण करे# | इसके द्वारा अपने उद्देश्यका
त्याग बताया गया है ।
इसके बाद ५विविद्या? तथा “कर्षोत्क” सम्बन्धी मन््त्रोंके
अन्तमें अर्थात् विविद्याये स्वाहा? 'कर्षोत्काय स्वाहा! इनके
अन्तमें खत्वत्यागके लिये “व्यापकाय परमात्मने शिवज्योतिषे
विश्वभूतघसनोत्सुकाय परस्मे देवाय इृदं न मस! इसका उच्चारण
करे | तत्पश्चवात् “उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे ) उप
प्र यन््तु मरुतः सुदानव इन्द्र ग्राशुभवा स था? इस मन््त्रके
अन्तमें (विर्वरूपाय पुरुषाय ४» स्वाहा? बोलकर खत्व त्यागके
लिये “लोकन्नयव्यापिने परमाव्मने शिवायेदं न सम? का उच्चारण
करे | तदनन्तर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिसे पहले
तन्त्र-कर्मका सम्पादन करके घुतमिश्रित चरुका प्राशन एवं
आचमन करनेके पश्चात् पुरोधा आचार्यको सुवर्ण आदिसे
सम्पन्न समुचित दक्षिणा दे ।
फिर ब्रह्माका विसजेन करके प्रातःकालिक उपासना-
सम्बन्धी नित्य होम करे | इसके बाद मनुष्य “सं मा सिद्चन्तु
मरुतः? इस मन्त्रका जप करे || तत्यश्वातू--“या ते अग्ने
# यथा---०पृथिव्यादिपन्नक॑ मे शुद्ध्यतां ज्योतिरद्धं विरजा
विपाप्मा भूयास< स्वाह्य--“प्थिन्यादिपश्नकाय परस्मे शिवज्योतिषे
शरद ने मम ।!
। धर्मसिन्धुकारने कद्दा दे कि “सं मा सिश्चन्तु मरुतः इस
मन्त्रसे अग्निका उपस्थान करके उसमें काप्ठमय यश्ञपात्रोंकी जला
दे । यदि पात्र तेजस थातुके हों तो उन्हें आचार्यकों दे दे ।
पूरा मन्त्र और उसका अर्थ श्स प्रकार है--
सं मा सिल्न्तु मरुतः समिन्द्र: सं बृहस्पति: ।
सं मायमरिनः: सिन्॒त्वायुवा च पनेन
च बेन चायुष्मन्त॑ करोतु मा।
अर्थात् मदतण, इन्द्र, बृदइस्पति तथा अग्नि--ये समी देवता
यज्षिया तनूस्तयेह्यारोहात्मात्मानम्#” इत्यादि मन्त्र
हाथको अग्नि्में तपाकर उस अग्निको अद्वेतधाम-खरूप अपने
आत्मामें आरोपित करे | तदनन्तर प्रातःकालकी संध्योपामना
करके सूर्योपस्थानके पश्चात् जलाशयमें जाकर नाभितक
जलके भीतर प्रवेश करे । वहाँ प्ररुन्नतापृबंक मनक्ो
स्थिरकर उत्सुकतापूतक वेदमन्त्रोंका जप करे ।
जो अग्निहोत्री हो, वह स्थापित अम्निर्मे प्राजापलन-
इृष्टि? करे तथा वेदोक्त वेश्वानर स्थालीपाक होम करके उसमें
अपना सब कुछ दान कर दे । पूर्वोक्तरूपसे अग्निका आत्मा
आरोप करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय । मुनीश्वर ! फि
वह साधक निम्माड्लितरूपसे ध्साविन्री-प्रवेश! करे---
मुझपर कल्याणकी वर्षा करें | ये अग्निदेव मुझे आयु) शात-
रूपी धन तथा साधनकी शक्तिसे सम्पन्न करें। साथ ही मुझको
दीघेजीवी भी बनायें ।
# पूरे मन्त्र और अथ॑ यों हैं--
या ते अग्ने यशिया तनूस्तयेश्ारोहत्मात्मानम् ।
अच्छा “वसूनि कऋृण्वन्नस्ये नर्या पुरूणि॥
यशो भूत्ता यज्ञममासीद स्वां योनिम् ।
जातवेदीं झुव आजायमान: सक्षय हि ॥
“दे अप्निदेव ! जो तुम्दारा यश्षिय ( यश्ञोमें प्रकट होनेवाण )
खरूप है, उसी खरूपसे तुम यहाँ पधारों और मेंरे लिये कहते
मनुष्योपयोगी विशुद्ध घन ( साधन-सम्पत्ति ) की सृष्टि के हुए
आत्मारूपसे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ | ठुम्त बरढ।
होकर अपने कारणरूप यश्ञमें पहुँच जाओ | दे जातवेदा '
तुम पथिवीसे उत्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पषारों !
! वहाँ जल लेकर उसे धआशुः शिशानः रह पूल
अभिमन्त्रित करके '्सर्वाम्यों देवताम्यः खाद्य! ऐसा कहकर की
दे । फिर संन्यासका संकल्प ले तीन वार जलाअति दे | ड
मन्त्र इस प्रकार दें--४० एप हू वा अग्नि: सूर्य: प्रा
स्वाह्द ॥ १ ॥ * स्थां योनि गच्छ खाह्य ॥ २॥ आए
वे गच्छ खाद्य ॥ ३ ॥ ( पर्मसिन्धु )
| ध्यदिष्टं य्त् पूतः यत्चापयनापदि प्रजापती हर
जुद्दोमि विमुक्तो & का (
जुद्दयेमि । 5६ देवकिल्विपात्खाह! ऐसा के धो
॥
आहुति दे---<दं प्रजापतये न मम”! कहकर त्याग
प्राजापत्येष्टि द ।
हे
साविती रु * 2.3 आदि
कैल/|ससंदहिता | # सखाविच्नी-प्रवेश, सर्वेसंन्यास ओर दृण्ड-धारण आदिका प्रकार 5 ४३२५
निशशिशिमिशशिमनिनिशिमिलीमि नमक जनक नल न कक आन लुनुु ता मामा बाण #ककक का गंक्रपक पकंमभामकभक यमन कक न कमकममक भकमककक कक कक भकम यथा कंभभ कामना था भाभभ अं भअअभअअभाअााअ अत भअआआभआभआकझ
% भू: सावित्री प्रवेशयामि 3 तत्सवितुव रेण्य स््ू , 3»
मुद्ः सावित्री प्रवेशयामि& भर्गों देवस्य धीसमहि, ३४ स्वः
प्रवेशयामि घियी बिक. ऐ#] भुव +
प्तावित्री श्रवेद घधियो यो नः प्रचोदयात्, ** भू भुवः
छः सावित्री प्रवेशयामि, तत्सवितुवरेण्यं भर्गों देवस्य 'धीमहि
वियो यो नः प्रचोदयात् ।!
--इन वाक्योंका प्रेमपूर्वक उच्चारण करे ओर चित्तको
चश्चल न होने दे |
उस समय गायन्नीका इस प्रकार ध्यान करे--ये
भगवती गायत्री साक्षात् भगवान् शंकरके आधे शरीरमें
वास करनेवाली हैं | इनके पाँच मुख ओर दस भुजाएँ हैं ।
पै पंद्रह नेत्रोंसे प्रकाशित होती हैँ | नूतन रत्नमय किरीय्से
जग्मगाती हुई चन्धलेखा इनके मस्तककों विभूषित करती
है । इनकी अज्ञकान्ति शुद्ध स्फटिक मणिके समान उज्ब्वल
है। ये शुभलक्षणा देवी अपने दस हाथोंमें दस प्रकारके
आयुध धारण करती हैं | हर, केयूर ( बाजूबंद » कड़े)
करपनी ओर नूपुर आदि आभूषणोंसे उनके अज्ञ विभूषित
६। इन्होंने दिव्य वच्र धारण कर रक्खा है। इनके सभी
भाभूषण र्ननिमित हैं | विष्णु, ब्रह्मा, देवता, ऋषि तथा
। गन्धवराज और मनुष्य ही सदा इनका सेवन करते हैं । ये
: सवव्यापिनी शिवा सदाशिव देवकी मनोहारिणी घमपत्नी
ई। पमृण जगत्की माता, तीनों छोकोंकी जननी) त्रिगुणमयी,
निर्गुणा तथा अजन्मा हूँ | इस प्रकार गायत्री-देवीके स्वरूपका
तन करते हुए शुद्धनुद्धिवाला पुरुष ब्राह्मणत्व आदि प्रदान
रनेवाली अजन्मा आदिदेवी त्रिपदा गायन्रीकां जप करे ।
पत्नी न्याइतियोंसे उसन्न हुई हैं और उन्हींमें लीन होती
६ | व्याइतियों प्रणवयसे प्रकट हुई हैं और प्रणवर्मे दी
प्राप्त होती हूं । प्रणव सम्पुणे वेदोंका आदि है | वह
पक्ष वाचक, मन्त्रोंका राजाधिराज, महावीजखरूप और
४४ भन्य है । शिव प्रणव है और प्रणव शिव कहा गया है
४ दाच्य और याचकर्मे अधिक भेद नहीं होता
तु
5 ५१] ञ्ञश्प्णु झरते र्ते ऐ
कै जलने ४
पारशामि' पाठ ६ ॥
. ) शदामन्तकों काशीमें शरीर-त्याग करनेवाले जीवोंके
) पीट उन्हें चुनाकर भगवान् शिव परम मोक्ष प्रदान
*९। इसलिये श्रेष्ठ यति अपने हृदयकमलके मध्यमें
"उनभान एफालर प्रणवरूप परम कारण शिव देवकी
० रत ् | दूस्तर भुम्ुस्ु) घीर एवं विरक्त लोकफिक
“पते विपयोका परित्याग करके प्रणवल्ू्प परस
अप०> उमा उनपर पाक सामनएमानभानभभक मानक पेज पर हमर मकर पिन करन पक पर पेन नमन आर पे. पेन फ अनी पारी पकारिनेममीम नी न नम अर अमन पानी फनी मनी पर री सम नी नरमी नीच चसि_चचल्च्च्चच््््चिच्च्च््च्च्च्चत्िि -चचचचचचचकलजिओन+
अर फनी "रमन अमान
इस प्रकार गायत्रीका शिववाचक्र प्रणवर्मे लय करके
“अह वृक्षस्य रेरिवा७? इस अनुवाकका जप करे | तत्यश्वात्
'यरछन्द्साम्टपभः? ( तेत्तिरीय १ | ४ | १ )--इस अनुवाक-
को आरम्मसे लेकर" * “श्र में गोपाय” # तक पढ़कर कहे
'दारे षणायाश्र वित्तेषणायाश्र लोकेपणायाश्र व्युत्थितो5हम
अर्थात् भमें छ्ीकी कामना, धनकी कामना ओर लोकोंमें
ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ |? मुने | इस वाक्य-
का मन्द, मध्यम ओर उच्चस्वर्से क्रमशः तीन बार उच्चारण
करे | तत्यश्नात् सृष्टि, स्थिति ओर लयके क्रमसे पहले प्रणब-
मन्त्रका उद्धार करके फिर क्रमशः इन वाक्योंका उच्चारण
करे-- ४० भू: संन््यस्तं मया? '<» भुचः संन्यस्तं मया!
# अहं वृश्षस्थ रेरिवा | कीर्ति: पृष्ठ गिरेरिव । ऊध्व॑पवित्रों
वाजिनीव समृतमस्ति । द्रविणं सवर्चसम् । सुमेधा अन्तोश्षितः | इति
तिशक्वेंदानुवचनम, । ( तेत्तितयोप० १ । १० । १ )
भें संसार-बृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ, मेरी कीर्ति पर्वतके
शिखरकी भाँति उन्नत है; अन्नोत्यादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे
उत्तम अमृत हे, उसी पकार मैं भी अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप
हूँ तथा में प्रकाशयुक्त पनका भंडार हूँ, परमानन्दमय अमृतसे
अभिषिक्त तथा श्रेष्ठ बुद्धिवाला हूँ--शस प्रकार यह निशरु
ऋषिका अनुभव किया छुआ वंदिक प्रवचन
| यरछन्दसामूपभो विश्वरूप: । धन्दोस्यो5ध्यनूतात्सम्बभूव ।
स मेंन्द्रों मेपया स्पृणोतु । अमृतस्य देव पारणों भूयासन् । श्र में
विचर्पणम् । जिद्ा में मघुमतमा । कर्णोर्न्या भूरि विशवन् ।
बद्मगः केशोंडसि मेषया पिद्दित: #ुर्त में गोषाव ।
जो वेदोमें सर्वश्रेष्ठ ५, स्वरूप ५ और सझस्ख्ूप उदीस
प्रधानरूपमें प्रछट हुआ द वह सदझय खानी पररममबर मुझ शरदा-
युक्त बुद्धिसि सम्पन्न करें । है कत/ ज आधेक) आयात अप गो
परमात्माओं अपने दृदयमें पारग उ्रनेगराडा इस हज + नण
शयर विशेष फुतोडा-संत प्र्ए्स रंगरांद" दे और भरी
डिद्ठा अतिशय मउुमठी ( मसल ) ही »ाप 4 525)!
कार्नेदारा अपिक दुनता रहे । ( दे आग ; व. 3 दजिक $इादने
दी दुई परमात्मायं निधि ॥ | 6, में ढुने ईंट अ्पक
रत कर ।
3३६
८३ सुचः संन््यस्त॑ मया? “छ भूभुवः सुचरः संनन््यरुतं मया?#
इन वाक्योंका मन्द। मध्यम ओर उच्चस्वसर्से ह्ृदयमें
सदाशिवका ध्यान करते हुए सावधान चित्तसे
उच्चारण करे | तदनन्तर “अभ्यय॑ सवभूतेभ्यो मत्तः
स्वाह! ( मेरी ओरसे सब प्राणियोंकों अभयदान दिया
गया )--ऐसा कहते हुए पूर्व दिशामें एक अज्ञलि जछ लेकर
छोड़े । इसके बाद शिखाके रोष बालोंको हाथसे उखाड़ डाले
ओर यशोपवीतको निकालकर जलके साथ हाथमें ले इस
प्रकार कहे--ओं भू: समुर्द गच्छ स्वाहा! यों कहकर
उसका जल्में ही होम कर दे । फिर “४ भू; संन्यस्त
मया! “८७ भ्ुवः संन्यस्तं मया? “४» सुबः संनन््यस्तं मया”
“इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलको अभिमन्त्रित
करके उसका आचमन करे । फिर जलाशयके किनारे
आकर वस्त्र ओर कटिसूत्रको भूमिपर त्याग दे तथा उत्तर
या पूवंकी ओर मुँह करके सात पदसे कुछ अधिक चले ।
कुछ दूर जानेपर आचार्य उससे कहे, ८ठहरो, ठहरो भगवन् !
लोकव्यवह्रके लिये कोपीन ओर “दण्ड स्वीकार करो ।?
यों कह आचार्य अपने हाथसे ही उसे कटिसूत् ओर कोपीन
देकर गेरुआ वस्त्र भी अर्पित करे । तत्पश्नात् संन्यासी जब
उससे अपने शरीरको ढककर दो बार आचमन कर ले तब आचार्य
उस शिष्यसे कहे--“इन्द्रस्य वज्ञोडइसि! यह मन्त्र बोलकर
दण्ड ग्रहण करो |? तब वह इस मन््त्रको पढ़े और “सखा
मा गोपायोजः सखा योअ्सीन्द्वस्य वज्ो5सि वाज्नंष्नः शर्म में
भव यत्पापं तन्निवारय[ |--इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए
दण्डकी प्रार्थना करके उसे हाथमें ले । ( तलश्वात् प्रणव
या गायत्रीका उच्चारण करके कमण्डछ अहण करे। )
तदनन्तर भगवान् शिवके चरणारविन्दका चिन्तन करते
हुए गुरुके निकट जा वह तीन बार प्रथ्वीमें छोटकर दण्डवत्
# मेने भूलोकका संन्यास ( पूर्णतः त्याग ) कर दिया |
मेने भुवः ( अन्तरिक्ष ) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैने
खर्गलाकका भी सर्वया त्याग कर दिया । मैंने भूल्लोक, भुवर्लोक
और खर्गलोक--श्न तीनोंकों मलीमाँति त्याग दिया ।
हे दण्ड ! तुम मेरे सा ( सद्यायक ) हो, मेरी रक्षा
करो । मेरे ओज ( प्राणशक्ति ) की रक्षा करो । तुम वही मेरे
सखा दो, जो इन्द्रके हाथर्मे वज्रके रूपमें रहते हो । तुमने हो
वजरूपसे आधात करके वृत्रासुरका संहार किया दे | तुम मेरे लिये
कृल्याणमय बने । मुझमें जो पाप दा, उसका निवारण करो ।
; द
# नमो उद्गाय शान्ताय ब्रह्मण परसात्मने %
कमकम्काकमकमकमकष्फथकथ्कम्कपकम्कन्ककम्फनकंग्कप्एम्कथ्कंगकल्कपकपकंगकपहमकमकमकमकृम्कमपकहकमककम्कमपकापकम कम करक०पकपक्पकथ कम पाव कम कम कम कम कण कम कम कानक कक कम कम कृमकम कक उाक+ यम हंगग कम रकाकम़गलफरश मरी कार पतन मन अल दककीकि कई
[ संक्षित-शिवएुराणा३
प्रणाम करे | उस समय वह अपने मनको पूर्णतया संबमगे
रक््खे । फिर धीरेसे उठकर प्रेमपूवक अपने गुरुकी ओर देखते
हुए हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप खड़ा हो जाय । पंयाप्त-
दीक्षा-विषयक्र॒ कमे आरम्म द्वोनेके पहले ही शुद्ध गोद
लेकर आऑँवके बराबर उसके गोले बना ले ओर सूफी
किरणोंसे ही उन्हें सुखाये | फिर होम आरम्म होनेपर उन
गोलोंको होमाग्निके बीचमें डाछ दे | होम समाप्त होनेपर
उन सबको संग्रह करके सुरक्षित रखे । तदनन्तर दष्ड-
धारणके पश्चात्, गुर विर्जाग्निजननित उस श्वेत भव
लेकर उसीको शिष्यके अज्ञोंमें लगाये अथवा उसे .छगाने
आज्ञा दे। उसका क्रम इस प्रकार है--<* अम्रित
भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म ख्थलमिति भस्त व्योभेति
भस्म स्वंध हु वा इदं भस्_्॒र मन एताति चक्षषपि'
इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे । तदनन्तर ईशानादि
पाँच मन्त्रोंद्रार उस भस्मका शिष्यके अज्ञोंसे स्पर्श कंगक
उसे मस्तकसे लेकर फ्रोंतक सर्वाज्ञमें लगानेके लिये दे दे। क्
शिष्य उस भस्मको विधिपूर्वक हाथमें लेकर . 'व्यायुषम"+
तथा “व्यम्बकम०7]? इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढ़ते
हुए. ललाट आदि अज्ञोमें क्रमशः त्रिपुण्ड धारण करे )
तलश्रात् श्रेष्ठ शिष्य अपने छृदय-कमलमे विराजमान
उमासदहित भगवान् शंकरका भक्तियुक्त चित्तसें ध्यान कर!
फिर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ रखकर उसके दाने
कानमें ऋषि, छन्द ओर देवतासह्वित प्रणवका
करे । इसके बाद कृपा करके प्रणवके अर्थका भी वोप
कराये । श्रेष्ठ गुरुको चाहिये कि वह प्रणवके 8: प्रकाएे
अर्थका ज्ञान कराते हुए. उसके बारह भेदोंका उपदेश दे ।
तत्पश्चात् शिष्य दण्डकी माँति एथ्वीपर पढ़कर गुदक।
साष्टाज्ञ प्रणाम करे और सदा उनके अधीन रहे) उनकी
आशके बिना दूसरा कोई कार्य न करे । गुरकी आशते हि!
वेदान्तके तातल्यके अनुसार सगुण-निगगुंण-मेदर्स शिव
ज्ञानमें तत्पर रहे | गुरू अपने डसी शिष्यक्र द्वार ५५
र्ड
# च्यायुप॑ जमदग्ने: कश्यपस्य च्याइुपत । ५
यदेवेपु. व्यायुप॑ तशोइसु. व्यायुपम ॥
( यजुर्वेद १। ६१)
| व्यम्वक॑ यजामहे सुगन्धि. पृथिवर्धनम ।
न्मृत्योमुश )
उर्वार्कमिव वन्पनान्मृत्योमुश्षीय. माशता4 ॥| ््ि
( यजुबेंद ३। ६“!
#लांससंदिता |
प्रनन और गिदिध्यासनपूर्वक जपके अन्तमें प्रातःकाल्कि
श्रादि नियमोंका अनुश्ठान करवाये । केल्मसप्रस्तर नामक
प्रण्डढमें शिवके द्वारा प्रतिपादित मार्गके अनुसार शिष्य वहीं
हकर शिवपूजन करे । यदि ग्रुरुके आदेशके अनुसार वह
प्रतिदिन वहीं रहकर मड्भलमव देवता शिवकी पूजा करनेमें
अम्मर्थ है| तो उनसे अर्घांसहित स्फटिकिमय शिवलिज्ञ
ग्रहण कर ले ओर कहीं भी रहकर नित्य. उसका
पूजन किया करे | वह गुरके निकट शपथ खाते
# पणवके अथांका विवेचन #
3२७
हुए इस तरह प्रतिज्ञा करे--५्मेरे प्राण चले जायें;
यह अच्छा है | मेरा सिर काट लिया जाय यह भी अच्छा है;
परंतु में भगवान् त्रित्लेचनकी पूजा किये बिना कंदापि भोजन
नहीं कर सकता |? ऐसा कहकर सुदृढ़ चित्तवाला शिष्य मनमें
शिवकी भक्ति लिये गुरके निकट तीन बार शपथ खाय और
तभीसे मनमें उत्साह रखकर उत्तम भक्तिभावसे पशद्चावरण-
पूजनकी पद्धतिक्रे अनुसार प्रतिदिन महादेवजीकी पूजा करे |
( अध्याय १३ )
प्रणवके अर्थोका विवेचन
वामदेवजी बोले--भंगवन् | घडानन | सम्पूर्ण विशान-
भय अमृतके सांगर | समस्त देवताके स्वामी महेश्वरके पुत्र !
प्रणतातिके मज्ञन कातिकेय | आपने कह्म है कि प्रणवके छः
प्रकारके अर्थोका परिशान अभीष्ट वस्तुकों देनेवाला है | यह
8: प्रकारके अर्थोका शान क्या है! प्रभो | वे छः प्रकारके
अर्थ कोन-कोन-से हैँ ओर उनका परिज्ञान क्या वस्तु है !
उनके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु क्या है और उन अर्थोका परिशान
शैनेपर कोन-सा फल मिलता है ? पारवतीनन्दन ! मैंने जो-जो
पते पूछी हैं, उन सबका सम्यकरूपसे वर्णन कीजिये |
सुन्नह्मण्य स्कन्द वोले--मुनिश्रेष्ठ | तुमने जो कुछ
पृष्ठा $ उसे आदसपूर्वक सुनो | समष्ठि और व्यश्मिवसे
प्रहेधरका परिशान ही प्रणवार्थका परिशान है। मैं इस विपयको
विस्तारफे साथ कहता हूँ | उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले
पुनीश्र ! मेरे इस प्रवचनसे उन छः प्रकारके अ्थोंकी एकता-
ग भी बोध होगा । पहला मन्त्ररूप अर्थ है, दूसरा यन्त्रभावित
हट ईै तीसण देवताबोधक अथ है, चोया प्रपद्चरूप अर्थ है;
क आ थ॑ गुदके रूपको दिखानेवाल्य है और छठा अर्य
“पक खल्पका परिचय देनेवाला है | इस प्रकार ये छः
+प॑ बताये गये | मुनिश्रेठ | उन छहों अर्थोर्में जो मन्त्ररूप
हे रची उसड्नी तुम्ह॑ बताता हूँ | उसका शान दोनेम त्र्से
“3२ भशरानी हो जाता है। प्रणवमें वेदोंने पाँच अक्षर
१४५४६ | १एटा आदिखर--प्अ), दुसरा पाँचवों खर--प्उ?;
मय पंधस पसे परदर्गका अन्तिम अक्षर प्म७/ उसके वाद
न “अर *न्दु और पाँचवों अज्षर नाद | इनके सिवा दूसरे
पाई हे | 5६ समध्िरुप वेदादि ( ध्रणव ) कहा गया है ।
५. “उंपकी सममाधल्प है विन्दुयुक्त जो चार अब्वर हैं,
छू 5.
हि. ५५. १-६७ ५ रु न
३ ७ तर कि +जतज चर
है 8 4 + १
चक्र प्रणय्म प्रतिष्ठित हैं |
विद्वन् ! अब यन्त्ररूप या यन्त्रभावित अर्थ सुनो | वह
यन्त्र ही शिवलिज्ञरूपमें स्थित है | सबसे नीचे पीठ ( अर्घा )
लिखे । उसके ऊपर पहला स्वर अकार लिखे | उसके ऊपर
उकार अद्भित करे ओर उसके भी ऊपर पवर्गका अन्तिम
अक्षर मकार लिखे | मकारके ऊपर अनुस्वार ओर उसके भी
ऊपर अधंचन्द्राकार नाद अज्लित करे | इस तरह यन्त्रके पूर्ण
हो जानेपर साधकका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध छोता है | इस प्रकार
यन्त्र लिखकर उसे ग्रणवसे ही वेशित करे | उस प्रणवसे दी
प्रकट होनेवाले नादके द्वार नादका अवसान समझे ।
मुने | अब में देवतारूप तीसरे अर्थकों बताऊँगा) जो
सत्र गूढ़ है | वामदेव | तुम्दारे स्नेहवश भगवान् शंकरके
द्वारा प्रतिपादित उस अर्यका मैं तुमसे वर्णन करता हैँ ।
'सद्योजातं प्रपद्यामि) यहंसि आरम्म करके 'सदाशियोम? तक
जोपॉंच# मन्त्र हैं, श्रतिने प्रणको इन सबका बाचक कद्दा रे |
इन्हें ब्रह्मल््पी पाँच सूक्ष्म देवता समझना चार्टिये | इन्दींका
शिवकी मूर्तिके रूपमें भी विस्तारपृर्वक वर्णन दे | शिवफा बाचक
मन्त्र शिवमूर्तिका भी वाचक दे। क्योंकि मूर्ति और मृतिमागसें
अधिक भेद नहीं है। “इंशान मुकुयेपेत:र इस इठोकहूसे आरम्भ
करके पहले इन मन्नीद्वाय शिवक्क विम्रईझ प्रतिशदन किया
जा चुका दे | अब उनके पॉच मुखोझा वर्णन लुनो । पद्धस
मन्त्र 'ईशानः सर्वविद्यानाम! को आदि सानकर वर्से डेद्धर
ऊपरके 'सप्ोज्ञात' मन्त्रतक ऋमश: एड चढ़ने अत दर ।
पिर 'सच्चोजात! से लेदर ईुद्याना मन्त्रतद्ध हा उद्ों
चकमें अद्धित करें | ये दी पॉच भगदान् आप पंच सुस्त
्... ऋड- | की उप लि पक के-- > ८ न ल््ूः “4 7 कि
दतावे गये हैं। परूपते केट्ूर सयोहाटतंड मा अदला चार
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# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाह
च्च्ुच्अ््जजश्श्य्स्य्््््ख्थ््य्य्््््ण्ण्ख्ण्ख््ज््््््ख्ल्ऊ्श्लजल््लपाा.ााासासाआासआ-
“इंशान? मन्त्र सद्योजातादि पांचों मन्त्रोंका समश्रिप है | मुने !
पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो चार मन्त्र हैं; वे ईशान देवके
व्यश्टरिप हैं ।
इसे अनुग्रहमय चक्र कहते हैं | यही पश्चार्थका कारण है |
यह सूक्ष्म, निर्विकार, अनामय परत्रह्मखरूप है | अनुग्रह भी
दो प्रकारका है | एक तो तिरोमाव आदि पॉच# कृत्योंके अन्तर्गत
है, दूसरा जीवोंको कार्य-कारण आदिके बन्धनोंसे मुक्ति देनेमें
समर्थ है। यह दोनों प्रकारका अनुग्रह सदाशिवका ही द्विविध
कृत्य कहा गया है | मुने ! अनुग्रहमें भी सृष्टि आदि कृत्योंका
योग होनेसे भगवान् शिवके पॉच कृत्य माने गये हैं | इन पॉँचों
कृत्योमं भी सद्योजात आदि देवता प्रतिष्ठित बताये गये हैं ।
वे पॉचों परत्रह्मसरूप तथा सदा ही कल्याणदायक हैं | अनु-
अहमय चक्र शान्त्यतीत| कल्ारूप है। सदाशिवसे अधिष्ठित
होनेके कारण उसे परम पद कहते हैं | शुद्ध अन्तःकरणवाले
संन्यासियोंको मिलने योग्य पद यही है | जो सदाशिवके उपासक
हैं और जिनका चित्त प्रणवोपासनामें संलग्न है, उन्हें भी इसी
पदकी प्राप्ति होती है । इसी पदको पाकर मुनीश्वरगण उन
ब्रह्मरूपी महादेवजीके साथ प्रच्चुर दिव्य भोगोंका उपभोग करके
महाप्रल्यकालमें शिवकी समताको प्राप्त हो जाते हैं| वे मुक्त
जीव फिर कभी संसारसागरमें नहीं गिरते ।
ते त्रह्मलोकेघु परान्तकाले पराम्ट॒ताः परिसुच्यन्ति सर्वे ।
( मुण्डक ३ । २।६ )
--इस सनातन भ्रुतिने इसी अरथका प्रतिपादन किया है |
शिकायत“ पन्यकनम-- पहनी" पा नमन भय #ल्०+-ग+ 5 मनन पथ कभआन पमपाक नया ताककर मजा पहनकर भा >+*+5५ नह» ५ पम्प» कगार "० 2" पाक >ना ४ मा सा“
शिवका ऐश्वर्य भी यह समश्रिप ही है। अथ्ववेदकी भरत
भी कहती है कि वह सम्पूर्ण ऐवर्यसे सम्पन्न है | समूर्ण ऐश
प्रदान करनेकी शक्ति सदाशिवमें ही वतायी गयी है | चमगा-
ध्यायके पदसे यह सूचित होता है कि शिवसे बढ़कर दूसश
कोई पद नहीं है। व्रह्मपश्चकके विस्तारको ही प्रपञ्ञ कहते हैं।
इन पाँच ब्रक्ममूर्तियोंसे ही निश्नत्ति आदि पाँच कलाएँ हुई
हैं | वे सब-की-सब सूक्ष्मभूतस्वरूपिणी होनेसे कारणह्पमे
विख्यात हैं | उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले वामदेव | स्थूछ-
रूपमें प्रकट जो यह जगत्-प्रपश्न है; इसको जिसने पाँच रुपो-
द्वारा व्यात्त कर रकखा है, वह ब्रह्म अपने उन पॉचों रुप
साथ ब्रह्मपञ्चक नाम घारण करता है । मुनिश्रेष्ठ | पुरुष, श्रोत
वाणी) शब्द और आकाश--इन पाँचोंकों त्रह्मने ईशानरुपपे
व्याप्त कर रक्खा है। मुनीश्वर | प्रकृति, त्वचा) पाणि) सा
और वायु--इन पाँचको ब्रह्मने ही पुरुषरूपसे व्याप्त कर सजा
है । अहंकार, नेत्र, पैर रूप और अग्नि--ये पाँच अधोए
रूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं | बुद्धि; रसना। पायु, रस और जछू-
ये वामदेवरूपी ब्रह्मसे नित्य व्याप्त रहते हैं | मन। नाणिका।
उपस्थ) गन्ध और प्रथिवी--ये पाँच सद्योजातरूपी व्रह्मसे याप
हैं | इस प्रकार यह जगत पश्मत्रह्मखरूप है ! हर
बताया गया जो शिववाचक प्रणव है) वह नादपयंन्त पॉँवे
वर्णोका समष्टिर्प है. तथा बिन्दुयुक्त जो चार वर्ण ह वे
प्रणवके व्यष्टिरूप हैं | शिवके उपदेश किये हुए मार्गसे उर्ृ्ट
मन्त्राधिराज शिवरूपी प्रणवका पूर्वोक्त यन्त्रढ्पसे पित्त
करना चाहिये । (अध्याय १४
“"77<#>कैट ८82...
शेवदशनके अनुसार शिवतत्तत, जगत्-प्रपश्च और जीवतचके विषयमें विशद् विवेचन तथा
शिवसे जीव ओर जगत्की अभिन्नताका ग्रतिपादन
तदनन्तर उत्तम श्रेष्ठ पद्धतिका वणन करके सश्टि,
स्थिति और संहार--सवकों शक्तिमान शिवकी लीला
वतलाते हुए वामदेवरजीके पूछनेपर स्कन्दने कहा--
मुने ! कर्मास्ति तत्तसे लेकर जो विस्तृत शास््रवाद है
अर्थात् कर्म-सत्ताके प्रतिपादक कर्मफल्वादसे आरम्भ करके
करनेवाल्ा है; अतः ज्ञानवान् पुरुषको विवेकपूर्वक इसका शा
करना चाहिये | ठमने जिन शिष्योंकों उपदेश दिया कै री
कोन तुम्हारे समान हैं ? वे अधम शिष्य आज भी अया।
शासत्रोमें भटक रहे हैं | अनीस्वखादी दहानेके चकफ
पड़कर मोहित हो रदे हैं | छः मुनियोंने उन्हें शाप दे ख्वा
शा््में जो विविध विषयोंका विशद् विवेचन है; वह ज्ञान प्रदान है; क्योंकि पहले वे शिवकी निन््दा किया करते मे | *_
न व कम नम 22 2 अब मम 235 8 3 नमन लय
# सृष्टि, स्िति। संदार, तिरोभाव तथा अनुग्रद--ये महेश्वरके पाँच कृत्य हैं ।
कहाएँ पाँच इँ--निवृत्तिका, प्रतिषठाकछा, विद्याकला, श्ान्तिकला तथा श्ञान्त्यतीताकला ।
के लग बदशनके | ज्ञीवतत्त्वके अजय $ पल
#वाससंहिता ] # शैवद्शनके अनुसार शिवतत्त्वः जगत्-प्रपश्न और जीवतत्वके विषय विवेचन 5 ४३९,
रन्नयकट कक या ये आला ता ाााााााााा॥ भा आ॥्ण॥७७७७७७७/७एएरशतर७७७७७७७७ए७७एल्श"शशश४७"श॥्रशआशशशशआरणशशशनाशराररणाशरराशथशणाणशाआ॥आए॥्ार्राा॥्।।्ल्र्ा॥॥ाएशरणाणाा्राशण
उनकी वार्ते नहीं सुननी चाहिये; क्योंकि वे अन्यथावादी
(प्रिवनद्यात्नके विपरीत बात करनेवाले ) हैं | यहाँ पॉच%
अववबोंसे युक्त अनुमानके प्रयोगके लिये भी अवकाश है ही |
उत्तम ब्तका पालन करनेवाले वामदेव ! जेसे धुमका दर्शन
हनेते छोग अनुमानद्वारा पवतपर अग्निकी सुत्ताका प्रतिपादन
के हैं, उसी प्रकार इस प्रत्यक्ष प्रपश्चके दशनरूप देतुका
: अवठम्बन करके परमेद्वर परमात्माकों जाना जा सकता है;
| झमें संशय नहीं हैं ।
... यह विश्व स्री-पुरुपरूप है, ऐसा प्रत्यक्ष ही देखा जाता
: १6: कोग्मरुप जो शरीर है। उसमें आदिके तीन माताक्े
! अंशते उसन हुए. हैं ओर अन्तिम तीन पिताके अंशसे--यह
: सतिका कथन है | इस प्रकार सभी शरीणोमे स्री-पुरुषभावको
: जाननेवाले लोग हूँ। मुने | विद्वानोंने परसात्मामें भी स््री-
* पुर्णभावकों जाना है | श्रुति कहती है; परव्रह्म परमात्मा सत्/
/ चित और आनन्दरूप है | असत् प्रपश्चको निदत्त करनेवाल्ा
; शव ही सद्रूप कहा जाता है। चित्-शब्दसे जड जगतकी
: नवत्ति को जाती है | यद्यपि सत्-शब्द तीनों लिक्लेंमं विद्यमान
;. 0 पैथापि यहाँ परत्रक्ष परमात्माके आर्थमें पुँछिज्ञ सत-शब्द-
हे. मे ही अश्ण करना चाहिये । वह सत् शब्द प्रकाशका
हु
# प्रतिशा, देतु, उदाहरण, उपनय और निगमन--ये अनुमान-
. 5 पंच अवयव हैं। “वंतों वहिमान! ( पर्वृ॑पर आग दै )--
” एपरेश ई। थूमवच्ात् (क्योंकि वहाँ धूम दिखायी देता है )--
पु घर । 'जह-जहाँ घूम होता है, वहाँ-बह्ाँ आग अवश्य
५ 0 भेसे रतोईपर/--.यह उदादरण है। ध्यतो&्यं घूमवान'
( पक प६ परत पूमवानू है )--यह उपनय है। “्ञतः
“नेवानू! ( अतः अम्निसे युक्त है )- -यद निगमन दै । इसी
। परे लिये भी अनुमान द्वोता ह--यथा-'श्ित्यकुरादिक
पक ५ ही तथा अदुर आदि किसी कर्तादारा उत्पन्न
| के /774६ प्रतिश $ । धकार्यत्वात' ( क्योंकि ये कार्य हैं )--
| हे र ह "पु यत् कार्य तत्तत् करठूंजन्यं यथा घट: कुन्भकार-
|; है हर | ५ “नी दावे ६, वह किसी-न-किसी कर्तासे उत्पन्न होता ६,
बा अनरस्से उत्न्न होता ईै--पद उदाइरण छुआ । “्यतः
030 आई । हट ये एृप्वी आदि कार्य हूँ )+भेंएँ उपनय
है ४ हंस ् दाये इन- नैसे _छोगोंसे उत्पन्न दुआ
| आजर चह्ं; अत; इसझ्ा फोई दिल्क्षण ऊर्ता दे, वही
बी १ पक चा श्र
5 प थे के
| “५ ६६२२ जी]
कि “न
(१ १,
४
वाचक है। ध्सन् प्रकाशःः--सन् शब्द स्पष्टछपसे प्रकाशका
वाचक है। परमात्मामें जो सत्ता या प्रकाशरुपता है। वह
उसके पुरुपभावकोीं सूचित करती है। शान शब्दका पर्यायव्राची
जो चित्-शब्द है, वह स्त्रीलिक् दे अर्थात् परमात्मामें चिद्र॒पता
उसके स्त्रीभावकों सूचित करती है। प्रकाश ओर चित्--ये
दोनों जगतके कारणभावकों प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार
सब्चिदात्मा परमेश्वर भी जब जगतके कारणभावतको प्राप्त होते
हैं, तब उन एकमात्र परमात्मामें ही (दशिवःभाव ओर दाक्ति?-
भावका भेद किया जाता है | जब तेल ओर बत्तीमें मल्निता
होती है; तब्र उसके प्रकाशमें भी मलिनता आ जाती है |
चिताकी आग आदिम अशिवता ओर मल्मिता स्पष्ट देखी
जाती है। अतः मलिनता आदि आरोपित वस्तु है, उसका
निवर्तक होनेके कारण परमात्माके शिवत्व!का ही श्रतिके
द्वारा प्रतिपादन किया गया है |
जीवके आश्रित जो चिच्छक्ति है; वह सदा हुर्बल द्वोती
है। उसकी निवृत्तिके लिये ही परमात्मामें सा्बकालिक
स्वशक्तिमत्ता विद्यमान है। ईश्वर बलवान हैं; शक्तिमान् हैं---
यह व्यवहार देखा जाता है। महामुने वामदेव | लोक और
बेदमें भी सदा ही परमात्माकी शिवरूपता और शक्ति-
रूपताका साक्षात्कार कराया गया है। शिव ओर शक्तिके
संयोगसे निरन्तर आनन्द प्रकट रहता के अतः मुने | उस
आनन्दको प्रात करनेके उद्देश्यसे द्वी पापरद्धित मुनि शिवमें
मन लगाकर निरामव शिव ( परम कल्याण एवं परमानन्द )
को प्राप्त हुए हैं ।उपनिषदोर्म शिव और शक्तिकों दी नर्वात्या
एवं ब्रह्म कह्य गया है । ब्रद्धा-शब्दसे बृंदि-पालथंगत
व्यापकता एवं सर्वात्मताका ही प्रतिपादन द्वोता ६ | झग्सु
नामक विग्रहम बृंहणल ओर दबृदृच्य ( व्यायकता एप
विश्ञाल्ता ) नित्य विद्यमान ६ । स्योज्ातादि पश्चन्रद्ममय
शिवविग्रदर्भ विश्वकी प्रवीति ब्रद्म-दब्दस दी कही गयी ८ )
वामदेव | इंस:? पदक्कों उलट देनेस स्सोप्रम! पर बनता
है। उसमें प्रणवक्रा प्राकव्य कैसे देता झ बह सुम्दार लेदयथ
मैं बता रह्य हूँ; सावधान होकर सुनो । खोटइम! परम
पतकार ओर दकार नामझ ब्यझ्नोंद त्याग रेनेसे स्थूछ अमू?
शब्द बच रहता दे। लो परमात्माश दाचखद्र 2। तत्वदर्थों
मुनि कदते है कि उसे मशमन्वर्ा जानना था एप । उसमें
कक हिल
५० 722
न चर इसदा अत ह
जी सूक््म मइानन्त ६३8 उसका इद्धार व एुेन्ए रत सा ।
+ हा... बन पद हअ जे अक्क े री हि लि. / मम लक ् हि
(छः? पदर्मे देन भउर ई-*२३ के) का ईमे हसमि यो प्था
हु] सकी हु ८8 किक 5 ट गा कर लि | ह
हा पृ +श्र्दप ( |ं॥ *,६०+ (५ है, न्र शत हे अर, न्् है। है, 2
कारक
३०
23206 60 पक्का + 5; सलाद भा कं कारक कार प5 पडता बाद धसम॒ततम फल बकल्.ांअइक 05 कब अंक आम ७४:०७ ७ बदन अप आया अं भ5 4 ऋ आम 2५6 ला कप शाका बाप का ० 2 लत लक
साथ है। सकारके साथ जो “अ! है, वह विसर्गसहित है;
वह यदि सकारके साथ ही उठकर ४हं?के आदिमें चला जाय
तो “हंसः'के विपरीत पसोडहम” यह महामन्त्र हो जायगा |
इसमें जो सकार है; वह शिवका वाचक है अर्थात् शिव ही
सकारके अथ माने गये हैं । शक्तयात्मक शिव ह्वीइस महामन्त्र-
के वाच्याथ हैं; यह विद्वानोंका निर्णय है | गुरु जब शिष्यको
इस महामन्त्रका उपदेश देते हैं, तब 'सोडहम? पदसे उसको
शक्तयात्मक शिवका ही बोध कराना अभीष्ट होता है। अर्थात्
वह यह अनुभव करे कि भें शक्त्यात्मक शिवरूप हूँ |? इस
प्रकार जब यह महामन्त्र जीवपरक होता है अर्थात् जीवकी
शिवरूपताका बोध कराता है, तब पद्मु ( जीव ) अपनेको
शक्त्यात्मक एवं शिवका अंश जानकर शिवके साथ अपनी
एकता सिद्ध हो जानेसे शिवकी समताका भागी हो जाता है ।
अब श्रुतिके “अज्ञानं अह्य? इस वाक्यमें जो “प्रशानम?
पद आया है; उसके अथंको दिखाया जा रहा है | ध्प्ज्ञानः
शब्द “चैतन्यःका पर्याय है; इसमें संशय नहीं है। मुने ! शिव-
सूत्रमं यह कहा गया है कि “चेतन्यम् आत्मा? अर्थात् आत्मा
( ब्रह्म या परमात्मा ) चेतन्यरूप है । चेतन्य-शब्दसे यह सूचित
होता है कि जिसमें विश्वका सम्यूण ज्ञान तथा खतन््त्रतापूर्वक
जगतके निर्माणकी क्रिया खभावतः विद्यमान है; उसीको आत्मा
या परमात्मा कहा गया है | इस प्रकार मैंने यहाँ शिवसत्रोंकी
व्याख्या ही की है ।
'ज्ञानं बन्धः? यह दूसरा शिवसूत्र है | इसमें पश्ुवर्ग
( जीवसमुदाय ) का लक्षण बताया गया है | इस सूत्रगें आदि
पद 'ज्ञानम? के द्वारा किंचिन्मात्र ज्ञान ओर क्रियाका होना ही
जीवका लक्षण कहा गया है | यह ज्ञान ओर क्रिया पराशक्तिका
प्रथम स्पन्दन है | कृष्ण यजुवंदकी ख्वेताश्वतर शाखाका
अध्ययन करनेवाले विद्वानोंने 'स्वाभावरिकी ज्ञानबलक्रिया च?&
इस श्रुतिके द्वारा इसी पराशक्तिका प्रसन्नतापूर्वक्त स्तवन
# यह श्रुति रवेताश्वतरोपनिषद ( ६। ८ ) की दे । इसका
पूरा पौठ इस प्रकार दै---
न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्राम्यधिकश्व दृशयते ।
परास्य शतक्तिविंविधेव श्रयते स्वामाविकी ज्ञानवलक्रिया च ||
देह और इन्द्रियसे उनका दे सम्बन्ध नहीं कोई।
अधिक कदों, उनके सम भी तो दीख़ रहा न कहीं कोई ॥
शानरूप, वररूप, क्रियामथ उनकी पराशक्ति भारी।
विविध रूपमें मुनी गयी 4) ख्वामाविक उनमें सारी ॥|
# नमो रुद्राय शान्ताय बह्मणे परमात्मने # -
-[ संक्षिप्त-शिवपुराणाई्:
किया है। भगवान् शंकरकी तीन दृष्टियाँ मानी गयी ह--
ज्ञान) क्रिया ओर इच्छारूप । ये तीनों दृश्याँ जीवके मरनों
स्थित हो इच्द्रियशानगोचर देहमें प्रवेश करके जीवरुप हे
सदा जानती और करती हैं | अतः यह दृश्त्रिवरुूप जीव
आत्मा ( महेश्वर ) का खरूप ही है; ऐसा निश्चित सिद्धान्त है।
अब में जगत्प्रपद्चके साथ प्रणवकी एकताका वोष
करनेवाले प्रपश्चार्थंका वर्णन करूँगा । 'ओमितीद॑ स्व॑म!
( तैत्तिरीय १ | ८ | १ ) अर्थात् यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाय
समस्त जगत् ओंकार है--यह सनातन श्रुतिका कथन है। इसे
प्रण. ओर जगत्की एकता सूचित होती है। 'तसाद्'
( तैत्तितिय २। १ ) इस वाक्यसे आरम्म करऊे तैत्तिशैय
श्रुतिने संसारकी सश्कि ऋमका वर्णन किया है। वामदेव|उत
श्रुतिका जो विवेकपूर्ण तात्यय है, उसे में तुम्हारे स्नेहवश क्ता
रह हूँ; सुनो | शिव-शक्तिका संयोग ही परमात्मा कै बह
ज्ञानी पुरुषोंका निश्चित मत है | शिवकी जो परागक्ति
उससे चिच्छक्ति प्रकंट होती है| चिच्छक्तिसे आनन्दशक्िका
प्रादुर्माव होता है। आनन्दशक्तिसे इच्छाशक्तिका उ्द
हुआ है, इच्छाशक्तिसे ज्ञानशक्ति और शञानशतिते पॉ्की
क्रियाशक्ति प्रकट हुई है | मुने ! इन्हींसे निव्ृत्ति आदि कलाई
उत्पन्न हुई हैं । चिच्छक्तिसे नाद और आनन्दशतिते
बिन्दुका प्राकस्य बताया गया है | इच्छाशक्तिते मकर
प्रकट हुआ है । ज्ञानशक्तिसे पाँचवाँ खर उकार उसन्न
हुआ है और क्रियाशक्तिसे अकारकी उत्तत्ति हुई ९।
मुनीश्वर | इस प्रकार मैंने तुम्हें प्रणणकी उत्त्ति वतद्ययी है|
अब ईशानादि पद्च ब्रह्मकी उत्मत्तिका वर्णन छुगो |
शिवसे ईशान उतन्न हुए हैं, इंशानसे तत्युरुपका प्रादुर्भाव
हुआ है, तत्पुरुपसे अबोरका। अबोरसे बामदेवका ओर
वामदेवसे सद्योजातका प्राकत्यं हुआ है। इस आदि भर
प्रणयसे ही मूलभूत पाँच खर और तैंतीस व्यज्ञनी 7
अड़तीस अक्षरोंका प्रादुर्माव हुआ है। अब कला
उत्पत्तिका क्रम सुनो | ईशानसे झान्त्यतीताकद्य उतने $*
है | तत्पुछूयते शान्तिकला/ अधोरसे विद्याकला) वामदेकी
प्रतिक्षाकछा और सद्योजातसे निद्नत्तिकछाकी उलत्ति हुई ९
ईशानते चिल्छक्तिद्वारा मिथुनपद्चककी उत्त्ति होती *'
अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और संशिएारी ओ
कृत्यॉका देतु होनेके कारण उसे पद्चक कहते है | ६ है
|
।
|
|
कैलाससंहिता |
तत्नदर्शों ज्ञानी मुनिरयोनि कद्दी है | वाच्य-वाचुकके सम्बन्धसे
उनमें मिथुनल्की प्राप्ति हुईं है
पश्चकर्में भूतपश्धककी गणना है। मुनिश्रेष्ठ | आकाशादिके
ऊमते इन पॉचों मिथुनोंकी उल्त्ति हुई है| इनमें पहलछा
मिथुन हे आकाश) दूसरा वायु; तीसरा अम्रि, चोथा जल
और पाँचवाँ मिथुन प्रृथ्वी है | इनमें आकाशसे लेकर
प्रखीतकके भूतोंका जैसा ख्रूप बताया गया है; उसे सुनो
आकाश एकमात्र शब्द ही गुग हैः वायुमें शब्द ओर
तर दो गुण हैं। अभिमें शब्द, स्पर्श ओर रूप---इन तीन
गु्की प्रधानता है; जलमें शब्द, स्पशे) रूप ओर रस--ये
चार गुग माने गये हैँ तथा पृथ्वी शब्द, स्पशे रूप। रस ओर
गभ--इन पाँच गुणोंसे ससन्न है। यही भूततोंका व्यापकत्व कहा
थाई अथांत् शब्दादि गुर्गोद्यरा आकाशादि भूत वायु आदि
रजर्ती भूतोर्मे क्रिस प्रकार व्यापक हैं, यह दिखाया गया है |
झके विपरीत गन्धादि गुण्णक्रे ऋ्रमसे वे भूत पूर्वतर्ती भूतोंसे
चाप हैं अर्थात् गन गुणवाली पृथ्वी जलका और रसगुण-
पेड जछ अम्रिक्रा व्याप्य है; इत्यादि रूपसे इनकी व्याप्यताको
उमसना चाहिये | पाँच भूतोंका यह विस्तार ही ध्पपश्चर
ऋइढाता है | सर्व॑सम्का जो आत्मा है; उसीका नाम “विराट?
९ और पृथ्वीततवसे लेकर क्रमशः शिंवतत्वतक जो तत्वोंका
पमुदाय है; वही “अ्माण्ड? है | वह क्रमशः तत््वसमूहमें लीन
४ता हुआ अन्ततोगत्वा सबके जीचनभूत चेतन्यमय परमेश्वर-
१0 ठप प्राप्त देता है और सष्टिकालमें फिर शक्तिद्वारा
पते निकलकर स्थूछ प्रपश्चके रूपमें प्रत्यकरालपर्यन्त
पुथ्पूरंक खित रदता है |
भानी इच्छासे संसारक्ी सुश्टिके लिये उद्यत हुए
“श्र जो प्रथम परिसन्द है; उसे पशिवतत््ः कहते हैं |
४ सेव्आाशणकितत्त है। क्योंकि सम्पूर्ण कृत्योँमें इसीका
“तन एता ३ । मुनीखर ! ज्ञान और क्रिया--इन दो
>ऊ9मे जब शानका आधिक्य हो, तब उसे सदाशिव-तत्त्व
“लत चादर जब क्रियाशनक्तिका उद्रेक हो) तब उसे महेथर-
थे | चाप तथा जब्र ज्ञान और किया दोनों शक्तियाँ
जप १ तर पहों गद विद्यात्मक-तत्व समसना चाहिये ।
%, ६ ँ हु भर के +क आ क5
'उंद परन्रके अद्गनत ही हैं; तथापि उनमें
४०
२५.५ हक बे 58 क
४“ &४ ० ५६--५७-..-
#* जीवतत्त्वके विषयमे विशद विवेचन #
3... ना ५३७५ ७०० पा» 4» ५००३० ३३७ ५० 2-३५» 0/७७»॥४व#8०३५ ५३७७७ ३#म०५७७५+४४०४०७५३४३०३३५४५+गह४४४३३३५ कह?» ५७३३५ गह8»+ ५७ ७३३३७ ७३३४३ ५पा ५ गह/० दमन कम .४३४३१०० हक 9४७४७ ७४४ ७४४५३५४७०४६३५४४०३/ यमन ७५४9५ ७४४०१ पा ७४4५ +५++धाम्५ पा: +००७५०००४४ भा पा प॒धा#मपात ता धाउल् पान पमकर पाक ..
कला वर्ण्वहूप इस
89१
जो भेद- बुद्धि होती है, उसका नाम माया-तत्च है। जब शिव
अपने परम ऐश्वयंशाली रवक्रो मायासे निश्दीत करके सम्पूर्ण
पदार्थोकों ग्रहण करने छाता है, तब्र उसका नाम “पुरुष?
होता है | 'तत्सष्टा तदेवानुअविशव! ( उस शरीरको रचकर
स्वयं उसमें प्रवेश हुआ ) इस श्रुतेने उसके इसी स्वरूपका
प्रतिगादन किया है अथवब्रा इसी तत्तक्रा प्रतितदन करनेके
लिये उक्त श्रुतिका प्रादुभात्र हुआ है | यही पुरुष मायाते मोहित
होकर संपतारी ( संपार-बत्वयमें बचा हुआ ) पश्च कश्छता है ।
शित्रतच्रके ज्ञानतें शूत्य होनेके कारण उप्तकी बुद्धि नाना
कर्मों आसक्त हो मूहताको प्राप्त हो जाती है| वह जगतको
शित्रते अभेन्न नहीं जानता तथा आमनेको भी सित्रसे भिन्न
ही समझता है। प्रभो! यदि शिय्सते आनी तथा जातक़ी
अमिन्नताका बोध हो जाय तो इप पश्च ( जीव्र ) को मोहका
बन्धन न प्राप्त हो। जये इच्धज्ञाल-विदयाके ज्ञाता (बाजीगर )
को आयी रची हुईं अद्भुत वल्तुओके विययर्म मोह
या भ्रम नहीं होता है, उसी प्रकार ज्ञानयोगीकों भी नर्दी
होता | ग़ुषके उपरेशद्वाएं आते ऐवपका बोध प्राप्त हो
जानेपर वह चिदानन्द्धन शित्ररूप ही हो जाता दे ।
शिप्रकी पाँच शक्तियों हैं -पर्वकतू रूपा। २-सर्वतत्त-
रूपा) ३-यूगेलरूपा, ४-नित्यलस्या ओर ५-जयावकत्तह्पा |
जीवकी पाँच के गए हं---१ कडठ) २ विद्या) ३ राग) ४ कार
ओर ५ नियते। इन्हें कगपश्चधक कली हैँ। जो यर्य पंच
तत्तकि रूपम॑ प्रकट होती है; उसका नाम कफ? द। जो कुछ-
कछ कतृतलमें हेतु बनती दे ओर कुछ तत्का साधन झेतो है
उस कल्ाका नाम “विद्या? दे। जो विययर्म आसक्ति पदा
कानेयादी दे; उत के झका साम व्यय! दे । जो भाव पदायों
ओए प्रकाशोंका भासनात्मकहपने क्रमदः अन्च्छेदक झेझ्र
सम्पूर्ण मूर्तिका आदि कहता दे) बी हाल? 4 ॥ ये सेय
कर्तव्य हे ओर यड नहीं इ--डूते प्रहार निभ्त्रग छतेआ्मडो
जो विधकी गक्ति 3; उप छा नाम जियते! दे | दवज था पद
जीवका पतम होता द। थे पसयों ही बडे कजाईो
आच्ठादत फऋरनवाड ऋषररने देव रत इंव वधाटजज पर
5 निएयय तिथि ऋगऑफज़ साचग दी
फेरे गये | । सनद्ध
| अदप १५-३६ )
फू
आपबय ता ४ ।
हि # नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मण परमात्मने # - . [ संक्षिप्त-शिवपुराणा
न्न्ल््््््च्च्यच्लय्स्च्च्,व्स्ं्य््च्च्चस्च्चस्स्च्ल्सड्स्स्सिडिस्ड्िडः:-..ऑई......ह॥ु॥ह.ह.ह]हहहप.
महावाक्योंके अथंपर विचार तथा संन्यासियोंके योगपड्का प्रकार
स्कन्धजी कहते हँ--मुने ! अब महावाक्य प्रस्तुत किये
जाते हैँ--
१-अज्ञानं ब्रह्म ( ऐतरेय ३ । ३ तथा आत्मप्र ० १ ),
२-अह ब्रह्मास्पि ( इहृदारण्य० १ | ४। १०
३-तप््वमसि ( छा० उ० ख० ८ से १६ तक),
3-अयमात्मा ब्रह्म ( माण्ड्क्य ० २; बृह० २ ।५। १९ ),
ज्-हेशा वास्यमिदं सर्वंम् ( ईशा० १ ),
६-आ्राणो$स्मि ( कोषी० ३ )
७-अज्ञानात्मा ( कौषी० ३ ),
<-यदेह तदमुत्र तदन्विह ( कढ० २। १ १० ऐ
4*-अन्यदेव तद्विदितादथी अविदितादधि ( केन० १ ।३ ))
३०-एप त आत्मान्तयास्यम्तः (बृह० ३ | ७। ३-२३),
११-स यश्चायं पुरुषों यश्वासावादित्ये स एकः,
( तैत्तिरीिय० २। ८ ),
4 २-अहमस्सि पर ब्रह्म परापरपरात्परम ।
4 ३-वेद्शास्त्रगुरूणां तु स्वयमानन्द्लक्षणस ।
१४-सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशय: ।
१५-तर्त्वस्य प्राणो5हमस्मि पृथिव्या: प्राणो5हमसि,
१६-अपां च प्राणो5हमस्सि तेजसश्रग्राणो5हमस्मि,
१७-वायोश्व आरणो5हमस्मि आकाशस्यथ प्राणो5हमस्मि,
१ ८-न्निगुणल्य प्राणो5हमस्म्रि,
१९-सर्वो5हं सर्वात्मको संसारी यदभूत॑ यत्च भव्य
यद्वतेसान॑ सर्वात्मकत्वादद्वितीयों 5हम ,
२०-सव खल्विदं बह्म ( छान्दोग्यो० ३ । १४ । २ )
२१-सर्वो5हं विमुक्तोडहम्,
२२-नयो5सा सो5हं हंसः सो5हमस्मि ।&
# इन वाक्योंका साधारण अर्थ यों समझना चाहिये-१ -अहा
उत्कृष्ट शानखरूप अथवा चेैतन्यरूप है। २-वह जहा मैं हूँ।
२-वद मह्म तू है। ४-यह मात्माजह्य है। ५-यह सव इश्वरसे
व्याप्त दे । ६-मैं प्राण हूँ । ७-प्रशानसरूप हूँ । ८-जो परमत्रहा
यहां है, वही वहाँ ( परलोकमें ) भी दै; जो वहाँ है, वही यहाँ
( श्स लोकमें ) भी है। ९-वह जदह्य विदित ( शात वस्तुओं ) से
भिन्न है और जविदित ( अज्ञात) से भी ऊपर । है १०-वह
तुम्दारा भात्मा अन्तर्यामी अमृत दे । ११-वह जो यह पुरुषमें है
ओर वद्द जो यद्द आदित्यमें है, एक द्वी है। १२-मैं परापरखरूप
परात्पर परतद्ा हूँ । १३-वेदों, शाद्यों और गुरुजनोंके वचनोंसे
इस प्रकार सर्वत्र चिन्तन करे | अब इन महावाकोोंद्षा
भावार्थ कहते हैं---प्रज्ञानं त्रह्मका वाक््यार्थ पहले ही समझाया
जा चुका है। ( अब “अहूं त्रंझास्मिःका अर्थ बताया जाता है।)
शक्तिस्वरूप अथवा दत्तियुक्त परमेश्वर ही “अहम? पदके अध॑-
भूत हैं | “भकार? सब वर्णोंका अग्रगण्य, परम प्रकाश शिवत्म
है। (हकार? व्योमस्वरूप होनेके कारण उसका शक्तिहुमसे वर्णन
किया गया है। शिव और शक्तिके संयोगसे सदा आन
उदित होता है| पमकार? उसी आनन्दका वोधक है। प्रह्म?
शब्दसे शिव-शक्तिकी सर्वरूपता स्पष्ट ही सूचित होती है।
पहले ही इस बातका उपदेश किया गया है कि वह शक्तिमान्
परमेश्वर में हूँ, ऐसी भावना करनी चाहिये | ( अब तत्नमति
का अर्थ कहते हैं---) “तस्वमस्तिः इस वाक्यमें ततदका वही
अर्थ है; जो 'सो5हमस्मि”में सः पदका अर्थ बताया गया है
अथाौत् तत्यद शक्त्यात्मक परमेश्वरका ही वाचक है। अयगा
'सोडहम्? इत वाक्यमें विपरीत अर्थकी भावना हो सकती है।
क्योंकि अहम्-पद पुँछिड्र है; अतः “सः?के साथ उसका अवब
हो जायगा; परंतु तत् पद नपुंसक है ओर 'त्वम! पुछ्िज्) अतः.
परस्परविरोधी छिज्ज होनेके कारण उन दोनोंमें अन्वय नहीं है
सकता। जब दोनोंका अर्थ “शक्तिमान् परमेश्वर! होगा) तब अप
समानलिक्रता होनेसे अन्वयमें अनुपपत्ति नहीं होगी। यदि
ऐसा न माना जाय तो स्त्री-पुरुषरूप जगतका कारण भी कि
और ही प्रकारका होगा | इसलिये “सो5हमस्मि!का 'स/ और
'तत््वमसिःका “तत्ः--ये दोनों समानार्थक हैं। इन महावारका-
के उपदेशसे एक ही अर्थक्री भावनाका विधान है । |
( अब ५्ञयमात्मा ब्रह्मौःका अर्थ बताया जाता है)
“अयमात्मा ब्रह्म? इस वाक्यमें (अयम? ओर “आत्मा! -ये दीन
पुँलिज्वरूप धर रन में ब ४४ 3 । “अयम!
पद पुल्लिड्गरूप हैं | अतः यहाँ अन्वयमें बाधा नहीं दै |
खयं ही हृदयमें आनन्दस्वरूप अ्रद्धका अनुभव दोने छत श
१४-जो सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित दे, वही अक्षा में ता के
नहीं देै। १५-मैं तत्तका प्राण हूँ, इ्वीका प्राण ६ ! (६
जलका प्राण हूँ, तेजका प्राण हूँ । १७-वायुका श्राण कै 7 *
का प्राण हूँ। १८-मैं त्रिगुणका प्राण हूँ । १९-मैं सं है!
हूँ, संसारी जीवात्मा हूँ; जो भूत, वर्तवान और भवि कं है का
मेरा द्वी स्वरूप होनेके कारण मैं अद्वितीय परमात्मा $ | *7 है
सव निश्चय ही जह्य है । २१-मैं स्वरूप हूँ, मुक्त ह। 77
वह दे, वद्द मैं हूँ । में वह हूँ और वह मैं हूँ ।
आवाग-
$टाससंहिता ] # महावाक्य के अर्थपर विचार तथा संन्यासियोाँके योगपट्का प्रकार £
र्य्य्य्ज्ज्य्ख््््यखथ््ं्च्य्ख््ट्््ख्््््ऊ्््््ञ्ं्््ऊ््््््््््््प्ख््ख्स्ल्लललससस्ल्लल-्््ल््----"-----न्5>-">-----
एकिमान परमेश्वरर्प आत्मा ब्रह्म है---? यह इस वाक्यका
वयर्य है। ( अब ईशा वास्यमिदं सम? का भावाथ बता रहे
: हूँ) परमेस्वस्से रक्षणीय होनेके कारण यह सम्पूर्ण जगत्
उनसे व्याप्त है। ( अब ध्याणोडस्मिः पप्रशानात्मा? और
धदेवेह तदमुत्र०? इन वाक्योंके अर्थथर विचार किया जाता
६-) मैं प्रशानखरूप प्राण हूँ। यहाँ प्राण-शव्द परमेश्वरका
वाच्क है | जो यहाँ है; वह वहाँ है---ऐसा चिन्तन करे।
हैँ बत्। ततका अर्थ क्रशः यः ओर सः है अर्थात् जो
स्मात्मा यहाँ है, वह परमात्मा वहाँ है--ऐसा सिद्धान्तपक्षका
प्रह्खन करनेवाले विद्वानोंने कहा है। उपयुक्त वाक्यमें
पृदभुत्न तदन्विहू! इस वाक्यांशका भाव यह है कि ध्यो5मुत्र
हू खितः अर्थात् जो परमात्मा वहाँ परलोकमं स्थित है;
३ वर्धा ( इस लोकमें ) भी स्थित है । इस प्रकार विद्वानोंको
हलके समान ही परमपुरुष परमात्मार्प अथ यहाँ अमीष्ट है।
( भव (अन्यदेव तद्दिदितादथो आविदितादधि? इस वाक्य-
४ विचार करते हैं-) भुने ! “अन्यदेव तद्विदितादथों
भपिद्ितादधि? इस वाक्यमें जिस प्रकार फलकी भी विपरीतता-
' भावना होती है, उसे यहाँ बताता हूँ; सुनो | 'विदितात?
+( १३ 'अयवाबिदितात'के अर्थमें प्रवृत हो सकता है | वह
पदितसे भिन्न है अथांत् जो असम्यगरूपसे ज्ञात है, उससे
मिनन ९ । इसी प्रकार जो यथावत् रूपसे विदित नहीं है; उससे
भे पृपकू है । इस कथनसे यह निश्चित होता है कि मुक्तिर्प
5) सिद्धिके लिये कोई और ही तत्त्व है; जो विदिताविदित-
ऐप है। परंतु जो आत्मा है, वह सर्बरूप है; वह किसीसे
मन नह हे सकता | अतः आत्मा या ब्रह्म आदि पद पूर्व येवत्
ऊन परमेश्वर शिवके ही वोधक हैं, यह मानना चाहिये।
अप 'एबं ते आत्मा> तथा ध्यश्वाय॑ पुरुपे! इन दो
(१४४ अथपर विचार किया जाता है--) यह तुम्हारा अन्यर्यामी
“4 0 जो खं ही अमृतस्वरूप शिव है | यह जो पुरुषमें
ह हे । ४ भी स्लित है। इन दोनोंमें कोई भेद नहीं
५४ वही आदित्में दे । इन दोनोंभें पृथक्तता
९) है । पु दे एक ही है। उसीको सर्वरूप कह गया है।
है 2 शणरन दो उपाधियति युक्त जो अर्थ किया
ह गपचा रक दै। उन डाम्मुनाथफ़ो सब अतियाँ
. पते है। 'द्र्यवाहये नम? इसमें जो बाहु
"६ पत्र अवझा उपल्यग दे । अन्यथा उसे
हे * अर आओ हरी पक नदीं होता ।
उद्न जे पह धरे ऐ--व्य एपोडन्तरादित्ये
की,
सब्थप
४७२
हिरण्मय: पुरुषों दृस्यते हिरण्यद्मश्रहिरण्यकेश आम्रणखात्
सब एवं सुवणः। (छान्दोग्य० १ ।६ | ६) इसके द्वारा
आदित्यमण्डल्यन्तगंत पुरुषको सुवर्णसय दादी -मूछोवाल्य) सुब॒र्ण-
सद्द्य केशोंवाला तथा नखसे लेकर केशाग्रभागपर्यन्त सारा-
का-सारा सुवर्णमय--प्रकाशमय ही बताया गया है । अतः वह
हिरिण्यमय पुरुष साक्षात् झम्मु ही है ।
अब “अहमस्मि पर ब्रह्म परापरपरात्परम? इत वाक्यका
तात्पय॑ बताता हूँ; सुनो । अहम? पदके अर्थभूत सत्यात्मा
शिव ही बताये गये हैं । वे ही शिव में हूँ, ऐसी वाक्यार्थयोजना
अवश्य होती है । उन्हींको सबसे उत्कृष्ट ओर सर्वस्वरूप परब्रक्ष
कहा गया है । उसके तीन भेद हँ---पर, अपर तथा परात्पर।
रुद्र) ब्रह्मा ओर विष्णु--ये तीन देवता श्रुतिने ही बताये ईं ।
ये ही क्रमशः पर, अपर तथा परात्यररूप हैँ | इन तीनोंसे भी
जो श्रेष्ठ देवता हैं, वे शम्भु “परत्रह्म” झब्दसे कहे गये हूँ।
वेदों, शार्त्रों ओर गुरुके वचनेंके अम्बाससे शिष्यके
हृदयमें खयं ही पूर्णानन्दमय झम्भुका प्रादुर्भाव द्वोता है ।
सम्पूर्ण भृतोंके ह्ृदयमें विराजमान झम्मु ब्रह्मल्प दी हैं । बी
मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है | में शिव ही सम्पूर्ण तत््व-समुदाय
का प्राण हूँ ।
पेसा कहकर स्कन्दूजी फिर कहते दँ--भुने |
में शिव आत्मतत्त्व, विद्यातत्व ओर झिवततल--इन तीनेका
प्राण हैं | पृथिबी आदिका भी प्राण हूँ | एस्वी आदि गुण
तकका ग्रहण होनेसे यह समझ ट्ो कि यहाँ सारे आत्मतत्त
यदीत हो गये | फिर सबका ग्रहण विद्यातत्य और शिवतत्तका
भी ग्रहण कराता हे | इस सत्र तत्वक्ा से प्राण हूं । से सर
हूँ, सर्वात्मिक हूँ, जीवका भी अन्तवामी एनेसे उसका अ|े
पी क् वे मे ठ। हि रण,
जीव ( आत्मा ) हैँ । जो भूत बतमान आर भाविशद्ा
है वद सब मेरा स्वरूप होगेक्ले कार ये | 7 गया या ते
सदर: ( सव छुछ दद्र दी दे /+हद श्रुति सामान् शिवद्
मुझस प्रक्रद हुए ६ | लता हि हाँ सवत्य हा कह उन्हें.
का इन समस्त उत्कुए सुर निज गम 2 गज पा
परायेके भेदसे रदित इमेक्रे आरण में
आशा हक जि
हे « हा 7 जो 26 +# आय ताज 37
। >> आई हई १४५ बे
है | खिर्व सदियिद प्रद्धा इस बाज अंग फटुले पहाड़ भा
ऋक्का है। में भावल्प इनक शारत पृ | । सेफ +।
३] । छू | 4४2 * 5 2+ ) २० | प् ४८. पक 7 की ५
प्रात हते हू) नी चयवस 4 खनन ४ पक 5 डक
४४४
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने # | संक्षिप्त-शिवपुराणाड
नल8शचच्चचचचच्च्चच्च्च्य्क्लक्स्क्ककच्च्च्च्च्लल्कलल्च्च्क्लच्च्स्ल्ल्च्च्ल्ल्ल्ट्ट्ल-..
'शिव ही बताये गये हैं# | ईशावास्गोपनिषदकी श्रुतिके दो
वाक्यद्वारा प्रतिपादित अर्थ साक्षात् शिवकी एकताका ज्ञान
प्रदान करनेवाल्य है। गुरुको चाहिये कि शिष्योंकों इसका
आदरपूवेंक उपदेश करे ।
गुरुको उचित है कि वें आधारसहित शह्लुको लेकर अख्त-
मन्त्र ( फट् ) से तथा भस्मद्वारा उसकी झुद्धि करके उसे अपने
सामने चोकोर मण्डल्में स्थापित करे | फिर ओंकारका उच्चारण
करके गन्ध आदिके द्वारा उस शह्लुकी पूजा करे | उसमें वज््र
लपेट दे और सुगन्धित जल भरकर प्रणवका उच्चारण करते
हुए उसका पूजन करे | तलश्रात् सात बार प्रणवके द्वारा फिर
उस शब्भुको अभिमन्त्रित करके शिष्यसे कहे--:हे शिष्य !
जो थोड़ा-सा भी अन्तर करता है--भेदमाव रखता है, वह
भयका भागी होता है | यह श्रुतिका सिद्धान्त बताया गया,
इसल्ये तुम अपने चित्तको स्थिर करके निर्भय हो जाओ|। |?
ऐसा कहकर गुरु खय॑ महादेवजीका ध्यान करते हुए उन्हीं-
के रुपमें शिष्यका अर्च॑न करे | शिष्यके आसनकी पूजा करके
उसमें शिवके आसन और शिवकी मूर्तिकी भावना करे | किर
सिरसे पेरतक ५्सद्योजातादिः पाँच मन्त्रोंका न्यास करके मस्तक,
मुख और कलाओंकि भेदसे प्रणवकी कल्यओंका भी न्यास करे |
शिष्यके शरीरमें अड़तीस मन्त्ररूपा प्रणकी कलाओंका न्यास
करके उसके मस्तकपर शिवका आवाहन करे | तत्पश्चात्
स्थापनी आदि मुद्राओंकां प्रदर्शन करे | फिर अड्गन्यास करके
आसनपूवंक घोडश उपचारोंकी कल्पना करे | खीरका नेवेश्व
# तत्तयोश्वासम्यदं प्राण: सवे: सर्वात्मको झ्हम् ।
जीवस्य चान्तर्यामित्वाज्जीवोडई॑ तस्य॒ सर्वदा ॥
यद् भूत यज्च भव्यं यद् भविष्यत् सर्वमेव च ।
मन्मयत्वादइ स्व: सर्वो वे रुद्र इत्यपि ॥
भ्ुतिराह मुने सा दि साक्षाब्छिवमुखोद़ता ।
सर्वात्मा परमेरेमिगुंणेनित्यसमन्वयात् ॥
सस्मात् परात्मविरह्दद्वितीयो5हमेव द्दि।
सर्वे खल्विदएं जहमेति वाक््याथं: पृर्व॑धरीरितः ॥
पूर्णाएहं भावरूपत्वानित्यमुक्तोउहमेव. हि ।
पशवों मत्यसादेन मुक्ता मद्भावमाश्रिता: ॥
योडसी सर्वात्मकः अम्भुस्सो5६ं हंस: शिवोध्स्म्यहम् ।
इति वे ख्वंवाक्याथों वामदेव शिवोदित: ॥
( शि० 'पु० के० सं० १९ । २६-३१ )
यस्त्वन्तरं किचिदपि कुरुते3स्त्यति भोतिभाक ।
श्त्यादई शुतिसत्तत्व॑ इृशध्टत्मा. गतभीमभं॑व ॥|
(शि० पु० के० सं० १९। २५-३६ )
अपण करके «ओं खाह्याः का उच्चारण करे | कुछा और आचमन
कराये | अध्यं आदि देकर क्रमशः धृप-दीपादि समर्पित करे|
शिवके आठ नामोंसे पूजन करके वेदोंके पारंगत ब्राह्मण
साथ “ब्रह्मविदाप्नोति परम? इत्यादि ब्रह्मानन्दव्लीके मन्नरके
तथा “न्ठगुर्वें' वारुणिःः इत्यादि भगुवल्लीके मन्त्रोंको पढ़े
ततश्चात् यो देवानां प्रथम पुरस्तात्ः--( महानारा० १०|
३े) से लेकर “तस्थ अकृतिकीनस्य यः परः से महेश
( भहानारा० १० | ८ ) तक महानागयणोपनिषदके मन
पाठ करे | इसके बाद शिष्यके सामने कहार आदिकी वी
हुईं माल्य लेकर खड़े हो गुरु शिवनिर्मित पाग्चालिक शांमत्ररे
सिद्धिस्कन्धका धीरे-धीरे जप करे | अनुकूल चित्तसे 'पूर्ण
5हम्र? इस मन्त्रतकका जप करके गुर उस मालको शिध्े
कण्ठमें पहना दे | तदनन्तर लब्यय्में तिछक लगाकर सम्रदाव-
के अनुसार उसके. स्वो ज्ञमें विधिवत् चन्दनका लेप कराये |
तत्पश्चात् गुरु प्रसन्नतापूर्वक श्रीपादयुक्त नाम देकर शिभक्न
छत्र और चरणपादुका अर्पित करे | उसे व्याख्यान देने तथा
आवश्यक कर्म आदिके लिये गुर्वांसन ग्रहण करनेका अधिकार
दे । फिर गुरु अपने उस शिवरूपी शिष्यपर अनुग्रह करे
कद्दे---“तुम सदा समाधिस्थ रहकर मैं शिव हूँ? इस प्रकार
भावना करते रहो।?? यों कहकर वह खवयं शिवको नमस्कारकरे |
फिर सम्प्रदायकी मर्यादाके अनुसार दूसरे छोग भी उसे नमछार
करें | उस समय शिष्य उठकर गुरुकों नमस्कार करे | आने
गुरुके गुरुको ओर उनके शिष्योंकों भी मस्तक झुकाये |
इस प्रकार नमस्कार करके सुशील शिष्य जब मोन
विनीतमावसे गुरुके समीप खड़ा हो, तब गुरु 'खयय उसे इ!
प्रकार उपदेश दे--थेटठा ! आजसे तुम समस्त लोकीपर
अनुग्रह करते रहो | यदि कोई शिष्य होनेके लिये आये वे
पहले उसकी परीक्षा कर लो, फिर शात्नविधिके अनुतार 3
शिष्य बनाओ | राग आदि दोषोंका त्याग करके विए्क
शिवका चिन्तन करते रहो | श्रेष्ठ सम्प्रदायके सिद्ध पुर
सह्ग करो; दूसरोंका नहीं | प्राणोंपर संकट आ जाय वीं भें
शिवका पूजन किये बिना कभी भोजन न करो । गुढ्भकिंक
आश्रय ले सुखी रहो; _आश्रय ले सुखी रहो, सुखी रहो | #॥ _____ सुखी रहो |?#
# रागादिदोपान् संत्युज्य शिवध्यानपरों ६६ |]
सत्सम्प्रदायसंसिद्धें: सन्न॑ कुर न चेतर: ॥
अनम्यच्ये शिव जातु मा सुखक्ष्वाप्राणसंश्षयम् |
मुस्भक्ति समास्थाय सुखी भव सुखी भव ॥
( शि० पु० कै० सं० १९ । ५३:५४)
|
कैटाससंहिता |
न निम मिलन मिनी लुनााइाआाइााकशकरंकबकमइुमयकपडमाइम कण कण हमभकृमपइण-कृमयकमपहमपकागकमपकमम कम दीप कृमग कु गकझगकम्पकम कमा इम्प कृष्ण कम कप कम कम्पकम कक कम कम कक भकमपकमक मकान कुइमयाम कम कक कुक कम कृषक एम कुमकु पक कम कम कम का थक कमा ह थक भकमबक्रका कक कम कन
मर मााइनकलवतपमउउााकामरक के की ओर 0 कफ 44 7607: 42:27 07400 6046 % 20 40005050७0७04355:४ 264 :2082044# 00270 8399७ %# 5452 49296 44 6-50: %9 2७%
मुनी्वर वामदेव ! तुम्हारे स्नेहवश अत्यन्त गोपनीय
रैनेपर भी मैंने यह योगपद्का प्रकार तुम्हें बताया है । ऐसा
» यतिके अन्त्येष्टिकमंकी दशाहपर्यन्त विधिका वर्णन #
७७४५
करशदाा+आआ२क कम जाल काका जवक३ ९ पेरकएनएखमलुकूा 4 ललतः
करी फरार मे दा नाक पका भक कान जम“ नया.
कहकर स्कन््दने यतियोंपर कृपा करके उनसे संन्यासियोंक्रे क्षोर
ओर स्नानविधिका वर्णन किया | ( अध्याय १७-१९ )
ननन्ब्न्नननाः चड्डी तन तनन
यतिके अन्त्येशिकर्मकी दरशाहपर्यन्त विधिका वर्णन
वामदेवजी वोछे--जो मुक्त यति हैं, उनके शरीरका
दादकर्म नहीं होता । मरनेपर उनके दरीरको गाड़ दिया जाता
है, यह मैंने सुना है । मेरे गुरु कातिकेय ! आप प्रसन्नतापूर्वक
पिरतियोके उस अन्त्येश्किमका मुझसे वर्णन कीजिये; क्योंकि
तीगों छोक्रोंमें आपके सिवा दूसरा कोई इस विघयका वर्णन
करनेवाद्य नहीं है । भगवन् | शंकरनन्दन ! जो पूर्ण परत्रह्ममें
#ऋंभावका आश्रय ले देहपञ्नचर्से मुक्त हो गये हैँ तथा जो
आगनाके मार्गसे शरीरबन्धनसे मुक्त हो परमात्माको प्राप्त
हुए ६, उनकी गतिमें क्या अन्तर है--यह बताइये । प्रभो !
में आपका शिष्य हूँ, इसलिये अच्छी तरह विचार करके
प्रमप्रतापूयक मुझसे इस विपयका वर्णन कीजिये ।
स्कन्दनें कहा--जो कोई यति समाधिस्थ हो शिवके
जिन््तगपूयक अपने शरीरका परित्याग करता दहै। वह यदि महान
'(२ ॥ तो परिपरणं शिवरूप हो जाता है; किंतु यदि कोई
नपीरचित्त होनेफे कारण समाधिताम नहीं कर पाता तो
शक ढिये उपाय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो । वेदान्त-
पक वाक्यति जो श्ञता, ज्ञान ओर शेय--इन तीन पदार्थों
ध परिशन टदोता है; उसे गुरुके मुखसे सुनकर यति यम-
नभभादरुप योगका अभ्यास करे | उसे करते हुए! वह भी
४ धवक शानमे तत्पर रहे | मुने ! उसे नित्य नियमपूर्वक
77 जप आर अथनिन्तनमें मनको लगाये रखना चाहिये ।
१; यदि देहकी दुर्बहताके कारण घीरता धारण करनेमें
अप यति निष्कामभावसे शिवका स्मरण करके अपने जीर्ण
'जत ध्याग दे तो भगवान् सदाशिवके अनग्रहसे नन््दीके
(० पख्यात पाँच आतिवाहिक देवता आते हैं । उनमेंसे
६ ॥ अरका अभिमानी; कोई च्योतिःपुञ्लस्खरूप, कोई
४ कोर गुकृपक्षाभिमानी और कोई उत्तरायणका
है //॥ ६0 8४। थे पर्चा सब प्राणियोंपर अनग्रद करनेमें
7 ६ | इसी तरह घूमामिमानी, तमका अभिमानी,
आन ') ध्यज्ञका अभनिमानी और दक्षियायनका
$ पर सर्ाफर पाच हे।
अप आग | शशि वॉशियय -|
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0 ७ ६६. 4६ ३.| “3३४७६ जय गन गत | ््स टट आन्ॉनन
है की | <
+ ४ >आकत सपाए ले ये पोचो देदता उनरे पुज्यदश खछूग-
* के कक
5+ > हि.
लोकको जाते हैं ओर वहाँ यथोक्त भोगोंका उपभोग करके
वे जीव पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मनुष्यलोकर्म आते तथा पृथवत्
जन्म ग्रहण करते हूं ।
इनके तिवा जो उत्तर मार्गके पाँच देवता हैं, वे भूतलसे
लेकर ऊध्वेलोकतकके मार्गको पाँच भागोंमं विभक्त करके
यतिको साथ ले क्रमशः अग्नि आदिके मार्गमें होते हुएए उसे
सदाशिवक्रे घाममें पहुँचाते हैं | वहाँ देवाधिदेव महादेवफे
चरणोंमें प्रणाम करके छोकानुग्रहके कर्ममें ही लगाये गये वे
अनुग्रहाकार देवता उन सदाशिवबके पीछे खड़े हो जाते
हैं । यतिको आया देख देवाधिदेव सदाशित्र यदि वहू तरिरक्त
हो तो उसे महामन्त्रके तात्ययंक्रा उपदेश दे गणपतिके पदपर
अभिपिक्त करके अपने ही समान शरीर देते ह । इस प्रकार
सर्वेश्वर सवेनियन्ता भगवान् शंकर उसपर अनुग्रद करते # |
उसे अनुगद्दीत करके निश्चछ समाधि देते हूँ । अपने प्रति
दास्यभावकी फल्खरूपा तथा सूर्य आदिके कार्य करनेकी दक्ति-
रूपा ऐसी तसिद्धियाँ प्रदान करते हैँ, जो कर्दी अवरद नह
होतीं | साथ ही वे जगद्गुरु शंकर उस यतिको वह परम मुक्ति
देते हैँ, जो व्रद्मयजीकी आयु समाप्त द्वेनेपर भी पुमरायत्तिद्
चक्करसे दूर रद्दती हे | अतः यही समश्मिन् सम्पूर्ण ऐडर्यन
युक्त पद है और यही मोक्षका राजमार्ग द ऐसा वेदान्त-दाग्त्र-
का निश्चय दे ।
जिस समय यति मरणारसन्ग ट्ो यरयरते शिधिल दो जब
उस समय उस श्रेठ्ठ सम्पदायवालि दूसरे बति अनुकूछताफी
भावना के उसके चार्रो ओर सट्टे द्वा जाये । थे सब यह
क्रमश: प्रणय आदि वाक्यक्रा उपदेश दे उन सालयंदट!
सावधानी और प्रसन्नताऊे साथ सुत्यद बन करें तथा दाद
तक उसके प्रागोका लय ने ही जाप तदसदा शगन
ज्योतिः:स्वकूप सदादावदा उसे गेस्सर स्वयं इशाद
तत्व
2258
ह
स्टः
ब्यन्की “ला ) | डरा अकनगक- १.
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हम ० कर्ण क+-+ -"श्ा+ कुक पुल च्न्क था #चए नक्त चञ ] रद
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# नमो रुद्राय शान्ताय च्रह्मण परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणा[
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वलम- 209४४ ४७४७७७७७४७४॥७७४४७७७७७७ ७ न ककयाबात4त७७ ऊजक
छोग अत्यन्त दुखी हो जाते हैँ | इसलिये उस दोषका परिहार
करनेके लिये शान्तिका विधान बताया जाता है । उस समय
“नम इरिण्याय? से लेकर “नम अमीवकेम्यः? तकके मन्त्रका
विनीतचित्त होकर जप करे। फिर अन्तमें ऑकारका जप करते
हुए. मिट्टीसे देवयजनकी# पूर्ति करे | मुनीश्वर ! ऐसा करनेसे
उस दोषकी शान्ति हो जाती है ।
( अब संन्यासीके शवके संस्कारकी विधि बताते हैं ) पुत्र
या शिष्य आदिको चाहिये कि यतिके शरीरका यथोचित रीतिसे
उत्तम संस्कार करे | त्रह्मन् ! में कपापूवंक संस्कारकी विधि
वता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो | पहले यतिक्रे शरीरकों
ग़ुद्ध जल्से नहरकर पुष्प आदिसे उसको पूजा करे | पूजनके
समय श्रीरद्रसम्बन्धी चमकाध्याय ओर नमकाध्यायका पाठ
करके रुद्रसुक्तका उच्चारण करे | उसके आगे श्भकी स्थापना
करके राह्ुस्थ जलसे यतिके शरीरका अभिषेक करे | सिरपर
पुष्प रखकर प्रणवद्धार उसका मार्जन करे | पहलेके कोपीन
आदिको हटाकर वूसरे नवीन कौपीन आदि धारण कराये |
फिर विधिपू्वक उसके सारे अज्ञेंमें भस्म छूगाये | विधिवत्
ज्िपुण्ड लगाकर चन्दनद्वारा तिलक करे | फिर फूलों ओर
वालाओंसे उसके शरीरकी अल्ंकृत करे | छाती, कण्ठ, मस्तक;
बह) कलाई और कानोंमें क्रमशः रुद्राक्षकी मालके आयूषण
मन्त्रोच्वारणपूवक धारण कराकर उन सब अज्लोंको सुशोभित
करे | फिर धूप देकर उस शरीरकों उठाये और विमानके ऊपर
रखकर इईशानादि पश्चत्रह्ममय रमणीय रथपर स्थापित करे ।
आदिम ओकारसे युक्त पॉच सद्योजातादि ब्रह्ममन्त्रोंका उच्चारण
करके सुगन्धित पुप्पों ओर मालाओंसे उस रथकों सुसजित
करे । फिर दृत्य) वाद्य तथा ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोच्वारणकी
घ्यनिके साथ ग्रामकी प्रदक्षिणा करते हुए उस प्रेतको
धाहर के जाय |
तदनन्तर साथ गये हुए वे सव यति गँवके पूव या
उत्तर दिशामें पवित्र स्थानमें किसी पवित्र बक्षके निकट देव-
यजन ( गड्डा ) खोदें । उसकी लंबाई संन्यासीके दण्डके
बराबर दी द्ोनी चाहिये | फिर प्रणव तथा व्याद्वति-मन्त्रोंसे उस
थानका प्रोक्षण करके वहाँ क्रमशः शमीके पत्र ओर फूछ
# संन्यासीके शर्रीरकों गाइनेके लिये जो गड्ढा खोदा जाता
है। उसको “देवयबन' कहते दें ।
विछाये | उनके ऊपर उत्तराग्र कुश विछाकर उसपर योफीठ
रक््खे | उसके ऊपर पहले क्ुश बिछाये, कुश्ोंके ऊपर माप
तथा उसके भी ऊपर वच्न विछाकर प्रणवसहित सद्योजातादि
पश्चत्रह्ममन्त्रॉका पाठ करते हुए पश्चगव्योंद्यर उठ शक्का
प्रोक्षण करे | तसश्वात् रुद्रसूक्त एवं प्रणवक्ता उच्चारण के
हुए; शह्भके जलसे उसका अभिषेक करके उसके मस्तकप
फूल डाले | शिष्य आदि संस्कारकर्ता पुरुष वहाँ गये हुए
मत यतिके अनुकूल माव रखते हुए शिवका चिन्तन करा
रहे | तदनन्तर 3“कारका उच्चारण और ख़त्तिवाचन करे
उस शवको उठाकर गड्डेके भीतर योगासनवर इस तरह बिग
जिससे उसका मुख पूर्व दिशाकी ओर रहे । फ़िर चन्दन-पुणसे .
अलंकृत करके उसे धूप ओर गुग्युलकी सुगन्ध दे । इसके
बाद “विष्णों | हृ्यमिदं रक्षस्व! ऐसा कहकर उसके दालि
हाथमें दण्ड दे ओर 'अजापते न त्वदेतान्यन्यो०? (शु०
यजु० २३ । ६५ ) इस मन्त्रको पढ़कर बाय हमे
जल्सहित कमण्डछ अर्पित करे | फिर “ब्रह्म जज्ञान्र प्रथम"
( झु० यज्ञु० १३ । ३ ) इस मन्त्रसे उत्तके मस्तक
स्पश करके दोनों मौंहोंके स्पर्शयूवंक रुद्रसृक्तका जप करे |
तत्यश्रात् 'मा नो महान्तमुत”ः (शु० यजु० १६। १५)
इत्यादि चार मन्त्रोंको पढ़कर नार्यिलके द्वारा यतिके शव
मस्तकका भेदन करे | इसके वाद उस गड्डेकों पाठ दे | फि
उस स्थानका स्पर्श करके अनन्यचित्तसे पाँच बद्ममत्त्रोंका जा
करे | तदनन्तर (यो देवानां प्रथम पुरस्तात? ( महावाएं+
१० । ३) से लेकर “तस्य प्रकतिक्ीनस्थ यः परः स मद्देबए।'
( महानारा० १० । ८ ) तक महानारायणोपनिपद्के मल
जप करके संसाररूपी रोगके भेषज, स्व) खतन्त्र तथा
अनुग्रह करनेवाले उमासहित महादेवजीका चिन्तन एवं पूर्ज
-करे । ( पूजनकी विधि यों है---)
एक हाथ छँचे और दो हाथ लंवे-चोढ़े एक पीठ
मिट्टीके द्वारा निर्माण करे | फिर उसे गोबरसें ढीपे | वह पीठ
चोकोर होना चाहिये | उसके मध्यमांगमें उम्रा-मदिवर '
स्थापित करके गन्ध) अशक्षत) सुगन्धित पुष्य) विल्वातर
तुल्सीदलोंसे उनकी पुजा करे | तलश्रात् श्रणवर्ते धूप और
दीप निवेदन करे | फिर दूध और हृविष्यका नेवेध टी
पाँच वार परिक्रमा करके नमस्कार करे। फ़िर बरिई ४
इंदाससंदिता |
द्रगयका जप करके प्रणाम करे | तदनन्तर ( ब्रक्मीभूत यतिको
: तृत्तिक लिये नारायणपूजन, बलिदान, घुतदीपदानका संकल्प
ऋके गतेके ऊपर -मृण्मय लिक्ग बनाकर पुरुषसूक्तसे पूजा
ऋरकेघृतमिश्रित पायसकी बलि दे |घीका दीप जल्य पायसबलि-
मै उसमें डाल दे ) तसश्रात् दिशा-विदिद्याओंके क्रमसे प्रणव-
४£# यतिके लिये एकादशाह-छृत्यका वर्णन #
७४४७
* आच्चिय्__य्य्य्य्य्य्थ्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य््स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्स्ट्य्ल्यः ॥ाााशीआ आस मई
के उच्चारणपूवक “अ“त्रह्मणे नमः? इस मन्त्रसे ब्र्मीभूत यतिझे
लिये शइ्डसे आठ वार अध्यंजल दे | इस प्रकार दस दिनोंतक
करता रहे | मुनिश्रेष् | यह द्माहतकक्की विधि तुम्दें वत्ताथी
गयी । अब यतियोंके एकादशाहकी विधि सुनो ।
( अध्याय २०-२१ )
>)-0 ७ ७-4
यतिके लिये एकादशाह-कत्यका वर्णन
स्न्दजी कहते हँ--वामदेव ! यतिका एकादशाह
परम दनेपर जो विधि बतायी गयी है, उसका में तुम्हारे स्मेह-
वश बणन करता हूँ । मिट्टीकी वेदी बनाकर उसका सम्मार्जन
ओर उपलेपन करे | तत्पश्चात् पुण्याहवाचनपूर्वक प्रोक्षण करके
पश्िमसे लेकर पू्वकी ओर पॉँच मण्डल बनाये और खबं
प्रादइकता उत्तराभियुख बैठकर काये करे। प्रादेशमात्र लंबा-
चोड़ा चौकीर मण्डल बनाकर उसके मध्यमागमें विन्दु+ उसके
उपर त्रिकोण मण्डछ, उसके ऊपर घटकोण मण्डल और उसके
उपर गोल मण्डल बनावे । फिर अपने सामने श्डकी
सापना करके पूजाके लिये बतायी हुईं पद्धतिके कऋ्रमसे
आय्मन प्राणायाम एवं संकल्प करके पूर्वोक्त पॉच आति-
परिकि देवताओंका देवेश्वरी. देवियोंके रूपमें पूजन करे।
उत्त ओर आसनके लिये कृश डाल्कर जलका स्परों
5२ | पश्चिमसे आरम्भ करके पूर्व॑प्यन्त जो मण्डल बताये
पे ४ उनके भीतर पीठके रूपमें पुष्प रक्खे और उन
पर प्रमशः उक्त पाँचों देवियोंका आवाहन करे
उ अप्रेपज्ञखरूपिणी आतिवाहिक देवीका आवाहन करते
४» ४प प्रकार कह्दे--ओं द्वीं अश्निख्पामातिवाहिकदेवतास्
वादपात्ि गम्न/ | इस प्रकार सर्वत्र वाक्ययोजना और भावना
९ रस तरह पॉ्चों देवियोंका आवाहन करके प्रत्येकके लिये
“पूरक खापना आदि मुद्राआदा प्रदशन करे ।
तश्यात् हाँ ही हू हों हु/+इन
"्य्मग्योद्याय पडड्नन्यास है सा करन्यास करें |
४२८5५ उन देदियोंका इस प्रकार ध्यान करना चादिये।
चर-चार हाथ हूँ । उनमेंसे दो दाथोम वे पाश और
प्यकरतो र॑ ठथा शाप दो हाधोंमे अभय ओर
, ४ ६। उनकी अश्वझान्ति चद्धकन्तमथिफे रुमान
८ के
र््ृ आर
(९ + ९४ पर ++
” लटक प्रचते उन्देंने उन्यूण दिशाओक दुस-
. आप
मण्डलको रंग दिया है। वे छा वस्र धारण करती हैं।
उनके हाथ ओर पर कमलछोंके समान शोभा पाते £ | तीन
नेत्रोंसे सुशोमित मुखर्पी पूर्ण चन्द्रमाकी छठासे वे मनको भोदे
लेती हैं। माणिक्यनिर्मित मुकुर्योेसे उद्धासित चन्द्रल़ेखा
उनके सीमन्तकों व्रिभूषित कर रही हे | कपोलोपर ख्नमय
कुण्डल झलमला रहे हैं | उनके उरोज पीन तथा उन्नत हूँ ।
हार) केयूर। कड़े ओर करपघनीको लड़ियंसि विभूपित दोनेके
कारण वे बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती हैँ । उनका कटिभाग
कृद् ओर नितम्प स्थूल हूँ | उनके अक़ः हाछ रंगे दिव्य
ब्नोंसे आच्छादित हैं। चरणारविन्दीम॑ भाणिक्यनिर्गित
पायजेबोंकी सनकार होती रहती दे । परको अंगुलिये में बिछुओं-
की पंक्ति अत्यन्त सुन्दर एवं मनादहूर दे ।
यदि अनुग्रद् मु्दके समान मूर्तिमान् दो तो उससे दया
सिद्ध हो सकता दे | इतालेये थे देधियोँ मदपरक्री भति
शक्तयात्मक मृर्तिवलि अनुप्रदसे सम्पन्न हू | अतः उनके
अनुग्रदसे सब कुछ सिद्ध हो सकता है। सवार अनुत्रद करने-
वाले भगवान थियने ही उन पॉच सूतियोदों सरदार दिया
रे हज ० बा व्यू सम्पूर्ण कं फा हि पर ०७ कक श _
है | इसलय वे दिव्य) सम्ूर्थय का करनयसे ससय या परम
अनुग्रहमं तर हैँ | इस प्रकार उन सब अनुवाद
कल्याणमयी देवियोंद्ा ध्यान करदे इनक लिये डी दस्त उलट
विन्द्रशद्वाय पर्गम तय; हंपान आधरनाय छा ऋसा दातर .
वूना चादिय | तदरनन्तर शा 6 जड़ी प्रंदव उन था
दा है र्ब्व अ्जुब्व द्रव फरुना का जय ॥+* हू | | १ , हाई न है बल है| ्श पा डे रे नब्य्जु
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रंगके वस्ज श्येर उत्तर भाध्य अर | परदुमाय गशर पे.
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पुष्प चढ़ाये । अत्यन्त सुगन्धित धूप और घीकी बत्तीसे युक्त
दीपक निवेदन करे । इन सब वस्तठुओंको अर्पण करते समय
आरम्भमें 'ऑं हीं? का प्रयोग करके फिर “समपंयामि नमः? बोलना
चाहिये। यथा “ऑं द्वीं अग्न्यादिख्पाभ्यः पद्चदेवीम्य: दीप॑
समर्पयामि नमः ।? इसी तरह अन्य उपचारोंको अपित करते
समय वाक्ययोजना कर लेनी चाहिये ।
दीपसमर्पणके पश्चात् हाथ जोड़कर प्रत्येक देवीके लिये
पृथक्-पुथक् केलेके पत्तेपर पूरा-पूरा सुवासित नेवेध रक्खे ।
वह नैवेद्य थी; शक्कर और मघुसे मिश्रित खीर; पूआ) केलेके
फल और गुड़ आदिके रूपमें हीना चाहिये | “भूझेवः स्व०
बोलकर उसका प्रोक्षण आदि संस्कार करे | फिर “ऑई हीं खाहा
नैचेय निवेदयासि नमः? बोलकर नवेध्वसमपंणके पश्चात् ों
हीं नेदेयान्ते आदमनाथे पानीयं सम५्यासि नमः? कहते हुए
बढ़े प्रेमसे जल अर्पित करे । मुनिश्रेष्ठ ! ततश्रात् प्रसन्नता-
पूर्वक नैवेय्को पूर्व दिशामें हट दे और उस स्थानको झुद्ध
करके कुछा+ आचमन तथा अपध्यके लिये जछ दे । फ़िर
ताम्बूल, धूप और दीप देकर परिक्रमा एवं नमस्कार करके
मस्तकपर हाथ जोड़ इन सब देवियोंसे इस प्रकार प्रार्थना
करे---हदे श्रीमाताओ | आप अत्यन्त प्रसन्न हो शिवपदकी
अभिलाधा रखनेवाले इस यतिको परमेश्वरके चरणारबविन्दोंमें
रख दें ओर इसके लिये अपनी स्वीकृति दें |? इस प्रकार
प्रार्थना करके उन सबका) वे जेसे आयी थीं; उसी तरह बिदा
देकर, विसर्जन कर दे ओर उनका प्रसाद लेकर कुमारी
कन्याओंको बाँट दे या गोंओकोी खिल्य दे अथवा जलमें डाल
दे | इनके सिवा और कहीं किसी प्रकार भी न डाले |
यहीं पाबंण करे | यतिके लिये कहीं भी एकोदिप्ट भ्राद्ध-
का विधान नहीं है | यहाँ पार्वण-श्राद्धके ल्यि जो नियम है,
उसे में बता रहा हूँ | मुनि£.8 ! तुम उसे सुनो | इससे कल्याण-
की प्राप्ति होगी। श्राद्धकर्ता पुरुष स्नान करके प्राणायाम करे |
यशोपवीत पहन सावधान हो हाथमं पवित्री घारण करके देश-
कालका कीर्तेन करनेके पश्चात् भ्म इस पुण्यतिथिको पार्बण-
थाद्ध करूँगा? इस तरह संकल्प करे | संकल्पके वाद उत्तर
दिशामें आसनके लिये उत्तम कुश बिछाये। फ़िर जल्का से
करे | उन आसनोंपर दृढ़तापूर्वक उत्तम त्रतका पालन कज्े-
वाले चार शिवभक्त ब्राह्मणोंकी बुल्गकर भक्तिभावसे बिठाये ।
वे ब्राह्मण उबटन लगाकर स्नान किये होने चाहिये | उनमेंसे
एक ब्राक्षणसे कहं--“आप विख्वेंदेवके लिये यहाँ भाद्व ग्रहण-
करनेकी कृपा करें |? इसी तरह दूसरेसे आत्माके लिये। तीर:
से अन्तरात्माके लिये ओर चोयेसे परमात्माके लिये श्राद्ध ग्रहण
करनेकी प्रार्थना करके आद्धकर्ता यति श्रद्धा और आदसूर्क
उन सबका यथोचितत रूपसे वरण करे | फिर उन सबके पैर
घोकर उन्हें पूवोमिमुख बिठाये और गन्ध भादिसे अंत
करके शिवके सम्मुख भोजन कराये | तदनन्तर वहाँ गेबसे
भूमिको लीपकर पूर्बाग्न कुश बिछाये और प्राणायामपूरक
पिण्डदानके लिये संकल्प करके तीन मण्डलोंकी पूजा करे।
इसके बाद पहले पिण्डको हाथमें ले 'आत्मने इमं पिण्डददामि'
ऐसा कहकर उस पिण्डको प्रथम मण्डलूमें दे दे । वलश्रात्
दूसरे पिण्डकी “अन्तरात्सने इस पिण्ड ददामि! कहकर दूसरे
मण्डलमें दे दे | फिर दीसरे पिण्डको 'परमात्मने इस पिएई
ददामि? कहकर तीसरे मण्डलमें अपित करे | इस तरह भक्ति-
भावसे विधिपूर्वक पिण्ड और कुंशोदक दे | तलश्रात् उठ
परिक्रमा और नमस्कार करे । तदनन्तर ब्राह्मणोंकों विधिवत
दक्षिणा दे | उसी जगह और उसी दिन नारायणवल्ि करें।
रक्षाके लिये ही सर्वत्र श्रीविष्णुकी पूजाका विधान है | आर
विष्णुकी महापूजा करे और खीरका नैंवेध लगाये | ई7*
बाद वेदोंके पारंगत बारह विद्वान, ब्राह्मणोंको बुढ्लकर की!
आदि नाम-मन्त्रोंद्यय गन्ध) पुष्प और अक्षत आदिसे उतके
पूजा करे | उनके लिये विधिपूर्वक जूता; छाता और वन
आदि दे । अत्यन्त मक्तिसे मौति-माँतिके झम वचन कै
उन्हें संतोष दे | फिर पूर्वाग्न कुशोंको बिछाकर ४ भूः सट/
४० भ्रुवः स्वाहा, ४४ खुचः स्वाहा? ऐसा उच्चारण करके हा
खीरकी वलि दे | मुनीश्वर |! यह मेने एकादगाइकी विधि.
बतायी है | अब द्वादशाहकी विधि बर्तोता हूं; आई,
पूवंक छुनो । ( अध्याय २२ )
“7+-+*€5:72/८2५)०-.०...-
ब्ैटाससंदिता ] # यतिके द्वादशाह-कृत्यका वर्णन, स्कन्द् और वामदेवका कैछास पर्वतपर जाना # ४४९
आवक न हा... या आन
यतिके द्वादशाह-कृत्यका वर्णेन, स्कन्द आर बामदेवका कैलास पर्वतपर जाना
तथा खतजीके द्वारा इस संहिताका उपसंहार
स्कन्दजी कहते हैँ--वामदेव ! बारहवें दिन प्रातः-
इट उठकर आद्कर्ता पुरय स्नान और नित्यकर्म करके
शिवभक्तां) यतियों अथवा शिवके प्रति प्रेम रखनेवाले ब्राह्मणों-
को निमन्त्रित करे । मध्याहकालमें स्नान करके पवित्र हुए
उन व्राद्मणेकी बुलाकर भक्तिभावसे विधिपूर्वक भाँति-माँतिके
घादिए अन्न भोजन कराये | फिर परमेश्वक्के निकट विठाकर
'जावरण-पद्धतिसि उनका पूजन करे । तलश्रात् मौनभावसे
ए्रणायाम करके देश-कांछ आदिके कीत॑नपूर्वक महान् संकल्प-
मे प्रणाल्के अनुसार संकल्प करते हुए:---“अस्महुरोरिह .
पं करिप्पे ( में अपने गुरुकी यहाँ पूजा करूँगा )! ऐसा कहकर
कुशका सर्श करे | फिर आह्णेंके पैर धोकर आचमन करके
परदकर्ता मोन रहे और ग
उकता मान रहे और भस्मसे विभूषित उन ब्राह्मणोंको
पं गत भर ०० आदिके
[॥भिमुत्त आसनपर बिठाये | वहाँ सदाशिव आदिके क्रमसे
फपें ञ्् बड़े
| आठ ब्राहाणोंका बड़े आदरके साथ चिन्तन करे अर्थात्
छुर | सूट शिव गदिका पे
" ९ ' “अशिव आदिका स्वरूप माने। मुने। अन्य चार
हप्षणदा भी चार गुरुओंके रूपमें चिन्तन करे | चारों गुर
३ ह-गुद ! परमगुरु) परात्पर गुद और परमेड्ठी गुरु ।
कं ( गुझका उनमें उम्रासहित महेश्वरकी भावना करते हुए.
जा फर। अपने गुरुका नाम लेकर ध्यान करे। उन
बिक लिये
| $ छिप "दमासनम्! ऐसा कहकर प्रथकू-प्थक आसन
तते। आदि प्रणब, बीचमें द्वितीयान्त गुर तथा अन््त्मे
'भिएहय चोलक
कक नि नम बोलकर आवाहन करे | यथा---४०
46 मात गुरुम आवाहयामि नमः | ४» परमगुरुम्
३! शै०॥| प्ि डे ९७
हक लि नमः | अं परात्परगुस्म् आवाहयासि नमः |
पंप [रमू अ
ह्सिका दाहयासि नमः | इस प्रकार आवाहन
४६४ ( अरमे रक््से हुए. जल ) से हनकसत बज > 2 0 0 3 मम लिल लकी आचमन
6 मी न न
७७ | अनपार सोलद आश्यगोफ्ों निमनन््पित करना
“५५ [. हि के +-
-+९ १ ७ जा >आं चुन रू
४+ मो सु परम गुरु, परणेण्ि गुरु और परातपर
हे 52 हट +$
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एज जाए बोर ऋाएजिठटक 3० >नी: के
ले “४ आधयदित केशयारि नानोये पडा
ह। रब ष्टाँ
७ तप पएएमसपे गये. दर्तर
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हम के हज जऊमुदार बारए
बज इक दुर«त। २
११«॥)१ धर] जभाररदऊ हि [
ओर अर्ध्य निवेदन करे | फिर वच्च, गन्ध और अश्वत देकर
'ओं गुरवे नमः? इत्यादि रूपसे गुरुओंको तथा “ओं सदाशिवाय
नमः? इत्यादि रुपसे आठ नामेक्रे उच्चारणपूर्वक आठ अन्य
ब्राह्मणोंकी सुगन्धित फूलोंसे अलंकृत करे । तलश्ात् धूप:
दीप देकर “कृतमिदं सकलमाराधन सम्पर्णमस्तु ( की
गयी यह सारी आराघना पृर्णल्पसे सफल हो )! ऐसा कहकर
खड़ा हो नमस्कार करे | इसके बाद केलेके पत्तोंक्रो पान्ररूपमें
विछाकर जलसे शुद्ध करके उनपर झुद्ध अन्न) खीए पृआ)
दाल ओर साग आदि व्यजञ्ञन परोसकर केलेके फछ) नारियल
ओर गुड भी रखे । पात्रोंकीं रखनेके लिये आसन
भी अल्ग-अल्ग दे | उन आसनेंका क्रमशः प्रीक्षण करके
उन्हें यथास्थान रक्खें | फिर भोजनपात्रका भी प्रीक्षण एवं
अभिपेक करके हाथसे उसका सझ्य करते हुए. कंदे---
“विष्णों | हृव्यमिदं रक्षस्व ( हे विष्णों | इस दृविष्यकों आज
सुरक्षित रक्खें )) फिर उठकर उन ब्राह््णको पीनेके लिये जल
देकर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करें--सदाशिवादयों में
प्रीता वरदा भवन्तु (सदाशिव आदि मुझपर प्रसन्न हो अभी?
वर देनेवाले हां )? | ।
इसके बाद प्ये देवा! (दयु० यजुर 23 दसट४ /
आदि मन्त्रका उच्चारण करके अश्नतसद्विति इस अन्मका त्याग.
करे । फिर नमस्कार करके उठे ओर “सर्वत्राकृतमस्नु ॥
ऐसा कहकर बआद्षणोओरी संतुए करके नगगानां हथा!। दर बे)
२३। १९ ) इस पहे पद करे भागे दाग
आदिमन्त्रोंका, डद्धाश्यादका:
ण् कक बिक किलर गा हर
तथा सम्रीज्ञातांद पास अध्यॉसन्द्ाओंं कैद कब. | चना:
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बॉसकी छड़ी देकर परिक्रमा ओर नमस्कारके द्वार उन
ब्राह्मणोंकों संतुष्ट करे तथा उनसे आशीर्वाद के | पुनः प्रणाम
करके गुरुके प्रति अविचल भक्तिके लिये प्राथेना करे | तत्पश्रात्
विसर्जनकी भावनासे कहे---“सदाशिवादयः श्रीता यथासुख्
गच्छन्तु? ( सदाशिव आदि संतुष्ट हो सुखपूबंक यहँसे पधारें )।
इस प्रकार विदा करके दरवाजेतक उनके पीछे-पीछे जाय ।
फिर उनके रोकनेपर आगे न जाकर लोट आये | लौय्कर
द्वारपर बैठे हुए ब्राह्मणों, बन्धुजनों दीनों और अनाथोंके साथ
खये मी मोजन करके सुखपूवक रदे। ऐसा करनेसे उसमें कहीं भी
विकृति नहीं हो सकती | यह सब सत्य है) सत्य है ओर बारंबार
सत्य है | इस प्रकार प्रतिवर्ष गुरुकी उत्तम आराधना करने-
वाला शिष्य इस लोकमें महान् मोगोंका उपभोग करके अन्तममें
शिवलोकको प्राप्त कर लेता है |
मुने ! यह साक्षात् भगवान् शिवका कहा हुआ उत्तम
रहस्य हैः जो वेदान्तके सिद्धान्तसे निश्चित किया गया है।
तुमने मुझसे जो कुछ सुना है। उसे विद्वान् पुरुष तुम्हारा ही
मत कहेंगे । अतः यति इसी मार्गसे चलकर “शिवो5हमस्मिः
( मैं शिव हूँ ) इस रूपमें आत्मखरूप शिवकी भावना करता
हुआ शिवरूप हो जाता है ।
सूतजी कहते है--इस प्रकार मुनीश्वर वामदेवको
उपदेश देकर दिव्य शानदाता गुरु देवेश्वर कार्तिकेय पिता-
वि नम नि मजाक कक जा कल ली जज कम कमवशइाक से सिर वपपपन कर कप त्॒वनानाञापकषयकलेतरतन।चका भा पइकधककक कप तन नक्त पका मकर नया मकर बह व्य्रथन्ःक़म दूतप उप हनदलम का भुकवक काम शापसाप सहारा दधमायक
माताके सर्वेदेववन्दित चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए
अनेक - शिखरोंसे आइत, शोभाशाली एवं परम आश्रयंगय
कैंशासशिखरको चले गये | श्रेष्ठ शिष्योंसहित वामदेव भी
मयूरवाहन कार्तिकेयकों प्रणाम करके शी्र ही परम अदूपुत
क्रैासशिखरपर जा पहुँचे ओर महादेवजीके निकट जा
उन्होंने उमासहित महेश्वरके-मायानाशक मोक्षदायक चर्णेत्न
दर्शन किया । फिर भक्तिमावसे अपना सारा अब भाव
शिवको समर्पित करके; वे शरीरकी सुधि भुझाकर उनके
मिकट दण्डकी माँति पड़ गये ओर वारंबार उठ-उठकर
नमस्कार करने छगे | तत्यश्चात् उन्होंने भौति-मॉतिके स्तोत्र
द्वार) जो वेदों और आगरमोंके रससे पूर्ण थे. जगदम्या ओर क्
पुत्नस॒हित परमेश्वर शिवका स्तवन किया । इसके वाद देवी क्
पार्वती और महादेवजीके चरणारविन्दको अपने मस्तक
रखकर उनका प्र॒ण अनुग्रह प्राप्त करके व॑ वहीं सुखपुवंक
रहने छगे | तुम सभी ऋषि भी इसी प्रकार प्रणवक्रे अर्थभूत
महेश्वर्का तथा वेदोंके गोपनीय रहस्य) वेदसवेख अआः
मोक्षदायक तारक मन्त्र डँ“कारका शान प्राप्त करके यहाँ सकते .
रहो तथा विश्वनाथजीके चरणोंमें- सायुज्यस्पा अहम हा.
उत्तम मुक्तिका चिन्तन किया करो | अब मैं गुर्देवकी तेवाके
लिये बदरिकाश्रम तीर्थकों जाऊँगा । तुम्हें फिर मेरे साय
सम्भाषणका एवं रत्सड्रका अवसर प्राप्त हो ।
( अध्याव ९२ ।
-)'आा७ ७ ७७---<-
॥ कैलाससंहिता सम्पूर्ण ॥
३
दम,
सी कक कर अटल किक 333 4“ “सु
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। का * 6 खण्ड द
वायवायसाहिता ९ पूवंँ्धण्ड )
प्रयागर्मे ऋषियोंद्वारा सम्मानित छतजीके द्वारा कथाका आरम्भ, विद्यास्थानों
एवं पुराणोंका परिचय तथा वासुसंहिताका प्रारम्भ
व्यास उत्ात्त
जम शिवाय सोमाय सगणाय ससूनवे ।
- प्रधानपुरुषेशाय सगस्थित्यन्तहेतवे ॥
धक्तिस्ततिमा यस्य झोश्वयं चापि सर्वगम ।
सामित्व॑ च विभुत्व॑ च खमाव॑ सम्प्रचक्षते ॥
पेम्ण॑ विश्वकर्माणं.. शाख्रतं शिवमन्ययप्र ।
भद्दादेव॑ मद्दात्मानं॑ बजामि शरण शिवम ॥
व्यासज्ञी कहते ह--जो जगतूकी स॒ष्टि, पालन और
'ंशरके हेतु तथा प्रकृति और पुरुषके ईश्वर हैं, उन प्रमथ-
_? उनय तथा उम्रासहित भगवान् शिवकों नमस्कार है ।
'जिककी शक्तिकी कहीं तुलना नहीं है, जिनका ऐश्वय सर्वत्र
आापक है तथा स्वामित्व और विभुत्त जिनका खभाव कहा
के ९ उन विश्वश्वण, सनातन, अजन्मा, अविनाशी, महान्
५० मशद्मय परमात्मा शिवकी में शरण छेता हद]
नी धर्मका क्षेत्र और महान् तीर्थ है, जहाँ गज़ा और
जात सोम हुआ है तथा जो बद्यलोकका मार्ग है, उस
“गत शुद्ध हुदयवाले सत्यत्रतपरायण महातेजस्वी एवं
“शमाग मुनियोने एक महान यशक्ता आयोजन किया |
हे ड्यरदित कर्म करनेवाे उन *महात्माअंकि यज्ञका
करे हक निपुण कथावाचक, त्रिकालेवेत्ता, उत्तम
हक ता गा कऋन््तदर्शी विद्वाद पौराणिकशिरोमणि
20 सानपर आये | सूतजोकफ़ो आते देख
। / सन प्रसन्नताते खिल उठा । उन्होंने उनसे
+ नीर्य मधुर बातें कहर उनकी यथायोग्य पूजा
*३क् * पापों धरा की हुई उस पूजाको ग्रहण करके सूतजीने
हि | हि झरने लिये बताये गये उपयुक्त आसनकों
शी अत समय मइरपियोंने अनुकूल ययनोंद्धार
जात" पे हुए उन्हें अत्य्त अख्छुल करे
कक
बन लिप
है! हि दृत 'शपः द ५.90... धहाच: +
ज्रप जि क 4 न ्मय सहादुद्धिबानू माता
है ।
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5. मम, प्रश है कोर हमारे मे गन
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प् दि ५ च्दु हे जम , सज च् न 4
० परार ३ | छाया सॉद्रेमे एड़ी फोड़ प्त
नहीं है, जो आपको विदित न हो | आप भाग्यवश हमें
दरन देनेके लिये स्वयं वहाँ आ गये हैं। अतः अब हमारा
कोई कल्याण किये बिना आपको यहोंसे व्यर्थ नदीं जाना
चाहिये | इसलिये आप हमें शीघ्र वह पवित्र पुराण सुनायें,
जी अत्यन्त श्रवणीय, उत्तम कथा और शानसे युक्त तथा
वेदान्तके सारसवंल्वसे सम्पन्न हो |
वेदबादी मुनियंनि जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब
सूतजीने मधुर, न्यायथुक्त एवं शुभ वचनोंमें उन्हें इस प्रफार
उत्तर दिया।
सूतजीने कहा--महर्पियो ! आपने मेरा सत्कार क्रिया
और मुझपर कृपा की दै। ऐसी दक्षामें आपत्ते प्रेरित दोऋर
में आपके समक्ष महर्पियोंद्वारा सम्मानित पुराणका भरीभोति
प्रवचन क्यों नहीं करूँगा | अब में मद्देवजी, देवी पार्नती)
कुमार स्कन्द, गणेशजी, नन्दी तथा चत्ववतीकुमार साझत्
भगवान् व्यासकों प्रणाम करफे उस परम पवित्र वेइलुस्य
पुराणकी कथा कहूँगा, जो शिवतत््यफे सानका लागर | और
भोग एवं मोक्षरमी कझे देनेवाला साक्षात् खधय है । वियाद्व
सम्पूर्ण खानोंका; पुराणोंकी संज्याका और उनकी उल्यदिद्ा
विवरण दे रहा हूँ। आपलोग मुझते इस सिपयको ध्यान
पूवक मु्ने | छः वेदाद्। चार वेद, मीमासा, दलित
न्यायशासत्र, पुयण ओर धर्मआरा-नये चीडट पियाएँ # |
इनके साथ आयुर्येद, पनर्वेद, गन्धबधद और उसमे आर:
शाखत्रकों भी गियत लिया जाय तो ये वियाएँ उद्ारद ते दी
हैं । इन अठारद विद्याओडे माय एड दस्त मिन्न हुँ ।
इन सबके निर्माता वरिशा्थ्यर्शों शिद्वाम
शूलपाणि शिव हैं। ऐला प्रतिका झबन ४ | स्म्पून
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प्रात्त करके जब प्रजाकी सष्टिके विस्तारकार्यमें छगे, तब
उन्होंने सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पहले पुराणको ही स्मरण किया और
उन्हींको वे प्रकाशमें छाये । पुराणोंके प्रकट होनेके अनन्तर
उनके चार मुखोंसे चारों वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ । फिर उन्हीं-
के मुखसे सम्पूर्ण शास्त्रोंकी प्रव्नत्ति हुईं ।
द्वापरमें भगवान् श्रीहरि सत्यवतीके गर्भसे उसी तरह
प्रकट हुए; जेसे अरणिसे आग प्रकट होती है | उस समय
उनका नाम श्रीकृष्णद्पायन हुआ । मुनिवर | श्रीकृष्ण-
दपायनने वेदोंको संक्षित करके उन्हें चार भागोंमें विभक्त
किया । इस प्रकार चार भागंमें वेदोंका व्यास ( विस्तार )
करनेसे वे छोकमें वेदव्यासके नामसे विख्यात हुए. । इसी
तरह उन्होंने पुराणोंको संक्षित करके चार छाख इलोकॉमें
सीमित किया । आज भी देवलोकमें पुराणोंका विस्तार सो
कोटि इलोकोंमें है । जो द्विज छहों अज्ों और उपनिषदों-
सहित चारों वेदोंको तो जानता है किंतु पुराणको नहीं
जानता, वह श्रेष्ठ विद्वान नहीं हो सकता | इतिहास और
पुराणोंसे वेदकी व्याख्या करे | जिसका ज्ञान बहुत कम है
अर्थात् जो पौराणिक ज्ञानसे शूल्य है, ऐसे पुरुषसे वेद यह
सोचकर डरता है कि यह मुझपर प्रह्यर कर बेठेगा ) सर्ग
प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर ओर वंशानुचरित--ये पुराणके
पाँच लक्षण हैं | छोटे ओर बढ़ेके भेदसे अठारह पुराण बताये
गये हैं | १--क्षपुराण,। २--अग्मपुराण। ३--विष्णुपुराण,
.४--शिवपुराण, ५---भागवतपुराण, ६---भविष्यपुराण, ७---
नारदपुराण, ८--माकण्डेयपुराण, ९---अग्निपुराण, १०---
बहावेवतेपुराण, ११--लिड्गपुराण, १२--वाराहपुराण, १३---
स््कन्दपुराण; १४--वामनपुराण, १५--क्रूमपुराण, १६---
“5 ><«><>&#&#८<-००---:::<
+# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
वे भगवान् विष्णु ब्रह्माजीके भी पालक हैं । ब्रह्मजी विद्या
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
मत्स्पपुराण, १७--गरुड़पुराण ओर १८--लह्माण्डपुरण--
यह पुराणोंका पवित्र क्रम है | इनमें शिवपुराण चोथा है; जे
भगवान् शिवसे सम्बन्ध रखता है ओर सब मनोरणोंक्रा
साधक है । इस ग्रन्थकी इलोकसंख्या एक छाख है और
यह बारह संहिताओंमें विभक्त है । इसका निर्माण साक्षात्
भगवान शिवने ही किया है तथा इसमें . धर्म प्रतिष्ठित है।
वेदव्यासने इस एक लाख इलोकवाले शिवपुणणक्रो
संक्षित करके चोबीस हजार इलोकॉका कर दिया है।
इसमें सात संहिताएँ हैं । पहछी विद्येश्वरसंह्िता,
दूसरी रुद्रसंहिताः तीसरी. शतरुद्रसंहिता) . चोषी
कोटिरुद्रसंहिता, पॉँचर्वी उमासंहिता, छठी कैल्यससंहिता और
सातवीं वायवीयसंहिता है। इस प्रकार इसमें सात ही संहिताएँ हैं।
विद्येश्वरसंहितामें दो हजार; रुद्रसंहितामें दस हजार पाँच से)
शतरुद्रसंहितामें दो हजार एक सौ अस्सी) कोटिस्द्रसंहिताम
दो हजार दो सौ चालीस) उमासंहितामें एक हजार आठ गे
चालीस, कैल्ाससंहितामें एक हजार दो सौ चालीस और
वायवी यसंहितामें चार हजार श्लोक हैं। इस परम पवित्र
शिवपुराणकी आपलोगोंने सुन॒ लिया । केवल चार इज
इलोकोंकी वायवीयसंहिता रह गयी है; जो दो भागोंते युक्त
है। उसका वर्णन मैं करूँगा । जो वेदोंका विद्वान न 6
उससे इस उत्तम शास्त्रका वर्णन नहीं करना चाहिये । जो
पुराणोंको न जानता हो और जिसकी पुणाणपर श्रद्धा न हो)
उससे भी इसकी कथा नहीं कहनी चाहिये । जो भगत
शिवका भक्त हो) शिवोक्त घर्मका पाठन करता दी अं पर
दोषदष्टिसे रहित हो/ उस जॉचे-बूझे हुए धर्मात्मा शिथक्ी
ही इसका उपदेश देना चाहिये । जिनकी कपते मुझको
पुराणसंहिताका शञान है; उन अमिततेजस्वी भगवान् व्यामक्ी
नमस्कार है । ( अध्याय १)
ऋषियोंका त्रह्माजीके पास जा उनकी स्तुति करके उनसे परमपुरुषके विषय प्रश्न करना
आर ब्रह्माजीका आनन्दमग्न हो 'रुद्र” कहकर उत्तर देना
श53०
सूतजी कहते हँ--महर्षियो | पहले अनेक कद्योंके
बारंवार बीतनेपर सुदीर्धकाछके पश्चात् जब यह वर्तमान कल्प
उपसित हुआ और खष्टिका कार्य आरम्भ हुआ; जब जीविका-
साधक कर्म--क्ृषि, गोरक्षा ओर वाणिज्यकी प्रतिष्ठा हुईं तथा
प्रजावर्गके लोग सजग एवं सचेत हो गये, तब छः कुलोंमें
क्र
योमें +६ यह तरह
उत्पन्न हुए. महर्षियोंमें परस्पर बहस छिड़ गयीं | 7६
5 कक > टोने ला |
है, यह नहीं है? इस प्रकार उनमें मद्दान् विवाद दर्नि :
शी गनेक कि उम
किंतु परम तत््वका निरूपण अत्यन्त कठिन द्वेनिके कीं
थे सब खा जग:
समय वहाँ कुछ निश्चय न दो सका । तब वे सब लोग जाई
कस. ऋ स्वाति हि
लश अविनाशी ब्रद्गाजीका दर्शन करनेके लिये उस खर्नीं
वायवीयसंदिता ] # ऋषियांका ब्रह्माजीफे पास जा उनसे परम पुरुपके विषयमे प्रश्न करना # ४५३
गये; जहाँ देवताओं ओर असुरोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते
हुए भगवान् ब्रह्मा विशजमान ये । देवताओं और दानवोंसे
भरे हुए सुन्दर रमणीय मेद-शिखरपर; जहाँ सिद्ध और चारण
परस्पर वातचीत करते हैं, यक्ष ओर गन्बव सदा रहते हैं;
तिदृंगमेक्रि समुदाय कलर करते हैं, मणि ओर मूँगे जिसकी शोभा
खाते हैं तथा निकरुञ्न, कन्दराएँ, छोटी ग॒फाएँ ओर अनेकानेक
गिर जिसे मुशोमित करते हैं, एक त्रह्मबन नामसे प्रसिद्ध
वन है । उसमें नाना प्रकारके वन्यपश्ु भरे हुए हैं | उसकी
दंबाई सो योजन और चोड़ाई दस योजनकी है । उसके भीतर
एक रमणीय सरोवर है, जो सुस्वादु निर्मेल जल्से मरा रहता
£ | वहक्ि रमणीय पुष्पित बृक्षोंपर मतवाले भौरे छाये रहते
दै | उस वनमें एक मनोहर एवं विश्ञाल नगर है; जो प्रातः-
कादके सूयंकी भाँति प्रकाशित होता रहता है । वहाँ दुर्धप
परक्तित युक्त बल्मयभिमानी देत्य, दानव तथा राक्षसोंका निवास
ई। बहू नगर तपाये हुए सुबणका वना जान पड़ता है ।
उप्की चहारदीवारियोँ और सदर फाटक बहुत ऊँचे हैं।
ओोटे बुर्नो,दादू छर्तों, आवासस्थानों तथा सेकड़ों गलियोंसे उस
पंख बड़ी शोमा है। वह विचित्र बहुमूल्य मणियोंसे
आकाग्कों चूमता-सा प्रतीत होता है तथा कई करोड़ विशाल
: मपनेसे अछंकृत है |
उस नगरमें प्रजापति ब्रह्मा अपने सभासदोंके साथ निवास
जे हैं | व्तं जाकर उन मुनियोने साक्षात छोक्पितामद
वध) देखा । देवपिंयोंके समुदाय उनकी सेवामें बैठे ये ।
+ अक्षयान्ति शुद्ध सुवर्णके समान थी | वे सब आभूपणसे
'(मूपत थे | उनका मुख प्रसन्न था। उससे तौम्यभाव प्रकट
7 आ। उनके नेत्र कमल्दल्के)समान विश्ञाल थे । दिव्य-
"पे मभन्न, दिव्य गन्ध एवं अनुलेपनसे चर्चित, दिव्य
"थे पते सुशोभित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित ब्रद्माजी-
ठप 'ाररसरोडो बन््दना सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा योगीन्द्र भी
ये उसे थण्य दिवाकरकी सेवा करती क उसी प्रकार
ह उन रउगत्ति युक्त साज्ञात् तरखती देवी हाथमें चँँदर
कै हे ते कर रही थीं, इससे उनकी वे डी याद दो
दे आई |
"पथ
/१:९*|
| पु भ] नह पद उन षिं का श्स दे
हे वे करके उने सभी सद॒पियोके सुस् और
रे 5 +5
+ हे "फू ्ः हल
रे ुुर कम चर छः ८०8 शकाजश
: + । ऊन्दने सलऊपएर अड्डलि वोपऊर उन सुर-
नई ५ बुक हे . आर
/ “४ ई २! |
हक वश जन >->-+म-ाम--+५० न आआन- जाकर
एम-एन्या 7 अकिपकि-मकययझ-आ-क - जय
कि जज है कुछ की बे चडाा
5 हक, न्प्छ
हा (ई
क्लषि वोले--संसारकी झशि पालन और संदारफें देतु
तीन रूप धारण करनेवाले आप पुराणपुरुष परमात्मा ब्रद्माफो
नमस्कार है| प्रकृति जिनका शरीर ऐ जो प्रकृति श्लोभ
उत्पन्न करनेवाले हैं तथा प्रकृतिब्पर्म तेदेस व्रिक्रारॉँधि युक्त
होनेपर भी जो वास्तवमें निर्दिकार हँ। उन अडादिवफों नमस्कार
है| ब्रह्माण्ड जिनकी देदू दे; तो भी जो ब्रद्माण्डफे उदरमे
निवास करते हैं तथा वर्दों रहकर जिनके कार्य और हरय सम्पकू-
हुपसे सिद्ध होते हैं, उन ब्रद्माजीकी नमस्हार हें। जो सर्वच-
टोकखस्प तथा समस्त दोकोंक्रि क्षश हैं; जो सम्यूथ डोदड्रा
शारयीरसे संयोग ओर वियोग करसनेम टेलु हैं; उन अद्गभीणे
नमस्कार दे । नाथ ! पितामद | आउने दी सखूर्ण जगनमूओं
दष्टि, पालन ओर संदार होते हैं; तथाएं भाडाने झाउत इनके
कारण एम आपको नहीं डानते |
स्ूतजी कहते ह--उन मद्ा्ग मइगि शेड इस दडार
स्तुति करनेपर अज्ञानी उन दुनियोसि भादाद दाने अर टुए
गम्भीर दागीमे इस प्रद्य बाई |
वब्रह्माजीनि ऋहा--मद्ान सच्कु गर्म
महतिजस्दी महदियों ! उमर चर दोगे ए८ «ब पा डिस जिद
5 3 र
अशाह 5 ₹। प्र 5 5 55
व गज ० न की 5
््छ ज.
थे
व्युशक कल्काण हू धकाए ४ एज हैं हछ।०।े: कक
मुनि पिता नफ:३क5 ५, ४०-०५
3५ ४
कारसे आधृत हो खिन्न हो रहे. हैं | परस्पर विवाद करते हुए
हमें परम तत्त्वका साक्षात्कार नहीं हो रहा है । आप सम्पूर्ण
जगत्के घारण-पोषण करनेवाले .तथा समस्त कारणोंके भी
कारण हैं | नाथ ! यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको
विदित न हो । कौन ऐसा पुरुष है, जो सम्पूर्ण जीवोंसे पुरातन;
अन्तयांमी उत्कृष्ट विश्युद्ध परिपूर्ण एवं सनातन परमेश्वर है !
कोन अपने अद्भुत क्रियाकल्यपद्दारा सबसे प्रथम संसारकी सृष्टि
# नमो रुद्रायं शान्ताय बह्मणे परमात्मने #
[ संज्षिप्त-शिवपुराणाइ्
करता है ! महाप्राज्ञ | हमारे इस संदेहका निवारण केक
लिये आप हमें परमार्थ-तत्त्वका उपदेश दें | ।
मुनियोके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीके नेत्र आश्रय
खिल उठे | वे देवताओं, दानवों और मुनियोके निकट से
हो गये ओर चिरकाल्तक ध्यानमम्म हो “रद्र? ऐसा कहते हुए
आनन्दविभोर हो गये | उनका सारा शरीर पुरकित हो उठा
ओर वे हाथ जोड़कर बोले | ( अध्याय २)
“"बऔे5>४क्सॉोय..--
त्रह्मजीके द्वारा परमतत्नके रूपमें भगवान् शिवकी ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी क्ृपाकों ही सर्व
साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिपारण्पमें आना
ब्रह्माजीने कहा--मुनियो | जिन्हें न पाकर मनसहित
वाणी लौट आती है, जिनके आनन्दमय स्रूपका अनुभव
करनेवाल्य पुरुष कभी किसीसे नहीं डरता, जिनसे सम्पूर्ण
भूतों और इन्द्रियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्रपू्वक
. यह समस्त जगत् पहले प्रकट होता है; जो कारणोंके भी सश
ओर विचारक परमकारण हैं, जिनके सिवा और क्रिसीसे कभी
भी जगत्की उच्तत्ति नहीं होती, # सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न
होनेके कारण जो स्वयं ही सर्वेश्वर नाम घारण करते हैं, सब
मुम॒क्ु जिन शम्मुका अपने हृदयाकाशके भीतर ध्यान
करते हैं, जिन्होंने सबसे पहले मुझे ही अपने पुत्रके रूपमें
उत्पन्न किया और मुझे ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान दिया; जिनके
कृपाप्रसादसे मैंने यह प्रजापतिका पद प्राप्त किया है, जो
ईश्वर अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चछक भावसे प्रकाशमान आकाशमें
विराजमान हैं; जिन परमपुरुष परमात्मासे यह सम्पूर्ण जगत्
परिपूर्ण है, जो अकेले ही बहुत-से निष्क्रिय जीवोंके शासक एवं
उन्हें सक्रियता प्रदान करनेवाले हैं, जो महेश्वर एक बीजको
अनेक रूपोर्म परिणत कर देते हैं; जो सबका शासन
करनेवाले ईश्वर इन जीवॉसहित इन समस्त लोकोंको वगमें
# यतोी वाचो निवतंन्ते अप्राप्प मनसा सह ।
आनन्द यस्थ वे विद्वान्ू न विभेति कुतश्चन ॥
यसात् सर्वंरिदं अद्यविष्णुरदरेन्द्रपूवंकम् |
जा गे]
सह भूतेन्द्रियेः सर्वे: प्रथम सम्प्सयते ॥
कारणानां 'च यो धाता ध्याता परमकारणम् ।
न सम्प्रसयतेषन्यस्मातू कुतश्वन कद्राचन ॥
(शि० पु० वा० सं० पू्० खं -38| १-३ )
|]
रखते हैं, सब रूपोंमें जो एकमात्र भगवान् रद्र ही हैं; दूसरा
कोई नहीं है, जो सदा ही मनुष्योंके हृदयमें मलीभौति प्रविष
होकर स्थित हैं, जो खयं सम्पूर्ण विश्वको देखते हुए भी
दूसरोंसे कदापि लक्षित नहीं होते और सदा समस्त जगतके
अधिष्ठाता हैं, जो अनन्त शक्तिशाली एकमात्र भगवान् रूद्र
कालसे मुक्त समस्त कारणोंपर भी शासन करते हैं, जिनके
लिये न दिन है न रात्रि है, जिनके समान मी कोई नहीं हैः शिर
अधिक तो हो ही कैसे सकता है, जिनकी ज्ञान। वढ और
क्रियारूपा पराशक्ति खामाविक एवं नित्य है।?# जो इस बः
( विनाशशील ), अव्यक्त ( प्रकृति ) पर तथा अमृतखहप
अक्षर ( अविनाशी ) जीवात्मापर शासन करते हैं, उनकी
निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उनमें लगाये रहनेते तया
उन्हींके तत्त्वकी भावना करते हुए उनमें तन्मय रहनेते दीव
अन्तमें उन्हींको प्रात्त हो जाता है। फिर तो सारी माया
अपने-आप दूर हो जाती है | उनके पास न तो बिजली प्रकाश
करती है और न सूर्य तथा चन्द्रमा ही अपनी प्रभा फेलवेए
अपितु उन्हींके प्रकाइसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित लेता है। ऐश
सनातन श्रुतिका कथन है || एकमात्र महादेव महेश्वरको दी अा
3०3 कब रब 52222 32 न जन ने बन कक “कल कलम जमकर
# न यस्य दिवसो रात्रिन समानो न चाधिकः ।
स्वाभाविकी परादक्तिनित्या जश्ञानक्रिये अपि ॥
वि ै ! १)
( शि० पु० वा० सं० पू० ख० ३ 3
। यस्िन्न भासते विद्न्ञ सूर्यों न च चन्धमाः |
यस्य भासा विमातीदमित्येपा- शाश्वत श्रुतिः ॥
( शि० पु० वा० सं० पू० खु० रे । (ड )
पवीयसंदिता ]. » ब्रह्माजीके द्वारा परमंतत्त्वके रूपमे भगवान् शिवकी मद्धत्ताका प्रतिपादन #.. ४५५
ग़राथदेव जानना चाहिये। उनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई पद
पलन्ध नहीं दोता । ये खयं द्वी सबके आदि हैं, किंतु
टनका न आदि है न अन्त । ये खमावसे ही निर्मेठ, खतन्त्र)
(पिर्प, लेच्छाधीन तथा चराचरूूप हैं । इनका शरीर
>्पराकृतिक ( दिव्य ) है। ये श्रीमान् महेश्वर लक्ष्य और
खणसे रहित हैं । ये नित्यमुक्त होकर सबको बन्धनसे
पुक्त करनेवाले हँ। काल्की सीमासे परे रहकर कालको
प्ररित करनेवाले ६ |# ये सबके ऊपर निवास करते हैं | खयं
ह सबके आवासस्थान हैं; सर्वज्ञ हैं. तथा छः प्रकारके अध्वा
( मार्ग ) से युक्त इस सम्पूर्ण जगतके पाल्क हैं | उत्तरोत्तर
इक भूत॑सि वे परम उत्क्ृष्ठ हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं
है। अनन्त आनन्दराशिरूपी मकरू्दका पान करनेवाले मधुन्रत
( प्रमर ) हैं। अखण्ड ब्रद्माण्डोकी मसलकर मृत्पिण्डके समान
5२ देनेकी कलामें पण्डित हैं | उदारता) वीरता, गम्भीरता
ओर मधुरताके महासागर हैं | इनके समान भी कोई वस्तु
नहीं है, फिर इनसे यद्कर तो हो ही कैसे सकती है। ये उपमा-
एवत ६। समस्त प्राणियोंक्रे राजाधिराजके रूपमें विराजमान
₹।ये हे सध्कि प्रारम्ममें अपने अद्भुत क्रियाकलापद्दारा
(१ सशू्ण जगतकी स॒ष्टि करते हैं और अन्तकाल्में यह फिर
#शमं ढीन हो जायग! । सब प्राणी इन्हींके वद्ममें हैँ । ये
0 सबकी विभिन्न कार्यो नियुक्त करनेवाले हैं | पराभक्तिसे
0 इन; दर्शन होता है, अन्य किसी प्रकारसे कमी नहीं
पते) समूणे दान; तपस्या और नियम-इन सब साधनोंको
परम सपुस्षोने भावशुद्धि तथा अनुरागकी उत्त्तिके
| पताश था) इसमें संशय नहीं है । में, भगवान् विष्णु,
हा तथा दूसरेदूनरें देवता एवं असुर आज भी उग्र
3६४४ दर उसके दर्शनकी इच्छा रखते हैँ। घर्मश्रषट
गैर पृ्चित आचार-विचारवाछे छोगोंको उनका
+ ह | उस्तेनय ई। भक्तजन भीतर ओर बाहर भी
आह इृप्न एवं प्याग करते
५
है"
॥.
ँ,
| यह छप तान प्रकारका
8 हओा 2९२ जुनाव्
४ अजय 4 दारदल:
एफपयरउथदा जता ।
एकल पपररद ॥
(् (99 ए० योा० सं० पू० सउ० २ । है)
है--त्यूछ, सूक्ष्म और इन दोनेंते परे | हम सब देवता
आदि जिस रूपको प्रत्यक्ष देखते हैँ, वह स्थूछ है। सूक्ष्म
रुपका दर्शन केवल योगियोंकों होता है ओर उससे भी परे
जो नित्य, शानखरूप) आनन्दमय तथा अविनाशी मगवत्सरूप
है, बह उसमें निष्ठा रखनेवाले भजनपरायण भक्तोंकी दी
दृष्टिमं आता है । मगवद्बतका आश्रय लेनेवाले भक्त
उसको देख पाते हैं । इस विपयरम अधिक कहनेसे क्या
लाभ, गुहयसे मी गुह्मतर एवं उत्कृष्ट साथन है भगवान्
शिवके प्रति भक्ति | जो उस भक्तिसे युक्त दे। वह संसार-
बन्धनसे मुक्त हो जाता है--इसमें संदेह नहीं है । वह भक्ति
भगवान, शिवकी कृपासे ही उपलब्ध होती दे और उनकी
कृपा भी भक्तिसे द्वी सम्भव होती दै--इस प्रकार ये दोनों एफ
दूसरेके आश्रित हँ--ठीक वैसे ही; जेते अकुरते व॑ ज ओर बीजसे
अछुर होता है | जीवको भगवत्कृपासे द्वी समन सिद्धियों
मिलती हैं | सम्पूर्ण साधनोंते अन्त भगवानकी छुपा दी
साध्य है। अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रशादका साधन दे धम
और उस धर्मके खरूपका प्रतिपादन बेदने किया दे। वेद:
अभ्याससे पहलेके पुण्य और पापेमि रूमता आती है) उन
समतासे प्रसाद ( प्रसन्नता या अन्तः्शद्धि ) का ससः £ प्राप्त
हेता है और उससे घर्मकी इंडि दोठी 4 । पसकोी एद्धिस पष्
( जीय ) के पार्पोका क्षय होता ६॥ इस तार ल्िसिक आप
क्षीप हो गये हैँ; उस लीदको अनेक उत्माद्न अश्वाशम
क्रमशः उमा-मदेखरके तत्वका शान प्रश्म टिागर इस् ये हु दया
क्तिकां
उनके प्रति भक्तिका ददव होता दे | उसे «कार सडक पस्दुलप
! प्रा लग अं हे 70१5
ही मददेशरफे कृपाप्रशादका उर्दक शो ४।े देह धादिदान
कफ 5388 हे ॥१२३॥| है. दकेलड कक प्र नव. मी डे हरन्जा ९ नव 2 दर
दामीका जाग ६५७४ ७ | कलश, ४ ६५३.*०१ * 4 3२).
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फल्ेफे ह्यागसे के कर्मोझ् सहला हराग्ल गई | |
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४3५५
मनके दोषोंसे रहित होकर एकमात्र भात्रान् शिवका ही
ध्यान करते रहो । उन्हींमें निष्ठा रखकर उनके भजनमें
तत्पर हो जाओ । उन्हींमें मन छगाकर उनके आश्रित
होकर रहो । सब काये करते हुए मनसे उन्हींका चिन्तन
किया करो । एक सहसर्त दिव्य वर्षोके लिये दीबकालिक
यशञका आरम्भ करके उसे पूर्ण करो | यज्ञके अन्तमें मन्त्रद्वार
आवाहन करनेपर साक्षात् वायुदेवता वहाँ पधारंगे । फिर
वे ही बुम सब छोगोंके कल्याणका साधन एवं उपाय
बतायेंगे | तत्पश्चात् तुम सब छोग परम सुन्दर पुण्यमयी
वाराणसीपुरीको जाना, जहाँ पिनाकपाणि श्रीमान् भगवान्
विश्वनाथ : भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवी पाव॑तीके
साथ सदा विहार करते हैं। हिजोत्तमो | वहाँ तुम्हें बड़ा
भारी. आश्चर्य दिखायी देगा | उस आश्वर्यकों देखकर तुम
फिर मेरें पास आना; तब मैं तुम्हें मोक्षका उपाय बताऊंगा ।
उस उपायसे एक द्वी जन्ममें मुक्ति तुम्हारे हाथमें आ
जायगी; जो अनेक जन््मोंके संसारबन्धनसे छुटकारा
दिल्लनेवाली होगी। यह मैंने मनोमय चक्रका निर्माण किया
है। इस चक्रको मैं यहँसे छोड़ता हूँ | जहाँ जाकर इसकी
नेमि विशीर्ण हो जाय--दृठ-फूट जाय, वह्दी तपस्याके लिये
झुभ देद है |
_ ऐसा. कहकर पितामह ब्रकह्माने उस सूयंत॒ल्य तेजस्वी
मनोमय चक्रकी ओर देखा ओर महादेवजीको प्रणाम करके
उसे छोड़ दिया | वे सब ब्राह्मण उन लोकनाथ ब्रह्माजीको
प्रणाम करके उस स्थानके लिये चल दिये; जहाँ उस चक्रकी
नेमि जीर्ण-शीण होनेवाली थी । ब्रह्माजीका फेंका हुआ वह
सुन्दर चक्र मनोहर शिव्यखण्डोंसे युक्त ओर निर्मछ एवं
स्वादिष्ठ जलसे पूर्ण किसी वनमें गिर | उस चक्रकी नेमिके
# नमो रुद्राय शान्ताय बअह्मणे परमात्मने #
सिलयामरयभापदइललताततालाकिम उपर भातभ॒क्रय कराकर कधारचक्राकादान धन पलनरा हा हतपाकाएउ दा यार मद भरकम कक कर महारास पाइप का वापलेका इस सतप्दप घर गा पपहा गर्ममपक पक कमर पषपवाग सु भ तुम पु: ुझन्माक यहा हुफग उप सीट गइतत यम क्रम सा स॒क्रमइससशन या पकाधतभध तरल तह सनास धक्का कराया तसाकपालपाह पक
| संक्षित-शिवपुरा
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शीर्ण होनेसे वह मुनिपूजित वन नेमिष नामसे, विख्यात
हुआ । अनेक यक्ष) गन्धव ओर विद्याघर वहाँ आऋ
रहने लगे । पूर्वकालमें जगतकी सश्टिकी इच्छा रखनेवाडे
विश्वलश एवं गाईपत्य अम्िके उपासक ब्रक्मश प्रजापतियोने
वहीं दिव्य यशका आरम्म किया था । वहीँ शब्दशात्षः
अर्थशात्र तथा न्यायशास्रके श्ञाता विद्वान महर्षियोंने शक्ति
ज्ञान ओर क्रियायोगके द्वारा शास्त्रीय विधिका आते
किया था | उसी स्थानपर वेदवेत्ता विद्वान् सदा वाद
जल्पके बल्से युक्त वचनोंद्वाए अतिवाद करनेवाले
वेदबहिष्कृत नास्तिकोंको पराहत या पराजित करते ये |
तभीसे नेमिषारण्य ऋषियोंकी तपस्याके योग्य स्थान बन गया।
स्फयिकमणिमय पर्बंतकी शिलाओंसे झरते हुण अमृत
समान मधुर एवं खच्छ जलके कारण वह वन बड़ी सका
प्रतीत होता है | वहाँ प्रायः अत्यन्त रसीले फ दे
वक्ष हैं तथा उस वनमें हिंसक जीव-जन्तुओंका अभाव |
( अध्याय ३)
: नैमिपारण्यमें दीघेसत्रके अन्तमें मनियोंके पास वायुदेवताका आगमन, उनका सत्कार वर्था
ऋषियोंके पूछनेपर वायुके द्वारा पशु, पाश एवं पशुपतिका ताचिक विवेचन
सूतजी कहते हँ--मुनीखणें | उस समय उत्तम
आयोजन किया | वह यश जब आरम्म हुआ तब म३ |!
त्रतका पांडन करनेवाले उन मद्ाभाग महर्षियोने उस देशमें .सर्वथा आश्रर्यजनक जान पड़ा | तदनन्तर समय बीत
मद्देवजीकी आराधना करते हुए एक महान् यशका
जब प्रचुर दक्षिणाओंसे युक्त वह यरा पमात
हुआ) ठं
निजन्धधिनन न
> ख्क ० गण फाकनाा
ञ कक की +|
५
४5,
ब 3 टीच स््न्न्फे बे घस्तमे स्तमे नियांके पके
वाययायसं हिता |. # लेनिपारण्यप्र दीश्रलत्रक अल्तम नया
प्रास बायुदेववाक्ना आमपन ७५७
23.०» >क +०2थ७-4०--प#याननााद मम मर नम "० अपन पके मकान कान परम -|राभावाा कोना नर काम
लिन ज >> ॒॒॒ाा मारा काका गा माना
रकक्रमाााााभा किक ६ ) कद 5550 "75 १2७४४ न बिलीज-वओओं 75 सर
गीकी आज्ञासे वायुदेव त्वयं वहाँ प्रधारे । उनको
थदा रेख दीवकालिक यशंका अनुष्ठान करनेवलि थे सुने
दा बातकी याद करके अनुपम दृपका अनुमत्र करने
उन सबने उठकर आकाझशजन्मा वायुदेबताको
प्रगम किया और उन्हें बेठनेक्रे लिये एक नीनेका बना
इक आनन दिया ) वायुदेवता उस आसनपर बेठे ।
च्चक
ह.
स्त्री
ट्प्र |
रमियनि उसकी विधिवत प्ृजां की | तदनन्तर उन सत्रका
# 4९,
रे लगे १]
बमनिददन करके वें कुशल-मज्ञछ पृछन स्या |
बायदेवता बाले--ब्राहणी | इस महान वशेका
अन्ना बृण होनेतक तुम सब लोग सक्रुशछ रहे न? यहदन्ता
देखटोदी दत्वेनि तुम्हें बराध्रा तो नहीं पर्ेचायी १ तुम्द काई
कक
प्रवश्चित्त तो नहीं करना पड़ा ? तुम्हारे यश्षमें कोई दोष
तो नहीं आया ? क्या तुमल्ओोगोने स्तोत्र ओर शख््रग्रदंद्धारा
देवाओंका तथा पितृकर्मद्वारा पित्रोंका भलीभाँति पूजन
करके यजविधिका अनुष्ठान भलीमोति सम्पन्न किया ! इस
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अब पहलेका द्रत्तान्त सुनिये । हृगाय देंदय आः
आक्रान्त हो गया था दमगे विज्ञान्की प्रासफे लिये
प्रवक्राटम प्रधशापतिकी उपासना को ।.
प्रजायतिने हम शरणागतोपर कृपा करके
व्राह्मणी ! उद्धदेव सबसे श्रेष्ठ हैं| वे ही परम
उन्हें तकसे नहीं जाना जा सकता। भक्तिमाय एदय दी
उनके स्वरुपकों डोक ठोक देखशतों और सगतों 5) आक्त
भी उनकी क्मासे ही मिलती हे और उस कमाने द्वी
परमानन्दकी प्राप्ति होती ६ । अतः ऊपापनसादकों
प्राप्त करनेके छिये तुमछांग ननिषारण्यमें बजका आयोजन
करो । दीवउकालतक चलनेबाले उस बन्षऊे द्वाम परम कारण
उद्रदेवकी आराधना करो । बशके
कुपाप्रसादसे बादुदेवता वर्दहा परचारंगे
तुम्दें शानस्ाभ होगा ओर उनसे
महाभाग | एसा आदेझा देकर परमेड्रीन दस सबको बर्दा
ज्ैज़ा | हम इस देशर्म आगे आगनगी प्रतीना करते
हुए एक सहस्त दिव्य वर्षोतक दी का छड् यसद्र अनप्ठाना
हरे रहे है | अतः इस
दुमारे लिये दूसरी
तब
डर गागतनत्सल
नड। पर १५९ 3 काल
क्वारण हूँ ।
उनके
उत्तम उसे ऋटदपऋओ
| उनऊे मुखसे वहां
कल्यागकों प्राप्ति होगी |?
ब्फ
चल
पय आप आगमसनके पिला
कोद याथनीय यस्लु नर्यी ४ |
चक्की के 2२
कक फ् बाड़
४ है. (-4+| |
दीवकाछसे यसानुष्टानरग उ्म
यह पुरतन व्रत्तान्त सुनकर वाउदेदता गनदीमन प्रसन्त
हो मनिर्वेसि घिरे हुए वर्दों बड़े रह । फिर उसे सब झ पृछनाप
उनके भक्तिभावक्री उद्धेकरे दिये उन्यव नभेगेयम सफर
एयआआद एल्लय का संदापता बताया |
खछ्गे हुए
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॥£ लेगी सद्राय शान्ताय नह्यण परसात्मन #
| संक्षिप्त-शिवपुराण;
न्नस्स्स्न्स््स्ससस्स्य््सस््य्स्य्स्स्य्य्य्य्स्य््सय्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स््स्स्य्य्य््य्य्य्य्प्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्यस्सस्ल्ल्ल्च
सृष्टि करने लगे | साक्षात् परमेश्वर शिवसे सुनकर ब्रह्माजीने
अमृतखरूप ज्ञान प्राप्त किया था; इसलिये मेने तपस्याकरे
बलसे उन्हींके मुखसे उस ज्ञानको उपलब्ध किया ।
मुनियांने पुछा--आपने वह कोन-सा ज्ञान प्राप्त किया;
जो सत्यसे भी परम सत्य एवं शुभ है तथा जिसमें उत्तम
निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्दको प्राप्त करता है !
वासुदेवता बोले--महर्षियों ! मैंने पू्वकालमें पश्च,
पाश ओर पशुपतिका जो ज्ञान प्राप्त किया था; सुख
चाहनेवाले पुरुषको उसीमें ऊंची निष्ठा रखनी चाहिये | अज्ञान-
से उत्पन्न होनेवाला दुःख ज्ञानसे ही दूर होता है। वस्तुके
विवेकका नाम ज्ञान है । वस्तुके तीन भेद माने गये हैं---जड
( प्रकृति )» चेतन ( जीव ) ओर उन दोनोंका नियन्ता
( परमेश्वर ) । इन्हीं तीनोंकी क्रमसे पाश) पशु तथा पश्चुपति
कहते हैं | तत्त्वज्ञ पुरुष प्रायः इन्हीं तीन तत्त्वोंको क्षर, अक्षर
तथा उन दोनोंसे अतीत कहते हैं | अक्षर ही पश्यु कह्य गया है।
क्षर तत्तवका ही नाम पाश है तथा क्षर ओर अक्षर दोनोंसे परे
जो परमतत्त्व है, उसीको पति या पशुपति कहते हैं | प्रकृति-
को ही क्षर कहा गया है | पुरुष ( जीव ) को ही अक्षर कहते
हैं ओर जो इन दोनोंको प्रेरित करता है; वह क्षर और अक्षर
दोनोंसे भिन्न तत्त्व परमेश्वर कहा गया है। मायाका ही नाम
प्रकृति है| पुरुष उस मायासे आधव्त है| मर और कममके
द्वारा प्रकृतिका पुरुषके साथ सम्बन्ध होता है | शिव ही इन
दोनोंके प्रेरक ईश्वर हैं। माया महेश्वरकी शक्ति है | चित्सवरूप
जीव उस मायासे आवबृत है | चेतन जीवकों आच्छादित करने-
वाछा अज्ञानमय पाश ही मर कहलाता है | उससे शुद्ध हो
जानेपर जीव स्वतः शिव हो जाता है। वह विश्ुद्ध ही
शिवत्व है ।
मुनियाने पुछा--सर्वव्यापी चेतनको माया किस हेतुसे
आवबृत करती है? किसलिये पुरुषको आवरण प्राप्त होता है
और किस उपायसे उसका निवारण होता हैं ?
चायुद्वता वोले--व्यापक तत्तको भी आंशिक आवरण
प्राप्त होता है; क्योंकि कछा आदि भी व्यापक हैं। भोगके
लिये किया गया कर्म ही उस आवरणमें कारण हैं। मल्का
नाश दोनेसे वह आवरण दूर हो जाता हैं | कला विद्या) राग)
काऊझ और नियति--इन्हींको कछा आदि कहते हूँ | कर्मफल्का
जो उपभोग करता दे) उसीका नाम पुरुष ( जीव ) दे | कर्म
दो प्रकारके ईं--पुष्यकर्म ओर पापकर्म । पुण्यकमंका
फल सुख और पापकर्मका फल दुःख है| कर्म अनरिर
आर फलका उपभोग कर लेनेपर उसका अन्त हो जाता है।
यद्यपि जड़ कमंका चेतन आत्मासे कुछ सम्बन्ध नहींहे
तथापि अज्ञानवश जीवने उसे अपने-आपमें मान खत
है। भोग कर्मका विनाश करनेवाछा है, प्रकृतिकों मेष.
कहते हैं ओर भोगका साधन है शरीर | वाह्य इन्द्रियाँ औ
अन्तः-करण उसके द्वार हैं | अतिशय भक्तिमावसे उपलब्ध हु
महेश्वरके क्ृपाप्रसादसे मलका नाश होता है ओर महः
नाश हो जानेपर पुरुष निर्मेश--शिवके समान हो जात हे
विद्या पुरषकी ज्ञानशक्तिको ओर कला उसकी क्रियाशरति
अभिव्यक्त करनेवाली है | राग भोग्य वस्तुके लिये हरि
प्रवृत्त करनेवाला होता है | काल उसमें अवच्छेदक होता
ओर नियति उसे नियन्त्रणमें रखनेवाली है। अव्यक्तत्म:
कारण है; वह त्रिगुणमय है; उसीसे जड जगत्की उर्बा
होती है ओर उसीमें उसका छय होता है । तत्वचिन्तक पुर
उस अव्यक्तको ही प्रधान ओर प्रकृति कहते हैं। पर
ओर तम--ये तीनों गुण प्रकृतिसे प्रकट होते हैं। तिलमे तेः
की भाँति वे प्रकृतिमें सूक्ष्मरूपसे विद्यमान रहते हैँ | पुख ॥
उसके हेतुको संक्षेपसे सात्विक कहा गया है; हुःख और उप
हेतु राजस कार्य हैं तथा जडता और मोह--ये तमोगुए
कार्य हैं । सात्विकी वृत्ति ऊध्यंको ले जानेवाली
तामसीबृत्ति अधोगतिमें डालनेवाली है तथा राजसीइति मर
स्थितिमं रखनेवाली है। पॉच तम्मात्राएं; पाँच भूत) ते
शनेच्दियाँ; पाँच क्मेन्द्रियाँ तथा प्रधान ( चिंत » महपत
( बुद्धि ) अहंकार ओर मन-ये चार अत्ताकरण-४
मिलकर चौबीस तत्त्व द्वोते हैं | इस प्रकार संकषेपसे ही किए
सहित अब्यक्त ( प्रकृति ) का वर्णन किया गया | कार्यो:
में रहनेपर ही इसे अव्यक्त कहते है. और शरीर आदि हा
जव वह कार्यावस्थाको प्रात होता है? तव उसकी व्यक्ता हैं
होती है---ठीक उसी तरह, जैसे कारणावखामें खित शी
जिसे हम “मिट्टी” कहते हूँ; वह्दी कार्यावस्था्म “बढ हो
नाम धारण कर लेती है | जैसे घट आदि कार्य हर्ष
आदि कारणसे अधिक भिन्न नहीं हैं) उसी अकीरे हे
आदि व्यक्त पदार्थ अव्यक्तसे अधिक मित्र नहीं हे | इ्ह
एकमात्र अव्यक्त ही कारण) करण, उनका आदधारपूर्त दा
तथा भोग्य वस्तु है; दूसरा कोई नहीं |
७ आर. के 5 पा ओर मा 2 ।
सुनियाने पूछा--प्रभो ! बुद्धिः इद्धिय ई
वायवीयसंद्िता ]
झतिरिक किसी आत्मा नामक वस्तुकी वास्तविक स्थिति
हि,
बायुदेवता वोले--महर्षियों | स्वेव्यापी चेतनका
वृद्धि, इद्िय और शरीरसे पार्थक्य। अवश्य है | आत्मा नामक
गई पदाथ निश्चय ही विद्यमान है। परंतु उसको सत्ताम
किसी देनुक़ी उपलब्धि बहुत ही कठिन है | सत्पुरुष बुद्धि;
रख्वव भोर शरीरकों आत्मा नहीं मानते; क्योंकि स्मृति
( बुद्धिका शान ) अनियत दे तथा उसे सम्पूण शरीरका एक
गय अनुभव्र नहीं होता। इसीलिये वेदों और वेदान्तोंमें
अम्मा पूर्वानुभूत विपयोका स्मरणकर्ता सम्यूण श्षेय पदार्थों
१ यापक तथा अन्तयामी कहा जाता है | यह न झ्त्रीदे) न
पदय है ओर ने नपुंसक ही है। न ऊपर दै। न अगल-
जाहठनें है, न नीचे है और न किसी स्थान-विशेषमें | यह
पमुप्र चल शरीरोंमे अविचछ, निराकार एवं अविनाशी रुपसे
स्त ३ | शानी पुरुष निरन्तर विचार करनेसे उस आत्म-
पैसा साक्षाक्तार कर पाते हैं |#
पुरषफा जो यह शरीर कहा गया है, इससे
:4) पंधीन, दुःखमय और अख्थिर दूसरी कोई वस्तु नहीं
३ | शरीर हे तब विपत्तियोंका मूल कारण है | उससे युक्त
जज
# महदेश्वरकी म्त्ताका मतिपादन #
3५०९
मनन नमनननननीनननननी नि नननननिनननन रन नर ++++-++ मिमी धाम 300झ-...-> नम». "0 >फलतिना+ पुल पा. न. पनीण “कक कान्मन. ७,
हुआ पुरुष अपने कर्मके अनुलार मुझ्ी, दुखी ओर मूड
होता है || जेसे पानीसे तींचा हुआ खेत अठ़र उत्पन्त करता
है, उसी प्रकार अज्ञनसे आप्लावित हुआ कर्म नूतन शरीरको
जन्म देता है । ये शरीर अत्यन्त दुःखोंके आलूय माने जाते
है | इनकी मृत्यु अनियाय होती हैँ । भूतऋालमें फितने द्वी
शरीर नष्ट हो गये ओर भविष्यकालमें सहश्नों शरीर आनेयाले
हैं, वे सत्र आ-आकर जब जीण-शीर्ण हो जाते हैं, तब पुदप
उन्हें छोड़ देता है। काई भी जीवात्मा किसी भी शरीरमें
अनन्त कालूतक रहनेका अवसर नहीं पाता । यों सर्यो,
पुत्रां और वन्चु-बान्वसि जो मिलन होता के बहू प्रसिककों
मागम मिले हुए. दनसरे पथिकोंक्े समराममक्ते दी समान हे |
जेंसे महासागरमे एक काए कईहींसे और दसरा काष्ट कहीसे
बहता आता हैँ) वे दोनों काठ कहीं थोड़ी देरके लिये मिछ
जाते हैँ ओर मिलकर फ़िर विछड़ जाते हैँ। उसी प्रक्नार
ग्राणियोंका यद समरागम भी संयोग-विवोगसे युक्त हे ।7 जअद्मानी
लेकर स्थावर प्राणियांतक सभी जीब पद्मु कदे गये ४ |
उन सभी पशुओं लिये ही यह दृष्टान्त वां दशनच्चधास्र कंद्टा
गया है | यद जीब पाशोमें बंवता ओर सुख-हुःस भोगता के
इसलिये 'पञ्नुः कहलाता दे । बद् ईश्वरकी ढीडाका साथन-
भूत के ऐला ज्ञानी मद्गात्मा कदते ६।.. ( अध्याय ४-५ )
0०
(3 ती
52 आएं
महेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन
वयुदबता कहते है--महपियों | इस विश्वका
रात उरयादा कोई पति है, जो अनन्त रमणीय गुगोंका
हयि
गन था चेतन
पे सम्भव ३।
जाती दे | किसी
तत्यका मिभाण
बात त्वय॑ समझने था
कारणके बिना इन
5 आज. आयुता० 5
जी
8 हि मे ओको पादय ओर परतिका जो वास्यमर्म वयईयधदे है,
+5दा गया ६ । बद्ी पश्ुओकों पाशसे मुक्त करनेबात्य पथ) पाश और पतेका जी वास पृरदूउधर स्वन््प एक
गा, निया १६ ४ गत हक हार 44 हि]
४ गा सतारका साप्र केसे द्रो सफाती २3) क्योकि उसे जाने या 2 कण 35 जप व 0 2 225
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बे ही जगत्का बन्वनसे छुड़ानेवाले हैं | भोक्ता। भोग्य और
प्रेक्--ये तीन ही तत्व जानने योग्य हैं | विश पुछषोंके छिये
इनसे भिन्न दूमरी कोई वस्तु जानने योग्य नहीं है । खष्टिके
आरम्भमें एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते हैं; दूमरा कोई
नहीं होता | वे ही इस जगत्की सृष्टि करके इसकी रक्षा
करते हैं ओर अन्तमें सबका संहार कर डालते हैं | उनके
सब ओरे नेत्र हैं; सब ओर मुख हैं, सब ओर भुजाएँ हैं
ओर सब ओर चरण हैं | ये .ही सवसे पहले देवताओंमें
ब्रह्माजीकों उत्तन्न करते हैं | श्रुति कहती है कि «रुद्रदेव
सबसे श्रेष्ठ महान् ऋषि हैँ | में इन महान् अमृतस्वरूप
अविनाशी पुरुष परमेश्चरको जानता हूँ । इनकी अज्ञकान्ति
सूके समान है| ये प्रभु अज्ञानान्थकारसे परे विराजमान
हैं ।!% इन परमात्मासे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है । इनसे
अत्यन्त सूक्ष्म ओर इनसे अधिक महान् भी कुछ नहीं है।
इनसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है । इनके सब ओर हाथ-र,
नेत्र, मस्तक, मुख ओर कान हैं। ये ल्लोकमें सबको व्याप्त
करके स्थित हैं | ये मम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोको जाननेबाले
हैं, परंतु वास्तवर्मे सब इन्द्रियोंसे रहित हैं | सबके स्वामी;
शासक) शरणदाता और मुद्दद् हैं | ये नेत्रके बिना भी देखते
हैं ओर कानके बिना भी सुनते हैं | ये सबको जानते हैं,
किंतु इनको पृर्णरूपसे जाननेयात्य कोई नहीं है | इन्हें परम
पुरुष कहते हैं | ये अणुसे भी अत्यन्त अणु और महानसे
भी परम महान् हैं ।ये अविनाशी महेश्वर इस जीवकी
हृदय-गुफामें निवास करते हूँ ।न॑
# विश्वस्नादधिकों रुद्रों महरपिरिति हि श्रुति: ॥
वेदाहमेत॑. पुरुष॑ महान्तमम्ृतं घुवम् ।
आदित्यवर्ण ननसः परस्तात्संम्पितं प्रभुम् ॥
( शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। १७-१८ )
प सर्वत:पाणिपादाइयं सबताइश्विशिरोमुख: ।
सर्वतःभ्षति नॉछोके सब माइत्य तिएति ॥
सर्वन्द्रियमुणाभास : सर्वन्द्रियविवर्जित: ।
सर्वस्य प्रभुरीशान: सर्वस्थ शरणं खुद्दत् ॥
मचल्षुरपि यः पर्यत्यकर्णोईपि खणोत्रि यथः |
सव॑ वेत्ति न वैेत्ताल्य तमाहु: पुरुष॑ परम ||
क्षणा रणायान्मदतो महदीयानयमव्यय: |
गुद्दायां निदितश्वापि जन्तारत्य नहेंशवर: |]
( शि० पु० बां० स॒० पृ० खें० दे । 54 कह.
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रद्मणे परमात्मने #
0७-७-२४-७*+- ७७-३० नीम लनरन- अर नन+ न करियर परम जम "पाक ३५०१५ मी “मग "कसा नायक“ ५" पा *प कक मय ड/०ग ५७०० +भम्गक
33 नतकनकक" अभय» 3-७७.» ०-3७ ७३०३४. प- जन ५०न४-
| संक्षिप्त-शिवपुराणाड्
एक साथ रहनेवाले दो पक्षी एक ही वृक्ष ( शरीर ) झा
आश्रय लेकर रहते हैं | उनमेंसे एक तो उस ब्रश्षके कर्मव्प
फर्छोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा उ
वैक्षके फछका उपभोग न करता हुआ केवल देखता खता
है ।# जीवात्मा इस वृक्षके प्रति आसक्तिमें हूबा हुआ है
अतः मोहित होकर शोक करता रहता है | वह जब कभी
भगवत्कृपासे भक्तसेवित परम कारणरूप परमेश्वरका ओर
उनकी महिमाका साक्षात्कार कर लेता है; तब शोकरहित
हो सुखी हो जाता है | छन्द, यज्ञ, ऋतु तथा भूत) - वर्तमान
और भविष्य सम्पूर्ण विश्वको वह मायावी रचता है और
मायासे ही उसमें प्रविष्ट होकर रहता है । प्रकृतिको ही माया ममझना
चाहिये और महेश्वर ही वह मायावी है || ये विश्वकर्मा महेश्यर
ही परम देवता परमात्मा हैं, जो सबके हृदयमें विराजमान
हैं | उन्हे जानकर ही पुरुष परमानन्दमय अमृतका अनुभव
करता है | ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, असीम एवं अविनाशी परमात्मा-
में विद्या और अविद्या दोनों गूढ़भावसे स्थित हैं | विनाश
शील जडवर्गकों ही यहाँ अविद्या कहा गया है और अविनाशी
' जीवको विद्या नाम दिया गया है; जो उन दोनों विद्या और,
अविद्यापर शासन करते हैं; वे महेश्वर उनसे सवंया
भिन्न--विलक्षण हैं । ये प्रतापी महेश्वर इस जगत
समष्टि भूत ओर इन्द्रियवर्ग हूूप एक-एक जालको अनेक
प्रकारसे रचकर इसका विस्तार करते हैं | फिर अन्तमें महार
करके सबको अनेकसे एकमें परिणत कर देते हैं तथा पुनः
सृष्टिकालमें सबकी पूर्ववत् रचना करके सबपर आधिपत्य करते
रू | ज्ञसे सूय अकेला ह्टी ब० 0 इन्ट लट। तथा अगल-बगलकी
दिशाओंकी प्रकाशित करता हुआ खय॑ मी देदीपयमात
होता है, उसी प्रकार ये मजनीय परमेश्वर अकेले ही समर
कारणरूप प्रथ्वी आदि तत्त्वोंका नियमन करते हैं | श्र
ओर भक्तिके भावसे प्राप्त होनेयोग्य, आश्रयरहित $
जानेबाले, जगत्की उत्तत्ति और संह्यार करनेवाले; कलाएं
खर्प एवं साल्ह कलछाओंकी रचना कर 27
पक &<६385432 2 24 जज ले नकेल कमल लक
सतत अम्मा सना ०याए-आ्यंक"./गू. के फ-रवेजा आर
# दो स॒ुप्णो च सयुजौ. समान इृक्षवाखिती।
एको5त्ति पिप्पल स्वादु पराइनइनन् प्रपद्यति !
(झ्ि० पु० बा० से पू. खें० ६।१९/
छन्दांसि यज्ञा: क्रतवों यद्भूत॑ मब्यमेव चं॥|
सायी विश्व सजत्यस्मिन्निविष्टो. माययवा पर |
मायां तु प्रकृति विद्यास्मायितं हु मर्देखरन
(झि० पु० वा० सं० पृ० खेन ६ हर /
वायवीयसंद्िता ]
आ-+या-कम्पहूक मय.
जयन्यानि+-बम्िमआ+ अगर
फ4+->की गए 7/सिनियनु+.-भम +न-नन्पिशकन-ातती अम्मी. ऑन अीी.. ५. अमन जया. सुमित पड. ० >पामामरमिषाम्या-ममयद०-अमम 2 धन. विकाना+-- पाप्ममषन्मय,.
गदादियकी जो जानते हैं; वे शारीसके बन््चनकों सदाके स्थ्यि
धाग देने रू अथातू जझनन््म-यृत्युक्ष अकरत छूट जाते ह |
ये दी यरमेदयर तीनों कालसि परे, निप्कछ) संबज, चिगणा-
धीबर एवं साझान् परालर ब्रह्म है । सम्यूण विश्व उन्हींका
ल्हय दे । वे सबकी उत्यत्तिके कारण होकर भी स्व अजन्मा
हैं; लतिके योग्य हैं, प्रजाओंके पालक, देवताओंके भी
देवता और सम्पूर्ण जगतके लिये पूजनीय हैं । अपने हृदयें
विराजमान उन परमेखवरकी हम उपासना करते हू
फ्ा आदिसे परे हैं, जिनसे यह समस्त प्रपत्र प्रकट द्वोता
क यो घर पालक) पापके नाझक) भोगोंके स्वामी तथा
मसृण विद्यके थाम हैं, जो ईश्वरोंके भी परम महेश्वरः
देदताओकि भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति हैं;
पुनश्वराक भी इश्वर मद्ादेवकी हम सबसे परे जानते
पररूप काय आर इन्द्रिय तथा मनरूपी ऋरण
नशे हैं । उसके समान ओर उनसे अधिक भी इस जगतमें
हाई नहीं दिखायी देता | जान, बछ और क्रियारूप उनकी
लाभायिक परागक्ति बेदोंसे नाना प्रकारकी मुनी गयी दे |
उन्हें गकियोंसे इस सम्पूर्ण बिश्वकी रचना हुई है | उसका
ने काई स्थामी है, ने कोई निश्चित चिह्न है; उसपर
(लोक शासन है | बहू समस्त कारणोंका कारण होता हआ ही
रब अधी-र भी है । उसका ने कोई जन्मदाता है; ने शम्म है
॥ ० गाया मयाद ऐसु ही हैँ | वह एक ही सम्युण विश्र्गें
ते आवन गुरूपने व्यात है । वही सब भूतोंका अन्तरात्मा
अर पथ छत मेधशाणा है | गाह उगजा +क्लानल नफ्णा 7ाउ7ह
ह।
के भहटेश्वरवो मदत्ताका पतिषपादन ४:
६१
झानकर में इस संसार
ट्रटसेके लिये उनकी शरणर्न ज्ञाता हूँ [ये
यह वेदान्त शात्यका परम गोपनीय शान है; पर्च कब्यमें
मुझ इनका उपदेश किया गया था | मेने बड़े भारी सोभासखसे
व्रद्मामीक मुख़से इस जमकों पाया था | ह्ञो शम-दमसे
रहित ही) उसे इस परम उत्तम शामका उपदेश नहीं देना
चाहिये । जी अपना पत्र; सदाचारी तथा श्िप्य न हो; उसे
भा नहीं देना चाहेये । जिसकी परमदेव पर्मेबरर्म परम
करनवाई उस बस्यधर शिदफ्
पन््दनस
& परच्िकालादद, ४ । एप. परमेद्रः: ।
परात्पर: ॥
प्रभापतिन् |
स्वंधित् पिनुणाईीओं अदा साजात
ते विश्वद्पसन भवनाीद॑य॑
देवदेवे.. जगसू््य सा्ितस्वसपास्मदें ॥
परिव-ते |
विष्धाम जे)
काडादिसि:. परम इस्थाव. प्रमश्म
पाप पापजुद भाग
तेनीखराणां वरमे नट्विदयरं ते देखतानों पर रू चे रब न ।
पति पतीश पर्स परस्तादिदास दब शुबनेखस्खरन ॥
मे तन््य दिययाते बतव कारण थे ने विधा ।
ने तत्समोइपिछमापि क्य्णिगति. दृद्य॥। |
परात्य. विधिया धर भती धाभाविदा धवा ॥
दाने इ्े किया यंब यान्यी विद्िई कूतम।
गे जम्यान्लि पान हे शिव हज हे अशितान
कारण दाग्गानां य छछपायरियाएिप: |
ने झाबदद अबिता इन झइे अम कश्न |
ग् जन्यरेिक्टइस्मल साया इ ४: ;॥
दर
भक्ति है, जैसे परमेश्वरमें है, वैसे ही गुरुमें मी है; उस महात्मा
पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए. रहस्यमय अथ प्रकाशित
होते हैं |# अतः संक्षेपसे यह सिद्धान्तकी बात सुनो | भगवान्
$# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मले *
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
शिव प्रकृति ओर पुरुषसे परे हैं | वे ही सृष्टिकाल्में जगतको
रचते और संद्वारकालमें पुनः सबको आत्मसात् कर लेते हैं |
( अध्याय ६ )
नन््चखिार ७० 2४ ज+-+-+-+
ब्रह्माजीकी मूच्छो, उनके ग्ुखसे रुद्रदेवका प्राकव्य, सम्राण हुए बह्लाजीके द्वारा आठ नामेसे
महेश्वरकी स्तुति तथा रुद्रकी आज्ञासे ब्रह्माहारा सुष्टि-रचना
तद्नन्तर कारूमहिमा, प्रलय: ब्रह्माण्डकी स्थिति
तथा खग्ग आदिका वर्णन करके वासुदेवताने कहा--
पहले ब्रह्माजीनी पॉँच मानसपुन्रोंकों उत्तन्न किया; जो
उनके दह्वी समान थे | उनके (नाम इस प्रकार है--सनक;
सननन््दन) विद्वान सनातनः। ऋभु ओर सनत्कुमार । वे
सब-के-सब योगी, वीतराग और ईष्योदोषसे रहित थे | इन
सबका मन इश्वरके चिन्तनमें छगा रहता था| इसलिये उन्होंने
खष्टिस्चनाकी इच्छा नहीं की | उष्टिसे विरत हो सनक आदि
महात्मा जब चले गये, तब ब्रह्माजीने पुनः सषश्टिकी इच्छासे
बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीघेकालतक तपस्या
करनेपर भी जब कोई काम न बना; तब उनके मनमें
दुःख हुआ। उस दुःखसे क्रोध प्रकट हुआ | क्रोधसे आविष्ट
होनेपर ब्रह्माजीके दोनों नेत्रोंसे आँसूकी दूँदें गिरने लगीं | उन
अश्रुविन्दुओंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए । अश्रुसे उत्पन्न हुए
उन सब भूतों-प्रेतोंकी देखकर ब्रह्माजीने अपनी निन््दा की ।
उस समय क्रोध और मोहके कारण उर्न्हें तीव्र मूच्छों आ
गयी । क्रोधसे आविष्ट हुए प्रजापतिने मूच्छित होनेपर अपने
प्राण त्याग दिये | तब प्राणोंके खामी भगवान नीललोहित
रझद्र अनुपम कृपा-प्रसाद प्रकट करनेके लिये ब्रह्माजीके मुखसे
वहाँ प्रक८ हुए | उन जगदीश्वर प्रभुने अपनेको ग्यारह
रूपोर्म प्रकद८ किया । मद्मदेवजीने अपने उन महामना
ग्यारह स्वरूपोंसे कह्द--थबच्चो ! मेने छोकपर अनुग्रह करनेके
लिये तुमलोगोंकी खष्टि की है। अतः तुम आल्स्यरहित हो
सम्पूण छोककी स्थापना, द्वितसाधन तथा प्रजा-संतानकी
बुद्धिके लिये प्रयक्ष करो |?
महेश्वरके ऐसा कहनेपर वे रोने ओर चारों ओर
दौड़ने छंगे | गोेने ओर दौड़नेके कारण उनका नाम «झुद्रः
हुआ । जो दद् हूँ, वे निश्चय ही प्राण हैं और जो प्राण हैं;
वे महात्मा रुद्र हैं| तत्यश्रात् ब्रह्मपुत्र महेश्वरने दया करके
मरे हुए देवता परसेष्ठी ब्रह्माजीको पुनः प्राणदान दिया।
ब्रह्माजीके शरीरमें प्राणंके छोट आनेपर रुद्रदेवका मु
प्रसन्नतासे खिल उठा । उन विश्वनाथने व्रह्माजीसे यह उत्तम
बात कही--“उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले जगदुर
महाभाग विरिश्व | डरो मत; डरो मत | मेने तुम्हारे प्रा्णोको
नूतन जीवन प्रदान किया है; अतः छुखसे उठो |? खम्ममे
सुने हुए वाक्यकी भाँति उस मनोहर वचनकों सुनकर
ब्रह्माजीने प्रफुछ कमलके समान सुन्दर नेत्रोंद्वारा धीरे
भगवान् हरकी ओर देखा । उनके प्राण पहलेका
तरह लोट आये थे | अतः ब्रह्माजीने दोनों हाथ जोड़
स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीद्वार उनसे कह्ा--श्रभों | आप
दर्शनमात्रसे मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहे है अतः
बताइये; आप कौन हैं ! जो सम्पूण जगतके रुपमें खित
हैं, क्या वे ही भगवान आप ग्यारह रुपोंमें प्रकट हुए हैँ ?
उनकी यह बात सुनकर देवताओंके खामी महेश
अपने परम सुखदायक करकमलोंद्वारा श्रह्माजीका स”
करते हुए. बोले--“देव | तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि
परमात्मा हूँ. और इस समय तुम्हारा पुत्र होकर मे
हुआ हूँ। ये जो ग्यारह रुद्र हैं; तुम्हारी सुरक्षाके ह्यि पथ
आये हैं | अतः तुम मेरे अनुग्रहसे इस तीत्र मूच्छाको त्यार्ग
जाग उठो और पूर्वबत् प्रजाकी सृष्टि करो ।!
भगवान शिवके ऐसा कहनेपर ब्ह्माजीके मनर्म *5
प्रसन्नता हुईं। उन विश्वात्मानें आठ नामोंद्वारः परम4
शिवका स्तवन किया | |
त्रह्माजी बोले--भगवन् |! रुद्र ! आपका तेज जी
सूतोके समान अनन्त है | आपको नमस्कार दे | बी
ओर जल्मय विग्रहवाले आप भवदेवताकों नमत्कार
तन््दी और सुरभि ( कामचेनु ) ये दोनों आपके छा ॥
आप मा मा जाम व मी लत नम शवकों नमस्कार है स्मग्यमव वायुहपवाः
# गम देने परा भक्तियंता देबे तबा गुरो। तस््वैते कथिता द्ार्था: प्रकाशन्ते. महात्मनः ॥
र ० ग्व '। 4 ह
( शि० पु० बा० सें० पूं० ल* ३ आम कह
जे
आयको नमस्कार है। आप ही वमुरूपधारी ईद हैं। आपको समाधिख दो अपने, चित्तको एकाग्र क्रिया | ततश्रात् मुखसे
नमस्कार है | अल्न्त तेजस्वी अग्रिक्म आप पद्मपतिकों देवताओंकी; कोखसे पितरोकी, कडिफि अगले भागसे
नमस्कार दे । शब्दतन्मात्रात युक्त आक्राशल्यवारी आप अआसुरोकों तथा प्रशननेखिय ( लिड्ढ ) से रूब मनुष्योको
भीमदेवकाीं नमस्कार दे | उमग्ररूपवाके बज्ञमानवति आपको उत्पन्न किया । उनके गुदास्थ -नसे राक्षत उतठन्न हुए; को
नमस्कार है | सोमरूष आप अमृतमूर्ति महादेवजीको सदा भूखसे व्याकुल रहते हैं| उनमे तमोगुण ओर रजेगुग
तमस्कार है | इस प्रकार आठ मूर्ति ऑर आठ नामवाले. को प्रधानता होती ६ । वे रातक्ों विचरते और बलवान
आय भगवान् खझिवकों सेरा नमस्कार है |# होते है| ताप, यक्। भूत और गन्धर्ब-सचे भी अद्याजीके
अड्जींसे उसन्न हुए | उनके पत्षमागसे पक्की हुए | वक्षःस्वल्से
इस प्रकार विश्वनाथ महद्यदेवजीकी स्तुति करके
ठोकपितामट बद्ाने प्रभामपूर्वक उनसे प्रार्थना कौ--“भृतः
विध्य ओर बतमानके खामी मेरे पुत्र भगवान् मह्देश्वर !
कामनाशन | आप सुश्टिके लिये मेरे शरीरते उत्पन्न हुए
९; इसलिये जगण्ममों | इस महान् कार्यर्म संल्म हुए
इस ब्रग्मकी आप समेन्न सहायता करें और खर्य भी
प्रजाकी सुट्टि कर |?
प्रशाजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर कल्याणकारी,
मिपुरनाशक इद्रदेवने प्वहुत अच्छा? कहकर उनकी बात
मान छ । तदनन्तर प्रसक्ष हुए मद्गदेवज्ञीका अभिनन्दन
कक सष्टिफे छिये उनकी आशा पाकर भगवान् ब्रह्माने
यान प्रज्ञाओंकी सृष्टि आरम्म की | उन्होंने अपने मनसे
| गरातचि, भर अफइ्विर) पुल्त्य, पुलद्। ऋतु, दक्ष, अन्रि
॥र वलिएकी सु की | ये सव बअद्यार्जीक्े पत्र कहे गये
९४ पे) सकल्य और इंद्रके साथ इनकी संख्या बारह
एंवी ६ | मे सब पुणने गहसख हूँ। देवगणोंसद्ति इनके
भर ध्पय पर कह गये हूं, जो प्रजावास क्रियावान तथा
उसे अलंइत हैँ । ततश्ात् जल्पर खित हुए
८ मज्ञ गशाजीने देवताओं असुरों, पितरों ओर मनप्योंकी
२ करना विचार किया । ब्रद्माजनि सष्टिफे लिये
2/2सट 3 मर म०-कम३-७५५५३५-५९५००५कणकणा++ कक
अज्जज्ग्म ( खावर ) प्राणियोॉका जन्म हुआ । ससते बकरा
ओर पाश्यभागते भुजंगमोकी उलत्ति हुई । दोनों परंसि
घोड़े, हाथी, शरभ, नीलगाय) मुग) ऊँ सब न्यूड
नामक मृग तथा पद्म जातिक्के अन्यान्य प्रागी उन हुए |
रोमावल्यिंसे ओपधियों और फलू-मूलेका प्राकब्य हुआ ।
ब्रद्माजीफे पूवर्ती मुससे गायत्री छन््दक। ऋम्मेद। भिध्वत्
स्तोम, रथन्तर साम तथा अग्रिशेम नामक यशहों उर्सात्त
हिई | उनके दक्षिण मुल्लसे यजुर्वेद, भिष्टप छन्द) पदश्चदश
स्तोम) बृहत्साम ओर उक्थ नामक यशकी उद््ति हुई ।
उन्हेंने. अपने पश्चिम मुखसे सामतेद। जगनी छनन््दं
सप्तदश सोम) वेहृप्य ताम ओर अतिसात्र गामफ सथदों
प्रकट किया | उनके उत्तखतों झुपने एऑॉर्डिगि सतोग;
अथववेद, आतोयान नामक यक्छा भनुन्ना छत ओर
वेरगान नामक सासनका गाहसाय हंस । उमद्ध आदले ओर
भी बहते छोडि-बड़े प्राणी उसन्न हुए । उसर्ाने पथ
पिशाच, गन्वर्व) अप्ााओंड्ठ समुदाक मनुप्फ दिस
परश्षत) पद्ठी, पद्ठ) मुंग ओर या आंद सम्दूर्य मिस्प एप
अनित झ्लवायर-नप्टम अगनऊी रसभो उोी | उन्नत ६. म्टोति
ज्ेस-जसे कभे एवं फल आजावि के परमाजना दट
हानार धन । र ५ हू है $१ | ६.] । 4९), ५५ | 3५4 44०5 ५ ।
४६७
% नपम्ों रुद्राय शान्तायें बह्मण परमात्सने #
। सक्षिप्त-शिवपुराणाड
ख्य्य्स््््््््््ल्ल्स्स्लच्च्ल्ल्ल्ल्स्ल्स्स्स्स्लल्चच्चच्च्ल्ल्लल्ल्ल्ल्ल्ललल्ललल्ट......
दिये, जो पूवकल्पमें उन्हें प्राप्त थे | जिस प्रकार भिन्न-मिन्न
ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नामरूप
आदि पूवंवत् रहते हैं; उसी प्रकार युगादि कालमें भी उनके
पूवेभाव ही दृष्टिगोचर होते हैं | इस प्रकार स्वयम्भू ब्रह्माजीकी
लोकस॒ष्टि उन्हींके विभिन्न अद्ञोंसे प्रक- हुई है
महत्से लेकर विशेषपयन्त सब कुछ प्रकृतिका विकार
है। यह प्राकृत जगत् चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्धासित;
ग्रह और नक्षन्नोंसे मण्डित। नदियों) पर्वतों तथा समुद्रोसि
अलंकृत और मभौँति-माँ तेके रमणीय नगरों एवं समृद्धिशाली
जनपदोंसे सुशोभित है | इसीको ब्रह्माजीका वन या ब्रह्म-ृक्ष
कहते हैं |
उस ब्रह्मवनमें अव्यक्त एवं सबज्ञ ब्रह्मा विचरते हैं |
वह पनातन ब्रह्मवृक्ष अव्यक्तरूपी बीजसे प्रकट एवं ईश्वरके
अनुग्रहपर स्थित है । बुद्धि इसका तना और वड़ीजड़ी
डालियाँ हैं | इन्द्र्या मीतरके खोखले हैं । महाभूत इसकी
सीमा हैं | विशेष पदार्थ इसके निर्मल पत्ते हैं | धर्म और
अधम इसके मुन्दर फूछ हैं। इसमें मुख और दुःलस्पी
फल लगते हैं तथा यह सम्पूर्ण भूतोंक जीवनका सहाय है |
ब्राह्मणलोग द्रुलोकको उनका मस्तक, आकाझशकों नापि
चन्द्रमा ओर सूर्यकों नेत्र, दिज्ञाओंकों कान और परश्वीको
उनके पर बताते हैं। वे अचिन्त्यखरूप महेश्वर ही सब
भूतके निमाता हैं | उनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुए हैं।
वक्षःस्थलके ऊपरी भागसे क्षत्रियोंकी उत्तत्ति हुई है दोनों
जॉघेसे वेश्य ओर पैरोंसे शूद्र उत्तन्न हुए हैं | इस प्रकार
उनके अज्ञेंसे ही सम्पूर्ण वर्णोका प्रादुर्भाव हुआ है |
( अध्याय ७-१२ )
“+-ज-+---+-+++++5+३-ज्ल८(>४०७०४++७
भगवान् रुद्रके बरह्माजीके छुखसे प्रकट होनेका रहस्य, रुद्रके महामहिम खरूपका वर्णन, उनके
द्वारा रुद्रणणोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीके रोकनेसे उनका सश्टिसे विरत होना
ऋषि बोले--प्रभो | आपने चतुर्मुख ब्रह्माके मुख-
से परमात्मा रुद्रदेवकी सृष्टि बतायी है| इस विषयमें हमको
संशय होता है | जो प्रलयकालमें कुपित होकर ब्रह्मा) विष्णु
ओर अमिसहित समस्त लोकका संहार कर डालते हैं, जिन्हें
ब्रह्म और विष्णु भयसे प्रणाम करते हैँ; जिन छोकसंहारकारी
महेश्वरके वशमें वे दोनों सदा ही रहते है, जिन महादेवजीने
पूर्वकालमें ब्रह्म और विष्णुको अपने शरीरसे प्रकट किया था;
जो प्रभु सदा ही उन दोनोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले
हैं, वे आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् रुद्र अव्यक्तजन्मा
ब्रह्माके पुत्र केसे हो गये ! तात ! भगवान ब्रह्माने मुनियोंसे
ज्लसी बात वबतायी थी; वह सब आप ठीक-ठीक कहिये |
भगवान् शिवके उत्तम यशका श्रवण करनेके लिये हमारे
हृदयमें वड़ी श्रद्धा है | ह
वायुद््वताने कहा--त्राह्मणो ! तुम सब छोग जिज्ञासा-
में कुशल हो; अतः तुमने यह बहुत ही उचित प्रध्न किया
है। मैंने भी पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीके समक्ष यही प्रइन
रक्खा था। उसके उत्तरमें पितामहने मुझसे जो कुछ कहा
था; वहीं में तुम्दें बताऊंगा | जैसे इद्रदेव उसन्न हुए ओर
फिर किस प्रकार व्र्मा ओर विष्णुकी परत्यर उत्तत्ति हुई;
वह सब विपय सुना रहा हैं | ब्त्मा। विष्णु और बढ--तीनों दी
कारणात्मा हैं | वें क्रशः चराचर जगत्की खुशछ्ठि पालन ओर
सहारके हेतु हैं और साक्षात् महेश्वरसे प्रकट हुए हैँ | उनमे
परम ऐड्वर्य विद्यमान है | वे परमेश्वरसे मावित ओर उनकी
शक्तिसे अधिष्ठेत हो सदा उनके कार्य करनेमें समर्थ होते
हैँ | पूबकालमं पिता महेश्वरने ही उन तीनोंकों तोनि कर्म
नियुक्त किया था । ब्रह्माकी सष्टि-कायमें, विष्णुकों रक्षाकाव
में तथा रुद्रकी संहरकायमें नियुक्ति हुईं थी। कल-न्तरम
परमेश्वर झिवके प्रसादसे रुद्रदेवने ब्रह्म और नागबंगकी
सृष्टि की थी । इसी तरह दूसरे कल्ममें जगन्मय ब्ह्ाने दे
तथा विष्णुकों उत्पन्न किया था | फिर कल्यान्तरमें भगवाव
विष्णुने भी रद्र तथा ब्रह्माकी खुष्टे की थी । इस तरह पुनः
ब्रह्मेने नारायणकी ओर दरुद्वदेवने ब्रह्माकी दृष्टि को | ई
प्रकार विभिन्न कल्योंमें ब्रह्मा) विष्णु ओर महेश्वर परसर उतने
होते और एक दसरेका हित चाहते हैं| उन-उन केंटर्क
व्रत्तान्तकों लेकर महर्षिगण उनके प्रभावक्ा वशन किया
करते हैं |
प्रत्येक कल्पमें भगवान् रुद्रके आविर्भावकरा जो कारण है
उसे बता रहा हूँ | उन्हींके प्रादुमविसे अद्वाजीकी कट
प्रवाह अविच्छिन्नक्पसे चलता रहता दे |जद्याण्डी उता
होनेवाले ब्र्षा प्रत्येक कल्पमें प्रजाकी खष्टि करके प्रीतिकओ
वायबीयसंहिता |
चृथमा/गागाश#- गण.
जे है कमर आता 2मरिनममोकरीपयानणंजी+नप-मी सवा पी अ्नीक-मा्ी.. "लीकॉग...ननी नानक. अनी.. अ नाम नमक अनमाक. पका... आका--. "3६ अमन. यम. >न््मही. ८ जन्म.“
की यि__-नरी-नमीफीयनरनण
नया >यायुरमी नी पिन
ब्रद्धि न देनेसे जब अत्यन्त दुखी हो मूछित हो जाते दें, तब
उनके दुःखकी शान्ति और प्रजावर्गकी ब्रद्धिके लिये उन-उन
कव्यमे रद्रगर्णकि स्वामी काछूखरूप नीललोहित महदेश्वर रुद्र
आने कारणनूत परमेश्वर्की आज्ञासे ब्रह्माजीके पुत्र होकर
उनपर अनग्र्ट करते हू 2 टी तेजोराशि, अनामय:
अनादि, अनन्त, थांता) भृतसंद्वास्क ओर सर्वव्यापी भगवान्
शा परम ऐड्वर्यसे संयुक्त, परमेश्वरसे भावित और सदा
उन्हींकी द्क्तिसि अधिष्ठित हो उन्हींके चिद् धारण करते हैं |
इर्दीके नामसे प्रसिद्ध हो उन्होंके सगान रूप धारणकर उनके
कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। इसका सार व्यवहार उन्हीं
परमेश्वस्के समान होता है। ये उनकी आज्ञाक्रे पाल्क हैँ |
सदखों सूर्योेक्षे समान उनका तेज है। वे अचन्द्रको
आभूषणके रूपमें घारण करते हैँ | उनके हार) बाजूबंद ओर
फड़े सपमय हैं। वे मूजकी मेखछा धारण करते हैं । जलंधर,
विरिध्च और इन्द्र उनकी सेवामें खड़े रहते हैं तथा द्वाथमे
कपाललण्ड उनकी श्लोभा बढ़ाता दे । गज्ञकी ऊंची तरद्ोंसे
उनके पिड्जल बर्णवाले केश और मुख भीगे रहते हैँ ।
उनके कमनीय करेछास परव॑तके विभिन्न प्रान्त टूटी हुई दादवाले
हद आदि बत्य पशुओंसे आकान्त हैं । उनके बाये कानोंके पास
गराकार कुण्टल झिलमिलाता रहता है | थे महान वृपभपर
सवारी करते हूं । उनकी वाणी सहान् मेघकी गजनाके समान
गणर 9 कान्ति प्रचण्ड अम्रिके समान उद्यी्त हे ओर
४ ब्रह्माजीके द्वारा अधनारीश्वररूपकी स्तुति तथा इस स्तोत्रक्री महिमा -* 2६0५
'ऋज्कब/दारूगासन्क,
अपन -अनीयाान»_े. टीन. आना... मय मम कर नम. मम. मनमक-.“-री.. "रन आरम्भ. >पानम-म मा. नीम मय... 2 स्पया- किमी, री ञ- -अषियामनी--. फिल+-
्व्ब्क ध्ल 5
गले क्रम ; कमल 2 व्स प्रकार ब्रद जद
बल-पराक्रत भी संदान है । इस प्रकार वरदापुत
विद्याल न्ध्प 856| शयानकऊ 2 -हुम+ पा ुक"००न कण के दे य्र पाऊ ० म२«. लि का
बाल रूप बढ़ा सवानक है। थे अक्लीशिकाो स्रजार
फाय की उनके न्््क् टायता मिल का टिक * का र के
संपम्रिकायमं उनकी संदायता करने हैँ। झअतः संद्न्रद पापा
सा दि 5 2 खत्पम डक ० बल ध >क 2 + >> कल सा ० £>3:-
प्रसादस प्रत्यक कह्पमम प्रजान्/तकां प्रझायाए प्रयास प्लस
त्रन ज्न्यी हट
बनी रह्त [हर ।
>क हे शक का का
+ २ «१६, ईः
्
एक समय ब्दाजीने नीलडोटित भगवान यद्धत
करनेकी प्राथना की | तव भगवान देने गानलिक
द्वारा बहुत-से पुर्षोकी सू्ठि की। ये सब है सन उनके आने
ही समान थे। सबने अटठाजट घारण कर खग्ये थे सनी
निर्मय/ नीटकण्ठ और बिनेत्र थ। जरा और सुत्यु उसके पल
दि बज ते हे च्क व
कर, 202
५ सिलल
५ के पका ला पी ०
दफा
नहीं पहुँचने पाती थी। चाही घल उसके
ते | उस झद्गर्णोने सगे चोद सुवरोल सास्टादित कर
लिया था । उस विविध संटोकिं देखकर पिशासदने रबदप्स
कहा--पदेवदेवेश्वर | आपके नमस्कार ४॥ आंब एसी
प्रमाओंकी खट्टि ने कीछिये। आपका ऋरयाण दी । भाप
दूसरी प्रज्ाओंकी सश्टि कीजिये: जो सरजचमयाए 4 ।'
ब्रद्मजीके ऐसा कदनेयर परमेद्र रद उससे टेसलल हु
बोडि--मारी सष्टि बनी नहीं दागी | आामभ प्रशाजदे ग५
हो
७ पक की की बजा हे कानफ... +फक्षट 5 6 -:२५ का $ व
तुम्दी करो ।! अश्रार्नीसि एसा कद फिशात बुर शरका
धटम हे 2 कप
भगवान दद् उन रदट्रगंभाड आय प्रशाकी सडक शेगडत
3 चआ कजऊ 9 ०»
६ की 4 हैं आते
निश्वत्त दो गये |
+-ज्कु ७० >बउकर्णई कई धन मनन
त्रह्माजीके द्वारा अद्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा उस स्तोगकी महिमा
# नमो रुद्राय शान्ताय अह्मणे परमात्मने
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
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छः 0 पे कर
१७९ ५ १७४
/ दर हा है जे
ब्रह्मा वोले--देव | महादेव ! आपकी जय हो | ईश्वर !
महेश्वर | आपकी जय हो ! स्वेगुणश्रेष्ठ शिव ! आपकी जय
हो | सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी शंकर ! आपकी जय हो।
प्रकृतिरुपिणी कल्याणमयी उमे | आपकी जय हो | प्रकृतिकी
नायिके ! आपकी जय हो प्रकृतिसे दूर रहनेवाली देवि !
आपकी जय हो | प्रकृतिसुन्दरि | आपकी जय हो | अमोघ
महामाया और सफल मनोरथवाले देव ) आपकी जय हो; जय
हो | अमोघ महालील् और कभी व्यथ न जानेवाले महान्
बल्से युक्त परमेश्वर | आपकी जय हो; जय हो। सम्पूर्ण
जगत्की माता उमे | आपकी जय हो । विश्वजगन्मये [| आपकी
जय हो | विश्वजगद्धात्रि ! आपकी जय हो | समस्त संसारकी
सखी-सहायिके ! आपकी जय हो | प्रभो | आपका ऐ.श्वर्य तथा
धाम दोनों सनातन हैँ | आपकी जय हो, जय हो | आपका रूप
ओर अनुचर-बर्ग भी आपकी ही माँति सनातन हैं | आपकी
जय हो, जय हो। अपने तीन रूपोंद्वारा तीनों लेकोंका निर्माण,
पालन और संहार करनेवाली देवि | आपकी जय हो, जय हो;
जय हो । तीनों लोकों अथवा आत्मा) अन्तरात्मा और परमा-
त्मा--तीनों आत्माओंकी नायिके | आपकी जय हो | प्रभो !
जगतके कारण-तत्त्वोंका प्रादुभांव ओर विस्तार आपकी कृपा-
दृष्टिके ही अधीन है; आपकी जय हो | प्रब्यकालमें आपकी
उपेक्षायुक्त कयक्ष्पूर्ण इश्सि जो मयानक आग प्रकट द्वोती
क्न्न्च्च््््स्य्य्य्य््््य्य्य्य्य्च्य्य्य््य्य्य्य्््य्य्य्य्स्य्य्य्स्य्य्स्स्सस्सस्य्सस््सल्ल-लल्ल्सट्
है, उसके द्वारा सारा भौतिक जगत् भस्म हो जाता है; आपकी
जय हो ।
देवि ! आपके खरूपका सम्यक् ज्ञान देवता आदिके हिये
भी अप्तम्भव है । आपकी जय हो | आप आत्मतत्तके सूक्ष्म
ज्ञानसे प्रकाशित होती हैं | आपकी जय हो | ईर्वरिं | आपने
स्थूल आत्मशक्तिसे चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है |
आपकी जय हो; जय हो | प्रभो | विश्वके तत््वोंका समुदाय
अनेक और एकरूपमें आपके ही आधारपर स्थित है; आपकी
जय हो | आपके श्रेष्ठ सेवकोंका समूह बड़े-बड़े असुरोके मस्तक-
पर पाँव रखता है | आपकी जय हो । शरणागतोंकी रक्षा
करनेमें अतिशय समथ परमेश्वरि | आपकी जय हो। संसार-
रूपी विषवृक्षके उगनेवाले अक्ुुरोंका उन्मूलन करनेवाली उमे !
आपकी जय हो | प्रादेशिक ऐश्वर्य, वीये ओर शोयका विखार
करनेवाले देव | आपकी जय हो । विश्वसे परे विद्यमान देव !
आपने अपने वैभवसे दूसरोंके वैमबोंको तिरस्कृत कर दिया है
आपकी जय हो | पशञ्चविध मोक्षरूप पुरुषार्थके प्रयोगद्वारा परमाननद-
मय अमृतकी प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो |
पञ्चविध पुरुषार्थके विज्ञानर्प अम्ृतसे परिपूर्ण स्तोत्रखरूपिणी
परमेश्वरि | आपकी जय हो । अत्यन्त भयानक संसारख्पी
महारोगको दूर करनेवाले वैद्यशिरोमणि | आपकी जय हो।
अनादि कर्ममछ एवं अज्ानरूपी अन्धकारराशिको दूर
करनेवाली चन्द्रिकारूपिणी शिवे | आपकी जय हो । त्रिपुरका
विनाश करनेके लिये कालामिस्वरूप महादेव | आपको जय
हो । त्रिपुरमैरवि |! आपकी जय हो। तीनों गुणेंसे मुक्त महैश्वर
आपकी जय हो । तीनों गुणोंका मर्दन करनेवाली महेंश्वर !
आपकी जय हो | आदिसर्वश | आपकी जय हो। सबकी
ज्ञान देनेवाली देवि | आपकी जय हो | प्रचुर दिव्य अद्वर्त
छुशोभित देव | आपकी जय हो | मनोवाब्छित वस्तु देनेवाली
देवि | आपकी जय हो । भगवन् [ देव ! कहाँ तो आपका
उत्कृष्ट धाम और कहाँ मेरी तुच्छ वाणी; तथापि भक्तिमावरत
प्रताप करते हुए. मुझ सेवकके अपराधको आरा
क्षमा कर दे# |
__ इस प्रकार सुन्दर उक्तियोंद्राय भगवान खऔर देव गे और देवीका एक
# अ्रद्योवाच---
जय देव महादेव जयेखर महेश्वर ।
जय स्वगुणश्रेष्ठ जय संसुराधिप ॥
जय प्रकृतिकल्याणि जय प्रक्नतिनायिके ।
जय प्रक्ृतिदूरे त्व॑ जय ॒प्रक्नतिसुन्दरि ॥
जयामोधमद्दामाय जयामोघमनोरथ ।
जया मोघमदालील जयामॉधमद्दाबल ॥
वायवीयसंधिता ]
अरवनानयानी-पमाओ सही-ायहनी गहनी अभी अजय
साथ गुणगान करके चतुमुख ब्रह्माने रद एवं रुद्राणीकों वारंबार
नमस्कार क्रिया | त्रद्माजीके द्वारा पठित यह पत्रित्र एवं उत्तम
अ्दनारीश्वर-त्तोत्रं शिव तथा पार्वतीके हर्षकों बढ़ानेत्राला है ।
जी भक्तिपूवेक जिस किसी भी गुरुकी शिक्षासे इस स्तोन्रका
पाठ करता ६ वहू शिव ओर पावतीकों प्रसन्न करनेके कारण
महादेवजीके किक हर ३ के. (लए
ट उेवजीके दारारसे देचीका प्राकल्य 5;
सीसी चकरीतन+-मी- यनरी-- जन.
#24 4 ट 5
' सराहा आम रा सहन.
अपने अमीश फलको प्रात कर लेता दे । जो समस्त सुयनोंकि
प्राणियोंकोी .उसन्न करनेवाले हैं; जिनके विग्रद जन्म ओर
म्त्युसे रहित हैं तथा जो शेप नर ओर सुख्रों सारीफे हुपमें
एक ही दारीर धारण करके लित है; उन कल्यानकारी भगवान
शिव ओर शित्राक्रों में प्रणाम करता हैं । ६ अध्याम १८ )
महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकव्य ओर देवीके अ्रमध्यभागसे ग्क्तिका प्रादर्भाव
चायुदेवता ऋहते है--तदनन्तर महादेवजी महामेव-
क्री ग्जनाके समान मधुरजाम्भीर, मद्नलदायिनी एवं मनोहर
धाम बोले--प्रह्मन्ू ! तुमने इस समय प्रजाजनोंकी
बृद्धिफ लिये ही तपस्या की हैं | तुम्हारी इस तपस्यासे में
संनुए है ओर तुम्हें अभीष्ट वर देता हेँ।? इस प्रकार परम
उदार तथा खमावतः मधुर वचन कहकर देवेश्वर हरने अपने
शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीकों प्रकट किया। जिन दिव्य गुण-
समन्ना दंवीको ब्ढ्षवेत्ता पुझय परमात्मा शिवकी पराश्षक्ति
तह तथा जिनमें जन्म; मृत्थु ओर जरा आदि विकारोका
पद नी $ वे भवानी उस समय शिवके अड्डसे प्रकट हुईं ।
जिनका परमभाव देवताओंकों भी ज्ञात नहीं है; वे समस्त
दपताआकी अधीश्वरी देवी अपने स्वामीके अड्से प्रकट
६९ । उन संव्ोकमदेश्वरी परमेश्वरीको देखकर विराट
४प१ ब्रक्चात प्रणाम किया ओर उन सर्वज्ञा, सर्वव्यापिनी,
पु, संदसद्भधाबसे रहित और अपनी प्रभासे इस सम्पूर्ण
पके प्रकाशित करनेवाली पराक्षक्ति महादेवीसे इस प्रकार
बना + |
त्रह्माजी बोहे--मर्नज्मनस्स्थी अधि ! महादवज्ीन
सबसे पहले समझे उत्तन्न किया ओर प्रजाकी संशिक कायमें
लगाया । इनकी आशासे में समसल जगनडोीं सुष्टि ऋसत।
हें | किंठु देवि | मेरे सानतिक संस रसे गये देखना
आदि समस्त प्राणी बारंबार झष्टि करनेपर भी बड़ मंदी
है हैँ | अतः अब में भेथुनी सध्ि करठे दी आनो नारे
प्रजकी बढ़ाना चाहता हूँ । आपके पहले नारीहढुला।
प्रादु भाव नहीं हुआ था । इसलिये «
लिये मुझमें शक्ति नर्दी ६
छ्ल्की हा! रह
| सख्यूग इचियोंटा आविना।
आपसे दी होता दे । अतः सन सदडों सेव प्रहारदी
दगक्ति देनेवाली आप वरदायिनी माया देवकरीसी दी प्रारना
करता टू संसारभयको दुर ऋर नेयाली स्व्यायिनी देय !
इस चराचर लगतूकी अद्िक्ष लिये आप. आन
एक अंदसे मेरे पृत्र द्कोी पुत्री ही जए4।
श्रत्ययानि ब्रद्याल दस प्रद्धार बाचना ऋरनार ॥यी
संद्राणीनी आअनी भेंदिक मयनागी आने से कान
(८ ६३३३॥ ५४
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कान्तिमती एक शाक्ि प्रदुथ को | उन
न आल
| | | न्
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॥॥77/00॥॥॥|
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प्र. ८८८2८ 4८22 2
च्रह्मा वोले--देव | महादेव ! आपकी जय हो | ईश्वर !
महेश्वर | आपकी जय हो | स्वेगुणश्रेष्ठ शिव | आपकी जय
हो | सम्पूर्ण देवताओंके खामी शंकर ! आपकी जय हो।
प्रकृतिरूपिणी कल्याणमयी उमें | आपकी जय हो । प्रकृतिकी
नायिके | आपकी जय हो । प्रकृतिसि दूर रहनेवाली देवि |
आपकी जय हो | प्रकृतिसुन्दरि | आपकी जय हो | अमोघ
महामाया ओर सफल मनोरथवाले देव ! आपकी जय हो, जय
हो | अमोध महालील और कभी व्यर्थ न जानेवाले महान
बलसे युक्त परमेश्वर | आपकी जय हो; जय हो। सम्पूर्ण
जगत्की माता उमे | आपकी जय हो । विश्वजगन्मये | आपकी
जय हो । विश्वजगद्धात्रि | आपकी जय हो । समस्त संसारकी
सखी-सहायिके | आपकी जय हो | प्रभो |! आपका ऐ्वयं तथा
धाम दोनों सनातन हैँ । आपकी जय हो; जय हो । आपका रूप
ओर अनुचर-वर्ग भी आपकी ही भाँति सनातन हैं | आपकी
जय हो, जय हो | अपने तीन रूपोंद्वारा तीनों लोकोंका निमोण,
पालन और संहार करनेवाली देवि | आपकी जय हो, जय हो)
जय हो । तीनों लोकों अथवा आत्मा, अन्तरात्मा और परमा-
त्मा--तीनों आत्माओंकी नायिके | आपकी जय हो प्रभो !
जगतके कारण-तत्तोंका प्रादुर्भाव ओर विस्तार आपकी क्ृपा-
इृष्टिक ही अधीन हैं, आपकी जय हो | प्रल्यकालमें आपकी
* उपेक्षायुक्त कयाक्षपूर्ण इश्सि जो भयानक आग प्रकट होती
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #.
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
है, उसके द्वारा सारा भौतिक जगत् भस्म हो जाता है; आपकी
जय हो |
देवि ! आपके खरूपका सम्यक ज्ञान देवता आदिके लिये
भी असम्भव है | आपकी जय हो । आप आत्मत्तके सूक्ष्म
ज्ञानसे प्रकाशित होती हैं | आपकी जय हो । ईश्वरिं | आपने
स्थूल आत्मशक्तिसे चराचर जगत्को व्याप्त कर रक़्वा है |
आपकी जय हो) जय हो | प्रभो | विश्वके तत्वोंका समुदाय
अनेक और एकरूपमें आपके द्दी आधारपर स्थित है; आपकी
जय हो । आपके श्रेष्ठ सेवकोंका समूह बड़े-बड़े असुरोके मस्तक-
पर पाँव रखता है । आपकी जय हो । शरणागतोंकी रक्षा
करनेमें अतिशय समर्थ परमेश्वरि | आपकी जय हो | संसार
रूपी विषवृक्षके उगनेवाले अद्भुरोंका उन्मूलन करनेवाली उम्र !
आपकी जय हो । प्रादेशिक ऐशश्र्य) वीर्य ओर शौयंका विस्तार
करनेवाले देव ! आपकी जय हो । विश्वसे परे विद्यमान देव |
आपने अपने वैभवसे दूसरोंके वैभवोंको तिरस्कृत कर दिया है
आपकी जय हो । पदञ्चविघ मोक्षरूप पुरुषार्थके प्रयोगद्वारा परमाननद्-
मय अमृतकी प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो |
पञ्चविध पुरुषार्थके विशानरूप अम्ृतसे परिपूर्ण स्तोत्रखरूपिणी
परमेश्वरि ! आपकी जय हो । अत्यन्त भवानक
महारोगको दूर करनेवाले वैद्यशिरोमणि | आपकी जय हो |
अनादि कर्ममल एवं अशानरूपी अन्धकारराशिको दूँर
करनेवाली चन्द्रिकारूपिणी शिवे ! आपकी जय हो । त्रिपुरका
विनाश करनेके लिये कालामिस्वरूप महादेव ! आपको जय
हो । त्रिपुर्मैरवि ! आपकी जय हो। तीनों गुणोंस मुक्त महेशर
आपकी जय हो | तीनों गुणोंका मर्दन करनेवाली महदेश्वरि !
आपकी जय हो | आदिसवश ! आपकी जय हो | सबको
ज्ञान देनेवाली देवि | आपकी जय हो । प्रचुर दिव्य अन्न
सुशोभित देव | आपकी जय हो | मनोवाश्छित वस्दु देनेवाली
देवि | आपकी जय हो । भगवन ! देव | कहां तो आपका
उत्कृष्ट धाम और कहाँ मेरी तुच्छ वाणी; तथापि भक्तिमावर्त
प्रताप करते हुए मुझ सेंवकके अपराधकी
क्षमा कर दे# |
__ इर प्रकार सुन्दर उक्ियोद्राय भगवा खनन
# अद्योवाच--
जय देव महादेव जयेश्वर महेश्वर ।
जय सर्वगुणओ्रेण.्0य. जय सर्वसुराधिष ॥
जय प्रकृतिकल्याणि जय प्रकतिनायिके ।
जय प्रकृतिदूरे तव॑ जय ॒मप्रकृतिसुन्दरि ॥
जयामोघमहामाय जयामोघमनोरथ ।
जया मोघमद्ालील जयामोघमहा4छ ॥
आप
चायवीयसंहिता |
साथ गुणगान करके चतुर्सुख ब्रह्मने रुद्र ए.वं रुद्राणीको बारंबार
नमस्कार किया । ब्रह्माजीके द्वारा पठित यह पवित्र एवं उत्तम
अद्धनारीश्वर-स्तोत्र शिव तथा पावतीके हर्षको बढ़ानेवाला है |
जो भक्तिपू्षक जिस किसी भी गुरुकी शिक्षासे इस स्तोन्रका
पाठ करता है; वह शिव ओर पावतीको प्रसन्न करनेके कारण
# महादेवजीके शरीरखे देवीका प्राकव्य #
४3६५
चला
अपने अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है | जो समस्त भुवनोंके
प्राणियोंकों उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनके विग्रह जन्म ओर
मृत्युसे रहित हैं तथा जो श्रेष्ठ नर ओर सुन्दरी नारीके रूपमें
एक ही शरीर धारण करके सित हैं, उन कल्याणकारी मगवान्
शिव और शिवाको मैं प्रणाम करता हूँ | ( अध्याय १५ )
महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकव्य और देबीके आूमध्यभागसे शक्तिका ग्रादुर्भाव
वायुद््वता कहते हँ--तदनन्तर महादेवजी महामेघ-
की गजनाके समान मधुर-गम्भीर; मन्नलदायिनी एवं मनोहर
वाणीमं बोले--“त्रह्मन् ) तुमने इस समय प्रजाजनोंकी
वृद्धिके लिये ही तपस्था की है | तुम्हारी इस तपस्थसे में
संतुष्ट हूँ ओर तुम्हें अमीष्ट बर देता हूँ।? इस प्रकार परम
उदार तथा खमावतः मधुर वचन कहकर देवेश्वर हरने अपने
शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको प्रकट किया | जिन दिव्य गुण-
समन्ना देवीको ब्रह्मवेत्ता पुरुष परमात्मा शिवकी पराशक्ति
कहते हूँ तथा जिनमें जन्म; मृत्यु और जरा आदि विकारोंका
प्रवेश नहीं है, वे मवानी उस समय शिवके अक्टसे प्रकट हुईं ।
जिनका परमभाव देवताओंकों भी ज्ञात नहीं है, वे समस्त
देवताओंकी अधीश्वरी देवी अपने खामीके अड्टसे प्रकट
हुईं | उन स्वेल्लोकमहेश्वरी परमेश्वरीकों देखकर विराट
पुरुष ब्रह्माने प्रणाम किया और उन सर्वज्ञा, स्वव्यापिनी;
पृदमा; सदसद्भावसे रहित और अपनी ग्रभासे इस सम्पूर्ण
जगत्को प्रकाशित करनेवाली पराशक्ति महादेवीसे इस प्रकार
प्राथंना की ।
जय विश्वजगन्मातर्जय
ब्रह्माज्ी बोछे--सर्वजगन्मयी देवि | महादेवजीने
सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया ओर प्रजाकी खश्टिके कार्यमें
लगाया | इनकी आशासे में समस्त जगतकी सृष्टि करता
हूँ । किंतु देवि | मेरे मानसिक संकल्पसे रचे गये देवता
आदि समस्त प्राणी बारंबार सृष्टि करनेपर भी बढ़ नहीं
रहे हैं | अतः अब में मेंथुनी रष्टि करके ही अपनी सारी
प्रजाको बढ़ाना चाहता हूँ । आपके पहले नारी-कुल्का.
प्रादुर्भांव नहीं हुआ था | इसलिये नारीकुलकी सष्टि करनेके
लिये मुझमें शक्ति नहीं है। सम्पूर्ण शक्तियोंका आविर्भाव
आपसे ही होता है । अतः सर्वत्र सबको सब प्रकारकी
शक्ति देनेवाली आप वरदायिनी माया देवेश्वरीसे ही प्रार्यना
करता हूँ; संसारमयकी दूर करनेवाली सर्वव्यापिनी देवि |
इस चराचर जगत॒की इंडिके लिये आप अपने
एक अंश्से मेरे पुत्र दक्षकी पुत्री द्वो जाइये।
ब्रक्षयोनि अक्षाके इस प्रकार याचना करनेपर देवी
रुद्राणीनी अपनी भेहोंके मध्यमागसे अपने दह्वी समान
कान्तिमती एक शक्ति प्रकट की । उसे देखकर देवदेवेश्वर
विश्वजगन्मयि । जय विश्वजगद्धात्रि. जय विश्वजगत्सखि ॥
जय शाश्वतिकैशर्य जय शाशवतिकालय । जय शाइवतिकाकार जय शाश्वतिकातुय ॥
जयात्मत्रयनिरमात्रि
जयावलोकनायत्तजगत्कारणबूंइण
जयत्मत्रयपालिनि । जयात्मत्रयसंहत्रि |
। जयोपेश्षाकयाक्षोत्थह्ुतमुग्भुक्तमीतिक ॥
जयात्मत्रयनायिके ॥
जय देवाय्विजेये खात्मसूक्ष्मद्शोज्ज्वले । जय स्थूलात्मशक्त्येशे जय व्याप्तवराचरे ॥
जय. नानेकविन्यस्तविश्वतत््वसमुच्चय.। जयासुरशिरोनि8श्रेष्ठनुगकदम्बंक ॥
जयोपाश्रितसंरक्षासंविधानपटी यसि । जयोन्मूलितसंसारविषवृश्षाह्डुरोहमे ॥
जय प्रादेशिकैशर्यवीरय॑शीर्यविजम्मण । जय. विश्वव्विरभूत निरस्तपरवेभव ॥
जय प्रणीतपत्चार्थप्रयोगपरमाझुत._ । जय. चख्रार्थविज्ञानसुधास्तोत्रखरूपिणि ॥
जयातिघोरसंसारमहारोगमिप्वर । जयानादिमलाश्ानतमःपटलचन्द्रिके !
जय त्रिपुरकालाग्ने - जय त्रिपुरमैरवि । जय त्रिगुणनिमुक्त जय त्रिगुणमर्दिनि ॥
जय प्रथमसवेश . जय. सर्वग्रवोधिके । जय अचुरदिब्यानज्न जय प्रायथितदायिनि ॥
क्व देव ते पर धाम कव च तुच्छ दि नो वचः । तथापि भगवन् भदत्या प्रलपन्त क्षमख मान ॥
( शि० पु० वा० सं० पू० ० १५। १६--३२१ )
भ3 लिप श्ॉँ 2 कल य् त्रह्मणे मात्मने े_ ७ (0 $*.
६८ * समा रुद्राय शान्तय 5 परमात् मे [ साक्षत्रटशवपु राणा
चित्त +जत5७त 555 +ज+++त+तज-.तत या अअअ ाा घाट २ ६२ २ की धौाा जा
अनीफनीन ननननकनय, वनसनन-
हरने हँसते हुए कहा--तुम तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी
आराधना करके उनका मनोरथ पूर्ण करो ।? परमेश्वर
शिवकी इस आशाको शिरोधार्य करके वह देवी
त्रह्माजीकी प्रार्थनाके अनुसार दक्षकी पुत्री हो गयी | इस
प्रकार ब्रह्माजीको ब्रह्मूूपिणी अनुपम शक्ति देकर देवी
शिवा महादेवजीके शरीरम प्रविष्टठ हो .गयीं । फिर
महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस जगतके
भीतर खस्त्रीजातिमें भोग प्रतिष्ठित हुआ ओर मेथुनद्वार
प्रजाकी सश्कि कार्य चलने छगा । मुनिवरों [_
इससे ब्रह्माजीकों भी आनन्द ओर तंतोष प्राप्त हुआ ।
देवीसे शक्तिके प्रादुर्भावका यह सारा प्रसज्ञ मेंने तुम्हें कह
सुनाया । प्राणियोंकी सश्टिके प्रसड्नमें इस विघयका वर्णन किया
गया है। यह पुण्यकी ब्ृद्धि करनेबा्य हैं; अतः अवश्य
सुनने योग्य है । जो प्रतिदिन देवीसे शक्तिके प्रादुर्भोवकी इस
कथाका कीर्तन करता है, उसे सब प्रकारका पुष्य प्राप्त होता
है तथा वह घुभलूक्षण पुत्र पाता है | ( अध्याय १६ ) .
>> ०>०पै०००---
भगवान् शिवका पाती कक तथा पाषेदोंके साथ मन्द्राचलपर जाकर रहना, श॒म्भ-निशुम्भके वधके
लिये ब्रह्माजीकी श्राथनासे शिवका पार्वतीको 'काली” कहकर कुपित करता और कालीका
गोरी” होनेके लिये तमाके निमिच्त जानेकी आज्ञा माँगना
वायुद्वता कहते हें--इस प्रकार मद्दादेवजीसे ही वायुदेव वोले--महर्षियो | पर्वतोम श्रेष्ठ और विचित्र
सनातन पराश्षक्तिकों पाकर ग्रजापति ब्रह्मा मैथुनी सृष्टि कन्दराओंसे सुशोभित जो परम सुन्दर मन्दराचल है वही
करनेकी इच्छा छेकर खयं भी आधे शरीरसे अद्भुत नारी अपनी तपस्याके प्रभावसे देवाधिदेव महादेवजीका प्रिय निवास-
और आधे दझरीरसे पुरुष हो गये | आधे शरीरसे जो नारी स्थान हुआ । उसने पाब॑ती और शिवको अपने सिरपर
उत्पन्न हुईं थी; वह उनसे शतबूपा ही प्रकट हुई थी। ढोनेके लिये बड़ा भारी तप किया था और दीर्घकालके वाद
प्रद्माजीने अपने आधे पुरुष शरीरसे विगटको उत्पन्न किया। उसे उनके चरणारविन्दोंके स्पर्शका सुख प्राप्त हुआ। उप
वे विराट पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहत्मते हैं| देवी शतरूपाने. पर्वतके सौन्दर्यका विस्तारपूर्वक वर्णन सहलों मुर्खोद्वार
अत्यन्त दुष्कर तपस्पा करके उद्दीत्त यद्ायवाले मनुको ही करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता | उसके सामने
पतिरूपमें प्राप्त किया । समस्त पर्वतोंका सौन्दर्य तुच्छ हो जाता है | इसीलिये
महादेवजीने देवीका ग्रिय करनेकी इच्छासे उस अत्यन्त
पर ५ ५/7 80.4
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इसके पश्चात् मनुके वंश तथा दक्ष-बन्ञ-विध्यंस आदिके से
वि हे पे तय पनेतकौं पु अपना अन्त5पर बना लय [श्रठ्ठ
प्रसज्ञ सुनाकर वायुदेवताने यह बताया कि भगवान् झंकरने. की अपना अन्तःपुर बना डिया इस तय
बक दे ४5 बंतेका समर करके व: + म्य्-आश्र मे प त्थित 7 ह्रण
दक्ष तथा देबताओंके अपराध क्षमा कर दिये | पवतका स्मरण करके रम्ब-आअमके समीप खित $
शक जि अम्बिकासहित भगवान् त्रिछोचन वहाँसे अन्तर्थान द्वकर चर
तद्नन्तर ऋषियाने पूछा--प्रमो ! अपने गणों तथा गये | मन्दराचलछके उद्यानमें पहेचकर देवीसहित मरदेखर
देनीके | [व् सन्त बान होकर हु भगवान् # ह (० शिव यार कहा ही नह की / 5 हा #फ 40 किलर; ०
“2 ॥| ध [ 9 रत भगवान् शव कहां गये, के हृ बहाकी रमणीब तथा दिव्य अन्त :पुरका भूमियाम एम
'« क्या करके प्रिरत हुए ! करने लगे |
वायवीयसंहिता ] # भगवान् शिवका पावती तथा पार्षदोंके साथ भन्दराचरूपर जाकर रहना %
आधा “व ऋकन 3 #ि. ०2 5 अर
3/0७०ग0.० “७२ १००२)१८ १ 0नन "
जब इस तरह कुछ समय बीत गया और ब्रह्माजीकी
मैथुनी सृश्टिके द्वारा जब प्रजाएं बढ़ गयीं; तब श॒ुम्भ और
निशुम्भ नामक दो देत्य उत्पन्न हुए.। वे परस्पर भाई थे |
उनके तपोबलसे प्रभावित हो परमेष्ठी ब्रद्मामे उन दोनों
भाइयोंकों यह वर दिया था कि “इस जगतके क्रिसी भी
पुरुषसे तुम मारे नहीं जा सकोगे |? उन दोनोंने ब्रह्माजीसे यह
प्राथना की थी कि प्पार्बती देवीके अंशसे उत्तन्न जो अयोनिजा
कन्या उत्पन्न हो, जिसे पुरषका स्पश तथा रति नहीं प्राप्त
हुई हो तथा जो अलड्डथ पराक्रमते सम्यन्न हो; उसके प्रति
'कामभावसे पीड़ित होनेपर हम युद्धमें उसीके हार्थों मारे
जाये ।? उनकी इस प्रार्थनापर ब्रह्माजीने “्तथास्तुः कहकर
खीकृति दे दी | तमभीसे युद्धमें इन्द्र आदि देवतार्ओको
जीतकर उन दोनोंने जगत्कों अनीतिपूर्बक वेदोंके स्वाध्याय
और वषटकार (यज्ञ ) आदिसे रहित कर दिया । तब
ब्रक्ेने उन दोनोंके बधके छिये देवेश्वर शिवसे प्रार्थना
की--प्रभो | आप एकान्तमें देवीकी निन्दा करके भी
पैसे-तैसे उन्हें क्रोध दिखाइये और उनके रूप-रंगकी निन्दासे
उस्न्न हुईं काममावसे रहित, कुमारीखरूपा शक्तिको
निशुम्म और थुम्भके वधके लिये देवताओंकों अर्पित
कीजिये |१ ह |
ब्रह्माजीके इस तरह प्रार्थना करनेपर भगवान् नीललोहित
# एकान्तमें पावतीकी निन््दा-सी करते हुए मुसकराकर
बेले---. तुम तो काली हो |? तब सुन्दर वणंवाली देवी पावंती
अगने इ्यामवर्णक्षे कारण आक्षेप सुनकर कुपित हो उठीं और
, उसकराकर समाघानरद्दित वाणीद्वारा बोलीं ।
देवीले कहा--प्रभो | यदि मेरे इस काले रंगपर
“रा प्रेम नहीं है तो इतने दीर्घकाल्से अपनी शिक्षाका
“प दमन क्यों करते रहे हैं ! कोई स्ली कितनी ही सर्वाक्ष-
उरी क्यों न हो, यदि पतिका उसपर अनुराग नहीं हुआ
शक समस्त गुर्णोकि साथ ही उसका जन्म लेना व्यथ हो
कै दि । छ्लियेंकी हहँ सा ही पतिके भोगका प्रधान अन्न
क् बा आर वश्चित हो गयी तो इसका और कहाँ
मिल रे सकता है उपमाा आपने एकान्तमें जिसकी
नन्दा की * उस वर्ण त्यागकर अब में ग्रहण
लीड ३७९% व मैं दूसरा वर्ण ग्रहण
कर जा कहकर देवी पाव॑ती शय्यासे उठकर खड़ी हो गयी
पेपसाके 5 ल्यि न श
मा अं निश्चय करके गद्दद कण्ठसे जानेकी
;..+ भगिते ही ।
४६९
इस प्रकार प्रेम भक्ग होनेसे मयभीत हो भूतनाथ भगवान्
शिव स्वयं भवानीको प्रणाम करते हुए ही बोले |
भगवान् शिवने कहा--प्रिये ! मैंने क्रीडा या मनो-
विनोदके लिये यह बात कही है। मेरे इस अभिप्रायको न
जानकर तुम कुपित क्यों हो गयीं ?! यदि तुमपर मेरा प्रेम नहीं
होगा तो ओर किसपर हो सकता है ! तुम इस जगतकी माता
हो और मैं पिता तथा अधिपति हूँ | फिर तुमपर मेरा प्रेम न
होना केसे सम्भव हो सकता है | हम दोनोंका वह प्रेम भी क्या
कामदेवकी प्रेरणासे हुआ है, कृदापि नहीं; क्योंकि कामदेवकी
उत्पत्तिसे पहले ही जगतकी उत्पत्ति हुई है | कामदेवकी
सृष्टि तो मैंने साधारण छोगोंकी रतिके लिये की है ।
कामदेव मुझे :साधारण देवताके सम्रान मानकर मेरा
कुछ-कुछ तिरस्कार करने छगा था; अतः मैंने उसे मस्म
कर दिया । हम दोनोंका यह लीछाविहार भी जगत्की रक्षाके .
लिये ही है, अतः उसीके लिये आज मैंने त॒म्हारे प्रति यह
परिहसयुक्त बात कही थी । मेरे इस कथनकी सत्यता ठुमपर
शीघ्र ही प्रकट हो जायगी |
देवीने कहा--भगवन् | पतिके प्यारसे वश्चित होनेपर
जो नारी अपने प्रार्णोका भी परित्याग नहीं कर देती, वह
कुलाड़ना ओर शुभलक्षणा होनेपर भी सत्पुयषोंद्वारा निन्दित
ही समझी जाती है। मेरा शरीर गोर वर्णका नहीं है; इस
बातको लेकर आपको बहुत खेद होता हैं अन्यथा क्रीड़ा या
परिहासमें भी आपके द्वारा मुझे “काली कदूटी? कहा जाना केसे
सम्भव हो सकता था | मेरा काछापन आपको प्रिय नहीं है;
इसलिये वह सत्पुरुषोद्वारा भी निन्दित है; अतः तपस्याद्वारा
इसका त्याग किये बिना अब मैं यहाँ रह ही नहीं सकती |
शिव वोले--यदि अपनी श्यामताकों लेकर तुम्हें इस
तरह संताप हो रहा है तो इसके लिये तपस्या करनेकी क्या
आवश्यकता है १ तुम मेरी या अपनी इच्छामात्रसे ही दूसरे
वर्णसे युक्त हो जाओ |
देवीने कहा--मैं आपसे अपने रंगका परिवतंन नहीं
चाहती । स्वयं मी इसे बदलनेका संकल्प नहीं कर सकती ।
अब तो तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराबना करके ही में झीत्र
गोरी हो जाऊंगी ।
शिव वोछे--महादेवि! पूवकालमें मेरी दी झृपासे त्रह्मा-
को त्रह्मपदकी ग्राप्ति हुई थी | अतः तपस्याद्वारा उन्हें चुडाकर
तुम क्या करोगी !
8 मी 28.3]
५५9०
की जा जा
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने 5:
| संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
देवीने कहा--इसमें संदेह नहीं कि ब्रह्मा आदि समस्त
देवताओंको आपसे ही उत्तम पदोंकी प्राप्ति हुई है; तथापि
आपकी आज्ञा पाकर मैं तपस्पाद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना
करके ही अपना अभीष्ट सिद्ध करना चाहती हूँ । पूर्वकालमें
जब में सतीके नामसे दक्षकी पुत्री हुई थी, तब तपस्याद्वारा
ही मैंने आप जगदीश्वरको पतिके रूपमें प्राप्त किया था । इसी
जैज ><«+><>छ्छह<2००-ऋओनअकइइकसइि
प्रकार आज भी तपस्पाद्वारा ब्राह्मण ब्रह्माको संतुष्ट करके में
गोरी होना चाहती हूँ । ऐसा करनेमें यहाँ क्या दोष है!
यह बताइये । ह
महादेवीके ऐसा कहनेपर वामदेव मुस्कराते हुए-से चुप
रह गये | देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे उन्होंने देवीको
रोकनेके लिये हठ नहीं किया | ( अध्याय १७--२४ )
पावंतीकी तपस्या, एक व्याप्रपर उनकी कृपा, अक्माजीका उनके पास आना, देवीके साथ उनका
देवीके जे
वातोलाप, देवीके द्वारा काली त्वचाका त्याग ओर उससे क्रृष्णवणों कुमारी कन्याके
कोशिकी के
रूपमें उत्पन्न हुईं कोशिकीके द्वारा श॒ुम्भ-निशुम्भका वध
वायुदेव कहते हँ--महर्षियो ! तदनन्तर पतित्रता
माता पावेती पतिकी परिक्रमा करके उनके वियोगसे हो नेवाले दुःख-
को किसी तरह रोककर हिमालय पर्वतपर चली गयीं । उन्होंने
पहले सखिरयोके साथ जिस स्थानपर तप किया था; उस स्थान-
से उनका प्रेम हो गया था । अतः फिर उसीको उन्होंने तपस्याके
लिये चुना | तदनन्तर माता-पिताके घर जा उनका दर्शन और
प्रणाम करके उन्हें सब समाचार बताकर उनकी आश्ञा ले
उन्होंने सारे आभूषण उतार दिये और फिर तपोवनमें जा
सस््नानके पश्चात् तपस्वीका परमपावन वेष धारण करके अत्यन्त
तीत्र एवं परम दुष्कर तपस्या करनेका संकल्प किया । वे मन-
ही-मन सदा पतिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुईं किसी
क्षणिक लिड़में उन्हींका ध्यान करके पूजनकी बाह्य विधिके
अनुसार जंगलके फल-फूल आदि उपकरणोंद्वारा तीनों समय
उनका पूजन करती थीं ।“भगवान् शंकर द्वी त्रह्माका रूप घारण
करके मेरी तपस्याका फल मुझे देंगे! ऐसा हृढ़ विश्वास
रखकर वे प्रतिदिन तपस्यामें लगी रहती थीं। इस तरह
तपस्या करते-करते जब बहुत समय बीत गया; तब एके दिन
उनके पास कोई बहुत बड़ा व्याप्र देखा गया । वह दुष्टभावसे
वहाँ आया था | पावंतीजीके निकट आते ही उस दुरात्माका शरीर
जडवत् हो गया | वह उनके समीप चित्रलिखित-सा दिखायी
देने लगा | दुष्टभावसे पास आये हुए! उस व्याप्तको देखकर
भी देवी पावंती साधारण नारीकी भाँति स्वभावसे विचलित
नहीं हुईं । उस व्यात्रके सारे अज्ञ अकड़ गये थे। वह भूख-
से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था ओर यह सोचकर कि ध्यद्दी
मेरा भोजन है? निरन्तर देवीकी ओर ही देख रहा था।
देवीके सामने खड़ा-खड़ा वह उनकी उपासना-सी करने लगा।
इधर देवीके छृदयमें सदा यही भाव आता था कि बह व्यात्र
मैरा ही उपासक है; दुष्ट वन-जन्तुओंसे मेरी रक्षा करनेवाला
है | यह सोचकर वे उसपर कृपा करने ढूगीं | उन्हींको कृपासे
उसके तीनों प्रकारके मल तत्काल नष्ट हो गये | फिर वो उस
व्याप्रको सहसा देवीके स्वरूपका बोध हुआ, उसकी भूख मिट
गयी और उसके अन्लोंकी जडता भी दूर हो गयी। साथ है
उसकी जन्मसिद्ध दुष्टता नष्ट हो गयी और उसे निरन्तर तृत्ति
बनी रहने लगी | उस समय उत्कृष्टह्पसे अपनी इतार्थताका
अनुभव करके वह तत्काल भक्त हो गया और उन परमेश्वरी-
की सेवा करने लगा | अब वह अन्य दुष्ट जन्तुओंको खदेड़ता
हुआ तपोवनमें विचरने छुगा | इधर देवीकी तपस्या बढ़ी ओर
तीत्रते तीत्रतर होती गयी ।
देवता श॒म्म आदि दैल्योंके ढुराग्रहसे ढुखी हो वर्ण
की शरणमें गये । उन्होंने शत्रुपीड़नजनित अपने दु/खको
उनसे निवेदन किया | झुम्म और निश्वम्म वरदान पे
घमंडसे देवताओंकी जैसे-जैसे दुःख देते ये; वह सब छुनक
त्रह्माजीको उनपर बड़ी दया आयी । उन्होंने दैत्यवधके लिये
भगवान् शंकरके साथ हुईं बातचीतका स्मरण करके देवताओं
के साथ देवीके तपोवनको प्रस्थान किया । वहाँ सुरमेष बह
ने उत्तम तपमें परिनिष्ठित परमेश्वरी पार्वतीकों देखा!
सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा-सी जान पड़ती थीं। अपने) श्रीक्षएक
तथा रुद्रदेवके भी जन्मदाता पिता महामहेदबरकी भावों और
जगन्माता गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजीको तक्माजीने प्रणाम कि ।
देवगणोंके साथ ब्रह्माजीकों आया देख देवीने किक
योग्य अर्व्य देकर स्वागत आदिके द्वारा उनका सार किंग
बदलेमें उनका भी सत्कार ओर अभिनन्दन करे व्क्षार
अनजानकी मौँति देवीकी तपस्याका कारण पूछने लगे |
प्रायवीयसंदिता | # गौरी देवीका व्यात्रको अपने साथ ले जानेके लिये अह्याजीसे आज्ञा मॉगना £# ४७९
न्ज्िज्जससखलख्ख्ख्िच्स्स्स्ख्चख्च््ि्स्स््स्स्च्स्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्य्च्च्च्च्च्स्च्स्च्स्स्स्स्स्स्स्स्स्््स
ब्रह्माजी वोले--देवि ! इस तीत्र तपस्याके द्वारा आप
यहाँ किस अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करना चाहती हेँ १ तपस्या-
के समूर्ण फ्लोंकी सिद्धि तो आपके ही अधीन है | जो समस्त
लेकोंके खामी हैं; उन्हीं परमेश्वरको पतिके रूपमें पाकर आपने
तपस्याका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लिया है अथवा यह सारा ही
क्रियाकलाप आपका छीलाविलास है | परंतु आश्रयेंकी बात
तो यह है कि आप इतने दिनोसे महादेवजीके विरहका कष्ट
कैसे सह रही हैं !
देवीने कहा--अ्रह्मनन ! जब सष्टिके आदिकाल्में
महादेवजीसे आपकी उत्पत्ति सुनी जाती है, तब समस्त प्रजाओं-
में प्रथम होनेके कारण आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र होते हैं। फिर जब
प्रजाकी वृद्धिके लिये आपके ललाटसे भगवान् शिवका प्रादु-
भाव हुआ; तब आप मेरे पतिके पिता और मेरे श्वशुर होनेके
कारण गुरुजनोंकी कोठिमें आ जाते हैं ओर जब मैं यह सोचती
हूँ कि खयं मेरे पिता गिरिराज हिमालय आपके पुत्र हैं, तब
आप मेरे साक्षात् पितामह छगते हैं। लोकपितामह | इस
तरह आप लोकयात्राके विधाता हैं | अन्तःपुरमें पतिके साथ
कफ घटित हुआ है, उसे मैं आपके सामने केसे कह
सवूगी ! अतः यहाँ बहुत कहनेसे क्या छाम । मेरे शरीरमें
जो यह कालापन है, इसे सात्विक विधिसे त्यागकर में गौरवर्णा
होना चाहती हू ।
तह्माजी वोले--देवि ! इतने ही प्रयोजनके लिये आपने
ऐसा कठोर तप क्यों किया ? क्या इसके लिये आपकी इच्छा-
रे ही पर्यात्त नहीं थी ! अथवा यह आपकी एक लीला ही
९ । जगन्मातः ! आपकी छीछा भी लोकहितके लिये ह्वी होती
| अतः आप इसके द्वारा मेरे एक अभीष्ठट फलकी सिद्धि
कजिये । निशुम्भ और श॒म्म नामक जो दो दैत्य हैं, उनको
पर दे खा है। इससे उनका घमंड बहुत बढ़ गया
है और वे देवताओंको सता हे हैं| उन दोनोंकों आपके ही
धभसे मारे जानेका वरदान प्राप्त हुआ है | अतः अब विलम्ब
करनेसे कोई छाम नहीं | आप क्षणभरके लिये सुस्थिर हो
जाइये | आपके द्वारा जो शक्ति रची या छोड़ी जायगी। वही
उन दोनोंके लिये मृत्यु हो जायगी |
ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर गिरिराजकुमारी देवी
पावती सहसा अपने काली त्वचाके आवरणको उतारकर गौरवर्णा हो
गयीं | त्वचाकोष ( काली त्वचामय आवरण )-रूपसे त्यागी
गयी जो उनकी शक्ति थी; उसका नाम “कौशिकी? हुआ |
वह काले मेघके समान कान्तिवाली कृष्णवर्णा कन्या हो गयी |
देवीकी वह मायामयी शक्ति ही योगनिद्रा और वेष्णवी कहलाती
है | उसके आठ बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं | उसने उन हाथोंमें
शह्लु। चक्र और त्रि्वूल आदि आयुध धारण कर रक््खे ये |
उस देवीके तीन रूप हैं--सोम्य) घोर और मिश्र | वह तीन
नेत्रोंसे युक्त थी । उसने मस्तकपर अधेचन्धका मुकुट घारण
कर रखा था। उसे पुरुषका स्पर्श तथा रतिका योग नहीं
प्रात्त था और वह अत्यन्त सुन्दरी थी । देवीने अपनी इस
सनातन शक्तिको ब्रह्माजीके हाथमें दे दिया | वही देत्यप्रवर
शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली हुईं | उस समये अ्सन्न
हुए ब्रह्माजीने उस पराशक्तिको सवारीके लिये एक प्रबल सिंह
प्रदान किया) जो उनके साथ ही आया था । उस देवीके रहने-
के लिये ब्रह्माजीने विन्ध्यगिरिपर वासख्थान दिया और वहाँ
नाना प्रकारके उपचारोंसे उनका पूजन किया । विश्वकर्मा
ब्रह्माके द्वारा सम्मानित हुई वह शक्ति अपनी माता गौरीको
और ब्रह्माजीको क्रमशः प्रणाम करके अपने ह्वी अन्नींसे उत्तन्न
और अपने ही समान शक्तिशालिनी वहुसंख्यक शक्तियोंको
साथ ले दैत्यराज श॒म्म-मिश्वम्मकों मारनेके लिये उद्यत होकर
विन्ध्यपर्वतकों चली गयी । उसने समराज्ञणमें उन दोनों देत्य-
राजोंको मार गिराया | उस युद्धका अन्यत्र वर्णन हो चुका हैं
इसलिये उसकी विस्तृत कथा यहाँ नहीं कही गयी । दूसरे
स्थलोंसे उसकी ऊह्य कर लेनी चाहिये | अब में प्रस्तुत प्रसड्-
का वर्णन करता हूँ । ( अध्याय २०५ )
डे देबी अििज-+शा ००४७२ श+7777+5 मं ० ॥॒
गोरी देवीका व्याप्रको अपने साथ ले जानेके लिये त्रह्माजीसे आज्ञा माँगना, अ्ाजीका उसे ढुष्कर्म
बताकर रोकना, देवीका शरणागतको त्यागनेसे इनकार करना, त्र्माजीका देवीकी महत्ता
बताकर अनुमति देना और देवीका माता-पितासे मिलकर मन्द्राचलका जाना
वायुदेवता कहते हैँ--कौशिकीको उत्पन्न करके उसे
' देवी बोलीं--क्या आपने मेरे आश्रममें रनेवालें इस
<. के हमें देनेके पश्चात् गौरी देवीने प्रत्युपकारके लिये .व्या्रको देखा है १ इसने दुट जन्तुओँसे मेरे तपोबनकों रक्षा
'शमससे
"मे कह ।
की है | यह मुझमें अपना मन लगाकर अनन्यभावस मेरा
घर
न्चचस्च्व्य्क्च्शििििि--->--->-
भजन करता रहा है। अतः इसकी रक्षाके सिवा वूसरा कोई
मैरा प्रिय कार्य नहीं है । यह मेरे अन्तःपुरमें विचरनेवाल्य
होगा | भगवान् शंकर इसे प्रसन्नतापूषक गणेश्वरका पद प्रदान
करेंगे | मैं इसे आगे करके सखियोके साथ यहाँसे जाना
चाहती हूँ । इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें। क्योंकि आप
प्रजापति हैं |
देवीके ऐसा कहनेपर उन्हें भोछी-भाली जान हँसते और
मुस्कराते हुए ब्रह्माजी उस व्याप्रकी पुरानी क्रूरतापूर्ण करतूतें
बताते हुए उसकी दुश्ताका वर्णन करने लगे ।
मुखमें साक्षात् अमृत क्यों सींच रही हैं ! यह केवल व्याप्रके
रुपमें रहनेवात्य कोई दुए निशाचर है | इसने बहुत-सी गौओं
और तपस्वी आह्मणोंको खा डाल है| यह उन सबको इच्छा-
सार ताप देता हुआ मनमाना रूप घारण करके विचरता
है । अतः इसे अपने पापकर्मका फछ अवश्य भोगना चाहिये |
ऐसे दुष्झॉपर आपको कृपा करनेकी वेया आवश्यकता है ? इस
स्वभावसे ही कछषित चित्तवाछे दुश जीवसे देवीकों क्या
काम है !
देवी वोरलीं--आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक
है | यह ऐसा ही सही; तथापि मेरी शरणमें आ गया है | अत;
मुझे इसका त्याग नहीं करना चाहिये |
अल्लाजीने कहा--देवि | इसकी आपसे प्रति भक्ति है,
इस वातको जाने बिना ही मैंने आपके समश्ष इसके पूर्वचरित्र-
का वर्णन किया है | यदि इसके भीतर भक्ति है तो पहलेके
पापोसे इसका क्या बिगड़नेवात्य है; क्योंकि आपके भक्तका
कभी नाश नहीं होता । जो आपकी आज्ञाका पाल्म नहीं
ता; वह पुण्यकर्मा होकर भी क्या करेगा । देवि | आप
ही अजन्मा, बुद्धिमती, पुरातन शक्ति ओर परमेश्वरी हैं। सबके
बन््ध ओर मोक्षकी व्यवस्था आपके ही अधीन है | आपके
सिवा पराशक्ति कोन है ? आपके बिना किसको कर्मजनित
सिद्धि प्राप्त हो सकती है ? आप ही असंख्य रुद्रोंकी विविध
के
यक्ति हैं | शक्तिरहित कर्ता काम करनेमें कौन-सी सफ़छता
# नमो रुद्राय दशाम्ताय त्रह्मणे परमात्मने २
| संक्षित्-शिवपुराणाड-
प्राप्त करेगा ? भगवान् विप्णुको, मुझको तथा अन्य देवता,
दानव और राक्षसोंकों उन-उन ऐश्वर्योकी प्राप्ति करानेक्े लिये
आपको आशा ही कारण है | असंख्य ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र,
जो आपकी आशाका पालन करनेवाले हैं; वीत चुके हैं और
भविष्यमें भी होंगे । देवेश्वर ! आपकी आराधना किये बिना
हम सब श्रेष्ठ देवता भी धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्त
नहीं कर सकते । आपके संकल्पसे ब्रह्मत्व और खावरल्का
"कील व्यत्यास ( फेर-बदछ ) भी हो जाता है अर्थात् अहम
सावर ( वृक्ष आदि ) हो जाता है और खावर ब्रह्मा: क्योंकि
पुष्य और पापके फल्लोंकी व्यवस्था आपने ही की है | आप ही
जगतके खामी परमात्मा शिवकी अनादि, अमध्य और अननत
आदि सनातन शक्ति हैं | आप सम्पूर्ण छोकयात्राका निर्वाह
करनेके लिये किसी अदभुत मूर्तिमं आविष्ट हो नाना प्रकार
भावोंसे क्रीड़ा करती हैं । भछा, आपको ठीक-ठीक कौन जानता
हैं | अतः यह पापाचारी व्यात्र भी आज आपकी हपासे परम
सिद्धि प्राप्त करे, इसमें कौन बाधक हो सकता है।.._
इस अकार उनके परम तत््वका स्मरण कराकर ब्रह्माजीने
जब उचित आर्थना की, तब गौरीदेवी- तपस्यासे निवृत्त हुई।
तदनन्तर देवीकी आज्ञा लेकर अद्माजी अन्तर्धान हो गये। फिर
देवीने अपने वियोगको न सह सकनेवाले माता-पिता मेना और
हिमवानका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया तथा उन्हें नाना
प्रकारसे आश्वासन दिया | इसके बाद देवीने तपस्थाक़े प्रेमी
तपोवनके इक्षोंकी देखा। वे उनके सामने फूलोंकी वर्षा कर दे
थे | ऐसा जान पड़ता था, मानो उनसे होनेवाले वियोगरे
झोकसे पीड़ित हो वे ऑँसू बरसा रहे हों | अपनी शाखाओंर
बेठे हुए; विहंगमोंके कलरवोंक्े व्याजसे मानो वे व्याकुल्ता-
पूवक नाना प्रकारसे दीनतापूर्ण विछाप कर रहे ये । तदनत्तर
पतिके दर्शनके लिये उतावली हो उस व्याप्रकों औरस पुत्रकी
भाँति स्नेहसे आगे करके सखियोंसे बातचीत करती ऑए
देहकी दिव्य प्रमासे दसों दिशाओंको उद्दीपित करती हुई
गोरीदेवी मन्दराचलको चली गर्बी, जहाँ सम्यूण जगत्के आधाए)
सा, पालक और संहारक पतिदेव महेश्वर विराजमान ये ।
( अथाव २६
">७३-आ>2+कंफ-८२-.
वायवीयसंहिता |
थक 55 उसपर पयत5रा भरा दायात एप या कसरारपरपभ्ा या चल सतत नास्ताया लक गन यलकरापरस<तपत५पतान् हा उाय सका पऋ का मत भाभकमसयापा नामक डक... >> यम लव नल जलकर अमर नल मि कक मिट विन लक कि आ आओ ३. पता «के. अधिनाओन पयक. अजगाकत. बन मानकर 3३७७०-+>बत++याका “गत,
# मन्द्राचलूूपर गौरीदेवीका खागत #
४७३
5099४ 0४0४४४४४8४४४४७७४७/७०७७ >> उन करा रफरतबअमप्इनपााक्रसद॑ंसलाफपभापाामकाकासअहाऊमएाज पा कारभारदए पक पकलननराकरयद
मन्दराचलपर गोरीदेवीका खागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट खरूप एवं
अविच्छेद्य सम्वन्धपर प्रकाश तथा देवीके साथ आये हुए व्याप्रको उनका गणाध्यक्ष
वनाकर अन््त;पुरके द्वारपर सोमनन्दी नामसे प्रतिष्ठित करना
फ्रूपियोंने पूछा--अपने शरीरको दिव्य गौरवर्णसे युक्त
बनाकर गिरिराजकुमारी देवी पारव॑तीने जब मन्दराचल प्रदेशर्मे
प्रवेश किया, तव वे अपने पतिसे किस प्रकार मिलीं ? प्रवेशकाल्में
। उनके भवनद्वारपर रहनेवाले गणेश्वरोंने क्या किया तथा
महदेवजीने भी उन्हें देखकर उस समय उनके साथ कैसा
बता किया ?
वायुदेवताने कहा--जिस प्रेमगर्भित रसके द्वारा
अनुरागी पुरुषोंके मनका हरण हो जाता है; उस परम रसका
गैक-ठीक वर्णन करना असम्भव है | द्वारपाल बड़ी उतावलीसे
रह देखते थे | उनके साथ ही महादेवजी भी देवीके आगमन-
के लिये उत्सुक थे | जब वे भवनमें प्रवेश करने लगीं; तब
शड्ित हो उन-उन प्रेमजनित भावोंसे वे उनकी और देखने
रे | देवी भी उनकी ओर उन्हीं भावोंसे देख रही थीं | उस
मय उस भवनमें रहनेवाले श्रेष्ठ पार्षदोंने देवीकी वन्दना
भी । फिर देवीने विनययुक्त वाणीद्वारा भगवान् त्रिछोचनको
! प्रणाम किया | वे प्रणाम करके अभी उठने भी नहीं पायी थीं
के परमेश्वरने उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर बड़े आननन््दके
सी सवा लिया | फिर मुसकराते हुए वे एकटक
5 मुखचन्रकी सुधाका पान-सा करने छगे | फिर
बा ऐप करनेके लिये उन्होंने पहले अपनी ओरसे वार्ता
देवाधिदेव महादेवजी वोले---सर्वाड्रसुन्दरि प्रिये |
बरी वह मनोदशा दूर हो गयी, जिसके रहते तुम्हारे
श्रेपके कारण मुझे अनुनय-विनयका कोई भी उपाय नहीं
ता था | यदि साधारण छोगोंकी भाँति हम दोनोंमें भी एक
छरेके अप्रियका कारण विद्यमान है, तब तो इस चराचर
कह नाश रा ही समझना चाहिये | मैं अग्निके मस्तक-
कप | हैँ और तुम सोमके | हम दोनोंसे ही यह अग्नि-
हि बा है| जगतके ३० ल्यि स्वेच्छासे
पे कं हम दोनोंके वियोगमें यह जगत्
कक हक इसमें शास््र और युक्तिसे निश्चित किया
पा हे | यह स्थावर-जंगमरूप जगत् वाणी
. अधंमय ही है.। तुम साक्षात् वाणीमय हो ओर
+ अपपय परम उत्तम अपत दोनों अमृत हक पलक
पु अमृत हूं | ये दोनों अमृत एक-दूसरे-
विद्या हो और मैं तुम्हारे दिये हुए विश्वासपूर्ण बोचसे जानने-
योग्य परमात्मा हूँ | हम दोनों क्रमशः विद्यात्मा और वेद्यात्मा
हैं, फिर हममें वियोग होना कैसे सम्भव है| मैं अपने प्रदत्त
जगत्की सृष्टि और संहार नहीं करता | एकमात्र आशज्ञासे
ही सबकी सष्टि ओर संह्यर उपलब्ध होते हैं | वह अत्यन्त
गोरवपूर्ण आशा तुम्हीं हो । ऐश्वर्यक्रा एकमात्र सार आज्ञा
( शासन ) है, क्योंकि वही स्वतन्त्रताका लक्षण है । आज्ञा
वियुक्त होनेपर मेरा ऐश्वय केसा होगा। हमलोगोंका एक
दूसरेसे विलग होकर रहना कभी सम्भव नहीं है | देवताओंके
कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे ही मैंने उस समय उस दिन लीला-
पूवक व्यड्ड-य वचन कहा था । तुम्हें भी तो यह बात अज्ञात
नहीं थी | फिर तुम कुपित केसे हो गयीं ! अतः यही कहना
पड़ता है कि तुमने मुझपर भी जो क्रोध किया था, वह त्रिलोकी
की रक्षाके लिये ही था; क्योंकि तुममें ऐसी कोई बात नहीं
है, जो जगतके प्राणियोंका अनर्थ करनेवाली हो ।
इस प्रकार प्रिय बचन बोलनेवाले साक्षात् परमेश्वर शिवके
प्रति छज्ञार रसके सारभूत भावोंकी प्राकृतिक जन्मभूमि देवी
पाबंती अपने पतिकी कही हुई यह मनोहर बात सुनकर इसे
सत्य जान मुसकराकर रह गयीं, लजावश कोई उत्तर न दे
सकी । केवल कोशिकीके यशका वर्णन छोड़कर और कुछ
उन्होंने नहीं कहा । देवीने कोशिकीके विपयमें जो कुछ कहा
उसका वर्णन करता हूँ ।
देवी बोलीं--“भगबन् | मैंने जिस कौशिकीकी सृष्टि की
है, उसे क्या आपने नहीं देखा है ? वैंसी कन्या न तो इस
लोकमें हुईं है ओर न होगी ।? यों कहकर देवीने उसके विन्ध्य-
प्॑तपर निवास करने तथा समराद्गरणमें शुम्म और निशुम्मका
वध करके उनपर विजय पानेका प्रसक्न सुनाकर उसके बल-
पराक्रमका वर्णन किया | साथ ही यह भी बताया कि वह
उपासना करनेवाले लोगोंको सदा प्रत्यक्ष फल देती है तथा
निरन्तर लोकोंकी रक्षा करती रहती है | इस विपयम ब्रह्मात्री
आपको आवश्यक वातें वतायेंगे |
उस समये इस प्रकार बातचीत करती हुई देवीकी
आजश्से ही एक सखीने उस व्याप्रको लाकर उनके सामने
खड़ा कर दिया | उसे देखकर देवी कदने लगीं---देव ! यह
. ४ खा केसे ता मेरे हि हे कि: थे देखिये
क् री सकते हैं | तुम मेरे स्वरूपका बोध करानेवाली व्याप्र मैं आपके लिये मेंठ लावी हूँ | आप इसे देखिये | इसके
शि पु० आं० ६०--
४७४ # नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने # [ संक्षिप्त-शिवपुराणा
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ग इसे मेरे तपोबनकी रक्षा की थी | यह मेरा अलन्त भर
है ओर अपने रक्षणात्मक कार्यसे मेरा विश्वासपात्र चने गा
है। मेरी प्रसन्नताके लिये यह अपना देश छोड़कर यहाँ भरा
गया है । महेश्वर | यदि मेरे आनेसे आपको प्रसन्नता हुई है
और यदि आप मुझसे अलन्त प्रेम करते हैं तो मं नश्तो
हूं कि यह नन््दीकी आज्ञासे मेरे अन्तःपुरके द्वार अब
र्षकोके साथ उन्हींके चिह्न धारण करके सदा छित छे।॥
वायुदेव कहते हँ--देवीके इस गधुर और अत्तो-
गला प्रेम बढ़ानेवाले घुभ वचनको सुनकर महादेवजीने कहा-
'में बहुत प्रसन्न हूँ |? फिर तो वह व्यात्र उसी क्षण लव
हुईं सुवर्णजटित बेंतकी छड़ी रत्नोंसे जटित विचित्र कवच
सरपंकी-सी आक्ृतिवाली छुरी तथा रक्षकोचित वेष धारण डिये
गणाध्यक्षके पदपर प्रतिष्ठित दिखायी दिया | उसने उमासत्लि
महादेव और नन््दीको आनन्दित किया था। इसलिये सोमनर्ी
नामसे विख्यात हुआ | इस प्रकार देवीका प्रिय कार्य करे
चन्द्राधभूषण महादेवजीने उन्हें रत्नभूषित दिव्य आपूषोंर
भूषित किया । चन्रभूषण भगवान् शिवने सबमनोह्मरिण
गिरिराजकुमारी गौरी देवीको पलंगपर विठाकर उस सम्रय
सुन्दर अलंकारोंसे स्वयं ही उनका श्वृज्ञार किया |
-( अध्याय २७ )
अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्निषोमात्मकताका ग्रतिपादन
ऋषियोंने पूछा--प्रमो | पार्वती देवीका समाधान
करते हुए महादेवजीने यह बात क्यों कही कि “सम्पूर्ण विश्व
अग्निषोमात्मक एवं वागर्थात्मक है | ऐश्वयंका सार एकमात्र
आज्ञा ही है ओर वह आज्ञा तुम हो |? अतः इस विषयमें हम
क्रमशः यथार्थ बातें सुनना चाहते हैं ।
वायुदेव वोले--महर्षियो ! रुद्देवका जो घोर तेजोमय
शरीर है, उसे अग्नि कहते हैं और अमृतमय सोम शक्तिका
स्वरूप है; क्योंकि शक्तिका शरीर शान्तिकारक है| जो अमृत
है; वह प्रतिष्षा नामक कला है; और जो तेज है, वह साक्षात्
विद्या नामक कला है | सम्पूर्ण सूक्ष्म भूतोंमें वे ही दोनों रस
और तेज हैं| तेजकी वृत्ति दो प्रकारकी है | एक सूर्यरूपा है
ओर दूसरी अग्निरूपा । इसी तरह रसबृत्ति भी दो प्रकारकी
है---एक सोमरूपिणी और दूसरी जल्रूपिणी | तेज विद्युत
आदिके रूपमें उपछग्ध होता है तथा रस) मधुर आदिके
रूपमें | तेज ओर रसके भेदोंने ही इस चराचर जगतको
धारण कर रक़्खा है । अग्निसि अमृतकी उत्पत्ति होती है और
अमृतस्वरूप घीसे अग्निकी इंद्धि होती है, अतएव अग्नि और
सोमको दी हुई आहुति जगतके लिये हितकारक होती है |
शसय-समत्ति दविष्यक्षा उत्मादन करती है। वर्पा शस्थ॒को
बढ़ाती है | इस प्रकार वर्षासे ही ह॒विष्यका प्रादुभाब होता है
जिससे यह अग्निषोमात्मक जगत् टिका हुआ है। अभि
वहाँतक ऊपरको प्रज्बलित होता है; जहाँतक सोमतमत्री
परम अमृत विद्यमान है; और जहाँतक अग्निका खान
वहाँतक सोमसम्बन्धी अमृत नीचेकों झरता है। इसीहिग
कालाग्नि नीचे है और शक्ति ऊपर | जहाँतक अमन है
उसकी गति ऊपरकी ओर है; और जो जल्का आप्छवन है;
उसकी गति नीचेकी ओर है। आधार-शक्तिने ही इस कर्णगग
कालाग्निकों धारण कर रक्खा है तथा निम्नगामी सोम शशि
शक्तिके आधारपर प्रतिष्ठित है। शिव ऊपर हैं. और शक
नीचे तथा गाक्ति ऊपर है और शिव नीचे । इस प्रकार मं
और शक्तिने यहाँ सब कुछ व्याप्त कर रखा है | की
अम्निद्वारा जलाया हुआ जगत् भस्मसात् हो जाता दे | कं
अग्निका वीर्य है| भस्मको ही अग्निका वी कहते हैं। मे ₹४
प्रकार भस्मके श्रेष्ठ स्खखपको जानकर “अपिः? इत्यादि मल ।
द्वारा भस्मसे स्नान करता है; वह बँधा हुआ जीव पाशरती 4.
हो जाता है | अग्निके वीय॑रूप मस्मको सोमने जज"
द्वारा फिर आप्लावित किया; इसलिये बह प्रकृतिके
चला गया | यदि योगयुक्तिसे शञाक्त अमृतवपकि ढीए उम
हि] +. जे कुक न जखआाक
वांयवीयसंहिता |
इंम्मपरआहानन पाना न कमा पदक,
# जंगत् 'वाणी और अथरूप! है--इसका प्रतिपादन #:
४७५
भस्तका सब ओर आप्लछावन हो तो वह प्रकृतिके अधिकारोंको
निवत्त कर देता है । अतः इस तरहका अमृतप्छावन सदा
मृत्युपर विजय पानेक्के लिये ही होता है। शिवाग्निके साथ
शक़तिसम्बन्धी अमृतका स्पशे होनेपर जिसने अमृतका
आप्लावन प्राप्त कर लिया, उसकी मृत्यु केसे हो सकती हैं |
जो अमिके इस गुद्य स्वरूपको तथा पूर्वोक्त अम्रृतप्छावनको
ठीक-ठीक जानता है; वह अग्निषोमात्मक जगत्कों त्यागकर
फिर यहाँ जन्म नहीं लेता | जो शिवाग्निसे शरीरकों दस्ध
करके शक्तिस्वरूप सोमामृतसे योगमार्गके द्वारा इसे आप्लावित
करता है; वह अमृतस्वरूप हो जाता है। इसी अभिप्रायको ह्ृदयमें
धारण करके महादेवजीने इस सम्यू्ण जगत्को अग्निषोमात्मक
कहा था। उनका वह कथन सबंथा उचित है। ( अध्याय २८ )
“---क्च्चकप २87
जगत् वाणी और अथेरूप' है-इसका प्रतिपादन
वायुदेवता कहते हैं--महर्षियो |! अब यह बता रहा
हूँ कि जगतकी वागर्थात्मकताकी सिद्धि केसे की गयी है | छः
अथाओं (मार्गों ) का सम्यक् ज्ञान मैं संक्षेपसे ही करा रहा हूँ,
विश्तारसे नहीं | कोई भी ऐसा अर्थ नहीं है, जो बिना शब्दका
हे और कोई भी ऐसा शब्द नहीं है जो बिना अर्थका हो |
. अत समयानुसार सभी शब्द सम्पूर्ण अर्थोके बोधक होते हैं ।
प्रकृतिका यह परिणाम शब्दभावना ओर अर्थमावनाके भेदसे
दो प्रकारका है | उसे परमात्मा शिव तथा पार्वतीकी प्राकृत
भूति कहते हैँ | उनकी जो शब्दमयी विभूति है, उसे विद्वान
न प्रकारकी बताते हँ-स्थूछा, सूक्ष्म और परा । स्थूला वह
है जो कानोंको प्रत्यक्ष सुनायी देती है; जो केवल चिन्तनमें
आती है; वह सूक्ष्मा. कही गयी है और जो चिन्तनकी भी
सीभासे परे है; उसे परा कहा गया है | वह शक्तिस्वरूपा है |
वह शिवतत्तके आश्रित रहनेवाली 'परा शक्ति? कही गयी है |
रानशक्तिके संयोगसे वही इच्छाकी उपोह्ठलिका ( उसे दृढ़
फरनेवाली ) होती है । वह सम्पूर्ण शक्तियोंकी समश्टिपा है।
वह शक्तितत्त्वके नामसे विख्यात हो समस्त कार्यंसमूहकी मूल
प्रकृति मानी गयी है। उसीको कुण्डलिनी कहा गया है । वही
वेशुद्भाध्यपरा माया है | वह स्वरूपतः विभागरहित होती हुई
भी छ; अध्वाओंके रुपमें विस्तारको प्राप्त होती है| उन छः
अध्वाअमेसे तीन तो शब्दरूप हैं. और तीन अर्थरूप बताये
हो है। सभी पुरुषोंको आत्मशुद्धिके अनुरूप सम्पूर्ण तत्तोके
वभागते हय और भोगके अधिकार प्राप्त होते हैं | वे सम्पूर्ण
पलकलाओद्वारा यथायोग्य प्राप्त हैं । परा ग्रकृतिके जो
देव बैच प्रकारके परिणाम होते हैं, वे ही निन्वत्ति आदि
70 ६। मन््त्राध्या) पदाघ्वा और वर्णाप्वा-ये तीन अध्वा
“ब्दत सम्बन्ध रखते हूँ तथा भुवनाध्वा, तत्त्वाध्या और
जधा-ये तीन अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं। इन सबमें
बा "या यज्यापक-भाव बताया जाता है | सम्पूर्ण मन्त्र
सा के .९ क्योंकि वे वाक्यरूप हे सम्पूर्ण पद भी
के पेयांकि विद्वान पुरुष वर्णके समूहको ही पद
५५ ३ । पे वणण भी भुवनोसे व्याप्त हैं; क्योंकि उन्हींमें उनकी
उपलब्धि होती है | भुवन भी तस्तवोंके समूहद्धारा बाहर-भीतरसे
व्यास हैं; क्योंकि उनकी उत्पत्ति ही तत्त्वोंसे हुई है। उन
कारणभूत तत्त्वोंसे ही उनका आरम्भ हुआ है । अनेक भ्ुवन
उनके अंदरसे ही प्रकट हुए हैं | उनमेंसे कुछ तो पुराणेमिं
प्रसिद्ध हैं। अन्य भुवनोंका ज्ञान शिवसम्बन्धी आगमसे
प्राप्त करना चाहिये | कुछ तत्त्व सांख़्य ओर योगशा्रोंमें भी
प्रसिद्ध हैं ।
शिवशाज़ोमें प्रसिद्ध तथा दूसरे-दूसरे भी जो तत्व हैं;
सब-के-सब कलाओंद्वारा यथायोग्य व्याप्त हैं। परा प्रकृतिके
जो आदिकालमें पाँच परिणाम हुए; वे ही निवृत्ति आदि
कलाएँ हैं | वे पाँच कलाएँ उत्तरोत्तर तत्वोंसे व्याप्त हैं। अतः
परा शक्ति सवेत्र व्यापक है। वह विभागरहित होकर भी छः
अध्वाओंके रूपमें विभक्त है। शक्तिसे लेकर प्ृथ्वीतत्त्वपर्यन्त .
सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रादुर्भाव शिव-तत्तसे हुआ है। अतः जेसे
घड़े आदि मिट्थीसे व्याप्त हैं; उसी प्रकार वे सारे तत्त एक-
मात्र शिवसे ही व्याप्त हैं | जो छः अध्वाओंसे प्राप्त होनेवाला
है, वही शिवका परम धाम है। पाँच तत्त्वोंके शोधनसे व्यापिका
और अबव्यापिका शक्ति जानी जाती है। निव्वत्तिकलाके द्वारा
रुद्रछोकपयन्त ब्ह्माण्डकी स्थितिका शोधन होता है । प्रतिष्ठा-
कलाद्वारा उससे भी ऊपर जहातक अव्यक्तकी सीमा है वहाँ:
तककी शोध की जाती है। मध्यवर्तिनी विद्याकलद्वोरा
उससे भी ऊपर विद्येश्वरपयन्त स्थानका शोधन होता है |
शान्तिकलाद्वार उससे भी ऊपरके स्थानका तथा शझान्ततीता
कलाके द्वारा अध्चाके अन्ततकका श्योधन हो जाता दँ। उसीको
“परम व्योम? कहा गया है । क्
ये पाँच तत्त्व बताये गये; जिनसे सम्यूण जगत् व्याप्त ३
वहीं साधकोंको यह सब कुछ देखना चाहिये; जा अच्चाकी
व्याप्तेोको न जानकर शोधन करना चाहता हैं; वह झुद्धिस
वच्चित रह जाता है, उसके फलको नहीं पा सकता | उसका
सारा परिश्रम व्यर्थ; केवल नरककी दी प्राप्ति करनेबादा
होता है। शक्तिपातका संयोग हुए. बिना तल्वोंका ठीऋ-ठीक
कस
ज्ञान नहीं हो सकता | उनकी व्याति ओर बृद्धिका शान भी
3७६
असम्भव है। शिवकी जो चित्स्वरूपा परमेश्वरी परा शक्ति है;
वही आजा है। उस कारणरूपा आशाके सहयोगसे ही शिव
सम्यूण विश्वके अधिष्ठाता होते हैं । विचारदश्सि देखा जाय
तो आत्मामें कभी विकार नहीं होता । यह विकारकी प्रतीति
मायामात्र है | न तो बन्धन है ओर न उस बन्धनसे छुटकारा
दिलानेवाली कोई मुक्ति है। शिवकी जो अव्यभिचारिणी परा-
शक्ति है; वही सम्पूर्ण ऐश्वयकी पराकाष्ठा है। वह उन्हींके
समान धर्मवाली है ओर विशेषतः उनके उन-उन विलश्षण
भावेसे युक्त है। उसी शक्तिके साथ शिव ग्रहस्थ बने हुए हैं
और वह भी सदा उन शिवके ही साथ उनकी ग्ृहिणी बनकर
रहती है । जो प्रकृतिजन्य जगत्रूप काय है; वही उन शिव
दम्पतिंकी संतान है । शिव कर्ता हैं ओर शक्ति कारण । यदी
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने
>> <5< 55 5< $< #स्९ 79777 नमन दि
| संक्षिप्त-शिवपुराणा३
उन दोनोंका भेद है | वास्तवमें एकमात्र साक्षात् शिव ही दो
रुपोर्मे स्थित हैं | कुछ लोगोंका कहना है कि ज्नी और पर
रूपम॑ ही उनका भेद है। अन्य छोग कहते हैं कि पराशक्ति
शिवमें नित्य समवेत है । जेसे प्रभा सूर्यसे भिन्न नहीं है, उप्ी
प्रकार चित्स्वरूपिणी पराशक्ति शिवसे अभिन्न ही है। यही
सिद्धान्त है। अतः शिव परम कारण हैं, उनकी आशा ही
परमैश्वरी है | उसीसे प्रेरित होकर शिवकी अविनाशिनी मूह
प्रकृति कार्यमेदसे महामाया। माया और निगुणात्मिक प्रकृति
--इन तीन रुपोमें स्थित हो छः अध्वाओंको प्रकट करती है|
वह छः प्रकारका अध्वा वागर्थमय है; वही सम्पूर्ण जगतके
रूपमें स्थित है; सभी शाखत्रसमूह इसी भावका विसाे
प्रतिपादन करते हैँ । ( अध्याय २९ )
जज अर
ऋषियोंके प्रश्नका उत्तर देते हुए वायुदेवके द्वारा शिबके खतन््त्र
एवं सवोनुग्राहक खरूपका ग्रतिपादन
तदननन््तर ऋषियोने कई कारण द्खिकर पूछा--
बायुदेव | यदि शिव सदा शान्तभावसे रहकर ही सबपर
अनुग्रह करते हैं तो सबकी अभिलाषाओको एक साथ ही
पूर्ण क्यों नहीं कर देते १ जो सब कुछ करनेमें समर्थ होगा;
बह सबको एक साथ ही बन्धन-मुक्त क्यों नहीं कर सकेगा !
यदि कहूँ अनादिकालसे चले आनेवाले सबके विचित्र कर्म
अलग-अछा हैं; अतः सबको एक समान फल नहीं मिल
सकता तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि कर्मोकी विचित्रता भी
यहाँ नियामक नहीं हो सकती। कारण कि वे कम भी ईश्वरके
करानेसे ही होते हैं | इस विषय बहुत कहनेसे क्या छाभ ।
उपर्युक्तरूपसे विभिन्न युक्तियोंद्राय फैछायी गयी नास्तिकता
जिस प्रकारसे शीघ्र ही निइईच हो जाय, वैसा उपदेश
दीजिये |
वायु देवताने कहा--त्राक्मणो ! आपलोगोंने युक्तियों-
ते प्रेरित होकर जो संशय उपस्थित किया है। वह उचित ही
है; क्योंकि किसी वातकों जाननेकी इच्छा अथवा तच्वज्ञानके
लिये उठाया गया प्रश्न साधुबुद्धिवाले पुरुषर्म नास्तिकता-
का उत्पादन नहीं कर सकता में इस विषयमें ऐसा प्रमाण
प्रस्तुत करूगा; जो सत्पुरुषोंके मोहकों दूर करनेवाल्य है।
असत् पुस्षोंका जो अन्यथा भाव द्वोता है, उसमें प्रभु शिवकी
कृपाका अभाव ही कारण है | परिपूर्ण परमात्मा शिवके परम
गया है । परानुग्रह कर्ममें खमाव ही पर्यात्त ( पूर्णतः समय )
है, अन्यथा निःस्वभाव पुरुष किसीपर भी अनुग्रह नहीं कर
सकता | पश्ञु और पाशरूप सारा जगत् ही पर कहां गया है
बह अनुग्रहका पात्र है। परको अनुग्हीत करनेके लिये पति
की आशाका समन्वय आवश्यक है| पति आशा देनेवाल है
वही सदा सबपर अनुग्रह करता है| उस अनुम्हके लिये ही
आशा-रूप अर्थक्रों खीकार करनेपर शिव परतन्त्र केसे कहे.
जा सकते हैं | अनुग्राहककी अपेक्षा न रखकर कोई भी
अनुग्रह सिद्ध नहीं हो सकता | अतः खातन्व्य-शब्दके अप:
की अपेक्षा न रखना ही अनुग्रहका छक्षण है । जो अनुप्राह्
है, वह परतन्त्र माना जाता है; क्योंकि पतिके अनु्हके बिना
उसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती | जो मूर्तात्मा है
वे भी अनग्रहके पात्र हैं; क्योंकि उनसे भी शिवकी आशकी
निव्त्ति नहीं होती---वें भी शिवक्री आशसे बाहर नहीं ह।
यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है; जो शिवक्री आशके अधने में
हो | सकल ( सगुण या साकार ) होनेपर भी जिसके
हमें निष्कल ( निर्गृंण या निराकार ) शिवकी य्रात्ति होती
उस मूर्ति या लिड्कके रूपमें साक्षात् शिव ही विराज रहे है |
वह “द्विवकी मूर्ति है? यह बात तो उपचारसे कही जाती $!
जो साक्षात् निप्कल तथा परम कारणहूप शिव हैं) वें किसे
द्वारा भी साकार अनुभावसे उपलक्षित नहीं होते, एमी 4
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पॉयवीयसंहिता ] हक वायुदेवके छारा शिवके स्वंतन्त पुव॑ लवोलुभाईक खंरूपका प्रतिपादन #
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हीं है; प्रमाण अथवा प्रतीकमात्रसे अपेक्षा-बुद्धिका उदय
नहीं होता | वे परम तत्त्वके उपल्क्षणमात्र हैं? इसके सिवा
उनका और कोई अभिप्राय नहीं है | कोई-न-कोई मूर्ति ही
भात्माका साक्षात् उपलक्षण होती है । पशिवकी मूर्ति है? इस
कथनका अभिग्राय यह है कि उस मूर्तिके रूपमें परम शिव
विगजम्रान हैं | मूर्ति उनका उपछक्षण है | जेसे काप्ठ आदि
आल्म्रनका आश्रय लिये बिना केवल अग्नि कहीं उपलब्ध
नहीं होती उसी प्रकार शिव भी मूत्यात्मामें आरूढ़ हुए
बिना. उपलब्ध नहीं होते । यही वस्तुसिति है । जैसे
किसीसे यह कहनेपर कि तुम आग ले आओ? उसके द्वारा
जलती हुई लकड़ी आदिके सिवा साक्षात् अग्नि नहीं लायी
जाती, उसी प्रकार शिवका 'पूजन भी मूर्तिरूपमें ही हो
सकता है; अन्यथा नहीं । इसील्यि पूजा आदियें भ्मूत्य॑त्मा/
फ्री परिकल्मना होती है; क्योंकि मूर्त्यात्माके प्रति जो कुछ
किया जाता है; वह साक्षात् शिवक्रे प्रति किया गया ही माना
गयाहै| लिक्न आदियें और विश्ेषतः अर्चाविग्रहमें जो पूजनकझत्य
रोता है, वह भगवान् शिवका ही पूजन है | उन-उन मूर्तियों-
के रुपमें शिवकी भावना करके हमलोग शिवकी ही उपासना
से हैँ | जैसे परमेष्ठी शिव मूर्त्यत्मापर अनुग्रद् करते हैं;
उत्ी प्रकार मृत्यात्मामें स्थित शिव हम पशुओंपर अनुग्रह
कैसे हैं | परमेष्ठी शिवने छोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये द्वी
तदाशिव आदि सम्पूर्ण मूर्त्यात्माओंको अधिष्ठित--अपनी
आशर्म रखकर अनुगहीत किया है |
भगवान् शिव सबपर अनुग्रह ही करते हैं, किसीका
निग्रह नहीं करते; क्योंकि निग्रह करनेवाले लोगोंमें जो दोष
रेत हैं, वे शिवमें असम्भव हैं | ब्रह्मा आदिके प्रति जो निम्नह
देखे गये हैं, वे भी श्रीकण्ठमूति शिवके द्वारा छोकहितके लिये
ऐे ढिये गये हैं । विद्वानोंकी दृष्टिमं निम्रह भी स्वरूपसे दूषित नहीं
।$ जब वह राग-द्वेपसे प्रेरित होकर किया जाता है; तभी
मैददनीय माना जाता है | ) इसीलिये दण्डनीय अपराधियोंको
पजाओफी ओरसे मिले हुए दण्डकी प्रशंसा की जाती है |
३ साधुकी रक्षा करनी है तो असाधुका निवारण करना
हगा पहले साम आदि तीन उपायेसे अखाधुके निवारण-
शे रा “गा जाता है। यदि यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ
०. भय उपाय दण्डका ही आश्रय लिया जाता है।
** बनते अनुशासन लोकहितके लिये ही किया जाना
चइये बह थ उससः आओ 488» ८ # 5 बे हज
'।। वही उसके औच्ित्यको परिलक्षित कराता हे | यदि
ग्नुशासन श्र श्सके रु न ष्श्ज
हक : विपरीत हो तो उसे अद्वितकर कहते हैं । जो
सदा हितमें ही लगे रहनेवाले हैं, उन्हें इश्वरका दृशन्त अपने
सामने रखना चाहिये | ( इंश्वर केवल दुष्ठोंको ही दण्ड देते
हैं, इसीलिये निर्दोष कहे जाते हैं |) अतः जो दुर्शेको ही
दण्ड देता है, वह उस निग्नह-कर्मकी लेकर सत्पुरुषोद्वारा
लाडिछत केसे क्रिया जा सकता है| लोकमें जहाँ कहीं भी
निग्रह होता है; वह यदि विद्वेषपू्वंक न हो। तभी श्रेष्ठ माना
जाता है । जो पिता पुत्रको दण्ड देकर उसे अधिक शिक्षित
बनाता है; वह उससे द्वेष नहीं करता |
शिवकी आशाका पालन ही हित है और जो द्वित है;
वही उनका अनुग्रह है | अतएव सबको हितमें नियुक्त करने-
वाले शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले कहे गये हैं | जो उपकार-
शब्दका अर्थ है, उसे भी अनग्रह ही कहा गया है; क्योंकि
उपकार भी हित्तरूप ही होता है। अतः सबका उपकार करने-
वाले शिव सर्वानुग्राहक हैं । शिवके द्वारा जड-चेतन सभी सदा
हितमें ही नियुक्त होते हैं | परंतु सबको जो एक साथ ओर
एक समान हितक्री उपलब्धि नहीं होती, इसमें उनका खभाव
ही प्रतिबन्धक है | जसे सूर्य अपनी किरणोंद्राय सभी कमलों-
को विकासके लिये प्रेरित करते हैं, परंतु वे अपने-अपने
खभावके अनुसार एक साथ ओर एक समान विकसित नहीं
होते, खभाव मी पदार्थोके भावी अर्थका कारण होता है;
किंतु वह नष्ट होते हुए अथैको कर्ताओंके लिये सिद्ध नहीं कर
सकता । जैसे अग्निका संयोग सु॒वर्णको द्वी पिघछाता है; कोयले
था अज्जरको नहीं; उसी प्रकार भगवान् शिव परिपक्ष मल-
बाले पश्ुओंको द्वी बन्धनमुक्त करते हैं; दूसरोंको नहीं । जो
वस्तु जैसी होनी चाहिये, वैसी वह ख्य नहीं वनती । वेसी
बननेके लिये कर्ताकी भावनाका सहयोग होना आवश्यक दै |
कतोकी भावनाके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है; अतः कर्ता
सदा खतन््त्र होता है |
सबपर अनुग्रह करनेवाले शिव जिस तरह खमभावसे ही
निर्मल हैं, उसी तरह “जीव? .संशा घारण करनेवाली आत्माएँ
खभावतः मलिन होती हैं | यदि ऐसी वात न होती तो बे
जीव क्यों नियमपूर्वक संसारमं भठकते ओर शिव क्यों संसार-
बन्धनसे परे रहते ? विद्वान पृदुप कर्म ओर मायाक्ते वन्यनको
ही जीवका “संसार? कहते हैं | यद बन्चन जीवको ही यात्त
होता है; शिवको नहीं | इसमें कारण है, जीवका स्वाभाविक
मल | वह कारणभूत मल जीवॉका अपना त्वभाव ही दे
आगन्तुक नहीं है | यदि आगन्लुक होता तो किसीको भी किसी
भी कारणसे बन्धन प्राप्त है जाता | जो व द्वेतु ६ बढ एड
न
है; क्योंकि सब जीवोंका खभाव एक-सा है | यद्यपि सबमें एक-
सा आत्मभाव है, तो भी मलके परिपाक और अपरिपाकके -
कारण कुछ जीव बद्ध हैं ओर कुछ बन्धनसे मुक्त हैं | बद्ध
जीवोम भी कुछ छोग लव और भोगके अधिकारके अनुसार
उत्कृष्ट और निकझृष्ट होकर ज्ञान और ऐश्व्य आदिकी विषमता-
को प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ लोग अधिक ज्ञान ओर ऐ:्यसे
युक्त होते हैं तथा कुछ लोग कम | कोई मूत्यात्मा होते हैं
ओर कोई साक्षात् शिवके समीप विचरनेवाले होते हैं | मूर्त्या-
त्माओमें कोई तो शिवल्लरूप हो छहों अध्वाओंके ऊपर स्थित
होते हैं, कोई अध्वार्भेके मध्यमार्गमं महेश्वर होकर रहते हैं
ओर कोई निम्नभागमें रुद्ररपसे स्थित होते हैं। शिवके
समीपवर्ती सर्पर्मे भी मायासे परे होनेके कारण उत्कृष्ट, मध्यम
ओर निक्ृष्टके भेदसे तीन श्रेणियाँ होती हैं--वहाँ निम्न स्थान-
में आत्माकी स्थिति है; मध्यम स्थानमें अन्तरात्माकी स्थिति
है ओर जो सबसे उत्कृष्ट श्रेणीका स्थान है; उसमें परमात्मा-
की स्थिति है | ये ही क्रमशः ब्रह्मा विष्णु ओर महेश्वर
कहलाते हैं। कोई वसु ( जीव ) परमात्मपदका आश्रय लेने-
वाले होते हैं; कोई अन्तरात्मगदपर और आत्मपदपर
प्रतिष्ठित होते हैं ।
भगवान शिव तो अनायास ही समसत्र पश्ुओंको बन्धनसे
मुक्त करनेमें समथे हैं| फिर वे उन्हें बन्धनमें डाले रखकर क्यों .
दुःख देते हैँ ? यहाँ ऐसा विचार या संदेह नहीं करना
चाहिये; क्योंकि सारा संसार दुःखरुप ही है, ऐसा विचार-
बारनोंका निश्चित सिद्धान्त है । जो ख़मावतः दुःखमय हैं) वह
दुःखरहित केसे हो सकता है | खभावमें उलट-फेर नहीं हो
सकता | वेद्यकी दवासे रोग अरोग नहीं होता | वह रोगपीड़ित
मनुष्यका अपनी दवासे सुखपूर्वक उद्धार कर देता है। इसी
प्रकार जो खमावतः मलिन और खमावसे ही दुखी हैं, उन
पशुओंकी अपनी आशरूपी ओपषधि देकर शिव दुःखसे छुड़ा
देते हैं । रोग होनेमें वेद्य कारण नहीं हैं; परंतु संसारकी
उत्तत्तिमें शिव कारण हैं । अतः रोग ओर वेद्यके दृष्टान्तसे
शिब और रुसारके दार्शन्तमें समानता नहीं है | इसलिये इसके
द्वारा शिवपर दोधारोपण नहीं किया जा सकता । जब दुःख
खभावसिद्ध है, तब शिव उसके कारण केसे द्वो सकते हैं ।
जीवोमें जो स्वाभाविक मल है) वदढ्ी उन्हें संतारके चक्करमें
$- नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मण परमात्मने #.
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डालता है| संसारका कारणभूत जो मल--अचेतन माय
आदि है, वह शिवका सांनिध्य प्राप्त किये विना खबं चेश-
शीछ नहीं हो सकता । जैसे चुम्बक मणि लोहेका सानिय
पाकर ही उपकारक होता हैं---लोहेको खींचता है। उप
प्रकार शिव भी जड माया आदिका सांनिध्य पाकर ही उसके
उपकारक होते हैं, उसे सचेष्ट बनाते हैँ । उनके विद्यमान
सांनिध्यकोी अकारण हटाया नहीं जा सकता। अतः ज़ग्तड़े
लिये जो सदा अज्ञात हैं, वे शिव ही इसके अधिष्ठाता हैं।
शिवके बिना यहाँ कोई भी प्रदत्त ( चेंशशील ) नहीं होता,
उनकी आशाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता । उनसे
प्रेरित होकर ही यह सारा जगत् विभिन्न प्रकारकी चेशएं
करता है, तथापि वे शिव कभी मोहित नहीं होते | उनकी
आशारूपिणी जो शक्ति है; वही सबका नियन्त्रण करती है।
उसका सब ओर मुख है । उसीने सदा इस समूण ह्ख
प्रपश्चका विस्तार किया है; तथापि उसके दोषसे शिव दूषित
नहीं होते । जो दुर्बुद्धि मानव मोहबश इसके विपरीत
मान्यता रखता है; वह नष्ट हो जाता है । शिवक्री झतिके
वैभवसे ही संसार चलता है। तथापि इससे शिव दृषित
नहीं होते |
इसी समय आकाशसे शरीररहित वाणी सुनायी दी-
सत्यम् ओम अमृतम् सौम्यम्!# इन. पदोंका वहाँ सं
उच्चारण हुआ) उसे सुनकर सब लोग बहुत प्रसल हुए !
उनके समस्त संशर्योका निवारण हो गया तथा उन मुनि्न
विस्मित हो प्रभु पवनदेवकों प्रणाम क्रिया | इस प्रकार उग
मुनिर्योको संदेहरहित करके भी वायुदेवने यह नहीं मां!
कि इन्हें पूर्ण शान हो गया । 'इनका शान अभी प्रतिहि
नहीं हुआ है? ऐसा समझकर ही वे इस प्रकार वीले । हि
वायु देवताने कहा--प्॒नियो ! परोक्ष और आप:
भेदसे ज्ञान दो प्रकारका माना गया है | परोक्ष शञनको अलिए
कहा जाता है और अपरोक्ष ज्ञानकों सुखिर । युक्तिपू्ण 3।
देशसे जो ज्ञान होता है) उसे विद्वान् पुरुष परोक्ष कहते £।
वही श्रेष्ठ अनुष्ठानसे अपरोक्ष हो जायगा । आपोध् शर्त
बिना मोक्ष नहीं होता, ऐसा निश्चय करके ठमलोग आदल-
रहित हो श्रेष्ठ अनुश्ठानकी सिद्धिके लिये प्रवत्त करों ।
( अध्याय ३१ /
्ननल््य्ध्ल्च्यव्च्द्सत-
बैँ.
» रन पर्दोछा सम्मिद्धि। अर्थ इस प्रकार ऐे--दोँ, यह सत्य है; अमृतमय है भोर सौम्य ९ ।
२>पाीकी मा कटे. ४७&०-+-अग०क-- “५०००० ३३०० आआ ० + ..23-गहममवीिल बने 8... ५ ३-3. 3 3 ०+मआ.
४ आओ + बता इक व्फ- प्र - ञ् बि न पे
नव न. ०३१८० नबी ; इसका
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उनरकिसम हरि सतीकन-ा
_॥ बआक धिकश ।
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बल बा जन गन वन मेन
5 फडं
नया यल ॥ €् शेच | ० हा
बांववीयलंहिता | # परमधमका प्रतिपादन, शेचागमके अनुसार परदशुपत ज्ञानतथा उसके साधन #े ४७९
च्स्य्य्म्य्म्न्न्य्य्न्््ख्््श्््ंईंईञं्े्थ्ख््खख्स्य्ज््ख्य्स्स््ख्ख्स््च्ल्लल््ल््ल््ज्---5->-----न..ढ७8ढ७8..0808080008ह8हलुहल6त8लह800हत7 8 | मरी: प्र जा 2७७७७७७४१७७७७७७७ए७#७७/(७(७एए ! ॑एऋश्ि माया नानक दान पाया बाकदंधाानाधधापातभदा वा ।>न््पाउा
च न. कार. की. लथ?णय,६-सीननओअगद-:फ-+०+०_.3नहनी ेन््मनीफयातनमम मान पक++ नाम ाता# १ पाक “मामा हाय न पा ए>+मीक पा + बी पु» एल् नाक माइक. पी सी ३» महक; 5 ००१५६ ५-भाअमी नामक“
परम धर्मका प्रतिपादन, शैयागमके अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन
फ्रषियोंने पूछा-वायुदेव ! वह कौन-सा श्रेष्ठ
अनुष्ठान है, जो मोक्षस्वरूप ज्ञांनको अपरोक्ष कर देता है !
उसको ओर उसके साधनोंको आज आप हमें बतानेकी
कृपा करें | क्
वायुने कहा--भगवान शिवका बताया हुआ जो परम
धर्म है, उसीको श्रेष्ठ अनुष्ठान कहा गया है | उसके सिद्ध
शेनेपर साक्षात् मोक्षदायक शिव अपरोक्ष हो जाते हैं | वह
परम॑वम पाँचों पर्वोके कारण क्रमशः पॉँच प्रकारका जानना
चाहिये | उन पर्वोंके नाम हैं--क्रिया, तप» जप) ध्यान और
शन । ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं, उन उत्कृष्ट साधनोंसे सिद्ध हुआ
पर परम धर्म माना गया है | जहाँ परोक्ष शान भी अपरोक्ष
गन होकर मोक्षदायक होता है। वैदिक धर्म दो प्रकारके
बताये गये हैँ--परम और अपरम | धर्म-दब्दसे प्रतिपात्
अप हमारे लिये श्रुति ही प्रमाण है। योगपर्यन्त जो परम घर्म है;
हैं श्रुतियेकि शिरोभूत उपनिषद्में वर्णित है और जो अपरम घर्म
/ वह उसकी अपेक्षा नीचे श्रुतिके मुखभागसे अर्थात् संहिता-
ननोद्वारा प्रतिपादित हुआ है । जिसमें पद्यु ( बद्ध ) जीवोंका
अधिकार नहीं है, वह वेदान्तवर्णित धर्म ध्परम घर्म? माना गया
(| उससे भिन्न जो यज्ञ-यागादि है, उसमें सबका अधिकार
नेसे वह साधारण या अपरम घर कहलाता है | जो अपरम
म है; वही परम धर्मका साधन है | धर्मशास्र आदिके द्वारा
“॒का सम्यक रूपसे विस्तारपूर्वक साज्ञोपाड़ः निरूपण हुआ है |
'गवान् शिवके द्वारा प्रतिपादित जो परम धर्म है; उसीका नाम
“8 अनुष्ठान है। इतिहास और पुराणौद्दारा उसका किसी
गर विस्तार हुआ है | परंतु शैव-शास्रोंद्यारा उसके
“जारका साक्लेपाक़् निरूपण किया गया है | वहीं उसके
"पड सम्यकरुपसे प्रतिपादन हुआ है। साथ ही उसके
एक और अधिकार भी सम्यकू रूपसे विस्तारपूर्वक बताये
हैं। शैब-आगमके दो भेद हैं--श्रोत ओर अश्रौत |
भुतिके सार तत्वसे सम्पत्न है वह श्रोत है; ओर जो
पितृस्प् है, वह
हा था, फिर अठारह अकारका हुआ | वह
छ् खल संशाओंसे सिद्ध होकर सिद्धान्त नाम
पैसार सै के | शुतिसाससय जो शैव-शास्त्र है, रे उसका
जी हअ रलेकमें किया गया है। उसीमें उत्कृष्ट
इसे तेवर *क पशिपत शान? का वर्णन किया गया है। युग-
प्योंकी उसका उपदेश देनेके लिये भगवान
अश्रोत माना गया है । खतन्नत्र शोवागम पहले
शिव खय॑ं ही योगाचार्यरूपसे जहाँ-तहाँ अवतीर्ण हो उसका
प्रचार करते हैं |
इस शेव-शाख््रको संक्षिप्त करके उसके सिद्धान्तका प्रबचन
करनेवाले मुख्यतः चार महर्षि हैँ---रुू, दधीच, अगस्त्य और
महायशस्ती उपमन्यु | उन्हें संहिताओंका प्रवर्तक 'पाशुपतः?
जानना चाहिये | उनकी संतान-परम्परामें सेकड़ों-हजारों गुरुजन
हो चुके हैं | पाञ्मपत सिद्धान्तमें जो परम धर्म बताया गया है,
वह च॑र्या आदि चार पादोंके कारण चार प्रकारका माना गया
है। उन चारोंमें जो पाशुपत योग है, वह हृद्तापूर्वक शिवका
साक्षात्कार करानेवाला है| इसलिये पाशुपत योग ही श्रेष्ठ
अनुष्ठान माना गया है | उसमें भी ब्रह्माजीने जो उपाय बताया
'है, उसका वर्णन किया जाता है। भगवान शिवके द्वारा
परिकल्पित जो ५्नामाष्टकमय योग? है; उसके द्वारा सहसा
शैवी प्रश्ञ|-का उदय होता है| उस प्रज्ञाद्वारा पुरुष शीघ्र
ही सुखिर परम ज्ञान प्राप्त कर लेता है | जिसके हृदयमें
वह ज्ञान प्रतिष्ठित हो जाता है; उसके ऊपर भगवान शिव
प्रसन्न होते हैं | उनके क्ृपा-प्रसादसे वह परम योग सिद्ध होता
है, जो शिवका अपरोक्ष दर्शन कराता है। शिवके अपरोक्ष शानसे
संसार-बन्धनका कारण दूर हो जाता है | इस प्रकार संसारसे
मुक्त हुआ पुरुष शिवके समान हो जाता है। यह ब्रह्माजीका
बताया हुआ उपाय है। उसीका प्रथक् वर्णन करते हैं ।
शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह ( ब्रह्मा ) संसारवैद्य,
सर्वज्ञ और परमात्मा--ये मुख्यतः आठ नाम हैं | ये आर्ठों
मुख्य नाम शिवके प्रतिपादक हैं | इनमेंसे आदि पाँच नाम
क्रमशः शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओसे सम्बन्ध रखते हैं और
उन पॉच उपाधियोंको ग्रहण करनेसे सदाशिव आदिके बोधक
होते हैं | उपाधिकी निश्ृत्ति होनेपर इन भेंदोंकी निव्रत्ति हो
जाती है । वह पद ही नित्य है। किंतु उस पदपर प्रतिष्ठित
होनेवाले अनित्य कहे गये हैं | पर्दोका परिवर्तनः होनेपर
पदवाले पुरुष मुक्त हो जाते हैं । परिवतेनके अनन्तर
पुनः दूसरे आत्माओंको उस पदकी प्राप्ति बतायी जाती है और
उन्हींके वे आदि पॉच नाम नियत होते हैं | उपादान आदि
योगसे अन्य तीन नाम ( संसारवेद्य, सर्वत्ञ ओर परमात्मा )
भी त्रिविध उपाधिका प्रतिपादन करते हुए शिवर्म ह्वी अन॒ुगत
होते हैं ।
अिननममम--- पुन कफ फनमक जकइललफा टााक. ०7. 77 ३.६ *+ जता ऋत-
१, चर्या, विद्या, क्रिया और योग--ये चार पाद ईं
स्डबड च् बन का आना कऋ अआान अब न न तर न]
छे८०
अनादि मलका संसर्ग उनमें पहलेसे ही नहीं है तथा वे
स्वभावतः अत्यन्त शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये (शिव? कहलाते हेँ।
अथवा वे ईश्वर समस्त कल्याणमय गु्णोके एकमात्र घनीभूत
विग्रह हैं। इसलिये शिवतत्वके अथैको जाननेबाले श्रेष्ठ
महात्मा उन्हें शिव कहते हैँ | तेईस तत्त्वोंसे परे जो प्रकृति
बतायी गयी है; उससे भी परे पचीसर्वें तत्त्वके स्थानमें
पुरुषको बताया गया है; जिसे वेदके आदिमें ओंकाररूप
कहा गया है। ओंकार ओर पुरुषमें वाच्य-वाचक-भाव
सम्बन्ध है। उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान एकमात्र
वेदसे - ही होता है | वे ही वेदान्तमें प्रतिष्ठित हैं |
किंतु वह प्रकृतिसे संयुक्त ' है; अतः उससे भी परे
जो परम पुरुष है, उसका नाम ्महेश्वर? है; क्योंकि प्रकृति
और पुरुष दोनोंकी प्रवृत्ति उसीके अधीन है| अथवा यह
जो अविनाशी त्रिगुणमय तत्त्व है; इसे प्रकृति समझना
चाहिये | इस प्रकृतिको माया कहते हैं | यह माया जिनकी
शक्ति है, उन मायापतिका नाम “महेश्वरः है। महेश्वस्के
सम्बनन्धसे जो माया अथवा प्रकृतिमें क्षोम उत्पन्न करते हैं,
वे अनन्त या ५विष्णु? कहे गये हैं। वे ही कालात्मा और
परमात्मा आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं। उन्हींको स्थूल
और सूक्ष्मरूप भी कहा गया है| दुःख अथवा दुःखके
हेतुका नाम “सतः? है । जो प्रभ्रु उसका द्वावण करते हैं---
उसे मार भगाते हैं; उन्न परम कारण शिवको साधु पुरुष
'रुद्रः कहते हैं | कछा, काल आदि तत्वोंसे लेकर भूर्तोमें
पथ्वी-पर्यन्त जो छत्तीस तत्त्व हैं, उन्हींसे शरीर बनता है |
उस शरीर; इन्द्रिय आदियमें जो तन्द्रारहित हो व्यापकरूपसे
स्थित हैं, वे भगवान् शिव ५रुद्र! कहे गये हैं। जगतके
पितारूप जो मूर्त्यत्मा हैं, उन सबके पिताके रूपमें भगवान्
शिव विराजमान हैं; इसलिये वे “पितामह?” कहे गये हैं ।
जेसे रोगोंके निदानकों जाननेवाल्म वैद्य तदनुकूछ उपायों
और दुवाओंसे रोगको दूर कर देता है; उसी तरह ईश्वर
ल्ययोगाधिकारसे सदा जड-मूलसहित संसार-रोगकी निव्रत्ति
करते हैं; अतः संपूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता विद्वान् उन्हें “संसार-
वेद्यः
होते हुए भी जीव तीनों कालोमें होनेवाले स्थूल-सूक्ष्म
2, कला, काल, नियति, विया, राग, प्रकृति और गुण--ये
सात तत्व, पद्नतन्मात्रा, दस इर्द्रियोँ, चार अन्त:करण, पाँच
शब्द आदि विषय तथा आकाश, वायु, तेज) जल और प्रथिवरी
ये छत्तोत्त तत्त् दं ।
# नमो रुद्वाय शान्ताय ब्रद्मणे परमात्मने #
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कहते हैं। दस विपयोक्ते ज्ञानके लिये दर्सों इन्द्रियोकि
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाड्
पदार्थोको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि मायाने ही उन्हें
मलसे आच्बत कर दिया है| परंतु भगवान सदाशिव सम
विषयक्रे ज्ञाके साधनभूत इच्द्रियादिके न होनेपर भी जे
वस्तु जिस रूपमें स्थित है; उसे उसी रूपमें ठीक-दीक
जानते हैं। इसलिये वे “सर्वज्ञ! कहलाते हैं| जो इन सभी
उत्तम गुणोंसे नित्य संयुक्त होनेके कारण सबके आत्मा
हैं, जिनके लिये अपनेसे अतिरिक्त किसी दूसरे आत्माक़ी
सत्ता नहीं है, वे भगवान् शिव खयं ही “परमात्मा? हैं।
आचायंकी कृपासे इन आठों नामोंका अभसहित
उपदेश पाकर शिव आदि पाँच नामोंद्वारा निद्वत्ति आदि
पाँचों कलाओंकी अन्थिका क्रमशः छेंदन और गुपके
अनुसार शोधन करके गुणित, उद्घातयुक्त और अनिद्द्ध
प्राणोंद्यारा हृदय, कण्ठ, ताल) भूमध्य ओर बह्मर्पे
युक्त पुय्येश्कका भेदन करके सुघुम्णा नाड़ीद्वार अपने
आत्माको सहस्तार चक्रके भीतर ले जाय | उसका गुभ्रबण
है । वह तरुण सूर्यके सदृश रक्तवर्ण केसरके द्वारा रक्षित
ओर अधोमुख है | उसके पचास दरलोंमें खित अश्े
लेकर #क्षःतक सबिन्दु अश्षर-कर्णिकाके बीचमें गोलकार
चन्द्र-मण्डल है | यह चमन्द्रमण्डल छलत्राकारमें खित है।
उसने एक ऊध्वंपुख द्वादश दल कमलको आइत कर
रक््खा है । उस कमलकी कर्णिकामें विद्युत-सहश अकथादि
त्रिकोण यन्त्र है| उस यन्त्रके चारों ओर सुधासागर होनेके
कारण वह मणिद्वीपके आकारका हो गया है | उस दीपक
मध्यभागमें मणिपीठ है | उसके बीचर्म नाद-बिन्दुके ऊपर
हंसपीठ है। उसपर परम शिव विराजमान हैं । उक्त
चन्द्रमण्डलके ऊपर शिवके तेजमें अपने आत्माको संयुक्त
करे | इस प्रकार जीवको शिवमें लीन करके शाक्त अर
वर्षाके द्वारा अपने शरीसके अमिषिक्त होनेकी भावना कर !
तत्यश्रात् अमृतमय विग्रहवाले अपने आत्माको व्रह्मस्त्रप
उतारकर हृदयमें द्वादश-दल कमलके भीतर ख्ित चदमाते
परे इ्वेत कमलपर अद्धनारीश्वर रूपमें विराजमान मर्नई
_आइकतिवाले निर्मल देव भक्तवत्सल महादेव शंकरका विन
करे | उनकी अड्जकान्ति शुद्धस्कटिक मणिकरे समान
उज्ज्वल है | वे शीतल प्रभासे युक्त और प्रसन्न ६ | री
प्रकार मन-ही-मन ध्यान करके शान्तचित्त हुआ मठ
शिवक्े आठ नार्मोंद्वारा ही भावमय पुण्मोसे उनको पूजा
करे । पूजनके अन्तर्मं पुनः प्राणायाम करके च्ित्तक|
भलीभाँति एकाग्र रखते हुए शिव-नामाष्टकका जे करे |
है]
वायवीयसंहिता | # पाशुपत-ब्तकी विधि और महिमा तथा भस्मधारणकी महत्ता #
फिर भावनाद्वारा मामभिमें आठ आहुतियोका हवन करके
पूर्णाहुति एवं नमस्कारपू्वंक आठ फूछ चढ़ाकर अन्तिम
अचेना पूरी करके चुल्दूमें लिये हुए जछकी भाँति अपने
आपको शिवके चरणोंमें समपित कर दे । इस प्रकार करनेसे
3८१
शीघ्र ही मक्गनलमय पाशुपत श्ञानकी प्राप्ति हो जाती है ओर
साधक उस ज्ञानकी सुखिरता पा लेता है। साथ ही
वह परम उत्तम पाशुपत-बत्रत एवं परम योगको पाकर
मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। ( अध्याय ३२ )
“४ै+- #++#ण 2०-७८
पाशुपत-व्रतकी विधि ओर महिमा तथा भसधारणकी महत्ता
फ्राषि बोले--मगवन् | हम परम उत्तम पाशुपत
ब्रतको सुनना चाहते हैँ; जिसका अनुष्ठान करके ब्रह्मा
आदि सब देवता पाशुपत माने गये हैं |
वायुदेवने कहा--मैं तुम सब छोगोंको गोपनीय
पाशुपत-अतका रहस्य बताता हूँ. जिसका अथवंशीष॑में
वर्णन है तथा जो सब पार्पोका नाश करनेवाल्ा है | चित्रासे
युक्त पौणमासी इसके लिये उत्तम काल है | शिवके द्वारा
भनुगहीत स्थान ही इसके लिये उत्तम देश है अथवा क्षेत्र,
बगीचे आदि तथा वनप्रान्त भी छुभ एवं प्रशस्त देश
हैं। पहले त्रयोदशीकों भलीभाँति स्नान करके नित्यकर्म
पमन्न कर ले। फिर अपने आचायेकी आजा लेकर उनका
पूजन और नमस्कार करके बतके अज्ञरूपसे देवताओंकी
विशेष पूजा करे | उपासकको खयं रवेत वस्त्र, स्वेत यशोपवीत,
खेत पुष्प ओर खेत चन्दन धारण करना चाहिये | वह
ऊैशके आसनपर बैठकर हाथमें मुद्दीमर कुश छे पूर्व या
उत्तकी ओर मुँह करके तीन प्राणायाम करनेके पश्चात्
भगवान् शिव और देवी पार्व॑तीका ध्यान करे । फिर यह
'ल्प करे कि में शिवशास्त्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार
हैं पाशुपत-ब्त करूँगा | वह जबतक शरीर गिर न जाय)
पबतकके लिये अथवा बारह, छः या तीन वर्षोंके लिये
मपवा बारह, छः, तीन या एक महीनेके लिये अथवा
रह छ;, तीन या एक दिनके इस बतकी दीक्षा ले | संकल्प
फफे विरजा होमके लिये विधिवत् अग्निकी स्थापना करके
हर पी। समिधा और चरुसे हवन करे | तलश्रात् त्चोंकी
>दऊ उपदेशसे फिर मूलमन्त्रद्वारा उन समिधा आदि
५ "४.३ आहुतियाँ दे | उस समय वह वारंबार यह
शा रथ शरीरमें जो ये तत्त्व हैं, सव शुद्ध दो
बल नाम इस प्रकार हैं---पाँचों भूत; उनकी
पांच शानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियोँ; पाँच विषय)
आदि _ते धातु, प्राण आदि पाँच वायु, मन; बुद्धि;
' पति, पुरुष, राग, विद्या; कूला। नियति। काल)
शि 0 पु ० सं० ६ १ हल
माया; शुद्ध विद्या; महेश्वर, सदाशिवः शक्ति-तत्व और शिव-
तत्व--ये क्रमश; तत्त्व कहे गये हैं ।
विरज मन्त्रोंसे आहुति करके होता रजोगुणरहित शुद्ध हो
जाता है। फिर शिवका अनुग्रह पाकर वह शानवान होता है ।
तदनन्तर गोबर छाकर उसकी पिण्डी बनाये | फिर उसे मन्त्र-
द्वारा अभिमन्त्रित करके अमिमें डाल दे | इसके बाद इसका
प्रोक्षण करके उस दिन ब्रती केवछ हृविष्य खाकर रहे | जब
रात बीतकर प्रातःकाल आये, तब चतुद्दशीमें पुनः पूर्वोक्त सब
कृत्य करे | उस दिन रोष समय निराहार रहकर ही बितावे।
फिर पूर्णिमाकों प्रातःकाल इसी तरह होमपयन्त कर्म करके
रुद्रामिका उपसंहार करे । तदनन्तर यक्षपूवंक उसमेंसे भस्म
ग्रहण करे | इसके वाद साधक चाहे जय रखा छे, चाहे
सारा सिर मुंडा ले या चाहे तो केवल सिरपर शिखा घारण
करे। इसके बाद स्नान करके यदि वह लोकलछूजासे ऊपर उठ
गया हो तो दिगम्बर हो जाय | अथवा गेरुआ वस्त्र, मृगचमे
या फटे-पुराने चीथड़ेकों ही घारण कर ले | एक वस्त्र धारण
करे या वलकल पहनकर रहे | कटिमें मेखला धारण करके
हाथमें दण्ड ले ले। तदनन्तर दोनों पैर घोकर आचमन करे।
विरजाभिसे प्रकट हुए भस्मको एकत्र करके “अप्निरिति भस्म?
इत्यादि छः अथवंवेदीय मन्त्रोंद्रारा उसे अपने शरीरमें लगाये ।
मस्तकसें लेकर पेरतक सभी अड्जोंमं उसे अच्छी तरह मल
दे | इसी क्रमसे प्रणव या शिवमन्त्रद्वारा सर्वाक्षमें भस्म रमा-
कर 'ज्र्यायुषम! इत्यादि मन्त्रोंसे लठ्ाट आदि अज्ञंमें त्रिपुण्ड़की
रचना करे। इस प्रकार शिवभावको प्रात्त हो शिवयोगका
आचरण करे। तीनों संध्याओंके समय ऐसा द्वी करना चाहिये ।
यही “पाशुपत-बत? है; जो भोग ओर मोक्ष देनेवाल्य द | यह
जीवोंके पश्ुभावको निव्वत्त कर देता है | इस प्रकार पाशुपत-
ब्रतके अनुष्ठानद्वारा पशुत्वका परित्याग करके लिड्ननूति सनातन
महादेवजीका पूजन करना चाहिये | यदि वेभव हो तो सोनेका
अष्टटल कमर बनवाये) जिसमें नो प्रकारके रत्न जड़े गये हो |
उसमें कर्णिका और केसर भी द्वों | ऐसे कमलको भग्वानका
$# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
आसन बनावे | घनाभाव होनेपर छाल या सफेद कमलके
फूलका आसन अपिंत करे | वह भी न मिले तो केवल भावना-
सय कमल समर्पित करे |. रु
उस कमलकी कर्णिकामें पीठिकासहित छोटेसे स्फटिक
मणिमय लिड्गकी स्थापना करके क्रमशः विधिपूवक उसका
पूजन करे | उस छिड्गका शोधन करके पहले शास्त्रीय विधिके
अनुसार उसकी स्थापना कर लेनी चाहिये | फिर आसन दे
पञ्ममुखके प्रकारसे मूर्तिकी कल्पना करके पश्चगव्य आदिसे
पूर्ण, अपने वेभवके अनुसार संग्हीत भरे हुए. सुवर्णनिर्मित
कल्शोंसे उस मूतिको स्नान-कराये | फिर सुगन्धित द्वव्य,
कपूर; चन्दन और कुद्धम आदिसे वेदीसहित भूषणभूषित
शिवलिड्रका अनुलेपन करके बिल्वपत्र) छाछ कमल; इवेत
कमल, नील कमल; अन्यान्य सुगन्धित पुष्प; पवित्र एवं उत्तम
पत्र तथा दूर्वा और अक्षत आदि विचित्र उपचार चढ़ाकर
यथाग्राप्त सामग्रियोंद्रार महापूजनकी विधघिसे उसमें मूतिकी
अभ्यर्चना करे। फिर धूप) दीप और नेवेद्य निवेदन करे ।
इस तरह भगवान् शिवको उत्तम वस्त्र निवेदन करके अपना
कल्याण करे | उस ब्रतमें विशेषतः वे सभी वस्तुएं देनी
चाहिये; जो अपनेको अधिक प्रिय हों; श्रेष्ठ हों और न्याय-
पूर्वक उपाजित हुई हों । विल्वपत्र, उप ओर कमलोंकी
संख्या एक-एक हजार होनी चाहिये | अन्य पत्रों और फूलोंमेंसे
प्रत्येककी संख्या एक सो आठ होनी चाहिये | इन सामग्रियोंमें
भी बिल्वपत्रको विशेष यक्षपू्वंक जुटाये | उसे भूलकर भी न
छोड़े । सोनेका बना हुआ एक ह्वी कमछ एक सहस्र कमलेसे
श्रेष्ठ बताया गया है। नीक कमल आदिके विषयमें भी यही
बात है | ये सब बिल्वपतन्नोके समान ही महत्व रखते हैं ।
अन्य पुप्पोंके लिये कोई नियम नहीं है। वे जितने मिलें, उतने
ही चढ़ाने चाहिये। अष्टाज़ अ्य॑ उत्कृष्ट माना जाता है | धूप
और आलेप ( चन्दन ) के विपयमें विशेष बात यह है।
धवामदेवःनामक मुखमें चन्दन) “तत्पुरुष”नामक मुखमें हरिताल
ओर ८ईशान'नामक मुखमें भस्म लगाना चाहिये | कोई-कोई
भस्मकी जगह आलेपनका विधान करते दे । दूसरे प्रकारके
धूपका विधान द्वेनेसे कुछ लोग प्रसिद्ध धूपका निपेध करते हैं|
'अबोर!नामक मुज़के लिये स्वेत अगुरुका धूप देना चाहिये |
'तत्पुरुषशनामक घुखके लिये ऋष्ण अगुब्के धूपका विधान है ।
ध्वामदेव' के लिये ग॒ग्गुल) 'सद्योज्ञात? मुखके लिये सोगन्धिक तया
“इशान'वे; लिये भी उश्चीर आदि धृपकों विशेषस्पसे देना
पाहिय | शर्करा, मधु) कपूर) कपिल्य गायक्ला घी; चन्दनका
चूरा तथा अगुरु नामक काष्ठ आदिका चूर्ण--इन सबको
मिलाकर जो धूप तेयार किया जाता है; उसे सबके लिये
सामान्यरूपसे उपयोगके योग्य बताया गया है । कपूरकी बत्ती
ओर घीके दीपक जलकर दीपमात्य देनी चाहिये | तलश्रात्
प्रत्येक मुखके लिये प्रथकू-प्रथक् अध्य॑ और आचमन देनेका
विधान है |
प्रथम आवरणमें गणेश और कार्तिकेयकी पूजा करनी
चाहिये | उनके साथ ही बाह्य अज्लककी भी पूजा आवश्यक है |
प्रथमावरणकी पूजा हो जानेपर द्वितीयावरणमें . चक्रवर्ती विष्ने-
श्वरोंका पूजन करना चाहिये | तृतीयावरणमें भव आदि अष्ट-
मूर्तियोंकी पूजाका विधान है | वहीं महादेव आदि एकादश
मूर्तियोंका भी पूजन आवश्यक है। चौथे आवरणमें सभी गणेश्वर
पूजनीय हैं | पश्चमावरणमें कमलके वाह्ममागमें क्रमशः दस
दिक्पालों, उनके अस्त्रों ओर अनुचरोंकी क्रमशः पूजा करनी
चाहिये | वहीं ब्रह्मके मानस पुत्रोंकी, समस्त ज्योतिगंणोंकी)
सब देवी-देवताओंकी, सभी आकाशचारियोंकी) पाताव्वासियों-
की) अखिल मुनीश्वरोंकी, योगियोंकी, सब यशोकी, द्वादश
सूर्योकी, मातृकाओंकी, गर्णोसहित क्षेत्रपालोंकी और इस संमसत
चराचर जगत्की पूजा करनी चाहिये | इन सबको शंकरजीको
विभूति मानकर शिवकी प्रसन्नताके लिये ही इनका पूजन करना
उचित है|
इस प्रकार आवरण-पूजाके पश्चात् परमेश्वर शिवका
पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक घत ओर व्यज्ञनसहित मनोहर
हृविष्य निवेदन करना चाहिये । मुखझुद्धिके लियि
आवश्यक उपकरणोंसहित ताम्बूल देकर नाना प्रकारके फूलों-
से पुनः इश्टदेवका श्यज्वार करे | आरती उतारे। तलश्राव्
पूजनका रोष कृत्य पूर्ण करे | प्याल्ला तथा उपकारक सामग्रियों-
सहित शय्या समर्पित करे | शय्यापर चन्धमाके समान चमकौला
हार दे | राजोचित मनोहर वस्तुएँ सब प्रकारसे संचित करक
दे | खयय॑ पूजन करे; दूसरोंसे भी कराये तथा प्रत्येक पूजन
में आहुति दे | इसके बाद स्तुति). प्रार्था ओर जय
करके पश्चाक्षरी विद्याको जपे | परिक्रमा ओर प्रणाम करके
अपने-आपको समर्पित करे | तदनन्तर- इश्देवके सामने दी
गुर और ब्राद्मणोंकी पूजा करे | इसके वाद अर्ब्य और आठ
फूल देकर पूजित लिक् या मूर्तिसि देवताका विसजन कर ।
फिर अभिदेवका भी विसर्तनन करके पूजा समात्त करे | मतुल-
को चाद्दिये कि प्रतिदिन, दसी प्रकार पूर्वोक्तत्पसे सेत्रा-का।
पूजनके अन्तमें सुवणमय कमछ तथा अन्य व उपकरणों:
वायवीयसंधिता ] # पाशुपत-बतकी विधि ओर महिमा तथा भस्मघारणकी मद्दत्ता #
सहित उस शिवलिज्ञको गुरुके हाथमें दे दे अथवा शिवाल्यमें
खापित कर दे | गुरुओँ3 ब्राह्मणों तथा विशेषतः ब्रतधारियोकी
पूजा करके सामर्थ्य हो तो भक्त ब्राह्मणों तथा दीनों और
अनाथोंको भी संतुष्ट करे | खयं उपवासमें असमर्थ दोनेपर
फल-मूल खाकर या दूध पीकर रहे अथवा मिक्षात्रमोजी हो या
एक समय भोजन करे । रातको प्रतिदिन परिमित भोजन करे
और पविन्नभावसे भूमिपर ही सोये | मस्सपरः तृणपर अथवा
चीर या मृगचर्मपर शयन करे | प्रतिदिन ब्रह्मचयका पालन
करते हुए. इस ब्रतका अनुष्ठान करे। यदि शक्ति होतो
रविवारके दिन) आार्द्रा नक्षत्रमें, दोनों पश्चोंकी पूर्णिमा ओर
अमावास्याको, अष्टमीकों तथा चतुर्दशीको उपवास करे | मन)
वाणी और क्रियाद्मारा सम्पूर्ण प्रयक्षसे पाखण्डी, पतित,
रखता ज्री; सूतकमें पढ़े हुए छोग तथा अन्त्यज आदिके
सम्पकका त्याग करे । निरन्तर क्षमा; दान) दया) सत्यभाषण
ओर अहिंसामें तत्पर रददे | संतुष्ट और शान्त रहकर जप ओर
घ्यानमें लगा रहे । तीनों काछ समान करे अथवा भस्म-स्नान
फर ले | मन) वाणी और क्रियाद्वारा विशेष पूजा किया करे |
इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाम ! ब्रतधारी पुरुष कभी
अशुभ आचरण न करे | प्रमादवश यदि वैसा आचरण बन
जाय तो उसके गुद-छाघवका विचार करके उसके दोषका
निवारण करनेके लिये पूजा, होम और जप आदिके द्वारा
उचित प्रायश्रित्त करे | ब्रतकी समाप्तिपर्यनतत भूलकर भी
अश्यभ आचरण न करे। सम्पत्ति हो तो उसके अनुसार गोदान;
धपोत्तगं और पूजन करे । भक्त पुरुष निष्काममभावसे
शिवकी प्रीतिके लिये ही सब कुछ करे | यह संक्षेपसे इस ब्रत-
पे सामान्य विधि कही गयी है ।
अब शाज्रके अनुसार प्रत्येक मासमें जो विशेष कृत्य है;
उते बताता हूँ | वैशाख मासमें हीरेके बने हुए. शिवलिद्नका
जैन करना चाहिये | ज्वेष्ठमासमें मरकत मणिमय शिवलिद्डकी
जा उचित है | आषाढ्मासमें मोतीके वने हुए. शिवलिद्नको
फैनोव समझे | आवणमासमें नीलमका बना हुआ शिवलिज्ञ
. एन योग्य है । भाद्रपदमासमें पूजनके लिये पद्मरण मणिमय
उत्तम माना गया है। आश्विनमासमें गोमेदमणिके
ई९ लिब्नको उत्तम समझे । कार्तिकमासमें मूँगेके ओर
९ साय है थक बेदूय॑मणिके बने हुए. लिश्ठकी पूजाका विधान
हा ३ ( पुखराज-) मणिके तथा माघमासमें
गर्ल लिज्नका पूजन करना चाहिये | फास्युनमासमें
पिघन्ममिके और सैज्रमें सूर्यकान्तसणिके यने हुए छिद्ल्के
पूजनकी विधि है | अथवा रत्नोंके न मिलनेपर सभी मार्सेमें
सुवर्णमय लिड्जका ही पूजन करना चाहिये । सुवर्णके अमावमें
चाँदी, तँबि, पत्थर; मिट्टी, छाह या और किसी वस्तुका जो
सुलभ हो, लिझ्ढ बना लेना चाहिये। अथवा अपनी रुचिके
अनुसार सबेगन्धमय लिड्गका निर्माण करे | त्रतकी समाप्तिके
समय नित्यकर्म पूर्ण करके पूर्ववत् विशेष पूजा और हवन करनेके
पश्चात् आचायका तथा विशेषतः ब्रती ब्राह्मणका पूजन करे |
फिर आचार्यकी आशा ले पूष या उत्तरकी ओर मुँह करके
कुशासनपर बैठे । हाथमें कुश ले, प्राणायाम करके ५साम्ब
सदाशिव”का ध्यान करते हुए यथाशक्ति मूलमन्त्रका जप
करे | फिर पूवबत् आशा ले हाथ जोड़ नमस्कार करके कहे---
“सगवन् | अब मैं आपकी आशासे इस ब्रतका उत्सर्ग करता
हूँ ।? ऐसा कह शिवलिड्ल्गके मूल भागमें उत्तर दिशाकी ओर
कुशोंका त्याग करे | तदनन्तर दण्ड, चीर; जग ओर मेखल्ाको
_भीत्याग दे । इसके बाद फिर विधिपूवक आचमन करके
पञ्चाक्षर मन्त्रका जप करे ।
जो आत्यन्तिक दीक्षा ग्रहण करके अपने शरीरका अन्त
होनेतक शान्तमावसे इस ब्रतका अनुष्ठान करता है; वह
'नेष्ठिक ब्रती? कद्दा गया है । उसे सब आश्रमोंसे ऊपर उठा
हुआ महापाशुपत जानना चाहिये | वढ्ी तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ
है और वही महान् ब्रतधारी है | जो वारह दिनोंतक प्रतिदिन
विधिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करता है; वह भी नेंछ्ठिकके ही
तुल्य है; क्योंकि उसने तीत्र त्रतका आश्रय लिया है| जो अपने
शरीरमें घी लगाकर ब्रतके सभी नियमोंके पाल्नमें तत्पर हो
दो-तीन दिन या एक दिन भी इस ब्रतका अनुष्ठान करता है,
वह भी कोई नेष्ठिक ही है | जो निष्काम होकर अपना परम
कतंव्य मानकर अपने आपको शिवके चरणोंमें सम्रपिंत करके
इस उत्तम ब्रतका सदा अनुष्ठान करता है; उसके समान कहीं
कोई नहीं है | विद्वान ब्रान््षण भस्म लगाकर महापातकजनित
अत्यन्त दारुण पार्पोसे भी तत्काल छूट जाता है; इसमें संशय
नहीं है | रुद्रामिका जो सबसे उत्तम वीर ( वल ) है; वही भस्म
कहा गया है | अतः जो सभी समर्योर्मे भस्म लगाये रहता है;
वह वीर्यवान माना गया है। भस्ममें निष्ठा रखनेवाके पुरुपके
सारे दोष उस भस्माम़िके संयोगसे दग्घ होकर नए हो जाते ६।
लिंसका शरीर भस्मस्नानसे विशुद्ध है) वह भस्मनिष्ठ क॒दा गया
है | जिसके सारे अज्जोमें भस्म लगा हुआ है) जो मम्मते प्रकाश
मान है; जिसने भस्ममय भिपुण्द् छगा रक्खा है तथा जो रखते
४८४
स्तान करता है; वह भस्मनिष्ठ माना गया है | भूत) प्रेत:
पिशाच तथा अत्यन्त दुःसह रोग भी भस्मनिष्ठके निकटसे
दूर भागते हैं, इसमें संशय नहीं है । वह शरीरको भासित
करता है, इसलिये “मसित? कहा गया है तथा पापोंका मनक्षण
करनेके कारण उसका नाम “भस्म? है। भूति (ऐश्वर्य ) कारक
होनेसे उसे ध्यूति? या “विभूति? भी कहते हैं । विभूति
रक्षा करनेवाली है; अतः उसका एक नाम रक्षा? भी
है। भस्मके माहात्म्यको लेकर यहाँ ओर क्या कहा जाय ।
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
ज्न््््ल्न्न्म््अअ28्लल्ल््य्य्््च्स्स्ल्स्लस्ल्सललल्ल्क््ल्््डड्स्-------टततर
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
भस्मसे स्नान करनेवाला ब्रती पुरुष साक्षात् महेश्वरदेव
कहा गया है । यह परमेश्वर ( रुद्रामि ) सम्बन्धी मस्त
शिवभक्तोंके लिये बड़ा भारी असल है; क्योंकि उसने धोम्य
मुनिके बढ़े भाई उपमन्युके तपमें आयी हुई आपत्तियोंका
निवारण किया था; इसलिये सब्ंथा प्रयक्ञ करके पाशुपत-
त्रतका अनुष्ठान करनेके पश्चात् हृवनसम्बन्धी भस्तका
धनके समान संग्रह करके सदा भस्मस्तानमें तत्पर रहना
चाहिये । ( अध्याय ३३ )
“77+<छ+णबल्ब०-(००००-४९--+--
बालक उपमन्युको दूधके लिये दुखी देख माताका उसे शिवकी आराधनाके
लिये ग्रेरित करना तथा उपमन्युकी तीव्र तपस्या
ऋषियाने पूछा--प्रमो ! धौम्यके बड़े भाई उपमन्यु
जब छोटे बालक थे; तब उन्होंने दूधके लिये तपस्या की
थी और भगवान शिवने प्रसन्न होकर उन्हें क्षीरसागर
प्रदान किया था। परंतु शेशवावस्थामें उन्हें शिव-शास्त्रके
प्रवचनकी शक्ति कैसे प्राप्त हुईं; अथवा वे केसे शिवके
सत्खरूपको जानकर तपस्मामें निरत हुए १ तपश्चरणके पवेमें
उन्हें भस्मके विज्ञानकी प्राप्ति केसे हुईं, जिससे जो रुद्रामिका
उत्तम वीरय॑ है, उस आत्मरक्षक भस्मको उन्होंने प्राप्त किया !
वायुद्ेवने कहा--महर्षियो | जिन्होंने वह तप किया
था; वे उपमन्यु कोई साधारण बालक नहीं थे, परम
बुद्धिमान् मुनिवर व्याश्रपादके पुत्र थे | उन्हें जन्मान्तरमें ही सिद्धि
प्रात्त हो चुकी थी। परंतु किसी कारणवश वे अपने पदसे
च्युत हो गये--योगश्रष्ट हो गये | अतः भाग्यवश जन्म
लेकर वे मुनिकुमार हुए ।
एक समयकी बात है अपने मामाके आशरममें उन्हें
पीनेके लिये बहुत थोड़ा दूध मिला । उनके मामाका बेटा
अपनी इच्छाके अनुसार गरम-गरम उत्तम दूध पीकर उनके
सामने खड़ा था । माठुलपुत्रको इस अवस्थामें देखकर
व्याप्रपादकुमार उपमन्युके मनमें ईर्यों हुई ओर वे अपनी
माँके पास जाकर बड़े प्रेमसे बोले--“८मातः | महाभागे !
तपस्िनि ! मुझे अत्यन्त खादिष्ठ गरम-गरम गायका दूघ
दो। मैं योडा-सा नहीं पीऊंगा ।?
बेटेकी यद वात सुनकर व्याप्रपादकी पत्नी तपसिनी
माताके मनमें उस समय वड़ा दुःख हुआ | उसने पुत्रको
बड़े आदरके साथ छातीसे छगा लिया और प्रेमपूर्वक लाड़-
प्यार करके अपनी निर्धनताका स्मरण हो आनेसे वह दुखी
हो विछाप करने लगी । महातेजसी बालक उपमन्यु बारंबार
दूधको याद करके रोते हुए मातासे कहने लगे--माँ |
दूध दो, दूध दो |! बालकके उस हठको जानकर उस
तपसख्विनी ब्राह्मण-पत्ञीने उसके हठके निवारणके लिये एक
सुन्दर उपाय किया । उसने खय॑ उज्छजृत्तिसे कुछ बीर्जो-
का संग्रह किया था | उन बीजोकों देखकर उसने तत्काल
उठा लिया ओर पीसकर पानीमें घोल दिया | फिर मीठी
वाणीमें बोली--पआओ, आओ मेरे छाल !? यों कह
बालकको शान्त करके हृदयसे लगा लिया ओर दुःख
पीडित हो उसने कृत्रिम दूध उसके ह्ाथमें दे दिया ।
माताके दिये हुए उस बनावटी दूधकों पीकर बालक अल्यन्त
व्याकुल हो उठा और बोला--(माँ ! यह दूध नहीं है ।”
तब वह बहुत दुखी हो गयी और बेटेका मस्तक सधकर
अपने दोनों हाथोंसे उसके कमल-सहश नेत्रोंको पॉछती
हुईं बोली--धबेटा | अपने पास सभी वस्तुओका अभाव
होनेके कारण दरिद्रतावश मुझ अभागिनीने पीसे हुए वीजको
पानीमें घोलकर यह तुम्हें मिथ्या दूध दिया था | तुम दूव
नहीं दिया? ऐसा कहकर रोते हुए. मुझे वारंबार ढुंसी
करते हो । किंतु भगवान् शिवकी कृपाके बिना तुम्हारे
लिये कहीं दूध नहीं है। भक्तिपूवक माता पार्वती ओर
अनुचरोंसहित भगवान् शिवके चरणारविन्दो्में जो कुछ
समर्पित किया गया हो) वद्दी सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कारण हीतां
है। महादेवजी ही घन देनेवाले हैं| इस समय इमलोगोने
उनकी आराधना नहीं की है । वे भगवान् द्वी ठकाम
पुर्षोकी उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले हैं। हम
वायवीयसंहिता ] # भगवान् शंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना # ४८५
43 यान मन ५ ०० नहर यान 3 काका एममक कया +ल् मम वा#७ "भय ५५ +म ७-3५ य७/५७४०-७४ एक घ.७७४३मक ७७७७७ ४०४ ३-७७ +३७+ का हनन पा 8५ ++न-क नमक नक नव +कन कब +-+नाकनक +नीननीनीयनन-+-3यननाननन नानक -+ न नइ-३++नमकन नम -+ न क नानक "+++पननानतन+ न न नीयत न ा-+-+3नन न पान -++न-मा+ तन. ७७ +++++नभ ३५) “आम +क++-. ५७५७ ५»+प# कब» ०७ ७३७७७ ०० न -8)/--.९०७>७१७-- थकान» ५७७७७००७५७७५५०७०७५७७७
आरांआंआआशशलीशसीआ आशा ली आज जा आज चली आ री आ आज आकी आकाश जी आल आीशीआआआली जी सं थक जकी गिरी जल कीजा 3. मय सम शनि बकयकाकूगाइमकमाकइमइम पाक कक
लोगोने आजसे पहले कभी भी धनकी कामनासे भगवान्
शिवकी पूजा नहीं की है। इसीलिये हम दरिद्र हो गये ओर
. यही कारण है कि तुम्हारे लिये दृध नहीं मिल रहा है।
वेश ! पूवजन्ममें भगवान् शिव अथवा विष्णुके उद्देश्यसे
जो कुछ दिया जाता है, वही वर्तमान जन्ममें मिलता हैः
वसा कुछ नहीं ।?#
$ उपमन्यु वोछे--माँ ! यदि माता पार्वतीसहित
भगवान् शिव विद्यमान हैं, तब आजसे शोक करना व्यथे
है। महाभागे | अब शोक छोड़ो, सब मद्गल्मय ही होगा ।
माँ | आज मेरी बात सुन छो | यदि कहीं महादेवजी हैं
ते में देरसे या जल्दी ही उनसे क्षीरसागर माँग लाऊँगा ।
वायुदेवता कहते हैँ--उस महाबुद्धिमान् बालककी
वात सुनकर उसको मनखिनी माता उस समय बहुत
प्रसन्न हुई और यों बोली । .
माताने कहा--बरेया ! तुमने बहुत अच्छा विचार
किया है। तुम्हारा यह विचार मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाल्य
९। अब तुम देर न छगाओ | साम्ब सदाशिवका भजन
गे। अन्य देवताओंको छोड़कर मन, वाणी और
क्रेयाद्वर भक्तिभावके साथ पाषदग्णोंसहित उन्हीं
गम्ब सदाशिवका भजन करो | “लमः शिवाय? यह मन्त्र
उन देवाधिदेव वरदायक शिवका साक्षात् वाचक माना गया
' अणवसह्ित जो दूसरे सात करोड़ महामन्त्र हैं; वे सब
जमे लीन होते हैं और फिर इसीसे प्रकट होते हैँ | यह
कस हे पूसरे सभी मन्त्रेसि प्रवछ है। यही सबकी रक्षा
रेजेमें सम है; अतः दूसरेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये |
पम दूसरे मन्त्रोंकी त्यागकर केवल पद्चाक्षरके
हि गे जाओ | इस मन्त्रके जिद्वापर आते ही यहाँ कुछ
औजम नहीं रह जाता है | यह उत्तम भस्म जिसे मैंने
हा सके थक 32.2 व्यक
तुम्हारे पिताजीसे ही प्राप्त किया है; यह विरजा होमकी
अम्निसे सिद्ध हुआ है, अतः बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका
निवारण करनेवात्म है | मैंने तुम्हें जो पद्चाक्षर मन्त्र बताया
है; उसको मेरी आज्ञासे ग्रहण करो | इसके जपसे ही शीघ्र
तुम्हारी रक्षा होगी |
वायुद्वता कहते हैँ--इस प्रकार आज्ञ देकर
और तुम्हारा कल्याण हो? ऐसा कहकर माताने पुत्रको बिंदा
किया | मुनि उपमन्युने उस आज्ञाकों शिरोधाय करके ही
उसके चरणोंमें प्रणाम किया ओर तपस्याके लिये जानेकी
तेयारी की | उस समय माताने आशीर्वाद देते हुए. कहा--
“सब देवता तुम्हारा मद्गल करें |? माताकी आज्ञा पाकर
उस बालकने दुष्कर तपस्या आरम्म की । हिमालय पव॑तके
एक शिखरपर जाकर उपमन्यु एकाग्रचित्त हो केवछ वायु
पीकर रहने लगे | उन्होंने आठ इंटोंका एक मन्दिर बनाकर
उसमें मिद्टीके शिवलिज्गकी स्थापना की | उसमें माता पार्वती
तथा गर्णांसहित अविनाशी महादेवजीका आवाहन करके
भक्तिभावसे पश्चाक्षर-मन्त्रद्वधारा दी वनके पत्र-पुष्प आदि
उपचारोंसे उनकी पूजा करते हुए वे चिरकाल्तक उत्तम
तपस्यामें छगे रहे | उस एकाकी कृशकाय बालक द्विजवर
उपमन्युको शिवमें मन लगाकर तपस्पा करते देख मरीचिके
शापसे पिशाचभावको प्राप्त हुए कुछ मुनियेनि अपने राक्षस-
स्वभावसे सताना और उनके तपमें विप्न डालना आरम्भ
किया। उनके द्वारा सताये जानेपर भी उपमन्यु किसी प्रकार
तपमें छगे रहे ओर सदा “नमः शिवाय? का आतंनादकी
भाँति जोर-जोरसे उच्चारण करते रहे | उस शब्दकों सुनते
ही उनकी तपस्यामें विन्न डालनेवाले वे मुनि उस बालकको
सताना छोड़कर उसकी सेवा करने छगे। ब्राह्मण-बालक
महात्मा उपमन््युकी उस तपस्यासे सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रदी्त
ए.वं संतत्त हो उठा | ( अध्याय ३४ )
“जान बंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना, उन्हें क्षीरसागर आदि
पहुत-से वर देना और अपना पृत्र मानकर पार्वतीके हाथमें सॉपना, ऋृतार्थ
. हुए उपमन्युका अपनी माताके ख्थानपर छोटना
परे पर भगवान् विष्णुके अनुरोध करनेपर श्रीशिवजीने. विचार किया | फिर श्वेत ऐरावतपर आल्ड़ हो खयय॑ देवराज
रदेका रूप अमल जा मयुक पाल लनिको ' पदक शिव मम करके उपमन्युके पास जानेका इन्द्रका शरीर अहण करके भगवान् सदाश्षिव देवता) असुरः
$ पूेजन्मनि यहतत॑ शिवमुद्दि्य वै छुत | तदेव हछु्यते नान्यद् विष्युमुद्दिश्य वा प्रभुस् ॥
( शि० पु० वा० सं० पू० यं० ३४ । ३२ )
४८८
सिद्ध तथा बड़े-बड़े नागोंके साथ उपमन्थु मुनिके तपोवनकी
ओर चले | उस समय वह ऐरावत दायीं सूँड़में चैंवर लेकर
शराचीसहित दिव्य-रूपवाले देवराज इन्द्रकों हवा कर रहा
था ओर बार्यी सँूँड़में ब्वेत छत्र लेकर उनपर लगाये चल
रहा था । इन्द्रका रूप घारण किये उमासहित भगवान्
सदाशिव उस श्वेत छत्नसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे;
जेसे उदित हुए पूर्ण चन्द्रमण्डलसे मन्दराचल शोभायमान
होता है | इस तरह इन्द्रके खल्ूपका आश्रय ले परमेश्वर
शिव उपमन्युके उस आभश्रमपर अपने उस भक्तपर अनुग्रह
करनेके लिये जा पहुँचे । इन्द्रब्पधारी परमेश्वर शिवकों
आया देख मुनियोंमें श्रेष्ठ उपमन्यु मुनिने सस्तक झुकाकर
20 677
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प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--६देवेश्वर | जगन्नाथ |
भगवन् | देवशिरोमणे | आप खबं यहाँ पघारे, इससे मेरा
यह आशअम पवित्र हो गया ।?
इन्द्रसूप्धारी शिव बोले--उत्तम ब्रतका पालन
करनेवाले घौम्यके यद्के भेंया मद्ानुने उपमन्यो | मैं तुम्दारी
इस तपस्यासे वहुत संतुष्ट हूँ । तुम वर माँगी) में तुम्दें सम्पूर्ण
अभीए वलुएँ पदान करूँगा ।
3: जमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने %
| सक्षिप्त-शिवपुराणाडू
वायुदेवता कहते हैँ--उन इन्द्रदेवके ऐसा कहनेपर
उस समय मुनिग्रवर उपमन्युने हाथ जोड़कर कहां--
“भगवन् | में भगवान् शिवक्री भक्ति मॉँगता हूँ।? यह
सुनकर इन्द्रने कहा-- क्या तुम मुझे नहीं जानते | में समस्त
देवताओंका पालक ओर तीनों छोकोंका अधिपति इब्ध हूँ।
सब देवता मुझे नमस्कार करते हैं। ब्रह्म | मेरे भक्त हो
जाओ | सदा मेरी ही पूजा करो | तुम्हारा कल्याण हो।
में तुम्हें सब कुछ दूँगा। निर्गण रुद्रको त्याग दो | उस
निगुंण रुद्रसे तुम्हारा कौन-सा काय सिद्ध होगा जो देवताओं-
की पद्क्तिसे बाहर होकर पिशाचमावको प्राप्त हो गया है |!
चायुंदेवता कहते है--यह सुनकर पश्चाक्षर मन्त्रका
जप करते हुए वे मुनि उपमन्यु इन्द्रकों अपने धर्ममें विश
डालनेके लिये आया हुआ जानकर बोले |
उपमन्युने कहा--यद्यपि तुम भगवान् शिवकी निन््दामे
तत्यर हो, तथापि इसी प्रसंग परमात्मा महादेवजीको
निर्मुणता बताकर तुमने स्वयं ही उनका सम्पूर्ण महत्व साठ
रूपसे कह दिया । तुम नहीं जानते कि भगवान् रुद्र समूर्ण
देवेदवरोंके भी ईश्वर हैं | ब्रह्म) विष्णु और महेशके भी
जनक हैं तथा प्रकृतिसे परे हैं | त्रह्मयादी छोग. उन्हींको
सत्-असत्) व्यक्त-अव्यक्त तथा नित्य एक और अनेक
कहते हैं | अतः मैं उन्हींसे वर माँगूँगा | जो युक्तिवादसे
परे तथा सांख्य और योगके सारभूत अर्थका शञन प्रदान
करनेवाले हैं, तत््वज्ञानी पुरुष उत्कृष्ट जानकर जिनकी
उपासना करते हैं, उन भगवान् शिवसे ही में वर मंगूगा।
देवाधम ! वूधके लिये जो मेरी इच्छा हैः यह यों ही रे
जायः परंतु शिवास्त्रके द्वारा तुम्हारा वध करके मैं आने
इस शरीरको त्याग दूँगा ।
वायुदेवता कहते हैँ--ऐसा कहकर खर्य
जानेका निश्चय करके उपमन्यु दूधकी भी इच्छा
इन्द्रका वध करनेके लिये उद्यत हो गये | उस समय अब
अल्से अभिमन्त्रित घोर भस्मको लेकर मुनिने इब््के
उद्देश्यसे छोड़ दिया और बड़े जोरसे विंहनाद किया | फिर
मर
शम्भुके युगल चरणारविन्दोका चिन्तन करते हुए वे आती ।
देहको दग्घ करनेके लिये उद्यत हो गये और आसेयी बार
घारण करके खित हुए ।
ब्राद्मोण उपमन्यु जब इस प्रकार खित डु5/ त्
भगदेवताके नेभ्रका माश करनेवाजें भगवान, शिवने योग
वायवीयंसंहिता ] # भगवान् शंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमत्युके भक्तिभावक्की परीक्षा लेना # ४८७
उपमत्युक्ी उस धारणाकों अपनी सौम्बदृश्सि रोक दिया |
उनके छोड़े हुए उस अघोराखको नन््दीश्वरकी आज्ञसे
शिववक्म नन््दीने वीचमें ही पकड़ लिया | तलश्ात् परमेश्वर
भगवान् शिवने अपने बालेन्दुशेखरूूपको धारण कर लिया
ओर ब्राह्मण उपमन्युको उसे दिखाया । इतना ही नहीं;
उप्त प्रमुने उस मुनिकों सहसों क्षीरसागर; सुधासागर, दि
. भादिके सागर, घ॒तके समुद्र; फूल्सम्बन्धी रसके समुद्र तथा
मेश्लमोज्य पदार्थोंके समुद्रका दर्शन कराया और पूओंका
पशड़ खड़ा करके दिखा दिया | इसी तरह देवी पार्व॑तीके
ताथ महादेवजी वहाँ वृषभपर आएूढ दिखायी दिये | वे
अपने गणाध्यक्षों तथा त्रिद्यूुल आदि दिव्यास्रोंसे घिरे हुए थे |
देवलेकरमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, आकाशसे फूलॉकी वर्षा
ऐने ठगी तथा विष्णु, ब्रह्मा. और इन्द्र आदि देवताओंसे
दरों दिशाएँ आच्छादित हो गयीं |
.. ते सम्य उपमन्यु आनन्दसागरकी छहरोसे घिरे हुए.
+। वे भक्तिविनन्न चित्तसे प्ृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़
गे | इसी समय वहाँ मुस्कराते हुए भगवान् शिवने
: पह५ँ आओ, यहाँ आओ? कहकर उन्हें बुछया और उनका
भरक सूँघकर अनेक वर दिये |
ह जय न जम
त्तद न 2 ; धर
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शिव वोले--वत्स ! तुम अपने भाई-बन्धुओंके साथ
पा इच्छानुसार भक्ष्य-भोज्य पदार्थोका उपभोग करो |
ढ/खसे छूटकर सर्वदा सुखी रहो) तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति
भक्ति सदा बनी रहे | महासाग उपमभन्यो ! ये पार्वती देवी
तुम्हारी माता हैं| आज मैंने तुम्हें अपना पुत्र बना लिया
ओर तम्हारे लिये क्षीरसागर प्रदान किया | केवल दूधका
ही नहीं, मधु, दही, अन्न) घी, भात तथा फल आदिके
रसका भी समुद्र तुम्हें देदिया।येपूओंके पहाड़ तथा
भक्ष्य-भोज्य पदार्थोके सागर मैंने तुम्हें समर्पित किये ।
महामुने | ये सब अहण करो | आजसे मैं महादेव तुम्हारा
पिता हूँ. ओर जगदम्बा उमा तुम्हारी माता है। मैंने तम्हें
अमरत्न तथा गणपतिका सनातन पद प्रदान किया | अब
तुम्हारे मनमें जो दूसरी-दूसरी अभिवाषाएँ: हों, उन सबको
तुम बड़ी प्रसन्नताके साथ वरके रूपमें माँगो | मैं संतुष्ट हूँ |
इसलिये वह सब दूँगा | इस विप्रयमें कोई अन्यथा विचार
नहीं करना चाहिये ।
वायुदेव कहते है--ऐसा कहकर महादेवजीने उन्हें
दोनों हाथोेंसे पकड़कर दृदयसे लगा लिया और मस्तक सूँघ-
, कर यह कहते हुए देवीकी गोदमें दे दिया कि यद्द तुम्हारा
पुत्र है | देवीने कार्तिकेयकी भाँति प्रेमपूर्वक्च उनके मस्तकपर
अपना करकमर रखा ओर उन्हें अविनाशी कुमारपद
प्रदान किया | क्षीरसागरने भी साकार रूप धारण करके उनके
हाथमें अनश्वर फिण्डीभूत खादिए्ठ दूध समर्पित किया |
तत्यश्चात् पार्वतीदेवीने संतुष्टचित्त हो उन्हें योगजनित ऐश्वर्य;
सदा संतोष, अविनाशिनी ब्रह्मविद्या ओर उत्तम समृद्धि
प्रदान की | तदनन्तर उनके तपोमय तेजको देखकर य्रसनन््नचित्त
हुए शम्भुने उपमन्यु मुनिकों पुनः दिव्य वरदान दिया।
पाझुपतत्त, पाशुपतशान) तात्चिक व्रतयोग तथा चिरकाल्तक
उसके प्रवचनकी परम पटुता उन्हें प्रदान की | भगवान् शिव
और शिवासे दिव्य वर तथा नित्य कुमारल पाऋछर वे
प्रमुदित हो उठे । इसके वाद प्रतनचित्र हो प्रयाम करके
४८८
हाथ जोड़ ब्राह्मण उपमन्युने देवदेव महेश्वरसे यह वर
माँगा । |
उपमन्यु बोले--देवदेवेश्वर ! प्रसन्न होइये ।
परमेश्वर ! प्रसन्न होइये ओर मुझे अपनी परम दिव्य एवं
अव्यभिचारिणी भक्ति दीजिये। मह[दिव ! मेरे जो अपने सगे-
सम्बन्धी हैं; उनमें मेरी सदा श्रद्धा बनी रहनेका वर दीजिये !
साथ ही; अपना दासत्व) उत्कृष्ट स्नेह ओर नित्य सामीप्य
प्रदान कीजिये ।
ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ उपमन्युने हर्ष
गद्द वाणीद्वारा महादेवजीका स्तवन किया ।
उपमन्न्यु वोले--देवदेव ! महादेव ! शरणागतबत्सल |
करुणा[सिन्धो ! साम्बसदाशिव ! आप सदा मुझपर
प्रसन्न होइये ।
वायुदेव कहते हैं--उनके ऐसा कहनेपर सबको
% नमो रुद्राय शानन््ता ब्रह्मणे परमात्मने #
श्६८य्य्लच्ल््््््सचल््ल््ल्अ््््य्य्य्य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्गम्म्म्प्प्पप-"--5::5:::::::::--------.--/-.क्ब..-नन--_तह808०ल००....................._ न 2७७७४७७०७७७७७४७४७७०७७७७७०७७७७४७७७४७७४७७७#७४७४७४४४४४४४४४िक४४७७७ऋछू 2 ककानक सकम॒2खरनाएनधयकनक>पापता कद म॒ऊपा०-आल् ८ + या मरपधश शक ला मा आल का ४ ॑एएााणणणभणणाााआआाणाणाााणाााणाााणााशाात३५ >> ममक भाभमममयकनया न या एक. |]
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाइ
वर देनेवाले प्रसन्नात्मा महादेवने मुनिवर उपमन्युको इस
प्रकार उत्तर दिया |
शिव बोले--वत्स उपमन्यो ! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ ।
इसलिये मैंने तुम्हें सब कुछ दे दिया ।« ब्र्मार्ष | तुम मेरे
सुब्ढ़ भक्त हो; क्योंकि इस विषयमें मैंने तुम्हारी परीक्षा ढे
ली है | तुम अजर-अमर; दुःखरहहित, यशख्री, तेजखी और
दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न होओ । द्विजश्रेष्ठ | तुम्हारे वन्धुवान्धव,
कुल तथा गोत्र सदा अक्षय रहेंगे | मेरे प्रति तुम्हारी भक्ति
सदा बनी रहेगी । विप्रवर ! में तुम्हारे आश्रमर्म नित्य निवात
करूँगा | तुम मेरे पास सानन्द विचरोगे |
ऐसा कहकर उपमन्युको अभीष्ट वर दे करोड़ों सूयकि
समान तेजसी भगवान् महेश्वर वहीं अन्तर्घान हो गये | उन
श्रेष्ठ परमेश्वरसे उत्तम वर पाकर उपमन्युका हृदय प्रसन्नताते
खिल उठा | उन्हें बहुत सुख मिछा ओर वे अपनी जब्म-
दायिनी माताके स्थानपर चले गये । ( अध्याय २५ )
॥ वायवीयसंहिताका पूर्वखण्ड सम्पू्ण ॥
।
: झा चरित्र
3 जिया
कि
+. बीज है ल्ी। ऑफ मे अं फिक पपाा 5
' ५ गशुपतज्ञन किस प्रकार
वायवीयसंहिता (उत्तरखण्ड )
ऋषियोंके पूछनेपर
सूत उचाच
नमः . समस्तसंसारचक्रश्नम”द्वेतवे ।
गोरीकुचतटद्वन्द्द कुछुमाह्नितवक्षते. ॥
सूतजी कहते हँ--जो समस्त संसार-चक्रके परि-
प्रमणमें कारणरूप हैं तथा गोरीके युगल उरोजोंमें छगे हुए.
'केतरसे जिनका वक्षःस्थल अद्जित है; उन भगवान् उमावल्लभ
शिवको नमस्कार है।
उपमन्युकी भगवान् शंकरके कृपाप्रसादके प्राप्त होनेका
प्रसज्ञ सुनाकर मध्याह्कालमें नित्य नियमके उद्देश्यसे वायु-
देव कथा बंद करके उठ गये । तब नैमिषारण्यनिवासी अन्य
ऋषि भी “अब अम्ुक बात पूछनी है? ऐसा निश्चय करके
उठे ओर प्रतिदिनकी भाँति अपना तात्कालिक नित्यकर्म
पृ करके भगवान् वायुदेवको आया देख फिर आकर उनके
पास बैठ गये। नियम समाप्त होनेपर जब आकाझजन्सा
वायुदेव मुनिर्योकी सभामें अपने लिये निश्चित उत्तम आसनपर
विगजमान हो गये--सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे लोकवन्दित
'नदेव मदेश्वरकी श्रीसम्पन्न विभूतिका मन-दी-मन चिन्तन
के इस प्रकार बोले---में उन सर्वश्ष और अपराजित
'हन् देव भगवान् शंकरकी शरण लेता हूँ, जिनकी विभूति
*३ स््त चयचर जगतके रूपमें फेली हुई है |?
उनकी शुभ वाणीकों सुनकर वे निष्पाप ऋषि भगवान-
» विभूतिका विस्तासूर्वक वर्णन सुननेके लिये यह उत्तम
पचन बोले |
ऋषियोनि फेंद्ा--भगवन् | आपने महात्मा उपमन्यु-
कर पुनाया, जिससे यह शत हुआ कि उन्होंने केबल
5 हे तपस्या करके भी परमेश्वर शिवसे सब कुछ पा
' झ हर लेक सुन रक््खा है कि अनायास ही महान
फैमड़े बह रन भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय
जा 'ई भाई उपमन्धुसे मिले थे और उनकी प्रेरणासे
हर कस करके उन्होंने "परम झान प्राप्त कर
' भाप यह बताये कि भगवान् श्रीकृष्णने परम
कार प्राप्त किया |
० ० सं ६२--
वायुदेवक्ा श्रीकृष्ण और उपमन्युक्के मिलनक्ला ग्रसद्भ सुनाना, भ्रीकृष्णफो
उपमन्युसे ज्ञानका ओर भगवान् शंकरसे पृत्रक्रा छाभ
0] ॥॥ । | ॥|
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बायुदेव बोले--अपनी इच्छासे अवतीर्ण होनेपर भी
सनातन वासुदेवने मानव-रीरकी निन््दा-सी करते हुए लोक-
संग्रहके लिये शरीरकी शुद्धि की थी । वे पुत्र-प्राप्तिके निम्मित्त
तप करनेके लिये उन महामुनिके आश्रमपर गये ये; जहाँ
बहुत-से मुनि उपमन्युजीका दर्शन कर रहे ये। भगवान्
श्रीकृष्णने भी वहाँ जाकर उनका दशन किया । उनके सारे
अइ्त भस्मसे उज्ज्वल दिखायी देते ये । मस्तक त्रिपुण्डसे
अद्डित था । रुद्राक्षकी माल्ल ही उनका आनृषण थी। वे
जटामण्डलसे मण्डित थे | शाह्रोत्ति वेदकी भोति वे अपने
शिष्यभूत महर्षियोंसे घिरे हुए थे और शिवजीके ध्यानमें
ततर हो झान्तमावसे बैठे थे। उन महातेजस्वी उपमन्थुका
दर्शन करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया | उस समय
उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाश्व हो आवा । श्रीक्ृषष्णने बढ़ें
आदरके साथ मुनिकी तीन बार परिक्रमा की । फिर अन्त
प्रसन्नताके साथ मस्तक झुका हाथ जाइकर उनका सबन
किया | तदनन्तर उपमनन््युने विधिएवक अप्निरिति भस्मा
इत्यादि मन्त्रोंते शीक्षप्णके शर्रीरमें भूल लगाकर उतरे
उरहाफत
8९०
अन्य,
कै. >ययकतरी "रयपनमम लत भओ--ममुटनपितन नर ....3 5३. 2 2 परी नर मकाइक--मी 2००. कम
बारह महोनेका साक्षात् पाशुपतत्रत करवाया । तत्मश्वात्
मुनिने उन्हें उत्तम ज्ञान प्रदान किया | उसी समयसे उत्तम
ब्रतका पालन करनेवाले सम्यूण दिव्य पाश्ुपत मुनि उन
श्रीकृष्णको चारों ओरसे त्रेऱर उनके पास बेठ रहने लगे |
फिर गुरुकी आज्ञासे परम शक्तिमान् श्रीकृष्णने पुत्रके लिये
साम्व शिवकी आराधनाका उदहृइय मनमें लेकर तपस्या की |
उस तपस्यासे संतुष्ट हो एक वर्षके पश्चात् पा्षदोंसहित, परम
ऐश्वयंशाली परमेश्वर साम्ब शिवने उन्हें दर्शन दिया।
श्रीकृष्णने वर देनेके लिये प्रकट हुए, सुन्दर अज्ञवाले महा-
देवजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनकी स्तुति भी
से के.
# नमों रुद्राय शान्ताय बरह्मण परमात्यने #
१७०४४०ाआआंआने<ंडंजंभा आजा पयबेंब जमा बी
>न 3 क-..3>4०40० >णा--0-+प8७७+मी. 3० -तआनथी १233... ऑनाा-ओममयक- “३ ०-3फनामनी न अर. मम 2, प++ मम पया.-+००-“.. सपा पर मी पाक“ 3. मनन न्यकाकमम- अमन.
| संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
की । गणोंसहित साम्ब सदाशिवका स्तवन करके श्रीकृष्ने
अपने लिये एक पुत्र प्राप्त किया | वह पुत्र तस्यासे संतुष-
चित्त हुए साक्षात् शिवने श्रीविष्णुको दिया था। चूँकि ताम
शिवने उन्हें अपना पुत्र प्रदान किया; इसलिये श्रीकृषष्णने
जाम्बवती-कुमारका नाम साम्ब ही रक््खा | इस प्रकार अम्ित-
पराक्रमी श्रीकृष्णको महर्षि उपमन्युसे ज्ञानलाम और भगवान्
शंकरसे पुत्र-छाभ हुआ | इस प्रकार यह सब प्रसक् मैंने पूराथूग
कह सुनाया । जो प्रतिदिन इसे कहता-सुनता या सुनाता है;
वह भगवान् विष्णुका ज्ञान पाकर उन्हींके साथ आनन्दित
होता है । ( अध्याय १)
+-शै5++22४कंआ>..-#-
उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णकोी पाशुपत ज्ञानका उपदेश
ऋषियोंने पूछा--पाशुपत ज्ञान क्या है ! भगवान्
शिव पशुपति केसे हैं ?! ओर अनायास ही महान् कम करने-
वाले भगवान् श्रीकृष्णने उपमन्युसे किस प्रकार प्रइन किया
था ? वायुदेव | आप साक्षात् शंकरके खरूप हैं; इसलिये ये
सब बाते बताइये । तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कोई
वक्ता इन बातोंको बतानेमें समर्थ नहीं है ।
सूतजी कहते हैं---उनं महर्षियोंकी यह बात सुनकर
वायुदेवताने भगवान् शंकरका स्मरण करके इस प्रकार उत्तर
देना आरम्म किया । ह
वायुदेव वोले--महर्षियो | पूर्वकालमें श्रीकृष्णर्पधारी
भगवान् विष्णुनें अपने आसनपर बैठे हुए. महर्षि उपमन्युसे
उन्हें प्रणाम करके न्यायपूवंक यों प्रश्न किया ।
श्रीकृष्णने कहा--भगवन् ! महादेवजीने देवी पाव॑ती-
को जिस दिव्य पाथुपत ज्ञान तथा अपनी सम्पूर्ण विभूतिका
उपदेश दिया था) में उसीको सुनना चाहता हूँ । मद्दिवजी
पशुपति केसे हुए ! पश्मु कोन कदलते हैं १ वे पद्म किन
पाशासे बॉँधे जाते हैं ओर फिर किस प्रकार उनसे मुक्त
होते हैं
दहात्मा श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर श्रीमान् उपभन््युने
मदादेवनी तथा देदी पार्यतीकों प्रणाम करके उनके प्रश्नके
भनुसार उत्तर देना आरम्भ किया ।
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उपमन्यु वोछे--देवकीनन्दन ! ब्रह्माजीसे लेकर लीगेए
पर्यन्त जो भी संसारके वशवर्ती चराचर प्राणी हैं) वे सबके: ,
सब भगवान् शिवके पञ्मु कहलाते हैं और उनके पति इन
कारण देवेश्यर जझिवकों पशुपति कहां गया हैं। वे पथ
अपने पद्मुओंको मछ और पाग्ोति बाँपते दें भी
ने पञ्ुअंकी मछ ओर माया आदि पाश्चति वरधिंत ६
भक्तिपूर्वक उनके द्वारा आराधित होगेपर वे त्वयं दी उ्ईें 5,
पाञ्मोसे मुक्त करते हैं | जो चौबीस तत्व हैं) वें माया ही।
वायवीयसंहिता | # भगवान् शिवकी ब्रह्मा भादि पश्चमूतियांका परिचय # ४९१
यान. मी 33. 3++>पानम "जनक नी अक- क्॑फल्यनअतीी-कमम«|नममयकबतनकी "ट आओ "राफकनना. पक
यक्षराज कुत्रेर ग्राणियोंकों उनके पुण्यक्रे अनुच्प सदा घन
देते हैं और उत्तम बुद्धिवाले पुरुर्षोको सम्पत्तिके साथ ज्ञान
मी प्रदान करते हैं | ईश्वर असाधु पुरुषोका निग्नह करते है
तथा रोष शिवकी ही आश्ञासे अपने मस्तकपर पृथ्वीको धारण
करते हैं। उन शेषको श्रीहरिकी तामसी रोद्रमूर्ति कह्य गया
है, जो जगतका प्रल्य करनेवाली है। ब्रह्माजी शिवकी ही
आज्ञसे सम्पूर्ण जगतकी सृष्टि करते हैं तथा अपनी अन्य
मूतियोद्वारा पालन और संह्वारका कार्य भी करते हैं। भगवान्
विष्णु अपनी त्रिविध मूर्तियोंद्वारा विश्वका पालन) सर्जन ओर
संहार भी करते हैं | विश्वात्मा भगवान् हर भी तीन रुपोंमें
विभक्त हो सम्पूर्ण जगतका संहार, सृष्टि ओर रक्षा करते हैं |
काल सबको उत्पन्न करता है । वही प्रजाकी सृष्टि करता है
तथा वही विश्वका पालन करता है | यह सब वह महाकालकी
आशसे प्रेरित होकर ही करता है। भगवान सू् उन्हींकी
आज्ञसे अपने तीन अंशोद्वारा जगत॒का पालन करते; अपनी
किरणोंद्वारा इष्टिके लिये आदेश देते और स्वयं ही आकाझमें
मेघ बनकर बरसते हैं। चन्द्रभूषण शिवका शासन मानकर
ही चन्द्रमा ओषधियोंका पोषण ओर प्राणियोंकों आह्वादित
करते हैँ | साथ ही देवताओंको अपनी अमृतमयी कल्मओंका
पान करने देते हैं| आदित्य, वरु। रुद्र, अश्विनीकुमार,
मरुद्रण, आकाशचारी ऋषि; सिद्ध, नागगण, मनुष्य, मृग)
एवं गुण हैं | वे ही विधय कहलाते हैं, जीवों ( पश्चुओं ) को
बॉधनेवाले पाश वे ही हैं | इन पाशोंद्वारा ब्रह्मासे लेकर कीट-
पयन्त समस्त पश्ुओंको बाँधकर महदेश्वर पश्चेपति देव उनसे
: अपना कार्य कराते हैं। उन महेश्वरकी ही आज्ञासे प्रकृति
पद्मोचित बुद्धिको जन्म देती है। बुद्धि अहंकारको प्रकट
की है तथा अहंकार कल्याणदायी देवाधिदेव शिवकी आशा-
पे ग्यारह इच्ध्रियों ओर पाँच तन्मात्राओंको उत्मन्न करता है ।
। तम्मात्राएँ भी उन्हीं महेश्वरके महान् शासनसे प्रेरित हो
बमशः पाँच महाभूतोंको उत्पन्न करती हैं | वे सब महाभूत
शिवकी आज्ञासे ब्रह्मसे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके लिये
देहकी सृष्टि करते हैं, बुद्धि कर्तव्यका निश्चय करती है और
अकार अभिमान करता है। चित्त चेतता है और मन
पंकत्प-विकल्य करता है; श्रवण आदि झानेन्द्रियाँ प्रथक-प्थक्
शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करती हैं | वे महादेवजीके आशज्ञा-
बसे केवल अपने ही विषयोंकों अहण करती हैं | बाक् आदि
: अमस्धियाँ कहछाती हैं और शिवक्री इच्छासे अपने लिये
नियत कः ही करती हैं, दूसरा कुछ नहीं | शब्द आदि जाने
जते है और बोलना आदि करे किये जाते हैं। इन सबके
डेये भावान् शंकरकी गुरुतर आज्ञाका उल्लज्ञन करना
सम्भव है | परमेश्वर शिवके शासनसे ही आकाश सर्वव्यापी
कर समस्त प्राणियोंको अवकाश प्रदान करता है; वायुतत्त्
'ग आदि तामभेदोंद्यारा बाहर-भीतरके सम्पूर्ण जगतकों
८" करता है। अग्नितत्व देवताओंके लिये हृव्य और
व्पिभाजी पित्तरोंके लिये कव्य पहुँचाता है | साथ ही मनुष्यों-
हे कं पक आदिका भी कार्य करता है | जल सबको जीवन
था है और पृथ्वी सम्मूण जगतकों सदा धारण किये
्ती है 5
के शिवकी आज्ञा सम्यूर्ण देवताओंकि लिये अल्डनीय है। उसीसे
हे शैकर ऐवराज इन्द्र देवताओंका पालन, देत्योंका दमन
कर जेकोंका संरक्षण करते हैं। वरुणदेव सदा जल्तत्त्व-
रे को अरे संरक्षणका कार्य सँभालते हैं, साथ ही दण्डनीय
गगवकी अपने पाश्षोद्वारा बाँध छेते हैं। धनके स्वामी
मकान का अका-मिनकन- कमी
पशु, पक्षी; कीट आदि; स्थावर प्राणी, नदियाँ, समुद्र, पर्वत,
वन) सरोवर, अद्ञोंमहित वेद, शास्त्र, मन्त्र, बेंदिकस्तोत्र और
यज्ञ आदि; कालाग्निसे लेकर शिवपयन्त भुवन) उनके अधिपति,
असंख्य ब्रह्माण्ड उनके आवरण, वर्तमान; भूत ओर भविष्य,
दिश्ञा-विदिशाएँ, कला आदि कालके भिन्न-मिन्न भेद तथा जो
कुछ भी इस जगतमें देखा और सुना जाता है। वह सब
भगवान् शंकरकी आज्ञाक्रे बल्से दीं टिका हुआ दे | उनकी
आशाके ही बल्से यहाँ उथ्बी; पर्वत) मेत्र, समुद्र, नश्चत्रगण)
इन्द्रादि देवता, खाबर, जद्नम अथवा जड ओर चेतन--
सबकी स्थिति दे । ( अध्याय २ )
रे विमराममक.
गेगबान् शिवकी ब्रह्मा आदि पश्चमूर्तियों, ईशानादि त्ह्ममूतिंयों तथा ४थ्वी एवं श्र आदि
अश्मूर्तियोंका परिचय और उनकी स्वेव्यापक्रताका वर्णन
7. “पमन्यु कहते हैँ-. श्रीकृष्ण | महेश्वर परमात्मा
भ्श्ने कक बियर वियोत्ते यह व है
2 हर ह सम्पूर्ण चराचर जगत् क्रिस प्रकार व्याप्त
७ १९ 4“... सह
* ४ ज्ा, विष्णु, रुद्र, महेशान तथा सदाशिव---
ये उन . परमेश्वरक्की पाँच मूर्तियाँ जाननी चाहिये, जिनसे बढ़
सम्पुर्ण विश्व विन्तारकों ग्रात हुआ दे। इसके सिवा ओर
भी उनके पाँच शरीर हैं। जिन्हें पंद्रनल्नत्न ( मन्त्र ) कदवे
थे भ्न
ल्ट
हैं ।इस जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन मूर्तियोंसे
व्याप्त न हो | ईशान, पुरुष, अबोर, बामदेव और सद्योजात---
ये महादेवजीकी विख्यात पाँच ब्रह्ममूर्तियाँ हैं| इनमें जो ईशान
नामक उनकी आदि श्रेष्ठ तम मूर्ति है, वह प्रकृतिके साक्षात्
भोक्ता क्षेत्रश्ञको व्याप्त करके स्थित है | मूर्तिमान् प्रभु शिवकी
जो तत्पुरुष नामक मूर्ति है, वह गुणोंके आश्रयरूप भोग्य-
अव्यक्त ( प्रकृति ) में अधिड़्ित है| पिनाकपाणि महेश्वरकी
जो अत्यन्त पूजित अघोर नामक मूर्ति है, वह घर्म आदि आठ
अज्ञोंसे युक्त बुद्धितत्वको अपना अधिष्ठान बनाती है।
विधाता महादेवकी वामदेव नामक मूर्तिकों आमगमवेत्ता
विद्वान् अहंकारकी अधिष्ठात्री बताते हैं | बुद्धिमान् पुरुष
अमित-तेजस्त्री शिवक्री सद्योजात नामक मूर्तिकों मनकी
अधिष्ठात्री कहते हैं | विद्वान् पुरुष भगवान् शिवकी ईशान-
नामक मूतिकों श्रवणेन्द्रिय, वाणी, शब्द ओर व्यापक आकाश-
तत्त्वकी स्वामिनी मानते हैं | पुराणोंके अर्थज्ञानमें निपुण समस्त
विद्वार्नोने मद्देश्वरके तत्पुरुष नामक विग्रहकों त्वचा; हाथ, स्पर्श
और वायु-तत््वका स्वामी समझा है। मनीपी मुनि शिवकी
अघोर नामक मूतिको नेत्र, पे, रूप ओर अग्नि-तक्षकी
अधिष्ठात्री बताते हैं| भगवान् शिवके चरणोंमें अनुराग रखने-
वाले महात्मा पुरष उनकी वामदेव नामक मूर्तिकों रसना:
पायु; रस और जल्तत्त्वकी स्वामिनी समझते हैं तथा सद्योजात
नामक मूर्तिको वे घाणेन्द्रिय, उपस्थ, गन्ध और प्रथ्बी-तत्त्वकी
अधिष्ठात्री कहते हैं | महादेवजीकी ये पाँचों मूर्तियाँ कल्याणकी
एकमात्र हेतु हैं| कल्याणकामी पुरुषोंको इनकी सदा ही यत्र-
पूवक वनन््दना करनी चाहिये । उन देवाधिदेव महादेवजीकी जो
आठ मूर्तियाँ हैं, तत््खरूप ही यह जगत् है | उन आठ मूर्तियों-
: में यह विश्व उमी प्रकार ओतप्रोत भावसे स्थित है, जैसे सूतमें
मनके पिरोये होते दे ।
श्े, भव) रुद्र) उम्र, भीम) पशुपति, ईशान तथा महा-
देव--ये शिवकी विख्यात आठ मूतियाँ हैं | महेश्वरकी इन
शर्वे आदि आठ मूर्तियोंसे क्रशः भूमि, जल) अग्नि, वायु;
क्षेत्र) सू और चन्द्रमा अधिष्ठित होते हैं | उनकी प्रथ्वीमयी
मूर्ति सम्धूण चराचर जगत्कों धारण करती है | उसके अधि-
छाताका नाम शर्द है | इसलिये वह शिवकी ध्शार्वी? मूर्ति कहृत्यती
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
चचच्््य्स्स््य्स्स्य्य्स्स््य्य्य्स्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य्य्स्य्य्स्य्स्ल्ल्प््प्कमलललफडसपफटपत>->-.
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
है । यही शास्त्रका निर्णय है | उनकी जलमयी मूर्ति तमख
जगत्के लिये जीवनदायिनी है | जल परमात्मा भवकी मूर्ति
है, इसलिये उसे “भावी? कहते हैं | शिवकी तेजोमयी शुभमूर्ति
विश्वके बाहर-मीतर व्याप्त होकर स्थित है। उस घोररूपिणी
मूर्तिका नाम रुद्र है, इसलिये बह रोद्री? कहल्यती है। भगवान
शिव वायुरूपसे स्वयं गतिशील होते और इस जगतकों गतिशील
बनाते हैं | साथ ही वे इसका भरण-पोषण मी करते हैं | वायु
भगवान् उग्रकी मूर्ति है; इसलिये साधु पुरुष इसे ८्मौग्री? कहते
हैं। भगवान् भीमकी आकाशरूपिणी मूर्ति सबको अवकाश
देनेवाली; सर्वव्यापिनी तथा भूतसमुदायकी भेदिका है| वह
भीम नामसे प्रसिद्ध है ( अतः इसे “मैमी? मूर्ति मी कहते हैं)।
सम्पूर्ण क्षेत्रोंमे निवास करनेवाली तथा सम्पूर्ण आत्माओंक़ी
अधिष्ठात्री शिवमूर्तिको “पशुपति? मूर्ति समझना चाहिये | वह
पशुओंके पार्शोका उच्छेद करनेवाली है। महेश्वरकी जो (ईशान!
नामक मूर्ति है, वही दिवाकर ( सूर्य ) नाम धारण करके
सम्पूर्ण जगत्कों प्रकाशित करती हुई आकाझमें विचरती है।
जिनकी किरणोंमं अमृत भरा है और जो सम्पूर्ण विश्वको उस
अमृतसे आप्यायित करते हैं, वे चन्द्रदेव भगवान् शिवके महा-
देव नामक विग्रह हैं; अतः उन्हें “महादेव? मूर्ति कहते है | यह
जो आठवीं मूर्ति है, वह परमात्मा शिवका साक्षात् खल्प है
तथा अन्य सब मूर्तियोंमें व्यापक है | इसलिये यह सम्पूर्ण विश
शिवरूप ही है । जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएं
पुष्ट होती हैं; उसी प्रकार भगवान् शिवकी पूजासे उनके खरूप-
भूत जगत्का पोषण होता है | इसलिये - सबको अमय दान
देना, सबपर अनुग्रह करना ओर सबका उपकार करना--हं
शिवका आराघधन माना गया है। जैसे इस जगतूमें अपने पुत्र-
पौत्र आदिके प्रसन्न रहनेसे पिता-पितामह आदिको प्रसन्नता
होती है; उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्की प्रसन्नतासें मगवान् शंकर
प्रसन्न होते हैं। यदि किसी भी देहधारीको दण्ड दिया जाता
है तो उसके द्वारा अश्मूर्तिघारी शिवका ही अनिष्ट किया जाता]
है, इसमें संशय नहीं है । आठ मूर्तियोंके रूपमें सम्यूण विधको
व्याप्त करके स्थित हुए भगवान् शिवका तुम सब प्रकारसे '
( अध्याय ३ )
2] शिव ओर ज्ै | आक शिव की स््ि ही ७२
शव आर शिवाकी विभूतियोंका वर्णन
श्रीकृष्ण ने पुछा--भगवन् ! अमित-तेजस्वी भगवान्
शिवकी मूर्तियोंने इस गाम्यूण जगतकों जिस प्रकार व्याप्त
के
बज
के
कर रक्खा है; वह सब मेने सुना | अब मुझे यह जाननेको
भजन करो; क्योंकि रुद्रदेव सबके परम कारण हैं | ह
;
|
|
]
इच्छा है कि परमेश्वरी शिवा और परमेश्वर शिवका ययार्य
ब्रायवीयसंहिता ]
-सायपलापराप्-न"नायारयाए, -दिलबाः+..ऑपाहता>े..धनपा 'पीममपकभी2३0>पए:+मथपलकरय...
तत्प क्या है; उन दोनोंने त्ली ओर पुरुषरूप इस जगतको
क्रिस प्रकार व्याप्त कर रक््खा है ।
उपमन्यु वोले--देवकीनन्दन | मैं शिवा और शिवके
प्रीममन्न ऐश्वब्का और उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपका संक्षेपसे
गन करूँगा | विस्तारपूर्वक इस विषयका बर्णन तो भगवान्
शिव मी नहीं कर सकते। साक्षात् महादेवी पायती शक्ति
हैं ओर महादेवजी शक्तिमान् । उन दोरनोंकी विभूतिका
ऐद्म्ात्र ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतकेः रूपमें स्थित है ।
फू कोई वस्तु जडरूप है ओर कोई वस्तु चेतनरूप । वे
दोनों क्रमशः शुद्ध, अश्ुद्ध तथा पर ओर अपर कहे गये हैं ।
बे चिन्मण्डल जडमण्डलके साथ संयुक्त हो संसारमें भटक
द्वा है, वही अग्युद्ध ओर अपर कहा गया है | उससे भिन्न
गे जढके बन्धनसे मुक्त है, वह पर और झुद्ध कहां गया है ।
अर और पर चिदचित्परूप हैं, इनपर ख्मभावतः
शिव और शिवाका खामित्व है | शिवा और शिवके ही
गर्म यह विश्व है | विश्वके वशामें शिवा और शिव नहीं हैं ।
ह॥ जगत शित्र और शिवाक्रे शासनमें है। इसलिये वे
रनों इसके ईश्वर या विश्वेश्वर कहे गये हैं। जैसे शिव हैं;
पेगी शिवा देवी हैं तथा जैसी शिवा देवी हैं, वेसे ही शिव
है| जिस तरह चन्द्रमा और उनकी चाँदनीमें कोई अन्तर
नहीं है; उसी प्रकार शिव और शिवामें कोई अन्तर म
भपझे। जैसे चन्द्रिकाके बिना ये चन्द्रमा सुशोभित नहीं होते:
ञी कार शिव विद्यमान होनेपर भी शक्तिके बिना
>भित नहीं होते । जैसे ये सूददेव कभी प्रभाके बिना
शंख रु प्रभा भी उन सूर्यदेवके बिना नहीं रहती;
गेज्तर उनके आश्रय ही रहती है, उसी प्रकार शक्ति और
पैक वि कक अपेक्षा होती है ।क् नतो
दा सर ; रह सकती है और न शक्तिके बिना
पे देन द्वारा शिव सदा देहधारियोंकी भोग ओर
पथ होते हैं, वह आदि सरल 5 आवलाय अकाली चिन्मयी
* कद्रो न जल भात्येप यथा चन्द्रिकया विना ।
गे भाति विध्यमानो5पि तथा शक्त्या विना शिव: ॥
नया हि बिना यद्वद्वानुरेष न विद्यते ।
हे रेस तेन हे सुतरां तदुपाश्रया ॥
हे शा शक्तिशक्तिमतो: स्थिता ।
" देन बिना शक्तिर शेक्त्या च विना शिव: ॥
( शि० पु० वा० सं० उ० खु० ४। १०-१२ )
. # शिव और शिवाकी विभूतियोंका वर्णन #
७९३
पराशक्ति शिवके ही आश्रित है | शानी पुरुष उसी शक्तिको
सर्वेश्वर परमात्मा शिवके अनुरूप उन-उन अल्येकिक गुणोंके
कारण उनकी समधमिणी कहते हैं | वह एकमात्र
चिन्मयी पराशक्ति सृष्टिषमिंणी है । वही शिवकी इच्छासे
विभागपूर्वक नाना प्रकारके विश्वकी रचना करती है । वह
शक्ति मूलप्रकृति, माया और त्रिगुणा--तीन प्रकारकी
बतायी गयी है; उस शक्तिरूपिणी शिवाने ही इस जगतका
विस्तार किया है । व्यवह्वरभेदसे शक्तियोंके एक-दो, सो, हजार
एवं बहुसंख्यक भेद हो जाते हैं ।
शिवकी इच्छासे पराशक्ति शिव-तत्वके साथ एकताको
प्राप्त होती है। तबसे कल्पके आदिमें उसी प्रकार सृष्टिका
प्रादुर्भाव होता है; जैसे तिलसे तेलका । तदनन्तर शक्तिमानसे
शक्तिमें क्रियामयी शक्ति प्रकट होती है। उसके विकज्षुब्ध
होनेपर आदिकालमें पहले नादकी उत्पत्ति हुईं। फिर नादसे
बिन्दुका प्राकस्य हुआ ओर बिन्दुसे सदाशिव देवका ।
उन सदाशिवसे महेश्वर प्रकट हुए और महेश्वरसे श॒द्ध
विद्या | वह वाणीकी ईश्वरी है। इस प्रकार त्रिश्यूलघारी
महेश्वरसे वागीश्वरी नामक शक्तिका प्रादुभोव हुआ जो
वर्णों ( अक्षरों ) के रूपमें विस्तारको प्राप्त होती है और माठृका
कहत्यती है | तदनन्तर अनन्तके समावेशसे मायाने काल;
नियति, कछा और विद्याकी सृष्टि की | कलासे राहु तथा
पुरुष हुए. | फिर मायासे द्वी त्रिगुणात्मिका अव्यक्त प्रकृति
हुई । उस त्रिग्ुणात्मक अव्यक्तसे तीनों गुण इंथकइथक्
प्रकट हुए | उनके नाम हैं--सत्च, रण और तम; इनसे
यह सम्यूणं जगत् व्याप्त है। गुणोमें क्षोम होनेपर उनसे
गुणेश नामक तीन मूर्तियाँ प्रकट हुईं | साथ ही “महत्ः
आदि तत्तवोंका क्रमशः प्राडुर्भाव हुआ । उन््हांसे शिवकी
आज्ञके अनुमार असंख्य अण्ड-पिण्ड प्रकद होते हैँ, जो
अनन्त आदि विद्येश्वर चक्रवर्तियोंसे अधिष्ठित हैं | शरीरान्तरके
भेदसे शक्तिके वहुत-सें भेद कहें गये हैं | स्थूछ ओर सूक्ष्मके
भेदसे उनके अनेक रूप जानने चाहिये। रुद्रकी झक्ति रोद्री/
विष्णुकी दैष्णबीः त्ह्ाकी ब्ह्माणी और इच्धक्ी इन्द्राणी
कहलाती है। वहाँ बहुत कहनेसे क्या छाम--जिसे विश्व
कहा गया है, वह उसी प्रकार शक्त्यात्मासे व्यात्त है ऊेँसे दरीर
अन्तरात्मासे | अतः सम्पूर्ण खावर-जंगमल्ूप जगत् झक्तिमय
है । यह पराशक्ति परमात्मा शित्रक्की कल्य करद्दी गयी दे ।
इस तरह यह पर शक्ति ईरंकी इच्छाक्े अनुसार चत्कर
चराचर जगत्की दृष्टि करती है ऐसा विश्व पुदषांका निंशव
७२७४
के +>>क -439>क कर क-ाा+ नम» मास :8७+१७०)-+००५
+ 4 २४०० भा आ-4५ ३-#8-०पणयमड> पर हू प. ९३०+०७ “-मल-नन न. “समन .लशव्मममममकन-कृत--,. ८-3 वयत-ययाननर--म्क-नकन-न- जग्ग्म्ण्ण्म्प््प््ण्प्च््च्य्ञ््श््ूू््श््नऋ्ल्खछश्श शछचणण या ट 2 था: जममकमयायकमदक्धकपयाभमा पक की > ०००३४ ७०५7; >थ 2 कर 23० ल लिमिट पु
इस को खंड च्क धयमर्क न न रन न
अं 5 अक नरक लक मी आल पद भतार > नुजवेऔ न की भ्आ० सनम था या ओ
है | श्ञान, क्रिया और इच्छा--अपनी इन तीन शक्तियोंद्वारा
शक्तिमान् ईश्वर सदा सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित
होते हैं। यह इस प्रकार हो ओर यह इस प्रकार न हो---
इस तरह कार्योका नियमन करनेवाली महेश्वरकी इच्छाशक्ति
नित्य है | उनकी जो ज्ञानशक्ति है, वह बुद्धिौ्प होकर
काये; करण, कारण और प्रयोजनका ठीक-ठीक निश्चय
करती है; तथा शिवकी जो क्रियाशक्ति है; वह संकल्परूपिणी
होकर उनकी इच्छा ओर निश्चयक्रे अनुसार कार्यरूप सम्पूर्ण
जगत्की क्षणभरमें कल्पना कर देती है | इस प्रकार तीनों
शक्तियोंसे जगतका उत्थान होता है। प्रसव-घर्मवाली जो
शक्ति है, वह पराशक्तिसे प्रेरित होकर ही सम्पूणं जगतकी
सृष्टि करती है | इस तरह शक्तियोंके संयोगसे शिव शक्तिमान्
कहल्ते हैं। शक्ति ओर शक्तिमानसे प्रकट होनेके कारण
यह जगत् शाक्त ओर शैव कहा गया है। जैसे माता-पिताके
बिना पुत्रका जन्म नहीं होता, उसी प्रकार भव और भवानीके
बिना इस चराचर जगतकी उत्पत्ति नहीं होती | स्री और
पुरुषसे प्रकट हुआ जगत् स्त्री ओर पुरुषरूप ही है; यह स्त्री
और पुरुषकी विभूति है; अतः स्री और पुरुषसे अधिष्ठित
है । इनमें शक्तिमान् पुरुषरूप शिव तो परमात्मा कह्टे गये हैं
ओर स्त्रीरूपिणी शिवा उनकी पराशक्ति | शिव सदाशिव
कहे गये हैं ओर शिवा मनोन््मनी | शिवकों महेश्वर जानना
चाहिये और शिवा माया कहलाती हैं । परमेश्वर शिव पुरुष
हैं ओर परमेश्वरी शिवा प्रकृति | महदेश्वर शिव रुद्र हैं ओर
उनकी वल्लभा शिवादेवी रुद्राणी। विश्वेश्वर देव विष्णु हैं
ओर उनकी प्रिया लक्ष्मी | जब सश्टिकर्ता शिव ब्रह्मा कहलाते
हैं, तब उनकी प्रियाक्रों ब्रद्माणी कहते हैं| भगवान् शिव
भास्कर हैं ओर भगवती शिवा प्रभा। कामनाशन शिव
महेन्द्र हैं ओर गिरिराजनन्दिनी उमा शची । महादेवजी अग्नि
हैं ओर उनकी अर्द्धा्निनी उमा स्वाह्य | भगवान् चिलछोचन
यम हैं ओर गिरिराजनन्दिनी उमा यमप्रिया | भगवान् शंकर
निऋंति हैं ओर पार्वती नेऋती । भगवान् रुद्र वरुण हैं ओर
पार्दती वारणी । चन्द्रशेखर शिव वायु हैं ओर पात्रती
वायुप्रिया. । शिव यक्ष हैं ओर पावंती ऋद्धि।
चन्द्राथधशेखर शिव चन्द्रमा हैं ओर रुद्रवल्लभा उमा रोहिणी ।
प्रमेश्वर शिव ईशान हैं और परमेश्वरी शित्रा उनकी पत्नी | नागराज
अनन्तको वल्यरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शंकर अनन्त
हूं ओर उनकी वल्लमा शिवा अनन्ता | कालदन्रु शिव
कालाग्निद्द्र हैं भोर काठी काल्यन्तकप्रिया हैं । जिनका
# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
चाल खत अजय ०. वजजताओ अ-ननीयआनम.-महुक--ये, +#न्म्ाओो,
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दूसरा नाम पुरुष है, ऐसे स्वायम्भुव मनुके रुपमें साक्षात्
शम्भु ही हैं और शिवप्रिया उमा शतख्पा हैं। साक्षात्
महादेव दक्ष हैं ओर परमेश्वरी पारवती प्रसृति | मगवान् भव
रुचि हैं ओर भवानीको ही विद्वान् पुरुष आकूति कहते हैं ।
महादेवजी भ्गु हैं ओर पार्बती ख्याति | भगवान् रुद्र मरीचि
हे ओर शिववल्लभा सम्भूति | भगवान् गन्जाधर अड्ल्रि हँ
ओर साक्षात् उमा स्मृति | चन्द्रमौलि पुल्स्य हैं और
पार्वती प्रीति। तजिपुरनाशक शिव पुलह हैं ओर पावती ही
उनकी प्रिया हैं | यज्ञविध्यंसी शिव क्रतु कह्दे गये हैं और
उनकी प्रिया पार्वती संनति | भगवान् शिव अत्रि हैं ओर
साक्षात् उमा अनसूया | कालहन्ता शिव कश्यप हैं ओर
मदहदेश्वरी उमा देवमाता अदिति। कामनाशनु, शिव वसिष्ठ
हैं और साक्षात् देवी पाव॑ती अरुन्धती | भगवान् शंकर ही
संसारके सारे पुरुष हैं ओर महेश्वरी शिवा ही सम्पूर्ण द्लिर्यों |
अतः सभी रत्री-पुरुष उन्हींकी विभूतियों हैं ।
भगवान् शिव विषयी हैं ओर परमेश्वरी उमा विषय |
नो कुछ सुननेमें आता है वह सब उमाका रूप है ओर श्रोता
साक्षात् भगवान् शंकर हैं | जिसके विषयमें प्रश्न या जिशता
होती है; उस समस्त वस्तुसमुदायक्रा रूप शंकरवल्लभा शिवा
खय॑ धारण करती हैं तथा पूछनेवाला जो पुरुष हैः वह
बाल चन्द्रशेखर विश्वात्मा शिवरूप ही है | भववल्लभा उमा
ही द्रष्टव्य वस्तुओंका रूप धारण करती हैं और द्रष्टा पुुषक
रूपमें शशिखण्डमौलि भगवान् विश्वनाथ ही सब कुछ देखते
हैं | सम्पूर्ण रसकी राशि महादेवी हैं ओर उस रसका आलादन
करनेवाले मड्जलमय मद्दादेव हैं | प्रेमसमूह पावती हैं ओर
प्रियवम विषभोजी शिव हैं | देवी महेश्वरी सदा मन्तव्य
वस्तुओंका ख्रूप धारण करती हैं और विश्वात्मा मदिश्वए
महादेव उन वस्तुओंके मनन््ता ( मनन करनेवाले हैं |
भववल्लमा पार्वती बोद्धव्य ( जानने योग्य ) वस्तुअ्की
खरूप धारण करती हैं और शिक्षशशिशेखर भगवान
महादेव ह्दी उन वस्त॒ओंके ज्ञाता हैं| सामथ्यशाली भगवान
पिनाकी सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राण हैँ ओर सबके प्राणी
स्थिति जलरूपिणी माता पाव॑ती हैं। तरिपुरान्तक पश्चप तिको
प्राणबल्लभा पार्वतीदेवी जब क्षेत्रका स्वरूप धारण करती ९
तब कालके भी कार भगवान् मद्दाकाल क्षेत्रशरूपमें घ्ित
होते हैं | झूलथारी महादेवजी दिन हैं तो शघूलपाणि प्रिया
पार्वती रात्रि | कल्याणकार्यी मद्गादेवजी आकाश हैं ओर थंकरः
प्रिया पार्वती प्रथिवी | भगवान् मर्देश्वर समुद्र ई तो गिरिएनः
बायवौयसोहिता |
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कया शिवा उसकी तटभूमि हैं | वृषभध्वज महादेव वृक्ष हैं
तो विश्वेश्वरप्रिया उमा उसपर फेलनेवाली लता हैं । भगवान्
त्रिपुरनाशक महादेव सम्पूर्ण पुछ्लिक्वरूपकों स्वयं धारण करते हैं
ओर महादेव-मनोरमा देवी शिवा सारा स््रीलिड़ रूप धारण
करती हैं| शिववल्लभा शिवा समस्त शब्द-जालका रूप धारण
करती हैं ओर बालेन्दुशेखर शिव सम्पूर्ण अर्थका | जिस-जिस
पदार्थकी जो-जो शक्ति कही गयी है; वह-बह शक्ति तो
विलेश्वरी देवी शिवा हैं ओर वह-वह सारा पदार्थ साक्षात् महेश्वर
हैं। जो सबसे परे है; जो पवित्र है, जो पुण्यमय है तथा जो
प्रदृलहप है, उप्त-उस वस्तुकों महाभाग महात्माओंने उन्हीं
दोनों शिव-पारव॑तीके तेजसे विस्तारको प्राप्त हुई बताया है ।
जैसे जलते हुए दीपककी शिखा समूचे घरको प्रकाशित
करती है, उसी प्रकार शिव-पार्वतीका ही यह तेज व्याप्त होकर
पूर्ण जगतको प्रकाश दे रहा है। ये दोनों शिवा और शिव
सब्ह्प हैं, सबका कल्याण करनेवाले हैं; अतः सदा ही इन
दोनोंका पूजन, नमन एवं चिन्तन करना चाहिये ।
श्रीकृष्ण | आज मेंने तुम्हारे समक्ष अपनी बुद्धिके अनुसार
. 'सोश्वर शिवा ओर शिवके यथार्थ खरूपका वर्णन किया है;
परंतु इयत्तापूबक नहीं; अर्थात् इस वर्णनसे यह नहीं मान लेना
षाहयि कि इन दोनोंके यथार्थ रूपका पूर्णतः वर्णन हो गया;
योकि इनके ख़ल्पकी इयतता ( सीमा ) नहीं है ।
जो समस्त महापुरुषोंके भी मनकी सीमासे परे है, परमेश्वर
शिव ओर शिवाक्रे उस यथार्थ स्वरूपका वर्णन कैंसे किया जा
पता है। जिन्होंने अपने चित्तको महेश्वरके चरणोमें अपिंत
दिया है तथा जो उनके अनन्य भक्त हैं, उनके ही मनमें
ष ते हैं और उन््हींकी बुद्धिमें आरुूढ़ होते ईद । दूसरोंकी
उैदम वे आरूद नहीं होते | यहाँ मैंने जिस
$& परमेश्वर शिवक्तके यथार्थ खरूपका विवेचन #
38९५
वर्णन किया है; वह प्राकृत है; इसलिये अपरा मानी गयी है।
इससे भिन्न जो अप्राकृत एवं परा विभूति है; वह गुद्य है ।
उनके गुह्य रहस्यकोी जाननेवाले पुरुष ही उन्हें जानते हैं ।
परमेश्वरकी यह अप्राकृत परा विभूति वह है, जहाँसे मन ओर
इन्द्रियोसहित वाणी लौट आती है | परमेश्वरकी वही विभूति
यहाँ परम धाम है, वही यहाँ परमगति है ओर वही यहाँ
पराकाष्ठा है |# जो अपने श्वास ओर इन्द्रियोपर विजय पा
चुके हैं, वे योगीजन ही उसे पानेका प्रयक्ष करते हैं | शिवा
और शिवकी यह विभूति संसाररूपी विषधर सर्पके डसनेसे
मृत्यके अधीन हुए मानवोंके लिये संजीवनी ओपधि है ]
इसे जाननेवाला पुरुष किसीसे भी भयभीत नहीं द्वोता ।
जो इस परा और अपरा विभूतिको ठीक-ठीक जान लेता है;
वह अपरा विभूतिको छांघकर परा विभूतिका अनुभव
करने छगता है ।
श्रीकृष्ण ! यह तुमसे परमात्मा शिव ओर पावतीके यथा
स्वरूपका गोपनीय होनेपर भी वर्णन किया गया है; क्योंकि
तुम भगवान् शिवकी भक्तिके योग्य हो। जो शिष्य न हों;
शिवके उपासक न हों ओर भक्त भी न हों, ऐसे लोगोंको कभी
शिव-पाव॑तीकी इस विभूतिका उपदेश नहीं देना चाहिये | यह
वेदकी आज्ञा है | अतः अत्यन्त कल्याणमय श्रीकृष्ण | तुम
- दूसरोंको इसका उपदेश न देना । जो! तु॒म्दारे-जेसे योग्य पुरुष
हों, उन्हींसे कहना; अन्यथा मोन ही रहना । जो भीतरसे
पवित्र; शिवका भक्त ओर विश्वासी हो, वह यदि इसका
कीत॑न करे तो मनोवाश्छित फलका भागी होता है| यदि
पहलेके प्रबल प्रतिबन्धक कर्मोद्वारा प्रथम वार फलकों
प्राप्तिमें बाधा पड़ जाय) तो भी वारबार साधघनका अभ्यास
करना चाहिये | ऐसा करनेवाले पुरुषके लिये यहाँ कुछ भी
विभूतिका दुर्लभ नहीं है । ( अध्याय ४ )
दिल गल अर दल मर
परमेश्वर शिवके यथार्थ खरूपका विवेचन तथा उनकी शरणपें जानेसे जीवके कल्याणका कथन
रब फेहते हें--यदुनन्दन | यह चराचर जगत्
।$ जा ९ है
पर 9 + जोका ख़ल्प है | परंतु पश् ( जीव )
नए गगतसे हैं +5> हे स्किल
बी ते ्वंधे होनके कारण जगत्का इस रूपम॑ नहीं
+. 7११६ | ९2 द्द 2 हे की
० ++- किस हे उन परमंश्रर शिवक्ते निविकत्य परम
* पी वाचों निवर्तन्ते
सेपेर थ
उडहू परत भान
' यो आक्रमओं १. आम.
“5 .
चान्द्रय हनन
मनता चें
द्रये: तट । अप्राकृता
25 न न हे मी
संकेह परमा गातेः। सेवेद परना काछा विदृति:
भावकी न जाननेके कारण उन एकका ही अनेक रूपमिं
वर्ण करते हैं--कोई उस परमतत्वकों अपर त्रक्गवल्प
कहते हैं, कोई परञ्रह्मल्प बताते हैं ओर कोई आदि-
अन्तसे रहित उत्कृष्ट मह्देवस्वरूप कदते हैं। पश्च महानूत,
प्रा चेत्रा विनूतिः पारमेचरी ॥
परमेटिनः ॥
( शि० पु० बा० २:० उठ ख० £ | ३६-७७ )
४९६ $# नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
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इन्द्रिय/ अन्तःकरण तथा प्राकृत विषयरूप जड तत्वको अपर
ब्रह्म कहां गया है। इससे भिन्न समष्टि चेतन््यका नाम
परब्रह्म है | बृहत् और व्यापक होनेके कारण उसे ब्रह्म
कहते हैं | प्रभो | वेदों एवं ब्रह्माजीके अधिपति परब्रह्म
परमात्मा शिवके वे पर ओर अपर दो रूप हैं।
कुछ लोग महेश्वर शिवको विद्याविद्या-स्वरूपी कहते हैं ।
इनमें विद्या चेतना है ओर अविद्या अचेतना | यह विद्या-
अविद्यारूप विश्व जगहुरु भगवान् शिवका रूप ही है, इसमें
संदेह नहीं है; क्योंकि विश्व उनके वशमें है। भ्रान्ति, विद्या
तथा पराविद्या या परम तत््व--ये शिवके तीन उत्कृष्ट रूप
माने गये हैं। पदार्थंके विष्रयमें जो अनेक प्रकारकी असत्य
धारणाएँ हूँ, उन्हें श्रान्ति कहते हैं। यथाथे घारणा या ज्ञानका
नाम विद्या है तथा जो विकल्परहित परम ज्ञान है; उसे परम
तत्त्व कद्ते हैं | परम तत्त्व ही सत् है; इससे विपरीत असत्
कहद्ा गया है | सत् और असत् दोनोंका पति होनेके कारण
शिव सदसत्पति कहलाते हैं। अन्य महषियोंने क्षर, अक्षर
ओर उन दोनोंसे परे परम तत्त्वका प्रतिपादन किया है ।
सम्पूर्ण भूत क्षर हैं और जीवात्मा अक्षर कहलाता है । वे
दोनों परमेश्वरके रूप हैं; क्योंकि उन्हींके अधीन हैं । शान्त-
स्वरूप शिव उन दोनेंसे परे हैं, इसलिये क्षराक्षरपर कहे
गये हैं। कुछ महर्षि परम कारणरूप शिवकों समष्टि-व्यष्टि-
खरूप तथा समष्टि ओर व्यष्टिका कारण कहते है । अव्यक्तको
समष्टि कहते हैं ओर व्यक्तकों व्यष्टि | वे दोनों परमेश्वर
शिवके रूप हैं, क्योंकि उन्हींकी इच्छासे प्रवृत्त होते हैं | उन
दोनोंके कारणरूपसे स्थित भगवान् शिव परम कारण हैं |
अतः कारणारथवेत्ता शानी पुरुष उन्हें समष्टि-व्यष्टिका कारण
बताते हैँ । कुछ लोग परमेश्वरको जाति-व्यक्तिखरूप कहते
हैं । जिसका शरीरमें भी अनुवतंन दो; वह जाति कही गयी
है | शरीरकी जातिके आश्रित रहनेवाली जो व्यावृत्ति है;
जिसके द्वारा जातिभावनाका आच्छादन ओर वेयक्तिक
भावनाका प्रकाशन होता है, उसका नाम व्यक्ति है | जाति
और व्यक्ति दोनों ही भगवान् शिवकी आजशासे परिपालित
हैँ, अतः उन महादेवजीको जाति-व्यक्तिस्वरूप कहा गया हैं ।
कोई-कोई शिवको प्रधान, पुरुष) व्यक्त ओर कालरूप
कहते हैं । प्रकृतिका द्वी नाम प्रधान हें | जीवात्माको ही
क्षेत्रश कहते दे | तेईस तत्तोंको मनीपी पुरुषोने व्यक्त कहा
६ और जो कार्य-प्रप्चके परिणामका एकमात्र कारण है;
उसका नाम काल है | भगवान् शिव इन सबके ईश्वर:
पालक, घारणकर्तो) प्रवतेंक, निवर्तक तथा आविर्भाव और
तिरोमावक्रे एकमात्र हेतु हैं। वे खयंप्रकाश एवं अजन्मा
हैं | इसीलियि उन महदेश्वरको प्रधान, पुरुष, व्यक्त और
कालरूप कहा गया है| कारण) नेता, अधिपति और पाता
बताया गया है | कुछ लेग महदेश्वरकों विराट और हिसपप-
गर्भरूप बताते हैं | जो सम्पूर्ण ललोकोंकी सृष्टिके हेतु हैं
उनका नाम दिरिण्यगर्भ है और विश्वरूपकों विराट कहते हैं ।
शानी पुरुष भगवान् शिवकों अन्तयोमी और परम पुरुष कहते
हैं | दूसरे लोग उन्हें प्राश/ तेजस ओर विश्वल्प बताते हैं।
कोई उन्हें तुरीयरूप मानते हैं और कोई सोम्यरूप | कितने ही
विद्वानोंका कथन है कि वे ही माता, मान) मेय और मितिल्प
हैं | अन्य ल्लेग कर्ता, क्रिया, कार्य, करण ओर कारणहप
कहते हैं | दूसरे शञानी उन्हें जाग्रत् खंभ और सुधुत्तिस्प
बताते हैं | कोई भगवान् शिवको तुरीयरूप कहते हैं तो कोई
तुरीयातीत | कोई निर्गुण बताते हैं, कोई सगुण। कोई
संसारी कहते हैं, कोई असंसारी | कोई खतमन्त्र मानते हैं;
कोई अस्तन्त्र | कोई उन्हें घोर समझते हैं, कोई सोम्य।
कोई रागवान कहते हैं, कोई वीतरागः कोई निष्किय वताते
हैं, कोई सक्रिय | किन्होंके कथनानुसार वे निरिन्द्रिय हैं तो
किन्हींके मतमें सेन्द्रिय हैं | एक उन्हें भ्रुव कहता है तो दूसरा
अन्लव; कोई उन्हें साकार बताते हैं तो कोई निरकार |
किन्हींके मतमें वे अद्श्य हैं तो किन्हींके मतमें दृश्यः कोई
उन्हें वर्णनीय मानते हैं तो कोई अनिवचनीय। किन्दीके मतर्म
वे शब्दखवरूप हैं तो किन्होंके मतमें शब्दातीत; कोई उन्हें
चिन्तनका विषय मानते हैं तो कोई अचिन्त्य समझते है |
दुसरे लछोगोंका कहना दै कि वे श्ञानस्वरूप हैं, कोई उन्हे
विज्ञानकी संज्ञा देते हैं । किन्हींके मतमें वे शेय हैं और
किन्हींके मतमें अश्ेय | कोई उन्हें पर बताता है तो कोई
अपर | इस तरह उनके विषयमें नाना प्रकारकी कलनो<५
होती हैं | इन नाना प्रतीतियोंके कारण मुनिजन उन परमेश्वर
यथार्थ ख्रूपका निश्चय नहीं कर पाते | जो स्वभावसे
उन परमेश्वस्की शरणमें आ गये हैं; वे ही उन परम कारग
शिवकों बिना यत्षके ही जान पाते हैं | जबतक पद्म ( जीव )
जिनका दूसरा कोई ईश्वर नहीं है उन सर्वेश्वरः सर्वक्ञ पुरा
पुरुष तथा तीनों छोकोके शासक शिवको नहीं देखता) तैंववः
वह पाशोंसे बद्ध हों इस दुःखमय संसार-्चक्रमेँ गाद#
पहियेकी नेमिके समान घूमता रहता है| जब बह 48
जीवात्मा सबके शासक ब्रह्मके भी आदिकारण) उस
वायवीयसंहिता |
# शिवके शुद्ध, चुछ्धू। सुक्त, सर्वबेमय खरूपका प्रतिपादन #
83९9
चयन
जातके सचयिता; सुवर्णोपम। दिव्य प्रकाशखरूप परम भछीमॉति हठाकर निर्मल हुआ वह शानी महात्मा सर्वोत्तम
पुरषका साक्षात्कार कर छेता है; तब पुण्य ओर पाप दोनोंको
समताको प्राप्त कर छेता है | ( अध्याय ५ )
शिवके शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं स्वोतीत खरूपका तथा
उनकी ग्रणवरूपताका ग्रतिपादन
उपमन्यु कहते हैँ--यदुनन्दन | शिवकों न तो आणव
पल्का ही बन््धन - प्राप्त है त् कर्का और न मायाका ही |
प्राइृत, बौद्ध, अहंकारः मनः चित्त; इन्द्रिय) तन््मात्रा और
पमूतसंम्बन्धी: मी कोई बन्धन उन्हें नहीं छू सका है।
भ्रमित तेजस्वी इंग्भुको न काल; न कला) न विद्या) न नियति,
ने गग ओर न द्वेषरूप ही वन्धन प्राप्त है । उनमें न तो कर्म
है) न उन कर्मोका परिषाक है; न उनके फल्खरूप सुख
और हुःख हैं, न उनका वासनाअंसे सम्बन्ध है; न
फेक संस्कारोंसे | भूत, भविष्य और वर्तमान भोगों तथा
उनके संस्कारोंसे भी उनका सम्पर्क नहीं है | न उनका कोई
तर है, न कर्ता | न आदि है, न अन्त और न मध्य है; न
झ्और करण है; न अकर्तव्य है और न कर्तव्य ही है।
» पे! ते कोई बन्धु है ओर न अबन्धु। न नियन्ता हैन
! पैक नपति है; न गुर है और न त्राता ही है। उनसे
अधिककी चर्चा कौन करे, उनके समान भी कोई नहीं है ।
जग न जन्म होता है न मरण | उनके छिये कोई वस्तु मं
0 वाज्छित है ओर न अवाड्छित ही | उनके लिये न विधि
गनिपेष | ने बन्धन हैन मुक्ति | जो-जो अकल्याणकारी
है वे उनमें कभी नहीं रहते । परंतु सम्पूर्ण कल्याण-
भर थ7 उनमें सदा ही रहते हैं। क्योंकि शिव साक्षात्
मा है। वे शिव अपनी शक्तियोंद्वारा इस सम्पूर्ण जगतें
भत्ते होकर अपने खभावसे च्युत न होते हुए सदा ही खित
बे दे इसलिये उन्हें सथाणु कहते हैं । यह सम्पूण चराचर
। ९-8५ सके है; अतः भगवान् शिव स्वरूप माने
कक ने ऐसा जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ।
पर पेल्प हैं। उन्हें नमस्कार है| वे सत्खरूप, परम
ः मी ५३४ हिरिप्यवाहु भगवान्, हिरण्यपति, ईइवर:
कक > ाना पिनाकपाणि तथा च्ृपभवाहन हैं ।
ह । फेर साय बह अब हर | दे ह्दी कष्ण-पिज्ञल
एड भीतर कमलके मव्यभागमें
छू ७ ७क
ञप्रे
«
. हर
श्फ्क्ै
८: _* ऊ्रणक्ष भौति रे
॥ मे 3 ऑमज्पसे चिन्तन करने योग्य हैं।
# | ०] पुबहरे + रंगर नो भ्ध्
+<६ सम हैं। नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं ।
दा
$ 3० भं० ।-4- विज
अड्न्ञकान्ति अरुण ओर ताम्रवर्णी है । वे सुवर्णमय
नीलकण्ठ देव सदा विचरते रहते हैं| उन्हें सोम्य, घोर; मिश्र;
अक्षर; अमृत और अव्यय कह गया है। वे पुरुषविशेष परमेश्वर
भगवान् शिव कालके भी काल हैं | चेतन और अचेतनसे
परे हैं | इस प्रपश्चयसे भी परातर हैं | शिवमें ऐसे ज्ञान और
ऐ्व्य देखे गये हैं, जिनसे बढ़कर शान ओर ऐख्वर्य अन्यत्र
नहीं हैं। मनीषी पुरुषोने भगवान् शिवकों छोकमें सबसे अधिक
ऐश्वर्यशाली पदपर प्रतिष्ठित बताया है | प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न
होकर एक सीमित कालुतक रहनेवाले ब्रह्माओकी आदिकालमें
विस्तारपूर्वक शासत्रका उपदेश देनेवाले भगवान् शिव ही हैं |
एक सीमित कालतक रहनेवाले गुरुओंके भी वे गुर हैँ | वे
सर्वेश्वर सदा सभीके गुरु हैं। कालकों सीमा उन्हें छू नहीं
सकती । उनकी शुद्ध खाभाविक शक्ति सबसे बढ़कर है। उन्हें
अनुपम शान और नित्य अक्षय शरीर प्राप्त है। उनके ऐश्वर्य-
की कहीं तुलना नहीं है | उनका सुख अक्षय ओर बल अनन्त
है | उनमें असीम तेज; प्रभाव, पराक्रम; क्षमा और करुणा
भरी है । वे नित्य परिपूर्ण हैं। उन्हें सृष्टि आदिसे अपने
लिये कोई प्रयोजन नहीं हे | दूसरोंपर परम अनुम्रह ही
उनके समस्त कर्मोका फल है| प्रणव उन परमात्मा शिवका
वाचक है | शिव) रुद्र आदि नामोंमें प्रणव द्वी सबसे उत्कृष्ट
माना गया है। प्रणबवाच्य शम्भुके चिन्तन ओर जपसे जो
सिद्धि प्राप्त होती है; वही परा सिद्धि है; इसमें संशय नहीं है ।
इसीलिये शास्रोके पारंगत मनख््ी विद्वान वाच्य ओर
वाचककी एकता खीकार करते हुए महादेवजीकों प्रणयरूप
कहते हैं । माण्ट्रक्योपनिषद्म प्रणवक्की चार मात्राएँ बतायी
गयी हैं---अकार। उकार; मकार ओर नाद । अकारकों
क्ग्वेद कहते हैं | उकार बजुर्वेदहत कहा गया दे ।
महाबीय हैं; वह रजोगुण वंया वध्कितां त्र्मा ६ै। उकार
प्रकृतिज्पा योनि है; वह सच्यगुग तथा पराछनकतां श्रीदररि
है | मकार जीवात्म एवं बीज है बढ तम्ेगुम तथा संद्ार-
कर्ता रुद्र है। नाद परम पुरुष परमेश्वर के बह निर्मम एवं
सम्यन््मभन+- 05० ्क
8९८
निष्क्रिय शिंव है | इस प्रकार प्रणव अपनी तीन मात्राओंके
द्वारा ही तीन रूपोर्मे इस सम्पूण जगत॒का प्रतिपादन करके
अपनी अद्धमात्रा ( नाद ) के द्वारा शिवखरूपका बोध
कराता है । जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है; जिनसे बढ़कर. परिपूर्ण है |#
# नमो रुद्राय शान्ताय त्रह्मणे परमात्मने
| संक्षिप्त-शिवपुराणाई
कोई न तो अधिक सूक्ष्म है और न महान ही है तथा जो
अकेले ही वृक्षकी माँति निश्चक भावसे प्रकाशमय आकाश
स्थित हैं, उन परम पुरुष परमेश्वर शिवसे यह सम्पूर्ण जगत्
( अध्याय ६)
परमेश्वरकी शक्तिका ऋषियोंद्वारा साक्षात्कार, शिवके प्रसादसे ग्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी
पेवा-भक्ति तथा पाँच प्रकारके शिव-धर्मका वर्णन
उपमन्यु कहते है--परमेश्वर शिवकी खाभाविक
शक्ति विद्या है; जो सबसे विलक्षण है । वह एक होकर भी
अनेक रूपसे भासित होती है | जेसे सूर्यकी प्रभा एक होकर
भी अनेक रुपमें प्रकाशित होती है । उस विद्याशक्तिसे इच्छा,
ज्ञान; क्रिया और माया आदि अनेक शक्तियाँ उत्तन्न हुई हैं;
ठीक उसी तरह जैसे अग्निसे बहुत-सी चिनगारियोँ प्रकट होती
हैं। उसीसे सदाशिव ओर ईश्वर आदि तथा विद्या ओर विद्येश्वर
आदि पुरुष भी प्रकट हुए, हैँ। परात्यर प्रकृति भी उसीसे
उत्पन्न हुई है। महत्तत्त्से लेकर विशेषपय॑न्त सारे विकार
तथा अज ( ब्रह्मा ) आदि मूर्तियाँ भी उसीसे प्रकट हुई हैं ।
इनके सिवा जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब भी उसी शक्तिके कार्य
हैं, इसमें संशय नहीं है | वह शक्ति सर्वव्यापिनी; सूक्ष्मा तथा
शानानन्दखरूपिणी है। उसीसे शीतांशुभूषण भगवान् शिंव
शक्तिमान कहलाते हैं | शक्तिमान---शिव वेद्य हैं ओर शक्ति-
रूपिणी शिवा विद्या हैं | वे शक्तिरूपा शिवा ही प्रज्ञा, श्रुति,
स्मृति ) धृति; स्थिति; निष्ठा शानशक्ति; इच्छाशक्ति; कमंशक्ति;
आशाशक्ति, परत्रह्म) परा ओर अपरा नामकी दो विद्याएँ, शुद्ध
विद्या ओर शुद्ध कला हैं। क्योंकि सब कुछ शक्तिका ही कार्य
है । माया; प्रकृति, जीव) विकार, विक्ृति, असत् ओर सत्
आदि जो कुछ भी उपलब्ध होता है; वह सब उस शक्तिसे
ही व्याप्त है |
वे शक्तिब्पिणी शिवा देवी मायाद्वारा समस्त चराचर
ब्रह्मण्डको अनायास ही मोहमें डाल देती और लील्ापूर्वक
उसे मोहके बन्धनसे मुक्त भी कर देती हूँ | इस शक्तिके
सत्ताईस प्रकार हैं? सत्ताइंस प्रकारवाली इस शक्तिके साथ
सर्वेश्वर शिव राम्पूर्ण विश्वकों व्याप्त करके खित हैं । इन्हींके
& ०४३ हल हि विराजती # 5) पकॉलिया रत बात ही कि डे
चरणोंम पुक्ति विराजती दे | पृथंकाल्की बात है; संसार-
# यज्मात्यं नापरनस्ति किंचिद्र यम्मान्नाणीयों न
दृक्ष॒ शत स्ब्बो
दिवि
बन्धनसे छूटनेकी इच्छावाले कुछ ब्रह्मवादी मुनियोके मनमे
यह संशय हुआ | वे परस्पर मिलकर यथार्थ रुपसे विचार
करने लगे---इस जगत्का कारण क्या है ! हम किससे उत्न्न
हुए हैं ओर किससे जीवन धारण करते हैं ! हमारी प्रतिष्ठा
कहाँ है ? हमारा अधिष्ठाता कौन है! हम किसके सहयोगते
सदा सुखमें ओर दुःखमें रहते हैं ! किसने इस बिश्वक्ी
अलझ्डनीय व्यवस्था की है १ यदि कहें काछ; खमाव) नियति
( निश्चित फल देनेवाला कम) ओर यहच्छा ( आकसिक
घटना ) इसमें कारण हों तो यह कथन युक्तिसंगत नहीं जान
पड़ता । पाँचों महाभूत तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हैं।
इन सबका संयोग तथा अन्य कोई भी कारण नहीं हैः क्योंकि
ये काल आदि अचेतन हैं । जीवात्माके चेत॑न होनेपर भी वह
सुख-दुःखसे अभिभूत तथा असमर्थ होनेसे इस जगवा
कारण नहीं हो सकता । अतः कौन कारण है इसका विचार
करना चाहिये | इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब वे
युक्तियोंद्यारा किसी निर्णयतक न पहुँच सके; तब उन्होंने
ध्यानयोगमें स्थित होकर परमेश्वरकी खरूपभूता अचित्य
शक्तिका साक्षात्कार किया) जो अपने ही गुणोति-सत्) जे ।
ओर तमसे ढकी है तथा उन तीनों गुर्णोत्र परे है| परम
की वह साक्षात् शक्ति समस्त पाशोंका विच्छेद करनेवाली है
उसके द्वारा वन्धन काट दिये जानेपर जीव अपनी दिव्य
से उन सर्वकारणकारण शक्तिमान् महादेवजीका दशेन कर
लगते हैं; जो काल्से लेकर जीवात्मातक पूर्वोक्त समस्त काएः
पर तथा सम्पूर्ण विश्वपर अपनी इस शक्तिके द्वारा ही शी
करते हैं | वे परमात्मा अप्रमेय हैं | तदनन्तर परमेश्वर!
प्रसाद-योग) परम-योग तथा सुदृढ़ भक्ति-योगके द्वार 5
मुनियोनेि दिव्य गति प्राप्त कर छी |
ज्थायो5स्ति किंचित् ।
तिएत्येकस्तेनेदे पूर्ण पुरुषेण. सबन् ॥
( शि०पु० वा० सं० उ० ख० ६। ३४१ यह मन्त्र अश्षरशः ( ३। ९ ) इवेताइबतरोपनिपद्त £
वायबीयसंदिता |
श्रीकृष्ण | जो अपने हृदयमें शक्तिसहित भगवान् शिव-
का दर्शन करते हैं, उन्हींकों सनातन शान्ति प्राप्त होती हैः
दूसरोंकोीं नहीं यह श्रृंविका कथन है । शक्तिमानका शक्तिसे
कभी वियोग नहीं होता । अतः शक्ति ओर शक्तिमान् दोनेंके
वादात्यसे परमानन्दकी प्राप्ति छोती है । मुक्तिकी प्राप्तिमें
निश्रय ही शान ओर कर्मका कोई क्रम विवक्षित नहीं है, जब
. शिव ओर शक्तिकी कृपा हो जाती है? तब वह मुक्ति हाथमें
आ जाती है । देवता; दानव, पश्ु) पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े
भी उनकी कृपासे मुक्त हो जाते हैं | गर्मका बचा; जन्मता हुआ
बोल्क, शिशु, तरुण; ब्रद्ध। मुमू रु स्वर्गवासी, नारकी) पतित;
धर्मात्मा, पण्डित अथवा मूखे साम्बशिवकी कृपा होनेपर
तकाल मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है । परमेश्वर
अपनी खाभाविक करुणासे अयोग्य भक्तोंके भी विविध मर्छॉको
दूर करके उनपर कृपा करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ।
भगवानकी कृपासे ही भक्ति होती है ओर भक्तिसे ही उनकी
कृपा होती है। अवस्थामेदका विचार करके विद्वान पुरुष
इस विषय्म मोहित नहीं होता है । कृपाप्रसादपूर्वक जो यह
भक्ति होती है; वह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाली
| उसे मनुष्य एक जन्ममें नहीं प्रात कर सकता | अनेक
जन्मोतक श्रीत-स्मार्त कर्मोका अनु्ठान करके सिद्ध हुए विरक्त
एवं शानसम्यन्न पुरुषोपर महेश्वर प्रसन्न होते ओर कृपा करते
९ | देवेश्वर शिवके प्रसन्न होनेपर उस पद्म ( जीव ) में बुद्धि
जक थोड़ी-सी भक्तिका उदय होता है । तब वह यह अनुभव
करने छाता है कि भगवान् शिव मेरे खामी हैं । फिर
३३३ के वह नाना प्रकारके शैवधर्मोके पालने संलझ
४व है| उन धमकि पालनमें बारंबार छगे रहनेसे उसके
# शिव-शान) शिवकी उपासनाले देवताओंको उनका द्शेन #%
७९९
दृदयमें पराभक्तिका प्रादुभोव होता है। उस. परामक्तिसे
परमेंश्वरक्ता परम प्रसाद उपलब्ध होता है | प्रसादसे सम्पूर्ण
पापोंसे छुटकारा मिलता है ओर छुटकारा मिल जानेपर
परमानन्दकी प्राप्ति होती है; जिस मनुष्यका भगवान् सिवमें
थोड़ा-सा भी भक्तिभाव है; वह तीन जन्मेंके बाद अवश्य मुक्त
हो जाता है| उसे इस संसारमें योनियन्त्रकी पीड़ा नहीं सहनी
पड़ती । साज्ञा ( अज्न्गसहित ) ओर अनज्ञा ( अड्गरहित )
जो सेवा है; उसीको भक्ति कहते हैं। उसके फिर तीन मेद
होते हैं--मानसिक, वाचिक ओर शारीरिक । शिवके रूप
आदिका जो चिन्तन है; उस्ते मानसिक सेवा कहते हैं | जप
आदि वाचिक सेवा है ओर पूजन आदि कर्म शारीरिक सेवा
है। इन त्रिविध साधनेंसे सम्पन्न होनेवाली जो यह सेवा है;
इसे ८शिवधर्मः भी कहते हैं | परमात्मा शिवने पाँच प्रकारका
शिव-धर्म बताया है--तप) कर्म, जप) ध्यान और शान |
लिड्यूजन आदिको “कम” कहते हैँ । चाद्रायण आदि
ब्रतका नाम “तप? है। वाचिक) उंपांझु ओर मानस--तीन
प्रकारका जो शिवमन्त्रका अम्यास ( आवृत्ति ) है। उसीको
(जप? कहते हैं | शिवका चिन्तन ही “ध्यान! कहलाता है तथा
शिवसम्बन्धी आगर्मोंमें जिस शञानका वर्णन है, उसीको यहाँ
'ज्ञान? शब्दसे कहा गया है। श्रीकण्ठ शिवने शिवाक्रे प्रति
जिस श्ञानका उपदेश किया हैः; वही शिवागम है । शिवके
आश्रित जो भक्तजन हैं) उनपर कृपा. करके कल्याणके एक-
मात्र साधक इस ज्ञानका उपदेश किया गया है। अतः कल्याण-
कामी बुद्धिमान् पुझषकों चाहिये क्रि वहद्द परम कारण शिवमें
भक्तिको बढ़ाये तथा विपयासक्तिका त्याग करे |
( अध्याय ७ )
«“-+०5--< २-४ +हहे[+++
शिव-ज्ञान, शिवकी उपासनासे देवताओंकी उनका दशेन, ख्यदेवमें शिवकी पुजा करके
अध्येदानकी विधि तथा व्यासावतारका वर्णन
शओकृष्ण बोके--भगवन् | अब मैं उस शिव-श्ञानको
>'या चाहता हूँ, जो वेदोंका सारतत्व है तथा जिसे भगवान्
“बने अपने शरणागत भक्तोंकी मुक्तिके लिये कह्य है | प्रभु
“मो पूजा केसे की जाती है पूजा आदिमें किसका अधिकार
का “नदंग आदि केसे लिद्ध होते हैं ? उत्तम अ्रतका
“न उबाल नुनीश्वर ! ये सब बातें विस्तासपूर्वक वताइये।
मन््युने कहा - भगवान् शिवने जिस वेदोक्त
“अत करके कह है, वही शेव-शान दे | वह निन्दा-
री न
!
' प्रक८ हुए । उस समव ज्ञनखरूप
स्तुति आदिसे रहित तथा श्रवणमात्रसे द्वी अपने प्रति विश्वास
उतलन्न करनेवाल्य है | यह दिव्य ज्ञान शुदकी झपसे प्रात
होता कट,
ही वताऊँगा; क्योंक्रि उसका विस्तारपृत्क वंगन काई कर दा
नहीं सकता दे । पूर्वकालमें महेशवर शिव दड्धिकों इच्छा करक
सत्काय-कारणोेति नियुक्त ्पक्तते व्यक्त हपमें
भगवान्. विश्वनायमे
देवताओंगें सबसे प्रथम देवता वेदपांत बअक्षारऊुऊा उससे
हा लग द्वा
(५५0०
किया । ब्रह्माने उत्पन्न होकर अपने पिता महादेवकों देखा
तथा ब्रह्माजीके जनक महादेवजीने भी उत्पन्न हुए ब्रह्माकी
ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा ओर उन्हें स॒ष्टि रचनेकी आशा
दी । रुद्रदेवकी कृपाइष्टिसे देखें जानेपर सष्टिके सामथ्यंसे युक्त
हो उन ब्रह्मदेवने समस्त संसारकी रचना को और ए्रथक्-
इथक् वर्णों तथा आश्रर्मोकी व्यवस्था की -। उन्होंने यज्ञके
लिये सोमकी सृष्टि की | सोमसे घुलोकका प्रादुर्माव हुआ |
फिर पृथ्वी, अग्नि; सूर्ब; यज्ञमय विष्णु और शचीपति इन्द्र
प्रकट हुए | वे सब तथा अन्य देवता :रुद्राध्याय पढ़कर
रुद्रदेवकी स्तुति करने लगे | तब भगवान् मददेशवर अपनी
- लीला प्रकट करनेके लिये उन सबका शान हरकर प्रसन्नमुख-
से उन देवताओंके आगे खड़े हो गये ।
तब देवताओंने मोहित होकर उनसे पूछा--“आप कोन
हैं ? भगवान् रुद्र बोले--“श्रेष्ठ देवताओ | सबसे पहले मैं ही
था | इस समय भी सत्र मैं ही हूँ ओर भविष्यमें मी में ही
रहूँगा । मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है | में भी अपने तेजसे
सम्पूर्ण जगत्को तृत्र करता हूँ । मुझसे अधिक ओर मेरे समान
कोई नहीं है | जो मुझे जानता है, वह मुक्त हो जाता है |?#
ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहीं अन्तर्घान हो गये । जब
देवताओंने उन मददेश्वरकों नहीं देखा, तब वे सामवेदके
मन्त्रोंद्यारा उनकी स्तुति करने लगे | अथवश्ीर्षमं वर्णित
पाशुप त-ब्रतको ग्रहण करके उन अमरगर्णोने अपने सम्पूर्ण
अड्रॉमें भस्म रूगा लिया | यह देख उनपर कृपा करनेके लिये
पशञ्ञुपति महादेव अपने गणों ओर उम्ाके साथ उनके निकट
आये | प्राणायामके द्वारा श्वासको जीतकर निद्रारहित एवं
निष्पाप हुए. योगीजन अपने हृदयमें जिनका दर्शन करते हैं,
उन्हीं महादेवको उन देवेइ्वरोने वहाँ देखा । जिन्हें ईश्वरकी
इच्छाका अनुसरण करनेवाली पराशक्ति कहते हैं, उन
वामलोचना भवानीको भी उन्होंने वामदेव महेझ्वरके वामभाग-
में विराजमान देखा । जो संसारको त्यागकर शिवके परमपद-
को प्राप्त दो चुके हैं तथा जो नित्य सिद्ध हैं, उन गणेब्वरोंका
भी देवताओंने दर्शन किया । तत्यश्वात् देवता महेश्वरसम्बन्धी
# सोड्त्रवीद भगवान् रुद्रों क्षहमेकः पुरातनः ।
आस प्रयममेवाद वर्तामि च संरात्तमाः॥
भविध्यामि च मत्तोडन्यो ब्यतिरिक्तो न कश्वन ।
अहमभेव जगत्सव तपंयामि खतेजसा ।
मचोडघिकः समों नास्ति मां यो वेद स मुच्यते ॥
( शि० पृ० वा० सं० उ० स्ु० ८ | १५--१७ )
' # 'लग्मो उद्भाय शाल्ताय ब्रह्मणे परमात्मने #
्न्च्च्््््च्स्स्ः्अनडबइ स वआआ असअसअसअल्अल्अल्अक्अल्स्लल्क्आ।/स स2सअ2आ्अ्अल्टवटस्स्चय्स्स्स्य्य्य्य्य्य््ल्ल्/डःजससलअनडःणजअबबबबअ सफसकसफ़ससससफसकससस ण ज इ इफइं
| संक्षिप्त-शिवपुराणाडू
00 आज >>
वैदिक और पौराणिक दिव्य स्तोत्रोद्वारा देवीसहित महेखरी
स्तुति करने छंगे | तब ब्ृषभध्यज महादेवजी भी उन देवताओं:
की ओर कृपापूषक देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो स्वमावतः मधुर
वाणीमें बोले--५मैं तुमलोगोंपर बहुत संतुष्ट हूँ ।? उन
प्राथनीय एवं पूज्यतम भगवान् ब्ृषभष्वजको अल्न्त प्रसत्न-
चित्त जान देवतारओने प्रणाम करके आदरपूर्वक उनसे पूछा।
देवता बोछे--भगवनु | इस भूतलूपर किस माग्से
आपकी पूजा होनी चाहिये और उस पूजामें किसका अधिकार
है ! यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ।
तब देवेश्वर शिवने देवीकी ओर मुसकराते हुए देखा
ओर अपने परम घोर सूर्यमय खरूपको दिखाया | उनका वह
खरूप सम्पूर्ण ऐश्व्-गुणोंसे सम्पन्न सर्वतेजोमय, स्वोल्ृष्ट
तथा शक्तियों, मूर्तियों, अज्ञों) ग्रह्ँ और देवताओँसे घिण
हुआ था | उसके आठ भुजाएँ ओर चार मुख थे । उसका
आधा भाग नारीके रूपमें था | उस अद्भुत आऋतिवाढे
आश्चर्यजनक खरूपको देखते ही सब देवता यह जान गये कि
सूर्यदेव, पार्वतीदेवी, चन्द्रमा/ आकाश) वायु) तेज) जछ!
पृथ्वी तथा शेष पदार्थ भी शिवके द्वी खरूप है । सम्पूण
चराचर जगत् शिवमंय ही है | परस्पर ऐसा कहकर उन्होंने
भगवान सूर्यको अ्य दिया और नमस्कार किया | अध्ये देते
समय वे इस प्रकार बोले--“जिनका वर्ण सिन्दूरके समान है
और भण्डल सुन्दर है; जो सुवर्णके समान कान्तिमांव्
आमूषण?से विभूषित हैं, जिनके नेत्र कमलके समान है!
जिनके हाथमें भी कमल हैं, जो ब्रह्मा) इन्द्र और
भी कारण हैं; उन भगवानको नमस्कार है [?# यों कह उत्तम
र्नोंसे पूर्ण सुवर्ण, कुछुम/ कु और पुष्पसे युक्त मे
सोनेके पात्रमें लेकर उन देवेश्वरकों अध्य दे और कहै-
“भगवन् | आप प्रसन्न हों । आप सबके आदिकारण ह।
आप ही रुद्र, विष्णु) ब्रह्मा और सूर्यरूप हैं | गर्णोसह्ित आय
शान्त झिवको नमस्कार है।/ ह
जो एकाग्रचित्त हो सूर्यमण्डलमें शिवका जन
के झिन्दूवर्णाय सुमण्डलाय सुवर्णवर्णाभरणाय ठुन्थम |
पद्माभनेत्राय. सपझुजाय सक्षेख्द्नारायणकाएणाय ॥|
( शि० पु० वा० सं० उ० ख० <। **
+ प्रदत्तमादाय सहेमपात्र प्रशस्तमर्ध्य भगवन् मर्द ।
|
नमः. शिवाय शान्ताय.. * सगणायादिद्वेतव हे
((शि० पु० वा० सं० उ० खन ९$। ३३०
न करके
)
१४ ।
शी
६ ||
|
।
4
वायवीयसंद्दिता ]
# शिवके अवतार, योगाचायों तथा उनके शिष्योंकी नामावली %
७०१
>>+कम्यजााकयतयाा>ककाथानकामकनकम पान पान्भा कम्क भकम्कुमबह न कृपया >पकप॥भकाम्म कम कमर मय पकम कम पकपहम सम पकान्पापल्पकअम प३० कम कक» यह कम पक प३>पाण राम य७अ काम रमहा+पामया मारा साथ इभ पम्प पकरग इल् हम पक कम एम कम कम फरार >> >>. 2. +#+ «2. मल लन मल जमलअ जमीनी लिनिजलकिली नकली लीड व कब नकल
प्रातःकाल) मध्याहकाल ओर सायंकालमें उनके लिये उत्तम
अर्ष्ष देता है; प्रणाम करता है और इन अवणसुखद
स्लोक़ोको पढ़ता है; उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
यदि वह भक्त है तो अवश्य ही मुक्त हो जाता है । इसलिये
प्रतिदिन शिवरूपी सूयंका पूजन करना चाहिये । घर! अथे;
काम और मोक्षके लिये मन) वाणी तथा क्रियाद्वारा उनकी
आगघना करनी चाहिये |
तंसश्रात् मण्डलम वियजमान महेश्वर देवताओंकी ओर
देखकर और उन्हें सम्पूर्ण शास्रोंमें श्रेष्ठ शिवशास्त्र देकर वहीं
अन्तर्धाव हो गये । उस शास्तमें शिवपूजाका अधिकार
त्रक्नण, क्षत्रिय और वेस्योंकी दिया गया है | यह जानकर
देवेसवर शिवको प्रणाम करके देवता जैसे आये थे; वैसे चढके
गे | तदनन्तर दीर्षकालके पश्चात् जब वह शाज्र छप्त हो
'य। तब्र भगवान् शंकरके अछूमें बेठी हुई महेश्वरी शिवाने
पतिदेवसे उसके विषयमें पूछा । तब देवीसे प्रेरित हो चन्द्रभूषण
महदेवने वेदोंका सार निकालकर सम्पूर्ण आगर्मोमें श्रेष्ठ शास्त्र
शा उपदेश किया, फ़िर उन परमेश्वरकी आशासे मैंने) गुरुदेव
आख्यने और महषि दधीचिने मी छोकमें उस शाम्का
४24७७४40930 89४ %#७ऋछ&60 4४७४७ ७७४ बल ड कक 9 कतार 32 38 हु न मय पाप नशुपरलअर्ादपअअध्यकतपपकष्य0मसडन्यकम चूरन कर कक डपपद पक प्यार रंकइताुक्र पकप्पइरपकानग परम भूदापककानुफमदरष्साचम
प्रचार किया । झूलपाणि महादेव खय॑ भी युग-युगमें
भूतलपर अवतार ले अपने आश्रित जनोंकी मुक्तिके लिये
शानका प्रसार करते हैं । ऋतु, सत्य, भागव, अड्विरा, सविता,
मृत्यु, इन्द्र, मुनिवर वसिष्ठ, सारस्॒त, त्रिधामा) सुनिश्रेष्
त्रिद्वत्, शततेजा; साक्षात् धर्मस्वरूप नारायण) खरक्ष) बुद्धिमान्
आरुणि, कृतज्ञय) भरद्वाज, श्रेष्ठ विद्यान् गौतम, वाचःश्रवा
मुनि, पवित्र सूक्ष्मयणि, तृणविन्दु मुनिः कृष्ण शक्ति
शाक्तेय ( पाराशर » उत्तर, जावृकण्य और साक्षात् नारायण-
स्वरूप कृष्णद्वेपायन मुनि--ये सब व्यासावतार हैं | अब
क्रमशः कब्ययोगेश्वरोका वर्णन सुनो । लिझ्शषपुराणमें द्वापरके
अन्तर्में होनेवाले उत्तम ब्तधारी व्यासावतार तथा
योगाचार्यावतारोंका वर्णन है | भगवान शिवके शिष्योमें भी जो
प्रसिद्ध हैं, उनका वर्णन है। उन अवतारोंमें मगवानके मुख्य-
रूपसे चार महातेजखी शिष्य होते हैँ | फिर उनके सेकड़ों:
हजारों शिष्य-प्रशिष्य हो जाते हैं | छोकमें उनके उपदेशके
अनुसार भगवान् शिवकी आशय पालन करने आदिके द्वारा
भक्तिसे अत्यन्त भावित हो भाग्यवान् पुरुष मुक्त हो जाते हैं ।
( अध्याय ८ )
“+-+9-<326 ७68४-4७
शिवके अवतार; योगाचार्यों तथा उनके शिष्योंकी नामावली
श्रीकृष्ण चोले--भगवन्._ [| समस्त युगावर्तोमें
पैगाचावक व्याजसे भगवान् शंकरके जो अवतार होते हैँ और
“न अवतारोंके जो शिष्य होते हैं; उन सबका वर्णन कीजिये |
उपमस्युने कहा--छवेत, सुतार/ मदन, सुहोच, कह
जेगि ! महामायावी जेगीषव्य, दधिवाह) ऋषमभ मुनि; उम्र:
न) सुपालक्, गौतम) वेदशिरा मुनि, गोकण) गुद्ावासी;
पैसण नै; जयमाली, अद्हास, दारुक, लाकुल्ी, महाकाल)
हे ईडी, मुण्डीश, सहिंष्णु, सोमशर्मा ओर नकुलीशर---
८ रे फेसके इस सातवें मन्वन्तरमें युगक्रमसे अद्वाईस
पट हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येकके शान्तचित्तवाले
पर दीप हुए हैं, जो स्वेतसे लेकर रुष्यपर्यन््त बताये
५... 9 स्वेतलेहित, दुन्दुमि, शतरूप+ ऋचीक;
ग हक / विपाश, पाशनाशन) सुमुख$
स्म्क् के न मे) अखिल सनक) सननन्दुन)
सु 33. घ्र्जञा आस शरूं, अण्डज, सारखत, मेघः
२४६४) कापछ) आखुरि, पद्बुशिसः बाष्कृ
चक्र
श 4६
पराशर, गर्ग) भार्गव, अक्लिरा, वल्वन्धु। निरामित्र, केतुशल्न/
तपोधन; हम्बोदर, लम्ब, हरुम्बरात्मा) लम्बकेशक, सर्वक्ञ
समबुद्धि, साध्यः सिद्धि, सुधामा) कश्यप) वसिष्ठ।
विरजा, अन्रि। उग्र; गुस्श्नेठ अ्रवण, श्रविष्ठक, क्ुणि,
कुणवाहु, कुशरीर, कुनेत्रकः काइ्यप, उशना) च्यवन,
बृहस्पति; उतथ्य) वामदेव, महाकाल, महानिल, वाचःश्रवा,
सुवीर; स्यावक) यतीश्वर। हिरण्यनाभ, कीशल्य, लोकाश्षि/
कुथुमि; सुमन्तु, जैमिनी) कुबन्ध, कुशकन्धरः प्लक्ष) दार्भायणि,
केतुमानः गोतम; भल्लवी: मधुपिक्ष: इेतकेत: उशिज, वुृद्द्स्थ
देवल; कवि) शालिहोच) सुवेप, युवनाश्र। शरदसु छंगल;
कुम्मकर्ण) कुम्म। प्रबाहुक, उत्दक) दिद्युत्अ इस्बूक,
आश्वलायन) अक्षयाद; कणाद) उछूक) वत्स, कुशिक) गये;
मित्रक ओर दुष्य--ये योगाचार्यरू्मी मदेखरक्े शिष्य ईद ।
इनकी संख्या एक तो बारद हैं | थे सब-के-सब सिद्ध प्राद्यपत
हैं । इनका शरीर भस्ते विभूषित रहता है। ये सम्यू्ग
शाह्मोंद्के तत्ज्ञ, वेद ओर वेदाहके पारंगत जैद्घानः
केन 7 म प्ु्सारकां
झिवाभममे भनुरका शिवशानंयरायगंः हब
५०२
आसक्तियोसे मुक्त, एकमात्र भगवान् शिवमें ही मनको लगाये
रखनेवाले, सम्यूण इन्द्रोंकी सहनेवाले, धीर, सर्वभूतहितकारी;
सरल, कोमछ, स्वस्थ; क्रोधशन्य ओर. जितेन्द्रिय होते हैं,
रुद्राक्षकी माला ही इनका आभूषण है। उनके मस्तक त्रिपुण्ड्रसे
अड्डित होते हँँ। उनमेंसे कोई तो शिखाके रुपमें ही जया
धारण करते हैं। किन्हींके सारे केश ही जठारूप होते हैं।
कोई-कोई ऐसे हैं, जो जठा नहीं रखते हैं और कितने ही
सदा माथा मुड़ाये रहते हैं | वे प्रायः फल-मूलका आह्यर करते
४ नमो रुद्गाय शान्ताय ब्ह्मणे परमात्मने #
नूूनड-्5532323:22:::क्::-:---<दक् मनन निनि मम दिक
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाहु
हैं | प्राणायाम-साधनमें तत्पर होते हैं | थ्मैं शिवका हूँ? इस
अभिमानसे युक्त होते हैं | सदा शिवके ही चिन्तनमें लगे रहते
हैं| उन्होंने संसाररूपी विषव्वक्षके अड्डूरकों मथ डाल है।
वे सदा परम धाममें जानेके लिये ही कटिवद्ध होते हैं। जे
योगाचार्योसहित इन शिष्योको जान-सानकर सदा शिवक्री
आराधना करता है; वह शिवका सायुज्य प्राप्त कर छेता
है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये |
( अध्याय ९)
भगवान् शिवके ग्रति भ्रद्धा-भक्तिकी आवच्यकताका प्रतिपादन, शिवधर्मके चार पादोंका वर्णन एवं
ज्ञानयोगके साधनों तथा शिवधमंके अधिकारियोंका निरूपण, शिवपृजनके अनेक
प्रकार एवं अनन्यचित्तसे भजनकी महिमा
तदनन्तर श्रीकृष्णके प्रश्न करनेपर उपमन्यु मन्दराचल-
पर घटित हुए. शिव-यावंती-संवादको प्रस्तुत. करते हुए
बोले---श्रीकृष्ण ! एक समय देवी पावंतीने भगवान् शिवसे
पूछा--“मदह्गदेव ! जो आत्मतत्त आदिके साधनमें नहीं लगे
हैं तथा जिनका अन्तःकरण पवित्र एवं वशीभूत नहीं है; ऐसे
मन्दमति, मत्यंलोकवासी जीवात्माओंके वशरमें आप किस
उपायसे द्वो सकते हैं १?
भद्दादेवजी योले--देवि | यदि साधकके मनमें अ्रद्धा-
भक्ति न हो तो पूजनकर्म, तपस्या; जप, आसन आदि; शान
तथा अन्य साधनसे भी में उसके वशीभूत नहीं होता हूँ ।
यदि मनुष्योंकी मुझमें अद्धा हो तो जिस किसी भी हेतुसे में
उसके वशमें हो जाता हूँ । फिर तो वह मेरा दर्शन) स्पशो;
पूजन एवं मेरे साथ सम्भाषण भी कर सकता है। अतः जो
मुझे वशर्मं करना चाहे; उसे पहले मेरे प्रति श्रद्धा करनी
चाहिये | श्रद्धा ही खधर्मका हेतु है और वहीं इस लोकमें
वर्णाश्रमी पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली है | जो मानव अपने
वर्णाअ्रमधर्मके पाल्ममें छगा रहता है; उसीकी मुझमें श्रद्धा
होती दे; दूसरेकी नहीं | वर्णाअमी पुरुषोंके सम्पूर्ण धर्म वेदोसि
सिद्ध हैं। पू्व॑कालमे ब्रद्मजीने मेरी द्वी आज्ञा लेकर उनका
वर्णन किया था । ब्रह्माजीका बताया हुआ वह घर्मं अधिक
धनके द्वारा साध्य दे तथा अनेक प्रकारके क्रियाकलपसे युक्त
होता है | उससे मिलनेवाला अधिकांश फछ अक्षय नहीं है
तथा उस धनके अनुष्ठानमें अनेक प्रकारके क्लेश और आयास
उठाने पड़ते हैँ । उस महान् धर्मसे परम दुलंभ श्रद्धाको
पाकर जो वर्णाश्रमी मनुष्य अनन्यभावसे मेरी शरणमें आ
जाते हैं, उन्हें सुखद मार्गसे घर, अथै; काम ओर मोक्ष प्राप्त
होते हैं | वर्णाश्रमसम्बन्धी आचारकी सृष्टि मैंने ही वारंबार
की है | उसमें भक्तिमाव रखकर जो मेरे हो गये हैं, उर्ं
वर्णाश्रमियोंका मेरी उपासनामें अधिकार है; दूसरोंका नहीं)
यह मेरी निश्चित आज्ञा है। मेरी आशाके अनुसार घर्ममागरे
चलनेवाले वर्णाअ्रमी पुरुष मेरी शरणमें आ मेरे कृपाप्रसादसे
मल ओर माया आदि पाशोंसे मुक्त हो जाते हैं तथा मेरे
पुनरावृत्तिरहित धाममें पहुँचकर मेरा उत्तम साधर्म्य ग्रात्त करके
परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं | इसलिये मेरे बताये हुए
वर्णबर्मको पाकर अथवा न पाकर भी जो मेरी शरण ले मेग
भक्त बन जाता है; वह सयं ही अपनी. आत्माका उद्धार कर
लेता है | यह कोटि-कोटि गुना अधिक अलब्ध-छाम है।
अतः मेरे मुखसे प्रतिपादित वर्णघमंका पालन अवश्य कसा
चाहिये | द
जो मोक्षमार्गसे विछग होकर दूसरी किसी वस्तुके लिये
श्रम करता है; उसके लिये वही सबसे बड़ी हानि हैः वही बड़ी
भारी त्रुटि है, वही मोह है और वही अन्धता एवं मूक
है# | देवेश्वरि | मेरा जो सनातनघर्म है; वह चार चर्सा्ि
युक्त बताया गया है| उन चरणोंके नाम हैँ--शानः हित)
चर्या और योग | पश्चु, पाश और पतिका ज्ञान ही शञन कईलत
है | गुरुके अधीन जो विधिपूर्वक पडध्वशोघनका कार्य है
है, उसे क्रिया कहते हैं | मेरे द्वारा विद्वित। वर्णाश्रमपररे
# सा द्वानिस्तन्महच्छिद्रं से मोहः सान्वमृक्ता |
यदन्यत्र अम॑.. कुर्यान्मोक्षमार्गवहिष्कृतः ॥ |
( शि० पु० वा० सं० उ० ख० 4० |
2९ )
# नमो रुद्गाय शान्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
| संक्षिप्त-शिवपुराणाड
च्न्स्स्च्य्च्च्च्स्स्य्स्स्य्स्य्स्य्स्य्स्य्स्य्स्स्स्स्स्स्ल्स्स्प्स्य्ल्ल्क्स्स्ल्ल््पल्ट्टिट-टट>-----_>
और कर्मद्वारा कहीं भी किश्विन्मात्र फलकी इच्छा म रखकर
ही क्रिया करनी चाहिये | देवेश्वरि | फलका उद्देश्य रखनेसे
मेरा आश्रय लघु हो जाता है; क्योंकि फलार्थीको यदि फल न
मिल्य तो वह मुझे छोड़ सकता है। सती साध्वी देवि | फलार्थी
होनेपर भी जिस साधकका चित्त मुझमें ही प्रतिष्ठित है; उसे
उसके भावके अनुसार फल मैं अवश्य देता हूँ | जिनका मन
फलको इच्छा न रखकर ही मुझमें छगा हो) परंतु पीछे वे
फल चाहने ढगे हों, वे भक्त भी मुझे प्रिय हैं । जो पूर्व
संस्कारवश ही फछाफलकी चिन्ता न करके विवश हो मेरी
शरण लेते हैं; वे भक्त मुझे अधिक प्रिय हैं। परमेश्वरि | उन
भक्तोंके लिये मेरी प्राप्तिसि बढ़कर दूसरा कोई वास्तविक लाभ
नहीं है तथा मेरे लिये भी वैसे भक्तोंकी प्राप्ति बढ़कर और
कोई लाभ नहीं है | मुझमें समर्पित हुआ उनका भाव मेरे
अनुग्रहसे ही उनको मानो बल्पूवक परम निर्वाणरूप फल प्रदान
करता है ।
जिन्होंने अपने चित्तको मुझे समर्पित कर दिया है,
अतएव जो मेरे अनन्य भक्त हैं, वे महात्मा पुरुष ही मेरे
घर्मके अधिकारी हैं | उनके आठ छक्षण बताये गये है मेरे
भक्तजनोंके प्रति स्नेह, मेरी पूजाका अनुमोदन) खबंकी भी
मेरे पूजनमें प्रवृत्ति, मेरे लिय्रे ही. शारीरिक चेशओंका होना;
मेरी कथा सुननेमें. भक्तिभाव, कथा सुनते समय खए नेत्र
और अज्जेंमें विकारका होना) वारंवार मेरी स्मृति और सदा
मेरे आश्रित रहकर ह्टी जीवन-निर्वाह करमा--ये आठ प्रकार-
के चिह्न यदि किसी म्लेच्छमें भी हाँ तो वह विप्रशिरोमणि
श्रीमान् मुनि है | वह संन््यासी है और वही पण्डित है। जो
मेरा भक्त नहीं है; वह चारों वेदोंका विद्वान् हो तो भी मुझे
प्रिय नहीं है | परंतु जो मेरा भक्त है; वह चाण्डाल हो तो भी
प्रिय है | उसे उपहार देना चाहिये, उससे प्रसाद ग्रहण
करना चाहिये तथा वह मेरे समान ही पूजनीय है । जो भक्ति-
भावसे मुझे पत्र) पुष्प। फछ अथवा जलू समर्पित करता है;
उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह भी मेरी इृध्सि
कभी ओझल नहीं होता है । # ( अध्याय १० )
+++०*<-2-<%82:--<5-»-«
बरणोश्रम-धर्मे तथा नारी-धर्मका वर्णन; शिवके भजन, चिन्तन एवं ज्ञानकी महत्ताका त्तिपादन
महादेवजी कहते हँ--देवेश्वरि | अब मैं अधिकारी,
विद्वान् एवं श्रेष्ठ ब्राक्मण-मक्तोके लिये संक्षेपसे वर्ण-घर्मका
वर्णन करता हूँ। तीनों काल स्नान; अभिहोत्र, विधिवत्
शिवलिज्ञ-पूजन) दान) ईश्वर-प्रेम। सदा और सर्वत्र दया;
सत्य-माषण, संतोष, आस्तिकता। किसी भी जीवकी हिंसा न
करना) लज्ञा। श्रद्धा, अध्ययन, योग; निरन्तर अध्यापन;
व्याख्यान) ब्रह्मचय। उपदेश-अ्रवण तपस्या क्षमा) शौच)
शिखा-घारण, यज्ञोपवीत-घारण, पगड़ी धारण करना)
दुपट्टा लगाना, निषिद्ध वस्तुका सेवन न करना; रुद्राक्षको
माला पहनना) प्रत्येक पर्वमें विशेषतः चतुर्दशीको शिवकी
पूजा करना, ब्रह्मकूर्चका| पान प्रत्येक मासमें अर्मकूचते
विधिपूर्वक मुझे नहत्वकर मेरा विशेषरूपसें पूजन करना)
# ने मे प्रियश्वतुर्वेदी मद्धक्तः श्वपचोडपि यः। तस्में देयं ततो आाश्य॑ सच पूज्यो यथा झ्हम् ॥
पत्र पुष्प॑ फल तोयं यो मे भत्तया प्रयच्छति । तस्याईं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
( शि० पु० वा० सं० उ० ख० १० । ७६-७९ )
पाराशरस्मृतिके ग्यारहवें अध्यायर्मे अह्कूच॑ंका वर्णन इस प्रकार दै--
क्षीर॑दधि सर्पि:
गोमृत्र गोमयं कुशोदकम् । निर्दिष्ट पन्नगव्यं च पवित्र... पापशोपनम् ॥२९॥
गोमुत्र कृष्णणाया: इवेतायाइचेव गोमयम्। पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया ग्रह्धते दधि ॥३०॥
कपिलाया घतं॑ ग्ाषह्य॑ सब कापिलमेव वा। मृत्रमेकपर्ल दद्याद हुप्ठार तु गो मयम् ॥३ १॥
क्वीरं सप्तपलं दचाइथि त्रिपल्मुच्यते | झतमेकप्ं॑ दबात्. पलमेक॑ कुशोदकन् ॥३ २॥
गायन््याइध्दाय.. गोमूत्र॑ नन्पदारेति गोमयन्। आप्यायस्वेति च क्षीर॑ दरिक्राव्गस्तथा दथि ॥३३॥
तेजोइति. शुक्रनित्याज्यं देवल्व त्वा कुशोदकम् | पश्चगव्यमृचापूर्त स्थापयेद्िसंनिधी ॥१४॥
अच्चछिन्नाग्रा: शुकत्विप ॥१५॥
डइंवती ॥३4॥
आपो हिष्ठेति चालोड्य मा नस्तोकेति मन्त्रयेत् | सप्तावरास्तु ये दर्मा
पतैलदधृत्य दोतव्यं पत्झगन्य॑ यथाविधि | इरावती इद. बविष्णुर्मानस्तोकेति
पैथा उमाकरयोके फ्ो कक, ह के |
आए भ्रभ्रिय ओर ५ पेंस पेताये गये है, गोरा, वाविर
त्रिषु शेकेक. न रेशम ॥३१८॥ कैयोंक) धर हा
मेरे पैव ध वेतर
गिरे पर ” भेरे पीयोक) । पर कहा पका)
* रे ? दृज्ू, देव ॥३९॥ चाय प्मागस यथा न य 3
ण०द्
सेंसे जलसे कमलका पता | मेरे प्रदादते विकुद हुए उन
विवेकी पुरुर्षोको मेरे स्वरूपका द्ञान शे जाता है। फिर उनके
लिये कतेव्याकतेन्यका विधि-निषेष नहीं रह जाता । समाधि
तथा शरणागति भी आवश्यक नहीं रहती । जेंसे मेरे लिये कोई
विधि-निषेध नहीं है; वेसे दी उनके लिये भी नहीं है । परिपूर्ण
होनेके कारण जैसे मेरे लिये कुछ साध्य नहीं है; उसी प्रकार
उन हझृतकृत्य ज्ञानयोगियोंके लिये भी कोई करलेव्य नहीं रह
जाता है। वे मेरे भक्तोंके हितके किये मानवभावक्ता सराक्य
छेकर भूतलपर स्थित हैँ । उन्हें रुद्रलोकसे परिघ्रष्ठ दद्ध ही
समझना चाहिये; इसमें संशय नहीं है। जेसे मेरी आशा ब्रह्मा
आदि देवताओँको कार्यमें प्रवृत्त करनेवाली है; उसी प्रकार
उन शिवयोगियोंकी आशा भी अन्य मनुष्योंकों कतंव्यकर्ममें
लगानेवाली है । वे मेरी आशाके आधार हैं | उनमें अतिशय
सद्भाव भी है । इसलिये उनका दर्शन करनेमात्रसे सब पार्पो-
का नाश हो जाता है तथा प्रशस्त फलकी प्राप्तेिको सूचित
करनेवाले विश्वासकी भी वृद्धि होती है। जिन पुरुर्षोका मुझमें
अनुराग है, उन्हें उन बाताका भी ज्ञान हो जाता है, जो पहले
कभी उनके देखने; सुनने या अनुमवर्मे नहीं आयी होती हैं।
उनमें अकस्मात् कम्प) स्वेद; अश्रुपात+ कण्ठमें खरविकार
तथा आनन्द आदि भावोंका बारंबार उदय होने लगता है।
ये सब लक्षण उनमें कभी एक-एक करके अछूग-अलछग प्रकट
होते हैँ और कभी सम्पूर्ण भार्वोका एक साथ उदय होने
लगता है | कभी विलग न होनेवाले इन मन्द) मध्यम और
उत्तम भावेद्धारा उन श्रेष्ठ सत्पुरुषोंकी पहचान करनी चाहिये |
जैसे जब छोहा आगमें तपकर छारू हो जाता है, तब
केवल लोहा नहीं रह जाता; उसी तरह मेरा सांनिध्य प्राप्त
होनेसे वे केवल मनुष्य नहीं रह जाते--मेरा खरूप हो जाते का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये |
+# नमो रुद्भाय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने %
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाहू
>.....-._०००-०-७नकज--७++ ना नभयानाक थक -+3..५७७५४)३०७५००७०५+>भनननकवनक ७३७. »+५.>.४७आ३० 2-५ भमभणकक ५७००७...
है| हाथ, पैर आदिके साथम्यंसे मानव-शरीर घारण करनेपर
भी वे वास्तवमे झद्व हैं| उन्हें प्राकृत मनुष्य समझकर विद्वान्
पुरुष उनकी अवद्ेलना न करे | जो मूढ़चित मानव उनके
प्रति अवददेलना करते हैँ, वे अपनी आयु; छण्मी) कुछ और
शीलको त्यागकर नरकमें गिरते हैं; अथवा बद्ुत कहनेसे क्या
लाभ £“लिस किसी भी उपायसे मुझमें चित्त लगाना कल्याण-
फ्री प्राप्तिका एकमात्र साधन है |
उपशमम्यु कहते है---इस प्रकार परमात्मा भीकष्ठनाथ
शिवने तीनों लोकॉके हितके लिये शानके सारभूत भर्यका
तंग्रह प्रक किया है। सम्पूर्ण वेद-शाज्म) इतिहास, पुगाण और
वियाएँ इस विशान-संग्रहकी ही विस्तृत व्याख्याएँ हैँ । शान)
शेय) अनुष्ठेय, अधिकार; साधन ओर साध्य--इन छः भर्थो-
का ही यह संक्षित्त संग्रह बताया गया है। भीकृष्ण | जो शिव
ओर शिवासम्बन्धी शानामृतसे तृ्॑त है ओर उनकी भक्तिपे
सम्पन्न है, उसके लिये बाहर-मीतर कुछ भी कतव्य शेष नहीं
है | इसलिये क्रमशः बाह्य और आम्यन्तर कर्मको त्यागकर
शानसे शेयका साक्षात्कार करके फिर उस साघनभूत शानको भी
त्याग दे | यदि चित्त शिवमें एकाग्र नहीं है तो कम करनेते
भी कया लाभ ! और यदि चित्त एकाम्र ही है तो कम करने-
की भी क्या आवश्यकता है ? अतः बाहर और भीतरके कम
करके या न करके जिस किसी भी उपायसे भगवान् शिवर्म
चित्त छगाये | जिनका चित्त भगवान् शिव लगा है और
जिनकी बुद्धि सुस्थिर है। ऐसे सत्पुरु्षोकी इहछोक और परलेक-
में भी सर्वत्र परमानन्दकी प्राप्ति होती है। यहाँ नमः
शिवाय? इस मन्त्रसे सब सिद्धियाँ सुलम होती हैं। अतः परावर
विभूति ( उत्तम-मध्यम ऐश्व्व ) की प्राप्तिके लिये उस मल्र-
( अध्याय ११)
न-ािीएणाख्स्स्स्च्थानचएलि-_>-+-
पथ्चाक्षुर-मन्त्रके माहात्म्यका वर्णन
श्रीकृष्ण बोछे--सर्वश महर्षिप्रवर ! आप सम्पूर्ण
जश्ञानके महासागर हैँ | अब में आपके मुखसे पश्चाक्षर-मन्त्रके
माहात्म्यका तत्वतः वर्णन सुनना चाहता हूँ ।
उपमन्य॒ुने कहा--देवकीनन्दन [| प्माक्षर मन्त्रके
माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन तो सो करोड़ वर्षोर्मे भी नहीं
किया ज्ञा सकता; अतः संक्षेपसें इसकी महिमा सुनो--वेदमें
तथा शैवागमर्मे दोनों जगद यह पडक्षर ( प्रणवसद्दित पश्चाक्षर )
मन््ज सम शसिवभऊकि सम्यूण अर्यक्षा खाथक कद्ा गया
है । इस मन्त्र अक्षर तो थोड़े ही हैं; परंठ यह महा, अपते
सम्पन्न है | यह वेदका सारतत्त्व है; मोक्ष देनेवाला $!
आज्ञसे सिद्ध है; संदेहझृत्य है तथा शिवख़रूप वाक्य ६ | 7६
नाना प्रकारकी सिद्धियोंसे युक्त) दिव्य, ढोगेंकि मनकों परी
एवं निर्मल करनेवाला, सुनिश्चित अर्थवाल्रा ( अथवा निश्षव
ही मनोरयको पूर्ण करनेवाल्ा ) तथा परमेश्वरका गम्भीर वर
है | इस मन्त्रका मुखसे खुखपूर्वक उच्चारण द्वोता है| 7
दे | इस मन्त्रका मुखसे छुखपूर्वक उच्चारण दए है ७
शिवने उम्पूर्ण देहघारियोंके सारे मनोसथोंकी सिद्धिके दि! ] क्
वानवीयसंद्िता |
(७ नमः शिवाय मन्त्रका प्रतिपादन किया है । यह आदि
पदक्षर मन्त्र सम्पूर्ण विद्या ( सन््त्रों ) का बीज ( मूल )
है| जैसे वट्के बीजमें महान इक्ष छिपा हुआ है; उसी प्रकार
अत्यन्त सृहम दोनेपर भी इस मन्त्रकों मद्गन् अर्थसे परिपूर्ण
समझना चाहिये |
'हँ) इस एकाक्षर मन्त्र तीनों गु्णोसे अतीतः स्वश)
सर्वकर्ता/ धुतिमान) सर्वव्यापी प्रभु झिव प्रतिष्ठित हैं। ईशान
भादि जो सूइ्म एकाक्षरूप ब्रह्म हैं; वे सब “नमः शिवाय!
इस मन्त्र्मे क्रमशः स्थित हैं | सूक्ष्म घडक्षर मन्त्र्मे पं्मत्रद्न-
ह्पधारी साक्षाव भगवान् शिव खमावतः वाच्यवाचकभादसे
विगजमान हैं। अप्रमेय दोनेके कारण शिव वाच्य हैं और
मन्त्र उनका वाचक माना गया है । शिव और मनन््त्रका यह
_ वच्यवाचक-भाव अनादिकाल्छूसे चछा आ रहा दै। जेंसे यह
घोर संसारसागर अनादिकाल्से प्रदत्त है; उसी प्रकार संसारसे
हुड़्नेवाले भगवान शिव भी अनादिकालसे ही नित्य विशजमान
हैं| देंसे ओषध रोगोंका खमावतः शन्रु है उसी प्रकार
भगवान् शिव संसारदोषोंके खामाविक शल्रु साने गये हूँ । यदि
मे मावान् विश्वनाथ न होते तो यह चगत् अन्धकारमय हो
जाता क्योंकि प्रकृति जड है कौर जीवात्मा अजशानी ।
अतः इन्हें प्रकाश देनेवाऊे परमात्मा दी हैँ | प्रकृतिसि केकर
परमाणुपरयन्त जो कुछ भी जड़ तत्व हे; वह किसी बुद्धिमान
( चेतन ) कारणके बिना खय॑ 'कर्तों नहीं देखा गया दे ।
पीवेके लिये घम करने और अधर्मसे बचनेका उपदेश दिया
पाता है । उनके वन्धन और मोक्ष भी देखें जाते हैँ | अतः
विचार करनेसे सर्वश्ञ परमात्मा शिवके बिना प्राणियोंके आदि-
पक सिद्धि नहीं होती । जैसे रोगी वैंथके बिना सुखसे
पति हो क्लेश उठाते हूँ, उसी प्रकार सर्वज्ञ शिवका आअय
न छेनेसे उंचारी जीव नाना ग्रकारके क्लेश भोगते हैं ।
हे कर यह सिद्ध हुआ कि जीर्वोका संसारसागरसे उद्धार
>'जाे खाम्ती अनादि स्वेश परिपूर्ण सदाशिव विद्यमान
| । प्रभु आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं । स्वमभावसे ही
। के हैं तथा स्वज्ञ एवं परिपूर्ण दें | उन्हें शिव नामसे
५, पहये | श्विवागमर्मे उनके ख़लूपका विश्दरूपसे
रे प दब कर मन्त्र उनका अभिषान ( वाचक ) है
(उर३ और वान् य् ( वाच्य हक | अभिषान ओर अभिषेय
सब सप न्यू ) रूप होनेके कारण परमशिवखस्प यह
हो माना गया है। “# नमः शिवाय” यह जो
'परबाक्य है; इतना ही शिवशान है और इतना ही
५ पसथाक्षर-सम्यके माहात्यका द्पेन के
५०७
्ल्स्ल््ल््य्ल्ल्््य्य्स्च्य्स््य्य्च््च््स्लसस्स्सलललण हा ला आय
परसपद है | यह शिवका विधि-वाक्य हैः अर्थवाद नहीं है।
यह उन्हीं शिवका खरूप है; जो सर्वश) परिपूर्ण ओर खमावतः
निर्मल हैं |
जो समस्त लछोकॉपर अनुग्रह करनेवाले हैं) वे भगवान
शिव झूठी बात कैसे कह सकते हैँ ! जो सर्वज्ञ हैं; वे तो
मन्त्रसे जितना फ्छ मिल सकता दे। उतना पूरा-कायूरा
बतायेंगे | परंतु जो राग ओर अशान आदि दोषोेंसे अस्त है)
वे दी झूठी बात कह सकते हैं | वे राग ओर अशान आदि
दोष ईव्वरस्में नहीं हैं; अतः ईश्वर केसे झूठ वोल सकते हैँ !
जिनका सम्पूर्ण दोषेसि कभी परिचय ही नहीं हुआ, उन
सर्वशञ शिवने जिस निर्मल वाक्य--पश्चाक्षर मन्त्रका प्रणयन
किया है; वह प्रमाणभूत ही है; इसमें संशय नहीं है । इसलिये
विद्वान पुरुषकों चाहिये कि वह ईश्वरके वचर्नोपर भ्रद्धा करे |
यथार्थ पुण्य-पापके विषयमें ईश्वरके वचनोंपर अ्रद्धा न
करनेवाल्य पुरुष नरकर्में जाता है । शान्त स्वभाववाले श्रेष्ठ
मुनिर्योनि स्वर्ग और मोक्षकी सिद्धिके लिये जो सुन्दर बात
कही है; उसे सुभाषित समझना चाहिये । जो वाक्य राग; दवेष,
असत्य; काम) क्रोध और तृष्णाका अनुसरण करनेवाला हो) वह
नरक॒का देतु होनेके कारण दुर्मोषित कहलाता है |# अविया
पएव॑ रागसे युक्त वाक्य जन्म-मरणरूप संसार-वलेशको प्राप्तिमें
कारण होता है| अतः वह कोमल) छलित अथवा संस्कृत
( संस्काययुक्त ) हो तो भी उससे क्या लाभ ? जिसे सुनकर
कल्याणकी प्राप्ति हो तथा राग आदि दोर्पोका नाश हो जाय;
वह वाक्य सुन्दर शब्दावलीसे युक्त न हो तो भी शोभन तथा
समझने योग्य है। मन््त्रोंकी संख्या बहुत होनेपर भी जिस
विम्ल घ॒डक्षर मन्त्रका निर्माण सर्वत् शिवने किया क उसके
समान कहीं कोई दूसरा मन्त्र नहीं दे |
पडक्षर मन्त्रमें छदों अन्नोसद्वित सम्पूर्ण वेद ओर झाम्र
विद्यमान हैं; अतः उसके समान दूसरा कोई मन्त्र कई नई
है । सात करोड़ महामन्त्रों और अनेकानेक उपमन््त्रेत्ति बंद
घडक्षर मन्त्र उसी प्रकार मिन्न दे) मैसे इस्तिते सूत्र | जितने
शिवशान हैं और जो-जो विद्याख्शान है वे व प्रदक्षर
मन्त्ररूपी सूचके संशित भाष्व हैं | जिसके हुदयम “5० नमः
शिवाय! यह पडक्षर मन्त्र प्रतिष्ठित दे) उसे दूनरे बहुर्शस्यक
दि
# रागद्रेशनतक्नीपकासवृध्णानुसाररे प4।
फ्लेरयदेटुलाचई,. दुर्भाषितदुभ्नत ॥
(् ० पु० गा० छु० उ० सं० २१) २०)
याद
२ ०८
न््ऑ्स्य्य्य्य्य््य््य्स्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्््स्स्््ललडल्ल-च.>ञुुगुनञल६&इ£&&<२उ: "5 >> ऑ अब दचच-+++«ई........................_
५4997 #9४9४9श20 9 97,799 7४,४9४ ४४४ ४8४७४७७४७४७४७४७७ न न य्कन्कसकनतडा्ा+कबाकछधान७कपरपफनलपक
# नमो रद्भाय शाम्ताय ब्रह्मण परमात्मने #
| संक्षिप्त-शिवपुराणाड
मनन््त्रों और अनेक विस्तृत शाज्रोसे क्या प्रयोजन है ! “शिवायः--ये तीन अक्षर जिसकी जिद्वाके अग्रमागमें विद्यमान
जिसने '४* नमः शिवाय? इस मन्त्रका जप हृढ़तापूर्वक अपना
लिया है; उसने सम्पूर्ण शास्र पढ़ लिया और समस्त शुभ
कृत्योंका अनुष्ठान पूरा कर लिया । आदियमें “नमः? पदसे युक्त तो वह पापपञ्ञरसे मुक्त हो जाता है |
न ><><>8०<०
हैं; उसका जीवन सफल हो गया | पश्चाक्षर मन्त्रके जपमें लगा
हुआ पुरुष यदि पण्डित, मूखे; अन्यज अथवा अपघम भी हो
( अच्याय १२)
पश्चाक्षर मन्त्रकी महिमा, उसमें समस्त वाज्युयकी स्थिति, उसकी उपदेशपरम्परा, देवीरुपा
पश्चाक्षर-विद्याका ध्यान, उसके समस्त ओर व्यस्त अक्षरोंके ऋषि, छन्द,
देवता, बीज, शक्ति तथा अड्गन्यास आदिका विचार
देवी बोर्ली--महेश्वर | दुजयः दुर्लच्नथ एवं कहुषित
कलिकालमें जब सारा संसार धर्मसे विमुख हो पापमय
अन्घधकारसे आच्छादित हो जायगा। वर्ण ओर आश्रम-
सम्बन्धी आचार नष्ट द्वो जायेंगे, घमंसंकट उपस्थित हो
जायगा) सबका अधिकार संदिग्घ: अनिश्चित और विपरीत
हो जायगा; उस समय उपदेशकी प्रणाठी नष्ट हो जायगी
और गुरु-शिष्यकी परम्परा भी जाती रहेगी, ऐसी परिस्थिति
आपके भक्त किस उपायसे मुक्त हो सकते हैं !
महांदेवजीने कहा--देवि | कलिकालके मनुष्य मेरी
प्रम मनोरम पश्चाक्षरी विद्याका आश्रय ले भक्तिसे भावित-
चित्त होकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। जो अकथनीय
और अचिन्तनीय हैं--उन मानसिक) वाचिक और शारीरिक
दोषोसे जो दूषित, कृतन्न) निर्दय/ छली, छोभी और कुटिल-
चित हैं, वे मनुष्य भी यदि मुझमें मन लगाकर मेरी
पञ्चाक्षरी विद्याका जप करेंगे; उनके लिये वह विद्या ही
संसारभयसे तारनेवाली होगी | देवि | मेने बारंबार प्रतिशा-
पूवंक यह बात कही है कि भूतलूपर मेरा पतित हुआ भक्त
भी इस पश्माक्षरी विद्याके द्वारा बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
देवी वोलीं--यदि मनुष्य पतित होकर सर्वथा कमे
करनेके योग्य न रह जाय तो उसके द्वारा किया गया कर्म
नरककी ही प्राप्ति करानेवाला होता है । ऐसी दशामें पतित
मानव इस विद्याद्वारा केसे मुक्त हो सकता हे !
महादेवजीने कहा--झुन्दरि ! तुमने यह बहुत ठीक
वात पूछी दहै। अब इसका उत्तर सुनो) पहले मैंने इस
विपयकी गोपनीय समझकर अबतक प्रकट नहीं किया था |
यदि पतित मनुष्य मोहचश ( अन्य ) मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक मेरा
पूजन करे तो वह निःसंदेह नरकगामी हो सकता है | किंतु
पञ्माशर मन्त्रके लिये ऐसा प्रतिवन््ध नहीं है। जो केवल
हि
जल पीकर और हवा खाकर तप करते हैं तथा दूसरे छोग
जो नाना प्रकारके ब्रतोंद्रारा अपने शरीरको सुखाते हें,
उन्हें इन ब्रतोंद्वारा मेरे छोककी प्राप्ति नहीं होती । परंतु
जो भक्तिपूवक पञ्चाक्षर मन्त्रसे ही एक बार मेरा पूजन कर
लेता है; वह भी इस मन्त्रके ही प्रतापसे मेरे घाममें पहुँच
जाता है | इसलिये तप, यज्ञ) त्रत ओर नियम पश्माशवरद्वार
मेरे पूजनकी करोड़वीं कछाके समान भी नहीं है । कोई
बद्ध हो या मुक्त, जो पश्चाथर मन्चके द्वारा मेण पूजन
करता है; वह अवश्य ही संखारपाशसे छुटकारा पा जाता
है। देवि | ईशान आदि पाँच ब्रह्म जिसके अझ् $। उप
घठक्षर या पश्माक्षर मन्तके द्वारा लो भक्तिमावते मेरा
पूजन करता है; वह मुक्त हो जाता है। कोई पतित हो या
अपतित, वह इस पश्चाक्षर मन््त्रके द्वारा मेरा पूजन करे।
मेरा भक्त पदञ्चाक्षर मन्त्रका उपदेश) गुरसे छे चुका हो वां
नहीं, वह क्रोषको जीतकर इस मन्त्रके द्वारा मेरी पूजा किया
करे । लिसने मन्त्रकी दीक्षा नहीं छी है; उसकी अपेक्षा दी
लेनेवाला पुरुष कोडदि-कोटि गुना अधिक माना गया है।
अतः देवि | दीक्षा लेकर ही इस मन्त्रसे मेरा पूजन करतीं
चाहिये | जो इस मन्त्रकी दीछ्षा लेकर मैत्री) मृदिता ( करुगा!
उपेक्षा ) आदि गुणेसे युक्त तथा ब्रक्मचर्यपरायण हो भक्तिभाव्त
मेरा पूजन करता है; वह मेरी समता प्राप्त कर लेता है |
इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या छाम ? मेरे पञ्माईः
मन्त्रमें सभी भक्तोंका अधिकार है | इसलिये वह अर |
मन्त्र है। पद्नाक्षकके प्रभावतें ही लोक) वेद) मह् “
सनातनघम) देवता तथा यह सम्यूर्ण जगत् ढिके हुए |
देवि | प्रढबकाल आनेपर जब चराचर जंगत् नें£
जाता है और सारा प्रपञ्ज प्रकृतिमें मिलकर वहीं छीन हो नर
है; तब मैं अकेला ही स्थित रहता हूँ? दूसरा कोई कई 9
रहता | उस समय समस्त देवता ओर शाम पह्आआर सत्र
बायवीव्ंदिवा]_# पश्माक्षर मन्थकी महिमा कल नलनननननननननननननननन5 ] # पश्चाक्षर मन्त्रको महिमा; उसमें समस्त वाझह्वायकी स्थिति #
आ्ख्विं्लच्चच्लचल्ं्लल्ल्ल्् ् ्ल्््ल्लच्च्् च्चच्चचचचव्कतकाा
3.....................नाकाकाभ ०७ ५कमनान कक का3७ “अमर +क न मकनमक कम कक न
न “सन
सित होते हैं | अतः मेरी शक्तिसे पालित होनेके कारण वे
गश नहीं होते हैँ | तदनन्तर मुझसे प्रकृति और पुरुषके भेदसे
युक्त वृष्टि होती है | तसश्चात् त्रिगुणात्मक मूर्तियोंका संहयर
करनेवाल अवान्तर प्रल्य होता दै | उस प्रल्यकालमें
भगवान्, नारायणदेव मायामय शरीरका आश्रय छे जलके
भीतर शेषशय्यापर शयन करते हैं | उनके नाभिकमलसे
पश्चमुख॒ ब्रह्माजीका जन्म होता है। ब्रह्माजी तीनों छोकोंको
सृष्टि करना चाहते थे; किंतु कोई सहायक न होनेसे उसे
कर नहीं पाते ये | तब उन्होंने पहले अमिततेजसी दस
महर्वियोंकी सृष्टि की) जो उनके मानसपुत्र कह्दे गये हैं ।
उन पुत्रोंकी सिद्धि बढ़ानेके लिये पितामह ब्रक्माने मुझसे
कहा-महादेव |! महेश्वर | मेरे पुत्रोकी शक्ति भ्रदान
कीजिये । उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर पॉच मुख
घारण करनेवाले मैंने व्रह्माजीके प्रति प्रत्येक मुखसे एक-एक
अध्षरके क्रसे पाँच अक्षरोंका उपदेश किया | छोकपितामदद
ब्रज्ाजीनी भी अपने पाँच मुर्खोद्दारा ऋ्मशः उन पाँचों
अध्षरोंकी अहण किया और वाच्यवाचकमावसे मुझ मददेश्वरको
जाना | मन्त्रके प्रयोगों जानकर प्रजापतिने विधिवत् उसे
उद्धू किया | तलबश्रात् उन्होंने अपने पुत्रोंकी यथावत्
पसते उस मन्त्रका और उसके अर्थका भी उपदेश दिया ।
तक्षात् लोकपितामह ब्रह्मासे उस मन्त्र॒रक्षको पाकर मेरी
भाराधनाकी इच्छा रखनेवाले उन मुनिर्योने उनकी बतायी
हुई पदतिसे उस मन््त्रका जप करते हुए. मेझके रमणीय
शिखर मुख़्वान् पर्वतके निकट एक सहस्थ दिव्य वर्षोतक
व तपत्या की । वे लोकसष्टिके छिये अत्यन्त उत्सुक
| इसलिये वायु पीकर कठोर तपस्यामें छग गये । जहाँ
उन तपस्या चल रही थी, वह भीमान् मुझ्लवान् पर्वत
रे हर प्रिय है और मेरे भक्तोने निरन्तर उसकी
७ |
, उन भ्पियोंकी भक्ति देखकर मैंने तत्काल उन्हें प्रत्यक्ष
रण श्न्
घ५
के दिया और उन आये ऋषियोंको पद्माक्षर मन्त्रके
/ 2 /द) देवता; बीज, शक्ति, कीलक) घडडुन्यास)
क् की हक सब बातोंका पूर्णस्पसे ज्ञान
, दे अल यहा प्टि बढ़े, इसके ल्यि रमने उन्हे मन्त्रकी
| « “पं वता्दी | तव वे उस मन््त्रके माहात्म्यसे तपत्या-
५.4. ३ गये ओर देवताओं) अबुरों तथा मनुर्ष्योकी
४ मदाभति विज्तार करने लगे |
>३ इंउ उत्तम विद्या पद्चाध्वरीके खरूपका वर्णन किया
१ +ह ॥<
५०९,
जाता है। आदियें “नमः? पदका प्रयोग करना चाहिये । उसके
बाद “शिवाय? पदका | यही वह पश्चाक्षरी विद्या है; जो समस्त
श्रुतियोंकी सिस्मौर है. तथा सम्पूर्ण शब्दसमुदायकी सनातन
बीजरूपिणी है | यह विद्या पहले-पहल मेरे मुखसें निकलीः
इसलिये मेरे द्वी खरूपका प्रतिपादन करनेवाली है। इसका
एक देवीके रुपमें ध्यान करना चाहिये | इस देवीकी अन्न-
कान्ति तपाये हुए, सुवर्णके समान है। इसके पीन पयोधर
ऊपरको उठे हुए, हैं । यह चार भुजाओं और तीन नेत्रोसे
सुशोभित है । इसके मस्तकपर वालचन्द्रमाका मुकुट हे ।
दो हार्थोमें पद्म और उत्पल हैं। अन्य दो हाथोंर्म वरद
और अभयकी मुद्रा है। मुखाकृति सोम्य दे । यह समस्त
शुभ छक्षणोंसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण आभूषणॉंसे विभूषित
है | ख्वेत कमलछके आसनपर विराजमान हैँ। इसके कालि-
काले घुंघराले केश बड़ी शोभा पा रहे हैं । इसके अज्नेंमें पॉच
प्रकारके वर्ण हैँ; जिनकी रश्मियोँ प्रकाशित हो रही हूँ ।
वे वर्ण ई--पीत, कृष्ण) धूम्र/ स्वर्णिम तथा रक्त |
इन वर्णोका यदि प्रथकू-इथक् प्रयोग हो तो इन्हें
बिन्दु और नादसे विभूषित करना चाहिये । बिन्दुकी
आकृति अर चन्द्रके समान है ओर नादकी अ [कृति दीप-
शिखाके समान | सुप्रुझति | यों तो इस मन्त्रके सभी अक्षर
बीजरूप हैं; तथापि उनमें दूसरे अध्षरकों इस मन्त्रका वीज
समझना चाहिये। दीर्घखसूर्बंक जो चौथा वर्ण ए उसे
कीलक और, पाँचवें वर्णकों शक्ति समझना चाएिये। इस
मन्मके वामदेव 'छषि ए४ और पंक्ति उन््द दे। वरानने |
मैं शिव ही हस मन्त्रका देवता हूँ । वरारोए | मगोतम)
अज्चि) विश्वामित्र अज्विरा और भरद्ाज--यें नकारादि वर्गकि
क्रमशः ऋषि माने गये देँ। गायची) अनु'्दधप/ त्रिष्दुप) बृददती
और विराट--ये क्रमशः पाँचों अक्षरेंके छत्द ई। ईन5
बे
रुद्र) विष्णु3 ब्रह्मा ओर स्कन्द--ये ऋमशः उन अक्षरोंके
देवता दे । वरानने ! मेरे पूर्दे आदि चार्रों दिश्ञाओंके तथा
ऊपरके--पौचों मुख इन नकारादि अब्रोके ऋमराः सन
हैं। पश्माक्षर मनन््त्रका पहछा अक्षर उदाच है। दूसरा और
$& ८३» अस्य थशधिवपत्याश्षरीमन्त्रत्य प्रामदेव ८ “7 ह:प पद्मफ्सतीमलवत्व, आामरेद आय ; परि-
इछन्दः शिवों देवता, मं दीज य॑ भक्ति:+ वाँ दीलए सदाधियट्याप्रसादो-
परन्धिपूरवकनसिलपुण्षार्यसिदये जप विनियोगः 4 शिवपृराच ८ इस
वर्गनके जनुस्तार बद्दों विनियोग-बलय ५॥ मन्वन्मइलव शोडिन
जो विनियोग दिया गया के उसने अ+ दीलन। निभा: फायि:
(शिवाय! शवि दीटछझन् श्वना अत्तर ४ !
५१२७०
का. 3यरता उनकी यान. आनमी.. सनम पोमनरी-- पुन >>. धान“ नभत-नक»ाम»म नहा" १९०-,
चोथा भी उदात्त ही है | पाँचवोँ स्वरित है ओर तीसरा अक्षर
अनुदात्त माना गया है | इस पश्चाक्षर सन्त्रके--मूल विद्या
शिव) शेंव, सूत्र तथा पद्चाक्षर नाम जाने । शेव ( शिव-
सम्बन्धी ) बीज प्रणव मेरा विद्याल हुदय है। नकार सिर कह्दा
गया है; मकार शिखा है; (शि? कवचु है; वा? नेत्र है और
यकार अज्ल है | इन वर्णोके अन्तमें अक्लैंके चत॒थ्य॑न्तरूपके
साथ क्रमशः नम; स्वाह्मः वषट) हुं, वोषट और फट
जोड़नेसे अड्डन्यास होता है [#
देवि | थोड़ेसे भेदके साथ यह तुम्दारा भी मूलमन्त्र है।
उस पश्चाक्षर मन्त्रमें जो पाँचवाँ वर्ण ध्यः है, उसे बारदवें
खरसे विभूषित किया जाता है, अर्थात् “नमः शिवाय? के झ्वानमें
८ससः शिवायै? कइहनेसे यह देवीका मूल मन्त्र हो जाता है।
अतः साधकको चाहिये कि वह इस मन्त्रसे मन वाणी और
शरीरके भेदसे हम दोनोंका पूजन, जप ओर होम आदि करे । ( मन
% भग्रों रद्राय आधप्ताय ब्रह्मण परसात्मने #
[ झंक्षि-शिवपुराणाए
आदिके भेदसे यह पूजन तीन प्रकारका होता है--मानसिक)
वाचिक और शारीरिक | ) देवि | जिसकी जेसी समझ हो,
जिसे जितना समय मिल सके, जिसकी जेसी बुद्धि, शक्ति;
सम्पत्ति; उत्साह एवं योग्यता और प्रीति हो, उसके अनुसार
वह शास्मविधिसे जब कभी) जहाँ कहीं अथवा जिस किसी भी
साधनद्वारा मेरी पूजा कर सकता है | उसकी की हुई वह
पूजा उसे अवश्य मोक्षकी प्राप्ति करा देगी। स॒न्दरि | मुझमें
मन लगाकर जो कुछ क्रम या ब्युत्तमसे किया गया हो) वह
कक्ष्याणकारी तथा मुझे प्रिय होता है । तथापि जो मेरे भक्त
हैँ और कम करनेमें अत्यन्त विवश ( असमर्थ ) नहीं हो गये 8)
उनके लिये सब शास्जोंमें मैंने ही नियम बनाया है; उस
नियमका उन्हें पालन करना चाहिये | अब में पहले मन्त्रकों
दीक्षा लेनेका झुभ विधान बता रहा हूँ; जिसके विता मल्र-जप
निष्फल होता है ओर जिसके होनेसे जप-कर्मे अवश्य सफल
होता है | ( अध्याय १३ )
+-.+४०<-39 ->-+.+
गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा, मन्त्रगणनाके
लिये विभिन्न प्रकारकी मालाओंका मदत्च तथा अंगुलियोंके उपयोगका रन, जपके छिये
उपयोगी स्थान तथा दिशा, जपमें वर्जनीय बातें, सदाचारका महत्त्व, आस्तिकता-
की प्रशंसा तथा पश्चाक्षर मन्त्रकी विशेषताका वर्णन
(महादेवजी कद्दते है--)वरानने | आशाहीन) क्रिया-
हीन भ्रद्धाहदीन तथा विधिके पालनार्थ आवश्यक दक्षिणासे
हीन जो जप किया जाता है; वह सदा निष्फल होता दे । मेरा
स्वरूपभूत मन्त्र यदि आश्य-सिद्ध, क्रियासिद्ध और अद्धासिद्ध
होनेके साथ ही दश्चिणासे भी युक्त हे तो उसकी सिद्धि होती है
और उससे महान फल प्राप्त होता है। शिष्यको चाहिये कि वह
पहले तत्त्वेचा आचाये) जपशील) सद्गुणसम्पच्च, भ्यानयोगपरायण
एवं ब्राह्मण ग़ुरुकी सेवार्मे उपस्थित हो; मनमें शुद्ध भाव रखते
हुए. प्रयत्षपूवंक उन्हें संतुर्ठ करे | ब्राद्मण साधक अपने मन;
वाणी, शरीर और घनसे आचार्यका पूछन करे | वह वैभव हो
तो गुरुको भक्तिमावसे हाथी; घोड़े; रथ) रत्न) क्षेत्र ओर गशह
आदि अपिंत करे | जो अपने लिये सिद्धि चाहता हो) वह घनके
दानमें कृपणता न करे | तदनन्तर सब सामग्रियोंसह्वित अपने
आपको गुरुकी सेवा्में अपित कर दे ।
इस प्रकार यथाशक्ति निरछलभावसे गुरुकी विविवत्
पूजा करके गुरुसे मन्त्र एवं ज्ञानका उपदेश क्रमशः अहण
करे | इस तरइ संतुष्ट हुए. गुद अपने पूजक शिष्यकरो) जो
एक वर्षतक उनकी सेवामें रह चुका हो) गुरुकी सेवार्मे उत्साई
रखनेवाला हो; अहंकाररहित हो और उपवासपूर्वक काने
करके झुद्ध हो गया हो) पुनः विशेष शुद्धिके लिये (५ केक
2 223 कक बम अप मम 32 नल पक कल कल नस सनक हु
# भमुन्यास-वाक्यका प्रयोग यों समझना चादिये---# हुदयाय नमः, | नं शिरसे खाह्दा, * मं शिख ये वषद) ४
शिं कवचाय दुन, «४? वां नेत्रश्नयाय वीपट 5० यं अस््राय फट इति द्वदयादिषदद्वन्यासः | इसी तरइ करन्यासका प्रयोग दे--यर्व-7
४89 ०० अजुपा््या नमः) » न॑ सज्ज॑नीस्या नमः) आ# म॑ मध्यमान्यां नमः, # झि अनामिकाम्या नमः, ई वां कनिष्ठि कार्म्या नम:
३० ये करतलकरपृष्ठान्यां नमः । विनियोगमें जो ऋषि आदि णाये हैं, उनका न्यास इस प्रकार समझना चाहिये-- वामदेवर्षये तन
शिरसि। पंक्तिच्छन्दसे नमः मुखे, शिवदेवतायें नमः इदये, मं वीजाय नमः गुझे) य॑ शक्तये नमः पादयोः, वां कील्काय नमः ताभी।
बिनियोगाय नमः स्वाजे।
वायवीयलंदिता ]
अमतायाननाग रानी अत भाने,
खरे हुए पवित्र द्रव्ययुक्त मन््त्शुद जलसे नहलाकर चन्दन;
पुपमाठ) वच्ध और आमूषणोद्वार अलुंकृत करके उसे सुन्दर
वेश-भूषाते विभूषित करें । तत्मथ्वात् शिष्यसे आज्णोंद्वारा
पुण्याइवाचन और ब्ाद्षणोंकी पूछा करवाकर समुद्र-तटपर
नदीके किनारे; गोशाक्षर्मे, देवालयमें; किसी भी पवित्र स्थानमें
अयवा परमें सिद्धिदायक काल खानेपर शुभ तिथि; शुभ नक्षत्र
एवं सबंदोषरह्ति शुभ योगर्में गुद अपने उस शिष्यको
अनुप्रहपूवंक विधिके अनुसार मेरा श्ञान दे। एकान्त स्थानमें
अत्न्त प्रसन्नचित्त हे उच्च खरसे एम दोनोंके उस उत्तम
मलका शिष्यसे भलीमोति उच्चारण कराये । बारंबार उद्यारण
कराकर शिष्यकों इस प्रकार आशीर्वाद दे---6तुम्झारा कस्याण
है, मल हो, शोमन हो, प्रिय हो? इस तरह गुरु शिष्यको
मन्त्र और आश्ञा प्रदान करे #| इस प्रकार गुरुसे मन्त्र और
आशा पाकर शिष्य एकाग्रचित्त हो संकल्प करके पुरथरण-
पूवंक प्रतिदिन उस सन्त्रका जप करता रहे | वह जबतक
जीये, तबतक अनन्यभावसे तत्परतापूर्वक नित्य एक इजार
आठ मन्त्रोंका जप किया करे । जो ऐसा करता है वह परम
गतिको प्राप्त होता है | जो प्रतिदिन संयमसे रहकर केवल
रातमें भोजन करता है और मन्त्रके जितने अक्षर हैं, उतने
णखका चौगुना जप आंदरपूर्वक पूरा कर देता है वह
'पोरथरणिकः कहलाता है | जो पुरश्चरण करके प्रतिदिन
नर करता रहता है। उसके समान इस लछोकमें दूसरा कोई
नहीं है । वह सिद्धिदायक सिद्ध हो जाता है.।
पाधकको चाहिये कि वह शुद्ध देशमें क्लान करके सुन्दर
उन बंधिकर अपने छदयमें तुम्हारे साथ मुझ शिवका और
अने गुर्का चिन्तन करते हुए उत्तर या पूवेंकी ओर मुंह
गोनभावसे बैठे, चित्तको एकाग्र करे तथा दहन-प्लावन
आदिफे द्वारा पँचों तत्वोंका शोधन करके मन्त्रका न्यास
दे करे। इसके वाद सकलीकरणकी क्रिया सम्पन्न करके |
ब् बय अत निवायन करते हुए हम दोनो खल्यका
बा र विद्यास्थान, अपने रूप) ऋषि, छन््द; देवता;
क बा मल वाच्यार्थरूप मुझ परमेश्वरका स्मरण
श हा ४ जप करे। मानस जप उत्तम है, उपांशु जप
...... ; १॥ वाचिक जप उससे निम्नकोटिका माना गया है--
किम
४ पास्तु शुन् चास्तु शोभनोइस्तु प्रियो5स्त्विति ।
श्र > दाद ३ ३
पर सुरुमंन्त्रमाश चेव ततः पराम् ॥
॥ श्वि० पु० या० सं> उ० उ० रेड | १५ )
. # गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि #
प११
ऐसा आगमार्थविज्ञारद विद्वानोंका कथन है। जो ऊँचे-नीचे
खरसे युक्त तथा स्पष्ठ ओर अस्पष्ट पर्दो एवं अक्षरोंके साथ
मन्त्रका वाणीद्वारा उच्चारण करता है; उसका यह जप ध्वाचिकः
कहलाता है | जिस जपमें केवक जिद्धामात्र हिलती है अथवा
बुदुत घीमे खरसे अक्षरोंका उदारण द्वोता है तथा जो दूसरोंके
कानमें पड़नेपर भी उन्हें कुछ सुनायी नहीं देता; ऐसे
लपको “उपांशु? कहते हैं | जिस जपमें अक्षर पडक्तिका; एक
वर्णसे दूसरे वर्णका, एक पदसे दूसरे पदका तथा शब्द और
अर्थका मनके द्वारा बारंबार चिन्तनमात्र होता है; वह “मानस?
जप कहलाता है | वाचिक जप एक गुना ही फल देता है;
उपांशु जप सो गुना फल देनेवाला वताया जाता है; मानस
जपका फल सहस्त गुना कहा गया है तथा सगर्भ जप उससे
सो गुना अधिक फल देनेवाला है | प्राणायामपुर्वंक जो_
जप होता है। उसे “सगर्भ! जप कहते हैं| अगर्भ जपमें भी
आदि ओर अन्तमें प्राणायाम कर लेना श्रेष्ठ बताया गया है |
मन्त्रार्थवेत्ता बुद्धिमान साधक प्राणायाम करते समय चालीस
बार मन्त्रका स्मरण कर ले | जो ऐसा करनेमें असम हो;
वह अपनी शक्तिके अनुसार जितना हो सके, उतने ही
मन्त्रोंका मानसिक जप कर ले | पाँच; तीन अथवा एक बार
अगर या सगम प्राणायाम करे। इन दोनोंमें सगभे प्राणायाम
श्रेष्ठ माना गया है | सगर्भकी अपेक्षा भी भ्यानसद्दित जप
सहस्तगुना फल देनेवाला क्या जाता है। इन पाँच प्रकारके
जपमेंसे कोई एक जप अपनी शक्तिके अनुसार करना
चाहिये |
अद्ठुलीसे जपकी गणना करना एकगुना बताया गया
है। रेखासे गणना करना आठगुना उत्तम समझना चाद्दिय |
पुत्नजीव ( जियापोता ) के बीजॉकी मालसे गणना करनेपर
जपका दसगुना अधिक फल द्वोता है। झद्भक़े मनक्रोसे सो
गुना) मूँगोंसे हजार गुना, स्फटिकमणिकी मालसे दस इज़ार
गुना, मोतियोंकी मालासे लाख गुना) पग्माक्षत्रें दस व्यख गुना
और सुवर्णके बने हुए मनकोंते गणना करनेपर कोटि गुना
अधिक फल बताया गया है। ऋुझकी गाँठसे तथा दद्राउसे
गणना करनेपर अनन्तगुनें फलकी प्राप्ति होती दे [तीस
रद्राक्षके दानोंते बनायी गयी मात्य जप-करममें घन देनेवाली ४
शेती है। सत्ताईंस दार्नोकी माला पुश्ठिदादिती और प्रचोस,
दानोंकी माल्य मुक्तिदायिनी देती दे। द्वद दठाशडी बसी
हुई माला अभिचार-करममें फल्दादक दल
ली
असूठेफो मोउदादक समझना
हा. के
को अाचछ >>
4 $०आ ध्ज्
शमुनाशक | सथ्यमा घन देती है ओर अनामिका शान्ति प्रदान
करती है। एक सौं आठ दानोंकी मारा उच्मोत्तम मानी
गयी है। सौ दामोंकी माछझा उत्तम और पचास दानोंकी
माला मध्यम होती है। चोवन दानोंकी माला मनोशरिणी
ए.वं भ्रेष्ठ फटी गयी है।इस तरहकी माछासे जप करे | .पह
जप किसीको दिखाये नहीं । कनिष्ठिका अंगुरि अश्वरणी
( भपके फुछकों ध्षरित--नछ न करनेवाहली ) मानी गयी हैः
इसलिये चपकर्ममें शुभ दै। दूसरी अंगुलियोंके साथ अंगुछठ्वारा
ख़प करना चाहिये; क्योंकि अल्लुधके बिना किया हुआ
जप निष्फल होता है ।
बरमें किये हुए ल्पफो समान या एकगुना समझना
चादिये | गोशाछामें उसका फूछ सोगुना शो जाता है; पवित्र
वन या उद्यानमें किये हुए! ज्पका फूल सहखगुना बताया
जाता है | पवित्र पवंतपर दस हजार गुना; नदीके तटपर
लाख गुना; देवालयमें कोटि गुना और मेरे निकथ किये हुए
जपको अनन्त गुना कष्टा गया है। सूर्य, अग्नि; गुर चन्द्रमा)
दीपक) जल) ब्राह्मण और गौ्मोके सम्रीप किया हुआ जप
श्रेष्ठ होता है | पुर्वाभिमुख किया हुआ जप वशीकरणमें और
दक्षिणाभिमुख जप अभिचार-कमेमें सफलता प्रदान करनेवाला
है | पश्चिमाभिमुख जपको घनदायक जानना चाहिये और
उत्तराभिमुख जप शान्तिदायक द्वोता है । सूय्य) अम्लि
ब्राह्मण देवता तथा अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप उनकी
ओर पीठ करके जप नहीं करना चाहिये, सिरपर पगड़ी रख-
कर) कुर्ता पहनकर नंगा होकर, बाल खोलकर, गलेमें कपड़ा
लपेटकर, अशुद्ध हाथ लेकर; सम्पूर्ण शरीरसे अशुद्ध रहकर
तथा विल्शपपूर्वक कभी जप नहीं करना चाहिये | जप करते
, समय क्रोघ मद) छींकना) थूकना ज॑भाई लेना तथा कुत्तों
और नीच पुरुर्षोकी ओर देखना वर्जित है। यदि कभी वैसा
सम्भव हो जाय तो आचमन करे अथवा तुम्हारे साथ मेरा
( पावतीसहित शिवका ) स्मरण करे या ग्रइ-नक्षत्रोंका दशन
करे अथवा प्राणायाम कर ले |
बिना आसनके बेठकर, सोकरः चल्से-चलते अथवा
खड़ा होकर जप न करे | गल्लीमं या सड़कपर; अपविन्न
स्थानमें तथा अपेरेमें भी जप न करे | दोनों पाँव पैलाकर:
कुक्कुट आसनसे बैठकर) सवारी या खाटपर चढ़कर अथवा
चिन्तासे व्याकुल होकर जप न करे | यदि शक्ति हो तो इन
सव नियमाका पालन करते हुए जप करे और अशक्त पुरुष
ययाशक्ति जप करे | इस विषय बहुत ऋइनेसे दया छाम १
3
$
7 नमो रुद्राय शान्ताय च्रह्मणे परमात्मने #
[ संक्षिप्त-शिवपुराणाड
संक्षेपसे मेरी यह बात सुनो | सदाचारी मनुष्य शुद्धभावपे
जप ओर ध्यान करके कल्याणका भागी होता है। आचार
परम घमे दे; आचार उत्तम घन है; आचार भेष्ठ विधा है
और आचार ही परम गति है । आचारहीन पुरुष संणासें
निन्दित दोता हैं और परढोकर्म भी सुख नहीं पाता | इप-
लिये सबको आचारवान् झोना चाहिये#। वेद विज्ञार्नोने
वेद-शाप्लके कथनानुसार थिस दर्णके ढछिये जो कर्म विहित
बताया है; उस वर्णके पुरुषको उसी क॒र्मका सम्यक आचरण
कश्ना चाहिये | वही उसका सदाचार है। दूसरा नहीं।
सत्पुरुषनि उसका आचरण किया है। इसीबिये वह सदाचार
कहछाता है | उस सदाचारका भी मूछ कारण आखिदता है।
यदि मजुष्य आस्तिक हो तो प्रमाद आदिके कारण सदाचारसे
कभी भ्रष्ट हो घानेपर भी दूषित नहीं होता । अतः सदा
आज्लिकताका आभय लेना चाहिये। जैसे इहछोकर्मे सत्कम
करनेसे सुख और दुष्कर्म करनेसे ह्ुुःख होता है। उसी तरह
परलोकर्मे भी होता है--इस विश्वासकों आस्तिकता $हत हैं।
सदाचारसे हीन; पतित और अन्त्यज्ञका उद्धार करनेके
लिये कलियुगर्म पद्चाक्षर मन्प्नसे बढ़कर दूसरा कोई उपाय
नहीं है | चलपे-फिरते, खड़े होते अथवा स्वेच्छानुसार कमे .
करते हुए. अपवित्र या पवित्र पुरुषके जप करनेपर भी यह
मन्त्र निष्फल नहीं होता । अन्त्यजः मूख) मूढ़ं) परतित,
मर्यादारहित और नीचके लिये भी यह मन्त्र निष्फल नहीं
होता | किसी भी अवस्थामें पड़ा हुआ मनुष्य भी) यदि मुझ
उत्तम भक्तिभाव रखता है तो उसके लिये यह मन्त्र निःसंदेह
सिद्ध होगा ही; किंतु दूसरे किसीके लिये वह सिद्ध नहीं ही
सकता | प्रिये | इस मन्त्रके लिये लग्न, तिथि) नश्चत्र) वार
और योग आदिका अधिक विचार अपेक्षित नहीं है | यह
मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत् ही रहता है | यह
महामन्त्र कभी किसीका शशज्नु नहीं होता | यह सदा सु्िद
सिद्ध अथवा साध्य ही रदेगा सिद्ध गुरुके उपदेशसे प्राप्त हुआ
मन्त्र सुसिद्ध कहलाता है। असिद्ध गुरुका भी दिया हुआ
मन्त्र सिद्ध फह्दा गया है | जो केवल परमरासे प्राह्ष हुआ
है, किसी गुरुके उपदेशसे नहीं मिला है) वह मन्त्र साथ होता |
# आचार: परमों धर्म झाचारः परम पंनम |
आचार: परमा विश्ना भाचारः परमा गतिः॥
आचारद्दीन: पुरुषों छोके भवति निन्दितः ।
परत्र च सुखी न स्थात्तसादाचारवान् भवेद ॥
( श्ि० प्ृ० था० सू० उ० हा० १४ । ५५-५३ )
बायवीयसंहिता |
वि बाप आओ
है। जो मुझमें; मन्त्र तथा गुरुमें अतिशय श्रद्धा रखनेवाला
है; उसको मिला हुआ मन्त्र किसी गुरुके द्वारा साधित हो या
अताधित; सिद्ध होकर ही रहता है; इसमें संशय नहीं है ।
इसलिये अधिकारकी दृश्सि विप्नयुक्त होनेवाले दूसरे मन््त्रोंको
त्यागकर विद्वान् पुरुष साक्षात् परमा विद्या पद्माक्षरीका आश्रय
ले | दूसरे मन्त्रोके सिद्ध हो जानेसे ही यह मन्त्र सिद्ध नहीं
होता | परंतु इस महामन्त्रके सिद्ध होनेपर वे दूसरे मन्त्र
अवश्य पिद्ध हो जाते हैं । महेश्वरि ! जेसे अन्य देवताओंके
प्राप्त होनेपर भी में नहीं प्राप्त होता; परंतु मेरे प्रात्त होनेपर
वे सब देवता प्राप्त हो जाते हैं, यह्दी न््याय इन सब मन्त्रोंके
# त्रिविध दीक्षाका निरूपण; शक्तिपातकी आवश्यकता
५१३
लिये भी है | सब मन्त्रोंके जो दोष हैं; वे इस मन्त्र सम्भव
नहीं हैं। क्योंकि यह मन्त्र जाति आदिकी अपेक्षा न
रखकर प्रवृत्त होता है | तथापि छोटे-छोटे तुच्छ फलोंके लिये
सहसा इस मन्त्रका विनियोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि
यह मन्त्र मह्ामन् फल देनेवाला है । ह
उपमन्यु कहते हँ--यदुनन्दन ! इस प्रकार चिशुल-
धारी महादेवजीने तीनों लोकॉंके हितके लिये साक्षात् महादेवी
पावतीसे इस पश्चाक्षर मन्त्रकी विधि कही थी, जो एकाग्रचित्त
हो भक्तिभावसे इस प्रसंगको सुनता या सुनाता है, वह सब
पापोसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होता है। ( अध्याय १४ )
ज-:जयक्च्यफडरू
त्रिविध दीक्षाका निरूपण, शक्तिपातकी आवश्यकता तथा उसके लक्षणोंका वणन, गुरुका महत्त्व, ज्ञानी
गुरुसे ही मोक्षकी ग्राप्ति तथा गुरुके द्वारा शिष्यकी परीक्षा
श्रीक्षण बोले--भगवन् | आपने मन्त्रका माहात्म्य
तथा उसके प्रयोगका विधान बताया) जो साक्षात् बेदके तुल्य
है। अब में उत्तम शिव-संस्कारकी विधि सुनना चाहता हूँ:
जिसे मन्त्र-ग्रहणके प्रकरणमें आपने कुछ सूचित किया था ।
ह वात मुझे भूली नहीं है।
उपमन्युने कहा--अच्छा, मैं तुम्हें शिवद्धारा कथित
सम पवित्र संस्कारका विधान बता रहा हूँ, जो समस्त पार्पो-
ग शोधन करनेवाल्य है । मनुष्य जिसके प्रभावसे पूजा
दि उत्तम अधिकार प्राप्त कर लेता है; उस षडध्वशोधन
मेंको संस्कार कहते हैं । संस्कार भर्थात् शुद्धि करनेसे ही
का नाम संस्कार है | यह विज्ञान देता है और पाशबन्धनको
गण करता है। इसलिये इस संस्कारको ही दीक्षा भी कहते
(| शिव-शा्रमें परमात्मा शिवने “शाम्मवी)? ध्याक्ती? और
मानी) तीन प्रकारकी दीक्षाका उपदेश किया है। गुर्के
“आयात माजसे, स्पदसि तथा सम्भाषणसे भी जीवकों जो
जा शंका ताश करनेवाली संज्ञा सम्यक् बुद्धि प्राप्त होती
« गम्भवी दीक्षा कहछयमती है । उस दीक्षाके भी दो भेद
*तत और तीज्रतरा । पाशेंके क्षीण होनेमें जो शीघ्रता
, “दवा होती है; उसीके भेदसे ये दो भेद हुए हैं | जिस
.' पाल सिद्धि या शान्ति प्राप्त होती है; वही तीव्रतरा
हि परी है। जीवित पुरुषके पापका अत्यन्त शोधन करने-
हे रे वश बा उसे तीत्रा कह्य गया है। मु योगमार्गसे
५५५ भपेश करके ज्ञान-हश्सि जो ज्ञानवती दीक्षा
_ + 5३ शक्तो कही गयी है। क्रियावती दीक्षाको मान््त्री
'ए५७ पु७ झं० ६५-..-
7२ 5
दीक्षा कहते हैं| इसमें पहले होमकुष्ड और यश्मण्डपका
निर्माण किया जाता है । फिर गुरु बाहरसे मन्द या मन्दतर
उद्देश्यको लेकर शिष्यका संस्कार करते हैं। शक्तिपातके
अनुसार शिष्य गुरुके अनुग्रहका भाजन होता है। शेव-घर्मका
अनुसरण शक्तिपातमूलक है; अतः संक्षेपस्त उसके विपयमें
निवेदन किया जाता है | जिस शिष्यमें गुझकी शक्तिका पात
नहीं हुआ; उसमें शुद्धि नहीं आती तथा उसमें न तो विद्या,
न शिवाचार, न मुक्ति और न सिद्धियाँ ही होती हैं; अतः
प्रचुर शक्तिपातके लक्षणोंको देखकर गुर श्ञान अथवा क्रियाके
द्वारा शिष्यका शोधन करें। जो मोहवश इसके विपरीत
आचरण करता है; वह दुबुंद्धि नष्ट हो जाता है; अतः गुर
सब प्रकारसे शिप्यका परीक्षण करे। उत्कृष्ट बोध ओर
आनन्दकी प्राप्ति ही शक्तिपातका लक्षण दै। क्योंकि वह परमा-
शक्ति प्रवोधानन्दरूपिणी ही दै। आनन्द और बोचका लक्षण है
अन्तःकरणमें ( सात्विक ) विकार । जब अन्तःकरण द्ववित द्ोता
है, तब बाह्य शरीरमें कम्प, रोमाश्च) स्व॑रविकार, नत्नविकार
और अज्ञविकार प्रकट होते हैं ।
शिप्य भी शिवपूजन आदिम गुदका समक प्रात करके,
अथवा उनके साथ रह करके उनमें प्रकट दोनेवाले इन
लक्षणोंसे गुरकी परीक्षा करे । शिष्य गुदकझा शिक्षतीय हता
है और उसका गुरके प्रति गौरव होता दे | इसलिये स्बंथा
छू... % न
१. -+ + ब्के ब्प्तस
१. कण्ठसे गद्दवाभीका प्रछट शदा। २- केदाल अंशुरात
होना । ३. शर्ररमें समन ( उदता ) दबा हद भादिश इदय
दीना ।
' #£ नमो रुद्राय शान्ताय ब्रह्मणे परमात्मने # | संक्षिप्त-शिवपुराणाडु
५१७३
्थ्य्य््स्य्ख्ज्य्ख्ज्ज्ख्््््प्ज्य्शय़्््िंकऊज्ज्म्जज्फकलफ्फत++ह>त्_-_ ता +जतस््््िदड-::ः: 5 52७२ उचचच:
प्रयक्ञ करके शिष्य ऐसा आचरण करे) जो गुरुके गोखके
अनुरूप हो | जो गुरु है; वह शिव कहा गया है ओर जो
शिव है, वह गुरु माना गया है | विद्याके आकारमें शिव ही
गुरु बनकर विराजमान हैं । जैसे शिव हैं, वेसी विद्या है।
जैसी विद्या हैः वैसे गुरु हैं | शिव, विद्या और गुरुके पूजनसे
समान फल मिलता है । शिव सर्वेदेवात्मक हैं और गुरु
संबमन्त्रमय | अतः सम्पूर्ण य्षसे गुरुकी आश्ाको शिरोधार्य॑
करना चाहिये | यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहनेवाला और
बुद्धिमान है तो वह गुरुके प्रति मन वाणी ओर क्रियाद्वारा
कभी मिथ्याचार---कपय्पू् बर्ताव न करे | गुरु आज्ञा दें या
न दें; शिष्य सदा उनका हित ओर प्रिय करे । उनके सामने
ओर पीठ पीछे भी उनका कार्य करता रहे । ऐसे आचारसे युक्त
गुरु-भक्त और सदा मनमें उत्साह रखनेवाल्ा जो गुरुका प्रिय
कार्य करनेवाल्य शिष्य है, वही शैव धर्मेकि उपदेशका अधिकारी
है। यदि गुरु गुणवानः विद्वान) परमानन्दका प्रकाशक,
तत्त्वेत्ता ओर शिवभक्त है तो वही मुक्ति देनेवाल्य है, दूसरा
नहीं । ज्ञान उत्पन्न करनेवाला जो परमानन्दजनित तत्त्व है;
उसे जिसने जान लिया है; वही आनन्दका साक्षात्कार करा
सकता है | ज्ञानरहित नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता ।
नौकाएँ: एक दूसरीको पार लगा सकती हैं, किंतु क्या
कोई शिला दूसरी शिलाको तार सकती है ! नाममात्रके गुरुसे
नाममात्रकी ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है। जिन्हें तत्वका शान
है, वे ही खयं मुक्त होकर दूसरोंको भी मुक्त करते हैं | तत्त्व-
हीनको केसे बोध होगा ओर बोधके बिनां केसे “आत्मा? का
अनुभवे होगा १& जो आत्मानुभवसे झृत्य है, वह प्यश्ुः
कहलाता है | पशुकी प्रेरणासे कोई पश्ुत्वको नहीं लाँघ सकता;
अतः तत्वज्ञ पुरुष ही भ्मुक्त' ओर “मोचक?” हो सकता है;
अज्ञ नहीं। समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त, सम्पूर्ण शाज्रोंका शाता
तथा सब प्रकारके उपाय-विधानका जानकार होनेपर भी जो
तत्वज्ञानसे हीन है, उसका जीवन निष्फछ है | जिस पुरुषकी
अनुभवपर्य॑न्त बुद्धि तत्त्वके अनुसंधानमें प्रदत्त होती है;
उसके दर्शन) स्पश आदिसे परमानन्दकी प्राप्ति होती है । अतः
हो; बुद्धिमान् पुरुष उसीको अपना गुरु चुने; दूसरेको नहीं।
योग्य गुरुका जबतक अच्छी तरह ज्ञान न हो जाय; तवतक
विनयाचारचतुर मुमुक्षु शिष्योंकों उनकी निरन्तर सेवा करनी
चाहिये | उनका अच्छी तरह ज्ञान--सम्यक् परिचय हो जानेपर
उनमें सुस्थिर भक्ति करे | जबतक तत्त्वका वोध न प्राप्त हो
जाय; तबतक निरन्तर गुरुसेवनमें लगा रहे । तत््वको न तो
कभी छोड़े ओर न किसी तरह भी उसकी उपेक्षा ही करे।
जिसके पास एक वष॑तक रहनेपर भी शिष्यको थोड़ेसे भी
आनन्द ओर प्रवोधकी उपलब्धि न हो; वह शिष्य उसे छोड़कर
दूसरे गुरुका आश्रय ले |
गुरुको भी चाहिये कि वह अपने आश्रित ब्राह्मणजातीय
शिष्यकी एक वर्षतक परीक्षा करे । क्षत्रिय शिष्यकी दो वर्ष
ओर वेश्यकी तीन वर्धतक परीक्षा करे । प्राणोंको संकटमें
डालकर सेवा करने ओर अधिक धन देने आदिका अनुकूल-
प्रतिकूछ आदेश देकर, उत्तम जातिवालोंको छोटे काममें लगाकर
और छोर्थेंको उत्तम काममें नियुक्त करके उनके थैर्य और
सहनशीलताकी परीक्षा करे । गुर्के तिरस्कार आदि करनेपर
भी जो विषादको नहीं प्राप्त होते; वे ही संयमी। शुद्ध तथा
शिव-संस्कार कर्मके योग्य हैं | जो किसीकी हिंसा नहीं करते,
सबके प्रति दया होते, सदा हृदयमें उत्साह रखकर सब
कार्य करनेको उद्यत रहते, अभिमानद्ूत्य। बुद्धिमान ओर
स्पर्धारहित होकर प्रिय वचन बोलते, सरल, कोमल; स्वच्छ;
विनयशील) सुस्थिरचित्त, शोचाचारसे संयुक्त ओर शिवभक्त
होते; ऐसे आचार-व्यवहारवाले ह्विजातियोंकी मनः वाणी
शरीर ओर क्रियाद्वारा यथोचित रीतिसे शुद्ध करके तत्तका
बोध कराना चाहिये, यह शास््रोंका निर्णय है। शिव-तंस्कार
कर्ममें नारीका स्वतः अधिकार नहीं है। यदि वह शिवमक्त
हो तो पतिकी आज्ञासे ही उक्त छंस्कारकी अधिकारिणी होती
है। विधवा स््रीका पुत्र आदिकी अनुमतिसे ओर कब्याका
पिताकी आज्ासे शिव-संस्कारमें अधिकार होता है । शो
पतितों और वर्ण-संकरोंके लिये घडध्यशोधन ( शिव-संस्कार )
का विधान नहीं है | वे भी यदि परमकारण शिवमें स्वामार्वि्
अनुराग रखते हों तो शिवका चरणोदक लेकर अपने पापों
जिसके सम्पर्कसे ही उत्कृष्ट बोधस्वरूप आनन्दकी प्राप्ति सम्भव शुद्धि करें | ( अध्याय १५ )
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# अन्योन््य॑ तारयेन्नीका कि शिलछा तारयेच्छिलाम् | एतस्य नाममात्रेण. मुक्तिव. नाममात्रिका ॥
ये: पुनविंदितं तक्वं ते मुकक्त्वा मोचयन्त्यपि | त्वहीने कुतों बोध: कुतों झ्ात्मपरिग्रहः ॥
(् शि० पु० वा० छूं० उ० ख० १५। 3८-३५ )
बायवीयसंहिता |
% समय-संस्कार या समयाचरकी दीक्षाकी विधि #
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